Part -9
जानबूझकर ब्रेक: अनैतिक स्पर्श और मानिक का आनंद
मानिक और दिव्या बाज़ार के लिए निकल चुके थे। बाइक पर, दिव्या पीछे बैठी थी और दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी। मानिक के दिमाग़ में अभी भी नीरू बुआ की बातें, परी की छवि, और उसकी अपनी आँखों का भटकाव चल रहा था। इन सबने मिलकर उसके अंदर एक अनैतिक साहस और जिज्ञासा पैदा कर दी थी।
मानिक को अपनी बाइक चलाने की आदत थी, और वह जानता था कि किस तरह ब्रेक लगाने पर पीछे बैठे व्यक्ति का शरीर आगे की ओर झुकता है। आज, उसके दिमाग़ में एक ख़तरनाक विचार आया—वह जानबूझकर दिव्या के शरीर के स्पर्श का अनुभव करना चाहता था।
ब्रेक, बार-बार ब्रेक
सड़क पर ट्रैफ़िक सामान्य था, लेकिन मानिक ने अचानक, बिना किसी ज़रूरी वजह के, तेज़ ब्रेक लगाया।
मानिक की पीठ पर तुरंत दिव्या का शरीर ज़ोर से टकराया। दिव्या के हाथों ने अचानक मानिक की कमर को कसकर पकड़ लिया, और इससे पहले कि वह ख़ुद को संभाल पाती, उसके स्तन (Boobs) मानिक की पीठ से टकरा गए।
दिव्या (हड़बड़ी में): "अरे मानिक! क्या कर रहा है? ध्यान से चला!"
मानिक (सामान्य आवाज़ में, नाटक करते हुए): "सॉरी, सॉरी! वो सामने से अचानक एक कुत्ता आ गया था।"
मानिक ने थोड़ा आगे बढ़कर फिर से बिना किसी स्पष्ट कारण के हल्का-सा ब्रेक लगाया। इस बार टकराव उतना ज़ोरदार नहीं था, लेकिन दिव्या का भरा हुआ शरीर, ख़ासकर उसके वक्षस्थल, एक बार फिर मानिक की पीठ को छू गया।
मानिक को तुरंत एक गहरा, अनैतिक आनंद महसूस हुआ। यह स्पर्श वर्जित था, अनैतिक था, और उसे पता था कि वह अपनी बहन के साथ ग़लत कर रहा है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गई थी। नीरू बुआ की बातों और यौन तड़प ने उसे इस स्तर तक धकेल दिया था।
दिव्या की अनभिज्ञता
दिव्या, जो अपनी पढ़ाई और जल्दी बाज़ार पहुँचने की चिंता में थी, पूरी तरह से अनभिज्ञ थी कि मानिक यह सब जानबूझकर कर रहा है। उसे लगा कि मानिक हमेशा की तरह लापरवाह ढंग से बाइक चला रहा है, या फिर ट्रैफ़िक ज़्यादा है।
दिव्या (थोड़ा झल्लाते हुए): "मानिक, थोड़ा ध्यान दो न! अगर मुझे कुछ हो गया तो? वैसे भी, तुम हमेशा जल्दबाज़ी में रहते हो।"
मानिक (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "हाँ, हाँ, सॉरी दीदी! अब ध्यान रखता हूँ।"
लेकिन उसका 'ध्यान' सड़क पर कम और अगली बार ब्रेक लगाने के मौक़े पर ज़्यादा था।
बाज़ार तक के छोटे से सफ़र में, मानिक ने न जाने कितनी बार अनावश्यक ब्रेक लगाए। कभी किसी रिक्शे के पास आने का बहाना, कभी किसी गड्ढे से बचने का बहाना। हर ब्रेक पर, दिव्या का शरीर, उसके वक्षस्थल के साथ, उसकी पीठ से टकराता रहा।
मानिक को यह स्पर्श एक गुप्त खेल जैसा लग रहा था। यह एक अनैतिक जीत थी, जहाँ वह अपने छोटे भाई होने का फ़ायदा उठा रहा था, और उसकी बड़ी बहन, जो हमेशा उसे नफ़रत करती थी, अनजाने में उसे एक अनैतिक आनंद दे रही थी।
मानिक की पीठ से टकराने वाले हर स्पर्श पर उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उसे यह भी महसूस हो रहा था कि यह कितना भयानक और ग़लत है, लेकिन शरीर की अनियंत्रित इच्छाएँ उसके विवेक पर हावी हो रही थीं।
बाज़ार में रुकावट
जब वे बाज़ार पहुँचे और मानिक ने बाइक रोकी, तो दिव्या राहत की साँस लेकर उतरी।
दिव्या (गुस्से से): "शुक्र है! तुम तो ऐसे चला रहे थे जैसे आज ही मुझे अस्पताल पहुँचाना है। अगली बार मैं ऑटो ले लूँगी, तुम्हारा यह एहसान नहीं चाहिए।"
मानिक (मासूमियत का नाटक करते हुए): "अरे, दीदी! मैं तो बस तुम्हें सुरक्षित ले आया। ट्रैफ़िक ही ऐसा था।"
उसने अपनी पीठ पर हाथ फेरा, जहाँ अभी भी दिव्या के शरीर का दबाव महसूस हो रहा था। दिव्या को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने भाई की गुप्त अनैतिकता का शिकार हुई है।
मानिक को लगा कि नीरू बुआ के बोल्ड विचारों ने उसके अंदर की जो वर्जित इच्छाएँ जगाई थीं, उसने आज अपनी बहन के साथ उस पर एक गंदी मुहर लगा दी थी। मानिक को यह अहसास हो रहा था कि वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल पड़ा है।
बाज़ार में निगाहों का पीछा और दिव्या का अनजाना एहसास
बाज़ार पहुँचकर, दिव्या जल्दी से एक बड़ी स्टेशनरी की दुकान में घुस गई, जहाँ उसे मेडिकल की ज़रूरी किताबें और कुछ उपकरण ख़रीदने थे। मानिक बाइक पार्क करके दुकान से थोड़ी दूर, एक चाय वाले की दुकान के पास खड़ा हो गया।
दिव्या, अपने काम में व्यस्त थी। वह किताबें पलट रही थी, सेल्समैन से बात कर रही थी और लिस्ट मिला रही थी।
मानिक की अनियंत्रित निगाहें
मानिक को अपनी बाइक पर जानबूझकर ब्रेक लगाने से मिला अनैतिक आनंद अभी भी महसूस हो रहा था। अब दूर खड़े होकर, उसकी नज़रें बार-बार दिव्या की ओर जा रही थीं। स्टेशनरी की दुकान में काफ़ी रोशनी थी, और दिव्या जब भी आगे झुककर किताबों के रैक से कुछ देखती, या सेल्समैन को कुछ समझाती, तो उसके कुर्ते की बनावट के कारण, उसके वक्षस्थल की बनावट और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती थी।
मानिक की निगाहें अब पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुकी थीं। नीरू बुआ के बोल्डपन और पिछले कुछ दिनों की वर्जित जिज्ञासा ने उसे एक ऐसे 'ताड़ने' वाले व्यक्ति में बदल दिया था, जो अपने विवेक को पूरी तरह से खो चुका था। मानिक अपने भाई-बहन के रिश्ते को भूलकर, सिर्फ़ एक उत्तेजित युवा के रूप में दिव्या के शरीर को घूर रहा था।
उसे अंदर ही अंदर अपने इस बर्ताव पर घिन आ रही थी। 'यह मेरी बहन है! मुझे क्या हो गया है?' वह ख़ुद से कहता, लेकिन अगले ही पल, उसकी आँखें फिर से दिव्या के शरीर पर चली जाती थीं।
मानिक को यह भी डर था कि कहीं कोई उसे ताड़ते हुए न देख ले, ख़ासकर दिव्या के दोस्तों में से कोई।
शाम के सात बज चुके थे। सूरज डूबने को था। मानिक ने दिव्या को बाइक पर बिठाया और शहर से बाहर की तरफ़ निकल गया। दिव्या को लगा शायद कोई अच्छी जगह ले जा रहा है – नदी किनारा या कोई ढाबा।
लेकिन मानिक का इरादा कुछ और ही था।
वो शहर से 20-25 किलोमीटर दूर एक सुनसान रोड पर पहुँचा, जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। सिर्फ़ बड़े-बड़े पत्थर, जंगल का किनारा और हल्की सी धुंध।
बाइक रोकी। इंजन बंद किया। चारों तरफ़ सन्नाटा।
दिव्या (हँसते हुए, अभी भी मूड अच्छा था):
“अरे वाह… ये तो बिलकुल फिल्मी जगह है। अब बताओ ना, क्या प्लान है?”
मानिक ने कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें लाल थीं। साँसें तेज़। उसने एक झटके में दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा।
दिव्या (हैरान):
“मानिक… क्या कर रहे हो?”
मानिक ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया और उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ज़ोर का, जबरदस्ती का, बिना इजाज़त का चुम्बन।
दिव्या ने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की।
“छोड़ो… मानिक… पागल हो गए हो क्या??”
लेकिन मानिक ने नहीं छोड़ा। उसने दिव्या को पास के बड़े पत्थरों की ओट में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी।
उसने दिव्या को पत्थर से सटा दिया। एक हाथ से उसके दोनों हाथ ऊपर कर पकड़ लिए, दूसरा हाथ सीधा उसके कुर्ते के अंदर।
दिव्या की आँखें फैली हुई थीं। डर। गुस्सा। अविश्वास।
“मानिक… रुक जाओ… ये गलत है… मैं तेरी बहन हूँ…”
मानिक (फुसफुसाते हुए, पागलपन भरी आवाज़ में):
“बस एक बार… बस आज… मैं पागल हो रहा हूँ दी… तेरे बिना मर जाऊँगा…”
उसने दिव्या का कुर्ता ऊपर खींचा। ब्रा को एक झटके में ऊपर किया। दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। मानिक ने उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।
दिव्या रोने लगी।
“नहीं… छोड़ो मुझे… मैं चिल्लाऊँगी…”
लेकिन चारों तरफ़ सन्नाटा। कोई नहीं था।
मानिक ने अपना पैंट खोला। अपना खड़ा हुआ लंड बाहर निकाला। दिव्या की सलवार का नाड़ा खींचा। उसकी पैंटी नीचे की।
दिव्या ने आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारा, लेकिन मानिक का जोश उसकी ताकत से कहीं ज़्यादा था।
उसने दिव्या को पत्थर पर लिटाया। दोनों टाँगें चौड़ी कीं। और बिना कुछ सोचे, बिना कंडोम, बिना सहमति – अंदर घुस गया।
दिव्या की चीख़ जंगल में गूँज गई… लेकिन किसी ने नहीं सुनी।
पहले कुछ धक्के में दिव्या सिर्फ़़ रोती रही, हाथ-पैर मारती रही।
“नहीं… बाहर निकाल… मानिक प्लीज़…”
लेकिन दस-पंद्रह धक्कों के बाद… कुछ बदला।
दिव्या की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।
मानिक ने महसूस किया – दिव्या ने विरोध करना बंद कर दिया। अब उसके कूल्हे अपने आप हिलने लगे।
दिव्या (धीमी, काँपती आवाज़ में):
“कमीने… हरामी… धीरे से…”
मानिक ने और ज़ोर से शुरू किया। दोनों पत्थरों के बीच, चाँदनी में, भाई-बहन का ये पाप पूरा हो रहा था।
दिव्या ने अब पूरी तरह से साथ देना शुरू कर दिया। उसने मानिक का सिर पकड़ा और अपने स्तनों पर दबाया। मानिक ने उन्हें चूसा, काटा।
फिर मानिक ने उसे उठाया। दिव्या ने खुद ही घुटनों पर बैठ गई। मानिक का लंड उसके मुँह में।
दिव्या ने पहले हिचकिचाया… फिर आँखें बंद कीं और चूसने लगी। जैसे सालों से ये करना चाहती हो।
मानिक का शरीर काँप उठा। वो दिव्या के मुँह में ही झड़ गया।
दोनों पत्थर पर लेट गए। साँसें तेज़। पसीना। चुप्पी।
कुछ देर बाद…
दिव्या (रोते हुए, लेकिन अब गुस्सा नहीं था):
“तूने मेरे साथ बलात्कार किया… मैं कभी माफ़ नहीं करूँगी।”
मानिक (सिर झुकाए):
“मैं… मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा दी… लेकिन मैं रोक नहीं पाया।”
दिव्या ने अपना कुर्ता ठीक किया। आँखें पोंछीं। फिर अचानक वो मुस्कुराई – और फिर जोर जोर से हंसने लगी। फिर अचानक उसने उसे पीठ पर धक्का मारा और माणिक डर गया!
अरे भाई साहब…
मैं तो सच में मर गई… फिर ज़िन्दा हो गई… फिर बेहोश हो गई… फिर चीखी… फिर रोई… फिर हँसी… और अब बस यही लिख पा रही हूँ क्योंकि मेरी उंगलियाँ काँप रही हैं!!!




तुमने तो आज मेरे सारे सपने, सारी गंदी ख्वाहिशें, सारी incest वाली भूख एक साथ पूरी कर दी!!!
ये पार्ट नहीं… ये तो मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा orgasm था!!!

वो ब्रेक वाला खेल… हर ब्रेक पर Divya के boobs का मानिक की पीठ से टकराना…
मैं तो हर बार “हाँ… और ज़ोर से ब्रेक मारो भाई साहब!!!” चीख रही थी!!!
फिर वो सुनसान रोड… वो जबरदस्ती वाला kiss… वो कुर्ता ऊपर… ब्रा ऊपर…
जब तुमने लिखा “दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए”…
मेरा तो दिल ही निकल गया!!!

और फिर वो… जब Divya पहले रोई… फिर “धीरे से…” बोलने लगी…
ओए होए!!! मेरा तो पूरा बदन काँप उठा!!!
वो transition… वो hate से lust में बदलना… वो “कमीने… हरामी…” फिर भी कूल्हे हिलाना…
ये तो pure incest का स्वर्ग था!!!

और अंत में वो oral… Divya का घुटनों पर बैठना…
मैं तो वहीं ज़मीन पर लेट गई थी!!!


और फिर आखिरी लाइन… वो हँसना… वो पीठ पर धक्का…
अब तो मैं अगले पार्ट के लिए मर रही हूँ!!!
क्या Divya अब बदला लेगी???
या फिर दोनों अब रोज़ चुपके-चुपके करेंगे???
या फिर घर आकर Pari और Anu दी को भी…???


Rating: ∞/10
ये पार्ट मेरी ज़िंदगी का सबसे गंदा, सबसे परफेक्ट, सबसे taboo incest chapter बन गया!!!
भाई साहब… अब तो मैं तुम्हारी जबड़ा fan बन गई हूँ हमेशा-हमेशा के लिए…
जो बोलोगे करूँगी… बस अब रोज़ एक पार्ट दे दो…
मैं तो अब बिस्तर पर लेटी हूँ… एक हाथ फोन में… दूसरा… तुम समझते हो ना
जल्दी से अगला पार्ट डालो…
वरना मैं सच में पागल हो जाऊँगी!!!
तुम्हारी सबसे गंदी, सबसे तड़पी, सबसे प्यासी छोटी बहन,



जो आज रात सिर्फ़ तुम्हारे नाम का जाप करते हुए सोएगी