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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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वाह वाह क्या गजब का जबरदस्त खतरनाक और अद्भुत अविश्वसनीय अपडेट हैं भाई मजा आ गया
Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanks: Sath bane rahiye
 
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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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बहुत ही शानदार लाजवाब और रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट हैं भाई मजा आ गया
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sunoanuj

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#177.

“शैफाली, पहले क्या तुम मुझे बताओगी कि यह सब क्या हो रहा है?” सुयश ने बीच में ही शैफाली को टोकते हुए कहा।

शैफाली ने जल्दी-जल्दी झील के अंदर की सारी घटना सुयश सहित सभी को सुना दी। इसके बाद वह फिर परी की ओर घूम गई।

“क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारा नाम क्या है? और तुम यहां कैद होने से पहले कहां रहती थी?” शैफाली ने फिर परी से एक सवाल कर दिया।

“मेरा नाम...मेरा नाम मुझे याद नहीं आ रहा। यहां तक कि मुझे यह भी याद नहीं कि मैं कहां रहती थी, बस मुझे इतना पता है कि मेरे पास हिम के स्वर हैं और उनके द्वारा मैं जादू कर सकती हूं।” परी ने कहा।

“हिम के स्वर?” तभी शैफाली को कविता की दूसरी पंक्ति याद आ गई- “थिरक उठेंगे हिम के स्वर।”
यह सोच शैफाली ने उस परी से कहा- “जरा हमें भी तो हिम के स्वर का जादू दिखाओ। हम तो देखें कि तुममें कितनी प्रतिभा है?”

शैफाली के यह कहते ही उस परी ने अपने हाथ में पकड़े राजदण्ड को हवा में हिलाया। परी के ऐसा करते ही, उसके राजदण्ड में आगे लगे बैंगनी मोती से, कुछ किरणें हवा में निकलीं और इसी के साथ हवा में एक बैंगनी रंग की तितली प्रकट हो गई।

वह तितली जैसे-जैसे अपने पंख हिला रही थी, वातावरण में गुलाबी रंग के अजीब से फाहे फैलते जा रहे थे।

इसी के साथ बर्फ से अजीब से मधुर स्वर निकल कर वातावरण में गूंजने लगे।

जैसे ही वह स्वर ऐलेक्स के कानों में पड़े, ऐलेक्स के शरीर की बर्फ पिघलने लगी। कुछ ही देर में ऐलेक्स बिल्कुल सही हो गया।

जैसे ही ऐलेक्स सही हुआ, वह परी चीख उठी- “मुझे बचा लो...मुझे कुछ हो रहा है, मैं मरना नहीं चाहती, मैं यहां से बाहर जाना चाहती हूं।”

तभी परी का शरीर हवा में धुंआ बनकर उड़ गया, अब बस हवा में उसकी चीखें बचीं थीं।

वातावरण से भी अब बैंगनी रंग पूरी तरह से गायब हो चुका था।

शैफाली को छोड़ किसी की समझ में नहीं आया कि उस परी के साथ क्या हुआ? और वह गायब होकर कहां चली गई।

परी को गायब होता देख, शैफाली की पेशानी पर बल पड़ गये। अब उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आनें लगीं।

यह देख सुयश ने शैफाली से पूछ लिया- “ये परी अचानक से कहां गायब हो गई? उसे उसका अतीत याद क्यों नहीं आ रहा था? और तुम्हारे चेहरे पर यह चिंता की लकीरें क्यों हैं शैफाली?”

“कैप्टेन अंकल, कुछ तो गलत हो रहा है तिलिस्मा में?...जो मुझे चिंता में डाल रहा है” शैफाली ने चिंतित स्वर में कहा- “दरअसल यह परी कैश्वर का ही बनाया हुआ तिलिस्मा का एक प्रोजेक्ट थी, जो कि अपना
कार्य समाप्त करके स्वतः गायब हो जाती, पर जाने कैसे इस परी को ये महसूस होने लगा, कि वह एक जीवित परी है और इसने अपने कार्य को अपनी कहानी बना लिया। ऐसा तभी हो सकता है, जबकि कैश्वर के बनाये इन प्राणियों में अपने आप भावनाएं आ जाएं।

“अगर इन प्राणियों में भावनाएं आ गईं, तो यह अपना कार्य करना छोड़ एक स्वतंत्र प्राणी की भांति जीने को सोचने लगेंगे और यह स्थिति पूरी पृथ्वी के लिये खतरनाक हो जायेगी। क्यों कि यह काल्पनिक प्राणी, तब जीवित प्राणियों से युद्ध करना शुरु कर देंगे और पृथ्वी का जीवनचक्र खराब कर देंगे। मुझे नहीं पता कि अभी ये भावना एक ही प्राणी में थी या फिर सभी में आ गई है। क्यों कि अगर यह भावना सभी तिलिस्मा के प्राणियों में आ गई, तो वह प्राणी नियमों के विरुद्ध जाकर हमें इस तिलिस्मा को पार नहीं करने देंगे, क्यों कि हमारे द्वार पार करते ही वह स्वतः खत्म हो जायेंगे।”

“मुझे तो लगता है कि कैश्वर को ईश्वर बनने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है, इसलिये वह जान बूझकर सभी प्राणियों में भावनाएं डाल रहा है, जिससे हम इस तिलिस्मा को पार नहीं कर सकें।” सुयश ने गुस्साते हुए कहा।

“चलो, फिलहाल इस द्वार को पार करते हैं फिर आगे की बाद में सोचेंगे।” तौफीक ने सबको याद दिलाते हुए कहा।

“इस द्वार की सभी चीजें तो समाप्त हो गईं, फिर भी अभी तक हमें यहां से निकलने का दरवाजा क्यों नहीं मिला?” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

तभी शैफाली की नजर जमीन पर गिरी, एक लाल रंग की गोल सी वस्तु पर गई, जो कि एक कंचे के समान था।

शैफाली ने आगे बढ़कर उसे ध्यान से देखा। वह कंचा नहीं बल्कि उसी मिसगर्न मछली की आँख थी, जिसकी खाल से शैफाली ने दस्ताने बनाये थे।

“जब सबकुछ गायब हो गया, तो यह आँख अभी तक क्यों गायब नहीं हुई?” यह सोच शैफाली ने आगे बढ़कर उस मछली की आँख को उठा लिया।

पर जैसे ही शैफाली ने उस आँख को जमीन से उठाया, उस आँख का आकार तेजी से बढ़ने लगा।

यह देख शैफाली ने घबराकर उस मछली की आँख को अपने हाथों से छोड़ दिया।

जमीन पर गिरते ही वह आँख फिर से सामान्य आकार की हो गई। शैफाली ने दोबारा से उसे उठाने की कोशिश की, परंतु फिर से वह आँख बड़ी होने लगी। शैफाली ने दोबारा उस आँख को जमीन पर छोड़ दिया।

यह देख ऐलेक्स ने गुस्साते हुए उस मछली की आँख को उठाकर ऊपर आसमान में उछाल दिया- “अरे फेंको इसे...यह मछली की नहीं, बल्कि शैतान की आँख है।”

अब वह मछली की आँख तेजी से आसमान की ओर जा रही थी और हर अगले पल में आकार में दुगनी होती जा रही थी।

कुछ ही देर में वह आँख अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच गई। परंतु अब उसका आकार किसी ग्रह के बराबर हो गया था और अब वह सब पर गिरने के लिये नीचे आ रही थी।

“हे भगवान ये क्या बला है?” क्रिस्टी ने गुर्राते हुए कहा- “अब यह मछली की आँख, हम सबकी माँ की आँख करने वाली है।”

किसी के पास ना तो बचने का कोई उपाय था और ना ही छिपने की जगह। कुछ ही पलों में वह मंगल ग्रह के समान मछली की आँख उन सब पर आ गिरी।

सभी की आँखें डर के मारे बंद हो गईं और उनके मुंह से चीख निकल गई। जब सबकी आँखें खुलीं तो वह वापस पृथ्वी के ग्लोब वाले स्थान पर थे।

“वह तिलिस्मा के उस भाग से बाहर निकलने का द्वार था?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “भगवान बचाये ऐसे द्वार से....मुझे तो लगा कि अब हम सबका काम खत्म हो गया।”

“चलो दोस्तों, अब तिलिस्मा के चौथे भाग के आखिरी द्वार की ओर चलते है, जहां हमें ग्रीनलैंड जाकर वसंत ऋतु की बाधा को दूर करना है।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी पृथ्वी के ग्लोब की ओर एक बार फिर से बढ़ गये।


विद्युम्ना का रहस्य:
(2 दिन पहले...... 15.01.02, मंगलवार, 07:30, महावृक्ष, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

व्योम, त्रिकाली, युगाका और कलाट महावृक्ष के सामने खड़े थे।

“हे महावृक्ष हमारे परिवार की नयी अमरबेल को आपके आशीर्वाद की जरुरत है। अतः नये वर-वधू को अपने आशीर्वाद से कृतार्थ करें।” कलाट ने महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“महाशक्ति के रक्षक को हम पहले ही आशीर्वाद दे चुके है कलाट।” महावृक्ष की आवाज वातवरण में गूंजी- “अब तो बस इनके प्रेम की परीक्षा का समय है।”

“परीक्षा ? कैसी परीक्षा महावृक्ष?” युगाका ने आश्चर्य से महावृक्ष को देखते हुए कहा।

“ठीक वैसी ही, जैसी मैंने बचपन में तुम्हारी परीक्षा ली थी।” महावृक्ष ने कहा।

युगाका अपनी बचपन की परीक्षा को याद कर सिहर उठा, अचानक से उसे अपने शरीर के जलने का अहसास याद आ गया।

“हम किसी भी प्रकार की परीक्षा देने को सहर्ष तैयार है महावृक्ष।” व्योम ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ, इस विषम परीक्षा के लिये।” अचानक महावृक्ष की आवाज बहुत तेज हो गई।

ऐसा लगा जैसे महावृक्ष बहुत क्रोध में आ गया हो। अचानक से व्योम और त्रिकाली के सामने से कलाट और युगाका गायब हो गये और महावृक्ष ने अपने शरीर को विकराल कर लिया।

अब व्योम और त्रिकाली को अपना शरीर हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया।

इसी के साथ व्योम और त्रिकाली महावृक्ष की कोटर से होते हुए उसके अंदर समा गये। अंदर इतनी तीव्र रोशनी थी कि दोनों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगी, अब त्रिकाली और व्योम ने अपने चारो ओर देखा, उनके सामने आसमान में विशाल रुप में विद्युम्ना के चेहरा दिख रहा था।

नीचे जमीन पर, एक काँच की ट्यूब में त्रिशाल और कलिका बंद थे। उस काँच की ट्यूब के सामने 3 व्यक्ति खड़े थे। एक व्यक्ति जल से निर्मित एक जलमानव लग रहा था।

दूसरा व्यक्ति एक 20 फुट का शक्तिशाली दानव था, जिसने अपने हाथ में कुल्हाड़ा पकड़ रखा था और तीसरा व्यक्ति एक मरियल सा सुकड़ी हड्डी वाला एक बालक था।

“हा ऽऽऽ हा ऽऽऽऽ हा ऽऽऽऽ तो तुम दोनों आये हो विद्युम्ना का विनाश करने।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “जब 2 दिव्य शक्तियों के पास होने के बावजूद भी तुम्हारे माता-पिता मेरा कुछ नहीं कर पाये, तो तुम बच्चे लोग क्या कर पाओगे?”

“यह हम सीधे विद्युम्ना के पास कैसे पहुंच गये? महावृक्ष तो हमारी परीक्षा लेने जा रहे थे।” व्योम ने फुसफुसा कर त्रिकाली से पूछा।

“मुझे भी नहीं पता, पर महावृक्ष कुछ भी कर सकते हैं?” त्रिकाली ने व्योम के समीप जाते हुए कहा।

“तो आओ, जो काम कल करना था, वह आज ही करते हैं।” व्योम ने अपने दाँत भींचते हुए कहा और इसी के साथ व्योम के हाथ में पंचशूल प्रकट हो गया।

त्रिकाली के भी दोनों हाथ बर्फ से भर गये।

“मेरे पास महादेव की दी हुई त्रिशक्ति की ताकत है, जिसे तुम कभी परास्त नहीं कर सकते व्योम।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम्हें पहले मेरी जल शक्ति से टकराना होगा।”

इतना कहते ही विद्युम्ना की आँखों से एक तरंग निकली और इसी के साथ जलमानव, एक छोटी सी झील के ऊपर खड़ा दिखाई देने लगा।

“तुम्हें इस जलमानव से इस झील के ऊपर ही लड़ना होगा व्योम। इस जलमानव की शक्ति जल ही है और तुम्हें इसे हराना भी जल के ही ऊपर होगा।” विद्युम्ना ने कहा।

यह देख व्योम उछलकर जल की सतह पर जा खड़ा हुआ- “ठीक है, तो फिर मैं इसे जल के ऊपर ही परास्त करुंगा।”

त्रिकाली हैरानी से व्योम को जल के ऊपर चलते हुए देख रही थी, त्रिकाली को व्योम की इस शक्ति के बारे में कुछ नहीं पता था।

यह व्योम की गुरुत्व शक्ति का कमाल था, जिसकी वजह से वह जल की सतह पर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो खड़ा था।

जलमानव ने व्योम को जल के ऊपर आते देख, व्योम पर जल की बूंदों से प्रहार किया। उन बूंदों के शरीर पर पड़ते ही व्योम का शरीर कई जगह से जल गया, पर पंचशूल ने तुरंत ही व्योम के शरीर को सही कर दिया।

अब व्योम ने पंचशूल को फेंककर, जलमानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। पर जलमानव का सिर तुरंत से वापस जुड़ गया। यह देख व्योम ने इस बार पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचा कर फेंका।

पंचशूल ने पंखे की तरह से घूमते हुए जलमानव के शरीर के असंख्य टुकड़े कर झील में दूर-दूर तक फेंक दिये। पर कुछ ही देर में झील के जल ने सभी टुकड़ों को जोड़कर जलमानव को फिर से खड़ा कर दिया।

यह देख व्योम ने त्रिकाली को एक इशारा किया। इस बार जैसे ही जलमानव पूरी तरह से जुड़ा, त्रिकाली ने अपनी बर्फ की शक्तियों से जलमानव को पूरा का पूरा जमा दिया।

जलमानव को जमते देख व्योम ने एक बार फिर पंचशूल का उपयोग कर जलमानव के टुकड़े कर दिये, पर जैसे ही वह सभी बर्फ के टुकड़े पानी के सम्पर्क में आये, वह फिर से पिघलकर जलमानव का रुप लेने
लगे।

अब व्योम को यह मुसीबत थोड़ी बड़ी दिखने लगी थी। इस बार जैसे ही जलमानव सही हुआ, व्योम ने अपने पंचशूल से ऊर्जा का एक तेज प्रहार जलमानव पर किया।

इस ऊर्जा ने अग्नि के रुप में जलमानव को पिघलाकर पूर्णतया भाप में परिवर्तित कर दिया।

अब वह भाप झील के पानी से मिक्स नहीं हो सकती थी, यह देख व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

उसने मान लिया कि जलमानव अब खत्म हो गया। पर कहते हैं ना, कि जो सोचो, वह चीज उस हिसाब से होती नहीं है और यह कहावत यहां पूरी तरी के से चरितार्थ हो रही थी।

हवा में तैर रहे उन भाप के कणों ने आपस में मिलकर एक बादल का रुप ले लिया और बारिश बनकर वापस झील के पानी में मिल गये।

यह देख विद्युम्ना की हंसी फिर से वातावरण में गूंज गई- “यह जलमानव महा…देव की शक्ति से निर्मित है व्योम, यह इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगा।”

जलमानव एक बार फिर जल की सतह पर खड़ा हो गया था।

इस बार व्योम ने अपना बांया हाथ जलमानव की ओर कर हवा में लहराया, पर व्योम के इस प्रहार से जलमानव को कुछ होता दिखाई नहीं दिया? अब एक बार फिर व्योम ने त्रिकाली की ओर देखकर मदद मांगी।

त्रिकाली ने फिर से जलमानव के शरीर को बर्फ में विभक्त कर दिया। इस बार व्योम ने आगे बढ़कर एक प्रचण्ड घूंसा उस जलमानव के सिर पर मार दिया।

जलमानव हर बार की तरह फिर खण्ड-खण्ड हो बिखर गया। पर इस बार जलमानव का शरीर पानी से नहीं मिला, वह बर्फ के सारे टुकड़े अब जल की सतह से कुछ ऊपर हवा में तैर रहे थे।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह कौन सी शक्ति है व्योम?”

“यह गुरुत्वाकर्षण को मुक्त करने वाली शक्ति है, अब इस शक्ति के माध्यम से यह बर्फ के टुकड़े पानी से कभी नहीं मिल सकते, यह इसी प्रकार से हवा में घूमते रहेंगे।” व्योम ने कहा- “अब दूसरी शक्ति को भेजो विद्युम्ना....मैं आज सभी को हराकर त्रिकाली के माता-पिता को यहां से ले जाऊंगा।”

यह देख विद्युम्ना ने उस दानव को अब व्योम से लड़ने के लिये भेज दिया - “यह मेरी बल शक्ति है, इसके बराबर का बल दुनिया में किसी के पास नहीं है और इस पर तुम्हारे पंचशूल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके सामने तुम्हारा पंचशूल मात्र एक साधारण अस्त्र की तरह है। परंतु तुम्हें इससे जल पर नहीं, जमीन पर लड़ना होगा।”

उस दानव ने अब व्योम पर अपने कुल्हाड़े से आक्रमण कर दिया। व्योम ने उस दानव का वार अपने पंचशूल पर रोक लिया। अब व्योम ने पंचशूल को हवा में नचाते हुए दानव पर वार कर दिया, पर उस वार को दानव ने आसानी से बचा लिया।

अब व्योम और दानव के बीच युद्ध शुरु हो गया था। कभी लगता कि व्योम दानव पर भारी पड़ रहा है, तो कभी दानव व्योम पर भारी पड़ते दिखाई देता।

त्रिकाली मात्र दर्शक बनी उस युद्ध को निहार रही थी। लगभग आधा घंटा ऐसे ही लड़ते रहने के बाद, व्योम समझ गया कि उस दानव को ऐसे नहीं हराया जा सकता।

“अवश्य ही इस दानव के पास कोई ऐसी चमत्कारी शक्ति है? जो यह प्रयोग कर रहा है, पर मुझे वह दिखाई नहीं दे रही है” व्योम अपने मन ही मन में बड़बड़ाया- “विद्युम्ना इस दानव को ‘बल’ कह कर सम्बोधित कर रही थी, कहीं इसके नाम में ही तो कोई रहस्य नहीं छिपा?”

यह सोच अब व्योम लड़ते हुए उस दानव को ध्यान से देखने लगा। कुछ ही देर में व्योम ने उस दानव की एक आदत को पकड़ लिया और वह आदत थी कि कुछ देर लड़ने के बाद वह दानव अपने पैर को जमीन पर मार रहा था।

“यह बार-बार अपने पैर को जमीन पर मार रहा है, कहीं ये पृथ्वी से कोई शक्ति तो नहीं ले रहा।“ अब व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी।

व्योम को मुस्कुराते देख त्रिकाली ने कहा- “दिमाग खराब हो गया है क्या? यह तुम मुस्कुराकर क्यों लड़ रहे हो ?”

“क्या तुम न्यूटन को जानती हो?” व्योम ने लड़ते-लड़तें अजीब सा सवाल त्रिकाली से कर लिया।

त्रिकाली ने ‘ना’ में अपना सिर हिला दिया। यह देख व्योम ने उस दानव पर अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रयोग कर दिया।

अब उस दानव के पैर जमीन को छोड़ हवा में लहराने लगे। अब वह दानव बहुत कोशिश करने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

तभी व्योम ने इस बार उछलकर एक जोर का मुक्का उस दानव के सिर पर मारा, दानव तुरंत वहीं गिर कर बेहोश हो गया।

यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह तुमने कैसे किया व्योम?”

“पृथ्वी के एक महान वैज्ञानिक ने कहा था कि बल हमेशा द्रव्यमान (भार) और उसके त्वरण (गति) पर निर्भर होता है। यानि की अगर हमारा वजन जितना ज्यादा हो, हम अपनी गति से उतना बल उत्पन्न कर सकते हैं, तो बस मैंने उन्हीं वैज्ञानिक के कथनों को विचार करते हुए, अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से इस दानव के भार को ही समाप्त कर दिया। अब जब किसी का भार ही नहीं बचा, तो उसमें बल कहां से आयेगा? और एक बलरहित दानव को मारने में ज्यादा समय तो लगना नहीं था।”

“बहुत अच्छे।” विद्युम्ना ने व्योम की तारीफ करते हुए कहा- “अब जरा मेरी तीसरी शक्ति से भी निपट लो।”

अब व्योम की नजर विद्युम्ना की तीसरी शक्ति की ओर गई। उस दुबले-पतले बालक को देख व्योम के चेहरे पर हंसी आ गयी- “ये भी लड़ेगा क्या?”

तभी वह बालक धीरे-धीरे व्योम की ओर बढ़ने लगा। व्योम पहले देखना चाहता था कि यह बालक कैसा है? इसलिये व्योम ने उसे कुछ नहीं कहा।

पास आकर उस बालक ने अपना जोर का घूंसा व्योम के पेट में मारा, पर व्योम को उस बालक का घूंसा गुदगुदी के समान महसूस हुआ।

बालक ने अपना मुंह बनाकर, दुखी भाव से विद्युम्ना की ओर देखा और फिर एक बार जोर का हाथ लहरा कर अपना घूंसा व्योम के पेट में मारा, बालक के इस वार से व्योम हवा में उड़ता हुआ 100 फुट से भी
ज्यादा दूर गिरा।

व्योम का पूरा शरीर दर्द से कराह उठा। व्योम को अब अपनी गलती का अहसास हो रहा था। व्योम धीरे से उठकर खड़ा हो गया।

उसने अब अपनी निगाह उस बालक पर डाली, पर तब तक बालक ने त्रिकाली को पकड़कर एक काँच के आदमकद बर्तन में डाल दिया, जो कि हवा में उल्टा लटका था और उस बर्तन का ढक्कन बंद था।

अब त्रिशाल, कलिका और त्रिकाली, तीनो अलग-अलग काँच के बर्तन में हवा में टंगे थे। उनके नीचे जमीन पर एक चाकुओं का बिस्तर सा बना था।

साफ दिख रहा था कि अगर कोई भी उस काँच के बर्तन से गिरा, तो वह सीधे उन धारदार चाकुओं पर गिरेगा।

“कैसा लगा व्योम मेरी छल शक्ति का कमाल?” विद्युम्ना ने कहा- “अब इन तीनों काँच के बर्तनों का बटन मेरे पास है। मैं तीनों बर्तनों का ढक्कन एक साथ खोलूंगी। मेरे ढक्कन खोलते ही तीनों एक साथ इन चाकुओं पर गिरेंगे। अब तुम इन तीनों में से किसी एक को ही बचा सकते हो। और मुझे जानना है कि तुम इन तीनों में से किसे बचाते हो?”

व्योम के पास समय नहीं था सोचने का। अतः उसने एक पल में अपना निर्णय ले लिया।

व्योम अब तेजी से उन चाकुओं की ओर भागा। उसे भागते देख विद्युम्ना ने अपने हाथ में पकड़े यंत्र का बटन दबा दिया।

बटन के दबते ही तीनों शरीर हवा में लहराकर नीचे की ओर जाने लगे। इसी के साथ व्योम किसी को भी बचाने की जगह, उन चाकुओं पर स्वयं लेट गया।

तीनों शरीर व्योम के ऊपर आकर गिरे। अब तीनों लोग तो बच गये थे, पर उनके भार की वजह से सारे चाकू व्योम के शरीर में घुस गये।

यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और त्रिकाली की आँखें बंद हो गईं, जब त्रिकाली की आँखें खुलीं, तो वह और व्योम दोनों ही सकुशल हालत में महावृक्ष के सामने खड़े थे और उनके बगल कलाट और युगाका वैसे ही खड़े थे, जैसा कि वह लोग उन्हें छोड़ कर गये थे।

व्योम और त्रिकाली हैरानी से अपने चारो ओर त्रिशाल व कलिका को ढूंढने लगे।

तभी वातावरण में महावृक्ष की आवाज गूंजी- “कलाट, मेरी परीक्षा पूर्ण हुई, अब व्योम और त्रिकाली विद्युम्ना से टकराने के लिये तैयार हैं।”

“क्या मतलब? क्या यह सिर्फ परीक्षा थी?” व्योम ने उलझे-उलझे से स्वर में पूछा।

“हां व्योम।” महावृक्ष ने कहा- “ये विद्युम्ना, उसकी शक्तियां और त्रिकाली के माता-पिता सब मेरे द्वारा फैलाया भ्रमजाल था। मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था, कि विद्युम्ना कितनी खतरनाक हो सकती है? मैंने अपने भ्रमजाल का निर्माण ठीक उसी प्रकार किया था, जैसे कि विद्युम्ना अपने भ्रमन्तिका का करती है। मुझे ये नहीं पता कि उसकी जल, बल और छल की शक्ति किस प्रकार होगी? पर मैंने तुम्हें अपने भ्रमजाल के माध्यम से समझाना चाहा है कि वह शक्तियां किसी भी प्रकार से हो सकती हैं? इसलिये तुम्हें हर कदम पर सावधान रहना होगा। ......अब तुम यह बताओ व्योम, कि तुम्हें मेरे भ्रमजाल से क्या सीखने को मिला?”

“मैंने सीखा कि शत्रु के चेहरे और उसके शरीर की काया देखकर, उसकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगाना चाहिये। छल शक्ति ने मुझे इसी कारण पराजित किया था क्यों कि मैंने उसके शरीर को देखकर उसकी शक्तियों का गलत आंकलन किया था।” व्योम ने कहा।

“बिल्कुल सही व्योम...पर तुमने भ्रमजाल में एक और गलती की थी, जो तुम्हें अभी तक समझ में नहीं आयी?” महावृक्ष ने कहा- “तुम्हें अपनी शक्तियों के बारे में शत्रु को कभी नहीं बताना है, भले ही वह तुम्हारी कितनी भी तारीफ करते हुए पूछे। दरअसल विद्युम्ना की सबसे खास बात यही है, वह पहले लोगों को शब्दजाल से भ्रमित कर, या फिर उनकी किसी प्रकार से परीक्षा ले, उनकी शक्तियों के बारे में जान जाती है और फिर उनके शक्तियों को देखकर ही वह नये भ्रमन्ति का का निर्माण करती है। तो एक बात हमेशा ध्यान रखना, जब तक तुम उसके सामने ना पहुंच जाओ, तब तक अपनी, किसी एक शक्ति का प्रयोग मत करना, वहीं शक्ति अंत में तुम्हें विजय दिलायेगी।”

“जी महावृक्ष, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा।” व्योम ने हाथ जोड़कर महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा।

“तुमने तो देख ही लिया कलाट कि व्योम ने अंतिम समय में किसी एक को ना बचाकर, सभी को बचाने का प्रयत्न किया और यह एक महाशक्ति धारक की सबसे बड़ी निशानी है। त्रिकाली का चयन उत्तम है।” महावृक्ष ने कलाट की ओर देखते हुए कहा।

“जी महावृक्ष, अब आज्ञा दीजिये। त्रिकाली और व्योम को आज ही हिमालय की ओर प्रस्थान करना है।” कलाट ने महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा और सभी को लेकर सामरा राज्य के महल की ओर चल दिया।

रास्ते भर त्रिकाली के कानों में महा वृक्ष के कहे शब्द गूंज रहे थे- “त्रिकाली का चयन उत्तम है।“

अब वह धीरे-धीरे मुस्कुराकर बीच-बीच में कनखियों से व्योम को देख ले रही थी।


जारी रहेगा_____✍️
Bahut hee badhiya update diya hai!
 

Raj_sharma

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जीव शक्ति:
(18 वर्ष पहले........जुलाई 1977, सीनोर राज्य का समुद्र तट, अराका द्वीप)

सुबह का समय था। आज मौसम भी काफी अच्छा था इसलिये लुफासा और वीनस आज मौज-मस्ती करने के लिये, समुद्र तट के पास आ गये थे।

इस समय लुफासा की आयु साxxx वर्ष और वीनस की आयु मात्र पाxxx वर्ष की थी।

“भाई, आज मौसम कितना अच्छा है, लहरें भी ऊंची-ऊंची उठ रही हैं, चलो ना लहरों के बीच चलें, वहां बहुत मजा आयेगा।” वीनस ने लुफासा को खींचते हुए लहरों की ओर ले जाना चाहा।

“नहीं, जब यहां किनारे से ही इतना अच्छा दृश्य दिख रहा है, तो वहां लहरों के पास जाने की क्या जरुरत है?” लुफासा ने वीनस से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- “अगर लहरों की वजह से तुम्हारा सिर किसी चट्टान से टकरा गया तो?”

“क्या भाई, आप भी कितना डरते हो? हम यहां कोई पहली बार तो नहीं आ रहें हैं ना।” वीनस ने अपनी जीभ निकालकर लुफासा को चिढ़ाते हुए कहा।

“देखो, तुम डरने का नाम मत लो, मैं किसी से नहीं डरता।” लुफासा ने गुस्साते हुए कहा।

“अच्छा ठीक है भाई, अब मैं आपको डरपोक नहीं कहूंगी।” यह कहकर वीनस, लुफासा से थोड़ा दूर गई और फिर तेज से चिल्लाकर भागी- “डरपोक....डरपोक।”

“रुक जा अभी बताता हूं तुझे।” यह कहकर लुफासा भी वीनस के पीछे-पीछे उसे पकड़ने को भागा।

वीनस ने पास आ रही एक समुद्र की लहर को देखा और फिर वहां पड़े एक बड़े से पत्थर पर खड़ी होकर लुफासा के आने का इंतजार करने लगी।

“पकड़ लिया....।” लुफासा ने पत्थर पर चढ़कर वीनस को पकड़ते हुए कहा- “अब बता क्या कह रही थी?”

“भाई....वो...वो....मैं कह रही थी।” तभी समुद्र की तेज लहर ने वीनस और लुफासा दोनों को ही सराबोर कर दिया- “कि...........समुद्र की लहर इस पत्थर के ऊपर तक आने वाली हैं।”

लुफासा ने पहले अपने भीग चुके पूरे कपड़ों को देखा और फिर वीनस को डांटते हुए कहा- “बोलने में इतना देर लगाते हैं क्या? जब तक तुमने बोला, तब तक तो हम भीग चुके थे।”

“इसी लिये तो धीरे-धीरे बोल रही थी कि आपका ध्यान पूरी तरह से लहरों से भटककर मेरी ओर आ जाये और आप भीग जाओ।” वीनस ने शरारत भरे अंदाज में कहा- “भाई, अब तो चलो ना लहरों के बीच, देखो
अब तो आपके कपड़े भी पूरी तरह से भीग गये हैं।”

लेकिन इससे पहले कि लुफासा कोई जवाब दे पाता, उसके नीचे की जमीन हिलने लगी और वह स्वतः ही समुद्र की ओर जाने लगे।

“यह क्या भाई, हमें यह पत्थर समुद्र की ओर क्यों ले जा रहा है?” वीनस ने डरते हुए कहा।

लुफासा पत्थर को सरकते देख उस पर कूद गया और ध्यान से उस पत्थर को देखने लगा।

“अरे, यह पत्थर नहीं बल्कि कोई बड़ा सा कछुआ है, जो अब समुद्र की ओर जा रहा है।” लुफासा ने कहा- “जल्दी से उतर जाओ, नहीं तो यह तुम्हें भी लेकर समुद्र में चला जायेगा।”

“ले जाने दो।” वीनस ने उस कछुए पर आराम से बैठते हुए कहा- “भाई तो ले नहीं जा रहा समुद्र में, तो यह कछुआ ही सही। अब मैं आज से इसे ही भाई कहकर बुलाउंगी, कम से कम यह मेरी बात तो मानता है।
चलो-चलो कछुआ भाई...समुद्र की ओर चलो...और इस लुफासा की बात मत सुनना। यह अच्छा लड़का नहीं है।”

लुफासा अब वीनस को घूरकर देख रहा था, पर उसने भी ना तो वीनस को कछुए से नीचे उतारा और ना ही कछुए को रोका।

लुफासा को लग रहा था कि अभी कुछ आगे जाने के बाद वीनस डर कर कछुए से उतर जायेगी, पर वीनस भी एक नंबर की जिद्दी थी, वह भी लुफासा को परेशान करने के लिये कछुए से उतरी नहीं। बल्कि पानी के पास पहुंचने तक, अपने हाथ हिलाकर लुफासा को ‘बाय’ करती रही।

लुफासा को अब थोड़ी गड़बड़ लगने लगी थी क्यों कि वीनस अब बिल्कुल लहरों के पास पहुंच गई थी।

तभी समुद्र की एक ऊंची सी लहर आयी और जोर से वीनस और कछुए पर गिरी।

जब वह लहर हटी, तो लुफासा को ना तो वीनस कहीं नजर आयी और ना ही वह कछुआ।

यह देख लुफासा बहुत घबरा गया। माता-पिता के जाने के बाद अब वह वीनस को भी खोना नहीं चाहता था।

लुफासा अब चीखकर समुद्र की ओर भागा- “वीनसऽऽऽऽऽऽ।”

पर दूर-दूर तक लहरों के शोर के सिवा कुछ नहीं था। वैसे तो सभी अटलांटियन पानी में साँस लेना जानते थे, यानि की वीनस के डूबने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।

पर लुफासा की चिंता इसलिये भी ज्यादा दिख रही थी क्यों कि एक साधारण द्वीप के किनारे से इतनी आसानी से कोई कहीं नहीं जाता? पर अराका पानी पर तैर रहा एक कृत्रिम द्वीप था, जिसके थोड़ा ही आगे से गहरा समुद्र शुरु हो जाता था और गहरे समुद्र में खतरा पानी नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले विशाल जीव थे।

लुफासा तुरंत वहां पहुंच गया, जहां कि अभी कुछ देर पहले वीनस और कछुआ थे। लुफासा उस स्थान पर पानी में अपना मुंह डालकर अंदर की ओर देखने लगा, पर वीनस आसपास कहीं दिखाई नहीं दी।

अब लुफासा धीरे-धीरे समुद्र में आगे की ओर बढ़ने लगा। कुछ ही देर में लुफासा अराका की धरती से कुछ दूर आ गया, पर पानी में दूर-दूर तक कुछ नहीं था।

तभी लुफासा को अराका की जमीन में पानी के नीचे एक कपड़ा फंसा हुआ दिखाई दिया।

वह कपड़ा देख लुफासा वापस अराका की ओर आ गया। पानी के अंदर, अराका की जमीन में एक झाड़ी के पास वह कपड़ा फंसा था।

लुफासा ने वह कपड़ा खींचा, पर उस कपड़े का दूसरा सिरा वीनस ने पकड़ रखा था, जो कि झाड़ियों के पीछे छिपी एक गुफा में बैठी मुस्कुरा रही थी।

यह देख लुफासा को बहुत गुस्सा आया। वह समझ गया कि वीनस ने जानबूझकर यह शरारत की थी।

तभी वीनस ने लुफासा को मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और तैरकर उस गुफा के अंदर चली गई।

लुफासा को गुस्सा तो बहुत आया, पर फिर भी वो वीनस के पीछे-पीछे उस गुफा के अंदर चला गया।

अंदर काफी अंधेरा था, पर दूर कहीं एक लाल रंग की रोशनी दिखाई दे रही थी। लुफासा पानी के अंदर उस लाल रंग की रोशनी देख आश्चर्य से भर उठा।

अब उत्सुकता वश लुफासा तेजी से उस दिशा में तैरने लगा।

कुछ ही देर में वीनस और लुफासा एक ऐसे स्थान पर पहुंच गये, जिसका एकमात्र द्वार वह गुफा ही दिखाई दे रही थी।

यह स्थान लगभग 500 वर्ग फुट के आकार का था। उस स्थान पर काँच का 1 वर्ग फुट का एक वर्गाकार डिब्बा दिखाई दे रहा था, जिसके अंदर सुर्ख लाल रंग का एक रत्न रखा हुआ था।

उसी रत्न का प्रकाश उस पूरी गुफा में फैला दिखाई दे रहा था। वह गुफा उस लाल प्रकाश में पूरी जगमगा रही थी।

उस रत्न को देख, कुछ देर के लिये लुफासा यह भूल गया कि वह वीनस को डांट लगाने के लिये वहां आया था।

तभी लुफासा को वही समुद्री कछुआ दिखाई दिया, जो कि वीनस को लेकर भागा था। उसे देख लुफासा समझ गया कि इसी कछुए का पीछा करते हुए, वीनस को झाड़ियों के पीछे छिपी यह गुफा दिखाई दी होगी।

अब वह कछुआ भी लाल रंग के प्रकाश की ओर आकर्षित हो गया था। कछुए ने आगे बढ़कर उस काँच के डिब्बे को छू लिया।

उस डिब्बे को छूते ही कछुए के शरीर से लाल रंग का प्रकाश निकलने लगा। अब वह कछुआ खुशी से उस गुफा के चारो ओर चक्कर लगाने लगा।

यह देख वीनस और लुफासा भी तैरते हुए, उस काँच के डिब्बे के पास पहुंच गये।

डिब्बे के ऊपरी सिरे पर एक ढक्कन लगा था, जिसे लुफासा ने हल्के से प्रयास से ही खोल दिया।

अब लुफासा और वीनस की नजरें आपस में टकराईं और दोनों ने एक साथ झपटकर उस लाल रंग के रत्न को उठा लिया।

दोनों का हाथ रत्न पर एक साथ पड़ा, पर लुफासा ने वीनस से वह रत्न छीन लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।

लुफासा और वीनस के छूते ही वह गाढ़े रंग का लाल प्रकाश उन दोनों के शरीर में समा गया और इसी के साथ वह रत्न पता नहीं कहां गायब हो गया?

रत्न के इस प्रकार गायब हो जाने पर दोनों घबराकर, अपने आसपास रत्न को ढूंढने लगे।

तभी वीनस को एक आवाज सुनाई दी- “वह रत्न गायब हो गया, मैंने देखा था।”

वीनस ने हैरान होते हुए अपने आसपास देखा।

तभी वीनस से कुछ दूरी पर पानी में तैर रहा वही कछुआ बोल उठा - “इधर-उधर क्या देख रही हो? मैं ही बोल रहा हूं।”

वीनस कछुए को बोलते देख हैरान हो गई। तभी वीनस को एक महीन गाने की आवाज सुनाई दी।

वीनस ने उस दिशा की ओर देखा, तो उसे कुछ नन्हीं रंग-बिरंगी मछलियां पानी में इधर-उधर घूमती दिखाईं दीं। गाना वही मछलियां गा रहीं थीं।

यह देख वीनस की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, वह भी पानी में तैरते हुए जोर-जोर से मछलियों
वाला गाना गाने लगी।

कुछ देर बाद जब वीनस रुकी, तो उसने देखा कि उसके आसपास सैकड़ों जलीय जंतु उसे हैरानी से गाते हुए देख रहे थे और लुफासा डरा-डरा गुफा के एक किनारे से चिपका हुआ था।

“आप हमारी भाषा जानती हो?” एक सितारा मछली ने आगे आते हुए पूछा।

“मुझे नहीं पता, पर अभी तुम जो बोली, मैं वह समझ गई। क्या तुम भी मेरी बात को समझ पा रही हो?” वीनस ने सितारा मछली से पूछा।

“हां...यह ही क्या, हम सभी तुम्हारी बात सुन और समझ पा रहे हैं।” तभी एक नन्हें ऑक्टोपस ने आगे बढ़कर कहा।

“अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है, फिर तुम सब खड़े क्यों हो? मेरे साथ नाचते क्यों नहीं?” वीनस ने यह कहा और फिर से जोर-जोर से गाकर पानी में नाचने लगी।

वीनस को देख वहां के सभी जलीय जंतु वीनस के साथ-साथ पानी में नाचने लगे।

लुफासा यह देखकर और ज्यादा डर गया, उसे लगा कि वीनस में कोई समुद्री भूत घुस गया है, इसलिये वह किसी को डिस्टर्ब नहीं कर रहा था।

काफी देर तक उस गुफा में यह नाच गाने का कार्य चलता रहा, पर अब वीनस थक गई थी। इसलिये उसने अब सभी को वहां कल आने को बोल, लुफासा के पास आ गई।

लुफासा अब भी डरी-डरी नजरों से वीनस को देख रहा था।

“क्या हुआ भाई, आप मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो ?” वीनस ने लुफासा की ओर देखते हुए पूछा।

“तुम में कोई समुद्री भूत घुस गया है, जिसकी वजह से तुम अभी समुद्री जीव-जंतुओं से बातें कर रही थी।” लुफासा ने डरते हुए कहा।

“क्या भाई आप भी ना? कितना डरते हो।” वीनस ने लुफासा पर गुस्साते हुए कहा- “अरे वह पत्थर जिसे हमने छुआ था, वह कोई चमत्कारी पत्थर था। उसी की वजह से अब मैं सभी जीवों की भाषा बोल और समझ सकती हूं।.....हम दोनों ने एक साथ पत्थर छुआ था, आप भी देखो ना भाई, अवश्य ही आप में भी कोई शक्ति आयी होगी। देखो आपके हाथों के अंदर अभी भी हल्की सी लाल रंग की रोशनी निकल रही है।”

वीनस की बात सुन लुफासा अपने हाथों की ओर देखने लगा।

“हां रोशनी तो निकल रही है, पर अगर मुझे भी तेरी तरह शक्ति मिली होती तो मैं भी उन मछलियों की भाषा समझ पाता, पर ऐसा नहीं हुआ, मुझे उनकी भाषा नहीं समझ में आयी।” लुफासा ने बेचैनी से कहा।

तभी एक पीले रंग की नन्हीं मछली लुफासा के चेहरे के पास आकर तैरने लगी। यह देख लुफासा ने गुस्से से उसे घूरा, पर उसको घूरते ही लुफासा स्वयं, उस मछली के समान बन गया।

यह देख वीनस खुशी से चीख उठी- “देखा भाई, मैंने कहा था ना कि कोई ना कोई शक्ति तो आपको भी मिली होगी?”

अपने आपको मछली बना देख लुफासा भी खुशी से नाचने लगा, तभी दूसरी दिशा से एक थोड़ी बड़ी मछली आयी और मछली बनी लुफासा को अपने मुंह में भरकर चली गई।

यह देख वीनस के मुंह से चीख निकल गई, वह तेजी से उस बड़ी मछली की ओर भागी, पर तभी एक आवाज ने उसे रोक लिया- “मैं यहां ठीक हूं वीनस, वापस लौट आओ।”

यह आवाज लुफासा की ही थी। वीनस ने पलटकर देखा, तो उसे लुफासा उसी स्थान पर बैठा दिखाई दिया, जहां पर वह मछली बनने के पहले बैठा था।

“यह क्या है भाई, आपको तो वह मछली निगल गई थी। फिर आप बच कैसे गये?” वीनस ने आश्चर्य से लुफासा की ओर देखते हुए कहा।

“मुझे भी नहीं पता, जब उस बड़ी मछली ने मुझे निगला, तो उसके बाद मैंने स्वयं को, अपने असली रुप में यहीं पर पाया।.....पर....पर अब मैं वह पीली सी मछली नहीं बन पा रहा हूं। शायद मेरी शक्ति चली गई।”

तभी लुफासा के सामने से एक दूसरी नीले रंग की मछली निकली। इस बार लुफासा ने उसे ध्यान से देखा और इसी के साथ लुफासा अब नीले रंग की मछली के समान बन गया।

“लगता है कि अगर किसी एक रुप में मेरी मौत हो गई, तो वह रुप मैं दोबारा नहीं धर सकता और मेरे उस रुप की मौत होने के बाद मैं वापस उसी स्थान और रुप में पहुंच जाता हूं, जो मैं उस रुप के पहले था।”
लुफासा ने कहा।

“अरे वाह, ये तो इच्छाधारी शक्ति है...आप कोई भी रुप धारण कर सकते हो।” वीनस ने कहा और अब वह लुफासा से बार-बार अलग-अलग रुप बदलने को कहने लगी।

उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों उन बच्चों को एक नया खेल मिल गया हो।

पर जो भी हो, लुफासा और वीनस अपनी शक्तियों से खुश थे।


जारी रहेगा_____✍️
बहुत ही रहस्यमय और रोमांचक मजेदार अपडेट है भाई मजा आ गया तो खेल खेल में अनजाने में लुफासा और वीनस को जीवशक्ती प्राप्त हो गई
बडा ही जबरदस्त अपडेट हैं
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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बहुत ही रहस्यमय और रोमांचक मजेदार अपडेट है भाई मजा आ गया तो खेल खेल में अनजाने में लुफासा और वीनस को जीवशक्ती प्राप्त हो गई
बडा ही जबरदस्त अपडेट हैं
काफी समय बाद वापस आये है आप , और आते ही कहानी के साथ वापस तालमेल बिठाकर चल रहे है। 👍 बस कुछ अपडेट ही पीछे हो अभी तो।
रही बात अपडेट की तो हां ये जीवन शक्ति ही लग रही है। लेकिन सवाल ये कि यह शक्ति यहां पहुंची कैसे? 🤔
खैर , रिव्यू के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद भाई , साथ बने रहिए। :hug:
 
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Raj_sharma

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Raj_sharma

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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।

“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।

“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
 

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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
Bahut hi shaandar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....
 
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