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समर सिंह और यग्नेश का युद्ध शानदार था मगर शिष्य गुरु पर बारी पड़ गया और गुरु को पराजित जान कर आगे बढ़ गया मगर यहीं उसकी भूल थी अब वो फिर से समर सिंह के पाश में बंध चुका है। जानदार अपडेटअध्याय - 7
अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी
" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "
इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई।
अब आगे ------
यह आवाज थी सेनापति समर सिंह की जो किसी समय में याग्नेश के युद्ध कला के गुरु रह चुके थे
समर सिंह--- मुझे दुख होता है यह सोच कर कि तुम जैसा व्यक्ति कभी मेरा शिष्य था , मैंने कभी सोचा नहीं था के तुम अधर्म के मार्ग चुनोगे और उस पर चलकर इतना आगे निकल जाओगे , अभी भी समय है याग्नेश, यह पाप पूर्ण मार्ग त्याग दो।
याग्नेश-- प्रणाम गुरुदेव , सर्वप्रथम आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें इतने समय पश्चात आपको देखकर बहुत अच्छा लगा आखिर किसी समय मैंने आपको अपने पिता तुल्य माना था।
समर सिंह-- मत कहो तुम मुझे अपना गुरुदेव तुम वह अधिकार खो चुके हो अभी भी समय है पुत्र तुम वापस लौट आओ यह पाप का मार्ग त्याग दो और अपने कर्मों का प्रायश्चित करो।
याग्नेश-- यह पाप पुण्य धर्म अधर्म का मुझे ज्ञान मत दो गुरुदेव मैं यह सब जानता हूं धर्म के मार्ग ने और मेरे पूर्वजों द्वारा पुण्यों ने आखिर दिया ही क्या है, आप मेरे लिए पूजनीय हैं इसलिए आप मेरे मार्ग से हट जाइए क्योंकि मैं नहीं चाहता क्यों मेरे द्वारा यहां होने वाले विनाश मैं मरने वालों मैं आपका भी नाम हो मुझे बहुत दुख होगा।
समर सिंह-- ठीक है तुम युद्ध ही चाहते हो तो युद्ध ही सही जरा देखे तो जादुई विद्याओं का प्रयोग करते करते युद्ध कला तो नहीं भूल गए
इतना कहकर सेनापति समर सिंह ने अपनी मयान से अपनी तलवार बाहर निकाल ली और उधर याग्नेश भी अपनी तलवार के साथ समर सिंह से युद्ध के लिए सज्ज हो गया
दोनों गुरु शिष्य युद्ध के मैदान में अब आमने-सामने थे जहां सेनापति ने सभी को दोनों के युद्ध में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया नहीं याग्नेश ने बिना काली शक्तियों के प्रयोग और उसके कवच के बिना युद्ध करने का निर्णय लिया।
राजा सुजान सिंह समेत वहां मौजूद सभी योद्धा इन दोनों के युद्ध के परिणाम को देखने के लिए उत्सुक थे।
समर सिंह ने आगे बढ़कर अपनी तलवार का प्रथम और भरपूर वार याग्नेश के सिर की तरफ किया और वही याग्नेश ने भी बड़ी फुर्ती के साथ अपनी तलवार से उस वार को रोककर साथ ही साथ अपनी तलवार घुमाकर समर सिंह के तलवार को झटका दिया और दूसरे हाथ से समर सिंह के सीने पर जोर से मुक्का मारा जिसके प्रभाव से वह कुछ कदम पीछे हटा।
समर सिंह-- बहुत खूब ! बहुत खूब ! दिख रहा है के तलवारबाजी का हुनर तुम भूले नहीं हो लो संभालो मेरे अगले बार को
इतना कहकर समर सिंह ने विद्युत किसी गति के साथ सीधी तलवार से याग्नेश के पेट की तरफ वार किया, परंतु याग्नेश ने भी इतनी फुर्ती के साथ अपनी तलवार को गोलाकार घुमाते हुए समर सिंह के वार को विफल किया और चकरी की तरह घूम कर समर सिंह के पीछे पहुंचकर अपने पैर से एक बार पुरवार उनकी कमर पर किया। यह सब इतनी तेजी के साथ हुआ था समर सिंह को संभलने का मौका नहीं मिला आगे जाकर मुंह के बल गिरा।
याग्नेश--- जब गुरु आपके जैसा सक्षम हो तो तलवारबाजी का हुनर मैं कैसे भूल सकता हूं परंतु लगता है कि आप अपना हुनर भूल गए हो खड़े हो जाइए गुरुदेव और सामना करिए।
याग्नेश की बात सुनकर समर सिंह बड़ी तेजी के साथ उठ खड़ा हुआ वह समझ गया था याग्नेश के साथ युद्ध करना इतना आसान नहीं है समर सिंह ने अपना ध्यान केंद्रित किया अपने संपूर्ण इंद्रियों को सजग किया जिससे वह याग्नेश के हर बार को समझ सके
समर सिंह--- यू मुझे बार-बार गुरुदेव मत कहो तुम्हारे जैसा नीच, अधर्मी , पापी और हत्यारा मेरा शिष्य नहीं हो सकता , अरे तुमने तो अपने पुर्वजो के आदर्शों की भी लाज नहीं रखी । अपने स्वार्थवश न जाने कितने बेगुनाहों की हत्या की।
समर सिंह के द्वारा कहे गए कटु वचनों को सुनकर याग्नेश को बहुत क्रोध आया जिससे वह अपना संतुलन खो बैठा यही तो समर सिंह भी चाहता था।
क्रोध के आवेग में याग्नेश ने समर सिंह को समाप्त करने के लिए छलांग लगाकर अपनी तलवार का वार समर सिंह के गर्दन की तरफ किया परंतु यहां समर सिंह भी पूरी तरह सचेत था कितनी गति से वार हुआ था उतनी ही गति से वह एक ओर हट गया और याग्नेश भूमि पर जोर से गिरा, समर सिंह याग्नेश को समझने का मौका नहीं देना चाहता था वह बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ा इससे पहले कि याग्नेश संभल पाता उसने जोरदार ठोकर याग्नेश की पसलियों में मारी जिससे याग्नेश वहा से उडकर पीछे जा गीरा।
समर सिंह शरीर से बहुत बलिष्ठ था शारीरिक बल के मामले में वह याग्नेश से दुगना शक्तिशाली था इस प्रकार से याग्नेश की पसलियों में तेज दर्द हुआ परंतु वह अपने दर्द को भूल कर इससे पहले कि समर सिंह उस तक पहुंचता वह फुर्ती के साथ खड़ा हुआ।
याग्नेश तेजी से समर सिंह की ओर बढ़ा और तलवार को विद्युत गति से घुमाता हुआ प्राण घातक वार करने लगा उसके प्रत्युत्तर में समर सिंह एकाग्रचित मन के कारण उसकी हर बार को सहजता से विफल कर रहा था दोनों योद्धाओं की तलवारों की टंकार वातावरण में गूंज रही थी बाकी सभी योद्धा अपनी सांस थामे देख रहे थे।
अति व्यग्रता और क्रोध के कारण याग्नेश का हर वार विफल हो रहा था , के तभी
समर सिंह ने तेजी से घूम कर याग्नेश के बाजू पर तलवार से वार किया जिससे बाई बाजू जख्मी हो गई।
इसी घाव के साथ याग्नेश को अपनी भूल का अंदाजा हो गया की व्यग्रता के साथ लड़ा गया कोई भी युद्ध जीत तक नहीं ले जाता अब उसने भी अपने मन को एकाग्र किया अपनी इंद्रियों को संयत करके अपने घाव के दर्द को भुलाकर वह किसी चक्कर की तरह घूमता हुआ और साथ ही साथ अपनी तलवार को घुमाता हुआ समर सिंह की और बढा।
याग्नेश में आए हुए इस बदलाव को देखकर समर सिंह के चेहरे पर मुस्कान उभर आई वह भी अपनी तलवार लेकर याग्नेश के वार का प्रत्युत्तर देने लगा।
तभी समर सिंह ने नीचे झुक कर अपनी तलवार का भरपूर वार याग्नेश के पैरों की तरफ किया याग्नेश ने भी छलांग लगाकर उस वार से अपना बचाव किया और साथ ही साथ समर सिंह के हाथ पर जोरदार ठोकर मारी जिसे समर सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई।
तलवार के भूमि पर गिरते ही इससे पहले कि याग्नेश अपना अगला वार करता समर सिंह ने भी हवा में उछल कर कलाबाजी या खाता हुआ याग्नेश के दाई और से उसकी कलाई पर प्रहार किया जिससे याग्नेश की भी तलवार भूमि पर गिर गई।
अब दोनों योद्धा मल्ल युद्ध करने लगे एक दूसरे पर लात घूसों के दाव पेच आजमाने लगे दोनों किसी मतवाली हाथी की तरह एक दूसरे से टकरा रहे थे।
अभी दोनो लड ही रहे थे के अचानक कड़क की आवाज के साथ किसी की चीखने की भी आवाज आई यह आवाज की समर सिंह की।
हुआ यूं के मल्लयुद्ध के दौरान समर सिंह ने जैसे ही जोरदार मुक्का याग्नेश के सीने में मारना चाहा तब याग्नेश ने बड़ी फुर्ती के साथ समर सिंह की कलाई पकडी और पूरी वेग के साथ घुमा दी जिससे समर सिंह हवा में घूमता हुआ भूमि पर आ गिरा उसके हाथ की हड्डी टूट चुकी थी समर सिंह की भूमि पर गिरते ही याग्नेश ने एक जोरदार ठोकर समर सिंह की पसलियों में मारी जिससे उसकी कई पसलियां टूट गई अब समर सिंह हिलने की भी हालत में नहीं रहा, और मूर्झीत हो गया।
समर सिंह को धराशाई होता हुआ देखकर राजा सुजान सिंह सभी योद्धा और सैनिक जो इस द्वंद्व को देख रहे थे वह सचेत हो गए क्योंकि वह जानते थे के याग्नेश को रोकना बहुत कठिन होगा।
समर सिंह के धराशाई होते ही याग्नेश ने सुजान सिंह की ओर देखा।
याग्नेश सुजान सिंह अब अपने किए हुए हर अपराध का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ आज तुम्हें मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकता तुम्हारा सेनापति तो धराशाई हो गया अब और कोई बचा है जो मेरा सामना कर सके तो उन्हें भी भेजो
इतना कहकर याग्नेश अपनी तलवार संभाल कर सुजान सिंह की और बढा जब सुजान सिंह के अंगरक्षको ने याग्नेश को अपने राजा की ओर बढ़ता हुआ देखा जो गिनती में लगभग 100 के बराबर थे उनमें से लगभग 50 योद्धाओं ने राजा के चारों तरफ एक घेरा बना लिया और बाकी बचे 50 अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।
उधर यागनेश भी किसी चक्र की मानिंद घूमता हुआ और तलवार घुमाता हुआ आगे बढ़ा और देखते ही देखते कुछ ही पल में आगे आ रहे दो अंग रक्षकों के सिर भूमि पर उसकी तलवार से कट कर गिर चुके थे , तब तक याग्नेश के पीछे चार अंगरक्षक पहुंच गए थे और उन्होंने एक साथ उसके ऊपर वार किया।
इंद्रियों के सजग रहने के कारण याग्नेश को इस बार का पता चल गया और उसने नीचे बैठकर अपनी तलवार ऊपर उठा दिया और उनके वारो को रोक दिया और साथ ही साथ बड़ी फुर्ती से घूम कर उन चारों के पैर काट दिए , पैरों के कटते हैं कि वो चारों किसी कटे हुए वृक्ष की भांति वह चारों धड़ाम से धरती पर आकर गिरे।
अपने साथियों की ऐसी हालत देखकर बाकी बचे हुए सभी योद्धाओ ने एक साथ याग्नेश के ऊपर छलांग लगा दी, इतने योद्धाओं के एक साथ टकराने से याग्नेश अपना संतुलन खो बैठा और भूमि पर जा गिरा सभी योद्धाओं ने मिलकर याग्नेश को अपने नीचे दबा दिया था, वहां मानो मानव शरीर का एक छोटा सा टीला सा बन गया था।
इस दृश्य को देखकर सुजान सिंह बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आगे बढ़ने वाला था यह तभी उस मानव टीले के नीचे जहां याग्नेश दबा पड़ा था, एक तेज नीली रोशनी चमकी और देखते ही देखते वो सभी योद्धा जो याग्नेश को अपने नीचे दबाए हुए पड़े थे वह हवा में तैरते हुए भूमि पर गिर पड़े मानो घास के तिनको को हवा के झोंके ने उड़ा कर फेंक दिया हो।
याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----
आज के लिए इतना ही अगला अध्याय शिघ्र ही-----
सभी पाठकों से नम्र निवेदन है कि वह इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव अवश्य दें-----
आप सभी के प्रेम और साथ का अभिलाषी
आपका अपना मित्र --- अभिनव![]()
इंसान अपने कर्मो को ना देख कर हर बात का ठीकरा ऊपर वाले पर फोड़ देता है, यग्नेश के साथ भी यही हुआ है और अब वो और भी नीच हो गया है चेतावनी दिए जाने के बाद भी। शायद इसीलिए कहा जाता है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि। बहुत ही रोचक अपडेट।
तो यग्नेश अब काली शक्तियों का गुलाम बन गया है और अपने पतन की और अग्रसर भी। बेगुनाह लोगो की बलि चढ़ा कर उसने अपने पाप का घड़ा और भी भर लिया है। सुन्दर अपडेट
विजयानंद एक सच्चा और साफ दिल इंसान है और उसी वजह से याग्नेश का क्रोध भी शांत हुआ और वो सब बातो को समझ भी गया। ये राजा एक सत्तालोभी इंसान है और इसके लालच ने भी यग्नेश को गलत रास्ते पर ला दिया मगर कर्मो का फल तो मिलना ही है जो मिल कर रहता है। रोचक अपडेट
बहुत ही बेहतरीन भाईकाली शक्तियों के आगे मामूली सैनिक तो नही टिक पाए मगर अब सेनापति आ गया है और अब लड़ाई बराबरी की होगी।
Bahut bahut dhanywad bhaiWah, Atyant shandar update Bhai,
Maja aa raha he aapke is sutra par.
Keep posting Bhai
सभी दुश्मन यग्नेश को बराबरी की टक्कर दे रहे है फिर भी उसने अपनी सूझबूझ से सबको परास्त किया और सुजान सिंह को मार कर बदला ले लिया मगर अभी भी ये लड़ाई समाप्त नही हुई है और जिन परिस्थितियों की वजह से यग्नेश यहां तक पहुंचावाहन पर उसके पास खोने के लिए कुछ है भी नही अब। तो वो अपना सबकुछ दाव पर लगा कर लड़ रहा हैं। शानदार अपडेटअध्याय -- 8
याग्नेश अब अपने कपड़ों को झाड़ता हुआ खड़ा हो गया , उसकी आंखें क्रोध की अधिकता के कारण लाल हो गई थी अपने चारों तरफ गिरे हुए सुजान सिंह के अंगरक्षको को समाप्त करने के लिए उसने उन सभी को विद्युत पाश में बांध दिया और उनके प्राणों को सोखने लगा के , तभी एक सशक्त उर्जा पाश ने उसे जकड लिया।
वह अदृश्य ऊर्जा पाश याग्नेश के शरीर पर पूरी तरह कस गया था, उस ऊर्जा पाश ने याग्नेश के हाथ पैरों को पूरी तरह बांध दिया था उस अदृश्य ऊर्जा पाश के बंधन में जकड़ा हुआ याग्नेश अब घुटनों के बल भूमि पर बैठ गया था---- के तब ही-----
अब आगे -----
ऊर्जा पाश में बंधा हुआ याग्नेश अपने आप को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा था, उसे आश्चर्य हो रहा था यह इतना शक्तिशाली ऊर्जा पाश जो उस की काली शक्तियों के कवच को भी भेद सकता है यह किसके द्वारा प्रयोग किया गया है । के तभी सामने से आते हुए युद्धवीर सिंह क्यों पर उसकी दृष्टि पड़ी।
युद्धवीर सिंह को देखकर याग्नेश के मुख पर व्यंगात्मक मुस्कान उभरी
याग्नेश-- ओह ! तो युद्धवीर सिंह तुम भी यहां उपस्थित हो अच्छा है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो मैं यमलोक भेज चुका हूं अब तुम भी यमलोक में उनके पास जाने के लिए सज्ज हो जाओ।
युद्धवीर सिंह -- हा हा हा ! मेरे पिता की हत्या करके तुम क्या सोचते हो मेरी भी हत्या कर दोगे , यह इतना आसान नहीं है याग्नेश। प्रतिशोध तो मैं लूंगा तुमसे अपने पिता की हत्या का , मेरी बहन के अपहरण का। कुछ जादुई शक्तियों का उपयोग करके तुम अपने आप को शक्तिशाली समझ रहे हो देखो मेरे छोटे से पास में तुम्हारी क्या दशा कर दी अब अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ।
इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपनी तलवार लेकर याग्नेश की और बड़ा ही था कि याग्नेश ने अपने हाथों को झटका दिया और ऊर्जा पाश से मुक्त हो गया । इससे पहले कि युद्धवीर सिंह याग्नेश पर कोई वार करता याग्नेश ने तेजी से उसे उठाकर दूर फेंक दिया
याग्नेश -- बच्चे हो तुम मेरे सामने अभी युद्धवीर सिंह ! तुम क्या सोचते थे कि यह ऊर्जा पाश मुझे बान्ध सकता है , याग्नेश हूं मै , यह छोटे मोटे पाश मेरा कुछ नही बीगाड सकतें , मैं तो बस तुम्हे सामने लाने के लिए बन्ध गया था ।
इतना कहकर याग्नेश ने नीले रंग के प्रकाश का एक गोला युद्धवीर सिंह की ओर फेंका, परंतु युद्धवीर सिंह भी कोई कम नहीं था उसने उतनी ही तेजी दिखाकर अपने स्थान से छलांग लगाकर याग्नेश के वार से बच गया और साथ ही साथ एक श्वेत ऊर्जा का गोले से याग्नेश पर प्रहार किया।
याग्नेश ने उस उर्जा के गोले के प्रहार को अपनी उर्जा से काट दिया और साथ ही साथ अपने दोनों हाथ युद्धवीर सिंह की ओर झटके जिससे असंख्य छोटे-छोटे चक्र तेजी से घूमते हुए युद्धवीर सिंह की ओर बढ़े ।
इधर युद्धवीर सिंह ने भी अपने दोनों हाथों को घुमा कर वायु का एक बड़ा गोला तैयार किया और चक्रों की दिशा में प्रहार किया, वायु का वह गोला उन सारे चक्रों को अपने में समाता हुआ याग्नेश की और बड़ा और बड़ी तेजी से टकराया।
वह चक्र याग्नेश की ही काली ऊर्जा से निर्मित थे , इस कारण उन चक्रों के टकराव से याग्नेश का कवच कई जगह से फट गया और उसके शरीर पर काफी घाव हो गए।
युद्धवीर सिंह का इस प्रकार उसके किए गए वार का प्रतिकार करना याग्नेश के लिए आश्चर्यजनक था याग्नेश युद्धवीर सिंह केबल और शक्ति के बारे में जानता था परंतु उसका सामना आज जिस युद्धवीर सिंह से हो रहा था वह सर्वथा भिन्न था।
याग्नेश जानता था कि यह समय विचार करने का नहीं युद्ध करने का है इसलिए अपने मन में आ रहे सभी विचारों को शांत करके एक बार फिर याग्नेश युद्ध के लिए सज्ज हो गया।
परंतु इतनी देर में युद्धवीर सिंह ने अपना अगला वार कर दिया था याग्नेश युद्धवीर सिंह की और बड़ा ही था की एक विद्युत किरण उसके सीने से टकराई जिसके प्रभाव से वह कुछ दुर पीछे गिरा।
परंतु याग्नेश भी कोई साधारण योद्धा नहीं था गिरते-गिरते भी उसने बड़ी तीव्रता के साथ अपनी उर्जा का प्रहार युद्धवीर सिंह की ओर किया।
अपने किए गए प्रहार की सफलता देखकर युद्धवीर सिंह प्रसन्न हो ही रहा था के याग्नेश की उर्जा उसके सीने से टकराई और एक धमाका हुआ जिससे वह उड़ते हुए दूर जा गिरा।
याग्नेश के इस वार से युद्धवीर सिंह बुरी तरह से घायल हो गया था , उसके सारे शरीर में भयंकर पीड़ा होने लगी थी।
अपने दर्द पर काबू पाता हुआ वह लड़खड़ाते हुए कदमों से खड़ा हुआ ही था के
युद्धवीर सिंह को समाप्त करने के लिए याग्नेश ने अपना अगला वार कर दिया ।
अनेक प्रकार के अस्त्र तीव्र गति से युद्धवीर सिंह की ओर बढ़ रहे थे, घायल अवस्था में भी युद्धवीर सिंह पूरी तरह से सजग था, अपनी ओर आते हुए अनेक घातक शस्त्रों को रोकने के लिए युद्धवीर सिंह ने अपना हाथ आगे करके एक मोटी सी ऊर्जा की ढाल बनाई । वह सारे शस्त्र उस उर्जा की परत से आकर टकराई।
युद्धवीर सिंह उन शस्त्रों को अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर रोक रहा था, जब उसे अंदाजा हुआ के वह श्वेत ऊर्जा द्वारा इन घातक अस्त्रों को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकता तब उसने अपनी आंखें बंद कर ली और कुछ बुदबुदाने लगा , कुछ ही पलों में उसने अपनी आंखें खोली अब उसकी आंखों का संपूर्ण रंग काला हो गया था।
उसके शरीर से गहरे नीले रंग की उर्जा किरणे निकलने लगी थी । उस ऊर्जा की किरणों का उन घातक अस्त्रों के साथ संपर्क होते ही वह सारे अस्त्र दूर से झीटक कर गिर गए ।
उस गहरे नीले रंग की उर्जा के प्रभाव से अब वीर सिंह के सारे घाव अब ठीक हो चुके थे। जिसे देखकर याग्नेश के आश्चर्य की सीमा नहीं रही क्योंकि वह उस नीले रंग की ऊर्जा को पहचानता था, क्योकि यह उर्जा किसी देवता की नही उसके मालिक जिसकी वह उपासना करता था उस ईब्लिस की थी।
अब युद्धवीर सिंह ने अपनी उसी उर्जा का वार याग्नेश पर किया, याग्नेश ने भी बड़ी तीव्रता के साथ इस वार का प्रत्युत्तर दिया और उसके वार को नष्ट किया,
अब दोनों ओर से काली शक्तियों की ऊर्जा के प्रहार हो रहे थे, दोनों में से कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा था , सतत दोनो ओर से काली उर्जाओ के टकराने से वहां की सारी सकारात्मक उर्जाएं नष्ट हो रही थी।
वहां चारों ओर नकारात्मक शक्ति फैलने लगी थी। जिसका प्रभाव वहां खड़े हुए योद्धाओं के मन पर पढ़ रहा था।
वहां खड़े योद्धा और सैनिक जो याग्नेश और युद्धवीर सिंह दोनों काली शक्तियों के धारक के टकराव को देख रहे थे , उन में अब दो दल बन गए थे
जहां एक दल शोर मचा कर याग्नेश का समर्थन कर रहा था वही दूसरा दल युद्धवीर सिंह के जयकारे लगाकर समर्थन कर रहा था।
जैसे-जैसे दोनों का युद्ध और गहरा होता जा रहा था वैसे वैसे वहांकि नकारात्मकता भी बढती जा रही थी , जिसके प्रभाव के कारण उन दोनों दलों की व्यग्रता भी बढ़ती जा रही थी ।
उस प्रभाव में आकर वह दोनों सैनिको के दल आपस में ही भिड़ गए और एक दूसरे को मारने लगे, एक-एक करके वह सभी मृत्यु की आगोश में जा रहे थे उनके शरीर के कटे हुए अंग और बहता हुआ रक्त उनकी वह चीख पुकार वहां के वातावरण को और भयावह बना रही थी।
अब तक के युद्ध से याग्नेश इस बात को जान गया था कि केवल काली शक्तियों के प्रहार से वह युद्धवीर सिंह से नहीं जीत सकता , इसलिए अब उसने अपने पिता द्वारा सिखाई गई पंच तत्वों की उर्जा का काली शक्तियों के साथ सम्मीश्रण करके प्रयोग करने का निर्णय लिया।
आचार्य पद के जाने के बाद याग्नेश ने अपने पिता द्वारा सिखाए गए श्वेत ऊर्जा और पंच तत्व के प्रयोग की कलाओं को याग्नेश ने त्याग दिया था क्योंकि यह सब सात्विक प्रयोग थे।
काली शक्तियों का धारक होने के कारण वह श्वेत ऊर्जा का प्रयोग तो नहीं कर सकता था , परंतु पंचतत्व की ऊर्जा का अवश्य प्रयोग कर सकता था , क्योंकि सभी शरीर धारी पंचतत्व की उर्जा के धारक होते हैं जहां यह ऊर्जा समाप्त होती है वही जीवन भी समाप्त हो जाता है।
याग्नेश ने अब वायु जल और पृथ्वी तत्व और अब सम्मिलित उर्जा का प्रयोग करके एक विशाल चक्रवात का निर्माण किया जिसमें उसने विद्युत तरंगों का भी प्रयोग किया।
वह चक्रवात तेजी से आगे बढ़ता हुआ युद्धवीर सिंह को अपने में समा गया,
युद्धवीर सिंह ने उस चक्रवात से निकलने का भरसक प्रयास किया , परंतु उसके सभी प्रयास विफल हो गए।
उस तेजी से घूमते हुए चक्रवात में भूमि तत्वों से निर्मित विशाल शिलाखंड और जल तत्व और वायु तत्व के सहयोग से बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े टकराने से युद्धवीर सिंह का शरीर कई जगह से घायल हो गया था।
अत्यंत पीड़ा का अनुभव करते हुए और उस चक्रवात में घूमते हुए युद्धवीर सिंह मृत:प्राय हो गया था।
उसकी सांसे बहुत धीमी गति से चलने लगी कुछ ही क्षणों में वह निर्जीव सा हो गया और देखते ही देखते हुए चक्रवात भी शांत हो गया ।
चक्रवात के शांत होते ही युद्धवीर सिंह का शरीर धड़ाम से भूमि पर आकर गिरा युद्धवीर सिंह के शरीर को क्षत विक्षत अवस्था में भूमि पर अचेत अवस्था में पड़ा देखकर , याग्नेश के चेहरे पर मुस्कान उभर आई उसे मृत समझकर याग्नेश अपने अगले शत्रु राजा सुजान सिंह की ओर बढ़ गया।
राजा के अंगरक्षक पहले ही याग्नेश और युद्धवीर सिंह के काली शक्तियों के प्रयोग से उत्पन्न होनेवाली नकारात्मक ऊर्जा की भेंट चढ़ गए थे ।
याग्नेश को अपनी और बढ़ता हुआ देखकर सुजान सिंह भय के मारे थर-थर कांपने लगा। उसने अपनी मदद की आशा से चारों ओर नजर दौड़ाई ,परंतु निराशा ही हाथ लगी , क्योंकि वह इस समय अकेला ही सही सलामत युद्ध भूमी पर खड़ा था।
एक ओर सेनापति समर सिंह अभी भी मूर्छित अवस्था में भूमि पर पड़े थे , तो दूसरी ओर युद्धवीर सिंह भी मृतप्राय अवस्था में भूमि पर अचेत पड़ा हुआ था । उसके सारे सैनिक और अंगरक्षक एक दूसरे को समाप्त कर चुके थे, उसके महामंत्री और राजगुरु का दूर-दूर तक पता नहीं था , शायद मृत्यू के भय से पलायन कर गये हो । चारों ओर लाशों के ढेर और रक्त के कीचड़ के बीच में सुजान सिंह अकेला खड़ा था।
सुजान सिंह को भय के मारे थरथर कांपता हुआ देखकर याग्नेश जोर से ठहाका लगाकर हंसने लगा , उसकी वह भयावह हंसी सुनकर सुजान सिंह का रंग पीला पड़ गया।
याग्नेश -- सुजान सिंह ! देखो अपने चारों ओर है कोई जो तुम्हारी रक्षा करने वाला हो, अब अपने किए गए अपराधों का दंड भुगतने के लिए तैयार हो जाओ।
सुजान सिंह -- मुझे क्षमा कर दो याग्नेश ! तुम जैसा बोलोगे वैसा ही मैं करूंगा, तुम चाहो तुम मेरा सारा धन ले लो परंतु मुझे जीवनदान दे दो, मैं अपने किये अपराधों का प्रायश्चित करना चाहता हूं । कृपया मुझे बस एक अवसर देदो।
याग्नेश -- क्षमा कर दो ! तुम्हें लज्जा नहीं आई सुजान सिंह क्षमा मांगते हुए , मेरे पिता तुम्हें भी अपने पुत्र के समान मानते थे, उनके प्रति किए गए विश्वासघात के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ?
मेरे दादाजी की मृत्यु के लिए तो मैं क्षमा कर दूं ? मेरे कुल का सर्वनाश का कारण बनने के लिए क्षमा कर दूं ?
आज मैं जहां खड़ा हूं उसका केवल एक ही व्यक्ति जिम्मेदार है और वह हो तुम इसलिए अपना दंड पाने के लिए सज्ज हो जाओ।
और इस प्रकार क्षमा दान मांग कर अपने गुरु और मेरे पिता की दी हुई शिक्षा को कलंकित मत करो संभालो अपनी तलवार और मेरा सामना करो।
इतना कहकर याग्नेश में अपने तलवार का भरपूर वार सुजान सिंह की गर्दन की तरफ किया, जिसे सुजान सिंह ने अपनी तलवार से रोकने का प्रयास किया, याग्नेश का प्रहार इतना जोरदार था उसके प्रभाव के कारण सुजान सिंह की तलवार भूमि पर गिर गई और अगले ही पाल सुजान सिंह का कटा हुआ सिर भूमि पर गिर पड़ा ।
सुजान सिंह को मरते हुए देखकर याग्नेश खुशी से झूम उठा के-----
मित्रों आज के लिए इतना ही ---अगला अपडेट जल्दी ही-----
आप सभी पाठको से अनुरोध है के इस कहानी पर अपने सुझाव और प्रतिक्रिया अवश्य दें,
आपके सहयोग का अभिलाषी
आपका मित्र -- अभिनव![]()
सभी दुश्मन यग्नेश को बराबरी की टक्कर दे रहे है फिर भी उसने अपनी सूझबूझ से सबको परास्त किया और सुजान सिंह को मार कर बदला ले लिया मगर अभी भी ये लड़ाई समाप्त नही हुई है और जिन परिस्थितियों की वजह से यग्नेश यहां तक पहुंचावाहन पर उसके पास खोने के लिए कुछ है भी नही अब। तो वो अपना सबकुछ दाव पर लगा कर लड़ रहा हैं। शानदार अपडेट
बहुत-बहुत धन्यवाद भाईसभी दुश्मन यग्नेश को बराबरी की टक्कर दे रहे है फिर भी उसने अपनी सूझबूझ से सबको परास्त किया और सुजान सिंह को मार कर बदला ले लिया मगर अभी भी ये लड़ाई समाप्त नही हुई है और जिन परिस्थितियों की वजह से यग्नेश यहां तक पहुंचावाहन पर उसके पास खोने के लिए कुछ है भी नही अब। तो वो अपना सबकुछ दाव पर लगा कर लड़ रहा हैं। शानदार अपडेट
Bahut hi behtarin update … ab yagnesh ka samna kis se hota hai ye dekhna dilchasp hoga… sujan singh ke marne lagta nahin ki Yagnesh ki mushkil khatam ho gai…