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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#179.

शक्ति
- एक ऐसा शब्द जिसे प्राप्त करने के लिये, मनुष्य, देवता, दैत्य ही नहीं अपितु अंतरिक्ष के जीव भी सदैव लालायित रहते हैं।

शक्ति का पर्याय स्वामित्व से जुड़ता है, इसलिये ब्रह्मांड के सभी जीव शक्ति को प्राप्त कर, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं।

वन में मौजूद एक सिंह भी, अन्य वन्य प्राणियों के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। ठीक उसी प्रकार कुछ देवता भी मनुष्यों के समक्ष, अपना शक्ति प्रदर्शन कर, उनमें भय की भावना उत्पन्न करते रहते हैं।

जैसे देवराज इंद्र के द्वारा जलप्रलय लाना या सूर्यदेव के द्वारा सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देना। यह सब भी शक्ति प्रदर्शन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

दैत्यों ने हमेशा त्रिदेवों से ही शक्ति प्राप्त कर, उनका प्रयोग देवताओं के ही विरुद्ध किया है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, मनुष्यों ने भी घोर तप किये हैं।

कुछ ऐसी ही देवशक्तियों को, पृथ्वी की सुरक्षा के लिये, देवताओं ने पृथ्वी के अलग-अलग भागों में छिपा दिया, जिससे समय आने पर कुछ दिव्य मानव, उन देव शक्तियों को धारण कर, पृथ्वी की सुरक्षा का भार उठा सकें।

ऐसे ही देवशक्ति धारक कुछ विलक्षण मनुष्य बाद में ब्रह्मांड रक्षक कहलाये।

समयचक्र- डेल्फानो ग्रह समाप्त होने के बाद, वहां के राजा गिरोट ने अपनी सबसे अद्वितीय रचना समयचक्र को पृथ्वी पर फेंक दिया, जो कि ब्लैक होल के सिद्धांतों पर कार्य करती थी।

यह समयचक्र पृथ्वी पर आने के 20 वर्षों तक सुप्तावस्था में रहा। एक दिन अचानक ही यह समयचक्र अपनी शक्तियों से, समय के कई आयामों को बांधने की कोशिश करने लगा।

इस समयचक्र के पास समय और ब्रह्मांड में यात्रा करने की अद्भुत शक्तियां थीं, पर इसी अद्भुत
शक्तियों को प्राप्त करने के लिये कुछ अंतरिक्ष के जीव भी पृथ्वी पर आ गये।

उन जीवों के पास दूसरी आकाशगंगा की अनोखी शक्तियां थीं, जो हमारे विज्ञान की कल्पनाओं से भी परे थीं।

इसी के साथ शुरु हुआ एक अनोखा टकराव, जिससे अनगिनत प्रश्नों की एक श्रृंखला खड़ी हो गई.

1) क्या व्योम और त्रिकाली, विद्युम्ना की जलशक्ति से बने मायाजाल में, देवराज इंद्र के वज्र से बच सके?

2) क्या हुआ जब कालकूट विष से बने नीलाभ को ब्रह्मांड में, महा..देव के पंचमुखी दर्शन हुए?

3) क्या हुआ जब ओरस, स्वयं अपने ही समयचक्र के जाल में फंसकर समययात्रा कर बैठा?

4) क्या सुयश अपने साथियों के साथ तिलिस्मा के मायाजाल में घूम रही पांचों इन्द्रियों को परास्त कर सका?

5) कौन था अष्टकोण में छिपा वह दिव्य बालक, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था?

6) क्या हुआ जब देवशक्ति धारक माया का टकराव, ग्रीक देवताओं से हुआ?

7) क्या था महा..देव की अमरकथा का रहस्य, जिसे देव ने देवी पा..ती को सुनाया था?

8) वी…भद्र और भद्रक..ली ने किस प्रकार से नीलाभ की परीक्षा ली?

9) क्या धनवंतरी के आयुर्वेद में सभी रोगों का निदान छिपा था?

10) क्या देवशक्ति धारक योद्धा, डार्क मैटर, नेबुला, ब्लैक होल जैसी शक्तियों से पृथ्वी की रक्षा कर पाये?

तो आइये दोस्तों कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिये पढ़ते हैं, विज्ञान और ईश्वरीय शक्ति के मध्य, रहस्य के ताने-बाने से बुना एक ऐसा अविस्मरणीय कथानक, जो आपको मानव शरीर और इन्द्रियों का अद्भुत ज्ञान देगा, जिसका नाम है "अद्भुत दिव्यास्त्र"

चैपटर-1
इंद्रसभा:
(20,005 वर्ष पहले.......) देवराज इंद्र का दरबार, स्वर्गलोक

स्वर्गलोक- एक ऐसा स्थान, जहां जीवित रहते कोई भी मनुष्य नहीं जाना चाहता, पर मृत्यु के उपरांत हर मनुष्य वहीं रहने की कामना करता है।

स्वर्गलोक- पृथ्वी का एक ऐसा भूभाग, जिसके बारे में कोई नहीं जानता, कि वह कहां पर है? एक ऐसा स्थान, जहां देवताओं का निवास है। वह देवता जिन्हें आदित्य भी कहते हैं।

त्रिदेवों ने देओं का राजा इंद्र को चुना था। सूर्य, अग्नि, पवन, वरुण, यम आदि सभी देव इंद्र के साथ मिलकर मनुष्यों की सहायता करते हैं।

इस समय स्वर्गलोक में इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देव, सिंहासनों पर बैठे हुए थे, पर किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें आज यहां किसलिये बुलाया गया है? बस उन्हें इतना बता या गया था, कि यह सभा त्रि..देवों के कहने पर बुलाई गई है, इसलिये सभी धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।

इंद्र भी सभा के मध्य, अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। पर इस समय इंद्र के चेहरे की बेचैनी, ये साफ बता रही थी, कि इस सभा का उद्देश्य उन्हें भी नहीं पता है। सभी के चेहरे पर बेचैनी एवं असमंजस के भाव थे।

आखिरकार गमणेश से रहा नहीं गया और उसने इंद्र से पूछ लिया- “देवराज, हमें यहां बैठे बहुत समय बीत गया है, पर आप तो कुछ बता ही नहीं रहे, कि आपने हम सभी को यहां किसलिये बुलाया है?"

गणे.. के शब्द सुन इंद्र डर गये। अब वो ये भी नहीं कह सकते थे कि उन्हें भी नहीं पता, नहीं तो सभी देवताओं के सामने उनका अपमान हो जाता।

अतः इंद्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कहा- “कुछ देर और प्रतीक्षा करो गमणेश, त्रि..वों ने हमें कुछ भी बताने से मना किया है, बस वह अब आते ही होंगे। उनके आते ही हम आपको सब कुछ बता देंगे।

इंद्र की बात सुन कार्तिकय जोर से हंस दिया, वो इंद्र का चेहरा देखकर ही जान गया था, कि इंद्र को कुछ नहीं पता?

तभी सभा में एक तीव्र प्रकाशपुंज उत्पन्न हुआ और उस प्रकाशपुंज से त्रि..मदेव प्रकट हो गये।
उन्के आगमन से, सभी के वार्तालापों का भ्रमरगुंजन स्वतः ही समाप्त हो गया। सभी उनके सम्मान में अपने-अपने सिंहासन से खड़े हो गये।

त्रि.देवों के साथ नीलाभ और माया भी थे। गमणेश ने माया को देखकर, अपनी पलकें जोर से झपकाईं।

यह एक प्रकार का शरारत भरा अभिवादन था। माया ने भी मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका कर गणे.. का अभिवादन स्वीकार कर लिया।

माया को देखकर हनुरमान.. को भी वह नन्हा यति याद आ गया। नन्हें यति को यादकर वह एक पल को सिहर उठे।

त्देवों के साथ नीलाभ और माया को देखकर, इंद्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये, वह समझ गये कि अवश्य ही कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है, क्यों कि त्रि..देव आज तक किसी को भी लेकर इंद्रसभा में नहीं आये थे? कुछ ही देर में सभी ने आसन ग्रहण कर लिया।

अब सभी देवताओं की नजर त्र..देवों पर थी, सभी साँस रोके बस उन्हें ही देखे जा रहे थे। भगवान व…ष्णु ने महानदेव को बोलने का इशारा किया।

“देवों आप सभी को भली-भांति पता है, कि पृथ्वी पर युगों को 4 भागों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग।” महानदेव ने कहा - “पहले 3 युगों में मनुष्य हमारे अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह वेद के माध्यम से देवताओं की आराधना करता है, जिसके फलस्वरुप देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और उसे असुरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। परंतु कलयुग में मनुष्य हमारे अस्तित्व को नकार देता है। हम स्वयं भी इन्हीं कारणों से मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, परंतु फिर भी हमें उनकी सुरक्षा का दायित्व लेना पड़ता है।

“कलयुग में मनुष्यों की तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों की ओर भी झांकना शुरु कर देते हैं और मनुष्यों की यह क्रिया, प्रत्येक बार उनके विनाश का कारण बनती है। ऐसे समय में हम स्वयं भी, उन मनुष्यों की किसी भी प्रकार से सुरक्षा नहीं कर पाते। इसलिये हमने कलयुग में भी मनुष्यों की रक्षा के लिये एक अनूठा उपाय सोचा है। हम चाहते हैं कि हम सभी देव, अपनी एक देवशक्ति को किसी ऐसे मनुष्य को प्रदान करें, जो कि ब्रह्मांड रक्षक बनकर कलयुग में, हमारी अनुपस्थिति में भी, मनुष्यों की रक्षा कर सके।" यह कहकर महानदेव शांत हो गये।

“पर ..देव, हम ऐसे मनुष्यों का चयन कैसे करेंगे? जो हमारी शक्ति को धारण कर ब्रह्मांड रक्षक का कार्य भली-भांति कर सके।” इंद्र ने परेशान होते हुए कहा।

“और ..देव ऐसे मनुष्यों के चयन में तो हजारों वर्ष लग सकते हैं और फिर हम उनकी परीक्षा कैसे लेंगे? कि वह देवशक्ति को धारण करने योग्य हैं कि नहीं?” सूर्य ने कहा।

"हमें पता है कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। ब्रह्म.. ने कहा- “पर इसका भी उपाय हमारे पास है।... आप में से कोई यह बताये कि हमारे पास ऐसा कौन सा ज्ञान का भंडार है? जो कभी खाली नहीं होगा और वह हमेशा सभी मनुष्यों को उचित मार्ग दिखायेगा।"

“वेदों का ज्ञान।” गमणेश ने हाथ उठाते हुए कहा “वही एक ऐसा ज्ञान है, जो कलयुग में भी सभी को उचित मार्ग दिखा सकता है।'

"बिल्कुल सही कहा ..गमणेश ने।” ब्रह..देव ने अपने एक हाथ में पकड़े वेद को सभी को दिखाते हुए कहा "वह वेदों का ज्ञान ही होगा, जिसके द्वारा हम उचित मनुष्य का चुनाव कर सकते हैं और वेदों के ज्ञानार्जन के बाद, वह मनुष्य कभी भी, कलयुग में भी, अपने मार्ग से विमुख नहीं होगा।”

“परंतु ब्रह्म.., इस वेद को समझना मनुष्य के मस्तिष्क से परे होगा।” कार्तिक... ने कहा- “यह तो अत्यंत जटिल भाषा में है, इसे तो मैं स्वयं भी अभी समझने की कोशिश कर रहा हूं।"


“भ्राता श्री, ये मैं आपको अच्छे से समझा दूंगा। मुझे यह बहुत अच्छे से आ गया है।" गमणेश ने अपनी भोली सी भाषा में कहा।

“मुझे तुमसे ज्ञान लेने की जरुरत नहीं है, मैं इसे स्वयं समझ लूंगा।” कर्तिके.. को उनकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

ब्रह्म… ने कार्तिके.. की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह पुनः बोले- “तुम सही कह रहे हो, इसकी भाषा अत्यंत जटिल है, परंतु आज से हजारों वर्षों के बाद, जब कलयुग का पृथ्वी पर प्रवेश होने वाला होगा, तो पृथ्वी पर एक ऋषि कृष्ण द्वैपायन का जन्म होगा। वही ऋषि इस 1 वेद को 4 भागों में विभक्त कर, इसे नया आकार देंगे और वेदों के इसी विभाजन के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास के नाम पर जाना जायेगा। वेद व्यास का अभिप्राय ही होगा, वेदों का विभाजन करने वाला। अब रही बात वेदों के इस विभाजन को सरलता देने की, तो मुझे लगता है कि यह कार्य गणे… बहुत आसानी से कर लेंगे। क्यों गमणेश हमने उचित कहा ना?"

“जी देव, आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।” गणे.. ने सिर झुकाते हुए कहा।

"तो अब बचता है कार्य, मनुष्यों के चयन और उन्हें वेदों का ज्ञान देने का।” तो इसके लिये हम अपने साथ, यहां नीलाभ और माया को लेकर आये हैं। माया निर्माण शक्ति में पूर्ण निपुण है और निर्माण शक्ति के ही माध्यम से, माया पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर, 15 लोकों का निर्माण करेगी। यह लोक पूर्णतया, एक भव्य नगर की भांति होंगे। इन 15 लोकों में हम 30 अद्भुत शक्तियों को छिपा देंगे और जो मनुष्य वेदों का ज्ञान अर्जित कर, इन 30 शक्तियों को प्राप्त करेगा, उसे ही हम अपनी देवशक्तियां देंगे। अब इसके लिये माया को हिमालय पर, एक विद्यालय 'वेदालय' की रचना भी करनी होगी। जहां पर कुछ चुने हुए मनुष्यों के बालकों को, नीलाभ वेदों के माध्यम से शिक्षा देंगे और उन बालकों को इतना निपुण बनायेंगे कि वह देवशक्ति धारण करने योग्य हो जायें।"

"बालको के हाथ में देवशक्ति देना क्या उचित होगा देव?” पवन ने कहा।

"क्यों नहीं पवनदेव।” ब्रह्म… ने कहा- “वेदालय की प्रतियोगिताएं इतनी दुष्कर होंगी कि आप भी उन्हें सरलता से पूर्ण नहीं कर पायेंगे और अगर वह बालक उसे पूर्ण कर लेते हैं, तो उन्हें देवशक्ति देने में दुविधा ही क्या है?”

“परंतु देव, वह बालक जब तक उन देवशक्तियों का प्रयोग सही से सीखेंगे, तब तक तो वह बूढ़े हो जायेंगे। मनुष्यों की आयु आखिर होती ही कितनी है?" वरुण ने कहा।

"हां, यह बात आपने सही कही वरुणदेव।" ब्रह्म.. ने कहा- “इसी के लिये विद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात्, हम उन्हें अमृतपान करायेंगे, जिससे वह भी आप लोगों की तरह, अमृत्व को प्राप्त कर लेंगे और युगों युगों तक निष्पक्ष भाव से ब्रह्मांड रक्षक का कार्य करते रहेंगे।

यह बात सुन कर इंद्र का हृदय कांप गया। वह सोचने लगे कि कहीं वह मनुष्य आगे चलकर, देवशक्तियों की शक्ति से, उनका ही सिंहासन ना छीन लें? परंतु इंद्र जानते थे कि इस समय त्रि..देवों के सामने कुछ भी बोलना सही नहीं है? अन्यथा वह कहीं अभी ही सिंहासन से ना हटा दिये जायें?

यह सोच इंद्र ने वापस देवों की ओर देखना शुरु कर दिया। पर जैसे ही इंद्र की नजरें भगवान वहिष्णु से टकराईं, वह एकाएक सटपटा गये, क्यों कि भगवान ..ष्णु मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे।

इंद्र को लगा कि जैसे उनकी चोरी पकड़ ली गई हो, इसलिये वह जल्दी से इधर-उधर देखने लगे।

“चलिये अमृतपान भी ठीक है, पर वह विवाह तो करेंगे ना? फिर विवाहोपरांत वह अपने मार्ग से भ्रमित भी हो सकते हैं? उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का भार सर्वोपरि लगने लगेगा। फिर वह ब्रह्मांड रक्षक का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पायेंगे?” गुरु बृहस्पति ने कहा।

"नहीं, वह तब तक विवाह नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें स्वयं के समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं मिल जाता? जब उन्हें दूसरा मनुष्य मिल जायेगा, तो वह अपनी शक्तियों के साथ, अपना अमरत्व भी दूसरे मनुष्य को दे देंगे और स्वयं विवाह कर, एक साधारण मनुष्य की जिंदगी जी सकेंगे।" ब्रह्देव ने कहा।

"क्या हम उन लोकों के नाम जान सकते हैं ब्देव?” शेषनाग ने कहा।

“अवश्य।” यह कह देव ने उन लोकों के नाम बताना शुरु कर दिया- “देवलोक, शक्ति लोक, राक्षसलोक, ब्रह्म…लोक, नागलोक, माया लोक, हिमलोक, नक्षत्रलोक, पाताललोक, भूलोक, सिंहलोक, रुद्रलोक, यक्षलोक, प्रेतलोक और मत्स्यलोक।"

शेषनाग, नागलोक का नाम सुनकर ही प्रसन्न हो गये।

Jaaari rahega……
Shaandar update
 

dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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#179.

शक्ति
- एक ऐसा शब्द जिसे प्राप्त करने के लिये, मनुष्य, देवता, दैत्य ही नहीं अपितु अंतरिक्ष के जीव भी सदैव लालायित रहते हैं।

शक्ति का पर्याय स्वामित्व से जुड़ता है, इसलिये ब्रह्मांड के सभी जीव शक्ति को प्राप्त कर, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं।

वन में मौजूद एक सिंह भी, अन्य वन्य प्राणियों के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। ठीक उसी प्रकार कुछ देवता भी मनुष्यों के समक्ष, अपना शक्ति प्रदर्शन कर, उनमें भय की भावना उत्पन्न करते रहते हैं।

जैसे देवराज इंद्र के द्वारा जलप्रलय लाना या सूर्यदेव के द्वारा सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देना। यह सब भी शक्ति प्रदर्शन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

दैत्यों ने हमेशा त्रिदेवों से ही शक्ति प्राप्त कर, उनका प्रयोग देवताओं के ही विरुद्ध किया है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, मनुष्यों ने भी घोर तप किये हैं।

कुछ ऐसी ही देवशक्तियों को, पृथ्वी की सुरक्षा के लिये, देवताओं ने पृथ्वी के अलग-अलग भागों में छिपा दिया, जिससे समय आने पर कुछ दिव्य मानव, उन देव शक्तियों को धारण कर, पृथ्वी की सुरक्षा का भार उठा सकें।

ऐसे ही देवशक्ति धारक कुछ विलक्षण मनुष्य बाद में ब्रह्मांड रक्षक कहलाये।

समयचक्र- डेल्फानो ग्रह समाप्त होने के बाद, वहां के राजा गिरोट ने अपनी सबसे अद्वितीय रचना समयचक्र को पृथ्वी पर फेंक दिया, जो कि ब्लैक होल के सिद्धांतों पर कार्य करती थी।

यह समयचक्र पृथ्वी पर आने के 20 वर्षों तक सुप्तावस्था में रहा। एक दिन अचानक ही यह समयचक्र अपनी शक्तियों से, समय के कई आयामों को बांधने की कोशिश करने लगा।

इस समयचक्र के पास समय और ब्रह्मांड में यात्रा करने की अद्भुत शक्तियां थीं, पर इसी अद्भुत
शक्तियों को प्राप्त करने के लिये कुछ अंतरिक्ष के जीव भी पृथ्वी पर आ गये।

उन जीवों के पास दूसरी आकाशगंगा की अनोखी शक्तियां थीं, जो हमारे विज्ञान की कल्पनाओं से भी परे थीं।

इसी के साथ शुरु हुआ एक अनोखा टकराव, जिससे अनगिनत प्रश्नों की एक श्रृंखला खड़ी हो गई.

1) क्या व्योम और त्रिकाली, विद्युम्ना की जलशक्ति से बने मायाजाल में, देवराज इंद्र के वज्र से बच सके?

2) क्या हुआ जब कालकूट विष से बने नीलाभ को ब्रह्मांड में, महा..देव के पंचमुखी दर्शन हुए?

3) क्या हुआ जब ओरस, स्वयं अपने ही समयचक्र के जाल में फंसकर समययात्रा कर बैठा?

4) क्या सुयश अपने साथियों के साथ तिलिस्मा के मायाजाल में घूम रही पांचों इन्द्रियों को परास्त कर सका?

5) कौन था अष्टकोण में छिपा वह दिव्य बालक, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था?

6) क्या हुआ जब देवशक्ति धारक माया का टकराव, ग्रीक देवताओं से हुआ?

7) क्या था महा..देव की अमरकथा का रहस्य, जिसे देव ने देवी पा..ती को सुनाया था?

8) वी…भद्र और भद्रक..ली ने किस प्रकार से नीलाभ की परीक्षा ली?

9) क्या धनवंतरी के आयुर्वेद में सभी रोगों का निदान छिपा था?

10) क्या देवशक्ति धारक योद्धा, डार्क मैटर, नेबुला, ब्लैक होल जैसी शक्तियों से पृथ्वी की रक्षा कर पाये?

तो आइये दोस्तों कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिये पढ़ते हैं, विज्ञान और ईश्वरीय शक्ति के मध्य, रहस्य के ताने-बाने से बुना एक ऐसा अविस्मरणीय कथानक, जो आपको मानव शरीर और इन्द्रियों का अद्भुत ज्ञान देगा, जिसका नाम है "अद्भुत दिव्यास्त्र"

चैपटर-1
इंद्रसभा:
(20,005 वर्ष पहले.......) देवराज इंद्र का दरबार, स्वर्गलोक

स्वर्गलोक- एक ऐसा स्थान, जहां जीवित रहते कोई भी मनुष्य नहीं जाना चाहता, पर मृत्यु के उपरांत हर मनुष्य वहीं रहने की कामना करता है।

स्वर्गलोक- पृथ्वी का एक ऐसा भूभाग, जिसके बारे में कोई नहीं जानता, कि वह कहां पर है? एक ऐसा स्थान, जहां देवताओं का निवास है। वह देवता जिन्हें आदित्य भी कहते हैं।

त्रिदेवों ने देओं का राजा इंद्र को चुना था। सूर्य, अग्नि, पवन, वरुण, यम आदि सभी देव इंद्र के साथ मिलकर मनुष्यों की सहायता करते हैं।

इस समय स्वर्गलोक में इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देव, सिंहासनों पर बैठे हुए थे, पर किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें आज यहां किसलिये बुलाया गया है? बस उन्हें इतना बता या गया था, कि यह सभा त्रि..देवों के कहने पर बुलाई गई है, इसलिये सभी धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।

इंद्र भी सभा के मध्य, अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। पर इस समय इंद्र के चेहरे की बेचैनी, ये साफ बता रही थी, कि इस सभा का उद्देश्य उन्हें भी नहीं पता है। सभी के चेहरे पर बेचैनी एवं असमंजस के भाव थे।

आखिरकार गमणेश से रहा नहीं गया और उसने इंद्र से पूछ लिया- “देवराज, हमें यहां बैठे बहुत समय बीत गया है, पर आप तो कुछ बता ही नहीं रहे, कि आपने हम सभी को यहां किसलिये बुलाया है?"

गणे.. के शब्द सुन इंद्र डर गये। अब वो ये भी नहीं कह सकते थे कि उन्हें भी नहीं पता, नहीं तो सभी देवताओं के सामने उनका अपमान हो जाता।

अतः इंद्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कहा- “कुछ देर और प्रतीक्षा करो गमणेश, त्रि..वों ने हमें कुछ भी बताने से मना किया है, बस वह अब आते ही होंगे। उनके आते ही हम आपको सब कुछ बता देंगे।

इंद्र की बात सुन कार्तिकय जोर से हंस दिया, वो इंद्र का चेहरा देखकर ही जान गया था, कि इंद्र को कुछ नहीं पता?

तभी सभा में एक तीव्र प्रकाशपुंज उत्पन्न हुआ और उस प्रकाशपुंज से त्रि..मदेव प्रकट हो गये।
उन्के आगमन से, सभी के वार्तालापों का भ्रमरगुंजन स्वतः ही समाप्त हो गया। सभी उनके सम्मान में अपने-अपने सिंहासन से खड़े हो गये।

त्रि.देवों के साथ नीलाभ और माया भी थे। गमणेश ने माया को देखकर, अपनी पलकें जोर से झपकाईं।

यह एक प्रकार का शरारत भरा अभिवादन था। माया ने भी मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका कर गणे.. का अभिवादन स्वीकार कर लिया।

माया को देखकर हनुरमान.. को भी वह नन्हा यति याद आ गया। नन्हें यति को यादकर वह एक पल को सिहर उठे।

त्देवों के साथ नीलाभ और माया को देखकर, इंद्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये, वह समझ गये कि अवश्य ही कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है, क्यों कि त्रि..देव आज तक किसी को भी लेकर इंद्रसभा में नहीं आये थे? कुछ ही देर में सभी ने आसन ग्रहण कर लिया।

अब सभी देवताओं की नजर त्र..देवों पर थी, सभी साँस रोके बस उन्हें ही देखे जा रहे थे। भगवान व…ष्णु ने महानदेव को बोलने का इशारा किया।

“देवों आप सभी को भली-भांति पता है, कि पृथ्वी पर युगों को 4 भागों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग।” महानदेव ने कहा - “पहले 3 युगों में मनुष्य हमारे अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह वेद के माध्यम से देवताओं की आराधना करता है, जिसके फलस्वरुप देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और उसे असुरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। परंतु कलयुग में मनुष्य हमारे अस्तित्व को नकार देता है। हम स्वयं भी इन्हीं कारणों से मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, परंतु फिर भी हमें उनकी सुरक्षा का दायित्व लेना पड़ता है।

“कलयुग में मनुष्यों की तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों की ओर भी झांकना शुरु कर देते हैं और मनुष्यों की यह क्रिया, प्रत्येक बार उनके विनाश का कारण बनती है। ऐसे समय में हम स्वयं भी, उन मनुष्यों की किसी भी प्रकार से सुरक्षा नहीं कर पाते। इसलिये हमने कलयुग में भी मनुष्यों की रक्षा के लिये एक अनूठा उपाय सोचा है। हम चाहते हैं कि हम सभी देव, अपनी एक देवशक्ति को किसी ऐसे मनुष्य को प्रदान करें, जो कि ब्रह्मांड रक्षक बनकर कलयुग में, हमारी अनुपस्थिति में भी, मनुष्यों की रक्षा कर सके।" यह कहकर महानदेव शांत हो गये।

“पर ..देव, हम ऐसे मनुष्यों का चयन कैसे करेंगे? जो हमारी शक्ति को धारण कर ब्रह्मांड रक्षक का कार्य भली-भांति कर सके।” इंद्र ने परेशान होते हुए कहा।

“और ..देव ऐसे मनुष्यों के चयन में तो हजारों वर्ष लग सकते हैं और फिर हम उनकी परीक्षा कैसे लेंगे? कि वह देवशक्ति को धारण करने योग्य हैं कि नहीं?” सूर्य ने कहा।

"हमें पता है कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। ब्रह्म.. ने कहा- “पर इसका भी उपाय हमारे पास है।... आप में से कोई यह बताये कि हमारे पास ऐसा कौन सा ज्ञान का भंडार है? जो कभी खाली नहीं होगा और वह हमेशा सभी मनुष्यों को उचित मार्ग दिखायेगा।"

“वेदों का ज्ञान।” गमणेश ने हाथ उठाते हुए कहा “वही एक ऐसा ज्ञान है, जो कलयुग में भी सभी को उचित मार्ग दिखा सकता है।'

"बिल्कुल सही कहा ..गमणेश ने।” ब्रह..देव ने अपने एक हाथ में पकड़े वेद को सभी को दिखाते हुए कहा "वह वेदों का ज्ञान ही होगा, जिसके द्वारा हम उचित मनुष्य का चुनाव कर सकते हैं और वेदों के ज्ञानार्जन के बाद, वह मनुष्य कभी भी, कलयुग में भी, अपने मार्ग से विमुख नहीं होगा।”

“परंतु ब्रह्म.., इस वेद को समझना मनुष्य के मस्तिष्क से परे होगा।” कार्तिक... ने कहा- “यह तो अत्यंत जटिल भाषा में है, इसे तो मैं स्वयं भी अभी समझने की कोशिश कर रहा हूं।"


“भ्राता श्री, ये मैं आपको अच्छे से समझा दूंगा। मुझे यह बहुत अच्छे से आ गया है।" गमणेश ने अपनी भोली सी भाषा में कहा।

“मुझे तुमसे ज्ञान लेने की जरुरत नहीं है, मैं इसे स्वयं समझ लूंगा।” कर्तिके.. को उनकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

ब्रह्म… ने कार्तिके.. की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह पुनः बोले- “तुम सही कह रहे हो, इसकी भाषा अत्यंत जटिल है, परंतु आज से हजारों वर्षों के बाद, जब कलयुग का पृथ्वी पर प्रवेश होने वाला होगा, तो पृथ्वी पर एक ऋषि कृष्ण द्वैपायन का जन्म होगा। वही ऋषि इस 1 वेद को 4 भागों में विभक्त कर, इसे नया आकार देंगे और वेदों के इसी विभाजन के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास के नाम पर जाना जायेगा। वेद व्यास का अभिप्राय ही होगा, वेदों का विभाजन करने वाला। अब रही बात वेदों के इस विभाजन को सरलता देने की, तो मुझे लगता है कि यह कार्य गणे… बहुत आसानी से कर लेंगे। क्यों गमणेश हमने उचित कहा ना?"

“जी देव, आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।” गणे.. ने सिर झुकाते हुए कहा।

"तो अब बचता है कार्य, मनुष्यों के चयन और उन्हें वेदों का ज्ञान देने का।” तो इसके लिये हम अपने साथ, यहां नीलाभ और माया को लेकर आये हैं। माया निर्माण शक्ति में पूर्ण निपुण है और निर्माण शक्ति के ही माध्यम से, माया पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर, 15 लोकों का निर्माण करेगी। यह लोक पूर्णतया, एक भव्य नगर की भांति होंगे। इन 15 लोकों में हम 30 अद्भुत शक्तियों को छिपा देंगे और जो मनुष्य वेदों का ज्ञान अर्जित कर, इन 30 शक्तियों को प्राप्त करेगा, उसे ही हम अपनी देवशक्तियां देंगे। अब इसके लिये माया को हिमालय पर, एक विद्यालय 'वेदालय' की रचना भी करनी होगी। जहां पर कुछ चुने हुए मनुष्यों के बालकों को, नीलाभ वेदों के माध्यम से शिक्षा देंगे और उन बालकों को इतना निपुण बनायेंगे कि वह देवशक्ति धारण करने योग्य हो जायें।"

"बालको के हाथ में देवशक्ति देना क्या उचित होगा देव?” पवन ने कहा।

"क्यों नहीं पवनदेव।” ब्रह्म… ने कहा- “वेदालय की प्रतियोगिताएं इतनी दुष्कर होंगी कि आप भी उन्हें सरलता से पूर्ण नहीं कर पायेंगे और अगर वह बालक उसे पूर्ण कर लेते हैं, तो उन्हें देवशक्ति देने में दुविधा ही क्या है?”

“परंतु देव, वह बालक जब तक उन देवशक्तियों का प्रयोग सही से सीखेंगे, तब तक तो वह बूढ़े हो जायेंगे। मनुष्यों की आयु आखिर होती ही कितनी है?" वरुण ने कहा।

"हां, यह बात आपने सही कही वरुणदेव।" ब्रह्म.. ने कहा- “इसी के लिये विद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात्, हम उन्हें अमृतपान करायेंगे, जिससे वह भी आप लोगों की तरह, अमृत्व को प्राप्त कर लेंगे और युगों युगों तक निष्पक्ष भाव से ब्रह्मांड रक्षक का कार्य करते रहेंगे।

यह बात सुन कर इंद्र का हृदय कांप गया। वह सोचने लगे कि कहीं वह मनुष्य आगे चलकर, देवशक्तियों की शक्ति से, उनका ही सिंहासन ना छीन लें? परंतु इंद्र जानते थे कि इस समय त्रि..देवों के सामने कुछ भी बोलना सही नहीं है? अन्यथा वह कहीं अभी ही सिंहासन से ना हटा दिये जायें?

यह सोच इंद्र ने वापस देवों की ओर देखना शुरु कर दिया। पर जैसे ही इंद्र की नजरें भगवान वहिष्णु से टकराईं, वह एकाएक सटपटा गये, क्यों कि भगवान ..ष्णु मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे।

इंद्र को लगा कि जैसे उनकी चोरी पकड़ ली गई हो, इसलिये वह जल्दी से इधर-उधर देखने लगे।

“चलिये अमृतपान भी ठीक है, पर वह विवाह तो करेंगे ना? फिर विवाहोपरांत वह अपने मार्ग से भ्रमित भी हो सकते हैं? उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का भार सर्वोपरि लगने लगेगा। फिर वह ब्रह्मांड रक्षक का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पायेंगे?” गुरु बृहस्पति ने कहा।

"नहीं, वह तब तक विवाह नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें स्वयं के समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं मिल जाता? जब उन्हें दूसरा मनुष्य मिल जायेगा, तो वह अपनी शक्तियों के साथ, अपना अमरत्व भी दूसरे मनुष्य को दे देंगे और स्वयं विवाह कर, एक साधारण मनुष्य की जिंदगी जी सकेंगे।" ब्रह्देव ने कहा।

"क्या हम उन लोकों के नाम जान सकते हैं ब्देव?” शेषनाग ने कहा।

“अवश्य।” यह कह देव ने उन लोकों के नाम बताना शुरु कर दिया- “देवलोक, शक्ति लोक, राक्षसलोक, ब्रह्म…लोक, नागलोक, माया लोक, हिमलोक, नक्षत्रलोक, पाताललोक, भूलोक, सिंहलोक, रुद्रलोक, यक्षलोक, प्रेतलोक और मत्स्यलोक।"

शेषनाग, नागलोक का नाम सुनकर ही प्रसन्न हो गये।

Jaaari rahega
Nice update.
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

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dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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Thanks man, :thanks:
baki tumse to qcche review ki ummeed thi :dazed:
God se related tha, isliye maine kuchh bhi nahi likha, baki apni story likhta hoon, isliye jyada bada review nahi likhta hoon, baki kisi din mood ban gaya toh 2k words ka review chhap dunga.
 

kas1709

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#179.

शक्ति
- एक ऐसा शब्द जिसे प्राप्त करने के लिये, मनुष्य, देवता, दैत्य ही नहीं अपितु अंतरिक्ष के जीव भी सदैव लालायित रहते हैं।

शक्ति का पर्याय स्वामित्व से जुड़ता है, इसलिये ब्रह्मांड के सभी जीव शक्ति को प्राप्त कर, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं।

वन में मौजूद एक सिंह भी, अन्य वन्य प्राणियों के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। ठीक उसी प्रकार कुछ देवता भी मनुष्यों के समक्ष, अपना शक्ति प्रदर्शन कर, उनमें भय की भावना उत्पन्न करते रहते हैं।

जैसे देवराज इंद्र के द्वारा जलप्रलय लाना या सूर्यदेव के द्वारा सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देना। यह सब भी शक्ति प्रदर्शन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

दैत्यों ने हमेशा त्रिदेवों से ही शक्ति प्राप्त कर, उनका प्रयोग देवताओं के ही विरुद्ध किया है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, मनुष्यों ने भी घोर तप किये हैं।

कुछ ऐसी ही देवशक्तियों को, पृथ्वी की सुरक्षा के लिये, देवताओं ने पृथ्वी के अलग-अलग भागों में छिपा दिया, जिससे समय आने पर कुछ दिव्य मानव, उन देव शक्तियों को धारण कर, पृथ्वी की सुरक्षा का भार उठा सकें।

ऐसे ही देवशक्ति धारक कुछ विलक्षण मनुष्य बाद में ब्रह्मांड रक्षक कहलाये।

समयचक्र- डेल्फानो ग्रह समाप्त होने के बाद, वहां के राजा गिरोट ने अपनी सबसे अद्वितीय रचना समयचक्र को पृथ्वी पर फेंक दिया, जो कि ब्लैक होल के सिद्धांतों पर कार्य करती थी।

यह समयचक्र पृथ्वी पर आने के 20 वर्षों तक सुप्तावस्था में रहा। एक दिन अचानक ही यह समयचक्र अपनी शक्तियों से, समय के कई आयामों को बांधने की कोशिश करने लगा।

इस समयचक्र के पास समय और ब्रह्मांड में यात्रा करने की अद्भुत शक्तियां थीं, पर इसी अद्भुत
शक्तियों को प्राप्त करने के लिये कुछ अंतरिक्ष के जीव भी पृथ्वी पर आ गये।

उन जीवों के पास दूसरी आकाशगंगा की अनोखी शक्तियां थीं, जो हमारे विज्ञान की कल्पनाओं से भी परे थीं।

इसी के साथ शुरु हुआ एक अनोखा टकराव, जिससे अनगिनत प्रश्नों की एक श्रृंखला खड़ी हो गई.

1) क्या व्योम और त्रिकाली, विद्युम्ना की जलशक्ति से बने मायाजाल में, देवराज इंद्र के वज्र से बच सके?

2) क्या हुआ जब कालकूट विष से बने नीलाभ को ब्रह्मांड में, महा..देव के पंचमुखी दर्शन हुए?

3) क्या हुआ जब ओरस, स्वयं अपने ही समयचक्र के जाल में फंसकर समययात्रा कर बैठा?

4) क्या सुयश अपने साथियों के साथ तिलिस्मा के मायाजाल में घूम रही पांचों इन्द्रियों को परास्त कर सका?

5) कौन था अष्टकोण में छिपा वह दिव्य बालक, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था?

6) क्या हुआ जब देवशक्ति धारक माया का टकराव, ग्रीक देवताओं से हुआ?

7) क्या था महा..देव की अमरकथा का रहस्य, जिसे देव ने देवी पा..ती को सुनाया था?

8) वी…भद्र और भद्रक..ली ने किस प्रकार से नीलाभ की परीक्षा ली?

9) क्या धनवंतरी के आयुर्वेद में सभी रोगों का निदान छिपा था?

10) क्या देवशक्ति धारक योद्धा, डार्क मैटर, नेबुला, ब्लैक होल जैसी शक्तियों से पृथ्वी की रक्षा कर पाये?

तो आइये दोस्तों कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिये पढ़ते हैं, विज्ञान और ईश्वरीय शक्ति के मध्य, रहस्य के ताने-बाने से बुना एक ऐसा अविस्मरणीय कथानक, जो आपको मानव शरीर और इन्द्रियों का अद्भुत ज्ञान देगा, जिसका नाम है "अद्भुत दिव्यास्त्र"

चैपटर-1
इंद्रसभा:
(20,005 वर्ष पहले.......) देवराज इंद्र का दरबार, स्वर्गलोक

स्वर्गलोक- एक ऐसा स्थान, जहां जीवित रहते कोई भी मनुष्य नहीं जाना चाहता, पर मृत्यु के उपरांत हर मनुष्य वहीं रहने की कामना करता है।

स्वर्गलोक- पृथ्वी का एक ऐसा भूभाग, जिसके बारे में कोई नहीं जानता, कि वह कहां पर है? एक ऐसा स्थान, जहां देवताओं का निवास है। वह देवता जिन्हें आदित्य भी कहते हैं।

त्रिदेवों ने देओं का राजा इंद्र को चुना था। सूर्य, अग्नि, पवन, वरुण, यम आदि सभी देव इंद्र के साथ मिलकर मनुष्यों की सहायता करते हैं।

इस समय स्वर्गलोक में इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देव, सिंहासनों पर बैठे हुए थे, पर किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें आज यहां किसलिये बुलाया गया है? बस उन्हें इतना बता या गया था, कि यह सभा त्रि..देवों के कहने पर बुलाई गई है, इसलिये सभी धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।

इंद्र भी सभा के मध्य, अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। पर इस समय इंद्र के चेहरे की बेचैनी, ये साफ बता रही थी, कि इस सभा का उद्देश्य उन्हें भी नहीं पता है। सभी के चेहरे पर बेचैनी एवं असमंजस के भाव थे।

आखिरकार गमणेश से रहा नहीं गया और उसने इंद्र से पूछ लिया- “देवराज, हमें यहां बैठे बहुत समय बीत गया है, पर आप तो कुछ बता ही नहीं रहे, कि आपने हम सभी को यहां किसलिये बुलाया है?"

गणे.. के शब्द सुन इंद्र डर गये। अब वो ये भी नहीं कह सकते थे कि उन्हें भी नहीं पता, नहीं तो सभी देवताओं के सामने उनका अपमान हो जाता।

अतः इंद्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कहा- “कुछ देर और प्रतीक्षा करो गमणेश, त्रि..वों ने हमें कुछ भी बताने से मना किया है, बस वह अब आते ही होंगे। उनके आते ही हम आपको सब कुछ बता देंगे।

इंद्र की बात सुन कार्तिकय जोर से हंस दिया, वो इंद्र का चेहरा देखकर ही जान गया था, कि इंद्र को कुछ नहीं पता?

तभी सभा में एक तीव्र प्रकाशपुंज उत्पन्न हुआ और उस प्रकाशपुंज से त्रि..मदेव प्रकट हो गये।
उन्के आगमन से, सभी के वार्तालापों का भ्रमरगुंजन स्वतः ही समाप्त हो गया। सभी उनके सम्मान में अपने-अपने सिंहासन से खड़े हो गये।

त्रि.देवों के साथ नीलाभ और माया भी थे। गमणेश ने माया को देखकर, अपनी पलकें जोर से झपकाईं।

यह एक प्रकार का शरारत भरा अभिवादन था। माया ने भी मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका कर गणे.. का अभिवादन स्वीकार कर लिया।

माया को देखकर हनुरमान.. को भी वह नन्हा यति याद आ गया। नन्हें यति को यादकर वह एक पल को सिहर उठे।

त्देवों के साथ नीलाभ और माया को देखकर, इंद्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये, वह समझ गये कि अवश्य ही कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है, क्यों कि त्रि..देव आज तक किसी को भी लेकर इंद्रसभा में नहीं आये थे? कुछ ही देर में सभी ने आसन ग्रहण कर लिया।

अब सभी देवताओं की नजर त्र..देवों पर थी, सभी साँस रोके बस उन्हें ही देखे जा रहे थे। भगवान व…ष्णु ने महानदेव को बोलने का इशारा किया।

“देवों आप सभी को भली-भांति पता है, कि पृथ्वी पर युगों को 4 भागों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग।” महानदेव ने कहा - “पहले 3 युगों में मनुष्य हमारे अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह वेद के माध्यम से देवताओं की आराधना करता है, जिसके फलस्वरुप देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और उसे असुरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। परंतु कलयुग में मनुष्य हमारे अस्तित्व को नकार देता है। हम स्वयं भी इन्हीं कारणों से मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, परंतु फिर भी हमें उनकी सुरक्षा का दायित्व लेना पड़ता है।

“कलयुग में मनुष्यों की तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों की ओर भी झांकना शुरु कर देते हैं और मनुष्यों की यह क्रिया, प्रत्येक बार उनके विनाश का कारण बनती है। ऐसे समय में हम स्वयं भी, उन मनुष्यों की किसी भी प्रकार से सुरक्षा नहीं कर पाते। इसलिये हमने कलयुग में भी मनुष्यों की रक्षा के लिये एक अनूठा उपाय सोचा है। हम चाहते हैं कि हम सभी देव, अपनी एक देवशक्ति को किसी ऐसे मनुष्य को प्रदान करें, जो कि ब्रह्मांड रक्षक बनकर कलयुग में, हमारी अनुपस्थिति में भी, मनुष्यों की रक्षा कर सके।" यह कहकर महानदेव शांत हो गये।

“पर ..देव, हम ऐसे मनुष्यों का चयन कैसे करेंगे? जो हमारी शक्ति को धारण कर ब्रह्मांड रक्षक का कार्य भली-भांति कर सके।” इंद्र ने परेशान होते हुए कहा।

“और ..देव ऐसे मनुष्यों के चयन में तो हजारों वर्ष लग सकते हैं और फिर हम उनकी परीक्षा कैसे लेंगे? कि वह देवशक्ति को धारण करने योग्य हैं कि नहीं?” सूर्य ने कहा।

"हमें पता है कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। ब्रह्म.. ने कहा- “पर इसका भी उपाय हमारे पास है।... आप में से कोई यह बताये कि हमारे पास ऐसा कौन सा ज्ञान का भंडार है? जो कभी खाली नहीं होगा और वह हमेशा सभी मनुष्यों को उचित मार्ग दिखायेगा।"

“वेदों का ज्ञान।” गमणेश ने हाथ उठाते हुए कहा “वही एक ऐसा ज्ञान है, जो कलयुग में भी सभी को उचित मार्ग दिखा सकता है।'

"बिल्कुल सही कहा ..गमणेश ने।” ब्रह..देव ने अपने एक हाथ में पकड़े वेद को सभी को दिखाते हुए कहा "वह वेदों का ज्ञान ही होगा, जिसके द्वारा हम उचित मनुष्य का चुनाव कर सकते हैं और वेदों के ज्ञानार्जन के बाद, वह मनुष्य कभी भी, कलयुग में भी, अपने मार्ग से विमुख नहीं होगा।”

“परंतु ब्रह्म.., इस वेद को समझना मनुष्य के मस्तिष्क से परे होगा।” कार्तिक... ने कहा- “यह तो अत्यंत जटिल भाषा में है, इसे तो मैं स्वयं भी अभी समझने की कोशिश कर रहा हूं।"


“भ्राता श्री, ये मैं आपको अच्छे से समझा दूंगा। मुझे यह बहुत अच्छे से आ गया है।" गमणेश ने अपनी भोली सी भाषा में कहा।

“मुझे तुमसे ज्ञान लेने की जरुरत नहीं है, मैं इसे स्वयं समझ लूंगा।” कर्तिके.. को उनकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

ब्रह्म… ने कार्तिके.. की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह पुनः बोले- “तुम सही कह रहे हो, इसकी भाषा अत्यंत जटिल है, परंतु आज से हजारों वर्षों के बाद, जब कलयुग का पृथ्वी पर प्रवेश होने वाला होगा, तो पृथ्वी पर एक ऋषि कृष्ण द्वैपायन का जन्म होगा। वही ऋषि इस 1 वेद को 4 भागों में विभक्त कर, इसे नया आकार देंगे और वेदों के इसी विभाजन के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास के नाम पर जाना जायेगा। वेद व्यास का अभिप्राय ही होगा, वेदों का विभाजन करने वाला। अब रही बात वेदों के इस विभाजन को सरलता देने की, तो मुझे लगता है कि यह कार्य गणे… बहुत आसानी से कर लेंगे। क्यों गमणेश हमने उचित कहा ना?"

“जी देव, आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।” गणे.. ने सिर झुकाते हुए कहा।

"तो अब बचता है कार्य, मनुष्यों के चयन और उन्हें वेदों का ज्ञान देने का।” तो इसके लिये हम अपने साथ, यहां नीलाभ और माया को लेकर आये हैं। माया निर्माण शक्ति में पूर्ण निपुण है और निर्माण शक्ति के ही माध्यम से, माया पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर, 15 लोकों का निर्माण करेगी। यह लोक पूर्णतया, एक भव्य नगर की भांति होंगे। इन 15 लोकों में हम 30 अद्भुत शक्तियों को छिपा देंगे और जो मनुष्य वेदों का ज्ञान अर्जित कर, इन 30 शक्तियों को प्राप्त करेगा, उसे ही हम अपनी देवशक्तियां देंगे। अब इसके लिये माया को हिमालय पर, एक विद्यालय 'वेदालय' की रचना भी करनी होगी। जहां पर कुछ चुने हुए मनुष्यों के बालकों को, नीलाभ वेदों के माध्यम से शिक्षा देंगे और उन बालकों को इतना निपुण बनायेंगे कि वह देवशक्ति धारण करने योग्य हो जायें।"

"बालको के हाथ में देवशक्ति देना क्या उचित होगा देव?” पवन ने कहा।

"क्यों नहीं पवनदेव।” ब्रह्म… ने कहा- “वेदालय की प्रतियोगिताएं इतनी दुष्कर होंगी कि आप भी उन्हें सरलता से पूर्ण नहीं कर पायेंगे और अगर वह बालक उसे पूर्ण कर लेते हैं, तो उन्हें देवशक्ति देने में दुविधा ही क्या है?”

“परंतु देव, वह बालक जब तक उन देवशक्तियों का प्रयोग सही से सीखेंगे, तब तक तो वह बूढ़े हो जायेंगे। मनुष्यों की आयु आखिर होती ही कितनी है?" वरुण ने कहा।

"हां, यह बात आपने सही कही वरुणदेव।" ब्रह्म.. ने कहा- “इसी के लिये विद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात्, हम उन्हें अमृतपान करायेंगे, जिससे वह भी आप लोगों की तरह, अमृत्व को प्राप्त कर लेंगे और युगों युगों तक निष्पक्ष भाव से ब्रह्मांड रक्षक का कार्य करते रहेंगे।

यह बात सुन कर इंद्र का हृदय कांप गया। वह सोचने लगे कि कहीं वह मनुष्य आगे चलकर, देवशक्तियों की शक्ति से, उनका ही सिंहासन ना छीन लें? परंतु इंद्र जानते थे कि इस समय त्रि..देवों के सामने कुछ भी बोलना सही नहीं है? अन्यथा वह कहीं अभी ही सिंहासन से ना हटा दिये जायें?

यह सोच इंद्र ने वापस देवों की ओर देखना शुरु कर दिया। पर जैसे ही इंद्र की नजरें भगवान वहिष्णु से टकराईं, वह एकाएक सटपटा गये, क्यों कि भगवान ..ष्णु मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे।

इंद्र को लगा कि जैसे उनकी चोरी पकड़ ली गई हो, इसलिये वह जल्दी से इधर-उधर देखने लगे।

“चलिये अमृतपान भी ठीक है, पर वह विवाह तो करेंगे ना? फिर विवाहोपरांत वह अपने मार्ग से भ्रमित भी हो सकते हैं? उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का भार सर्वोपरि लगने लगेगा। फिर वह ब्रह्मांड रक्षक का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पायेंगे?” गुरु बृहस्पति ने कहा।

"नहीं, वह तब तक विवाह नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें स्वयं के समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं मिल जाता? जब उन्हें दूसरा मनुष्य मिल जायेगा, तो वह अपनी शक्तियों के साथ, अपना अमरत्व भी दूसरे मनुष्य को दे देंगे और स्वयं विवाह कर, एक साधारण मनुष्य की जिंदगी जी सकेंगे।" ब्रह्देव ने कहा।

"क्या हम उन लोकों के नाम जान सकते हैं ब्देव?” शेषनाग ने कहा।

“अवश्य।” यह कह देव ने उन लोकों के नाम बताना शुरु कर दिया- “देवलोक, शक्ति लोक, राक्षसलोक, ब्रह्म…लोक, नागलोक, माया लोक, हिमलोक, नक्षत्रलोक, पाताललोक, भूलोक, सिंहलोक, रुद्रलोक, यक्षलोक, प्रेतलोक और मत्स्यलोक।"

शेषनाग, नागलोक का नाम सुनकर ही प्रसन्न हो गये।

Jaaari rahega……
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