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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

jaggi57

Abhinav
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Id to yaad hogi hi, Aap kaho to Siraj Bhai se baat karke aapki id ka password nya banva dete hai...
aap purani ID se hi story likhte, aapke kafi fan honge usme to...
Id toh yaad hai bhai lekin ab iss id se story start kar chuka hu , issiliye ab isse hi chalne dete hai , ussko start karenge toh phir se pura update likhna padega

by the way bst of luck for voting
thanku for ur lovely support 💐💐
 

Naik

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दोस्तों मैं आपका मित्र अभिनव आया हूं एक और नई कहानी लेकर अपनी नई आईडी से----
आशा करता हूं कि जिस प्रकार मेरी पहले की दोनों कहानियों ,ABHI - THE WARRIOR 1& 2 को आप सब का भरपूर प्यार मिला उसी प्रकार इस कहानी को भी मिलेगा

वैसे मैं कोई लेखक नहीं हूं परंतु कुछ किरदार मेरे मस्तिष्क में हलचल मचा रहे थे तो बस उन्हें ही यहां उतारने का प्रयत्न कर रहा हूं जैसे पहले की दोनों कहानियां पूरी हुई उसी प्रकार यह कहानी भी पूरी होगी प्रयत्न करूंगा कि रोज कम से कम एक अपडेट तो दे सकूं।


यह कहानी देवत्व प्राप्त करने के संघर्ष की है हर महत्वकांक्षी व्यक्ति इस समाज में अपने आप को देव तुल्य स्थापित करना चाहता है आने को शक्तियां और भौतिक वैभव से वह अपने आप को देवतुल्य बनाना चाहता है और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उचित अनुचित है जो चाहे कर्म करने लग जाता है फलस्वरूप वह देवत्व हो तो प्राप्त कर नहीं पाता परंतु ही कसूर जरूर बन जाता है।
वहीं दूसरी ओर बिना किसी महत्वकांक्षा के समाज के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण करता है अपने जन्म के उद्देश्य को समझ कर निस्वार्थ भाव से कर्म करता है वह अनायास ही देवत्व को प्राप्त कर जाता है।
ज्यादा बातें ना करते हुए तो चलो चलते हैं कहानी की ओर----- धन्यवाद🙏🙏

INDEX


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Code:
देवत्व -- एक संघर्ष गाथा

Update 1 काली घनी अंधेरी रात गगनचुंबी बड़े-बड़े वृक्षों से भरे हुए वन के मध्य में कल-कल बहती हुई नदी के किनारे एक गुफा के आहते में टिमटिमाती हुई कुछ मशाले जल रही थी और साथ ही खड़े थे कुछ लोग जो हाथ जोड़कर ना जाने क्या प्रार्थना कर रहे थे। गुफा के भीतर का भी दृश्य कुछ इस प्रकार था वहां भी कुछ लोग हाथ जोड़े कुछ प्रार्थना कर रहे थे ।

गुफा के मध्य भाग में कुछ काले लबादा पहने लोग एक घेरा बनाकर खड़े थे वहां फैले सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज उभरी----

"क्या आप समझते हैं कि क्या होना चाहिए?" आचार्य यग्नेश ने गंभीर स्वर में पूछा।


उसके सामने एक बड़े पत्थर की पटिया पर एक आदमी लेटा था। उसकी नीली कमीज कभी महंगे कपडे हुआ करती थी, लेकिन अब वह फटी और गंदी हो गई है।

उसके माथे से पसीना बह रहा था, पत्थर पर टपक रहा था।
उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे और उसकी आँखें घबराकर कमरे में घूम रही थीं।

"हाँ-हाँ।
मेरा बलिदान आपको मेरी बेटी को ठीक करने की शक्ति देगा। कृपया, उसकी मदद करें। मैं अपना जीवन अपने बेटी के प्राण बचाने के लिए आपके सुपुर्द करता हु ।"

उसके शब्द सुनकर आचार्य के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई उसने गुफा के मध्य में वेदी के चारों ओर खड़े अपने शिष्यों को देखा जो कुछ मंत्रो का उच्चारण कर रहे थे।


उनके चेहरे केवल गुफा की कच्ची दीवारों के साथ लटकी हुई मशालों के तरफ थी। आचार्य ने एक गहरी साँस ली और अपना हाथ उस आदमी के नम माथे पर रख दिया।
याग्नेश-- "मैं आपकी बेटी को बचाऊंगा और उसे वह दूंगा जो मेरे परिवार को कभी नहीं मिला - जीवन का उपहार।" वह

आदमी मुश्किल से थूक निगल कर बोला । "धन्यवाद आचार्य----
आचार्य के चेहरे पर

एक खोखली मुस्कान उभर आई । वह फिर से असफल होने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।
जितने भी लोगो का उसने अब तक बलिदान दिया था उन सबकी पवित्र आत्माओं की आँखें मुक्ति के लिए हर रात सताती थी।

आचार्य ने अपने वस्त्र में एक गहरी जेब से दो चीजें निकालीं - एक बैंगनी क्रिस्टल और एक पिच-काले गोमेद जिसे उसने अपने हाथ में बांध लिया था।
पत्थर की पटिया से उसने एक छोटा सा चाकू उठाया और अपने चारों ओर घेरे में खड़े पुरुषों और महिलाओं को देखा।और उस आदमी की तरफ बढा जो खुद को बलिदान करने वाला था,

आचार्य के शिष्यों ने मार्गदर्शन के लिए उसकी ओर देखा।
उनमें से प्रत्येक ऐसा था जिसने अपने जीवन मे बहुत कुछ खोया था और बहुत कुछ सहा था, आचार्य ने उन्हे संगठीत किया था ।
आचार्य ने उनके लिए बहुत कुछ किया था, इसलिए वह समझ जानते थे कि कितनी दूर वे उसके पीछे चलेंगे। उनकी निष्ठा निर्विवाद थी।
उन सब की तरफ देखकर

आचार्य ने बोलना शुरू किया -- "मेरे साथियों हम यहा आज कुछ ठोस फैसला लेने के लिए इकत्रीत हुए हैं।
हमने हमेशा से सदियों से देवताओं से प्रार्थना की है,इसी आस मे के वे हमारी सहायता के लिए आएंगे। लेकिन हमारी पुजा का और श्रद्धा के बदले मे क्या मिला

"गरीबी और हताशा !" पुरुषों में से एक चिल्लाया।

“जब मेरे पति की मृत्यु हो गई तो मुझे वेश्यालय में काम करने के लिए मजबूर किया गया। क्यों
क्या उन्होंने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी?” एक औरत ने कहा


आचार्य ने फिर सिर हिलाया और कहा --- "हम सभी तथाकथित देवताओं के कारण पीड़ित हैं। कल्पना कीजिए कि हम उनकी जैसी शक्तियों के साथ क्या कर सकते हैं!”

अब समय आ गया है के हम स्वयं देवत्व को प्राप्त करें, और ये तभी हो सकता है जब हम उनकी शक्तिया प्राप्त कर ले और इसका एक ही मार्ग है बलिदान ।"

इतना कहकर आचार्य ने एक धारदार
चाकू को ऊपर उठा दिया, और पत्थर की पटिया पर बैठे आदमी की तरफ अपने कदम बढा दिये और शुरू हो गया मौत का नंगा नाच, पहला हलका वार उसके सीने पर करके उसके खून से सने चाकू को उपर उठाते हुए
और उसके सीने की ओर इशारा करते हुए------
"इस आदमी की सबसे गहरी इच्छा अपनी बेटी को बचाने की है"
कई अन्य लोगों की तरह, वह अपना बलिदान देने को तैयार है अपनी बेटी के लिए अपना जीवन। ”

आचार्य ने नीचे आदमी की आँखों में देखा।

"सभी एक साथ प्रार्थना करो। प्रार्थना करें कि हम सबके मालीक मुझे दवताओ की सारी ऊर्जा उपहार में दें। जिससे मैं आप सबको जीवन शक्ति प्रदान करने मे समर्थ हो सकता हूं । उस ऊर्जा से मैं आपकी मदद कर सकूंगा।"

उस जखमी आदमी ने अपनी बेटी को याद किया फिर अपनी आंखे बन्द करके प्रार्थना करने लगा
" हे देवताओ मेरा बलीदान स्वीकार करो , मेरी सहायता करो ! मैं अपनी जान अपनी बेटी को बचाने के लिए देता हूं
मेरी फरियाद सुनो। मेरी जान उसके लिए।"

उसके इतना कहते ही आचार्य का चाकू उसकी छाती में घूस गया, और उसकी जोरदार चीख वहा फैले सन्नाटे को चीरते हुए गूंजने लगी।

उसके सीने में बार-बार छुरा घोंपते हुए याग्नेश ने एक बडा सा छेद बना दिया , जिसमे हाथ आसानी से जा सकें,
उस व्यक्ति के सीने से लाल रक्त का फव्वारा सा बहकर पत्थर के नीचे बहकर फर्श पर गुफा की कच्ची फर्श पर फैल रहा था।


उसका सिर एक ओर लूढक गया और उसने आखिरी बार सांस ली। आचार्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसके सीने में हाथ डाला, और उस का हृदय काटकर उसके सीने से बाहर निकाल दिया ।

उसने उसे अपने दोनों हाथों में एक साथ पकड़ रखा था वही पास रखे ऊचे आसन पर रखे क्रिस्टल और गोमेद के सामने आचार्य ने वो हृदय चढाया और अपने खून से सने दोनो हाथ जोडकर ----, "हे मेरे मालिक मेरे ईश्वर "मेरे भगवान,
हमारी प्रार्थना सुनो।

इस बलिदान को स्वीकार करो और हमें अपनी शक्तियां प्रदान करें। हमें की अपना चमत्कार दिखाओ",

उसके बाद उसने रक्त रीसते हुए हृदय को और सफेद और काले क्रिसटलो को अपनी दोनो हथेलीयों के बीच दबाकर निचोड़ने लगा और , साथ साथ कुछ मंत्र भी बुदबुदाने लगा , वह एक सेकंड के लिए रुक गया और फिर अपना मंत्र जारी रखा।
हृदय को और सिकोड़ते हुए उसकी हथेलीयों से खून बहने लगा।

धीरे-धीरे काला रत्न सक्रिय होने लगा और वहां एक काला घना साया फैलने लगा उसकी ऊर्जा को आचार्य स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता था।

काले रत्न के सक्रिय होने पर आचार्य ने सफेद रत्न को सक्रिय करने के लिए देवताओं के मंत्र का उच्चारण शुरू किया बड़ी देर तक ऐसा करने पर भी वह श्वेत रत्न सक्रिय नहीं हुआ।

आज के इस बलिदान को भी व्यर्थ जाते हुए देख कर आचार्य की आंखें क्रोध में लाल हो गई।
उसने ऐसा कई बार कीया था, लेकिन हत्यायो के इस घोर अन्धकार मे उसे कभी भी सफलता नही मीली ।

गुफा के ऊपर एक भयानक सन्नाटा छा गया। गरजती हवा और मशालों की टिमटिमाती लपटें ही सुनाई देने वाली आवाजें थीं।
जब अंधेरा धीरे-धीरे काले गोमेद में घुस गया, तो सभी शिष्यों ने उसे देखा, लेकिन किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की। आचार्य ने धीरे से हाथ खोले। हृदय, क्रिस्टल और गोमेद अभी भी वहीं थे। कुछ भी नहीं बदला था।

हृदय को फर्श पर फेंकते ही वह दहाड़ उठा, उसके बूट पर खून का आखिरी छिड़काव। "झूठे देवता!" वह गुफा की छत को देखते हुए चिल्लाया। "कब सुनोगे ? और कितने जीवन लगेंगे?”

वहा उपस्थित- सभी के चेहरे पर निराशा थी। आचार्य गुस्से में था। वह उन्हें फिर से विफल कर दिया था।
देवताओं की शक्तियों का केवल एक अंश प्राप्त करने के अपने प्रयासों में उसने कितने लोगों की बलि दी थी? बीस? पच्चीस? रास्ते में उसने गिनती खो दी थी।

आचार्य ने दोनों रत्नों को अपनी जेब में भर लिया और गुफा से बाहर सर्द रात में चला गया।
गुफा से बाहर निकल कर आचार्य एक जगह बैठ गए आंखों में क्रोध और चेहरे पर कठोरता लिए उन्होंने एक बार आसमान को घूरा और फिर आंखें बंद करके ना जाने किन ख्यालों में गुम हो गए कि उनकी आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदे धरती पर गिर पड़ी गहरी सांस लेकर वही लेट गए और अपने बीते कल और आने वाले कल के बारे में सोचने लगे।

ये थे आचार्य याग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे। इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

आज के लिए इतना ही, अगला अपडेट जल्द ही______
सभी पाठको से निवेदन है के इस कहानी पर अपने बहुमुल्य सुझाव और प्रतिक्रीया आवश्य दे।🙏🙏


आपका मित्र - अभिनव 🔥
:congrats: for new thread brother &
Welcome back
 

Naik

Well-Known Member
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Kahani ki shuruwat tow bade khaternaak dhang se huwi h yeh acharya Yagnesh tow ek insaan k roop shaitan ho gaya aisi kia mazboori aa gayi jo masoomo ko bewakoof bana ker unki bali k naam per hatya ker raha h
Baherhal dekhte h aage kia hota
Shaandaar shuruwat bhai
 

Xabhi

"Injoy Everything In Limits"
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Id toh yaad hai bhai lekin ab iss id se story start kar chuka hu , issiliye ab isse hi chalne dete hai , ussko start karenge toh phir se pura update likhna padega

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Aapki real ID hoti to support karne bhi kahta pr rule ke mutabik ye id manya nhi hogi,
Ha Aap Sayad aisa karva sake to behtar hoga, MOD se kah kr us id ka data Sara is id me transfer karva sako to ise hi original ID ghosit kr diya jata...
 

jaggi57

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:congrats: for new thread brother &
Welcome back

Kahani ki shuruwat tow bade khaternaak dhang se huwi h yeh acharya Yagnesh tow ek insaan k roop shaitan ho gaya aisi kia mazboori aa gayi jo masoomo ko bewakoof bana ker unki bali k naam per hatya ker raha h
Baherhal dekhte h aage kia hota
Shaandaar shuruwat bhai
Bahut bahut dhanywad Naik bhai aapke support k liye aise hi saath banaye rakhe 💐💐
 

jaggi57

Abhinav
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Aapki real ID hoti to support karne bhi kahta pr rule ke mutabik ye id manya nhi hogi,
Ha Aap Sayad aisa karva sake to behtar hoga, MOD se kah kr us id ka data Sara is id me transfer karva sako to ise hi original ID ghosit kr diya jata...
Thanks bhai ...maine aapki salah par MOD Lucifer se iss baare mein req ki hai ..dekhte hai kya hota hai 🤔🤔🤔🌹🌹
 

jaggi57

Abhinav
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अध्याय- 2

ये थे आचार्य यग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे।
इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

अब आगे ---

कोई एक घंटे बाद, आचार्य अपनी घोड़े पर पूर्व की ओर दौड़ते हुए, पहाडी रस्तो से होते हुए मैदानी इलाकों में पहुचे, अब तक उनका क्रोध थोडा ठंडा हो गया था।

परंतु एक प्रश्न उनके मन में अभी भी चल रहा था की, आखिर क्यों उनके साथ ऐसा हुआ उनके परिवार ने पीढीयो से देवताओं की पूजा की थी , अपना सारा जीवन लोक कल्याण और लोगों की भलाई में लगाया था , फिर भी उन्हें क्या प्राप्त हुआ ।

अपने बीते जीवन के बारे में सोचते सोचते उनके मन में देवताओं के प्रति घृणा और प्रबल हो गई।

दूर आगे ऐसे ही चलते चलते वो उस जगह पहुंचे जहां कभी बचपन में अपनी छोटी बहन के साथ बैठकर पूरे शहर को देखते थे वह एक टीला था जहां से पूरा नगर दिखाई देता ,

इस समय देवनगर की ऊंची-ऊंची दीवारों के ऊपर सैकड़ों मशाले जल रही थी , जो आकाश मे चमकने वाले तारों की भांती लग रहे थे। इस शहर को देखते देखते ही यग्नेश बडा हुआ था ।


आचार्य वही उस टीले पर आंख बंद करके लेट गए और अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगे।

यह रहा देव नगर शहर जो भौगोलिक दृष्टि से उसका क्षेत्रफल किसी बडे राज्य से कम नहीं था ऐसे ही 5 और शहर मिलाकर बनती है यहां की सभ्यता , जो आज भी आधुनिक समाज और सभ्यता से कटी हुई है , या यु कहो के कोई अदृश्य आयाम इसे बाकी पृथ्वी से अलग बनाए हुए हैं ।


पृथ्वी पर रहते हुए भी इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है जो इसी पृथ्वी पर मौजूद किसी अलग आयाम में स्थित हैं।
चारों ओर से पर्वतों से घिरे हरे भरे बाग बगीचे झरने तलाब और अद्भुत जड़ी बूटी से सुसज्जित यहां के घने वन, अद्भुत शिल्पकला, इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है।

यह नगर देवनगर के नाम से विख्यात था। यह नगर चारों ओर से छोटे छोटे मंदिरों से सुसज्जित था और नगर के मध्य में यहां के मुख्य देवता गजेंद्र का विशाल मंदिर था और साथ ही एक बड़ा आश्रम था।

इस मंदिर और आश्रम के आचार्य की बड़ी गरिमा थी यहां आचार्य देवता का प्रतिनिधि मानकर देव तुल्य ही सम्मान देते थे उनका हर आदेश यहां की प्रजा के लिए देवता का ही आदेश माना जाता था।

तीन पीढ़ियों से आचार्य याग्नेश के परिवार के सदस्य ही यहां के आचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे पहले याग्नेश के दादा अग्निवेश यहां के आचार्य बने और उनके बाद याग्नेश के पिता आचार्य विग्नेश ने यहां का पदभार संभाला

जब याग्नेश के दादा की मृत्यु हुई थी तभी याग्नेश बहुत छोटा था परंतु आज भी वह वो दिन नहीं भूल पाया था जिस दिन उसके दादा की मृत्यु हुई थी।

यग्नेश अपने दादा से बहुत प्रेम करता था बिना दादा से मिले उसके दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती थी रोज की तरह इस दिन भी प्रातः वह अपने दादा से मिलने उनके कक्ष में गया

अपने दादा के कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे वह दो चार कदम आगे बढ़ा तो सामने का दृश्य देखकर वह स्तंभित हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई सांसे तेज चलने लगी दिल जोरो से धड़कने लगा सामने उसके दादा का क्षत-विक्षत शव पड़ा हुआ था, उनके शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव से रिस्ता लाल रक्त और सीने में गड़ा हुआ एक बड़ा सा खंजर उस दृश्य को और भी भयावह बना रहा था।

अपने प्यारे दादा को ऐसी स्थिति में देखकर याग्नेश को गहरा सदमा लगा उसके मुख से एक जोरदार चीख निकली और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा , उसकी आवाज सुनकर कक्ष के बाहर मौजूद आश्रम के शिष्य कक्ष के भीतर आए कक्ष के भीतर का भयावह दृश्य देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई ।

अपने प्यारे आचार्य को इस स्थिति में देखकर सबकी आंखों में आंसू आ गए सब क्रंदन करने लगे इस दुखद घटना की सूचना जब विग्नेश तक पहुंची तब वह तुरंत वहां पहुंचा ।

एक तरफ अपने पिता का क्षत-विक्षत शव और दूसरी तरफ नन्हा याग्नेश बेहोश स्तिथी में विग्नेश के नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगे उसने अपने पिता को कई बार पुकारा परंतु उस पुकार का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला।

अपने पिता के बाद उसके कंधे पर आने वाली आश्रम की जिम्मेदारियों को वह जानता था , इसलिए उसने अपने ह्रदय को कठोर किया और अपने पिता के शव को उठाकर उनके आसन पर लिटा दिया ।


तभी वहां कोलाहल शुरू हुआ जब आश्रम के शिष्यों ने वहां मौजूद ऊंचे आसन की तरफ देखा जहां उनका दिव्य क्रिस्टल रखा हुआ होता था उस क्रिस्टल को वहां ना पाकर सभी भयभीत हो गए क्योंकि क्रिस्टल के वहां ना होने का अर्थ था उनके नगर का विनाश।

विग्नेश अभी अपने पिता की मृत्यु के बारे में ही विचार कर रहा था के नगर के विनाश के भय ने भी उसके हृदय को घेर लिया उसने वहां मौजूद सभी को शांत रहने का परामर्श दिया और क्रिस्टल वापस लाने का आश्वासन दिया।

आश्रम के बाकी शिष्य विग्नेश का बड़ा आदर करते थे , इसलिए उसकी बात मानकर सब शांत हो गए विग्नेश ने उन सब को अपने पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी करने को कहां और सभी को कक्ष से बाहर भेज दिया।

सभी के कक्ष के बाहर जाने के बाद विग्नेश उस पक्ष में कुछ ढूंढने लगा, वह अपने पिता को अच्छी तरह जानता था ,उसे पता था कि मृत्यु से पूर्व का उसके पिता ने कुछ ना कुछ क्रिस्टल के बारे में निशान छोड़े होंगे।

ढूंढते ढूंढते उससे एक जगह रक्त से बने हुए कुछ चिन्ह मिले जिन्हें देखकर वह समझ गया कि उसके पिता ने वह क्रिस्टल कहां रखा हुआ है शायद उसके पिता को इस स्थिति का पूर्व अंदेशा था इसलिए उन्होंने विग्नेश को कई तरह के गुप्त चिन्हों और आश्रम में पदासीन आचार्यों के रहस्य के बारे में सब कुछ बता दिया था।

वह अपने पुत्र की योग्यता को जानते थे और यह भी जानते थे, कि उनके बाद उनका पुत्र विग्नेश ही आचार्य के पद को संभालेगा

विग्नेश सबकी नजर बचाते हुए कक्ष में मौजूद पत्थर के चबूतरे के पास पहुंचा जहां उनके प्रमुख देवता गजेंद्र की प्रतिमा रखी हुई थी ।

उसने उस प्रतिमा को पहले प्रणाम किया फिर तीन बार उस प्रतिमा को घुमाया तभी उस पत्थर के चबूतरे के पीछे एक छोटा सा द्वार प्रगट हुआ विग्नेश उस द्वार में प्रवेश कर गया और नीचे की सीढ़ियां उतरते हुए वह वहां के गुप्त कक्ष में पहुंचा।

यह एक ऐसा गुप्त कक्ष था जिसके बारे में केवल आश्रम के पदासीन आचार्य को पता होता था , इस कक्ष में आश्रम का गुप्त खजाना और भी कई तरह की दिव्य जड़ी बूटियां और अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे ।

विग्नेश ने उस कक्ष में एक आसन पर रखे दिव्य क्रिस्टल की तरफ देखा उसने उस क्रिस्टल को लाल कपड़े में लपेटा और वापस उसी रास्ते से होकर अपने पिता के कक्ष में आया और क्रिस्टल को उसके यथा योग्य स्थान पर स्थापित कर दिया।


क्रिस्टल के वहां स्थापित होते वहां एक अदृश्य सुरक्षा घेरा प्रकट हुआ ।

विग्नेश ने क्रिस्टल के मिलने की सूचना आश्रम के बाकी शिष्यों तक पहुंचाई क्रिस्टल की मिलने की सूचना पाकर सभी का भय दूर हो गया उसके बाद ही था योग्य रीति से विग्नेश के पिता का अंतिम संस्कार किया गया।

जब तक याग्नेश को होश आया तब तक उसके दादा राख में बदल चुके थे अगले कई दिनों तक याग्नेश की स्थिति बड़ी विकट थी रोज रात को वह अपने दादा को पुकारता हुआ चीखता हुआ उठ जाता था , अपनी दादा की वह खुली आंखें और रक्तरंजित शव का दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।


परंतु कहते हैं ना कि समय गहरे से गहरे घावो को भर देता है याग्नेश के साथ भी ऐसी हुआ ।

परंतु उसके घाव पूरी तरह तो नहीं भर पाए , कभी-कभी आज तक ईतने वर्षो बाद , भी उसे उसके दादा के मृत्यु का वह दृश्य सपनों में उसे डराते है।

समय आगे बढता गया , वहा के राजा और आश्रम के अनुयायियो ने सर्वसम्मति से विग्नेश को वहां के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया।।

अपने अतीत के बारे मे सोचते हुए याग्नेश उस टीले पर लेटा हुआ था के तभी आकाश में बादलों की गर्जना की आवाज के कारण वह अपने अतीत से बाहर आया, उसने एक नजर नगर में टिमटिमाते हुए मशालों पर डाली और एक गहरी सांस छोड़ी।

उस नगर का राजा और कुटिल मंत्री राजगुरु शायद इस समय अपने महंगे घरों में सुरक्षित और गर्म होकर सोए थे।
गजेन्द्र के अनुयायिओं के कुलपतियों की कमी नहीं थी।

नगर के मध्य में स्थित वहां के देवता के मुख्य मंदिर के शिखर पर जब उसकी नजर पड़ी तो उसके जबड़े क्रोध के कारण भी कि गए आंखें लाल हो गई जिस गजेंद्र को उसकी कई पीढ़ियां और नगर के सभी लोग सदियों से देवता मानकर पूजते थे क्या वह सही में कोई देवता है या कोई शैतान

आखिर उसकी पूजा करके उन्हें क्या मिला दुख दर्द अपनों से जुदाई और हृदय पर गहरे घाव।

याग्नेश जानता था कि देवता उसी को कहते हैं जो सबको निस्वार्थ भाव से अपनी करुणा देता है , उसे नही जो अपने मानने वालो को ही दुःख दे ।

उसका मानना था के यहां का देवता जिसने नगर वासियों की और उसकी खुशियां छीनी है वो कोई देवता नही हो सकता ।

उसने देवता गजेन्द्र के विरुद्ध युद्ध का मानो बिगुल फुंक दिया था और इस राह पर चलते चलते कब वह मानव से दानव बन गया था उसे पता ही नही चला, आज वह शक्तिया प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने अपने ही लोगो की बलीया चढा चूका था ।


याग्नेश के पिता आचार्य विघ्नेश जिन्होंने सदैव ही अपने ज्ञान अपनी शक्तियों का उपयोग जनकल्याण और पीड़ितों रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया, उन्हें भी अपने परिवार को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा अपने परिवार की रक्षा करते करते स्वयं भी अनजाने बीमारी का शिकार हो गए थे ।

उनके पिता अजीब बीमारी से मरने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के पश्चात अपनी बीमार मां के प्राणों की रक्षा के लिए याग्नेश ने पिता से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग किया परंतु सभी प्रयास उसके विफल रहे उसने देवताओं के कई अनुष्ठान किए प्रार्थनाये कि , देवताओं ने भी उनके जीवन के कई वर्ष ले लिए ।

शुरुआत में, लगा यह सब प्रार्थनाये काम कर रही हैं , और वह कुछ स्वस्थ भी हो गई थी । परंतु पुनः बीमारी वापस आ गई और याग्नेश के माता को निगल गई ।


जीवन में इतना कुछ सहने के पश्चात भी याग्नेश की धर्म के प्रति श्रद्धा आस्था कम नहीं हुयी , वो अपना कार्य निरंतर करता रहा और इसी के फलस्वरूप अपने पिता के पश्चात वहां के अनुयायियों ने याग्नेश को वहा के आचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया।

जीवन चक्र का पहिया एक बार फिर घुमा, इस बार याग्नेश की बहने उस अनजाने रोग से ग्रसित हो गई थी।

वह किसी भी प्रकार अपने माता पिता की तरह अपनी बहनों को खोना नहीं चाहता था, चाहे उसे इसके लिए कुछ भी करना पड़े ।

याग्नेश इस रोग का समूल नाश करना चाहता था उसे भय था के कही उसकी पत्नी नीरजा और उसका नन्ना सा पुत्र देव भी कहीं इस रोग की चपेट में ना आ जाए।

आचार्य के पद पर रहते हुए आचार्य याग्नेश ने देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के शीघ्र उपायों के बारे में अध्ययन किया जहां उसे देवताओं के प्रति किए गए बलिदान विधि की एक प्राचीन प्रतिलीपी कीसी के द्वारा प्राप्त हुई ।


प्राचीन प्रतिलिपि में जीव बली के द्वारा देवताओं की शक्ति प्राप्त करने के कई अनुष्ठानों की विधियां लिखी हुई थी,
याग्नेश ने जब उसे पढ़ा तब उसे प्रथम उस बात पर विश्वास नहीं हुआ देवता कैसे किसी की बलि से प्रसन्न हो सकते हैं ।

परंतु प्रतिलिपि देने वाला भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था वह क्यों उसे इस प्रकार की प्रतिलिपि देगा जिसका कोई उपयोग ना हो इस प्रतिलिपि में लिखे गए अनुष्ठानों को पढकर उसे एक आशा की किरण नजर आई जिससे वह इस अनजाने रोग के भय से निजात पा सकता था।

बहुत सोच समझ कर उसने इस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया परंतु वह इस बात को भूल गया कि बलिदान अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने को कहते हैं।

याग्नेश ने पहला मानव बलिदान एक महिला का किया जो बेघर थी और प्रार्थना करने के लिए उसके मंदीर में आई थी।

उसने अपने निजी कक्ष में उस महिला को भोजन की पेशकश की और अपनी बहनों के लिए प्रार्थना की उसके पश्चात् उसने महिला को सम्मोहीत करके गला रेत कर उसकी बली चढा दी , इस उम्मीद में कि एक जीवन दूसरे को बहाल कर सकता है।

देवताओं ने इस दिए गए बलिदान को स्वीकार नहीं किया। उस दिन से, साधारण प्रार्थनाओं ने भी उनके लिए काम करना बंद कर दिया था।


वह अब दिव्य दृष्टि का उपयोग नहीं कर सकता था या अपनी जीवन शक्ति का उपयोग करके चोटों को ठीक नहीं कर सकता था।

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।

आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

सभी पाठकों से निवेदन है कि उन्हें यह कहानी कैसी लग रही है यह बताएं और साथ ही साथ अपने अनमोल सुझाव दे ---
धन्यवाद 🙏🙏

अगला अपडेट जल्द ही कृपया प्रतीक्षा करें--

आपका अपना मित्र ------अभिनव🔥
 

Napster

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बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय कहानी है भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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