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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट है सुयश के टैटू का तो राज खुल गया लेकिन एक और राज सामने आ गया सबकी हैप्पी न्यू ईयर की जगह bad न्यू ईयर हो गई शैफाली के पास एक सिक्का मिला है वह शैफाली के पास कौन व क्यों रख के गया है जिसका पता किसी को भी नहीं है अल्बर्ट के हिसाब से यह सिक्का अटलांटिस सभ्यता का है ये सच हो सकता है और शैफाली का उनके साथ कुछ तो संबंध हो सकता है???

James aur Wilmar ne Shalaka👸 aur uske bhaiyo 🦸‍♂️🦹‍♂️🦸‍♂️🦹‍♂️🦸‍♂️🦹‍♂️ 🦸‍♂️ ko jagaa diya. Lekin inaam ki jagah unhe sunehri qaid mili.. 😏

Yeha Mayavan mei ab Nayantara 🤩 ka kya mamla hai yaar.. bahut suspense hai yaar..
:cool3:

Awesome update

Badhiya update bhai

To Toffik hi tha jisne sab kiya tha lekin loren ko kyun mar diya usne wo to usse pyar karta tha na or bechari loren bhi uske pyar me andhi hoker uski baten man rahi thi or jis jenith se badla lena chahta tha use abhi tak jinda rakha ha usne usse pyar ka natak karta ja raha ha Jenith ki sab sachhai pata pad gayi ha dekhte han kab tak Toffik babu apni sachhai chhupa pate han waise bure karm ki saja milti hi ha or jis jagah ye sab han usse lagta ha jaise Aslam miya ko saja mili usi prakar Toffik ka bhi number lag sakta ha

चौदह वर्ष पूर्व कलिका - जो दिल्ली के एक मैग्जीन की संपादक थी - ने यक्षलोक के प्रहरी युवान के कठिन सवालों का जो जवाब दिया वह बिल्कुल महाभारत के एक प्रसंग ( युधिष्ठिर और यक्ष संवाद ) की तरह था ।
क्या ही कठिन सवाल थे और क्या ही अद्भुत जवाब थे ! यह सब कैसे कर लेते है आप शर्मा जी ! पहले तो दिमाग मे कठिन सवाल लाना और फिर उस सवाल का जवाब ढूंढना , यह कैसे कर लेते है आप !
यह वाकई मे अद्भुत था । इस अपडेट के लिए आप की जितनी तारीफ की जाए कम है ।

शायद सम्राट शिप से चौदह साल पहले जो शिप बरमूडा ट्राइंगल मे डुब गया था , उस शिप मे ही कलिका की बेटी सफर कर रही होगी । वह लड़की आकृति हो सकती है । वह आकृति जो शलाका का क्लोन धारण कर रखी है ।

दूसरी तरफ सामरा प्रदेश मे व्योम साहब पर कुदरत बहुत ही अधिक मेहरबान हो रखा है । वगैर मांगे छप्पर फाड़ कर कृपा बरसा रहा है । पहले अमृत की प्राप्ति हुई और अब राजकुमारी त्रिकाली का दिल उनपर धड़क गया है ।
मंदिर मे जिस तरह दोनो ने एक दूसरे को रक्षा सूत्र पहनाया , उससे लगता है यह रक्षा सूत्र नही विवाह सूत्र की प्रक्रिया थी ।


इन दो घटनाक्रम के बाद तीसरी तरफ कैस्पर का दिल भी मैग्ना पर मचल उठा है और खास यह है कि यह धड़कन हजारों वर्ष बाद हुआ है । लेकिन सवाल यह है कि मैग्ना है कहां !
कहीं शैफाली ही मैग्ना तो नही ! शैफाली कहीं मैग्ना का पुनर्जन्म तो नही !

कुकुरमुत्ता को छाते की तरह इस्तेमाल करते हुए सुयश साहब और उनकी टीम का तेजाबी बारिश से खुद को रक्षा करना एक और खुबसूरत अपडेट था । पांच लोग बचे हुए हैं और एलेक्स को मिला दिया जाए तो छ लोग । तौफिक साहब की जान जाते जाते बची , लेकिन लगता नही है यह साहब अधिक दिन तक जीवित रह पायेंगे ।
कुछ मिलाकर पांच प्राणी ही सम्राट शिप के जीवित बचेंगे , बशर्ते राइटर साहब ने कुछ खुराफाती न सोच रखा हो ।
ये मिश्रित पांडव जीवित रहने चाहिए पंडित जी ! :D

सभी अपडेट बेहद खुबसूरत थे ।
रोमांच से भरपूर ।
एक अलग तरह की कहानी , एक अद्भुत कहानी ।
और आउटस्टैंडिंग राइटिंग ।

अद्भुत अंक भाई

Nice update ...lambe gap ke karan thoda confusion hai kuch ...lekhak mahodaya ho sake to iska answer dijiyega ...
Gurutva shakti

Nice update....

Ab s
समझ आया आकृति के चेहरा नहीं बदल पाने के कारण.... इसलिए आर्यन भी जल्दी नहीं पहचान पाया उसको....


बहुत ही सुंदर अपडेट

Awesome update and nice story

अदभुद अकल्पनीय इससे अधिक शब्द नहीं हैं व्याख्यान के लिए

Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai,

Ye Ke-ishwar bhi ab had se jyada chalaki kar raha he.............

Vo nahi chahta ki suyash and party kabhi bhi tilsima bahar ja paye.......vo tilsima ke guards me emotions daal raha he

Jiske karan ab suyash and party ki musibat aur bhi jayda badhne vali he...........

Vyomaur Trikali ne mahavriksh ki pariksha bhi pass kar li...........

Lekin ye abhi ek practice match tha..............asli world cup final to abhi baaki he............

Keep rocking Bro

Nice intro 👏🏻 🎉

Aaj se padhna suru karungi.

यह अपडेट रोमांच, रहस्य और भावनाओं का एक बेहतरीन मिश्रण है। आपने कहानी को दो अलग-अलग कालखंडों में बांटकर इसे बहुत ही दिलचस्प बना दिया है।

झील के नीचे का दृश्य काफी विस्तृत और कल्पनाशील है। मिसगर्न मछली और समुद्री घोड़े के साथ शैफाली का लुका-छिपी का खेल और उसे पकड़ने के लिए लगाया गया उसका दिमाग कहानी में रोमांच पैदा कर रहा है।
जलपरी की मूर्ति, बैंगनी ड्रेस, राजदंड और त्रिशूल वाली जलपरियां एक जादुई माहौल तैयार करती हैं।😃

क्रिस्टी की गलती से सेन्टौर का जाग्रत होना और उसके बाद आया भूकंप कहानी में 'हाई-स्टेक' ड्रामा जोड़ता है। ऐलेक्स के शरीर में चट्टानों का समा जाना एक बड़ा रहस्य पैदा करता है कि क्या वह अब भी ऐलेक्स है या कुछ और बन चुका है।🤔

सुयश का 'कंटक' छूते ही बर्फ बन जाना एक ज़बरदस्त मोड़ है। अब सारी जिम्मेदारी शैफाली और तौफीक पर आ गई है।😎

सुयश का अतीत (Flashback: 1972) कहानी का यह हिस्सा सुयश के चरित्र की गहराई को दर्शाता है। 👍
अयोध्या की पृष्ठभूमि और सूर्यवंशी राजपूत होने का गर्व सुयश के व्यक्तित्व को एक ऐतिहासिक और राजसी आधार देता है।

सूर्य नारायण सिंह और नन्हे सुयश के बीच के संवाद बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। "कलेक्टर" और "कैप्टन" बनने वाली बातचीत बच्चों की मासूमियत को बखूबी दर्शाती है।

सुयश का पहाड़ी से गिरना और साक्षात सूर्यदेव द्वारा उसे बचाया जाना कहानी में 'सुपरनेचुरल' तत्व जोड़ता है। सूर्यदेव का उसे 'पुत्र' कहना यह संकेत देता है कि सुयश के पास कुछ विशेष दैवीय शक्तियां हो सकती हैं, जो शायद वर्तमान के इस संकट (बर्फ बनने वाली स्थिति) से उसे बाहर निकालेंगी।🤔

आपने हिंदी के सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग किया है। दृश्यों का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक के सामने एक फिल्म की तरह दृश्य चलने लगते हैं। विशेष रूप से बर्फ की गिरती चट्टानें और पानी के भीतर का तिलिस्म प्रभावी ढंग से लिखा गया है।:bow:

कुछ अनसुलझे सवाल (जो उत्सुकता बढ़ाते हैं)
* क्या ऐलेक्स अब इन चट्टानों की शक्ति को सोख रहा है?
* सुयश बर्फ बन गया है, तो क्या उसका 'सूर्यपुत्र' होना उसे पिघलाने में मदद करेगा?
* उस बैंगनी ड्रेस वाली परी के राजदंड में क्या राज है?
निष्कर्ष:
यह अपडेट कहानी को एक निर्णायक मोड़ पर ले आया है। एक तरफ वर्तमान की जानलेवा मुसीबत है और दूसरी तरफ सुयश के 'सूर्यपुत्र' होने का रहस्य। भाई वाह, मजा आ गया 👌🏻👌🏻👌🏻

Bhut hi jabardast update bhai
To albert bhi us terosor se bach gaya tha
Aage dhekte hai us patr ke jal aur us bracelet ka kya rahasya hai ye to aage pata chalega

Ab intezar rahega agle bhag ka jisme hame in sawalo ka jawab milega

Nice update💯
Dekhte hai Albert kya kya krta hai aage

Shaandar update

Bahut hi shaandar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....

Shandar update bhai

nice update

अच्छी बात यह है कि अल्बर्ट बच गया है और अपनी ख़ुराफ़ात जारी रख रहा है।
पढ़ कर ऐसा लगा कि सुपर कमाण्डो ध्रुव वाली एक बेहद पुरानी कहानी - 'आदमखोरों का स्वर्ग' जैसा कुछ होगा।
लेकिन निराशा हाथ लगी :) हा हा!

इस अपडेट से एक और बात सूझती है कि क्या पुराने 'मर गए' किरदार भी वापस आ सकते हैं?

इस अपडेट में इक्यावन प्रश्न हैं - इतने तो एग्जाम में भी नहीं हल किए।
लिहाज़ा प्रश्नों को पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाई मैंने।

अब तो सीधे अगले अपडेट में मिलेंगे जहाँ दिव्यास्त्रों की बातें होंगी - जैसे अभी कोई कम दिव्य शक्तियों की बातें हो रही थीं।
:tongue: :tongue: :tongue:

Lovely update.albert terosor se to Bach Gaya par kuwe me fans gaya. Apne khurafati dimag se devi ka pani aur bracelet pehenke dekha par koi natija nahi dikha par lagta hai aage jaake koi effect dikh jaaye ..
waise sawal to bahut bache hai jiska jikr kiya writer ne par aakhri panktiyan padhkar maja aa gaya.

Nice update....

रिव्यू की शुरुआत की जाए
इंटरेस्टिंग इंटरेस्टिंग

Raj_sharma
आर्केडिया यहाँ वो जगह थी जहाँ शलाका अपने भाइयों के साथ बर्फ़ में विश्राम कर रहे थे। आर्गस का कैरेक्टर किसने नोटिस नहीं किया, लेकिन अगर याद हो तो मैंने कहा था आर्गस से रिलेटेड कुछ आगे होने को है।

एक और जगह जहाँ मेरा ध्यान गया है वो है लिडिया भी आरियन गैलेक्सी से रिश्ता रखती हैं, यानी अटलांटिक और आरियन के संबंध न सिर्फ़ अलेना की वजह से जुड़े हैं बल्कि एटलस की वाइफ़ लिडिया की वजह से भी ये लोग संबंधी हैं।

अब देखा जाए तो आरियन और फोरेना दोनों अलग-अलग आकाशगंगा हैं। इसका मतलब अगर मेरा अनुमान सही जाता है तो एक आकाशगंगा के लोग शलाका के समर्थन में होना चाहिए। देखो मुझे अब लगने लगा है शलाका का रोल हम लोग अटलांटिक के संदर्भ में देखते थे लेकिन जिस तरह कहानी में मोड़ आ रहे हैं उससे ये लगता है शलाका का रोल हमें आकाशगंगा के लोगों के बीच में होना चाहिए।
क्योंकि कहानी की मुख्य नायिका शेफ्फाली है जो कि अटलांटिक क्षेत्र में भूमिका निभाएगी। दूसरी मुख्य नायिका शलाका है जो कि आकाशगंगा में। ऐसे में दोनों के बीच न्याय होगा, वरना शलाका अटलांटिक तक रहती तब उसका उद्देश्य इतना महत्वपूर्ण नज़र नहीं आता।

वैसे अब एक और लक्ष्य मुझे नज़र आता है वो है शलाका का आर्गस को ढूँढना कि वह कहाँ है। कहीं आर्गस के इन लोगों से संपर्क तोड़ने की वजह कुछ और तो नहीं, क्योंकि सिर्फ़ रहने की जगह निर्धारण में संबंध तोड़ना थोड़ा फ़िल्मी टाइप लगता है।

आगे देखना टाइटन (आरियन) बनाम एंडोरस (फोरेना) के लोग भी भिड़ेंगे एक-दूसरे से। यहाँ भी एक पक्ष अच्छाई के साथ तो दूसरा ग़लत के साथ मिलेगा।

(इनकी लड़ाई समय चक्र के लिए होने वाली है)
इसको बुकमार्क करना पड़ेगा, ये आगे मुझे फ़्लेक्स मारने में काम आएगा कि देखो मैंने क्या प्रेडिक्ट किया था।

वैसे किस्मत देखो जेम्स की एलियन स्पेस शिप उड़ाएगा, दूसरा विलमार बेचारा अब जानवरों वाली ज़िंदगी जीने वाला है।

वैसे मैं एक बात को लेकर कन्फ्यूज़ हूँ कि जो दिव्य जोड़ें हैं उन्हें एक-एक शक्ति मिली, इसका मतलब क्या? उदाहरण लें तो मयूर और धारा दोनों के पास एक तरह की कॉमन शक्तियाँ हैं, और सुयश और शलाका के पास अलग-अलग तरह की दो शक्तियाँ हैं, ऐसा ही ना? या सिर्फ़ इन दोनों की और भी शक्तियाँ उजागर होना बाकी हैं।

अब यहाँ एक पहले जो मुझे संदेह था जिसका मैंने ज़िक्र भी किया था कि अगर तत्व शक्ति शलाका के भाइयों के पास हैं तो वही शक्तियाँ दिव्य जोड़ें के पास कैसे और अग्नि, वायु का कहाँ रोल रहेगा ऐसे में खैर अब समझ आ गया क्या था वो।

आगे देखने में बहुत सी चीज़ें हुईं, सबसे बड़ी बात शीट हृतु तिलिस्म पूरा हुआ। एक समय लगा कि वो आँक गिर रहे हैं, कहीं इन लोगों का द एंड तो नहीं लिख दिया गया।

तिलिस्म की मुसीबत से बाहर निकलने की घटना रोचक थी। इस बार का तिलिस्म वाक़ई ख़तरनाक था, सच में मृगन मछली ने दिमाग़ खपा दिया।

लेकिन एक रोचक घटना ने मेरा ध्यान खींच लिया। वो जलपरी का शुरू में मुझे लगा सच में तिलिस्म से बाहर से कोई आ तो नहीं गया वो भी इतना जल्दी।

अब केश्वर को पहले हल्के में ले रहा था मैं, लेकिन मुझे लगता है केश्वर आगे चलकर बहुत बड़ा खलनायक बनेगा। केश्वर अगर एक प्राणी में भावना डाल सकता है तो वह भगवान ही बन गया एक तरह से। वो चाहे तो तिलिस्म में अपनी खुद की सेना तैयार कर दे।

एक बात कुछ अपडेट में ये भी सामने आई कि तिलिस्म से कुछ जीव बाहर भी गए। सोचो ऐसे अगर भावना वाले जीव तिलिस्म के बाहर चले गए तो आम लोगों का क्या हश्र होगा। इन जीवों के पास तो मैजिकल पावर्स भी हैं।

मुझे लगता है कहानी यहाँ से एक स्तर और ऊपर चली गई है, कहानी का स्केल अब एकदम ग्रैंड लग रहा है।

आगे चलते हैं।
त्रिकाली और व्योम का दृश्य बहुत समय के उपरांत आया है। शुरू में मुझे लगा क्या ये विधुम्न का अध्याय इतना जल्दी समाप्त हो गया, पर मैं ग़लत था। संदेह था ज़रूर यहाँ कि ऐसा कैसे इतना जल्दी, अभी तो बस झलकियाँ दिखीं, ऐसे में ख़त्म इतना जल्दी।

खैर महावृक्ष की प्रशिक्षण इतनी ख़तरनाक थी, विधुम्न कितने ख़तरनाक होने वाले हैं। वैसे भी उसे महादेव का वरदान प्राप्त है तो चुनौती और कठिन।
वैसे मुझे साइंस आती तो नहीं है लेकिन गुरुत्व आकर्षण के नियम ज़रूर समझ आए।

मुझे बस इस चीज़ का समझ नहीं आ रहा कि विधुम्न, त्रिशल, कालिका, व्योम ये लोग अटलांटिक से और स्टोरी के नज़रिए से कनेक्टेड कैसे होंगे, क्योंकि इनका रोल सिर्फ़ वो नीमा गुरुजी का बदला लेने तक तो सीमित नहीं होगा।

आगे मेरे लीजेंडरी प्रेडिक्शन “अल्बर्ट ज़िंदा है शायद” वाली कन्फर्म हो गई।

वैसे क्या पेच डाला है कि अल्बर्ट को पकड़ा ही नहीं पकड़ी तो उसकी जैकेट थी, और गिराया भी पेड़ पर मान गए गुरु।

अब ऐसे ही ब्रैंडन और ब्रूनो मिल जाएँ मज़ा आ जाए।
वैसे ये काली बिल्ली की देवी क्या चीज़ थी। उस द्रव्य में तो कुछ था या नहीं लेकिन उस ब्रैसलेट में ज़रूर कुछ पावर है। वैसे लगता तो नहीं अल्बर्ट काली बिल्ली बन जाएगा क्योंकि उसे लाया गया है मतलब आगे लंबा कुछ काम होगा, इसलिए जहाँ तक लगता है उसको बिल्ली वाली शक्ति मिली होगी, शायद बिल्ली का रूप धारण करने की शक्ति मिल गई।
वैसे अभी अल्बर्ट अगर मयावन में है मतलब वो सम्रा या सेनोर जा सकता है, क्योंकि मयावन तो ख़तरे से खाली नहीं है।

कुल मिलाकर अच्छा अपडेट था।
आगे की प्रतीक्षा।

Raj_sharma next update kab aaraha hain

God se related tha, isliye maine kuchh bhi nahi likha, baki apni story likhta hoon, isliye jyada bada review nahi likhta hoon, baki kisi din mood ban gaya toh 2k words ka review chhap dunga.

Nice update....

राज भाई आज बहुत दिनों बाद आया हूं फोरम पर
जल्द ही इस कथा के छूटे हुए सभी अध्याय पढ़ने को उत्सुक हूं

लेकिन समस्या वहीं पुरानी है
इस फोरम पर कोई पोस्ट पढ़ना और लिखना दोनों ही मुश्किलें भरे हैं redirect & unresponsive
इसी वजह से ना चाहते हुए भी पहले आना और कमेंट करना बन

राज भाई
सेक्स नहीं कहानी पढ़ने का शौक रहा है मेरा हमेशा से
सेक्स पढ़ने देखने की जरूरत सिर्फ कुछ नया, अनोखा, अलग जानने के लिए समझता हूं
आनन्द या मनोरंजन सेक्स लिखने, पढ़ने, सुनने या देखने से नहीं 'करने' में ही होता है

Besabari se intezaar rahega next update ka Raj_sharma bhai....

Bahut hee badhiya update diya hai!

बहुत ही रहस्यमय और रोमांचक मजेदार अपडेट है भाई मजा आ गया तो खेल खेल में अनजाने में लुफासा और वीनस को जीवशक्ती प्राप्त हो गई
बडा ही जबरदस्त अपडेट हैं

nice update
Update posted friends ✅
 

Raj_sharma

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Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
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kas1709

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“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


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“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।

“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।

“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
Awesome update and nice story.
 

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चैपटर-12
ग्रीष्म ऋतु-2:
(तिलिस्मा 4.2)

सुयश सहित सभी लोग 41 नंबर पर खड़े थे। 50 नंबर पर यूरेनस ग्रह चक्कर लगा रहा था।

41 से 50 के बीच बहुत ही गर्म सा कोई द्रव भरा हुआ नजर आ रहा था, जिसमें 41 वाली साइड एक नाव खड़ी थी।

“यह तो कोई आसान सा कार्य लग रहा है, क्यों कि हमें उस पार जाने के लिये पानी में एक बोट भी दी गई है।” ऐलेक्स ने कहा।

“तिलिस्मा में कोई कार्य आसान नहीं है।” क्रिस्टी ने उस बोट को देखते हुए कहा- “जरुर कैश्वर ने इस कार्य में भी कोई ना कोई पेंच डाल रखा होगा?”

तभी उस द्रव से धुंए की एक लकीर उठी और उसने हवा में एक नयी कविता लिख दी-
“जिसमें रहती उसी को खाए,
फिर भी नाव को पार लगाये।”

“अब इस पहेली का क्या मतलब हुआ?” जेनिथ ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा।

कुछ देर तक सभी इस पहेली का मतलब समझने की कोशिश करते रहे, परंतु जब काफी देर तक किसी को कुछ समझ में नहीं आया, तो तौफीक बोल उठा- “मुझे नहीं लगता कि हमें अभी इतना दिमाग लगाने की जरुरत है कैप्टेन....अगर हमारे सामने एक नाव खड़ी है, जो इस गर्म द्रव से बचाकर हमें उस पार पहुंचा सकती है, तो पहले हमें उसमें बैठकर उस पार पहुंचने की कोशिश करनी चाहिये, अगर हमें कोई परेशानी आती है, तब हमको इतना सोचना चाहिये, बिना पानी में उतरे, हम कुछ खास सोच नहीं पायेंगे, क्यों कि हमें पता ही नहीं है कि हमें सोचना क्या है?”

तौफीक की बात सभी को सही लगी, इसलिये सभी उतर कर नाव में बैठ गये।

नाव के दोनों ओर बैठने की लिये सीट लगीं थीं। सभी उन सीटों पर बैठ गये।

नाव में एक 2 फुट का धातु का पैन (किचन में कार्य में लाया जाने वाला एक बर्तन) रखा था, जिसे तौफीक ने चप्पू समझ हाथ में उठा लिया, पर जब तौफीक ने पैन को उस द्रव में डालकर नाव को चलाने की कोशिश की, तो वह पैन उस नाव को हिला भी नहीं पाया।

“कैप्टेन यह तो बहुत ही गाढ़ा द्रव है, हम इस अकेले पैन से इस नाव को नहीं चला सकते।” तौफीक ने सुयश को देखते हुए कहा- “ऊपर से यह गर्म बहुत दिख रहा है, ऐसे में हम इसमें हाथ भी नहीं डाल सकते, तो फिर हम इस नाव को चलायेंगे कैसे?”

“तुमने कहा तो था तौफीक कि नाव में बैठने के बाद ही हमें असली समस्या का पता चलेगा, लो अब पता चल गयी असली समस्या। असली समस्या इस नाव को चलाने की है।” सुयश ने कहा- “अब हमें एक बार फिर ध्यान से इस नाव को उस पहेली से मैच कराना होगा, तभी इस समस्या से हमें छुटकारा मिलेगा।”

“कैप्टेन अंकल, बाहर जो द्रव दिखाई दे रहा है, मैं बहुत देर से उसे पहचानने की कोशिश कर रही हूं, अब मुझे उसकी गंध से पता चल गया कि वह द्रव असल में मोम है।”

“मोम????” मोम शब्द सुनते ही अचानक से सुयश को झटका लगा, अब वह कुछ सोच में पड़ गया।

कुछ देर सोचते रहने के बाद सुयश नाव की सीट से खड़ा हुआ और ध्यान से उस नाव का अगला हिस्सा देखने लगा। नाव का अगला हिस्सा देखने के बाद सुयश ने तौफीक के हाथ से वह पैन ले लिया और उसे देखने लगा।

पैन को देखने के बाद अब सुयश के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई और वह बोला- “मिल गया इस पहेली का हल।”

सुयश की बात सुन सभी सुयश की ओर देखने लगे।

“इस पहेली की पहली पंक्ति हैं कि ‘जिसमें रहती उसी को खाए’ यानि की मोमबत्ती का धागा.....मोमबत्ती का धागा, जिसमें रहता है, उसी को खाता है, पहेली की दूसरी पंक्ति है “फिर भी नाव को पार लगाये’ यानि
की हम इस नाव को मोमबत्ती से चला सकते हैं।” सुयश ने कहा।

“मोमबत्ती से?” क्रिस्टी आश्चर्य से सुयश का चेहरा देखने लगी- “मोमबत्ती से नाव कैसे चलेगी कैप्टेन?”

“चलेगी।....लगता है कि तुमने अपने बचपन में ‘पॉप-पॉप बोट’ नहीं चलाई है क्रिस्टी।” सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा - “पॉप-पॉप बोट को हम मोमबत्ती के द्वारा भाप बनाकर चलाते थे।....रुको मैं तुम्हें यह करके दिखाता हूं।”

“मैं आपकी बात समझ गया कैप्टेन।” तौफीक ने सुयश को देखते हुए कहा- “मैंने बचपन में यह बोट चलाई है, पर आप यह बताइये कि हमारे पास ना तो यहां मोमबत्ती में लगाने वाला कोई धागा है और ना ही आग.... फिर हम मोमबत्ती बनायेंगे कैसे?”

“बताने की जगह मैं करके दिखाता हूं।” यह कहकर सुयश ने पैन को उस द्रव में डालकर उसे मोम से भर लिया।

मोम अभी गीला था, यह देखकर सुयश ने अपनी जेब से वह डोरी निकाल ली, जो खोपड़ी की माला में बंधी थी, उस डोरी को अभी तक सुयश ने फेंका नहीं था।

सुयश ने उस डोरी को उस पैन के एक किनारे पर द्रव में डाल दिया। कुछ ही देर में मोम सूख गया। अब वह पैन एक मोमबत्ती का रुप धारण कर चुका था।

सुयश ने अपने बैग से अब 2 पत्थरों को निकाला और उन्हें रगड़ कर उनसे आग बना ली। सुयश ने इस आग से मोमबत्ती रुपी पैन को जला लिया और उसे नाव के अगले भाग में रख दिया।

कुछ ही देर में नाव के पीछे मौजूद पाइप से ‘फट्-फट्’ की आवाज निकलने लगी और नाव सभी को लेकर दूसरी दिशा की ओर चल दी।

दूसरी दिशा से कुछ पहले ही सुयश ने पैन को नाव से हटा दिया, जिससे नाव उन सभी को दूसरी ओर पहुंचा कर बंद हो गई। सभी उतरकर 50 नंबर पर खड़े हो गये।

“वाह! यह कार्य तो कैप्टेन के रहते आसान बन गया।” क्रिस्टी ने सुयश की तारीफ करते हुए कहा- “पर ये बताइये कैप्टेन, कि आपने यह पत्थर कब अपने बैग में रख लिये। क्यों कि जब अलबर्ट सर ने हमें आग से बचाया था, उस समय तो हमारे पास कुछ जलाने के लिये था ही नहीं। तभी अलबर्ट सर ने अपने चश्में से आग जलाई थी।”

“बस उसी घटना के बाद से मुझे समझ आ गया था कि आग की जरुरत हमें कहीं भी पड़ सकती है, इसलिये मैंने रास्ते में एक जगह से यह 2 पत्थर उठा लिये थे।” सुयश ने कहा।

“पर कैप्टेन, नाव तो लकड़ी की थी, फिर आपके आग लगाने से वह जली क्यों नहीं?” जेनिथ ने पूछा।

“पूरी नाव लकड़ी की थी, पर नाव का आगे का ऊपरी हिस्सा टिन से बना था, पर वह टिन का रंग लकड़ी की भांति था, मैंने सबसे पहले यही तो चेक किया था और उस टिन के हिस्से से 2 पतली धातु की पाइप नाव के पिछले हिस्से की ओर जा रही थी। बस इसी को देख मैं पहेली का मतलब समझ गया था।” सुयश ने कहा।

“पर एक बात कमाल की है कैप्टेन।” ऐलेक्स ने कहा- “आपने जो खोपड़ी की माला का धागा अभी तक बचा कर रखा था, कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह तिलिस्मा में कहीं हमारे काम भी आ सकता है।”

“मैंने जबसे यह सुना था कि तिलिस्मा में कोई चमत्कारी शक्ति काम नहीं करेगी, तभी से हर छोटी से छोटी चीज को अपने बैग में जमा करना शुरु कर दिया था। क्यों कि मुझे पता है कि हर छोटी से छोटी चीज कभी तो काम आती है।” सुयश ने सभी को देखते हुए जवाब दिया।

“आप इतनी छोटी से छोटी चीज पर ध्यान कैसे दे लेते हैं कैप्टेन?” तौफीक ने सुयश से सवाल किया।

“सुयश, शायद इतनी छोटी से छोटी चीज पर कभी ध्यान नहीं देता, पर आर्यन ने तो अपनी जिंदगी के 10 बहुमूल्य वर्ष, वेदालय में यही सब तो किया था, माना कि अभी यादें थोड़ी धुंधली हैं, पर हैं तो मेरे ही दिमाग
में।” सुयश ने अतीत काल में एक डुबकी लगाते हुए जवाब दिया।

सभी अब 51 नंबर पर जाकर खड़े हो गये। 60 नंबर पर शनि ग्रह नाचता दिखाई दे रहा था।

51 से 60 के बीच में लावा फैला हुआ दिखाई दे रहा था। वहां पर पास में 2 लंबे से धातु के पतले खंभे रखे थे, जिनके ऊपर के सिरे पर लगभग, 4 फुट की ऊंचाई पर एक छोटा सा बेस बना था।

देखने पर वह खंभे किसी सर्कस के जोकर वाले खंभे दिख रहे थे, जो कि जोकर अपने पैर में बांधकर चलने के लिये प्रयोग में लाते हैं।

“यह खंभे तो स्टिल्ट वॉकिंग के लिये प्रयोग किये जाते हैं” जेनिथ ने कहा- “आज के समय में बहुत से देशों में स्टिल्ट वॉकिंग की प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं।”

एक बार फिर सभी को हवा में लावे से लिखी 2 पंक्तियां दिखाई दीं।
“आगे चलो तो मंजिल भागे,
उल्टा चलो आ जाओ आगे।”

“लगता है कि इस बार इन खंभों के माध्यम से हमें उस पार जाना होगा।” ऐलेक्स ने कहा- “अब ये कार्य हममें से कौन आसानी से कर सकता है?”

ऐलेक्स की बात सुनते ही सभी की निगाहें स्वतः ही क्रिस्टी की ओर चलीं गईं क्यों कि ऐसे कार्य में तो वही सिद्धहस्त थी।

सभी को अपनी ओर देखते पाकर क्रिस्टी ने उन खंभों को उठाकर उनके वजन का अंदाजा लगाया और एक खंभे को लावे में डालकर देखा। पता नहीं वह खंभा किस धातु का बना था? कि लावे में डालने पर भी उस खंभे का कुछ नहीं हुआ?

अब क्रिस्टी ने दूसरा खंभा भी लावे में डाल दिया और उछलकर एक खंभे पर अपना बांया पैर रख लिया, क्रिस्टी ने दूसरे खंभे को भी अपने हाथों से नहीं छोड़ा था।

एक खंभे पर अपने शरीर का बैंलेस बनाने के बाद क्रिस्टी ने अपना दाहिना पैर दूसरे खंभे पर रख दिया।

अब क्रिस्टी के दोनों पैर 2 खंभों पर थे और वह पूरी तरह से उन दोनों खंभों के सहारे खड़ी थी।
क्रिस्टी ने अब अपना बांया पैर धीरे से हवा में उठा कर उस खंभे को आगे बढ़ाया।

एक बार अच्छी तरह से बैंलेस बन जाने के बाद अब क्रिस्टी ने अपना दाहिना पैर हवा में उठाकर दाहिनी ओर वाले खंभे को भी आगे बढ़ाया। इस प्रकार क्रिस्टी किसी सर्कस के अभ्यस्त जोकर की तरह आगे बढ़ने लगी।

तभी क्रिस्टी को वह दोनों खंभे धीरे-धीरे गर्म होते हुए महसूस हुए, पर मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं थी इसलिये क्रिस्टी लगातार आगे बढ़ती रही।

अब क्रिस्टी की दूरी 60 नंबर से मात्र 15 फुट ही बची थी, क्रिस्टी ने फिर से अपने पैर को आगे बढ़ाया, क्रिस्टी के आगे बढ़ने के बाद अब उस दूरी को घट जाना चाहिये था, पर आश्चर्यजनक तरीके से वह दूरी घटी ही नहीं।

यह देख क्रिस्टी आश्चर्य से भर उठी। उसने फिर से अपना पैर आगे बढ़ाया, पर क्रिस्टी को एक बार फिर दूरी उतनी ही दिखाई दी।

“कैप्टेन, कुछ गड़बड़ है, मैं बार-बार आगे बढ़ रही हूं, पर मैं जितना आगे बढ़ती हूं, मेरे सामने की दूरी उतनी ही मुझसे दूर जा रही है।” क्रिस्टी ने घबरा कर कहा- “इधर मेरे हाथ में मौजूद खंभे भी लावे की वजह से लगातार गर्म होते जा रहे हैं, अगर यही कुछ देर तक चलता रहा तो मैं इस कार्य को पूरा नहीं कर पाऊंगी।”

“मुझे पहले ही पता था कि कुछ ना कुछ गड़बड़ तो होगी ही।” सुयश ने चिल्लाकर कहा- “हमें उन कविता की पंक्तियों को ही ध्यान से समझना होगा, उन्हीं पंक्तियों में ही इस पहेली का राज छिपा होगा?”

“कैप्टेन इन कविता की पंक्तियों के हिसाब से तो मुझे इन खंभो के साथ उल्टा चलना होगा, पर उल्टा चलकर इन खंभों पर बैंलेस बनाना कैसे संभव है?” क्रिस्टी ने कहा।

“तुम कर सकती हो क्रिस्टी ” ऐलेक्स ने चीखकर क्रिस्टी का हौसला बढ़ाया- “तुम हममें से सबसे अलग हो इसी लिये तिलिस्मा ने तुम्हें चुना है, मुझे पता है कि तुम यह कर सकती हो। अब अपने डर को छोड़ो और जल्दी कोशिश करो, नहीं तो यह लावा तुम्हारे खंभे के द्वारा तुम्हारा हाथ जलाना शुरु कर देगा, फिर यह कार्य बिल्कुल असंभव हो जायेगा।”

क्रिस्टी ने ऐलेक्स के शब्दों को सुना और धीरे-धीरे अपना बैलेंस बनाकर मुड़ गयी।

अब क्रिस्टी की नजरें ऐलेक्स से मिलीं और क्रिस्टी के चेहरे पर एक विश्वास की झलक दिखने लगी।

क्रिस्टी ने धीरे-धीरे अपना एक कदम पीछे की ओर बढ़ाया, क्रिस्टी का यह प्रयास सफल रहा, अब क्रिस्टी की दूरी मात्र 10 फुट ही पीछे की ओर बची थी।

पर अब खंभे इतने ज्यादा गर्म हो गये थे कि क्रिस्टी का उसे पकड़े रह पाना असंभव हो गया। अतः क्रिस्टी ने उन खंभों को अपने हाथ से छोड़ दिया।

अब क्रिस्टी बिना किसी सपोर्ट के उन खंभों पर खड़ी थी। क्रिस्टी ने ऐलेक्स को देख नजरें मिलायीं और मुस्कुरा कर अपना शरीर पीछे की ओर गिरा दिया।

यह देख ऐलेक्स के मुंह से चीख निकल गई- “क्रिस्टी ऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!”

क्रिस्टी का शरीर अनियंत्रित हो कर पीछे की ओर गिरने लगा, पर....पर क्रिस्टी का शरीर लावे में नहीं बल्कि 60 नंबर पर जाकर गिरा क्यों कि क्रिस्टी की दूरी भी 10 फुट बची थी और जमीन से क्रिस्टी की ऊंचाई 11 फुट थी।

क्रिस्टी उठकर खड़ी हो गई और मुस्कुराकर ऐलेक्स की ओर देखने लगी। तभी लावे के ऊपर पुल बन गया और ऐलेक्स भागकर आकर क्रिस्टी से लिपट गया।

“यह तुमने क्या किया था पागल?” ऐलेक्स ने क्रिस्टी को गले से लगाते हुए कहा - “अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

“अरे कैसे हो जाता, मैंने पीछे की दूरी को भांप लिया था और जानबूझकर यह किया था।” क्रिस्टी ने कहा।

“चलो भाई, इन लोगों का मिलन तो चलता रहेगा, हम लोग 61 नंबर पर चलते हैं।” जेनिथ ने दोनों को देख मुस्कुरा कर कहा।

जेनिथ की बात सुनकर दोनों अलग हो गये, पर ऐलेक्स और क्रिस्टी की निगाहें अभी भी एक दूसरे की ओर ही थीं, और उन निगाहों में प्यार का अहसास भी था और दूसरे के प्रति चिंता भी।

कुछ देर बाद सभी 61 नंबर पर खड़े थे। 70 नंबर पर बृहस्पति ग्रह मौजूद था।

61 से 70 नंबर के बीच पूरे रास्ते में 12 इंच लंबे, नुकीले काँटे निकले थे और 61 नंबर के पास पतली लकड़ियों से निर्मित एक सप्तकोण टंगा था।

तभी हवा में फिर एक पहेली लिखी हुई उभरी-
“सात को अठ्ठारह में बांटें,
खत्म करें रास्ते के काँटे।”

“यह किन 7 को 18 में बांटने की बात कर रहा है?” जेनिथ ने दिमाग लगाते हुए कहा- “हम लोग भी नक्षत्रा को मिलाकर 7 ही हैं, कहीं यह हमें बांटने की बात तो नहीं कर रहा?”

“नहीं जेनिथ दीदी, वहां देखिये वह सप्तकोण भी 7 लकड़ी की एक बराबर तीलियों से बना है, मुझे लग रहा है कि कैश्वर इन्हीं तीलियों से कुछ करने को कह रहा है।” शैफाली ने जेनिथ को सप्तकोण दिखाते हुए कहा।

“अगर सप्तकोण की बात हो रही है, तो इसको बांटने के लिये तो इसे तोड़ना होगा।” ऐलेक्स ने कहा।

ऐलेक्स की बात सुन सुयश ने सप्तकोण को उतार लिया, पर जैसे ही सुयश ने सप्तकोण को उतारा, उसकी एक-एक तीलियां जमीन पर बिखर कर अलग हो गईं।

अब शैफाली ध्यान से उन तीलियों को देखने लगी। काफी देर तक देखते रहने के बाद शैफाली ने एक गहरी साँस भरी और जमीन से उठकर खड़ी हो गई।

“क्या हुआ शैफाली?” सुयश ने शैफाली को उठते देख पूछ लिया- “कुछ समझ में आया क्या?”

“कैप्टेन अंकल, मैं आपसे एक प्रश्न पूछती हूं, जो कि मैं अपने स्कूल में अपने सभी दोस्तो से पूछा करती थी।” शैफाली ने सुयश की बात का जवाब दिये बिना उल्टा एक सवाल ही कर दिया।

पर सुयश शैफाली के तर्कों से अच्छी तरह से परिचित था, इसलिये उसने मुस्कुराकर अपना सिर हां के अंदाज में हिला दिया।

सुयश को हां करते देख शैफाली ने बोलना शुरु कर दिया- “कैप्टेन, एक छत पर 30 कबूतर बैठे हैं। आपको उन सभी को 7 बार में उड़ाना है, शर्त यह है कि आपको हर बार विषम संख्या में ही कबूतर को उड़ाना होगा, तो क्या आप बता सकते है कि किस बार में कितने कबूतर आप उड़ायेंगे?”

शैफाली के प्रश्न को सुनकर सभी लोग कबूतर उड़ाने में लग गये, उधर शैफाली अपनी पहेली को सुलझाने लगी।

अजीब सा माहौल था, तिलिस्म के अंदर भी शैफाली ने सबको काम पकड़ा दिया था। लगभग 10 मिनट के बाद शैफाली की आँखें, किसी कारण से चमक उठीं।

उधर सभी अभी तक कबूतर उड़ाने में ही लगे थे।

“आप लोगों से नहीं हो पा रहा होगा, चलिये मैं आपको अपनी पहेली का उत्तर बताती हूं।” शैफाली के यह कहते ही, सभी कबूतर उड़ाना छोड़ शैफाली की ओर देखने लगे।

“कैप्टेन अंकल दरअसल मैंने आपसे जो प्रश्न किया था, उसका कोई उत्तर नहीं है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा - “असल में गणित में 7 विषम अंको के जोड़ का उत्तर कभी ‘सम’ हो ही नहीं सकता, जबकि 30 एक सम संख्या है।”

यह सुनकर ऐलेक्स ने शैफाली के कान पकड़ लिये- “शैतान लड़की ! जब इसका उत्तर था ही नहीं, तो तुमने हम लोगों से यह प्रश्न ही क्यों पूछा? हम लोग बेवकूफों की तरह से तबसे इसका उत्तर ढूंढ रहे हैं।”

“अरे मैं यही तो आप लोगों को समझाना चाह रही थी कि 7 लकड़ियों को कभी भी तोड़कर 18 में नहीं बांट सकते?” शैफाली ने ऐलेक्स के हाथों से अपना कान छुड़ाते हुए कहा।

“तो क्या कैश्वर भी हमें बेवकूफ बना रहा था?” तौफीक ने मुस्कुराते हुए शैफाली से पूछा।

“नहीं...वह हमें बेवकूफ नहीं बना रहा था, बस इस पहेली का उत्तर जरा अलग ढंग से देने के लिये कह रहा था।”

यह कहकर शैफाली ने उन 7 लकड़ियों से रोमन अंको में 18 लिख दिया। (रोमन अंक- XVIII)
इसी के साथ वहां बने काँटें जमीन में समा गये और सभी चलते हुए 70 नंबर को पार कर 71 पर आ गये।


जारी रहेगा_____✍️
बहुत ही शानदार लाजवाब और रोमांच से भरपूर अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
सुयश और टीम अपनी सुझबुज और एकता के साथ धीरे धीरे ही सही पर तिलिस्मा के एक एक कठीनाईयाॅं पार करतें हुए आगे बढ रहें हैं
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
 
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