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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

Lovely Anand

Love is life
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आह ....तनी धीरे से ...दुखाता
(Exclysively for Xforum)
यह उपन्यास एक ग्रामीण युवती सुगना के जीवन के बारे में है जोअपने परिवार में पनप रहे कामुक संबंधों को रोकना तो दूर उसमें शामिल होती गई। नियति के रचे इस खेल में सुगना अपने परिवार में ही कामुक और अनुचित संबंधों को बढ़ावा देती रही, उसकी क्या मजबूरी थी? क्या उसके कदम अनुचित थे? क्या वह गलत थी? यह प्रश्न पाठक उपन्यास को पढ़कर ही बता सकते हैं। उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।

इस उपन्यास में इंसेस्ट एक संयोग है।
अनुक्रमणिका
भाग 126 (मध्यांतर)
भाग 127 भाग 128 भाग 129 भाग 130 भाग 131 भाग 132
भाग 133 भाग 134 भाग 135 भाग 136 भाग 137 भाग 138
भाग 139 भाग 140 भाग141 भाग 142 भाग 143 भाग 144 भाग 145 भाग 146 भाग 147 भाग 148 भाग 149 भाग 150 भाग 151 भाग 152 भाग 153 भाग 154 भाग 155 भाग 156 भाग 157 भाग 158 भाग 159 भाग 160 भाग 161भाग 162 भाग 163 भाग 164 भाग 165 भाग 166 भाग 167
 
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Deepak@123

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एपिसोड 214 मे सगुना खुद हि चरम सुख प्राप्त करना बहोत हि कामुक अपडेट है | चरम सुख प्राप्त करते हूए सगुना सोनु के बारे सोच कर रहि थी उसी टाईम सोनु आवाज दिया तब और कामुक भरा संगम देखने को मिला | बनारस महोत्सव में सोच कर हि क्या होगा यह सोच कर हि दिल रोमांचक हो गया है अगले अपडेट कि प्रीतीक्षा धन्यवाद लवलीजी|
 

Lovely Anand

Love is life
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Now it is attendance time...

Readers who are reading this story shall come forward with Sugna Picture in saree waiting for Sonu at the same bed where they had their first sex...

I will forward the next episode to them

Have a nice day
 

Nazriya

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सुगना और सोनू की शुहागरात।
उम्मीद है अपडेट भेजेंगे।

images
 

R_Raj

Engineering the Dream Life
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भाग 214

लाली ने बीती रात सुगना को अपनी बातों और सोनू की यादों की गर्माहट से सराबोर कर वासना के चरम पर पहुंचा दिया था और अपनी अब खुरदरी हो चुकी उंगलियों से सुगना के रसीले मालपुआ को करे देते हुए सुगना को स्खलन पर मजबूर कर दिया था। लाली और सुगना दोनों निहाल होकर एक सुखद नींद की आगोश में जा चुके थे।

अब आगे..
हवेली के भीतर सुबह की मद्धम धूप फैल चुकी थी, आज् सुगना देर से उठी। सुगना बाथरूम में अभी भी रात के उस मादक कृत्य को याद कर रही थी। सुगना पानी की बाल्टी के पास खड़ी थी, पर उसका ध्यान वर्तमान में कम और बीती रात के उस बवंडर में ज़्यादा था। लाली के साथ बिताई गई वह एक-एक कामुक घड़ी उसके जेहन में किसी फिल्म की तरह रील दर रील घूमने लगी थी।
जैसे ही सुगना ने स्नान करने के लिए अपने बदन से साड़ी के पल्लू को सरकाया, उसे तुरंत याद आया कि कैसे चंद घंटों पहले लाली ने इसी बेबाकी से उसके पल्लू को दरकिनार किया था। सुगना के कांपते हाथों ने जब ब्लाउज के हुक खोले, तो उसे अपनी छाती पर लाली के उन कड़े चुंबनों और सीने की वह तीखी रगड़ साफ़ महसूस होने लगी, जिसने उसकी चूचियों को उत्तेजना से तान दिया था। अब सुगना पूरी तरह से निर्वस्त्र हो चुकी थी। पानी की ठंडी बूंदें बदन पर पड़ने से पहले ही, रात की उस तपन की याद में उसका गोरा, सुगठित शरीर अंदर से सुलग रहा था। उसने आईने में अपने नंगे बदन को देखा—वही बदन, जिसे लाली ने रात भर अपनी उंगलियों से मथा था।
सुगना का हाथ अनजाने में ही अपनी जाँघों के उस संवेदनशील मुहाने, यानी अपने उस मखमली 'मालपुए' की तरफ चला गया। लाली की उंगलियों का वह पहला स्पर्श, वह गाढ़ा चिपचिपापन, और उस चरम सुख में अपनी ही भोजपुरी बोली में मर्यादा का सारा बांध तोड़कर छोटे भाई सोनू के साथ के गुप्त संबंधों को कुबूल कर लेना... यह सब याद आते ही सुगना की साँसें गुसलखाने की बंद दीवारों के बीच एक बार फिर धौंकनी की तरह तेज़ हो गईं। शर्म, लाज और वासना की एक मिली-जुली सिहरन उसके रोम-रोम में दौड़ गई। वह समझ चुकी थी कि लाली ने उसके भीतर की उस आदिम आग को दोबारा सुलगा दिया था, जिसे वह सालों से दबाए बैठी थी।
गुसलखाने की बंद दीवारों के बीच, बदन पर गिरते ठंडे पानी के बावजूद सुगना के भीतर विचारों की एक अजीब उथल-पुथल मची हुई थी। इस वक्त उसे सबसे ज़्यादा आश्चर्य, बल्कि एक गहरा धक्का इस बात पर लग रहा था कि कैसे उम्र में छोटे सोनू ने उन दोनों के बीच के उस बेहद गुप्त और वर्जित शारीरिक संबंध को लाली के सामने इस कदर उजागर कर दिया। सालों पहले, जब वे दोनों सलेमपुर की उस काली रात के बाद से अपने पुराने घर और जौनपुर के बंद कमरों में एक-दूसरे के बदन का रस लेते थे, तब दोनों ने एक-दूसरे की कसम खाई थी कि इस राज़ को वे हमेशा एक गहरा राज़ ही रखेंगे।
पानी की बूंदों को अपने चेहरे से पोंछते हुए सुगना ने ठंडे दिमाग से सोचने की कोशिश की। अचानक उसके मन में एक खयाल आया—शायद यह समय की मार थी जिसके कारण सोनू टूट गया हो। पिछले कई वर्षों से, बदली हुई परिस्थितियों और उसके स्वयं के हृदय परिवर्तन की वजह से उसने खुद को सोनू से दूर कर लिया था। इसका कारण कुछ और नहीं सिर्फ सरयू सिंह की मृत्यु थी। जब से सुगना ने यह जाना था की सरयू सिंह उसके पिता थे तब से ही उसका वासना से मोह भंग हो गया था इसी कारण सोनू और सुगना के बीच वह पुराना कामुक संबंध पूरी तरह टूट चुका था। बरसों की वह दूरी, वह शारीरिक अकेलापन और उस चरम सुख से वंचित रह जाने की छटपटाहट अब सुगना के अंतर मन पर भारी पड़ रही थी।
सुगना को लगा कि इतने सालों तक उस भारी और सुलगते हुए राज़ को अपने सीने में दबाए रखना शायद युवा सोनू के बस में नहीं रहा होगा, और इसी मानसिक हताशा या पुराने दिनों की कसक में आकर उसने लाली के सामने अपना मुंह खोल दिया। बेचारी सुगना इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सोनू ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था, बल्कि यह तो लाली का बिछाया हुआ वह शातिर झूठ और जाल था जिसमें सुगना की कामुकता और लाज एक ही झटके में घुटने टेक चुकी थी।
अतीत के इस गहरे समंदर में गोता लगाते हुए, सुगना की बंद आँखों के पीछे अब सोनू की वह गठीली और मादक युवावस्था पूरी तीव्रता के साथ उभर आई थी। गुसलखाने की खामोशी में, पानी के गिरने की आवाज़ जैसे बीते कल के किसी संगीत में बदल गई थी। वह याद करने लगी कि कैसे २५-२६ वर्ष का वह नौजवान एक अद्भुत, सुगठित और फौलादी बदन का मालिक था, जिसकी एक झलक ही सुगना के अंतर्मन के भारी सन्नाटे को चीर दिया करती थी।
सोनू के वे चौड़े कंधे, कसी हुई गठीली छाती और उसके पौरुष की वह बेबाक कड़कड़ाहट... सुगना के ज़ेहन में वह सब इतनी शिद्दत से कौंधा कि उसके रोम-रोम में एक सिहरन दौड़ गई। सोनू न केवल सुगना से बेपनाह और उग्र प्यार करता था, बल्कि उस प्यार में एक ऐसा खिंचाव था जिसे चाहकर भी झुठलाया नहीं जा सकता था। जब भी वे दोनों बंद कमरों के एकांत में, दुनिया की नज़रों से छुपकर मिलते थे, तो उनकी जोड़ी एक अप्रतिम और अद्भुत विलास को जन्म देती थी। वासना और समर्पण का वह संगम ऐसा था मानो वे दोनों एक-दूसरे के बदन के लिए ही बने हो, जहाँ सारे सामाजिक बंधन और वर्जनाएँ उस कड़े बदन की तपिश में पिघलकर राख हो जाते थे।
ऊपर से सोनू सुगना की बेहद इज्जत करता था सुगना को यह बेहद पसंद आता वह चाहे कितना भी अपनी वासना में अंधा हो पर बिना सुगना की अनुमति की वह अपनी उग्रता कभी भी जाहिर नहीं करता था।
अतीत की गहराइयों में डूबी सुगना का ध्यान अब विशेष रूप से जौनपुर के उस बंद कमरे के एकांत पर टिक गया, जहाँ लोक-लाज और मर्यादा के सारे बंधन एक झटके में टूट गए थे। वह शिद्दत से याद करने लगी कि कैसे उसने अपने इस दिव्य बदन और जाँघों के बीच छिपे उस मखमली 'मालपुए' (योनि) को पूरी तरह से, एक अनमोल दहेज की तरह, उम्र में छोटे सोनू के पौरुष को समर्पित कर दिया था। उस समर्पण में कोई हिचक नहीं थी, बल्कि अपनी जवानी का सारा रस अपने ही भाई के नाम कर देने की एक अदम्य चाहत थी और नसबंदी करा चुके सोनू को एक वैवाहिक जीवन प्रदान करना था। लाली की किस्मत में सोनू को डालकर सुगना ने उन तीनों के लिए ही मनचाहा सुख दे दिया था।
उस विशेष दिन की याद सुगना के ज़ेहन में आज भी उतनी ही साफ़ और जलती हुई थी। उसे याद आया कि कैसे सोनू ने पहली बार उसके गोरे बदन को निहारते हुए, अपनी जीभ और होठों से उसके उस संवेदनशील हिस्से को छुआ था। अपने ही भाई के मुंह और होठों की वह तीखी छुअन, और उसके द्वारा दिए गए उस पहले मुखमैथुन (ओरल सेक्स) की मादकता सुगना के पूरे वजूद को हिला गई थी। सोनू का उसके उस खूबसूरत हिस्से को पूरी दीवानगी और उग्रता से चूसना, और उस तीखे स्पर्श से बदन में उठने वाली सिसकारियां सुगना को आज भी अंदर तक झकझोर देती थीं।
यह यादें इस वक्त गुसलखाने के सन्नाटे में इतनी कामुक और तीव्र होकर उभरीं कि सुगना का पूरा बदन तपने लगा। बरसों से शांत पड़ी आग लाली की उकसाहट और इन यादों के साए में अचानक भड़क उठी थी। अपनी ही सुलगती यादों के पूरी तरह वश में होकर, सुगना का आत्मनियंत्रण जाता रहा। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी और आईने के सामने खड़े होकर अपने स्वयं के मखमली, भीगे बदन को निहारने लगी।
कांपते हाथों से उसने अपने उभरे हुए सीने, अपनी सुगठित कमर और जाँघों के मखमली हिस्सों पर धीरे-धीरे हाथ फेरना शुरू किया। पानी की ठंडी बूंदों से भीगा होने के बावजूद, उसका वह मखमली हिस्सा अंदरूनी गर्मी से सुलग उठा। उस बीती दोपहर के चरम सुख और सोनू के होठों की याद आते ही, सुगना के उस मखमली 'मालपुए' के भीतर से एक अद्भुत, गाढ़ा और अप्रतिम काम-रस अपने आप बहने लगा, जो पानी के प्रवाह के बीच भी अपनी मादक उपस्थिति दर्ज करा रहा था। ठंडे गुसलखाने में उसका अपना ही स्पर्श, उसकी बंद आँखों के पीछे सोनू के उन्हीं पुराने, बेबाक हाथों का अहसास करा रहा था। सुगना ने गहरी सांस लेते हुए आईने पर अपनी हथेलियां टिका दीं, और उसका पूरा वजूद अतीत के उस वर्जित सुख के सैलाब में पूरी तरह बह गया।
आईने के सामने खड़ी सुगना का वजूद इस वक्त पूरी तरह से अतीत की उन कामुक लपटों में घिर चुका था। पानी की ठंडी फुहारें उसके गोरे, सुगठित बदन पर बेअसर साबित हो रही थीं, क्योंकि अंदर सुलगती आग ने उसकी नसों में रक्त के प्रवाह को तूफ़ानी गति दे दी थी। सोनू के उस अद्भुत पौरुष, उसकी अगाध इज़्ज़त और जौनपुर की उस मदहोश कर देने वाली दोपहर की याद ने सुगना के आत्मनियंत्रण की आखिरी परत भी छील दी थी।
अपने अंतर्मन में सोनू के गहरे और बेबाक स्पर्श को साक्षात महसूस करते हुए, सुगना का हाथ धीरे-धीरे उसकी भीगी जाँघों के बीच बने उस मखमली मुहाने की गहराई में उतर गया। अपनी ही लंबी, कोमल उंगलियों से वह अपने उस रसीले 'मालपुए' (योनि) को अंदर तक टटोलने लगी। हर एक छुअन के साथ जौनपुर का वह पूरा दृश्य उसकी बंद आँखों के सामने सजीव हो उठा, जहाँ सोनू ने पहली बार अपना मुंह वहाँ टिकाया था। सुगना की उंगलियों कभी उस मखमली हिस्से के संवेदनशील दाने (क्लिटोरिस) को सहलातीं और पूरी शिद्दत से रगड़तीं, तो कभी वह सोनू के उस मादक और उग्र चूसने के अहसास को याद कर भीतर तक सिहर उठती।
जैसे-जैसे यादों का यह सिलसिला गहरा होता गया, गुसलखाने की बंद हवा में सुगना की उत्तेजना अपने चरम बिंदु की तरफ बढ़ने लगी। काम-रस के गाढ़े बहाव और अपनी उंगलियों की तीखी हरकत के कारण उसका पूरा शरीर अकड़ने लगा, जाँघों में एक अजीब सी बेबसी और कशिश भर गई। पैरों में उठती इस कमज़ोरी को संभालने के लिए उसने धीरे से अपनी नंगी और भीगी पीठ को गुसलखाने की ठंडी दीवार से टिका दिया। दीवार की वह ठंडक उसके तपते बदन को एक अजीब सी राहत और उत्तेजना दे रही थी।
अब सुगना पूरी तरह से उस आदिम सुख के भंवर में डूब चुकी थी। उसका एक हाथ जहाँ नीचे उस मखमली हिस्से को बेताबी से मथ रहा था, वहीं उसका दूसरा हाथ ऊपर उठकर उसकी तानकर खड़ी हो चुकी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगा। उंगलियों का यह दोहरा प्रहार और ज़ेहन में सोनू के पौरुष का वह अटूट सम्मोहन... सुगना को उस चरम स्खलन की दहलीज पर ले आया जहाँ साँसें धौंकनी बनकर हलक में अटक जाती हैं। वह बंद आँखों से, दीवार के सहारे खुद को पूरी तरह छोड़ते हुए, बरसों बाद अपनी उंगलियों के ज़रिए उसी वर्जित और अद्भुत सुख को दोबारा निचोड़ लेने के प्रयास में पूरी तरह लीन हो गई।
उल्तेजना और चरम सुख के उस आख़िरी मुहाने पर, जहाँ सुगना का पूरा बदन दीवार के सहारे पूरी तरह अकड़ चुका था और उसकी उँगलियाँ उस मखमली हिस्से से चरम रस निचोड़ लेने को बेताप थीं, ठीक उसी पल गुसलखाने के बाहर, उसके सूने कमरे में एक जानी-पहचानी, कड़क और मर्दाना आवाज़ गूंज उठी।
"दीदी... ओ सुगना दीदी! कहाँ बाड़ू तू?"
सोनू की वह रसीली और मधुर आवाज़ सीधे सुगना के कानों के परदों से टकराती हुई उसके अंतर्मन में उतर गई। यह वही समय था जब सुगना अपनी उँगलियों के प्रहार से स्खलन (orgasm) के ठीक करीब पहुँच कर ख़ाली हो रही थी, उसका पूरा वजूद उस सुखद झटके से कांप रहा था। ऐसे चरम क्षण में अचानक सोनू की आवाज़ का सुनाई देना सुगना के लिए किसी बहुत बड़े विस्मय से कम नहीं था।
एक तरफ़ उसका बदन काम-रस के सैलाब में भीगकर निढाल हो रहा था, और दूसरी तरफ़ बरसों बाद सोनू की वही आवाज़ साक्षात उसके कानों में मिसरी घोल रही थी। सुगना के कानों को अपनी ही सुनवाइयों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे लगा कि शायद यह उसकी अपनी सुलगती हुई वासना और यादों का कोई भ्रम है, कोई मायाजाल है जो इस बंद गुसलखाने में उसे सुनाई दे रहा है।
वह पूरी तरह से मंत्रमुग्ध हो चुकी थी। दीवार से टिकी उसकी पीठ, छाती पर कसा उसका हाथ और जाँघों के बीच थमी उँगलियाँ... सब कुछ जैसे एक पल के लिए जम गया। वह सांस रोककर, बिना कोई उत्तर दिए, बस उस जादुई आवाज़ को अपलक सुनती रही। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा और फूटा तो सुगना के मालपूए का अद्भुत काम रस। , सुगना इस सच से बिल्कुल अनजान थी कि मनोरमा के दफ़्तर से ज़रूरी ज़िम्मेदारी संभालने के बाद, नियति के खेल के तहत सोनू अचानक ही सुबह-सुबह बनारस हवेली की इस चौखट पर आ पहुँचा था।
गुसलखाने के उस तूफ़ानी बवंडर और स्खलन के सुखद अहसास को समेटकर सुगना जब तैयार होकर बाहर आई, तो हवेली का माहौल पूरी तरह बदला हुआ था। कुछ ही देर बाद, पूरा परिवार एक बार फिर नाश्ते की टेबल पर एक साथ मौजूद था। प्लेटों और चम्मचों की खनखनाहट के बीच सभी के चेहरे पर सोनू के अचानक आने की खुशी साफ़ देखी जा सकती थी।
सुगना ने प्लेट में नाश्ता परोसते हुए बेहद धीमी और संकोच भरी आवाज़ में सोनू से पूछा, "सोनू... तू अइसन अचानक सुबह-सुबह कैसे? सब ठीक-टाक बा नऽ?"
आज पहली बार सुगना को सोनू की मर्दाना आँखों में आँखें डालकर बात करने में एक अजीब सी, भारी शर्म और हिचक महसूस हो रही थी। उसकी नज़रें बार-बार नीचे फर्श की तरफ झुक जाती थीं। कारण बिल्कुल स्पष्ट था; वर्षों की दूरी के बाद, अभी कुछ ही देर पहले गुसलखाने में सोनू के उसी कड़े पौरुष और जौनपुर की यादों को ध्यान में रखते हुए सुगना ने अपनी कामुकता को उत्कर्ष पर पहुँचाया था। अपनी ही उंगलियों से उस मखमली 'मालपुए' को मथने के कारण उसके चेहरे और गोरे गालों पर जो कामुक लाली और रक्तिम आभा उभरी थी, उसे वह चाहकर भी पूरी तरह छुपा पाने में नाकाम साबित हो रही थी।
लाली, जो कल रात के पूरे घटनाक्रम की सूत्रधार थी, नाश्ते की मेज पर बैठी सुगना की इस हालत का पूरा आनंद ले रही थी। सुगना की चोरी पकड़े जाने के डर और उसकी हिचक को ताड़ते हुए लाली ने तिरछी नज़र से देखा और उसे छेड़ते हुए बिंदास लहजे में कहा, "अरे! जब-जब सोनू घर आवेला, तब-तब सुगना के चेहरे पर एक अजबे नूर आ जाला। सुगना तो बहुत खुश हो जाले, जैसे ओकर संसार लौट आईल हो!"
लाली के इस दोअर्थी और शरारती तंज को भांपकर सुगना की माँ पद्मा और चाची कजरी तुरंत सुगना के पक्ष में ढाल बनकर खड़ी हो गईं। पद्मा ने कचौड़ी प्लेट में रखते हुए कहा, "अरे लाली, खुश काहे नहीं होगी? ओकर प्यारा छोटा भाई बा। बचपन से सुगना ओकरा के अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करेले।" कजरी ने भी हामी भरते हुए कहा, "हाँ, भाई-बहन का अइसन सनेह तो नसीब वालों के मिलेला।"
इन सब बातों के बीच, सोनू चुपचाप चाय की चुस्की लेते हुए सुगना को बहुत ध्यान से देख रहा था। अब से कुछ देर पहले ही स्नान करके निकली सुगना का वह भीगा, खिला-खिला और सुगंधित बदन... जिसे अतीत में न जाने कितनी बार सोनू ने अपनी बाहों में भींचा था, मथा था और जिसके एक-एक अंग का चरम आनंद लिया था। पिछले कई वर्षों की लंबी दूरी और सरयू सिंह की मृत्यु के बाद सुगना के बदले रवैये के कारण सोनू के मन से वे कामुक विचार लगभग पूरी तरह जा चुके थे, वह उन्हें मर्यादा की राख मान चुका था।
परंतु, पिछले कुछ दिनों में सुगना के चेहरे पर आई यह अजीब सी मादक हंसी, उसका थरथराता बदन और इस वक्त लाज से टमाटर की तरह लाल हो रहा उसका चेहरा... सोनू के भीतर सोए हुए उस २५-२६ साल के पुराने रफ एंड टफ मर्द को एक बार फिर सुगना के उसी दिव्य बदन की तरफ तीव्र गति से आकर्षित कर रहा था। सोनू को सुगना के इस रूप में हवेली के बंद कमरों का वही पुराना, वर्जित और मीठा राज़ दोबारा धड़कता हुआ महसूस होने लगा था।
टेबल के एक कोने पर बैठे नई पीढ़ी के सदस्य—सूरज, सोनी और विकास—बड़े कौतूहल से अपनी सुगना दीदी के चेहरे को निहार रहे थे। उन्होंने सुगना को हमेशा गंभीर और शांत देखा था, लेकिन आज वह किसी खिले हुए फूल की तरह सुंदर और प्रफुल्लित लग रही थी। सूरज और विकास आपस में धीमे स्वर में सोनू के रोबीले पुलिसिया अंदाज़ की तारीफ कर रहे थे, जबकि सोनी सुगना के चेहरे की अलौकिक चमक देखकर मुस्कुरा रही थी।
वहीं टेबल के दूसरे छोर पर युवाओं की पूरी टोली जमी हुई थी। मालती, राजू, राजा, रीमा और मधु—यह पूरी युवा ब्रिगेड एक साथ बैठकर नाश्ते का आनंद ले रही थी। लेकिन इस शोरगुल के बीच, मालती और राजू ने खुद को दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया था। उनकी आँखें आपस में इस कदर जुड़ चुकी थीं मानो पूरी टेबल पर सिर्फ वे दो ही मौजूद हों।
मालती ने चाय की प्याली होठों से लगाते हुए अपनी कजरारी आँखों की कोर से राजू की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा निमंत्रण, शरारत और कल की किसी अधूरी मुलाकात की तपन साफ़ झलक रही थी। उसने अपनी पलकों को हौसले से थोड़ा झुकाया और फिर सीधे राजू की आँखों में अपनी नज़रें गाड़ दीं। राजू, जो प्लेट में रखी कचौड़ी को तोड़ने का नाटक कर रहा था, मालती की इस बेबाक और सुलगती हुई नज़र को सह नहीं पाया। उसने जब पलटकर मालती की आँखों में झांका, तो उसकी आँखों में पौरुष की चाहत और दीवानगी साफ़ दिखाई दे रही थी।
बिना एक भी शब्द बोले, दोनों ने अपनी आँखों के तीर से एक-दूसरे के बदन की चाहत को स्वीकार कर लिया था। उनकी आँखों का यह खामोश मिलन गवाही दे रहा था कि उनके बीच का संबंध बंद कमरों के उस गहरे और रसीले सुख से पूरी तरह सराबोर हो चुका है, जिसे वे इस वक्त नाश्ते की मेज पर एक-दूसरे को सौंप रहे थे। इस गुप्त खेल के साए में राजा, रीमा और मधु आपस में फुसफुसाते हुए नाश्ते की मेज पर चल रही मीठी छेड़छाड़ का मजा ले रहे थे।
राजा का ध्यान रह रहकर मालती की तरफ जाता और मालती जब जब राजा की कामुक निगाहों को अपने बदन पर महसूस करती वह सिहर जाती उसे यह डर अब भी सता रहा था कि राजा उस राज को राज रखने के बदले में न जाने उसे कौन सी कीमत वसूलेगा।
पूरी टेबल पर जहाँ बाहरी तौर पर एक सुखी और समृद्ध संयुक्त परिवार की हँसी-मजाक गूंज रही थी, वहीं अंदरूनी तौर पर अतीत की वासना, वर्तमान का आकर्षण, नई पीढ़ी के गुप्त प्रेम प्रसंग और लाली का शातिर जाल एक साथ धड़क रहा था। सुगना अपनी माँ और चाची की ओट में छुपकर अपने बहते हुए कामुक मन की सिहरन को समेटने की कोशिश कर रही थी, और सोनू अपनी चाय की चुस्की के साथ उस हवेली के पुराने, वर्जित खेल के दोबारा शुरू होने के संकेत को महसूस कर रहा था।
नाश्ते की उसी टेबल पर जहाँ चारों तरफ वासना और छुपे हुए समीकरणों की गर्माहट तैर रही थी, सूरज, सोनी और विकास के बीच का कोना भी पूरी तरह से एक मादक और कामुक तनाव में तब्दील हो चुका था। यहाँ अपराध बोध का नामोनिशान नहीं था; उसकी जगह केवल एक उग्र आकर्षण और नैनीताल की उन सर्द रातों का रसीला साया काम कर रहा था।
सूरज अब किसी भी बंधन को मानने के मूड में नहीं था। उसके मन में एक अजीब सी उन्मुक्तता और बेबाकी थी। वह नाश्ते की मेज पर पूरी तरह खुलकर, अपनी आँखों से सोनी के गोरे बदन और उसके उभरते हुए अंगों को निहार रहा था। सूरज की नज़रों में इस वक्त पौरुष की वह बेधड़क भूख थी जो समाज के नियमों को दरकिनार करने के लिए तैयार थी। वह अपनी आँखों से सोनी को यह अहसास करा रहा था कि अब वह रुकने वाला नहीं है।
सूरज की इस उन्मुक्त और सीधी कामुक नज़र ने सोनी के भीतर एक मीठा सा डर पैदा कर दिया था। सोनी के दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं, और उसकी जाँघों के भीतर एक सिहरन दौड़ रही थी। उसे इस बात का डर था कि कहीं सूरज की यह बेबाक आँखें हवेली के बाकी लोगों के सामने उनका यह गुप्त राज़ न खोल दें, लेकिन साथ ही सूरज का यह मर्दानी अंदाज़ उसे अंदर तक उत्तेजित भी कर रहा था। डर और कामुकता के इस अनूठे संगम ने सोनी की साँसों को थोड़ा भारी कर दिया था, और वह शर्माकर अपनी आँखें झुका रही थी।
वहीं पास ही बैठा विकास भी एक अलग ही स्तर की उन्मुक्तता से भरा हुआ था। उसकी आँखों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि सोनी के प्रति एक तीखा कामुक अधिकार था। सोनी को सूरज की नज़रों से डरते और सिहरते देख विकास के भीतर की आदिम आग और भड़क उठी थी।
विकास की नज़रें जब सोनी की कसी हुई कमर और उसकी भीगी हुई गर्दन पर टिकतीं, तो उसका दिमाग तुरंत नैनीताल में सूरज द्वारा दी गई पूर्णाहुति के उस मादक दृश्य को याद करता और उसके लिंग में तनाव आ जाता।
तभी सोनू की मर्दाना आवाज में सबका ध्यान खींचा..
“अब से बनारस महोत्सव तक हम बनारस में ही रहब”
पूरा परिवार खुशी से उछल पड़ा….
पद्मा ने सोनू से पूछा…काहे तोहार बदली बनारस हो गइल का?
मनोरमा मैडम हमर ड्यूटी बनारस महोत्सव में अपना साथ लगा देले बाड़ी …सोनू ने संजीदगी से उत्तर दिया..और आगे बोला..
सुगना दीदी मनोरमा मैडम तोहरा बारे में पूछत रहली हा…
मनोरमा का नाम सुनते ही सुगना को अतीत में हुई उसकी सारी मुलाकातें याद आ गई…सुगना मनोरमा के बारे में जानने के लिए बेचैन हों उठी...

शेष अगले भाग में...

Wow Nice Updates bro
sugna ka malpuwa to aaj ful hi gya bahot dino bad

baki bahar sabhi apni apni kamuk kahani ke sath. baithe hai
mahotsav ka intezar rahega
 
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