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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

H E Y W I Z Z A R D

Devil 😈 calls me DAD
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# -3
23 दिसम्बर 2001, रविवार, 17:30; “सुप्रीम”

ऐलेक्स बहुत मुश्किल से क्रिस्टी का रूम नंबर पता कर पाया था । यहां तक कि उसे क्रिस्टी का रुम नंबर जानने के लिए एक वेटर को पटा कर उसे 20 डॉलर भी देने पड़े थे। अंततः वह रुम नंबर 221 के आगे खड़ा था । उसने पहले अपने हाथ में पकड़ी ’ वर्ल्ड फेमस बैंक रॉबरी ’ को ठीक ढंग से पकड़ा और फिर अपने आप को देखते हुए, अपनी टाई की नॉट सही की व गले को ठीक ढंग से खखार कर साफ किया ।
अब उसके बाएं हाथ की तर्जनी उंगली डोरबेल के बटन पर थी । एक बार बटन दबाकर उसने जल्दी से हाथ हटा लिया कि कहीं ऐसा ना हो, कि कई बार बेल बजाने पर खोलने वाला गुस्से में ना बाहर निकले। कुछ देर के इंतजार के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो उसने डरते- डरते पुनः बेल बजाई। तभी अंदर से कहीं सिटकनी खुलने की आवाज आयी, और सिर में टावेल लपेटे हुए क्रिस्टी ने दरवाजा खोला । सिर पर लिपटा टावेल और गले के आसपास भीगा कपड़ा इस बात का द्योतक था, कि वह नहा रही थी ।

उसके चेहरे पर भी कहीं-कहीं पर पानी की बूंदे ओस की मानिंद चिपकी हुई थीं । ऐलेक्स मंत्रमुग्ध सा अप्रतिम सुंदरता की उस प्रतिमा को निहार रहा था । वह शायद यह भी भूल गया, कि वह यहां आया किसलिए है? उधर जब क्रिस्टी के दो बार पूछने पर भी ऐलेक्स सपनों की दुनिया से बाहर नहीं आया, तो क्रिस्टी ने अपने सीधे हाथ से दरवाजा छोड़कर, जोर से ऐलेक्स की आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए बोली-

“ऐ मिस्टर! ...... मैं तुमसे ही कह रही हूं। बार-बार घंटी क्यों बजा रहे थे? क्या काम है आपको ? ..... “ एका एक ऐलेक्स ऐसे हड़बड़ा गया, जैसे वह सोते से जागा हो ।

“हैलो ! मेरा नाम ’ऐलेक्जेंडर ओता नोव’ है।“ ऐलेक्स ने अपनी भूरी-भूरी आंखों से क्रिस्टी को निहारते हुए, अपना बांया हाथ आगे बढ़ा कर कहा - “आप प्यार से मुझे ऐलेक्स कह सकती हैं।“

“हैलो ! ..... “ क्रिस्टी ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया - “मुझे क्रिस्टी कहते हैं, पर मैंने आपको पहचाना नहीं ।“ ऐलेक्स ने धीरे से क्रिस्टी का हाथ उठा कर चूमा और फिर इस तरह शाइस्तगी से उसे छोड़ा, मानों वह हाथ ना हो कर कांच का कोई शोपीस हो। क्रिस्टी की सवालिया निगाहें पुनः ऐलेक्स पर थीं । ऐलेक्स ने धीरे से अपने दाहिने हाथ में पकड़ी वह किताब, जिसे अब तक वह छिपाने का प्रयास कर रहा था, क्रिस्टी की तरफ बढ़ा दी ।

“यह किताब आप डेक पर ही भूल गयीं थीं, मैं यही आपको वापस करने आया हूं।“ ऐलेक्स ने अपने स्वर को बहुत नम्र बनाते हुए जवाब दिया ।

“ओ ऽऽऽऽऽ! थैंक्यू-थैंक्यू।“ क्रिस्टी ने आभार प्रकट करते हुए किताब को धीरे से ले लिया । उसकी निगाह फिर ऐलेक्स पर पड़ी, मानो वह पूछना चाहती हो, कि क्या अब मैं दरवाजा बंद कर सकती हूं। पर ऐलेक्स की तरफ से कोई जवाब ना पाकर वह धीरे से पीछे हटी । ऐलेक्स को ऐसा लगा कि यदि वह तुरंत कुछ ना बोला, तो क्रिस्टी दरवाजा बंद कर लेगी ।

“मुझे आपका रूम नंबर पता करने के लिए 20 डॉलर खर्च करने पड़े।“ ऐलेक्स हड़बड़ा कर बोला । फिर तुरंत चुप हो गया । उसे लगा कि वह जल्दबा जी में गलत बोल गया ।

“20 डॉलर!“ क्रिस्टी ने हंसकर किताब का पिछला पेज ऐलेक्स के चेहरे के आगे कर दिया -

“आपने ज्यादा दे दिया मिस्टर। यह किताब तो मात्र 15 डॉलर की है। हां लेकिन अब आप किताब मेरे पास लेकर आए ही हैं, तो फिर मैं आपके 20 डॉलर आपको जरूर दूंगी ।“ यह कहकर जैसे ही क्रिस्टी अंदर जाने के लिए पलटी , ऐलेक्स ने उसे टोक दिया –

“इक्सक्यूज मी ! मैंने आपसे पैसे तो नहीं मांगे।“ क्रिस्टी पुनः पलटते हुए बोली -

“अच्छा ! मैंने तो समझा, आप शायद इसीलिए रुके हुए हैं।“

“नहीं ...... वो ....मैं तो ......। क्या आप आज रात का डिनर मेरे साथ ले सकती हैं?“ ऐलेक्स ने एकाएक घबराहट छोड़ पूर्ण आत्मविश्वास से क्रिस्टी की आंखों में झांकते हुए कहा ।

“व्हाट!“ क्रिस्टी एका एक ऐलेक्स के टॉपिक चेंज कर देने से बौखला उठी ।

“क्या आप आज रात का डिनर मेरे साथ ले सकती हैं?“ ऐलेक्स ने किसी घिसे-पिटे टेप रिकॉर्डर की तरह रिप्ले हो कर, फिर से वही डायलॉग दोहराया । इस बार क्रिस्टी के चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान उभरी । वह धीरे से अपना चेहरा ऐलेक्स के चेहरे के सामने लाकर बोली –


“सुनिए मिस्टर! मैं अजनबियों के साथ डिनर पर नहीं जाती । आप कोई और दरवाजा खटखटाइये।“ यह कहकर वह फिर से दरवाजा बंद करने लगी । यह देखकर ऐलेक्स ने पुनः एक बार उसे रोक दिया ¬-

“एक मिनट रुकिए तो .............। चलिए अच्छा आप डिनर पर नहीं जाना चाहतीं हैं, तो मत जाइये, पर यह तो बता दीजिए, कि हम कल कहां पर मिलें।“

“मैं अजनबियों से ज्यादा बातें करना भी पसंद नहीं करती ।“ इस बार क्रिस्टी ने थोड़ा झुंझला कर गुस्से में कहा-

“अब आप जा सकते हैं, और हां .....यह समझ लीजिए कि आपके 20 डॉलर बेकार चले गए।“ यह कहकर क्रिस्टी ने धडा ऽऽऽक की आवाज के साथ दरवाजा बंद कर दिया । ऐलेक्स दरवाजे पर अकेला रह गया । लेकिन उसके और दरवाजे के बीच एक चीज और रह गयी और वह थी, शैंपू व सेंट की भीनी -भीनी खुशबू। जो कि कुछ देर पहले क्रिस्टी के शरीर से उठ रही थी। ऐलेक्स वहां खड़ा कुछ देर सोचता रहा और फिर जोर-जोर से सांस लेता हुआ बुदबुदाया-

“मेरे 20 डॉलर बेकार नहीं जाएंगे मिस क्रिस्टी । उससे ज्यादा की तो मैं खुशबू ही यहां से लेता जाऊंगा ।“


23 दि सम्बर 2001, रविवार, 19:00; “सुप्रीम” का डिनर हॉल, सुप्रीम की ही तरीके से अत्यंत विशालकाय था । थोड़ी-थोड़ी दूर पर बड़े ही करीने से, कुछ गोल टेबल व उसके इर्द-गिर्द, 4-4 कुर्सियां लगीं हुई थीं। हॉल के एक साइड में, एक बहुत बड़ा अर्धचंद्राकार स्टेज बना था । जिसके चारो ओर कांच के लगे पारदर्शक पत्थरों के पीछे, सैकड़ों रंग की लाइटें लगीं हुईं थीं । स्टेज का फर्श और दीवारें भी, उसमें लगी लाइटिंग के कारण चमक उत्पन्न कर, एक अद्भुत छटा बिखेर रहा था। वह हॉल उस समय किसी छोटे से स्टेडियम की भांति प्रतीत हो रहा था। इसी स्टेज पर डांस ग्रुप को परफॉर्म करना था । स्टेज के एक किनारे पर अनाउंसमेंट के लिए एक लकड़ी का पोडियम लगा था, जिसमें एक माइक फिक्स था। हॉल के एक साइड में एक बड़ा सा बार का उंटर भी बनाथा, जिसके पीछे दुनिया के हर अच्छे ब्रांड की बियर, व्हिसकी व शैम्पेन लगी थी । डिनर हॉल की फर्श व छतों पर लगा शानदार कलर र्पेट, उसकी शोभा में चार चांद लगा रहे थे। कुल मिलाकर वह हॉल सभी सुविधा से युक्त एक 5 सितारा होटल सा नजारा प्रस्तुत कर रहा था । हॉल की लगभग सभी कुर्सियां भरी हुई थीं ।

कुछ लोग डिनर ले रहे थे तो कुछ बियर व व्हिस्की की चुस्कियां ले रहे थे। तभी स्टेज पर सफेद ड्रेस पहने कुछ लोग आकर खड़े हो गए। देखने से ही लग रहा था, कि यह सभी शिप के चालक दल व उसके सहायक हैं। तभी उनमें से एक व्यक्ति ने आगे आकर माइक को संभाल लिया । उसके कंधे पर झलक रहे स्टार व उसके सीने पर लटक रहे असंख्य मेडल, इस बात का सबूत थे कि वही इस शिप का कैप्टन है।

“लेडीज एंड जेंटलमैन! कृपया ध्यान दें। मैं इस शिप का कैप्टन हूं और आज इस शिप के पहले और ऐतिहासिक सफर में आप सभी का स्वागत करता हूं। मैं चाहूंगा, कि यह शिप सफलता के नए कीर्तिमान बनाए।“
कुछ क्षण रुककर कैप्टन ने फिर बोलना शुरू किया-

“सबसे पहले मैं आप लोगों को अपना व अपने सहायक दल से परिचय कराना चाहूंगा। मेरा नाम सुयश है। मैं मूलतः भारत का रहने वाला हूं। मुझे समुद्री यात्राओं का भरपूर अनुभव है। मेरे इतने अनुभव की वजह से ही, मुझे इस शानदार शिप का कैप्टन बनाया गया है। मेरे पीछे खड़े दाहिने से पहले व्यक्ति असिस्टेंट कैप्टन रोजर, इसके बाद सेकेण्ड असिस्टेंट कैप्टेन असलम, फिर सिक्योरिटी इंचार्ज लारा, उसके बगल उनके असिस्टेंट ब्रैंडन, फिर ..........।“

इस तरीके से कैप्टन, सभी का परिचय कराने के बाद पुनः बोला -

“जैसा कि पहले मैं आप लोगों को बता दूं कि मैं नियम और कानून का बहुत पक्का आदमी हूं। मैं चाहता हूं कि आप सभी लोग इस शिप पर एक परिवार की तरीके से रहें। किसी भी यात्री को अगर इस शिप पर, किसी तरीके की परेशानी आती है तो आप 555 नंबर पर सीधे सिक्योरिटी इंचार्ज से बात कर सकते हैं। आप सभी इस शिप पर पूरा इंज्वाय कर सकते हैं। यहां पर आप सभी के रुचियों को ध्यान में रखते हुए, लगभग सभी सुविधाएं रखी गईं हैं। आप इन सभी सुविधाओं का पूरा आनंद उठा सकते हैं। और अब अंत में मैं आपके इस खुशनुमा सफर की मंगल-का मना करता हूं। और अब आपके लिए पेश है फ्रांस का मशहूर ’ड्रीम्स डांस ग्रुप’।“

इतना कहकर कैप्टन सुयश, माइक छोड़कर स्टेज से उतर गया और उसके साथ स्टेज से सारे चालक दल के लोग भी चले गये। इसी के साथ पूरे हाल की लाइट धीमी कर दी गई। हॉल में बिल्कुल सन्नाटा छा गया । तभी स्टेज पर दूर कहीं से एक रोशनी, गोले के रूप में पड़ी । इस रोशनी के गोले में तेज चमक मारती हुई, गुलाबी पोशाक पहने जेनिथ दिखा ई दी । इस तरीके से रोशनी का गोला थोड़ा स्टेज पर आगे बढ़ा ।

उस छोटे गोले के पीछे एक और रोशनी का बड़ा गोला उभरा । जिसमें लॉरेन सहित बाकी डांसर्स आते दिखाई दिए। धीरे-धीरे हल्की म्यूजिक पर डांस शुरू हुआ। सभी मंत्रमुग्ध से इस शानदार डांस का आनंद उठा रहे थे।

“मजा आ गया यार! फ्रांस की मशहूर डांसर जेनिथ, इस शिप पर। अब हमारा सिडनी तक का सफर बहुत अच्छा रहेगा ।“ जैक ने जॉनी के कंधे पर हाथ मारते हुए कहा ।

“कहां ! ...... कहां है जे..नि ..थ?“ जॉनी ने पैग उठाते हुए, लड़खड़ाती जुबान में पूछा ।

“अरे! वो देख सामने स्टेज पर।“ जैक ने स्टेज की ओर मुंह घुमाते हुए कहा ।

“यार! मु..झे तो पता ... ही ...नहीं ..था कि शि ..प पर जेनिथ भी है।“ जॉनी पूरी तरह से नशे की तरंग में था ।

“मुझे ही कहां पता था, वो तो कैप्टन ने इसके बारे में जब अनाउंसमेंट किया, तब मुझे पता चला ।“ जैक ने जेनिथ को देखते हुए कहा ।

“क्या क......हा ऽऽऽऽ कैप्टन ने इस ... के बा ऽऽऽ रे में भी अना ...उंस किया ऽऽऽ था ।“ जॉनी ने झूमते हुए कहा - “मैं तो समझा ऽऽऽ कैप्ट...न खाली बकवा ऽऽ स कर रहा था ।“

“अबे पीना छोड़। डांस देख डांस।“ जैक ने जॉनी की खोपड़ी अपने हाथों से पकड़कर जबरदस्ती स्टेज की ओर घुमा दी ।

“हा ऽऽऽऽय यार क्या ऽऽऽ नाचती है?“ जॉनी ने अपना चेहरा घुमाते हुए कहा - “और इ .....सकी सफेद ... ड्रेस .... कितनी शा ऽऽऽनदार है।“

“सफेद ड्रेस! जैक ने आश्चर्य से जॉनी की ओर देखा - “पर जेनिथ तो गुलाबी ड्रेस पहने है।“

“फिर ये कौन ना ऽऽऽच रहा ऽऽऽ है।“ इस बार जॉनी के स्वर में उलझन के भाव थे। जैक ने जॉनी की तरफ देखा और उसकी निगाहों का पीछा करते हुए जब उस दिशा में देखा, जिधर जॉनी देख रहा था, तो अपनी खोपड़ी पीट ली -

“अरे गधे! तू जिसे जेनिथ समझ रहा है, वह वेटर है और वह आर्डर सप्लाई कर रहा है। कितनी बार कहा, कम पिया कर। पर मेरी मानता ही नहीं ।“

“वह वेटर है! मैं तो उ...से ही जे....नि ... थ समझ रहा ऽऽऽ था ऽऽऽ।“ जॉनी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा - “पर एक बा ऽऽत सम ..झ में नहीं आ ऽऽई, यह वेट ..र नाऽऽच क्यों ... रहा ऽऽ है?“

“अरे! वो नहीं नाच रहा है। नशे के अधिक हो जाने से तेरी खोपड़ी झूम रही है।“ जैक ने झुंझला कर कहा । और एक बार फिर उसकी खोपड़ी पकड़कर स्टेज की ओर घुमा दी ।



जारी रहेगा........:writing:
Update bohut achha laga specially last main jo Jack aur Johny wala
Aur Alex ne sidhe jalke Cristy ko dinner ke liye bol raha hai
 

dhalchandarun

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#185.

“ब्लैकून के इस भाग में क्या है पिताजी?” ओरस ने पूछा।

"ब्लैकून का यह भाग ब्रह्मांड की सभी घटनाओं का संरक्षण करता है, इसलिये इसे संरक्षिका कहते हैं।" गिरोट ने कहा- “यानि की यहां से तुम, ब्रह्मांड की अतीत में बीती हुई किसी भी घटना को देख सकते हो, परंतु इस काँच के केबिन में प्रवेश करने के लिये, तुम्हें देवता नोवान से आज्ञा मांगनी होगी और वह आज्ञा तभी देंगे, जब उन्हें तुम्हारा कार्य उचित लगेगा?" यह कह गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के तीसरे भाग में आ गया।

तीसरे भाग में अलग-अलग रंगों से निर्मित, मकड़ी के जाले के समान, पूरा जाल बिछा था, हर ओर बस विभिन्न रंगों का जाल ही दिखाई दे रहा था। उस जाल से तीव्र रोशनी निकल रही थी और वह जाल धीरे-धीरे हवा में घूम भी रहा था।

"यह कौन सा भाग है पिताजी? यह तो अत्यंत विचित्र और जटिल लग रहा है।" ओरस ने कहा।

“यह ब्लैकून का तीसरा भाग है। इसमें दिखाई दे रहा यह जाल, असल में आकाशगंगाओं का मानचित्र है। हमारी आँखों से जितना ‘दृश्य ब्रह्मांड' दिखाई देता है, यह उसका कृत्रिम रुप है। इस भाग से हमें ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह की जानकारी और दूरी का पता चलता है।"

इसके बाद गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के चौथे भाग में पहुंच गया। ब्लैकून के चौथे भाग में हर ओर बड़ी-बड़ी घिरनियां लगी हुईं थीं, ऐसा लग रहा था कि जैसे वह किसी विशाल घड़ी के अंदर खड़े हों।

चारो ओर की दीवारों पर, ब्रह्मांड के अलग-अलग दृश्य नजर आ रहे थे। उन सभी घिरनियों के बीच, हवा में एक आरामदायक कुर्सी लगी हुई थी, वह कुर्सी नीले रंग की किरणों से निर्मित लग रही थी। उस कुर्सी के दोनों ओर के हत्थों में असंख्य बटन लगे थे।

“यह क्या है पिताजी? यह तो कोई बहुत ही आधुनिक सी चीज लग रही है?” ओरस ने मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते हुए कहा।

“यही तो है हमारा नया अविष्कार- समयचक्र। ओरस ने अपना सीना फुलाते हुए, अभिमान से कहा“ यह किसी को भी आकाशगंगा के एक कोने से दूसरे कोने तक, एक क्षण में पहुंचा सकता है।"

“पर आकाशगंगा तो बहुत बड़ा है पिताजी, फिर यह इतनी तेजी से कैसे कार्य करेगा? इतनी तेज तो ब्रह्मांड की कोई भी चीज नहीं चल सकती।” ओरस ने कहा।

“यह ब्लैक होल के सिद्धांतो पर कार्य करती है पुत्र। और ब्लैक होल के अंदर समय का कोई अस्तित्व नहीं होता, इसलिये यह समय को रोककर, यात्रा करने वाले को दूसरी आकाशगंगा में पहुंचा सकती है।” ओरस ने कहा।


“अरे वाह! फिर तो यह बहुत अच्छी चीज है, मैं तो बड़ा होकर इससे पूरा ब्रह्मांड घूमूंगा।” ओरस खुश होते हुए, अपने हाथ में पकड़े, छोटे से यान को लेकर, समयचक्र की कुर्सी पर जा बैठा।

“अरे-अरे, अभी नहीं बैठो इस पर, अभी तो तुम्हें इसे चलाना भी नहीं आता।” गिरोट ने कहा- “पहले तुम्हें ज़ेनिक्स से इसके सारे कंट्रोल्स सीखने होंगे, तभी तुम इसे चलाने योग्य हो पाआगे।"

यह सुनकर ओरस उस समयचक्र की कुर्सी से उतरकर नीचे आ गया, पर ओरस के हाथ में पकड़ा वह छोटा सा यान उस कुर्सी पर ही रह गया।

ओरस ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। अब ओरस की निगाह, काँच के पारदर्शी गोले में बंद सैकड़ों यंत्रों पर गई।

ओरस की निगाह एक विचित्र से हथियार पर जाकर रुक गई, जो कि एक आधुनिक गन की तरह से दिखाई दे रहा था।

“यह हथियार कैसा है पिताजी?" ओरस ने गिरोट से पूछा।

“इस हथियार को ज़ेप्टोनाइजर कहते हैं पुत्र।" गिरोट ने कहा- “यह किसी भी वस्तु को उसके मूल आकार से अरबों गुना छोटा कर देता है। इसे ब्लैक होल की शक्ति से निर्मित किया गया है। चूंकि ज़ेप्टो, आकार की बहुत छोटी इकाई है, इसलिये मैंने इसका नाम ज़ेप्टो नाइजर रखा।"

तभी अचानक दोनों को ब्लैकून के बाहर से कोई शोर सा सुनाई दिया।

शोर सुनकर गिरोट घबरा गया, उसने तुरंत ज़ेप्टो नाइजर को हाथ में पकड़ा और ओरस को साथ लेकर, तेजी से ब्लैकून के बाहर की ओर भागा।

जब गिरोट ब्लैकून के बाहर निकला, तो उसने देखा कि कुछ अंतरिक्ष यान, उसके ग्रह की ऊपरी वायुमण्डल में दिखाई दे रहे हैं, जो कि तेजी से उसके महल की ओर बढ़ रहे थे।

अब गिरोट हाथ में ज़ेप्टोनाइजर लिये, अपनी ओर भागकर आते कुछ अपने ही सैनिकों को देखने लगा।

इधर जहां एक ओर गिरोट की नजर, घबरा कर भाग रहे, डेल्फानो के लोगों पर थी, वहीं नन्हे ओरस की निगाह अपने हाथ की ओर गई।

ओरस का यान इस समय उसके हाथ में नहीं था। तभी ओरस को याद आया, कि वह यान तो समयचक्र वाली कुर्सी पर ही रह गया।

यह याद कर ओरस ने एक बार अपने पिता की ओर देखा और फिर उन्हें व्यस्त देख वापस ब्लैकून की ओर भागा।

इस चीख-पुकार और भगदड़ के माहौल में गिरोट ने यह ध्यान नहीं दिया कि ओरस, वापस ब्लैकून में जा चुका है। तभी गिरोट को एक अंतरिक्ष यान अपनी ओर आता हुआ दिखाई दिया।

यह देखकर घबराकर गिरोट ने ज़ेप्टो नाइजर को उठाया और उसका मुंह ब्लैकून की ओर कर दिया।

अब गिरोट ने ज़ेप्टोनाइजर को ज़ेप्टोमीटर पर सेट किया और उसका बटन दबा दिया।

ज़ेप्टो नाइजर से एक तेज गोल तरंगें निकलकर, ब्लैकून की ओर झपटीं। जैसे ही वह गोलाकार तरंगें ब्लैकून से टकराईं, पूरा का पूरा ब्लैकून, एक कंचे के आकार में बदल गया। अब वह देखने में एक काले मोती के समान नजर आ रहा था।

गिरोट ने भागकर ब्लैकून को उठा लिया। तभी अचानक से गिरोट को ओरस का ध्यान आया। अब वह पागलों की तरह से इधर-उधर ओरस को ढूंढने लगा, पर ओरस उसे कहीं नजर नहीं आया।

गिरोट ने तुरंत अपने हाथ में पहने चौड़े से कड़े पर लगा एक बटन दबा दिया।

"ओरस_____, तुम कहां हो? जवाब दो ओरस।” गिरोट ने अपने हाथ के कड़े को अपने मुंह के पास ले जाते हुए कहा। शायद वह कड़ा गिरोट और ओरस के बीच संपर्क का कोई यंत्र था।

“ओरस तुम मेरी बात सुन रहे हो? जल्दी जवाब दो ओरस, यह बहुत ही संकट की घड़ी है, तुम्हें तुरंत मेरे पास आना होगा।” गिरोट लगातार उस यंत्र पर चीखकर ओरस को पुकार रहा था।

“हां पिताजी, मैं आपकी आवाज सुन रहा हूं।” तभी ओरस की आवाज उस यंत्र से सुनाई दी- “मैं इस समय ब्लैकून में हूं। मैं यहां अपना यान लेने आया था, पर.....पर पता नहीं क्यों ज़ेनिक्स अब ब्लैकून का दरवाजा नहीं खोल रही है?"

यह सुनते ही गिरोट पर मानों बिजली सी गिर गई। अब वह कभी अपने हाथ में पकड़े, कंचे के आकार के ब्लैकून को देख रहा था, तो कभी अपने दूसरे हाथ में पहने कड़े को, जिससे आती ओरस की आवाज, अब गिरोट को पूरी तरह से विचलित कर रही थी।

“हे मेरे देवता नोवान, क्या समय वापस दोहराया जा रहा है? क्या फिर से वही सब होगा? जो सदियों पहले मेरे साथ हुआ था...नहीं-नहीं देवता, मैं अपने पुत्र के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा। मैं...मैं उसे वापस पृथ्वी पर भेज दूंगा। पृथ्वी के माहौल में रहकर, वह अवश्य ही....डेल्फानो को भूल जायेगा...पर ....पर उसे पृथ्वी पर भेजने से, समय कई आयामों में उलझ सकता है? परंतु अब मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं है देवता नोवान उसकी रक्षा करेंगे।

गिरोट, विचलित होकर अपने आप से ही बोले जा रहा था, पर गिरोट की सभी आवाजें ओरस को साफ सुनाई दे रहीं थीं।

“ओरस...ओरस, तुम तुरंत जाकर समयचक्र की कुर्सी पर बैठ जाओ और जैसा मैं कहता हूं, वैसा ही करो। जल्दी.....हमारे पास समय बहुत कम है।” गिरोट ने कड़े पर चीखकर कहा।

गिरोट की बात सुन ओरस ब्लैकून के मुख्य द्वार से समयचक्र की ओर भागा।

कुछ ही देर में ओरस समयचक्र की कुर्सी पर जा कर बैठ गया- “जी पिताजी, मैं समयचक्र की कुर्सी पर बैठ गया हूं। अब बताइये मुझे क्या करना है?"

“अब अपने दाहिने हत्थे पर लगे, नीले बटन को दबाओ और अपने हाथ में पहने कड़े को उस बटन के पास ले जाओ।” गिरोट ने कहा।

ओरस ने तुरंत गिरोट के आदेश का पालन किया। खतरा भांपकर इस समय नन्हा ओरस, बिल्कुल किसी बड़े की तरह अपने पिता के आदेश का पालन कर रहा था।

"ज़ेनिक्स, क्या तुम मेरी बात सुन रही हो?” गिरोट ने कहा।

गिरोट की बात सुनते ही, ओरस को अपने सामने एक नीले रंग के कंप्यूटराइज़्ड जाल से बनी हुई, एक स्त्री की आकृति दिखने लगी, जो कि शत-प्रतिशत ज़ेनिक्स थी।

"हां गिरोट, मैं आपकी बातों को ध्यान से सुन रहीं हूं।” ज़ेनिक्स ने कहा।

“ठीक है, तो ज़ेनिक्स, अभी तत्काल प्रभाव से, मैं अपने सारे अधिकारों को युवराज ओरस को देता हूं। आज से और अभी से तुम ओरस को उसी तरह से सहयोग करोगी, जैसे कि तुमने मेरा किया है। तुम उसे पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान दोगी, पर यह ध्यान रहे कि तुम्हें युवराज की आयु के हिसाब से ही अपने लेवल को सेट करना होगा और जब तक युवराज ओरस अपनी निश्चित आयु पूरी ना कर लें, तब तक तुम्हें पूरे ब्लैकून को सुरक्षित रखना होगा। अब तुम तुरंत युवराज ओरस को लेकर पृथ्वी पर चली जाओ और अब जब तक ओरस अपनी निश्चित आयु को पूरी नहीं करता, तब तक तुम्हें, उसे समयचक्र का प्रयोग करने से रोकना
होगा। ध्यान रहे ज़ेनिक्स...पृथ्वी और सन् 1982....और आगे तुम्हें पता है कि तुम्हें क्या करना है?"

तभी गिरोट के सामने एक यान आकर रुका और उसमें से कुछ अंतरिक्ष के नीले जीवों ने निकलकर गिरोट को चारो ओर से घेर लिया, पर फिर भी गिरोट जल्दी-जल्दी बोलता जा रहा था।

शायद गिरोट को पता था कि इसके बाद, समयचक्र के निर्माता को कभी समय नहीं मिलेगा।

"जेनिक्स.....संरक्षिका का ध्यान रखना और समय आने पर उसका रहस्य ओरस को बता देना।.....अब तुम तुरंत निकल जाओ यहां से।” यह कहकर गिरोट ने अपने उस हाथ की मुठ्ठी बंद कर ली, जिस हाथ में उसने ब्लैकून को पकड़ रखा था।

तभी उन जीवों के कमांडर ने अपनी तीर जैसी पूंछ को हवा में लहराते हुए कहा- “गिरोट....डेल्फानो के राजा...समयचक्र के निर्माता... बताओ समयचक्र कहां है? और तुम अभी किस से बात कर रहे थे?"
यह कहते हुए उस जीव ने अपने हाथ में पकड़ी विचित्र सी गन का मुंह गिरोट की ओर कर दिया।

“समयचक्र समयचक्र मेरे महल में है।" गिरोट ने साफ झूठ बोलते हुए कहा- “तुम मेरे साथ महल में चलो, मैं तुम्हें समयचक्र दे देता हूं।"


“तुम्हें तो सही से झूठ बोलना भी नहीं आता गिरोट....तुम्हें क्या लगा कि तुम मुझे धोखा दे दोगे?...मुझे सब पता है, समयचक्र तुम्हारे ब्लैकून नाम की प्रयोगशाला में है। बताओ कहां है तुम्हारी प्रयोगशाला?" जीवों के उस कमांडर ने कहा।

उसकी बात सुन गिरोट ने अपनी मुठ्ठी को और कस कर बंद कर लिया।

“क्या है तुम्हारे उस हाथ की मुठ्ठी में?” कमांडर ने गिरोट के हाथ की ओर देखते हुए कहा- “कहीं इसमें ब्लैकून की चाबी तो नहीं ? इसके हाथ की मुठ्ठी खोलो।" कमांडर ने सैनिक जीवों की ओर इशारा करते हुए कहा।

तुरंत कुछ सैनिक जीव, गिरोट की ओर बढ़े। एक जीव ने गिरोट के हाथ से ज़ेप्टो नाइजर छीन ली और कुछ जीव गिरोट का वह हाथ खुलवाने लगे।

कुछ ही देर में उन जीवों ने अपनी पूरी ताकत लगाकर, गिरोट की मुठ्ठी खोल ली, पर गिरोट की हथेली में कुछ भी नहीं था।

यह देखकर गिरोट ने राहत की साँस ली। वह समझ गया कि ज़ेनिक्स, ओरस को लेकर पृथ्वी की ओर जा चुकी है। अब गिरोट के चेहरे पर एक शांति भरी मुस्कान थी, अब उसे अपने मरने की भी कोई चिंता नहीं थी।

गिरोट के चेहरे की मुस्कान कमांडर को नागवार गुजरी और उसने गुस्से में अपनी गन उठा कर गिरोट पर किरणों का वार कर दिया।

एक पल में ही गिरोट का शरीर राख में बदलकर वातावरण में मिल गया। अब वह सदा-सदा के लिये कई रहस्यों को अपने सीने में दबाकर प्रकृति में समाहित हो चुका था।

एक शांति प्रिय ग्रह के राजा का हस्र दुखद हुआ था। अब कमांडर के आदेश पर सभी जीव डेल्फानों को बर्बाद करने में लग गये।


जारी रहेगा______✍️
Wonderful update! Let's see Yuvraj Auras kab wapas aata hai apna planet, kya Auras aur Nakshatra dono same hain???
 

dhalchandarun

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#186.

अराका युद्ध:
(17.01.02, गुरुवार, सीनोर राज्य का समुद्र तट, अराका द्वीप)

मेलाइट और सुर्वया ने जैसे ही सनूरा को अपनी कहानी सुनाने को कहा, तभी महल में किसी बड़े ढोल की आवाज सुनाई देने लगी थी।

सुर्वया ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखकर बताया कि सीनोर राज्य के समुद्र तट पर, समुद्र की लहरों पर कोई विशालकाय चीज खड़ी है।

सुर्वया के शब्द सुन सनूरा तेजी से बाहर की ओर भागी। सनूरा को बाहर जाते देख मेलाइट और सुर्वया ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर वह भी सनूरा के पीछे भाग लीं। आखिर वह सब अब एक अच्छी दोस्त थीं।

सनूरा जैसे महल के बाहर वाले प्रांगण में पहुंची, उसे घबराया हुआ लुफासा एक ओर से आता दिखाई दिया। महल की मीनारों पर मौजूद प्रहरी, अभी भी बड़ा सा ढोल बजा रहा था।

“सुर्वया ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि हमारे समुद्र तट पर कोई विशाल आकृति खड़ी है। वह क्या है? वह तो वहां पहुंचने पर ही पता चलेगा।” सनूरा ने लुफासा से कहा।

तभी लुफासा के सामने एक विशाल रथ आकर खड़ा हो गया, जिसे 4 तेंदुए खींच रहे थे।

“सनूरा, तुम सबको लेकर समुद्र तट पर पहुंचो, मैं आसमान से तुम सब पर नजर रखे हूं।” लुफासा ने सनूरा से कहा- “लेकिन ध्यान रखना, जब तक हो सके, हमें किसी भी युद्ध को टालना है।" यह कहकर लुफासा ने एक बार सुर्वया, मेलाइट ओर रोजर की ओर देखा और फिर एक विशाल चील में परिवर्तित होकर आसमान में उड़ गया।

लुफासा के जाते ही सनूरा रथ पर बैठ गई। सनूरा को रथ पर बैठते देख मेलाइट, सुर्वया और रोजर भी रथ पर बैठ गये। इस समय रोजर ने पूरे कपड़े पहन रखे थे।

“क्या लगता है आप लोगों को? समुद्र तट पर किस प्रकार का खतरा होगा?” मेलाइट ने सुर्वया से पूछा।

लेकिन इससे पहले कि सुर्वया कोई जवाब दे पाती, उसे रोजर की बुदबुदाती आवाज सुनाई दी- “आपसे बड़ा तो नहीं ही होगा।"

“तुमने मुझे खतरा कहा?” अब मेलाइट अचानक से रोजर की ओर ही घूम गई।


“न...न...नहीं तो। मैनें ऐसा कब कहा।” रोजर ने घबराते हुए कहा।

“तुम भूल रहे हो रोजर कि मैं एक हिरनी हूं, मेरे कान बहुत तेज होते हैं।” मेलाइट ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।

“पर मैंने तो सुना था कि बिल्ली के कान तेज होते हैं।” रोजर ने बात को बदलते हुए कहा।

“रोजर का कहना ठीक है, बिल्ली के कान ही सबसे तेज होते हैं।” सनूरा ने बिल्ली के परिवार का पक्ष लेते हुए कहा।

"हां-हां ठीक है, पर हिरनी के भी होते हैं।” मेलाइट ने सनूरा को बीच में पड़ते देख सरेंडर करते हुए कहा।

"मेरे हिसाब से सिंह के कान सबसे तेज होते हैं। अब सुर्वया ने भी अपने लोक का हवाला देते हुए कहा।

“क्या दोस्तों? हम इस समय समुद्र तट की ओर जा रहे हैं, जहां पर कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है और आप लोग हिरन, शेर और बिल्ली के कान पर लगे हुए हो।" रोजर ने मुस्कुराते हुए कहा।'

रोजर की बात सुन मेलाइट को याद आया कि वह तो कोई और ही बात कर रहे थे, पर रोजर ने ही उन सभी का ध्यान भंग कर दिया था।

अब मेलाइट ने घूरकर रोजर की ओर देखा। मेलाइट को घूरते देख रोजर ने सटपटा कर अपनी नजरें दूसरी ओर कर लीं। यह देख मेलाइट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

तभी सनूरा को समुद्र तट का किनारा दिखाई देने लगा, जहां पर लहरों के ऊपर, एक विशाल अंतरिक्ष यान खड़ा दिखाई दे रहा था, पर अभी दूरी अधिक होने के कारण वह सनूरा के अलावा और किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।

उस अंतरिक्ष यान को देख, सनूरा ने अपने पास से 3 लाल रंग की बिंदियां निकालकर मेलाइट, सुर्वया और रोजर की ओर बढ़ा दिया।

"तुम तीनों इन बिंदियों को अपने गले पर चिपकालो, इससे अराका द्वीप का सुरक्षा घेरा, तुम्हें अंदर या बाहर जाने पर रोकेगा नहीं।"

तीनों ने जल्दी से अपने-अपने गले पर उन बिंदियों को चिपका लिया।

कुछ ही देर में चारो सीनोर के समुद्र तट पर खड़े, उस अंतरिक्ष यान को निहार रहे थे।

सनूरा ने धीरे से सिर उठाकर ऊपर आसमान की ओर देखा, उसे लुफासा उस अंतरिक्ष यान की ओर जाता दिखाई दिया।

समुद्र की लहरों पर खड़ा अंतरिक्ष यान लगभग 100 मीटर बड़ा, काले रंग का यान था। उसका आकार बिल्कुल गोल था, उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह ज्वालामुखी से निकले लावे से निर्मित हो।

उस अंतरिक्ष यान पर अजीब सी आड़ी-तिरछी धारियां बनी हुई थीं।

उस अंतरिक्ष यान पर कुल 10 मनुष्य की तरह दिखने वाले जीव खड़े थे, जिनका शरीर हल्की सी नीली रंगत वाला था और उन सभी ने एक ही तरह की, गाढ़े नीले रंग की ड्रेस पहन रखी थी।

हर ड्रेस के बीच में एक सुनहरे रंग का गोला बना था, जिस पर A1 से लेकर A10 तक लिखा हुआ था। वह सभी अंतरिक्ष यान के ऊपर एक क्रमबद्ध तरी के से खड़े थे।

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उधर इन सबसे दूर सीनोर राज्य में बने पिरामिड के अंदर, एक बड़ी सी स्क्रीन पर, यह पूरा दृश्य, वहां खड़े मकोटा, वुल्फा और जैगन देख रहे थे।

इस समय जैगन का आकार एक साधारण मनुष्य के बराबर ही था। शायद उसके पास अपने आकार को घटाने और बढ़ाने की भी विशेषता थी।

“यह तो कोई अंतरिक्ष के जीव हैं? जो अराका वासियों से लड़ने के लिये आये हैं।” वुल्फा ने कहा “क्या हमें भी इस युद्ध का हिस्सा बनना चाहिये मांत्रिक?"

“हां-हां बनना चाहिये।” मकोटा के बोलने के पहले ही जैगन बोल उठा- “बहुत दिन हो गये युद्ध किये हुए... पहले मुझे भेजो, मैं इन सबको काटकर खा जाऊंगा।

“मूर्ख मत बनो जैगन।” मकोटा ने जैगन को समझाते हुए कहा- “हमें पहले यहीं से बैठकर इस युद्ध को देखना चाहिये। पता तो चले कि लुफासा जैसे मूर्ख ने और किस-किस को सीनोर में छिपा कर रखा है?"

मकोटा का इशारा इस समय मेलाइट, रोजर व सुर्वया की ओर था, जो उसके लिये बिल्कुल नये थे।

“और अगर उन अंतरिक्ष के जीवों के पास कोई खतरनाक शक्ति हुई? तो हम उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाकर, अपना लक्ष्य भी तो पूरा कर सकते हैं?” मकोटा के शब्दों में लोमड़ी सी मक्कारी झलक रही थी-
“पर एक चीज समझ में नहीं आई कि यह पूरी पृथ्वी को छोड़कर यहां अराका पर लेने क्या आये हैं?"

“मुझे लगता है कि युद्ध शुरु होने के बाद हमें काफी जानकारी अपने आप मिल जायेगी।” वुल्फा ने कहा “वह देखिये, अब उनमें से 1 जीव, पानी पर चलता हुआ, उन लोगों की ओर ही बढ़ रहा है।"
..............................

1 जीव को अपनी ओर बढ़ता देख, सनूरा ने सभी को सावधान होने का इशारा कर दिया।
1 उस जीव के गोले पर, A10 लिखा था। वह जीव पानी पर चलता हुआ, सनूरा के सामने आ पहुंचा।

“तुम में से इस द्वीप का कमांडर कौन है?” उस जीव ने साफ अंग्रेजी बोलते हुए कहा। उसे अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते देख सनूरा सहित सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

“मैं हूं इस द्वीप की कमांडर। मेरा नाम सनूरा है। सनूरा ने कहा- “तुम लोग कौन हो? और तुम्हारे यहां आने का क्या उद्देश्य है?"

“मेरा नाम एलात्रा है, मैं और मेरे बाकी 9 साथी, पृथ्वी से 2.5 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर, एण्ड्रोवर्स आकाशगंगा के फेरोना ग्रह से आये हैं। हमें पृथ्वी पर हमारे एक दुश्मन की तलाश है, जो कि इस द्वीप पर ही कहीं छिपकर बैठा है। अगर तुमने बिना किसी शर्त, उसे हमे सौंप दिया, तो हम बिना युद्ध किये इस ग्रह से चले जायेंगे।" एलात्रा ने कहा।

“पर हमारे द्वीप पर कोई भी परग्रह वासी नहीं छिपा है। तुम पता नहीं किसकी बातें कर रहे हो?” सनूरा ने एलात्रा को समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

“उसका नाम ओरस है...वह अंतरिक्ष के एक ग्रह डेल्फानो का राजकुमार है और हमारे सिग्नल के अनुसार वह 3 दिन पहले तक इसी द्वीप पर था। पता नहीं कैसे अचानक ही उसके सिग्नल आने बंद हो गये? इसी लिये हमको यहां आना पड़ा। ...अब अगर तुम लोग उसके बारे में कुछ नहीं बताओगे? तो विवश होकर हमें आपस में युद्ध करना ही पड़ेगा।

“अच्छा ठीक है एलात्रा, तुम हमें कुछ दिन का समय दे दो, हम उस ओरस को ढूंढकर, तुम्हें जल्दी ही सौंप देंगे।” सनूरा ने दिमाग लगाते हुए, एक बार फिर युद्ध को टालने की कोशिश की।

यह सुनकर एलात्रा ने अपने अंतरिक्ष यान से संपर्क करते हुए किसी से कहा- “कमांडर रेने, इस द्वीप का कमांडर, ओरस को हमें सौंपने के लिये कुछ समय मांग रहा है? आप बताइये कि हमें क्या करना है?"

कुछ क्षण रुकने के बाद दूसरी ओर से आवाज आई“ ठीक है, तुम इन्हें 3 दिन का समय देकर वापस अपने अंतरिक्ष यान पर आ जाओ।

"जी......कमांडर।” एलात्रा ने रेने से कहा।

"हमारे कमांडर ने आप लोगों को 3 दिन का समय देने को कहा है। हम 3 दिन बाद फिर से वापस आयेंगे। एलात्रा ने सनूरा से कहा और फिर पलटकर अपने अंतरिक्ष यान की ओर चल दिया।

मकोटा से यह समझौता देखा नहीं गया, उसने पिरामिड से बैठे-बैठे ही, अपने हाथ में पकड़ी सर्प के समान, छड़ी को हवा में लहराया।

उसके ऐसा करते ही मकोटा की छड़ी से एक लाल रंग की किरण निकली और हवा में ऊंची उठती हुई, समुद्र तट पर मौजूद एलात्रा से कुछ दूरी पर जाकर गिरी। एक तरह से मकोटा ने युद्ध का बिगुल बजा दिया था।

अब एलात्रा पीछे पलटा और सनूरा को घूरने लगा। इससे पहले कि सनूरा एलात्रा को कुछ समझा पाती, अंतरिक्ष यान से 3 और जीव कूदकर अराका की ओर चल दिये।

अब सनूरा के पास किसी को भी समझाने का समय नहीं था, अब तो हराने या हारने का समय था।

मेलाइट, सुर्वया और रोजर भी किसी भी हमले से निपटने के लिये तैयार हो गये थे। सुर्वया के हाथ में अचानक से तीर-धनुष दिखाई देने लगा।

“क्या कोई मुझे भी किसी प्रकार का हथियार देगा?" रोजर ने धीमें स्वर में बोलते हुए कहा।

"हां, मैं देती हूं।” यह कहकर मेलाइट ने रोजर की शर्ट एक झटके से फाड़कर फेंक दी- “यही है तुम्हारा हथियार।"

रोजर अब बिना शर्ट के उस युद्ध के मैदान में खड़ा था, पर उसकी नाभि से निकल रही तेज रोशनी एलात्रा का ध्यान बार-बार उधर ही ले जा रही थी।

रोजर को समझ ही नहीं आया कि मेलाइट ने ऐसा क्यों किया? वह तो बस अभी अंतरिक्ष यान की ओर से, पास आ रहे जीवों को देख रहा था।

तभी एलात्रा ने अपने हाथ हवा में उठाये और अपना पहला वार सनूरा पर कर दिया।

एलात्रा के हाथ से तेज बिजली की लहर निकली और सनूरा की ओर बढ़ी, पर सनूरा पहले से ही इसके लिये तैयार थी, उसने एक ओर झुककर उस वार को बचाया।

बिजली की वो लहर, सनूरा के पीछे मौजूद एक पेड़ पर जाकर गिरी, पेड़ अब धू-धू करके जलने लगा। यह देखकर सनूरा समझ गई, कि इस एलात्रा के अगले वार से बचना होगा।

तभी मेलाइट आगे बढ़ी और एलात्रा के सामने जाकर खड़ी हो गई।

अब मेलाइट ने सबसे चीखकर कहा- “तुम लोग बाकी के जीवों पर ध्यान दो, मैं इस एलात्रा से निपटती हूं।" यह कहकर मेलाइट ने अपने सिर को तेजी से दांये बांये हिलाया।

अब वह बैल के बराबर की एक सुनहरी हिरनी में परिवर्तित हो गई। उस सुनहरी हिरनी की सींगें, और पैर सोने के थे। एलात्रा एकाएक मेलाइट के इस रुप परिवर्तन को समझ नहीं पाया।

तभी मेलाइट ने बिजली की फुर्ती से एलात्रा के पेट में अपनी सींगें घुसा दीं। एलात्रा के शरीर से नीले रंग का खून निकलकर, समुद्र के पानी में मिक्स होने लगा।

उधर A2 नंबर का जीव, जिसका नाम नीडो था, सनूरा की ओर बढ़ा। नीडो ने अपने दोनों हाथों को आगे किया, जिससे बहुत से छोटे-छोटे धारदार सितारे निकलकर सनूरा की ओर लपके।

सनूरा ने तुरंत अपने हाथों से ताली बजाई, जिससे वह एक विशाल बिल्ली में परिवर्तित हो गई।

अब सनूरा की स्पीड देखने लायक थी। उसने उछलकर, हवा में ही अपने शरीर का एक कोण बनाया और सभी सितारों से आसानी से बच गई।

अब सनूरा ने उछलकर नीडो के शरीर पर अपना पंजा मारा। नीडो के सीने पर मौजूद उसकी ड्रेस, कुछ मांस और खून लिये अब सनूरा के पंजों में फंसी थी। अब नीडो सनूरा से सावधान हो गया था।

तीसरे जीव A9 का नाम सलोहा था। सलोहा ने जैसे ही एलात्रा और नीडो का खून से सना शरीर देखा, उसने तुरंत अपने शरीर को एक ‘मरकरी' की तरह के द्रव फार्म में बना लिया। सलोहा को आगे बढ़ता देख सुर्वया ने उस पर तीरों की बौछार कर दी।

पर सुर्वया के चलाये हुए सारे तीर सलोहा के पार जा रहे थे, उन तीरों का उस पर कोई भी असर नहीं हो रहा था।

यह देख सुर्वया ने अपने मन में कोई मंत्र पढ़ा, जिससे उसके धनुष पर एक आग के समान तीर दिखाई देने लगा, सुर्वया ने वह तीर भी सलोहा पर फेंक कर मार दिया।

इस तीर के लगते ही सलोहा का शरीर, पूरी तरह से आग की लपटों के बीच घिर गया।

यह देख सुर्वया की नजर चौथे जीव A3 पर गई, जिसका नाम डार्को था, पर सबकी आशा के विपरीत डार्को, आराम से पानी पर खड़े होकर उस युद्ध को देख रहा था।

डार्को जैसा ही हाल रोजर का भी था, उसे तो कुछ पता ही नहीं था कि युद्ध करना कैसे है? वह भी डरी-डरी निगाहों से चारो ओर हो रहे इस घमासान को देख रहा था।

उधर मेलाइट, एलात्रा को अपनी सींघों में फंसाकर इधर-उधर पटक रही थी। एलात्रा को संभलने का भी मौका नहीं मिल पा रहा था।

उधर नीडो ने अब अपने हाथों से सितारे फेंकने बंद कर दिये थे, उसे पता चल गया था कि उन सितारों से, वह सनूरा रुपी बिल्ली का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा? इसलिये इस बार उसने अपनी चाल बदल दी।

नीडो ने एक बार फिर अपना हाथ सनूरा की ओर उठाया, सनूरा को लगा कि नीडो फिर से सितारे फेंकने जा रहा है, इसलिये उसने हवा में छलांग लगा दी, पर इस बार सनूरा के ठीक सामने हवा में एक जोर का धमाका हुआ, जिसके कारण सनूरा, नीचे जमीन पर गिर गई।

सनूरा का बिल्ली वाला शरीर इस धमाके से कई जगह पर जख्मी हो गया था, पर सनूरा किसी भी चीज की परवाह किये बिना फिर से खड़ी हो गई।

यह देख सुर्वया ने इस बार नीडो पर तीरों की बौछार कर दी। नीडो का सारा ध्यान सनूरा की ओर था, इसलिये वह सुर्वया के तीरों से बच नही पाया।

कम से कम 8 से 10 तीर नीडो के शरीर में जाकर घुस गये। जिसकी वजह से नीडो वहीं पानी पर गिर गया।

तभी सलोहा ने सुर्वया का ध्यान दूसरी ओर देख, अपने द्रव्य रुपी शरीर से सुर्वया को पूरी तरह से जकड़ लिया।

यह देख मेलाइट ने एलात्रा को वहीं नीडो के पास जमीन पर पटका और सुर्वया की ओर तेजी से दौड़ पड़ी।

मेलाइट ने सुर्वया के पास पहुंचकर अपनी सोने की सींगें, सलोहा के द्रव्य वाले शरीर से छुआ दिया।

मेलाइट के सींगों से छूते ही सलोहा को अपने शरीर में एक तेज गर्मी का अहसास हुआ और वह पूरा का पूरा पिघलकर सुर्वया के पास जमीन पर गिर गया। अब सुर्वया फिर से आजाद हो गई थी।

तभी नीचे गिरे पड़े घायल नीडो ने अपना मुंह जोर से खोल दिया। उसके मुंह से एक छोटा सा सूर्य के समान गोला निकला और उसने वहां के वातावरण में तेज गर्मी पैदा कर दी।

उस गर्मी ने एक सेकेण्ड में ही सबके पसीने छुड़ा दिये। अंतरिक्ष के उन जीवों पर इस गर्मी का कोई असर नहीं हो रहा था।

अब सभी सीनोरवासी युद्ध करना छोड़, उस गर्मी से बचने के लिये इधर-उधर छिपने की जगह ढूंढने लगे।

पर जाने क्यों रोजर को इस भयानक गर्मी का बिल्कुल भी अहसास नहीं हा रहा था, यह देख रोजर उस हवा में नाच रहे छोटे से सूर्य के और पास पहुंच गया।

जैसे ही रोजर उस सूर्य के पास पहुंचा, वह सूर्य छोटा होकर रोजर की नाभि में समा गया। यह देखकर अंतरिक्ष के जीव क्या सभी अराका वासी भी हैरान हो गये।

सबसे ज्यादा हैरानी तो स्वयं रोजर को हो रही थी।

तभी घायल पड़े एलात्रा ने, अपने हाथ को हवा में जोर से उठाया, उसके ऐसा करते ही आसमान में तेज बिजली कड़कने लगी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, एक बिजली रोजर पर आकर गिरी।

रोजर का शरीर हवा में उछला और एक पल में निष्प्राण हो गया। यह देख जैसे मेलाइट का खून खौल गया, उसने अपने आकार को थोड़ा और बड़ा कर लिया और पूरे आसमान की बिजली को अपनी सींघों में सोख लिया।

अब मेलाइट की खूंखार निगाहें सिर्फ और सिर्फ एलात्रा पर थीं। इससे पहले कि एलात्रा अपने बचाव में कुछ कर पाता, मेलाइट ने अपनी सींघों में भरी पूरी बिजली को उल्टा एलात्रा पर ही मार दिया।

शायद आज पहली बार एलात्रा को, अपनी ही दवा का स्वाद अनुभव करना पड़ रहा था। कड़कड़ाती हुई वह बिजली एलात्रा पर जाकर गिरी। जिसकी वजह से एलात्रा पूरा स्वाहा हो गया। उसके शरीर का कण-कण जलकर हवा में बिखर गया।

अब इतनी देर से वहां खड़े तमाशा देख रहे डार्को की आँखें जल उठीं, वह अपने हाथ उठाकर हमला करने ही जा रहा था कि तभी समुद्र की लहरों के बीच से एक विशाल व्हेल हवा में उछली और उसे गपक कर पानी के अंदर चली गई।

जी हां, वह कोई और नहीं बल्कि लुफासा था। लुफासा अब किसी को कोई भी मौका नहीं देना चाहता था।

लुफासा ने डार्को को अपने दाँतों में कसकर दबाया और समुद्र की गहराई के अंदर छलांग लगा दी।

उधर नीडो और सलोहा मेलाइट का विकराल रुप देख धीरे-धीरे पीछे की ओर खिसकने लगे थे।

अब मेलाइट ने अपना रुप परिवर्तित कर लिया। अब वह फिर से स्त्री रुप में आ गई और रोजर का शरीर अपनी बांहों में भरकर जोर-जोर से रोने लगी।

सनूरा को पता था कि खतरा अभी टला नहीं इसलिये वह मेलाइट के पास पहुंच तो गई थी, पर उसकी निगाहें अभी भी नीडो और सलोहा की ओर थीं।

सुर्वया से मेलाइट का इस प्रकार रोना देखा नहीं जा रहा था। तभी सुर्वया की निगाह अंतरिक्ष यान से निकलकर आ रहे 4 और योद्धाओं पर पड़ी।

यह देख सुर्वया का दिमाग पूरी तरह से खराब हो गया। अब उसने अपने वस्त्रों में छिपाई एक डिबिया को निकाल लिया और उसका ढक्कन खोलकर तेज आवाज में चिल्लाई- “सिंहराज, मुझे शुभार्जना की आवश्यकता है।”

सुर्वया के ऐसा बोलते ही उस डिबिया से, एक सुनहरे रंग का धुंआ निकलकर वातावरण में फैलने लगा।

धीरे-धीरे उस सुनहरे धुंए ने अराका के पूरे आकाश को ढंक लिया।

अब अंतरिक्ष यान से निकले जीव, द्वीप को छोड़ उस धुंए को देखने लगे।

तभी उस धुंए ने एक विशाल सिंह का अवतार धारण कर लिया, जिसके मुंह का ही आकार अराका द्वीप से भी बड़ा था।

अब उन अंतरिक्ष के जीवों ने नीडो और सलोहा को उठाया और धीरे-धीरे अपने अंतरिक्ष यान की ओर वापस जाने लगे।

तभी उस महाकाय सिंह ने एक भयानक गर्जना की। उस गर्जना की ध्वनि तरंगें इतनी ज्यादा शक्तिशाली थीं, कि उस सिंह की गर्जना मात्र से ही, पूरा का पूरा अंतरिक्ष यान 20 मीटर तक पीछे खिसक गया।

पर सिंहराज की महा गर्जना का एक असर और हुआ, मरा पड़ा रोजर अचानक से उठकर बैठ गया।

उधर अंतरिक्ष यान के सारे जीव अपने यान में बैठकर, वहां से तुरंत भाग गये।

इधर मेलाइट ने जैसे ही रोजर को उठते देखा, उसने तुरंत अपने आँसू पोंछ लिये और खुश हो ते हुए कहा- “थैंक गॉड कि तुम जिंदा हो।"

रोजर अब अचकचाकर अपने शरीर को देखने लगा, जो कि अब भी मेलाइट की गोद में था।

“अरे वाह, काश ऐसा मरना रोज-रोज हो।" रोजर ने खुश होकर कहा।

रोजर की बात सुन मेलाइट ने रोजर के शरीर को धीरे से जमीन पर रखा और शर्माकर उस जगह से उधर चल दी, जिधर सुर्वया खड़ी थी।

उधर महाकाय सिंहराज का शरीर वापस धुंए में बदलकर उस डिबिया में समा गया।

मेलाइट ने अब सुर्वया को गले से लगा लिया “मुझे पता है कि रोजर को तुमने ही शुभार्जना का प्रयोग कर बचाया है। मैं तुम्हारा यह अहसान पूरी जिंदगी नहीं भूलूंगी सुर्वया।

"चल-चल, मैंने तुम्हारे लिये नहीं बचाया उस ‘कोई और' को। मुझे तो बस कुछ दिन और तुम दोनों का नाटक देखना है। सच में बहुत मजा आता है।” सुर्वया ने किसी बेस्ट सहेली की तरह मेलाइट से मजा लेते हुए कहा- “चलो अब अपनी 'नाभिकीय टॉर्च' को लेकर महल चलते हैं।"

सुर्वया ने 'नाभिकीय टॉर्च' कहकर रोजर का एक नया नामकरण कर दिया था, पर जो भी हो यह नाम रोजर पर बिल्कुल फिट बैठ रहा था।

उधर लुफासा भी डार्को को कहीं पानी में पटककर वापस आ गया था। अतः सभी वापस महल की ओर चल पड़े।

सभी के चेहरे इस समय खुशी से जगमगा रहे थे क्यों कि उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा था और उन्होंने अपने एक शत्रु एलात्रा को मार दिया था।

जारी रहेगा_____✍️
Wonderful update! Action scene achha raha, aisa scene likhne ke liye kaphi new cheezein sochni padti hai. Let's see Vyom aur Shefali team apna mission kaise pura karte hain.
 

dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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#187.

चैपटर-4
अद्भुत नेत्र:
(तिलिस्मा 5.11)

वसंत ऋतु को पार करने के बाद सभी जिस द्वार में प्रवेश किये, वह उन्हें लेकर एक बड़े से नाव के आकार वाले कमरे में पहुंच गया।

यह कमरा लगभग 5,000 वर्ग फुट में निर्मित था, इसकी छत की ऊंचाई भी बहुत ज्यादा थी।

कमरे की जमीन सफेद पत्थरों से बनी थी, जिसके बीच एक 10 मीटर त्रिज्या का नीला गोला और उस नीले गोले के बीच, 2 मीटर त्रिज्या का काला गोला बना था।

उस काले गोले के बीच में, काँच की पारदर्शी लिफ्ट लगी थी, जो कि उस काले गोले से, नीचे की ओर ले जाने के लिये थी। परंतु लिफ्ट पर किसी भी प्रकार का कोई बटन नहीं था।

कमरे की छत पर, लिफ्ट के ठीक ऊपर की ओर एक गोल ढक्कन लगा था।

“यह कमरा तो देखने में बहुत ही अजीब सा लग रहा है?" ऐलेक्स ने कहा।

“सही कह रहे हो ऐलेक्स भैया, इस कमरे का डिजाइन किसी नाव के समान है” शैफाली ने कमरे को देखते हुए कहा- “और इसकी जमीन भी थोड़ी उभरी हुई लग रही है।"

“पर इस कमरे में उस काँच की लिफ्ट के सिवा तो कुछ है ही नहीं?" जेनिथ ने कहा- “शायद उस लिफ्ट से हमें नीचे की ओर कहीं जाना है। पर उस लिफ्ट पर कहीं भी बटन नहीं है, पता नहीं यह कैसे चलती होगी?" यह कहकर जेनिथ उस लिफ्ट की ओर बढ़ी, परंतु अचानक पैर में कुछ चिपचिपा सा अहसास होने की वजह से वह चलते-चलते रुक गई और नीचे जमीन की ओर देखने लगी।

“दोस्तों, यहां जमीन पर कुछ चिपचिपा पदार्थ भी है, जरा ध्यान से आना, कहीं यह पदार्थ भी किसी प्रकार की मुसीबत ना हो?” जेनिथ ने सभी को सावधान करते हुए कहा और लिफ्ट की ओर आगे बढ़ गई।

लेकिन इससे पहले कि जेनिथ और आगे बढ़कर लिफ्ट के पास पहुंचती, तभी ऊपर छत पर लगा ढक्कन तेजी से खुला और उसमें से एक प्रकाश की किरण आकर लिफ्ट से टकराई।

प्रकाश की किरण टकराते ही, लिफ्ट का दरवाजा 2 सेकेण्ड के लिये खुला और फिर बंद होकर लिफ्ट, एक तेज आवाज करती हुई, जमीन के नीचे चली गई।

अब लिफ्ट के स्थान पर एक अंतहीन गोल गड्ढा दिखाई दे रहा था। अब ऊपर का ढक्कन पुनः बंद हो गया था।

जेनिथ ने धीरे से उस गड्ढे में झांक कर देखा। तभी जेनिथ को लिफ्ट वापस आती दिखाई दी। लिफ्ट को वापस आते देख जेनिथ थोड़ा पीछे हट गई। लिफ्ट पहले की तरह अपने स्थान पर वापस आकर रुक गई।

अब जेनिथ की नजर सुयश की ओर गई, जो कि बहुत देर से इस पूरे स्थान को देखकर कुछ सोच रहा था।

जेनिथ को अपनी ओर देखते पाकर आखिर सुयश बोल उठा- “यह पूरा कमरा किसी मानव के नेत्र के समान प्रतीत हो रहा है। जरा सभी लोग जमीन की ओर देखो, इसकी नाव सी सफेद आकृति, आँख के सफेद भाग की तरह प्रतीत हो रही है। इस सफेद भाग के बीच का नीला गोला, आँख की ‘आइरिश' और काला गोला, आँख की ‘प्यूपिल' लग रहा है। छत के ऊपर की ओर लगा ढक्कन, शायद पलकों का काम कर रहा है। जब पलकें खुलती हैं, तो उसमें से दृश्य तरंगे निकलकर उस लिफ्ट पर गिरती हैं। शायद वह लिफ्ट उन दृश्य तरंगों को लेकर मस्तिष्क तक जाती हो?"

सुयश के शब्दों को सुन सभी ने पहली बार उस कमरे को महसूस करके देखा। अब सभी सुयश की बात से सहमत थे।

"हम आपकी बात से सहमत हैं कैप्टेन।" क्रिस्टी ने कहा- “पर यह नहीं समझ आ रहा कि हमें इस आँख में करना क्या है?"

“पर कैप्टेन, जमीन पर बिखरा यह चिपचिपा पदार्थ कैसा है?” जेनिथ ने सुयश से पूछा- “आँख में तो ऐसा नहीं होता।"

"शायद यह चिपचिपा पदार्थ ही हमारी परेशानी है?" शैफाली ने कहा- “क्यों कि आँख में अगर किसी भी प्रकार का कोई कण या पदार्थ गिरता है, तो आँख स्वतः आँसू बनाकर उस कण या पदार्थ को बाहर निकाल देती है।

“अब समझ में आ गया।” ऐलेक्स ने खुशी से चीखते हुए कहा- “इस आँख में आंसुओं का निर्माण नहीं हो रहा। हमें आंसुओं का निर्माण करके इस चिपचिपे पदार्थ को समाप्त करना है।

“वाह मेरे अराका के शेर, तुमने तो पूरी पहेली ही हल कर दी।” क्रिस्टी ने ऐलेक्स से मजा लेते हुए कहा “पर जरा यह बताओगे कि हम आँसुओं का निर्माण कैसे करेंगे?"

क्रिस्टी की बात सुन, ऐलेक्स अपना सिर खुजाकर ऊपर की ओर देखने लगा।

“आँसुओं का निर्माण, आँखों के ऊपर बने 'लैक्राईमल ग्लैंड' में होता है।" शैफाली ने कहा- “वहीं से आँसू हमारी आँख में प्रवेश करते है और ‘लैक्राइमल पंक्टा' से होते हुए नाक के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। जब आँसू ज्यादा मात्रा में बनते हैं, तो वह ओवरफ्लो होकर हमारी आँखों से बाहर निकलने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को हम रोना कहते हैं। शैफाली ने सरल भाषा में सभी को समझाते हुए कहा।

"तो इसका मतलब पहले हमें लैक्राईमल ग्लैंड तक पहुंचना होगा, उसके बाद ही हम जान पायेंगे कि वहां परेशानी क्या है?" जेनिथ ने कहा- “पर हम लैक्राईमल ग्लैंड तक जायेंगे कैसे?"

“यहां से तो लैक्राईमल ग्लैंड तक जाने का कोई रास्ता नहीं है। अब हमें वहां तक पहुंचने के लिये, पहले छत के ढक्कन खुलने का इंतजार करना होगा। जैसे ही ढक्कन खुलेगा, हम बारी-बारी से लिफ्ट के द्वारा नीचे जायेंगे और फिर वहां से किसी भी प्रकार से मस्तिष्क तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। अगर हम मस्तिष्क तक पहुंचने में सफल हो गये, तो वहां से कहीं भी जाया जा सकता है।” शैफाली ने सभी को अपना प्लान बताते हुए कहा।

"मुझे लगता है कि इस द्वार के लिये, हमें सिर्फ शैफाली की बातें सुननी चाहिये। क्यों कि उसे ही आँख की सबसे अच्छी जानकारी है।” सुयश ने कहा।

सुयश की बात सुन, सभी ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दे दी। अब सभी आकर लिफ्ट के पास खड़े हो गये। सभी को वहां खड़े-खड़े आधा घंटा बीत गया, पर ऊपर की छत का ढक्कन नहीं खुला।

“कैप्टेन, यह छत का ढक्कन क्यों नहीं खुल रहा? क्रिस्टी ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“मुझे लगता है कि यह इंसान सो रहा है, इसी लिये उसकी पलकें अभी नहीं झपक रहीं हैं।” सुयश ने तथ्य देते हुए कहा।

तभी छत की ऊपर लगा ढक्कन खुलने की तेज आवाज सुनाई दी। यह देख सुयश ने पहले तौफीक को नीचे जाने का इशारा किया। सुयश का इशारा पाकर, तौफीक बिल्कुल तैयार हो गया।

अब छत के ढक्कन से तेज रोशनी निकलकर, लिफ्ट के ऊपर गिरी और इसी के साथ लिफ्ट का दरवाजा 2 सेकेण्ड के लिये खुला।

तौफीक के लिये लिफ्ट में प्रवेश करने के लिये इतना समय काफी था। लिफ्ट तौफीक को लेकर नीचे की ओर चली गई।

धीरे-धीरे, एक-एक करके सभी उस लिफ्ट के माध्यम से नीचे की ओर आ गये। अब नीचे उन्हें एक बड़ा सा गोल पारदर्शी पर्दा दिखाई दिया, जिससे होकर प्रकाश अंदर की ओर जा रहा था।

“यह लेंस है, हमारी दृश्य तरंगे इससे होकर ही अपना चित्र रेटिना पर दर्शाती हैं।" शैफाली ने लेंस को देखते हुए कहा- “हमें इस लेंस के पार जाना होगा। यह कहकर शैफाली ने लेंस को अपने हाथों से छूकर देखा, पर वह उसे ठोस दिखाई दिया।

"हम ऐसे इसके पार नहीं जा सकते, इसके पार जाने के लिये कोई ना कोई दूसरा उपाय सोचना होगा?" शैफाली ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“क्या हम फिर से प्रकाश के द्वारा उस पार नहीं जा सकते?" सुयश ने शैफाली से सवाल करते हुए पूछा।

“नहीं !” शैफाली ने समझाते हुए कहा- “इसको हम इस प्रकार समझ सकते हैं, कि जिस प्रकार पारदर्शी काँच के दूसरी ओर प्रकाश के सिवा कुछ भी नहीं जा सकता, ठीक उसी प्रकार इस लेंस के पार हम प्रकाश मे माध्यम से नहीं जा सकते।... लेकिन अभी भी हमारे पास दूसरी ओर जाने का एक तरीका है।... जब भी हल्का प्रकाश हमारी आँख पर पड़ता है, तो हमारी आँख में मौजूद लेंस अपने आकार को बढ़ा देता है और जब भी कोई तेज प्रकाश, हमारी आँखों पर पड़ता है, तो हमारी आँखों का लेंस सिकुड़कर छोटा हो जाता है। तो हमें बस इस लेंस के किनारे पहुंचकर किसी तेज प्रकाश के आने का इंतजार करना होगा। जैसे ही तेज प्रकाश आँखों पर पड़ेगा, लेंस अपने आपको ‘प्यूपिल' के हिसाब के संतुलित कर अपना आकार सिकोड़ेगा और ऐसी स्थिति में हम लेंस के किनारे से होकर दूसरी ओर जा पायेंगे।"

शैफाली का ज्ञान कई लोगों के सिर के ऊपर से निकल गया, पर उन्हें इतना समझ में आया कि तेज प्रकाश में लेंस के किनारे से, दूसरी ओर जाने का रास्ता बन जायेगा। अतः सभी लेंस के एक किनारे पर आकर खड़े हो गये।

सभी को ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ देर बाद ही आँख से तेज रोशनी प्यूपिल को पारकर लेंस पर आकर पड़ी। अब लेंस ने अपने आकार को सिकोड़ना शुरु कर दिया।

जैसे ही लेंस के किनारे से एक व्यक्ति के निकलने के बराबर जगह हो गई, शैफाली सहित सभी उस जगह से निकलकर लेंस व रेटिना के बीच वाले स्थान पर पहुंच गये।

उस स्थान का आकार काफी बड़ा था। वहां का वातावरण हल्के गुलाबी रंग का था। वहां की गोलाकार दीवारें किसी फिल्मस्क्रीन के पर्दे की भांति अत्यंत चमकीली थीं। बीच के स्थान पर अनेक लाल और नीले रंग के मोटे, परंतु खोखले पाइप हवा में लहरा रहे थे।

"हमें इन पाइपों के अंदर तो नहीं घुसना है ना?" ऐलेक्स ने घबराकर शैफाली की ओर देखते हुए पूछा।

"नहीं, ये पाइप असल में 'ऑप्टिकल नर्वस्' हैं।" शैफाली ने कहा- “यही नर्वस् रेटिना पर बने चित्रों को देखकर, मस्तिष्क तक इलेक्ट्रानिक सिग्नल भेजते हैं। अब हमें सिर्फ ये देखना है कि कैश्वर की बनाई यह कृत्रिम आँख, किस प्रकार से मस्तिष्क तक सिग्नल भेजती है? हमें बस उस सिग्नल का पीछा करना होगा।"

"हे भगवान, हमारी आँख इतनी कठिनता से हमें चित्र दिखाती है, यह तो हमें पता ही नहीं था।” क्रिस्टी ने आश्चर्य से आँखें फाड़कर रेटिना को देखते हुए कहा।

“मुझे इस बात का अच्छी तरह से अहसास है।" शैफाली ने आह भरते हुए कहा- “मैंने तो 13 वर्ष तक अपनी आँखों से कुछ देखा ही नहीं?" यह सुन सुयश ने शैफाली के सिर पर हाथ फेरा, जो कि अपनेपन का अहसास लिये था।

तभी रेटिना की चमक कुछ कम होती दिखाई दी।

“दोस्तों तैयार हो जाओ, अब ऑप्टिकल नर्वस् मस्तिष्क को सिग्नल भेजने ही वाला है।" शैफाली ने सबको सावधान करते हुए कहा।

तभी उन पाइपों से 4 फुट के जुगनू निकलने शुरु हो गये, जो कि अपने पंखों के सहारे तेजी से उड़ रहे थे।
उन जुगनुओं से तेज रोशनी भी, कुछ समय अंतराल में चमक रही थी।

किसी को भी पाइपों से जुगनू के निकलने की तो आशा कतई नहीं थी, इसलिये सभी विस्मित होकर उन जुगनुओं को देखने लगे।

तभी सभी को शैफाली की आवाज सुनाई दी- “यही जुगनू इलेक्ट्रानिक तरंगों का रुप हैं, हमें किसी भी प्रकार से इन पर बैठना होगा? यही हमें मस्तिष्क तक ले जा सकते हैं।" यह कहकर शैफाली ने एक पाइप को उछलकर पकड़ लिया और उससे जुगनू निकलने का इंतजार करती रही।

जैसे ही पाइप से जुगनू निकलता दिखा, शैफाली उस जुगनू पर कूदकर सवार हो गई। जुगनू अब शैफाली को लेकर हवा में उड़ने लगा।

शैफाली को इस प्रकार करते देख, क्रिस्टी ने भी उछलकर एक पाइप को पकड़ा और एक जुगनू पर सवार हो गई।

इस प्रकार एक-एक कर जेनिथ को छोड़ सभी जुगनुओं पर बैठ गये। जेनिथ जुगनू तो छोड़ो, पाइप को भी पकड़ते ही नीचे गिर जा रही थी।

“कैप्टेन, जेनिथ जुगनू पर नहीं बैठ पा रही है।' ऐलेक्स ने चीखकर कहा- “हमें जेनिथ की मदद करनी होगी।"

लेकिन इससे पहले कि कोई जेनिथ की मदद कर पाता, तभी रेटिना के बीच से एक द्वार खुला और सभी जुगनू उस द्वार से होते हुए बाहर की ओर निकल गये।

अब जेनिथ के हाथ पैर फूलने लगे। उसे नहीं पता था कि अगर वह कुछ देर तक इस रेटिना के द्वार से बाहर नहीं निकली, तो उसके साथ क्या होगा?

“नक्षत्रा !” जेनिथ ने घबराकर नक्षत्रा को पुकारा “क्या तुम मेरी किसी भी प्रकार से मदद कर सकते हो?"

“मैं तुम्हारा हौसला बढ़ाने के सिवा कुछ नहीं कर सकता जेनिथ। यह एक फिजिकल कार्य है, इसे तुम्हें स्वयं ही पूरा करना होगा।” नक्षत्रा ने अपने हथियार डालते हुए कहा।

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ पुनः से कोशिश करने लगी। तभी अचानक जेनिथ के शरीर को एक झटका लगा और वह उछलकर एक जुगनू पर सवार हो गई।

जेनिथ को ऐसा लगा कि जैसे किसी ने उसके शरीर को उठाकर जुगनू की ओर फेंक दिया हो।

जेनिथ ने डरकर जुगनू के शरीर को कसकर पकड़ लिया, पर वह यह नहीं जान पायी कि उसका शरीर जुगनू तक पहुंचा कैसे?

“यह कैसे हुआ नक्षत्रा? मैं अपने आप जुगनू तक कैसे पहुंच गई?” जेनिथ ने आश्चर्य से नक्षत्रा से पूछा।

“क्षमा चाहता हूं जेनिथ, इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है, पर मुझे लगता है कि कोई ना कोई इस तिलिस्म में भी तुम्हारी मदद कर रहा है। अब वह कौन है? यह मुझे भी नहीं पता।

जेनिथ का जुगनू उड़कर रेटिना के द्वार की ओर चल दिया, पर अब जेनिथ की आँखें सोचने के अंदाज में सिकुड़ गईं थीं।

पता नहीं क्यों इस बार उसे नक्षत्रा पर कुछ शक सा होने लगा था? उसे लग रहा था कि उसे किसी प्रकार से नक्षत्रा ही बार-बार बचा रहा है? पर वह उसे बता क्यों नहीं रहा था? यह जेनिथ को नहीं समझ आ रहा था ?


जारी रहेगा_____✍️
Wonder update brother! Main theme of this episode, wo kaun hai jisne ek baar pahle aur ek baar abhi Jenith ka help kiya??? Let's see next episode mein Shefali kaise challenge ko paar karti hai.
 

dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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#188.

दिव्य बालक:
(18.01.02, शुक्रवार, आर्केडिया यान, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका को युद्ध के बारे में पता चल चुका था, वह जानती थी कि यदि युद्ध हुआ, तो उसका परिणाम किसी भी पक्ष में जा सकता है और ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के लिये खतरनाक था।

अतः शलाका ने सबसे पहले अपने सभी भाइयों को सुरक्षित करते हुए, अपने पिता के घर एरियन आकाश -गंगा में भेज दिया था। अब आर्केडिया यान पर सिर्फ शलाका और जेम्स ही बचे थे।

जेम्स को भी शलाका ने आर्केडिया के कंट्रोल्स सीखने के कार्य पर लगा दिया था। अतः अब शलाका थोड़ा निश्चिंत लगने लगी थी।

चूंकि आर्केडिया पिछले 5,000 वर्षों से अटार्कटिका की बर्फ के नीचे दबा था, इसलिये शलाका ने पूरी रात जागकर आर्केडिया के सभी तकनीकी प्रणाली को दुरुस्त कर लिया था।

अब शलाका को आर्यन और आकृति के पुत्र की याद आ गई, जो कि अष्टकोण में बंद भारत के किसी अवन्ती राज्य के, उज्जैनी नगर में जमीन के नीचे सो रहा था।

शलाका कुछ देर आराम करके, अब आर्यन के पुत्र की खोज में जाना चाहती थी। इसलिये शलाका ने एक नजर जेम्स के कमरे पर मारी।

इस समय जेम्स भी सो रहा था। उसे सोते देख शलाका अपने कमरे में आ गई और बिस्तर पर लेट गई।

तभी शलाका की आँखों के आगे आर्यन के पुत्र की मोहक छवि नजर आने लगी। ना जाने कितनी ही देर तक शलाका उस पुत्र के ख्यालों में खोई रही।

अंततः उसे नींद आ ही गई। कुछ ही देर में शलाका गहरी नींद के घोड़ों पर सवार हो, सपनों की दुनिया में चली गई। अब आर्केडिया में चारो ओर सन्नाटा छा गया था।

लगभग आधे घंटे के बाद शलाका के कमरे का दरवाजा बिना आवाज के धीरे से खुला और एक साया दबे पाँव अंदर दाखिल हुआ।

कमरे में ज्यादा उजाला नहीं था, पर फिर भी उस साये के चेहरे पर एक दबी मुस्कान दिखाई दे रही थी।
वह साया काफी देर तक ऐसे ही खड़ा, सो रही शलाका को देखता रहा, फिर वह दबे पाँव कमरे के अंदर आ गया।

उस साये के चलने पर बिल्कुल भी आवाज नहीं हो रही थी। अब वह साया धीरे से शलाका के सामने रखी एक कुर्सी पर बैठ गया।

अब उस साये के हाथ में एक कागज और एक पेन दिखाई देने लगा था। उस साये के हाथ अब कागज पर तेजी से चलने लगे। शायद वह कुछ चित्रकारी कर रहा था।

काफी देर तक चित्रकारी करने के बाद, उस बेखौफ साये ने उस कागज को शलाका के सिरहाने रख दिया।

कागज रखने के बाद उस साये ने एक बार फिर प्यार भरी नजरों से शलाका को देखा और वापस उसी प्रकार कमरे से निकल गया, जिस प्रकार वह अंदर आया था।

इस घटना के लगभग 5 घंटे के बाद शलाका की आँख खुली। अब उसकी नींद पूरी हो गई थी। शलाका बिस्तर से उठी और एक जोर की अंगड़ाई ली। नींद पूरी हो जाने के बाद, अब उसे काफी फ्रेश महसूस होने लगा था।

तभी शलाका की नजर, अपने सिरहाने रखे उस कागज के टुकड़े पर पड़ी। शलाका ने आश्चर्य से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर आगे बढ़कर उसे उठा लिया।

पर जैसे ही शलाका की नजर उस पर बनी आकृति पर गई, वह आश्चर्य से भर उठी।

कागज के टुकड़े पर, बहुत ही सुंदर 3 डी के अक्षरों में अंग्रेजी भाषा का S लिखा था, उस S के आगे एक सुंदर सा डिजाइन किया हुआ दिल बना था, जिसके चारो ओर से किरणें निकल रहीं थीं। उस कागज को देख शलाका की आँखें सिकुड़ गईं।

“यह कागज का टुकड़ा मेरे कमरे में कैसे आया?" शलाका ने दिमाग लगाते हुए सोचना शुरु कर दिया- “कहीं, मेरे सोते समय जेम्स तो नहीं आया था मेरे कमरे में?...नहीं-नहीं जेम्स की इतनी हिम्मत नहीं होगी। तो फिर और कौन हो सकता है? और सबसे बड़ी बात की वह आर्केडिया के अंदर घुसा कैसे? और...और यह S अक्षर तो मेरे नाम का पहला अक्षर है, जो कि....काफी प्यार से लिखा गया लग रहा है? इसके आगे बना दिल भी प्यार का ही संकेत दे रहा है।...पर ऐसा कौन हो सकता है?"

काफी देर तक सोचते रहने के बाद भी जब शलाका को उस कागज के टुकड़े का रहस्य समझ में नहीं आया, तो वह उसे लेकर जेम्स के कमरे की ओर बढ़ गई।

जेम्स इस समय अपने कमरे में नहीं था। इसलिये शलाका आर्केडिया के ट्रेनिंग रुम की ओर बढ़ गई।

जेम्स ट्रेनिंग रुम में ही था, वह अब भी पूरी तन्मयता से वीडियो गेम के द्वारा आर्केडिया के कंट्रोल्स को सीखने की कोशिश कर रहा था। शलाका को ट्रेनिंग रुम में आता देख जेम्स ने गेम को 'फ्रीज' कर दिया।

"तो कैसी चल रही है तुम्हारी ट्रेनिंग?” शलाका ने जेम्स की आँखों में झांकते हुए पूछा।

“बहुत अच्छी...मुझे लग रहा है कि मैं जल्दी ही इसे पूरी तरह से चलाना सीख लूंगा।” जेम्स ने मुस्कुराते हुए कहा।

“वेरी गुड।” शलाका ने जेम्स की तारीफ करते हुए कहा- “मुझे पहले ही पता था कि तुम इसे जल्दी ही सीख लोगे। अच्छा जेम्स, क्या तुम इस कागज के बारे में कुछ जानते हो?" शलाका ने जेम्स के चेहरे के सामने वह कागज का टुकड़ा, हवा में लहराते हुए पूछा।

जेम्स ने ध्यान से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर बोला- “अरे वाह! आपकी तो चित्रकारी भी अच्छी है।"

“यह मेरा बनाया हुआ नहीं है जेम्स।” शलाका ने ध्यान से जेम्स के चेहरे को पढ़ते हुए कहा।

"तो फिर यह जिसने भी बनाया है, उसकी चित्रकारी बहुत अच्छी है और इसने जो दिल के चारो ओर सूर्य की किरणें बनाई हैं, वह तो लाजवाब है।"

शलाका ने जेम्स की बात सुन एक बार फिर उस कागज के टुकड़े को देखा, जेम्स सही कह रहा था, दिल के चारो ओर सूर्य के प्रकाश को ही दर्शाया गया था।

“मैं सही सोच रही थी, जेम्स को इसके बारे में कुछ भी नहीं पता?” शलाका स्वयं को समझाते हुए सोच रही थी- “परंतु दिल पर बनी ये सूर्य की किरणें...कहीं सुयश तो नहीं.... नहीं-नहीं मैं भी क्या सोचने लगी? सुयश तो इस समय तिलिस्मा में है...वह भला यहां.. सुयश तो नहीं कैसे आ सकता है?....फिर...फिर और कौन ऐसा है? जो मुझे प्यार करता है और उसके बारे में मुझे भी नहीं पता है। लेकिन एक बात तो तय है कि वह जो भी है, बहुत हिम्मत वाला है, नहीं तो मेरे कमरे में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं करता।”

“आप क्या सोचने लगीं?" तभी जेम्स ने शलाका को कुछ ना बोलते देख पूछ लिया।

“नही-नहीं...कुछ नहीं....मैं तो बस अपने भाइयों के बारे में सोच रही थी।” शलाका ने बात को बदलते हुए कहा- “अच्छा, अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, हम लोग, कुछ ही देर में भारत जाने वाले हैं।"

“येऽऽऽ!” जेम्स खुशी से चीख उठा- “यानि कि मेरा पहला मिशन आज से ही शुरु होगा।"

“आज से नहीं, बल्कि अभी से...अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। मैं तुम्हारे कमरे में लगभग 1 घंटे के बाद आती हूं।" यह कहकर शलाका जेम्स के कमरे से बाहर निकल गई। वह कागज का टुकड़ा अभी भी
शलाका के हाथ में था।

"लगता है कि मुझे अब आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु करना पड़ेगा, जिससे आज जैसी कोई घटना ना घटने पाये।" यह सोच शलाका चलती हुई, अपने कमरे के एक किनारे गई और हवा में हाथ हिलाया।

उसके ऐसा करते ही हवा में एक बड़ा सा आयताकार डिब्बा प्रकट हुआ, उस डिब्बे का आकार किसी क्रिकेट की किट के समान था।

शलाका ने उस डिब्बे को खींचकर खोल दिया और उसमें मौजूद बहुत सारे इलेक्ट्रानिक यंत्रों को देखने लगी। अब उसने कुछ यंत्र उठाकर एक छोटे से बैग में रख लिये और उस डिब्बे को वापस से गायब
कर दिया।

अब शलाका ने अपने बैग में कुछ और जरुरत की चीजें डालीं। अब वह बैग भी शलाका की तरह से तैयार हो गया था।

आज का दिन शलाका के लिये आश्चर्य से भरा दिख रहा था। जो भी हो, पर आज की घटना ने शलाका का दिमाग हिला दिया था। बहरहाल लगभग 1 घंटे के बाद शलाका फिर से जेम्स के कमरे में पहुंची।

शलाका का तैयार किया हुआ बैग इस समय शलाका के हाथ में था। इस समय जेम्स पूरी तरह से तैयार खड़ा था। उसने आगे बढ़कर शलाका के हाथ से बैग ले लिया।

शलाका ने जेम्स को अपने पीछे आने का इशारा किया और स्वयं एक दिशा की ओर चल दी।

जेम्स शलाका के साथ-साथ चलने लगा। शलाका जेम्स को लेकर एक विशाल कमरे में पहुंच गई, पर जेम्स को इस कमरे में कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि शलाका इस कमरे में क्यों आई है? लेकिन थोड़ी ही देर बाद जेम्स को अपना जवाब मिलना शुरु हो गया।

शलाका कमरे के बीचो-बीच में पहुंची और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये।

अब शलाका के हाथों में नीले रंग का एक ऊर्जा जाल आ गया। उस ऊर्जा जाल को देखकर महसूस हो रहा था कि शलाका ने अपने हाथों में, कोई हल्के नीले रंग के पारदर्शी दस्ताने पहने हों।

शलाका ने अब अपने दस्तानों से, हवा में एक जगह अपनी उंगली दबाई। शलाका के ऐसा करते ही पूरा कमरा एक दूधिया रोशनी से भर गया और जिस स्थान पर शलाका खड़ी थी, उस स्थान पर 2 कुर्सियां प्रकट हो गईं।

जेम्स आश्चर्य भरी नजरों से इस अद्भुत तकनीक को देख रहा था। शलाका अब उनमें से एक कुर्सी पर बैठ गई और जेम्स को दूसरी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

शलाका का इशारा पाकर जेम्स दूसरी कुर्सी पर आकर बैठ गया। जेम्स अब स्वयं को किसी ‘एस्ट्रोनॉट' से कम नहीं समझ रहा था।

अब शलाका के सामने एक बड़ी सी चमकीली स्क्रीन प्रकट हो गई। शलाका ने उस स्क्रीन पर लगे एक लाल रंग के बटन को दबा दिया।

शलाका के ऐसा करते ही हवा में किसी लड़की का विशालकाय चेहरा उभरा, जो कि देखने पर ही कोई कम्प्यूटर प्रोग्राम के समान प्रतीत हो रही थी।

“शलाका को आर्ची का प्रणाम।” उस कम्प्यूटर वाली लड़की ने कहा- “इस बार तो बहुत लंबे अंतराल के बाद आपने मुझे जगाया।"

"हां आर्ची...इसलिये सबसे पहले आर्केडिया यान के सारे कंट्रोल्स चेक करो।” शलाका ने कहा।

“जो आज्ञा।” यह कहकर आर्ची, आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स को चेक करने लगी।

"आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स सही काम कर रहे हैं। कुछ देर के बाद आर्ची ने कहा- “अब मैं आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु कर देती हूं।"

यह कहकर आर्ची ने पता नहीं क्या किया? कि पूरे यान में कुछ देर तक खट-पट की आवाजें आती रहीं।

“सुरक्षा तंत्र भी शुरु हो चुका है। अब बताइये कि मुझे और क्या करना है?" आर्ची ने कहा।

“सबसे पहले इस पृथ्वी पर, हवा में घूम रहे सभी सिग्नल्स का ठीक से अध्ययन करो और पृथ्वी का सारा लेटेस्ट डेटा अपने प्रोग्राम में डाल लो, जिससे तुम्हारे पास की सभी जानकारियां अपडेट हो जायें। हां... पृथ्वी की बाहरी कक्षा में घूम रहे सभी सेटेलाइट को स्कैन करना मत भूलना।” शलाका ने आर्ची को अगला आदेश दिया।

यह आदेश सुन जेम्स की आँखें खुली की खुली रह गईं। वह पृथ्वी पर अगले 50 वर्षों तक भी ऐसी तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था।

लगभग 10 मिनट के बाद फिर से आर्ची की आवाज उभरी- “पृथ्वी का सारा तकनीकी डेटा, मैंने अपने स्टोर में अपडेट कर लिया है।"

“ओ.के. तो अब सबसे पहले मुझे ये बताओ कि भारत में अवन्ती राज्य कहां है? मुझे उसके एक शहर उज्जैनी में जाना है।” शलाका ने कहा।

"भारत में अब राजाओं की परंपरा समाप्त हो चुकी है और अवन्ती राज्य का उज्जैनी शहर, अब उज्जैन नाम से विख्यात है, जो कि भारत के एक राज्य मध्य प्रदेश में स्थित है।" आर्ची ने कहा।

“अब मुझे ये बताओ कि तुम उज्जैन में कहां लैंड कर सकती हो?” शलाका ने कहा।


“उज्जैन शहर, म…देव के एक मंदिर महा…लेश्वर के लिये प्रसिद्ध है। महा…लेश्वर मंदिर के बगल एक रुद्र सागर नाम की झील है। वहां हम आसानी से अपना यान उतार सकते हैं। दूसरा विकल्प क्षिप्रा नदी का है, जो शहर से कुछ दूरी पर है।” आर्ची ने अपना कम्प्यूटर खंगालते हुए कहा।

“ठीक है तो पहले आर्केडिया को अदृश्य तरंगों से इस प्रकार अदृश्य कर दो कि कोई रेडार भी उसे ना ढूंढ पाये और फिर उज्जैन की ओर चलो और हां....जेम्स को अच्छी तरह से देख लो, यह आज से हमारे साथ काम करेगा, इसलिये आपातकाल को छोड़, अब तुम्हें इसके आदेश भी मानने पड़ेंगे।” शलाका ने आर्ची को आदेश देते हुए कहा।

"जो आज्ञा शलाका और आर्केडिया पर आपका स्वागत है जेम्स।" यह कहकर आर्ची ने आर्केडिया को अदृश्य किया और उसे अटलांटिक की बर्फ से निकालकर, भारत की ओर लेकर चल दी।

“यह यान तो ऑटोमेटिक है। फिर आप मुझे इसका कंट्रोल क्यों सिखा रहीं थीं?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“भले ही आज तुम्हें आर्केडिया को चलाना ना हो, पर उसे चलाना आना जरुरी है। हम एक कम्प्यूटर पर एक हद तक ही निर्भर हो सकते हैं।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा।

"वैसे यह आर्केडिया कब तक भारत पहुंच जायेगा?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

लेकिन इससे पहले कि शलाका कुछ जवाब दे पाती, यान में आर्ची की आवाज सुनाई दी- “हम कुछ ही देर में उज्जैन पहुंचने वाले हैं।"

"इतनी तेज स्पीड?” जेम्स तो आर्ची की बात सुन हैरान हो गया।

“जेम्स, तुम भूल रहे हो कि यह यान यहां से कई प्रकाशवर्ष दूर भी जाता है, ऐसे में अगर इसकी स्पीड इतनी तेज ना होती, तो यह भला उतनी दूर कैसे जा पाता।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा- “लो अब यह इलेक्ट्रानिक यंत्र अपने गले के पास लगा लो।"

यह कहते हुए शलाका ने अपने बैग से 2 छोटे से इलेक्ट्रानिक यंत्र निकाले और उसमें से एक जेम्स की ओर बढ़ा दिया।

“यह कैसा यंत्र है?” जेम्स ने पूछा।

"इस यंत्र को गले से लगाने के बाद हमारा संपर्क हमेशा आर्ची से बना रहेगा और इस यंत्र की मदद से आर्ची, इस यान में रहकर भी, बहुत प्रकार से हमारी मदद कर सकती है।" अब शलाका जल्दी-जल्दी जेम्स को अष्टकोण और उस दिव्य बालक के बारे में बताने लगी।

कुछ ही देर में अदृश्य आर्केडिया, उज्जैन के रुद्र सागर में उतर गया। ना जाने कैसी तकनीक थी कि आर्केडिया के झील में उतरने के बाद भी पानी ऊपर नहीं उछला।


जारी रहेगा_____✍️
Beautiful update brother! Ye achhi baat hai ki Aryan aur Aakriti ka baccha abhi tak puri tarah se safe hoga, khair Aakriti ko jitna saza milna tha wo mil chuka hai phir bhi usne iss process mein aur kai sare panga le liya hai.
 

Dhakad boy

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#188.

दिव्य बालक:
(18.01.02, शुक्रवार, आर्केडिया यान, ट्रांस अंटार्कटिक माउन्टेन, अंटार्कटिका)

शलाका को युद्ध के बारे में पता चल चुका था, वह जानती थी कि यदि युद्ध हुआ, तो उसका परिणाम किसी भी पक्ष में जा सकता है और ऐसी स्थिति में पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के लिये खतरनाक था।

अतः शलाका ने सबसे पहले अपने सभी भाइयों को सुरक्षित करते हुए, अपने पिता के घर एरियन आकाश -गंगा में भेज दिया था। अब आर्केडिया यान पर सिर्फ शलाका और जेम्स ही बचे थे।

जेम्स को भी शलाका ने आर्केडिया के कंट्रोल्स सीखने के कार्य पर लगा दिया था। अतः अब शलाका थोड़ा निश्चिंत लगने लगी थी।

चूंकि आर्केडिया पिछले 5,000 वर्षों से अटार्कटिका की बर्फ के नीचे दबा था, इसलिये शलाका ने पूरी रात जागकर आर्केडिया के सभी तकनीकी प्रणाली को दुरुस्त कर लिया था।

अब शलाका को आर्यन और आकृति के पुत्र की याद आ गई, जो कि अष्टकोण में बंद भारत के किसी अवन्ती राज्य के, उज्जैनी नगर में जमीन के नीचे सो रहा था।

शलाका कुछ देर आराम करके, अब आर्यन के पुत्र की खोज में जाना चाहती थी। इसलिये शलाका ने एक नजर जेम्स के कमरे पर मारी।

इस समय जेम्स भी सो रहा था। उसे सोते देख शलाका अपने कमरे में आ गई और बिस्तर पर लेट गई।

तभी शलाका की आँखों के आगे आर्यन के पुत्र की मोहक छवि नजर आने लगी। ना जाने कितनी ही देर तक शलाका उस पुत्र के ख्यालों में खोई रही।

अंततः उसे नींद आ ही गई। कुछ ही देर में शलाका गहरी नींद के घोड़ों पर सवार हो, सपनों की दुनिया में चली गई। अब आर्केडिया में चारो ओर सन्नाटा छा गया था।

लगभग आधे घंटे के बाद शलाका के कमरे का दरवाजा बिना आवाज के धीरे से खुला और एक साया दबे पाँव अंदर दाखिल हुआ।

कमरे में ज्यादा उजाला नहीं था, पर फिर भी उस साये के चेहरे पर एक दबी मुस्कान दिखाई दे रही थी।
वह साया काफी देर तक ऐसे ही खड़ा, सो रही शलाका को देखता रहा, फिर वह दबे पाँव कमरे के अंदर आ गया।

उस साये के चलने पर बिल्कुल भी आवाज नहीं हो रही थी। अब वह साया धीरे से शलाका के सामने रखी एक कुर्सी पर बैठ गया।

अब उस साये के हाथ में एक कागज और एक पेन दिखाई देने लगा था। उस साये के हाथ अब कागज पर तेजी से चलने लगे। शायद वह कुछ चित्रकारी कर रहा था।

काफी देर तक चित्रकारी करने के बाद, उस बेखौफ साये ने उस कागज को शलाका के सिरहाने रख दिया।

कागज रखने के बाद उस साये ने एक बार फिर प्यार भरी नजरों से शलाका को देखा और वापस उसी प्रकार कमरे से निकल गया, जिस प्रकार वह अंदर आया था।

इस घटना के लगभग 5 घंटे के बाद शलाका की आँख खुली। अब उसकी नींद पूरी हो गई थी। शलाका बिस्तर से उठी और एक जोर की अंगड़ाई ली। नींद पूरी हो जाने के बाद, अब उसे काफी फ्रेश महसूस होने लगा था।

तभी शलाका की नजर, अपने सिरहाने रखे उस कागज के टुकड़े पर पड़ी। शलाका ने आश्चर्य से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर आगे बढ़कर उसे उठा लिया।

पर जैसे ही शलाका की नजर उस पर बनी आकृति पर गई, वह आश्चर्य से भर उठी।

कागज के टुकड़े पर, बहुत ही सुंदर 3 डी के अक्षरों में अंग्रेजी भाषा का S लिखा था, उस S के आगे एक सुंदर सा डिजाइन किया हुआ दिल बना था, जिसके चारो ओर से किरणें निकल रहीं थीं। उस कागज को देख शलाका की आँखें सिकुड़ गईं।

“यह कागज का टुकड़ा मेरे कमरे में कैसे आया?" शलाका ने दिमाग लगाते हुए सोचना शुरु कर दिया- “कहीं, मेरे सोते समय जेम्स तो नहीं आया था मेरे कमरे में?...नहीं-नहीं जेम्स की इतनी हिम्मत नहीं होगी। तो फिर और कौन हो सकता है? और सबसे बड़ी बात की वह आर्केडिया के अंदर घुसा कैसे? और...और यह S अक्षर तो मेरे नाम का पहला अक्षर है, जो कि....काफी प्यार से लिखा गया लग रहा है? इसके आगे बना दिल भी प्यार का ही संकेत दे रहा है।...पर ऐसा कौन हो सकता है?"

काफी देर तक सोचते रहने के बाद भी जब शलाका को उस कागज के टुकड़े का रहस्य समझ में नहीं आया, तो वह उसे लेकर जेम्स के कमरे की ओर बढ़ गई।

जेम्स इस समय अपने कमरे में नहीं था। इसलिये शलाका आर्केडिया के ट्रेनिंग रुम की ओर बढ़ गई।

जेम्स ट्रेनिंग रुम में ही था, वह अब भी पूरी तन्मयता से वीडियो गेम के द्वारा आर्केडिया के कंट्रोल्स को सीखने की कोशिश कर रहा था। शलाका को ट्रेनिंग रुम में आता देख जेम्स ने गेम को 'फ्रीज' कर दिया।

"तो कैसी चल रही है तुम्हारी ट्रेनिंग?” शलाका ने जेम्स की आँखों में झांकते हुए पूछा।

“बहुत अच्छी...मुझे लग रहा है कि मैं जल्दी ही इसे पूरी तरह से चलाना सीख लूंगा।” जेम्स ने मुस्कुराते हुए कहा।

“वेरी गुड।” शलाका ने जेम्स की तारीफ करते हुए कहा- “मुझे पहले ही पता था कि तुम इसे जल्दी ही सीख लोगे। अच्छा जेम्स, क्या तुम इस कागज के बारे में कुछ जानते हो?" शलाका ने जेम्स के चेहरे के सामने वह कागज का टुकड़ा, हवा में लहराते हुए पूछा।

जेम्स ने ध्यान से उस कागज के टुकड़े को देखा और फिर बोला- “अरे वाह! आपकी तो चित्रकारी भी अच्छी है।"

“यह मेरा बनाया हुआ नहीं है जेम्स।” शलाका ने ध्यान से जेम्स के चेहरे को पढ़ते हुए कहा।

"तो फिर यह जिसने भी बनाया है, उसकी चित्रकारी बहुत अच्छी है और इसने जो दिल के चारो ओर सूर्य की किरणें बनाई हैं, वह तो लाजवाब है।"

शलाका ने जेम्स की बात सुन एक बार फिर उस कागज के टुकड़े को देखा, जेम्स सही कह रहा था, दिल के चारो ओर सूर्य के प्रकाश को ही दर्शाया गया था।

“मैं सही सोच रही थी, जेम्स को इसके बारे में कुछ भी नहीं पता?” शलाका स्वयं को समझाते हुए सोच रही थी- “परंतु दिल पर बनी ये सूर्य की किरणें...कहीं सुयश तो नहीं.... नहीं-नहीं मैं भी क्या सोचने लगी? सुयश तो इस समय तिलिस्मा में है...वह भला यहां.. सुयश तो नहीं कैसे आ सकता है?....फिर...फिर और कौन ऐसा है? जो मुझे प्यार करता है और उसके बारे में मुझे भी नहीं पता है। लेकिन एक बात तो तय है कि वह जो भी है, बहुत हिम्मत वाला है, नहीं तो मेरे कमरे में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं करता।”

“आप क्या सोचने लगीं?" तभी जेम्स ने शलाका को कुछ ना बोलते देख पूछ लिया।

“नही-नहीं...कुछ नहीं....मैं तो बस अपने भाइयों के बारे में सोच रही थी।” शलाका ने बात को बदलते हुए कहा- “अच्छा, अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, हम लोग, कुछ ही देर में भारत जाने वाले हैं।"

“येऽऽऽ!” जेम्स खुशी से चीख उठा- “यानि कि मेरा पहला मिशन आज से ही शुरु होगा।"

“आज से नहीं, बल्कि अभी से...अब तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। मैं तुम्हारे कमरे में लगभग 1 घंटे के बाद आती हूं।" यह कहकर शलाका जेम्स के कमरे से बाहर निकल गई। वह कागज का टुकड़ा अभी भी
शलाका के हाथ में था।

"लगता है कि मुझे अब आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु करना पड़ेगा, जिससे आज जैसी कोई घटना ना घटने पाये।" यह सोच शलाका चलती हुई, अपने कमरे के एक किनारे गई और हवा में हाथ हिलाया।

उसके ऐसा करते ही हवा में एक बड़ा सा आयताकार डिब्बा प्रकट हुआ, उस डिब्बे का आकार किसी क्रिकेट की किट के समान था।

शलाका ने उस डिब्बे को खींचकर खोल दिया और उसमें मौजूद बहुत सारे इलेक्ट्रानिक यंत्रों को देखने लगी। अब उसने कुछ यंत्र उठाकर एक छोटे से बैग में रख लिये और उस डिब्बे को वापस से गायब
कर दिया।

अब शलाका ने अपने बैग में कुछ और जरुरत की चीजें डालीं। अब वह बैग भी शलाका की तरह से तैयार हो गया था।

आज का दिन शलाका के लिये आश्चर्य से भरा दिख रहा था। जो भी हो, पर आज की घटना ने शलाका का दिमाग हिला दिया था। बहरहाल लगभग 1 घंटे के बाद शलाका फिर से जेम्स के कमरे में पहुंची।

शलाका का तैयार किया हुआ बैग इस समय शलाका के हाथ में था। इस समय जेम्स पूरी तरह से तैयार खड़ा था। उसने आगे बढ़कर शलाका के हाथ से बैग ले लिया।

शलाका ने जेम्स को अपने पीछे आने का इशारा किया और स्वयं एक दिशा की ओर चल दी।

जेम्स शलाका के साथ-साथ चलने लगा। शलाका जेम्स को लेकर एक विशाल कमरे में पहुंच गई, पर जेम्स को इस कमरे में कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह समझ ही नहीं पा रहा था कि शलाका इस कमरे में क्यों आई है? लेकिन थोड़ी ही देर बाद जेम्स को अपना जवाब मिलना शुरु हो गया।

शलाका कमरे के बीचो-बीच में पहुंची और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये।

अब शलाका के हाथों में नीले रंग का एक ऊर्जा जाल आ गया। उस ऊर्जा जाल को देखकर महसूस हो रहा था कि शलाका ने अपने हाथों में, कोई हल्के नीले रंग के पारदर्शी दस्ताने पहने हों।

शलाका ने अब अपने दस्तानों से, हवा में एक जगह अपनी उंगली दबाई। शलाका के ऐसा करते ही पूरा कमरा एक दूधिया रोशनी से भर गया और जिस स्थान पर शलाका खड़ी थी, उस स्थान पर 2 कुर्सियां प्रकट हो गईं।

जेम्स आश्चर्य भरी नजरों से इस अद्भुत तकनीक को देख रहा था। शलाका अब उनमें से एक कुर्सी पर बैठ गई और जेम्स को दूसरी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

शलाका का इशारा पाकर जेम्स दूसरी कुर्सी पर आकर बैठ गया। जेम्स अब स्वयं को किसी ‘एस्ट्रोनॉट' से कम नहीं समझ रहा था।

अब शलाका के सामने एक बड़ी सी चमकीली स्क्रीन प्रकट हो गई। शलाका ने उस स्क्रीन पर लगे एक लाल रंग के बटन को दबा दिया।

शलाका के ऐसा करते ही हवा में किसी लड़की का विशालकाय चेहरा उभरा, जो कि देखने पर ही कोई कम्प्यूटर प्रोग्राम के समान प्रतीत हो रही थी।

“शलाका को आर्ची का प्रणाम।” उस कम्प्यूटर वाली लड़की ने कहा- “इस बार तो बहुत लंबे अंतराल के बाद आपने मुझे जगाया।"

"हां आर्ची...इसलिये सबसे पहले आर्केडिया यान के सारे कंट्रोल्स चेक करो।” शलाका ने कहा।

“जो आज्ञा।” यह कहकर आर्ची, आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स को चेक करने लगी।

"आर्केडिया के सारे कंट्रोल्स सही काम कर रहे हैं। कुछ देर के बाद आर्ची ने कहा- “अब मैं आर्केडिया का सुरक्षा तंत्र शुरु कर देती हूं।"

यह कहकर आर्ची ने पता नहीं क्या किया? कि पूरे यान में कुछ देर तक खट-पट की आवाजें आती रहीं।

“सुरक्षा तंत्र भी शुरु हो चुका है। अब बताइये कि मुझे और क्या करना है?" आर्ची ने कहा।

“सबसे पहले इस पृथ्वी पर, हवा में घूम रहे सभी सिग्नल्स का ठीक से अध्ययन करो और पृथ्वी का सारा लेटेस्ट डेटा अपने प्रोग्राम में डाल लो, जिससे तुम्हारे पास की सभी जानकारियां अपडेट हो जायें। हां... पृथ्वी की बाहरी कक्षा में घूम रहे सभी सेटेलाइट को स्कैन करना मत भूलना।” शलाका ने आर्ची को अगला आदेश दिया।

यह आदेश सुन जेम्स की आँखें खुली की खुली रह गईं। वह पृथ्वी पर अगले 50 वर्षों तक भी ऐसी तकनीक की कल्पना नहीं कर सकता था।

लगभग 10 मिनट के बाद फिर से आर्ची की आवाज उभरी- “पृथ्वी का सारा तकनीकी डेटा, मैंने अपने स्टोर में अपडेट कर लिया है।"

“ओ.के. तो अब सबसे पहले मुझे ये बताओ कि भारत में अवन्ती राज्य कहां है? मुझे उसके एक शहर उज्जैनी में जाना है।” शलाका ने कहा।

"भारत में अब राजाओं की परंपरा समाप्त हो चुकी है और अवन्ती राज्य का उज्जैनी शहर, अब उज्जैन नाम से विख्यात है, जो कि भारत के एक राज्य मध्य प्रदेश में स्थित है।" आर्ची ने कहा।

“अब मुझे ये बताओ कि तुम उज्जैन में कहां लैंड कर सकती हो?” शलाका ने कहा।


“उज्जैन शहर, म…देव के एक मंदिर महा…लेश्वर के लिये प्रसिद्ध है। महा…लेश्वर मंदिर के बगल एक रुद्र सागर नाम की झील है। वहां हम आसानी से अपना यान उतार सकते हैं। दूसरा विकल्प क्षिप्रा नदी का है, जो शहर से कुछ दूरी पर है।” आर्ची ने अपना कम्प्यूटर खंगालते हुए कहा।

“ठीक है तो पहले आर्केडिया को अदृश्य तरंगों से इस प्रकार अदृश्य कर दो कि कोई रेडार भी उसे ना ढूंढ पाये और फिर उज्जैन की ओर चलो और हां....जेम्स को अच्छी तरह से देख लो, यह आज से हमारे साथ काम करेगा, इसलिये आपातकाल को छोड़, अब तुम्हें इसके आदेश भी मानने पड़ेंगे।” शलाका ने आर्ची को आदेश देते हुए कहा।

"जो आज्ञा शलाका और आर्केडिया पर आपका स्वागत है जेम्स।" यह कहकर आर्ची ने आर्केडिया को अदृश्य किया और उसे अटलांटिक की बर्फ से निकालकर, भारत की ओर लेकर चल दी।

“यह यान तो ऑटोमेटिक है। फिर आप मुझे इसका कंट्रोल क्यों सिखा रहीं थीं?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“भले ही आज तुम्हें आर्केडिया को चलाना ना हो, पर उसे चलाना आना जरुरी है। हम एक कम्प्यूटर पर एक हद तक ही निर्भर हो सकते हैं।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा।

"वैसे यह आर्केडिया कब तक भारत पहुंच जायेगा?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

लेकिन इससे पहले कि शलाका कुछ जवाब दे पाती, यान में आर्ची की आवाज सुनाई दी- “हम कुछ ही देर में उज्जैन पहुंचने वाले हैं।"

"इतनी तेज स्पीड?” जेम्स तो आर्ची की बात सुन हैरान हो गया।

“जेम्स, तुम भूल रहे हो कि यह यान यहां से कई प्रकाशवर्ष दूर भी जाता है, ऐसे में अगर इसकी स्पीड इतनी तेज ना होती, तो यह भला उतनी दूर कैसे जा पाता।” शलाका ने जेम्स को समझाते हुए कहा- “लो अब यह इलेक्ट्रानिक यंत्र अपने गले के पास लगा लो।"

यह कहते हुए शलाका ने अपने बैग से 2 छोटे से इलेक्ट्रानिक यंत्र निकाले और उसमें से एक जेम्स की ओर बढ़ा दिया।

“यह कैसा यंत्र है?” जेम्स ने पूछा।

"इस यंत्र को गले से लगाने के बाद हमारा संपर्क हमेशा आर्ची से बना रहेगा और इस यंत्र की मदद से आर्ची, इस यान में रहकर भी, बहुत प्रकार से हमारी मदद कर सकती है।" अब शलाका जल्दी-जल्दी जेम्स को अष्टकोण और उस दिव्य बालक के बारे में बताने लगी।

कुछ ही देर में अदृश्य आर्केडिया, उज्जैन के रुद्र सागर में उतर गया। ना जाने कैसी तकनीक थी कि आर्केडिया के झील में उतरने के बाद भी पानी ऊपर नहीं उछला।


जारी रहेगा_____✍️
Bhut hi badhiya update Bhai
Shalaka aur james aryan aur aakriti ke bete ko dhundne ke liye mahakal ki nagari ujjain pahuch gaye hai
Dhekte hai aage kya hota hai
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Update bohut achha laga specially last main jo Jack aur Johny wala
Aur Alex ne sidhe jalke Cristy ko dinner ke liye bol raha hai
Alex ki noob harkate badhiya hain, waise shuru me khali story building pe jyada focus hai, baaki asli maja to aage aayega :declare:
Thanks for your valuable review and support :thanks:
 

Raj_sharma

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Wonderful update! Let's see Yuvraj Auras kab wapas aata hai apna planet, kya Auras aur Nakshatra dono same hain???
Ye dono same hain ya alag, ye to abhi nahi bataunga, kyu ki story ka maja chala jayega :dazed:
And uske wapis jaane me abhi bohot samay hai. Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanks:
 

Raj_sharma

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Wonderful update! Action scene achha raha, aisa scene likhne ke liye kaphi new cheezein sochni padti hai. Let's see Vyom aur Shefali team apna mission kaise pura karte hain.
Kya kare dost, hum poori kosis karte hain ki aapka manoranjan acche se kar sake :smarty:
Vyom and trikali ka chapter bhi aane hi wala hai. Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanks:
 

Raj_sharma

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Wonder update brother! Main theme of this episode, wo kaun hai jisne ek baar pahle aur ek baar abhi Jenith ka help kiya??? Let's see next episode mein Shefali kaise challenge ko paar karti hai.
Nakshatra me kuch to locha lagta hai mujhe :shhhh: Thanks for your valuable review and support bhai :thanks:
 
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