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तो अभी छल से लड़ रहा है राजा और शायद जीत भी जाए क्योंकि यग्नेश अपनी शक्तियों के अंहकार में है। उपर से राज्य के सारे योद्धा उसके विरुद्ध। ये छोटी रानी और उनका बेटा शायद यग्नेश के बीवी और बेटा है और उसको इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए लाए है। मगर क्या इससे यग्नेश सुजान सिंह और राजगुरु को छोड़ देगा? सुंदर अपडेट।अध्याय - 9
इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा । सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा था के-----------
अब आगे ---------
देखते ही देखते सुजान सिंह का शरीर धुएं में परिवर्तित होने लगा । याग्नेश अभी कुछ समझता के इससे पहले उस धूए ने उसे चारों ओर से घेर लिया । अब वह धूआ लोहे की मजबूत पिंजरे में बदल चुका था ।
जिसमें याग्नेश कैद हो चुका था , इस प्रकार की अद्भुत माया याग्नेश पहली बार देख रहा था।
इस प्रकार की अद्भुत माया कौन हो सकता है इस बारे में याग्नेश सोच ही रहा था कि उसे किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। पिंजरे में कैद याग्नेश में जब सामने की ओर देखा तो उसे राजा सुजान सिंह महामंत्री विरूपाक्ष और राजगुरु विद्याधर को आते हुए दिखे
उन तीनों को सामने से आता हुआ देखकर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया और वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयत्न करने लगा परंतु जैसे ही वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयास करता उसे तेज झटके लगते।
सुजान सिंह - हंसी आती है मुझे याग्नेश तुम्हारी दशा देखकर , देखो किस प्रकार कैद में किसी पंछी की भांति फड़फड़ा रहे हो। तुम कितनी भी कोशिश कर लो इस कैद से बाहर नहीं आ पाओगे क्या सोचा था तुमने फिर तुम मुझे इतनी सरलता से मार दोगे मत भूलो मैं सुजान सिंह हूं देव नगर का राजा, कोई साधारण सैनिक नही जीसे तुम आसानी से मार दोगे।
याग्नेश - सुजान सिंह तुम्हारा यह मायावी पिंजरा मुझे ज्यादा देर तक कैद नहीं रख सकता अच्छा हुआ तुम तीनों एक साथ मेरे सामने आ गए , बचपन की मित्रता को याद करते हुए मैंने सोचा था कि तुम्हें सरल नंबर क्यों दूं परंतु अब नहीं और अच्छा हुई हुआ फिर तुम अपने साथ राजगुरु को भी ले आए।
राजगुरु विद्याधर -- कैसे ना आता मेरे बच्चे ! तुम्हें अंतिम विदाई देने के लिए तो आना ही था । आखिर तुम मेरे प्यारे विग्नेश के पुत्र जो ठहरे , मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस दशा में देखकर । चिंता मत करो तुम्हें अब शीघ्र ही इस असहनीय दु:ख से मुक्ति मिलने वाली है।
याग्नेश -- मत लो अपने गंदी जुबान से मेरे पिता का नाम । मेरे दादा ने तुम्हें अपना भाई माना था मेरे पिता भी आपको अपने पिता तुल्य मानते थे। ना जाने क्या क्यों और कैसे आपने मेरे परिवार के साथ विश्वासघात किया , परंतु अब तक इतना मैं जान चुका हूं, मेरे परिवार की दुर्दशा मैं सबसे बड़ा हाथ आपका ही है। जितनी पीडा तुम तीनो ने मुझे दी है उससे कई गुना अधिक पीडा मै तूम तीनो को दूंगा।
राजगुरु - ऐसा मत कहो पुत्र मुझे सच में तुम्हारे परिवार के लिए दुख होता है , परंतु अब तुम्हारे सारे दुखों के समाप्त होने का समय आ गया ।
इतना कहकर राजगुरु ने एक इशारा किया और इसके साथ ही वहां 10 धनुर्धर आ गए राजा सुजान सिंह का इशारा पाते ही सभी धनुर्धरोंने याग्नेश की और अपने तीरो की बरसात कर दी अभी वह तीर याग्नेश तक पहुंच पाते एक धमाके के साथ लोहे के पिंजड़े के चिथड़े उड़ गए जो सामने धनुरधरों से इतनी तीव्रता के साथ टकराए के वे दसों धनुर्धर वहीं ढेर हो गए ।
याग्नेश को इतनी सहजता के साथ पिंजरे से मुक्त हुआ होता हुआ देखकर सुजान सिंह राजगुरु और महामंत्री को बड़ा आश्चर्य हुआ मायावी पिंजरे के धमाके मैं नष्ट होने से जो धुआं उठा था उसके छटते ही उन तीनो ने याग्नेश को देखा इस समय याग्नेश की आंखें नीले प्रकाश से चमक रही थी उसके शरीर से निकलता हुआ नीला प्रकाश उसके चारों ओर एक घेरा बना रहा था
याग्नेश -- क्यों सुजान सिंह क्या हुआ इस तरह मुझे आंखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो और राजगुरु तुमने क्या सोचा था कि आपने इस तरह के छोटे-मोटे जादुई प्रयोग करके तुम मुझे कैद कर लोगे, हा हा हा (हसते हुए) यदि और भी कोई प्रयोग करना हो तो कर लो क्योंकि अब ज्यादा समय तुम्हारे पास नहीं रहा।
इतना कहकर याग्नेश तीव्र गति से सुजान सिंह की और बढ़ा , इससे पहले कि सुजान सिंह अपनी रक्षा के लिए कुछ कर पाता याग्नेश ने उसे गर्दन से उठाकर जोर से जमीन पर पटक दिया , यह सब इतनी तेजी से हुआ और सुजान सिंह भूमी पर इतनी तीव्र गति से टकराया था के एक पल तो उसे समझ ही नही आया के अचानक क्या हुआ । उसके शरीर मे भयंकर पीडा हो रही थी ।
उसे समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपने मयान से तलवार बाहर निकाल ली और सुजान सिंह को समाप्त करने के लिए जैसे ही उसने तलवार हवा में उठाई, उसी पल एक भाला तीव्र गति से आकर उसकी पीठ से टकराया।
इस समय याग्नेश की सारी काली शक्तियां जागृत थी , इसलिए वह भाला याग्नेश की पीठ में प्रवेश नहीं कर पाया।
चुपके से वार करने वाला कौन है , यह देखने के लिए याग्नेश ने पलट कर देखा कौन से वहां थोड़ी ही दूर पर महामंत्री विरुपाक्ष नजर आया
याग्नेश को अपनी ओर देखते हुए देखकर विरुपाक्ष भय से कांप गया उसे अपनी मृत्यु सामने साक्षात नजर आने लगी वह तुरंत घूम कर वहां से भागने लगा, परंतु याग्नेश उसे भागने नहीं देना चाहता था याग्नेश उसी का फेंका हुआ भाला उठाया और निशाना साधा और महामंत्री विरुपाक्ष पर फेंक दिया। वह भाला तीव्र गति से जाकर महामंत्री विरुपाक्ष के पीठ से होकर सीने से आर पार हो गया और एक भयंकर चीख के साथ महामंत्री विरुपाक्ष वही धराशाई हो गया।
महामंत्री विरुपाक्ष को मौत के घाट उतारने के पश्चात याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ गया, तब तक सुजान सिंह भी संभाल कर खड़ा हो चुका था। इतनी आसानी से हार मानने वालो मे सुजान सिहं नही था , वह शारीरिक बल और युद्ध कला में याग्नेश से किसी भी तरह कम नही था ।
सुजान सिंह को संभल कर खड़े होते हुए देखकर याग्नेश मुस्कुराया
याग्नेश -- संभालो अपनी तलवार सुजान सिंह और मेरा सामना करो मैं एक निहत्थे असहाय कि हत्या नहीं करना चाहता, तुम्हें मारते वक्त मुझे भी ऐसा लगना चाहिए कि मैं एक दयनीय असहाय व्यक्ति का नहीं देव नगर के राजा का वध कर रहा हूं।
सुजान सिंह ने भी अब तक अपनी तलवार मयान से बाहर निकाल ली थी दोनों योद्धा अपनी अपनी तलवार लेकर एक दूसरे से भिड़ गए।
जहां सुजान सिंह ने अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश की गर्दन की तरफ किया, तो वही याग्नेश ने भी बड़ी सरलता से उस वार को अपनी तलवार पर रोक दिया और साथ ही साथ घुमाते हुए सुजान सिंह को पीछे की ओर धक्का दिया,
याग्नेश ने भी सुजान सिंह के पेट की ओर अपनी तलवार से वार किया , तो वही सुजान सिंह ने भी कलाबाजियां खाकर बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश की कलाई पर वार किया जिससे काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर कोई असर नही हुआ ।
अब याग्नेश भी अपनी तलवार को किसी चक्र की मांनींद तीव्र गति से सुजान सिंह की ओर बढ़ा और बडी फुर्ती से उसके वार से बचते हुए एक वार उसकी बाजू पर और दूसरा उसके पीठ पर कीया जिससे सुजान सिंह घायल हो गया।
अपने किसी भी प्रहार का काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर ना होता हुआ देखकर सुजान सिंह अपनी तलवार नीचे किए घुटने के बल जमीन पर बैठ गया, सुजान सिंह को इस प्रकार अपने हथियार डाल कर जमीन पर बैठा हुआ देखकर याग्नेश मुस्कुराया।
याग्नेश -- बस इतना ही जोर था तुममे सुजान सिंह ! तुम अपने आप को देवनगर का राजा कहते हो , इतना कमजोर राजा जो मेरे सामने थोड़ी देर भी टिक नहीं पाया।
सुजान सिंह -- बल और युद्ध कौशल में मैं किसी भी प्रकार तुम से कम नहीं हूं , यह तुम भी अच्छी प्रकार जानते हो, तुम मुझे कह रहे हो परंतु सच तो यह है कि तुम्हें अपने बल और युद्ध कौशल पर विश्वास नहीं है , इसलिए तुमने अपने आपको काली शक्तियों के कवच से सुरक्षित कर रखा है, इस प्रकार का युद्ध करने का क्या लाभ जब सामने वाला तुम्हारी किसी भी प्रहार से आहत ना हो ।
इसलिए लो मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत हूं कर दो मेरी हत्या यही तो तुम भी चाहते हो मुकाबले का अवसर देना तो बस तुम्हारा एक दिखावा है।
ऐसा कहकर सुजान सिंह ने याग्नेश के अहंकार पर चोट की और निशाना भी सही लगा सुजान सिंह की बात सुनकर याग्नेश ने अब अपना काली शक्तियों का कवच हटा दिया।
याग्नेश -- तुम्हें हराने के लिए मुझे इस कवच की कोई आवश्यकता नहीं है , लो अब मैंने कवच हटा दिया अब सामना करो मेरा।
याग्नेश के द्वारा कवच के हटाए जाने पर सुजान सिंह एक बार फिर अपनी तलवार लेकर सज्ज हो गया दोनों योद्धा किसी मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भीड गए थे, ना कोई किसी से कम ना कोई किसी से ज्यादा ।
यहां दूसरी ओर राजगुरु विद्याधर अब तक समझ चुके थे सुजान सिंह अकेले याग्नेश का सामना ज्यादा देर तक, नहीं कर सकते और यदी वो राजा की सहायता करने जाता है तो ऐसी स्थिती में याग्नेश भी अपनी काली शक्तियों का प्रयोग करेगा अब तक राजगुरु याग्नेश की शक्तियों को देखकर इतना तो समझ ही चुके थे कि वह उसकी शक्तियों का अकेले सामना नहीं कर सकते
राजगुरू जानते थे के युद्धवीर सिंह की सहायता के बीना वो इस समय याग्नेश को नहीं रोक सकते ।
इसीलिए राजगुरु उस ओर चल पड़ा जहां अभी भी युद्धवीर सिंह भूमि पर पड़ा था, युद्धवीर सिंह को भी अब तक होश आ गया था वह बड़ी कठिनाई से उठने का प्रयत्न कर रहा था , युद्धवीर सिंह को जीवित देखकर राजगुरु की जान में जान आई उसने आगे बढ़ कर युद्धवीर सिंह को सहारा देकर बैठा दिया
राजगुरु -- शुक्र है युद्धवीर सिंह कि तुम सही सलामत हो , तुम्हारी सहायता के बिना याग्नेश को रोकना संभव है।
युद्धवीर सिंह -- राजगुरु यहां मैं खड़ा होने में भी असमर्थ हो रहा हूं और आप कह रहे हो कि मैं याग्नेश का सामना करो , क्षमा करें राजगुरु परंतु अब मैं इस स्थिति में नहीं हूं क्या आपकी कोई सहायता कर सकूं। परंतु आपको मै इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता बता सकता हूं जो शायद आप भूल गए हो।
राजगुरु -- कैसा रास्ता , इस समय यूं पहेलीयों मे बात मत करों , स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो , जरा विस्तार से बताओ।
युद्धवीर सिंह -- राजगुरु आप शायद छोटी रानी को भूल गए हो, एक वही है जो इस समय राजा की रक्षा कर सकती है।
राजगुरु -- बात तो तुम्हारी ठीक है परंतु छोटी रानी तो वर्षों पहले अपने नन्हे कुमार के साथ महल को छोड़कर चली गई थी और वह अब इस समय कहां है किसी को नहीं पता।
युद्धवीर सिंह -- यही तो फर्क है आप में और मुझ में राजगुरु, जीवन मे सफल होने के लिए दुरदर्शीता होना आवश्यक हैं । मुझे पहले ही पता था के इस प्रकार की परिस्थिति सामने आ सकती हैं , इसलिए मैंने पहले ही उन्हें ढूंढ निकाला है, इसलिए अब ज्यादा देर मत करो और शीघ्र जाओ महल के तहखाने में स्थित कैद में तुम्हें वह मिल जाएगी।
युद्धवीर सिंह की बात सुनकर राजगुरु ने तुरंत महल की ओर दौड़ लगा दी।
यहां सुजान सिंह और याग्नेश का युद्ध अपने चरम सीमा पर था, दोनों इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो चुके थे याग्नेश के प्रभावशाली वार को सहते सहते सुजान सिंह के शरीर की शक्ति कम हो गई थी, वह बुरी तरह थक चूका था, और इसी बात का फायदा उठाकर याग्नेश ने अपनी शक्ति एकत्रित करके अपनी जगह से उछलकर अपने दोनों पैरों का वार सुजान सिंह के सीने पर किया जिससे सुजान सिंह भूमि पर गिर गया।
याग्नेश ने अपना अंतिम वार करने के लिए सुजान सिंह के सीने पर पैर रखा हर तलवार हवा में उठाई ही थी की इससे पहले कि वह सुजान सिंह पर वार करता राजगुरु की आवाज वहां गूंज उठी।
राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश सुजान सिंह को मारने से पहले जरा एक बार यहां देख लो कहीं ऐसा ना हो कि बाद में तुम्हें पछताना पड़े।
राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।
आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शीघ्र ही ---
आप सब पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस कहानी के प्रति अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
आपके सहयोग का अभिलाषी
आपका मित्र - अभिनव![]()
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई आपकी शानदार और बेहतरीन रिव्यू के लिएतो अभी छल से लड़ रहा है राजा और शायद जीत भी जाए क्योंकि यग्नेश अपनी शक्तियों के अंहकार में है। उपर से राज्य के सारे योद्धा उसके विरुद्ध। ये छोटी रानी और उनका बेटा शायद यग्नेश के बीवी और बेटा है और उसको इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए लाए है। मगर क्या इससे यग्नेश सुजान सिंह और राजगुरु को छोड़ देगा? सुंदर अपडेट।
Bahut bahut dhanywad mitra aapke shandaar Review & support k liyeDono hi updates ek se badhkar ek he..........
Yagnesh ko ab chhal purvak harane ki sazish ki ja rahi he........lekin shayad hi yagnesh unke behkave me aaye......
Pratiksha rahegi agle update ki.....................
अध्याय -- 8
याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----
अब आगे -----
ऊर्जा पाश में बंधा हुआ याग्नेश अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा था, उसे आश्चर्य हो रहा था यह इतना शक्तिशाली ऊर्जा पाश जो उस की काली शक्तियों के कवच को भी भेद सकता है यह किसके द्वारा प्रयोग किया गया है । के तभी सामने से आते हुए युद्धवीर सिंह क्यों पर उसकी दृष्टि पड़ी।
युद्धवीर सिंह को देखकर याग्नेश के मुख पर व्यंगात्मक मुस्कान उभरी
याग्नेश-- ओह ! तो युद्धवीर सिंह तुम भी यहां उपस्थित हो अच्छा है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो मैं यमलोक भेज चुका हूं अब तुम भी यमलोक में उनके पास जाने के लिए सज्ज हो जाओ।
युद्धवीर सिंह -- हा हा हा ! मेरे पिता की हत्या करके तुम क्या सोचते हो मेरी भी हत्या कर दोगे , यह इतना आसान नहीं है याग्नेश। प्रतिशोध तो मैं लूंगा तुमसे अपने पिता की हत्या का , मेरी बहन के अपहरण का। कुछ जादुई शक्तियों का उपयोग करके तुम अपने आप को शक्तिशाली समझ रहे हो देखो मेरे छोटे से पास में तुम्हारी क्या दशा कर दी अब अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ।
इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपनी तलवार लेकर याग्नेश की और बड़ा ही था कि याग्नेश ने अपने हाथों को झटका दिया और ऊर्जा पाश से मुक्त हो गया । इससे पहले कि युद्धवीर सिंह याग्नेश पर कोई वार करता याग्नेश ने तेजी से उसे उठाकर दूर फेंक दिया
याग्नेश -- बच्चे हो तुम मेरे सामने अभी युद्धवीर सिंह ! तुम क्या सोचते थे कि यह ऊर्जा पाश मुझे बान्ध सकता है , याग्नेश हूं मै , यह छोटे मोटे पाश मेरा कुछ नही बीगाड सकतें , मैं तो बस तुम्हे सामने लाने के लिए बन्ध गया था ।
इतना कहकर याग्नेश ने नीले रंग के प्रकाश का एक गोला युद्धवीर सिंह की ओर फेंका, परंतु युद्धवीर सिंह भी कोई कम नहीं था उसने उतनी ही तेजी दिखाकर अपने स्थान से छलांग लगाकर याग्नेश के वार से बच गया और साथ ही साथ एक श्वेत ऊर्जा का गोले से याग्नेश पर प्रहार किया।
याग्नेश ने उस उर्जा के गोले के प्रहार को अपनी उर्जा से काट दिया और साथ ही साथ अपने दोनों हाथ युद्धवीर सिंह की ओर झटके जिससे असंख्य छोटे-छोटे चक्र तेजी से घूमते हुए युद्धवीर सिंह की ओर बढ़े ।
इधर युद्धवीर सिंह ने भी अपने दोनों हाथों को घुमा कर वायु का एक बड़ा गोला तैयार किया और चक्रों की दिशा में प्रहार किया, वायु का वह गोला उन सारे चक्रों को अपने में समाता हुआ याग्नेश की और बड़ा और बड़ी तेजी से टकराया।
वह चक्र याग्नेश की ही काली ऊर्जा से निर्मित थे , इस कारण उन चक्रों के टकराव से याग्नेश का कवच कई जगह से फट गया और उसके शरीर पर काफी घाव हो गए।
युद्धवीर सिंह का इस प्रकार उसके किए गए वार का प्रतिकार करना याग्नेश के लिए आश्चर्यजनक था याग्नेश युद्धवीर सिंह केबल और शक्ति के बारे में जानता था परंतु उसका सामना आज जिस युद्धवीर सिंह से हो रहा था वह सर्वथा भिन्न था।
याग्नेश जानता था कि यह समय विचार करने का नहीं युद्ध करने का है इसलिए अपने मन में आ रहे सभी विचारों को शांत करके एक बार फिर याग्नेश युद्ध के लिए सज्ज हो गया।
परंतु इतनी देर में युद्धवीर सिंह ने अपना अगला वार कर दिया था याग्नेश युद्धवीर सिंह की और बड़ा ही था की एक विद्युत किरण उसके सीने से टकराई जिसके प्रभाव से वह कुछ दुर पीछे गिरा।
परंतु याग्नेश भी कोई साधारण योद्धा नहीं था गिरते-गिरते भी उसने बड़ी तीव्रता के साथ अपनी उर्जा का प्रहार युद्धवीर सिंह की ओर किया।
अपने किए गए प्रहार की सफलता देखकर युद्धवीर सिंह प्रसन्न हो ही रहा था के याग्नेश की उर्जा उसके सीने से टकराई और एक धमाका हुआ जिससे वह उड़ते हुए दूर जा गिरा।
याग्नेश के इस वार से युद्धवीर सिंह बुरी तरह से घायल हो गया था , उसके सारे शरीर में भयंकर पीड़ा होने लगी थी।
अपने दर्द पर काबू पाता हुआ वह लड़खड़ाते हुए कदमों से खड़ा हुआ ही था के
युद्धवीर सिंह को समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपना अगला वार कर दिया ।
अनेक प्रकार के अस्त्र तीव्र गति से युद्धवीर सिंह की ओर बढ़ रहे थे, घायल अवस्था में भी युद्धवीर सिंह पूरी तरह से सजग था, अपनी ओर आते हुए अनेक घातक शस्त्रों को रोकने के लिए युद्धवीर सिंह ने अपना हाथ आगे करके एक मोटी सी ऊर्जा की ढाल बनाई । वह सारे शस्त्र उस उर्जा की परत से आकर टकराई।
युद्धवीर सिंह उन शस्त्रों को अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर रोक रहा था, जब उसे अंदाजा हुआ के वह श्वेत ऊर्जा द्वारा इन घातक अस्त्रों को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकता तब उसने अपनी आंखें बंद कर ली और कुछ बुदबुदाने लगा , कुछ ही पलों में उसने अपनी आंखें खोली अब उसकी आंखों का संपूर्ण रंग काला हो गया था।
उसके शरीर से गहरे नीले रंग की उर्जा किरणे निकलने लगी थी । उस ऊर्जा की किरणों का उन घातक अस्त्रों के साथ संपर्क होते ही वह सारे अस्त्र दूर से झीटक कर गिर गए ।
उस गहरे नीले रंग की उर्जा के प्रभाव से अब वीर सिंह के सारे घाव अब ठीक हो चुके थे। जिसे देखकर याग्नेश के आश्चर्य की सीमा नहीं रही क्योंकि वह उस नीले रंग की ऊर्जा को पहचानता था, क्योकि यह उर्जा किसी देवता की नही उसके मालिक जिसकी वह उपासना करता था उस ईब्लिस की थी।
अब युद्धवीर सिंह ने अपनी उसी उर्जा का वार याग्नेश पर किया, याग्नेश ने भी बड़ी तीव्रता के साथ इस वार का प्रत्युत्तर दिया और उसके वार को नष्ट किया,
अब दोनों ओर से काली शक्तियों की ऊर्जा के प्रहार हो रहे थे, दोनों में से कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा था , सतत दोनो ओर से काली उर्जाओ के टकराने से वहां की सारी सकारात्मक उर्जाएं नष्ट हो रही थी।
वहां चारों ओर नकारात्मक शक्ति फैलने लगी थी। जिसका प्रभाव वहां खड़े हुए योद्धाओं के मन पर पढ़ रहा था।
वहां खड़े योद्धा और सैनिक जो याग्नेश और युद्धवीर सिंह दोनों काली शक्तियों के धारक के टकराव को देख रहे थे , उन में अब दो दल बन गए थे
जहां एक दल शोर मचा कर याग्नेश का समर्थन कर रहा था वही दूसरा दल युद्धवीर सिंह के जयकारे लगाकर समर्थन कर रहा था।
जैसे-जैसे दोनों का युद्ध और गहरा होता जा रहा था वैसे वैसे वहांकि नकारात्मकता भी बढती जा रही थी , जिसके प्रभाव के कारण उन दोनों दलों की व्यग्रता भी बढ़ती जा रही थी ।
उस प्रभाव में आकर वह दोनों सैनिको के दल आपस में ही भिड़ गए और एक दूसरे को मारने लगे, एक-एक करके वह सभी मृत्यु की आगोश में जा रहे थे उनके शरीर के कटे हुए अंग और बहता हुआ रक्त उनकी वह चीख पुकार वहां के वातावरण को और भयावह बना रही थी।
अब तक के युद्ध से याग्नेश इस बात को जान गया था कि केवल काली शक्तियों के प्रहार से वह युद्धवीर सिंह से नहीं जीत सकता , इसलिए अब उसने अपने पिता द्वारा सिखाई गई पंच तत्वों की उर्जा का काली शक्तियों के साथ सम्मीश्रण करके प्रयोग करने का निर्णय लिया।
आचार्य पद के जाने के बाद याग्नेश ने अपने पिता द्वारा सिखाए गए श्वेत ऊर्जा और पंच तत्व के प्रयोग की कलाओं को याग्नेश ने त्याग दिया था क्योंकि यह सब सात्विक प्रयोग थे।
काली शक्तियों का धारक होने के कारण वह श्वेत ऊर्जा का प्रयोग तो नहीं कर सकता था , परंतु पंचतत्व की ऊर्जा का अवश्य प्रयोग कर सकता था , क्योंकि सभी शरीर धारी पंचतत्व की उर्जा के धारक होते हैं जहां यह ऊर्जा समाप्त होती है वही जीवन भी समाप्त हो जाता है।
याग्नेश ने अब वायु जल और पृथ्वी तत्व और अब सम्मिलित उर्जा का प्रयोग करके एक विशाल चक्रवात का निर्माण किया जिसमें उसने विद्युत तरंगों का भी प्रयोग किया।
वह चक्रवात तेजी से आगे बढ़ता हुआ युद्धवीर सिंह को अपने में समा गया,
युद्धवीर सिंह ने उस चक्रवात से निकलने का भरसक प्रयास किया , परंतु उसके सभी प्रयास विफल हो गए।
उस तेजी से घूमते हुए चक्रवात में भूमि तत्वों से निर्मित विशाल शिलाखंड और जल तत्व और वायु तत्व के सहयोग से बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े टकराने से युद्धवीर सिंह का शरीर कई जगह से घायल हो गया था।
अत्यंत पीड़ा का अनुभव करते हुए और उस चक्रवात में घूमते हुए युद्धवीर सिंह मृत:प्राय हो गया था।
उसकी सांसे बहुत धीमी गति से चलने लगी कुछ ही क्षणों में वह निर्जीव सा हो गया और देखते ही देखते हुए चक्रवात भी शांत हो गया ।
चक्रवात के शांत होते ही युद्धवीर सिंह का शरीर धड़ाम से भूमि पर आकर गिरा युद्धवीर सिंह के शरीर को क्षत विक्षत अवस्था में भूमि पर अचेत अवस्था में पड़ा देखकर , याग्नेश के चेहरे पर मुस्कान उभर आई उसे मृत समझकर याग्नेश अपने अगले शत्रु राजा सुजान सिंह की ओर बढ़ गया।
राजा के अंगरक्षक पहले ही याग्नेश और युद्धवीर सिंह के काली शक्तियों के प्रयोग से उत्पन्न होनेवाली नकारात्मक ऊर्जा की भेंट चढ़ गए थे ।
याग्नेश को अपनी और बढ़ता हुआ देखकर सुजान सिंह भय के मारे थर-थर कांपने लगा। उसने अपनी मदद की आशा से चारों ओर नजर दौड़ाई ,परंतु निराशा ही हाथ लगी , क्योंकि वह इस समय अकेला ही सही सलामत युद्ध भूमी पर खड़ा था।
एक ओर सेनापति समर सिंह अभी भी मूर्छित अवस्था में भूमि पर पड़े थे , तो दूसरी ओर युद्धवीर सिंह भी मृतप्राय अवस्था में भूमि पर अचेत पड़ा हुआ था । उसके सारे सैनिक और अंगरक्षक एक दूसरे को समाप्त कर चुके थे, उसके महामंत्री और राजगुरु का दूर-दूर तक पता नहीं था , शायद मृत्यू के भय से पलायन कर गये हो । चारों ओर लाशों के ढेर और रक्त के कीचड़ के बीच में सुजान सिंह अकेला खड़ा था।
सुजान सिंह को भय के मारे थरथर कांपता हुआ देखकर याग्नेश जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगा , उसकी वह भयावह हंसी सुनकर सुजान सिंह का रंग पीला पड़ गया।
याग्नेश -- सुजान सिंह ! देखो अपने चारों ओर है कोई जो तुम्हारी रक्षा करने वाला हो, अब अपने किए गए अपराधों का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।
सुजान सिंह -- मुझे क्षमा कर दो याग्नेश ! तुम जैसा बोलोगे वैसा ही मैं करूंगा, तुम चाहो तुम मेरा सारा धन ले लो परंतु मुझे जीवनदान दे दो, मैं अपने किये अपराधों का प्रायश्चित करना चाहता हूं । कृपया मुझे बस एक अवसर देदो।
याग्नेश -- क्षमा कर दो ! तुम्हें लज्जा नहीं आई सुजान सिंह क्षमा मांगते हुए , मेरे पिता तुम्हें भी अपने पुत्र के समान मानते थे, उनके प्रति किए गए विश्वासघात के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ?
मेरे दादाजी की मृत्यु के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ? मेरे कुल का सर्वनाश का कारण बनने के लिए क्षमा कर दूं ?
आज मैं जहां खड़ा हूं उसका केवल एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वह हो तुम इसलिए अपना दंड पाने के लिए सज्ज हो जाओ।
और इस प्रकार क्षमा दान मांग कर अपने गुरु और मेरे पिता की दी हुई शिक्षा को कलंकित मत करो संभालो अपनी तलवार और मेरा सामना करो।
इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा ।
सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा के-----
मित्रों आज के लिए इतना ही ---अगला अपडेट जल्दी ही-----
आप सभी पाठको से अनुरोध है के इस कहानी पर अपने सुझाव और प्रतिक्रिया अवश्य दें,
आपके सहयोग का अभिलाषी
आपका मित्र -- अभिनव![]()
अध्याय - 9
इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा । सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा था के-----------
अब आगे ---------
देखते ही देखते सुजान सिंह का शरीर धुएं में परिवर्तित होने लगा । याग्नेश अभी कुछ समझता के इससे पहले उस धूए ने उसे चारों ओर से घेर लिया । अब वह धूआ लोहे की मजबूत पिंजरे में बदल चुका था ।
जिसमें याग्नेश कैद हो चुका था , इस प्रकार की अद्भुत माया याग्नेश पहली बार देख रहा था।
इस प्रकार की अद्भुत माया कौन हो सकता है इस बारे में याग्नेश सोच ही रहा था कि उसे किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। पिंजरे में कैद याग्नेश में जब सामने की ओर देखा तो उसे राजा सुजान सिंह महामंत्री विरूपाक्ष और राजगुरु विद्याधर को आते हुए दिखे
उन तीनों को सामने से आता हुआ देखकर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया और वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयत्न करने लगा परंतु जैसे ही वह उस पिंजरे को तोड़ने का प्रयास करता उसे तेज झटके लगते।
सुजान सिंह - हंसी आती है मुझे याग्नेश तुम्हारी दशा देखकर , देखो किस प्रकार कैद में किसी पंछी की भांति फड़फड़ा रहे हो। तुम कितनी भी कोशिश कर लो इस कैद से बाहर नहीं आ पाओगे क्या सोचा था तुमने फिर तुम मुझे इतनी सरलता से मार दोगे मत भूलो मैं सुजान सिंह हूं देव नगर का राजा, कोई साधारण सैनिक नही जीसे तुम आसानी से मार दोगे।
याग्नेश - सुजान सिंह तुम्हारा यह मायावी पिंजरा मुझे ज्यादा देर तक कैद नहीं रख सकता अच्छा हुआ तुम तीनों एक साथ मेरे सामने आ गए , बचपन की मित्रता को याद करते हुए मैंने सोचा था कि तुम्हें सरल नंबर क्यों दूं परंतु अब नहीं और अच्छा हुई हुआ फिर तुम अपने साथ राजगुरु को भी ले आए।
राजगुरु विद्याधर -- कैसे ना आता मेरे बच्चे ! तुम्हें अंतिम विदाई देने के लिए तो आना ही था । आखिर तुम मेरे प्यारे विग्नेश के पुत्र जो ठहरे , मुझे बहुत दुख हो रहा है तुम्हें इस दशा में देखकर । चिंता मत करो तुम्हें अब शीघ्र ही इस असहनीय दु:ख से मुक्ति मिलने वाली है।
याग्नेश -- मत लो अपने गंदी जुबान से मेरे पिता का नाम । मेरे दादा ने तुम्हें अपना भाई माना था मेरे पिता भी आपको अपने पिता तुल्य मानते थे। ना जाने क्या क्यों और कैसे आपने मेरे परिवार के साथ विश्वासघात किया , परंतु अब तक इतना मैं जान चुका हूं, मेरे परिवार की दुर्दशा मैं सबसे बड़ा हाथ आपका ही है। जितनी पीडा तुम तीनो ने मुझे दी है उससे कई गुना अधिक पीडा मै तूम तीनो को दूंगा।
राजगुरु - ऐसा मत कहो पुत्र मुझे सच में तुम्हारे परिवार के लिए दुख होता है , परंतु अब तुम्हारे सारे दुखों के समाप्त होने का समय आ गया ।
इतना कहकर राजगुरु ने एक इशारा किया और इसके साथ ही वहां 10 धनुर्धर आ गए राजा सुजान सिंह का इशारा पाते ही सभी धनुर्धरोंने याग्नेश की और अपने तीरो की बरसात कर दी अभी वह तीर याग्नेश तक पहुंच पाते एक धमाके के साथ लोहे के पिंजड़े के चिथड़े उड़ गए जो सामने धनुरधरों से इतनी तीव्रता के साथ टकराए के वे दसों धनुर्धर वहीं ढेर हो गए ।
याग्नेश को इतनी सहजता के साथ पिंजरे से मुक्त हुआ होता हुआ देखकर सुजान सिंह राजगुरु और महामंत्री को बड़ा आश्चर्य हुआ मायावी पिंजरे के धमाके मैं नष्ट होने से जो धुआं उठा था उसके छटते ही उन तीनो ने याग्नेश को देखा इस समय याग्नेश की आंखें नीले प्रकाश से चमक रही थी उसके शरीर से निकलता हुआ नीला प्रकाश उसके चारों ओर एक घेरा बना रहा था
याग्नेश -- क्यों सुजान सिंह क्या हुआ इस तरह मुझे आंखें फाड़ फाड़ कर क्या देख रहे हो और राजगुरु तुमने क्या सोचा था कि आपने इस तरह के छोटे-मोटे जादुई प्रयोग करके तुम मुझे कैद कर लोगे, हा हा हा (हसते हुए) यदि और भी कोई प्रयोग करना हो तो कर लो क्योंकि अब ज्यादा समय तुम्हारे पास नहीं रहा।
इतना कहकर याग्नेश तीव्र गति से सुजान सिंह की और बढ़ा , इससे पहले कि सुजान सिंह अपनी रक्षा के लिए कुछ कर पाता याग्नेश ने उसे गर्दन से उठाकर जोर से जमीन पर पटक दिया , यह सब इतनी तेजी से हुआ और सुजान सिंह भूमी पर इतनी तीव्र गति से टकराया था के एक पल तो उसे समझ ही नही आया के अचानक क्या हुआ । उसके शरीर मे भयंकर पीडा हो रही थी ।
उसे समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपने मयान से तलवार बाहर निकाल ली और सुजान सिंह को समाप्त करने के लिए जैसे ही उसने तलवार हवा में उठाई, उसी पल एक भाला तीव्र गति से आकर उसकी पीठ से टकराया।
इस समय याग्नेश की सारी काली शक्तियां जागृत थी , इसलिए वह भाला याग्नेश की पीठ में प्रवेश नहीं कर पाया।
चुपके से वार करने वाला कौन है , यह देखने के लिए याग्नेश ने पलट कर देखा कौन से वहां थोड़ी ही दूर पर महामंत्री विरुपाक्ष नजर आया
याग्नेश को अपनी ओर देखते हुए देखकर विरुपाक्ष भय से कांप गया उसे अपनी मृत्यु सामने साक्षात नजर आने लगी वह तुरंत घूम कर वहां से भागने लगा, परंतु याग्नेश उसे भागने नहीं देना चाहता था याग्नेश उसी का फेंका हुआ भाला उठाया और निशाना साधा और महामंत्री विरुपाक्ष पर फेंक दिया। वह भाला तीव्र गति से जाकर महामंत्री विरुपाक्ष के पीठ से होकर सीने से आर पार हो गया और एक भयंकर चीख के साथ महामंत्री विरुपाक्ष वही धराशाई हो गया।
महामंत्री विरुपाक्ष को मौत के घाट उतारने के पश्चात याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ गया, तब तक सुजान सिंह भी संभाल कर खड़ा हो चुका था। इतनी आसानी से हार मानने वालो मे सुजान सिहं नही था , वह शारीरिक बल और युद्ध कला में याग्नेश से किसी भी तरह कम नही था ।
सुजान सिंह को संभल कर खड़े होते हुए देखकर याग्नेश मुस्कुराया
याग्नेश -- संभालो अपनी तलवार सुजान सिंह और मेरा सामना करो मैं एक निहत्थे असहाय कि हत्या नहीं करना चाहता, तुम्हें मारते वक्त मुझे भी ऐसा लगना चाहिए कि मैं एक दयनीय असहाय व्यक्ति का नहीं देव नगर के राजा का वध कर रहा हूं।
सुजान सिंह ने भी अब तक अपनी तलवार मयान से बाहर निकाल ली थी दोनों योद्धा अपनी अपनी तलवार लेकर एक दूसरे से भिड़ गए।
जहां सुजान सिंह ने अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश की गर्दन की तरफ किया, तो वही याग्नेश ने भी बड़ी सरलता से उस वार को अपनी तलवार पर रोक दिया और साथ ही साथ घुमाते हुए सुजान सिंह को पीछे की ओर धक्का दिया,
याग्नेश ने भी सुजान सिंह के पेट की ओर अपनी तलवार से वार किया , तो वही सुजान सिंह ने भी कलाबाजियां खाकर बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश की कलाई पर वार किया जिससे काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर कोई असर नही हुआ ।
अब याग्नेश भी अपनी तलवार को किसी चक्र की मांनींद तीव्र गति से सुजान सिंह की ओर बढ़ा और बडी फुर्ती से उसके वार से बचते हुए एक वार उसकी बाजू पर और दूसरा उसके पीठ पर कीया जिससे सुजान सिंह घायल हो गया।
अपने किसी भी प्रहार का काली शक्तियों के कवच के कारण याग्नेश पर ना होता हुआ देखकर सुजान सिंह अपनी तलवार नीचे किए घुटने के बल जमीन पर बैठ गया, सुजान सिंह को इस प्रकार अपने हथियार डाल कर जमीन पर बैठा हुआ देखकर याग्नेश मुस्कुराया।
याग्नेश -- बस इतना ही जोर था तुममे सुजान सिंह ! तुम अपने आप को देवनगर का राजा कहते हो , इतना कमजोर राजा जो मेरे सामने थोड़ी देर भी टिक नहीं पाया।
सुजान सिंह -- बल और युद्ध कौशल में मैं किसी भी प्रकार तुम से कम नहीं हूं , यह तुम भी अच्छी प्रकार जानते हो, तुम मुझे कह रहे हो परंतु सच तो यह है कि तुम्हें अपने बल और युद्ध कौशल पर विश्वास नहीं है , इसलिए तुमने अपने आपको काली शक्तियों के कवच से सुरक्षित कर रखा है, इस प्रकार का युद्ध करने का क्या लाभ जब सामने वाला तुम्हारी किसी भी प्रहार से आहत ना हो ।
इसलिए लो मैं तुम्हारे सामने प्रस्तुत हूं कर दो मेरी हत्या यही तो तुम भी चाहते हो मुकाबले का अवसर देना तो बस तुम्हारा एक दिखावा है।
ऐसा कहकर सुजान सिंह ने याग्नेश के अहंकार पर चोट की और निशाना भी सही लगा सुजान सिंह की बात सुनकर याग्नेश ने अब अपना काली शक्तियों का कवच हटा दिया।
याग्नेश -- तुम्हें हराने के लिए मुझे इस कवच की कोई आवश्यकता नहीं है , लो अब मैंने कवच हटा दिया अब सामना करो मेरा।
याग्नेश के द्वारा कवच के हटाए जाने पर सुजान सिंह एक बार फिर अपनी तलवार लेकर सज्ज हो गया दोनों योद्धा किसी मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भीड गए थे, ना कोई किसी से कम ना कोई किसी से ज्यादा ।
यहां दूसरी ओर राजगुरु विद्याधर अब तक समझ चुके थे सुजान सिंह अकेले याग्नेश का सामना ज्यादा देर तक, नहीं कर सकते और यदी वो राजा की सहायता करने जाता है तो ऐसी स्थिती में याग्नेश भी अपनी काली शक्तियों का प्रयोग करेगा अब तक राजगुरु याग्नेश की शक्तियों को देखकर इतना तो समझ ही चुके थे कि वह उसकी शक्तियों का अकेले सामना नहीं कर सकते
राजगुरू जानते थे के युद्धवीर सिंह की सहायता के बीना वो इस समय याग्नेश को नहीं रोक सकते ।
इसीलिए राजगुरु उस ओर चल पड़ा जहां अभी भी युद्धवीर सिंह भूमि पर पड़ा था, युद्धवीर सिंह को भी अब तक होश आ गया था वह बड़ी कठिनाई से उठने का प्रयत्न कर रहा था , युद्धवीर सिंह को जीवित देखकर राजगुरु की जान में जान आई उसने आगे बढ़ कर युद्धवीर सिंह को सहारा देकर बैठा दिया
राजगुरु -- शुक्र है युद्धवीर सिंह कि तुम सही सलामत हो , तुम्हारी सहायता के बिना याग्नेश को रोकना संभव है।
युद्धवीर सिंह -- राजगुरु यहां मैं खड़ा होने में भी असमर्थ हो रहा हूं और आप कह रहे हो कि मैं याग्नेश का सामना करो , क्षमा करें राजगुरु परंतु अब मैं इस स्थिति में नहीं हूं क्या आपकी कोई सहायता कर सकूं। परंतु आपको मै इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता बता सकता हूं जो शायद आप भूल गए हो।
राजगुरु -- कैसा रास्ता , इस समय यूं पहेलीयों मे बात मत करों , स्पष्ट कहो क्या कहना चाहते हो , जरा विस्तार से बताओ।
युद्धवीर सिंह -- राजगुरु आप शायद छोटी रानी को भूल गए हो, एक वही है जो इस समय राजा की रक्षा कर सकती है।
राजगुरु -- बात तो तुम्हारी ठीक है परंतु छोटी रानी तो वर्षों पहले अपने नन्हे कुमार के साथ महल को छोड़कर चली गई थी और वह अब इस समय कहां है किसी को नहीं पता।
युद्धवीर सिंह -- यही तो फर्क है आप में और मुझ में राजगुरु, जीवन मे सफल होने के लिए दुरदर्शीता होना आवश्यक हैं । मुझे पहले ही पता था के इस प्रकार की परिस्थिति सामने आ सकती हैं , इसलिए मैंने पहले ही उन्हें ढूंढ निकाला है, इसलिए अब ज्यादा देर मत करो और शीघ्र जाओ महल के तहखाने में स्थित कैद में तुम्हें वह मिल जाएगी।
युद्धवीर सिंह की बात सुनकर राजगुरु ने तुरंत महल की ओर दौड़ लगा दी।
यहां सुजान सिंह और याग्नेश का युद्ध अपने चरम सीमा पर था, दोनों इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो चुके थे याग्नेश के प्रभावशाली वार को सहते सहते सुजान सिंह के शरीर की शक्ति कम हो गई थी, वह बुरी तरह थक चूका था, और इसी बात का फायदा उठाकर याग्नेश ने अपनी शक्ति एकत्रित करके अपनी जगह से उछलकर अपने दोनों पैरों का वार सुजान सिंह के सीने पर किया जिससे सुजान सिंह भूमि पर गिर गया।
याग्नेश ने अपना अंतिम वार करने के लिए सुजान सिंह के सीने पर पैर रखा हर तलवार हवा में उठाई ही थी की इससे पहले कि वह सुजान सिंह पर वार करता राजगुरु की आवाज वहां गूंज उठी।
राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश सुजान सिंह को मारने से पहले जरा एक बार यहां देख लो कहीं ऐसा ना हो कि बाद में तुम्हें पछताना पड़े।
राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।
आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शीघ्र ही ---
आप सब पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस कहानी के प्रति अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
आपके सहयोग का अभिलाषी
आपका मित्र - अभिनव![]()
Maine tino update back to back padhe Jabki mujhe subah jaldi jagna tha, lekin ek baar dekha to padhta chla gya, mujhse ruka hi nhi gya bhai...Update - 10
राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।
अब आगे ----
सामने खड़ी थी राजगुरु के साथ एक स्त्री और उसके साथ सोलह 17 साल का एक युवक उस स्त्री को देखकर याग्नेश की आंखों में अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी जैसे ही उस स्त्री की दृष्टि याग्नेश पर पड़ी तो उसके नेत्र से भी अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी उसका कंठ रुद्ध हो गया।
भर्आए गले से उस स्त्री के मुख से एक शब्द् निकला
भैया ऽऽऽ-------
इस एक शब्द में उसके ह्रदय का प्रेम दुख सब व्यक्त हो रहा था यह एक शब्द ही पर्याप्त था उसके ह्रदय का हाल बताने के लिए।
जी हां या और कोई नहीं याग्नेश की बहन श्रुति थी जिसे उसने उसके परिवार के साथ घटित घटना के कारण मरा हुआ समझ लिया था, आज इतने वर्षों के पश्चात अपने सामने अपने भाई को देखकर श्रुति के नेत्रों से अश्रु थे के रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे उसका शरीर अत्यंत प्रसन्नता एवं दुख के मिले-जुले प्रभाव के कारण कांप रहा था वह दौड़ कर अपने भाई के गले लगना चाहती थी उसने अपने कदम याग्नेश की ओर बढ़ाएं ही थे के राजगुरु ने कुमार को पकड़ लिया और उसकी गर्दन पर तलवार रखते हुए बोला
राजगुरु -- रुक जाइए छोटी रानी जी इतनी शीघ्रता भी कैसी अपने भाई को मिलने की कहीं ऐसा ना हो के भाई को मिलने के चक्कर में अपना बेटा ना खो दो।
श्रुति ने जब पलट कर देखा तो उसके पदम वहीं रुक गए वह बेबसी से राजगुरु की ओर देख रही थी एक तरफ उसका पुत्र था जो उसके जीने का एकमात्र सहारा था तो दूसरी और उसका भाई था ।
अब तक जागने समझ चुका था के राजगुरु ने जीस युवक के गर्दन पर तलवार रखी थी और कोई नहीं उसकी बहन श्रुति का पुत्र था उस का भांजा था अपनी बहन की विवशता देखकर याग्नेश की आंखों में क्रोध उतर आया।
तब तक सुजान सिंह भी संभल कर खड़ा हो चुका था याग्नेश का पूरा ध्यान उसकी बहन की ओर देखकर सुजान सिंह ने याग्नेश पर अपनी तलवार से वार किया।
सुजान सिंह को तलवार उठाते हुए श्रुति ने देख लिया था वह अपने भाई को सचेत करने के लिए जोर से चिल्लाई भैया संभलो अपनी बहन के पुकारने का तात्पर्य याग्नेश समझ चुका था इसलिए वह अपनी जगह से थोड़ा पीछे हटा परंतु तब तक सुजान सिंह की तलवार याग्नेश के सीने पर एक बड़ा सा घाव कर गई थी।
दूसरा वार करने के लिए सुजान सिंह ने अपनी तलवार ऊपर उठाई ही थी याग्नेश ने एक जोरदार ठोकर सुजान सिंह की कलाई पर मारी जिससे उसकी तलवार दूर जाकर गिरी याग्नेश ने बड़ी फुर्ती से सुजान सिंह का गला पकड़ कर उसे हवा में उठा दिया।
उसी की पकड़ सुजान सिंह के गले पर कसने लगी जिससे सुजान सिंह का दम घुटने लगा
राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश ! यदि राजा सुजान सिंह को कुछ भी हुआ तो कुमार का सिर धड़ से अलग हो जाएगा और जिस बहन को तुम बरसो बाद देख रहे हो वह तुम्हारी बहन भी जीवित नहीं रहेगी।
राजगुरु की बात सुनकर याग्नेश ने विवश होकर सुजान सिंह को छोड़ दिया। भूमि पर गिरकर सुजान सिंह अपनी सांसो को नियंत्रित करने लगा।
याग्नेश - राजगुरु ! छोड़ दो कुमार और श्रुति को नहीं तो यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा , तुम जानते हो मुझे मेरा वचन कभी भी मिथ्या नहीं होता , अभी भी समय है संभल जाओ छोड़ दो सुजान सिंह का साथ तो शायद मैं तुम्हें जीवन दान दे दूं।
राजगुरु - मृत्यु के मुख में तुम स्वयं खड़े हो और मुझे जीवन दान देने की बात कर रहे हो , मानना पड़ेगा तुम्हें । अंतिम बार देख लो अपनी बहन और भांजे को जी भर के क्योंकि अब तुम मृत्यु का ग्रास बनने जा रहे हो।
तब तक सुजान सिंह भी संभल चुका था
सुजान सिंह -- बहुत खूब राजगुरु ! बहुत खूब , तुम सही समय पर इन दोनों को यहां लाए नहीं तो यह मुझे यमलोक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर चुका था।
(याग्नेश की ओर मुड़ कर ) तो कहो भूतपूर्व आचार्य किस प्रकार मरना पसंद करोगे तड़प तड़प कर या आसान मौत।
ऐसी विकट परिस्थिति देखकर श्रुति ने सुजान सिंह की ओर देखते हुए दोनों हाथ जोड़ दिए---
श्रुति -- आप क्यों ऐसा कर रहे हो , कुमार तो आपका पुत्र है अपने ही पुत्र के साथ इस तरह का व्यवहार , आप किस प्रकार कर सकते हो जाने दो मेरे भाई आपको जो भी करना है मेरे साथ करो परंतु मेरे कुमार और मेरे भाई को छोड़ दो।
( राजगुरु की ओर देखते हुए ) मैंने तो आपको अपना दादा समान माना था आप तो हमारे घर के सदस्य थे फिर क्यों आपने हमारे साथ ऐसा किया।
सुजान सिंह -- छोड़ दूं तुम्हारे भाई तुम ऐसा कैसे कह सकती हो जो व्यक्ति तुम्हारे पति परमेश्वर के खून का प्यासा हो हत्या करना चाहता हो तुम उसे छोड़ने को कह रही हो किस प्रकार की पत्नी हो। मैं जो कुछ भी कर रहा हूं अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए कर रहा हूं इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
अपनी बहन को इस तरह सुजान सिंह और राजगुरु के आगे हाथ जोड़ता हुआ देखकर याग्नेश के हृदय पर आघात होने लगा,
अब तक उसे इस बात का पता नहीं था क्या कुमार किसकी संतान है और श्रुति का विवाह किससे हुआ परंतु अब श्रुति की बातें सुनकर उसे पता चल गया कि सुजान सिंह ही श्रुति के पुत्र कुमार का पिता है।
याग्नेश -- मत जोड़ो हाथ श्रुती इन दोनों के सामने , जो हमारे परिवार की बर्बादी के जिम्मेदार है । मेरे साथ जो भी होना है वह होने दो, तुम्हें इस प्रकार दोनों से विनती करते हुए देखने से अच्छा तो मैं मृत्यु को अपने गले लगा लूं, मरतो मैं वैसे ही गया यह देख कर मेरी प्यारी छोटी बहन ने उसके साथ विवाह किया जो हमारे परिवार के विनाश का कारण है।
श्रुति -- मुझे क्षमा कर दो भैया मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता था , मेरे साथ बहुत बड़ा छल हुआ है और मैं परिस्थितियों के आगे विवश थी , मुझे नहीं पता था जिसने नगर वालों की क्रोध से मेरे प्राणों की रक्षा की वही हमारे परिवार के विनाश का कारण है परंतु जब तक मुझे पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।
सुजान सिंह द्वारा नगर वालों के क्रोध से श्रुति के प्राण बचाये जाने को सुनकर याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ा
याग्नेश -- सुजान सिंह तुमने भले ही कितनी ही अपराध किए हो, परंतु मेरी बहन के जीवन की रक्षा करके तुमने अपने प्राणों की रक्षा की है, मैं तुम्हें एक अंतिम बार जीवन दान देता हूं।
सुजान सिंह -- तुम तो मुझे जीवन दान दे रहे हो, परंतु मैं यह गलती नहीं कर सकता इतना कहकर सुजान सिंह ने तुरंत अपनी तलवार याग्नेश के पेट में उतार दी।
" नहीं ऽऽऽऽ भैया ऽऽऽऽ " यह चीख श्रुति की थी, अपने भाई पर प्राणघातक वार होता देखकर उसका कलेजा कांप गया। वह अपने भाई की ओर दौड़ी ही थी कि तभी राजगुरु की आवाज में उसके कदम रोक लिए , यह कैसी विवशता थी अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए अपने घायल भाई से भी नहीं मिल पा रही थी उसकी सिसकियां अब रुदन में बदल गई थी।
सुजान सिंह की तलवार याग्नेश के पेट के आर पार हो गई थी याग्नेश अब घायल अवस्था में भूमि पर घुटनों के बल बैठ गया उसके मुख से रक्त निकलने लगा था।
तभी वहां किसी का स्वर गूंजा " रुक जाओ युद्धवीर सिंह रूक जाओ " यह स्वर समर सिंह का था , जो अब तक होश में आ चुका था । परंतु तब तक देर हो चुकी थी युद्धवीर सिंह अपना काम कर चुका था।
यहां जब याग्नेश , सुजान सिंह और श्रुति के बीच बाते चल रही थी , तब तक युद्धवीर सिंह ने अपने आप को संभाल लिया था और वो धीरे धीरे चलता हुआ याग्नेश के पीछे पहुंच गया था।
सुजान सिंह की तलवार से घायल याग्नेश जब भूमि पर बैठा तब उसने सही अवसर देखकर वही युद्ध भूमि में पड़ा हुआ एक भाला उठाकर याग्नेश की पीठ पर वार किया ।
तब तक समर सिंह को भी होश आ गया था वह भी युद्ध भूमि की परिस्थितियों को समझने का प्रयत्न ही कर रहा था कि उसने युद्धवीर सिंह को भाला उठाते हुए देख लिया।
जब तक वह युद्धवीर सिंह को रोकता तब तक वह भाला याग्नेश की पीठ को चीरता हुआ उसके सीने से होकर भूमि में धंस गया था एक साथ दो चीखें वहां गूंज उठी , एक चीख थी याग्नेश की तो दुसरी थी श्रुति की जो अपने भाई ऊपर ऐसा प्राणघातक वार देखकर मूर्छित हो गई।
सुजान सिंह -- वाह युद्धविर सिंह वाह ! समाप्त हो गया हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारी योजना सफल हुई आज मैं बहुत प्रसन्न हूं हमारी इतनी वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई, इसका श्रेय सबसे ज्यादा तुम्हीं को जाता है ।
यदि तुम श्रुति को ढूंढ कर ना लाते तो हमारे लिए याग्नेश को रोकना असंभव होता। मैं बहुत प्रसन्न हूं तुम पर , कहो तुम्हे क्या चाहिए , तुम्हें तुम्हारा मन चाहा पुरस्कार मिल जाएगा।
युद्धवीर सिंह -- महाराज आप की रक्षा करना और आपके शत्रु को समाप्त करना, यह तो हमारा कर्तव्य है ।
रही बात पुरस्कार की तो मुझे धन , सोना, चांदी, हीरे , जवाहरात कुछ नहीं चाहिए। यह तो आप जानते ही हैं मुझे केवल आश्रम की सत्ता चाहिए और वह जब तक विजयानंद जीवित है तब तक नहीं प्राप्त हो सकती।
सुजान सिंह -- हमारा सबसे बड़ा कांटा याग्नेश तो निकल ही गया युद्धवीर सिंह । रही बात विजयानंद की तो उसे समाप्त करना कोई कठिन कार्य नहीं । हम उस पर भी कोई ना कोई लांछन लगा देंगे तो आश्रम के अनुयाई और नगर के लोग ही उसे समाप्त कर देंगे।
राजगुरु -- जय हो महाराज जय हो, आखिर आप की योजना सफल हो ही गई मुझे बड़ी प्रसन्नता है के आप सुरक्षित हो एक समय तो मुझे ऐसा लगा कि हमारे सारे रास्ते बंद हो गए , परंतु तभी मुझे युद्धवीर सिंह से योजना के अंतिम चरण के बारे में पता चला। अब इन दोनो श्रुति और कुमार का क्या करें।
सुजान सिंह -- राजगुरु शत्रुओं का समूल नाश ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करती है । अब इन दोनों का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है , समाप्त कर दो दोनों को, जीते जी तो नहीं परंतु मरने के बाद ही सही मेरा मित्र याग्नेश अपनी बहन और भांजे से मिल तो सकेगा। अब मैं इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता के बिछडे परिवार का मीलन ना करवाऊं । हा हा हा हा ।
आज के लिए इतना ही अगला अपडेट शीघ्र ही ----------
सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि वह इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझाव अवश्य दें ----
स्वस्थ रहें , प्रसन्न रहें आपके सहयोग का अभिलाषी ----
आपका मित्र -- अभिनव![]()

यग्नेश ने जो किया वो अपने परिवार के बदले के लिए किया मगर उसको छल से मार कर सुजान सिंह और उसके साथियों ने और भी गलत किया। यग्नेश की गलती के लिए ईश्वर दूत उसको धमकी दे कर गया था तो राजगुरु जैसे सम्मानित व्यक्ति ने जो किया वो ईश्वर और उसके दूत को दिखाई नहीं दिया। ये तो लॉजिक ही गलत है फिर तो जो भी यग्नेश ने किया बिल्कुल सही किया था। यहां तो अच्छाई और बुराई की परिभाषा ही खतम हो गई है।Update - 10
राजगुरु की बात सुनकर जब याग्नेश ने उस ओर देखा , तो सामने खड़े व्यक्ति को देखकर वह स्तब्ध सा हो गया उसके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी , होंठ मानो सिल गए हो, वह बहुत कुछ कहना चाह रहा था परंतु शब्द उसका साथ नही दे रहे थे।
अब आगे ----
सामने खड़ी थी राजगुरु के साथ एक स्त्री और उसके साथ सोलह 17 साल का एक युवक उस स्त्री को देखकर याग्नेश की आंखों में अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी जैसे ही उस स्त्री की दृष्टि याग्नेश पर पड़ी तो उसके नेत्र से भी अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी उसका कंठ रुद्ध हो गया।
भर्आए गले से उस स्त्री के मुख से एक शब्द् निकला
भैया ऽऽऽ-------
इस एक शब्द में उसके ह्रदय का प्रेम दुख सब व्यक्त हो रहा था यह एक शब्द ही पर्याप्त था उसके ह्रदय का हाल बताने के लिए।
जी हां या और कोई नहीं याग्नेश की बहन श्रुति थी जिसे उसने उसके परिवार के साथ घटित घटना के कारण मरा हुआ समझ लिया था, आज इतने वर्षों के पश्चात अपने सामने अपने भाई को देखकर श्रुति के नेत्रों से अश्रु थे के रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे उसका शरीर अत्यंत प्रसन्नता एवं दुख के मिले-जुले प्रभाव के कारण कांप रहा था वह दौड़ कर अपने भाई के गले लगना चाहती थी उसने अपने कदम याग्नेश की ओर बढ़ाएं ही थे के राजगुरु ने कुमार को पकड़ लिया और उसकी गर्दन पर तलवार रखते हुए बोला
राजगुरु -- रुक जाइए छोटी रानी जी इतनी शीघ्रता भी कैसी अपने भाई को मिलने की कहीं ऐसा ना हो के भाई को मिलने के चक्कर में अपना बेटा ना खो दो।
श्रुति ने जब पलट कर देखा तो उसके पदम वहीं रुक गए वह बेबसी से राजगुरु की ओर देख रही थी एक तरफ उसका पुत्र था जो उसके जीने का एकमात्र सहारा था तो दूसरी और उसका भाई था ।
अब तक जागने समझ चुका था के राजगुरु ने जीस युवक के गर्दन पर तलवार रखी थी और कोई नहीं उसकी बहन श्रुति का पुत्र था उस का भांजा था अपनी बहन की विवशता देखकर याग्नेश की आंखों में क्रोध उतर आया।
तब तक सुजान सिंह भी संभल कर खड़ा हो चुका था याग्नेश का पूरा ध्यान उसकी बहन की ओर देखकर सुजान सिंह ने याग्नेश पर अपनी तलवार से वार किया।
सुजान सिंह को तलवार उठाते हुए श्रुति ने देख लिया था वह अपने भाई को सचेत करने के लिए जोर से चिल्लाई भैया संभलो अपनी बहन के पुकारने का तात्पर्य याग्नेश समझ चुका था इसलिए वह अपनी जगह से थोड़ा पीछे हटा परंतु तब तक सुजान सिंह की तलवार याग्नेश के सीने पर एक बड़ा सा घाव कर गई थी।
दूसरा वार करने के लिए सुजान सिंह ने अपनी तलवार ऊपर उठाई ही थी याग्नेश ने एक जोरदार ठोकर सुजान सिंह की कलाई पर मारी जिससे उसकी तलवार दूर जाकर गिरी याग्नेश ने बड़ी फुर्ती से सुजान सिंह का गला पकड़ कर उसे हवा में उठा दिया।
उसी की पकड़ सुजान सिंह के गले पर कसने लगी जिससे सुजान सिंह का दम घुटने लगा
राजगुरु -- रुक जाओ याग्नेश ! यदि राजा सुजान सिंह को कुछ भी हुआ तो कुमार का सिर धड़ से अलग हो जाएगा और जिस बहन को तुम बरसो बाद देख रहे हो वह तुम्हारी बहन भी जीवित नहीं रहेगी।
राजगुरु की बात सुनकर याग्नेश ने विवश होकर सुजान सिंह को छोड़ दिया। भूमि पर गिरकर सुजान सिंह अपनी सांसो को नियंत्रित करने लगा।
याग्नेश - राजगुरु ! छोड़ दो कुमार और श्रुति को नहीं तो यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा , तुम जानते हो मुझे मेरा वचन कभी भी मिथ्या नहीं होता , अभी भी समय है संभल जाओ छोड़ दो सुजान सिंह का साथ तो शायद मैं तुम्हें जीवन दान दे दूं।
राजगुरु - मृत्यु के मुख में तुम स्वयं खड़े हो और मुझे जीवन दान देने की बात कर रहे हो , मानना पड़ेगा तुम्हें । अंतिम बार देख लो अपनी बहन और भांजे को जी भर के क्योंकि अब तुम मृत्यु का ग्रास बनने जा रहे हो।
तब तक सुजान सिंह भी संभल चुका था
सुजान सिंह -- बहुत खूब राजगुरु ! बहुत खूब , तुम सही समय पर इन दोनों को यहां लाए नहीं तो यह मुझे यमलोक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर चुका था।
(याग्नेश की ओर मुड़ कर ) तो कहो भूतपूर्व आचार्य किस प्रकार मरना पसंद करोगे तड़प तड़प कर या आसान मौत।
ऐसी विकट परिस्थिति देखकर श्रुति ने सुजान सिंह की ओर देखते हुए दोनों हाथ जोड़ दिए---
श्रुति -- आप क्यों ऐसा कर रहे हो , कुमार तो आपका पुत्र है अपने ही पुत्र के साथ इस तरह का व्यवहार , आप किस प्रकार कर सकते हो जाने दो मेरे भाई आपको जो भी करना है मेरे साथ करो परंतु मेरे कुमार और मेरे भाई को छोड़ दो।
( राजगुरु की ओर देखते हुए ) मैंने तो आपको अपना दादा समान माना था आप तो हमारे घर के सदस्य थे फिर क्यों आपने हमारे साथ ऐसा किया।
सुजान सिंह -- छोड़ दूं तुम्हारे भाई तुम ऐसा कैसे कह सकती हो जो व्यक्ति तुम्हारे पति परमेश्वर के खून का प्यासा हो हत्या करना चाहता हो तुम उसे छोड़ने को कह रही हो किस प्रकार की पत्नी हो। मैं जो कुछ भी कर रहा हूं अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए कर रहा हूं इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
अपनी बहन को इस तरह सुजान सिंह और राजगुरु के आगे हाथ जोड़ता हुआ देखकर याग्नेश के हृदय पर आघात होने लगा,
अब तक उसे इस बात का पता नहीं था क्या कुमार किसकी संतान है और श्रुति का विवाह किससे हुआ परंतु अब श्रुति की बातें सुनकर उसे पता चल गया कि सुजान सिंह ही श्रुति के पुत्र कुमार का पिता है।
याग्नेश -- मत जोड़ो हाथ श्रुती इन दोनों के सामने , जो हमारे परिवार की बर्बादी के जिम्मेदार है । मेरे साथ जो भी होना है वह होने दो, तुम्हें इस प्रकार दोनों से विनती करते हुए देखने से अच्छा तो मैं मृत्यु को अपने गले लगा लूं, मरतो मैं वैसे ही गया यह देख कर मेरी प्यारी छोटी बहन ने उसके साथ विवाह किया जो हमारे परिवार के विनाश का कारण है।
श्रुति -- मुझे क्षमा कर दो भैया मुझे इस बारे में कुछ भी नहीं पता था , मेरे साथ बहुत बड़ा छल हुआ है और मैं परिस्थितियों के आगे विवश थी , मुझे नहीं पता था जिसने नगर वालों की क्रोध से मेरे प्राणों की रक्षा की वही हमारे परिवार के विनाश का कारण है परंतु जब तक मुझे पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।
सुजान सिंह द्वारा नगर वालों के क्रोध से श्रुति के प्राण बचाये जाने को सुनकर याग्नेश सुजान सिंह की ओर मुड़ा
याग्नेश -- सुजान सिंह तुमने भले ही कितनी ही अपराध किए हो, परंतु मेरी बहन के जीवन की रक्षा करके तुमने अपने प्राणों की रक्षा की है, मैं तुम्हें एक अंतिम बार जीवन दान देता हूं।
सुजान सिंह -- तुम तो मुझे जीवन दान दे रहे हो, परंतु मैं यह गलती नहीं कर सकता इतना कहकर सुजान सिंह ने तुरंत अपनी तलवार याग्नेश के पेट में उतार दी।
" नहीं ऽऽऽऽ भैया ऽऽऽऽ " यह चीख श्रुति की थी, अपने भाई पर प्राणघातक वार होता देखकर उसका कलेजा कांप गया। वह अपने भाई की ओर दौड़ी ही थी कि तभी राजगुरु की आवाज में उसके कदम रोक लिए , यह कैसी विवशता थी अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए अपने घायल भाई से भी नहीं मिल पा रही थी उसकी सिसकियां अब रुदन में बदल गई थी।
सुजान सिंह की तलवार याग्नेश के पेट के आर पार हो गई थी याग्नेश अब घायल अवस्था में भूमि पर घुटनों के बल बैठ गया उसके मुख से रक्त निकलने लगा था।
तभी वहां किसी का स्वर गूंजा " रुक जाओ युद्धवीर सिंह रूक जाओ " यह स्वर समर सिंह का था , जो अब तक होश में आ चुका था । परंतु तब तक देर हो चुकी थी युद्धवीर सिंह अपना काम कर चुका था।
यहां जब याग्नेश , सुजान सिंह और श्रुति के बीच बाते चल रही थी , तब तक युद्धवीर सिंह ने अपने आप को संभाल लिया था और वो धीरे धीरे चलता हुआ याग्नेश के पीछे पहुंच गया था।
सुजान सिंह की तलवार से घायल याग्नेश जब भूमि पर बैठा तब उसने सही अवसर देखकर वही युद्ध भूमि में पड़ा हुआ एक भाला उठाकर याग्नेश की पीठ पर वार किया ।
तब तक समर सिंह को भी होश आ गया था वह भी युद्ध भूमि की परिस्थितियों को समझने का प्रयत्न ही कर रहा था कि उसने युद्धवीर सिंह को भाला उठाते हुए देख लिया।
जब तक वह युद्धवीर सिंह को रोकता तब तक वह भाला याग्नेश की पीठ को चीरता हुआ उसके सीने से होकर भूमि में धंस गया था एक साथ दो चीखें वहां गूंज उठी , एक चीख थी याग्नेश की तो दुसरी थी श्रुति की जो अपने भाई ऊपर ऐसा प्राणघातक वार देखकर मूर्छित हो गई।
सुजान सिंह -- वाह युद्धविर सिंह वाह ! समाप्त हो गया हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारी योजना सफल हुई आज मैं बहुत प्रसन्न हूं हमारी इतनी वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई, इसका श्रेय सबसे ज्यादा तुम्हीं को जाता है ।
यदि तुम श्रुति को ढूंढ कर ना लाते तो हमारे लिए याग्नेश को रोकना असंभव होता। मैं बहुत प्रसन्न हूं तुम पर , कहो तुम्हे क्या चाहिए , तुम्हें तुम्हारा मन चाहा पुरस्कार मिल जाएगा।
युद्धवीर सिंह -- महाराज आप की रक्षा करना और आपके शत्रु को समाप्त करना, यह तो हमारा कर्तव्य है ।
रही बात पुरस्कार की तो मुझे धन , सोना, चांदी, हीरे , जवाहरात कुछ नहीं चाहिए। यह तो आप जानते ही हैं मुझे केवल आश्रम की सत्ता चाहिए और वह जब तक विजयानंद जीवित है तब तक नहीं प्राप्त हो सकती।
सुजान सिंह -- हमारा सबसे बड़ा कांटा याग्नेश तो निकल ही गया युद्धवीर सिंह । रही बात विजयानंद की तो उसे समाप्त करना कोई कठिन कार्य नहीं । हम उस पर भी कोई ना कोई लांछन लगा देंगे तो आश्रम के अनुयाई और नगर के लोग ही उसे समाप्त कर देंगे।
राजगुरु -- जय हो महाराज जय हो, आखिर आप की योजना सफल हो ही गई मुझे बड़ी प्रसन्नता है के आप सुरक्षित हो एक समय तो मुझे ऐसा लगा कि हमारे सारे रास्ते बंद हो गए , परंतु तभी मुझे युद्धवीर सिंह से योजना के अंतिम चरण के बारे में पता चला। अब इन दोनो श्रुति और कुमार का क्या करें।
सुजान सिंह -- राजगुरु शत्रुओं का समूल नाश ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करती है । अब इन दोनों का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं है , समाप्त कर दो दोनों को, जीते जी तो नहीं परंतु मरने के बाद ही सही मेरा मित्र याग्नेश अपनी बहन और भांजे से मिल तो सकेगा। अब मैं इतना निष्ठुर तो नहीं हो सकता के बिछडे परिवार का मीलन ना करवाऊं । हा हा हा हा ।
आज के लिए इतना ही अगला अपडेट शीघ्र ही ----------
सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि वह इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया एवं सुझाव अवश्य दें ----
स्वस्थ रहें , प्रसन्न रहें आपके सहयोग का अभिलाषी ----
आपका मित्र -- अभिनव![]()
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई हमेशा की तरह बहुत ही बेहतरीन आपकी इस समीक्षा के लिएMaine tino update back to back padhe Jabki mujhe subah jaldi jagna tha, lekin ek baar dekha to padhta chla gya, mujhse ruka hi nhi gya bhai...
Superb jabarjast sandar lajvab updates
Yuddhvir, rajguru, sujan singh ne milkr jo yojna Bnai usme ek stri ko visvash karke uske bhai or bete ke Bich lakr Khada kr diya, Vaise Mai is yojna ko Acchi yojna Bilkul bhi nhi kahunga kyoki ye kisi bhi angle se satvik nhi thi isme chhal kapat kali shaktiyo ka purntya prayog tha dono hi paksho me...
Samar singh ka samajh sakte hai ki Vo Pahle bhi swet urja dhari tha or ab bhi swet urja dhari hai pr uske alava idhar koi bhi purn rup se swet urja dhari nhi hai...
Shruti jo Yagnesh ki bahan hai, jisko Usne mrit samajh liya tha, ab itne varsho baad jivit dekha bhi to kis rup me, dushman ki patni ke rup me jo pure parivar ki Vinash ka karan hai...
Pr yah sahi rha ki shruti ke bacche ko bhi aaj sab pta Chal gya ki uske pita kis tarah ke hai sayad vo kuchh parivartan la sake aage chal ke...
Yagnesh ko to mahamahim ka vardan hai ki use sirf uska hi khoon maar sakta hai jo positive and negative dono hi urja ko balance kar sakta ho, isliye uska in sabke hatho marna asambhav hai, Dekhte hai Samar singh shruti or uske bete ko bcha paata hai ya nhi...
Superb bhai...![]()
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई हमेशा की तरह बहुत ही बेहतरीन रिव्यु दिया है आपने।यग्नेश ने जो किया वो अपने परिवार के बदले के लिए किया मगर उसको छल से मार कर सुजान सिंह और उसके साथियों ने और भी गलत किया। यग्नेश की गलती के लिए ईश्वर दूत उसको धमकी दे कर गया था तो राजगुरु जैसे सम्मानित व्यक्ति ने जो किया वो ईश्वर और उसके दूत को दिखाई नहीं दिया। ये तो लॉजिक ही गलत है फिर तो जो भी यग्नेश ने किया बिल्कुल सही किया था। यहां तो अच्छाई और बुराई की परिभाषा ही खतम हो गई है।