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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

11 ster fan

Lazy villain
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई हमेशा की तरह बहुत ही बेहतरीन रिव्यु दिया है आपने।

राजगुरु और सुजान सिंह तो पहले से ही गलत रासते पर चल रहे थे ।

परंतु याग्नेश तो पहले ईश्वर भक्त था और धर्म के उंचे पद पर था जहां धर्म रक्षा का दायित्व बढ जाता है ।

चेतावनी तो सबको जो गलत मार्राग मे चलते है कीसी ना किसी रुप मे देते हैं, राजगुरु और सुजान सिंह को भी प्राप्त हुई थी , वह कब और किस रुप में प्राप्त हुई यह आगे कहानी मे पता चलेगा ।

आपका यह प्रेम और सहयोग ही हमें कहानी आगे और लिखने की प्रेरणा देता है बस ऐसे ही साथ बनाए रखें स्वस्थ रहें प्रसन्न रहें 🙏💐💐💐
लेकीन अगर गहराई से देखा जाए तो याग्नेश कहीं भी गलत मार्ग पर नहीं था।।। बली के वक्त एक पिता अपने पुत्री को जीवित करने के लिए खुद की बली देता हैं, यह उस पिता कि गलत मंशा है, क्योंकि जो मर गया वो वापस नहीं आ सकता।।।।और यग्नेश का हर एक को जीवनदान देना ये दिखाता है कि वो हर उपकार के बदले उनपर एक मेहरबानी करता है।।।और ये बात इस बात को गलत साबित करती है कि वो जबरदस्ती किसी कि बली देता हो।।।और यागनेश के पूर्वजों ने इतना कुछ सहा , बीबी ,बेटा,बाप , दादा सब मारे गए , और देवदूत,देवता मस्त तमाशे देखते रहे।।।और अगर बदला लेने लगे तो अच्छाई का पाठ पढ़ाया जाए, धर्म की बाते सुनाओ।। ओह ये कितना घटिया चरित्र है,धर्म और अच्छाई का।।।
 

jaggi57

Abhinav
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लेकीन अगर गहराई से देखा जाए तो याग्नेश कहीं भी गलत मार्ग पर नहीं था।।। बली के वक्त एक पिता अपने पुत्री को जीवित करने के लिए खुद की बली देता हैं, यह उस पिता कि गलत मंशा है, क्योंकि जो मर गया वो वापस नहीं आ सकता।।।।और यग्नेश का हर एक को जीवनदान देना ये दिखाता है कि वो हर उपकार के बदले उनपर एक मेहरबानी करता है।।।और ये बात इस बात को गलत साबित करती है कि वो जबरदस्ती किसी कि बली देता हो।।।और यागनेश के पूर्वजों ने इतना कुछ सहा , बीबी ,बेटा,बाप , दादा सब मारे गए , और देवदूत,देवता मस्त तमाशे देखते रहे।।।और अगर बदला लेने लगे तो अच्छाई का पाठ पढ़ाया जाए, धर्म की बाते सुनाओ।। ओह ये कितना घटिया चरित्र है,धर्म और अच्छाई का।।।
बहुत बहुत धन्यवाद भाई आपकी उत्तम प्रतिक्रीया के लिए , हर व्यक्ति के सोचने का तरीका भिन्न होती है , जो दृष्टीकोण एक के लिए सही है वो किसी दुसरे के लिए गलत हो सकता है ।

चलो देखते है कहानी के पात्र इस कहानी को किस दिशा मे ले जाते है , और कहानी का क्या निशकर्ष निकालते है ।

ऐसे ही साथ बनाए रखे 🙏💐💐💐
 

jaggi57

Abhinav
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Update -- 11

सुजान सिंह -- राजगुरु शत्रुओं का समूल नाश ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करती है । अब इन दोनों का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है , समाप्त कर दो दोनों को, जीते जी तो नहीं परंतु मरने के बाद ही सही मेरा मित्र याग्नेश अपनी बहन और भांजे से मिल तो सकेगा। अब मैं इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता के बिछडे परिवार का मीलन ना करवाऊं । हा हा हा हा ।

अब आगे --


सुजान सिंह का आदेश मिलते ही राजगुरु ने कुमार की हत्या करने के लिए जैसे ही तलवार हवा में उठाई , इसके पहले कि वह कुमार का कुछ अहित कर सके, उसका हाथ कट कर भूमि पर गिरा , यह इतना तेजी से हुआ था, के पहले तो उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ , परंतु जब उसने अपना कटा हुआ हाथ भूमि पर पड़े देखा और उसकी कटी बाजू से रक्त का फावारा निकलते हुए देखा तो एक जोरदार चीख के साथ वह वही मूर्छित हो गया।

राजगुरु की चीख सुनकर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह का ध्यान उस ओर जब गया तब उन्होंने समर सिंह को वहां राजगुरु के रक्त से सनी हुई तलवार लेकर खड़े हुए पाया।

हुआ यूं था होश में आने के पश्चात समर सिंह ने जब युद्धवीर सिंह को चोरी-छिपे घायल याग्नेश पर वार करते हुए देखा और दूसरी तरफ राजगुरु के कब्जे में छोटी रानी और कुमार को देखा तो उसे कुछ-कुछ षड्यंत्र का अंदाजा हो गया था और रही सही कसर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह की बातों ने कर दिया था, जब वह विजयानंद को समाप्त करने की योजना पर बात कर रहे थे।

इनकी बातों से समर सिंह को अंदाजा हो गया था कि छोटी रानी और कुमार का जीवन पर संकट आ सकता है , इसलिए वह जमीन पर रेंगते रेंगते ही राजगुरु के समीप तक पहुंच गया और जैसी सुजान सिंह ने राजगुरु को छोटी रानी श्रुति और कुमार को समाप्त करने का आदेश दिया , तो समर सिंह अपनी तलवार संभाल कर सजग हो गया और जैसे ही राजगुरु ने कुमार को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार उठाई उसी समय बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह ने राजगुरु का हाथ काट दिया।

समर सिंह को इस प्रकार अपने आदेश के विरुद्ध जाता हुआ देखकर सुजान सिंह को बहुत क्रोध आया

सुजान सिंह -- यह क्या किया अपने सेनापति समर सिंह ! आप तो स्वामी भक्ति की मिसाल थे राजगुरु पर वार करके आपने मेरे आदेश की अवहेलना की है मुझे आपसे ऐसी आशा नहीं थी क्या यही है आपकी स्वामी भक्ति।

समर सिंह -- स्वामी भक्ति की बात आप ना ही करें महाराज । मेरे लिए मेरी स्वामी हैं मेरी मातृभूमि ।
आपकी और युद्धवीर सिंह की बातों से मैं इतना तो समझ चुका हूं कि याग्नेश को इस परिस्थिति में पहुंचाने वाले आप ही थे । इतने से भी आपका मन नहीं भरा तो आप विजयानंद को भी समाप्त करने की योजना बनाने लगे , आप भूल रहे हो महाराज कि हमारे नगर की नींव गजेंद्र का वह मंदिर और आश्रम ही है और आप उससे ही नष्ट करना चाहते हो मैं आपको ऐसा नहीं करने दूंगा चाहे इसके लिए मुझे आपके विरुद्ध भी जाना पड़े ।

वहीं दूसरी ओर राजगुरु की भूमि पर गिरते ही कुमार दौड़ कर अपनी मां श्रुति के पास पहुंचा, युद्ध भूमि में अब तक जो कुछ भी हो रहा था उसके कारण भय और दुख दोनों उसके नेत्रों में झलक रहे थे अपनी माता को इस प्रकार भूमि पर मूर्छित देखकर उसके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी।

कुमार नीचे बैठ गया और अपनी माता का सिर अपनी गोदी में रखकर प्रेम से अपनी माता को पुकारने लगा उसके नेत्रों से गिरते हुए अश्रु उसकी माता श्रुति के चेहरे पर पड़ रहे थे।

कुमार -- उठो ना मां ! उठो देखो मुझे अब मैं बिल्कुल सुरक्षित हूं मां , उठो ना ! मैं आपको इस प्रकार नहीं देख सकता मां।

अपनी मां को उठाने के लिए कुमार उसे पुकारता हुआ सतत प्रयास करने लगा एक मां किस प्रकार अपने पुत्र की पुकार को अनसुना कर सकती थी श्रुति को अब होश आ गया था उसने अपने नेत्र खोलकर कुमार की और देखा और एक हाथ से उसके अश्रु पहुंचकर उसके गालों को सहलाया और उठ कर बैठ गई ।

श्रुति -- मत रो मेरे लाल ! मत रो । देखो मैं बिल्कुल ठीक हूं इतना कहकर श्रुति ने अपने पुत्र को अपने कंठ से लगा लिया और उसे चुप कराने लगी ।
तभी उसे मूर्छित होने से पहले की घटना याद आई तो वह किसी अनर्थ की आशंका से तुरंत अपने पुत्र को अलग कर दिया और उस ओर दौड़ी जहां याग्नेश भूमि पर पड़ा हुआ था ।
अपने नेत्रों के आगे याग्नेश पर घातक प्रहार होते हुए देख कर भी उसका मन कह रहा था कि उसका भाई जीवित है ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि इतने वर्षों बाद मिले हुए उसके भाई को इस प्रकार छीन ले।

कुमार को पहले ना तो सुजान सिंह के बारे में पता था और ना ही याग्नेश के बारे में परंतु अब तक की बातों से उसे सब पता चल गया था अपनी मां को भूमि पर पड़े हुए अपने मामा की ओर दौड़ते हुए देखकर कुमार भी श्रुति के पीछे दौड़ पड़ा।

समर सिंह जानता था के सुजान सिंह कुछ भी कर सकता है श्रुति और कुमार के प्राणों को संकट में देखकर समर सिंह भी दोनों के पीछे हो लिया।

श्रुति याग्नेश तक पहुंची ही थी कि सुजान सिंह ने उसे बालों से पकड़ लिया अपनी माता को इस प्रकार प्रताड़ित होता हुआ देखकर कुमार को बहुत क्रोध आया वह क्रोध में भरकर सुजान सिंह पर छलांग लगाने वाला था कि पीछे से समर सिंह ने उसे पकड़ लिया।

कुमार -- छोड़ दो मुझे मैं आज इस राजा को नहीं छोडूंगा जिसने मेरे मां का जीवन दुखो से भर दिया , छोड़ दो मुझे।

सुजान सिंह -- वाह बेटे वाह ! तू मुझे समाप्त करेगा , मानना पड़ेगा तेरे साहस को। आखिर क्यों ना हो तेरे धमनियों में मेरा ही तो रक्त दौड़ रहा है। तुम्हे मारने मे मुझ बहुत दु:ख होगा, परंतु क्या करे मेरी वीवशता हैं।

राजगुरु -- छोड़ दो महाराज ! छोटी रानी को । आप एक राजा हो इस प्रकार किसी स्त्री पर हाथ उठाना आपको शोभा नहीं देता। छोड़ दो छोटी रानी को अपने पद को कलंकित मत करो।

सुजान सिंह -- तुम तो चुप ही रहो राजगुरु मुझे शिक्षा देने की तुम्हारी हैसियत नहीं है।

श्रुति -- छोड़ दीजिए छोड दिजीए , बस एक बार मिलने दीजिए मुझे अपने भाई से ।
आखिर हमने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने हमारे परिवार के साथ विश्वासघात किया । जिसने किसी समय आपके प्राणों की रक्षा की थी उसी के पीठ में खंजर घोप दिया, अब अपनी संतान को भी मारने पर तुले हो इतना कैसे गिर सकते हो आप। घृणा होती है मुझे अपने आप से के किसी समय मैने आपसे प्रेम किया था।

सुजान सिंह - घृणा ! घृणा तो मैं करता था तुम्हारे भाई से । मैंने तो कभी उसे अपना मित्र माना ही नहीं एक राजा का बेटा होने के पश्चात भी तुम्हारे इस भाई के कारण मुझे आश्रम में वह सम्मान कभी प्राप्त नहीं हुआ जो प्राप्त होना था, तुम्हारा भाई तो मारा गया ।
यदि मैं तुम्हें जीवीत छोड़ दूं तो कल को तुम या तुम्हारा बेटा मेरे लिए खतरा बन सकता है इसलिए तुम दोनों का मरना मेरे लिए जरूरी है।

अपनी विवशता देखकर श्रुति अपने भाई याग्नेश को पुकारने लगी , उसे पूर्ण विश्वास था कि उसकी पुकार उसका भाई जरूर सुनेगा-----

श्रुति -- उठ जाओ , भाई उठ जाओ ! इतने वर्षों पश्चात मिलकर आप इस प्रकार मुझे छोड़कर नहीं जा सकते, उठो भाई उठो आपके बिना यहां मेरी और मेरे पुत्र की रक्षा करने वाला कोई नहीं।

श्रुति स सतत् याग्नेश को पुकारने लगी , इस आशा के साथ के उसका भाई उसकी पुकार जरुर सुनेगा -----

सुजान सिंह ने श्रुति को मारने के लिए अपने तलवार उठाई ही थी के तभी , नीले रंग के प्रकाश का एक चक्र बड़ी तीव्र गति से आकर उसके सीने से टकराया और एक बड़ा सा छेद करते हुए पार हो गया एक दर्दनाक चीख के साथ सुजान सिंह वही धराशाई हो गया और किसी कटे वृक्ष की भांति भूमि पर गिर गया।

युद्धवीर सिंह जो अभी सुजान सिंह की ओर देख ही रहा था अचानक से हुए इस हमले को एक पल तो वह समझ ही नहीं पाया , परंतु जैसे ही उसे वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ उसने तुरंत पीछे पलट कर देखा तो उसकी आंखें हैरत से फटी की फटी रह गई ।

वहां याग्नेश सही सलामत खड़ा था। उसके नेत्र किसी जलते हुए अंगारे की भांति लग रहे थे शरीर से नीले रंग की उर्जा निकल रही थी वह सामने खड़ा किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

हुआ यूं के याग्नेश ने अपनी आत्मा का एक अंश इब्लिस को समर्पित कर दिया था । जिसके कारण कोई भी साधारण अस्त्र उसे मार नहीं सकता था।
युद्धवीर सिंह के द्वारा किए गए वार से वह कुछ देर के लिए अचेत आवश्य हो गया था, उसकी सांसे थमने लगी थी। तभी उसके भीतर इब्लिस की शक्ति जागृत हो उठी उसकी चेतना फिर लौट आई जब उसने अपने नेत्र खोल कर सामने देखा तो सुजान सिंह उसकी प्यारी छोटी बहन श्रुति के बाल पकड़कर खड़ा था और हत्या करने ही वाला था के जिसे देखकर याग्नेश का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया और उसने तुरंत प्राणघातक ऊर्जा का प्रयोग सुजान सिंह पर कर दिया जिसके फलस्वरूप सुजान सिंह मारा गया।

अपने सीने में धंसे हुए भाले को बाहर निकालकर उसने युद्धवीर सिंह की ओर फेंक दिया परंतु तब तक युद्धवीर सिंह ने उसे देख लिया था, उसने तुरंत अपनी जगह से हटकर अपने प्राणों की रक्षा की। इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता युद्धवीर सिंह ने वहां एक धुएं का गुबार प्रकट किया और याग्नेश की नजरों से बचकर वहां से भाग गया और जाते-जाते अपने साथ राजगुरु को भी ले गया।

युद्धवीर सिंह का पीछा करने से ज्यादा जरूरी इस समय याग्नेश का अपनी बहन और भांजे से मिलना था।

अपने भाई को सही सलामत सामने खड़ा देख श्रुति दौड़कर याग्नेश के गले लग गई ।बरसों से ह्रदय में छिपे हुए दुख दर्द अश्रु और रुदन द्वारा बाहर निकलने लगे।
जहां श्रुति अपने भाई के सीने से लग कर आंसू बहा रही थी वही याग्नेश भी प्रेम से अपने बहन के सिर पर हाथ फिरता हुआ उसे अपने गले से लगाए अश्रु बहा रहा था। दोनों में से कोई कुछ भी बोल नहीं रहा था परंतु उनके नेत्रों से बहती अविरल अश्रु धारा सब कुछ कह रही थी ।

दूर खड़ा कुमार भी इस मिलन को देखकर अत्यंत भावुक हो रहा था , उसमें कभी अपनी मां के सिवा और किसी अपने को नहीं देखा था । आज अपने मामा को देखकर वह भी बहुत भावुक हो गया था । याग्नेश ने कुमार की और देखा और उसे अपनी और आने का इशारा किया, कुमार भी बस इसी प्रतीक्षा में खड़ा था, वह तुरंत दौड़कर याग्नेश के गले लग गया।

इस युद्ध में संपूर्ण रात्रि बीत चुकी थी, पूर्व दिशा की लालिमा सूर्योदय होने की सूचना दे रही थी । वही दूर खड़ा सेनापति समर सिंह याग्नेश को उसकी बहन और भांजे से मिलता हुआ देख रहा था।

इस नए सूर्योदय के साथ देवनगर का नया अध्याय किस दिशा की ओर जाएगा इसी सोच के साथ समर सिंह ने अपनी दृष्टि आकाश की और उठाई।

आज के लिए इतना ही , अगला अपडेट शीघ्र ही ----
आप सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि आप इस कहानी पर अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें--
आपके सहयोग का अभिलाषी ---

आपका मित्र -- अभिनव🔥
 

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Update -- 11

सुजान सिंह -- राजगुरु शत्रुओं का समूल नाश ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करती है । अब इन दोनों का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है , समाप्त कर दो दोनों को, जीते जी तो नहीं परंतु मरने के बाद ही सही मेरा मित्र याग्नेश अपनी बहन और भांजे से मिल तो सकेगा। अब मैं इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता के बिछडे परिवार का मीलन ना करवाऊं । हा हा हा हा ।

अब आगे --



सुजान सिंह का आदेश मिलते ही राजगुरु ने कुमार की हत्या करने के लिए जैसे ही तलवार हवा में उठाई , इसके पहले कि वह कुमार का कुछ अहित कर सके, उसका हाथ कट कर भूमि पर गिरा , यह इतना तेजी से हुआ था, के पहले तो उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ , परंतु जब उसने अपना कटा हुआ हाथ भूमि पर पड़े देखा और उसकी कटी बाजू से रक्त का फावारा निकलते हुए देखा तो एक जोरदार चीख के साथ वह वही मूर्छित हो गया।

राजगुरु की चीख सुनकर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह का ध्यान उस ओर जब गया तब उन्होंने समर सिंह को वहां राजगुरु के रक्त से सनी हुई तलवार लेकर खड़े हुए पाया।

हुआ यूं था होश में आने के पश्चात समर सिंह ने जब युद्धवीर सिंह को चोरी-छिपे घायल याग्नेश पर वार करते हुए देखा और दूसरी तरफ राजगुरु के कब्जे में छोटी रानी और कुमार को देखा तो उसे कुछ-कुछ षड्यंत्र का अंदाजा हो गया था और रही सही कसर सुजान सिंह और युद्धवीर सिंह की बातों ने कर दिया था, जब वह विजयानंद को समाप्त करने की योजना पर बात कर रहे थे।

इनकी बातों से समर सिंह को अंदाजा हो गया था कि छोटी रानी और कुमार का जीवन पर संकट आ सकता है , इसलिए वह जमीन पर रेंगते रेंगते ही राजगुरु के समीप तक पहुंच गया और जैसी सुजान सिंह ने राजगुरु को छोटी रानी श्रुति और कुमार को समाप्त करने का आदेश दिया , तो समर सिंह अपनी तलवार संभाल कर सजग हो गया और जैसे ही राजगुरु ने कुमार को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार उठाई उसी समय बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह ने राजगुरु का हाथ काट दिया।


समर सिंह को इस प्रकार अपने आदेश के विरुद्ध जाता हुआ देखकर सुजान सिंह को बहुत क्रोध आया

सुजान सिंह -- यह क्या किया अपने सेनापति समर सिंह ! आप तो स्वामी भक्ति की मिसाल थे राजगुरु पर वार करके आपने मेरे आदेश की अवहेलना की है मुझे आपसे ऐसी आशा नहीं थी क्या यही है आपकी स्वामी भक्ति।

समर सिंह -- स्वामी भक्ति की बात आप ना ही करें महाराज । मेरे लिए मेरी स्वामी हैं मेरी मातृभूमि ।
आपकी और युद्धवीर सिंह की बातों से मैं इतना तो समझ चुका हूं कि याग्नेश को इस परिस्थिति में पहुंचाने वाले आप ही थे । इतने से भी आपका मन नहीं भरा तो आप विजयानंद को भी समाप्त करने की योजना बनाने लगे , आप भूल रहे हो महाराज कि हमारे नगर की नींव गजेंद्र का वह मंदिर और आश्रम ही है और आप उससे ही नष्ट करना चाहते हो मैं आपको ऐसा नहीं करने दूंगा चाहे इसके लिए मुझे आपके विरुद्ध भी जाना पड़े ।


वहीं दूसरी ओर राजगुरु की भूमि पर गिरते ही कुमार दौड़ कर अपनी मां श्रुति के पास पहुंचा, युद्ध भूमि में अब तक जो कुछ भी हो रहा था उसके कारण भय और दुख दोनों उसके नेत्रों में झलक रहे थे अपनी माता को इस प्रकार भूमि पर मूर्छित देखकर उसके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी।

कुमार नीचे बैठ गया और अपनी माता का सिर अपनी गोदी में रखकर प्रेम से अपनी माता को पुकारने लगा उसके नेत्रों से गिरते हुए अश्रु उसकी माता श्रुति के चेहरे पर पड़ रहे थे।

कुमार -- उठो ना मां ! उठो देखो मुझे अब मैं बिल्कुल सुरक्षित हूं मां , उठो ना ! मैं आपको इस प्रकार नहीं देख सकता मां।

अपनी मां को उठाने के लिए कुमार उसे पुकारता हुआ सतत प्रयास करने लगा एक मां किस प्रकार अपने पुत्र की पुकार को अनसुना कर सकती थी श्रुति को अब होश आ गया था उसने अपने नेत्र खोलकर कुमार की और देखा और एक हाथ से उसके अश्रु पहुंचकर उसके गालों को सहलाया और उठ कर बैठ गई ।

श्रुति -- मत रो मेरे लाल ! मत रो । देखो मैं बिल्कुल ठीक हूं इतना कहकर श्रुति ने अपने पुत्र को अपने कंठ से लगा लिया और उसे चुप कराने लगी ।
तभी उसे मूर्छित होने से पहले की घटना याद आई तो वह किसी अनर्थ की आशंका से तुरंत अपने पुत्र को अलग कर दिया और उस ओर दौड़ी जहां याग्नेश भूमि पर पड़ा हुआ था ।
अपने नेत्रों के आगे याग्नेश पर घातक प्रहार होते हुए देख कर भी उसका मन कह रहा था कि उसका भाई जीवित है ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि इतने वर्षों बाद मिले हुए उसके भाई को इस प्रकार छीन ले।

कुमार को पहले ना तो सुजान सिंह के बारे में पता था और ना ही याग्नेश के बारे में परंतु अब तक की बातों से उसे सब पता चल गया था अपनी मां को भूमि पर पड़े हुए अपने मामा की ओर दौड़ते हुए देखकर कुमार भी श्रुति के पीछे दौड़ पड़ा।

समर सिंह जानता था के सुजान सिंह कुछ भी कर सकता है श्रुति और कुमार के प्राणों को संकट में देखकर समर सिंह भी दोनों के पीछे हो लिया।


श्रुति याग्नेश तक पहुंची ही थी कि सुजान सिंह ने उसे बालों से पकड़ लिया अपनी माता को इस प्रकार प्रताड़ित होता हुआ देखकर कुमार को बहुत क्रोध आया वह क्रोध में भरकर सुजान सिंह पर छलांग लगाने वाला था कि पीछे से समर सिंह ने उसे पकड़ लिया।

कुमार -- छोड़ दो मुझे मैं आज इस राजा को नहीं छोडूंगा जिसने मेरे मां का जीवन दुखो से भर दिया , छोड़ दो मुझे।

सुजान सिंह -- वाह बेटे वाह ! तू मुझे समाप्त करेगा , मानना पड़ेगा तेरे साहस को। आखिर क्यों ना हो तेरे धमनियों में मेरा ही तो रक्त दौड़ रहा है। तुम्हे मारने मे मुझ बहुत दु:ख होगा, परंतु क्या करे मेरी वीवशता हैं।

राजगुरु -- छोड़ दो महाराज ! छोटी रानी को । आप एक राजा हो इस प्रकार किसी स्त्री पर हाथ उठाना आपको शोभा नहीं देता। छोड़ दो छोटी रानी को अपने पद को कलंकित मत करो।

सुजान सिंह -- तुम तो चुप ही रहो राजगुरु मुझे शिक्षा देने की तुम्हारी हैसियत नहीं है।


श्रुति -- छोड़ दीजिए छोड दिजीए , बस एक बार मिलने दीजिए मुझे अपने भाई से ।
आखिर हमने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने हमारे परिवार के साथ विश्वासघात किया । जिसने किसी समय आपके प्राणों की रक्षा की थी उसी के पीठ में खंजर घोप दिया, अब अपनी संतान को भी मारने पर तुले हो इतना कैसे गिर सकते हो आप। घृणा होती है मुझे अपने आप से के किसी समय मैने आपसे प्रेम किया था।


सुजान सिंह - घृणा ! घृणा तो मैं करता था तुम्हारे भाई से । मैंने तो कभी उसे अपना मित्र माना ही नहीं एक राजा का बेटा होने के पश्चात भी तुम्हारे इस भाई के कारण मुझे आश्रम में वह सम्मान कभी प्राप्त नहीं हुआ जो प्राप्त होना था, तुम्हारा भाई तो मारा गया ।
यदि मैं तुम्हें जीवीत छोड़ दूं तो कल को तुम या तुम्हारा बेटा मेरे लिए खतरा बन सकता है इसलिए तुम दोनों का मरना मेरे लिए जरूरी है।

अपनी विवशता देखकर श्रुति अपने भाई याग्नेश को पुकारने लगी , उसे पूर्ण विश्वास था कि उसकी पुकार उसका भाई जरूर सुनेगा-----

श्रुति -- उठ जाओ , भाई उठ जाओ ! इतने वर्षों पश्चात मिलकर आप इस प्रकार मुझे छोड़कर नहीं जा सकते, उठो भाई उठो आपके बिना यहां मेरी और मेरे पुत्र की रक्षा करने वाला कोई नहीं।

श्रुति स सतत् याग्नेश को पुकारने लगी , इस आशा के साथ के उसका भाई उसकी पुकार जरुर सुनेगा -----

सुजान सिंह ने श्रुति को मारने के लिए अपने तलवार उठाई ही थी के तभी , नीले रंग के प्रकाश का एक चक्र बड़ी तीव्र गति से आकर उसके सीने से टकराया और एक बड़ा सा छेद करते हुए पार हो गया एक दर्दनाक चीख के साथ सुजान सिंह वही धराशाई हो गया और किसी कटे वृक्ष की भांति भूमि पर गिर गया।

युद्धवीर सिंह जो अभी सुजान सिंह की ओर देख ही रहा था अचानक से हुए इस हमले को एक पल तो वह समझ ही नहीं पाया , परंतु जैसे ही उसे वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ उसने तुरंत पीछे पलट कर देखा तो उसकी आंखें हैरत से फटी की फटी रह गई ।

वहां याग्नेश सही सलामत खड़ा था। उसके नेत्र किसी जलते हुए अंगारे की भांति लग रहे थे शरीर से नीले रंग की उर्जा निकल रही थी वह सामने खड़ा किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

हुआ यूं के याग्नेश ने अपनी आत्मा का एक अंश इब्लिस को समर्पित कर दिया था । जिसके कारण कोई भी साधारण अस्त्र उसे मार नहीं सकता था।
युद्धवीर सिंह के द्वारा किए गए वार से वह कुछ देर के लिए अचेत आवश्य हो गया था, उसकी सांसे थमने लगी थी। तभी उसके भीतर इब्लिस की शक्ति जागृत हो उठी उसकी चेतना फिर लौट आई जब उसने अपने नेत्र खोल कर सामने देखा तो सुजान सिंह उसकी प्यारी छोटी बहन श्रुति के बाल पकड़कर खड़ा था और हत्या करने ही वाला था के जिसे देखकर याग्नेश का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया और उसने तुरंत प्राणघातक ऊर्जा का प्रयोग सुजान सिंह पर कर दिया जिसके फलस्वरूप सुजान सिंह मारा गया।

अपने सीने में धंसे हुए भाले को बाहर निकालकर उसने युद्धवीर सिंह की ओर फेंक दिया परंतु तब तक युद्धवीर सिंह ने उसे देख लिया था, उसने तुरंत अपनी जगह से हटकर अपने प्राणों की रक्षा की। इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता युद्धवीर सिंह ने वहां एक धुएं का गुबार प्रकट किया और याग्नेश की नजरों से बचकर वहां से भाग गया और जाते-जाते अपने साथ राजगुरु को भी ले गया।

युद्धवीर सिंह का पीछा करने से ज्यादा जरूरी इस समय याग्नेश का अपनी बहन और भांजे से मिलना था।

अपने भाई को सही सलामत सामने खड़ा देख श्रुति दौड़कर याग्नेश के गले लग गई ।बरसों से ह्रदय में छिपे हुए दुख दर्द अश्रु और रुदन द्वारा बाहर निकलने लगे।
जहां श्रुति अपने भाई के सीने से लग कर आंसू बहा रही थी वही याग्नेश भी प्रेम से अपने बहन के सिर पर हाथ फिरता हुआ उसे अपने गले से लगाए अश्रु बहा रहा था। दोनों में से कोई कुछ भी बोल नहीं रहा था परंतु उनके नेत्रों से बहती अविरल अश्रु धारा सब कुछ कह रही थी ।

दूर खड़ा कुमार भी इस मिलन को देखकर अत्यंत भावुक हो रहा था , उसमें कभी अपनी मां के सिवा और किसी अपने को नहीं देखा था । आज अपने मामा को देखकर वह भी बहुत भावुक हो गया था । याग्नेश ने कुमार की और देखा और उसे अपनी और आने का इशारा किया, कुमार भी बस इसी प्रतीक्षा में खड़ा था, वह तुरंत दौड़कर याग्नेश के गले लग गया।

इस युद्ध में संपूर्ण रात्रि बीत चुकी थी, पूर्व दिशा की लालिमा सूर्योदय होने की सूचना दे रही थी । वही दूर खड़ा सेनापति समर सिंह याग्नेश को उसकी बहन और भांजे से मिलता हुआ देख रहा था।

इस नए सूर्योदय के साथ देवनगर का नया अध्याय किस दिशा की ओर जाएगा इसी सोच के साथ समर सिंह ने अपनी दृष्टि आकाश की और उठाई।


आज के लिए इतना ही , अगला अपडेट शीघ्र ही ----
आप सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि आप इस कहानी पर अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें--
आपके सहयोग का अभिलाषी ---
आपका मित्र -- अभिनव🔥
ईश्वर तुल्य एक उच्च उपाधि का जिस तरह राजगुरु ने अपमान किया तो उसका फल तो मिलना ही था मगर उनका दंड अभी भी पूरा नहीं हुआ है।

सुजान सिंह ने राजा हो कर भी जिस तरह अपनी ही प्रजा के साथ और उससे भी बढ़ कर अपने मित्र, अपनी पत्नी और पुत्र के साथ विश्वासघात किया है तो उसकी सजा भी मृत्युदंड ही हो सकती थी जोकि उसको मिली।

युद्धवीर और राजगुरु फिर भी बच गए जोकि आगे चल कर यग्नेश, उसकी बहन और भांजे के लिए चिंता का विषय रहेंगे। अब अगला राजा तो कुमार को ही बनना है नियमानुसार अगर कोई और ज्येष्ठ पुत्र सामने नही आता है सुजान सिंह का तो। मगर यग्नेश अब आगे क्या मार्ग चुनता है वो अब देखने का विषय होगा? बहुत ही शानदार अपडेट jaggi57 भाई
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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अध्याय- 2

ये थे आचार्य यग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे।
इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

अब आगे ---

कोई एक घंटे बाद, आचार्य अपनी घोड़े पर पूर्व की ओर दौड़ते हुए, पहाडी रस्तो से होते हुए मैदानी इलाकों में पहुचे, अब तक उनका क्रोध थोडा ठंडा हो गया था।

परंतु एक प्रश्न उनके मन में अभी भी चल रहा था की, आखिर क्यों उनके साथ ऐसा हुआ उनके परिवार ने पीढीयो से देवताओं की पूजा की थी , अपना सारा जीवन लोक कल्याण और लोगों की भलाई में लगाया था , फिर भी उन्हें क्या प्राप्त हुआ ।

अपने बीते जीवन के बारे में सोचते सोचते उनके मन में देवताओं के प्रति घृणा और प्रबल हो गई।

दूर आगे ऐसे ही चलते चलते वो उस जगह पहुंचे जहां कभी बचपन में अपनी छोटी बहन के साथ बैठकर पूरे शहर को देखते थे वह एक टीला था जहां से पूरा नगर दिखाई देता ,

इस समय देवनगर की ऊंची-ऊंची दीवारों के ऊपर सैकड़ों मशाले जल रही थी , जो आकाश मे चमकने वाले तारों की भांती लग रहे थे। इस शहर को देखते देखते ही यग्नेश बडा हुआ था ।

आचार्य वही उस टीले पर आंख बंद करके लेट गए और अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगे।

यह रहा देव नगर शहर जो भौगोलिक दृष्टि से उसका क्षेत्रफल किसी बडे राज्य से कम नहीं था ऐसे ही 5 और शहर मिलाकर बनती है यहां की सभ्यता , जो आज भी आधुनिक समाज और सभ्यता से कटी हुई है , या यु कहो के कोई अदृश्य आयाम इसे बाकी पृथ्वी से अलग बनाए हुए हैं ।

पृथ्वी पर रहते हुए भी इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है जो इसी पृथ्वी पर मौजूद किसी अलग आयाम में स्थित हैं।
चारों ओर से पर्वतों से घिरे हरे भरे बाग बगीचे झरने तलाब और अद्भुत जड़ी बूटी से सुसज्जित यहां के घने वन, अद्भुत शिल्पकला, इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है।

यह नगर देवनगर के नाम से विख्यात था। यह नगर चारों ओर से छोटे छोटे मंदिरों से सुसज्जित था और नगर के मध्य में यहां के मुख्य देवता गजेंद्र का विशाल मंदिर था और साथ ही एक बड़ा आश्रम था।

इस मंदिर और आश्रम के आचार्य की बड़ी गरिमा थी यहां आचार्य देवता का प्रतिनिधि मानकर देव तुल्य ही सम्मान देते थे उनका हर आदेश यहां की प्रजा के लिए देवता का ही आदेश माना जाता था।

तीन पीढ़ियों से आचार्य याग्नेश के परिवार के सदस्य ही यहां के आचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे पहले याग्नेश के दादा अग्निवेश यहां के आचार्य बने और उनके बाद याग्नेश के पिता आचार्य विग्नेश ने यहां का पदभार संभाला

जब याग्नेश के दादा की मृत्यु हुई थी तभी याग्नेश बहुत छोटा था परंतु आज भी वह वो दिन नहीं भूल पाया था जिस दिन उसके दादा की मृत्यु हुई थी।

यग्नेश अपने दादा से बहुत प्रेम करता था बिना दादा से मिले उसके दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती थी रोज की तरह इस दिन भी प्रातः वह अपने दादा से मिलने उनके कक्ष में गया

अपने दादा के कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे वह दो चार कदम आगे बढ़ा तो सामने का दृश्य देखकर वह स्तंभित हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई सांसे तेज चलने लगी दिल जोरो से धड़कने लगा सामने उसके दादा का क्षत-विक्षत शव पड़ा हुआ था, उनके शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव से रिस्ता लाल रक्त और सीने में गड़ा हुआ एक बड़ा सा खंजर उस दृश्य को और भी भयावह बना रहा था।

अपने प्यारे दादा को ऐसी स्थिति में देखकर याग्नेश को गहरा सदमा लगा उसके मुख से एक जोरदार चीख निकली और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा , उसकी आवाज सुनकर कक्ष के बाहर मौजूद आश्रम के शिष्य कक्ष के भीतर आए कक्ष के भीतर का भयावह दृश्य देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई ।

अपने प्यारे आचार्य को इस स्थिति में देखकर सबकी आंखों में आंसू आ गए सब क्रंदन करने लगे इस दुखद घटना की सूचना जब विग्नेश तक पहुंची तब वह तुरंत वहां पहुंचा ।

एक तरफ अपने पिता का क्षत-विक्षत शव और दूसरी तरफ नन्हा याग्नेश बेहोश स्तिथी में विग्नेश के नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगे उसने अपने पिता को कई बार पुकारा परंतु उस पुकार का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला।

अपने पिता के बाद उसके कंधे पर आने वाली आश्रम की जिम्मेदारियों को वह जानता था , इसलिए उसने अपने ह्रदय को कठोर किया और अपने पिता के शव को उठाकर उनके आसन पर लिटा दिया ।

तभी वहां कोलाहल शुरू हुआ जब आश्रम के शिष्यों ने वहां मौजूद ऊंचे आसन की तरफ देखा जहां उनका दिव्य क्रिस्टल रखा हुआ होता था उस क्रिस्टल को वहां ना पाकर सभी भयभीत हो गए क्योंकि क्रिस्टल के वहां ना होने का अर्थ था उनके नगर का विनाश।

विग्नेश अभी अपने पिता की मृत्यु के बारे में ही विचार कर रहा था के नगर के विनाश के भय ने भी उसके हृदय को घेर लिया उसने वहां मौजूद सभी को शांत रहने का परामर्श दिया और क्रिस्टल वापस लाने का आश्वासन दिया।

आश्रम के बाकी शिष्य विग्नेश का बड़ा आदर करते थे , इसलिए उसकी बात मानकर सब शांत हो गए विग्नेश ने उन सब को अपने पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी करने को कहां और सभी को कक्ष से बाहर भेज दिया।

सभी के कक्ष के बाहर जाने के बाद विग्नेश उस पक्ष में कुछ ढूंढने लगा, वह अपने पिता को अच्छी तरह जानता था ,उसे पता था कि मृत्यु से पूर्व का उसके पिता ने कुछ ना कुछ क्रिस्टल के बारे में निशान छोड़े होंगे।

ढूंढते ढूंढते उससे एक जगह रक्त से बने हुए कुछ चिन्ह मिले जिन्हें देखकर वह समझ गया कि उसके पिता ने वह क्रिस्टल कहां रखा हुआ है शायद उसके पिता को इस स्थिति का पूर्व अंदेशा था इसलिए उन्होंने विग्नेश को कई तरह के गुप्त चिन्हों और आश्रम में पदासीन आचार्यों के रहस्य के बारे में सब कुछ बता दिया था।

वह अपने पुत्र की योग्यता को जानते थे और यह भी जानते थे, कि उनके बाद उनका पुत्र विग्नेश ही आचार्य के पद को संभालेगा
विग्नेश सबकी नजर बचाते हुए कक्ष में मौजूद पत्थर के चबूतरे के पास पहुंचा जहां उनके प्रमुख देवता गजेंद्र की प्रतिमा रखी हुई थी ।

उसने उस प्रतिमा को पहले प्रणाम किया फिर तीन बार उस प्रतिमा को घुमाया तभी उस पत्थर के चबूतरे के पीछे एक छोटा सा द्वार प्रगट हुआ विग्नेश उस द्वार में प्रवेश कर गया और नीचे की सीढ़ियां उतरते हुए वह वहां के गुप्त कक्ष में पहुंचा।

यह एक ऐसा गुप्त कक्ष था जिसके बारे में केवल आश्रम के पदासीन आचार्य को पता होता था , इस कक्ष में आश्रम का गुप्त खजाना और भी कई तरह की दिव्य जड़ी बूटियां और अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे ।

विग्नेश ने उस कक्ष में एक आसन पर रखे दिव्य क्रिस्टल की तरफ देखा उसने उस क्रिस्टल को लाल कपड़े में लपेटा और वापस उसी रास्ते से होकर अपने पिता के कक्ष में आया और क्रिस्टल को उसके यथा योग्य स्थान पर स्थापित कर दिया।

क्रिस्टल के वहां स्थापित होते वहां एक अदृश्य सुरक्षा घेरा प्रकट हुआ ।

विग्नेश ने क्रिस्टल के मिलने की सूचना आश्रम के बाकी शिष्यों तक पहुंचाई क्रिस्टल की मिलने की सूचना पाकर सभी का भय दूर हो गया उसके बाद ही था योग्य रीति से विग्नेश के पिता का अंतिम संस्कार किया गया।

जब तक याग्नेश को होश आया तब तक उसके दादा राख में बदल चुके थे अगले कई दिनों तक याग्नेश की स्थिति बड़ी विकट थी रोज रात को वह अपने दादा को पुकारता हुआ चीखता हुआ उठ जाता था , अपनी दादा की वह खुली आंखें और रक्तरंजित शव का दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।

परंतु कहते हैं ना कि समय गहरे से गहरे घावो को भर देता है याग्नेश के साथ भी ऐसी हुआ ।

परंतु उसके घाव पूरी तरह तो नहीं भर पाए , कभी-कभी आज तक ईतने वर्षो बाद , भी उसे उसके दादा के मृत्यु का वह दृश्य सपनों में उसे डराते है।

समय आगे बढता गया , वहा के राजा और आश्रम के अनुयायियो ने सर्वसम्मति से विग्नेश को वहां के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया।।

अपने अतीत के बारे मे सोचते हुए याग्नेश उस टीले पर लेटा हुआ था के तभी आकाश में बादलों की गर्जना की आवाज के कारण वह अपने अतीत से बाहर आया, उसने एक नजर नगर में टिमटिमाते हुए मशालों पर डाली और एक गहरी सांस छोड़ी।

उस नगर का राजा और कुटिल मंत्री राजगुरु शायद इस समय अपने महंगे घरों में सुरक्षित और गर्म होकर सोए थे।
गजेन्द्र के अनुयायिओं के कुलपतियों की कमी नहीं थी।

नगर के मध्य में स्थित वहां के देवता के मुख्य मंदिर के शिखर पर जब उसकी नजर पड़ी तो उसके जबड़े क्रोध के कारण भी कि गए आंखें लाल हो गई जिस गजेंद्र को उसकी कई पीढ़ियां और नगर के सभी लोग सदियों से देवता मानकर पूजते थे क्या वह सही में कोई देवता है या कोई शैतान

आखिर उसकी पूजा करके उन्हें क्या मिला दुख दर्द अपनों से जुदाई और हृदय पर गहरे घाव।

याग्नेश जानता था कि देवता उसी को कहते हैं जो सबको निस्वार्थ भाव से अपनी करुणा देता है , उसे नही जो अपने मानने वालो को ही दुःख दे ।

उसका मानना था के यहां का देवता जिसने नगर वासियों की और उसकी खुशियां छीनी है वो कोई देवता नही हो सकता ।

उसने देवता गजेन्द्र के विरुद्ध युद्ध का मानो बिगुल फुंक दिया था और इस राह पर चलते चलते कब वह मानव से दानव बन गया था उसे पता ही नही चला, आज वह शक्तिया प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने अपने ही लोगो की बलीया चढा चूका था ।

याग्नेश के पिता आचार्य विघ्नेश जिन्होंने सदैव ही अपने ज्ञान अपनी शक्तियों का उपयोग जनकल्याण और पीड़ितों रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया, उन्हें भी अपने परिवार को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा अपने परिवार की रक्षा करते करते स्वयं भी अनजाने बीमारी का शिकार हो गए थे ।

उनके पिता अजीब बीमारी से मरने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के पश्चात अपनी बीमार मां के प्राणों की रक्षा के लिए याग्नेश ने पिता से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग किया परंतु सभी प्रयास उसके विफल रहे उसने देवताओं के कई अनुष्ठान किए प्रार्थनाये कि , देवताओं ने भी उनके जीवन के कई वर्ष ले लिए ।

शुरुआत में, लगा यह सब प्रार्थनाये काम कर रही हैं , और वह कुछ स्वस्थ भी हो गई थी । परंतु पुनः बीमारी वापस आ गई और याग्नेश के माता को निगल गई ।

जीवन में इतना कुछ सहने के पश्चात भी याग्नेश की धर्म के प्रति श्रद्धा आस्था कम नहीं हुयी , वो अपना कार्य निरंतर करता रहा और इसी के फलस्वरूप अपने पिता के पश्चात वहां के अनुयायियों ने याग्नेश को वहा के आचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया।
जीवन चक्र का पहिया एक बार फिर घुमा, इस बार याग्नेश की बहने उस अनजाने रोग से ग्रसित हो गई थी।

वह किसी भी प्रकार अपने माता पिता की तरह अपनी बहनों को खोना नहीं चाहता था, चाहे उसे इसके लिए कुछ भी करना पड़े ।
याग्नेश इस रोग का समूल नाश करना चाहता था उसे भय था के कही उसकी पत्नी नीरजा और उसका नन्ना सा पुत्र देव भी कहीं इस रोग की चपेट में ना आ जाए।

आचार्य के पद पर रहते हुए आचार्य याग्नेश ने देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के शीघ्र उपायों के बारे में अध्ययन किया जहां उसे देवताओं के प्रति किए गए बलिदान विधि की एक प्राचीन प्रतिलीपी कीसी के द्वारा प्राप्त हुई ।

प्राचीन प्रतिलिपि में जीव बली के द्वारा देवताओं की शक्ति प्राप्त करने के कई अनुष्ठानों की विधियां लिखी हुई थी,
याग्नेश ने जब उसे पढ़ा तब उसे प्रथम उस बात पर विश्वास नहीं हुआ देवता कैसे किसी की बलि से प्रसन्न हो सकते हैं ।

परंतु प्रतिलिपि देने वाला भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था वह क्यों उसे इस प्रकार की प्रतिलिपि देगा जिसका कोई उपयोग ना हो इस प्रतिलिपि में लिखे गए अनुष्ठानों को पढकर उसे एक आशा की किरण नजर आई जिससे वह इस अनजाने रोग के भय से निजात पा सकता था।

बहुत सोच समझ कर उसने इस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया परंतु वह इस बात को भूल गया कि बलिदान अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने को कहते हैं।

याग्नेश ने पहला मानव बलिदान एक महिला का किया जो बेघर थी और प्रार्थना करने के लिए उसके मंदीर में आई थी।

उसने अपने निजी कक्ष में उस महिला को भोजन की पेशकश की और अपनी बहनों के लिए प्रार्थना की उसके पश्चात् उसने महिला को सम्मोहीत करके गला रेत कर उसकी बली चढा दी , इस उम्मीद में कि एक जीवन दूसरे को बहाल कर सकता है।

देवताओं ने इस दिए गए बलिदान को स्वीकार नहीं किया। उस दिन से, साधारण प्रार्थनाओं ने भी उनके लिए काम करना बंद कर दिया था।

वह अब दिव्य दृष्टि का उपयोग नहीं कर सकता था या अपनी जीवन शक्ति का उपयोग करके चोटों को ठीक नहीं कर सकता था।

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।
आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

सभी पाठकों से निवेदन है कि उन्हें यह कहानी कैसी लग रही है यह बताएं और साथ ही साथ अपने अनमोल सुझाव दे ---
धन्यवाद 🙏🙏

अगला अपडेट जल्द ही कृपया प्रतीक्षा करें--

आपका अपना मित्र ------अभिनव🔥
Great story and great update with awesome writing skills bhai,
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Naik

Well-Known Member
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अध्याय - 7

अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी
" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "

इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई।

अब आगे ------


यह आवाज थी सेनापति समर सिंह की जो किसी समय में याग्नेश के युद्ध कला के गुरु रह चुके थे

समर सिंह--- मुझे दुख होता है यह सोच कर कि तुम जैसा व्यक्ति कभी मेरा शिष्य था , मैंने कभी सोचा नहीं था के तुम अधर्म के मार्ग चुनोगे और उस पर चलकर इतना आगे निकल जाओगे , अभी भी समय है याग्नेश, यह पाप पूर्ण मार्ग त्याग दो।

याग्नेश-- प्रणाम गुरुदेव , सर्वप्रथम आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें इतने समय पश्चात आपको देखकर बहुत अच्छा लगा आखिर किसी समय मैंने आपको अपने पिता तुल्य माना था।

समर सिंह-- मत कहो तुम मुझे अपना गुरुदेव तुम वह अधिकार खो चुके हो अभी भी समय है पुत्र तुम वापस लौट आओ यह पाप का मार्ग त्याग दो और अपने कर्मों का प्रायश्चित करो।

याग्नेश-- यह पाप पुण्य धर्म अधर्म का मुझे ज्ञान मत दो गुरुदेव मैं यह सब जानता हूं धर्म के मार्ग ने और मेरे पूर्वजों द्वारा पुण्यों ने आखिर दिया ही क्या है, आप मेरे लिए पूजनीय हैं इसलिए आप मेरे मार्ग से हट जाइए क्योंकि मैं नहीं चाहता क्यों मेरे द्वारा यहां होने वाले विनाश मैं मरने वालों मैं आपका भी नाम हो मुझे बहुत दुख होगा।

समर सिंह-- ठीक है तुम युद्ध ही चाहते हो तो युद्ध ही सही जरा देखे तो जादुई विद्याओं का प्रयोग करते करते युद्ध कला तो नहीं भूल गए

इतना कहकर सेनापति समर सिंह ने अपनी मयान से अपनी तलवार बाहर निकाल ली और उधर याग्नेश भी अपनी तलवार के साथ समर सिंह से युद्ध के लिए सज्ज हो गया
दोनों गुरु शिष्य युद्ध के मैदान में अब आमने-सामने थे जहां सेनापति ने सभी को दोनों के युद्ध में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया नहीं याग्नेश ने बिना काली शक्तियों के प्रयोग और उसके कवच के बिना युद्ध करने का निर्णय लिया।

राजा सुजान सिंह समेत वहां मौजूद सभी योद्धा इन दोनों के युद्ध के परिणाम को देखने के लिए उत्सुक थे।

समर सिंह ने आगे बढ़कर अपनी तलवार का प्रथम और भरपूर वार याग्नेश के सिर की तरफ किया और वही याग्नेश ने भी बड़ी फुर्ती के साथ अपनी तलवार से उस वार को रोककर साथ ही साथ अपनी तलवार घुमाकर समर सिंह के तलवार को झटका दिया और दूसरे हाथ से समर सिंह के सीने पर जोर से मुक्का मारा जिसके प्रभाव से वह कुछ कदम पीछे हटा।

समर सिंह-- बहुत खूब ! बहुत खूब ! दिख रहा है के तलवारबाजी का हुनर तुम भूले नहीं हो लो संभालो मेरे अगले बार को

इतना कहकर समर सिंह ने विद्युत किसी गति के साथ सीधी तलवार से याग्नेश के पेट की तरफ वार किया, परंतु याग्नेश ने भी इतनी फुर्ती के साथ अपनी तलवार को गोलाकार घुमाते हुए समर सिंह के वार को विफल किया और चकरी की तरह घूम कर समर सिंह के पीछे पहुंचकर अपने पैर से एक बार पुरवार उनकी कमर पर किया। यह सब इतनी तेजी के साथ हुआ था समर सिंह को संभलने का मौका नहीं मिला आगे जाकर मुंह के बल गिरा।

याग्नेश--- जब गुरु आपके जैसा सक्षम हो तो तलवारबाजी का हुनर मैं कैसे भूल सकता हूं परंतु लगता है कि आप अपना हुनर भूल गए हो खड़े हो जाइए गुरुदेव और सामना करिए।
याग्नेश की बात सुनकर समर सिंह बड़ी तेजी के साथ उठ खड़ा हुआ वह समझ गया था याग्नेश के साथ युद्ध करना इतना आसान नहीं है समर सिंह ने अपना ध्यान केंद्रित किया अपने संपूर्ण इंद्रियों को सजग किया जिससे वह याग्नेश के हर बार को समझ सके

समर सिंह--- यू मुझे बार-बार गुरुदेव मत कहो तुम्हारे जैसा नीच, अधर्मी , पापी और हत्यारा मेरा शिष्य नहीं हो सकता , अरे तुमने तो अपने पुर्वजो के आदर्शों की भी लाज नहीं रखी । अपने स्वार्थवश न जाने कितने बेगुनाहों की हत्या की।

समर सिंह के द्वारा कहे गए कटु वचनों को सुनकर याग्नेश को बहुत क्रोध आया जिससे वह अपना संतुलन खो बैठा यही तो समर सिंह भी चाहता था।

क्रोध के आवेग में याग्नेश ने समर सिंह को समाप्त करने के लिए छलांग लगाकर अपनी तलवार का वार समर सिंह के गर्दन की तरफ किया परंतु यहां समर सिंह भी पूरी तरह सचेत था कितनी गति से वार हुआ था उतनी ही गति से वह एक ओर हट गया और याग्नेश भूमि पर जोर से गिरा, समर सिंह याग्नेश को समझने का मौका नहीं देना चाहता था वह बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ा इससे पहले कि याग्नेश संभल पाता उसने जोरदार ठोकर याग्नेश की पसलियों में मारी जिससे याग्नेश वहा से उडकर पीछे जा गीरा।

समर सिंह शरीर से बहुत बलिष्ठ था शारीरिक बल के मामले में वह याग्नेश से दुगना शक्तिशाली था इस प्रकार से याग्नेश की पसलियों में तेज दर्द हुआ परंतु वह अपने दर्द को भूल कर इससे पहले कि समर सिंह उस तक पहुंचता वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ।
याग्नेश तेजी से समर सिंह की ओर बढ़ा और तलवार को विद्युत गति से घुमाता हुआ प्राण घातक वार करने लगा उसके प्रत्युत्तर में समर सिंह एकाग्रचित मन के कारण उसकी हर बार को सहजता से विफल कर रहा था दोनों योद्धाओं की तलवारों की टंकार वातावरण में गूंज रही थी बाकी सभी योद्धा अपनी सांस थामे देख रहे थे।

अति व्यग्रता और क्रोध के कारण याग्नेश का हर वार विफल हो रहा था , के तभी
समर सिंह ने तेजी से घूम कर याग्नेश के बाजू पर तलवार से वार किया जिससे बाई बाजू जख्मी हो गई।

इसी घाव के साथ याग्नेश को अपनी भूल का अंदाजा हो गया की व्यग्रता के साथ लड़ा गया कोई भी युद्ध जीत तक नहीं ले जाता अब उसने भी अपने मन को एकाग्र किया अपनी इंद्रियों को संयत करके अपने घाव के दर्द को भुलाकर वह किसी चक्कर की तरह घूमता हुआ और साथ ही साथ अपनी तलवार को घुमाता हुआ समर सिंह की और बढा।

याग्नेश में आए हुए इस बदलाव को देखकर समर सिंह के चेहरे पर मुस्कान उभर आई वह भी अपनी तलवार लेकर याग्नेश के वार का प्रत्युत्तर देने लगा।

तभी समर सिंह ने नीचे झुक कर अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश के पैरों की तरफ किया याग्नेश ने भी छलांग लगाकर उस वार से अपना बचाव किया और साथ ही साथ समर सिंह के हाथ पर जोरदार ठोकर मारी जिसे समर सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई।

तलवार के भूमि पर गिरते ही इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता समर सिंह ने भी हवा में उछल कर कलाबाजी या खाता हुआ याग्नेश के दाई और से उसकी कलाई पर प्रहार किया जिससे याग्नेश की भी तलवार भूमि पर गिर गई।


अब दोनों योद्धा मल्ल युद्ध करने लगे एक दूसरे पर लात घूसों के दाव पेच आजमाने लगे दोनों किसी मतवाली हाथी की तरह एक दूसरे से टकरा रहे थे।

अभी दोनो लड ही रहे थे के अचानक कड़क की आवाज के साथ किसी की चीखने की भी आवाज आई यह आवाज की समर सिंह की।

हुआ यूं के मल्लयुद्ध के दौरान समर सिंह ने जैसे ही जोरदार मुक्का याग्नेश के सीने में मारना चाहा तब याग्नेश ने बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह की कलाई पकडी और पूरी वेग के साथ घुमा दी जिससे समर सिंह हवा में घूमता हुआ भूमि पर आ गिरा उसके हाथ की हड्डी टूट चुकी थी समर सिंह की भूमि पर गिरते ही याग्नेश ने एक जोरदार ठोकर समर सिंह की पसलियों में मारी जिससे उसकी कई पसलियां टूट गई अब समर सिंह हिलने की भी हालत में नहीं रहा, और मूर्झीत हो गया।

समर सिंह को धराशाई होता हुआ देखकर राजा सुजान सिंह सभी योद्धा और सैनिक जो इस द्वंद्व को देख रहे थे वह सचेत हो गए क्योंकि वह जानते थे के याग्नेश को रोकना बहुत कठिन होगा।

समर सिंह के धराशाई होते ही याग्नेश ने सुजान सिंह की ओर देखा।

याग्नेश सुजान सिंह अब अपने किए हुए हर अपराध का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ आज तुम्हें मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता तुम्हारा सेनापति तो धराशाई हो गया अब और कोई बचा है जो मेरा सामना कर सके तो उन्हें भी भेजो

इतना कहकर याग्नेश अपनी तलवार संभाल कर सुजान सिंह की और बढा जब सुजान सिंह के अंगरक्षको ने याग्नेश को अपने राजा की ओर बढ़ता हुआ देखा जो गिनती में लगभग 100 के बराबर थे उनमें से लगभग 50 योद्धाओं ने राजा के चारों तरफ एक घेरा बना लिया और बाकी बचे 50 अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।


उधर यागनेश भी किसी चक्र की मानिंद घूमता हुआ और तलवार घुमाता हुआ आगे बढ़ा और देखते ही देखते कुछ ही पल में आगे आ रहे दो अंग रक्षकों के सिर भूमि पर उसकी तलवार से कट कर गिर चुके थे , तब तक याग्नेश के पीछे चार अंगरक्षक पहुंच गए थे और उन्होंने एक साथ उसके ऊपर वार किया।

इंद्रियों के सजग रहने के कारण याग्नेश को इस बार का पता चल गया और उसने नीचे बैठकर अपनी तलवार ऊपर उठा दिया और उनके वारो को रोक दिया और साथ ही साथ बड़ी फुर्ती से घूम कर उन चारों के पैर काट दिए , पैरों के कटते हैं कि वो चारों किसी कटे हुए वृक्ष की भांति वह चारों धड़ाम से धरती पर आकर गिरे।

अपने साथियों की ऐसी हालत देखकर बाकी बचे हुए सभी योद्धाओ ने एक साथ याग्नेश के ऊपर छलांग लगा दी, इतने योद्धाओं के एक साथ टकराने से याग्नेश अपना संतुलन खो बैठा और भूमि पर जा गिरा सभी योद्धाओं ने मिलकर याग्नेश को अपने नीचे दबा दिया था, वहां मानो मानव शरीर का एक छोटा सा टीला सा बन गया था।

इस दृश्य को देखकर सुजान सिंह बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आगे बढ़ने वाला था यह तभी उस मानव टीले के नीचे जहां याग्नेश दबा पड़ा था, एक तेज नीली रोशनी चमकी और देखते ही देखते वो सभी योद्धा जो याग्नेश को अपने नीचे दबाए हुए पड़े थे वह हवा में तैरते हुए भूमि पर गिर पड़े मानो घास के तिनको को हवा के झोंके ने उड़ा कर फेंक दिया हो।

याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----

आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शिघ्र ही🙏 -----
सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि वह इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव अवश्य दें 🙏🙏🙏🙏-----
आप सभी के प्रेम और साथ का अभिलाषी 💐💐💐💐

आपका अपना मित्र --- अभिनव🔥
Giru ji apne hi chele se haar gaye chela tow bahot takatwer nikla Yagnesh jab jeetne wala tha yeh adrish urja kaha se gayi jiski qaid m yagnesh aa gaya
Dekhte h kon samne aata h kahi samar singh hi tow nahi
Shaandaar lajawab update bhai
 

Naik

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अध्याय -- 8

याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----

अब आगे -----


ऊर्जा पाश में बंधा हुआ याग्नेश अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा था, उसे आश्चर्य हो रहा था यह इतना शक्तिशाली ऊर्जा पाश जो उस की काली शक्तियों के कवच को भी भेद सकता है यह किसके द्वारा प्रयोग किया गया है । के तभी सामने से आते हुए युद्धवीर सिंह क्यों पर उसकी दृष्टि पड़ी।

युद्धवीर सिंह को देखकर याग्नेश के मुख पर व्यंगात्मक मुस्कान उभरी

याग्नेश-- ओह ! तो युद्धवीर सिंह तुम भी यहां उपस्थित हो अच्छा है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो मैं यमलोक भेज चुका हूं अब तुम भी यमलोक में उनके पास जाने के लिए सज्ज हो जाओ।

युद्धवीर सिंह -- हा हा हा ! मेरे पिता की हत्या करके तुम क्या सोचते हो मेरी भी हत्या कर दोगे , यह इतना आसान नहीं है याग्नेश। प्रतिशोध तो मैं लूंगा तुमसे अपने पिता की हत्या का , मेरी बहन के अपहरण का। कुछ जादुई शक्तियों का उपयोग करके तुम अपने आप को शक्तिशाली समझ रहे हो देखो मेरे छोटे से पास में तुम्हारी क्या दशा कर दी अब अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ।

इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपनी तलवार लेकर याग्नेश की और बड़ा ही था कि याग्नेश ने अपने हाथों को झटका दिया और ऊर्जा पाश से मुक्त हो गया । इससे पहले कि युद्धवीर सिंह याग्नेश पर कोई वार करता याग्नेश ने तेजी से उसे उठाकर दूर फेंक दिया


याग्नेश -- बच्चे हो तुम मेरे सामने अभी युद्धवीर सिंह ! तुम क्या सोचते थे कि यह ऊर्जा पाश मुझे बान्ध सकता है , याग्नेश हूं मै , यह छोटे मोटे पाश मेरा कुछ नही बीगाड सकतें , मैं तो बस तुम्हे सामने लाने के लिए बन्ध गया था ।

इतना कहकर याग्नेश ने नीले रंग के प्रकाश का एक गोला युद्धवीर सिंह की ओर फेंका, परंतु युद्धवीर सिंह भी कोई कम नहीं था उसने उतनी ही तेजी दिखाकर अपने स्थान से छलांग लगाकर याग्नेश के वार से बच गया और साथ ही साथ एक श्वेत ऊर्जा का गोले से याग्नेश पर प्रहार किया।

याग्नेश ने उस उर्जा के गोले के प्रहार को अपनी उर्जा से काट दिया और साथ ही साथ अपने दोनों हाथ युद्धवीर सिंह की ओर झटके जिससे असंख्य छोटे-छोटे चक्र तेजी से घूमते हुए युद्धवीर सिंह की ओर बढ़े ।
इधर युद्धवीर सिंह ने भी अपने दोनों हाथों को घुमा कर वायु का एक बड़ा गोला तैयार किया और चक्रों की दिशा में प्रहार किया, वायु का वह गोला उन सारे चक्रों को अपने में समाता हुआ याग्नेश की और बड़ा और बड़ी तेजी से टकराया।


वह चक्र याग्नेश की ही काली ऊर्जा से निर्मित थे , इस कारण उन चक्रों के टकराव से याग्नेश का कवच कई जगह से फट गया और उसके शरीर पर काफी घाव हो गए।
युद्धवीर सिंह का इस प्रकार उसके किए गए वार का प्रतिकार करना याग्नेश के लिए आश्चर्यजनक था याग्नेश युद्धवीर सिंह केबल और शक्ति के बारे में जानता था परंतु उसका सामना आज जिस युद्धवीर सिंह से हो रहा था वह सर्वथा भिन्न था।

याग्नेश जानता था कि यह समय विचार करने का नहीं युद्ध करने का है इसलिए अपने मन में आ रहे सभी विचारों को शांत करके एक बार फिर याग्नेश युद्ध के लिए सज्ज हो गया।
परंतु इतनी देर में युद्धवीर सिंह ने अपना अगला वार कर दिया था याग्नेश युद्धवीर सिंह की और बड़ा ही था की एक विद्युत किरण उसके सीने से टकराई जिसके प्रभाव से वह कुछ दुर पीछे गिरा।

परंतु याग्नेश भी कोई साधारण योद्धा नहीं था गिरते-गिरते भी उसने बड़ी तीव्रता के साथ अपनी उर्जा का प्रहार युद्धवीर सिंह की ओर किया।
अपने किए गए प्रहार की सफलता देखकर युद्धवीर सिंह प्रसन्न हो ही रहा था के याग्नेश की उर्जा उसके सीने से टकराई और एक धमाका हुआ जिससे वह उड़ते हुए दूर जा गिरा।

याग्नेश के इस वार से युद्धवीर सिंह बुरी तरह से घायल हो गया था , उसके सारे शरीर में भयंकर पीड़ा होने लगी थी।

अपने दर्द पर काबू पाता हुआ वह लड़खड़ाते हुए कदमों से खड़ा हुआ ही था के
युद्धवीर सिंह को समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपना अगला वार कर दिया ।

अनेक प्रकार के अस्त्र तीव्र गति से युद्धवीर सिंह की ओर बढ़ रहे थे, घायल अवस्था में भी युद्धवीर सिंह पूरी तरह से सजग था, अपनी ओर आते हुए अनेक घातक शस्त्रों को रोकने के लिए युद्धवीर सिंह ने अपना हाथ आगे करके एक मोटी सी ऊर्जा की ढाल बनाई । वह सारे शस्त्र उस उर्जा की परत से आकर टकराई।


युद्धवीर सिंह उन शस्त्रों को अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर रोक रहा था, जब उसे अंदाजा हुआ के वह श्वेत ऊर्जा द्वारा इन घातक अस्त्रों को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकता तब उसने अपनी आंखें बंद कर ली और कुछ बुदबुदाने लगा , कुछ ही पलों में उसने अपनी आंखें खोली अब उसकी आंखों का संपूर्ण रंग काला हो गया था।

उसके शरीर से गहरे नीले रंग की उर्जा किरणे निकलने लगी थी । उस ऊर्जा की किरणों का उन घातक अस्त्रों के साथ संपर्क होते ही वह सारे अस्त्र दूर से झीटक कर गिर गए ।
उस गहरे नीले रंग की उर्जा के प्रभाव से अब वीर सिंह के सारे घाव अब ठीक हो चुके थे। जिसे देखकर याग्नेश के आश्चर्य की सीमा नहीं रही क्योंकि वह उस नीले रंग की ऊर्जा को पहचानता था, क्योकि यह उर्जा किसी देवता की नही उसके मालिक जिसकी वह उपासना करता था उस ईब्लिस की थी।


अब युद्धवीर सिंह ने अपनी उसी उर्जा का वार याग्नेश पर किया, याग्नेश ने भी बड़ी तीव्रता के साथ इस वार का प्रत्युत्तर दिया और उसके वार को नष्ट किया,

अब दोनों ओर से काली शक्तियों की ऊर्जा के प्रहार हो रहे थे, दोनों में से कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा था , सतत दोनो ओर से काली उर्जाओ के टकराने से वहां की सारी सकारात्मक उर्जाएं नष्ट हो रही थी।

वहां चारों ओर नकारात्मक शक्ति फैलने लगी थी। जिसका प्रभाव वहां खड़े हुए योद्धाओं के मन पर पढ़ रहा था।
वहां खड़े योद्धा और सैनिक जो याग्नेश और युद्धवीर सिंह दोनों काली शक्तियों के धारक के टकराव को देख रहे थे , उन में अब दो दल बन गए थे

जहां एक दल शोर मचा कर याग्नेश का समर्थन कर रहा था वही दूसरा दल युद्धवीर सिंह के जयकारे लगाकर समर्थन कर रहा था।

जैसे-जैसे दोनों का युद्ध और गहरा होता जा रहा था वैसे वैसे वहांकि नकारात्मकता भी बढती जा रही थी , जिसके प्रभाव के कारण उन दोनों दलों की व्यग्रता भी बढ़ती जा रही थी ।

उस प्रभाव में आकर वह दोनों सैनिको के दल आपस में ही भिड़ गए और एक दूसरे को मारने लगे, एक-एक करके वह सभी मृत्यु की आगोश में जा रहे थे उनके शरीर के कटे हुए अंग और बहता हुआ रक्त उनकी वह चीख पुकार वहां के वातावरण को और भयावह बना रही थी।


अब तक के युद्ध से याग्नेश इस बात को जान गया था कि केवल काली शक्तियों के प्रहार से वह युद्धवीर सिंह से नहीं जीत सकता , इसलिए अब उसने अपने पिता द्वारा सिखाई गई पंच तत्वों की उर्जा का काली शक्तियों के साथ सम्मीश्रण करके प्रयोग करने का निर्णय लिया।

आचार्य पद के जाने के बाद याग्नेश ने अपने पिता द्वारा सिखाए गए श्वेत ऊर्जा और पंच तत्व के प्रयोग की कलाओं को याग्नेश ने त्याग दिया था क्योंकि यह सब सात्विक प्रयोग थे।

काली शक्तियों का धारक होने के कारण वह श्वेत ऊर्जा का प्रयोग तो नहीं कर सकता था , परंतु पंचतत्व की ऊर्जा का अवश्य प्रयोग कर सकता था , क्योंकि सभी शरीर धारी पंचतत्व की उर्जा के धारक होते हैं जहां यह ऊर्जा समाप्त होती है वही जीवन भी समाप्त हो जाता है।

याग्नेश ने अब वायु जल और पृथ्वी तत्व और अब सम्मिलित उर्जा का प्रयोग करके एक विशाल चक्रवात का निर्माण किया जिसमें उसने विद्युत तरंगों का भी प्रयोग किया।
वह चक्रवात तेजी से आगे बढ़ता हुआ युद्धवीर सिंह को अपने में समा गया,

युद्धवीर सिंह ने उस चक्रवात से निकलने का भरसक प्रयास किया , परंतु उसके सभी प्रयास विफल हो गए।


उस तेजी से घूमते हुए चक्रवात में भूमि तत्वों से निर्मित विशाल शिलाखंड और जल तत्व और वायु तत्व के सहयोग से बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े टकराने से युद्धवीर सिंह का शरीर कई जगह से घायल हो गया था।

अत्यंत पीड़ा का अनुभव करते हुए और उस चक्रवात में घूमते हुए युद्धवीर सिंह मृत:प्राय हो गया था।

उसकी सांसे बहुत धीमी गति से चलने लगी कुछ ही क्षणों में वह निर्जीव सा हो गया और देखते ही देखते हुए चक्रवात भी शांत हो गया ।
चक्रवात के शांत होते ही युद्धवीर सिंह का शरीर धड़ाम से भूमि पर आकर गिरा युद्धवीर सिंह के शरीर को क्षत विक्षत अवस्था में भूमि पर अचेत अवस्था में पड़ा देखकर , याग्नेश के चेहरे पर मुस्कान उभर आई उसे मृत समझकर याग्नेश अपने अगले शत्रु राजा सुजान सिंह की ओर बढ़ गया।

राजा के अंगरक्षक पहले ही याग्नेश और युद्धवीर सिंह के काली शक्तियों के प्रयोग से उत्पन्न होनेवाली नकारात्मक ऊर्जा की भेंट चढ़ गए थे ।

याग्नेश को अपनी और बढ़ता हुआ देखकर सुजान सिंह भय के मारे थर-थर कांपने लगा। उसने अपनी मदद की आशा से चारों ओर नजर दौड़ाई ,परंतु निराशा ही हाथ लगी , क्योंकि वह इस समय अकेला ही सही सलामत युद्ध भूमी पर खड़ा था।


एक ओर सेनापति समर सिंह अभी भी मूर्छित अवस्था में भूमि पर पड़े थे , तो दूसरी ओर युद्धवीर सिंह भी मृतप्राय अवस्था में भूमि पर अचेत पड़ा हुआ था । उसके सारे सैनिक और अंगरक्षक एक दूसरे को समाप्त कर चुके थे, उसके महामंत्री और राजगुरु का दूर-दूर तक पता नहीं था , शायद मृत्यू के भय से पलायन कर गये हो । चारों ओर लाशों के ढेर और रक्त के कीचड़ के बीच में सुजान सिंह अकेला खड़ा था।

सुजान सिंह को भय के मारे थरथर कांपता हुआ देखकर याग्नेश जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगा , उसकी वह भयावह हंसी सुनकर सुजान सिंह का रंग पीला पड़ गया।

याग्नेश -- सुजान सिंह ! देखो अपने चारों ओर है कोई जो तुम्हारी रक्षा करने वाला हो, अब अपने किए गए अपराधों का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।

सुजान सिंह -- मुझे क्षमा कर दो याग्नेश ! तुम जैसा बोलोगे वैसा ही मैं करूंगा, तुम चाहो तुम मेरा सारा धन ले लो परंतु मुझे जीवनदान दे दो, मैं अपने किये अपराधों का प्रायश्चित करना चाहता हूं । कृपया मुझे बस एक अवसर देदो।

याग्नेश -- क्षमा कर दो ! तुम्हें लज्जा नहीं आई सुजान सिंह क्षमा मांगते हुए , मेरे पिता तुम्हें भी अपने पुत्र के समान मानते थे, उनके प्रति किए गए विश्वासघात के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ?
मेरे दादाजी की मृत्यु के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ? मेरे कुल का सर्वनाश का कारण बनने के लिए क्षमा कर दूं ?

आज मैं जहां खड़ा हूं उसका केवल एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वह हो तुम इसलिए अपना दंड पाने के लिए सज्ज हो जाओ।
और इस प्रकार क्षमा दान मांग कर अपने गुरु और मेरे पिता की दी हुई शिक्षा को कलंकित मत करो संभालो अपनी तलवार और मेरा सामना करो।


इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा ।

सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा के-----


मित्रों आज के लिए इतना ही ---अगला अपडेट जल्दी ही-----

आप सभी पाठको से अनुरोध है के इस कहानी पर अपने सुझाव और प्रतिक्रिया अवश्य दें 🙏🙏,

आपके सहयोग का अभिलाषी

आपका मित्र -- अभिनव 🔥
Bahot behtareen shaandaar update bhai
Yagnesh tow sab per bhari h takker tow sab de rehe h lekin ziada dair joyi tikta nahi h sujan singh tow ek jhatke m khatam ho gaya lelin mia aisa huwa h ya fir ek jhalawa h Yagnesh k liye
Baharhal dekhte h aage kia hota h
 

Naik

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अध्याय - 9

इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा । सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा था के-----------

अब आगे ---------


देखते ही देखते सुजान सिंह का शरीर धुएं में परिवर्तित होने लगा । याग्नेश अभी कुछ समझता के इससे पहले उस धूए ने उसे चारों ओर से घेर लिया । अब वह धूआ लोहे की मजबूत पिंजरे में बदल चुका था ।
जिसमें याग्नेश कैद हो चुका था , इस प्रकार की अद्भुत माया याग्नेश पहली बार देख रहा था।

इस प्रकार की अद्भुत माया कौन हो सकता है इस बारे में याग्नेश सोच ही रहा था कि उसे किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। पिंजरे में कैद याग्नेश में जब सामने की ओर देखा तो उसे राजा सुजान सिंह महामंत्री विरूपाक्ष और राजगुरु विद्याधर को आते हुए दिखे

उन तीनों को सामने से आता हुआ देखकर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया और वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयत्न करने लगा परंतु जैसे ही वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयास करता उसे तेज झटके लगते।

सुजान सिंह - हंसी आती है मुझे याग्नेश तुम्हारी दशा देखकर , देखो किस प्रकार कैद में किसी पंछी की भांति फड़फड़ा रहे हो। तुम कितनी भी कोशिश कर लो इस कैद से बाहर नहीं आ पाओगे क्या सोचा था तुमने फिर तुम मुझे इतनी सरलता से मार दोगे मत भूलो मैं सुजान सिंह हूं देव नगर का राजा, कोई साधारण सैनिक नही जीसे तुम आसानी से मार दोगे।

याग्नेश - सुजान सिंह तुम्हारा यह मायावी पिंजरा मुझे ज्यादा देर तक कैद नहीं रख सकता अच्छा हुआ तुम तीनों एक साथ मेरे सामने आ गए , बचपन की मित्रता को याद करते हुए मैंने सोचा था कि तुम्हें सरल नंबर क्यों दूं परंतु अब नहीं और अच्छा हुई हुआ फिर तुम अपने साथ राजगुरु को भी ले आए।

राजगुरु विद्याधर -- कैसे ना आता मेरे बच्चे ! तुम्हें अंतिम विदाई देने के लिए तो आना ही था । आखिर तुम मेरे प्यारे विग्नेश के पुत्र जो ठहरे , मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस दशा में देखकर । चिंता मत करो तुम्हें अब शीघ्र ही इस असहनीय दु:ख से मुक्ति मिलने वाली है।


याग्नेश -- मत लो अपने गंदी जुबान से मेरे पिता का नाम । मेरे दादा ने तुम्हें अपना भाई माना था मेरे पिता भी आपको अपने पिता तुल्य मानते थे। ना जाने क्या क्यों और कैसे आपने मेरे परिवार के साथ विश्वासघात किया , परंतु अब तक इतना मैं जान चुका हूं, मेरे परिवार की दुर्दशा मैं सबसे बड़ा हाथ आपका ही है। जितनी पीडा तुम तीनो ने मुझे दी है उससे कई गुना अधिक पीडा मै तूम तीनो को दूंगा।

राजगुरु - ऐसा मत कहो पुत्र मुझे सच में तुम्हारे परिवार के लिए दुख होता है , परंतु अब तुम्हारे सारे दुखों के समाप्त होने का समय आ गया ।

इतना कहकर राजगुरु ने एक इशारा किया और इसके साथ ही वहां 10 धनुर्धर आ गए राजा सुजान सिंह का इशारा पाते ही सभी धनुर्धरोंने याग्नेश की और अपने तीरो की बरसात कर दी अभी वह तीर याग्नेश तक पहुंच पाते एक धमाके के साथ लोहे के पिंजड़े के चिथड़े उड़ गए जो सामने धनुरधरों से इतनी तीव्रता के साथ टकराए के वे दसों धनुर्धर वहीं ढेर हो गए ।

याग्नेश को इतनी सहजता के साथ पिंजरे से मुक्त हुआ होता हुआ देखकर सुजान सिंह राजगुरु और महामंत्री को बड़ा आश्चर्य हुआ मायावी पिंजरे के धमाके मैं नष्ट होने से जो धुआं उठा था उसके छटते ही उन तीनो ने याग्नेश को देखा इस समय याग्नेश की आंखें नीले प्रकाश से चमक रही थी उसके शरीर से निकलता हुआ नीला प्रकाश उसके चारों ओर एक घेरा बना रहा था

याग्नेश -- क्यों सुजान सिंह क्या हुआ इस तरह मुझे आंखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो और राजगुरु तुमने क्या सोचा था कि आपने इस तरह के छोटे-मोटे जादुई प्रयोग करके तुम मुझे कैद कर लोगे, हा हा हा (हसते हुए) यदि और भी कोई प्रयोग करना हो तो कर लो क्योंकि अब ज्यादा समय तुम्हारे पास नहीं रहा।


इतना कहकर याग्नेश तीव्र गति से सुजान सिंह की और बढ़ा , इससे पहले कि सुजान सिंह अपनी रक्षा के लिए कुछ कर पाता याग्नेश ने उसे गर्दन से उठाकर जोर से जमीन पर पटक दिया , यह सब इतनी तेजी से हुआ और सुजान सिंह भूमी पर इतनी तीव्र गति से टकराया था के एक पल तो उसे समझ ही नही आया के अचानक क्या हुआ । उसके शरीर मे भयंकर पीडा हो रही थी ।
उसे समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपने मयान से तलवार बाहर निकाल ली और सुजान सिंह को समाप्त करने के लिए जैसे ही उसने तलवार हवा में उठाई, उसी पल एक भाला तीव्र गति से आकर उसकी पीठ से टकराया।


इस समय याग्नेश की सारी काली शक्तियां जागृत थी , इसलिए वह भाला याग्नेश की पीठ में प्रवेश नहीं कर पाया।
चुपके से वार करने वाला कौन है , यह देखने के लिए याग्नेश ने पलट कर देखा कौन से वहां थोड़ी ही दूर पर महामंत्री विरुपाक्ष नजर आया

याग्नेश को अपनी ओर देखते हुए देखकर विरुपाक्ष भय से कांप गया उसे अपनी मृत्यु सामने साक्षात नजर आने लगी वह तुरंत घूम कर वहां से भागने लगा, परंतु याग्नेश उसे भागने नहीं देना चाहता था याग्नेश उसी का फेंका हुआ भाला उठाया और निशाना साधा और महामंत्री विरुपाक्ष पर फेंक दिया। वह भाला तीव्र गति से जाकर महामंत्री विरुपाक्ष के पीठ से होकर सीने से आर पार हो गया और एक भयंकर चीख के साथ महामंत्री विरुपाक्ष वही धराशाई हो गया।

महामंत्री विरुपाक्ष को मौत के घाट उतारने के पश्चात याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ गया, तब तक सुजान सिंह भी संभाल कर खड़ा हो चुका था। इतनी आसानी से हार मानने वालो मे सुजान सिहं नही था , वह शारीरिक बल और युद्ध कला में याग्नेश से किसी भी तरह कम नही था ।

सुजान सिंह को संभल कर खड़े होते हुए देखकर याग्नेश मुस्कुराया

याग्नेश -- संभालो अपनी तलवार सुजान सिंह और मेरा सामना करो मैं एक निहत्थे असहाय कि हत्या नहीं करना चाहता, तुम्हें मारते वक्त मुझे भी ऐसा लगना चाहिए कि मैं एक दयनीय असहाय व्यक्ति का नहीं देव नगर के राजा का वध कर रहा हूं।

सुजान सिंह ने भी अब तक अपनी तलवार मयान से बाहर निकाल ली थी दोनों योद्धा अपनी अपनी तलवार लेकर एक दूसरे से भिड़ गए।

जहां सुजान सिंह ने अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश की गर्दन की तरफ किया, तो वही याग्नेश ने भी बड़ी सरलता से उस वार को अपनी तलवार पर रोक दिया और साथ ही साथ घुमाते हुए सुजान सिंह को पीछे की ओर धक्का दिया,

याग्नेश ने भी सुजान सिंह के पेट की ओर अपनी तलवार से वार किया , तो वही सुजान सिंह ने भी कलाबाजियां खाकर बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश की कलाई पर वार किया जिससे काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर कोई असर नही हुआ ।

अब याग्नेश भी अपनी तलवार को किसी चक्र की मांनींद तीव्र गति से सुजान सिंह की ओर बढ़ा और बडी फुर्ती से उसके वार से बचते हुए एक वार उसकी बाजू पर और दूसरा उसके पीठ पर कीया जिससे सुजान सिंह घायल हो गया।


अपने किसी भी प्रहार का काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर ना होता हुआ देखकर सुजान सिंह अपनी तलवार नीचे किए घुटने के बल जमीन पर बैठ गया, सुजान सिंह को इस प्रकार अपने हथियार डाल कर जमीन पर बैठा हुआ देखकर याग्नेश मुस्कुराया।

याग्नेश -- बस इतना ही जोर था तुममे सुजान सिंह ! तुम अपने आप को देवनगर का राजा कहते हो , इतना कमजोर राजा जो मेरे सामने थोड़ी देर भी टिक नहीं पाया।

सुजान सिंह -- बल और युद्ध कौशल में मैं किसी भी प्रकार तुम से कम नहीं हूं , यह तुम भी अच्छी प्रकार जानते हो, तुम मुझे कह रहे हो परंतु सच तो यह है कि तुम्हें अपने बल और युद्ध कौशल पर विश्वास नहीं है , इसलिए तुमने अपने आपको काली शक्तियों के कवच से सुरक्षित कर रखा है, इस प्रकार का युद्ध करने का क्या लाभ जब सामने वाला तुम्हारी किसी भी प्रहार से आहत ना हो ।
इसलिए लो मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत हूं कर दो मेरी हत्या यही तो तुम भी चाहते हो मुकाबले का अवसर देना तो बस तुम्हारा एक दिखावा है।


ऐसा कहकर सुजान सिंह ने याग्नेश के अहंकार पर चोट की और निशाना भी सही लगा सुजान सिंह की बात सुनकर याग्नेश ने अब अपना काली शक्तियों का कवच हटा दिया।

याग्नेश -- तुम्हें हराने के लिए मुझे इस कवच की कोई आवश्यकता नहीं है , लो अब मैंने कवच हटा दिया अब सामना करो मेरा।
याग्नेश के द्वारा कवच के हटाए जाने पर सुजान सिंह एक बार फिर अपनी तलवार लेकर सज्ज हो गया दोनों योद्धा किसी मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भीड गए थे, ना कोई किसी से कम ना कोई किसी से ज्यादा ।

यहां दूसरी ओर राजगुरु विद्याधर अब तक समझ चुके थे सुजान सिंह अकेले याग्नेश का सामना ज्यादा देर तक, नहीं कर सकते और यदी वो राजा की सहायता करने जाता है तो ऐसी स्थिती में याग्नेश भी अपनी काली शक्तियों का प्रयोग करेगा अब तक राजगुरु याग्नेश की शक्तियों को देखकर इतना तो समझ ही चुके थे कि वह उसकी शक्तियों का अकेले सामना नहीं कर सकते

राजगुरू जानते थे के युद्धवीर सिंह की सहायता के बीना वो इस समय याग्नेश को नहीं रोक सकते ।

इसीलिए राजगुरु उस ओर चल पड़ा जहां अभी भी युद्धवीर सिंह भूमि पर पड़ा था, युद्धवीर सिंह को भी अब तक होश आ गया था वह बड़ी कठिनाई से उठने का प्रयत्न कर रहा था , युद्धवीर सिंह को जीवित देखकर राजगुरु की जान में जान आई उसने आगे बढ़ कर युद्धवीर सिंह को सहारा देकर बैठा दिया

राजगुरु -- शुक्र है युद्धवीर सिंह कि तुम सही सलामत हो , तुम्हारी सहायता के बिना याग्नेश को रोकना संभव है।


युद्धवीर सिंह -- राजगुरु यहां मैं खड़ा होने में भी असमर्थ हो रहा हूं और आप कह रहे हो कि मैं याग्नेश का सामना करो , क्षमा करें राजगुरु परंतु अब मैं इस स्थिति में नहीं हूं क्या आपकी कोई सहायता कर सकूं। परंतु आपको मै इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता बता सकता हूं जो शायद आप भूल गए हो।

राजगुरु -- कैसा रास्ता , इस समय यूं पहेलीयों मे बात मत करों , स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो , जरा विस्तार से बताओ।

युद्धवीर सिंह -- राजगुरु आप शायद छोटी रानी को भूल गए हो, एक वही है जो इस समय राजा की रक्षा कर सकती है।

राजगुरु -- बात तो तुम्हारी ठीक है परंतु छोटी रानी तो वर्षों पहले अपने नन्हे कुमार के साथ महल को छोड़कर चली गई थी और वह अब इस समय कहां है किसी को नहीं पता।

युद्धवीर सिंह -- यही तो फर्क है आप में और मुझ में राजगुरु, जीवन मे सफल होने के लिए दुरदर्शीता होना आवश्यक हैं । मुझे पहले ही पता था के इस प्रकार की परिस्थिति सामने आ सकती हैं , इसलिए मैंने पहले ही उन्हें ढूंढ निकाला है, इसलिए अब ज्यादा देर मत करो और शीघ्र जाओ महल के तहखाने में स्थित कैद में तुम्हें वह मिल जाएगी।

युद्धवीर सिंह की बात सुनकर राजगुरु ने तुरंत महल की ओर दौड़ लगा दी।



यहां सुजान सिंह और याग्नेश का युद्ध अपने चरम सीमा पर था, दोनों इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो चुके थे याग्नेश के प्रभावशाली वार को सहते सहते सुजान सिंह के शरीर की शक्ति कम हो गई थी, वह बुरी तरह थक चूका था, और इसी बात का फायदा उठाकर याग्नेश ने अपनी शक्ति एकत्रित करके अपनी जगह से उछलकर अपने दोनों पैरों का वार सुजान सिंह के सीने पर किया जिससे सुजान सिंह भूमि पर गिर गया।

याग्नेश ने अपना अंतिम वार करने के लिए सुजान सिंह के सीने पर पैर रखा हर तलवार हवा में उठाई ही थी की इससे पहले कि वह सुजान सिंह पर वार करता राजगुरु की आवाज वहां गूंज उठी।

राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश सुजान सिंह को मारने से पहले जरा एक बार यहां देख लो कहीं ऐसा ना हो कि बाद में तुम्हें पछताना पड़े।

राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।

आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शीघ्र ही ---
आप सब पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस कहानी के प्रति अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें ।🙏🙏💐💐💐💐
आपके सहयोग का अभिलाषी

आपका मित्र - अभिनव🔥
Tow woh ek jhalawa hi tha yagnesh samajh raha tha ki sujan sing mara gaya lekin woh khud qaid m aa gaya
Halanki woh qaid m ziada dair nahi raha or sujan Singh k saath ek baar for talwar baji suru huwi jisme jeet uski pakki tho lekin Rajguru chhoti rani ko leker aa gaye shayad
Baharhal dekhte h kisko dekh ker yegnesh ki aa kho aansu ki dhara beh niki or muh se koyi bol nahi foot rehe
Bahot khoob shaandaar update bhai
 
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