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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

Lovely Anand

Love is life
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आह ....तनी धीरे से ...दुखाता
(Exclysively for Xforum)
यह उपन्यास एक ग्रामीण युवती सुगना के जीवन के बारे में है जोअपने परिवार में पनप रहे कामुक संबंधों को रोकना तो दूर उसमें शामिल होती गई। नियति के रचे इस खेल में सुगना अपने परिवार में ही कामुक और अनुचित संबंधों को बढ़ावा देती रही, उसकी क्या मजबूरी थी? क्या उसके कदम अनुचित थे? क्या वह गलत थी? यह प्रश्न पाठक उपन्यास को पढ़कर ही बता सकते हैं। उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।

इस उपन्यास में इंसेस्ट एक संयोग है।
अनुक्रमणिका
भाग 126 (मध्यांतर)
भाग 127 भाग 128 भाग 129 भाग 130 भाग 131 भाग 132
भाग 133 भाग 134 भाग 135 भाग 136 भाग 137 भाग 138
भाग 139 भाग 140 भाग141 भाग 142 भाग 143 भाग 144 भाग 145 भाग 146 भाग 147 भाग 148 भाग 149 भाग 150 भाग 151 भाग 152 भाग 153 भाग 154
 
Last edited:

Rekha rani

Well-Known Member
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बहुत ही सुंदर उपडते दिया है , बहन भाई को कैसे नियति एक दूसरे के पास ला रही है उसका स्टिकलेखन किया है, सोनू और सुगना धीरे धीरे आगे बढ़ रहे है, बिना सोच समझ के, बस नियति ने कैसे उनका मिलन लिखा है वही देखना है अब, उधर सरयू सिंह सोनी की तरह आशक्त है, देखें नियति ने इनके लिए भी कुछ सोचा है क्या,
 

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
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आपको इस कहानी के पटल पर देख कर अच्छा लगा।
दरअसल इंसेस्ट लिखना मुझे भी पसंद नहीं आता परंतु इस फोरम के अधिकतर पाठक यही पसंद करते हैं मैंने यह कहानी इंसेस्ट थीम पर जरूर शुरू की है पर शायद यह कहानी कुछ अलग लगे...
बाकी आपकी प्रशंसा के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद और आभार
जी सही कहा आपने कि अधिकांश लोग यहाँ incest पढ़ने ही आते हैं। लेकिन अगर आप Kala Nag भाई की कहानी पढें तो पाएँगे कि उनकी कहानी पसंद करने वाले भी कई लोग हैं। और वो तो सेक्स भी नहीं लिखते। मेरी भी रोमांटिक और नॉन इरोटिक कहानियों को भी पाठकों ने पसंद किया है। इसलिए आप भी अपनी सहज वृत्ति के हिसाब से लिखिए। आपके लेखन को प्रेम और सहयोग मिलेगा 👍
 

विनय07

New Member
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भाग 92
सरयू सिंह अपने मन में सुखद कल्पनाएं लिए कल्पना लोक में विचरण करने लगे. कई दृश्य धुंधले धुंधले उनके मानस पटल पर घूमने लगे कजरी… पदमा सुगना… और अब मनोरमा….. मानस पटल पर अंकित इन चार देवियों में अब भी सुगना नंबर एक पर ही थी…

सरयू सिंह को यदि यह पता न होता की सुगना उनकी पुत्री है तो वह सुगना को जीवन भर अपनी अर्धांगिनी बनाकर रखते…और सारे जहां की खुशियां उसकी झोली में अब भी डाल रहे होते….

रात बीत रही थी सूरज गोमती नदी के आंचल से निकलकर लखनऊ शहर को रोशन करने के लिए बेताब था।

अब आगे..

आज लखनऊ की सुबह बेहद सुहानी थी… गंगाधर स्टेडियम में सोनू और उसके साथियों के शपथ ग्रहण समारोह के लिए दिव्य व्यवस्था की गई थी… सफेद वस्त्रों से बने पांडाल पर गेंदे के फूल से की गई सजावट देखने लायक थी…बड़े-बड़े कई सारे तोरण द्वार बनाए गए थे। उन पर की गई सजावट सबका मन मोहने वाली थी। सुगना अपने दोनों छोटे बच्चों के साथ सज धज कर तैयार होकर और सोनू और सरयू सिंह के साथ गंगाधर स्टेडियम में प्रवेश कर रही थी।

सुगना इतनी भव्यता की आदी न थी वह आंखें फाड़ फाड़ कर गंगाधर स्टेडियम में की गई सजावट का आनंद ले रही थी.. सुगना यह बात भूल रही थी कि वह स्वयं नियति और नियंता की अनूठी कृति है।


जो स्वयं सबका मन मोहने वाली थी वह गंगाधर स्टेडियम की सजावट में खोई हुई थी वह जिस रास्ते से गुजर रही थी आसपास के लोग उसे एकटक देख रहे थे।

जाने सुगना के शरीर में ऐसा कौन सा आकर्षण था कि हर राह चलता व्यक्ति उसे एकटक देखता रह जाता सांचे में ढली मदमस्त काया साड़ी के आवरण में भी उतनी ही कामुक थी जितनी साड़ी के भीतर।

शिफॉन की साड़ी ने उसकी काया को और उभार दिया था भरी-भरी चूचियां पतली गोरी कमर और भरे पूरे नितंब हर युवा और अधेड़.. सुगना के शरीर पर एक बार अपनी निगाह जरूर फेर लेता। और जिसने उसके कोमल और मासूम चेहरे को देख लिया वह तो जैसे उसका मुरीद हो जाता। एक बार क्या बार-बार जब तक सुगना उसकी निगाहों की के दायरे में रहती वह उस खूबसूरती का आनंद लेता।

सुगना धीरे-धीरे दर्शक दीर्घा में आ गई…

सोनू ने सुगना और सरयू सिंह के बैठने का प्रबंध किया और सुगना का पुत्र सूरज सरयू सिंह की गोद में आकर उनसे खेलने लगा सूरज और सरयू सिंह का प्यार निराला था। सरयू सिंह की उम्र ने सूरज को उन्हें बाबा बोलने पर मजबूर कर दिया था ….

मधु सुगना की गोद में बैठी चारों तरफ एक नए नजारे को देख रही थी उस मासूम को क्या पता था कि आज उसके पिता सोनू एक प्रतिष्ठित पद की शपथ लेने जा रहे थे..

सूट बूट में सोनू एक दूल्हे की तरह लग रहा था था . सुगना ने अधिकतर युवकों को सूट-बूट विवाह समारोह के दौरान ही पहनते देखा था।

सुगना की निगाहें बार-बार सोनू पर टिक जाती और वह अपनी हथेलियों को मोड़ कर अपने कान के पास लाती और मन ही मन सोनू की सारी बलाइयां उतार लेती मन ही मन वह अपने अपने इष्ट देव से सोनू को हर खुशियां और उसकी हर इच्छा पूरी करने के लिए वरदान मांगती.. परंतु शायद सुगना यह नहीं जानती थी कि इस समय सोनू के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ एक इच्छा थी और वह सिर्फ सुगना ही पूरा कर सकती थी। और वह इच्छा पाठको की इच्छा से मेल खाती थी।

सुगना की प्रार्थना भगवान ने भी सुनी और नियति ने भी जिस मिलन की प्रतीक्षा सोनू न जाने कब से कर रहा था सुगना ने अनजाने में ही अपने इष्ट देव से सोनू की खुशियों के रूप में वही मांग लिया था..

मंच पर गहमागहमी बढ़ गई…. सभी मानिंद लोक मंच पर आसीन हो चुके थे मुख्य अतिथि का इंतजार अब भी हो रहा था।


अचानक पुलिस वालों के सुरक्षा घेरे में एक महिला आती हुई दिखाई पड़ी। दर्शक दीर्घा में कुछ लोग खड़े हो गए… फिर क्या था… एक के पीछे एक धीरे धीरे सब एक दूसरे का मुंह ताकते ……..परंतु उन्हें खड़ा होते देख स्वयं भी खड़े हो जाते … कुछ ही देर में पंडाल में बैठे सभी लोग खड़े हो गए सुगना और सरयू सिंह भी उनसे अछूते न थे धीरे-धीरे महिला मंच के करीब आ गई।

सुगना की निगाह उस महिला पर पड़ते सुगना बोल उठी…

"अरे यह तो मनोरमा मैडम है…अब तक सरयू सिंह ने भी मनोरमा को देख लिया था जिस मनोरमा को बीती रात उन्होंने जी भर कर चोदा था आज वह चमकती दमकती अपने पूरे शौर्य और ऐश्वर्य में अपने काफिले के साथ इस मंच पर आ चुकी थी।

उद्घोषणा शुरू हो चुकी थी…और सभी अपने अपने मन में चल रहे विचारों को भूलकर उद्घोषणा सुनने में लग गए…

आज मनोरमा के चेहरे पर एक अजब सी चमक थी सरयू सिंह और मनोरमा की निगाहें मिली। मनोरमा ने न चाहते हुए भी सरयू सिंह के चेहरे से अपनी निगाहें हटा ली और सामने बैठी अपनी जनता को सरसरी निगाह से देखने लगी।.

मंच पर बैठने के पश्चात उसने अपनी निगाहों से सुगना को ढूंढने की कोशिश की ….सरयू सिंह के बगल में बैठी सुगना को देखकर मनोरमा ने मुस्कुरा कर सुगना का अभिवादन किया। परंतु सुगना ने अपना हाथ उठाकर मनोरमा का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की। सुगना के मासूमियत भरे अभिवादन से मनोरमा खुद को ना रोक पाई और उसने भी हाथ उठाकर सुगना के अभिवादन का जवाब दे दिया।


दर्शक दीर्घा में बैठे सभी लोग उस शख्स की तरफ देखने लगे जिसके लिए मनोरमा ने अपने हाथ हिलाए थे… सुगना को देखकर सब आश्चर्यचकित थे मनोरमा और सुगना के बीच के संबंध को समझ पाना उनके बस में न था…सरयू सिंह मन ही मन घबरा रहे थे की कहीं सुगना और मनोरमा अपनी बातें एक दूसरे से साझा न कर लें…

डर चेहरे से तेज खींच लेता है…. सरयू सिंह अचानक खुद को निस्तेज महसूस कर रहे थे.. वह वह अपना ध्यान मनोरमा से हटाकर सूरज के साथ खेलने लगे..

उधर मंच पर बैठी मनोरमा सरयू सिंह और सुगना को देख रही थी नियति ने दो अनुपम कलाकृतियों को पूरी तन्मयता से गढ़ा था उम्र का अंतर दरकिनार कर दें तो शायद सरयू सिंह और सुगना खजुराहो की दो मूर्तियों की भांति दिखाई पड़ रहे थे एक बार के लिए मनोरमा ने अपने प्रश्न के उत्तर में सुगना को खड़ा कर लिया परंतु उसका कोमल और तार्किक मन इस बात को मानने को तैयार न था कि सरयू सिंह अपनी पुत्री की उम्र की पुत्रवधू सुगना के साथ ऐसा संबंध रख सकते है…

मंच पर मनोरमा मैडम का उनके कद के अनुरूप भव्य स्वागत किया गया । सरयू सिंह मनोरमा की पद और प्रतिष्ठा के हमेशा से कायल थे और आज उसे सम्मानित होता देख कर स्वयं गदगद हो रहे थे। मनोरमा के सम्मान से उन्होंने खुद को जोड़ लिया था आखिर बीती रात मनोरमा और सरयू सिंह एक ऐसे रिश्ते में आ चुके थे जो शायद आगे भी जारी रह सकता था।

स्वागत भाषण के पश्चात अब बारी थी इस प्रोग्राम के सबसे काबिल और होनहार युवा एसडीएम को बुलाने..की…

सभी प्रतिभागीयों के परिवार के लोग उस व्यक्ति के नाम का इंतजार कर रहे थे जो इस ट्रेनिंग की बाद हुई परीक्षा में अव्वल आया था और जिसे इस कार्यक्रम में सबसे पहले सम्मानित किया जाना था..

प्रतिभागियों के परिवार को शायद इसका अंदाजा न रहा हो परंतु सभी प्रतिभागी यह जानते थे कि उनका कौन इस ट्रेनिंग प्रोग्राम की शान था और वही निर्विवाद रूप से इस ट्रेनिंग प्रोग्राम का सबसे होनहार व्यक्ति था।

उद्घोषक ने मंच पर आकर कहा …

अब वह वक्त आ गया है कि इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के सबसे होनहार और लायक प्रतिभागी का नाम आप सबके सामने लाया जाए आप सब को यह जानकर हर्ष होगा कि यह वही काबिल प्रतिभागी हैं जिन्होंने पिछली बार पीसीएस परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था…

उद्घोषक के कहने से पहले ही भीड़ से संग्राम सिंह …संग्राम सिंह…. की आवाज गूंजने लगी…

अपने सोनू का नाम भीड़ के मुख से सुनकर सुगना आह्लादित हो उठी उसने पीछे मुड़कर देखा। पीछे खड़ी भीड़ गर्व से संग्राम सिंह का नाम ले रही थी।

उद्घोषक ने भीड़ की आवाज थमने का इंतजार किया और बोला आप लोगों ने सही पहचाना वह संग्राम सिंह ही हैं मैं मंच पर उनका स्वागत करता हूं और साथ ही स्वागत करता हूं उनकी बहन सुगना जी का जिनके मार्गदर्शन और सहयोग से संग्राम सिंह जी ने यह मुकाम हासिल किया है। सुगना बगले झांक रही थी…उसे इस आमंत्रण की कतई उम्मीद न थी।

उद्घोषक ने एक बार फिर कहा मैं संग्राम सिंह जी से अनुरोध करता हूं कि अपनी बहन सुगना जी को लेकर मंच पर आएं और मनोरमा जी के द्वारा अपना पुरस्कार प्राप्त करें..

सोनू न जाने किधर से निकलकर सुगना के ठीक सामने आ गया सुगना मंच पर जाने में हिचक रही थी परंतु नाम पुकारा जा चुका था सरयू सिंह ने मधु को सुगना की गोद से लेने की कोशिश की परंतु वह ना मानी और सुगना अपनी गोद में छोटी मधु को लेकर सोनू के साथ मंच की तरफ बढ़ चली…


मंच पर पहुंचकर सुगना को एक अलग ही एहसास हो रहा था सारी निगाहें उसकी तरफ थी। मनोरमा मैडम के पास पहुंचकर मनोरमा ने सोनू और सुगना दोनों से हाथ मिलाया। सुगना की हथेली को छूकर मनोरमा को एहसास हुआ जैसे उसने किसी बेहद मुलायम चीज को छू लिया हो मनोरमा एक बार फिर वही बात सोचने लगी कि ग्रामीण परिवेश में रहने के बावजूद सुगना इतनी सुंदर और इतनी कोमल कैसे थी ।

दो सुंदर महिलाएं और सोनू कैमरे की चकाचौंध में स्वयं को व्यवस्थित कर रहे थे फोटोग्राफी पूरी होने के पश्चात उद्घोषक ने सुगना को माइक देते हुए कहा

"अपने भाई के बारे में कुछ कहना चाहेंगी?"

सुगना का गला रूंध आया अपने भाई की सफलता पर सुगना भाव विभोर थी उसके मुंह से शब्द ना निकले परंतु आंखों से बह रहे खुशी के हाथों ने सुगना की भावनाओं को जनमानस के सामने ला दिया..

सुगना ने अपने कांपते हाथों से माइक पकड़ लिया और अपने बाएं हाथ से अपने खुशी के आंसू पूछते हुए बोली..

"मेरा सोनू निराला है आज उसने हम सब का मान बढ़ाया है मैं भगवान से यही प्रार्थना करूंगी कि उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो और वह हमेशा खुश रहे…"

तालियों की गड़गड़ाहट ने एक बार फिर सुगना को भावविभोर कर दिया उसने आगे और कुछ न कहा तथा माइक सोनू को पकड़ा दिया..


आखिरकार माइक सोनू उर्फ संग्राम सिंह के हाथों में आ गया। उसने सब को संबोधित करते हुए कहा मेरी

"मेरी सुगना दीदी मेरा अभिमान है मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और मैंने यह निश्चय किया है कि जिसने मेरे जीवन को सजा सवार कर मुझे इस लायक बनाया है मैं जीवन भर उनकी सेवा करता रहूंगा मैं इस सफलता में अपनी मां पदमा और अपने सरयू चाचा का भी शुक्रगुजार हूं…"


पंडाल में बैठे लोग एक बार फिर तालियां बजाने लगे। सूरज भी अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से अपने मामा सूरज के लिए ताली बजा रहा था।

सुगना और सोनू के इस भावुक क्षण में वासना न जाने कहां गायब हो गई थी समाज में सोनू और सुगना एक आदर्श भाई-बहन के रूप में प्रतिस्थापित हो चुके थे।

सोनू के पश्चात और भी प्रतिभागियों का सम्मान किया गया। सम्मान समारोह के पश्चात सुगना गंगाधर स्टेडियम से बाहर आ गई…वह मनोरमा मैडम से और कुछ बातें करना चाहती थी परंतु मंच पर उसके और मनोरमा मैडम के बीच की दूरी इतनी ज्यादा थी की उसको पाट पाना असंभव था।


सोनू आज बेहद प्रसन्न था. वह अपनी बड़ी बहन सुगना को हर खुशी से नवाजना चाहता था। ट्रेनिंग के पैसे उसके खाते में आ चुके थे और वह अपनी सुगना दीदी की पसंद की हर चीज उसके कदमों में हाजिर करना चाहता था।

बाहर धूप हो चुकी थी सुबह का सुहानापन अब गर्मी का रूप ले चुका था बच्चे असहज महसूस कर रहे थे सोनू ने सुगना से कहा

" रिक्शा कर लीहल जाओ"

"सूरज खुश हो गया और चहकते हुए बोला

"हां मामा"

सोनू ने रास्ते में चलते हुए दो रिक्शे रोक लिए अब बारी रिक्शा में बैठने की थी।


नियति दूर खड़ी नए बनते समीकरणों को देख रही थी सूरज और सरयू सिंह एक रिक्शे में बैठे और दूसरे में सोनू और सुगना। सोनू की गोद में उसकी पुत्री खेल रही थी …. बाहर भीड़ से निकल रहे लोग रिक्शे में बैठे सोनू और सुगना को देखकर अपने मन में सोच रहे थे कि यदि सोनू और सुगना पति-पत्नी होते तो शायद यह दुनिया की सबसे आदर्श जोड़ी होती। गोद में मधु सोनू और सुगना को पति-पत्नी के रूप में सोचने को मजबूर कर रही थी।

राह चलते व्यक्ति के लिए रिक्शे में बैठे स्त्री पुरुष और गोद में छोटे बच्चे को देखकर यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि वह भाई बहन है…

रिक्शा जैसे ही सिग्नल पर खड़ा हुआ पास के रिक्शे में बैठी एक युवा महिला ने सुगना की गोद में खेल रही मधु को देखकर कहा..

" कितनी सुंदर बच्ची है"

साथ बैठी अधेड़ महिला ने कहा

"जब बच्चे के मां बाप इतने सुंदर है तो बच्चा सुंदर होगा ही" औरत ने अपने अनुभव से रिश्ता सोच लिया।

उस औरत की आवाज सुनकर सुगना ने तपाक से जवाब दिया…

"ये मेरा भाई है पति नहीं"

शायद सुगना सोनू के बारे में ही सोच रही थी जिसकी जांघें सुगना से रगड़ खा रही थी। सुगना सचेत थी और सोनू से सुरक्षित दूरी बनाए हुए थी।

स्त्री पुरुष के बीच रिश्तों का सही अनुमान लगाना आपके अनुभव और विचार पर निर्भर करता है जिन लोगों ने मंच पर सुगना और सोनू को आदर्श भाई बहन के रूप में देखा था अब वह रिक्शे पर बैठे सोनू और सुगना को देखकर उन्हें पति पत्नी ही समझने लगे..थे..

वैसे भी रिश्ते भावनाओं के अधीन होते हैं …सामाजिक रिश्ते चाहे जितने भी प्रगाढ़ क्यों न हो यदि उनके बीच वासना ने अपना स्थान बना लिया वह रिश्तो को दीमक की तरह खा जाती है।


सोनू और सुगना जो आज से कुछ समय पहले तक एक आदर्श भाई बहन थे न जाने कब उनके रिश्तो के बीच दीमक लग चुकी थी। यदि सोनू अपने जीवन के पन्ने पलट कर देखें तो इसमें बनारस महोत्सव का ही योगदान माना जाएगा… जिसमें उसने पहली बार सुगना को सिर्फ और सिर्फ एक नाइटी में देखा था शायद उसके अंतर्वस्त्र भी उस समय उसके शरीर पर न थे…उसी महोत्सव के दौरान जब उसने सुगना को लाली समझकर पीछे से पकड़कर उठा लिया था और अपने तने हुए लंड को सुगना के नितंबों में लगभग धसा दिया था।

उसके बाद से वासना एक दीमक की तरह सोनू के दिमाग में अपना घर बना चुकी थी।भाई बहन के रिश्तो को तार-तार करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लाली ने अदा की थी जो मुंह बोली बहन होने के बावजूद अपने पति के सहयोग से सोनू से बेहद करीब आ गई थी और अब उसके साथ हर तरह के वासना जन्य कृत्य कर रही थी।

सोनू के कोमल मन पर धीरे धीरे भाई-बहन के बीच संबंधों का मोल कम होता गया था और वासना अपना आकार बढ़ाती जा रही थी.और अब वर्तमान में सोनू सुगना को अपनी बड़ी बहन के रूप में कम अपनी अप्सरा के रूप में ज्यादा देखता था.. और उसे प्रसन्न और खुश करने के लिए जी तोड़ कोशिश करता था…


सोनू और सुगना दोनों शायद एक दूसरे के बारे में ही सोच रहे थे वक्त कब निकल गया पता ही न चला। धीरे-धीरे रिक्शा गेस्ट हाउस में पर पहुंच चुका था…

सोनू रिक्शे से उतरा और सुगना को अपने हाथों का सहारा देकर उतारने की कोशिश की… सुगना की कोमल हथेलियां अपनी हथेलियों में लेते ही सोनू को एक अजब सा एहसास हुआ उसका लंड अपनी जगह पर सतर्क हो गया। रास्ते में दिमाग में चल रही बातें ने उसके लंड पर लार की बूंदे ला दी थी..


वासना सचमुच अपना आकार बढ़ा रही थी।

कमरे में पहुंचकर सुगना और सोनू अभी अपनी पीठ सीधी ही कर रहे थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई ..

"कम ईन" सोनू ने आवाज दी।


बाहर खड़े व्यक्ति ने दरवाजा खोला और अंदर आकर बोला

" सर मनोरमा मैडम की गाड़ी आई है उनका ड्राइवर आपको बुला रहा है…"

सोनू घबरा गया…वह उठकर बाहर आया और गेस्ट हाउस के बाहर मनोरमा मैडम की गाड़ी देखकर उसके ड्राइवर के पास गया और बोला

"क्या बात है?"

"मनोरमा मैडम ने यह पर्ची सुगना जी के लिए दी है"

सोनू ने कांपते हाथों से वह पर्ची ली उसके मन में न जाने क्या-क्या चल रहा था । सुगना और मनोरमा की एक दो चार बार ही मुलाकात हुई थी यह बात सोनू भली भांति जानता था परंतु मनोरमा मैडम सुगना दीदी के लिए कोई संदेश भेजें यह उसकी कल्पना से परे था।


वह भागते हुए सुगना के कमरे में आ गया और सुगना से बोला

" दीदी मनोरमा मैडम ने देख तोहरा खातिर का भेजले बाड़ी "

सोनू के हांथ में खत देखकर सुगना ने बेहद उत्सुकता से कहा

"तब पढ़त काहे नइखे"

सोनू ने पढ़ना शुरू किया..

"सुगना जी मैं मंच पर आपसे ज्यादा बातें नहीं कर पाई और आपको समय न दे पाई पर मेरी विनती है कि आप अपने बच्चों सरयू सिंह जी और सोनू के साथ मेरे घर पर आए और दोपहर का भोजन करें इसी दौरान कुछ बातें भी हो जाएंगी… मैं आपका इंतजार कर रही हूं"

मनोरमा का निमंत्रण पाकर सुगना खुश हो गई वह सचमुच मनोरमा से बातें करना चाहती थी सोनू ने जब यह खबर सरयू सिंह को दी उनके होश फाख्ता हो गए एक अनजान डर से उनकी घिग्गी बंध गई उन्होंने कहा

"सोनू बेटा हमरा पेट दुखाता तू लोग जा हम ना जाईब"

सुगना ने भी सरयू सिंह से चलने का अनुरोध किया और बोली

"मनोरमा मैडम राऊर कतना साथ देले बाड़ी आपके जाए के चाहीं"

सरयू सिंह क्या जवाब देते हैं वह मनोरमा का आमंत्रण और और खातिरदारी और अंतरंगता तीनों का आनंद बीती रात ले चुके थे और अब सुगना के साथ जाकर वह वहां कोई असहज स्थिति नहीं पैदा करना चाहते थे।

उनकी दिली इच्छा तो यह थी कि सुगना और मनोरमा कभी ना मिले परंतु नियति को नियंत्रित कर पाना उनके बस में ना था। जब वह स्थिति को नियंत्रित करने में नाकाम रहे उन्होंने पलायन करना ही उचित समझा और सब कुछ ऊपर वाले के हवाले छोड़ कर चादर तान कर सो गए।

सुगना और सोनू मनोरमा मैडम के घर जाने के लिए तैयार होने लगे दोनों ..

नियति सक्रिय थी कहानी की और कहानी की पटकथा को अपनी कल्पनाओं से आकार दे रही थी..

दोनों बच्चे एंबेसडर कार में बैठकर चहक उठे सूरज आगे ड्राइवर के बगल में बैठ कर उससे ढेरों प्रश्न पूछ रहा था जैसे कार चलाना एक ही पल में सीख लेगा..

मनोरमा की एंबेसडर कार सरयू सिंह की दोनों प्रेमिकाओं को एक दूसरे से मिलाने के लिए लखनऊ की सड़कों पर सरपट दौड़ रही थी और सोनू अपनी मैडम के घर जाने को तैयार बड़े अदब से अपने कपड़े ठीक कर रहा था..

कुछ होने वाला था…

शेष अगले भाग में…



पाठकों की संख्या मन मुताबिक होने के कारण मैं यह अपडेट कहानी के पटल पर डाल रहा हूं।

पर अपडेट 90और 91 ऑन रिक्वेस्ट ही उपल्ब्ध है..

जिन पाठकों की इस अपडेट पर प्रतिक्रिया आ जाएगी उन्हें अगला अपडेट एक बार फिर भेज दिया जाएगा आप सबका साथ ही इस कहानी को आगे बढ़ाएगा जुड़े रहिए और कहानी का आनंद लेते रहे धन्यवाद
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी आप आइसे ही परिवेश की और भी नई कहानियां लिखने की कृपा करे
 

Kala Nag

Mr. X
Prime
4,343
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जी सही कहा आपने कि अधिकांश लोग यहाँ incest पढ़ने ही आते हैं। लेकिन अगर आप Kala Nag भाई की कहानी पढें तो पाएँगे कि उनकी कहानी पसंद करने वाले भी कई लोग हैं। और वो तो सेक्स भी नहीं लिखते। मेरी भी रोमांटिक और नॉन इरोटिक कहानियों को भी पाठकों ने पसंद किया है। इसलिए आप भी अपनी सहज वृत्ति के हिसाब से लिखिए। आपके लेखन को प्रेम और सहयोग मिलेगा 👍
🙏❤️🙏
 

Seema3284

❣️Desi long detailed roleplay ❤️❤️ shy queen
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हायय्य्यय्य
क्या दशा हुई होगी सोनू की
पर एक बार फिर सोनू और लाली का मिलन होना जरूरी है और जब मिलन हो तो दोनो जानते हो की ओखली लाली की है पर मन में सुगना और बेतहसा सोनू उस प्रेम गली में अपना तूफान समा दे
 

Kalpana singh

New Member
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भाग 95

सोनू ने पतले लहंगे के पीछे छुपे सुगना के मादक नितंबों को अपनी जांघों और पेडू प्रदेश पर महसूस करना शुरू कर दिया जैसे-जैसे सोनू का ध्यान केंद्रित होता गया उसके लंड में तनाव आने लगा.. सोनू के लंड का सुपाड़ा सुगना की कमर से सट रहा था शायद यह लंबाई में अंतर होने की वजह से था।


सोनू पूरी तरह सुगना से सटा हुआ था.. उसके मजबूत खूंटे जैसे लंड में तनाव आए और सुगना को पता ना चले यह संभव न था। सोनू के लंड में आ रहे तनाव को देखकर सुगना आश्चर्यचकित थी.. और अब वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी…. उसके दिमाग में सोनू के लंड की तस्वीर घूमने लगी…

अब आगे

सोनू का लंड सुगना पहले भी देख चुकी थी..लाली की बुर में तेजी से आगे पीछे होते हुए सोनू के मजबूत लंड की तस्वीर उसके दिलो-दिमाग पर छप चुकी थी और न जाने कितनी बार वह अपने स्वप्न में वह उस लंड को देख चुकी थी। उस दिन हैंडपंप के नीचे सोनू नहाते समय जिस तरह अपने लंड को और उसके सुपाड़े को सहला रहा था वह बेहद उत्तेजक था … सुगना के दिमाग में वही दृश्य घूमने लगे..

सुगना सोच रही थी… क्या सोनू के लंड में आया हुआ तनाव उसकी वजह से था? उसे अपने भाई से ऐसी उम्मीद नहीं थी। सुगना ने अगल-बगल नजर दौड़ाई और सोनू के लंड में आए इस तनाव का कारण जानने की कोशिश की।


एक और युवती सुगना से कुछ ही दूर पर खड़ी थी परंतु उसके शरीर की बनावट देखकर सुगना समझ गई निश्चित ही यह तनाव उस युवती की वजह से न था… तो क्या उसके भाई सोनू का लंड उसके लिए ही खड़ा हुआ था?.

हे भगवान अब वह क्या करें? सुगना अब असहज महसूस कर रही थी। उसका रोम-रोम सिहर उठा। ह्रदय की धड़कन तेज हो गई। जिस अवस्था में वह थी कुछ कर पाना संभव न था। वह इस बारे में सोनू से कुछ भी बोल पाने की स्थिति में न थी।

फिर भी सुगना ने अपने शरीर को थोड़ा अगल-बगल कर सोनू को यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि वह उससे दूर हो जाए। परंतु यह सोनू के लिए भी संभव न था। सोनू के पीछे भी एक दो व्यक्ति खड़े थे और पीछे जाना संभव न था। सुगना के हिलने डुलने की वजह से सोनू को भी हिलना पड़ा और गाहे-बगाहे सोनू का लंड सुगना के नितंबों के बीच आ गया।

लंड का सुपाड़ा सुगना की पीठ पर था परंतु लंड का निचला भाग सुगना की नितंबों के बीच की घाटी में आ चुका था।

ट्रेन और वासना धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहीं थी..

ट्रेन के आउटर स्टेशन और मुख्य स्टेशन के बीच ट्रेन न जाने कितनी बार पटरियां बदलती है और पटरियां बदलते समय ट्रेन की हिलने डुलने की गति और बढ़ जाती है।

आज यह गति सोनू को बेहद प्यारी लग रही थी जब भी ट्रेन हिलती सुगना और उसके बीच में एक घर्षण होता और वह सोनू के लंड एक बेहद सुखद एहसास देता..


सोनू अपनी कमर हिला कर अपने आनंद को और बढ़ाना चाह रहा था परंतु अपनी बड़ी बहन सुगना की नजरों में गिरना नहीं चाह रहा था। जिस सुखद पल को नियति ने उसे स्वाभाविक रूप से प्रदान किया था उस अहसास को अपने हाथों से गवाना नही चाहता था।

लाली के साथ भरपूर कामुक क्रियाकलाप करते करते सोनू में अब धैर्य आ चुका था…


उसने यथासंभव अपने आप को संतुलित रखते हुए ट्रेन के हिलने से अपने लंड में हो रहे कोमल घर्षण और हलचल को महसूस करने लगा…

ट्रेन के हिलने से सुगना और सोनू के बीच का दबाव कभी कम होता कभी ज्यादा परंतु सोनू के लंड और सुगना के नितंबों का साथ कभी ना छूटता.. और कभी इसकी नौबत भी आती तो सोनू स्वतः ही उस दबाव को बढ़ा देता… यह मीठा और उत्तेजक एहसास सोनू को बेहद पसंद आ रहा था..

जिस तरह सोनू अपनी बड़ी बहन सुगना को खुद से दूर नहीं करना चाहता था ठीक उसी प्रकार सोनू का लंड सुगना के नितंबों के कोमल और मादक के स्पर्श से दूर नहीं होना चाहता था..

ट्रेन के पटरी या बदलने से खटखट की आवाजें ट्रेन में आ रही परंतु न तो यह सुगना को सुनाई दे रही थी और नहीं सोनू को ….सुगना और सोनू के दिमाग में इस समय कुछ और ही चल रहा सोनू अपने सपने में देखी गई बातों को याद कर रहा था और अपने मन में सुगना के कोमल और मादक बदन को अनावृत कर रहा था.. और उधर सुगना सोनू के लंड के स्पर्श को महसूस कर रही थी और सोनू के लंड के आकार का अनुमान लगा रही थी..

एक पल के लिए सोनू के मन में आया कि वह दरवाजे के सपोर्ट को छोड़कर अपने दोनों हाथ सुगना की चुचियों पर ले आए और उसे मसलते हुए अपने लंड को उसके नितंबों के बीच पूरी तरह घुसा दे..


परंतु यह सोच सिर्फ और सिर्फ उसके उत्तेजक खयालों की देन थी.. हकीकत में ऐसा कर पाना संभव न था। सुगना के साथ ऐसी ओछी हरकत करने का परिणाम भयावह हो सकता था…

कामुक सोच और उत्तेजना में चोली दामन का संबंध है..

सोनू अपनी सोच में सुगना को और नग्न करता गया और …. उसका लंड और भी संवेदनशील होता गया..

सरयू सिंह अब भी सूरज के साथ बातें कर रहे और मधु अपनी मां सुगना के कंधे पर सर रखकर सो रही थी।

सोनू की उत्तेजना अब परवान चढ़ चुकी थी। लाली को घंटों चोद चोद कर थका देने वाला सोनू का वह मजबूत लंड आज सुगना के नितंबों के सानिध्य में आकर जैसे अपना तनाव खोने को तत्पर था।

सुगना स्वयं अपने मन में चल रहे गंदे संदे खयालों से जूझ रही थी.. और उसकी बुर हमेशा की तरह उसकी बातों को नजरअंदाज करते हुए अपने होठों से लार टपक आने लगी थी। न जाने वह निगोडी क्यों सोनू के लंड के ख्याल मात्र से सुगना से विद्रोह पर उतारू हो जाती ऐसा लगता जैसे उसके लिए रिश्तो की मर्यादा का कोई मोल ना हो।


सुगना असहज हो रही थी उसने सोनू को खुद से दूर करने की सूची और अपने नितंबों को पीछे की तरफ हल्का धकेल कर सोनू को दूर करने की कोशिश की।

यही वह वक्त था जब सुगना के नितंबों ने सोनू के लंड पर एक बेहद मखमली दबाव बना दिया… सोनू के सब्र का बांध टूट गया।

सोनू का अपनी बड़ी बहन के प्रति भावनाओं का सैलाब फूट पड़ा.. अंडकोशो ने वीर्य उगलना शुरू कर दिया सोनू स्खलित होने लगा उसका लंड उछल उछल कर वीर्य वर्षा करने लगा….

परंतु हाय री किस्मत सोनू की सारी भावनाएं सोनू की पजामी को न भेद सकीं और उसका ढेर सारा वीर्य उसकी पजामी को गीला करता रहा।

स्खलित होता हुआ लंड एक अलग ही कंपन पैदा करता है जिन स्त्रियों में इस कलित होते हुए लंड को अपने हाथों में पकड़ा होगा वह वीर्य के बाहर निकलते वक्त उसके कंपन को अपनी उंगलियों पर अवश्य महसूस किया होगा…

सुगना को तो जैसे इसमें महारत हासिल थी वैसे भी नियति ने अब तक उसके भाग्य में जो दो पुरुष दिए थे वह दोनों अपनी जांघों के बीच विधाता की अनुपम धरोहर के लिए घूमते थे…

सरयू सिंह और सुगना के धर्मपति रतन दोनो एक मज़बूत लंड के स्वामी थे …


सुगना अपने नितंबों पर लंड की वह थिरकन महसूस कर रहीं थी।.दिल में भूचाल लिए वह एकदम शांत थी…हे भगवान सोनू स्खलित हो रहा था…. और वह अनजाने में अपने ही छोटे भाई सोनू को स्खलित होने में मदद कर रही थी..

सोनू का स्खलन पूर्ण होते ही…. वासना न जाने कहां फुर्र हो गई सिर्फ और सिर्फ आत्मग्लानि थी …आज सोनू ने अपनी बड़ी और सम्मानित बहन सुगना के नितंबों पर अपना लंड रगड़ते हुए खुद को स्खलित कर लिया था ..पर अब शर्मिंदगी महसूस कर रहा था..

वासना के अधीन होकर की गई बातें और कृत्य वासना का उफान खत्म होने के बाद हमेशा अफसोस का कारण बनते हैं जिह्वा और हरकतों पर लगाम न लगाने वाले अपने अंतर्मन में चल रहे अति उत्तेजना और अपने अपेक्षाकृत घृणित विचारों को अपने साथी को बता जाते हैं। यह उनके चरित्र को उजागर करता है।

जब तक सोनू कुछ और सोचता ट्रेन में एक बार फिर गहमागहमी चालू हो गई थी ट्रेन लखनऊ स्टेशन के प्लेटफार्म पर आ रही थी अंदर फसे यात्री अब उग्र हो रहे थे परंतु सोनू शांत था और सुगना भी।


सरयू सिंह ने सुगना के लिए रास्ता बनाया और सोनू से कहा

"संभाल के उतर जाईह"

सुगना इस स्थिति में न थी कि वह सोनू से कुछ कह पाती और न सोनू इस स्थिति में था कि वह सुगना से प्यार से विदा ले पाता… अब से कुछ देर पहले उसने जो किया था या जो हुआ था उसका गुनाहगार सिर्फ और सिर्फ सोनू था परंतु नियति सुगना को भी उतना ही कसूरवार मान रही थी..

खैर जो होना था वह हो चुका था सोनू को सुगना का लखनऊ आगमन रास आ गया था.. शायद उसने अपने विधाता से आज इतना मांगा भी न था जितना नियत ने उसे प्रदान कर दिया था..

सोनू प्लेटफार्म पर उतर कर कुछ देर और खड़ा रहा सुगना ट्रेन के अंदर आ चुकी थी दोनों बच्चे सोनू की तरफ देख रहे थे सोनू ट्रेन की खिड़की से अपने हाथ अंदर डाल कर सूरज के साथ खेल रहा था परंतु सुगना अपनी नजर झुकाए हुए थी.. सोनू से हंसी ठिठोली करने वाली सुगना आज शांत थी… न जाने जिस अपराध का गुनाहगार सोनू था उस अपराध के लिए सुगना क्यों अपनी नजर झुका रही थी..

कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी सोनू ने अपने हाथ हवा में लहरा कर अपने परिवार के सदस्यों को विदा करने लगा ट्रेन के अंदर से सब ने हाथ हिलाए परंतु सुगना अब भी शांत थी पर जैसे ही सुगना को लगा कि अब वह सोनू को और नहीं देख पाएगी उसका धैर्य टूट गया..


उसने सोनू की तरफ देखा और अपने हाथ हिला कर उसका अभिवादन किया सुगना की आंखों में आंसू स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते थे यह आंसू क्यों थे यह तो हमारे संवेदनशील पाठक ही जाने परंतु सुगना असमंजस में थी।

आज अपने ही भाई के साथ वह जिस अनोखी घटना की भागीदार और साक्षी बनी थी वह निश्चित ही पाप था एक घोर पाप पर सोनू का परित्याग करना या उसके साथ कुछ भी गलत करना सुगना को कतई गवारा ना था सोनू अब भी सुगना को उतना ही प्यारा था शायद इसी वजह से सुगना सोनू को विदा करते समय अपने हाथ हिलाने से खुद को ना रोक पाई…

सुगना और सोनू का प्यार निराला था ..

ट्रेन पटरीओं पर दौड़ लगाती ओझल हो गई परंतु सुगना अब भी सोनू के दिमाग में घूम रही थी …सुगना के हाथी लाए जाने से सोनू प्रसन्न हो गया था और अब उसके होठों पर मुस्कान थी…सोनू हर्षित मन से स्टेशन के बाहर आया और ऑटो रिक्शा कर अपने हॉस्टल की तरफ निकल गया…


अगली सुबह सरयू सिंह सुगना के साथ बनारस आ चुके थे। मदमस्त सोनी नहा कर बाहर आई थी। आधुनिकता के इस दौर में सोनी भी नहा कर नाइटी पहन कर बाहर आ जाया करती थी जैसे ही सोनी ने दरवाजा खोला सरयू सिंह सामने खड़े थे…अब भी सरयू सिंह ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके सामने घर की स्त्रियां अब भी कुछ पर्दा कर लिया करती थी परंतु आज जिस अवस्था में उन्होंने सोनी को देखा था वह बेहद उत्तेजक और निगाहों में अभद्र थी। सोनी उनके चेहरे के भाव देख कर घबरा गई। उसने न तो सरयू सिंह के चरण छुए और न सुगना के अपितु उल्टे पैर भागते हुए सुगना के कमरे में आ गए….

सरयू सिंह सोनी को अंदर जाते हुए देख रहे थे। सोनी की काया में आया बदलाव सरयू सिंह बखूबी महसूस कर रहे थे। शायद सोनी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा बड़ी दिखाई पड़ने लगी थी और हो भी क्यों न विकास से कई दिनों तक जी भर कर चुदवाने के बाद सोनी में निश्चित ही शारीरिक बदलाव आया गया था…आज भी जब कभी उसे मौका मिलता वह अपने कामुक खयालों में खो जाया करती थी और अपनी छोटी सी बुर को मसल मसल कर स्खलित होने पर मजबूर कर देती थी…

शायद उसे भी अपनी कामुक अवस्था का ध्यान आ गया था .. इसीलिए वह सर्विसिंग के सामने ज्यादा देर खड़ी ना हो पाई …सोनी ने अपने वस्त्र पहने और फिर आकर सरयू सिंह और सुगना के चरण छुए। सरयू सिंह ने सोनी को आशीर्वाद दीया परंतु उसकी कामुकता या उनके दिमाग में अभी घूम रही थी…

सरयू सिंह का लंड तो न जाने लंगोट की अंधेरी कैद में भी न जाने कैसे सुंदर और कामुक युवतियों को अंदाज लेता था..

सूरज तो जैसे अपनी सोनी मौसी से मिलने के लिए बेचैन था.. वह झटपट सोनी की गोद में आ गया और फिर क्या था उसने सोनी के कोमल होठों को चूम लिया… सरयू सिंह की निगाह सूरज पर पड़ गई। उन्होंने कुछ कहा नहीं परंतु वह यह देखकर आश्चर्य में थे कि सोनी ने उसे रोका तक नहीं अपितु वह उसका साथ दे रही थी। सूरज की यह क्रिया बाल सुलभ थी या आने वाले समय की झांकी यह कहना कठिन था पर जो कुछ हो रहा था वह असामान्य था छोटे बच्चों को भी कामुक महिलाओं के होंठ चूमने का कोई अधिकार नहीं है ऐसा सरयू सिंह का मानना था..

लाली अब तक चाय लेकर आ चुकी थी सरयू सिंह चाय पी रहे थे और लाली सोनू के बारे में ढेर सारी बातें पूछ रही थी.. लाली का सोनू के बारे में जानने की इतनी इच्छा …..लाली का यह व्यवहार बुद्धिमान सरयू सिंह की बुद्धि के परे था… उधर सोनी सूरज को लेकर कमरे में आ गई थी ….

सूरज अभी भी सोनी की गोद में था और कभी उसके गाल कभी होठों को चूम रहा था… सोनी ने सूरज को बिस्तर पर खड़ा कर दिया और हमेशा की तरह एक बार फिर उसके जादुई अंगूठे को सहला दिया …आगे क्या होना था यह सबको पता था सूरज में अपनी सोनी मौसी के बाल पकड़े और उसे खींचकर नीचे झुका दिया सोनी ने जी भर कर उस अद्भुत मुन्नी के दर्शन किए जो अब विकास के लंड के बराबर अपना आकार बढ़ा चुकी थी सोनी को निदान पता था… उसने अपने होंठ अपने कार्य पर लगा दिए कुछ ही देर में सूरज खिलखिलाते हुआ सोनी के बाल सहलाने लगा…सोनी की जांघों के बीच गर्माहट बढ़ गई थी…

"सोनी सूरज के भेज बिस्कुट खा ली" सुगना ने आवाज लगाई..


सुगना यह बात भली-भांति जानती थी कि अब भी सोनी एकांत पाकर अपनी हरकत करने से बाज नहीं आएगी परंतु सुगना को सोनी की आदत से कोई विशेष तकलीफ न थी…. सूरज भी खुश था और सोनी भी….

घर में सब के चेहरों पर खुशियां व्याप्त थी परंतु सुगना असहज थी जब जब उसे ट्रेन की वह घटना याद आती वह खुद को उस घटना के लिए जिम्मेदार मानती जिसमें शायद उसका सक्रिय योगदान न था वह तो सोनू ही था जो अपनी बहन की सुंदरता और मादक शरीर पर फिदा हुआ जा रहा था…


यदि सुगना अपना सुखद वैवाहिक जीवन जी रही होती तो शायद सोनू इस गलत विचारधारा में न पड़ता परंतु इसे परिस्थितियों का दोष कहें या स्त्री पुरुष के बीच स्वाभाविक आकर्षण परंतु सोनू अब बेचैन हो उठा था।…

सुगना नहाने जा चुकी थी…सोनू द्वारा दी गई लहंगा और चोली उतारते समय उसे एक बार फिर सोनू की याद आ गई दिमाग में ट्रेन के दृश्य घूमने लगे जैसे-जैसे सुगना नग्न होती गई वासना उसे अपनी आगोश में लेती गई।

सुगना ने अपनी कोमल और उदास बुर को सर झुका कर देखना चाहा..

ट्रेन में छाई उत्तेजना ने सुगना की जांघों पर भी प्रेमरस के अंश छोड़ दिए थे…दिमाग में सोनू की मजबूत लंड की कल्पना और नितंबों की बीच उसे प्रभावशाली घर्षण ने सुगना की बुर को लार टपकाने के लिए विवश कर दिया था…

जैसे जैसे सुगना उस सुख चुकी लार को साफ करने लगी..उसकी बुर ने और उत्सर्जन प्रारंभ कर दिया..

सुगना ने अपनी अभागन बुर को थपकियां देकर धीरज रखने को कहा पर न उसकी उंगलियों ने उसकी बात मानी और न बुर ने…सोनू ….आ ….ई………सुगना के होंठ न जाने क्या क्या बुदबुदा रहे थे सुगना की मनोस्थिति पढ़ पाना नियति के लिए भी एक दुरूह कार्य था…

कुछ ही देर में सुगना ने अपना अधूरा स्खलन पूर्ण कर लिया….

सोनू ने अगले दो-तीन दिनों में अपना सामान बांधा और बनारस आने की तैयारी करने लगा।

सोनू की पोस्टिंग बनारस से कुछ ही दूर जौनपुर में हुई थी। सोनू बेहद प्रसन्न था। जौनपुर से बनारस आना बेहद आसान था सोनू मन ही मन अपने ख्वाब बुनने लगा …

सोनू के मन में सिर्फ एक ही चिंता थी कि अब जब वह सुगना के सामने आएगा तो वह उससे कैसा व्यवहार करें कि क्या उसने उसे ट्रेन में हुई घटना के लिए माफ कर दिया होगा?

सोनू के पास सिर्फ और सिर्फ प्रश्न थे उसे सुगना का सामना करना ही था। उसने अपने इष्ट से सब कुछ सामान्य और अनुकूल रहने की कामना की और अपना सामान बांध कर बनारस विस्तृत सुगना के घर आ गया..सामन पैक करते वक्त उसे रहीम और फातिमा की चूदाई गाथा की वह फटी किताब भी दिखाई पड़ गई और सोनू मुस्कुराने लगा.. उसने न जाने क्या सोच कर उस अधूरी किताब को भी रख लिया…

अगली सुबह सोनू अपना ढेर सारा सामान आटो में लाद कर सुगना के घर के सामने खड़ा था..

उसका कलेजा धक धक कर रहा था..

शेष अगले भाग में..
Nice Update

Ye update seduce karne wala raga...
भाग 95

सोनू ने पतले लहंगे के पीछे छुपे सुगना के मादक नितंबों को अपनी जांघों और पेडू प्रदेश पर महसूस करना शुरू कर दिया जैसे-जैसे सोनू का ध्यान केंद्रित होता गया उसके लंड में तनाव आने लगा.. सोनू के लंड का सुपाड़ा सुगना की कमर से सट रहा था शायद यह लंबाई में अंतर होने की वजह से था।


सोनू पूरी तरह सुगना से सटा हुआ था.. उसके मजबूत खूंटे जैसे लंड में तनाव आए और सुगना को पता ना चले यह संभव न था। सोनू के लंड में आ रहे तनाव को देखकर सुगना आश्चर्यचकित थी.. और अब वह स्वयं को असहज महसूस कर रही थी…. उसके दिमाग में सोनू के लंड की तस्वीर घूमने लगी…

अब आगे

सोनू का लंड सुगना पहले भी देख चुकी थी..लाली की बुर में तेजी से आगे पीछे होते हुए सोनू के मजबूत लंड की तस्वीर उसके दिलो-दिमाग पर छप चुकी थी और न जाने कितनी बार वह अपने स्वप्न में वह उस लंड को देख चुकी थी। उस दिन हैंडपंप के नीचे सोनू नहाते समय जिस तरह अपने लंड को और उसके सुपाड़े को सहला रहा था वह बेहद उत्तेजक था … सुगना के दिमाग में वही दृश्य घूमने लगे..

सुगना सोच रही थी… क्या सोनू के लंड में आया हुआ तनाव उसकी वजह से था? उसे अपने भाई से ऐसी उम्मीद नहीं थी। सुगना ने अगल-बगल नजर दौड़ाई और सोनू के लंड में आए इस तनाव का कारण जानने की कोशिश की।


एक और युवती सुगना से कुछ ही दूर पर खड़ी थी परंतु उसके शरीर की बनावट देखकर सुगना समझ गई निश्चित ही यह तनाव उस युवती की वजह से न था… तो क्या उसके भाई सोनू का लंड उसके लिए ही खड़ा हुआ था?.

हे भगवान अब वह क्या करें? सुगना अब असहज महसूस कर रही थी। उसका रोम-रोम सिहर उठा। ह्रदय की धड़कन तेज हो गई। जिस अवस्था में वह थी कुछ कर पाना संभव न था। वह इस बारे में सोनू से कुछ भी बोल पाने की स्थिति में न थी।

फिर भी सुगना ने अपने शरीर को थोड़ा अगल-बगल कर सोनू को यह एहसास दिलाने की कोशिश की कि वह उससे दूर हो जाए। परंतु यह सोनू के लिए भी संभव न था। सोनू के पीछे भी एक दो व्यक्ति खड़े थे और पीछे जाना संभव न था। सुगना के हिलने डुलने की वजह से सोनू को भी हिलना पड़ा और गाहे-बगाहे सोनू का लंड सुगना के नितंबों के बीच आ गया।

लंड का सुपाड़ा सुगना की पीठ पर था परंतु लंड का निचला भाग सुगना की नितंबों के बीच की घाटी में आ चुका था।

ट्रेन और वासना धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रहीं थी..

ट्रेन के आउटर स्टेशन और मुख्य स्टेशन के बीच ट्रेन न जाने कितनी बार पटरियां बदलती है और पटरियां बदलते समय ट्रेन की हिलने डुलने की गति और बढ़ जाती है।

आज यह गति सोनू को बेहद प्यारी लग रही थी जब भी ट्रेन हिलती सुगना और उसके बीच में एक घर्षण होता और वह सोनू के लंड एक बेहद सुखद एहसास देता..


सोनू अपनी कमर हिला कर अपने आनंद को और बढ़ाना चाह रहा था परंतु अपनी बड़ी बहन सुगना की नजरों में गिरना नहीं चाह रहा था। जिस सुखद पल को नियति ने उसे स्वाभाविक रूप से प्रदान किया था उस अहसास को अपने हाथों से गवाना नही चाहता था।

लाली के साथ भरपूर कामुक क्रियाकलाप करते करते सोनू में अब धैर्य आ चुका था…


उसने यथासंभव अपने आप को संतुलित रखते हुए ट्रेन के हिलने से अपने लंड में हो रहे कोमल घर्षण और हलचल को महसूस करने लगा…

ट्रेन के हिलने से सुगना और सोनू के बीच का दबाव कभी कम होता कभी ज्यादा परंतु सोनू के लंड और सुगना के नितंबों का साथ कभी ना छूटता.. और कभी इसकी नौबत भी आती तो सोनू स्वतः ही उस दबाव को बढ़ा देता… यह मीठा और उत्तेजक एहसास सोनू को बेहद पसंद आ रहा था..

जिस तरह सोनू अपनी बड़ी बहन सुगना को खुद से दूर नहीं करना चाहता था ठीक उसी प्रकार सोनू का लंड सुगना के नितंबों के कोमल और मादक के स्पर्श से दूर नहीं होना चाहता था..

ट्रेन के पटरी या बदलने से खटखट की आवाजें ट्रेन में आ रही परंतु न तो यह सुगना को सुनाई दे रही थी और नहीं सोनू को ….सुगना और सोनू के दिमाग में इस समय कुछ और ही चल रहा सोनू अपने सपने में देखी गई बातों को याद कर रहा था और अपने मन में सुगना के कोमल और मादक बदन को अनावृत कर रहा था.. और उधर सुगना सोनू के लंड के स्पर्श को महसूस कर रही थी और सोनू के लंड के आकार का अनुमान लगा रही थी..

एक पल के लिए सोनू के मन में आया कि वह दरवाजे के सपोर्ट को छोड़कर अपने दोनों हाथ सुगना की चुचियों पर ले आए और उसे मसलते हुए अपने लंड को उसके नितंबों के बीच पूरी तरह घुसा दे..


परंतु यह सोच सिर्फ और सिर्फ उसके उत्तेजक खयालों की देन थी.. हकीकत में ऐसा कर पाना संभव न था। सुगना के साथ ऐसी ओछी हरकत करने का परिणाम भयावह हो सकता था…

कामुक सोच और उत्तेजना में चोली दामन का संबंध है..

सोनू अपनी सोच में सुगना को और नग्न करता गया और …. उसका लंड और भी संवेदनशील होता गया..

सरयू सिंह अब भी सूरज के साथ बातें कर रहे और मधु अपनी मां सुगना के कंधे पर सर रखकर सो रही थी।

सोनू की उत्तेजना अब परवान चढ़ चुकी थी। लाली को घंटों चोद चोद कर थका देने वाला सोनू का वह मजबूत लंड आज सुगना के नितंबों के सानिध्य में आकर जैसे अपना तनाव खोने को तत्पर था।

सुगना स्वयं अपने मन में चल रहे गंदे संदे खयालों से जूझ रही थी.. और उसकी बुर हमेशा की तरह उसकी बातों को नजरअंदाज करते हुए अपने होठों से लार टपक आने लगी थी। न जाने वह निगोडी क्यों सोनू के लंड के ख्याल मात्र से सुगना से विद्रोह पर उतारू हो जाती ऐसा लगता जैसे उसके लिए रिश्तो की मर्यादा का कोई मोल ना हो।


सुगना असहज हो रही थी उसने सोनू को खुद से दूर करने की सूची और अपने नितंबों को पीछे की तरफ हल्का धकेल कर सोनू को दूर करने की कोशिश की।

यही वह वक्त था जब सुगना के नितंबों ने सोनू के लंड पर एक बेहद मखमली दबाव बना दिया… सोनू के सब्र का बांध टूट गया।

सोनू का अपनी बड़ी बहन के प्रति भावनाओं का सैलाब फूट पड़ा.. अंडकोशो ने वीर्य उगलना शुरू कर दिया सोनू स्खलित होने लगा उसका लंड उछल उछल कर वीर्य वर्षा करने लगा….

परंतु हाय री किस्मत सोनू की सारी भावनाएं सोनू की पजामी को न भेद सकीं और उसका ढेर सारा वीर्य उसकी पजामी को गीला करता रहा।

स्खलित होता हुआ लंड एक अलग ही कंपन पैदा करता है जिन स्त्रियों में इस कलित होते हुए लंड को अपने हाथों में पकड़ा होगा वह वीर्य के बाहर निकलते वक्त उसके कंपन को अपनी उंगलियों पर अवश्य महसूस किया होगा…

सुगना को तो जैसे इसमें महारत हासिल थी वैसे भी नियति ने अब तक उसके भाग्य में जो दो पुरुष दिए थे वह दोनों अपनी जांघों के बीच विधाता की अनुपम धरोहर के लिए घूमते थे…

सरयू सिंह और सुगना के धर्मपति रतन दोनो एक मज़बूत लंड के स्वामी थे …


सुगना अपने नितंबों पर लंड की वह थिरकन महसूस कर रहीं थी।.दिल में भूचाल लिए वह एकदम शांत थी…हे भगवान सोनू स्खलित हो रहा था…. और वह अनजाने में अपने ही छोटे भाई सोनू को स्खलित होने में मदद कर रही थी..

सोनू का स्खलन पूर्ण होते ही…. वासना न जाने कहां फुर्र हो गई सिर्फ और सिर्फ आत्मग्लानि थी …आज सोनू ने अपनी बड़ी और सम्मानित बहन सुगना के नितंबों पर अपना लंड रगड़ते हुए खुद को स्खलित कर लिया था ..पर अब शर्मिंदगी महसूस कर रहा था..

वासना के अधीन होकर की गई बातें और कृत्य वासना का उफान खत्म होने के बाद हमेशा अफसोस का कारण बनते हैं जिह्वा और हरकतों पर लगाम न लगाने वाले अपने अंतर्मन में चल रहे अति उत्तेजना और अपने अपेक्षाकृत घृणित विचारों को अपने साथी को बता जाते हैं। यह उनके चरित्र को उजागर करता है।

जब तक सोनू कुछ और सोचता ट्रेन में एक बार फिर गहमागहमी चालू हो गई थी ट्रेन लखनऊ स्टेशन के प्लेटफार्म पर आ रही थी अंदर फसे यात्री अब उग्र हो रहे थे परंतु सोनू शांत था और सुगना भी।


सरयू सिंह ने सुगना के लिए रास्ता बनाया और सोनू से कहा

"संभाल के उतर जाईह"

सुगना इस स्थिति में न थी कि वह सोनू से कुछ कह पाती और न सोनू इस स्थिति में था कि वह सुगना से प्यार से विदा ले पाता… अब से कुछ देर पहले उसने जो किया था या जो हुआ था उसका गुनाहगार सिर्फ और सिर्फ सोनू था परंतु नियति सुगना को भी उतना ही कसूरवार मान रही थी..

खैर जो होना था वह हो चुका था सोनू को सुगना का लखनऊ आगमन रास आ गया था.. शायद उसने अपने विधाता से आज इतना मांगा भी न था जितना नियत ने उसे प्रदान कर दिया था..

सोनू प्लेटफार्म पर उतर कर कुछ देर और खड़ा रहा सुगना ट्रेन के अंदर आ चुकी थी दोनों बच्चे सोनू की तरफ देख रहे थे सोनू ट्रेन की खिड़की से अपने हाथ अंदर डाल कर सूरज के साथ खेल रहा था परंतु सुगना अपनी नजर झुकाए हुए थी.. सोनू से हंसी ठिठोली करने वाली सुगना आज शांत थी… न जाने जिस अपराध का गुनाहगार सोनू था उस अपराध के लिए सुगना क्यों अपनी नजर झुका रही थी..

कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी सोनू ने अपने हाथ हवा में लहरा कर अपने परिवार के सदस्यों को विदा करने लगा ट्रेन के अंदर से सब ने हाथ हिलाए परंतु सुगना अब भी शांत थी पर जैसे ही सुगना को लगा कि अब वह सोनू को और नहीं देख पाएगी उसका धैर्य टूट गया..


उसने सोनू की तरफ देखा और अपने हाथ हिला कर उसका अभिवादन किया सुगना की आंखों में आंसू स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते थे यह आंसू क्यों थे यह तो हमारे संवेदनशील पाठक ही जाने परंतु सुगना असमंजस में थी।

आज अपने ही भाई के साथ वह जिस अनोखी घटना की भागीदार और साक्षी बनी थी वह निश्चित ही पाप था एक घोर पाप पर सोनू का परित्याग करना या उसके साथ कुछ भी गलत करना सुगना को कतई गवारा ना था सोनू अब भी सुगना को उतना ही प्यारा था शायद इसी वजह से सुगना सोनू को विदा करते समय अपने हाथ हिलाने से खुद को ना रोक पाई…

सुगना और सोनू का प्यार निराला था ..

ट्रेन पटरीओं पर दौड़ लगाती ओझल हो गई परंतु सुगना अब भी सोनू के दिमाग में घूम रही थी …सुगना के हाथी लाए जाने से सोनू प्रसन्न हो गया था और अब उसके होठों पर मुस्कान थी…सोनू हर्षित मन से स्टेशन के बाहर आया और ऑटो रिक्शा कर अपने हॉस्टल की तरफ निकल गया…


अगली सुबह सरयू सिंह सुगना के साथ बनारस आ चुके थे। मदमस्त सोनी नहा कर बाहर आई थी। आधुनिकता के इस दौर में सोनी भी नहा कर नाइटी पहन कर बाहर आ जाया करती थी जैसे ही सोनी ने दरवाजा खोला सरयू सिंह सामने खड़े थे…अब भी सरयू सिंह ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके सामने घर की स्त्रियां अब भी कुछ पर्दा कर लिया करती थी परंतु आज जिस अवस्था में उन्होंने सोनी को देखा था वह बेहद उत्तेजक और निगाहों में अभद्र थी। सोनी उनके चेहरे के भाव देख कर घबरा गई। उसने न तो सरयू सिंह के चरण छुए और न सुगना के अपितु उल्टे पैर भागते हुए सुगना के कमरे में आ गए….

सरयू सिंह सोनी को अंदर जाते हुए देख रहे थे। सोनी की काया में आया बदलाव सरयू सिंह बखूबी महसूस कर रहे थे। शायद सोनी अपनी उम्र से कुछ ज्यादा बड़ी दिखाई पड़ने लगी थी और हो भी क्यों न विकास से कई दिनों तक जी भर कर चुदवाने के बाद सोनी में निश्चित ही शारीरिक बदलाव आया गया था…आज भी जब कभी उसे मौका मिलता वह अपने कामुक खयालों में खो जाया करती थी और अपनी छोटी सी बुर को मसल मसल कर स्खलित होने पर मजबूर कर देती थी…

शायद उसे भी अपनी कामुक अवस्था का ध्यान आ गया था .. इसीलिए वह सर्विसिंग के सामने ज्यादा देर खड़ी ना हो पाई …सोनी ने अपने वस्त्र पहने और फिर आकर सरयू सिंह और सुगना के चरण छुए। सरयू सिंह ने सोनी को आशीर्वाद दीया परंतु उसकी कामुकता या उनके दिमाग में अभी घूम रही थी…

सरयू सिंह का लंड तो न जाने लंगोट की अंधेरी कैद में भी न जाने कैसे सुंदर और कामुक युवतियों को अंदाज लेता था..

सूरज तो जैसे अपनी सोनी मौसी से मिलने के लिए बेचैन था.. वह झटपट सोनी की गोद में आ गया और फिर क्या था उसने सोनी के कोमल होठों को चूम लिया… सरयू सिंह की निगाह सूरज पर पड़ गई। उन्होंने कुछ कहा नहीं परंतु वह यह देखकर आश्चर्य में थे कि सोनी ने उसे रोका तक नहीं अपितु वह उसका साथ दे रही थी। सूरज की यह क्रिया बाल सुलभ थी या आने वाले समय की झांकी यह कहना कठिन था पर जो कुछ हो रहा था वह असामान्य था छोटे बच्चों को भी कामुक महिलाओं के होंठ चूमने का कोई अधिकार नहीं है ऐसा सरयू सिंह का मानना था..

लाली अब तक चाय लेकर आ चुकी थी सरयू सिंह चाय पी रहे थे और लाली सोनू के बारे में ढेर सारी बातें पूछ रही थी.. लाली का सोनू के बारे में जानने की इतनी इच्छा …..लाली का यह व्यवहार बुद्धिमान सरयू सिंह की बुद्धि के परे था… उधर सोनी सूरज को लेकर कमरे में आ गई थी ….

सूरज अभी भी सोनी की गोद में था और कभी उसके गाल कभी होठों को चूम रहा था… सोनी ने सूरज को बिस्तर पर खड़ा कर दिया और हमेशा की तरह एक बार फिर उसके जादुई अंगूठे को सहला दिया …आगे क्या होना था यह सबको पता था सूरज में अपनी सोनी मौसी के बाल पकड़े और उसे खींचकर नीचे झुका दिया सोनी ने जी भर कर उस अद्भुत मुन्नी के दर्शन किए जो अब विकास के लंड के बराबर अपना आकार बढ़ा चुकी थी सोनी को निदान पता था… उसने अपने होंठ अपने कार्य पर लगा दिए कुछ ही देर में सूरज खिलखिलाते हुआ सोनी के बाल सहलाने लगा…सोनी की जांघों के बीच गर्माहट बढ़ गई थी…

"सोनी सूरज के भेज बिस्कुट खा ली" सुगना ने आवाज लगाई..


सुगना यह बात भली-भांति जानती थी कि अब भी सोनी एकांत पाकर अपनी हरकत करने से बाज नहीं आएगी परंतु सुगना को सोनी की आदत से कोई विशेष तकलीफ न थी…. सूरज भी खुश था और सोनी भी….

घर में सब के चेहरों पर खुशियां व्याप्त थी परंतु सुगना असहज थी जब जब उसे ट्रेन की वह घटना याद आती वह खुद को उस घटना के लिए जिम्मेदार मानती जिसमें शायद उसका सक्रिय योगदान न था वह तो सोनू ही था जो अपनी बहन की सुंदरता और मादक शरीर पर फिदा हुआ जा रहा था…


यदि सुगना अपना सुखद वैवाहिक जीवन जी रही होती तो शायद सोनू इस गलत विचारधारा में न पड़ता परंतु इसे परिस्थितियों का दोष कहें या स्त्री पुरुष के बीच स्वाभाविक आकर्षण परंतु सोनू अब बेचैन हो उठा था।…

सुगना नहाने जा चुकी थी…सोनू द्वारा दी गई लहंगा और चोली उतारते समय उसे एक बार फिर सोनू की याद आ गई दिमाग में ट्रेन के दृश्य घूमने लगे जैसे-जैसे सुगना नग्न होती गई वासना उसे अपनी आगोश में लेती गई।

सुगना ने अपनी कोमल और उदास बुर को सर झुका कर देखना चाहा..

ट्रेन में छाई उत्तेजना ने सुगना की जांघों पर भी प्रेमरस के अंश छोड़ दिए थे…दिमाग में सोनू की मजबूत लंड की कल्पना और नितंबों की बीच उसे प्रभावशाली घर्षण ने सुगना की बुर को लार टपकाने के लिए विवश कर दिया था…

जैसे जैसे सुगना उस सुख चुकी लार को साफ करने लगी..उसकी बुर ने और उत्सर्जन प्रारंभ कर दिया..

सुगना ने अपनी अभागन बुर को थपकियां देकर धीरज रखने को कहा पर न उसकी उंगलियों ने उसकी बात मानी और न बुर ने…सोनू ….आ ….ई………सुगना के होंठ न जाने क्या क्या बुदबुदा रहे थे सुगना की मनोस्थिति पढ़ पाना नियति के लिए भी एक दुरूह कार्य था…

कुछ ही देर में सुगना ने अपना अधूरा स्खलन पूर्ण कर लिया….

सोनू ने अगले दो-तीन दिनों में अपना सामान बांधा और बनारस आने की तैयारी करने लगा।

सोनू की पोस्टिंग बनारस से कुछ ही दूर जौनपुर में हुई थी। सोनू बेहद प्रसन्न था। जौनपुर से बनारस आना बेहद आसान था सोनू मन ही मन अपने ख्वाब बुनने लगा …

सोनू के मन में सिर्फ एक ही चिंता थी कि अब जब वह सुगना के सामने आएगा तो वह उससे कैसा व्यवहार करें कि क्या उसने उसे ट्रेन में हुई घटना के लिए माफ कर दिया होगा?

सोनू के पास सिर्फ और सिर्फ प्रश्न थे उसे सुगना का सामना करना ही था। उसने अपने इष्ट से सब कुछ सामान्य और अनुकूल रहने की कामना की और अपना सामान बांध कर बनारस विस्तृत सुगना के घर आ गया..सामन पैक करते वक्त उसे रहीम और फातिमा की चूदाई गाथा की वह फटी किताब भी दिखाई पड़ गई और सोनू मुस्कुराने लगा.. उसने न जाने क्या सोच कर उस अधूरी किताब को भी रख लिया…

अगली सुबह सोनू अपना ढेर सारा सामान आटो में लाद कर सुगना के घर के सामने खड़ा था..

उसका कलेजा धक धक कर रहा था..

शेष अगले भाग में..
Nice update...
Ye update seduce karne wala tha.
Next update ki intezar me...
 

Kalpana singh

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हायय्य्यय्य
क्या दशा हुई होगी सोनू की
पर एक बार फिर सोनू और लाली का मिलन होना जरूरी है और जब मिलन हो तो दोनो जानते हो की ओखली लाली की है पर मन में सुगना और बेतहसा सोनू उस प्रेम गली में अपना तूफान समा दे
Bilkul sahi boli...
 
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