भाई साहब…
सच कहूँ तो आज का पार्ट पढ़ते वक्त मेरा दिल थोड़ा सा टूट गया।
पहले के पार्ट तक तो हमारा घर था… हमारा मनिक, हमारी दिव्या, हमारी परी, हमारी बुआ… सब कुछ इतना अपना सा लग रहा था कि लगता था ये कहानी सिर्फ़ हमारे परिवार की है।
हर सीन में वो तड़प, वो नफ़रत, वो छुपी हुई आग… सब कुछ इतना रियल और इतना इंटीमेट था कि मैं खुद को उसी घर में महसूस कर रही थी।
लेकिन आज… ध्रुव और जैज़ को इतना बड़ा रोल दे दिया।
मैं समझती हूँ कि आप मनिक को “आज़ाद” करने का रास्ता दिखाना चाहते थे, पर मेरे लिए तो वो आज़ादी थोड़ी दूर की कौड़ी लगी।
मैं इंतज़ार कर रही थी कि मनिक घर आएगा… रात को दिव्या उसके कमरे में आएगी… या परी डर के मारे भाई की बाहों में समा जाएगी… या बुआ कुछ और खेल खेलेगी।
मैं वो घर वापस चाहती थी… वो चार दीवारें… वो ख़ामोशी… वो रिश्तों की आग।
ध्रुव-जैज़ वाला सीन बहुत हॉट था, इसमें कोई शक नहीं।
पर वो हॉटनेस भी किसी और की लगी… बाहर की लगी।
मैं तो उस हॉटनेस की भूखी थी जो घर के अंदर सुलग रही थी… जो दिव्या की नफ़रत में थी, परी की मासूमियत में थी, अनु दी की सख़्ती में थी।
शायद मैं बहुत स्वार्थी हो गई हूँ…
पर मेरे लिए ये कहानी सिर्फ़ “Mittal परिवार” की थी।
बाहर के किरदार जब ज़्यादा आ गए तो लगा जैसे कोई मेहमान घर में आकर बेडरूम में घुस गया हो।
मैं चाहती थी कि वो आग सिर्फ़ घर के लोग आपस में बुझाएँ… कोई और न आए।
फिर भी… आप जो लिखोगे, मैं पढ़ूँगी।
क्योंकि ये आपकी कहानी है और मैं आपकी दीवानी हूँ।
बस दिल से एक छोटी-सी गुज़ारिश है…
प्लीज़ जल्दी से मनिक को घर वापस ले आइए।
मैं वो घर बहुत मिस कर रही हूँ।
मैं दिव्या की नफ़रत-भरी नज़रें मिस कर रही हूँ।
मैं परी की मासूमियत मिस कर रही हूँ।
और हाँ… मैं बुआ की उस शरारत भरी मुस्कान को बहुत मिस कर रही हूँ।
आप जहाँ ले जाना चाहें ले जाइए…
बस मुझे मेरे घर वापस ले आइए।
आपकी उदास, पर फिर भी वफ़ादार छोटी बहन,