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Romance फ़िर से [चित्रमय]

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
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दोस्तों - इस अपडेट सूची को स्टिकी पोस्ट बना रहा हूँ!
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि केवल पढ़ कर निकल लें। यह केवल आपकी सुविधा के लिए है। चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए :)

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dhparikh

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ख़ैर, अंत में सोने का समय हो ही गया।

पैट्रिशिया और प्रशांत के रहने का बंदोबस्त प्रशांत के ही कमरे में किया गया था। रूचि स्वतः ही अजय के कमरे में आ गई।

अजय को रूचि की उपस्थिति बहुत अच्छी लगती थी। उसकी सच्चाई जानने के बाद भी वो अजय को अपने से छोटा ही मानती थी और अजय के लिए उसके मन में जो प्रेम था, उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया था। बल्कि वो और बढ़ा ही था - उसकी समझ में अजय पहले से भी बेहतर लड़का था, और उसके हिसाब से परफेक्ट! मानसिक और भावनात्मक रूप से वो उसकी ‘असली’ उम्र के जितनी परिपक्व थी। रागिनी को उसके सामने ला कर उसने अजय को अपने ‘वर्स्ट फियर’ का सामना करने की हिम्मत भी दी, और यह संतुष्टि भी कि उसकी पिछली ज़िन्दगी में रागिनी ने जो प्रलय मचाया था, वो इस जीवन में नहीं मचा सकेगी। एक और अच्छी बात हो गई थी - वो यह कि उसको ससुराल के रूप में अजय का घर मिल गया था। जब ईश्वर की ऐसी अनुकम्पा हो, तो कौन लड़की होगी जो अपने आप को सौभाग्यशाली नहीं समझेगी?

रूचि को अपने आलिंगन में भरते हुए अजय बोला, “मेरी जान... देखो न, इतना बिजी हो गया कि तुमसे बात भी नहीं हो सकी इतने दिनों,”

वो मुस्कुराई, “कोई बात नहीं। ... वैसे बहुत बढ़िया बंदोबस्त था दोनों शादियों में!”

अजय संतुष्टि से मुस्कुराया, ‘हाँ - बहुत से काम किये थे उसने इन दोनों शादियों के लिए,’

“मुझको तो हमारी शादी के लिए बहुत से आइडियाज आ रहे हैं,” रूचि बोली।

“फॉर एक्साम्प्ल?”

“बाद में!” रूचि बोली, “कैन यू हेल्प मी इन रिमूविंग माय क्लोथ्स?”

अजय जानता था कि चोली लहँगा उतारने में ऐसी कोई कठिनाई नहीं होती है - लेकिन रूचि का मन था कि अजय उसको निर्वस्त्र करे! तो उसको भी इस काम से क्या परहेज़ हो सकता था?

“पैट्रिशिया भाभी अच्छी हैं,” रूचि बोली।

“हम्म... भैया को लाइन पर रखेंगी,”

“हा हा हा... अरे ऐसा क्यों कहा?”

“नहीं कुछ नहीं! इट इस जस्ट दैट भैया इस ऐन अक्सोरियस पर्सन (ऐसा आदमी जो अपनी बीवी को हद से अधिक प्यार करता है, लेकिन जब तरह के व्यवहार को सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता),”

“हम्म्म... कोई बात नहीं! भाभी अच्छी हैं, मतलब घर परिवार को साथ में रखेंगी,”

“हाँ, मुझे तो लगता है कि इंडिया आने का इंस्पिरेशन भी उन्ही से आया है,”

“अच्छा है न!”

“हाँ... अच्छा एक बात बताओ? तुमने डॉक्टर को दिखाया?” अजय ने पूछा।

“हाँ... दिखाया था! आई स्पेशलिस्ट ने कहा कि कोई प्रॉब्लम नहीं है। माइग्रेन या वैसा कुछ हो सकता है...” रूचि ने कहा, “इसलिए, मेरे स्वामी, आप मुझे कुछ कहें, उससे पहले ही मैंने डॉक्टर देशपाण्डे से अपॉइंटमेंट लिया है...”

“ओह?” अजय ने पूछा, “कब का?”

“हाँ... नेक्स्ट वीक! चलोगे साथ में?”

“अरे, ये कोई पूछने वाली बात है?”

तब तक रूचि की चोली उतर गई थी। उसने अंदर कुछ भी नहीं पहना हुआ था। अजय ने रूचि को अपनी तरफ घुमा कर उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में भर कर आहिस्ते से दबाया।

“आह्ह्ह...” रूचि के गले से आनंद भरी आह निकल गई।

“क्या हुआ रूचि?” अजय ने चिंतित होते हुए पूछा।

“मेरी जान... दर्द वाली आह और सुख वाली आह में अंतर होता है!” रूचि ने मुस्कुराते हुए शरारत से कहा।

“ओह!”

वो मुस्कुराई, “वैसे एक बात है जो सर दर्द से याद आई... जब भी मैं माँ का दूध पीती हूँ न, बहुत रिलैक्स्ड हो जाती हूँ!”

अजय मुस्कुराया, “आई नो, राइट? मैं भी! ... सच में ऐसा लगता है कि जैसे कोई मेडिसिनल प्रॉपर्टीज़ हैं उनके दूध में,”

रूचि बदमाशी से मुस्कुराई, “अब तो भाभी भी विदा हो गईं... मतलब, उनका शेयर मुझको मिलेगा,”

“हा हा हा हा हा!” अजय दिल खोल कर हँसा और फिर उसका एक चूचक मुँह में ले कर उसको चूसने लगा।

रूचि को भी ये खेल बहुत पसंद आता था।

जब अजय के होंठ उसके स्तनों को छूते चूसते थे, तो वो आनंद सागर में गोते लगाने लगती थी। केवल दो मिनटों में ही उसको छोटी मोटी रति निष्पत्ति का आनंद महसूस होने लगता था। तो दो ही मिनटों में इस बार भी रूचि को छोटी मोटी रति निष्पत्ति का आनंद महसूस होने लगा। ऐसा नहीं था कि अजय को पता नहीं चलता था - अपने अनुभवों से वो रूचि के अंदर होते हुए परिवर्तनों को समझता था। लेकिन वो जानबूझ कर ऐसा करता था कि उसको पता नहीं चल रहा है, जिससे रूचि को शर्म या झिझक महसूस न हो, और वो अपने यौन आनंद का पूरी तरह से आस्वादन कर सके।

“अज्जू?” रूचि ने हाँफते हुए कहा।

“हम्म?” उसका चूचक चूसते हुए अजय बोला।

“ब्बस मेरी जान,” वो बोली, “अब रुक जाओ,”

अजय ने उसके चूचक को छोड़ दिया। दोनों बिस्तर पर लेट गए - रूचि अजय के ऊपर ही टेक लगा कर लेट गई।

“एक बात बताऊँ?” रूचि ने थोड़ा संयत होते हुए कहा।

“हूँ?” अजय ने रूचि के बालों की महक को महसूस करते हुए कहा।

रूचि ने थोड़ा झिझकते हुए बताया, “अज्जू... यार... मैंने कुछ दिनों पहले माँ से कहा था कि क्यों न वो... पापा से... आई मीन, वो दोनों शादी कर लें?”

“व्हाट?”

रूचि ने बड़ी मासूमियत से अपनी पलकें झपकाते हुए कहा, “जान... हम उनको मम्मी पापा कहते ही हैं! भाभी (माया) का कन्यादान दोनों ने मिल कर किया। आज भी प्रशांत भैया के रस्मों को दोनों साथ ही में कर रहे थे! तो... हमारे लिए वो दोनों तो सचमुच के मम्मी पापा हैं ही! अब वो प्रॉपरली शादी कर के हमारे मम्मी पापा बन जाएँ, तो क्या खराबी है?”

अजय हँसने लगा, “अरे यार रूचि! तुम भी न!”

“क्यों? अभी उन दोनों की उम्र ही क्या है?” उसने समझाते हुए बताया, “थोड़ा समझो मेरी बातों को अज्जू... कमल भैया की मम्मी प्रेग्नेंट हैं। मम्मी पापा की शादी हो जाए तो उनके भी बेबी हो सकते हैं न?”

“खड़ी होवो,”

“क्या?”

“अरे यार, गेट अप! तभी तो ये लहँगा उतरेगा,”

“ओह,” कहते हुए रूचि खड़ी हो गई।

अजय ने उसके लहँगे को उसकी चड्ढी समेत उतार दिया।

फिर दोनों वापस अपनी पहले वाली अवस्था में लेट गए।

उसी समय बगल वाले कमरे से प्रशांत और पैट्रिशिया की कामुक आहें सुन कर रूचि ने खिलखिलाते हुए अजय से कहा,

“बाप रे! भैया क्या क्या कर रहे हैं भाभी के साथ… जो वो ऐसी ऐसी आवाज़ें निकाल रही हैं,”

“वही मेरी जान, जो हम तुम साथ में करेंगे… जब हमारी शादी हो जायेगी!” अजय ने उसके एक चूचक को अपनी तर्जनी से छेड़ते हुए कहा।

“हा हा हा... आज ही न करने लग जाना,” रूचि ने हँसते हुए कहा।

“पहले तो ऐसे नंगे हो कर मुझको टीज़ करती हो... फिर ये सब बातें करती हो!”

“हनी, यू विल लव दिस इंतज़ार,” रूचि ने अजय के होंठों को चूमते हुए कहा, “आई प्रॉमिस!”

“यप! आई एग्री,”

“तुम भी तो उतारो... इट इस नॉट फेयर कि मैं ऐसे नंगी नंगी हूँ और तुम पूरे कपड़े पहने हुए हो!”

“क्या रूचि,”

“ओये... बच्चू अपनी लिमिट में रहो,” रूचि ने अजय को प्यार से धमकाया, “क़ायदे से देखो, तो मैं तुम्हारी गार्डियन हूँ!”

“अरे?”

“और नहीं तो क्या! तुमसे बड़ी हूँ... अगर उस दिन मेरे साथ हॉस्पिटल चलते, तो मैं ही गार्डियन की तरह साइन करती!”

“हा हा हा!”

“उस रोज़ हॉस्पिटल में सबके सामने नंगे नंगे घूम रहे थे तब कुछ नहीं,”

“अरे मेरी माँ... उतार रहा हूँ!”

“कोई ज़रुरत नहीं है... मैं कर देती हूँ,” कह कर रूचि उसका चूड़ीदार पजामी उतारने लगती है। कमल अपना कुर्ता खुद उतारने लगता है।

उसी समय माहौल में प्रशांत भैया और पैट्रिशिया भाभी की ऊँची कामुक आवाज़ें गूँज उठीं।

“यार सोचो न,” रूचि अजय की पजामी उतारते हुए बोली, “कुछ दिनों में हमारी भी शादी हो जाएगी... फिर हम भी सेक्स करेंगे... फिर घर में हमारी भी ऐसी ऐसी आवाज़ें आएँगी... सोचो तो, मम्मी पापा के मन पर क्या बीतेगा?”

“हम्म्म,”

“और फिर दोनों कम उम्र ही हैं! वो दोनों बहुत हुआ तो बस फोर्टी टू - फोर्टी थ्री के होंगे?”

अजय ने ‘हाँ’ में सर हिलाया।

अब तक अजय भी रूचि की ही तरह पूरी तरह नग्न हो गया था। उसका लिंग उत्तेजनावश खड़ा हो गया था।

“सो, नो डिफरेंट फ्रॉम माय पेरेंट्स,” वो बोली, “एंड लेट मी टेल यू, मेरे पेरेंट्स की सेक्स लाइफ बहुत एक्टिव है,”

“हाऊ डू यू नो... ओह डोंट आंसर दैट,” अजय बोला, “क्या वो भी प्लान कर रहे हैं बेबीज़?”

“नॉट इन माय नॉलेज,” रूचि ने ऐसे कहा कि जैसे उसको अजय के प्रश्न से कोई फ़र्क़ न पड़ा हो, “लेकिन अगर वो और बच्चे चाहते हैं, तो ऐसी कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए! मम्मी इस जस्ट फोर्टी एंड हाफ, एंड रिप्रोडक्टिवली फर्टाइल ऐस वेल! दोनों लगभग रोज़ सेक्स करते हैं। अगर वो प्रोटेक्शन यूज़ करना बंद कर दें, तो मम्मी विल गेट प्रेग्नेंट! … एंड द न्यू बेबी विल बी एटीन इयर्स ओल्ड, बाय द टाइम शी रिटायर्स,”

“इंटरेस्टिंग! तुमने यह सब उनसे कहा?”

“कितनी बार तो कहा है मैंने कि मुझे एक गुड्डा या गुड़िया दे दो! लेकिन बार बार हँसी में टाल जाते हैं,” वो बताने लगी, “इसीलिए कमल भैया की शादी में मैंने ख़ास कर माँ को आंटी जी से मिलवाया था, और बताया था कि वो प्रेग्नेंट हैं! सोचा कि शायद वो उन्ही से वो थोड़ा इंस्पायर हो जाएँ!”

“हा हा हा हा... रूचि... यू आर अमेज़िंग,”

“आई नो,” रूचि ने बताया, “... अभी कुछ दिनों पहले ही... जब माँ ने ब्रेस्टफीड कराया था न पहली बार, उसके तीन दिन बाद, मैं मम्मी पापा के रूम में गई,”

“ओके!”

“जनरली जाती नहीं क्योंकि उस टाइम के आस पास दोनों सेक्स शुरू करने वाले होते हैं,” रूचि ने बताया, “लेकिन उस रात गई। माँ ने नाईटी पहना हुआ था। मैंने उनकी नाईटी का साइड ढलका कर उनके ब्रेस्ट को पीना शुरू कर दिया। ... माँ वास लाइक एंग्री एंड लाफ़िंग... पापा भी!”

“हा हा हा हा...”

“एनीवे, जब मैंने एनफ डाँट और हँसी सुन ली, तो मुझसे उन्होंने रीज़न पूछा कि मैंने वैसा क्यों किया! तो मैंने दोनों को बताया कि मुझे दूधू पीने का मन है... और मुझे एक लिविंग डॉल चाहिए खेलने के लिए!”

“तो क्या कहा मम्मी पापा ने?”

“कुछ नहीं... देर तक हँसते रहे! शायद सेक्स भी नहीं किया उन्होंने उस रोज़!”

“हा हा हा हा हा,” अजय ज़ोर से हँसने लगा।

“लेकिन अज्जू... क्या ये वाक़ई इतना बुरा थॉट है?” रूचि उसके लिंग को प्यार से सहलाने लगी।

“नहीं मेरी जान,” अजय बोला, “तुम इतनी अच्छी हो... तुम्हारे मन में कोई गलत थॉट्स आ ही नहीं सकते!”

“सो डू यू एग्री, कि माँ और पापा दोनों की शादी हो जानी चाहिए?”

“इन प्रिंसिपल, यस! आई थिंक इट इस गुड! ... लेकिन ये उनका पर्सनल मैटर है न जानू?”

“वो भी है,” रूचि बोली, “लेकिन कम से कम उनको एक बार ये कह देने से ये होगा कि उनको समझ में आ जायेगा कि उनके रिलेशनशिप के लिए हमारी ब्लेसिंग है,”

“यप... बात तो ठीक है,”

रूचि अचानक से अजय का लिंग सहलाना बंद कर के बोली, “आज रात अगर मैं माँ के पास सो जाऊँ तो तुमको बुरा तो नहीं लगेगा?”

“अरे, क्यों बुरा लगेगा?”

“ओके,” कह कर रूचि उठने लगी, “तो मैं माँ के पास जाती हूँ!”

“मैं भी आ जाऊँ?”

“शी इस नॉट ओन्ली माय मदर... ऑफ़ कोर्स यू कैन कम,” रूचि ने चंचल अदा से कहा।

*
Nice update....
 
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अपडेट 2


अजय ने अपनी कलाई की घड़ी को देखा, “इमरजेंसी सर्विस न जाने कब आएगी!”

“आ जाएगी बच्चे!” प्रजापति ने मुस्कुरा कर अपनी टूटी फूटी दर्द-भरी आवाज़ में कहा, “... मैं बहुत बोल नहीं पाऊँगा... तकलीफ़ होती है। तुम ही सब कहो! अपने बारे में बताओ कुछ...”

“क्या है बताने को अंकल जी? कुछ भी नहीं!”

“अरे! ऐसे न कहो बेटे! अपने रक्षक के बारे में जानने का कुछ तो हक़ है न मुझे?”

“हा हा हा... रक्षक! क्या अंकल जी!” अजय ने हँसते हँसते कहा, “ठीक है, कहता हूँ!”

“हम दिल्ली में रहते थे... हम, मतलब मेरे मम्मी पापा... मैं... और मेरे काका ताई!” अजय ने बताना शुरू किया, “पापा का बिज़नेस था, जो उन्होंने मम्मी के साथ शुरू किया था। मम्मी तब चल बसीं जब मैं पंद्रह साल का था। ... एक्चुअली, एक रोड एक्सीडेंट में माँ और काका चल बसे।”

प्रजापति ने सहानुभूति में सर हिलाया।

“फिर पापा ने ख़ुद को काम में झोंक दिया। ... लेकिन उनकी किस्मत ऐसी ख़राब निकली कि कई सालों तक बिज़नेस में उनको नुक़सान उठाना पड़ा। बहुत टेंशन में थे वो... एक दिन उसी के चलते उनको हार्ट अटैक हुआ और वो चल बसे!”

“आई ऍम सो सॉरी बेटे... इतनी कम उम्र में माँ बाप को खोना...” प्रजापति ने सर हिलाते हुए कहा, “और तुम?”

“जी कुछ भी ख़ास नहीं! बस, ऍमसीए करने के बाद छोटी मोटी नौकरियाँ करता रहा हूँ... अभी भी स्ट्रगल चल रहा है! घर में बस ताई जी हैं... तो वो ही मेरा परिवार हैं!”

“उनके बच्चे हैं?”

“एक बेटा है उनका... अमेरिका में! लेकिन वो अपने में ही खुश हैं!”

“शादी?”

“हाँ... उनकी शादी हो गई है!”

बूढ़ा बहुत मुश्किल से मुस्कुराया, “नहीं... तुम्हारी...”

अजय ने फ़ीकी हँसी हँसते हुए कहा, “हाँ... हुई थी शादी... लेकिन उसकी याद न ही करूँ तो बेहतर!”

“क्या हुआ?”

“होना क्या है अंकल जी... वही जो आज कल हर रोज़ हज़ारों आदमियों के साथ हो रहा है! ... उसने ताई जी और मुझ पर दहेज़ और डोमेस्टिक वायलेंस का झूठा केस लगा दिया!”

कहते हुए उसके मन में कड़वी यादें ताज़ा हो गईं!

रागिनी... उसकी पत्नी -- नहीं, भूतपूर्व पत्नी... एक्स वाइफ... के साथ बिताया गया एक एक पल जैसे नश्तर पर चलने के समान था। विदा हो कर आते ही उसने गिरगिट की तरह रंग दिखाने शुरू कर दिए थे। परिवार को तोड़ने की हर कला में निपुण थी वो! ऊपर से देश का कानून - दफ़ा 498A की बलि-वेदी पर अनगिनत भारतीय पुरुषों की बलि चढ़ चुकी है... एक उसकी भी सही!

“ऐसे में कोई कुछ सुनता थोड़े ही है! ... उसके चलते हम दोनों को तीन साल जेल में रहना पड़ा। न कोई सुनवाई न कुछ! ... डिवोर्स के सेटलमेंट में पापा का घर उसने हड़प लिया। ... बाद में दहेज़ का केस झूठा साबित हुआ... वायलेंस का भी... लेकिन तब तक हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया था। वो सब होने से पहले वो पापा का घर भी बेच कर, सब कुछ सफ़ाचट कर के चम्पत हो गई... पुलिस को उसको ढूंढने में कोई इंटरेस्ट नहीं था। ... बस... इस तरह पीछे रह गए बस माँ और मैं!”

यह सब याद कर के अजय का मन खट्टा हो गया, “... जेल जाने के कारण जो छोटे मोटे काम मिलते थे, वो भी बंद हो गए। अब बस जैसे तैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ हो पाता है, बस!”

प्रजापति ने निराशा में अपना सर झुका लिया, “क्या हो गया है समाज को... संसार को! हर तरफ़ बस नीचता ही नीचता!”

“हा हा! समाज और संसार को हम बदल तो नहीं सकते न अंकल जी!”

“तो क्या बदलना चाहते हो?” प्रजापति ने पूरी सहानुभूति से पूछा, “अगर उस लड़की... मतलब तुम्हारी बीवी से फिर से मुलाक़ात हो जाए, तो बदला लोगे उससे?”

“आपको क्या लगता है? इतना कुछ हो जाने के बाद मैं उसकी शक्ल भी देखना चाहूँगा?”

“फ़िर?”

“नहीं अंकल जी... मैं वैसी ज़हरीली सी लड़की फ़िर कभी भी अपनी ज़िन्दगी में देखना नहीं चाहूँगा... न ही कभी देखना और न ही कभी मिलना! कम से कम ये तो होना ही चाहिए!”

प्रजापति ने मुस्कुराते हुए कहा, “वो भी ठीक बात है! फिर क्या चाहते हो?”

“अंकल जी,” अजय ने कुछ देर सोचते हुए कहा, “एक मौका चाहता हूँ बस... एक मौका कि जो कुछ जानता हूँ, काश उसका एक बेहतर तरीक़े से इस्तेमाल कर सकता... काश कि अपने पापा, अपनी मम्मी के लिए कुछ कर सकता! ताई माँ को एक बेहतर ज़िन्दगी दे सकता...”

“अपनी ताई माँ को एक बेहतर ज़िन्दगी तो अभी भी दे सकते हो!”

इस बात पर अजय चुप रहा, और ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“... तो सच में... क्या चाहते हो?”

“अपने पापा को थोड़ी ख़ुशी देना चाहता हूँ, अंकल जी... मैं यह अक्सर ही सोचता हूँ कि काश एक मौका मिल जाए कि उनको थोड़ी खुशियाँ दे सकूँ... उन्होंने बहुत कुछ किया मेरे लिए, लेकिन मैं ही कुछ न कर सका...”

बहुत कुछ कहना चाहता था अजय, लेकिन शब्द मौन हो गए। इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन उसने जब ठहर कर सोचा, तो बस इतना ही तो चाहता था वो!

“बीता हुआ समय वापस नहीं आता न बेटे,” प्रजापति ने जैसे समझाते हुए कहा।

“जी अंकल जी... बीता हुआ समय वापस नहीं आता!”

अजय ने एक गहरा निःश्वास छोड़ते हुए कहा।

उसी समय एम्बुलेंस की आवाज़ आती हुई सुनाई देने लगी। अजय ने अपनी घड़ी में देखा,

“अंकल जी, एम्बुलेंस आने ही वाली है! आप घबराइएगा नहीं। सब ठीक हो जाएगा!”

प्रजापति मुस्कुराए, “तुम बहुत अच्छे हो, अजय बेटे! ... अपनी अच्छाई बनाए रखना!” कह कर उन्होंने अपना झुर्रियों से भरा हाथ अजय के सर पर फिराया, “... और अपना ध्यान रखना बेटे... अपने पथ से डिगना मत! जो सोचा हुआ है, वो करना... और मतिभ्रम न होने देना...!” प्रजापति की आवाज़ धीमी पड़ रही थी - लेकिन उनकी आँखों की चमक बरक़रार!

“थैंक यू अंकल जी,” अजय मुस्कुराते हुए बोला, “लेकिन आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि आप मुझे बाय बाय कर रहे हैं! ऐसे नहीं छोड़ूँगा आपको... हॉस्पिटल चल रहा हूँ आपके साथ, और आपको देखने रोज़ आता रहूँगा...”

इतना कह कर अजय अपनी जगह से उठ कर सड़क के किनारे खड़ा हो गया, और हाथ हिलाने लगा, जिससे कि आती हुई एम्बुलेंस उसको देख सके।

कोई मिनट भर में ही एम्बुलेंस उसके सामने आ खड़ी हुई। एक नर्स और एक पैरामेडिक तेजी से एम्बुलेंस से उतरे, और उनकी तरफ़ बढ़े। अजय को राहत हुई... समय व्यय हुआ, लेकिन कम से कम प्रजापति जी को समुचित चिकित्सा तो मिल ही सकती है। अजय ने इशारा कर के नर्स और पैरामेडिक को मरीज़ की तरफ़ जाने को कहा।

पैरामेडिक ने स्टेथोस्कोप लगा कर प्रजापति जी की हृदयगति नापी और बड़ी विचित्र दृष्टि से अजय की तरफ़ देखा।

“क्या हुआ?” अजय ने आशंकित होते हुए पैरामेडिक से पूछा।

“ही इस नो मोर...”

“क्या?!” अजय इस खुलासे पर चौंक गया, “... लेकिन आप लोगों के आने के एक मिनट पहले तक ही तो मैं इनसे बात कर रहा था! ऐसे कैसे...?” वो भाग कर प्रजापति जी के पास पहुँचा।

उसने देखा कि प्रजापति जी वाक़ई बड़े सुकून से अपनी चिर-निद्रा को प्राप्त हो गए थे।

“मतलब इतना सब किया वो सब बेकार गया!” वो बड़बड़ाया।

“जी?” पैरामेडिक ने पूछा।

“जी, मैंने इनको सीपीआर दिया था...” अजय की आँखों में आँसू आ गए, “हमने कुछ देर तक बातें भी करीं! ... मुझे तो लगा था कि...”

“आई ऍम सॉरी,” पैरामेडिक ने सहानुभूतिपूर्वक कहा, “लेकिन इतनी एडवांस्ड एज में कुछ भी हो सकता है... इन्होने आपको कुछ बताया? कोई रिलेटिव या कोई और... जिनको हम इत्तला दे सकते हैं?”

“बता रहे थे कि इनके बच्चे विदेश में रहते हैं... कहाँ, वो मुझको बताया नहीं।”

“इनके पर्सनल इफेक्ट्स में कोई इन्फॉर्मेशन मिल सकती है,” कह कर उसने प्रजापति जी की कार की तलाशी लेनी शुरू कर दी।

कुछ देर बाद उसने निराश हो कर कहा, “... फ़ोन भी नहीं है!”

फिर उनका बटुआ निकाल कर बोला, “विश्वकर्मा प्रजापति... पुणे में रहते हैं... थे...”

कुछ देर तक वो प्रशासनिक काम करता रहा, फिर अजय से बोला, “आप अपना कांटेक्ट दे दीजिए... वैसे तो आपको कांटेक्ट करने की कोई ज़रुरत नहीं पड़ेगी, लेकिन अगर पुलिस को कोई ज़रुरत हुई, तो आपको कांटेक्ट करेंगे!”

“ठीक है...” अजय ने कहा, और अपना नाम पता और फ़ोन नंबर लिखवाने लगा।

इस पूरे काम में बहुत समय लग गया था, और मीटिंग के लिए पहुँचने में बहुत देर लगने वाली थी। अब मुंबई जाने का कोई मतलब नहीं था। इसलिए अजय वापस पुणे की तरफ़ हो लिया।


**
good story
 
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Sushil@10

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प्रशांत और पैट्रिशिया की शादी की गहमागहमी माया की शादी की ही तरह सुबह सुबह ही होने लगी थी।

लिंडा और पीटर जी को भारतीय परंपरा से होने वाली शादियों के बारे में कोई ज्ञान नहीं था। इसलिए प्रशांत ने उनको ‘हम आपके हैं कौन’ फिल्म भी दिखाई थी कि उनको थोड़ा आईडिया हो जाए। फिर कमल और माया की शादी देख कर उनको बहुत कुछ समझ में आ गया, और उन्होंने जो देखा, वो उनको बहुत पसंद भी आया। ख़ास कर, दुल्हन का रंग बिरंगी पोशाक पहनना! उनके देश में, उनकी परम्परानुसार दुल्हनें सफ़ेद गाउन पहन कर तैयार होती हैं और दूल्हे काले सूट पहनते हैं। ऐसा नहीं है कि ब्लैक एंड व्हाइट देख कर बुरा लगता है, लेकिन अपनी एकलौती बेटी पैट्रिशिया को लाल सुनहरे लहँगा चोली पहने, और भारतीय जेवरों में लदी हुई देख कर उनको बड़ा अच्छा लगा।

और तो और, लिंडा जी ने भी किरण जी के ही समान रंग की साड़ी ब्लाउज़ और पीटर ने अशोक जी के ही समान रंग का धोती कुरता पहना हुआ था। अशोक जी ने कहा था कि उन्होंने ऐसा बंदोबस्त इसलिए किया है कि बेटे और बहू के माता पिता में कोई अंतर न दिखाई दे! इस बात से वो दोनों बहुत प्रभावित हो गए थे। यहीं समझ आ गया कि उनकी बेटी के लिए यह सही घर है।

और भी कई अच्छी बातें थीं - जब से उनको प्रशांत के बारे में पता चला था, तब से वो समझ रहे थे कि न केवल प्रशांत अच्छा अच्छा था, बल्कि उसका परिवार भी अच्छा था। अशोक जी, किरण जी, और अजय से बातें कर के उनको इतना तो समझ आ गया कि बेहतर यही है कि पैट्रिशिया और प्रशांत दोनों भारत ही आ कर अपना जीवन आगे बढ़ाएँ। हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक निवेश के लिए खुली थी, और यह एक बड़ा कारण था कि अजय की अमरीकन कंपनी बॉम्बे में ऑफ़िस खोल रही थी। नहीं तो इतनी कम उम्र में इतना ऊँचा ओहदा मिल पाना कठिन था प्रशांत के लिए। पैट्रिशिया को भी अगर एम्बेसी में नौकरी मिल जाए तो डॉलर में उसको सैलरी मिलेगी - प्रशांत की ही तरह! कुल मिला कर आर्थिक रूप से बढ़िया निर्णय था भारत आना। हाँ - उनसे पैट्रिशिया की दूरी अवश्य बढ़ जाती, लेकिन अमरीका में तो बच्चों को सिखाते ही हैं कि वो अपनी राह चुनें और उस पर चलें!

दोनों की शादी के लिए नव-विवाहित युगल - माया और कमल भी बड़े सवेरे ही आ गए थे। दोपहर होते होते रूचि भी आ गई थी। उसके मम्मी पापा बाद में आने वाले थे। पूरा राणा खानदान भी शाम होने तक शामिल होने वाला था। उसी लॉन में, जहाँ माया और कमल की शादी हुई थी, माया की शादी की ही तरह असंख्य रस्में निभाई गईं। अपनी शादी में शादी वाला जोड़ा ‘मस्ती’ - मतलब नाच गाना - नहीं कर पाता, लेकिन दूसरे की शादी में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। लिहाज़ा कमल और माया ने भी सौम्य रूप से बाजे की धुन पर नृत्य किया; और अजय और रूचि ने भी! अब तक सभी निकट के सम्बन्धियों और हितैषियों को पता चल गया था कि रूचि अजय की मंगेतर है, और उसकी होने वाली बीवी है! लिहाज़ा सभी उससे उसके पद की गरिमा के अनुरूप मिले, और उसको आशीर्वाद दिए। रूचि आज बहुत ही खूबसूरत लग रही थी - उसने रागिनी की ही दी हुई रस्ट कलर वाली साड़ी ब्लाउज़ पहनी हुई थी जो उस पर बेहतरीन तरीक़े से फ़ब रही थी। अजय ने क्रीम कलर का रेशमी कुर्ता और चूड़ीदार पैजामी पहन रखी थी। देखने में सरल परिधान था, लेकिन उस पर बहुत ही सुन्दर लग रहा था।

भोजन इत्यादि के बाद, पुनः रात में ही विवाह की मुख्य रस्में पूरी हुईं। प्रशांत और पैट्रिशिया के विवाह में भी विधि-विधान में कोई समझौता नहीं किया गया था। सारी रस्में, सारे नियम पूरे किए गए। चूँकि पैट्रिशिया का कोई भाई नहीं था, इसलिए उसकी बारी में कमल ने खील छोड़ कर सम्पन्नता का आशीर्वाद देने की रस्म अदा करी। बड़े बुज़ुर्गों के आशीर्वाद के लम्बे और भावुक दौर के बाद पैट्रिशिया को उसके माता पिता के होटल भेज दिया गया, जहाँ से उसकी विदाई ‘अपने’ घर को होनी थी। सुबह करीब आठ बजे वो रस्म भी पूरी हुई। पैट्रिशिया का पूरे पारम्परिक रीति के अनुसार और बड़े ही उत्साह से घर में स्वागत किया गया। किरण जी ने अच्छी सास होने के नाते उन दोनों को आराम करने को कहा।

प्रशांत ने पैट्रिशिया को भारतीय परंपरा में विवाह के बारे में बहुत कुछ बता रखा था - ख़ास कर यह बात कि बहू से क्या क्या उम्मीदें होती हैं। वैसे भी पैट्रिशिया कोई आलसी प्रवृत्ति की लड़की नहीं थी। विदा हो कर आने और बहू के स्वागत की रस्में पूरी होते ही वो सीधे रसोईघर में प्रविष्ट हो गई। किरण जी को ऐसी उम्मीद ही नहीं थी कि पैट्रिशिया ऐसा कुछ कर देगी! उन्होंने उसको बहुत मना किया यह कह कर कि रसोईये नाश्ता पका रहे हैं। लेकिन पैट्रिशिया ने एक न सुनी। उसने बहुत से भारतीय व्यंजन पकाने सीखे हुए थे। लेकिन जब सासू माँ (किरण जी) ने उसको बहुत समझाया कि ‘बहूरानी, आज कुछ भी पकाने की ज़रुरत नहीं है,’ तो वो मान तो गई, लेकिन उसका चेहरा उतर गया। यह देख कर अशोक जी ने उससे बड़े प्रेम-पूर्वक आग्रह किया कि क्या बढ़िया हो अगर बहू के हाथ से एक कप बढ़िया से चाय पीने को मिले।

उनके आग्रह पर पैट्रिशिया आह्लादित हो गई, और तुरंत चाय बनाने लगी। उसका उत्साह देखने वाला था। मुश्किल से एक सप्ताह ही वो साथ रही थी, लेकिन अब तक वो भी सभी से पूरी तरह घुल मिल गई थी। किरण जी भी ऐसी प्यारी सी बहू पा कर बहुत अच्छा महसूस कर रही थीं - क्योंकि अभी तक उनके अपने ही बेटे ने उनको बहुत निराश कर रखा था। लेकिन नई बहू के आते ही बड़े सुखद परिवर्तन आते हुए दिखाई दे रहे थे। रूचि भी इस समय घर पर ही थी - उसको देख कर किरण जी बहुत प्रसन्न हुईं।

‘मेरी दोनों बहुएँ कितनी प्यारी हैं… कितनी अच्छी हैं,’ उन्होंने मन ही मन सोचा, ‘हे प्रभु, दोनों को हर बुरी नज़र से बचाना और इस परिवार पर अपनी दया बनाए रखना!’

पैट्रिशिया ने अदरक कूट कर मसाला चाय बनाई सभी के लिए। रसोईये की चाय ‘बाहर वालों’ के लिए थी, और बहू की चाय घर वालों के लिए! और क्या बढ़िया चाय! सभी ने पैट्रिशिया की बहुत बढ़ाई करी और बहू को उसकी ‘पहली रसोई’ के लिए रुपए दे कर उसको आशीर्वाद दिया।

उसके बाद किरण जी ने फिर से पैट्रिशिया और प्रशांत को आराम करने को कहा, लेकिन दोनों का वैसा कोई मूड नहीं था। वैसे भी शादी से पहले ही दोनों की बड़ी ही सक्रिय सेक्स लाइफ थी, और वो विवाह की रस्मों की मोहताज नहीं थी। इसलिए उन दोनों के लिए परिवार के संग बैठना, और सभी के साथ बातें करना अधिक महत्त्वपूर्ण था। कुछ घंटों बाद माया और कमल विदा हो गए। उनको जाते जाते बहुत से उपहार भी दिए गए। कल माया और अजय का रिसेप्शन था, और सभी लोग वहाँ वाँछित थे। उत्सव और हर्ष का माहौल कुछ ऐसा था, कि रूचि का अपने घर जाने का मन नहीं था, इसलिए वो यहीं रुक गई थी। उसके घर में उसके माता पिता को बता दिया गया था कि रूचि आज और कल रात यहीं रुकेगी।

शाम होते होते सभी थक कर चूर हो गए।

इतने कम समय में दो दो शादियों की तैयारी करना और फिर उनको संपन्न करना - बेहद थकाऊ काम होता है। किरण जी थक कर चूर हो गई थीं, और अब तो वो कुछ सोच भी नहीं पा रही थीं। इसलिए घर की बड़ी बहू, पैट्रिशिया ने ही निर्णय लिया, कि घर में ही कुछ सामान्य सा खा लेंगे। अजय ने अपनी भाभी को बताया कि रसोईयों ने बहुत कुछ ला कर रख दिया है, उसमें से खाया जा सकता है। वैसे भी बहुत खाना है और अधिकतर लोग जा चुके हैं। उसको यह सुझाव अच्छा लगा। सभी के लिए पैट्रिशिया ने ही खाने की टेबल पर भोजन सजाया और सभी ने साथ में मिल कर खाया। बाहर बैठे मनोहर भैया को भी भीतर ही बुला लिया गया था। घर की कामवाली बाई भी साथ ही हो ली।

रात्रि भोजन देर तक चला।

खाते समय पता चला कि चूँकि पहली बार आना हुआ है, इसलिए लिंडा और पीटर जी कुछ दिन उत्तर भारत की सैर करेंगे। कल माया और अजय का रिसेप्शन अटेंड कर के परसों सवेरे ही वो आगरा को निकल जाएँगे। वहाँ से जयपुर और फिर वापस दिल्ली आ कर दिल्ली की सैर करेंगे। और फिर यह सब कर के वो प्रशांत और पैट्रिशिया के साथ वापस शिकागो चले जाएँगे। अशोक जी और किरण जी को बहुत अच्छा लगा कि इस दौरान उनके बेटे बहू उनके साथ ही रहेंगे। हाँ, अवश्य ही वो बड़ी जल्दी वापस जा रहे थे, लेकिन फिर वो परमानेंटली वापस भारत ही में सेटल होने वाले थे। यह सब अच्छी बातें थीं!

खाने पर ही प्रशांत और पैट्रिशिया ने रूचि और अजय से उनके आगे के प्लान्स के बारे में पूछा और बातें करीं। पैट्रिशिया ने दोनों से कहा कि अगर दोनों आगे पढ़ने के लिए शिकागो शहर जाते हैं, तो उसका अपना एक छोटा सा घर वहाँ है। अगर दोनों चाहें, तो वहीं रह सकते हैं। उसने शिकागो में स्थित चार यूनिवर्सिटीज़ के नाम बताए जहाँ दोनों साथ में अप्लाई कर सकते थे। शिकागो के बारे में उसने दोनों को बहुत कुछ बताया। उसने यह भी सुझाव दिया कि दोनों शादी कर लें, फिर वहाँ जाएँ… या फिर वहाँ जा कर शादी कर लें। अजय को ये सुझाव अच्छा लगा, लेकिन किरण जी ने उसे आँखें तरेर कर हिदायद दी कि अगर उनके बिना उन दोनों ने शादी करी, तो वो उससे बात नहीं करेंगी कभी!

*
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अपडेट 75


ख़ैर, अंत में सोने का समय हो ही गया।

पैट्रिशिया और प्रशांत के रहने का बंदोबस्त प्रशांत के ही कमरे में किया गया था। रूचि स्वतः ही अजय के कमरे में आ गई।

अजय को रूचि की उपस्थिति बहुत अच्छी लगती थी। उसकी सच्चाई जानने के बाद भी वो अजय को अपने से छोटा ही मानती थी और अजय के लिए उसके मन में जो प्रेम था, उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया था। बल्कि वो और बढ़ा ही था - उसकी समझ में अजय पहले से भी बेहतर लड़का था, और उसके हिसाब से परफेक्ट! मानसिक और भावनात्मक रूप से वो उसकी ‘असली’ उम्र के जितनी परिपक्व थी। रागिनी को उसके सामने ला कर उसने अजय को अपने ‘वर्स्ट फियर’ का सामना करने की हिम्मत भी दी, और यह संतुष्टि भी कि उसकी पिछली ज़िन्दगी में रागिनी ने जो प्रलय मचाया था, वो इस जीवन में नहीं मचा सकेगी। एक और अच्छी बात हो गई थी - वो यह कि उसको ससुराल के रूप में अजय का घर मिल गया था। जब ईश्वर की ऐसी अनुकम्पा हो, तो कौन लड़की होगी जो अपने आप को सौभाग्यशाली नहीं समझेगी?

रूचि को अपने आलिंगन में भरते हुए अजय बोला, “मेरी जान... देखो न, इतना बिजी हो गया कि तुमसे बात भी नहीं हो सकी इतने दिनों,”

वो मुस्कुराई, “कोई बात नहीं। ... वैसे बहुत बढ़िया बंदोबस्त था दोनों शादियों में!”

अजय संतुष्टि से मुस्कुराया, ‘हाँ - बहुत से काम किये थे उसने इन दोनों शादियों के लिए,’

“मुझको तो हमारी शादी के लिए बहुत से आइडियाज आ रहे हैं,” रूचि बोली।

“फॉर एक्साम्प्ल?”

“बाद में!” रूचि बोली, “कैन यू हेल्प मी इन रिमूविंग माय क्लोथ्स?”

अजय जानता था कि चोली लहँगा उतारने में ऐसी कोई कठिनाई नहीं होती है - लेकिन रूचि का मन था कि अजय उसको निर्वस्त्र करे! तो उसको भी इस काम से क्या परहेज़ हो सकता था?

“पैट्रिशिया भाभी अच्छी हैं,” रूचि बोली।

“हम्म... भैया को लाइन पर रखेंगी,”

“हा हा हा... अरे ऐसा क्यों कहा?”

“नहीं कुछ नहीं! इट इस जस्ट दैट भैया इस ऐन अक्सोरियस पर्सन (ऐसा आदमी जो अपनी बीवी को हद से अधिक प्यार करता है, लेकिन जब तरह के व्यवहार को सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता),”

“हम्म्म... कोई बात नहीं! भाभी अच्छी हैं, मतलब घर परिवार को साथ में रखेंगी,”

“हाँ, मुझे तो लगता है कि इंडिया आने का इंस्पिरेशन भी उन्ही से आया है,”

“अच्छा है न!”

“हाँ... अच्छा एक बात बताओ? तुमने डॉक्टर को दिखाया?” अजय ने पूछा।

“हाँ... दिखाया था! आई स्पेशलिस्ट ने कहा कि कोई प्रॉब्लम नहीं है। माइग्रेन या वैसा कुछ हो सकता है...” रूचि ने कहा, “इसलिए, मेरे स्वामी, आप मुझे कुछ कहें, उससे पहले ही मैंने डॉक्टर देशपाण्डे से अपॉइंटमेंट लिया है...”

“ओह?” अजय ने पूछा, “कब का?”

“हाँ... नेक्स्ट वीक! चलोगे साथ में?”

“अरे, ये कोई पूछने वाली बात है?”

तब तक रूचि की चोली उतर गई थी। उसने अंदर कुछ भी नहीं पहना हुआ था। अजय ने रूचि को अपनी तरफ घुमा कर उसके स्तनों को अपनी हथेलियों में भर कर आहिस्ते से दबाया।

“आह्ह्ह...” रूचि के गले से आनंद भरी आह निकल गई।

“क्या हुआ रूचि?” अजय ने चिंतित होते हुए पूछा।

“मेरी जान... दर्द वाली आह और सुख वाली आह में अंतर होता है!” रूचि ने मुस्कुराते हुए शरारत से कहा।

“ओह!”

वो मुस्कुराई, “वैसे एक बात है जो सर दर्द से याद आई... जब भी मैं माँ का दूध पीती हूँ न, बहुत रिलैक्स्ड हो जाती हूँ!”

अजय मुस्कुराया, “आई नो, राइट? मैं भी! ... सच में ऐसा लगता है कि जैसे कोई मेडिसिनल प्रॉपर्टीज़ हैं उनके दूध में,”

रूचि बदमाशी से मुस्कुराई, “अब तो भाभी भी विदा हो गईं... मतलब, उनका शेयर मुझको मिलेगा,”

“हा हा हा हा हा!” अजय दिल खोल कर हँसा और फिर उसका एक चूचक मुँह में ले कर उसको चूसने लगा।

रूचि को भी ये खेल बहुत पसंद आता था।

जब अजय के होंठ उसके स्तनों को छूते चूसते थे, तो वो आनंद सागर में गोते लगाने लगती थी। केवल दो मिनटों में ही उसको छोटी मोटी रति निष्पत्ति का आनंद महसूस होने लगता था। तो दो ही मिनटों में इस बार भी रूचि को छोटी मोटी रति निष्पत्ति का आनंद महसूस होने लगा। ऐसा नहीं था कि अजय को पता नहीं चलता था - अपने अनुभवों से वो रूचि के अंदर होते हुए परिवर्तनों को समझता था। लेकिन वो जानबूझ कर ऐसा करता था कि उसको पता नहीं चल रहा है, जिससे रूचि को शर्म या झिझक महसूस न हो, और वो अपने यौन आनंद का पूरी तरह से आस्वादन कर सके।

“अज्जू?” रूचि ने हाँफते हुए कहा।

“हम्म?” उसका चूचक चूसते हुए अजय बोला।

“ब्बस मेरी जान,” वो बोली, “अब रुक जाओ,”

अजय ने उसके चूचक को छोड़ दिया। दोनों बिस्तर पर लेट गए - रूचि अजय के ऊपर ही टेक लगा कर लेट गई।

“एक बात बताऊँ?” रूचि ने थोड़ा संयत होते हुए कहा।

“हूँ?” अजय ने रूचि के बालों की महक को महसूस करते हुए कहा।

रूचि ने थोड़ा झिझकते हुए बताया, “अज्जू... यार... मैंने कुछ दिनों पहले माँ से कहा था कि क्यों न वो... पापा से... आई मीन, वो दोनों शादी कर लें?”

“व्हाट?”

रूचि ने बड़ी मासूमियत से अपनी पलकें झपकाते हुए कहा, “जान... हम उनको मम्मी पापा कहते ही हैं! भाभी (माया) का कन्यादान दोनों ने मिल कर किया। आज भी प्रशांत भैया के रस्मों को दोनों साथ ही में कर रहे थे! तो... हमारे लिए वो दोनों तो सचमुच के मम्मी पापा हैं ही! अब वो प्रॉपरली शादी कर के हमारे मम्मी पापा बन जाएँ, तो क्या खराबी है?”

अजय हँसने लगा, “अरे यार रूचि! तुम भी न!”

“क्यों? अभी उन दोनों की उम्र ही क्या है?” उसने समझाते हुए बताया, “थोड़ा समझो मेरी बातों को अज्जू... कमल भैया की मम्मी प्रेग्नेंट हैं। मम्मी पापा की शादी हो जाए तो उनके भी बेबी हो सकते हैं न?”

“खड़ी होवो,”

“क्या?”

“अरे यार, गेट अप! तभी तो ये लहँगा उतरेगा,”

“ओह,” कहते हुए रूचि खड़ी हो गई।

अजय ने उसके लहँगे को उसकी चड्ढी समेत उतार दिया।

फिर दोनों वापस अपनी पहले वाली अवस्था में लेट गए।

उसी समय बगल वाले कमरे से प्रशांत और पैट्रिशिया की कामुक आहें सुन कर रूचि ने खिलखिलाते हुए अजय से कहा,

“बाप रे! भैया क्या क्या कर रहे हैं भाभी के साथ… जो वो ऐसी ऐसी आवाज़ें निकाल रही हैं,”

“वही मेरी जान, जो हम तुम साथ में करेंगे… जब हमारी शादी हो जायेगी!” अजय ने उसके एक चूचक को अपनी तर्जनी से छेड़ते हुए कहा।

“हा हा हा... आज ही न करने लग जाना,” रूचि ने हँसते हुए कहा।

“पहले तो ऐसे नंगे हो कर मुझको टीज़ करती हो... फिर ये सब बातें करती हो!”

“हनी, यू विल लव दिस इंतज़ार,” रूचि ने अजय के होंठों को चूमते हुए कहा, “आई प्रॉमिस!”

“यप! आई एग्री,”

“तुम भी तो उतारो... इट इस नॉट फेयर कि मैं ऐसे नंगी नंगी हूँ और तुम पूरे कपड़े पहने हुए हो!”

“क्या रूचि,”

“ओये... बच्चू अपनी लिमिट में रहो,” रूचि ने अजय को प्यार से धमकाया, “क़ायदे से देखो, तो मैं तुम्हारी गार्डियन हूँ!”

“अरे?”

“और नहीं तो क्या! तुमसे बड़ी हूँ... अगर उस दिन मेरे साथ हॉस्पिटल चलते, तो मैं ही गार्डियन की तरह साइन करती!”

“हा हा हा!”

“उस रोज़ हॉस्पिटल में सबके सामने नंगे नंगे घूम रहे थे तब कुछ नहीं,”

“अरे मेरी माँ... उतार रहा हूँ!”

“कोई ज़रुरत नहीं है... मैं कर देती हूँ,” कह कर रूचि उसका चूड़ीदार पजामी उतारने लगती है। कमल अपना कुर्ता खुद उतारने लगता है।

उसी समय माहौल में प्रशांत भैया और पैट्रिशिया भाभी की ऊँची कामुक आवाज़ें गूँज उठीं।

“यार सोचो न,” रूचि अजय की पजामी उतारते हुए बोली, “कुछ दिनों में हमारी भी शादी हो जाएगी... फिर हम भी सेक्स करेंगे... फिर घर में हमारी भी ऐसी ऐसी आवाज़ें आएँगी... सोचो तो, मम्मी पापा के मन पर क्या बीतेगा?”

“हम्म्म,”

“और फिर दोनों कम उम्र ही हैं! वो दोनों बहुत हुआ तो बस फोर्टी टू - फोर्टी थ्री के होंगे?”

अजय ने ‘हाँ’ में सर हिलाया।

अब तक अजय भी रूचि की ही तरह पूरी तरह नग्न हो गया था। उसका लिंग उत्तेजनावश खड़ा हो गया था।

“सो, नो डिफरेंट फ्रॉम माय पेरेंट्स,” वो बोली, “एंड लेट मी टेल यू, मेरे पेरेंट्स की सेक्स लाइफ बहुत एक्टिव है,”

“हाऊ डू यू नो... ओह डोंट आंसर दैट,” अजय बोला, “क्या वो भी प्लान कर रहे हैं बेबीज़?”

“नॉट इन माय नॉलेज,” रूचि ने ऐसे कहा कि जैसे उसको अजय के प्रश्न से कोई फ़र्क़ न पड़ा हो, “लेकिन अगर वो और बच्चे चाहते हैं, तो ऐसी कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए! मम्मी इस जस्ट फोर्टी एंड हाफ, एंड रिप्रोडक्टिवली फर्टाइल ऐस वेल! दोनों लगभग रोज़ सेक्स करते हैं। अगर वो प्रोटेक्शन यूज़ करना बंद कर दें, तो मम्मी विल गेट प्रेग्नेंट! … एंड द न्यू बेबी विल बी एटीन इयर्स ओल्ड, बाय द टाइम शी रिटायर्स,”

“इंटरेस्टिंग! तुमने यह सब उनसे कहा?”

“कितनी बार तो कहा है मैंने कि मुझे एक गुड्डा या गुड़िया दे दो! लेकिन बार बार हँसी में टाल जाते हैं,” वो बताने लगी, “इसीलिए कमल भैया की शादी में मैंने ख़ास कर माँ को आंटी जी से मिलवाया था, और बताया था कि वो प्रेग्नेंट हैं! सोचा कि शायद वो उन्ही से वो थोड़ा इंस्पायर हो जाएँ!”

“हा हा हा हा... रूचि... यू आर अमेज़िंग,”

“आई नो,” रूचि ने बताया, “... अभी कुछ दिनों पहले ही... जब माँ ने ब्रेस्टफीड कराया था न पहली बार, उसके तीन दिन बाद, मैं मम्मी पापा के रूम में गई,”

“ओके!”

“जनरली जाती नहीं क्योंकि उस टाइम के आस पास दोनों सेक्स शुरू करने वाले होते हैं,” रूचि ने बताया, “लेकिन उस रात गई। माँ ने नाईटी पहना हुआ था। मैंने उनकी नाईटी का साइड ढलका कर उनके ब्रेस्ट को पीना शुरू कर दिया। ... माँ वास लाइक एंग्री एंड लाफ़िंग... पापा भी!”

“हा हा हा हा...”

“एनीवे, जब मैंने एनफ डाँट और हँसी सुन ली, तो मुझसे उन्होंने रीज़न पूछा कि मैंने वैसा क्यों किया! तो मैंने दोनों को बताया कि मुझे दूधू पीने का मन है... और मुझे एक लिविंग डॉल चाहिए खेलने के लिए!”

“तो क्या कहा मम्मी पापा ने?”

“कुछ नहीं... देर तक हँसते रहे! शायद सेक्स भी नहीं किया उन्होंने उस रोज़!”

“हा हा हा हा हा,” अजय ज़ोर से हँसने लगा।

“लेकिन अज्जू... क्या ये वाक़ई इतना बुरा थॉट है?” रूचि उसके लिंग को प्यार से सहलाने लगी।

“नहीं मेरी जान,” अजय बोला, “तुम इतनी अच्छी हो... तुम्हारे मन में कोई गलत थॉट्स आ ही नहीं सकते!”

“सो डू यू एग्री, कि माँ और पापा दोनों की शादी हो जानी चाहिए?”

“इन प्रिंसिपल, यस! आई थिंक इट इस गुड! ... लेकिन ये उनका पर्सनल मैटर है न जानू?”

“वो भी है,” रूचि बोली, “लेकिन कम से कम उनको एक बार ये कह देने से ये होगा कि उनको समझ में आ जायेगा कि उनके रिलेशनशिप के लिए हमारी ब्लेसिंग है,”

“यप... बात तो ठीक है,”

रूचि अचानक से अजय का लिंग सहलाना बंद कर के बोली, “आज रात अगर मैं माँ के पास सो जाऊँ तो तुमको बुरा तो नहीं लगेगा?”

“अरे, क्यों बुरा लगेगा?”

“ओके,” कह कर रूचि उठने लगी, “तो मैं माँ के पास जाती हूँ!”

“मैं भी आ जाऊँ?”

“शी इस नॉट ओन्ली माय मदर... ऑफ़ कोर्स यू कैन कम,” रूचि ने चंचल अदा से कहा।

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अपडेट 76


प्रशांत और पैट्रिशिया अपनी शादी के एक सप्ताह बाद वापस अमेरिका लौट गए।

इतने समय में सभी की दिनचर्या बेहद धीमी रफ़्तार में वापस सामान्य हो रही थी। कमल और माया की दिनचर्या तो बहुत बदल गई थी और होनी भी चाहिए थी। उधर रूचि भी अब अधिकतर समय अजय के घर में ही बिता रही थी। अक्सर ही रात में वो वहीं रुक जाती। अजय के माता पिता ने रूचि के माता पिता - रवि और शोभा जी से इस बात की आज्ञा ले ली थी। किरण जी और अशोक जी को अपनी बहू रूचि का अपने सामने रहना बहुत भाता। उनको माया के अपने ससुराल जाने की कमी खलती, उससे पहले ही रूचि ने वो कमी पूरी कर दी थी। रूचि की सौम्यता, हँसी, और भोली शरारतों से उनके घर में रौनक रहती। रवि और शोभा जी भी समझ रहे थे कि बहुत जल्दी ही अजय और रूचि की भी शादी हो जाएगी। ऐसे में अनावश्यक ही इस नवोदित सम्बन्ध को जटिल बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

और तो और, रूचि को वो अपने से अलग भी न मानते थे। इसलिए आज जब रूचि को डॉक्टर को दिखाने की बात आई, तो न केवल रूचि के माता पिता, बल्कि अजय और उसके माता पिता भी आए हुए थे।

“हेल्लो रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने बड़ी गर्मजोशी से रूचि से हाथ मिलाते हुए उसका अभिवादन किया, “हाऊ आर व्ही टुडे?”

“आई ऍम गुड, सर” रूचि ने भी उनका अभिवादन गर्मजोशी से किया, “हाऊ आर यू?”

“वैरी वेल... थैंक यू!” फिर उसके माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ गुप्ता!”

“नमस्ते डॉक्टर साहब,” रवि जी और शोभा जी ने भी डॉक्टर देशपाण्डे का अभिवादन किया।

डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय के माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ ठाकुर!”

डॉक्टर देशपाण्डे द्वारा दोनों का इस तरह ‘साथ’ में अभिवादन सुन कर रूचि के होंठों पर एक शरारती मुस्कान आ गई। अजय ने आँखें तरेर कर उसको चुप रहने का इशारा किया।

“एंड हाऊ इस माय फ़ेवरिट यंग मैन?”

अजय ने डॉक्टर देशपाण्डे से हाथ मिलाते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग सर! आई ऍम गुड! हाऊ आर यू?”

डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “फैंटास्टिक! भई, आप सभी को यूँ साथ में देख कर बहुत अच्छा लगा… बहुत कम ऐसे परिवार देखें हैं जिनमें इस तरह से… जो बड़ी मोहब्बत से रहते हैं। आप लोग जब भी आते हैं, तो साथ में आते हैं… और मज़बूती से एक दूसरे के संग खड़े रहते हैं।”

“डॉक्टर साहब,” अशोक जी बोले, “रूचि भी तो हमारी बेटी है,”

“सो तो है… सो तो है,” वो बोले, फिर रूचि की तरफ़ मुखातिब हो कर, “नाऊ रूचि, प्लीज़ टेल मी, व्हाट इस एलिंग यू?”

“सर,” उसने बताना शुरू किया, “आई समटाइम्स एक्सपीरियंस शूटिंग पेन इन माय हेड।”

“हाऊ आफ्टेन?”

“वीक में कभी कभी... लेकिन कभी कभी एक दिन में दो बार भी एक्सपीरियंस किया है।”

“इंटेंसिटी कितनी होती है - से ऑन अ स्केल ऑफ़ टेन?”

“युसुअलि सिक्स सेवेन...”

“इन मॉर्निंग्स?”

“हाँ! कभी कभी। लेकिन सुबह का पेन अधिक... पेनफुल होता है।”

“ओके! प्लीज डोंट बी अलार्मड, व्हेन आई आस्क यू दिस... बट डू यू एक्सपीरियंस सीज़र्स?”

“मतलब?”

“मतलब कभी बॉडी में अनयुसुअल झटका महसूस हुआ हो कभी?”

“एक बार हुआ था,” रूचि ने चिंतित स्वर में कहा, “एक बार हुआ था... जस्ट वन लिटिल जॉल्ट!”

“हम्म... टायर्डनेस?”

“होती ही है,”

“नहीं, जनरल टायर्डनेस नहीं... हमेशा रहती है क्या?”

“नो... लेकिन कभी कभी पेन के कारण ठीक से सो नहीं पाती, जिसके कारण अगली सुबह थोड़ा सुस्ती रहती है।

“व्हेन डिड यू गेट योर प्रिस्क्रिप्शन ग्लासेस?”

“रीसेंटली... बट दे आर नॉट हेल्पिंग। इन फैक्ट, आई थिंक इनके कारण और दिक्कत हो गई है।”

“टिनिटस (कभी कभी ऐसा होता है कि कानों के अंदर सीटी बजने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं, चाहे आप किसी शांत जगह पर ही क्यों न बैठे हों)?”

“नो... उम्, वेल, वो तो सभी को होता है।”

“यस यस... मेरा मतलब अनयूसुअल?

“नो,”

“मितली होती है?”

“क्या हो गया डॉक्टर साहब? आप इतने सारे क्वेश्चंस क्यों पूछ रहे हैं?” रूचि के पिता, रवि गुप्ता जी ने बेहद चिंतित होते हुए पूछा।

“देखिए मिस्टर गुप्ता, आप ऐसे घबराइए नहीं। ये सब क्वेश्चंस मैं एक बेसलाइन इस्टैब्लिश करने के लिए पूछ रहा हूँ। सिम्प्टंप्स ठीक से पता होंगे, तभी कोर्स ऑफ़ एक्शन डिसाइड हो पाएगा।”

“पापा... इट्स ओके! डोंट वरी! ... नहीं सर, कोई मितली नहीं होती है।”

“डू यू टू मेक लव?” डॉक्टर देशपाण्डे ने अचानक से ही शरारतपूर्वक पूछ लिया।

“व्हाट!” अजय अविश्वनीय तरीके से चौंक गया।

“नहीं डॉक्टर साहब,” किरण जी ने कहा, “हमारे बच्चे बहुत अच्छे हैं... इनमें अभी भी भोलापन है!”

किरण जी की बात से रूचि के माता पिता को बड़ी राहत हुई - ख़ास कर उसकी माँ शोभा जी को। उनको तो यही लग रहा था कि दोनों ने अब तक कई बार सेक्स कर लिया होगा। लेकिन किरण जी के मुँह से यह सुन कर उनको अच्छा लगा और राहत हुई। अपनी बेटी की बातों (रूचि हमेशा ही उनसे कहती थी कि वो और अजय बहुत क़रीब हैं, लेकिन वो दोनों सेक्स नहीं करते) पर उनको और भी अधिक विश्वास हो गया, और साथ ही अजय और रूचि की मोहब्बत पर गुमान भी!

“ओके! गुड,” डॉक्टर देशपाण्डे मुस्कुराते हुए बोले, “हाऊ आर योर स्टडीज़? एनी प्रॉब्लम्स विद योर मेमोरी?”

“नो सर,”

“ऑन द कंट्रेरी सर,” अजय बोला, “शी इस द टॉपर... एंड आई ऍम श्योर दैट शी विल बी दिस ईयर्स मेरिट लिस्ट टॉपर ऐस वेल,”

अजय हँसते हुए बताया।

“आई ऍम श्योर! रूचि इस अ शार्प एंड इंटेलीजेंट गर्ल... एंड यू आर अ लकी मैन!”

“दैट आई ऍम,” अजय ने हँसते हुए स्वीकारा, “थैंक यू सर,”

“रूचि बेटे, मैंने पहले से ही आपके लिए एमआरआई स्कैनिंग की बुकिंग कर दी है।”

“सर कोई प्रॉब्लम है क्या?”

“वही बता रहा हूँ,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “एमआरआई स्कैनिंग की रिपोर्ट्स के बाद मैं आपको ठीक ठीक बता सकूँगा!”

“कब तक आ जाएगी रिपोर्ट्स?”

“थ्री डेज़... आई विल कॉल यू विद ऐन अपॉइंटमेंट,” डॉक्टर ने कहा, “अभी आप लोग रूचि का हेड स्कैन करवा लें!”

सभी लोग स्कैन रूम की तरफ़ जाने लगे तो डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय से बात करने की गरज़ से उसको दो पल के लिए रोका।

“अजय, तुम कैसे हो?”

“फर्स्ट क्लास, सर!” अजय बोला, “... सर एक बात बताइए? रूचि को कोई सीरियस परेशानी तो नहीं है?”

“अजय... मैं तुमको कोई झूठा दिलासा नहीं दूँगा। सबके सामने कुछ कह नहीं पाया, लेकिन रूचि तुम्हारी मंगेतर है, इसलिए तुमको मेरा इनिशियल असेसमेंट जानने का पूरा हक़ है।” डॉक्टर देशपाण्डे ने गहरी साँस भरी, “आई सस्पेक्ट कि रूचि के ब्रेन में ट्यूमर है,”

“व्हाट?” ट्यूमर शब्द सुनते ही अजय का दिमाग सुन्न हो गया।

कुछ पलों तक उसको समझ ही नहीं आया कि वो क्या कहे। लेकिन फिर स्वयं को समेट कर उसने डॉक्टर देशपाण्डे जो कह रहे थे, वो समझने को कोशिश करी।

डॉक्टर ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए बताया, “रूचि ब्रेन ट्यूमर के क्लासिक, लेकिन इनिशियल सिम्पटम्स डिस्प्ले कर रही है... आई थिंक अभी शुरू ही हुआ है। ... सर का दर्द ब्रेन ट्यूमर का सबसे कॉमन सिम्पटम है। ट्यूमर के कारण ब्रेन में प्रेशर बनता है, जिसको इंट्राक्रैनियल प्रेशर कहते हैं। उसके कारण हेडेक (सरदर्द) होता है। रूचि के बाकी सिम्पटम्स या तो एब्सेंट हैं या वीक! इसीलिए मैंने कहा कि ट्यूमर अभी शुरू हुआ है,”

“इसका इलाज तो होगा न सर?”

“जैसे बाकी कैंसर्स बहुत टाइप के होते हैं, वैसे ही ब्रेन कैंसर्स में भी वैरायटी होती है। ... एमआरआई स्कैन से क्लैरिटी आएगी कि रूचि को क्या है। उसी के बाद सॉलूशन निकलेगा।”

“ओह गॉड,”

“अजय... प्लीज! ऐसे अपना दिल न हारो। ... यू मस्ट नो दैट इफ डिटेक्टेड अर्ली ऑन, कैंसर ट्रीटमेंट सक्सेस रेट इस वैरी हाई,”

अजय ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“रूचि अभी छोटी है; हेल्दी है; उसका बॉडी कंस्टीटूशन अच्छा है। आई ऍम श्योर वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी!”

अजय सुन भी रहा था, और नहीं भी!

रूचि को ऐसा रोग हो गया लगता है जिसका नाम भी लेने में लोग काँप जाते हैं। किसी के संग सुखपूर्वक जीवन जीने की अभिलाषा क्या हुई, मानो गुनाह हो गया! कहीं ऐसा तो नहीं कि वो अच्छे जीवन जीने की अभिलाषा में स्वार्थी हो गया? तो उसी बात का दण्ड मिल रहा है? लेकिन फिर उसके अपराध का दण्ड किसी अन्य को क्यों मिले? नहीं नहीं... ईश्वर ऐसे निष्ठुर तो नहीं हो सकते! वैसे भी, उन्होंने कुछ सोच कर ही उसको ‘वापस’ भेजा है। माया दीदी और कमल दोनों का कुछ भला हुआ उसके वापस आने से। प्रशांत भैया और पैट्रिशिया भाभी का जीवन भी पटरी पर है। शायद पापा भी सही रहें!

तो क्या... तो क्या... रूचि को इस क्षति से बचाने का निमित्त भी अजय ही है?

संभव है न?

उसने दिमाग पर ज़ोर लगाया।

पिछले जीवन में कॉलेज के बाद उसको रूचि के बारे में पता ही क्या था? कुछ भी तो नहीं। शायद, पिछली ज़िन्दगी में उसको वो स्मृतियाँ कभी याद रही हों? लेकिन अब? अब तो बिल्कुल भी याद नहीं।

संभव है कि पिछले समयकाल में यह ब्रेन कैंसर रूचि को लील गया हो। लेकिन अगर वो वापस आया है, तो वो रूचि को बचाने के लिए जो भी बन पड़ेगा वो करेगा।

“... अजय? क्या हुआ? कहाँ खो गए?”

“कुछ नहीं सर! ... जो भी हो, जस्ट प्लीज़ लेट मी नो?” अजय की आवाज़ में एक तरह की हिम्मत सुनाई दे रही थी।

“बिल्कुल... मुझे सही लगा था कि तुममें बड़ी हिम्मत है। यू आर नॉट आवर जनरल टीनएजर... तुम अलग हो!”

अजय ने एक फीकी मुस्कान दी।

“अजय... दिल न हारो। रूचि को सम्हालने का काम तुम्हारा है। उसको खुश रखो। आगे की ज़िन्दगी के सपने बुनो। ... होप (आशा) बहुत बड़ी चीज़ होती है ऐसे रोगों को हराने में। होप मत छोड़ना! और फिर मैं तो हूँ ही न! आई विल डू माय बेस्ट... आई विल डू एवरीथिंग इन माय पॉवर टू ट्रीट रूचि बैक टू अ परफेक्ट हेल्थ!”

अजय ने गहरी साँस भरी।

हाँ वो भी सब कुछ करेगा रूचि को बचाने की!

उसके होंठों पर एक हल्की सी, लेकिन आशाभरी मुस्कान आ गई।

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तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।

अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।

अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!

“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”

“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।

“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”

ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।

शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।

“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”

“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”

“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।

“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”

इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।

अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।

और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।

रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!

डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”

सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।

“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”

किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।

“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”

रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”

“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”

सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”

अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”

“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”

कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।

अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।

“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”

“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”

यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,

'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'

लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।

बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”

रूचि मुस्कुराई।

“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”

कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।

कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।

“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”

“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”

“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”

“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”

यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।

“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”

“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”

फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”

किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।

उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,

“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”

किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।

फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”

इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”

फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”

“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।

अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।

डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।

“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”

रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”

छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।

“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”

“क्या सर?”

“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”

“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।

डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”

“आई नो सर, एंड थैंक यू!”

“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”

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तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।

अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।

अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!

“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”

“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।

“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”

ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।

शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।

“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”

“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”

“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।

“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”

इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।

अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।

और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।

रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!

डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”

सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।

“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”

किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।

“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”

रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”

“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”

सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”

अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”

“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”

कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।

अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।

“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”

“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”

यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,

'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'

लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।

बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”

रूचि मुस्कुराई।

“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”

कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।

कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।

“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”

“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”

“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”

“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”

यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।

“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”

“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”

फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”

किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।

उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,

“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”

किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।

फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”

इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”

फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”

“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।

अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।

डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।

“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”

रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”

छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।

“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”

“क्या सर?”

“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”

“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।

डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”

“आई नो सर, एंड थैंक यू!”

“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”

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Nice update....
 
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Surajs13

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जिसका डर था वही हुआ, मुझे लगा ही था रुचि को कोई गंभीर बीमारी है।
खैर यही प्रकृति की ताकत है, वो बैलेंस बनाना जानती है।
चाहे कोई कुछ भी कर ले कितना ही ताकतवर हो अमीर हो
सबके जीवन में हमेशा सुख ही सुख और दुख ही दुख हो ही नहीं सकते।
अजय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं सबकुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर पाया।
Thank for update

Waiting for next update ❣️
 
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अपडेट 76


प्रशांत और पैट्रिशिया अपनी शादी के एक सप्ताह बाद वापस अमेरिका लौट गए।

इतने समय में सभी की दिनचर्या बेहद धीमी रफ़्तार में वापस सामान्य हो रही थी। कमल और माया की दिनचर्या तो बहुत बदल गई थी और होनी भी चाहिए थी। उधर रूचि भी अब अधिकतर समय अजय के घर में ही बिता रही थी। अक्सर ही रात में वो वहीं रुक जाती। अजय के माता पिता ने रूचि के माता पिता - रवि और शोभा जी से इस बात की आज्ञा ले ली थी। किरण जी और अशोक जी को अपनी बहू रूचि का अपने सामने रहना बहुत भाता। उनको माया के अपने ससुराल जाने की कमी खलती, उससे पहले ही रूचि ने वो कमी पूरी कर दी थी। रूचि की सौम्यता, हँसी, और भोली शरारतों से उनके घर में रौनक रहती। रवि और शोभा जी भी समझ रहे थे कि बहुत जल्दी ही अजय और रूचि की भी शादी हो जाएगी। ऐसे में अनावश्यक ही इस नवोदित सम्बन्ध को जटिल बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

और तो और, रूचि को वो अपने से अलग भी न मानते थे। इसलिए आज जब रूचि को डॉक्टर को दिखाने की बात आई, तो न केवल रूचि के माता पिता, बल्कि अजय और उसके माता पिता भी आए हुए थे।

“हेल्लो रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने बड़ी गर्मजोशी से रूचि से हाथ मिलाते हुए उसका अभिवादन किया, “हाऊ आर व्ही टुडे?”

“आई ऍम गुड, सर” रूचि ने भी उनका अभिवादन गर्मजोशी से किया, “हाऊ आर यू?”

“वैरी वेल... थैंक यू!” फिर उसके माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ गुप्ता!”

“नमस्ते डॉक्टर साहब,” रवि जी और शोभा जी ने भी डॉक्टर देशपाण्डे का अभिवादन किया।

डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय के माता पिता का अभिवादन करते हुए बोले, “हेल्लो मिस्टर एंड मिसेज़ ठाकुर!”

डॉक्टर देशपाण्डे द्वारा दोनों का इस तरह ‘साथ’ में अभिवादन सुन कर रूचि के होंठों पर एक शरारती मुस्कान आ गई। अजय ने आँखें तरेर कर उसको चुप रहने का इशारा किया।

“एंड हाऊ इस माय फ़ेवरिट यंग मैन?”

अजय ने डॉक्टर देशपाण्डे से हाथ मिलाते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग सर! आई ऍम गुड! हाऊ आर यू?”

डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “फैंटास्टिक! भई, आप सभी को यूँ साथ में देख कर बहुत अच्छा लगा… बहुत कम ऐसे परिवार देखें हैं जिनमें इस तरह से… जो बड़ी मोहब्बत से रहते हैं। आप लोग जब भी आते हैं, तो साथ में आते हैं… और मज़बूती से एक दूसरे के संग खड़े रहते हैं।”

“डॉक्टर साहब,” अशोक जी बोले, “रूचि भी तो हमारी बेटी है,”

“सो तो है… सो तो है,” वो बोले, फिर रूचि की तरफ़ मुखातिब हो कर, “नाऊ रूचि, प्लीज़ टेल मी, व्हाट इस एलिंग यू?”

“सर,” उसने बताना शुरू किया, “आई समटाइम्स एक्सपीरियंस शूटिंग पेन इन माय हेड।”

“हाऊ आफ्टेन?”

“वीक में कभी कभी... लेकिन कभी कभी एक दिन में दो बार भी एक्सपीरियंस किया है।”

“इंटेंसिटी कितनी होती है - से ऑन अ स्केल ऑफ़ टेन?”

“युसुअलि सिक्स सेवेन...”

“इन मॉर्निंग्स?”

“हाँ! कभी कभी। लेकिन सुबह का पेन अधिक... पेनफुल होता है।”

“ओके! प्लीज डोंट बी अलार्मड, व्हेन आई आस्क यू दिस... बट डू यू एक्सपीरियंस सीज़र्स?”

“मतलब?”

“मतलब कभी बॉडी में अनयुसुअल झटका महसूस हुआ हो कभी?”

“एक बार हुआ था,” रूचि ने चिंतित स्वर में कहा, “एक बार हुआ था... जस्ट वन लिटिल जॉल्ट!”

“हम्म... टायर्डनेस?”

“होती ही है,”

“नहीं, जनरल टायर्डनेस नहीं... हमेशा रहती है क्या?”

“नो... लेकिन कभी कभी पेन के कारण ठीक से सो नहीं पाती, जिसके कारण अगली सुबह थोड़ा सुस्ती रहती है।

“व्हेन डिड यू गेट योर प्रिस्क्रिप्शन ग्लासेस?”

“रीसेंटली... बट दे आर नॉट हेल्पिंग। इन फैक्ट, आई थिंक इनके कारण और दिक्कत हो गई है।”

“टिनिटस (कभी कभी ऐसा होता है कि कानों के अंदर सीटी बजने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं, चाहे आप किसी शांत जगह पर ही क्यों न बैठे हों)?”

“नो... उम्, वेल, वो तो सभी को होता है।”

“यस यस... मेरा मतलब अनयूसुअल?

“नो,”

“मितली होती है?”

“क्या हो गया डॉक्टर साहब? आप इतने सारे क्वेश्चंस क्यों पूछ रहे हैं?” रूचि के पिता, रवि गुप्ता जी ने बेहद चिंतित होते हुए पूछा।

“देखिए मिस्टर गुप्ता, आप ऐसे घबराइए नहीं। ये सब क्वेश्चंस मैं एक बेसलाइन इस्टैब्लिश करने के लिए पूछ रहा हूँ। सिम्प्टंप्स ठीक से पता होंगे, तभी कोर्स ऑफ़ एक्शन डिसाइड हो पाएगा।”

“पापा... इट्स ओके! डोंट वरी! ... नहीं सर, कोई मितली नहीं होती है।”

“डू यू टू मेक लव?” डॉक्टर देशपाण्डे ने अचानक से ही शरारतपूर्वक पूछ लिया।

“व्हाट!” अजय अविश्वनीय तरीके से चौंक गया।

“नहीं डॉक्टर साहब,” किरण जी ने कहा, “हमारे बच्चे बहुत अच्छे हैं... इनमें अभी भी भोलापन है!”

किरण जी की बात से रूचि के माता पिता को बड़ी राहत हुई - ख़ास कर उसकी माँ शोभा जी को। उनको तो यही लग रहा था कि दोनों ने अब तक कई बार सेक्स कर लिया होगा। लेकिन किरण जी के मुँह से यह सुन कर उनको अच्छा लगा और राहत हुई। अपनी बेटी की बातों (रूचि हमेशा ही उनसे कहती थी कि वो और अजय बहुत क़रीब हैं, लेकिन वो दोनों सेक्स नहीं करते) पर उनको और भी अधिक विश्वास हो गया, और साथ ही अजय और रूचि की मोहब्बत पर गुमान भी!

“ओके! गुड,” डॉक्टर देशपाण्डे मुस्कुराते हुए बोले, “हाऊ आर योर स्टडीज़? एनी प्रॉब्लम्स विद योर मेमोरी?”

“नो सर,”

“ऑन द कंट्रेरी सर,” अजय बोला, “शी इस द टॉपर... एंड आई ऍम श्योर दैट शी विल बी दिस ईयर्स मेरिट लिस्ट टॉपर ऐस वेल,”

अजय हँसते हुए बताया।

“आई ऍम श्योर! रूचि इस अ शार्प एंड इंटेलीजेंट गर्ल... एंड यू आर अ लकी मैन!”

“दैट आई ऍम,” अजय ने हँसते हुए स्वीकारा, “थैंक यू सर,”

“रूचि बेटे, मैंने पहले से ही आपके लिए एमआरआई स्कैनिंग की बुकिंग कर दी है।”

“सर कोई प्रॉब्लम है क्या?”

“वही बता रहा हूँ,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “एमआरआई स्कैनिंग की रिपोर्ट्स के बाद मैं आपको ठीक ठीक बता सकूँगा!”

“कब तक आ जाएगी रिपोर्ट्स?”

“थ्री डेज़... आई विल कॉल यू विद ऐन अपॉइंटमेंट,” डॉक्टर ने कहा, “अभी आप लोग रूचि का हेड स्कैन करवा लें!”

सभी लोग स्कैन रूम की तरफ़ जाने लगे तो डॉक्टर देशपाण्डे ने अजय से बात करने की गरज़ से उसको दो पल के लिए रोका।

“अजय, तुम कैसे हो?”

“फर्स्ट क्लास, सर!” अजय बोला, “... सर एक बात बताइए? रूचि को कोई सीरियस परेशानी तो नहीं है?”

“अजय... मैं तुमको कोई झूठा दिलासा नहीं दूँगा। सबके सामने कुछ कह नहीं पाया, लेकिन रूचि तुम्हारी मंगेतर है, इसलिए तुमको मेरा इनिशियल असेसमेंट जानने का पूरा हक़ है।” डॉक्टर देशपाण्डे ने गहरी साँस भरी, “आई सस्पेक्ट कि रूचि के ब्रेन में ट्यूमर है,”

“व्हाट?” ट्यूमर शब्द सुनते ही अजय का दिमाग सुन्न हो गया।

कुछ पलों तक उसको समझ ही नहीं आया कि वो क्या कहे। लेकिन फिर स्वयं को समेट कर उसने डॉक्टर देशपाण्डे जो कह रहे थे, वो समझने को कोशिश करी।

डॉक्टर ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए बताया, “रूचि ब्रेन ट्यूमर के क्लासिक, लेकिन इनिशियल सिम्पटम्स डिस्प्ले कर रही है... आई थिंक अभी शुरू ही हुआ है। ... सर का दर्द ब्रेन ट्यूमर का सबसे कॉमन सिम्पटम है। ट्यूमर के कारण ब्रेन में प्रेशर बनता है, जिसको इंट्राक्रैनियल प्रेशर कहते हैं। उसके कारण हेडेक (सरदर्द) होता है। रूचि के बाकी सिम्पटम्स या तो एब्सेंट हैं या वीक! इसीलिए मैंने कहा कि ट्यूमर अभी शुरू हुआ है,”

“इसका इलाज तो होगा न सर?”

“जैसे बाकी कैंसर्स बहुत टाइप के होते हैं, वैसे ही ब्रेन कैंसर्स में भी वैरायटी होती है। ... एमआरआई स्कैन से क्लैरिटी आएगी कि रूचि को क्या है। उसी के बाद सॉलूशन निकलेगा।”

“ओह गॉड,”

“अजय... प्लीज! ऐसे अपना दिल न हारो। ... यू मस्ट नो दैट इफ डिटेक्टेड अर्ली ऑन, कैंसर ट्रीटमेंट सक्सेस रेट इस वैरी हाई,”

अजय ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“रूचि अभी छोटी है; हेल्दी है; उसका बॉडी कंस्टीटूशन अच्छा है। आई ऍम श्योर वो पूरी तरह ठीक हो जाएगी!”

अजय सुन भी रहा था, और नहीं भी!

रूचि को ऐसा रोग हो गया लगता है जिसका नाम भी लेने में लोग काँप जाते हैं। किसी के संग सुखपूर्वक जीवन जीने की अभिलाषा क्या हुई, मानो गुनाह हो गया! कहीं ऐसा तो नहीं कि वो अच्छे जीवन जीने की अभिलाषा में स्वार्थी हो गया? तो उसी बात का दण्ड मिल रहा है? लेकिन फिर उसके अपराध का दण्ड किसी अन्य को क्यों मिले? नहीं नहीं... ईश्वर ऐसे निष्ठुर तो नहीं हो सकते! वैसे भी, उन्होंने कुछ सोच कर ही उसको ‘वापस’ भेजा है। माया दीदी और कमल दोनों का कुछ भला हुआ उसके वापस आने से। प्रशांत भैया और पैट्रिशिया भाभी का जीवन भी पटरी पर है। शायद पापा भी सही रहें!

तो क्या... तो क्या... रूचि को इस क्षति से बचाने का निमित्त भी अजय ही है?

संभव है न?

उसने दिमाग पर ज़ोर लगाया।

पिछले जीवन में कॉलेज के बाद उसको रूचि के बारे में पता ही क्या था? कुछ भी तो नहीं। शायद, पिछली ज़िन्दगी में उसको वो स्मृतियाँ कभी याद रही हों? लेकिन अब? अब तो बिल्कुल भी याद नहीं।

संभव है कि पिछले समयकाल में यह ब्रेन कैंसर रूचि को लील गया हो। लेकिन अगर वो वापस आया है, तो वो रूचि को बचाने के लिए जो भी बन पड़ेगा वो करेगा।

“... अजय? क्या हुआ? कहाँ खो गए?”

“कुछ नहीं सर! ... जो भी हो, जस्ट प्लीज़ लेट मी नो?” अजय की आवाज़ में एक तरह की हिम्मत सुनाई दे रही थी।

“बिल्कुल... मुझे सही लगा था कि तुममें बड़ी हिम्मत है। यू आर नॉट आवर जनरल टीनएजर... तुम अलग हो!”

अजय ने एक फीकी मुस्कान दी।

“अजय... दिल न हारो। रूचि को सम्हालने का काम तुम्हारा है। उसको खुश रखो। आगे की ज़िन्दगी के सपने बुनो। ... होप (आशा) बहुत बड़ी चीज़ होती है ऐसे रोगों को हराने में। होप मत छोड़ना! और फिर मैं तो हूँ ही न! आई विल डू माय बेस्ट... आई विल डू एवरीथिंग इन माय पॉवर टू ट्रीट रूचि बैक टू अ परफेक्ट हेल्थ!”

अजय ने गहरी साँस भरी।

हाँ वो भी सब कुछ करेगा रूचि को बचाने की!

उसके होंठों पर एक हल्की सी, लेकिन आशाभरी मुस्कान आ गई।

**
Bahut hi shaandar update diya hai avsji bhai....
Nice and lovely update....
 
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Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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जैसा सबको अंदेशा था, रुचि को एक गंभीर बीमारी है।

पर डॉ देशपांडे ने कहा है कि अजय को उसका इलाज पता है, भले ही अवचेतन मन में। लेकिन कैसे?

क्योंकि अजय का पाला तो कभी भी साइंस से नहीं था पिछले जन्म में?
 
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अपडेट 77


तीन दिन बाद सभी वापस डॉक्टर देशपाण्डे के सामने थे।

अजय दिल थामे बैठा हुआ था - इस उम्मीद में कि वो कहें कि रूचि को कोई परेशानी नहीं है। जब से उसको पता चला था कि रूचि को ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना है, तब से उसकी नींद उड़ गई थी। वो वाक़ई जानना चाहता था कि रूचि पूरी तरह से निरोगी है। अजय की ही तरह बाकी लोगों के मन में भी उद्विग्नता थी, क्योंकि उनको नहीं पता था कि क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर देशपाण्डे ने सभी का अभिवादन कर के उनको बैठने को कहा।

अजय ने उनकी तरफ़ देखा। साफ़ दिख रहा था कि डॉक्टर साहब बड़े असमंजस में थे। लेकिन उनका चेहरा देख कर अजय समझ गया कि क्या सुनने को मिलेगा। पक्की बात थी कि रूचि को ब्रेन कैंसर था!

“रूचि,” डॉक्टर देशपाण्डे ने हिचकिचाते हुए कहना शुरू किया, “देयर इस नो ईज़ी वे टू से दिस… बट द पेन इन योर हेड इस बिकॉज़ ऑफ़ अ ट्यूमर! इट इस रफ़ली द साइज़ ऑफ़ टू सेन्टीमीटर्स… एंड इस मेलिग्नेंट,”

“मतलब डॉक्टर साहब,” किरण जी की आवाज़ काँप रही थी।

“मतलब… रूचि हैस कैंसर… ब्रेन कैंसर,”

ये सुनते ही किरण जी की एक दुःखभरी आह निकल गई, और अगले ही पल वो पल रोने लगीं।

शोभा जी तो जैसे पत्थर की हो गईं। न तो उनके कोई आवाज़ निकली और न ही आँसू।

“लेकिन डॉक्टर साहब,” अशोक जी अविश्वास से बोले, “बिटिया की अभी उम्र ही क्या है? ऐसे में कैंसर! कैसे?”

“सर, आई अंडरस्टैंड! और यह बात अच्छी है,”

“अच्छी बात है? कैसे डॉक्टर?” रवि जी ने पूछा।

“प्लीज़ लेट मी एक्सप्लेन। रूचि इस यंग, एंड हर बॉडी कंस्टीटूशन इस गुड… अच्छी हेल्थ है। … डिड आई टेल यू दैट इट इस एट अर्ली स्टेज?”

इस तथ्य से भी किसी को संतोष नहीं हुआ।

अजय ने इतनी देर में पहली बार रूचि को देखा।

और जो उसने देखा, वो देख कर उसको अचम्भा हुआ - रूचि के चेहरे पर भय का कोई चिह्न नहीं था।

रूचि और अजय साथ ही बैठे थे, और दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था। पिछले तीन दिनों से रूचि महसूस कर रही थी कि अजय जितना दिखा रहा, उससे कहीं अधिक उसको पता था। स्कैन करवा कर जब वो वानप्रस्थ अस्पताल से निकली थी, तभी से अजय के हाव भाव पढ़ कर वो समझ गई थी कि उसको कोई गंभीर रोग हो गया था। एक पल को उसको डर भी लगा; लेकिन फिर उसने सोचा कि अजय ने साक्षात परमब्रह्म को छुआ था और उसने अजय को! ईश्वर की जो भी कृपा अजय को मिली हुई थी, उसमें से कुछ तो उस पर भी आई होगी न? इसलिए डरने की क्या बात है? वैसे भी, मृत्यु तो संसार का अटल सत्य है - कभी न कभी मरना है ही। लेकिन उसको यकीन था कि अगर उसके जीवन में अजय के साथ रहना लिखा है, तो वो बदलेगा नहीं। कोई न कोई मार्ग ज़रूर निकलेगा। ऐसे में डरने का कोई मतलब ही नहीं!

डॉक्टर देशपाण्डे ने बताया, “देखिए, मैं डिटेल में बताता हूँ। रूचि को ग्लिओब्लास्टोमा ट्यूमर है, जो एक बहुत ही अग्रेसिव ब्रेन ट्यूमर होता है। यह ब्रेन की ग्लियल सेल्स में होता है, इसीलिए इसको ग्लिओब्लास्टोमा कहते हैं।”

सभी दुःखी से, लेकिन पूरी तरह से ध्यान दे कर सुन रहे थे।

“इसे ग्रेड फोर एस्ट्रोसाइटोमा में कटेगोराइज़ किया गया है, जो शायद सबसे घातक ब्रेन ट्यूमर्स में से एक है।” डॉक्टर कह रहे थे, “ये बहुत तेजी से बढ़ता है और जल्दी ही अपने आस पास के ब्रेन टिश्यू में फैल जाता है! इसलिए देर करने से इसका ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है।”

किरण जी इसकी घातकता के बारे में सुन कर और भी रोने लगीं।

“वैसे तो ग्लिओब्लास्टोमा ब्रेन के किसी भी हिस्से में हो सकता है। रूचि को फ्रंटल लोब में हुआ है। इसीलिए उसको आँखों के पास में इतना पेन होता है।”

रवि जी ने पूछा, “सर, इसका ट्रीटमेंट क्या है?”

“जी, इसके मल्टीपल कोर्स होते हैं। सबसे पहला तो है सर्जरी... हमारी कोशिश रहेगी कि जितना पॉसिबल हो, उतना ट्यूमर हटा दिया जाए... बिना हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुँचाए। ट्यूमर अभी छोटा है, और फैला नहीं है। इसलिए दैट शुड बी इजी।”

सभी ने समझते हुए ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“कैंसर सेल्स को केवल ऑपेरशन कर के पूरी तरह निकालना इम्पॉसिबल है। इसलिए सर्जरी के बाद, एक्सटर्नल बीम रेडिएशन थेरेपी दी जायेगी। इससे ट्यूमर की बची हुई सेल्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। ये क़रीब छः से सात सप्ताह चलेगा। अगर ज़रुरत पड़ी, तो स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी करनी पड़ेगी।”

अजय के मुँह से निकल गया, “सर, कीमोथेरेपी भी होती है?”

“हाँ, लेकिन वो हेल्दी टिश्यू पर भी असर डालती है, और बॉडी को वीक करती है। मैं अपनी रिसर्च में यही कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे लेस टैक्सिंग (कम नुक़सान पहुँचाने वाला) ट्रीटमेंट बनाया जाए,”

कह कर डॉक्टर देशपाण्डे ने अर्थपूर्वक दृष्टि अजय पर डाली।

अजय का दिल अभी भी काँप रहा था।

“सर, बचने के क्या चांस हैं? … मतलब रूचि ठीक तो हो जायेगी न?”

“अजय, आई विल बी ट्रुथफुल हियर,” डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी पर कसमसाते हुए बोले, “ग्लिओब्लास्टोमा के पेशेंट्स की प्रोग्नोसिस सीरियस होती है। क्योंकि यह ट्यूमर बहुत अग्रेसिव होता है। जनरली, पोस्ट ट्रीटमेंट सर्वाइवल एक्सपेक्टेशन ट्वेल्व टू एटीन मंथ्स होती है।”

यह सुन कर शोभा जी का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ गया,

'बस एक डेढ़ साल! अभी उनकी बेटी ने कौन से सुख देखे हैं?'

लेकिन रूचि के चेहरे पर अभी भी शिकन की एक लकीर भी नहीं थी।

बट,” डॉक्टर ने इस शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा, “बट, रूचि अभी अपने टीन्स में है, हेल्दी है… इसलिए शी कैन बी बेटर! मुझे लगता है कि वो पूरी तरह से ठीक हो सकती है। मैं अभी कोई प्रॉमिस नहीं दे सकता, लेकिन मेरी पूरी कोशिश बस यही रहेगी कि रूचि को दुबारा यह रोग न आए।”

रूचि मुस्कुराई।

“यू मस्ट नो, ट्रीटमेंट का ऑब्जेक्टिव न केवल लाइफ को प्रोलांग करना होता है, बल्कि क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को बेहतर करना भी होता है।”

कमरे में गहरी निःस्तब्धता छा गई।

कुछ देर तक किसी से कुछ कहा ही नहीं गया।

“कब शुरू करना है सर?” पूरे वार्तालाप में पहली बार रुचि ने कुछ कहा था, “ऑपेरशन कब कर सकते हैं?”

“जितना जल्दी हो सके,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “फिलहाल ट्यूमर निकालना सबसे ज़रूरी है।”

“ओके,” रूचि ने पूछा, “इसके ऑपेरशन से मेमोरी या अन्य क्षमताओं पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ता?”

“रूचि बेटा, असर हो तो सकता है। लेकिन ये बहुत से फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। अच्छी बात ये है कि अभी ट्यूमर छोटा है। और हमारे पास ट्रीटमेंट के अडवांस्ड मेथड्स हैं। इसलिए ब्रेन डैमेज मिनिमल होने की पॉसिबिलिटी है।” डॉक्टर ने बताया, “मेमोरी फंक्शन्स पर इम्पैक्ट नहीं आना चाहिए क्योंकि ये फ्रंटल लोब में है। लेकिन स्पीच, मोटर स्किल्स - मतलब मूवमेंट, बैलेंस, और कोऑर्डिनेशन में शायद कोई समस्या हो सकती है। अभी सब बता पाना मुश्किल है! ट्यूमर ऑक्सिपिटल लोब के पास नहीं है, इसलिए विज़न में कोई प्रॉब्लम नहीं आनी चाहिए। यू में नॉट नोटिस इट, लेकिन तुम्हारे लोगों को तुम्हारी पर्सनालिटी और बिहैवियर में थोड़े चेंजेस दिखाई दे सकते हैं।”

यह सुन कर रूचि के चेहरे पर पहली बार परेशानी वाले भाव दिखाई दिए।

“लेकिन हम बहुत की केयरफुल हो कर ऑपरेशन करेंगे। माय कलीग, डॉक्टर नारायण, हैस अ गुड एंड लॉन्ग एक्सपीरियंस इन परफार्मिंग ब्रेन सर्जरी… इसलिए चिंता न करो। आई ऍम होपफ़ुल… क्योंकि जहाँ पर ये ट्यूमर है, थैंकफुली, वहाँ टिश्यू रिमूवल से ये डैमेज बहुत कम होने चाहिए,”

“ओके देन…” वो बोली, “लेट्स डू इट,”

फिर सभी को देख कर वो आगे बोली, “कमऑन… मम्मी पापा… आप लोग सभी ऐसे क्यों हैं?”

किरण जी ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से रूचि को देखा - इतनी प्यारी सी बच्ची को अगर कुछ हो गया तो? यह विचार उनको अंदर से खाए जा रहा था। रूचि की रौनक के बगैर अब वो अपने घर के बारे में सोच भी नहीं पा रही थीं।

उनको ऐसे देख कर रूचि अपने सामान्य, खुशनुमा अंदाज़ में चुहल करते हुए बोली,

“क्या माँ! आप भी न! ऐसे क्यों रो रही हैं आप? मैं तो अभी भी हूँ न!” उसने किरण जी के आँसू पोंछे, “मुझे कुछ नहीं होगा! अभी तो आपको मेरी और अज्जू की शादी करानी है… फिर हमारे बच्चों के संग खेलना है… मैं आपको बिना ये सारी ख़ुशियाँ दिए कहीं नहीं जाने वाली!”

किरण जी उस बच्ची की हिम्मत भरी बातें सुन कर आश्चर्यचकित थीं। उनको भी थोड़ा दिलासा मिला।

फिर रूचि उनके कानों के फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलती है, “… और मुझे आपका खूब सारा दुद्धू पीना है… बहुत सालों तक!”

इस आखिरी बात पर रोते रोते भी, अनायास ही किरण जी के होंठों पर मुस्कान आ ही गई।

“दैट्स लाइक माय प्यारी सी माँ,”

फिर उसने शोभा जी को देखा, और हँसते हुए बोली, “मम्मी, आप भी रोना बंद करेंगी, या आपको भी समझाऊँ,”

“ओह मेरी बच्चे,” कह कर उन्होंने रूचि को अपने आलिंगन में भर लिया।

अशोक जी और रवि जी भी एक दूसरे को हाथ पकड़ कर सम्बल दे रहे थे। मर्द थे, इसलिए दोनों अपनी पीड़ा सबके सामने दिखा नहीं पा रहे थे। लेकिन अंदर ही अंदर उनके दिलों में जैसे नश्तर चुभ रहा था। एक अभूतपूर्व टीस बार बार उठ रही थी। लेकिन चाहे जो भी हो, मुश्किल की इस घड़ी में यह पूरा परिवार उस मुश्किल का सामना करने के लिए एक जुट था।

डॉक्टर देशपाण्डे भी इस भावनात्मक रूप से गहरे हो चले माहौल को देख रहे थे और मन ही मन वो भी द्रवित हो रहे थे। सच में, ऐसे प्यारे से परिवार का नुकसान नहीं होना चाहिए - रूचि जैसी प्यारी सी बच्ची के रूप में तो बिल्कुल ही नहीं।

“इफ यू आर ओके,” डॉक्टर देशपाण्डे बोले, “देन व्ही कैन परफॉर्म द ऑपरेशन नेक्स्ट वीक,”

रवि जी ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए कहा, “जैसा आप ठीक समझें डॉक्टर साहब,”

छोटी मोटी औपचारिक बातें करने के बाद जब सभी वहाँ से निकल रहे थे, तब डॉक्टर देशपाण्डे ने इशारे से अजय को दो मिनट रुकने को कहा।

“अजय,” डॉक्टर देशपाण्डे ने कहा, “डिड यू नोटिस वन थिंग?”

“क्या सर?”

“रूचि को वही कैंसर हुआ है, जिसका सलूशन तुम उस दिन बेहोशी की हालत में बता रहे थे?”

“व्हा…” अजय को यकीन ही नहीं हुआ।

डॉक्टर देशपाण्डे ने ‘हाँ’ में सर हिलाया, “एंड ऐस आई प्रॉमिस्ड, मैं रूचि का इलाज़ पूरी तरह से फ्री में करूँगा। लेकिन तुमको भी मेरी मदद करनी होगी! … सोचो, इस खतरनाक बीमारी का इलाज़ मिलने से कितने लोगों को फायदा पहुँचेगा!”

“आई नो सर, एंड थैंक यू!”

“अजय, तुम सभी चिंता मत करो!” डॉक्टर देशपाण्डे ने पूरे विश्वास से कहा, “न जाने क्यों, मुझे यकीन है कि रूचि पूरी तरह से ठीक हो जाएगी… वो भी जल्दी ही!”

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Bahut hi badhiya update diya hai avsji bhai....
Nice and beautiful update....
 
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