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★☆★ Xforum | Ultimate Story Contest 2025 ~ Reviews Thread ★☆★

Lucifer

ReFiCuL
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Unfortunately We are facing a server issue which limits most users from posting long posts which is very necessary for USC entries as all of them are above 5-7K words ,we are fixing this issue as I post this but it'll take few days so keeping this in mind the last date of entry thread is increased once again,Entry thread will be closed on 7th May 11:59 PM. And you can still post reviews for best reader's award till 13th May 11:59 PM. Sorry for the inconvenience caused.

You can PM your story to any mod and they'll post it for you.

Note to writers :- Don't try to post long updates instead post it in 2 Or more posts. Thanks. Regards :- Luci
 
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Bahut mast hai kahani
Khas kar character ke name😂😂😂
Kafi intresting story likhi hai aapne or kabhi mauka mile to is story ko long me jaroor likhna aap Action or Comedy ka Jabardast tadka maja aajay read karne me jise
waise main soch raha tha is kahani ko long story banau. ab pakka karunga aisa. thanks a lot sir 🙏🙏🙏🙏🙏
 

Shetan

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Raj_sharma
"पट"
रात का अंधेरा धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था । आकाश में घने बादल छाए हुए थे।

हवा तेज थी और अपने साथ पतझड़ में गिरे हुए पत्तों को उड़ाती एक विचित्र प्रकार की भयावनी ध्वनि उत्पन्न कर रही थी । सन्नाटा और भी गहरा हो चला था ।

नीरवता के उस साम्राज्य को कभी-कभी चमगादड़ या उल्लू के चीखते हुए स्वर तोड़ देते ।

कालिमा की उस फैली हुई चादर के नीचे सृष्टि किसी थके हुए नटखट शिशु की भांति सो रही थी ।

रजत को अमझरा घाटी आए हुए अभी कुल दो ही दिन हुए थे । वह पुरातत्व विभाग से संबंधित था और उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश को मिलाने वाली सीमा रेखा के निकट घने वन में स्थित मंदिरों तथा प्राचीन भग्नावशेषों का अध्ययन करने अकेला ही अमझरा घाटी की सुरम्यता का पान करने आ पहुंचा था ।
आते समय पथ प्रदर्शक के रूप में एक निकट का ग्रामवासी साथ था जो उसका सामान भी उठाए हुए था और मार्गदर्शन भी वही कर रहा था ।
घाटी के सौंदर्य ने रजत को पूर्णतया अभिभूत कर लिया था । लंबे राजमार्ग के दोनों ओर चिरौंजी और आम के वृक्ष थे। कहीं कहीं पलाश के वृक्ष तथा कँटीली झाड़ियां थीं । पेड़ों का सिलसिला सड़क के निकट उतना घना न था किंतु जैसे जैसे उनका सड़क से फ़ासला बढ़ता गया था उनकी सघनता में भी वृद्धि होती गई थी।
बसंत बीत चुका था और पतझड़ पूरे यौवन पर था । हवा के हर झोंके के साथ पेड़ों से टूट टूट कर गिरने वाले सूखे पत्तों का मरमर संगीत बढ़ जाता था ।

कभी-कभी वनांचल से कोयल कूक उठती या पपीहा 'पी कहां' की आवाज लगा बैठता। वन प्रदेश के उस मोहक सौंदर्य में भी एक रहस्यमयी संगीत की ध्वनि रजत को बराबर सुनाई दे रही थी।

उसे यहां का वातावरण चिर परिचित सा प्रतीत हो रहा था । एक ऊंचे टीले पर चढ़ कर उसने दूर तक फैली उस वन- राशि को देखा और मुस्कुरा दिया था ।

फिर गाइड से पूछा - "मंदिर किधर है ?"

"उस ओर घने जंगलों के बीच कई छोटे-बड़े टीले हैं । उन्हीं पर मंदिर और खंडहरों का झुंड भी है।

"खंडहरों का झुंड' सुन कर बरबस ही उसे हँसी आ गई थी । शाम होते-होते वह घने वन में प्रविष्ट होकर उन टीलों पर पहुंच चुका था ।

सामने दूर तक छोटे-बड़े टीले फैले हुए थे । एक ऊंचे टीले पर एक छोटा सा मंदिर दिखाई दे रहा था जिसके कंगूरे का कलश संध्याकालीन रक्तिम किरणों में विचित्र रूप से चमक रहा था ।

उसी के पास एक और टीला था । मंदिर वाले टीले की अपेक्षा कुछ अधिक ऊंचा।

उस पर जाने के लिये नीचे से ऊपर तक छोटी-छोटी सीढ़ियों की लंबी कतार थी ।

स्थान स्थान पर यह सीढ़ियां टूट चुकी थी फिर भी उनका प्रयोग विश्वास के साथ किया जा सकता था । जहां सीढियाँ समाप्त होती थीं वहां कोई बहुत छोटा सा शि..वा..लय था या फिर तुलसी का देवल। नीचे से कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रहा था।

टीलों से कुछ हट कर एक खंडहर था जिसे देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि यह इमारत अपने समय में निश्चय ही अत्यंत भव्य रही होगी । इसी खंडहर में रजत ने ठहरने का निश्चय किया था ।

मंदिर और खंडहरों के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान वहां ठहरने योग्य न था ।
खंडहर में प्रवेश करते ही एक विचित्र सी गंध रजत के नसों में घुसी ।

वह कुछ ठिठक गया किंतु फिर दृढ़ता से भीतर प्रविष्ट हो गया । द्वार पार करने पर एक लंबा पतला गलियारा पार करना पड़ा। एक विशाल आँगन में जा कर यह गलियारा खत्म हो गया ।

आंगन के पूर्व में एक दालान था । शेष तीनों और कमरे बने हुए थे जो अब जर्जर अवस्था में थे ।

रजत ने आँगन की पश्चिमी दिशा में पड़ने वाले कमरे को खोला । जर्जर, उड़के हुए किवाड़ चरमरा कर खुल गए और वर्षो से बंद रहने की सीली सी बास एक भभका बन कर बाहर निकली ।

थोड़ा ठहर कर रजत ने कमरे का अंदर से निरीक्षण किया । द्वार दीवार के बीचोबीच में था और उसकी दोनों तरफ दो बड़ी खिड़कियां थीं जिनमें चीड़ की लकड़ियों के पल्ले जड़े हुए थे ।अपने गाइड से कह कर रजत ने कमरे की सफाई कराई ।

कमरा साफ़ करते करते ही उसने पूछा था - "साहब ! क्या आप यही रहेंगे ?"

"हां । क्यों ?"

"साहब !..."कुछ कहते कहते गाइड हिचकिचाया ।

"क्या बात है ? निडर होकर कहो ।"


रजत ने फिर पूछा तो वह बोला -
"पचास साठ वर्षों से इन खंडहरों का रुख़ किसी ने नहीं किया है साहब ! और यहां तो सुनते हैं कि आत्माएं रहती हैं ।"

"क्या ?"

"हां साहब ! वह उधर बस्ती की ओर जो मंदिर पड़ता है दु..र्गा मैया का वह भी तो अपने आप बन गया था । गांव या शहर के किसी मजदूर या राजगीर ने एक ईंट तक न उठाई और रातों-रात मंदिर तैयार हो गया । दु..र्गा मैया के आदेश से ही कोई इधर नहीं आता ।" गाइड ने बताया ।

"अच्छा । किसी ने मैया को देखा भी है ?" रजत ने दिलचस्पी से पूछा ।

"साहब ! हम पापी लोगों को तो दर्शन नहीं हुए लेकिन यहां के राजा जी और उनके वंशजों ने उनके कई बार दर्शन किए हैं ।"

"खैर, जो होगा देखा जाएगा ।"

उसे आत्माओं के अस्तित्व पर विश्वास था किंतु उनके दर्शन या रूप धारण करने की बात पर उसे रत्ती भर भी भरोसा नहीं था । भूत-प्रेतों या देवी देवताओं के आगमन की बात भला कौन पढ़ा लिखा व्यक्ति स्वीकार करता है ?

"साहब ! यहां न ठहरें । इससे अच्छा तो आप उस टीले वाले मंदिर की यज्ञशाला में ठहर जाएँ ।"

"नहीं दोस्त ! मैं यही रहूंगा । अगर मैया को यह नाग़वार लगेगा तो वह स्वयं आकर मुझे मना कर देंगी। इसी बहाने उनके दर्शन मुझे भी मिल जाएंगे ।"

"लेकिन साहब !"

"लेकिन लेकिन कुछ नहीं । मेरा सामान उधर रख दो और अब तुम जाओ । रात होने वाली है । ज्यादा समय की बीत गया तो जाने में भी मुश्किल होगी ।"

"साहब ! आप अकेले..."

"हां भाई ! मैं अकेला ही रहूंगा । और हां, तुम कल सुबह मेरे खाने के लिए कुछ ला देना । या फिर सुबह आकर कुछ बना ही जाना ।"

"अच्छा साहब !"


वह जाने के लिए मुड़ा तो रजत ने उसके हाथ पर सौ रुपये का नोट रख दिया ।
"ये रुपए रख लो । नाम क्या है तुम्हारा ?"

"गेंदा सिंह ।"

"खूब । अच्छा, कल आना ।"

"अच्छा साहब !"गेंदा सिंह ने लंबा सलाम ठोंका और चला गया ।

उसके जाने के बाद उसने अपने सामान को एक ओर जमाया और साफ़ की हुई फ़र्श पर अपना बिस्तर लगा दिया। आते समय वह अपने साथ कुछ अखरोट बादाम और सूखे मेवे ले आया था । थोड़े से अखरोट जेब में डाल कर वह कमरे से बाहर निकला ।
द्वार अच्छी तरह बंद करके उसने एक बार पूरे खंडहर का चक्कर लगाया । कहीं कोई खास बात नजर न आयी । पुराने समय के जमींदारों के भवनों के ही समान ही यह भी था ।

जिस कमरे में रजत ने ठहरने का निश्चय किया था उसी के पार्श्व में एक छोटी सीढ़ी भी थी जो नागिन की तरह बलखाती ऊपर चली गई थी ।
पूरे खंडहर का निरीक्षण करके रजत इस सीढ़ी से चढ़ कर ऊपर पहुंचा ।

खुली हुई छत कहीं कहीं टूट गई थी । किनारे की मुंडेर की ईटें भी खिसकने लगी थीं । काई की काली परत ने पूरी इमारत को स्याह रंग में रंग दिया था । इमारत के बाजू में एक कुंआ था जो अब भग्न अवस्था में था । कुंआ देख कर रजत की प्यास चमक आई ।

उसकी बोतल में पानी था फिर भी उसने पानी की तलाश में चारों ओर देखा । अंधेरा गहरा हो चला था । कहीं कुछ स्पष्ट दिखाई न पड़ा ।
मंदिर और टीले अंधेरे में दैत्यों के सायों के समान काँप रहे थे । अंधेरा थरथराने लगा था । रजत ने ऊपर सिर उठाया । नीला आकाश काली चादर ओढ़ चुका था । कालिमा की फटी चादर के सुराखों से रह रह कर किसी सुंदरी भिखारिन के बदन जैसा आकाश चमक रहा था ।
रजत ने टार्च जला ली और उसकी प्रकाश - रेखा के सहारे धीरे-धीरे संभल संभल कर नीचे उतर आया ।


कमरे में आकर उसने मोमबत्ती जला दी । टिफ़िन कैरियर से निकाल कर खाना खाया और बिस्तर पर लेट कर उपन्यास के पन्नों में डूब गया । रात खिसकती रही और जब नींद में उसकी पलकें बोझिल कर दीं तब हाथ की किताब सिरहाने रख कर वह सो गया ।

सवेरा हो चुका था और सूर्य की सुनहरी किरणें कमरे में खेलने लगी थीं । गेंदा सिंह की कथित आशंका की बात सोच कर वह मुस्करा उठा था । सारी रात उस वर्जित प्रदेश में बिता कर संभवतः उसने उन आत्माओं के प्रति धृष्ठता की थी लेकिन उसे इस वर्जित कृत्य से रोकने के लिए किसी आत्मा ने उस तक आने का कष्ट नहीं उठाया था ।

उसने आसपास के वातावरण का जायज़ा लिया । टीले पर के उस मंदिर में उसे एक विचित्र प्रकार का आकर्षण प्रतीत हो रहा था । बार-बार मंदिर के खुले 'पट' उसका आह्वान सा कर रहे थे ।

चांदी सी चमकती धूप चारों ओर बिखरी हुई थी ।
गेंदा सिंह उसके लिए बस्ती से सहज प्राप्त फल, सब्जियां और आटा लाया था । लकड़ियां बटोर कर उसने खंडहर के आंगन में ही एक ओर चूल्हा बना लिया था और अब रसोई के प्रबंध में जुटा था।
रजत का मन बार-बार मंदिर की ओर खिंचा जा रहा था । वह गेंदा सिंह से कहकर मंदिर की ओर बढ़ गया । मंदिर तक जाने के लिए उसे कुल उन्चास सीढ़ियां तय करनी पड़ीं ।

मंदिर के पट जो नीचे से देखने पर खुले प्रतीत हो रहे थे वस्तुतः बंद थे । उनका काला रंग कहीं-कहीं से उखड़ गया था । मंदिर की दीवारें पत्थर की थीं जिन पर सुंदर नक्काशी की गई थी । ऊपर गोल गुंबद और फिर ऊंची लंबी चोटी पर रखा हुआ पीतल का कलश जो धूप में सोने का भ्रम उत्पन्न कर रहा था ।
रजत मंदिर के द्वार से टिक कर खड़ा हो गया । चारो ओर दूर-दूर तक पेड़ और झाड़ियां फैली हुई थीं । रात में वन्य पशुओं के गर्जन से गूंजने वाला वन इस समय चिड़ियों की मधुर कलरव से गूंज रहा था ।
मंदिर के पास ही एक आम का पेड़ था । फलों के भार से दबी हुई उसकी शाखाएं धरती का आंचल चूम रही थीं । सिंदूरी आम के फलों को देखने पर देखने वाले के मन में फूलों का भ्रम उत्पन्न होता था ।

वातावरण अत्यंत सुहावना था । पीछे की ओर एक छोटा सा द्वार था और उसके पास ही बनी थी यज्ञ वेदी । उस पर जंगली फूलों की लताएं फैल गई थीं । थोड़े अंतर के बाद ही टीले की सीधी ढलान थी जो पीछे एक बड़े गड्ढे में खत्म हो जाती थी । यहां से अगर कोई गिर पड़े तो .....! रजत को झुरझुरी हो आई ।

अर्ध परिक्रमा करता वह फिर मंदिर के सामने आ गया । कहीं कुछ नवीनता, कोई विचित्रता न होने पर भी रजत को जैसे कोई आत्मिक संबंध मंदिर की ओर खींच रहा था ।

उसने बंद किवाड़ों को धक्का दिया लेकिन वे टस से मस न हुए । रजत ने कई बार उन्हें खोलने का प्रयत्न किया और अंत में निराश होकर लौट आया ।
दूसरे टीले पर एक छोटा सा शि.वा.ला था। टीले का धरातल कठिनाई से दस वर्ग फीट का ही होगा । काले संगमरमर की छोटी सी शि..व मूर्ति के ऊपर सफेद संगमरमर का क्षत्र के आकार का चंदोवा था । शि..व..ग के सामने ही थी नंदी की मूर्ति और वहीं ध्यानावस्थित पा..र्व..ती जी भी स्थित थीं । देवताओं पर श्रद्धा न रखने वाले रजत के मन में न जाने कैसे श्रद्धा जाग पड़ी ।
उसने पास फैली जंगली लताओं से फूल चुन कर मूर्ति पर चढ़ा दिए । मस्तक नवा कर जब उसने सिर उठाया तो चौंक पड़ा ।

शि..व मूर्ति के पीछे ही एक छोटा सा पक्का कुंड था जिसमें साफ पानी का सोता छलछला रहा था । पानी की पतली धार झरने के रूप में धीरे-धीरे बहती शि..व.. के चरण धोती नीचे की ओर उतर गई थी ।

प्रकृति की इस विचित्र रचना पर रजत चकित रह गया । टीले पर फूटने वाला झरना ..... यह कल्पना भी असत्य लगती है ।
दिन भर रजत गेंदा सिंह से बातें करता रहा और आसपास के वातावरण, मंदिरों और उस खंडहर का विवरण अपनी नोट बुक में नोट करता रहा और फिर आ गई वह रात...!
चारों ओर फैला सन्नाटा । गहरा अंधेरा और पल-पल खिसकता समय । बढ़ती भयानकता । आज की रात रजत को रोमांचित कर रही थी ।

यद्यपि एक रात वह इसी खंडहर में सकुशल बिता चुका था किंतु आज उसका हृदय व्यग्र था ।

गेंदा सिंह बस्ती की ओर जा चुका था । मोमबत्ती जला कर देर से रजत पढ़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन शब्द थे कि सब आपस में गड्डमड्ड हुए जाते थे ।

कई बार प्रयत्न करके भी वह कुछ न पढ़ सका तो किताब बंद करके रख दी और सोने की चेष्टा करने लगा ।
पिघलती हुई मोमबत्ती आधी जल चुकी थी। रजत ने आंखें बंद कर लीं । नींद अभी आंखों से कोसों दूर थी । और तभी उसे लगा जैसे कोई बड़ा सा काला ठंडा अंधेरे का टुकड़ा उसके ऊपर छाने लगा।

रजत ने घबरा कर आंखें खोल दीं । बाहर हवा की सांय सांय बढ़ती जा रही थी । लगता था तूफान आएगा । हवा के थपेड़े बार-बार कमरे के द्वार से टकरा कर भड़भड़ा उठते । बिल्कुल ऐसे जैसे कोई जोर जोर से सांकल बजा रहा हो ।
अजीब खौफ़नाक माहौल हो रहा था । अचानक हवा के एक तेज झोंके ने मोमबत्ती बुझा दी । बाहर का अँधेरा कमरे में उतर आया । रजत ने चादर अपने गिर्द लपेट ली । तभी सांकल जोर से बज उठी ।

रजत चौंक पड़ा । इस एकांत निर्जन स्थान में कौन है हो सकता है ? उसने जोर से पूछा -
"कौन है ?"
उत्तर न मिला । रजत ने सोचा - हवा के झोंके ने यह शरारत की होगी और अपनी मूर्खता पर खुद ही उसे हँसी आ गई किंतु नहीं । यह भ्रम नहीं था । सांकल फिर बजी थी । बिल्कुल उसी ढंग से । उसी अंदाज में।

रजत ने सांस रोक ली और कान लगा कर आहट सुनने लगा । अपने संदेह का वह निवारण करना चाहता था । थोड़े अंतराल के बाद फिर सांकल बजी किंतु इस बार कुछ आहिस्ता आहिस्ता ।
रजत ने टटोल कर अपनी टार्च उठा ली और दूसरे हाथ से पिस्तौल का हत्था कस कर पकड़ लिया । कौन हो सकता है इस समय ? कहीं कोई आत्मा ? धत, यह सब मनुष्य का वहम है कोरी कल्पना ।

आत्माओं का कोई अस्तित्व नहीं । फिर ?

जरूर कोई डाकू होगा । चंबल की घाटियों में डाकू रहते ही हैं । उन्हीं में से कोई यहां आश्रय की तलाश में आया होगा और प्रकाश की रेखा के सहारे इस कमरे तक..!

सांकल एक बार फिर बजी । रजत बिना आहट किए पांव दबा कर द्वार तक पहुंचा और खामोशी से आहिस्ता आहिस्ता कुंडा खोल कर आड़ में खड़ा हो गया । हवा का एक झोंका उढ़के हुए किवाड़ों को धकेल कर अंदर घुस आया ।

बहुत देर तक जब रजत ने कोई आहट न सुनी तो टार्च जला कर बाहर निकल गया । उसके दाहिने हाथ में अभी भी पिस्तौल का दस्ता दबा हुआ था । सावधानी से उसने पूरे आँगन और आसपास के कमरों का निरीक्षण किया ।
आंगन में धूल की परतें और पत्तों का अंबार था किंतु किसी के आने का उसे कोई चिन्ह नहीं मिला । तो क्या वह उसका भ्रम था ? यह कैसे हो सकता है ?
उसने तीन बार सांकल बजने की आवाज बिल्कुल साफ़ साफ़ सुनी थी । अपने अनुभव को झूठा कैसे समझ ले ? मन की तसल्ली के लिए उसने टार्च का रुख़ कर छत पर जाने वाली सीढ़ियों की ओर कर दिया ।

अचानक उसे लगा जैसे कोई साया तेजी से सीढ़ियों के ऊपरी मोड़ पर गुम हो गया । टार्च से निकले प्रकाश के दायरे में सीढ़ियों पर पड़ी धूल पर दो छोटे-छोटे मांसल पैरों के निशान पड़े हुए थे ।
रजत ने उन्हें ध्यान से देखा । उसे लगा जैसे वह इन पद - चिन्हों को पहचानता है आज से नहीं, वर्षो से वह इन चिन्हों को जानता है ।

जैसे ये चिन्ह किन्हीं बेहद खूबसूरत गुलाबी तलवों वाले मांसल संगमरी पाँवों के हैं जिनमें पायल बंधी हुई है फिर भी जिनके थिरकने से आवाज नहीं होती । खामोशी गुनगुना उठती है । हवाओं में संगीत भर जाता है । फिज़ा महक उठती है ।
रजत मंत्रमुग्ध सा उन्हें देखता रहा । हर सीढ़ी पर एक पांव का चिन्ह बना था । एक पर दाएं पांव का, दूसरे पर बाएं पांव का । संभल संभल कर, उन चिन्हों से बच बच कर रजत ऊपर चढ़ता गया । पद - चिन्हों का यह सिलसिला अंतिम सीढ़ी पर जाकर समाप्त हो गया ।
उसके बाद पूरी छत अछूती थी । कहीं कोई चिन्ह नहीं । कोई आहट नहीं । फिर भी लगता था जैसे कोई दैवी अस्तित्व अभी अभी यहीं कहीं खो गया हो ।
देर तक रजत छत पर चिन्ह ढूंढता रहा किंतु निराशा ही हाथ लगी । वह फिर सीढ़ियों के पास आया । एक बार फिर उन पद - चिन्हों को देखने का औत्सुक्य वह संवरण न कर पा रहा था ।

किंतु यह क्या ? टार्च के दायरे में अब कोई चिह्न न था । धूल की मोटी परत अछूती थी उस पर रजत के पांवों के निशान थे किंतु वे चिन्ह कहीं नहीं थे ।

रजत का मस्तिष्क घूम गया । यह सब क्या गोरखधंधा है ? क्या उसने किसी चिन्ह को नहीं देखा ? क्या उसने जो देखा सुना वह सब भ्रम था ? तो सत्य क्या है ? कहीं गेंदा सिंह के कहे अनुसार यह सब आत्माओं का खेल तो नहीं ? किंतु रजत का मन मस्तिष्क से समझौता न कर सका। उसका तर्क, उसी की बौद्धिकता उसे बार-बार कहती रही - यह सब भ्रम है । यह कुछ भी हो सकता है किंतु आत्मा कुछ नहीं है ।
रजत ने एक बार फिर छत पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि डाली । अंधेरे में लिपटा हुआ जंगल भयानक हो चुका था । हिंसक पशुओं की हुंकारे बीच-बीच में उभर कर वातावरण की भयंकरता को और भी बढ़ा रही थीं ।
रजत ने टीलों की ओर देखा जो रात की चादर में लगे धब्बे जैसे ही भयानक थे । अंधेरे में भी उसकी दृष्टि मंदिर वाले टीले पर ठहर गई । वह उसे अच्छी तरह पहचान पा रहा था और इस अंधेरे में भी उसे महसूस हो रहा था कि मंदिर के दोनों पट खुले हुए थे ।
गहरे अंधेरे के बीच भी मंदिर जैसे अपने अस्तित्व का आभास दिला रहा था और उसके वे खुले हुए प्रतीत होने वाले पट....!
न जाने कौन सा रहस्य उन किवाड़ों के पीछे बंद था ।

गेंदा सिंह से जब उसने इस संबंध में पूछा तो उसने कहा था -
"साहब ! यह देवी मैया की राजधानी है । मंदिर के पट पिछले दस वर्षों से नहीं खुले हैं । लगभग दस वर्ष पहले अचानक ही दिन रात खुले रहने वाले पट आधी रात के समय जोर की आवाज के साथ बंद हो गए और तब से आज तक बंद हैं । राजा जू ने भी बड़ी मिन्नत की लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ । तब से इधर आने से लोग डरते हैं । कुमारी जू पहले यहां रोज पूजा के लिए आया करती थीं ।"

"कौन कुमारी जू ?"

"राजा जयसिंह की बेटी रूप कुंवर जू ।"
वे ही पट इस समय खुले हुए थे । आधी रात के बाद ....। क्या वे पट सचमुच खुले हुए हैं ? रजत को आश्चर्य हुआ कि इतने घने अंधकार में भी वह कैसे समझ पा रहा है कि मंदिर खुला है ।
गेंदा सिंह ने ही बताया था - "उस दिन के बाद रूपकुंवर जू को किसी ने नहीं देखा । वह कभी घर से बाहर न निकलीं । किसी ने उनकी आवाज़ न सुनी ।"

"ओह ।" रजत गहन चिंतन में डूब गया ।

वे खुले हुए मंदिर के पट । रजत का मन उसी ओर खिंचा जा रहा था । बड़ी ही आत्मीयता से, बड़े आग्रह से मंदिर के खुले हुए पट बाहें पसारे उसे बुला रहे थे । उस ओर जाने की तीव्र इच्छा को वह रोक नहीं पा रहा था । यह अदम्य अभिलाषा क्यों ?

आकाश पर बादल छाने लगे थे । हवा की गति और तेज हो गई थी । थोड़ी ही देर में आकाश घने बादलों मैं छिप गया । बिजली चमकने लगी और आसमान की फटी चादर से ढेरों मोती तरल होकर बरस पड़े । बड़ी-बड़ी बूंदों के साथ छोटे-छोटे ओले भी गिरने लगे ।
असमय की वर्षा और यह उपल पात । रजत नीचे उतर आया । कमरे का द्वार खुला था । टार्च के प्रकाश से उसने कमरे के अंधेरे को चीर दिया और बिस्तर पर बैठ गया । मन में उठने वाली इच्छा, मंदिर का आह्वान और आत्मिक आकर्षण उसे चैन नहीं लेने दे रहे थे ।

मस्तिष्क ने भी तर्क किया - यदि मंदिर के पट खुले हैं तो उनका रहस्य जानना ही चाहिए । कितनी अद्भुत खोज होगी यह । यदि ऐसा नहीं है तब भी शंका का निराकरण तो हो ही जाएगा ।

अंततः मानसिक जिज्ञासा की ही विजय हुई । टार्च और पिस्तौल लेकर वह बरसते पानी में ही कमरे से बाहर निकल पड़ा । कमरे का द्वार अच्छी तरह बंद करके उसने आँगन पार किया और फिर सावधानी से कदम बढ़ाता गलियारा पार करके खंडहर के बाहर आ गया ।

सामने लगभग डेढ़ फर्लांग की दूरी पर खड़ा टीला अभी भी उसे इशारा कर रहा था । मंदिर के कँगूरे पर स्थित कलश बिजली की चमक पाकर जल से उठता था। मंदिर का द्वार खुला हुआ ही प्रतीत हो रहा था ।
रजत तेज कदमों से आगे बढ़ गया । ओले और भी तेजी से गिरने लगे थे । उनका आकार भी अब बड़ा हो चला था ।बदन से टकराते ओले रजत को सिहरा देते ।

वर्षा के तेज होने के साथ रजत दौड़ने लगा । दौड़ते हुए रास्ता तय किया उसने और जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ने लगा । यह शीघ्रता बहुत खतरनाक थी । वर्षा के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी ।

ऊबड़ खाबड़ सीढ़ियां थोड़ी सी भी असावधानी होने पर उसे नीचे धकेल देती लेकिन रजत इन सारी विपत्तियों से बेफिक्र ऊपर चढ़ता जा रहा था ।

जब वह मंदिर के सामने पहुंचा वह हाँफ रहा था । कुछ देर तक रुक कर उसने अपनी सांसे ठीक कीं और आगे बढ़ने के लिए टार्च का रुख फर्श की ओर किया । एक बार फिर उसे चौंक जाना पड़ा ।

उसके सामने वही चरण - चिन्ह उपस्थित थे । उसने आंखें मल कर देखा । कहीं यह कोई स्वप्न तो नहीं है ? किंतु वह स्वप्न नहीं हो सकता । वही छोटे-छोटे सुडौल और मांसल पांवों के निशान...! जैसे धीरे-धीरे मस्तानी चाल से कोई सुंदरी अभी-अभी यहां से गुजरी हो ।

इतनी तेज वर्षा की धारा भी उन चरण चिन्हों को बहा नहीं पाई थी । कितने स्पष्ट, उभरे हुए थे वे पैरों के निशान ।
मंदिर की देहरी पर जाकर वे चिन्ह समाप्त हो गए । रजत ने मंदिर के द्वारों पर दृष्टि डाली । द्वार वैसे ही बंद थे जैसे वह उन्हें दिन में देख गया था । फिर ये किसके पद चिन्ह हैं ? कहां गई इन चिन्हों की स्वामिनी?

उसने टार्च का प्रकाश मंदिर के आसपास डाला और खोजपूर्ण नेत्रों से इधर-उधर देखने लगा ।मंदिर के समीप स्थित आम्र वृक्ष पर उसकी दृष्टि ठहर गई ।

वृक्ष की फलों से भरी डालों के बीच एक साया लहरा रहा था । हां साया ही था वह । रजत ने फिर अपनी आंखें मलीं और देखा -
वह साया एक नारी मूर्ति में बदल रहा था । आकार उभर रहा था । एक पन्द्रह सोलह वर्षीया युवती बालिका का चेहरा था वह । उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में ढेर सारा भोलापन और कौतुक भरा था । गुलाबी अधर काँप रहे थे सफेद साड़ी में लिपटी हुई उस बालिका ने अपने केश के खोल रखे थे । ऐसा लगता था जैसे अभी अभी नहा कर आई हो ।
उसके बालों से पानी की बूंदें टपक रही थीं। काली काली अलकों से घिरा वह सुंदर मुख स्पष्ट नहीं था परंतु रजत उसके अपरिमित सौंदर्य को अनुभव कर पा रहा था।

पत्तों की ओट लेकर वह खड़ी थी । सफेद साड़ी के नीचे झांक रहे थे दो सुंदर संगमरमरी पाँव जिनमें पायल बंधी थी पर बेआवाज। उनकी छम छम खोई हुई थी। उसके अधर खामोश थे।

प्रस्तर प्रतिमा जैसा वह अपरिमित सौंदर्य बिना बोले ही जैसे कोई दर्दीली कथा कह रहा था। उसके खामोश थरथराते अधर, उसकी मासूम नजरें बिना बोले ही बहुत कुछ बोल रही थीं । एक ऐसी कहानी जो आदि से अंत तक दर्द में डूबी थी ।
रजत उसे एकटक देख रहा था । वह उसके सुंदर रूप में डूबा हुआ था । उसकी वेदना से अभिभूत था। बाएं हाथ में पूजा का थाल लिए वह एक हाथ से वृक्ष की डाल पकड़े आगे की झुक कर खड़ी थी।
रजत पर नशा जैसा छाता जा रहा था। उसने अपनी चेतना को संभाल कर लड़खड़ाते पांवों से उसकी ओर बढ़ने का प्रयत्न किया किंतु उसके पांवों पर मानो मनो का बोझ था। चाह कर भी वह आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

तभी बादल जोर से गड़गड़ा उठे। बिजली की तेज चमक ने उसकी आंखें बंद कर दीं और जब चकाचौंध से दूर हुई वह सुंदरी बालिका वहां नही थी।

रजत की जड़ता भी टूट चुकी थी। पागलों की तरह वह वृक्ष की ओर झपटा किंतु वहां कुछ भी न था।
रजत ने वहां का चप्पा चप्पा छान मारा और अंत में निराश होकर वहीं मंदिर की देहरी पर सिर रख कर बैठ गया। वर्षा कब बंद हु,कब उसे नींद ने धर दबाया इसका उसे एहसास भी न हो सका।

नींद टूटने पर उसने स्वयं को उसी कमरे में पाया जहां वह ठहरा हुआ था। गेंदा सिंह उसके पास बैठा था। रजत को आंखें खोलते देख कर उसने चाय का प्याला बढ़ा दिया-

"साहब ! चाय पी लीजिए।"

"मैं यहां कैसे आया गया गेंदा सिंह ?"

"साहब ! आपको कमरे में न पाकर मैं डर गया था। आस पास ढूंढने पर जब आप नहीं मिले तो मैं मन्दिर की ओर चला गया। वहीं मंदिर के सामने आपको पड़े देखा और उठा कर यहां ले आया। आपके सारे कपड़े भीग गए थे। साहब ! अब रात में वहां क्यों गए थे ?"

"कुछ नहीं। ऐसे ही।"

रजत बात टाल गया। वह स्वयं रात की घटना पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। गेंदा सिंह से कहने पर वह उसे देवी मैया की कृपा कहेगा या फिर भूत-प्रेतों का उत्पात बताएगा। रजत इन बातों को मानने के लिए तैयार नहीं था। वह उस रहस्य की तह तक जाना चाहता था।

सारे दिन वह खंडहर और उसके निकट के टीलों पर घूमता रहा। उस दिन उसका किसी काम में मन लगा। तीसरे पहर ही वह अपने कमरे में लौट आया और आर्ट पेपर पर रात देखें सौंदर्य को साकार रूप देने लगा।

शाम होते-होते उसने पेंसिल स्केच तैयार कर लिया। शाम गहरी होने लगी थी इसलिए रंग भरने का कार्य दूसरे दिन पर छोड़ कर वह चक्करदार सीढ़ियों से होता हुआ छत पर जा पहुंचा। मुंडेर के पास खड़े होकर चारों ओर बिखरे प्राकृतिक सौंदर्य में वह खो सा गया।

प्राकृतिक दृश्यों में आज कुछ नया ही सौंदर्य था। कोयल की कूक में अनोखी ही मादकता थी। सनसनाती हुई हवा पिछली रात देखे सौंदर्य का गीत गा रही थी। फिज़ा में वही खामोश संगीत - लहरी गूंज रही थी। उन थरथराते अधरों की अनकही कहानी हजारों स्रोतों से होकर अपना दर्द वातावरण में उड़ेल रही थी।

रजत को इंतजार था रात गहराने का। रात के अंधेरे में वह फिर उस सौंदर्य को देखना चाहता था। उसके अनबोले अधरों की कहानी सुनना चाहता था। उन खूबसूरत पग-चिन्हों को एक बार फिर देखना चाहता था जो अपनी स्वामिनी के दर्द के भागीदार थे।

पायल की वही खामोश छम छम सुनने के लिए उसका मन व्याकुल था, किंतु....क्या वह आज भी आएगी ? वे खूबसूरत नक्शे पा क्या वह फिर देख सकेगा ? आज उसका मन नीचे जाने का न हुआ।

मुंडेर के पास बैठ कर ही वह मंदिर के बन्द दरवाजों को देखता रहा। उनकी कशिश महसूस करता रहा। उनके आह्वान को सुनता रहा और प्रतीक्षा करता रहा उस अनजाने अस्तित्व की।

रात भीगती गई। एक बज गया। वह प्रतीक्षा करते करते थक कर मुंडेर पर सिर रखे अपनी नींद से बोझिल पलकों को आराम देने लगा।

कितनी देर सोया कुछ पता न चला । एक हल्की सी आहट से उसकी आंखें खुल गयीं।
उसने देखा - उसके चारों ओर सफेद बादलों का एक टुकड़ा मडरा रहा था। उसने उठने का प्रयत्न किया लेकिन सफल न हो सका। जैसे शरीर अपने स्थान पर जड़ हो गया था। वह अपने हाथ पांव भी नहीं हिला सकता था।

थोड़ी देर में बादलों के उस टुकड़े की धज्जियां बिखर गयीं। हल्की सी धुंध चारों ओर बिखरी रही और उसमें से धीरे-धीरे एक आकार स्पष्ट होने लगा।

वह धुंधला सा आकार...वही अनुपम सौंदर्य। काली घनी अलकों से घिरा चांद जैसा मुखड़ा। काली-काली विशाल आंखें और थरथराते गुलाब की पत्तियों जैसे अधर। आज भी उसके बालों से पानी टपक रहा था। सफेद साड़ी में लिपटा हुआ उसका बदन और कपड़ों के नीचे से झांकते मरमरी पांव।

रजत मुग्ध सा उसे देखता रहा। वह कुछ पूछना चाहता था। कुछ कहना चाहता था किंतु उसके बोल साथ नहीं दे रहे थे। उस चंद्र मुख पर छायी विषाद की रेखाएं उससे कुछ अनुनय कर रही थीं। कुछ कहना चाह रही थीं। कुछ अपेक्षा रखती प्रतीत हो रही थीं।

कुछ ही क्षणों बाद वह आकृति धुंध में समा गई। रजत चौंक कर उठ बैठा। उसने देखा-रुई के फाहे जैसे बादल तेजी से मंडराते हुए मंदिर के कंगूरे पर जाकर लुप्त हो गए।
उसके बाद रजत सो न सका। पौ फटने में एक घंटे की देर थी। सूनी छत पर बैठा हुआ वह दूर-दूर तक फैले अंधकार के साम्राज्य को देखता रहा। उस अपरिचिता के विषय में सोचते सोचते सवेरा हो गया।

नित्यकर्म से निबट कर जब वह अपने कमरे में पहुंचा गेंदा सिंह आ चुका था और चाय की केतली चूल्हे पर रखे आग ठीक कर रहा था।

रजत कमरे में जाकर एक दिन पूर्व खिंचे खाके में रंग भरने की तैयारी करने लगा। अभी उसमें रंग भरना शुरू ही किया था कि गेंदा सिंह चाय ले आया। चाय का प्याला रखते समय उसकी दृष्टि चित्र पर पड़ी और वह चीख पड़ा।

"क्या हुआ ?" रजत ने घबरा कर पूछा।

"कुमारी जू ....आप कुमारी जू को जानते हैं ?" गेंदा सिंह ने चकित और भयभीत दृष्टि से चित्र की ओर देखते हुए पूछा ।

"कौन कुमारी जू ? मैं उन्हें कैसे जानूंगा ?"

"कुमारी रूप कुंवर जू । यह चित्र तो उन्हीं का है । दस बरस पहले जब वे मंदिर में पूजा करने आती थीं तब ऐसे ही सफेद धोती पहने, बाएं हाथ में पूजा का थाल लिए आती थीं। तुरंत नहा कर मंदिर में जाते समय उनके बालों से पानी टपकता रहता था। बिल्कुल वही मूरत। वही रूप है साहब ! लेकिन आपने उन्हें कब देखा ?"

"तुमने उन्हें कब से नहीं देखा गेंदा सिंह ?" रजत ने उसके प्रश्न का उत्तर न देते हुए पूछा ।

"कोई दस बरस हुए होंगे जब वह पूजा के लिए आती थी । सारा गांव देखता था कुमारी जू को। बड़ा प्यारा स्वभाव था उनका लेकिन जब से मंदिर के कपाट बंद हुए उन्हें फिर किसी ने नहीं देखा ।"

"ओह !" रजत गहरे सोच में डूब गया ।

उसकी आंखों में रूप कुमार का भोला मुख डोल गया । उसकी भोली निश्छल दृष्टि में छिपी आरजू उसका हृदय मसलने लगी । तो क्या रूपकुंवर मर चुकी है ? लेकिन यह कैसे संभव है ? वह मर चुकी है तो रातों को इस तरह भटकती क्यों है ? कहीं उसकी अतृप्त आत्मा का कोई भयानक सफ़र तो नहीं है ?
गेंदा सिंह कहता है कि रूपकुंवर को दस वर्षों से न किसी ने देखा न उसकी आवाज सुनी फिर भी वह उसे मृत नहीं मानता । इस हिसाब से तो वह अब पच्चीस छब्बीस वर्ष की युवती होगी । फिर यह सुंदरता की प्रतिमा कौन है ?

"तुम क्या पूरे एतबार से कह रहे हो गेंदा सिंह कि यह रूपकुंवर की ही तस्वीर है ?"
रजत ने पूछा ।

"हां साहब ! मैंने ऐसा रूप कहीं नहीं देखा । कुमारी जू मुझसे बहुत छोटी हैं । मैंने उनके जैसा मीठा स्वभाव, उनके जैसी सुंदरता और निश्छलता कहीं नहीं देखी । मैं कसम खाने को तैयार हूँ । यह रूप कुंवर जू ही हैं।"

"लेकिन इस लड़की को मैंने कल भी देखा है । परसों भी देखा था । वह इतनी ही बड़ी है । ऐसी ही है । तुम्हारी रूपकुंवर जू तो अब तक बहुत बड़ी हो गई होंगी । यह तो....!"

"यह कैसे हो सकता है साहब ? यह कुमारी जू ही हैं ।" गेंदा सिंह ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा ।

"क्या रूपकुवर जिंदा हैं ?"

"यह आपने क्या कहा साहब ?"

"तुम ही सोचो गेंदा सिंह ! रूपकुंवर को दस वर्षों से किसी ने नहीं देखा। उनकी आवाज भी किसी ने नहीं सुनी तो क्या यह संभव नहीं कि वे मर चुकी हों ? यदि वे जीवित होतीं तो क्या अब तक उन्हें कोई न देख पाता ? उनका विवाह भी तो नहीं हुआ ।"
रजत ने कुछ सोचते हुए पूछा ।

"आप ठीक कहते हैं साहब ! लेकिन उनके मरने की कोई खबर भी तो नहीं मिली किसी को । पता नहीं । मुझे तो साहब ! बहुत डर लगता है । आपको यह सब कैसे मालूम हुआ ? कुमारी जू को आपने कैसे देखा ?"

रजत ने कोई उत्तर नहीं दिया । वह गहरी सोच में डूब गया । उसकी आंखों के सामने बार-बार रूपकुँवर का चेहरा घूमता रहा । उन अधरों की खामोश थरथराहट में कौन सी विनय कैद थी ? क्या वह रूपकुंवर ही थी या कोई और ? कितने ही प्रश्न उसके जेहन में चक्कर काट रहे थे ।

सारे दिन वह मंदिर के गिर्द भटकता रहा । मंदिर के चप्पे-चप्पे की उसने जांच कर ली लेकिन उसका बंद द्वार न खुल सका । बाहर से उसने सब कुछ अच्छी तरह टटोल लिया लेकिन रहस्य की तहें खुलती नजर न आयीं । शाम हुई तो उसने गेंदा सिंह को छुट्टी दी ।

वह बोला -"साहब ! आज मैं भी आपके साथ रहूंगा ।"

"क्यों ?" कुछ अचरज से रजत ने पूछा ।

"मैं भी आज कुमारी जू को देखूंगा । देखूंगा कि वह कुमारी जू ही हैं या कोई और । मैं आज आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगा साहब !"

रजत ने उसे बहुत समझाया । भूत-प्रेतों की बातें भी कहीं लेकिन वह अपने निश्चय पर अडिग रहा ।

धीरे-धीरे समय बीतता रहा । रात गहरी होने लगी । रजत मोमबत्ती जला कर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा था । पास ही बैठा गेंदा सिंह किसी अनहोनी की प्रतीक्षा में सन्नद्ध था ।

रजत का मन भटक रहा था । अपने हृदय में आज वह कुछ अधिक ही उतावली, ज्यादा ही बेचैनी का अनुभव कर रहा था ।
रात के ग्यारह बज गए । उसके लिए बैठे रहना असह्य होता जा रहा था । जब न रहा गया तो बोला -
"गेंदा सिंह ! चलो । बाहर चलें । मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है ।"

"डर लग रहा है साहब ?" गेंदा सिंह ने पूछा।

"नहीं । बड़ी अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही है ।" रजत ने पहलू बदलते हुए कहा ।

थोड़ा समय और बीता । एक बज गया तो रजत उठ खड़ा हुआ । उसने एक हाथ में टार्च और दूसरे में पिस्तौल ले लिया और बाहर निकल आया । गेंदा सिंह उसके साथ था ।

खंडहर के बाहर आकर वह ठहर गया । सामने मंदिर की ओर देख कर वह चीख पड़ा -"तुम कुछ देर देख रहे हो गेंदा सिंह?"

"हां साहब ! मंदिर के पास कोई खड़ा है । अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा है ।"
गेंदा सिंह ने उत्तर दिया ।

"वह साया रूप कुंवर का ही है गेंदा सिंह ! और ध्यान से देखो । उसके बाएं हाथ में पूजा की थाली है और...और उसके काले बालों की लटें हवा में लहरा रही हैं ।"

गेंदा सिंह ने कोई उत्तर नहीं दिया।
रजत वातावरण में बिखरते उस खामोशी के संगीत को सुन रहा था। हवा में बिखरती उस दर्द भरी दास्तान का एक-एक शब्द उसके जेहन के करीब से गुजरता जा रहा था ।

साये के लहराते आंचल के पीछे पीछे उसके कदम उठ रहे थे । सीढ़ियों पर बने पद - चिन्हों को हसरत भरी नजर से देखता हुआ वह टीले पर चढ़ता गया। गेंदा सिंह खामोशी से उसका अनुकरण कर रहा था।

मंदिर की दहलीज तक जाकर वह ठिठक गया। उसके मुख से चीख निकलते निकलते रह गई । गेंदा सिंह का तो खून ही ज़र्द हो गया था। रजत ने लड़खड़ा कर मंदिर की चौखट का सहारा ले लिया।

वर्षों से बंद मंदिर के द्वार इस समय किसी अभिसारिका की बाहों के समान खुले हुए उनका आह्वान कर रहे थे। फटी फटी आंखों से दोनों मंदिर के भीतर का दृश्य देखने लगे।

सामने भवा...नी की विशाल भव्य मूर्ति खड़ी थी। उनकी बड़ी बड़ी आंखें सुर्ख थीं। मूर्ति के पास ही एक छोटा सा दिया जल रहा था। दिए की काँपती लौ के प्रकाश में थरथराते हुए साये वातावरण की भयावहता में वृद्धि कर रहे थे।

मूर्ति के सम्मुख वही किशोरी बैठी थी। पूजा का थाल उसकी बाईं तरफ रखा हुआ था । उसके मधुर कंठ से वन्दना के स्वर बिखर रहे थे। धीरे-धीरे वह फूल आदि भवा..नी को चढ़ा रही थी ।

रजत द्वार से टिका खड़ा था । उसका शरीर जड़ बन चुका था । रूप कुंवर ने पूजा पूरी की और हाथ जोड़ कर मस्तक नवाया।

तभी अचानक मूर्ति के पास स्थित स्तंभ के पीछे से एक हाथ बाहर निकला। कटार के एक ही वार से रूपकुंवर का सर कट कर भवानी के चरणों में जा गिरा। दीपक की लौ और भी तेज हो गई ।

रूपकुंवर का सिर और धड़ कुछ देर तड़प कर शांत हो गए। खून का फव्वारा देवी के चरण धोता रहा । स्तंभ के पीछे खड़े व्यक्ति की एक झलक भर देख पाया रजत। उसकी चेतना जवाब दे चुकी थी।

थोड़ी ही देर बाद उसका बेहोश शरीर मंदिर की दहलीज पर गिर पड़ा । गेंदा सिंह तो बहुत पहले ही होश खो चुका था । काफी दिन चढ़ने के बाद रजत की मूर्छा टूटी। उसने देखा-गेंदा सिंह का शरीर अब भी टीले की धूल में पड़ा था।

मंदिर के पट खुले हुए थे किंतु उसके अंदर रात देखे दृश्य का कोई भी चिन्ह शेष न था। एक बार फिर रजत का सिर चकरा गया।

"तो क्या वह सब स्वप्न था ? रूप कुंवर को किसने मारा ? उसकी लाश कहां गई ? और खून की वह धारा....उफ़ ! हे भगवान ...क्या था वह सब ?" उसने दोनों हाथों से अपना सिर दबा लिया ।

कुछ देर बाद जब वह कुछ ठीक हुआ तो उठ कर शि..वा..ल..य के पास स्थित सोते से पानी लाकर गेंदा सिंह के मुंह पर डाल कर उसका शीतोपचार करने लगा ।

थोड़े से प्रयत्न के बाद वह होश में आ गया किंतु उसकी आंखों में अब भी भय की परछाइयां काँप रही थीं। भयभीत दृष्टि से उसने मंदिर के खुले द्वार पर टिका दी। उस के रोएं खड़े हो गए ।

रजत ने सांत्वना दी - "वहां अब कुछ नहीं है गेंदा सिंह ! चलो ।"
गेंदा सिंह कुछ कह न सका । रजत ने उसे सहारा दिया और दोनों टीले से नीचे उतर आए । नहा धोकर जब वे कुछ स्वस्थ हुए तो गेंदा सिंह ने नाश्ते का प्रबंध किया । रजत उसके पास ही बैठा रहा।

अपने साथ उसने गेंदा सिंह को भी नाश्ता कराया और स्नेह भरे स्वर में पूछा -
"गेंदा सिंह ! वह रूप कुंवर ही थी न ?"

"हां साहब ! कुमारी जू ही थीं लेकिन ..."

"वह सब छोड़ो गेंदा सिंह ! लो, थोड़ी चाय और पियो ।"

"आप क्या अभी यहां ठहरेगें ?" उसने पूछा।

"नहीं, अब मेरा मन यहां न लगेगा। मेरा काम भी पूरा हो चुका है। मैं सोचता हूँ आज ही वापस चला जाऊं।" रजत ने कुछ सोचते हुए कहा ।

"साहब ! आज राजा जू से मिलने न चलेंगे?"

"क्यों ?"

"उनसे मिल कर कुमारी जू के बारे में कुछ मालूम हो सकता है। फिर आप उन्हें मंदिर के पट खुलने की सूचना भी दे दीजिएगा।"

"हां, यह तुम ठीक कह रहे हो। चलो। सामान समेट लो। आज ही मैं उनसे मिल कर उधर से ही शहर चला जाऊंगा ।"
रजत ने स्वीकार किया।

एक घंटे बाद वे अपने सफ़र पर रवाना हुए। रजत ने चलने से पूर्व शि..वा..ले में जाकर सिर नवाया और 'जय भ..वा..नी' का नारा लगा कर चल पड़ा।

रात की घटना का प्रभाव अभी भी उसके हृदय पर भारी था।

राजा जू की उपाधि धारी ठाकुर जय सिंह की हवेली पहुंच कर एक बार फिर रजत को चौंक जाना पड़ा। जय सिंह के सामने आते ही वह चीख पड़ा-
"तुम ? तुम हत्यारे हो...तुम खूनी हो।"
गेंदा सिंह ने रजत को संभाला अन्यथा आवेश में वह जयसिंह से भिड़ ही जाता ।

"साहब ! धीरज रखें साहब ! थोड़ा बुद्धि से काम लें । यह राजा जू हैं ।"

"नहीं । यह हत्यारा है। रूप कुंवर का हत्यारा।" रजत चीख पड़ा।

जिस व्यक्ति की झलक उसने मंदिर में देखी थी वह राजा जू ही थे किंतु इस समय राजा जू के चेहरे पर स्थायी पीड़ा घनीभूत हो चुकी थी।

मंदिर में देखा व्यक्ति निश्चित रूप से यही था किंतु उसमें और इसमें बहुत अंतर था। वह एक भरपूर जवान हट्टे कट्टे शरीर का स्वामी था और यह एक ढलती उम्र का व्यक्ति जिसकी शक्ति उससे विदा ले रही थी। रजत के आरोप को सुन कर वह चौका किंतु क्रोधित नहीं हुआ।
रजत के बार बार जोर देने पर वह आहत स्वर्ग में चीत्कार कर उठा। उसके स्वर में आवेश की अपेक्षा रुदन अधिक था। व्यथा से कराह कर कहा उसने -

"हां बाबू ! मैंने रूप कुँवर को मारा है। मैंने ही अपनी बेटी को मारा है। अपनी बेटी किसी के लिए दुश्मन नहीं होती। और फिर रूप कुंवर जैसी बेटी पर हाथ हाथ उठाने के पहले तो भगवान का दिल भी कांप उठता। लेकिन.....लेकिन मैंने उसे मार डाला। भवानी मैया को अपनी ही बेटी की बलि चढ़ा दी। मेरे सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा था। बाबू ! रूपा डाकू ने मेरी बेटी मांगी थी। उसने धमकी दी थी कि वह रूपकुवर को अपने साथ एक महीने के भीतर ही उठा ले जाएगा और अगर उससे धोखा हुआ तो वह गांव में आग लगा देगा। तुम ही बताओ बाबू ! कोई बाप अपनी बेटी को किसी डाकू के हाथ कैसे सौंप सकता है ? उस हत्यारे के पास उसे भेज कर मैं अपने कुल की इज्जत और उसका जीवन मिट्टी में कैसे मिलने देता ?

रूप कुंवर को उस दिन नहला धुला कर आधी रात के बाद भवानी के मंदिर में मैं पूजा कराने ले गया था। मैंने पूजा के बाद प्रणाम करते समय अपनी बेटी का सिर भवानी मैया के चरणों पर चढ़ा दिया। उसके पवित्र खून से मैया के चरण धो डाले लेकिन मेरे मंदिर से बाहर आते ही मंदिर के पट तेज आवाज के साथ बंद हो गए और फिर न खुले। भवानी मैया भी मेरी विवशता को नहीं समझ पायीं तो कोई दूसरा कैसे समझेगा ? हाय...मेरी बच्ची. ...मेरी रूप कुवर...!"

राजा जू फूट-फूट कर रो पड़े। रजत स्तब्ध सा उसे देखता रह गया।

बहुत देर बाद उसके कंपित अधरों से कुछ बोल फूट पड़े -

"राजा जू ! मंदिर के पट खुल गए हैं !!


"समाप्त"
क्या जबरदस्त कहानी है. अफ़सोस ये हुआ की कहानी छोटी निकली. स्टार्ट तो बहोत जबरदस्त किया. उसके बाद किसी मोवी की तरह सॉक पर सॉक देते रहे. जिस तरह रजत को बार बार किसी के होने का आभास होता. पहले तो रजत को सिर्फ पाऊ के निशान मिलते रहे. उसके लिए जो सीन क्रिएट किए. वो ला ज़वाब थे. और बाद मे हु उसे कुमारी जु और जुवार दोनों ही दीखते रहे. पर रजत और गेंदा सिंह को कोई नुकशान नहीं पहोंचाया. रजत ने तो अपने आँखों से बली वाला नजारा देखा. वो सीन मुजे ज्यादा पसंद आया. पर आप ने ज्यादा सस्पेंस नहीं रखा. राजा ने अपने बेटी की बली का सही कारन जल्दी ही बता दिया. सस्पेंस बहोत आसानी से खुल गया.

कमी सिर्फ एक है. 🤣🤣🤣 बैकग्राउंड म्यूजिक की. जो तुम पूरी नहीं कर सकते.
 

LONELYCHAHAK

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Writer - LONELYCHAHAK

genre- adultery
Story summary -
Kahani ek chote ladke, Arjun, ke baare mein hai. Woh apni maa, Veena, aur uske mausa ji, Ashok, ke beech mein chal rahe affair ko dekhta hai. Jab uske papa kaam ke liye Delhi shift ho jaate hain, tab mausa ji unke ghar rehne aate hain. Maa, jo pehle ek sanskari aurat lagti thi, dheere dheere mausa ji ke saath najayaz rishta bana leti hai. Arjun chupke se unhe intimate hote hue aur baatein karte hue dekhta hai. Poori kahani Arjun ke nazariye se batai gayi hai.

Positive point-
* Systematic Update : system sahi hai. Chapter jaisa. Rukne pe yaad rehta hai kahaan the. Easy padhne mein."

* Passion- "Sex scenes maa aur mausa ji ke beech mein jo passion hai, usko dikhaate hain. Unse pata chalta hai ki unke beech mein kitni strong feelings hain."

Negative Point
* describtion - update change ke baad next seen over describe kiye jaate hai jisase story ka flow break hota

*Predictablity and uniqueness- story kuch jyada hi predictible hai aur story mein koi uniqueness nahi hai

* Morality - "Arjun ke liye, yeh sab galat hai. Woh chota hai aur use yeh sab nahi dekhna chahiye tha."

* * Overly Sexual : Sex scenes bahut hain aur zyada hain. Kahani ussi baare mein lagti hai, aur kuch nahi."



Overall its an average
Rating 4/10
THANK U SIR
AAPKE VIEWS KE LIYE SHUKRIYA
 

Ajju Landwalia

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SFAM
सीता फिर अग्नि में
ये कहानी एक कोशिश है — रामायण जैसी पुरानी महागाथा को आज की दुनिया से जोड़कर देखने की। इसमें न सिर्फ सीता के बलिदान की गूंज है, बल्कि उस हर आधुनिक स्त्री की आवाज़ भी है जो आज के रावणों से अकेले लड़ रही है — अपने आत्मसम्मान के लिए, सच्चाई के लिए।

इस कहानी का ढांचा थोड़ा अलग है — यहाँ हर दृश्य, हर संवाद खुलकर नहीं लिखा गया, बल्कि इशारों और प्रतीकों में रचा गया है। ये एक ऐसी कथा है जिसमें मैंने आप सब को भी लेखन का हिस्सा बना दिया है। जो बातें नहीं कही गईं, उन्हें समझना और महसूस करना अब आपके हिस्से का काम है।

ये कहानी सीधी नहीं है, लेकिन गहरी है। यहाँ सीता सिर्फ त्रेता युग की देवी नहीं, बल्कि आज की वो औरत है जो बार-बार अग्निपरीक्षा से गुजरती है — लेकिन इस बार वो चुप नहीं है।


उम्मीद है कि इस कहानी को पढ़ते वक्त आप इसके हर शब्द के पीछे छुपे दर्द, सवाल और ताक़त को महसूस करेंगे — और अपनी कल्पना से उन ख़ामोश हिस्सों को आवाज़ देंगे, जो सिर्फ आपकी समझदारी और संवेदना से पूरा हो सकते हैं।
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त्रेतायुग

शाम ढल रही थी। सूर्य की आख़िरी किरणें अयोध्या के महलों की सुनहरी छतों पर पड़कर ऐसा प्रतीत कर रही थीं मानो स्वर्ग स्वयं उतर आया हो। प्रजा के चेहरे पर उल्लास था, नगर की गलियों में पुष्प वर्षा हो रही थी, और महलों में शंखनाद के साथ-साथ वीणा की मधुर स्वर लहरियाँ बह रही थीं।

राजकुमार राम का राज्याभिषेक होना था — अयोध्या का सबसे न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और पराक्रमी पुत्र अब राजा बनने जा रहा था।

परंतु उसी समय, महल के एक कोने में एक और दृश्य चल रहा था। वहाँ न तो वीणा थी, न ही शंख। वहाँ थी बस मंथरा की ज़हर बुझी वाणी और कैकेयी की भ्रमित आँखें।

"राज्य तुम्हारे पुत्र भरत का होना चाहिए, रानी। राम अगर राजा बन गया, तो भरत की छाया भी नहीं रहेगी।"

"लेकिन राम मुझे प्रिय है…"

"प्रियता सत्ता नहीं लाती, रानी — राजनीति लाती है।"

मंथरा ने कैकेयी के दिल के किसी कोने में बैठी माँ की असुरक्षा को उभारा, और फिर... वो क्षण आया जब कैकेयी ने दशरथ से वो दो वचन माँग लिए।

दशरथ का चेहरा सफेद पड़ गया। काँपते हाथों से उन्होंने राम को बुलाया।

राम आए, मुस्कराते हुए — जैसे कुछ भी अनहोनी नहीं हुई।
दशरथ की आँखों में आँसू थे।

“राम… तुम्हें वन जाना होगा… १४ वर्षों के लिए…”

“और भरत?”

“वो राजा बनेगा…”

राम चुप रहे। केवल अपनी तलवार उतारी। राजवस्त्र उतारे। और पिता के चरणों में सिर रख दिया।

“आपकी आज्ञा, वहीं मेरा धर्म। मैं जा रहा हूँ पिताश्री… पर आप रोइए नहीं। मैं लौटूँगा।”

सीता काँपती हुई पास आईं।

“मैं भी चलूंगी, प्रभु। केवल अयोध्या की रानी नहीं, वन की पथ-संगीनी भी बनूंगी।”


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कलियुग - भारत, नई दिल्ली

आरव सिंह, 38 वर्ष का ईमानदार IAS अधिकारी, अपने दफ़्तर में फाइलों के ढेर से घिरे बैठे थे। चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में वही दृढ़ता थी जो केवल सच के रास्ते पर चलने वालों में होती है।

उस दिन उनके पास एक फ़ाइल आई — एक बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की — जहाँ सरकारी धन का अरबों रुपये का गबन हो चुका था। दस्तखतों में बड़े नाम थे — सांसद, मंत्री, और एक रावण-सा उद्योगपति: रणवीर मलिक।

“अगर ये सामने आया, तो तूफ़ान मच जाएगा,” उनके जूनियर ने कहा।

“तूफ़ान से डरता तो मैं साइकिल से दफ़्तर नहीं आता,” आरव ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

रात 8 बजे, जब घर लौटे तो पत्नी सिया ने चाय दी। वो एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता थीं, खुद समाज की अंधेरी गलियों में उजाला फैलाने वाली।

“आज फिर लेट?”

“तूफ़ान जगाने की तैयारी कर रहा हूँ,” आरव ने हल्की हँसी में कहा।

अगली सुबह — स्थानांतरण आदेश हाथ में था।

“आपका तत्काल ट्रांसफर बस्तर ज़िले में किया जाता है। कार्यभार अगले 72 घंटे में सँभालना है।”

सिया वह लेटर पढ़ते-पढ़ते चुप हो गईं।

“ये… तुम्हें वहाँ भेज रहे हैं ताकि तुम इस केस से हट जाओ।”

आरव ने अख़बार एक ओर रखा और धीरे से बोला —

“अगर राम अयोध्या छोड़ सकता है, तो मैं दिल्ली क्यों नहीं छोड़ सकता?”

“पर आरव, वहां जंगल है, नक्सल क्षेत्र है… बड़ी खतरनाक जगह है”

“तो क्या हुआ? सच को कभी आंच आई है क्या..!!”

सिया ने उनका हाथ थाम लिया।

“तुम अकेले नहीं जाओगे। मैं चलूँगी।”

“ये वनवास नहीं है, सिया। ये यात्रा है — सच की। मैं वहाँ अपना काम करूंगा और तुम यहाँ अपना करो"

त्रेता युग में राम अपने पिता के वचन पर वन को निकले, कलियुग में आरव अपने ‘कर्तव्य’ के धर्म पर ट्रांसफर को स्वीकार कर रहा था।

राम के साथ सीता चली थीं, पथगामिनी बनकर, और आरव के साथ सिया थी — केवल पत्नी नहीं, युद्ध की सिपाही बनकर.. बस दोनों अपने अपने युद्ध.. अपनी अपनी जागर पर रहकर लड़ रहे थे..!!

अयोध्या छोड़ने की पीड़ा और दिल्ली के सरकारी फ्लैट से विदाई — दोनों में फर्क था… पर वेदना समान थी।

"एक युग में सत्ता ने धर्म को रोका, दूसरे युग में राजनीति ने ईमानदारी को। पर इस युग में भी.. राम को वन तो जाना ही पड़ा..."


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त्रेता युग - पंचवटी का एक शांत अपराह्न

जंगल की दोपहरें अक्सर उदास होती हैं, पर पंचवटी में कोई उदासी नहीं थी। वहाँ राम, लक्ष्मण और सीता का स्नेह और समर्पण, उस तपस्वी वन को भी मंदिर सा पवित्र बनाता था। सीता कुटिया के बाहर तुलसी को जल देतीं, पास में मोर नाचते, और राम दूर से यह दृश्य देखकर मुस्कराते।

“देखो भैया,” लक्ष्मण ने कहा, “कुटिया नहीं, स्वर्ग जान पड़ती है।”

राम मंद मुस्कान के साथ बोले,

“जहाँ स्नेह हो, वहाँ स्वर्ग अपने आप बसता है।”

पर नियति को यही सुख नहीं सुहाता।

एक स्वर्ण-मृग आया — मारीच का मायावी रूप। उसकी चमकती त्वचा, वन में बिजली की तरह दौड़ती… सीता की आँखें चकित थीं।

“राम, क्या आप इस मृग को पकड़ सकते हैं? मैं चाहती हूँ इसे देखभाल कर पालूं… बहुत सुंदर है…”

राम सहमत हुए।

“मैं इसे पकड़ लाता हूँ। लक्ष्मण, सीता का ध्यान रखना।”

और फिर… जैसे किसी रचना का एक पात्र कागज़ से मिट गया हो — राम वन में खो गए।

कुछ ही समय बाद राम की आवाज़ जंगल में गूंजी —

“लक्ष्मण! लक्ष्मण!!”

सीता घबरा गईं।

“जाओ लक्ष्मण! प्रभु संकट में हैं!”

लक्ष्मण ने हाथ जोड़े,

“भाभी, यह किसी मायावी की चाल है। राम के रहते किसी संकट की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

“तो क्या तुम अपने भाई की पुकार को अनसुना करोगे? क्या एक पत्नी की करुणा से ऊपर तुम्हारा तर्क है?”

लक्ष्मण टूट गए। उन्होंने भूमि पर एक रेखा खींची —

“इस रेखा को पार मत करना भाभी। यह आपकी रक्षा की अंतिम सीमा है।”

सीता मौन रहीं। और फिर…

एक भिक्षुक आया।

कमज़ोर, झुका हुआ, कांपता स्वर —

“देवी… कुछ दान दीजिए…”

सीता ने रेखा को देखा… और फिर सहानुभूति के स्वर में एक निर्णय लिया।

सीमा पार हो गई।

अगले ही क्षण — रावण का असली रूप सामने था।

दस सिर, गर्जता हुआ रथ, और एक भयावह हँसी।

सीता चिल्लाईं —

“राम!!”

लेकिन राम बहुत दूर थे… और रावण, बहुत पास।

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कलियुग

सिया, एक तेजस्वी और निर्भीक सामाजिक कार्यकर्ता, दिल्ली की उन गलियों में काम करती थी जहाँ न्याय अक्सर एक सपना होता है। उसने दर्जनों अनाथ बच्चों को बचाया था — पर अब, वो एक बड़े राक्षस की काली साजिश के सामने खड़ी थी — रणवीर मलिक, एक धनकुबेर, समाजसेवी का मुखौटा लगाए, भ्रष्टाचार का असली रावण।

एक पॉडकास्ट के माध्यम से जब सिया ने रणवीर मलिक का इंटरव्यू लिया तब उसने पूछा..

“आपका ट्रस्ट हर साल करोड़ों रुपये खाता है, और अनाथ बच्चों का कोई रिकॉर्ड नहीं — यह क्या है?” सिया ने सीधा सवाल किया।

रणवीर ने कुर्सी से पीछे झुकते हुए मुस्कराहट फेंकी,

“आप सवाल बहुत अच्छा करती हैं, मिसेज आरव सिंह। लेकिन आप भूल गईं — यह दिल्ली है। यहाँ जवाब नहीं, चुप्पी बिकती है।”

सिया ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ पिघलन नहीं थी, केवल पत्थर की सत्ता थी।

वो मुड़ी, बाहर निकली। पर रणवीर ने अपने आदमी को इशारा कर दिया।

अगले दिन…आरव को फोन आया।

“सिया मिसिंग है। आखिरी बार वो रणवीर मलिक के एन.जी.ओ. दफ्तर में देखी गई थीं। उसके बाद सीसीटीवी में बस एक काली गाड़ी दिखी… नंबर प्लेट झूठी थी।"

आरव की साँसें रुक गईं। आवाज़ भीतर ही रह गई।

उसी शाम, उसने सिया की एक पुरानी वॉइस नोट को दोबारा सुना —

“अगर कुछ हो जाए, तो जान लेना… मैं डरती नहीं। लेकिन अगर मैं हार गई… तो मेरी आवाज़ बन जाना और मेरे काम को अंजाम देना।”

पंचवटी की सीता वन में थी, अकेली, भयभीत…
दिल्ली की सिया भी अंधेरे में खो गई थी — पर डर कर नहीं, सवाल पूछ कर।

त्रेता में रावण सीता को अपने रथ पर ले गया,
कलियुग में रणवीर ने एक काली गाड़ी को ही अपनी लंका बना लिया।

एक को मृग ने बहकाया, दूसरी को ‘पब्लिक इमेज’ ने। पर दोनों के पास एक ही शस्त्र था — 'करुणा' — जिसे राक्षस ने कमज़ोरी समझ लिया।

आरव अब दिल्ली की ओर रवाना हो चुका था। आँखों में नींद नहीं, दिल में आग। उसने सिया की तस्वीर देखकर कहा —

“सिया, तुमने कहा था कि मैं तुम्हारी आवाज़ बनूं… नहीं… अब मैं तुम्हारा प्रतिशोध बनूंगा।”

"एक रावण ने सीता को अपहृत किया था… पर इस बार सीता का अपहरण नहीं हुआ — उसका अपराध है कि उसने सवाल पूछे। और यही इस युग की सबसे बड़ी क्रांति बनने जा रही है…"


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त्रेता युग – किष्किंधा का वन

वन सूख रहा था। राम की आँखों में सिया के बिना नींद नहीं थी, और लक्ष्मण की तलवार बेचैन थी। सीता की खोज अब केवल एक दांपत्य की पुकार नहीं थी — यह धर्म की अग्नि परीक्षा बन चुकी थी।

उसी समय उन्हें मिले.. हनुमान..!!!

एक वानर, लेकिन वाणी में वेदों का बल, हृदय में सेवा की अग्नि-ज्वाला।

“प्रभु, मैं वचन देता हूँ — जहाँ तक सूरज की किरण जाती है, वहाँ तक जाकर मैं जानकी माता को खोज लाऊँगा।”

हनुमान ने राम की मुद्रिका ली और कूद पड़े — समुद्र लांघने, लंका जाने, और सीता को विश्वास दिलाने कि

"राम आएंगे… और यह रावणराज खत्म होगा।"


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कलियुग

मारुत मेहता — एक आईटी एक्सपर्ट, साइबर जासूस, और आरव सिंह का सबसे करीबी दोस्त।

छोटा कद, लहराते बाल, और आँखों में शरारत — लेकिन जब किसी मिशन पर होता, तो उसकी उँगलियों की स्पीड किसी धनुष की प्रत्यंचा जैसी होती।

जब आरव ने सिया के लापता होने की बात कही, तो मारुत का चेहरा गंभीर हो गया।

“मुझे दो दिन दो, आरव। मैं सिया को नहीं, उसकी परछाईं तक को खोज लाऊँगा।”

मारुत ने अपना लैपटॉप खोला। उसने दिल्ली के हर सीसीटीवी, हर कॉल रिकॉर्ड, हर एन.जी.ओ. नेटवर्क के डेटा को खंगालना शुरू किया।

रातें गुजरती रहीं, आँखें सूज गईं, पर हार नहीं मानी।

वो रणवीर मलिक की वेबसाइट के बैकएंड में घुसा। एन.जी.ओ. के नाम पर जो ट्रैकिंग ऐप बनाए गए थे, उनमें लोकेशन स्पूफिंग का कोड मिला।

“यह देखो आरव — रणवीर की टीम बच्चियों को जीपीएस टैग देती है, और फिर उन्हें ब्लाइंड एरिया में ट्रांसफर करती है जहाँ कोई ट्रेस न कर सके…”

आरव सिहर गया।

“सिया उन्हीं के खिलाफ तो जा रही थी…”

फिर एक फोल्डर मिला — “S-1” उसमें सीसीटीवी फुटेज थे… सिया के कदमों की आखिरी निशानियाँ।

मारुत ने एक पुराना ट्रैप फोन ट्रैक किया, जो सिया के एन.जी.ओ. द्वारा प्रयोग में लाया गया था। वो लोकेशन पकड़ चुका था — गुड़गांव के बाहर, एक फार्महाउस जैसा स्थान।

अब जरूरत थी राम की मुद्रिका की।

“आरव, यह लो… एक वॉइस मैसेज रिकॉर्ड करो — जो मैं सिया को भेज सकूं।”

आरव ने कांपती आवाज़ में कहा —

“सिया, मैं आ रहा हूँ। चाहे रावण कितना भी ताकतवर हो, पर राम अभी ज़िंदा है…”

मारुत ने मैसेज उस फार्महाउस के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से जोड़ दिया। अब जब भी कोई वहां वाई-फ़ाई कनेक्ट करता, वह संदेश सुनाई देता।

त्रेता में हनुमान समुद्र लांघकर लंका पहुँचे,
कलियुग में मारुत ने डेटा के समुद्र को पार किया — बगैर तलवार, केवल सत्य की ताकत से।

वहाँ राम की अंगूठी सीता तक गई थी,
यहाँ एक आवाज़ — जो हर सिस्टम को चीरती हुई, सिया के दिल तक पहुँची।

मारुत ने कहा —

“अब अगला कदम युद्ध है, आरव। हम जानते हैं कि वो कहाँ है, अब उसे बचाना नहीं… आज़ाद करना है।”

आरव की आँखों में पहली बार जलते आँसू थे —

“मारुत… तुम मेरे लिए सिर्फ दोस्त नहीं हो, तुम मेरी हनुमान गाथा हो।”

"जब युग बदलता है, तो भगवान भी अपना रूप बदलते हैं…

अब हनुमान वानर नहीं, हैकर होता है —

पर उसका धर्म वही रहता है — सीता को संदेश देना, और रावण के दरबार में जला देना हर झूठ की लंका


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त्रेता युग

रात का अंधकार लंका पर था। स्वर्ण-महल चमकते थे, पर उसमें एक कैदी थी — सीता। अशोक वाटिका में बैठी, आँसू नहीं बहा रही थीं, बल्कि राम की स्मृति से स्वयं को मजबूत कर रही थीं।

तभी वायुपुत्र हनुमान वहाँ पहुँचे। राम की मुद्रिका उनके हाथ में थी।

“माता, मैं राम का दूत हूँ। प्रभु ने कहा है — धैर्य रखिए, युद्ध आरंभ हो चुका है।”

सीता की आँखों में पहली बार एक नमी चमकी — आँसू नहीं, आशा।

हनुमान ने लंका की गलियों में भ्रमण किया। वहाँ का हर द्वार सोने से जड़ा था, पर भीतर की आत्मा — झूठ, पाप और दंभ से सड़ी हुई थी।

और फिर… हनुमान ने लंका को जला दिया।

न केवल भवन — हर वह भ्रम जो रावण ने अपने देवत्व का फैलाया था।

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कलियुग

मारुत और आरव अब तैयार थे। उनके पास था:

सिया का लोकेशन ट्रेस

रणवीर मलिक की संस्था की डिजिटल फाइलें

एन.जी.ओ. घोटाले के सबूत

बाल संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन की क्लिप्स

और सबसे जरूरी — जनता की नींद तोड़ने का हौसला

“अब युद्ध आरंभ होगा” आरव ने कहा।

मारुत ने पहले एक अनाम ट्वीट डाला:

“क्या आपको पता है, आपके शहर में एक देवदूतों का रावण बसता है? क्या अनाथ बच्चों की सुरक्षा राम भरोसे छोड़ दी गई है?”

उसके बाद...

एक के बाद एक दस्तावेज़, सीसीटीवी फुटेज, एन.जी.ओ. के अंदर की रिकॉर्डिंग, बच्चियों के नाम — सब वायरल होने लगे।

#RavankapardaFaash हैशटेग ट्रेंड करने लगा।
#WhereIsSia का आंदोलन शुरू हुआ।

रणवीर मलिक की लंका में खलबली मच गई थी

एक कमरे में रणवीर अपने मैनेजरों पर चिल्ला रहा था।

“शट डाउन दैट पेज! ब्लॉक दैट चैनल! यह लोग जानते नहीं है मुझे..!”

पर इस बार इंटरनेट के हनुमान ने उसकी ‘सोशल इमेज’ को घास समझकर जलाया था।

ई.डी., सीबीआई, और चाइल्ड वेलफेर कमिटी — सभी जगह फाइलें भेज दी गईं।

“यह सब एक ट्रैप था… मेरे खिलाफ?” रणवीर चिल्लाया।

उसके सबसे भरोसेमंद व्यक्ति ने कहा —

“नहीं सर… पर शायद सच आपके खिलाफ था।”

गुड़गांव के बाहर स्थित फार्महाउस में पुलिस रेड हुई। आमने सामने जबरदस्त फायरिंग हुई..!! क्रॉसफायर में रणवीर के अधिकतर साथी मारे गए और पुलिस को अंत में एक लाश भी मिली.. जिसका हुलिया बिल्कुल रणवीर मलिक से मेल खाता था..

सिया को एक कमरे में बेहोश पाया गया, पर जीवित। उसके शरीर पर ज़ख्म नहीं, पर आत्मा पर खरोंचें थीं।

जब आरव ने सिया का हाथ थामा, उसने आँखें खोलीं और मुस्कराई।

“तुम… आ ही गए…”

आरव ने उसका माथा चूमा।

“अब कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता सिया…”

त्रेता में लंका सोने की थी, पर पाप की चमक से चिपकी हुई।
कलियुग की लंका चमकते सी.एस.आर. रिपोर्ट्स और अवॉर्ड्स की दीवारों से बनी थी — अंदर केवल अंधकार था।

वहाँ हनुमान ने आग से जलाया,
यहाँ मारुत ने डेटा से हर झूठ को राख किया।

रणवीर अब मर चुका था। लोगों ने उसके ट्रस्ट के बाहर पोस्टर फाड़ दिए। हर जगह सिया के संघर्ष की कहानी छाई थी।

मारुत ने चुपचाप अपने लैपटॉप को बंद किया।

“लंका जल चुकी है। अब राम और सीता को अपना भविष्य फिर से बनाना है…”

"रावण हर युग में जन्म लेता है — कभी सत्ता में, कभी सेवा में।
लेकिन जब राम और हनुमान एक साथ होते हैं —
तो हर लंका की एक ही किस्मत होती है: भस्म।"


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त्रेता युग – राम और सीता का पुनर्मिलन

लंका जल चुकी थी। युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण मारा गया।

राम-सीता का मिलन हुआ.. वनवास पूर्ण होते ही अयोध्या वापिस लौटे

सीता — थकी, शांत, लेकिन आत्मविश्वास से भरी — एक अग्नि से तपकर लौटी थी। राम के सामने आकर झुकीं नहीं — खड़ी रहीं, आँखों में न कोई गिला, न कोई आस।

राम बोले —

“सीते, तुम्हें पाने के लिए मुझे न जाने क्या क्या करना पड़ा.. पर अब मैं तुम्हें पुनः प्राप्त कर अति प्रसन्न हूँ।”

सीता ने ठहरकर देखा,

“प्रभु, आपने मेरे सम्मान की रक्षा की, पर मेरा विश्वास कहाँ था उस क्षण… जब आपने मुझे अग्नि परीक्षा देनी चाही?”

राम मौन हो गए।

और फिर… सीता स्वयं अग्नि में प्रविष्ट हुईं — और अग्नि से अक्षत निकलीं।

पर उनके और राम के बीच जो कुछ टूटा था — वह अनकहा रह गया।

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कलियुग

सिया अस्पताल के उस सफ़ेद बिस्तर पर लेटी थी… बदन पर खरोंच नहीं के बराबर थी, पर आत्मा मानो किसी ने खरोंच-खरोंच कर नोच ली हो। आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें गहराई थी — एक ऐसी गहराई जो पूछती नहीं, बस थक कर देखती है।

आरव पास बैठा था, उसके हाथों को अपने हाथों में लिए हुए। उसके चेहरे पर ग्लानि थी… पर उससे ज़्यादा एक असहज बेचैनी — जैसे किसी अनकही आशंका ने उसे भीतर से जकड़ रखा हो।

"सिया..." उसकी आवाज़ में कंपकंपी थी,
"तुमने जो सहा, मैं समझ सकता हूँ। मुझे बस ये डर सता रहा है कि उस राक्षस ने... बेहोशी में… तुम्हारे साथ... पता नहीं क्या क्या कर दिया होगा…!!”

यह सुनकर सिया की साँस थम सी गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। जिस आदमी की बाँहों में उसने अपने सपनों को सुरक्षित महसूस किया था, वही आज उसकी 'पवित्रता' के प्रमाण पर खड़ा था।

कुछ पल की चुप्पी…

फिर उसके होंठों पर एक मुस्कान आई — ऐसी मुस्कान जो कड़वाहट से नहीं, बल्कि घुटी हुई चीखों से जन्मी थी।

“तुम आए, यही बहुत है, आरव।”

वह धीरे से बोली, “पर क्या तुम जानते हो कि मेरी लड़ाई सिर्फ रणवीर से नहीं थी? मेरी असली लड़ाई उस सोच से थी — जो एक औरत की आत्मरक्षा को भी उसकी लज्जा से जोड़ देती है।”

आरव की आंखें झुक गईं। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

सिया ने उसकी हथेली पर अपनी उंगलियाँ फेरते हुए कहा —
“मैं एक बार फिर से उठी हूँ, पर इस बार ज़मीन से नहीं, खुद की नज़रों से। और यह बहुत कठिन था, आरव… बहुत। पर तुम जानते हो क्या ज़्यादा कठिन था?”

उसने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा,
“तुम्हारा ये कहना — ‘डॉक्टर से एक बार जाँच करवा लेते हैं…’ तुम मेरा हाल समझ नहीं पाए, बस मेरा शरीर देखना चाहते हो…?”

आरव चौंका। “नहीं सिया, तुम गलत समझ रही हो…”
उसने हड़बड़ाते हुए कहा, “मुझे बस तसल्ली चाहिए थी कि कहीं… कुछ अनहोनी न हुई हो। डॉक्टर बस… एहतियात के लिए…”

सिया का चेहरा शांत था, पर आंखें बोल रही थीं —

“एहतियात तुम्हारे लिए है, मेरी नहीं। तुम्हें मेरी मानसिक हालत पर नहीं, मेरे शरीर पर संदेह है। और यही कलियुग है, आरव..!!”

आराव ने सिया का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा "तुम मुझे गलत समझ रही हो सिया.. ठीक है.. कोई बात नहीं.. तुम जांच न करवाना चाहो तो.. चलो फिर घर चलते है"

उसने धीरे से अपना हाथ खींच लिया।

“घर?” उसने दोहराया।

“कौन सा घर? वो जिसमें औरत का देह उसकी आत्मा से ज्यादा महत्व रखता है? जहाँ उसका संघर्ष, उसकी बहादुरी — सब एक जाँच रिपोर्ट में बदलकर रह जाते हैं?”

वो उठी। कमज़ोर शरीर, लेकिन आँखों में तूफ़ान।

“मैं तुम्हारे साथ रहूँगी, लेकिन तुम्हारे ‘नाम’ के साथ नहीं। मैं अब 'सिया आरव सिंह' नहीं — सिर्फ 'सिया' हूँ। मैं तुम्हारे साथ तो रहूँगी, पर अपनी शर्तों पर। इस बार मैं सिया बनकर लौटूंगी नहीं, बल्कि वो स्त्री बनकर जिऊँगी जो अग्नि से निकल कर लौ बन चुकी है।”

कमरे में गहरी ख़ामोशी थी।

आरव ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसके शब्द अब भी हकलाहट में उलझे हुए थे।

दोनों एक ही कमरे में थे — लेकिन उनके बीच एक पारदर्शी दीवार खड़ी हो चुकी थी।

एक ऐसी दीवार जो न प्यार गिरा सकता है, न पश्चाताप — सिर्फ समझ और समानता ही उसे मिटा सकते हैं।


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कुछ महीने बाद…

सिया ने अपनी किताब लॉन्च की:

📘 "लंका के बाद"
✍ लेखिका: सिया आरव नहीं — सिर्फ सिया..!!

पुस्तक विमोचन के बाद एक पत्रकार ने पूछा:

“आपका अगला कदम क्या होगा?”

सिया मुस्कराई —

“मैं राजनीति में प्रवेश करने जा रही हूँ।” भीड़ तालियों से गूंज उठी।

लेकिन जब वो मंच से उतरी, एक अनजान युवती ने आकर उसे एक लिफाफा थमाया।

सिया ने लिफाफा खोला — अंदर एक पेपर-क्लिप थी, उस रात की तस्वीरों की कॉपी… उन तस्वीरों ने सिया को झकझोर कर रख दिया..!!!

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

शायद रावण हारा… पर क्या उसकी परछाई अब भी पीछा कर रही है???

।। समाप्त ।।

Shandar

Superb

Zindabad..........

Siya ne to har yug me pariksha di he..................chahe satyug ho ya fir kalyug..............

Lekin na Ram badle na Ravan............
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

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Raj_sharma

क्या जबरदस्त कहानी है. अफ़सोस ये हुआ की कहानी छोटी निकली. स्टार्ट तो बहोत जबरदस्त किया. उसके बाद किसी मोवी की तरह सॉक पर सॉक देते रहे. जिस तरह रजत को बार बार किसी के होने का आभास होता. पहले तो रजत को सिर्फ पाऊ के निशान मिलते रहे. उसके लिए जो सीन क्रिएट किए. वो ला ज़वाब थे. और बाद मे हु उसे कुमारी जु और जुवार दोनों ही दीखते रहे. पर रजत और गेंदा सिंह को कोई नुकशान नहीं पहोंचाया. रजत ने तो अपने आँखों से बली वाला नजारा देखा. वो सीन मुजे ज्यादा पसंद आया. पर आप ने ज्यादा सस्पेंस नहीं रखा. राजा ने अपने बेटी की बली का सही कारन जल्दी ही बता दिया. सस्पेंस बहोत आसानी से खुल गया.

कमी सिर्फ एक है. 🤣🤣🤣 बैकग्राउंड म्यूजिक की. जो तुम पूरी नहीं कर सकते.
Thank you very much for your amazing review Shetan :hug: Bas tumhe achi lagi to kaam poora,🙏🏼 rahi baat chhoti ki, to bilkul ise or bhi badhqya ja sakta tha,specially end ka part,per apun ne socha, sort story hai to dhort me hi likh daalo:shhhh: Background music bhi ek din jaroor daalega apun:smarty:
 
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avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
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SFAM
सीता फिर अग्नि में
ये कहानी एक कोशिश है — रामायण जैसी पुरानी महागाथा को आज की दुनिया से जोड़कर देखने की। इसमें न सिर्फ सीता के बलिदान की गूंज है, बल्कि उस हर आधुनिक स्त्री की आवाज़ भी है जो आज के रावणों से अकेले लड़ रही है — अपने आत्मसम्मान के लिए, सच्चाई के लिए।

इस कहानी का ढांचा थोड़ा अलग है — यहाँ हर दृश्य, हर संवाद खुलकर नहीं लिखा गया, बल्कि इशारों और प्रतीकों में रचा गया है। ये एक ऐसी कथा है जिसमें मैंने आप सब को भी लेखन का हिस्सा बना दिया है। जो बातें नहीं कही गईं, उन्हें समझना और महसूस करना अब आपके हिस्से का काम है।

ये कहानी सीधी नहीं है, लेकिन गहरी है। यहाँ सीता सिर्फ त्रेता युग की देवी नहीं, बल्कि आज की वो औरत है जो बार-बार अग्निपरीक्षा से गुजरती है — लेकिन इस बार वो चुप नहीं है।


उम्मीद है कि इस कहानी को पढ़ते वक्त आप इसके हर शब्द के पीछे छुपे दर्द, सवाल और ताक़त को महसूस करेंगे — और अपनी कल्पना से उन ख़ामोश हिस्सों को आवाज़ देंगे, जो सिर्फ आपकी समझदारी और संवेदना से पूरा हो सकते हैं।
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त्रेतायुग

शाम ढल रही थी। सूर्य की आख़िरी किरणें अयोध्या के महलों की सुनहरी छतों पर पड़कर ऐसा प्रतीत कर रही थीं मानो स्वर्ग स्वयं उतर आया हो। प्रजा के चेहरे पर उल्लास था, नगर की गलियों में पुष्प वर्षा हो रही थी, और महलों में शंखनाद के साथ-साथ वीणा की मधुर स्वर लहरियाँ बह रही थीं।

राजकुमार राम का राज्याभिषेक होना था — अयोध्या का सबसे न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और पराक्रमी पुत्र अब राजा बनने जा रहा था।

परंतु उसी समय, महल के एक कोने में एक और दृश्य चल रहा था। वहाँ न तो वीणा थी, न ही शंख। वहाँ थी बस मंथरा की ज़हर बुझी वाणी और कैकेयी की भ्रमित आँखें।

"राज्य तुम्हारे पुत्र भरत का होना चाहिए, रानी। राम अगर राजा बन गया, तो भरत की छाया भी नहीं रहेगी।"

"लेकिन राम मुझे प्रिय है…"

"प्रियता सत्ता नहीं लाती, रानी — राजनीति लाती है।"

मंथरा ने कैकेयी के दिल के किसी कोने में बैठी माँ की असुरक्षा को उभारा, और फिर... वो क्षण आया जब कैकेयी ने दशरथ से वो दो वचन माँग लिए।

दशरथ का चेहरा सफेद पड़ गया। काँपते हाथों से उन्होंने राम को बुलाया।

राम आए, मुस्कराते हुए — जैसे कुछ भी अनहोनी नहीं हुई।
दशरथ की आँखों में आँसू थे।

“राम… तुम्हें वन जाना होगा… १४ वर्षों के लिए…”

“और भरत?”

“वो राजा बनेगा…”

राम चुप रहे। केवल अपनी तलवार उतारी। राजवस्त्र उतारे। और पिता के चरणों में सिर रख दिया।

“आपकी आज्ञा, वहीं मेरा धर्म। मैं जा रहा हूँ पिताश्री… पर आप रोइए नहीं। मैं लौटूँगा।”

सीता काँपती हुई पास आईं।

“मैं भी चलूंगी, प्रभु। केवल अयोध्या की रानी नहीं, वन की पथ-संगीनी भी बनूंगी।”


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कलियुग - भारत, नई दिल्ली

आरव सिंह, 38 वर्ष का ईमानदार IAS अधिकारी, अपने दफ़्तर में फाइलों के ढेर से घिरे बैठे थे। चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में वही दृढ़ता थी जो केवल सच के रास्ते पर चलने वालों में होती है।

उस दिन उनके पास एक फ़ाइल आई — एक बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की — जहाँ सरकारी धन का अरबों रुपये का गबन हो चुका था। दस्तखतों में बड़े नाम थे — सांसद, मंत्री, और एक रावण-सा उद्योगपति: रणवीर मलिक।

“अगर ये सामने आया, तो तूफ़ान मच जाएगा,” उनके जूनियर ने कहा।

“तूफ़ान से डरता तो मैं साइकिल से दफ़्तर नहीं आता,” आरव ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

रात 8 बजे, जब घर लौटे तो पत्नी सिया ने चाय दी। वो एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता थीं, खुद समाज की अंधेरी गलियों में उजाला फैलाने वाली।

“आज फिर लेट?”

“तूफ़ान जगाने की तैयारी कर रहा हूँ,” आरव ने हल्की हँसी में कहा।

अगली सुबह — स्थानांतरण आदेश हाथ में था।

“आपका तत्काल ट्रांसफर बस्तर ज़िले में किया जाता है। कार्यभार अगले 72 घंटे में सँभालना है।”

सिया वह लेटर पढ़ते-पढ़ते चुप हो गईं।

“ये… तुम्हें वहाँ भेज रहे हैं ताकि तुम इस केस से हट जाओ।”

आरव ने अख़बार एक ओर रखा और धीरे से बोला —

“अगर राम अयोध्या छोड़ सकता है, तो मैं दिल्ली क्यों नहीं छोड़ सकता?”

“पर आरव, वहां जंगल है, नक्सल क्षेत्र है… बड़ी खतरनाक जगह है”

“तो क्या हुआ? सच को कभी आंच आई है क्या..!!”

सिया ने उनका हाथ थाम लिया।

“तुम अकेले नहीं जाओगे। मैं चलूँगी।”

“ये वनवास नहीं है, सिया। ये यात्रा है — सच की। मैं वहाँ अपना काम करूंगा और तुम यहाँ अपना करो"

त्रेता युग में राम अपने पिता के वचन पर वन को निकले, कलियुग में आरव अपने ‘कर्तव्य’ के धर्म पर ट्रांसफर को स्वीकार कर रहा था।

राम के साथ सीता चली थीं, पथगामिनी बनकर, और आरव के साथ सिया थी — केवल पत्नी नहीं, युद्ध की सिपाही बनकर.. बस दोनों अपने अपने युद्ध.. अपनी अपनी जागर पर रहकर लड़ रहे थे..!!

अयोध्या छोड़ने की पीड़ा और दिल्ली के सरकारी फ्लैट से विदाई — दोनों में फर्क था… पर वेदना समान थी।

"एक युग में सत्ता ने धर्म को रोका, दूसरे युग में राजनीति ने ईमानदारी को। पर इस युग में भी.. राम को वन तो जाना ही पड़ा..."


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त्रेता युग - पंचवटी का एक शांत अपराह्न

जंगल की दोपहरें अक्सर उदास होती हैं, पर पंचवटी में कोई उदासी नहीं थी। वहाँ राम, लक्ष्मण और सीता का स्नेह और समर्पण, उस तपस्वी वन को भी मंदिर सा पवित्र बनाता था। सीता कुटिया के बाहर तुलसी को जल देतीं, पास में मोर नाचते, और राम दूर से यह दृश्य देखकर मुस्कराते।

“देखो भैया,” लक्ष्मण ने कहा, “कुटिया नहीं, स्वर्ग जान पड़ती है।”

राम मंद मुस्कान के साथ बोले,

“जहाँ स्नेह हो, वहाँ स्वर्ग अपने आप बसता है।”

पर नियति को यही सुख नहीं सुहाता।

एक स्वर्ण-मृग आया — मारीच का मायावी रूप। उसकी चमकती त्वचा, वन में बिजली की तरह दौड़ती… सीता की आँखें चकित थीं।

“राम, क्या आप इस मृग को पकड़ सकते हैं? मैं चाहती हूँ इसे देखभाल कर पालूं… बहुत सुंदर है…”

राम सहमत हुए।

“मैं इसे पकड़ लाता हूँ। लक्ष्मण, सीता का ध्यान रखना।”

और फिर… जैसे किसी रचना का एक पात्र कागज़ से मिट गया हो — राम वन में खो गए।

कुछ ही समय बाद राम की आवाज़ जंगल में गूंजी —

“लक्ष्मण! लक्ष्मण!!”

सीता घबरा गईं।

“जाओ लक्ष्मण! प्रभु संकट में हैं!”

लक्ष्मण ने हाथ जोड़े,

“भाभी, यह किसी मायावी की चाल है। राम के रहते किसी संकट की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

“तो क्या तुम अपने भाई की पुकार को अनसुना करोगे? क्या एक पत्नी की करुणा से ऊपर तुम्हारा तर्क है?”

लक्ष्मण टूट गए। उन्होंने भूमि पर एक रेखा खींची —

“इस रेखा को पार मत करना भाभी। यह आपकी रक्षा की अंतिम सीमा है।”

सीता मौन रहीं। और फिर…

एक भिक्षुक आया।

कमज़ोर, झुका हुआ, कांपता स्वर —

“देवी… कुछ दान दीजिए…”

सीता ने रेखा को देखा… और फिर सहानुभूति के स्वर में एक निर्णय लिया।

सीमा पार हो गई।

अगले ही क्षण — रावण का असली रूप सामने था।

दस सिर, गर्जता हुआ रथ, और एक भयावह हँसी।

सीता चिल्लाईं —

“राम!!”

लेकिन राम बहुत दूर थे… और रावण, बहुत पास।

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कलियुग

सिया, एक तेजस्वी और निर्भीक सामाजिक कार्यकर्ता, दिल्ली की उन गलियों में काम करती थी जहाँ न्याय अक्सर एक सपना होता है। उसने दर्जनों अनाथ बच्चों को बचाया था — पर अब, वो एक बड़े राक्षस की काली साजिश के सामने खड़ी थी — रणवीर मलिक, एक धनकुबेर, समाजसेवी का मुखौटा लगाए, भ्रष्टाचार का असली रावण।

एक पॉडकास्ट के माध्यम से जब सिया ने रणवीर मलिक का इंटरव्यू लिया तब उसने पूछा..

“आपका ट्रस्ट हर साल करोड़ों रुपये खाता है, और अनाथ बच्चों का कोई रिकॉर्ड नहीं — यह क्या है?” सिया ने सीधा सवाल किया।

रणवीर ने कुर्सी से पीछे झुकते हुए मुस्कराहट फेंकी,

“आप सवाल बहुत अच्छा करती हैं, मिसेज आरव सिंह। लेकिन आप भूल गईं — यह दिल्ली है। यहाँ जवाब नहीं, चुप्पी बिकती है।”

सिया ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ पिघलन नहीं थी, केवल पत्थर की सत्ता थी।

वो मुड़ी, बाहर निकली। पर रणवीर ने अपने आदमी को इशारा कर दिया।

अगले दिन…आरव को फोन आया।

“सिया मिसिंग है। आखिरी बार वो रणवीर मलिक के एन.जी.ओ. दफ्तर में देखी गई थीं। उसके बाद सीसीटीवी में बस एक काली गाड़ी दिखी… नंबर प्लेट झूठी थी।"

आरव की साँसें रुक गईं। आवाज़ भीतर ही रह गई।

उसी शाम, उसने सिया की एक पुरानी वॉइस नोट को दोबारा सुना —

“अगर कुछ हो जाए, तो जान लेना… मैं डरती नहीं। लेकिन अगर मैं हार गई… तो मेरी आवाज़ बन जाना और मेरे काम को अंजाम देना।”

पंचवटी की सीता वन में थी, अकेली, भयभीत…
दिल्ली की सिया भी अंधेरे में खो गई थी — पर डर कर नहीं, सवाल पूछ कर।

त्रेता में रावण सीता को अपने रथ पर ले गया,
कलियुग में रणवीर ने एक काली गाड़ी को ही अपनी लंका बना लिया।

एक को मृग ने बहकाया, दूसरी को ‘पब्लिक इमेज’ ने। पर दोनों के पास एक ही शस्त्र था — 'करुणा' — जिसे राक्षस ने कमज़ोरी समझ लिया।

आरव अब दिल्ली की ओर रवाना हो चुका था। आँखों में नींद नहीं, दिल में आग। उसने सिया की तस्वीर देखकर कहा —

“सिया, तुमने कहा था कि मैं तुम्हारी आवाज़ बनूं… नहीं… अब मैं तुम्हारा प्रतिशोध बनूंगा।”

"एक रावण ने सीता को अपहृत किया था… पर इस बार सीता का अपहरण नहीं हुआ — उसका अपराध है कि उसने सवाल पूछे। और यही इस युग की सबसे बड़ी क्रांति बनने जा रही है…"


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त्रेता युग – किष्किंधा का वन

वन सूख रहा था। राम की आँखों में सिया के बिना नींद नहीं थी, और लक्ष्मण की तलवार बेचैन थी। सीता की खोज अब केवल एक दांपत्य की पुकार नहीं थी — यह धर्म की अग्नि परीक्षा बन चुकी थी।

उसी समय उन्हें मिले.. हनुमान..!!!

एक वानर, लेकिन वाणी में वेदों का बल, हृदय में सेवा की अग्नि-ज्वाला।

“प्रभु, मैं वचन देता हूँ — जहाँ तक सूरज की किरण जाती है, वहाँ तक जाकर मैं जानकी माता को खोज लाऊँगा।”

हनुमान ने राम की मुद्रिका ली और कूद पड़े — समुद्र लांघने, लंका जाने, और सीता को विश्वास दिलाने कि

"राम आएंगे… और यह रावणराज खत्म होगा।"


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कलियुग

मारुत मेहता — एक आईटी एक्सपर्ट, साइबर जासूस, और आरव सिंह का सबसे करीबी दोस्त।

छोटा कद, लहराते बाल, और आँखों में शरारत — लेकिन जब किसी मिशन पर होता, तो उसकी उँगलियों की स्पीड किसी धनुष की प्रत्यंचा जैसी होती।

जब आरव ने सिया के लापता होने की बात कही, तो मारुत का चेहरा गंभीर हो गया।

“मुझे दो दिन दो, आरव। मैं सिया को नहीं, उसकी परछाईं तक को खोज लाऊँगा।”

मारुत ने अपना लैपटॉप खोला। उसने दिल्ली के हर सीसीटीवी, हर कॉल रिकॉर्ड, हर एन.जी.ओ. नेटवर्क के डेटा को खंगालना शुरू किया।

रातें गुजरती रहीं, आँखें सूज गईं, पर हार नहीं मानी।

वो रणवीर मलिक की वेबसाइट के बैकएंड में घुसा। एन.जी.ओ. के नाम पर जो ट्रैकिंग ऐप बनाए गए थे, उनमें लोकेशन स्पूफिंग का कोड मिला।

“यह देखो आरव — रणवीर की टीम बच्चियों को जीपीएस टैग देती है, और फिर उन्हें ब्लाइंड एरिया में ट्रांसफर करती है जहाँ कोई ट्रेस न कर सके…”

आरव सिहर गया।

“सिया उन्हीं के खिलाफ तो जा रही थी…”

फिर एक फोल्डर मिला — “S-1” उसमें सीसीटीवी फुटेज थे… सिया के कदमों की आखिरी निशानियाँ।

मारुत ने एक पुराना ट्रैप फोन ट्रैक किया, जो सिया के एन.जी.ओ. द्वारा प्रयोग में लाया गया था। वो लोकेशन पकड़ चुका था — गुड़गांव के बाहर, एक फार्महाउस जैसा स्थान।

अब जरूरत थी राम की मुद्रिका की।

“आरव, यह लो… एक वॉइस मैसेज रिकॉर्ड करो — जो मैं सिया को भेज सकूं।”

आरव ने कांपती आवाज़ में कहा —

“सिया, मैं आ रहा हूँ। चाहे रावण कितना भी ताकतवर हो, पर राम अभी ज़िंदा है…”

मारुत ने मैसेज उस फार्महाउस के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से जोड़ दिया। अब जब भी कोई वहां वाई-फ़ाई कनेक्ट करता, वह संदेश सुनाई देता।

त्रेता में हनुमान समुद्र लांघकर लंका पहुँचे,
कलियुग में मारुत ने डेटा के समुद्र को पार किया — बगैर तलवार, केवल सत्य की ताकत से।

वहाँ राम की अंगूठी सीता तक गई थी,
यहाँ एक आवाज़ — जो हर सिस्टम को चीरती हुई, सिया के दिल तक पहुँची।

मारुत ने कहा —

“अब अगला कदम युद्ध है, आरव। हम जानते हैं कि वो कहाँ है, अब उसे बचाना नहीं… आज़ाद करना है।”

आरव की आँखों में पहली बार जलते आँसू थे —

“मारुत… तुम मेरे लिए सिर्फ दोस्त नहीं हो, तुम मेरी हनुमान गाथा हो।”

"जब युग बदलता है, तो भगवान भी अपना रूप बदलते हैं…

अब हनुमान वानर नहीं, हैकर होता है —

पर उसका धर्म वही रहता है — सीता को संदेश देना, और रावण के दरबार में जला देना हर झूठ की लंका


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त्रेता युग

रात का अंधकार लंका पर था। स्वर्ण-महल चमकते थे, पर उसमें एक कैदी थी — सीता। अशोक वाटिका में बैठी, आँसू नहीं बहा रही थीं, बल्कि राम की स्मृति से स्वयं को मजबूत कर रही थीं।

तभी वायुपुत्र हनुमान वहाँ पहुँचे। राम की मुद्रिका उनके हाथ में थी।

“माता, मैं राम का दूत हूँ। प्रभु ने कहा है — धैर्य रखिए, युद्ध आरंभ हो चुका है।”

सीता की आँखों में पहली बार एक नमी चमकी — आँसू नहीं, आशा।

हनुमान ने लंका की गलियों में भ्रमण किया। वहाँ का हर द्वार सोने से जड़ा था, पर भीतर की आत्मा — झूठ, पाप और दंभ से सड़ी हुई थी।

और फिर… हनुमान ने लंका को जला दिया।

न केवल भवन — हर वह भ्रम जो रावण ने अपने देवत्व का फैलाया था।

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कलियुग

मारुत और आरव अब तैयार थे। उनके पास था:

सिया का लोकेशन ट्रेस

रणवीर मलिक की संस्था की डिजिटल फाइलें

एन.जी.ओ. घोटाले के सबूत

बाल संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन की क्लिप्स

और सबसे जरूरी — जनता की नींद तोड़ने का हौसला

“अब युद्ध आरंभ होगा” आरव ने कहा।

मारुत ने पहले एक अनाम ट्वीट डाला:

“क्या आपको पता है, आपके शहर में एक देवदूतों का रावण बसता है? क्या अनाथ बच्चों की सुरक्षा राम भरोसे छोड़ दी गई है?”

उसके बाद...

एक के बाद एक दस्तावेज़, सीसीटीवी फुटेज, एन.जी.ओ. के अंदर की रिकॉर्डिंग, बच्चियों के नाम — सब वायरल होने लगे।

#RavankapardaFaash हैशटेग ट्रेंड करने लगा।
#WhereIsSia का आंदोलन शुरू हुआ।

रणवीर मलिक की लंका में खलबली मच गई थी

एक कमरे में रणवीर अपने मैनेजरों पर चिल्ला रहा था।

“शट डाउन दैट पेज! ब्लॉक दैट चैनल! यह लोग जानते नहीं है मुझे..!”

पर इस बार इंटरनेट के हनुमान ने उसकी ‘सोशल इमेज’ को घास समझकर जलाया था।

ई.डी., सीबीआई, और चाइल्ड वेलफेर कमिटी — सभी जगह फाइलें भेज दी गईं।

“यह सब एक ट्रैप था… मेरे खिलाफ?” रणवीर चिल्लाया।

उसके सबसे भरोसेमंद व्यक्ति ने कहा —

“नहीं सर… पर शायद सच आपके खिलाफ था।”

गुड़गांव के बाहर स्थित फार्महाउस में पुलिस रेड हुई। आमने सामने जबरदस्त फायरिंग हुई..!! क्रॉसफायर में रणवीर के अधिकतर साथी मारे गए और पुलिस को अंत में एक लाश भी मिली.. जिसका हुलिया बिल्कुल रणवीर मलिक से मेल खाता था..

सिया को एक कमरे में बेहोश पाया गया, पर जीवित। उसके शरीर पर ज़ख्म नहीं, पर आत्मा पर खरोंचें थीं।

जब आरव ने सिया का हाथ थामा, उसने आँखें खोलीं और मुस्कराई।

“तुम… आ ही गए…”

आरव ने उसका माथा चूमा।

“अब कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता सिया…”

त्रेता में लंका सोने की थी, पर पाप की चमक से चिपकी हुई।
कलियुग की लंका चमकते सी.एस.आर. रिपोर्ट्स और अवॉर्ड्स की दीवारों से बनी थी — अंदर केवल अंधकार था।

वहाँ हनुमान ने आग से जलाया,
यहाँ मारुत ने डेटा से हर झूठ को राख किया।

रणवीर अब मर चुका था। लोगों ने उसके ट्रस्ट के बाहर पोस्टर फाड़ दिए। हर जगह सिया के संघर्ष की कहानी छाई थी।

मारुत ने चुपचाप अपने लैपटॉप को बंद किया।

“लंका जल चुकी है। अब राम और सीता को अपना भविष्य फिर से बनाना है…”

"रावण हर युग में जन्म लेता है — कभी सत्ता में, कभी सेवा में।
लेकिन जब राम और हनुमान एक साथ होते हैं —
तो हर लंका की एक ही किस्मत होती है: भस्म।"


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त्रेता युग – राम और सीता का पुनर्मिलन

लंका जल चुकी थी। युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण मारा गया।

राम-सीता का मिलन हुआ.. वनवास पूर्ण होते ही अयोध्या वापिस लौटे

सीता — थकी, शांत, लेकिन आत्मविश्वास से भरी — एक अग्नि से तपकर लौटी थी। राम के सामने आकर झुकीं नहीं — खड़ी रहीं, आँखों में न कोई गिला, न कोई आस।

राम बोले —

“सीते, तुम्हें पाने के लिए मुझे न जाने क्या क्या करना पड़ा.. पर अब मैं तुम्हें पुनः प्राप्त कर अति प्रसन्न हूँ।”

सीता ने ठहरकर देखा,

“प्रभु, आपने मेरे सम्मान की रक्षा की, पर मेरा विश्वास कहाँ था उस क्षण… जब आपने मुझे अग्नि परीक्षा देनी चाही?”

राम मौन हो गए।

और फिर… सीता स्वयं अग्नि में प्रविष्ट हुईं — और अग्नि से अक्षत निकलीं।

पर उनके और राम के बीच जो कुछ टूटा था — वह अनकहा रह गया।

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कलियुग

सिया अस्पताल के उस सफ़ेद बिस्तर पर लेटी थी… बदन पर खरोंच नहीं के बराबर थी, पर आत्मा मानो किसी ने खरोंच-खरोंच कर नोच ली हो। आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें गहराई थी — एक ऐसी गहराई जो पूछती नहीं, बस थक कर देखती है।

आरव पास बैठा था, उसके हाथों को अपने हाथों में लिए हुए। उसके चेहरे पर ग्लानि थी… पर उससे ज़्यादा एक असहज बेचैनी — जैसे किसी अनकही आशंका ने उसे भीतर से जकड़ रखा हो।

"सिया..." उसकी आवाज़ में कंपकंपी थी,
"तुमने जो सहा, मैं समझ सकता हूँ। मुझे बस ये डर सता रहा है कि उस राक्षस ने... बेहोशी में… तुम्हारे साथ... पता नहीं क्या क्या कर दिया होगा…!!”

यह सुनकर सिया की साँस थम सी गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। जिस आदमी की बाँहों में उसने अपने सपनों को सुरक्षित महसूस किया था, वही आज उसकी 'पवित्रता' के प्रमाण पर खड़ा था।

कुछ पल की चुप्पी…

फिर उसके होंठों पर एक मुस्कान आई — ऐसी मुस्कान जो कड़वाहट से नहीं, बल्कि घुटी हुई चीखों से जन्मी थी।

“तुम आए, यही बहुत है, आरव।”

वह धीरे से बोली, “पर क्या तुम जानते हो कि मेरी लड़ाई सिर्फ रणवीर से नहीं थी? मेरी असली लड़ाई उस सोच से थी — जो एक औरत की आत्मरक्षा को भी उसकी लज्जा से जोड़ देती है।”

आरव की आंखें झुक गईं। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

सिया ने उसकी हथेली पर अपनी उंगलियाँ फेरते हुए कहा —
“मैं एक बार फिर से उठी हूँ, पर इस बार ज़मीन से नहीं, खुद की नज़रों से। और यह बहुत कठिन था, आरव… बहुत। पर तुम जानते हो क्या ज़्यादा कठिन था?”

उसने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा,
“तुम्हारा ये कहना — ‘डॉक्टर से एक बार जाँच करवा लेते हैं…’ तुम मेरा हाल समझ नहीं पाए, बस मेरा शरीर देखना चाहते हो…?”

आरव चौंका। “नहीं सिया, तुम गलत समझ रही हो…”
उसने हड़बड़ाते हुए कहा, “मुझे बस तसल्ली चाहिए थी कि कहीं… कुछ अनहोनी न हुई हो। डॉक्टर बस… एहतियात के लिए…”

सिया का चेहरा शांत था, पर आंखें बोल रही थीं —

“एहतियात तुम्हारे लिए है, मेरी नहीं। तुम्हें मेरी मानसिक हालत पर नहीं, मेरे शरीर पर संदेह है। और यही कलियुग है, आरव..!!”

आराव ने सिया का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा "तुम मुझे गलत समझ रही हो सिया.. ठीक है.. कोई बात नहीं.. तुम जांच न करवाना चाहो तो.. चलो फिर घर चलते है"

उसने धीरे से अपना हाथ खींच लिया।

“घर?” उसने दोहराया।

“कौन सा घर? वो जिसमें औरत का देह उसकी आत्मा से ज्यादा महत्व रखता है? जहाँ उसका संघर्ष, उसकी बहादुरी — सब एक जाँच रिपोर्ट में बदलकर रह जाते हैं?”

वो उठी। कमज़ोर शरीर, लेकिन आँखों में तूफ़ान।

“मैं तुम्हारे साथ रहूँगी, लेकिन तुम्हारे ‘नाम’ के साथ नहीं। मैं अब 'सिया आरव सिंह' नहीं — सिर्फ 'सिया' हूँ। मैं तुम्हारे साथ तो रहूँगी, पर अपनी शर्तों पर। इस बार मैं सिया बनकर लौटूंगी नहीं, बल्कि वो स्त्री बनकर जिऊँगी जो अग्नि से निकल कर लौ बन चुकी है।”

कमरे में गहरी ख़ामोशी थी।

आरव ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसके शब्द अब भी हकलाहट में उलझे हुए थे।

दोनों एक ही कमरे में थे — लेकिन उनके बीच एक पारदर्शी दीवार खड़ी हो चुकी थी।

एक ऐसी दीवार जो न प्यार गिरा सकता है, न पश्चाताप — सिर्फ समझ और समानता ही उसे मिटा सकते हैं।


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कुछ महीने बाद…

सिया ने अपनी किताब लॉन्च की:

📘 "लंका के बाद"
✍ लेखिका: सिया आरव नहीं — सिर्फ सिया..!!

पुस्तक विमोचन के बाद एक पत्रकार ने पूछा:

“आपका अगला कदम क्या होगा?”

सिया मुस्कराई —

“मैं राजनीति में प्रवेश करने जा रही हूँ।” भीड़ तालियों से गूंज उठी।

लेकिन जब वो मंच से उतरी, एक अनजान युवती ने आकर उसे एक लिफाफा थमाया।

सिया ने लिफाफा खोला — अंदर एक पेपर-क्लिप थी, उस रात की तस्वीरों की कॉपी… उन तस्वीरों ने सिया को झकझोर कर रख दिया..!!!

उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

शायद रावण हारा… पर क्या उसकी परछाई अब भी पीछा कर रही है???

।। समाप्त ।।

अरे मेरे भाई, अरे मेरे भाई!!!! 🙏🙏🙏

क्या अद्भुत लिखा है - आदिकाल और वर्तमान को समानांतर पर ला कर खड़ा कर दिया अपने।

कहानी चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, मनुष्य के जीवन में सब प्रासंगिक है। इसीलिए रामकथा को जन चेतना का प्रतिबिंब माना जाता है।
किन्तु कोई लड़ाई निर्णायक नहीं होती - रावण जीवित रहता है इस आस में कि वह कभी तो राम से प्रतिशोध लेगा, और राम का प्रयास यह रहता है कि कैसे रावण सशक्त न बन पाए। न कोई हारता है और न ही कोई जीतता है।

किन्तु सीता! 🙏

शुचिता का मानक अगर दैहिक शोषण पर आधारित है, फ़िर कुछ कहना ही अनावश्यक है। लेकिन आपने बहुत कुछ कह दिया है भाई।

विचारों को झकझोर देने वाली इस कहानी के प्रस्तुतिकरण के लिए साधुवाद! वखरिया भाई, ग़ज़ब की लेखनी है और बढ़िया सोच है आपकी।

और भी लिखिए। 😊👌👏
इस कहानी और इस प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएं। आशा करता हूं कि आप जीतें।
 

Shetan

Well-Known Member
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Thank you very much for your amazing review Shetan :hug: Bas tumhe achi lagi to kaam poora,🙏🏼 rahi baat chhoti ki, to bilkul ise or bhi badhqya ja sakta tha,specially end ka part,per apun ne socha, sort story hai to dhort me hi likh daalo:shhhh: Background music bhi ek din jaroor daalega apun:smarty:
हा ये बात सच है. पूरी तरह से समा बंधा हुआ था. बस end फीका सा लगा.
 

DesiPriyaRai

Royal
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अपशगुनी by avsji

यह एक पूरे परिवार की सामाजिक और भावनात्मक यात्रा है, जिसमें पीढ़ियों के टकराव, विचारों का बदलाव और समय के साथ बदलते रिश्तों को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है।

कहानी का सबसे बड़ा नायक एक ऐसा अमरूद का पेड़ है जो बिना बुलाए आता है, बिना देखभाल के पनपता है और पूरे परिवार की यादों, भावनाओं और संघर्षों का गवाह बन जाता है। यह पेड़ एक साथ कई प्रतीकों को समेटे हुए है संघर्ष, जड़ें, उम्मीद, विद्रोह और अंततः बलिदान।

कथानायक का उससे जुड़ाव, छोटी बहन 'गिल्लू' का निस्वार्थ स्नेह, और बच्चों की मासूम खुशियाँ, यह सभी बातें मिलकर एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव बनाती हैं।. धीरे-धीरे जब परिवार के भीतर रिश्तों में कड़वाहट और बदलाव आने लगते हैं, तो पेड़ एक अंधविश्वास का शिकार बन जाता है। यह दुखद है कि वही पेड़, जिसने सबको साथ जोड़ा था, अंततः अम्मा के अंधविश्वास और निराशा का बलि का बकरा बन जाता है।

कहानी में गिल्लू का विद्रोह, उसके द्वारा बोए गए बीज, आशा की उस लौ की तरह हैं जो यह संदेश देती है कि बदलाव मुमकिन है, और हर ‘कटाव’ के बाद भी फिर से उगना संभव है।

शब्दों की सहजता, भावनाओं की गहराई और वातावरण की सजीवता इस कहानी को विशिष्ट बनाती है। छोटे-छोटे विवरण, जैसे फूलों की चोरी, चिट्ठियाँ, पेड़ की टहनियों में चिड़ियों के लिए चुग्गा—कहानी में जीवन भरते हैं।
 

Avaran

एवरन
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Bak-bakchodi
Writer - manikmittalme07
Genre - sexual comedy

Story summary -

Story Chuski Chameli aur Munni Mastani naam ki do sexually bold aur independent ladkiyon se shuru hoti hai, jo Mumbai mein rehti hain. Inka attitude, language aur lifestyle extremely uninhibited hai. Story unki tharak bhari masti, relationships, aur ek accidental kidnapping aur human trafficking se encounter tak ka safar dikhati hai. Beech mein Chuski aur Munni ka pyaar do naye characters Panku aur Chanku se develop hota hai, jo unhe bachate hain. Ant mein romance, rescue aur shadi ke saath story khatam hoti hai.


Positive points

* Characters: Over-the-top aur entertaining, especially Chuski, Munni, Panku, Chanku.

* Visual Storytelling: Scenes ka description kaafi vivid hai — reader ko poora visual feel milta hai.

* Unpredictable Plot: Story mein twists hain — kabhi sudden breakup, kabhi kidnapping, kabhi rescue — jo reader ka interest banaye rakhte hain.

* Dialogues ka Raw Charm: Characters ke dialogues kaafi natural lagte hain (chahe vulgar ho), unka tone consistent hai.


Negative Points

* Grammatical Issues: Kahin kahin sentence structure aur grammar weak hai, jo readability ko affect karta hai.

* Storyline ka Overcrowding: Bahut saare characters aur random incidents ek hi story mein daal diye gaye hain, jo plot ko messy bana dete hain.


Short review
"Bak-bakchodi" ek adult comedy story hai jo bold language, vulgar humor aur exaggerated situations se bhari hui hai. Kahani mein thoda thrill aur romance bhi hai, lekin main focus sexual comedy par hai..

Overall its a good story
Rating 6/10
 
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