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Id toh yaad hai bhai lekin ab iss id se story start kar chuka hu , issiliye ab isse hi chalne dete hai , ussko start karenge toh phir se pura update likhna padegaId to yaad hogi hi, Aap kaho to Siraj Bhai se baat karke aapki id ka password nya banva dete hai...
aap purani ID se hi story likhte, aapke kafi fan honge usme to...
दोस्तों मैं आपका मित्र अभिनव आया हूं एक और नई कहानी लेकर अपनी नई आईडी से----
आशा करता हूं कि जिस प्रकार मेरी पहले की दोनों कहानियों ,ABHI - THE WARRIOR 1& 2 को आप सब का भरपूर प्यार मिला उसी प्रकार इस कहानी को भी मिलेगा
वैसे मैं कोई लेखक नहीं हूं परंतु कुछ किरदार मेरे मस्तिष्क में हलचल मचा रहे थे तो बस उन्हें ही यहां उतारने का प्रयत्न कर रहा हूं जैसे पहले की दोनों कहानियां पूरी हुई उसी प्रकार यह कहानी भी पूरी होगी प्रयत्न करूंगा कि रोज कम से कम एक अपडेट तो दे सकूं।
यह कहानी देवत्व प्राप्त करने के संघर्ष की है हर महत्वकांक्षी व्यक्ति इस समाज में अपने आप को देव तुल्य स्थापित करना चाहता है आने को शक्तियां और भौतिक वैभव से वह अपने आप को देवतुल्य बनाना चाहता है और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उचित अनुचित है जो चाहे कर्म करने लग जाता है फलस्वरूप वह देवत्व हो तो प्राप्त कर नहीं पाता परंतु ही कसूर जरूर बन जाता है।
वहीं दूसरी ओर बिना किसी महत्वकांक्षा के समाज के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण करता है अपने जन्म के उद्देश्य को समझ कर निस्वार्थ भाव से कर्म करता है वह अनायास ही देवत्व को प्राप्त कर जाता है।
ज्यादा बातें ना करते हुए तो चलो चलते हैं कहानी की ओर----- धन्यवाद
INDEX
Update 1 update 2 update 3 update 4 update 5 update 6 update 7 update 8 update 9 update 10
Update 11 update 12 update 13 update 14 update 15 update 16 update 17 update 18 update 19 update 20
Update 21 update 22 update 23 update 24 update 25 update 26 update 27 update 28 update 29 update 30
Update 31 update 32 update 33 update 34 update 35 update 36 update 37 update 38 update 39 update 40
Update 41 update 42 update 43 update 44 update 45 update 46 update 47 update 48 update 49 update 50
Update 51 update 52 update 53 update 54 update 55 update 56 update 57 update 58 update 59 update 60
देवत्व -- एक संघर्ष गाथाCode:
Update 1 काली घनी अंधेरी रात गगनचुंबी बड़े-बड़े वृक्षों से भरे हुए वन के मध्य में कल-कल बहती हुई नदी के किनारे एक गुफा के आहते में टिमटिमाती हुई कुछ मशाले जल रही थी और साथ ही खड़े थे कुछ लोग जो हाथ जोड़कर ना जाने क्या प्रार्थना कर रहे थे। गुफा के भीतर का भी दृश्य कुछ इस प्रकार था वहां भी कुछ लोग हाथ जोड़े कुछ प्रार्थना कर रहे थे ।
गुफा के मध्य भाग में कुछ काले लबादा पहने लोग एक घेरा बनाकर खड़े थे वहां फैले सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज उभरी----
"क्या आप समझते हैं कि क्या होना चाहिए?" आचार्य यग्नेश ने गंभीर स्वर में पूछा।
उसके सामने एक बड़े पत्थर की पटिया पर एक आदमी लेटा था। उसकी नीली कमीज कभी महंगे कपडे हुआ करती थी, लेकिन अब वह फटी और गंदी हो गई है।
उसके माथे से पसीना बह रहा था, पत्थर पर टपक रहा था। उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे और उसकी आँखें घबराकर कमरे में घूम रही थीं।
"हाँ-हाँ।
मेरा बलिदान आपको मेरी बेटी को ठीक करने की शक्ति देगा। कृपया, उसकी मदद करें। मैं अपना जीवन अपने बेटी के प्राण बचाने के लिए आपके सुपुर्द करता हु ।"
उसके शब्द सुनकर आचार्य के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई उसने गुफा के मध्य में वेदी के चारों ओर खड़े अपने शिष्यों को देखा जो कुछ मंत्रो का उच्चारण कर रहे थे।
उनके चेहरे केवल गुफा की कच्ची दीवारों के साथ लटकी हुई मशालों के तरफ थी। आचार्य ने एक गहरी साँस ली और अपना हाथ उस आदमी के नम माथे पर रख दिया।
याग्नेश-- "मैं आपकी बेटी को बचाऊंगा और उसे वह दूंगा जो मेरे परिवार को कभी नहीं मिला - जीवन का उपहार।" वह
आदमी मुश्किल से थूक निगल कर बोला । "धन्यवाद आचार्य---- आचार्य के चेहरे पर
एक खोखली मुस्कान उभर आई । वह फिर से असफल होने का जोखिम नहीं उठा सकते थे। जितने भी लोगो का उसने अब तक बलिदान दिया था उन सबकी पवित्र आत्माओं की आँखें मुक्ति के लिए हर रात सताती थी।
आचार्य ने अपने वस्त्र में एक गहरी जेब से दो चीजें निकालीं - एक बैंगनी क्रिस्टल और एक पिच-काले गोमेद जिसे उसने अपने हाथ में बांध लिया था। पत्थर की पटिया से उसने एक छोटा सा चाकू उठाया और अपने चारों ओर घेरे में खड़े पुरुषों और महिलाओं को देखा।और उस आदमी की तरफ बढा जो खुद को बलिदान करने वाला था,
आचार्य के शिष्यों ने मार्गदर्शन के लिए उसकी ओर देखा। उनमें से प्रत्येक ऐसा था जिसने अपने जीवन मे बहुत कुछ खोया था और बहुत कुछ सहा था, आचार्य ने उन्हे संगठीत किया था ।
आचार्य ने उनके लिए बहुत कुछ किया था, इसलिए वह समझ जानते थे कि कितनी दूर वे उसके पीछे चलेंगे। उनकी निष्ठा निर्विवाद थी। उन सब की तरफ देखकर
आचार्य ने बोलना शुरू किया -- "मेरे साथियों हम यहा आज कुछ ठोस फैसला लेने के लिए इकत्रीत हुए हैं। हमने हमेशा से सदियों से देवताओं से प्रार्थना की है,इसी आस मे के वे हमारी सहायता के लिए आएंगे। लेकिन हमारी पुजा का और श्रद्धा के बदले मे क्या मिला
"गरीबी और हताशा !" पुरुषों में से एक चिल्लाया।
“जब मेरे पति की मृत्यु हो गई तो मुझे वेश्यालय में काम करने के लिए मजबूर किया गया। क्यों
क्या उन्होंने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी?” एक औरत ने कहा ।
आचार्य ने फिर सिर हिलाया और कहा --- "हम सभी तथाकथित देवताओं के कारण पीड़ित हैं। कल्पना कीजिए कि हम उनकी जैसी शक्तियों के साथ क्या कर सकते हैं!”
अब समय आ गया है के हम स्वयं देवत्व को प्राप्त करें, और ये तभी हो सकता है जब हम उनकी शक्तिया प्राप्त कर ले और इसका एक ही मार्ग है बलिदान ।"
इतना कहकर आचार्य ने एक धारदार
चाकू को ऊपर उठा दिया, और पत्थर की पटिया पर बैठे आदमी की तरफ अपने कदम बढा दिये और शुरू हो गया मौत का नंगा नाच, पहला हलका वार उसके सीने पर करके उसके खून से सने चाकू को उपर उठाते हुए
और उसके सीने की ओर इशारा करते हुए------
"इस आदमी की सबसे गहरी इच्छा अपनी बेटी को बचाने की है"
कई अन्य लोगों की तरह, वह अपना बलिदान देने को तैयार है अपनी बेटी के लिए अपना जीवन। ”
आचार्य ने नीचे आदमी की आँखों में देखा।
"सभी एक साथ प्रार्थना करो। प्रार्थना करें कि हम सबके मालीक मुझे दवताओ की सारी ऊर्जा उपहार में दें। जिससे मैं आप सबको जीवन शक्ति प्रदान करने मे समर्थ हो सकता हूं । उस ऊर्जा से मैं आपकी मदद कर सकूंगा।"
उस जखमी आदमी ने अपनी बेटी को याद किया फिर अपनी आंखे बन्द करके प्रार्थना करने लगा " हे देवताओ मेरा बलीदान स्वीकार करो , मेरी सहायता करो ! मैं अपनी जान अपनी बेटी को बचाने के लिए देता हूं
मेरी फरियाद सुनो। मेरी जान उसके लिए।"
उसके इतना कहते ही आचार्य का चाकू उसकी छाती में घूस गया, और उसकी जोरदार चीख वहा फैले सन्नाटे को चीरते हुए गूंजने लगी।
उसके सीने में बार-बार छुरा घोंपते हुए याग्नेश ने एक बडा सा छेद बना दिया , जिसमे हाथ आसानी से जा सकें,
उस व्यक्ति के सीने से लाल रक्त का फव्वारा सा बहकर पत्थर के नीचे बहकर फर्श पर गुफा की कच्ची फर्श पर फैल रहा था।
उसका सिर एक ओर लूढक गया और उसने आखिरी बार सांस ली। आचार्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसके सीने में हाथ डाला, और उस का हृदय काटकर उसके सीने से बाहर निकाल दिया ।
उसने उसे अपने दोनों हाथों में एक साथ पकड़ रखा था वही पास रखे ऊचे आसन पर रखे क्रिस्टल और गोमेद के सामने आचार्य ने वो हृदय चढाया और अपने खून से सने दोनो हाथ जोडकर ----, "हे मेरे मालिक मेरे ईश्वर "मेरे भगवान,
हमारी प्रार्थना सुनो।
इस बलिदान को स्वीकार करो और हमें अपनी शक्तियां प्रदान करें। हमें की अपना चमत्कार दिखाओ",
उसके बाद उसने रक्त रीसते हुए हृदय को और सफेद और काले क्रिसटलो को अपनी दोनो हथेलीयों के बीच दबाकर निचोड़ने लगा और , साथ साथ कुछ मंत्र भी बुदबुदाने लगा , वह एक सेकंड के लिए रुक गया और फिर अपना मंत्र जारी रखा। हृदय को और सिकोड़ते हुए उसकी हथेलीयों से खून बहने लगा।
धीरे-धीरे काला रत्न सक्रिय होने लगा और वहां एक काला घना साया फैलने लगा उसकी ऊर्जा को आचार्य स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता था।
काले रत्न के सक्रिय होने पर आचार्य ने सफेद रत्न को सक्रिय करने के लिए देवताओं के मंत्र का उच्चारण शुरू किया बड़ी देर तक ऐसा करने पर भी वह श्वेत रत्न सक्रिय नहीं हुआ।
आज के इस बलिदान को भी व्यर्थ जाते हुए देख कर आचार्य की आंखें क्रोध में लाल हो गई। उसने ऐसा कई बार कीया था, लेकिन हत्यायो के इस घोर अन्धकार मे उसे कभी भी सफलता नही मीली ।
गुफा के ऊपर एक भयानक सन्नाटा छा गया। गरजती हवा और मशालों की टिमटिमाती लपटें ही सुनाई देने वाली आवाजें थीं। जब अंधेरा धीरे-धीरे काले गोमेद में घुस गया, तो सभी शिष्यों ने उसे देखा, लेकिन किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की। आचार्य ने धीरे से हाथ खोले। हृदय, क्रिस्टल और गोमेद अभी भी वहीं थे। कुछ भी नहीं बदला था।
हृदय को फर्श पर फेंकते ही वह दहाड़ उठा, उसके बूट पर खून का आखिरी छिड़काव। "झूठे देवता!" वह गुफा की छत को देखते हुए चिल्लाया। "कब सुनोगे ? और कितने जीवन लगेंगे?”
वहा उपस्थित- सभी के चेहरे पर निराशा थी। आचार्य गुस्से में था। वह उन्हें फिर से विफल कर दिया था। देवताओं की शक्तियों का केवल एक अंश प्राप्त करने के अपने प्रयासों में उसने कितने लोगों की बलि दी थी? बीस? पच्चीस? रास्ते में उसने गिनती खो दी थी।
आचार्य ने दोनों रत्नों को अपनी जेब में भर लिया और गुफा से बाहर सर्द रात में चला गया। गुफा से बाहर निकल कर आचार्य एक जगह बैठ गए आंखों में क्रोध और चेहरे पर कठोरता लिए उन्होंने एक बार आसमान को घूरा और फिर आंखें बंद करके ना जाने किन ख्यालों में गुम हो गए कि उनकी आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदे धरती पर गिर पड़ी गहरी सांस लेकर वही लेट गए और अपने बीते कल और आने वाले कल के बारे में सोचने लगे।
ये थे आचार्य याग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे। इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।
आज के लिए इतना ही, अगला अपडेट जल्द ही______
सभी पाठको से निवेदन है के इस कहानी पर अपने बहुमुल्य सुझाव और प्रतिक्रीया आवश्य दे।
आपका मित्र - अभिनव![]()
for new thread brother &Aapki real ID hoti to support karne bhi kahta pr rule ke mutabik ye id manya nhi hogi,Id toh yaad hai bhai lekin ab iss id se story start kar chuka hu , issiliye ab isse hi chalne dete hai , ussko start karenge toh phir se pura update likhna padega
by the way bst of luck for voting
thanku for ur lovely support![]()
for new thread brother &
Welcome back
Bahut bahut dhanywad Naik bhai aapke support k liye aise hi saath banaye rakheKahani ki shuruwat tow bade khaternaak dhang se huwi h yeh acharya Yagnesh tow ek insaan k roop shaitan ho gaya aisi kia mazboori aa gayi jo masoomo ko bewakoof bana ker unki bali k naam per hatya ker raha h
Baherhal dekhte h aage kia hota
Shaandaar shuruwat bhai
Thanks bhai ...maine aapki salah par MOD Lucifer se iss baare mein req ki hai ..dekhte hai kya hota haiAapki real ID hoti to support karne bhi kahta pr rule ke mutabik ye id manya nhi hogi,
Ha Aap Sayad aisa karva sake to behtar hoga, MOD se kah kr us id ka data Sara is id me transfer karva sako to ise hi original ID ghosit kr diya jata...