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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

avsji

Weaving Words, Weaving Worlds.
Supreme
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#179

राज भाई - आपकी रचना तो एक भव्य और महत्वाकांक्षी फंतासी वाले संसार की रचना है। इंद्रसभा, त्रिदेवों का आगमन, और कलयुग के लिए “ब्रह्मांड रक्षक” की योजना, यह सभी तत्व मिलकर बढ़िया प्लॉट बना रहे हैं। मतलब आगे कहानी में और विस्तार आने वाला है। हमको इनके बारे में पहले पता चल चुका है लेकिन फिर भी, इस अपडेट के विचार न सिर्फ नए लगते हैं, बल्कि एक structured universe का संकेत भी देते हैं।

लेकिन सबसे पहले, भाषा और शुद्धता - जो आपने जान बूझ कर खराब करी है - उस पर ध्यान देना ज़रूरी है। एक और बात, संवाद केवल functional से हैं, मतलब, वो कहानी को आगे बढ़ाते तो हैं, लेकिन अलग-अलग पात्रों की आवाज़ में अंतर नहीं पढ़ने में आता। इंद्र, सूर्य, और वरुण, तीनों के ही बोलने का तरीका लगभग एक जैसा है।

-- ये उतारी मैंने बाल की खाल!

#180

यह अपडेट पिछले से बेहतर है और बहुत जीवंत है। बढ़िया visual narrative! देवशक्तियों का प्रस्तुतिकरण - रत्नों के माध्यम से शक्तियों को दिखाना एक बहुत ही प्रभावी और याद रहने वाला आइडिया है (वो अलग बात है कि मुझ भुलक्कड़ को याद नहीं रहेगा)। हर शक्ति का रंग, उसका गुण (जैसे सूर्यशक्ति = पराक्रम, जलशक्ति = गंभीरता, वायुशक्ति = विज्ञान) - यह सब मिलकर एक structured magic system बनाता है। अच्छी फंतासी वहीं होती है जहाँ शक्तियों के नियम स्पष्ट हों।

उधर इंद्र की आफ़त हो गई है। पहले उसको दूसरों के अमरत्व के कारण दिक्कत थी, फ़िर राक्षसलोक का डर, फिर माया पर संदेह, और अंत में मन ही मन कोई खिचड़ी पकाना। देवराज एक insecure और politically aware शासक है। बढ़िया!
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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#179

राज भाई - आपकी रचना तो एक भव्य और महत्वाकांक्षी फंतासी वाले संसार की रचना है। इंद्रसभा, त्रिदेवों का आगमन, और कलयुग के लिए “ब्रह्मांड रक्षक” की योजना, यह सभी तत्व मिलकर बढ़िया प्लॉट बना रहे हैं। मतलब आगे कहानी में और विस्तार आने वाला है। हमको इनके बारे में पहले पता चल चुका है लेकिन फिर भी, इस अपडेट के विचार न सिर्फ नए लगते हैं, बल्कि एक structured universe का संकेत भी देते हैं।
इश शानदार रिव्यू के लिए बोहोत-2 धन्यवाद भाई 🙏🏼🙏🏼
लेकिन सबसे पहले, भाषा और शुद्धता - जो आपने जान बूझ कर खराब करी है - उस पर ध्यान देना ज़रूरी है। एक और बात, संवाद केवल functional से हैं, मतलब, वो कहानी को आगे बढ़ाते तो हैं, लेकिन अलग-अलग पात्रों की आवाज़ में अंतर नहीं पढ़ने में आता। इंद्र, सूर्य, और वरुण, तीनों के ही बोलने का तरीका लगभग एक जैसा है।

-- ये उतारी मैंने बाल की खाल!
एकआध ऐसा भी होना चाहिए जो बाल की खाल निकाले। :D
बाकी भाषा की बात करें तो यहाॅ कई संस्कृतियो का ओर भाषाओ का मेल दिखाए गये है, इस लिए अंग्रेजी का समावेश है।
#180

यह अपडेट पिछले से बेहतर है और बहुत जीवंत है। बढ़िया visual narrative! देवशक्तियों का प्रस्तुतिकरण - रत्नों के माध्यम से शक्तियों को दिखाना एक बहुत ही प्रभावी और याद रहने वाला आइडिया है (वो अलग बात है कि मुझ भुलक्कड़ को याद नहीं रहेगा)। हर शक्ति का रंग, उसका गुण (जैसे सूर्यशक्ति = पराक्रम, जलशक्ति = गंभीरता, वायुशक्ति = विज्ञान) - यह सब मिलकर एक structured magic system बनाता है। अच्छी फंतासी वहीं होती है जहाँ शक्तियों के नियम स्पष्ट हों।
धन्यवाद भाई जी 🙏🏼 आपको अच्छा लगा तो हमारी मेहनत सफल :yes1:
वैसे अमर भाई भुलक्कड़ कब से हो गये?
उधर इंद्र की आफ़त हो गई है। पहले उसको दूसरों के अमरत्व के कारण दिक्कत थी, फ़िर राक्षसलोक का डर, फिर माया पर संदेह, और अंत में मन ही मन कोई खिचड़ी पकाना। देवराज एक insecure और politically aware शासक है। बढ़िया!
इंद्र की तो सदा से ही देखते आये है, कि जब भी कोई देव या असुर शक्ति हासिल करता है, तो इनकी हालत खराब होती ही है।:D
 

H E Y W I Z Z A R D

Devil 😈 calls me DAD
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# 6.
25 दिसम्बर 2001, मंगलवार, 19:00 “सुप्रीम”

आज क्रिसमस का दिन था । सुबह से ही सारे लोग एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे। पूरे शिप पर एक त्यौहार का माहौल था। सुयश ने भी विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन किया हुआ था। पूरे दिन भर लोगों ने एक बड़ी संख्या में, इन विभिन्न प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। शिप के हॉल को भी दुल्हन की तरह सजाया गया था।

धीरे-धीरे शाम हो चली थी । शिप के लगभग सभी व्यक्ति, उस विशालकाय हॉल में एकत्रित थे। हमेशा की तरह इस बार भी सुयश ने स्टेज पर चढ़कर, सबसे पहले सभी को अभिवादन किया, और फिर एक गहरी निगाह उस विशालकाय भीड़ पर डाली । हॉल में इतने सारे लोगों के होने के बाद भी, इस समय बिल्कुल सन्नाटा था । सभी की निगाहें सिर्फ और सिर्फ सुयश पर थीं। सुयश ने सब पर एक नजर डालने के बाद धीरे से माइक संभाला ।

“दोस्तों ! जैसा कि आप जानते हैं, कि आज क्रिसमस का त्यौहार है।“ सुयश की आवाज पूरे हॉल में गूंज रही थी-

“यह त्यौहार पूरे विश्व भर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ।इसलिए हमने भी अपने शिप पर मौजूद सभी यात्रियों की सुविधा का विशेष ख्याल रखा। उनको जरूरत की लगभग हर चीज उपलब्ध कराई और इस त्यौहार को खुशी का नया रंग देने के लिए, मैंने शिप पर कुछ प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया। मुझे बड़ी खुशी हुई कि अधिक से अधिक लोगों ने इन प्रतियोगिताओं में भाग लिया। अब मैं उन प्रतियोगियों के नाम बताऊंगा, जिन्होंने इन प्रतियोगिताओं में भाग लेकर सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया है।

सुयश ने कुछ क्षण रुककर रोजर के हाथ से, कागज का एक पन्ना लिया और उसे खोल कर देखने के बाद फिर बोलना शुरु कर दिया-

“सबसे पहले मैं अपनी सबसे शानदार प्रतियोगिता, निशानेबाजी में भाग लेने वाले उन सभी 28 प्रतियोगियों को धन्यवाद देना चा हूंगा, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में खुले दिल से भाग लिया और अपनी निशानेबाजी का हुनर दिखा कर, सभी का मनोरंजन किया। अब मैं इस प्रति योगिता में प्रथम, द्वित्तीय और तृतीय आए लोगों के नाम एनाउंस करुंगा, जिनके खूबसूरत और अचूक निशाने को देखकर, आपने भी अपने दांतो तले उंगली दबाली।“

“तो निशानेबाजी का प्रथम पुरस्कार जाता है, मिस्टर तौफीक के नाम पर, जिन्होंने अपने निशाने से, पहले दिए गए सभी लक्ष्यों को भेदा, फिर एक ही गोली से एक कतार में रखी 6 जलती हुई मोमबत्तियों को बुझाया और उसके बाद अभेद्य समझे जाने वाले, 6 सिक्कों को हवा में उछाल कर, जमीन पर गिरने से पहले ही निशाना बनाया ।“


सुयश लगातार बोल रहा था- “अतः मैं मिस्टर तौफीक से आग्रह करूंगा कि वह स्टेज पर आकर अपना मेडल प्राप्त करें।“ सुयश के इतना कहते ही, पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा ।

इन तालियों में एक ताली की आवाज ऐसी थी, जिसमें खुशी की गूंज भी थी और प्यार का इजहार भी। और वह ताली थी जेनिथ की, जो हॉल में एक स्थान पर लॉरेन के साथ बैठी थी। तौफीक इन दोनों से कुछ ही दूरी पर बैठा था। उसने अपना नाम एनाउंस होते देख, एक नजर जेनिथ पर डाली और फिर धीरे धीरे चलता हुआ स्टेज पर जा पहुंचा। अब वह सुयश के सामने था । सुयश ने एक बार बड़े ही गौर से तौफीक को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर आगे बढ़कर तौफीक से हाथ मिलाते हुए, बगल में खड़े रोजर से मेडल लेकर तौफीक के सीने पर टांक दिया। पूरा हॉल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा ।

तौफीक के सीने पर चमचमाता हुआ मेडल देख, जेनिथ खुशी से फूली नहीं समा रही थी । उधर मेडल तौफीक के सीने पर टांकने के बाद सुयश ने माइक के सामने जाकर, तौफीक को माइक पर आने का इशारा किया। एक पल के लिए तौफीक ठिठका और फिर कुछ सोचकर धीरे से माइक के सामने जा पहुंचा। उसके माइक पर पहुंचते ही, सुयश ने तौफीक को संबोधित करते हुए कहा –

“अब मैं मिस्टर तौफीक से उनकी इस शानदार निशानेबाजी का राज पूछना चाहूंगा । मैं चाहूंगा कि वे सबके सामने अपने इस शानदार हुनर का कारण बताएं।“ यह कहकर सुयश शांत हो कर तौफीक के चेहरे को इस तरह देखने लगा जैसे कि उस पर लिखा हो, कि वही अपराधी है। तौफीक ने एक नजर पहले वहां बैठे सभी दर्शकों पर मारी, फिर जेनिथ पर और फिर बिल्कुल शांत भाव से बोलना शुरू किया-

“दोस्तों ! मेरा नाम तौफीक है। मैं वैसे तो मूलतः मिश्र का रहने वाला हूं, पर फ्रांस में रहने के कारण, मुझे वहां की नागरिकता प्राप्त है। मैं वहां की आर्मी फोर्स में मेजर के पद पर कार्य करता हूं। यही कारण है कि मेरा निशाना इतना अचूक है। वैसे तो मैं आमतौर पर इस तरह की, किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेता, पर आज किसी के कहने पर मैंने इस प्रतियोगिता में भाग लिया । इसलिए ये मेडल उसी के नाम पर।“ यह कहते समय तौफीक की नजर जेनिथ पर जा कर टिक गई, जो अपलक उसी को देख रही थी । तत्क्षण उसकी नजरें पुनः पूरे हॉल में सरसरी तौर पर घूमी और फिर वह बोला-

“बस दोस्तों ! इससे ज्यादा और कुछ नहीं कहना चाहूंगा ।“ यह कहकर तौफीक स्टेज से उतरता हुआ धीरे-धीरे अपने स्थान की ओर बढ़ गया। सुयश ने तौफीक को जाते देख पुनः आकर माइक संभाल लिया ।

“अब मैं निशानेबाजी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान पाने वाले, उस प्रतियोगी को स्टेज पर बुलाना चाहूंगा, जिन्होंने बाकी सभी जगहों पर तौफीक को बराबरी की टक्कर दी, परंतु अंतिम राउंड में हार गए। उनका नाम है मिस्टर लोथार।“

तालियों की गूंज के बीच, लोथार स्टेज पर आया। सुयश ने लोथार को एक छोटी सी शील्ड प्रदान की, और फिर उसे भी माइक पर बुलाया ।

“दोस्तों ! मेरा नाम लोथार है। मैं साऊथ अफ्रीका का रहने वाला हूं। मुझे बचपन से ही निशानेबाजी का शौक था । इसलिए मैंने साऊथ अफ्रीका की जानी मानी ‘टारगेट शूटर्स‘ ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षण लिया। जिसकी वजह से मैं आज यहां इस मुकाम तक पहुंचा हूं।“

इतना कहकर लोथार ने अपने दाहिने हाथ से अपने होठों को चूम कर, एक फ्लाइंग किस हवा में उछाला और एक हाथ हिलाते हुए, विदाई की मुद्रा में स्टेज से उतर गया।

“अब मैं इस प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे, मिस्टर जैक को स्टेज पर बुलाना चाहूंगा।“ सुयश ने पुनः माइक संभालते हुए कहा-

“इन्होंने भी इस प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन किया।“ जैक, सुयश से नजरें चुराता, सिर झुकाए स्टेज पर आया और इससे पहले कि सुयश उसे माइक पर बुला पाता, तेजी से अपनी शील्ड लेकर बिना कुछ बोले स्टेज से उतर गया। सुयश की तीखी निगाहें अंत तक जैक पर थीं। फिर वह अन्य प्रतियोगिताओं के विनर्स का नाम घोषित करने में लग गया। इस प्रकार उस शाम का अंत, सेलिब्रेट करते हुए, शोर- शराबे के बीच बीता।

25 दिसम्बर 2001, मंगलवार, 19:00; “सुप्रीम” मीटिंग रुम :
“हम लोगों का प्लान व प्रतियोगिता का आयोजन तो शानदार रहा।“ सुयश ने रोजर व लारा को बारी-बारी से देखते हुए कहा-

“लेकिन असली चुनौती तो अब शुरू होगी। क्यों कि अब हमें इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले उन सभी 28 प्रतियोगियों के कमरे चेक करने होंगे। जिससे हमें अपराधियों का कुछ सुराग लग सके।“

“कैप्टन!“ रोजर ने सुयश की बात पूरी होते ही पूछा- “वैसे आपने इन सभी 28 प्रतियोगियों को देखा। आपकी समझ से इनमें अपराधी कौन हो सकता है?“ रोजर की बात सुनते ही तुरंत सुयश की आंखों के सामने जैक का चेहरा घूम गया।

“वैसे तो अभी किसी के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।“ सुयश ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा-
“लेकिन फिर भी मुझे सबसे ज्यादा शक जैक पर हो रहा है। क्यों कि कुछ तो उसकी हरकतें भी अपराधियों के जैसी हैं, और फिर तुम लोगों ने देखा, कि कैसे वह स्टेज पर आकर, बिना कुछ बोले ही चला गया। यहां तक कि उसने यह भी नहीं बताया, कि उसने इतनी अच्छी निशानेबाजी कहां से सीखी ?“

“आप बिल्कुल सही कह रहे हैं, कैप्टन।“ लारा ने भी कैप्टन सुयश की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा-
“मुझे भी वह आदमी कुछ अजीब सा लगा।“

“अच्छा ! अब यह सोचो ।“ रोजर ने लारा की तरह देखते हुए कहा- “कि इन लोगों का कमरा, चेक कब और कैसे करना है? क्यों कि किसी-किसी के साथ तो दो या तीन लोग रहते हैं, और जरूरी नहीं कि सारे लोग एक साथ कमरे से बाहर जाएं। ये भी हो सकता है कि वह लोग जल्दी ही कमरे में वापस आ जाएं। जबकि हमें कमरे चेक करने के लिए समय चाहिए होगा।“

“रोजर बिल्कुल सही कह रहा है।“ सुयश ने लारा की तरफ देखते हुए कहा-

“हमें तलाशी चुपचाप ही लेनी होगी। यदि किसी को इस बारे में पता चल गया तो शिप की बदनामी तो होगी ही, बल्कि समय से पहले अपराधी भी सतर्क हो जाएगा।“

“तो फिर तलाशी के लिए हमें एक महोत्सव फिर से करना पड़ेगा।“ लारा ने सुयश की ओर देखते हुए कहा- “और इस महोत्सव में यह कोशिश करनी होगी कि अधिक से अधिक यात्री, इस में सम्मिलित हों।“

“उसकी जरूरत नहीं है। 5 दिन के बाद नया साल आने वाला है। उसकी पार्टी में तो वैसे भी सारे आदमी हॉल में रहेंगे। यह हमारे लिए सबसे अच्छा मौका रहेगा । हम उसी समय उन सभी के कमरे चेक करेंगे।“ सुयश ने पास रखे पेन को हाथ की उंगलियों में फंसाकर नचाते हुए कहा।

“ठीक है कैप्टन!“ लारा ने जोश में आते हुए जवाब दिया -

“मैं अपनी सिक्योरिटी के सभी आदमियों को एलर्ट करके, उस दिन के बारे में बता दूंगा, और यह 28 प्रतियोगियों की लिस्ट भी, उनके रुम नंबर सहित उनके हवाले कर दूंगा।“

“हाँ ! लेकिन एक बात का ख्याल रहे, तलाशी लेते समय यात्रियों के सामानों के साथ, इस तरह की छेड़छाड़ न की जाए, कि उन्हें बाद में पता चल जाए कि उनके रुम की तलाशी ली गई है।“ सुयश ने कहा।

“ठीक है सर! मैं ऐसा अपनी सिक्योरिटी के आदमियों को बता दूंगा।“ इतना कहकर लारा ने सुयश की ओर जाने की आज्ञा लेने वाली दृष्टि से देखा । सुयश ने यह देख लारा को जाने का इशारा कर दिया। लारा के जाने के बाद सुयश, रोजर की तरफ घूमा-

“रोजर वैसे तो हमारा प्लान बहुत अच्छा है, पर अगर हमें इसके द्वारा सफलता ना मिली तो ?“

“इसके लिए हमें पहले से ही कुछ और प्लान भी करना पड़ेगा।“ रोजर ने शांत स्वर में कहा-

“लेकिन आप चिंता ना करें कैप्टेन, मैं कोई ना कोई प्लान और बना ही लूंगा।“

“ठीक है, फिर आगे की बातें हम बाद में ही करेंगे।“ सुयश ने मीटिंग खत्म करने वाले अंदाज में कहा , और उठकर खड़ा हो गया । रोजर भी उठ कर खड़ा हो गया और सुयश से विदा लेकर केबिन से बाहर निकल गया।




जारी रहेगा…..... :writing:
Update is very nice 👍 🙂
Ek pakda gaya toh baki sab bahar ajaenge
 

parkas

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#189.

भारत में इस समय दोपहर के 4 बज रहे थे। शलाका और जेम्स, आर्केडिया के गुप्त द्वार से बाहर निकले और रुद्र सागर के पानी को चीरते हुए, झील की सतह के ऊपर आ गये।

"आर्ची, मेरे और जेम्स के कपड़े, भारत की परंपरा के हिसाब से कर दो।” शलाका ने झील के बाहर निकलते ही आर्ची को आदेश दिया। शलाका के इतना कहते ही जेम्स और उसके कपडे तुरंत बदल गये।

यह देख जेम्स ने आश्चर्य से पूछा- “क्या आर्ची वहां से कपड़े भी चेंज कर सकती है?"

“आगे-आगे देखते रहो....अभी वह बहुत कुछ कर सकती है।” शलाका ने मुस्कुराकर अपने शरीर पर पहने कपड़े को देखा और फिर महा…लेश्वर मंदिर की ओर बढ़ गई।

इस समय जेम्स और शलाका ने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी।

जेम्स के लिये ये सभी कुछ बहुत अनोखा था। उसे तो यह लग रहा था कि शलाका कहीं भी जाने के लिये अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करेगी, पर जेम्स की सोच से बिल्कुल उल्टा हो रहा था, शलाका पूरी तरह से विज्ञान की शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

शलाका चलते हुए अब मंदि..र के प्रांगण में आ गई। शलाका ने जिस तरह का मं..दिर वेदांत रहस्यम् में देखा था, यह उससे बिल्कुल अलग था। बस देव का शि….वलिंग वहीं था।

इस समय मं..दिर के पट बंद थे। शलाका ने बाहर से हाथ जोड़कर देव का नमन किया और जेम्स को लेकर उस दिशा की ओर चल दी, जिधर उसने, वह लकड़ी का मकान देखा था।

इस समय उस स्थान पर सबकुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा था। अब वहां पर बहुत से मकान बन चुके थे, पर शलाका को उस मकान की मंदिर से दूरी और उसका कोण याद था, इसलिये वह बिना कहीं रुके आगे बढ़ रही थी।

अब शलाका एक स्थान पर जाकर रुक गई। उसके सामने एक पक्का और काफी अच्छा मकान बना था।

शलाका ने एक बार फिर पलटकर मं..दिर के प्रांगण को देखा और उस मकान की दूरी और उसके कोण का फिर से अंदाजा लगाया।

अब वह पूरी तरह से संतुष्ट थी कि यह वही मकान है। शलाका जेम्स को लेकर उस मकान के बाहर पहुंच गई।

मकान के बाहर एक नेम प्लेट लगी थी, जिस पर हिंदी भाषा में लिखा था- “शारदा भवन।"

पर जेम्स, उस भाषा को पढ़ नहीं पा रहा था।

“आर्ची, हमें हिंदी भाषा का ज्ञान चाहिये।” शलाका ने आर्ची से कहा।

“भेज दिया, आप चेक कर सकती हैं।” आर्ची ने बिना देर लगाये शलाका और जेम्स के दिमाग में हिंदी भाषा का ज्ञान डाल दिया।

आर्ची के हर एक कार्य पर जेम्स हैरान हो रहा था। अब जेम्स की नजर दोबारा से नेम प्लेट पर गई, पर अब वह साफ-साफ हिंदी भाषा को पढ़ ले रहा था।

अब शलाका ने उस घर पर लगी घंटी पर अपनी उंगली रख दी। अंदर कहीं एक मधुर स्वरलहरी गूंजी।

कुछ देर के बाद एक लगभग 35 वर्षीय महिला ने दरवाजा खोला।
अपने सामने कुछ अजनबियों को देख, उसने पूछ लिया- "कौन हैं आप लोग और आपको किससे मिलना है?"

“जी, हमें इस घर के बारे में कुछ पूछना है? क्या हम अंदर आ सकते हैं?” शलाका ने बिल्कुल साफ हिंदी बोलते हुए कहा।

वह महिला एक विदेशी को इतनी साफ हिंदी बोलते देख खुश हो गई और उन्हें अंदर आने का इशारा किया।

शलाका और जेम्स घर के अंदर आ गये। घर अंदर से काफी सजा हुआ था। उस महिला ने दोनों को सोफे पर बैठने का इशारा किया और स्वयं सामने वाले सोफे पर बैठ गई।

“जी अब बताइये कि आप क्या कह रहीं थीं?” उस महिला ने शलाका से पूछा।

“जी क्षमा चाहती हूं, पर मैं कुछ भी बोलने से पहले आपका परिचय जानना चाहती हूं।” शलाका ने विनम्र शब्दों में निवेदन करते हुए पूछा।

"मेरा नाम शारदा है, मैं ही इस घर की मालकिन हूं।" शारदा ने कहा।

"शारदा जी आज से 30 वर्ष पहले इस मकान में हमारे पिताजी रहते थे। उन्हों ने अपना कुछ सामान, इस घर के तहखाने में रखा था, जिसका पता हमें कुछ दिनों पहले चला है, इसलिये हम यहां आये हैं।” शलाका ने साफ झूठ बोलते हुए कहा।

“जी, पर हमने तो यह मकान, सिर्फ 9 वर्ष पहले ही खरीदा है और इसमें कोई भी तहखाना नहीं है। इसके पहले तो इस मकान में शर्मा जी रहते थे, जो कि अपना सब कुछ बेचकर यहां से हमेशा-हमेशा के लिये अमेरिका चले गये।” शारदा ने कहा- “पर क्या मैं पूछ सकती हूं कि ऐसा क्या था यहां? जिसे आप 30 वर्ष बाद ढूंढने यहां आये हैं?”

“जी, वह काँच का एक अष्टकोण था, जो कि हमारे पिता की आखिरी निशानी था।” शलाका ने अभिनय करते हुए कहा- “पर अब तो उसका मिलना बिल्कुल असंभव ही है।"

शलाका का चेहरा रोने वाले अंदाज में बन गया, जिसे देख शारदा बोल उठी- “आप परेशान मत होइये, मैं आपको शर्मा जी का पता और फोन नंबर दे देती हूं। आप एक बार उनसे पूछ कर देख लीजिये, हो सकता है कि उन्हें कुछ पता हो उस अष्टकोण के बारे में?"

“ठीक है, आप उनका ही पता दे दीजिये, मैं उनसे मिलकर पूछ लूंगी।” शलाका ने खड़े होते हुए कहा" वैसे क्या मैं आपका अंदर वाला कमरा, एक बार देख सकती हूं?"

"हां पर इतने वर्षों के बाद अब उस कमरे में क्या मिलेगा आपको?" शारदा ने आश्चर्य से शलाका को देखते हुए कहा।

"मेरी माँ की यादें...वह उसी कमरे में रहती थीं।" अब तो शलाका ने झूठ बोलने की हद ही कर दी।

जेम्स, शलाका के अद्वितीय अभिनय को देख मन ही मन मुस्कुरा रहा था, पर वह अब भी सबके सामने अपने भावों को सामान्य किये शांति से बैठा था।

“जी हां आप अंदर वाला कमरा देख सकती हैं।” शारदा ने शलाका को अंदर जाने की इजाजत दे दी और उठकर स्वयं भी शलाका के साथ चलने लगीं।

एक सेकेण्ड से भी कम समय में, शलाका ने जेम्स को गहरे अंदाज में देखा।

जेम्स समझ गया कि शलाका नहीं चाहती कि शारदा उसके पीछे-पीछे उस कमरे में जाये, इसलिये वह तुरंत बोल उठा- “आप घर में अकेली ही रहती हैं क्या? मेरा मतलब है कि भाई साहब कहां काम करते हैं?" जेम्स को बोलता देख शारदा वापस से सोफे पर बैठ गई।

“मेरे पति का कपड़ों का व्यापार है, वह इस सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते हैं, इसलिये पूरा घर मुझे ही संभालना पड़ता है।"

शलाका, शारदा को बातों में फंसा देखकर तुरंत अंदर के कमरे में पहुंच गई। शलाका ने उस कमरे के कोण को देख महसूस कर लिया कि यह वही कमरा था, जिसमें उसने आर्यन को उस दिव्य बालक को छिपाते हुए देखा था।

“आर्ची, तुरंत मेरी आँखों में पृथ्वी से धातु ढूंढने वाला स्कैनर डालो।” शलाका ने आर्ची से कहा।

आर्ची ने तुरंत शलाका की आँख में स्कैनर डाल दिया। अब शलाका तेजी से पूरे कमरे की जमीन को स्कैन करके, उसके नीचे देखने लगी।

पर पूरे कमरे को स्कैन करने के बाद भी उसे जमीन में किसी प्रकार का धातु का कोई टुकड़ा नहीं दिखाई दिया।

“यहां पर अमरत्व की धातु वाली शीशी नहीं है, इसका साफ मतलब है कि किसी ने उस अष्टकोण से उस दिव्य बालक को निकाल लिया है?...अब...अब तो...शारदा से नंबर लेकर, एक बार शर्मा से भी बात करनी होगी, हो सकता है कि उसे अष्टकोण का पता हो?" यह सोच शलाका ने अपने चेहरे पर फिर से रोने वाले भाव लाये और वापस जेम्स के पास आ गई।

"अच्छा शारदा जी, आप वो शर्मा जी का पता और नंबर दे दीजिये....मैं एक बार उनसे बात करके भी देख लेती हूं।” शलाका ने शारदा की ओर देखते हुए कहा "वैसे शर्मा जी के घर में कौन-कौन है?"

"कौन...कौन....क्या? बस 3 ही लोग हैं उनके परिवार में शर्मा जी, उनकी पत्नि गायत्री और उनका बेटा देवोम।" शारदा ने पास की टेबल पर रखी अपनी डायरी उठाई और उसके पन्ने पलटकर शर्मा जी का नंबर ढूंढने लगी।

"उनके और बच्चे नहीं हैं क्या?" जेम्स ने शारदा को देखते हुए पूछा।

"और बच्चे?....अरे 50 वर्ष की उम्र में तो उन्हें बेटा हुआ था...अब उसके बाद और बच्चे कहां से आते?" शारदा ने एक पन्ने पर शर्मा जी का पता लिखते हुए कहा।

शारदा की बात सुन, इस बार शलाका का माथा ठनका।

"इस उम्र में बेटा?” शलाका ने आश्चर्यचकित होने का अभिनय किया।

"हां...कुछ लोग तो कहते हैं कि उनके बुढ़ापे को देख ईश्वर ने ही उनकी सुन ली...पर जो भी कहो....देवोम है बहुत कमाल का? बिल्कुल देवताओं सा तेज है उसके चेहरे पर इसीलिये तो शर्मा जी ने उसका नाम देवोम रखा था।...किसी ने सही कहा है, ईश्वर की माया अपरम्पार है।"

यह कहकर शारदा ने एक कागज शलाका की ओर बढ़ दिया, इस कागज में लिखा था “महेन्द्र शर्मा, 127B, 6 स्ट्रीट, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका” इसके बाद एक फोन नंबर दिया हुआ था।

"जी आपके सहयोग के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।” यह कहकर, शलाका ने वह कागज का टुकड़ा शारदा से ले लिया और जेम्स के साथ बाहर की ओर निकल गई।

जाने क्यों शलाका को विश्वास हो चला था कि देवोम ही वह दिव्य बालक है? अब वह तेजी से वापस रुद्र सागर की ओर चल दी।

“क्या अब हम न्यूयार्क जायेंगे?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“हां ! हम न्यूयार्क जायेंगे, पर अभी नहीं। अभी मुझे कुछ और काम निपटाने हैं। इसलिये पहले हमें वापस अंटार्कटिका चलना होगा।” शलाका ने अपना सिर हिलाते हुए कहा- “वैसे जब तक मैं उस दिव्य बालक को ढूंढ नहीं लेती, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी?"

“शलाका !" जेम्स ने एक जगह रुकते हुए कहा “आप तो देवी हो। हो सकता है कि आपको भूख ना लगती हो?"

जेम्स की बात सुन शलाका एक झटके से रुकी और पलटकर जेम्स को देखने लगी। फिर मुस्कुराकर, एक पास वाले रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गई।

जेम्स भी मुस्कुराकर शलाका के पीछे चल दिया।

जारी रहेगा_____✍️
Bahut hi badhiya update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and beautiful update....
 

Raj_sharma

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