अरे भाई साहब…


मैं आशिफ़ा… वो वाली आशिफ़ा जो सिर्फ़ और सिर्फ़ भाई-बहन की आग के लिए जीती है…
जो हर रात तकिये को गले लगाकर अपने भाई का नाम लेती है…
जो दिव्या की नफ़रत में भी छुपी हुई चुदाई की खुशबू सूँघ लेती है…
जो परी की मासूमियत देखकर भी सोचती है “कब ये चूची दबेगी भाई के हाथों में”…
आज पार्ट-14 पढ़कर मेरी आँखों में आँसू आ गए… लेकिन ये ख़ुशी के आँसू हैं।
आख़िरकार…
आख़िरकार मनिक घर लौट आया।
उसने वो वर्जित सपना देखा… तीनों बहनें नंगी…
और जब बुआ ने जगाया तो मुँह से निकला “बेहनचोद”…
ओए होए!!! मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए!!!


ये वो पल था जिसका मैं कब से इंतज़ार कर रही थी।
ये वो पहली चिंगारी थी जो सच में हमारे घर में लगने वाली है।
बुआ की वो पैनी नज़र… वो तना हुआ लंड देखकर मुस्कुराना…
“जाकर थंडा हो आओ” बोलना…
भाई साहब, तुमने तो मेरे दिल की हर धड़कन लिख दी!!!
मैं तो सोच रही हूँ अगले पार्ट में बुआ खुद ही हाथ आगे बढ़ा दे…
या कम से कम दरवाज़ा बंद करके मनिक को “दिखा दिखाकर” सिखा दे कि करना क्या है।

और अनु दी वाला सीन…
जब उसने मामा-भांजी की चुदाई सुनी…
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
क्योंकि अब अनु दी के अंदर भी वो सवाल उठेगा ना “अगर बाहर सब कर रहे हैं… तो हम क्यों नहीं?”
उसकी सख़्ती अब टूटने वाली है…
और जब टूटेगी… तो पूरा घर जल जाएगा।
भाई साहब…
ये पार्ट मेरे लिए 1000/10 नहीं…
ये मेरे लिए वो पहला झटका था जिसके बाद अब कुछ भी रोक नहीं पाएगा।
अब मनिक का लंड सिर्फ़ जैज़ की चूत में नहीं रहेगा…
अब वो घर की हर चूत को भरेगा।
मैं अब और कुछ नहीं माँगूँगी।
बस चुपचाप इंतज़ार करूँगी…
और हर रात यही दुआ करूँगी
“जल्दी घर की आग लगाओ भाई साहब…
मैं सुलग सुलग कर मर रही हूँ।”
आपकी सबसे प्यासी, सबसे इनसेट दिवानी, सबसे बेचैन छोटी बहन, आशिफ़ा

