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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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#178.

काली बिल्ली:
(5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।
नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।


प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-
“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................


कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,
लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,
जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।

दोस्तों आप सबके सपोर्ट और रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट है सुयश के टैटू का तो राज खुल गया लेकिन एक और राज सामने आ गया सबकी हैप्पी न्यू ईयर की जगह bad न्यू ईयर हो गई शैफाली के पास एक सिक्का मिला है वह शैफाली के पास कौन व क्यों रख के गया है जिसका पता किसी को भी नहीं है अल्बर्ट के हिसाब से यह सिक्का अटलांटिस सभ्यता का है ये सच हो सकता है और शैफाली का उनके साथ कुछ तो संबंध हो सकता है???

I don't know ,aap padhakar batana kaisi lagi ,

Badhiya update bhai

To Toffik hi tha jisne sab kiya tha lekin loren ko kyun mar diya usne wo to usse pyar karta tha na or bechari loren bhi uske pyar me andhi hoker uski baten man rahi thi or jis jenith se badla lena chahta tha use abhi tak jinda rakha ha usne usse pyar ka natak karta ja raha ha Jenith ki sab sachhai pata pad gayi ha dekhte han kab tak Toffik babu apni sachhai chhupa pate han waise bure karm ki saja milti hi ha or jis jagah ye sab han usse lagta ha jaise Aslam miya ko saja mili usi prakar Toffik ka bhi number lag sakta ha

moka hi nahi mil raha kuchh v pardne ka😞

उचित समय आने पर, अवश्य ही

चौदह वर्ष पूर्व कलिका - जो दिल्ली के एक मैग्जीन की संपादक थी - ने यक्षलोक के प्रहरी युवान के कठिन सवालों का जो जवाब दिया वह बिल्कुल महाभारत के एक प्रसंग ( युधिष्ठिर और यक्ष संवाद ) की तरह था ।
क्या ही कठिन सवाल थे और क्या ही अद्भुत जवाब थे ! यह सब कैसे कर लेते है आप शर्मा जी ! पहले तो दिमाग मे कठिन सवाल लाना और फिर उस सवाल का जवाब ढूंढना , यह कैसे कर लेते है आप !
यह वाकई मे अद्भुत था । इस अपडेट के लिए आप की जितनी तारीफ की जाए कम है ।

शायद सम्राट शिप से चौदह साल पहले जो शिप बरमूडा ट्राइंगल मे डुब गया था , उस शिप मे ही कलिका की बेटी सफर कर रही होगी । वह लड़की आकृति हो सकती है । वह आकृति जो शलाका का क्लोन धारण कर रखी है ।

दूसरी तरफ सामरा प्रदेश मे व्योम साहब पर कुदरत बहुत ही अधिक मेहरबान हो रखा है । वगैर मांगे छप्पर फाड़ कर कृपा बरसा रहा है । पहले अमृत की प्राप्ति हुई और अब राजकुमारी त्रिकाली का दिल उनपर धड़क गया है ।
मंदिर मे जिस तरह दोनो ने एक दूसरे को रक्षा सूत्र पहनाया , उससे लगता है यह रक्षा सूत्र नही विवाह सूत्र की प्रक्रिया थी ।


इन दो घटनाक्रम के बाद तीसरी तरफ कैस्पर का दिल भी मैग्ना पर मचल उठा है और खास यह है कि यह धड़कन हजारों वर्ष बाद हुआ है । लेकिन सवाल यह है कि मैग्ना है कहां !
कहीं शैफाली ही मैग्ना तो नही ! शैफाली कहीं मैग्ना का पुनर्जन्म तो नही !

कुकुरमुत्ता को छाते की तरह इस्तेमाल करते हुए सुयश साहब और उनकी टीम का तेजाबी बारिश से खुद को रक्षा करना एक और खुबसूरत अपडेट था । पांच लोग बचे हुए हैं और एलेक्स को मिला दिया जाए तो छ लोग । तौफिक साहब की जान जाते जाते बची , लेकिन लगता नही है यह साहब अधिक दिन तक जीवित रह पायेंगे ।
कुछ मिलाकर पांच प्राणी ही सम्राट शिप के जीवित बचेंगे , बशर्ते राइटर साहब ने कुछ खुराफाती न सोच रखा हो ।
ये मिश्रित पांडव जीवित रहने चाहिए पंडित जी ! :D

सभी अपडेट बेहद खुबसूरत थे ।
रोमांच से भरपूर ।
एक अलग तरह की कहानी , एक अद्भुत कहानी ।
और आउटस्टैंडिंग राइटिंग ।

Esa bhi kyaa yaad aa gaya

अद्भुत अंक भाई

Raj_sharma bhai next update kab tak aayega?

फिर से एक अप्रतिम रोमांचक और अद्भुत अविस्मरणीय मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अब स्टॅचू ऑफ लिबर्टी की मुर्ती पर तिलिस्मा का नया खेल शुरु हो गया
खैर देखते हैं आगे
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा

Maza aa gya bhai

Nice update ...lambe gap ke karan thoda confusion hai kuch ...lekhak mahodaya ho sake to iska answer dijiyega ...
Gurutva shakti

Nice update....

Ab s
समझ आया आकृति के चेहरा नहीं बदल पाने के कारण.... इसलिए आर्यन भी जल्दी नहीं पहचान पाया उसको....


बहुत ही सुंदर अपडेट

Awesome update and nice story

Nice update....

बहुत ही उम्दा और लाजवाब अपडेट चल रहा है तिलिस्म का !

To aakhir neelabh ji mil gaye, maha prabhu ki tapasya kar rahe hain, and power gain kar rahe hain, taaki divyastra sambhaal sake 🙄 ab udhar shefaali and Suyash kya Alex ko sahi kar payenge? Ya fir gadha ... mera matlab hai ki ghoda hi bana rahega😁? Awesome update again bhai, 👌🏻👌🏻

अदभुद अकल्पनीय इससे अधिक शब्द नहीं हैं व्याख्यान के लिए

Nice update....

रिव्यू की शुरुआत की जाए

मुझे अब तिलिस्म कुछ लंबे फ़ील हो रहे हैं, मेरा मतलब ये है कि हृतु का तिलिस्म इतना लंबा चला गया कि, पतझड़, ग्रीष्म और अब सर्दियों से सामना है हमारा। मैं तो भूल ही गया कि तिलिस्मी दुनिया कितनी अपडेट हो गई है, शायद अपडेट बड़े होने की वजह से भी ये महसूस हो रहा है।

आगे आते हैं, मिट्टी वाले भाग में, सुयश की सूझबूझ ने सॉल्व कर लिया।

भैया जी, किसी दिन अच्छे से धुलाई पक्की है तुम्हारी, क्या करते हो यार। लगा कि जेनिथ को मार दिया, मतलब सिचुएशन ऐसे बना रहे हो कि लोगों को लगे कि आज इसका नंबर है, कल उसका नंबर है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल मुझे अब बताओ, वो कौन था जिसने जेनिथ को बचाया ,क्या वो ओरस हैं, जो कि मल्टीवर्स के समय का राजा है? मुख्य बात ये संभव कैसे? अगर नक्षत्र समय को नियंत्रित कर सकता है, तो ओरस नक्षत्र को होना चाहिए।

क्या यह संभव है कि नक्षत्र सिर्फ़ ओरस की शक्तियों को धारण करने का एक यंत्र है देखो, ओरस के अलावा मुझे नहीं लगता वो कुछ और हो सकता है।
एक ख़तरनाक विचार आ रहा है मन में क्या मकोटा और एंडोर्स लोग तिलिस्म तोड़कर उसमें जाकर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं कहीं उन्हीं में से कुछ लोग सफल तो नहीं हो गए?

लेकिन जो सोच रहे होगे कि आज क्या पीकर आया है, जो सिर-पैर की बात कर रहा है अगर ऐसा होता तो सुयश और बाकी लोगों को मार नहीं दिया जाता क्या?

इसका जवाब भी है मेरे पास। तिलिस्म को तोड़ने की शर्त है कि तिलिस्म आम मनुष्य ही तोड़ सकते हैं, तो ऐसे में दुश्मन खेमा इंतज़ार करेगा कि काला मोती के समीप पहुँचने तक।

अगर ऐसा हो गया तो मज़ा आ जाएगा तिलिस्म के चैलेंज के साथ दूसरी चुनौतियाँ, एक नया दृष्टिकोण मिल जाएगा।

(वैसे ऐसा होने की संभावना कम है)

आगे न्यूज़ीलैंड में पहुँच गए हैं, लेकिन यहाँ का सीनारियो मुझे समझ नहीं आया सेंटोर का।
अश्व मानव भी था, किसी की पूँछ सही करनी है तो किसी की आँख।

लेकिन वो मुख्य बात नहीं है। मुख्य बात है सुयश और एलेक्स का बर्फ़ में फँसना, क्योंकि अब क्या रास्ता बचा है कि किससे दोनों उस मुसीबत से बाहर आएँगे।

साथ ही मेरी चिंता तब बढ़ गई जब सुयश का बालपन दिखा। एक समय लगा कि सुयश को निपटा रहे हैं, इसलिए उसका बालपन दिखाया।

लेकिन मुझे कुछ ऐसा लग रहा है कि ये तिलिस्म से सुयश को बर्फ़ से बाहर निकालने का उपाय उसके बचपन में रखा है। सूर्य में तेज रहता है और सुयश में खुद भगवान सूर्य अंश मात्रा शक्तियाँ हैं, तो ऐसे में सुयश अगर अपने अंदर की ऊर्जा का इस्तेमाल करे बाहर निकलने के लिए, तो आसानी होगी तिलिस्म तोड़ने में।

पर मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि अगर उसके पास सूर्य नारायण की शक्तियाँ हैं, तो वो आम मनुष्य कैसे हुआ? ये बात शेफाली पर भी लागू होती है।
मुझे लग रहा है कि सुयश के अतीत में कुछ ऐसा है, जिसको शायद मैं अभी समझ नहीं पाया। कुछ ऐसी गहराइयाँ जो आगे चलकर काम आएँगी।
वैसे मुझे सुयश का बालपन का सीन काफ़ी पसंद आया है, बिल्कुल सुंदर, सजीव।

वैसे एक कितनी रिसर्च की है कि उस समय कोका-कोला नहीं, कैम्पा कोला ही चलती थी। बाबा जी, हैट्स ऑफ़, कितना डिटेल्स का ध्यान रखते हो।
मैं होता तो इतना सोचता नहीं, लिख देता कोका-कोला। कहा पब्लिक को इतना पता है कि उस समय क्या चलता था।

अब आते हैं हनुका और गुरु नीलाभ के सीन पर।
सबसे पहले, तालियाँ बजाई जाएँ, क्योंकि अगर लेखक महोदय चाहते तो गुरु नीलाभ का निवास स्थान एक गुफ़ा को भी बता सकते थे, लेकिन उस जगह को एक अलग रूप देने के लिए अनोखा तरीका अपनाया।

साथ ही किसी जगह को इमैजिनेशन का फ़ीलिंग देना भी एक कला है, जो कि उस समय भली-भांति दी गई थी। पूरा आस-पास का वातावरण इमैजिन करा दिया।

मुझे अब लगता है कि हनुका के ज़रिये हमें कुछ महत्वपूर्ण ज्ञात हुआ है। गुरु नीलाभ आखिर कहानी में क्यों इतना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, वो अब धीरे-धीरे समझ आ रहा है।

विश्वास से परे है कि एक जन सिर्फ़ 5000 साल से इसलिए तपस्या कर रहा है ताकि कुछ क्षण के लिए ईश्वर की शक्ति धारण कर सके। मामला कितना सीरियस है, इससे मुझे समझ भी आ गया है।
वैसे नीलाभ और माया के बारे में और विस्तार से लिखा है जू ने, बस एक बार उसको पढ़ना पड़ेगा, शायद आगे कुछ काम आए।

रक्त बीज इसको लेकर जू, मानोगे नहीं, मैंने इसके बारे में रिसर्च की। क्योंकि थोड़ा बहुत मैंने इसके बारे में सुन रखा था।

मुझे एक बात पता चली, जितना मैंने समझा है
रक्त बीज में इंसान के अंदर ऊर्जा का संचार होता है। इसे धारण करने वाला थोड़ा उग्र हो जाता है। रक्त बीज की शक्ति का आना ये भी दर्शाता है कि मामला अब करुणा और शांति से उठ चुका है।

मुझे एक और बात पता चली इसे अंत और आरंभ का संकेत भी कहा जाता है।

कुल मिलाकर अच्छा जा रहा है।
बस तिलिस्म में मुझे जिस धमाके का इंतज़ार है, वो हो जाए।
आगे की प्रतीक्षा।


Raj_sharma

Mast update

Shandar update bhai
Vyom aur trikali ne mahavarksh ki pariksha pass kar li hai

Bahut hi badhiya update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and beautiful update....

Mind blowing update💯💯

Romanchak update.mahavriksh ki pariksha me pass ho gaya vyom.vidhyumna se kaise padhna hoga vyom ko iski jhalak mahavriksh ne vyom ko dikha di .vyom ko bhi pata chal gaya ki dushman se ladhte huye use kis baat ka dhyan rakhna hai.
trikali khush huyi ye jaankar ki uski pasand ekdam sahi hai .ab himalay me jakar vidhyumna ka saamna kaise karte hai dono .

nice update

Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai,

Ye Ke-ishwar bhi ab had se jyada chalaki kar raha he.............

Vo nahi chahta ki suyash and party kabhi bhi tilsima bahar ja paye.......vo tilsima ke guards me emotions daal raha he

Jiske karan ab suyash and party ki musibat aur bhi jayda badhne vali he...........

Vyomaur Trikali ne mahavriksh ki pariksha bhi pass kar li...........

Lekin ye abhi ek practice match tha..............asli world cup final to abhi baaki he............

Keep rocking Bro

#173
सुना तो था कि दर्द नापने का कोई तरीक़ा है, लेकिन पढ़ा यहीं। वाह भाई। 👍
बैंगनी रंग की पोशाक पहना हुआ योद्धा - मतलब केश्वर के प्रोग्राम में कोई वायरस घुस आया है भाई!
अब आया न्यूज़ीलैंड -- अपना वाला देश! ;)

#174
जो नहीं जानते, उनके लिए बता दूँ कि सागरमाथा का नेपाली भाषा में अर्थ है “आकाश में उठा हुआ शीश” और यह शब्द वो माउंट एवरेस्ट के लिए इस्तेमाल करते हैं। कहने का मतलब है, हनुका जी माउंट एवरेस्ट पर हैं।
स्साला -- भैंगा सेन्टॉर ने ग़दर मचा दी! 😂 😂 😂 😂

#175
ये वाला तो ऐक्वामैन फिल्म से प्रभावित लगता है! जलपरियाँ, त्रिशूल… हा हा हा! 😂😂
… अरे बाबा! ये तो ‘बर्फ़ की चिता’ जैसा मामला है।

“कैम्पा कोला” -- भाई वाह! ये सुयश तो अपनी उम्र का लगता है। ♥️
सुयश और सूर्य नारायण का सूर्यदेव के साथ सम्बन्ध थोड़ा थोड़ा पता चला।

भाई - आप ‘भगवान, मंदिर, देवता, ईश्वर, महादेव, गणेश, इत्यादि’ शब्द लिखने में “..” न इस्तेमाल किया करें।
अगर किसी को इन शब्दों पर आपत्ति है, या किसी की भावनाएँ आहत होने लगीं, तो उनको हम जैसे पाठकों से संवाद करना पड़ेगा।
सूतियापे की सीमा होती है। आप चिंता न करें। 👍

#176
शलाका की कहानी का रिकैप हो गया और कुछ नई बातें भी पता चलीं। बढ़िया है।

शेफ़ाली ने सेन्टॉर का अंत भस्मासुर की ही तरह कर दिया।
अरे भाई! केश्वर के प्रपंच में पहले वो “बैंगनी” रंग की पोषक पहना हुआ महायोद्धा, और अब ये “बैंगनी” रंग की पोशाक वाली परी! उसके पहले बैंगनी रंग की तितली जो नन्हे सुयश से मिली, और वापस वही तितली परी ने भी पैदा कर दी। भाई, केश्वर का इलाज लगता है बैंगन से ही होने वाला है। ससुरे को बैंगन का भरता खिलाओ! अकल ठिकाने आ जाएगी उसकी! हा हा हा हा! 😂😂😂

लेकिन शायद नहीं। तिलिस्म के ‘जीव’ अब सेंटिनल हो रहे हैं। गज़ब का चक्र है न : अर्द्ध-ईश कैस्पर ने AI केश्वर को बनाया -- केश्वर सेंटिनल हो गया -- केश्वर ने तिलिस्मा और उसके जीवों को बनाया -- तिलिस्मा के जीवों में भावनाएँ आने लगी हैं और वो भी सेंटिनल हो गए!


भाई - न्यूज़ीलैंड की बाधा तो कठिन रही।

#177
ई ल्यो -- त्रिकाली और व्योम का हनीमून होने के बजाए “माँ की आँख”होने लगा यहाँ तो! हा हा हा हा! 😂😂😂
भाई, जल की बूंदो से कोई “जल”ता नहीं, भीगता है! :tongue:

“तुम्हें अपनी शक्तियों के बारे में शत्रु को कभी नहीं बताना है, भले ही वह तुम्हारी कितनी भी तारीफ करते हुए पूछे” -- यह एक अच्छी सीख है।

लगभग तीन सप्ताह बाद इस कहानी पर वापस आया। और भाई, बढ़िया गति पकड़ ली है कहानी ने। केश्वर के भ्रमजाल का अंत निकट है। लेकिन पराशक्तियों का खतरा अभी भी पूरी तरह से समझ में नहीं आया। बेहद विस्तृत कथा होने के कारण अचानक से पात्रों को याद कर पाना कठिन हो जाता है। लेकिन फिर भी कोशिश यही है कि सब याद रखा जा सके।

पुनः, बहुत ही अच्छा लगा पढ़ कर। दो तीन कथाएँ ही शेष हैं इस फोरम पर - नहीं तो क्या ही है!
आप श्रम करते रहें। अब शायद लगातार साथ रहेंगे आपके 🙂

2 din mein 😁

Lajawab update bro, ye scene bahut dino se intezaar tha, khair abhi ye scene pura nahi hua hai, let's see ye topic kab tak end hota hai.

Update posted friends :declare:
 

dil_he_dil_main

Royal 🤴
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#175.

“पर कैसे? समुद्री घोड़ा तो अपना काम करके वापस झील में चला गया है।” सुयश ने कहा- “अब इतने बर्फ जैसे पानी में जाकर कौन उसे ढूंढ पायेगा?”

“मैं स्वयं जाऊंगी।” शैफाली ने दृढ़ता से कहा- “मैं इसके पहले भी पेंग्विन के पीछे बर्फ में गई थी, उस समय मुझ पर बर्फ की ठंडक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।”

यह सुनकर सुयश ने अपना सिर हिलाकर शैफाली को झील के अंदर जाने की इजाजत दे दी।

सुयश की इजाजत मिलते ही शैफाली ने अपने जूते बाहर उतारे और उसी रास्ते से झील के अंदर दाखिल हो गई, जिस रास्ते से वह समुद्री घोड़ा बाहर आया था।

सच में शैफाली को बर्फ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह आसानी से इतने ठंडे पानी में तैर रही थी।

झील में प्रवेश करते ही शैफाली ने एक डुबकी मारी और पानी के अंदर अपनी नजरें घुमाना शुरु कर दिया। शैफाली को अब कुछ दूरी पर एक खूबसूरत परी की एक मूर्ति दिखाई दी।

यह मूर्ति पानी में एक स्थान पर खड़ी थी। यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी।

परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी। उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था।

उस परी के चारो ओर कुछ जलपरियां, अपने हाथ में त्रिशूल लेकर घूम रहीं थीं।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस जलपरी की रक्षा कर रहीं हों या फिर उसकी परिक्रमा लगा रहीं हों। पर उन्होंने शैफाली से कुछ नहीं कहा।

“यह तो पानी के नीचे भी कोई तिलिस्म बना है?” शैफाली ने अपने मन में सोचा- “लगता है उस परी के हाथ में जो राजदण्ड है, उसमें अवश्य ही इस द्वार का कोई राज है, पर पहले मुझे वह कार्य कर लेना चाहिये, जिसके लिये मैं इस स्थान पर आयी हूं।”

अब शैफाली परी को छोड़कर उस समुद्री घोड़े को ढूंढने लगी। कुछ ही देर में शैफाली की निगाह में वह समुद्री घोड़ा आ गया, जो कि मिसगर्न मछली के बीच छिपकर पानी में तैर रहा था।

शैफाली उस समुद्री घोड़े की ओर बढ़ गयी। समुद्री घोड़े के पास पहुंचकर शैफाली ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर शैफाली के आगे बढ़ते ही वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

पहले प्रयास में शैफाली नाकाम रही। शैफाली ने फिर से पानी में आगे बढ़कर उस समुद्री घोड़े को पकड़ने की कोशिश की, पर इस बार भी वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

अब यह सिलसिला शुरु हो गया था, जब भी शैफाली आगे बढ़ती, वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो जाता।
यह देख शैफाली ने तेजी से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।

तभी शैफाली की नजर उस समुद्री घोड़े के आगे-पीछे घूम रही मिस गर्न मछली की ओर गई।

अब शैफाली के दिमाग में एक आइडिया आ गया था। शैफाली इस बार ध्यान से समुद्री घोड़े को देखती रही, जैसे ही एक मिसगर्न मछली, उस समुद्री घोड़े के ठीक पीछे पहुंची, शैफाली ने ठीक उसी समय पर, समुद्री घोड़े की ओर छलांग लगा दी।

हर बार की तरह इस बार भी समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे जाने के लिये बढ़ा, पर वह पीछे जा नहीं पाया और मिसगर्न मछली से टकराकर वहीं रह गया।

तभी शैफाली ने झपटते हुए उस समुद्री घोड़े को पकड़ लिया। अब शैफाली ने उसकी आँखों को देखा।

समुद्री घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशा में थीं, जिसे शैफाली ने अपने हाथों से सही कर दिया और इसके बाद उस समुद्री घोड़े को वहीं झील के पानी में छोड़, वह झील की सतह की ओर चल दी।

झील की सतह पर सभी बेसब्री से शैफाली के आने का इंतजार कर रहे थे। पानी से शैफाली का चेहरा निकलते देख सभी खुश हो गये।

शैफाली ने अपना सिर हिलाकर सभी को काम पूरा होने की खबर दे दी।

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी ने एक नजर ऐलेक्स की ओर डाली, ऐलेक्स अब अपने रुप में तो वापस आ गया था, पर वह अब भी बर्फ की
मूर्ति बना दिखाई दे रहा था।

“ये ऐलेक्स तो अब बर्फ का बन गया, अब इसे बर्फ से कैसे सही करें?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए कहा- “हो ना हो इस सेन्टौर में ही कोई चक्कर है, इसी की वजह से ऐलेक्स अभी तक सही नहीं हुआ है।” यह कहकर क्रिस्टी उस सेन्टौर के पास जाकर उसकी मूर्ति को जगह-जगह से हिलाकर देखने लगी।

क्रिस्टी से किसी को ऐसी आशा नहीं थी, इसलिये सभी उसे ऐसा करने से रोकने के लिये भागे।

सभी जानते थे कि क्रिस्टी की एक गलत हरकत उन्हें हमेशा के लिये इस तिलिस्म में कैद कर सकती है।

तभी क्रिस्टी के मूर्ति के हिलाने की वजह से सेन्टौर के हाथ में पकड़ा कंटक जमीन पर गिर गया और इसी के साथ सबके सामने एक मुसीबत और खड़ी हो गई।

सेन्टौर जीवित हो गया था और सबको खूनी नजरों से देख रहा था।

“हो गया काम तमाम, बड़ी मुश्किल से अभी उस समुद्री घोड़े से बचे थे, अब यह सेन्टौर जाग गया।” तौफीक ने क्रिस्टी पर नाराज होते हुए कहा।

क्रिस्टी एक पल में ही अपनी गलती को समझ गयी, पर अब क्या हो सकता था? तभी उस सेन्टौर ने अपने पैर को बर्फ की जमीन पर जोर से पटका, उसके ऐसा करने से एक जोर की आवाज हुई और इसी के साथ झील में मौजूद मिसगर्न मछलियां तेजी से गति करने लगीं।

यह देख शैफाली ने चीखकर सबको आगाह करते हुए कहा- “सब लोग सावधान हो जाओ, भूकंप आने वाला है।” तभी पूरी बर्फ की धरती हिलने लगी और बर्फ के उस हिस्से में मौजूद ऊंची चट्टानें गिरना शुरु हो गईं।

सभी किसी प्रकार उन चट्टानों से बचने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक बड़ी चट्टान ऐलेक्स की ओर गिरने लगी, यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।

इतने कम समय में कोई भी ऐलेक्स को बचा नहीं सकता था। जोर से गड़गड़ाती वह चट्टान ऐलेक्स के ऊपर आकर गिरी, पर तभी एक चमत्कार हुआ, वह भारी चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराकर उसमें
समा गई।

“यह बर्फ की चट्टान ऐलेक्स के शरीर के अंदर कैसे चली गई।” जेनिथ ने आश्चर्य से ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।

तभी एक और चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराई, इसका हस्र भी पहले वाली चट्टान के जैसा हुआ, वह चट्टान भी ऐलेक्स के शरीर में समा गई।

यह देख सुयश ने सबसे चिल्लाकर कहा- “सभी लोग ऐलेक्स के शरीर की ओट में छिप जाओ, नहीं तो यह गिरती हुई चट्टानें हमें पीस देंगी।”

सुयश की बात सुन सभी ऐलेक्स की ओर भागे और उसके पीछे जाकर छिप गये।

ऐलेक्स के आसपास बहुत सी चट्टानें गिर रहीं थीं, परंतु समय पर सुयश का दिमाग काम करने की वजह से सभी सुरक्षित थे।

उधर जोर-जोर से सेन्टौर के पैर पटकने की वजह से झील की बहुत सी मछलियां उछलकर झील के बाहर आ गईं थीं।

“कैप्टेन, हमें जल्द से जल्द इस सेन्टौर का इलाज करना होगा, नहीं तो यह हमें चुटकियों में मसल देगा।” क्रिस्टी ने गुस्साये हुए सेन्टौर की ओर देखते हुए कहा।

तभी तौफीक की निगाह सेन्टौर के गिरे अस्त्र कंटक पर गई। उसे देखकर तौफीक बोला- “अगर सेन्टौर का यह अस्त्र भी हमारे हाथ लग जाये तो कुछ देर तक तो इससे बचा ही जा सकता है? पर वह भी कमबख्त बिल्कुल उसके बगल में ही गिरा पड़ा है।”

तौफीक की बात सुन शैफाली की आँखें सिकुड़ गईं- “कैप्टेन अंकल, कंटक तो सेन्टौर के बगल में ही गिरा पड़ा है, तो फिर यह सेन्टौर उसे उठा क्यों नहीं रहा? उसे उठाने के बाद तो यह और विनाश कर सकता है।”

“इसी कंटक के इसके हाथ से निकलने के बाद ही तो यह जिंदा हुआ था।” क्रिस्टी ने कहा।

“इसका मतलब यदि हम इस कंटक को दोबारा से इसके हाथ में पकड़ा दें, तो यह सेन्टौर फिर से बर्फ का बन सकता है।” शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “तौफीक, तुम इस सेन्टौर का ध्यान भटकाकर उसे दूसरी दिशा में ले जाओ, तब तक मैं इस कंटक को उठा लूंगा।”

सुयश की बात सुनकर तौफीक ने अपना सिर हिलाया और ऐलेक्स की ओ से बाहर निकल, सेन्टौर से कुछ दूरी पर जाकर दौड़ने लगा।

सामने तौफीक को दौड़ते देख सेन्टौर तौफीक की ओर चल दिया। जैसे ही सेन्टौर का चेहरा दूसरी ओर हुआ, सुयश तेजी से कंटक की ओर भागा।

एक पल में ही सुयश कंटक के पास पहुंच गया, मगर जैसे ही सुयश ने कंटक को उठाया, वह भी बर्फ की मूर्ति में परिवर्तित हो गया।

यह देख शैफाली और तौफीक दोनों ही आश्चर्य से भर उठे। अब दोनों के पास कोई और तरीका नहीं बचा था।


सूर्यपुत्र:
(30 वर्ष पहले.....जनवरी,1972, प्रातः काल, अयोध्या, भारत)

“दादा जी, आप हमेशा बंदूक लेकर क्यों चलते हो?” नन्हें सुयश ने अपने दादा सूर्य नारायण सिंह को सम्बोधित करते हुए पूछा- “क्या आपको बहुत डर लगता है?”

सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

“नहीं हमें डर नहीं लगता, यह हम अपने वंश की शान के लिये, अपने साथ लेकर चलते हैं। हम सूर्यवंशी राजपूत हैं, मेरे दादा जी तो हाथ में तलवार लेकर चलते थे। अंग्रेज भी उन्हें देख थर-थर कांपते थे, पर अब
समय बदलने के साथ तलवारों का चलन खत्म हो गया और तलवारों का स्थान इस अग्नि मारक बंदूक ने ले लिया।”

सुयश से बात करते-करते सूर्य नारायण सिंह, घर के आंगन में खड़ी एक खुली जीप में बैठ गये और सुयश को उन्होंने अपने बगल में बैठा लिया।

“मैं जब बड़ा होऊंगा, तो अपने हाथ में तलवार ही लेकर चलूंगा, बंदूक तो डाकू लोग चलाते हैं।” नन्हें सुयश ने अपने दिल के उद्गार प्रकट किये।

“अच्छा-अच्छा छोटे युवराज, आप तलवार लेकर ही चलना, पर वादा करो कि कुलदेवता के मंदिर में पूजा के समय, आज आप मुझे तंग नहीं करोगे।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आपको नहीं परेशान करुंगा, पर आप भी वादा करो कि वापस आने के बाद आप मुझे कैम्पा कोला पिलाओगे।” सुयश ने अपनी जुबान से चटकारा लगाते हुए कहा।

“ठीक है, मैं वादा करता हूं।” सूर्य नारायण सिंह ने अपनी हथेली को सुयश की नन्हीं हथेली से टकराते हुए कहा।

तभी दूसरी जीप में कुछ महिलाएं पूजा की थाली और कुछ पूजा की सामग्री लेकर बैठने लगीं।

“अरे अभय, तुम अपनी जीप चलाओ, बाकी लोग पीछे से आते रहेंगे। अगर हम थोड़ा जल्दी भी मंदिर पहुंच गये, तो कोई परेशानी की बात नहीं।” सूर्य नारायण सिंह ने जीप के ड्राइवर से कहा।

“जी मालिक।” सूर्य नारायण सिंह की बात सुन ड्राइवर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

“अच्छा दादा जी, आप ये बताओ कि आज आप रात को मुझे कौन सी कहानी सुनाओगे?” सुयश ने अपने दादा जी से पूछा।

“मैं....मैं आज तुम्हारी सबसे प्रिय यति और उड़ने वाले घोड़े की कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के गाल खींचते हुए कहा।

“नहीं दादा जी आज मुझे भगवान सूर्य की कहानी सुननी है।....वह कहानी सुने बहुत दिन बीत गये।” सुयश ने अपने दिमाग के कोनों को खंगालते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आज तुम्हें अपने कुल -देवता भग…न सूर्य की ही कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

रास्ते भर सुयश ऐसे ही अपने दादा जी से कुछ ना कुछ पूछता रहा। आधा घंटे के ड्राइव के बाद आखिर कुलदेवता का मंदिर आ ही गया।

अभय ने जीप को मंदिर के प्रांगण के बाहर ही रोक दिया। सूर्य मंदिर एक पर्वत की चोटी पर बना था। सुयश अपने दादा जी के साथ मंदिर के प्रांगण में आ गया।

मंदिर के मुख्य द्वार पर 7 घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्यदेव की मूर्ति लगी थी। शिखर पर सूर्य के मुख की ज्वाला उगलती आकृति बनी थी।

“अरे दादा जी यह आकृति तो बिल्कुल वैसी ही है, जैसी आपके दाहिने हाथ की कलाई पर बनी है।” सुयश ने आश्चर्य से दादा जी की कलाई देखते हुए कहा।

“हां बेटा, यह हमारे कुलदेवता का चिन्ह है, जिसे मैंने अपनी कलाई पर बनवा लिया था। क्या यह चिन्ह आपको पसंद है?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश से पूछा।

“हां दादा जी मुझे यह चिन्ह बहुत पसंद है, मैं एक दिन यही चिन्ह अपनी पूरी पीठ पर बनवाऊंगा।” सुयश ने दादा जी के हाथ पर बने सूर्य चिन्ह को अपनी नन्हीं हथेली से सहलाते हुए कहा।

“ठीक है, जब तुम बड़े होकर कलेक्टर बन जाओगे, तो मैं यह सूर्य चिन्ह तुम्हारे पीठ पर बनवा दूंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने चारो ओर फैले पर्वतों को देखते हुए कहा।

“कलेक्टर? ये कलेक्टर क्या होता है दादा जी?” सुयश ने पूछा।

“कलेक्टर पूरे जिले का सबसे बड़ा ऑफिसर होता है।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश की ओर देखते हुए जवाब दिया।

“नहीं-नहीं दादा जी, मैं कलेक्टर नहीं बनूंगा, मैं तो एक बहुत बड़े से पानी के जहाज का कप्तान बनूंगा और समुद्र की विशाल लहरों में अपना जहाज लेकर घूमूंगा।” सुयश ने अपनी कल्पना को उड़ान देते हुए कहा।

“अरे वाह, छोटे युवराज, आपकी सोच तो कमाल की है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपनी गोद में उठा लिया और चलते हुए मंदिर के प्रांगण के किनारे आ गये।

उस स्थान से उगते हुए सूर्यदेव बिल्कुल साफ नजर आ रहे थे। सूर्य की लालिमा प्रकाश का रुप ले, संपूर्ण आभा मंडल को दैदीप्यमान कर रही थी।

तभी मंदिर का एक पंडित अपने हाथ में 2 तांबे के लोटे में, जल लेकर आ गया। एक तांबे का लोटा थोड़ा छोटा था, जो कि निश्चित ही सुयश के लिये था।

“चलो बेटा, अब सूर्य को अर्घ्य दो, पर ध्यान रहे, यह पात्र तुम्हारे दोनों हाथों में सिर से ऊपर की ऊंचाई पर होना चाहिये और जल की धार टूटनी नहीं चाहिये। इस प्रकार करने से सूर्य की पहली जीवन दायिनी किरण स्वच्छ जल को पारकर हमारे शरीर से टकराती है और हमें सभी प्रकार के रोग से मुक्त करती है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने छोटा लोटा सुयश की ओर पकड़ा दिया और बड़े लोटे से स्वयं सूर्य को अर्घ्य देने लगे।

सुयश ने भी अपने दादा जी को देखते हुए ठीक उसी प्रकार से किया, जैसा कि दादा जी ने कहा था।

तभी दूसरी जीप भी आ गई। यह देखकर सूर्य नारायण सिंह ने सूर्य को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन लोगों की ओर बढ़ गये।

सूर्य नारायण सिंह ने अभय को सुयश का ध्यान रखने के कार्य पर लगा दिया।

दादा जी के जाने के बाद नन्हें सुयश ने भगवान सूर्य को देखा, सूर्य की लालिमा सुयश को बहुत भली लग रही थी।

धीरे-धीरे सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था, पर सुयश अभी भी अपनी नजरें सूर्य से नहीं हटा रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे सूर्य से सुयश का कोई बहुत गहरा रिश्ता हो।

तभी अचानक सुयश को सूर्य, बैंगनी रंग का होता दिखाई दिया। यह देख सुयश अचकचा गया, पर तभी सुयश को अपनी नाक पर बैठी एक नीले रंग की खूबसूरत सी तितली दिखाई दी।

उसी तितली के पंखों की वजह से सुयश को सूर्य का रंग बदलता हुआ दिखा था।

सुयश ने अपने हाथों से उस तितली को पकड़ने की कोशिश की, पर वह तितली सुयश की नाक से उड़कर दूर चली गई।

उस तितली का रंग इतना प्यारा था, कि सुयश का ध्यान अब तितली की ओर आकृष्ट हो गया था।

सुयश अब मंदिर के प्रांगण में तितली के पीछे-पीछे भागकर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा।

उधर अभय को जीप में रखा एक पूजा का सामान याद आ गया, उसने एक बार सुयश को खेलते हुए देखा और फिर बाहर जीप में रखें सामान को लाने के लिये चला गया।

सुयश अभी भी तितली के पीछे-पीछे भाग रहा था। तितली कभी एक स्थान पर बैठती, तो कभी दूसरे स्थान पर।

इस बार तितली मंदिर के प्रांगण के किनारे लगे एक छोटे से पेड़ की शाख पर जा बैठी।

सुयश अपना हाथ बढ़कार तितली को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पर वह पेड़ की डाल सुयश के नन्हें हाथों से थोड़ा दूर थी, इसलिये सुयश ने अपना एक पैर मंदिर के प्रांगण की रेलिंग से बाहर निकाल लिया।

पर इससे पहले कि सुयश उस नीले रंग की तितली को पकड़ पाता, उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे की ओर गिरने लगा।

सुयश के मुंह से चीख निकल गई। तभी सूर्य की किरणों की चमक बढ़ गई और सुयश, बिना किसी सहारे के हवा में झूलने लगा।

उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सूर्य की किरणों से बने झूले पर बैठा हो।

नन्हें सुयश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सुयश को अपने सामने एक दिव्य प्रकाशपुंज स्वरुप एक पुरुष दिखाई दिया।

उसे देख सुयश ने पूछ ही लिया- “आप कौन हो?”

“मैं सूर्यदेव हूं।” सूर्यदेव ने कहा- “मैंने ही तुम्हें इस ऊंचे पर्वत से गिरने से बचाया है।”

“आपने मुझे क्यों बचाया?” सुयश के शब्दों में एक बालरस झलक रहा था।

“क्यों कि मैंने तुम्हें अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया है, फिर भला मैं तुम्हें मरने कैसे देता?” सूर्यदेव ने कहा।

“आप इतनी जल्दी उतनी ऊंचाई से मेरे पास कैसे आ गये?” सुयश ने सूर्यदेव की ओर देखते हुए पूछा।

“क्यों कि मेरी किरणों से तेज चलने वाली चीज अभी इस ब्रह्मांड में नहीं है।....अपना ध्यान रखना सुयश।” सूर्यदेव ने कहा और सुयश को उठाकर, मंदिर के प्रांगण के बाहर लगी घनी झाड़ियों पर बैठा दिया। इसी के साथ सूर्यदेव हवा में कहीं गायब हो गये।

उधर अभय जैसे ही मंदिर के प्रांगण में पहुंचा, उसे सुयश कहीं दिखाई नहीं दिया। घबराकर अभय ने मंदिर के प्रांगण के किनारे जाकर नीचे की ओर देखा।

नीचे की ओर देखते ही अभय की जान सूख गई क्यों कि सुयश इस समय नीचे एक झाड़ी में फंसा दिखाई दे रहा था।

अभय ने घबरा कर अपने चारो ओर देखा, पर उसे आसपास कोई नजर नहीं आया, यह देख अभय ने जल्दी से नीचे लटककर, सुयश का एक हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।

सुयश को सही सलामत देख अभय की जान में जान आयी, पर उसे यही डर था कि कहीं सुयश, सूर्य नारायण सिंह को यह सारी बात बता ना दे।

“देखो बेटा, तुम यह बात किसी को बताना नहीं, मैं तुम्हें ढेर सारी टॉफियां दूंगा।” अभय ने सुयश को फुसलाते हुए कहा।

टॉफियों की बात सुन सुयश तुरंत मान गया। 2 घंटे के बाद सभी पूजा करके वापस घर की ओर चल दिये।

“तुम्हें भगवान सूर्यदेव कैसे लगे सुयश?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपने से चिपटाते हुए पूछा।

“अच्छे लगे, पर जब उन्होंने मुझे गोद में उठाया, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुयश ने भोलेपन से कहा।

“अच्छा, तो भगवान सूर्य ने तुम्हें गोद में उठाकर क्या कहा?” सूर्य नारायण सिंह ने हंसते हुए पूछा।

“उन्होंने कहा कि वो मुझे ढेर सारी टॉफियां देंगे।.....नहीं-नहीं....ये तो अभय अंकल ने कहा था.....उन्होने कहा था.... उन्होने कहा था...... क्या दादा जी आपने तो सब भुलवा दिया?” सुयश ने कहा और दादा जी के सीने से चिपक गया।

“शैतान बच्चा, 2 मिनट में कहानियां बनाकर सुनाने लगता है।” सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह मुस्कुराए और फिर से सुयश के सिर पर हाथ फेरने लगे।

सुयश अब दादा जी से ऐसे चिपका था, जैसे कि वह सूर्य नारायण सिंह ना होकर साक्षात सूर्यदेव हों।


जारी रहेगा_____✍️

यह अपडेट रोमांच, रहस्य और भावनाओं का एक बेहतरीन मिश्रण है। आपने कहानी को दो अलग-अलग कालखंडों में बांटकर इसे बहुत ही दिलचस्प बना दिया है।

झील के नीचे का दृश्य काफी विस्तृत और कल्पनाशील है। मिसगर्न मछली और समुद्री घोड़े के साथ शैफाली का लुका-छिपी का खेल और उसे पकड़ने के लिए लगाया गया उसका दिमाग कहानी में रोमांच पैदा कर रहा है।
जलपरी की मूर्ति, बैंगनी ड्रेस, राजदंड और त्रिशूल वाली जलपरियां एक जादुई माहौल तैयार करती हैं।😃

क्रिस्टी की गलती से सेन्टौर का जाग्रत होना और उसके बाद आया भूकंप कहानी में 'हाई-स्टेक' ड्रामा जोड़ता है। ऐलेक्स के शरीर में चट्टानों का समा जाना एक बड़ा रहस्य पैदा करता है कि क्या वह अब भी ऐलेक्स है या कुछ और बन चुका है।🤔

सुयश का 'कंटक' छूते ही बर्फ बन जाना एक ज़बरदस्त मोड़ है। अब सारी जिम्मेदारी शैफाली और तौफीक पर आ गई है।😎

सुयश का अतीत (Flashback: 1972) कहानी का यह हिस्सा सुयश के चरित्र की गहराई को दर्शाता है। 👍
अयोध्या की पृष्ठभूमि और सूर्यवंशी राजपूत होने का गर्व सुयश के व्यक्तित्व को एक ऐतिहासिक और राजसी आधार देता है।

सूर्य नारायण सिंह और नन्हे सुयश के बीच के संवाद बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। "कलेक्टर" और "कैप्टन" बनने वाली बातचीत बच्चों की मासूमियत को बखूबी दर्शाती है।

सुयश का पहाड़ी से गिरना और साक्षात सूर्यदेव द्वारा उसे बचाया जाना कहानी में 'सुपरनेचुरल' तत्व जोड़ता है। सूर्यदेव का उसे 'पुत्र' कहना यह संकेत देता है कि सुयश के पास कुछ विशेष दैवीय शक्तियां हो सकती हैं, जो शायद वर्तमान के इस संकट (बर्फ बनने वाली स्थिति) से उसे बाहर निकालेंगी।🤔

आपने हिंदी के सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग किया है। दृश्यों का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक के सामने एक फिल्म की तरह दृश्य चलने लगते हैं। विशेष रूप से बर्फ की गिरती चट्टानें और पानी के भीतर का तिलिस्म प्रभावी ढंग से लिखा गया है।:bow:

कुछ अनसुलझे सवाल (जो उत्सुकता बढ़ाते हैं)
* क्या ऐलेक्स अब इन चट्टानों की शक्ति को सोख रहा है?
* सुयश बर्फ बन गया है, तो क्या उसका 'सूर्यपुत्र' होना उसे पिघलाने में मदद करेगा?
* उस बैंगनी ड्रेस वाली परी के राजदंड में क्या राज है?
निष्कर्ष:
यह अपडेट कहानी को एक निर्णायक मोड़ पर ले आया है। एक तरफ वर्तमान की जानलेवा मुसीबत है और दूसरी तरफ सुयश के 'सूर्यपुत्र' होने का रहस्य। भाई वाह, मजा आ गया 👌🏻👌🏻👌🏻
 

Dhakad boy

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#178.

काली बिल्ली:
(5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।
नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।


प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-
“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................


“कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,
लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,
जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।


दोस्तों आप सबके सपोर्ट और र रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
Bhut hi jabardast update bhai
To albert bhi us terosor se bach gaya tha
Aage dhekte hai us patr ke jal aur us bracelet ka kya rahasya hai ye to aage pata chalega

Ab intezar rahega agle bhag ka jisme hame in sawalo ka jawab milega
 

ak143

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78
#178.

काली बिल्ली:
(5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।
नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।


प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-
“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................


“कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,
लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,
जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।


दोस्तों आप सबके सपोर्ट और र रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
Nice update💯
Dekhte hai Albert kya kya krta hai aage
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#178.

काली बिल्ली:
(5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।
नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।


प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-
“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................


“कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,
लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,
जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।


दोस्तों आप सबके सपोर्ट और र रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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यह अपडेट रोमांच, रहस्य और भावनाओं का एक बेहतरीन मिश्रण है। आपने कहानी को दो अलग-अलग कालखंडों में बांटकर इसे बहुत ही दिलचस्प बना दिया है।

झील के नीचे का दृश्य काफी विस्तृत और कल्पनाशील है। मिसगर्न मछली और समुद्री घोड़े के साथ शैफाली का लुका-छिपी का खेल और उसे पकड़ने के लिए लगाया गया उसका दिमाग कहानी में रोमांच पैदा कर रहा है।
जलपरी की मूर्ति, बैंगनी ड्रेस, राजदंड और त्रिशूल वाली जलपरियां एक जादुई माहौल तैयार करती हैं।😃

क्रिस्टी की गलती से सेन्टौर का जाग्रत होना और उसके बाद आया भूकंप कहानी में 'हाई-स्टेक' ड्रामा जोड़ता है। ऐलेक्स के शरीर में चट्टानों का समा जाना एक बड़ा रहस्य पैदा करता है कि क्या वह अब भी ऐलेक्स है या कुछ और बन चुका है।🤔

सुयश का 'कंटक' छूते ही बर्फ बन जाना एक ज़बरदस्त मोड़ है। अब सारी जिम्मेदारी शैफाली और तौफीक पर आ गई है।😎

सुयश का अतीत (Flashback: 1972) कहानी का यह हिस्सा सुयश के चरित्र की गहराई को दर्शाता है। 👍
अयोध्या की पृष्ठभूमि और सूर्यवंशी राजपूत होने का गर्व सुयश के व्यक्तित्व को एक ऐतिहासिक और राजसी आधार देता है।

सूर्य नारायण सिंह और नन्हे सुयश के बीच के संवाद बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। "कलेक्टर" और "कैप्टन" बनने वाली बातचीत बच्चों की मासूमियत को बखूबी दर्शाती है।

सुयश का पहाड़ी से गिरना और साक्षात सूर्यदेव द्वारा उसे बचाया जाना कहानी में 'सुपरनेचुरल' तत्व जोड़ता है। सूर्यदेव का उसे 'पुत्र' कहना यह संकेत देता है कि सुयश के पास कुछ विशेष दैवीय शक्तियां हो सकती हैं, जो शायद वर्तमान के इस संकट (बर्फ बनने वाली स्थिति) से उसे बाहर निकालेंगी।🤔

आपने हिंदी के सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग किया है। दृश्यों का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक के सामने एक फिल्म की तरह दृश्य चलने लगते हैं। विशेष रूप से बर्फ की गिरती चट्टानें और पानी के भीतर का तिलिस्म प्रभावी ढंग से लिखा गया है।:bow:

कुछ अनसुलझे सवाल (जो उत्सुकता बढ़ाते हैं)
* क्या ऐलेक्स अब इन चट्टानों की शक्ति को सोख रहा है?
* सुयश बर्फ बन गया है, तो क्या उसका 'सूर्यपुत्र' होना उसे पिघलाने में मदद करेगा?
* उस बैंगनी ड्रेस वाली परी के राजदंड में क्या राज है?
निष्कर्ष:
यह अपडेट कहानी को एक निर्णायक मोड़ पर ले आया है। एक तरफ वर्तमान की जानलेवा मुसीबत है और दूसरी तरफ सुयश के 'सूर्यपुत्र' होने का रहस्य। भाई वाह, मजा आ गया 👌🏻👌🏻👌🏻
Thank you very much for your awesome review man, stay with us, keep reading 📚, aage ke update bhi post kar diye hain.:hug:
 
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काली बिल्ली:
(5 दिन पहले ...... 12.01.02, शनिवार, 11:30, सीनोर राज्य की सीमा, मायावन, अराका द्वीप)

विशाल टेरोसोर अलबर्ट को उठाये आसमान में उड़ा चला जा रहा था। नीचे कुछ नन्हें टेरोसोर आसमान की ओर अपना मुंह उठाये, उस विशाल टेरोसोर के पीछे-पीछे तेज आवाज करते भाग रहे थे।

अलबर्ट का ध्यान टेरोसोर पर कम और नीचे जमीन की ओर ज्यादा था। उसे ऊंचाई से नीचे गिरने का ज्यादा डर दिख रहा था।

अलबर्ट ने अब एक बार ऊपर टेरोसोर के मुंह की ओर देखा। टेरोसोर अपनी लंबी चोंच में पहले से ही किसी जानवर को पकड़े था।

अब अलबर्ट की नजर टेरोसोर के पंजों की ओर गई, तो अलबर्ट हैरान हो गया क्यों कि इस समय टेरोसोर के पंजों में अलबर्ट के शरीर का कोई हिस्सा नहीं था।

वह टेरोसोर अलबर्ट की जैकेट को अपने पंजे से पकड़े था, यानि कि अगर जैकेट को खोल दिया जाता, तो अलबर्ट नीचे गिर सकता था।

यह देख अलबर्ट तेजी से सोचने लगा- “अगर ये टेरोसोर मुझे अपने घोसले में लेकर पहुंच गया? तो मेरा बचना बिल्कुल असंभव है, मुझे इसके पहले ही इस टेरोसोर की पकड़ से छूटना होगा।... वैसे तो जैकेट खोलते ही मैं आजाद हो जाऊंगा, पर इतनी ऊंचाई से नीचे गिरने पर तो मेरी मौत पक्का हो जायेगी.... इसलिये मुझे टेरोसोर के थोड़ा नीचे आने का इंतजार करना होगा।”

नन्हें टेरोसोर अब बहुत पीछे छूट गये थे, पर अलबर्ट को पता था कि वो पीछे से आ रहे होंगे।

तभी अचानक पता नहीं कहां से एक दूसरा विशाल पक्षी आकर, उस टेरोसोर के मुंह में पकड़े जानवर को छीनने की कोशिश करने लगा।

यह देख टेरोसोर ने एक बड़ी सी डाइव मारी और अब थोड़ा नीचे उड़ने लगा।

अलबर्ट को इस समय नीचे घने पेड़ दिखाई दिये और अब उन घने पेड़ों से अलबर्ट की ऊंचाई भी ज्यादा नहीं थी।

इससे अच्छा मौका अलबर्ट को फिर नहीं मिलता, अतः उसने एक झटके से अपनी जैकेट की ‘जिप’ को खोल दिया और अपने हाथ ऊपर की ओर कर लिये।

एक क्षण में ही अलबर्ट की जैकेट उसके शरीर से अलग हो गई और वह तेजी से नीचे घने पेड़ों की ओर गिरने लगा।

किस्मत अच्छी थी कि अलबर्ट का शरीर एक घने पेड़ की शाखाओं में उलझकर रुक गया और वह जमीन पर गिरने से बच गया।

अलबर्ट ने अपने शरीर का बैलेंस बनाया और पेड़ की शाखाओं से छूटकर वहीं बैठ गया।

अलबर्ट की निगाह अब नीचे की ओर जा रही थी। अलबर्ट का अंदाजा सही निकला, कुछ ही देर में चीखते हुए छोटे टेरोसोर उधर से गुजरे।

अगर अलबर्ट पेड़ से नीचे उतर गया होता, तो पक्का उसे इन नन्हें टेरोसोर का शिकार बन जाना था।

कुछ देर तक अलबर्ट नीचे देखता रहा और फिर कोई खतरा ना देख धीरे से नीचे उतर गया।

अब वह सुयश और बाकी सभी लोगों के बारे में सोचने लगा।

उसे पता था कि सभी लोग अब पोसाईडन पर्वत की ओर चले गये होंगे। अगर उन लोगों से मिलना है तो उसे भी पोसाईडन पर्वत की ओर जाना ही होगा।

अलबर्ट जानता था कि वैसे भी, वह अकेले इस भयानक जंगल में ज्यादा दिन तक सुरक्षित नहीं रह सकता।
यह सोच अलबर्ट अंदाजे से ही, पोसाईडन पर्वत की ओर चल दिया।
नीचे काफी सूखी पत्तियां पड़ी थीं, इसलिये अलबर्ट के चलने से वातावरण में तेज आवाज गूंज रही थी।

कुछ आगे चलते ही अलबर्ट का पैर एक गहरे गड्ढे पर पड़ा और वह अपने शरीर का संतुलन खो, तेजी से गहरे गड्ढे में जा गिरा।

पेड़ों की टहनियां और सूखी पत्तियां, गड्ढे के ऊपर पड़े होने की वजह से अलबर्ट को वह गड्ढा दिखाई नहीं दिया था। भला यही था कि उस गड्ढे में कोई पत्थर नहीं था, नहीं तो अलबर्ट का सिर फट जाना था।

अलबर्ट ने अब उस गड्ढे को ध्यान से देखा, वह एक बड़ा सा सूखा कुंआ था।

अलबर्ट को उस कुंए से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। अभी दिन होने की वजह से सूर्य की थोड़ी रोशनी कुएं में आ रही थी।

तभी अलबर्ट को कुएं में एक दिशा पर एक हल्की रोशनी दिखाई दी। इस रोशनी की किरण ने अलबर्ट के अंदर एक नया उत्साह भर दिया।

वह अब कुएं के उस ओर आ गया, जहां से रोशनी नजर आ रही थी। वहां पहुंचते ही अलबर्ट आश्चर्य से भर गया क्यों कि उस स्थान पर पेड़ों की बेल के पीछे, एक विशाल बिल्ली के मुंह वाली गुफा नजर आ रही थी।

देखने से साफ पता चल रहा था कि यह गुफा किसी इंसान के द्वारा बनायी गई है। अलबर्ट उस बिल्ली वाली गुफा में प्रवेश कर गया।

उस गुफा में चारो ओर पत्थरों से बने अर्द्धचंद्राकार 5 दरवाजे बने थे, जिनके बीच में बहुत से महीन सुराख थे। उन सुराखों से जल की पतली धारा किसी झरने के तरह से गिर रही थी।

पर इस धारा का पानी जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी जमीन पर गिरने के पहले ही कहीं गायब हो जा रहा है।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के बीच, एक बिल्ली जैसे मुंह वाली देवी की मूर्ति खड़ी थी। जिसके दोनों हाथ आगे की ओर थे और उन हाथों के बीच एक सुनहरी धातु का पात्र रखा था।

उस पात्र के ऊपर से हवा में, कुछ पानी की बूंदें स्वतः बन रहीं थीं और वह बूंद एक-एक कर उस पात्र में गिर रही थी। पात्र जल से पूरा भरा था, पर फिर भी उसकी बूंदे, पात्र से बाहर नहीं गिर रहीं थीं।

उस देवी ने अपने दाहिने हाथ में एक सुनहरे रंग का ब्रेसलेट पहन रखा था, जो कि दूर से ही चमक रहा था।

उन अर्द्धचंद्राकार दरवाजों के पीछे, पत्थर से बनी दीवारों पर कुछ चित्रकारी की गई थी।

उस प्रत्येक चित्रकारी में चित्र कोई भी हो, पर एक काली बिल्ली को उस पात्र से जल पीते हुए दिखाया गया था।

यह देख अलबर्ट का खुराफाती दिमाग जाग उठा- “अवश्य ही इस पात्र में कोई ना कोई दिव्य जल है, जिसकी महत्वता दीवारों पर चित्रों के माध्यम से दर्शाई गई है। मुझे अवश्य ही इस जल को पीकर देखना चाहिये, भले ही मैं इसे पीने के बाद मैं काली बिल्ली ही क्यों ना बन जाऊं? और वैसे भी अब मैं अपनी पूरी जिंदगी तो जी चुका, फिर इन छोटे-छोटे प्रयोगों से क्या डरना ?” यह सोच अलबर्ट ने देवी के हाथ से उस पात्र को उठाया और पूरा का पूरा जल पी गया।

अलबर्ट ने पूरा जल पीने के बाद देवी के हाथ में कटोरा पुनः वापस रख दिया और ध्यान से अपने शरीर में हो रहे बदलाव को देखने लगा।

पर जब 10 मिनट के अपार निरीक्षण के बाद भी अलबर्ट को अपने शरीर में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया, तो वह निराश हो गया।

“लगता है सबको बेवकूफ बनाने के लिये दीवारों पर चित्रकारी की गई थी।” अलबर्ट ने गुस्साते हुए कहा।

अब अलबर्ट ने देवी के हाथ से वह ब्रेसलेट भी निकाल कर अपने हाथों में पहन लिया।

पर इसके बाद भी जब कुछ ना हुआ तो खीझकर अलबर्ट उस कुएं से निकलने का रास्ता ढूंढने लगा।


प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि यह कहानी बहुत तेजी से बढ़ता जा रही है और हर पेज पर आपके दिमाग एक नया प्रश्न खड़ा करता जा रहा है।

प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें-

1) ‘अटलांटिस का इतिहास‘ नामक किताब ‘लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में कैसे पहुची ? क्या इसके लेखक वेगा के बाबा कलाट ही थे? क्या इस किताब से और भी राज आगे खुले?

2) माया से विदा लेने के बाद मेरोन और सोफिया का क्या हुआ? क्या माया कैस्पर को उसकी असलियत बता पायी ?

3) क्या जेनिथ सुयश के सामने तौफीक का राज खोल पायी ?

4) क्रिस्टी को नदी की तली से मिली, वह काँच की पेंसिल कैसी थी ?

5) शैफाली को मैग्ना की ड्रेस तक पहुंचाने वाली पेंग्विन और डॉल्फिन क्या थीं ?

6) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था ?

7) ऐमू के अमरत्व का क्या राज है?

8) जैगन का सेवक गोंजालो कौन था ? क्या उसकी मूर्ति में भी कोई राज छिपा था ?

9) क्या सनूरा की शक्तियों का राज एक रहस्यमय बिल्ली है?

10) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था ? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी ?

11) उड़नतश्तरी के अंदर मौजूद 6 फुट का हरा कीड़ा बाकी कीड़ों से अलग क्यों था? वह इंसानों की तरह कैसे चल रहा था?

12) मकोटा के सर्पदंड का क्या रहस्य था?

13) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

14) माया सभ्यता का अंत किस प्रकार हुआ?

15) माया को इतनी सारी देवशक्तियां कहां से प्राप्त हुईं?

16) कौन था ‘ओरस’? जिसे फेरोना ग्रह का राजा एलान्का ढूंढ रहा था।

17) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

18) क्या थी एण्ड्रोवर्स पावर? जिसके हरे ग्रह पर भेजने से एलान्का गुस्सा रहा था।

19) कौन थी रेने? जिसे एलान्का ने एण्ड्रोनिका का प्रतिनिधित्व करने को कहा था ? उसके पास कैसी शक्तियां थीं?

20) क्या शलाका आर्यन के पुत्र को ढूंढने अवन्ती राज्य गई?

21) कहां था आर्यन का पुत्र? क्या वह अब भी अष्टकोण में बंद था? या किसी ने उसे निकाल लिया था?

22) अष्टकोण के साथ रखी उस अमृत की दूसरी बूंद का क्या हुआ?

23) एण्ड्रोनिका में एलनिको और एनम के सिवा कितनी शक्तियां और थीं?

24) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

25) गोंजालो का ऊर्जा द्वार, तिलिस्मा के ऊर्जा द्वार से कैसे टकरा गया?

26) कैश्वर अंतरिक्ष से किसे बुलाना चाह रहा था?

27) माया ने कैस्पर से किस प्रकार से, महाविनाश की तैयारी करने की बात की थी?

28) महावृक्ष के स्वप्नतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

29) सुनहरी ढाल और तलवार से ‘आकृति’ देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

30) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

31) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

32) क्या ओरैकल से मिलने के बाद आर्टेमिस ने आकृति का पीछा करना बंद कर दिया था?

33) क्या मुफासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

34) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

35) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

36) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

37) क्या जैगन धरा के बेहोश होने की वजह से जाग गया था?

38) कौन था वह विचित्र जीव? जिसने आसमान से सभी पंक्षियों को मारकर वांशिगटन डी.सी. पर गिरा दिया था? क्या समुद्री जीवों को भड़काना भी उसी की हरकत थी?

39) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

40) वेदालय की देवशक्तियों का क्या रहस्य था?

41) सुर्वया के सिंहलोक में ‘चतुर्भुज सिंहराज’, शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

42) क्या थी सीनोर द्वीप पर आयी वह अंजानी मुसीबत? जो कि एक विशाल आकृति में समुद्र की लहरों पर मौजूद थी।

43) क्या लुफासा और वीनस को मिलने वाला वह लाल रंग का पत्थर मैग्ना की जीवशक्ति ही थे?

44) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

45) कैश्वर के बनाए प्राणियों में भावनाओं का संचार कैसे शुरु हो गया था?

46) क्या विद्युम्ना की त्रिशक्ति, महावृक्ष के द्वारा बनाये गये भ्रमजाल से भी ज्यादा खतरनाक थीं?

47) बिल्ली वाली देवी के, पात्र के जल और ब्रेसलेट का क्या रहस्य था?

48) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

49) क्या त्रिकाली और व्योम, त्रिशाल और कलिका को विद्युम्ना के भ्रमन्तिका से छुड़ा पाये?

50) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके?

51) क्या था इन अद्भुत देवशक्तियों का रहस्य?

ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें।

तो इंतजार कीजिए हमारे अगले भाग का जिसका नाम है-
“अद्भुत दिव्यास्त्र” जिसमें हम आपको ले चलेंगे, देवताओं के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति के रहस्य छिपे हैं....................


“कृति का संकलन हूं, नये शब्दों का संचार हूं मैं, अनकही गाथा हूं, या मस्तिष्क का विचार हूं मैं, मेरे कथनों की कल्पना का सागर असीम है,
लफ्जों में बिखरी हुई, वीणा की झंकार हूं मैं, मत दीजिये मेरे अलफाजों को पंक्तियों की चुनौती,
जो रुह को महका दे, फजा में बिखरी वो बयार हूं मैं, मेरा वजूद छाया है अनंत ब्रह्मांड की गहराई में सिमटा संसार हूं मैं”

दोस्तों जिस प्रकार इन्द्रधनुष में सात रंग होते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक की रचनाओं में भी सात रंग पाये जाते हैं। हर रंग अपने आप में एक अलग पहचान रखता है।


दोस्तों आप सबके सपोर्ट और र रिव्यू ही मुझे ओर भी अधिक लिखने को प्रेरित करते है। तो अपना कीमती समय निकालकर कुछ शब्द लिखते रहिए। (राज शर्मा)
Bahut hi shaandar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Bhut hi jabardast update bhai
To albert bhi us terosor se bach gaya tha
Aage dhekte hai us patr ke jal aur us bracelet ka kya rahasya hai ye to aage pata chalega

Ab intezar rahega agle bhag ka jisme hame in sawalo ka jawab milega
Jaroor bhai, qgla bhaag hoga jisme divyastro and Rahashya mayi shaktiyo ke baare me bataya jayega. Thank you very much for your wonderful review and support :hug:
 
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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Nice update💯
Dekhte hai Albert kya kya krta hai aage
Thank you so much bhai :thanks:
 
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