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Incest पाप ने बचाया

Sweet_Sinner

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Index

~~~~ पाप ने बचाया ~~~~

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Karnal Rathore

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Update- 43

(तो चलिए उदयराज और रजनी को सोने देते हैं और चलते हैं नीलम के घर, यहां कहानी में थोड़ा पीछे आना पड़ेगा, आइए थोड़ा पीछे जाकर नीलम की जिंदगी में देखें क्या क्या घटित हुआ।)

उस दिन अपनी माँ को वचन देने के बाद, कि कभी भी बाबू को ऐसा कुछ हुआ तो मैं वही करूँगी जो आपने सपने में देखा था, नीलम बहुत खुश थी, एक तो वो इस बात से खुश थी कि उसकी माँ ने ऐसा सपना देखा और सपने में जैसा हुआ था उसे समस्या का समाधान मानके अपनी बेटी से वैसा ही करने का वचन लिया, दूसरा उसकी माँ इस तरह की बातें आज जीवन में पहली बार करके उसके मन के और नजदीक आ गयी थी, परंतु उसने फिर सोचा कि नही वो अपने बाबू बिरजू को खुद ही अपना रसीला यौवन दिखा दिखा के रिझाएगी, आखिर कभी तो उसके बाबू उसपर टूट पड़ेंगे तब आएगा मजा, आखिर एक प्यासा मर्द कब तक अपने आप को रोकेगा। अपने बाबू की मन की हल्की हल्की मंशा को नीलम जान चुकी थी और वो ये भी जानती थी कि उसकी अम्मा अब बाबू को अपना मक्ख़न नही दे पाती हैं खाने को और बिना मक्ख़न के मर्द कैसे और कब तक रहेगा।

उस दिन छत पर गेहूं फैलाते वक्त जब से उसने अपने बाबू बिरजू का काला खुला हुआ लन्ड देखा था, तभी से वो बहुत विचलित थी और कामाग्नि में जल रही थी, बिरजू को तो ये बात पता भी नही थी कि उसकी बेटी उसका क्या देख चुकी है, पर जब छुप छुप के बाहर काम करते हुए वो अपने बाबू को निहारती और बिरजू द्वारा देख लिए जाने पर जान बूझ कर मुस्कुराते हुए इधर उधर देखने लगती तो बिरजू को भी कुछ कुछ होता था।

नीलम रंग में रजनी से बस हल्का सा कम थी पर शरीर में थोड़ा सा भारी थी, नीलम की मस्त चूचीयाँ कयामत ला देने वाली चूचीयों की श्रेणी में आती थी और नैन नक्श में वो रजनी को बराबर का टक्कर दे देती थी, उसकी लंबाई रजनी से थोड़ी कम थी जिस वजह से वो रजनी से थोड़ा ज्यादा भारी दिखती थी, जब वो चलती थी तो उसकी भारी गांड देख के उसके बाबू का मन डोल ही जाता था, अपनी सगी शादीशुदा बेटी पर उसका मन आसक्त होता था और नीलम यही तो चाहती थी।

नीलम की शादी हुए चार साल हो चुके थे पर अभी तक उसको बच्चा नही हुआ था, बच्चे के लिए मन ही मन वो बहुत तरसती थी, इस वजह से उसने नियमित रूप से पूजा पाठ भी शुरू कर दिया था, जैसा भी जो लोग करने के लिए बोलते थे वो उसको नियम से करती थी, अपने पति से उसका इस बात को लेकर कभी कभी मनमुटाव और हल्का फुल्का झगड़ा भी हो जाता था, और जब उसका दिमाग ज्यादा खराब होता तो वो ससुराल से मायके आ जाती थी और तीन चार महीने रहकर ही जाती थी। नीलम का अपने पति से बच्चे को लेकर इसलिए झगड़ा होता था क्योंकि नीलम को बहुत अच्छे से पता था कि उसके पति का वीर्य बहुत पतला था और वो इसी को इसका कारण मानती थी, अपने पति को वो इसका इलाज कराने के लिए बोलती तो उसका पति अपनी मर्दानगी पर लांछन समझकर चिढ़ जाता था और अक्सर झगड़ा कर लेता था हालांकि नीलम से वो डरता था, नीलम उसपर भारी पड़ती थी, उसपर ही क्या वो अपने ससुराल में दबदबा बना कर रहती थी, पर दिल की बहुत अच्छी थी, ससुराल में जब भी रहती सारा घर संभाल कर रखती थी, उसकी सास भी उससे ज्यादा बहस नही करती थी, पर वो ये मानने को तैयार नही होती थी कि उसके बेटे में कमी है, खैर नीलम भी अपनी सास के सामने कभी इस बात का जिक्र नही करती थी और न ही करना ठीक समझती थी, पर चिंता तो सबको ही थी, नीलम की सास को भी और नीलम की माँ को भी, बस चिंता नही थी तो उसके पति को, वो बोलता था कि जब जो होना होगा हो जाएगा, मैं क्या करूँ और नीलम इस बात से चिढ़ भी जाती थी और अक्सर वो अपने मायके आ जाती थी उसके ससुराल में भी काम धाम संभालने वाली उसकी देवरानी और उससे बड़ी जेठानी थी तो उसकी वजह से वहां काम रुकता नही था, जिस वजह से वो अक्सर अपने मायके में रह लेती थी।

एक दिन नीलम की माँ ने नीलम से कहा- बेटी तेरे नानी के यहां एक बुढ़िया है जो ओझाई का काम करती है छोटा मोटा, लोग कहते हैं कि वो कुछ जड़ी बूटियां देती है जिससे बच्चे न होने की समस्या हल हो जाती है, पता नही कितना सच है कितना झूट, मेरा तो मन कर रहा है कि किसी दिन तेरे नानी के घर जा के मिल कर आऊं उस बुढ़िया से, तू ठीक लगे तो बोल मैं जाती हूँ किसी दिन।

नीलम- अम्मा, जो भी जैसा भी लोग बोलते हैं मैं सब करती हूं, अगर आपको ऐसा लगता है तो किसी दिन चली जाओ और मेरी जरूरत पड़े तो मैं भी चलूंगी।

नीलम को माँ- अभी नही पहले मैं जाउंगी अकेले फिर देखो वो क्या बताती है, क्या कहती है, काफी पहले मैंने सुना था उसके बारे में, पता नही अब वो बुढ़िया जिंदा भी है या नही।

नीलम- अम्मा मेरा मन तो नही मानता की मेरे अंदर कोई कमी है, वैसे भी हमारे गांव में बच्चे जल्दी होते कहाँ हैं ये बात तो आप भी जानती हो न, क्या पता वही असर हो, इसी समस्या का हल ढूंढने के लिए तो रजनी दीदी और बड़े बाबू देखो तीन चार दिन कितना डरावना सफर करके महात्मा से मिलकर उस समस्या का हल लेकर आये हैं अब वो जैसे ही यज्ञ करेंगे सब ठीक हो जाएगा और एक बात और भी है जो मैं तुम्हे बता चुकी हूं, मैं उन्हें बहुत बोलती हूँ इलाज़ कराने के लिए पर वो मेरी सुनते ही कहाँ हैं, उन्हें तो जैसे कोई चिंता ही नही है।

नीलम की माँ- देख बेटी वजह चाहे जो भी हो पर कहीं कुछ पता चलता है जो जाकर कर लेने में क्या हर्ज है, तू चिंता न किया कर, तेरी कोख भी ईश्वर जल्द ही भरेंगे मेरा दिल कहता है, तू खुश रहा कर, ईश्वर सबकी सुनता है। मैं जाती हूँ किसी दिन तेरे नानी के घर। वो नही ध्यान देता तो छोड़ तू उसको, तेरी सास तो तेरे को लांछन नही देती न।

नीलम- नही अम्मा लांछन तो नही देती पर वो मुझे कम मानती है, देवरानी और जेठानी को ज्यादा मानती हैं, हालांकि कभी वो सीधा मुझसे नही कहती पर उनके हाव भाव से मुझे लग जाता है।

नीलम की माँ- तू चिंता न कर सब ठीक हो जाएगा मेरी बच्ची।

ऐसा कहकर नीलम की माँ उसको गले लगा लेती है।

नीलम के घर के आगे द्वार पर एक बहुत बड़ा जामुन का पेड़ था और जामुन था भी मीठा वाला, बड़े बड़े और काले काले जामुन लगते थे उनमे, गांव के बच्चे अक्सर जामुन के चक्कर में वहीं डेरा जमाए रहते थे, ज्यादातर बच्चे पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते कि पेड़ पर चढ़कर अच्छे अच्छे जामुन तोड़ेंगे, नीचे गिरकर जामुन बेकार हो जाते हैं, मीठे जामुन होने की वजह से ततैया भी उन्हें खाने ले लिए पेड़ पर मंडराती रहती थी, बच्चे नीलम की मां से डरते थे क्योंकि वह पेड़ पर चढ़ने से डांटती थी, जब भी वो देखती की बच्चे पेड़ पर चढ़ रहे है और ज्यादा शरारत कर रहे है या शोर मचा रहे हैं तो डंडा लेकर उन्हें खदेड़ लेती थी, हालांकि वह ज्यादा फुर्ती से भाग नही पाती थी पर जामुन के पेड़ पर नजर रखती थी कहीं बच्चे उसपर चढ़े न और अपने हाँथ पांव न तुड़वा बैठें।

नीलम ये सब देखकर खूब हंसती थी, अपने घर पे बच्चों के इस तरह आकर खेलना, जामुन खाना और उनका जेब में भर भर के अपने घर ले जाना नीलम को बहुत अच्छा लगता था। बच्चे अक्सर नीलम से ही जामुन खाने और तोड़ने की आज्ञा मांगते थे और जब नीलम बोल देती थी कि जाओ खा लो, तोड़ लो, तो सीना चौड़ा करके जमीन पर पेड़ के नीचे गिरे सारे जामुन बिन लेते थे, कुछ बच्चे बड़ी सी लग्गी लेके आते और अच्छे अच्छे जामुन तोड़कर नीलम को भी देते खुद भी खाते और घर भी ले जाते, नीलम को ये सब देखकर बहुत सुकून मिलता था, इन प्यारे प्यारे मासूम बच्चों और बच्चियों को देखकर। नीलम खुद छोटी छोटी बच्चियों को लग्गी से अच्छे अच्छे जामुन तोड़कर देती थी और जब वो बच्चियां घर से कुछ लेकर नही आई होती थी तो उनकी फ्रॉक के आगे के हिस्से को उठाकर जामुन उसमे भर देती थी, वो छोटी छोटी बच्चियां अपने फ्रॉक को आगे से उठाए उसमे जामुन भरे हुए नन्हे नन्हे कदमों से चलकर अपने घर जाती तो देखकर बहुत अच्छा लगता, नीलम तो उन्हें देखकर बहुत खुश होती थी। नीलम की मां भी बच्चों के मामले में खड़ूस नही थी पर वो उन्हें इसलिए डांटती थी कि कहीं पेड़ से गिर कर चोट न लगा लें।

तो जब तक नीलम के घर के आगे जामुन के पेड़ पर जामुन लगे रहते तब तक उसके घर पेड़ के नीचे गांव के बच्चों का जमावड़ा अक्सर शाम को या दोपहर को लगा रहता था। नीलम भी उनके साथ खाली वक्त में अपना मन बहलाने के लिए या जामुन तोड़ने में उनकी मदद करने के लिए हँसती खिलखिलाती लगी रहती थी, हर उम्र के छोटे बडे बच्चे वहां आते थे जामुन खाने। सब बच्चे नीलम को दीदी कहकर बुलाते थे।

एक दिन नीलम की माँ ने नीलम से और उसके बाबू बिरजू से अगले दिन शाम को नीलम की नानी के घर जाने के लिए कहा तो बिरजू बोला- हाँ ठीक है चली जाओ पर जल्दी आ जाना एक दो दिन में।

नीलम की माँ- अरे नीलम के बाबू मैं कल शाम को जाउंगी और उसके अगले दिन ही आ जाउंगी, मुझे रुकना थोड़ी है वहां। वो तो मैं किसी काम से जा रही हूँ।

बिरजू- कैसा काम?

नीलम की माँ- है कुछ काम, जरूरी है तुम्हे पहले से ही सब बताऊं, जब सफल हो जाएगा तो बता दूंगी, कुछ काम औरतों वाले भी होते हैं मर्दों को नही बताये जाते पहले।

बिरजू हंसता हुआ नीलम को देखकर- अच्छा बाबा ठीक है, जाओ।

अपने बाबू को अपनी तरफ देखते हुए देखकर नीलम शर्मा गयी।

रात को खाना खाने के बाद जब बिरजू बाहर सोने चला गया तो नीलम ने अपनी माँ से कहा- अम्मा अपने जामुन के पेड़ में बहुत जामुन लगे हैं तो तुम कल जामुन भी लेते जाना नाना नानी और मामा मामी के लिए, मैं तोड़ दूंगी।

नीलम की माँ ने पहले तो मना किया फिर नीलम की जिद पर मान गयी।

अगली सुबह नीलम ने अपने बाबू बिरजू को अपना मदमस्त यौवन दिखाने की सोचकर उनके किसी काम से निकलने से पहले ही उसने बोली- बाबू आप जा रहे है काम से।

बिरजू- हाँ बिटिया, क्या हुआ, मेरी बेटी को कुछ काम है क्या मुझसे?

नीलम- हां है तो

बिरजू- तो बोल न शर्माती क्यों है।

नीलम की मां उस वक्त सुबह सुबह लायी हुई घास मशीन के पास बैठकर पीट रही थी। (गांव में क्या होता है कि खेत से घास छीलकर लाने के बाद उसको किसी छोटे डंडे से पीटते हैं ताकि उसकी मिट्टी निकल जाए, फिर उसको मशीन में लगाकर छोटा छोटा काटते हैं और फिर उस घास में भूसा मिलाकर जानवर को खाने को देते हैं तो नीलम की माँ उस वक्त घास को डंडे से पीट रही थी)

नीलम ने आज नहा कर जानबूझ कर घाघरा चोली पहना हुआ था और नीचे काली रंग की पैंटी पहनी हुई थी।

बिरजू अपनी बेटी को आज घाघरा चोली में देखकर निहारे जा रहा था, नीलम मंद मंद अपने बाबू को चोर नज़रों से घूरते हुए देखकर सिरह सिरह जा रही थी और उसे बड़ा मजा आ रहा था।

नीलम- बाबू मेरी जामुन तोड़ने में मदद करो न, अकेले कैसे तोडूं, अम्मा आज नाना के घर जाएंगी तो मैंने सोचा था कि अपने यहां के अच्छे पके हुए जामुन तोड़कर भेजूंगी पर बिना आपके कैसे होगा?

बिरजू- हां तो बेटी चल न तोड़ देता हूँ, इतना कहने में तुझे संकोच क्यों हो रहा है वो भी अपने बाबू से।

नीलम- मुझे लगा क्या पता आप मना कर दो।

बिरजू- मना क्यों कर दूंगा, अपनी प्यारी बेटी की हर इच्छा पूरा करना बाप का फर्ज होता है, चाहे छोटी चीज़ हो या बड़ी।

नीलम- अच्छा तो फिर ठीक है, अब नही शरमाउंगी बोल दूंगी जो भी इच्छा होगी, पूरा करोगे न। (नीलम ने डबल मीनिंग में बोला पर बिरजू अभी समझ न पाया)

बिरजू- क्यों नही करूँगा, मेरी तू ही तो प्यारी सी बेटी है, ऐसा कभी मत सोचना अब ठीक है, चल।

सवेरे की खिली खिली धूप निकल आयी थी, नीलम एक खाट लेके आयी और उसको जामुन के पेड़ के नीचे बिछा दिया और उसपर एक पुराना चादर डाल दिया फिर अपने बाबू से बोली- बाबू आप न इस खाट के बगल में खड़े रहो, मैं पेड़ पर चढ़ती हूँ।

ये सुनकर बिरजू बोला- अरे नही बेटी तू यहीं खाट के पास रह मैं पेड़ पर चढ़कर तोड़ देता हूँ पर नीलम मानी नही क्योंकि उसको पेड़ पे चढ़कर अपने बाबू को कुछ दिखाना था, घाघरा उसने इसी लिये पहना था आज।

नीलम नही मानी, बिरजू ने एक बार नीलम की माँ को देखा जो बैठकर घास पीटने में व्यस्त थी, उसको तो पता भी नही था कि नीलम और बिरजू कर क्या रहे हैं, वो बस डंडे से पट्ट पट्ट की आवाज करते हुए घास पीटे जा रही थी पीछे क्या हो रहा था उसे पता नही और लगातार डंडे ही आवाज से उसे कुछ सुनाई भी नही दे रहा था।

नीलम जामुन के पेड़ पर चढ़ने के लिए अपनी चुन्नी को कमर पर बांधने लगी, बिरजू अपनी बेटी की सुंदरता को मंत्रमुग्द होकर देखे जा रहा था, उसके भीगे बालों की लटें, माथे पे छोटी सी बिंदिया, मांग में सिंदूर, कान की हिलती हुई झुमकियाँ, लाली लगे रसीले होंठ और वो गज़ब के मस्त मोटे मोटे तने हुए, चोली में कसे हुए दोनों जोबन और अपनी कमर में चुन्नी बांधते हुए वो कितनी खूबसूरत लग रही थी, कमर में कस कर चुन्नी बांधने से उसकी दोनों उन्नत चूचीयाँ और भी उभरकर बाहर आ गयी थी।

नीलम ने जैसे ही कमर में चुन्नी बांधकर अपने बाबू की तरफ देखा तो वो उसे ही मंत्रमुग्ध सा देख रहा था, एक पल के लिए नीलम मुस्कुरा उठी अपने बेटी से नज़र मिलते ही बिरजू भी मुस्कुरा दिया तो नीलम धीरे से बोली- ऐसे क्या देख रहे हो बाबू,।

बिरजू- अपनी बेटी की सुंदरता, आज क्या बला की खूबसूरत लग रही है मेरी बेटी इस घाघरा चोली में।

नीलम का चेहरा शर्म से लाल हो गया क्योंकि बिरजू ने आज से पहले कभी ऐसा नही कहा था, नीलम के छोड़े गए तीर सही जगह पर जा जा के लग रहे थे।

नीलम- अच्छा जी, बाबू आज से पहले तो आपने कभी ऐसा नही कहा, क्या मैं तब सुंदर नही थी।

बिरजू- सुंदर तो तू मेरी बेटी हमेशा से ही है पर मैंने आज तुझे ध्यान से और.........

बिरजू रुककर नीलम की माँ की तरफ देखने लगता है नीलम भी एक नज़र अपनी माँ पर डालती है जो मस्त मौला बेखबर होकर घास पीटे जा रही थी।

नीलम- बोलो न बाबू आज अपने मुझे ध्यान से और.....और क्या? बोलो न.... अम्मा तो घास पीट रही है नही सुनेगी, बोलो न धीरे से।

बिरजू- और...... दिल से देखा है, पता नही क्यों, तू सच में बहुत खूबसूरत है

नीलम- सच बाबू, आपको मैं इतनी अच्छी लगने लगी हूँ, ऐसा क्या है मुझमें, मैं तो आपकी बेटी हूँ न, सगी बेटी।

बिरजू- हाँ है तो मेरी बेटी, मेरी सगी बेटी, पर तू मुझे अच्छी लगती है तो क्या करूँ, तू सच में बहुत......

नीलम- बहुत क्या बाबू.....बोलो न

बिरजू ने एक बार फिर नीलम की माँ की तरफ देखा तो नीलम भी फिर अपनी माँ को देखने लगी।

बिरजू- बाद में बताऊंगा और कहकर नीलम की आंखों में देखने लगा।

नीलम- जब अम्मा नानी के यहां चली जायेगी।

बिरजू- हाँ

नीलम- तो आप जल्दी घर आ जाना आज, मैं आपका इंतजार करूँगी, आपकी बेटी आपका इंतजार करेगी आज रात।

इतना कहकर नीलम का चेहरा वासना में लाल हो गया और वो अपने बाबू की आंखों में देखकर मुस्कुराने लगी।

बिरजू को भी आज इतना अच्छा लग रहा था की वो आसमान में उड़ने लगा, अपनी ही सगी बेटी से उसे मोहब्बत होती जा रही थी और उसकी बेटी के मन में भी यही था अब ये उसे थोड़ा थोड़ा आभास हो गया था।

दोनों मंत्रमुग्द से एक दूसरे को देखते रहे कि तभी नीलम बोली- बाबू चलो मुझे पीछे से सहारा देकर पेड़ पर चढ़ाओ नही तो मैं चढ़ नही पाऊंगी, देखो कितना मोटा है इसका तना।

बिरजू- हाँ चल, तू चढ़ मैं तुझे पीछे से तुझे उठाता हूँ।

नीलम ने अपने दोनों हांथों से जामुन के पेड़ के तने को पकड़ा और अपना सीधा पैर उठा कर तने पर चढ़ने के लिए लगाया जिससे उसकी भारी विशाल गांड की चौड़ी चौड़ी गोलाइयाँ बिरजू को पागल कर गयी और नीलम ये बात जानती थी उसने ये सब प्लान जानबूझकर बनाया ही था इसलिए उसने जानबूझकर भी अपनी गांड को और भी पीछे को निकाल लिया, बिरजू अपनी बेटी की गांड बहुत नजदीक से देखता रह गया, नीलम समझ गयी कि उसके बाबू की नज़र कहाँ है, वो मंद मंद मुस्कुराते हुए बोली- बाबू हाँथ लगाओ न, ऐसे ही देखते रहोगे क्या, जो भी देखना है बाद में देख लेना, अभी मुझे चढ़ाओ पेड़ पर।

नीलम ने ये लाइन "जो भी देखना है बाद में देख लेना" जानबूझकर धीरे से बोली और उदयराज अपनी सगी बेटी के इस निमंत्रण पर अचंभित सा रह गया और धीरे से बोला- बाद में कब?

नीलम मुस्कुराते हुए- जब अम्मा चली जायेगी नानी के घर तब रात में।

बिरजू की सांसें ये सुनकर अब तेज चलने लगी नीलम की भी सांसे ये सोचकर काफी तेज चलने लगी कि आज वो ये क्या क्या कर और बोल रही है, उसके अंदर इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई है, बोलते बोलते उसका चेहरा भी शर्म से लाल हो गया था, पर नीलम ने सोचा था कि वो पहल जरूर करेगी ताकि उसके बाबू को आगे बढ़ने के लिए सिग्नल मिल सके, पर वो इस द्विअर्थी बातों से खुद भी बहुत उत्तेजित होती जा रही थी।

एकाएक बिरजू ने नीलम की पतली मखमली कमर को अपने दोनों हाँथ से पकड़ा और ऊपर को उठाने लगा, कमर को पकड़ते ही बिरजू को जैसे बिजली का झटका सा लगा, अपनी जवान सगी शादीशुदा बेटी के मखमली बदन को वो आज पहली बार उसकी जवानी में छू रहा था, बेटी के जवान हो जाने के बाद वो केवल बेटी नही रहती वो एक स्त्री भी हो जाती है और जवान होने के बाद पिता अपनी बेटी के बदन से इसलिए दूर भी रहता है क्योंकि कामभावना जागने का डर रहता है फिर चाहे वो सगी बेटी ही क्यों न हो, यही हाल इस वक्त बिरजू का था आज पहली बार उसने जब अपनी सगी बेटी नीलम के बदन को छुवा तो उसकी कामवासना जाग गयी।

बिरजू ने नीलम को कमर से पकड़कर ऊपर को उठाने की कोशिश की पर नीलम भारी बदन की मलिका थी, सिर्फ कमर पर हाँथ लगाने से आसानी से उठ जाती ये तो मुमकिन ही नही था, नीलम ने भी पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की पर फिसलकर फिर नीचे आ गयी।
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Karnal Rathore

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Update- 44

नीलम ने पलटकर अपने बाबू को देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखा फिर बोली- बाबू ठीक से पकड़कर उठाओ न, दम लगा के ऐसे तो मैं चढ़ ही नही पाऊंगी, उस डाल तक उठा दो बस वो पकड़ में आ जाये फिर तो मैं चढ़ जाउंगी।

बिरजू ने भी एक बार पलटकर नीलम की माँ को देखा, वो अपने काम में मस्त थी, बिरजू ने नीलम को बोला थोड़ा इधर आ इस तरफ से चढ़, बिरजू और नीलम पेड़ के तने के दायीं ओर आ गए और पेड़ के मोटे तने के पीछे छुप से गये, वहां से नीलम की माँ दिख नही रही थी, पेड़ से ओट हो गया था।

नीलम ने फिर कोशिश की, बिरजू ने जैसे ही कमर को हाँथ लगाया नीलम ने अपने बाबू का हाँथ खुद ही पकड़कर अपने विशाल चूतड़ पर रख दिया और बोली- बाबू कमर पर नही यहां हाँथ लगा के उठाना, और अपने बाबू को देखकर हंस दी फिर बोली- अब तो अम्मा भी नही दिख रही यहां से, अब मुझे सहारा दो अच्छे से।

बिरजू भी हंस दिया और बोला- ठीक है चल, जल्दी कर।

नीलम ने एक पैर पेड़ के तने पर रखा और दोनों हांथों से तने को पकड़ा, बिरजू ने जैसे ही अपना एक हाँथ नीलम की कमर पर लगाया और दूसरा हाँथ उसकी चौड़ी मांसल गांड पर लगाया, नीलम और बिरजू दोनों एक साथ सिरह उठे, क्या मस्त गुदाज गांड थी नीलम की, बिरजू बावला सा हो गया, बिरजू के हाँथ की उंगलियाँ मानो नीलम की गुदाज फूली हुई गांड में धंस सी गयी।

नीलम- ऊऊऊऊईईईईईई.....बाबू.....हाँ ऐसे ही उठाओ, जोर लगाओ, पकड़े रहना, बस वो डाली पकड़ लूं मैं।

नीलम ने थोड़ा ऊपर चढ़कर अपने हाँथ से उस डाली को पकड़ने की कोशिश की, वो डाली उसकी पहुंच से सिर्फ एक फुट ऊपर थी।

बिरजू तो मस्त हो चुका था अपनी सगी बेटी के मांसल बदन को छूकर और उसकी मदमस्त चौड़ी गांड को दबोचकर।

बिरजू- हाँ चढ़ बेटी, मैंने पकड़ा है नीचे से, गिरेगी नही।

ऐसा कहते हुए बिरजू ने अपना दूसरा हाँथ भी कमर से हटा कर नीलम के दूसरे चूतड़ पर रख दिया और अब दोनों हांथों से उसके चूतड़ के दोनों उभार थाम लिए, अपनी बेटी के मादक गरम गुदाज गांड की लज़्ज़त और नरमी का अहसास मिलते ही बिरजू के लंड में हलचल होने लगी। उसने एक पल के लिए आंखें बंद कर ली। नीलम भी सिरहते और शर्माते हुए डाली को पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

बिरजू का मन कर रहा था कि अपना हाँथ अपनी बेटी की गांड की महकती दरार पर रख दे पर संकोच उसे रोक ले रहा था, तभी नीलम बोली- बाबू और जोर लगाओ न, और उठाओ मुझे, इसलिए बोलती हूँ दूध पिया करो ताकत रहेगी, पीते तो हो नही, उठाओ और जोर से मुझे। (नीलम ने double meaning में कहा)

बिरजू अपनी बेटी की बात का अर्थ समझ गया और बोला- दूध है ही कहाँ जो पियूँ बेटी, तुझे तो पता है गाय बूढ़ी हो गयी है अब कहाँ दूध होता है उसको।

नीलम- अच्छा, बहाना मत करो, जिसको दूध पीने की इच्छा होती है न वो कैसे न कैसे करके घर में या बाहर से दूध की व्यवस्था कर ही लेता है, गाय बूढ़ी हो गयी तो क्या हुआ उसकी जवान बछिया तो है न। (नीलम ने double meaning में खुला निमंत्रण सा दिया अपने बाबू को और ये बोलकर वो खुद सिरह गयी, शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया, हालांकि उसका चेहरा ऊपर की तरफ था)

(नीलम के घर में सच में एक गाय थी जो बूढ़ी हो चुकी थी और इत्तेफ़ाक़ से उसकी एक जवान बछिया भी थी पर अभी उसकी मैचिंग किसी बैल से नही हुई थी तो उसको कोई बच्चा नही हुआ था और जब बच्चा ही नही हुआ था तो उसको दूध कैसे होता, इसी गाय और बछिया को लेकर नीलम और बिरजू डबल मीनिंग में कामुक बातें करने लगे)

बिरजू- पर बछिया को दूध आता ही कहाँ है बेटी, जब तक उसको बच्चा नही होगा वो दूध नही देगी और बाहर का दूध मैं पियूँगा नही।

नीलम- सच, आप बाहर का दूध नही पियोगे।

बिरजू- नही, बिल्कुल नही।

नीलम- तब तो फिर बछिया को जल्दी बच्चा देना होगा, पर वो बेचारी अकेली तो बच्चा कर नही सकती न, अब तो किसी बैल को बुलाना होगा न बाबू।

(और इतना कहती हुई नीलम खिलखिलाकर अपने बाबू को नीचे की तरफ देखती हुई हंस दी, बिरजू भी नीलम की गुदाज गांड को अपने दोनों हांथों से पकड़े पकड़े हंस दिया, दोनों के चहरे और कान वासना की गर्माहट से लाल हो चुके थे, दोनों ने एक बार फिर पेड़ की ओट से झांककर नीलम की माँ को देखा तो वो बस घास ही पीटने में लगी थी)

बिरजू- हाँ अगर दूध पीना है तो उसको बैल के पास तो ले जाना ही पड़ेगा।

नीलम- इस पर हम बाद में बात करेंगे, क्योंकि आपकी सेहत की बात है और मैं अपने बाबू की सेहत से समझौता नही कर सकती।

बिरजू- कब बात करेगी मेरी बेटी इस विषय में।

नीलम- जब अम्मा नही रहेंगी तब, रात को....ठीक, रुक क्यों गए ऊपर को ठेलों न मुझे बाबू, लटकी हुई हूँ बीच में मैं, उठाओ जोर से।

जैसे ही बिरजू ने तेज जोर लगाने के लिए दम लगाया, न जाने कहाँ से एक लाल ततैया आ के बिरजू के हाँथ पर बैठ गयी और बिरजू ने हाँथ तेज से झटका, ततैया तो फुर्र से उड़ गई पर ऊपर को चढ़ने की कोशिश कर रही नीलम का बैलेंस बिगड़ा और वो सीधे नीचे सरक कर अपने बाबू पर इस तरह गिरी की उसकी भारी गुदाज गांड बिरजू के चहरे पर बैठ गयी, बिरजू की नाक सीधे नीलम की मक्ख़न जैसी मुलायम गांड की दरार में जा घुसी।

नीलम- अरेरेरेरेरे.......ऊऊऊऊऊईईईईईईईई.......... बाबू........अरे मैं गिरी.....पकड़ो मुझे........बाबू........आआआआआआआआह हहहहहहहहहहहह......बाबू आपको लगी तो नही।

लगने की बात तो दूर, बिरजू ने ये सोचा भी नही था कि अचानक ऐसा हो जाएगा आज जीवन में पहली बार ये क्या हो रहा था, पर जो हो रहा था उसमें वो खो गया, आखिर इस लज़्ज़त को भला वो कैसे जाने देता जिसके लिए वो मन ही मन तरसता था। ये समझ लो की नीलम अपने बाबू के चेहरे पर अपनी भारी गांड रखकर बैठ चुकी थी, अपनी ही जवान सगी शादीशुदा बेटी की इतनी गुदाज गांड की दरार में एक दिन अचानक उसका मुँह घुस जाएगा ये बिरजू ने कभी सोचा नही था और न ही नीलम ये सोचा था।

नीलम की रसभरी चौड़ी गांड की मदहोश कर देने वाली भीनी भीनी महक को बिरजू सूंघने लगा, उसने जानबूझ के अपनी नाक को और नीलम की गांड की दरार में घुसेड़ दिया और अच्छे से अपनी सगी शादीशुदा बेटी की गांड की महक को जी भरकर सूंघने लगा, नीलम धीरे से शर्माते हुए अपनी मोटी गांड और मांसल जांघे आपस में भींचते हुए चिहुँक उठी, एकाएक अपने बाबू की नाक और मुँह अपनी गांड की गहराई और बूर के पास महसूस करके नीलम चौंक सी गयी और चिहुँकते, शर्माते हुए
ऊऊऊऊईईईईईई.......माँ की कामुक आवाज निकलते हुए सिरह उठी और कुछ देर तो वो खुद ही मदहोशी में अपने बाबू के मुँह पर अपनी गांड और बूर रखे बैठी सिसकती रही उसे काफी गुदगुदी भी हो रही थी।

फिर वो समझ गयी कि उसके बाबू दीवाने हो चुके है और उसकी गांड और बूर के छेद को कपड़ों के ऊपर से ही सूंघने में लगे हुए हैं, बिरजू ने दोनों हाँथों से नीलम की कमर को पकड़ रखा था, नीलम के दोनों पैर पेड़ के तने पर ही थे और हांथों से नीलम ने तने को घेरा बना के कस कर पकड़ा हुआ था, नीलम अब शर्म से गड़ी जा रही थी, अपनी गांड की मखमली दरार में और बूर पर उसे अपने बाबू की नाक और दहकते होंठ महसूस हुए तो वो फिर से चिहुँक उठी और उसके मुँह से भी जोर से मादक सिकारियाँ निकल गयी, ये सब इतनी जल्दी हुआ कि न तो नीलम ही संभाल पाई और न ही बिरजू और जो होना था वो हो चुका था, अपनी सगी बेटी की गांड और बूर की खुशबू और उसका अच्छे से अहसास करके बिरजू बेकाबू सा होने लगा।

नीलम ने समय की नजाकत को समझते हुए, शर्माते हुए, अपने को बेकाबू होने से संभालते हुए अपनी अम्मा की तरफ एक नज़र घुमा के पेड़ की ओट से देखा और अपने चौड़े चूतड़ और बूर की खुशबू लेकर मदहोश हो चुके अपने बाबू से उखड़ती सांसों से बोला- बाबू.....अम्मा देख लेगी...बस करो न...बाद में कर लेना ऐसा.....बस करो न बाबू।

बिरजू ने जब ये सुना तो उसकी बांछे खिल गयी और फिर उसने नीलम के दोनों चूतड़ पर अपने हाँथ लगा के ऊपर को उठा दिया और तेज चल रही सांसों को संभालते हुए बोला- बाद में कब बेटी? मुझे तेरे बदन से आ रही ये मदहोश कर देने वाली खुशबू लेना है, कितनी अच्छी है ये, खुशबू लेने देगी मुझे?

नीलम- रात को जब अम्मा चली जायेगी, तब कर लेना जो भी करना हो (नीलम ने ये बात बहुत उत्तेजना से धीरे से बोली)

बिरजू- सच, करने दोगी।

नीलम- हाँ बाबू, बिल्कुल, क्यों नही, पर अभी अम्मा देख सकती है जब वो चली जायेगी तब।

ये कहकर नीलम शर्म से लाल भी होती चली गयी।

बिरजू की तो ये सुनकर मानो लॉटरी लग गयी थी, दिल में हज़ारों घंटियाँ एक साथ बजने लगी, अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी के यौवन का रसपान उसे अपने ही घर में चुपके चुपके करने को मिल जाएगा, इस बात को सोचकर ही वो फूला नही समाया और जोश में आकर उसने नीलम को कस के उसकी दोनों गांड पकड़के इतनी तेज उठाया की नीलम ऊऊऊऊईईईईईई करते हुए ऊपर को उचकी और उसने अब वो डाल पकड़ ली, और फिर पैर ऊपर रखते हुए दूसरे हाँथ से दूसरी डाल पकड़ते हुए जामुन के पेड़ पर चढ़ गई। बिरजू वासना भारी नजरों से अपनी सगी बेटी के मादक गदराए बदन को पेड़ पर चढ़ते हुए निहारता रहा।

नीलम पेड़ पर डाल पकड़ पकड़ कर ऊपर चढ़ने लगी, पैर फैला कर जब नीलम ने आगे बढ़ने और ऊपर चढ़ने के लिए एक डाल पर रखा तो नीचे खड़े बिरजू को अब जाकर फैले घाघरे के अंदर वो दिखा जिसको देखने के लिए उसकी आंखें तरस रही थी, घाघरे के अंदर नीलम को गोरी गोरी टांगें जाँघों तक दिख गयी, बिरजू अवाक सा रह गया, कितनी मांसल जाँघे थी नीलम की, लार ही टपक पड़ी उसकी अपनी ही बेटी की जाँघे देखकर, तभी नीलम ने अपना दूसरा पैर उठा कर दूसरी डाल पर रखा और एक मोटी डाल पर वहीं बैठ गयी, घाघरा नीचे लटका हुआ था, दोनों गोरे गोरे पैर और जाँघों का निचला हिस्सा देखकर बिरजू सनसना गया, एकटक लगाए वो अपनी बेटी के घाघरे में ही झांकने की कोशिश कर रहा था, नीलम ने नीचे अपने बाबू को देखा तो उसने पाया कि उसके बाबू की प्यासी नज़रें कहाँ है, समझते उसे देर नही लगी और वो मुस्कुरा दी, उसने एक जामुन तोड़ा और खींच कर अपने बाबू के ऊपर फेंका, जामुन सीधा बिरजू के सर पर लगा और फूटकर फैल गया, बिरजू की तन्द्रा भंग हुई तो नीलम खिलखिलाकर हंसने लगी और बोली- बाबू खाट को खींचकर मेरी सीध में लाओ ताकि मैं जामुन तोड़कर उसपर फेंकती रहूँ।

बिरजू को होश आया तो वो झेंप सा गया फिर जल्दी से उसने खाट को खींचकर नीलम की सीध में नीचे किया, और ऊपर देखने लगा, नीलम की नजरें अपने बाबू से मिली तो दोनों मुस्कुरा दिए, नीलम अभी डाली पर घाघरे को समेटकर जानबूझ कर बैठी थी वो जानती थी खड़े होने पर बाबू को घाघरे के अंदर का नज़ारा अच्छे से दिख जाएगा पर वो अपने बाबू को कुछ देर तड़पाकर उनकी हालत देखना चाहती थी, बिरजू भी बार बार सर उठाये अपनी बेटी के घाघरे के अंदर झांकने की कोशिश करता और जो भी थोड़ा बहुत दिख रहा था उसे ही बड़ी वासना भरी नजरों से देखता।

नीलम ने बिरजू से इशारे से पूछा कि अम्मा क्या कर रही है क्योंकि ऊपर पत्तियों की आड़ से नीचे दूर साफ दिख नही रहा था, बिरजू ने एक नजर नीलम की माँ पर डाली तो देखा कि वो घास को बड़ी टोकरी में भरकर बगल में कुएं पर ही बने बड़े से हौदे में धोने के लिए डाल रही थी, उसने नीलम को ग्रीन सिग्नल का इशारा किया, नीलम और बिरजू दोनों मुस्कुराने लगे।

नीलम ने नीचे अपने बाबू को देखते हुए एक हाँथ से डाल पकड़े, डाल पर बैठे बैठे ही आस पास लगे जामुनों के गुच्छों में से अच्छे पके पके जामुन तोड़कर नीचे खाट पर फेंकना तो दूर पहले तोड़कर खुद ही खाने लगी, ऊपर जामुनों की भरमार थी, पूरा पेड़ जामुन से लदा हुआ था, आस पास पके पके बड़े बड़े काले काले जामुनों को देखकर नीलम से रहा न गया और वो खिलखिलाकर हंसते हुए अपने बाबू को नीचे देख देखकर रिझाकर जामुन तोड़कर खाने लगी।

अब बिरजू ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए अपनी कमर पर दोनों हाँथ रखकर खड़ा हो गया और बोला- तू वहां जामुन तोड़ने गयी है कि खाने गयी है।

नीलम- अरे बाबू यहां पर आ के कितना अच्छा लग रहा है देखो न कितने बड़े बड़े मीठे मीठे काले काले जामुन है ऊपर, नीचे से तो ये दिखते ही नही है, अच्छा लो आप मुँह खोलो, आ करो आपके मुँह में मैं यहीं से फेंककर मरती हूँ जामुन, देखना सीधे मुँह में जायेगा।

बिरजू- तेरी मां ने देख लिया न तो हम दोनों का जामुन निकाल देगी (बिरजू ने बनावटी गुस्से से कहा, पर वो चाहता था कि उसकी बेटी अच्छे से अपने मन की कर ले)

नीलम- अरे बाबू आप अम्मा से कितना डरते हो, उनको मैं देख लुंगी आप मुँह खोलो, खोलो तो सही, एक बार बाबू......बस एक बार....खोलो न मुँह अपना...जोर से आ करो, खूब जोर से, यहीं से डालूंगी आपके मुँह में सीधा जामुन।

बिरजू को भी नीलम की शरारते बहुत भा रही थी, उसने बड़ा सा मुँह खोला, नीलम ने एक अच्छा सा जामुन तोड़कर तीन चार बार अच्छे से निशाना लगाया और खींचकर अपने बाबू के मुँह की तरफ फेंका, जामुन सीधा बिरजू के गाल पर जा के पट्ट से लगा, फुट गया, जामुन का जमुनी रस गाल पर फैल गया।

बिरजू- लो! यही निशाना है तेरा, बस अब रहने दे तू, खिला चुकी तू जामुन अपने बाबू को (बिरजू ने double meaning में कहा)

नीलम- जामुन तो मैं खिला के रहूँगी अपने बाबू को, देख लेना, बाबू एक बार और, एक बार और न बाबू, देखो एक दो बार तो इधर उधर हो ही जाता है, फिर आ करो न, करो न बाबू, इस बार ठीक से फेंकूँगी, देखो मैं कितनी ऊपर भी तो हूँ, पर इस बार पक्का सीधा मुँह में डालूंगी।

बिरजू अपनी बेटी की इस बचपने और जिद पर निहाल होता जा रहा था आज नीलम उसे जवानी और बचपन हर तरह का प्यार दे रही थी, उसने फिर से आ किया, बड़ा सा मुँह खोला।

नीलम ने अपने आस पास सर उठा के एक अच्छा सा बड़ा सा जामुन देखा और तोड़कर पांच छः बार निशाना लगाया फिर खींच कर अपने बाबू के मुँह में फेंका, इस बार जामुन सीधा बिरजू के मुँह में गप्प से चला गया और बिरजू उस रसभरे मीठे जामुन को खाने लगा।

नीलम- देखा बाबू! है न मेरा निशाना अच्छा, खिलाया न आपको जामुन, मीठा है न बहुत, बोलो ना।

बिरजू- नही तो ज्यादा मीठा तो नही था, बाकी निशाना तो तेरा बहुत अच्छा है। (बिरजू ने जानबूझकर ये बोला कि जामुन मीठा नही है वो देखना चाहता था कि नीलम अब क्या करेगी, क्योंकि वो सबसे ज्यादा पका हुआ अच्छा जामुन था)

नीलम- क्या बाबू, कितना अच्छा मीठा जामुन खिलाया आपको मैंने और आप कह रहे हैं कि मीठा ही नही था, तो और कैसे मीठा होगा? (तभी नीलम को ये बात click कर गयी, वो समझ गयी उनके बाबू ने ऐसा क्यों बोला), अच्छा रुको अब मैं तुम्हे सच में बहुत मीठा जामुन खिलाती हूँ, एक बार फिर से मुँह खोलो।

बिरजू ने फिर मुँह खोला- नीलम में एक और बड़ा सा जामुन तोड़ा और अपने बाबू को दिखाते हुए उसे थोड़ा सा काटकर जूठा किया, ये देखते ही बिरजू की आंखें खुशी से चमक गयी, वो अपनी बेटी की समझ को समझ गया, नीलम ने जामुन जूठा करके निशाना लगा के सीधा अपने बाबू के मुँह में फेंका, इस बार भी जामुन सीधा मुँह में गया और वाकई में इस बार के जामुन में बेटी के होंठों की मदहोश कर देने वाली खुशबू थी, बिरजू उसे आंखें बंद करके नशे में खाने लगा तो ऊपर से नीलम उन्हें देखकर हंस दी, नीलम और बिरजू दोनों के ही बदन में अजीब सी सुरसुरी दौड़ गयी। बिरजू ने वो जामुन खा लिया फिर आंखें खोलकर ऊपर देखा तो नीलम उसे ही बड़े प्यार से देख रही थी।

नीलम ने पूछा- ये वाला मीठा था?

बिरजू- बहुत, बहुत मीठा, तेरा प्यार जो था इसमें, ये दुनिया का सबसे मीठा जामुन था।

नीलम- मेरे छूने से इतना मीठा हो गया बाबू।

बिरजू- हाँ और क्या, तू है ही इतनी मीठी।

नीलम- मैं मीठी हूँ?

बिरजू- बहुत

नीलम- सिर्फ इतने से पता लग गया आपको?

बिरजू- थोड़ा थोड़ा तो पता लग ही गया, बाकी का..........

नीलम- बाकी का क्या?.....बाबू बोलो न रुक क्यों गए।

बिरजू- बोल दूँ।

नीलम धीरे से-हम्म्म्म

बिरजू- बाकी का तो तुझे पूरा चख के पता लगेगा, होंठों का तो पता लग गया बहुत मीठे होंगे।

नीलम- हाय दैय्या, धत्त बाबू, बेशर्म.... कोई सुन लेगा तो क्या सोचेगा, धीरे बोलो, अम्मा भी घर पर ही हैं (नीलम अपने बाबू के इस खुले बेबाक जवाब से बेताहाशा शर्मा गयी, बदन उसका गनगना गया, पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी, वासना की तरंगें उठने लगी, क्योंकि वो ऊपर पेड़ पर थी तो उसने झट से बात को बदला), अच्छा बाबू और खाओगे जामुन?

बिरजू- मन तो बहुत है मेरी बेटी पर अब अभी नही।

नीलम- तब कब?

बिरजू- वही, तेरी अम्मा के जाने के बाद।

नीलम मुस्कुरा दी- रात को खिलाऊंगी फिर।

बिरजू- हाँ बिल्कुल, और बचा के रख लेना जामुन सारा मत भेजना नाना के यहां।

नीलम- ठीक है बाबू।

नीलम और बिरजू दोनों एक दूसरे को कातिल मुस्कान से देखने लगे दोनों की आंखों में वासना भर चुकी थी।
?
 

Karnal Rathore

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नीलम जमुन के पेड़ की डाल पर बैठी आस पास लगे मोटे मोटे पके हुए काले काले जामुनों को गुच्छों सहित तोड़कर नीचे खाट पर फेंकने लगी, बिरजू नीचे खड़ा अपनी बेटी को मंत्रमुग्ध सा देखता रहा, जब खाट पर काफी जामुन हो गए तो बिरजू ने उन्हें एक बाल्टी में पलट लिया, फिर ऊपर देखने लगा, नीलम जिस डाल पर बैठी थी वहां आस पास और थोड़ा दूर दूर उसने हाँथ बढ़ा कर सारे अच्छे अच्छे पके हुए जामुन तोड़ लिए। नीलम अपने बाबू को देखते हुए उस डाल से उठी और दूसरी डाल पर चली गयी, बिरजू नीचे से नीलम को निहार रहा था।


नीलम इस वक्त जहां पर थी वहां दो मोटी मोटी डाल थी, नीलम को यही तो चाहिए था, जामुन तो वो अच्छे खासे तोड़ चुकी थी अब उसे बिरजू को कुछ अच्छे से दिखाना था उसने अपना एक पैर अच्छे से खोलकर फैलाकर दूसरी डाल पर रख दिया, घाघरा पूरा फैल गया, नीलम के ठीक नीचे बिरजू खाट के पास खड़ा किसी चकोर की तरफ एक टक लगाए अपनी बिटिया को निहार रहा था, जैसे ही नीलम ने अपने पैर ऊपर डाली पर रखकर फैलाये घाघरे के अंदर नीलम की वो गोरी गोरी टांगें, मादक मोटी मोटी जाँघे और उसमे फंसी काली पैंटी साफ दिख गयी, उसके विशाल गुदाज दोनों नितम्ब कैसे पतली सी पैंटी में कसे हुए थे और उफ़्फ़फ़फ़ वो दोनों जाँघों के बीच वो मोटा सा फूला हुआ हिस्सा जो चीख चीख के कह रहा था कि हां यहीं है वो महकती हुई मखमली सी जवान प्यासी बूर, इसलिए दोनों जाँघों के बीच पैंटी यहां उभरी हुई है, उस जगह पर पैंटी इतनी पतली थी कि बस उसने किसी तरह केवल मखमली बूर को ही ढका हुआ था, ऐसा लग रहा था कि वो काली पैंटी नीलम की मदमस्त जवानी को, उसके गुदाज, मांसल जाँघों को, मस्त चौड़े नितम्ब को संभाल पाने में असमर्थ है।


बिरजू अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी की मदमस्त जवानी को देखकर वासना से लाल होता चला गया उसका लंड धोती में हिचकोले खाने लगा उसने जैसे तैसे नज़रें बचा कर उसे ठीक किया, एक टक वो पैंटी के अंदर अपनी सगी बेटी की बूर और मोटी मोटी जाँघे, मदमस्त गोरी टांगें घूरे जा रहा था, कई बार उसने अपने सूख गए होंठो पर जीभ फेरा और अपनी बेटी की नग्नता के दर्शन करते हुए अपनी सांसों को काबू करने की कोशिश करने लगा। नीलम अपने बाबू की मनोदशा देख देखकर जामुन तोड़ तोड़कर नीचे फेंकते हुए चुपके से मंद मंद मुस्कुराते जा रही थी।


नीलम ने एक बार फिर काफी जामुन तोड़ तोड़ कर खाट पर इकठ्ठे कर दिए, बिरजू ने उसे भी बाल्टी में पलट दिया, नीलम ने अब अपने बाबू को तरसाने के लिए अपने दोनों पैर एक ही डाल पर रख लिए, बिरजू मन मकोस कर रह गया, अपने बाबू की हालत देख नीलम हंस पड़ी और बोली- क्या देख रहे थे बाबू?


बिरजू- यही की तू जामुन कैसे तोड़ रही है?


नीलम- पक्का यही देख रहे थे।


बिरजू- हाँ


नीलम ने बड़ी अदा से कहा- सच्ची बोलोगे तो दुबारा.........


बिरजू ने बड़ी वासना से नीलम को देखा फिर बोला- सच, दुबारा


नीलम- ह्म्म्म, बिल्कुल, सच बोलने का इनाम मिलेगा न।


बिरजू- अच्छा! और क्या क्या मिलेगा?


नीलम- क्या क्या चाहिए मेरे बाबू को?


बिरजू- मुझे..... मुझे तो पूरी की पूरी नीलम ही चाहिए।


नीलम जोर हंसते हुए शर्मा गयी और बोली- धत्त, पगलू, बेटी हूँ न मैं आपकी, वो भी सगी, अपनी ही सगी बेटी चाहिए मेरे बाबू को, कोई जान जाएगा तो क्या सोचेगा, बदमाश? (नीलम ने बड़ी अदा से धीरे से कहा)


बिरजू- कोई जानेगा कैसे? तुम बताओगी क्या किसी को?


नीलम- मैं, मैं तो कभी नही बताऊंगी, किसी को भी नही, मैं भला क्यों बताऊंगी?


बिरजू- फ़िर, और मैं तो बताने से रहा, तो कोई जानेगा कैसे?


नीलम- फिर भी कभी किसी ने देख लिया तो?


बिरजू- चुपके चुपके, छुप छुप कर...समझी। तो फिर कोई कैसे देखेगा?


नीलम शर्म से लाल हो गयी फिर बोली- लेकिन सच सच बताओगे तब, की आप क्या देख रहे थे?


बिरजू- अच्छे से तो रात को बताऊंगा अभी तो बस यही कहूंगा कि जो मेरी बेटी मुझे दिखा रही थी वही देख रहा था।


नीलम ये सुनकर शर्मा गयी और अपने बाबू की आंखों में देखने लगी फिर उसने अपना एक पैर खोलकर दूसरी डाली पर रख दिया और दिखावे के लिए जामुन तोड़ने लगी, घाघरा एक बार फिर फैल गया और बिरजू ने दोनों आंखें फाड़े घाघरे के अंदर अपनी सगी बेटी की नग्नता के अच्छे से दर्शन किये, क्या बदन था नीलम का, हाय वो कसी हुई पैंटी, वो मोटी मोटी जाँघे, पैंटी के अंदर कसमसाती बूर.....ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़


बिरजू तो हिल गया, नीलम भी शर्म से लाल होती रही, अपनी नग्नता अपने ही सगे बाबू को दिखाने में उसे अजीब सी गुदगुदी और शर्म के साथ साथ वासना की तरंगें पूरे बदन में उठती हुई महसूस हो रही थी, ये सोचकर वो गनगना जा रही थी कि कैसे उसके बाबू उसके घाघरे के अंदर एक टक लगाए उसकी टांगों, जाँघों, नितम्बों और पैंटी को देख रहे थे, कितनी शर्म भी आ रही थी उसको, काफी देर वो इसी तरह अपने बाबू को अपने हुस्न का खजाना दिखाती रही फिर उसने धीरे से बोला- अब बस करो बाबू, अब बाद में, अभी के लिए बस, ज्यादा नही, कोई देख लेगा बाबू।


नीलम ने अपने दोनों पैर एक डाल पर रखे और जैसे ही वो सीधी खड़ी हुई पूरी डाल कड़कड़ा कर टूटी, नीलम लगभग 14-15 फुट ऊपर से नीचे गिरी। नीलम के मुँह से एक पल के लिए डर के मारे चीख निकल गयी, नीलम की तेज चीख और डाल टूटने की कड़कड़ाहट सुनकर नीलम की माँ ने भी कुएँ से पलट के देखा, और चिल्लाते हुए पेड़ की तरफ भागी।


बिरजू ने लपकक्कर अपनी बेटी नीलम को जल्दी से अपनी बलशाली भुजाओं में थाम लिया और भाग्यवश बगल में ही मजबूत खाट होने की वजह से दोनों उस खाट पर धड़ाम से गिरे, और खाट की एक पाटी मजबूत होने पर भी कड़ाक से टूट गयी, करीब 14-15 फुट ऊपर से नीलम गिरी और बिरजू उसे थामते हुए लेकर खाट पर गिरा तो पाटी तो टूटनी ही थी, नीलम का मदमस्त गदराया बदन अपने बाबू की मजबूत बाहों में झूल गया, बिरजू नीलम को लेके अपने दाएं हाँथ के बल खाट पे गिरा और सारा भार उसके हाँथ पर आ गया जिससे उसके हाँथ में गुम चोट लगी, ईश्वर की कृपा थी कि बस यही एक चोट बिरजू को लगी थी, नीलम बिल्कुल सुरक्षित बच गयी थी, अपने बाबू से वह बुरी तरह लिपटी उनके ऊपर पड़ी थी, उसका गदराया बदन, मोटी मोटी चूचीयाँ बिरजू के सीने पर दब गई, बिरजू को चोट के दर्द और अपनी बेटी के गदराए बदन का मीठा मीठा मिला जुला अहसाह हो रहा था। डाल पूरी तरह टूटी नही थी बस आधी टूटकर झूल गयी थी अगर डाल पूरी टूटकर अलग हो गयी होती तो वो भी साथ में गिरती और फिर डाल से भी काफी चोट लग सकती थी, पर ये ईश्वर की दूसरी गनीमत थी।


जामुन की डाल भले ही देखने में मोटी हो पर वो ज्यादा मजबूत नही होती ये बात नीलम जानती तो थी पर उस वक्त अपने बाबू के साथ वो वासना में डूबी हुई थी उसे ये बिल्कुल ध्यान ही नही आया कि डाल टूट सकती है और वही हुआ, जमीन पर काफी जामुन झटका लगने से टूटकर गिर गए थे, बगल में दो बाल्टी भरकर जामुन पहले ही रखे हुए थे जो नीलम ने तोड़े थे।


नीलम की माँ कुएँ पर से ही देखकर चिल्लाई- हाय मेरी बच्ची....नीलम, अरे नीलम के बाबू बचाओ उसे, पकड़ो उसे, गयी मेरी बच्ची आज, हे भगवान, टूट गयी न डाल
इसीलिए मैं बोलती हूँ कि पेड़ पर मत चढ़, गांव के बच्चों को भी डांटती रहती हूं, मैंने बोला था कि जामुन नही चाहिए रहने दे, पर ये जिद्दी माने तब न, और ये भी इसी के साथ दीवाने हुए रहते हैं, जो कहेगी बस कर देना है, सोचना समझना नही है, अरे तुम्ही चढ़ जाते पेड़ पे, उसको चढ़ाने की क्या जरूरत थी, बताओ भगवान का लाख लाख शुक्र है कि बच गयी मेरी बच्ची, आज हाथ पैर टूट ही जाते उसके, जामुन तो लग्गी से भी तोड़ी जा सकती थी पेड़ पे चढ़ने की क्या जरूरत थी, ये लड़की सच में किसी दिन हाथ पैर तुड़वायेगी अपना।


अपनी माँ को बड़बड़ाते हुए अपनी तरफ आते देखकर नीलम हड़बड़ा के अपने बाबू को देखते हुए धीरे से उनके ऊपर से उठी और बोली- मेरे बाबू आपको लगी तो नही, आज आप न होते तो मुझे कौन बचाता?, आप तो ठीक तो हो न मेरे बाबू?


बिरजू- हाँ मेरी बेटी मैं बिल्कुल ठीक हूँ, हम बच गए, बस थोड़ा सा इस सीधे हाँथ में गुम चोट आ गयी है, बाकी तो सब ठीक है (बिरजू ने हल्का सा दर्द की वजह से कराहते हुए कहा)


नीलम की आंखों से आँसू बह निकले और वो लिपटकर उनके हाँथ को देखने लगी- कहाँ बाबू कहाँ लगी मेरे बाबू को दिखाओ जरा, हे भगवान ये तो सूज गया है यहां पर हाँथ, सब मेरी वजह से हुआ न बाबू, न मैं ऐसा करती न होता।


बिरजू- नही मेरी बेटी कुछ नही हुआ मुझे, तू भी न, और तू रोने क्यों लगी हे भगवान, ये तो बस इस खाट की पाटी की वजह से दबाव पड़ गया उसकी वजह से गुम चोट लगी है बस, तू तो रोने भी लगी इतनी जल्दी, बस कर मेरी बिटिया रानी।


बिरजू ने नीलम के आँसू पोछे और गले से लगा लिया।


नीलम- आपके होते हुए मुझे कुछ हो सकता है बाबू, आज मैं ये जान गई कि आप ही मेरे रक्षक हो, आप उठो चलो बरामदे में।


तभी नीलम की मां आ गयी और नीलम को बाहों में भर लिया- मेरी बच्ची तुझे कहीं लगी तो नही, तुझे कितनी बार मना किया है न कि पेड़ पर मत चढ़ मत चढ़, पर तु माने तब न, तुझे कुछ हो जाता तो ससुराल वालों को क्या जवाब देती मैं, कितने ऊपर से गिरी है तू, लाख लाख शुक्र है ईश्वर का की बच गयी मेरी बच्ची आज, अब मत चढ़ना कभी पेड़ पर।


नीलम- अम्मा मुझे तो बाबू ने बचा लिया, मुझे चोट नही लगी पर बाबू को हाँथ में गुम चोट लग गयी है, आज वो न होते तो मुझे बहुत चोट लगती, मेरे बाबू ने मुझे बचाया है।


नीलम की माँ- कहाँ लगी तुम्हे दिखाओ, हे भगवान देखो कितनी सूजन हो गयी है, चलो बरामदे में लेटो मैं धतूरे के पत्ते में हल्दी गरम करके बांध देती हूं शाम तक सूजन उत्तर जाएगी, आज सुबह सुबह यही सब होना था।


बिरजू- अरे नीलम की माँ तू ज्यादा परेशान मत हो ये सब तो होता ही रहता है जिंदगी में, ज्यादा नही लगी है बस यहीं बाजू में लगी है थोड़ी सी, वो तो खाट थी तो बच गए वरना ज्यादा लग जाती।


नीलम और उसकी माँ बिरजू को सहारा देकर बरामदे में लाये और बिस्तर पर लिटाया, नीलम दौड़ कर गयी धतूरे के पत्ते तोड़कर लायी और माँ को दिया उसकी माँ रसोई में हल्दी, लहसन, फिटकरी मिलाकर सरसों के तेल में पकाकर पेस्ट बनाने ले लिए चली गयी।


नीलम अपने बाबू की आंखों में बड़े प्यार से एकटक देखने लगी और बोली- सब मेरी वजह से हुआ न बाबू, न मैं जिद करती और न ये सब होता, देखो चोट लग गयी न आपको, मुझे तो बचा लिया अपने पर मेरी वजह से आपको चोट लगी न बाबू।


बिरजू ने नीलम के चहरे को हाँथों में थाम लिया और बोला- तू अपने को क्यों कोस रही है पगली, कभी कभी कुछ दर्द भरी घटना अगर अच्छे के लिए हो तो वो घटना अच्छी ही मानी जाती है, तेरे लिए तो मैं कुछ भी कर जाऊंगा ये छोटा सी चोट क्या चीज़ है,आज तूने मुझे इतना प्यार दिया और इतना आनंद दिया, उसका भी तो अपना अलग ही मजा था, तू ये सब न करती तो भला तू मुझे आज मिलती कैसे, तुझे पता है आज तू मुझे मिल गयी है, तुझे आज पाया है मैंने, अपनी बेटी को आज पाया है मैंने, आज मैं कितना खुश हूं तुझे नही पता, और इसके बदले में ये छोटा सा दर्द तो बहुत कम है मेरी बेटी, बहुत कम, तू अपने को मत कोस ये होना था और अच्छे के लिए होना था।


नीलम इतना सुनते ही भावुक होकर अपने बाबू के गले लग गयी और बोली- ओह बाबू आज अपने मेरा दिल जीत लिया, सच पूछो तो दीवानी तो मैं आपकी बहुत पहले से थी पर आज मैं पूरी तरह आपकी हो गयी सिर्फ आपकी, आज मैं भी इतनी खुश हूं कि मैं बयान नही कर सकती।


ऐसा कहकर नीलम और बिरजू एक दूसरे की आंखों में देखने लगे, दोनों की आंखों में प्यार और प्यास दोनों साफ नज़र आ रहा था अपनी बेटी के तरसते होंठों को वो लगतार देखे जा रहा था, कभी पूरे चेहरे को निहारता, कभी लाली लगे हुए होंठो को देखता, कभी आंख और नाक तथा नाक की प्यारी सी लौंग को देखता, बिरजू को हाथ में दर्द भी हो रहा था। इतने में वो बोला- अब आज तो तेरी अम्मा जाने से रही नाना के घर, तो हम गाय और बछिया के बारे में बात कैसे करेंगे और तुम मुझे जामुन कैसे खिलाओगी?


नीलम मुस्कुराते हुए- आप अपनी बेटी को कम समझते हैं क्या बाबू, देखते जाइये मैं कैसे अम्मा को नाना के यहां भेजती हूँ और हाँ अगर आज नही मानी तो कल तो पक्का भेजूंगी, अपने बाबू को जामुन तो खिलाकर रहूँगी वो भी बहुत मीठा वाला।


बिरजू- हाय! सच


नीलम- हाँ सच, देखते जाइये।


बिरजू- ये तो मुझे पता है कि मेरी बेटी बहुत तेज है।


नीलम- आपकी बेटी हूँ, तेज तो होऊंगी ही न।


इतने में नीलम की माँ धतूरे के पत्ते में पकाया हुआ गरम हल्दी का पेस्ट लेकर आती हुई जान पड़ी तो दोनों बाप बेटी अलग हो गए, नीलम की माँ ने वो पेस्ट बिरजू के चोट पर लगा कर पत्ते से बांध दिया और ऊपर से पट्टी बांध दी और बोली- अब ऐसे ही लेटे रहो, आज कहीं जाना नही, ये घरेलू दवाई शाम तक सारा दर्द खींच लेगी और सूजन भी कम हो जाएगी, शाम को एक बार और बांध दूंगी, आराम करो अब।


नीलम की माँ ने पेड़ के नीचे रखी जामुन से भरी दोनों बाल्टी उठाकर घर में रख दी और बिखरे हुए जामुन भी बटोर लिए, टूटी खाट उठा कर बगल में रख दी, डाल पेड़ पर लटकी झूल ही रही थी उसे देख बिरजू नीलम की माँ से बोला- देखना किसी गाँव के बच्चे को पेड़ के नीचे मत खेलने देना ये डाल कभी भी टूटकर गिर सकती है, मुझे थोड़ा आराम हो जाये तो मैं इसे खींचकर गिराता हूँ।


नीलम की माँ- अरे अभी तुम आराम करो, करना बाद में जो भी करना हो, जरा सा चैन नही है, चोट लगने पर भी।


नीलम अपने बाबू को देख कर मुस्कुराने लगी बिरजू भी उसे देखकर मुस्कुरा दिया।



(ये वही 6ठा दिन था जब उदयराज ने शाम को खेत से आते वक्त नीलम को रोड के पास धतूरे के पत्ते तोड़ते हुए देखा था और पूछा था कि क्या हो गया, फिर नीलम ने उसे जब बताया कि बाबू को चोट लग गयी है तब वो उसी वक्त बिरजू को देखने गया था और उसे फिर थोड़ा देर भी हो गयी थी, इसी के बाद था 7वां दिन अमावस्या की रात)
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Karnal Rathore

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Update- 46

दोपहर को नीलम ने अपनी माँ से कहा- अम्मा शाम को कितने बजे निकलोगी नाना के घर जाने के लिए।

नीलम की माँ- अब आज कहाँ जाउंगी बेटी, तेरे बाबू को चोट जो लगी है, अब उन्हें आराम हो जाये तो मेरे मन को तसल्ली होगी तभी जाउंगी, आज तो मुश्किल है कल ही जाउंगी।

नीलम- अरे अम्मा फिर वो जामुन तो कल तक खराब हो जाएंगे न, इतनी मेहनत से तोड़ा है मैंने और बाबू ने।

मां- हाँ वो तो देखा है मैंने कितनी मेहनत से तोड़ा है तूने, हाँथ पैर तुड़वा के बैठ गयी, बोल रही थी की रहने दे जामुन मत तोड़ फिर भी, अब तो कल ही जाउंगी, जामुन को गीले सूत की बोरी में लपेट के रख दे, कल सुबह ही निकल जाउंगी, तब तक खराब नही होगा।

नीलम- अम्मा तू गुस्सा क्यों होती है, ठीक है तेरा मन कल है तो कल ही जाना, पर गुस्सा मत हो, हो गया जो होना था मैंने कोई जानबूझ के थोड़ी न किया, मुझे क्या पता था।

ये सुनकर नीलम की माँ का छोटा सा गुस्सा शांत हो गया- अरे नही मेरी बिटिया गुस्सा नही हो रही, पर चिंता तो होती है न, मैं चली गयी और पीठ पीछे कुछ दिक्कत हो तो मेरा मन भी तो नही लगेगा न वहां, इसलिए बोल रही थी कि तेरे बाबू को कल तक काफी आराम हो जाएगा तो कल चली जाउंगी सुबह।

नीलम ने भी ज्यादा जोर नही दिया, एक रात की ही तो बात थी, कर लेगी कैसे भी बर्दाश्त, काट लेगी एक रात करवट बदल बदल कर, जब इतनी रातें काटी हैं तो एक रात और सही, ज्यादा जोर देती तो उसकी माँ को भी शक होता, इसलिए उसने ज्यादा कुछ बोल नही।

दिन भर बिरजू खाट पर लेटा रहा, नीलम की माँ और नीलम घर का और बाहर का सारा काम करती रही, बिरजू लेटे लेटे उन्हें देखता रहा, नीलम काम से फुरसत निकाल कर अपने दीवाने बाबू के पास कभी कभी बीच बीच में आकर बैठ जाती और दोनों एक दूसरे को नीलम की माँ से नजर बचा कर निहारते, एक टक लगा कर एक दूसरे को देखते। नीलम अपनी माँ की नज़र बचा कर अपने बाबू की खाट पर बिल्कुल सटकर बैठ जाती, बिरजू उसके हाँथ को अपने हाँथ में ले लेता और नरम मुलायम उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा कर धीरे धीरे उसकी आँखों में देखता हुआ सहलाता, नीलम शर्मा जाती और मदहोशी में अपने बाबू के बदन की छुअन को महसूस कर आंखें बंद कर लेती।

ऐसे ही एक बार नीलम कोई काम करके दुबारा आयी और खाट पर बिरजू के बगल में झट से बैठ गयी, बिरजू ने हल्का सा सरककर उसको बैठने की जगह दी, बिरजू ने नीलम के हाँथ को अपने हाँथ में लिया और प्यार से सहलाने लगा और बोला- तेरी अम्मा कहाँ है?

नीलम- पीछे खेत में गयी है अम्मा, कुछ देर में आएंगी (नीलम ने ये बात जोर देकर कही), बाबू आपका दर्द कैसा है धीरे धीरे आराम हो रहा है न (नीलम बिरजू की आँखों में देखते हुए बोली)

बिरजू- अब मेरी प्यारी बिटिया मुझे बार बार आ के प्यार देगी और छुएगी तो धीरे धीरे तो आराम होगा ही।

नीलम- मेरा बस चलता तो आपका सारा दर्द एक चुटकी में गायब कर देती।

बिरजू- वो कैसे?

नीलम ने अपना चेहरा बिरजू पर झुकाया और धीरे से बोली- आपको पूरी तरह अच्छे से छूकर।

बिरजू- हाय, तो रोका किसने है मेरी बिटिया, मेरी जान।

नीलम- अभी तो फिलहाल अम्मा ने रोक रखा है (नीलम का अर्थ ये था कि अभी अम्मा घर पे हैं)

बिरजू- लेकिन वो तो पीछे खेत में गयी है न, तो फिर।

नीलम- कभी भी आ सकती है बाबू (फिर नीलम ने बहुत धीरे से बोला)- बेटी को बहुत तसल्ली से धीरे धीरे प्यार करना चाहिए, समझें बुध्धू राम, जल्दबाज़ी में नही। किसी चीज़ को जल्दबाज़ी में खाओगे तो पूरा मजा कैसे मिलेगा, बोलो, सही कहा न (और वो कहकर खिलखिला कर हंस दी)

बिरजू- ठीक है मैं अपनी बेटी की चिज्जी को धीरे धीरे ही खाऊंगा और बिरजू ने नीलम का हाँथ दबा दिया तो वो सिसक उठी फिर बोली- बेटी की चिज्जी?

बिरजू- हाँ, मेरी प्यारी बेटी की प्यारी सी चिज्जी।

नीलम का चेहरा शर्म से लाल हो गया यहां तक कि उसके कान भी लाल हो गए जोश में, शर्मा कर उसने अपना चेहरा हाँथ से छुपा लिया और मंद मंद मुस्कुराने लगी,बिरजू उसे शर्माते हुए देखता रहा, हालांकि नीलम रजनी के मुकाबले काफी बिंदास थी पर फिर भी अपने सगे बाबू के मुँह से ये सुनके न जाने क्यों उसे बहुत शर्म आयी और वो वासना से भर गई, बदन उसका सनसना गया, कुछ देर हाथों में चेहरा छुपाये बैठी रही फिर एकएक एक उंगली को हल्का सा साइड करके झरोखा बना के अपने बाबू को देखा तो वो मुस्कुराते हुए उसे ही देख रहे थे, फिर उसने हंसते हुए दुबारा अपने चेहरे को हांथों से छुपा लिया और एकाएक जब बिरजू ने नीलम के चेहरे से हाँथ हटाया तो वो झट अपने बाबू के ऊपर लेटकर गले से लग गयी और कान में बोली- धत्त!......पर ये चिज्जी है क्या बाबू? आपकी प्यारी सी बेटी की प्यारी सी कौन सी चिज्जी, और ये है कहाँ? (नीलम ने जानबूझकर सिसकते हुए पूछा)

बिरजू तो पहले नीलम के बाहों में आने से ही उसके गुदाज मखमली बदन से मदहोश हो गया फिर कुछ देर बाद बोला- नाभि के रास्ते नीचे की तरफ चलते जाओ कुछ दूर जाने पर एक घना जंगल आएगा, जैसे ही उस जंगल को पार करोगे चिज्जी वहीं मिलेगी, बहुत प्यारी सी होती है वो, मीठी मीठी, देखने में ही मदहोशी सी आ जाती है और खाने लगो तो जैसे जन्नत में पहुँच गए हों, मक्ख़न जैसी होती है बिल्कुल, नरम नरम।

नीलम की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी ये सुनकर फिर भी वो उखड़ती सांसों से बोली- उसको खाते कैसे हैं बाबू? बताओ न?

बिरजू भी बदहवास सा हो गया ऐसी बातें करके फिर बोला- उसको पहले तो मुँह में भरकर खाते हैं फिर बड़े से मूसल से खाते हैं, उस मूसल को उसमे डाल के उसको अच्छे से खाते हैं।

नीलम- उसमे डालते हैं वो मूसल बाबू?

बिरजू- हाँ मेरी बेटी, मेरी रानी। पूरा अच्छे से अंदर तक डालकर उस चिज्जी को खाते हैं।

नीलम ने उखड़ती हुई भारी सी आवाज में कहा- कौन सा मूसल बाबू?, कैसा मूसल?

बिरजू जैसे ही नीलम का हाँथ पकड़कर अपने धोती में खड़े दहकते लंड की तरफ ले जाने लगा तो नीलम समझ गयी और सनसना कर चौकते हुए हाँथ वापिस खींच लिया और एक मुक्का अपने बाबू के सीने पर हल्का सा मारा और बोली- ईईईईईईईईशशशशशशशशश......धत्त....बाबू.....कोई देख लेगा.....अभी नही और हंसते हुए उनके सीने में मुँह छुपाकर लेट गयी।

बिरजू- तुमने ही तो पूछा था की मूसल क्या होता है, तो मैं तो बस वही दिखा रहा था।

नीलम- बहुत गन्दू होते जा रहे हो आप, जल्दी जल्दी, संभालो खुद को। बेटी की चिज्जी को चुपके चुपके खाते हैं, कोई देख लेगा तो?

नीलम शर्माते हुए अपने बाबू से लिपटी रही।
दोनों की सांसें बहुत तेज चलने लगी, बिरजू ने अपने खड़े लंड को ठीक किया।

फिर कुछ देर बाद नीलम उठकर बैठ गयी और अपने बाल ठीक करते हुए अपने बाबू की आंखों में देखते हुए बोली-बाबू अम्मा तो कल सुबह ही जाएगी नाना के यहां आज तो नही जाएंगी।

बिरजू- लो तुम तो बोल रही थी कि मैं कैसे भी करके आज ही भेजके रहूँगी, मेरी बिटिया रानी।

नीलम- मैंने बहुत कोशिश की पर वो नही मानी फिर मुझे लगा कि उन्हें शक होगा, इसलिए मैंने ज्यादा जोर नही दिया।

बिरजू- कोई बात नही बेटी, एक रात और सही, पर जामुन तो कल तक खराब हो जाएंगे तो तुम खिलाओगी कैसे?

नीलम मुस्कुराते हुए- अभी तक आप ये समझ रहे हैं कि जो बाल्टी में भरकर रखा है वो आपका जामुन है। (नीलम ने बड़े अचरज से पूछा)

बिरजू- हाँ, वही तो है जामुन न।

नीलम अपने बाबू के और नज़दीक आयी और फुसफुसाके बोली- अरे मेरे बुध्धू बाबू, आपका जामुन तो ये है, उससे भी बहुत मीठा।

और ऐसा कहते हुए नीलम ने बहुत शर्माते हुए आज पहली बार अपने बाबू बिरजू की बाएं हाँथ की तर्जनी उंगली को पकड़ा और धीरे से अपनी चोली में कसी हुई बड़ी ही उन्नत दायीं चूची के निप्पल पर रख दिया, दोनों को एकाएक मानो करंट सा लगा, बिरजू ने ऐसा सोचा भी नही था कि उसकी सगी शादीशुदा बेटी एकाएक ऐसा कर देगी और न ही नीलम ने सोचा था, ये तो बस न जाने कैसे वासना में होता चला गया, बिरजू बदहवास सा नीलम को अपनी दोनों उंगली से उसके निप्पल को पकड़े देखता रह गया और नीलम भी अपने बाबू का हाँथ पकड़े कुछ देर उन्हें देखती रही फिर बिरजू ने जोश में आकर नीलम के निप्पल को उंगलियों से मसल दिया तो वो तेज से चिहुँक कर सिसक पड़ी फिर अचानक पीछे मुड़कर देखी की कहीं अम्मा न आ जाएं।

बिरजू कुछ देर अपनी बेटी के मोटे जामुन जैसे बड़े बड़े निप्पल चोली के ऊपर से ही बावला सा होकर धीरे धीरे दबाता मसलता रहा। नीलम सिसकते हुए बोली- बाबू बस, जामुन फूट जाएंगे.....अभी बस करो....आआआ आआआआआआआहहहहहहह.......अम्मा आ जायेगी रुको न..........अम्मा को जाने दो फिर सब कर लेना अपनी सगी बेटी के साथ जो जी में आये...............मैं तो आपकी ही हूँ न.....रुको न बाबू बस करो।

वाकई में नीलम के निप्पल किसी जामुन जैसे ही बड़े बड़े थे और इस वक्त वासना में फूलकर सख्त हो चुके थे उनका आकार भी बड़ा हो गया था, बिरजू अपनी सगी बेटी के मोटे मोटे निप्पल को आज छूकर होशो हवास खो बैठा, जब निप्पल इतने बड़े बड़े हैं तो चूची कितनी मस्त होगी, जब वो उसे खोलकर देखेगा, तो कैसा लगेगा, कैसी होगी चूची मेरी सगी बेटी की और निप्पल कैसे रंग का होगा, काला या गुलाबी.....हाय, खोलकर दोनों चूची जब वो लेटेगी मेरे सामने तो उसके सीने पर गोल गोल उठी हुई विशाल चूचीयाँ देखकर कैसा लगेगा मुझे, कहीं मैं पागल न हो जाऊं, यही सब सोचते हुए बिरजू का लंड धोती में फिर टनटना गया और जैसे ही नीलम की चौड़ी गांड पर चुभा, नीलम भी लंड की छुवन से बौरा सी गयी पर उसने अपने आपको काबू करने की कोशिश की, कहीं अम्मा न आ जाये। बिरजू ने एकाएक अपनी सगी बेटी की बड़ी सी मादक फूली हुई चूची को अपनी हथेली में भरकर दबा दिया, नीलम थोड़ा जोर से सीत्कार उठी, बिरजू हल्का हल्का मस्ती में आंखें बंद किये अपनी ही सगी बेटी की मखमली चूची दबाने लगा, नीलम शर्माते हुए सिसकने लगी, दोनों ही इस वक्त आगे नही बढ़ना चाहते थे पर न जाने क्यों खुद पर काबू ही नही हो रहा था जैसे तैसे नीलम ने अपने बाबू को रोका और समझाया, बिरजू ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोका और संभलते हुए बोला- कल साड़ी पहनोगी?

नीलम- हाँ मेरे बाबू जरूर, आप बोलो और मैं न पहनूँ ऐसा हो नही सकता, किस रंग की पहनूँ बोलो?

बिरजू- लाल रंग की।

नीलम मुस्कुराते हुए- लाल जोड़े में महसूस करना है अपनी बेटी को?

बिरजू- हाँ, एक दुल्हन की तरह।

दोनों एक दूसरे को बड़े प्यार से देखने लगे।

फिर नीलम बोली- और वो किस रंग की।

बिरजू जानबूझकर अनजान बनते हुए- वो क्या?

नीलम ने धीरे से कान में झुककर कहा- वही आखिरी वस्त्र...........कच्छी..….वो किस रंग की पहनूँ बाबू (नीलम ये बोलकर गनगना गयी)

बिरजू सिरह गया- काले रंग की, चिज्जी को काले कपड़े में छुपाकर रखना।

नीलम शर्माते हुए मुस्कुरा दी और फिर से एक मुक्का हल्के से अपने बाबू के सीने पर दे मारा- बदमाश! काले कपड़े में चिज्जी चाहिए, पगलू को, ठीक है बाबू आपकी ख्वाहिश आपकी ये बिटिया जरूर पूरा करेगी, अब मुझे छोड़ो अम्मा आती होंगी, बहुत देर हो गयी है।

तभी सच में नीलम की माँ चारा लेके आ गयी, दोनों झट से अलग हो गए।

शाम को नीलम ने जल्दी ही खाना बना लिया था, बिरजू को एक बार फिर पट्टी बदल दी गयी अब तक उसे काफी आराम हो चुका था दर्द तो बिल्कुल गायब हो चुका था बस थोड़ी सूजन थी, नीलम की माँ बोली- कल तक ये हाँथ ठीक हो जाएगा।

नीलम बरामदे में सोती थी, बिरजू और नीलम की अम्मा बाहर द्वार पर अगल बगल खाट बिछा कर सोते थे।

खाना खाने के बाद नीलम की माँ और बिरजू अपनी अपनी खाट पर अगल बगल लेटे थे, नीलम बरामदे में अपनी खाट पर लेटी तड़प रही थी, बर्दाश्त तो बिरजू से भी नही हो रहा था, तभी नीलम को एक तरकीब सूझी, लालटेन हल्की रोशनी देते हुए जल रही थी, नीलम ने देखा कि अम्मा और बाबू की खाट अगल बगल है और बीच में जगह है अगर मैं दोनों खाट के बीच जाकर पटरा लेकर बैठ जाऊं तो बाबू मुझे छू सकते हैं, नीलम का इतना मन कर रहा था कि उससे अब बर्दाश्त नही हो रहा था।
नीलम ने अपनी खाट से उठकर तेल की शीशी ली और एक हाथ में पीढ़ा लिया और अपनी अम्मा के पास पहुँच गयी, दोनों खाट के बीच आ के खड़ी हो गयी, आते हुए लालटेन को थोड़ा और मद्धिम कर आई थी।

नीलम ने एक नजर अपने बाबू पर डाली तो वो बड़ी बेचैनी से उसे ही देख रहे थे, नीलम को बिल्कुल खाट के पास बैठता देख बिरजू का मन मयूर झूम उठा, वो समझ गया कि उसकी बेटी उसे छुप छुप कर मजे देने आयी है, उसकी बेटी अब उसकी हो चुकी है पूरी तरह और वो भी तड़प रही है मस्ती करने के लिए, बिरजू उसे देखकर मुस्कुरा उठा, नीलम ने इशारे से थोड़ा रुकने के लिए बोला फिर दोनों खाट के बीच अपने बाबू की तरफ पीठ करके और अपनी अम्मा की तरफ मुँह करके नीचे जमीन पर पटरा रखकर बैठ गयी और अपनी अम्मा से बोली- अम्मा ला तेरे सर पे तेल रख दूँ, आज तूने बहुत काम किया है दिन भर, बाबू के हिस्से का भी काम किया है न तूने, काफी थक गई होगी, ला तेल से मालिश कर दूं, कल तो चली ही जाएगी तू नाना के घर।

नीलम की माँ- हाँ मैं तो कल बनवास जा रही हूं न 14 बरस के लिए आऊँगी थोड़ी लौट के, परसों ही आ जाउंगी मैं, रुकूँगी थोड़ी वहां, और मैं थकी वकी नही हूँ, चल सो जा जाके तू भी, नींद आ रही है मुझे अब।

नीलम- अरे अम्मा गुस्सा क्यों होती है, ठीक है तू परसों ही चली आना, मत रुकना वहां पर तेल तो मालिश करवा लें सर पे, तू सोती रह मैं कर देती हूं मालिश, ला अपना सर इधर रख।

नीलम की माँ- अरे बेटी मैं गुस्सा नही हूँ, तेरे से भला गुस्सा क्यों होऊंगी, वो तो मुझे नींद लग गयी है न इसलिए बोल रही हूं, तू भी खामख्वाह परेशान हो रही है, जा सो जा जाके, तू भी तो मेरे साथ साथ दिन भर लगी थी, जा सो जा रहने दे।

नीलम- लो माँ की सेवा करने में क्या परेशानी, तू भी तो मेरे लिए ही कल इतनी दूर अकेले नाना के घर जाएगी न।

अचानक ही नीलम के मुँह से ये निकल गया, तो वो झट से चुप हो गयी, नीलम की माँ ने दबी आवाज में फुसफुसाके बोला- धीरे बोल पगली तेरे बाबू एकदम पास में ही तो हैं, सुन लेंगे तो फिर पूछने लगेंगे की क्या बात है, अभी कल ही पूछ रहे थे तो मैंने उन्हें नही बताया बात टाल दी, और तू है कि कुछ भी झट से बोल पड़ती है।

नीलम- अरे अम्मा मेरे मुँह से एकदम से निकल गया, तू भी तो नही मान रही है न मेरी बात, कब से बोल रही हूं इधर सर कर, पर माने तब न।

नीलम की माँ- अच्छा बाबा ले, तू मानेगी थोड़ी, जिद्दी तो बचपन से है तू। (इतना कहते हुए नीलम की माँ ने अपना सर घुमाकर किनारे कर लिया)

नीलम- हाँ तो, जब तू जानती है फिर भी बहस करती है मुझसे (इतना कहकर नीलम धीरे से हंस पड़ी)

बिरजू चुपचाप आंखें मूंदे ऐसे लेटा था जैसे पानी में मगरमच्छ चुपचाप पड़ा पड़ा सही वक्त आने के इंतजार करता है।

नीलम की माँ- हाँ दादी अम्मा तेरे से अब बहस भी नही कर सकती मैं, पहले लालटेन तो बुझा दे।

नीलम- हाँ अम्मा, ये तो मैं भूल ही गयी।

और नीलम ने जाकर लालटेन बुझा दी, फिर आकर बैठ गयी, ये तो अब और ही नीलम और बिरजू के मन का ही हो गया था, अब काफी अंधेरा हो गया, बिरजू ने आंखें खोल ली और नीलम की मदमस्त पीठ देखने लगा, नीलम की पीठ बस एक फुट दूर थी। नीलम ने एक बार अपने बाबू को पलटकर देखा और अंधेरे में दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।

नीलम- अम्मा बाबू तो सो गए हैं, उन्होंने सुना नही होगा।

नीलम की माँ- चल अच्छा है नही सुना होगा तो, और तू अब बोल मत नींद आ रही है मुझे सोने दे, जल्दी से मालिश करके जा सो जा तू भी।

नीलम- ठीक है तू सो जा अम्मा, मैं मालिश करती हूं देख तुझे और भी अच्छी नींद आएगी।
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Karnal Rathore

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Update- 47

नीलम की माँ एक तो वैसे ही थकी थी ऊपर से नीलम की बेहतरीन सर की तेल मालिश से जल्द ही चली गयी वो तगड़े नींद की आगोश में।

बिरजू एक टक अपनी बेटी की पीठ को कुछ देर अंधेरे में देखता रहा, नीलम बस एक फुट की दूरी पर ही थी, बिरजू ने एक हाँथ से पीठ पर लहरा रहे बालों को हटाया और दूसरा हाँथ उसकी पीठ पर रख दिया, नीलम गुदगुदा गयी, धीरे धीरे बिरजू के हाँथ नीलम की पीठ को सहलाने लगे, नीलम और बिरजू की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने बाल को हटा के अपनी बेटी के नग्न पीठ को थोड़ा आगे होकर चूम लिया, अपने बाबू के होंठ आज पहली बार अपनी पीठ पर लगते ही नीलम सिसक उठी, मस्ती में आंखें बंद थी उसकी, बदन में उठी अजीब सी सनसनी और गनगनाहट से उसने अपनी जाँघे भीच ली। बिरजू धीरे धीरे हौले हौले एक के बाद एक कई गीले चुम्बन अपनी बेटी के पीठ पर कई जगह मदहोश होते हुए अंकित करता गया, और नीलम अपने होंठ दांतों में दबाए आंखें बंद किये बहुत मुश्किल से अपनी सिसकी दबाती चली गयी।

कुछ एक पल बाद नीलम ने अपना हाँथ पीछे ले जा के अपने बाबू का एक हाँथ पकड़ा और उसे आगे की तरफ लाते हुए धीरे से अपनी मखमली दायीं चूची पर रख दिया, बिरजू खुशी से भर गया कि उसकी बेटी वाकई में निडर है और कितनी उतावली हो रखी है। उसका लंड खड़ा होने लगा, अपनी बेटी की दाहिनी चूची को वो चोली के ऊपर से भर भर के दबाने और सहलाने लगा, नीलम की हालत खराब होने लगी उसके निप्पल सख्त होने लगे, बीच बीच में बिरजू द्वारा निप्पल को तेज मसल देने से उसके मुँह से सी-सी की आवाज न चाहते हुए भी हल्के हल्के निकल ही जा रही थी, लेकिन ये बहुत रिस्की था, पर क्या करें मन मान भी तो नही रहा था दोनों का।

आँख बंद किये वो अपने सगे बाबू से अपनी चूची दबवाने का असीम आनंद ले रही थी कुछ देर ऐसे ही चलता रहा, नीलम के निप्पल फूलकर किसी जामुन की भांति बड़े हो चुके थे और बिरजू का लंड धोती में लोहा बन चुका था।

बिरजू कुछ देर अपनी बेटी की पीठ को लगातार चूमते हुए उसकी दायीं चूची को मीजता, दबाता और सहलाता रहा, फिर उसने थोड़ा सही से लेटते हुए अपने दूसरे हाँथ को भी आगे ले जाकर नीलम की दूसरी चूची को भी अपने हांथों में भर लिया और अब दोनों चूचीयों को हांथों में भर भर के मदहोशी में दबाने लगा, नीलम के लिए बहुत मुश्किल हो रही थी क्योंकि माँ बिल्कुल पास ही थी और अति आनंद में निकल रही सिसकी को वो अब रोकने में खुद को असमर्थ पा रही थी, बार बार जाँघों को आपस में सिकोड़ ले रही थी क्योंकि गनगनाहट अब पूरे बदन में दौड़ रही थी, जाँघों के बीच जब उसे तेज सनसनाहट महसूस होती तब वो तेजी से अपनी जाँघे भींच लेती।

कुछ देर ऐसे ही दोनों बाप बेटी चुपके चुपके चूची मर्दन का आनंद लेते रहे फिर जब नीलम से अब बर्दाश्त नही हुआ तो उसने एक हाँथ से अपने बाबू के दोनों हांथों को पकड़ कर रुकने का इशारा किया, बिरजू रुक गया, कुछ देर के लिए उसने अपने हाँथ पीछे खींच लिए, नीलम की सांसें तेज चलने लगी थी।

बिरजू ने फिर से नीलम की पीठ को बेसब्री से चूमना शुरू कर दिया, पीठ का जितना भी खुला हिस्सा था वो बिरजू के थूक से भीग चुका था, नीलम सिरह सिरह जा रही थी।

एकाएक बिरजू ने अपने दोनों हाँथ नीलम के चहरे के सामने लाया नीलम अपने बाबू के हाँथ की उंगलियां आश्चर्य से देखने लगी की उसके बाबू क्या कर रहे हैं, बिरजू ने उल्टे हाँथ की तर्जनी उंगली और अंगूठे को मिलाकर गोल बनाया और सीधे हाँथ की तर्जनी उंगली को उस गोल छेद में डालकर अंदर बाहर करते हुए नीलम को दिखाकर ये इशारा किया कि लंड बूर चोदने के लिए बहुत तड़प रहा है।

नीलम ये देखते ही शर्म से पानी पानी हो गयी, मन में सोचने लगी उसके बाबू कितने बदमाश हो गए हैं, उनका चूत मारने का बहुत ही मन कर रहा है, ये इशारा देखकर मजा तो नीलम को भी बहुत आया पर वो शर्मा भी गयी, उसने पीछे पलटकर मुस्कुराते हुए अपने बाबू को देखा और फुसफुसाकर धीरे से बोली- बदमाश! सब्र करो, आज नही कल मिलेगी।

बिरजू- रहा नही जाता

नीलम- कैसे भी रहो, रहा तो मुझसे भी नही जा रहा, पर बर्दाश्त कर रही हूं न बाबू।

बिरजू- मुझे तेरे ऊपर लेटना है, चल न बरामदे में अपनी खाट पर।

नीलम- अम्मा जग जाएगी तो।

बिरजू- इतनी जल्दी नही जागेगी, गहरी नींद में है, चल न, बस एक बार, तेरे ऊपर लेटने का मन कर रहा है बहुत।

नीलम का भी मन डोल गया, उसे भी लगा मौका तो है, थोड़ा हिम्मत करें तो हो सकता है, वो फुसफुसाकर बोली- अच्छा बाबू ठीक है मैं जाती हूँ अपनी खाट पर तुम आना चुपके से।

और नीलम ने एक बार अपनी माँ को देखा तो वो सारे घोड़े सस्ते दाम पर बेंचकर सो रही थी, नीलम मुस्कुराई और धीरे से उठकर बरामदे में जाकर अपनी खाट पर लेट गयी।

थोड़ी देर बाद बिरजू धीरे से उठा और नीलम की खाट के पास जाने लगा, नीलम खाट पर चित लेटी बड़ी ही बेसब्री से अपने बाबू का इंतजार कर रही थी, नीलम को अपना इंतजार करता देख वासना से बिरजू की लार टपक गयी और वो धीरे से आआआआआआआआआआहहहहहहह.......मेरी बेटी बोलता हुआ उसके ऊपर चढ़ गया।

नीलम ने भी बाहें फैला के ओओओओहहहहहहहहह...........मेरे प्यारे बाबू......धीरे बोलो, बिरजू को अपनी बाहों में भर लिया।

आज पहली बार बिरजू अपनी सगी बेटी के ऊपर चढ़ा था वो भी शादीशुदा, नीलम को भी मानो होश नही था, शर्मो हया और वासना का मीठा मीठा मिश्रण पूरे बदन के रोएं खड़े कर दे रहा था, कैसा लग रहा था आज, एक शर्म, मर्यादा, लाज की एक आखिरी लकीर भी अब टूट चुकी थी, ये वही बाबू हैं जिनसे वो पैदा हुई है, जिस लंड से वो पैदा हुई है आज उसी बलशाली लंड को अपनी जिस्म की गहराई में अंदर तक महसूस करने के लिए तड़प गयी है, कैसी है यह वासना अपने ही सगे बाबू की हो चुकी है वो।

दोनों हल्का हल्का सिसकारी लेते हुए आंखें बंद किए एक दूसरे के बदन को महसूस कर अनंत आनंद में खोए रहे, बिरजू का लोहे समान दहाड़ता लंड नीलम की दोनों जाँघों के बीच घाघरे में छिपी बूर के ऊपर ठोकर मारने लगा तो नीलम अपने बाबू का मोटा लन्ड कपड़े के ऊपर से ही अपनी बूर पर महसूस कर व्याकुल हो गयी, मस्ती में आंखें बंद कर अपने होंठों को दांतों से दबा लेती।

आज अपनी ही सगी बेटी के ऊपर चढ़कर बिरजू सातवें आसमान में उड़ रहा था, कैसा होता है सगी बेटी का बदन ये आज उसे अच्छे से महसूस हो रहा था, अपनी ही सगी बेटी के साथ वासना का खेल खेलने में जो परम सुख मिलता है वो कहीं नही ये बात आज बिरजू को मतवाला कर दे रही थी, कितना मखमली बदन था नीलम का, कितना गुदाज, उसकी मोटी मोटी चूचीयाँ बिरजू के चौड़े सीने से दबी हुई थी।

नीलम और बिरजू ने एक बार सर घुमाकर बाहर थोड़ी दूर द्वार पर सो रही नीलम की माँ को देखा और फिर मदहोश आंखों से एक दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे, अंधेरा था इसलिए ज्यादा कुछ दिखाई नही दे रहा था, बिरजू ने धीरे से अपने होंठ आज पहली बार अपनी बेटी के होंठों पर रख दिये, नीलम ने तड़पकर अपने बाबू के होंठों का स्वागत करते हुए अपने होंठों में भर लिए और दोनों ही बाप बेटी एक दूसरे के होंठों को बेताहाशा चूमने लगे, बिरजू आज पहली बार अपनी सगी बेटी के होंठों को चूमकर बदहवास हो गया, क्या नरम नरम होंठ थे, बचपन से लेकर आज तक वो इन नरम नरम होंठों को देखता चला आ रहा था, जब नीलम बोलती थी तो कैसे उसके होंठ हिलते थे, जब हँसती थी तो कैसे उसके नरम नरम होंठ खुलकर फैलते थे। जिन होंठों को वो बचपन से देखता चला आ रहा है वो होंठ आज उसके होंठों में थे, दोनों के होंठ एक दूसरे को खा जाने वाली स्थिति में चूम और चाट रहे थे।

हल्की हल्की सिसकारियां और होंठ चूसने की चप चप आवाज़ें होने लगी तो नीलम धीरे से किसी तरह रुककर सिसकते हुए बोली- बाबू आवाज नही, बहुत धीरे धीरे।

बिरजू ने हंसते हुए उसके गालों को ताबड़तोड़ चूम लिया तो वो शर्मा गयी, बिरजू ने कपड़े के ऊपर से ही लंड से एक धक्का बूर पर मारा तो नीलम आआआआआहहहहह....बाबू कहते हुए मचल गयी, फिर बोली- बस बाबू, अभी नही, नही तो मैं बेकाबू हो जाउंगी, मेरे राजा।

और अपने दोनों पैर उठाकर बिरजू की कमर पर लपेट लिए कपड़े के ऊपर से ही बिरजू का दहाड़ता लंड नीलम की दहकती बूर पर रगड़ खाने लगा, नीलम अपने बाबू का लंबा मोटा लंड महसूस कर वासना से भर चुकी थी, जिस लंड को उसने कुछ दिन पहले देखा था और उसको पाने के लिए मिन्नतें की थी आज वही लंड सच में उसकी बूर में घुसने के लिए दहाड़ रहा था।

नीलम ने अपने को संभालते हुए बोला- बाबू, हाँथ की उंगलियों से क्या इशारा कर रहे थे उस वक्त?

बिरजू- मेरा चिज्जी खाने का मन कर रहा है बहुत, वही कह रहा था।

नीलम- ओओहह, बाबू, कल खा लेना चिज्जी, अच्छे से, अभी कैसे खिलाऊँ आपको चिज्जी, अम्मा है न।

बिरजू- तो फिर मुझे दिखा ही दो।

नीलम- चिज्जी को देखोगे भी कैसे बाबू, अंधेरा है न, कल दिन में दिखाउंगी अच्छे से, मान जाओ बाबू, मेरे प्यारे बाबू।

बिरजू ने फिर कहा- अच्छा तो फिर मुझे मेरे जामुन खिला दो, तुमने बोला था न कि आज जामुन खिलाऊंगी।

नीलम ने एक बार अपनी माँ की तरफ देखा फिर बोला- अच्छा ठीक है बाबू लो, धीरे धीरे खाना, आवाज मत करना।

और ऐसा कह कर नीलम अपनी चोली के बटन खोलने लगी और एक ही पल में सारे बटन खोल कर चोली के दोनों पल्लों को हटा कर इधर उधर कर दिया, ब्रा में उसकी कसी हुई बड़ी बड़ी दोनों चूचीयाँ दिखने लगी, बिरजू की अपनी सगी बेटी की इतनी बड़ी बड़ी चूचीयाँ ब्रा के ऊपर से ही देखकर आँखे फटी की फटी रह गयी।

नीलम ने हाथ पीछे लेजाकर ब्रा का हुक खोलकर ब्रा को ऊपर गर्दन की तरफ उठा कर अपनी कयामत ला देने वाली दोनों चूचीयों को अपने सगे बाबू के आगे निवस्त्र कर दिया, स्पॉन्ज की तरह दोनों गुदाज बड़ी बड़ी चूचीयाँ उछलकर बाहर आ गयी, अंधेरे में बस हल्का हल्का ही दिख रहा था फिर भी बिरजू आंखें फाड़े नीलम की दोनों चूचीयों को बदहवास सा देखता रह गया, वासना और जोश की वजह से दोनों चूचीयाँ किसी गोल गुब्बारे की तरह फूलकर सख्त हो गयी थी और उनकी गोलाइयाँ देखते ही बनती थी, आज पहली बार सगी बेटी की नंगी चूचीयाँ आंखों के सामने थी, दोनों की सांसें वासना में तेज तेज चल रही थी, तेज सांसें चलने से नीलम की दोनों उन्नत चूचीयाँ ऊपर नीचे हो रही थी, बिरजू ने धीरे से अपना बायां हाँथ उठाकर दायीं गोल चूची पर रखा तो नीलम थरथरा गयी आआआआआहहहहह....बाबू, आज पहली बार उसके बाबू ने उसकी नंगी चूची को अपने हांथों से छुआ था, क्या नरम नरम फूली हुई गोल गोल चूची थी नीलम की और उफ्फ उसपर वो जामुन के आकार का फूला हुआ सख्त निप्पल। नशे में बिरजू की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने दायीं चूची को हाथों में लिया और भर भर के दबाना शुरू कर दिया, नीलम हल्के हल्के सिसकने लगी फिर धीरे से कराहते हुए बोली- बाबू जल्दी से अपना जामुन थोड़ा सा खा लो, फिर कल अच्छे से खाना।

बिरजू ने ये सुनते ही दायीं चूची का जामुन जैसा मोटा सख्त निप्पल अपने मुँह में भर लिया और नीलम मस्ती में लहरा गयी, मुँह से उसके तेज से सिसकी निकली, बिरजू तेज तेज वासना में चूर होकर निप्पल पीने लगा और चूची को भी दबाने लगा, नीलम मस्ती में अपने दोनों पैरों को आपस में रगड़ने लगी जो उसने मोड़कर अपने बाबू की कमर से बांध रखे थे, मस्ती में भरकर उसकी आंखें बंद हो गयी और अपने हांथों से अपने बाबू के बालों को बडे प्यार से सहलाते हुए हल्के हल्के आआआहहह..........आआआ आआआहहहहह करने लगी।

बिरजू लपलपा कर अपनी सगी बेटी की चूची पिये जा रहा था, निप्पल चाटे और चूसे जा रहा था, कभी कभी दांतों से काट भी लेता तो नीलम दबी आवाज में कराहते हुए अपने नाखून पीठ को सहलाते हुए उसमे गड़ा देती, कैसे नीलम अपने सगे बाबू को अपनी चूची खोलकर पिला रही थी कितना मादक दृश्य था।

नीलम ने सिसकते हुए अपने दोनों हांथों से दोनों चूचीयों को पकड़ा और दोनों निप्पल को बिल्कुल पास पास कर दिया बिरजू ने दोनों निप्पल को एक साथ मुँह में भर लिया और नीलम कराह उठी, अपनी चूची को वैसे ही पकड़े रही और बिरजू एक साथ दोनों निप्पल मुँह में भरकर पीता रहा, नीलम दबी आवाज में सिसकती रही, एकाएक उसको लगा कि अम्मा करवट ले रही हैं तो उसने धीरे से बिरजू से कहा- बाबू बस, लगता है अम्मा उठेंगी।

और नीलम ने झट ब्रा को नीचे खींचकर दोनों चूची को ढक लिया और चोली के बटन लगाने लगी, दोनों बाप बेटी चुप करके एक दूसरे को बाहों में भरे नीलम की माँ की तरफ कुछ देर देखते रहे और जब ये आस्वस्त हो गए कि वो सो रही है तो बिरजू बोला- जामुन तो बहुत प्यारे और बहुत ही मीठे हैं मेरी बेटी के।

नीलम ने शर्माते हुए बिरजू की पीठ पर चिकोटी काट ली और बोली- बाबू सुन लेगी अम्मा जरूर, मीठे मीठे जामुन चुपचाप खा लेते हैं ज्यादा बोलते नही हैं पगलू।

बिरजू- नही सुनेगी मेरी रानी, वो सो रही है। अच्छा सुन

नीलम- हम्म, बोलो न बाबू

बिरजू- मुझे मेरी चिज्जी देखना है।

नीलम सिसकते हुए- कैसे देखोगे बाबू बहुत अंधेरा है, बत्ती जला नही सकते।

बिरजू- छू कर देखूंगा बस, जल्दी से

नीलम- ठीक है मेरे बदमाश बाबू, तुम मानोगे नही, तो छू लो थोड़ा सा।

और फिर बिरजू मुस्कुराते हुए नीलम के बगल में लेट गया और उसके तड़पते होंठों पर अपने होंठ रख दिये, नशे में फिर नीलम की आंखें बंद हो गयी, बिरजू ने लेटे लेटे अपने सीधे हाँथ से अपनी सगी बेटी के घाघरे को नीचे से उठाया और पैरों व मोटी मोटी जाँघों को सिसकते हुए सहलाने लगा, नीलम तड़प उठी, बिरजू आज पहली बार अपनी बेटी की मांसल जाँघों को छू और सहला रहा था, अपने बाबू के हाँथ अपनी जाँघों पर रेंगते हुए महसूस कर नीलम तड़प कर कराह उठी, कितनी मोटी मोटी मादक जांघे थी नीलम की, जाँघों को छूते और काफी देर सहलाने के बाद बिरजू ने पैंटी के ऊपर से ही अपनी बेटी नीलम की मखमली फूली हुई रसभरी महकती बूर को हथेली में भरकर दबोच लिया और नीलम कराह उठी, बड़ी मुश्किल से उसने अपनी आवाज को दबाया और
भारी सांसों से उसने बोला- बाबू जल्दी करो, छुओ न चिज्जी को,
इतना सुनते ही बिरजू ने नीलम की पैंटी की इलास्टिक को उठाते हुए हाँथ अंदर डाल दिया और अपनी शादीशुदा सगी बेटी की रस बहाती बूर पर हाँथ रख दिया, नीलम गनगना कर अपने बाबू से लिपट गयी और उनके सीने में शर्म से मुँह छिपा लिया, बिरजू धीरे से कान में बोला- यही है न चिज्जी?

नीलम शर्म के मारे कुछ नही बोली

तो फिर बिरजू ने दुबारा पूछा- बोल न, यही है न वो चिज्जी जिसको खाते हैं

इस बार नीलम ने बहुत शर्माते हुए धीरे से कान के पास मुँह ले जाकर बोला- हां मेरे बाबू यही है वो चिज्जी जिसको खाते हैं।

इतना सुनते ही बिरजू वासना में सिसक उठा और अपनी बेटी की बूर को हाँथ से सहलाने लगा, नीलम की बूर बिल्कुल पनिया गयी थी, वो अपने बाबू के सीने में मुँह छुपाये धीरे धीरे होंठों को भीचते हुए हाय हाय करने लगी, कितनी मोटी मोटी मखमली फांकें थी नीलम की बूर की, भगनासा कितना फूला हुआ और मुलायम सा था, हल्के हल्के बालों में छिपी अपनी बेटी की दहकती बूर को बिरजू मसलने लगा, नीलम से रहा नही जा रहा था तो उसने बिरजू का हाँथ पकड़ लिया और फुसफुसाके बोली- बाबू बस, अब बस करो, रहा नही जाता, अम्मा जग सकती है कभी भी, कल खूब प्यार कर लेना जी भरके, बस भी करो मेरे बाबू, मुझसे रहा नही जा रहा, बाकी की सारी चिज्जी कल खा लेना अच्छे से।

बिरजू ने तड़पते हुए अपनी बेटी को चूम लिया और बोला- ठीक है तू सो जा अब मैं अपनी खाट पर जाता हूँ, पर एक बार तो बता दे

नीलम - क्या बाबू?

बिरजू- इस चिज्जी को और क्या बोलते हैं।

नीलम पहले तो शर्मा गयी फिर कुछ देर बाद धीरे से कान में बोली - इसको...बूबूबूबूरररररर....बोलते हैं

और कहकर फिर शर्म से लाल हो गयी।

बिरजू- हाहाहाहाहाहायययययय.......….…..ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़ मेरी जान, और क्या बोलते हैं?

नीलम- अच्छा जाओ सो जाओ बाबू, मुझे शर्म आती है, अब मुझे नही पता।

बिरजू- बता न, बस एक बार और फिर चला जाऊंगा, जल्दी से बोल दे। बोल न

नीलम फिर शर्माते हुए कान में धीरे से- इसको चूचूचूचूचूतततत.....भी बोलते है, अब खुश।

बिरजू- हाय मेरी जान।

और नीलम फिर शर्मा जाती है, बिरजू नीलम को कस के होंठों पर एक चुम्बन लेता है और अपनी खाट पर जाकर लेट जाता है, कुछ देर तक तो नीलम और बिरजू तड़पते हुए एक दूसरे को अंधेरे में देखते रहते हैं फिर धीरे धीरे सो जाते हैं।
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Karnal Rathore

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Update- 48

अगली सुबह वही अमावस्या की रात का दिन था, नीलम ने आज सुबह नहा कर गुलाबी रंग का सूट पहन लिया था, इसी दिन दोपहर में रजनी काकी के साथ बिरजू को देखने आयी थी और उधर घर पे उदयराज रजनी द्वारा छुपाया हुआ कागज ढूंढ रहा था, ये वही दिन था 7वां दिन, उधर आज की रात रजनी और उदयराज का रसीला मिलन कुल वृक्ष के नीचे हुआ और उसी रात इधर नीलम और बिरजू की भी रसीली चुदाई हुई थी, उधर रजनी और उदयराज महापाप का रसीला आनंद ले रहे थे और इधर नीलम और बिरजू भी महापाप के लज़्ज़त का भोग लगा रहे थे, ये वही दिन था, इसी रात इस गांव में महापाप की सिसकारियां दो जगह गूंजी थी।

नीलम की माँ करीब 12:30 तक नीलम के नाना के घर जाने वाली थी तभी रजनी और काकी आ गयी थी फिर वह उनसे काफी देर बातें करती रही और करीब 2 बजे अपने मायके जाने के लिए निकली थी, काकी ने नीलम की माँ से पूछा भी था कि क्या बात हो गयी अचानक कैसे तू अपने मायके जा रही है तो नीलम की माँ ने काकी को धीरे से सारी बातें बता दी थी, काकी ने भी अपनी सहमति जताई कि ठीक है करके देख ले, नीलम की कोख कब से सूनी है, क्या पता ईश्वर सुन लें।

नीलम की माँ 2 बजे तक थैले में जामुन लेके जा चुकी थी, बिरजू का हाँथ काफी हद तक ठीक हो गया था, काकी, नीलम, बिरजू और रजनी काफी देर बातें करते रहे, नीलम ने एक बार सोचा कि वो रजनी से अपनी मन की बात कहे पर न जाने क्यों कुछ सोच कर वो चुप ही रह गयी थी, उसने सोचा था कि बाद में कभी उससे पूछेगी, अभी तो उसे इतनी बेचैनी थी कि जैसे तैसे वो समय काट रही थी।

नीलम ने रजनी और काकी को खाना खिलाया और जामुन भी दिए खाने को, रजनी का मन तो लग नही रहा था इसलिए वो जल्दी आ गयी थी, काकी काफी देर तक बैठी थी नीलम से बातें करती रही, मन तो अब नीलम का भी नही लग रहा था वो और बिरजू सोच रहे थे कि काकी जल्दी जाए पर बोल भी नही सकते थे, खैर जैसे तैसे काकी भी चली गयी।

शाम हो चुकी थी अंधेरा हो गया था, नीलम ने घर के अंदर और बाहर लालटेन जला दी और जैसे ही बरामदे में खाट पर बैठे अपने बाबू के पास से उन्हें मुस्कुराते हुए देखकर घर में जाने के लिए उनके आगे से गुजरी कि बिरजू ने लपककर नीलम का हाँथ पकड़ लिया, नीलम ने मुड़कर मुस्कुराते हुए पलटकर देखा बिरजू ने नीलम को अपने ऊपर खींच लिया, नीलम आआआआहहहह करते हुए अपने बाबू के ऊपर गिरी और दोनों बाप बेटी खाट पर लेट गए।

बिरजू ने झट से नीलम के होंठों को अपने होंठों में भर लिया तो नीलम जोर से सिसक उठी, दोनों एक दूसरे के होंठों को चूसने लगे, होंठों के मिलन की असीम लज़्ज़त में दोनों खो गए, बिरजू का लंड खड़ा होने लगा, नीलम की चूचीयाँ सख्त होने लगी, काफी देर दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपटे, एक दूसरे के होंठों को तन्मयता से चूमने चाटने लगे, नीलम का बदन मजे में सुलगने लगा, तन बदन में तरंगे उठने लगी, वासना का उठान जोर पकड़ने लगा, बिरजू ने काफी देर अपनी बेटी के होंठ चूसने के बाद होंठ अलग किये, नीलम के हल्के हल्के वासना में हिलते होंठों को वो देखने लगा, नीलम ने आंखें बंद की हुई थी एकाएक उसने भी आंखें खोलकर अपने बाबू को थोड़ी दूर जल रही लालटेन की हल्की रोशनी में देखा, तो बिरजू बोला- कितनी खूबसूरत है तू

नीलम अपने बाबू की आंखों में देखते हुए- आपकी बेटी की खूबसूरती सिर्फ आपके लिए है, सिर्फ आपके लिए।

नीलम ने भारी आवाज में कहा- मैं आपके लिए बहुत तरसी हूँ बाबू बहुत।

बिरजू- तो तूने मुझे पहले कभी इशारा क्यों नही किया।

नीलम- कैसे करती बहुत डरती थी, लोक लाज की वजह से, फिर ये सोचती थी कि आप अम्मा के हो मेरे कैसे हो सकते हो?

बिरजू- ओह! मेरी बिटिया, तेरी अम्मा से भी पहले मैं तेरा हूँ सिर्फ तेरा। सिर्फ अपनी बेटी का हूँ मैं।

नीलम- अपनी सगी बेटी को इतना चाहते हैं आप।

बिरजू- बहुत, बहुत मेरी बेटी बहुत।

नीलम- ओओओओहहहहह....मेरे बाबू, क्यों हम अब तक इतने दूर दूर थे।

बिरजू- अब तो पास आ गए न, अब तो मैं अपनी बेटी के अंदर समा ही जाऊंगा, बहुत अंदर तक।

नीलम- अपनी सगी बेटी के अंदर, बहुत अंदर

बिरजू- हां, अब रहा नही जाता।

नीलम- तो समा जाना आज रात, अब तो कोई भी नही है, हम दोनों ही है घर पे अकेले, किसी का कोई डर भी नही, किसी को पता भी नही चलेगा, बाबू....सुनो न (नीलम ने अपने बाबू के कान में धीरे से कहा)

बिरजू- बोल न

नीलम- अपनी सगी बेटी के ऊपर चढ़ो न, बगल में क्यों लेटे हो, अब तो किसी का डर नही।

इतना सुनते ही बिरजू नीलम के गालों पर ताबड़तोड़ चूमता हुआ उसके ऊपर धीरे धीरे चढ़ने लगा और नीलम भी सिसकते हुए अपने बाबू के नीचे आने लगी, बिरजू पूरी तरह चढ़ गया नीलम के ऊपर, दोनों ही कराह उठे, नीलम ने अपने पैर बिरजू की कमर पर उठाकर लपेट दिये, बिरजू नीलम को गालों, होंठों, गर्दन, कान के पास ताबड़तोड़ चूमने लगा, नीलम जोर जोर से सिसकने लगी और बोली- आप चूमते हो तो कितना अच्छा लगता है बाबू, बहुत मजा आता है।

बिरजू- अच्छा, ऐसा क्यों (बिरजू ने जानबूझ के पूछा)

नीलम ने शर्माते हुए कहा- क्योंकि आप बाबू हो और.....

बिरजू- और क्या?

नीलम ने धीरे से कहा- और..... मैं आपकी बेटी, वो भी सगी बेटी, आप मेरे बाबू हैं इसलिए बहुत शर्म भी आती है और असीम आनंद भी।

बिरजू- सच

नीलम- हाँ, बाबू बहुत अच्छा लगता है, जब आप मुझे चूमते और सहलाते हो, अजीब सी गुदगुदी होती है, तन बदन में झुरझुरी हो जाती है।

बिरजी का लंड अपनी ही सगी बेटी के मुँह से ये सुनके लोहा हो गया और सीधा नीलम की बूर पर कपड़े के ऊपर से ही बूर में धसने लगा, बिरजू हल्के हल्के लंड से बूर को रगड़ने लगा, नीलम ने तड़प के आंखें बंद कर ली, बिरजू लगातार उसे हर जगह चूमे जा रहा था।

अभी सिर्फ शाम के 7:30 ही हुए थे और दोनों बाप बेटी गुथे हुए थे, इतना जरूर था कि अंधेरा हो गया था, लालटेन हल्की रोशनी में जल रही थी, कोई घर पर आ भी सकता था पर अब दोनों को होश कहाँ था, इतनी गनीमत थी कि वो दोनों बरामदे में थे।

बिरजू नीलम को बेताहाशा चूमे जा रहा था नीलम की सांसें उखड़ने लगी, मदहोश होकर सिसकने लगी वो, हाँ बाबू ऐसे ही........और चूमो मुझे.........जी भरके चूमो बाबू अपनी सगी बेटी को.........आआआआआआआहहह हहह......हाहाहाहाहाहाययययय........अब तो अम्मा भी नही है........खूब प्यार करो अपनी बिटिया को.....बाबू......ऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़........हाहाहाहाहाहाययययय......अम्मा कितना अच्छा लग रहा है।

बिरजू लगातार मदहोशी में नीलम को चूमता जा रहा था नीलम का पूरा चेहरा, गर्दन, कान के आस पास का हिस्सा बिरजू के प्यार भरे चुम्बन से गीला हो चुका था जिसने नीलम की दहकती बूर में झनझनाहट पैदा कर दी और वो रिसने लगी।

नीलम- बाबू, ओ मेरे बाबू

बिरजू- हाँ मेरी रानी

नीलम- लालटेन बुझा देती हूं।

बिरजू रुककर नीलम को प्यार से देखने लगा

नीलम- बुझा देती हूं न, क्या पता कोई आ ही जाए इस वक्त, अभी ज्यादा रात नही हुई है न, थोड़ी देर अंधेरे में प्यार करके फिर जला दूंगी।

बिरजू - हाँ, जा बुझा दे।

नीलम जैसे ही उठने को हुई वहां शेरु और बीना न जाने कहाँ से द्वार पे भटकते भटकते आ गए, नीलम गर्भवती बीना को देखकर मुस्कुरा दी।

नीलम और बिरजू बरामदे में थे वहां से बाहर द्वार पर सब दिख रहा था। नीलम और बिरजू ने शेरु और बीना को देखा, तो बिरजू बोला- अरे इस वक्त ये दोनों कहाँ से आ गए, शायद भूखे हैं कुछ खाने को दे दे इनको।

नीलम- बाबू, जरा बीना को ध्यान से देखो।

बिरजू- क्या हुआ उसको? ये बाप बेटी भी हमेशा साथ साथ ही रहते हैं।

नीलम- अरे उसको देखो, देखो तो सही, आपको कुछ फर्क नही लग रहा।

बिरजू और नीलम ने एक दूसरे को अभी भी बाहों में भर रखा था, और बिरजू नीलम पर चढ़ा हुआ था, क्योंकि जैसे ही नीलम उठने को हुई थी वैसे ही शेरु और बीना आ गए थे तो वो दोनों फिर लेट गए।

बिरजू ने बीना को ध्यान से देखा फिर बोला- इसको क्या हुआ कुछ तो नही।

नीलम- अरे बहुत ध्यान से देखो उसका पेट फूला हुआ है (नीलम ने फिर बिरजू के कान में कहा) बाबू वो न गर्भवती है।

बिरजू- क्या......सच

नीलम- हाँ, और पता है उसको गर्भवती किसने किया है।

बिरजू- किसने

नीलम ने वासना में आंखें बंद कर भारी आवाज में अपने बाबू के कान में कहा- खुद उसके पिता ने, शेरु ने

बिरजू अवाक सा नीलम की आंखों में देखने लगा- सच

नीलम ने शर्मा कर हाँ में सर हिलाते हुए अपना चेहरा हाथ से छुपा लिया, तो बिरजू ने उसके हाँथ को हटा कर नीलम को शर्माते हुए देखा तो वो और शर्मा गयी, बिरजू बोला- तुझे कैसे पता?

नीलम ने धीरे से कहा- मैन शेरु को कई बार बीना को "वो" करते हुए देखा था।

बिरजू ने अपने लंड से एक झटका अपनी बेटी की बूर पर कपड़ों के ऊपर से मारा और बोला- वो क्या मेरी रानी।

नीलम जोर से सिसक उठी पर शर्मा कर चुप रही।

बिरजू ने फिर पूछा - बोल न

नीलम वासना में कंपते हुए- "बीना को चोदते हुए।"

और इतना कहकर नीलम अपने बाबू से सिसकारी लेते हुए चिपक गयी।

बिरजू ये जानकर थोड़ा हैरान हुआ फिर उसने अपनी बेटी नीलम के चेहरे को बड़े प्यार से देखा, नीलम की आंखें बंद थी बिरजू बोला- आंखें खोल न

नीलम ने आंखें खोल दी, उसकी आँखों में शर्मो हया साफ दिख रही थी

बिरजू- तूने इन दोनों की चुदाई देखी है

नीलम ने हम्म में सिर हिलाकर कहा फिर बोली- कई बार देखी है।

बिरजू नीलम को और नीलम बिरजू की आंखों में देखते रहे, फिर बिरजू बोला- अगर मेरी बेटी पैदा होगी तो वो बिल्कुल मेरी बेटी जैसी खूबसूरत होगी न।

नीलम ये सुनकर अपने बाबू का अर्थ समझते ही गनगना गयी और सिरहकर ओह बाबू कहते हुए अपने बाबू से फिर कसके लिपट गयी, उसकी सांसे तेज चलने लगी, काफी देर सांसों को काबू करने के बाद नीलम धीरे से बोली- और बाबू बेटा होगा तो बिल्कुल आपके जैसा बलशाली होगा न।

ये बोलकर नीलम सर उठा के अपने बाबू की आंखों में देखने लगी फिर बोली- आप मुझे बच्चा दोगे बाबू?

बिरजू बड़े प्यार से नीलम के बालों को सहलाता हुआ- क्यों नही मेरी बेटी, मेरी जान, क्यों नही, तेरी सूनी कोख अब सूनी नही रहेगी, किसी को पता भी नही चलेगा।

बिरजू ने आगे कहा- बछिया को बैल को तो दिखाना पड़ेगा न तभी तो उसको बच्चा होगा और फिर वो दूध देगी, और फिर मेरी सेहत बनेगी।

नीलम- ओह! मेरे बाबू, आप अपनी इस बछिया की कोख में बीज बो दीजिए, ताकि वो आपके बच्चे को जन्म दे और ढेर सारा दूध आपको पिलाये, मेरे बाबू अपनी इस बछिया के अरमान पूरे कर दीजिए। ये बछिया सिर्फ आपकी है।

बिरजू- जरूर मेरी बच्ची,

नीलम ने फिर बड़ी कामुकता से बिरजू के कान में कहा- बेटी से बेटी पैदा करोगे, बाबू?

बिरजू ने नीलम के कान में कहा- बेटी को चोदकर बेटी पैदा करूँगा।

नीलम सिसक उठी

बिरजू बोला- बोल न, एक बार धीरे से

नीलम ने बिरजू के कान में बोला- बेटी को चोद कर बेटी पैदा करना बाबू सच बहुत मजा आएगा, सगी बेटी को चोदकर।

बिरजू और नीलम कराह उठे ये बोलकर

बिरजू- मजा आयेगा न

नीलम सिरहते हुए- बहुत बाबू, बहुत, जैसे शेरु ने किया, बीना को बहुत मजा आया था।

बिरजू- चिंता न कर मेरी बिटिया तुझे भी पूरा मजा आएगा।

नीलम और बिरजू दोनों कस के लिपट गए और बिरजू ने लंड से एक सूखा घस्सा बूर पर मारा तो नीलम चिहुँक कर सिसक गयी और बोली- लालटेन बुझा देती हूं बाबू।

बिरजू- हाँ बुझा दे और इनको भी खाना दे दे।

नीलम- या तो बाबू पहले खाना बना लेती हूं, खाना भी तो बनाना है न।

बिरजू- हाँ ये भी तो करना ही है, तू खाना बना ले मैं जानवरों को चारा डाल देता हूँ। लेकिन तूने आज साड़ी क्यों नही पहनी?, कल वादा किया था न!

नीलम बिरजू की आंखों में देखते हुए- अब पहनूँगी न मेरे बाबू, दिन में अम्मा थी तो कैसे पहनती, अभी नहा के साड़ी पहनूँगी आपकी पसंद की और वो भी?

बिरजू- वो भी क्या?

नीलम- अरे भूल गए, कच्छी बाबू कच्छी, काले रंग की।

नीलम ये बोलकर मुस्कुरा उठी, बिरजू ने उसे चूम लिया।

बिरजू और नीलम उठे, बरामदे से बाहर आये तो देखा कि शेरु बीना की बूर सूंघ रहा था, नीलम और बिरजू उनको देखने लगे, बीना चुपचाप खड़ी होकर अपनी बूर शेरु को सुंघाने लगी, बिरजू ने ये देखकर नीलम को बाहों में भर लिया नीलम अपने बाबू की बाहों में आ गयी और दोनों बीना और शेरु को देखने लगे, बिरजू- कितना मजा आ रहा होगा शेरु को बूर सूंघने में।

नीलम ये सुनते ही शर्मा कर धत्त बोलते हुए घर में भाग गई और थोड़ी देर बाद कुछ खाना लेकर आई और दोनों को दिया, शेरु और बीना खाना खाने लगे, नीलम अपने बाबू को मुस्कुराकर देखते हुए इशारे से बोली- मैं नहाने जा रही हूँ और घर में चली गयी, बिरजू समझ गया इशारा, पहले तो वो जानवरों को चारा डाल के आया फिर घर में गया और गुसलखाने की तरफ बढ़ा, एक छोटा लालटेन आंगन में जल रहा था, गुसलखाने के दरवाजे पर पर्दा लगा था, अंदर पानी गिरने की आवाज आ रही थी, जिससे पता लग रहा था कि नीलम नहा रही है बिरजू ने गुसलखाने के दरवाजे पर जाके एक हाथ से पर्दा सरकाया तो देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी, नीलम ने अपना सूट उतार दिया था और ऊपर सिर्फ ब्रा पहन रखी थी, नीचे सलवार पहन रखी थी, पूरा बदन भीगा हुआ था, अभी नहाना उसने शुरू ही किया था, अपने बाबू को देखकर वो खड़ी हो गई।

बिरजू ने आगे बढ़कर उसे पीछे से बाहों में भर लिया।

बिरजू- कितनी खूबसूरत है तू बेटी, रहा नही जाता बिल्कुल अब

नीलम- आआआआआहहहहह........बाबू, रहा तो मुझसे भी नही जा रहा।

बिरजू- मुझे शेरु बनना है

नीलम अपने बाबू का इरादा समझ गयी और वासना में चूर होकर बोली- हाय, तो फिर मैं बीना बन जाती हूँ बाबू और इतना कहकर नीलम अपने दोनों हाँथ सिसकते हुए दीवार पर लगा कर पैरों को हल्का खोलते हुए भीगी सलवार में चौड़ी सी गांड को बाहर को उभारकर सिसकते हुए खड़ी हो गयी और बोली- लो बाबू सूँघो अपनी बेटी को....आआआहह, जैसे कल सुबह सूंघ रहे थे।

बिरजू नीचे बैठकर अपनी बेटी की चौड़ी गुदाज गांड को पहले तो जोर जोर से दबाने और भीचने लगा फिर एकाएक उसने नीलम की मखमली गांड को फैलाया और दोनों पाटों के बीच में सलवार के ऊपर से ही चूम लिया, नीलम जोर से कराह उठी, बिरजू ने एकाएक अपनी नाक गांड के छेद पर सलवार के ऊपर से ही लगा दी और मदहोश होकर मादक गंध को सूंघने लगा, दोनों हांथों से गांड को सहलाये जा रहा था, कुछ पल तक बिरजू अपनी सगी बेटी नीलम की गांड को कस कस के दबा दबा के सूंघता रहा कि तभी नीलम ने कराहते हुए सलवार का नाड़ा जल्दी से खोल दिया और गीली सलवार सरककर नीचे गिरने लगी, बिरजू ने अपना मुँह हटाकर सलवार को नीचे गिर जाने दिया और अब....अब तो नीलम सिर्फ पैंटी और ब्रा में खड़ी थी।

नीलम धीरे से सिसकते हुए बोली- बाबू सूँघो न, बहुत अच्छा लग रहा है।

बिरजू ने ये सुनते ही कराहते हुए दोनों हांथों से नीलम की चौड़ी विशाल गांड को अच्छे से फाड़कर पैंटी को साइड किया और साइड करते ही अपनी सगी बेटी के गांड का गुलाबी छेद और बूर की निचली फांकें हल्की रोशनी में देखकर नशे में मदहोश हो गया, क्या गांड थी नीलम की ऊऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़फ़फ़, और वो गांड का गुलाबी छेद उसके हल्के से नीचे गीली बूर का हल्के काले बालों से भरा निचला हिस्सा, और उसमे से निकलती गरम गरम पेशाब और काम रस की मिली जुली भीनी भीनी मादक सी महक बिरजू को पागल कर गयी। नीलम ने सिसकारते हुए फिर आग्रह किया- बाबू जल्दी सुंघों न छेद को, खाओ न उसको।

बिरजू भूखे भेड़िये की तरह नीलम की गांड के गुलाबी से छेद पर टूट पड़ा, अपनी नाक छेद पर भिड़ाकर बड़ी तेज से कराहते हुए सूँघा, एक मादक सी महक बिरजू के अंदर तक समाती चली गयी, नीलम भी मस्ती में अपने बाबू की नाक और उससे निकलती गरम गरम सांसें अपनी गांड की छेद पर महसूस कर मचलते हुए कराह उठी और उसने अपना एक हाथ पीछे लेजाकर अपने बाबू का सर और भी अपनी गांड की छेद पर दबा दिया, आआआआआआहहहहहहह.........अम्मा........ ओओओओहहह........बाबू........सूंघों न और अच्छे से मेरी गांड को सूंघों बाबू..............जैसे शेरु सूंघता है अपनी बेटी की बूर और गांड को....वैसे ही सूँघो..........इसकी खुशबू लो..........ऊऊऊईईईईईईई....….कितना मजा आ रहा है...........कैसा लग रहा है न बाबू...........कभी सोचा नही था कि आप मुझे नंगा करके मेरी गांड के छेद को सूंघेंगे............आआआआहहह......दैय्या.......हे भगवान.......मेरे बाबू.......ये सब करने में भी कितना मजा है न............करो न बाबू जोर जोर से चाटो छेद को........आआआआहहहह।


बिरजू- आआआआहहहह मेरी बेटी क्या महक है तेरी चौड़ी गांड की.......ऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़...... मजा ही आ गया........कितनी चौड़ी गांड है तेरी..........कितनी नरम और बड़ी है तेरी गांड........कितनी मोटी है........ये छेद कितना प्यारा है गांड का.......हाय।

बिरजू नीलम की गांड के छेद पर जीभ गोल गोल घुमाने लगा, जीभ से चाटने लगा।

नीलम- उफ़्फ़फ़फ़ हाय मेरे बाबू चाटो ऐसे ही अपनी बेटी की गांड.........हाय

पूरी गांड थूक से सन गयी, बिरजू कभी जीभ से चाटता कभी सूंघता, कभी उंगली से छेद को धीरे धीरे सहलाता, कभी चूमने लगता।

नीलम- बाबू.........आह, अपनी बेटी की बूर कब चटोगे मेरे राजा, गांड के छेद से बस थोड़ा सा ही नीचे है वो, उसको भी चाट लो न बाबू।

दरअसल बिरजू नीलम की गांड फाड़े खाली उसकी गांड के छेद को सूंघ रहा था, चाट चूम और सहला रहा था, गांड के छेद की गंध ने उसे मतवाला कर रखा था और जब नीलम ने बूर चाटने का आग्रह किया तब उसका ध्यान नीचे गया और उसने आंखें खोलकर देखा तो नीलम ने अपनी गांड को और ऊपर को उठाकर अपनी बूर को परोस रखा था, नीलम दोनों पैर फैलाये आंखे बंद किये खड़ी थी, गांड उसने पीछे को और उभार रखी थी, अपने एक हाँथ से वो बिरजू के सर को सहला रही थी और उसका दूसरा हाँथ से दीवार पर टेक लगाए हुए थी, बिरजू ने दोनों हांथों से नीलम की चौड़ी गांड को अच्छे से फाड़ रखा था। पहले तो उसने एक हाँथ से पैंटी को साइड किया हुआ था फिर नीलम के बूर चाटने के आग्रह पर बिरजू ने पैंटी को पकड़ा और उसको नीचे जाँघों तक एक ही झटके में नीचे खींचकर अपनी सगी बेटी की गांड को पूरा नंगा कर दिया, मोटी मोटी कसी हुई मखमली गांड के दोनों पाट उछलकर नंगे हो गए, कितना कसाव था गांड में, नीलम आह करके मचल उठी।

बिरजू ने अपनी बिटिया की मदमस्त गांड को दोनों हांथों से कस के फैला दिया, बूर की दोनों फांक हल्की सी खुल गयी, बिरजू ने अपनी प्यासी जीभ अपनी बेटी की प्यासी बूर के दोनों फाँकों के बीच घुसेड़ दी।

नीलम जोर से ऊऊऊऊउफ़्फ़फ़फ़........बाबू करते हुए उछल पड़ी, बिरजू लप्प लप्प बूर को पीछे से चाटने लगा, नीलम अपनी गांड को और अच्छे से ऊपर को उठाकर हाय हाय करते हुए अपनी बूर को अपने बाबू की जीभ पर रगड़ने लगी।
नीलम- आआआहहहह........ऊऊऊईईईईईईई......अम्मा.........हाय बाबू लगता है आज आप मुझे नहाने नही दोगे.............सब कुछ यहीं कर लोगे क्या...........हाय बाबू............कितना अच्छा बूर चाटते हो आप...........मजा आ गया......ऐसे ही चाटो..........उफ़्फ़फ़फ़.........बूर चटवाने में कितना मजा आता है..........हाय...... चूत चटवाने में.............कितनी मस्त है आपकी जीभ...........सच में बहुत अच्छा लग रहा है..........ओह मेरे बाबू....

बिरजू लपलपा कर नीलम की पूरी बूर पर पीछे से जीभ लगा लगा के चाटने लगा, बूर से निकल रहे रस और पेशाब की मिली जुली गंध ने उसे पागल कर दिया था, अपनी ही सगी बेटी के पेशाब के गंध को सूंघ सूंघ कर वो बदहवास होता जा रहा था, पूरे गुसलखाने में चप्प चप्प की बूर चटाई की आवाज दोनों की सिसकियों के साथ गूंजने लगी, नीलम के पैर खड़े खड़े थरथराने लगे, वासना में वो हाय हाय करते हुए कांपने लगी।

बिरजू बड़ी ही तन्मयता से एक हाँथ से नीलम की गांड फैलाये और दूसरे हाँथ से अपनी ही सगी बेटी की मखमली बूर को फैला फैला कर सपड़ सपड़ जीभ से चाटे जा रहा था, नीलम बहुत गर्म हो चुकी थी ऐसी मस्त बूर चटाई वो भी पीछे से आज तक कभी नही हुई थी, वो भी सगे पिता की जीभ से, जब उससे बर्दाश्त नही हुआ तो उसने कराहते हुए बोला- बाबू अभी बस करो.......मुझे नहा लेने दो न..........फिर अपनी बेटी को अच्छे से सारी रात चोदकर एक बेटी पैदा करना, इसी बूर से निकलेगी वो, थोड़ा सब्र करो बाबू, मेरी बात मान लो न बाबू.....आआआआआहहहहह।

बिरजू बड़ी मुश्किल से रुका और नीलम के कान में बोला- आआआआआआहहहहहहहह.......बिटिया, तेरी बूर, कितनी खूबसूरत है, ये कितनी मादक है......कितनी दहक रही है..आआआआहहह.....मेरी बेटी.......इसको चोदकर चोदकर तुझे बच्चा दूंगा मेरी बेटी।

नीलम- हाय, हाँ बाबू मुझे आपसे ही बच्चा चाहिए, सिर्फ आपसे.........ओफ़फ़फ़.......मेरे बलमा सिर्फ आप ही हैं मेरे बाबू।

बिरजू ने धीरे से नीलम के कान में कहा- बूर

नीलम गनगना कर बिरजू से सीधी होकर लिपट गयी, पैंटी तो नीलम की नीचे जांघ तक सरकी ही हुई थी आगे से उसकी बूर बिल्कुल नंगी थी। बिरजू ने एक हाँथ में नीलम की पनियायी हुई बूर को भर लिया और फाँकों की दरार में उंगली चलाने लगा और दुबारा उसके कान में धीरे से बोला- बूर

नीलम जोर से सिरह गयी।

बिरजू ने फिर कान में बोला- बूर

नीलम ये सुनकर फिर गनगना गयी, बिरजू बूर को बराबर सहला रहा था।

नीलम समझ गयी की उसके बाबू उसके कान में बार बार बूर क्यों बोल रहे हैं, उसने बड़ी मादक आवाज में अपने बाबू के कान में सिसकते हुए बोला- लंड

बिरजू- बूर

नीलम- हाय बाबू....लंड

बिरजू- मेरी बेटी की बूर

नीलम- मेरे बाबू का लंड

नीलम और बिरजू दोनों बोल बोल कर और सुन सुनकर गनगना जा रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को कस के बाहों में भरा हुआ था।

बिरजू- मेरी सगी बेटी को बूर

नीलम सिसकते हुए- हाय! मेरे सगे बाबू का लंड

इतने में बिरजू ने अपनी बेटी का हाँथ पकड़कर धोती में फौलाद हो चुके अपने 8 इंच लंबे, 3 इंच मोटे लन्ड पर रख दिया, नीलम के पूरे बदन में अपने बाबू का लन्ड छूते ही सनसनी दौड़ गयी, वह जोर से कराही, बिरजू नीलम की बूर को हल्का हल्का सहला ही रह था और अब नीलम भी अपने बाबू के विशाल लंड को धोती के ऊपर से ही पकड़ पकड़ कर सिसकते हुए मुआयना करने लगी, पूरे तने हुए लंड पर वो मचलते हुए अपना हाँथ फेरने लगी, कभी कभी नीचे मोटे मोटे दोनों आंड को भी मस्ती में भरकर सहलाने लगती। बिरजू की मस्ती में आंखें बंद हो गयी, सगी बेटी के नरम नरम हाथ अपने लन्ड पर महसूस कर बिरजू अनियंत्रित सा होने लगा। नीलम अपने सगे बाबू का लन्ड सहलाकर मस्त हो गयी।

दोनों बाप बेटी अब एक दूसरे का लंड और बूर सहला रहे थे।

बिरजू ने कराहते हुए कहा- मेरी बेटी की बूर में मेरा लंड।

नीलम ने सिरहते हुए कान में कहा- अपनी सगी बेटी नीलम की बूर में आपका मोटा सा मूसल जैसा लंड।

नीलम ने फिर धीरे से बिरजू के कान में सिसकते हुए कहा- बाबू...सगी बेटी को चोदने में बहुत मजा आएगा न, अम्मा से भी ज्यादा।

बिरजू- हाय.....हाँ मेरी प्यारी बिटिया, सगी बेटी को चोदने का मजा ही कुछ और है, बहुत रसीला मजा आएगा।

नीलम- आह....बाबू बस करो मैं नहा कर खाना बना लूं, फिर प्यार करेंगे सारी रात।

बिरजू- हाँ, ठीक है

और ऐसा कहते हुए उसने बूर पर से हाथ हटा लिया, नीलम के होंठों पर एक जोरदार चुम्बन जड़ दिया और गुसलखाने से बाहर आ गया, नीलम ने अपनी पैंटी को निकाल कर ब्रा भी निकाल दिया और नहाया, बिरजू भी बाहर आकर लेट गया, नीलम ने नहा कर लाल साड़ी और ब्लॉउज पहना और अंदर काले रंग की ब्रा और पैंटी पहन ली, फिर वह जल्दी जल्दी खाना बनाने लगी, जल्दी ही उसने कुछ हल्का फुल्का बना लिया, बिरजू ने नीलम को आंगन में अपनी गोद में बैठाकर बड़े प्यार से अपने हांथों से खाना खिलाया, नीलम ने भी अपने बाबू की आंखों में देखते मुस्कुराते हुए खाना खाया और उन्हें भी अपने हाथों से खिलाया।

रात के 11:30 हो चुके थे, नीलम ने अपने बाबू से कहा- बाबू अब आप बरामदे में लेटो, थोड़ी देर में आना, 12 बजे तक, बिरजू अपनी बेटी को चूमकर जाकर बरामदे में खाट पर लेट गया। 12 बजने का इंतज़ार करने लगा, बाहर द्वार पर लालटेन बुझा दिया, जैसे ही बारह बजे वो घर में गया, नीलम को ढूंढने लगा, सारे कमरों का दरवाजा खुला था बस एक का पल्ला सटाया हुआ था और उसमे लालटेन जलने की रोशनी भी आ रही थी, बिरजू ने उस कमरे का दरवाजा खोला तो नीलम लाल साड़ी पहने दुल्हन की तरह सजी हुई पलंग पर बैठी थी, उसने घूंघट किया हुआ था, बिरजू पलंग के पास आकर बैठ गया और उसने नीलम का घूंघट धीरे से उठा दिया नीलम दुल्हन की तरह सजी हुई थी, उसकी आंखें बंद थी, बिरजू ने धीरे से उसके होंठों को चूमते हुए बोला- हाय..मेरी दुल्हन

नीलम सिसकते हुए- दुल्हन नही बाबू.......बेटी......सगी बेटी......सगी बेटी बोलो न......बेटी हूँ न आपकी

बिरजू- आह मेरी बेटी, मेरी सगी बेटी।

नीलम- हाय, मेरे बाबू, अब आया न मजा।

और दोनों बाप बेटी एक दूसरे की बाहों में समा गए, बिरजू ने नीलम को बाहों में उठा लिया और लालटेन बुझाते हुए उसको बाहों में उठाये उठाये बाहर आ गया और बरामदे में खाट पर लिटा दिया, अमावस्या की अंधेरी रात थी, गांव के सब लोग खर्राटे लेने लगे थे, बिरजू ने घर के सारे लालटेन बुझा दिए थे, बाहर का लालटेन भी बुझा दिया था, बाहर ठंडी ठंडी हवा चल रही थी जो बरामदे के अंदर तक आ रही थी, गुप्प अंधेरा था, बिरजू के घर के थोड़ी थोड़ी दूर पर कुछ और घर भी थे।
?
 

netsunil

मैं काग़ज़ बेरंग.. तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का
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MAST STORY.....
 

DeewanaHuaPagal

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Update- 61

नीलम ने दोनों को देखकर शर्माने का दिखावा करते हुए अपना पल्लू उठाकर अपने खजाने को ढका और बगल में रखी मचिया पर बैठ गयी, बिरजू और महेन्द्र नाश्ता करने लगे तो बिरजू ने नीलम के नाश्ते की प्लेट उसको थमाते हुए बोला- बेटी तू भी नाश्ता कर न, बस हमे ही खिलाएगी।

नीलम- बाबू आपलोग कर लीजिए नाश्ता मैं थोड़ी देर बाद कर लूँगी।

बिरजू- अरे अभी कर न हमारे साथ, थोड़ी देर बाद तो दोपहर के भोजन का वक्त हो जाएगा तब क्या नाश्ता लेके बैठेगी क्या?

सब हंसने लगे, नीलम ने भी फिर नाश्ता किया और वो थकी मांदी दोपहर का खाना बनाने की तैयारी करने के लिए घर में जाने लगी तो जाते वक्त उसने पलटकर बिरजू को बोला- बाबू जरा सुनिए

बिरजू- बेटा तुम आराम से खाट पर लेटो, आराम करो मैं आता हूँ।

महेन्द्र- ठीक है बाबू जी।

बिरजू नीलम के पीछे पीछे घर में गया और जैसे ही दोनों आंगन में पहुँचे बिरजू ने नीलम को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया, लंड तो उसका घर में प्रवेश करते वक्त ही खड़ा हो चुका था, लंड सीधा नीलम की मखमली 36 साइज की गाँड़ की दरार में साड़ी के ऊपर से जा के घुसा तो नीलम चिहुँक उठी- कितना खड़ा कर रखे हो बाबू, आपके दामाद है बाहर थोड़ा सब्र रखो, आ गए तो, अनर्थ हो जाएगा।

बिरजू- तूने पल्लू से क्यों ढक लिया था चूची को, कुछ देर तो देखने देती, मेरी रांड

नीलम- हाय...बाबू.... रांड बोलते हो तो मैं गनगना जाती हूँ, अब देखो दोनों ही लोग एक टक घूरे जा रहे थे, कुछ तो शर्म का दिखावा करना पड़ता है न, और वैसे भी रात भर दर्शन तो किया है इनका और दर्शन ही क्या जी भरकर चूसा और सहलाया, दबाया है इसको बाबू अभी मन नही भरा क्या बिटिया की चूची से........आआआआआआआहहहहहह......बाबू......धीरे धीरे.......दबाओ चूची......दर्द होता है।

(बिरजू अपने हांथों को आगे ले जाकर नीलम की दोनों चूची को ब्लॉउज के ऊपर से ही हथेली में भरकर दबाने लगता है, दोनों निप्पल को कस के मसक देता है)


बिरजू- इससे भी कोई मन भरता है क्या, क्या चूची है तेरी बिटिया, तेरे पसीने की खुश्बू ने तो मदहोश कर दिया मुझे।

नीलम- और सूँघोगे बाबू बेटी का पसीना।

बिरजू- सुंघा दे, जल्दी से

नीलम ने अपने दोनों हाँथ ऊपर करके पीछे बिरजू के गले से लपेट दिए और बिरजू मस्ती में चूर होकर अपनी बेटी की दोनों चूचीयों को मसलते हुए उसकी दोनों कांख में नाक लगा कर बारी बारी से दोनों कांख से आ रही पसीने की मदहोश कर देने वाली महक सूंघने लगा। नीलम अपनी आवाज को गले में ही दबा कर होने वाली हल्की हल्की मादक गुदगुदी से सराबोर होकर हल्का हल्का सिसकने लगी। जोश में आकर बिरजू साड़ी के ऊपर से ही नीलम की गाँड़ में जब जब गच्च से अपना लन्ड मारता तो नीलम भी गाँड़ उठा उठा के अपने बाबू के लन्ड का पूरा मजा लेती। साड़ी न होती तो न जाने कब का पूरा लन्ड नीलम की गाँड़ में समा गया होता।

नीलम- बाबू बस करो क्या पता वो घर में ही आ जाएं, अब बस, मैं जरा दोपहर का खाना बना लूं।

(नीलम ने बड़ी मुश्किल से बिरजू को रोका)

बिरजू- बेटी, अभी हम दामाद जी की बात कर ही रहे थे और वो आ भी गए।

नीलम- हाँ बाबू आ तो गए, पर आज उन्हें जाने मत देना, आज रात रोकना, फिर लेंगे हम दोनों असली मजा, एक अलग ही अनुभूति के साथ।

(ऐसा कहते हुए नीलम ने कातिल मुस्कान के साथ अपने बाबू के गाल को हाथों से सहला दिया तो बिरजू के चेहरे पर भी व्यभिचार से मिलने वाले आनंद की अनुभूति को महसूस कर मुस्कान फैल गयी)

नीलम ने बिरजू के कान में कहा- अपनी सगी शादीशुदा बेटी को एक ही बिस्तर पर अपने दामाद के सामने भोगकर पाप का अद्भुत मजा लोगे न बाबू।

बिरजू- आह.... क्यों नही मेरी रांड...जरूर.....तेरी इच्छा जरूर पूरी करूँगा, कितना मजा आएगा बगल में मेरा दामाद लेटा होगा और मैं अपनी ही सगी बेटी की बूर चोदूंगा.....हाय...बेटी के साथ....पाप का मजा

(ऐसा कहते हुए बिरजू ने एक हाँथ आगे ले जाकर साड़ी के ऊपर से ही नीलम की फूली हुई बूर को दबोच लिया, बूर पर अपने सगे बाबू का हाथ लगने से नीलम वासना से भर गई और
अपने बाबू के मुँह से '"बूर" और "पाप" शब्द सुनकर नीलम की भी सिसकी निकल गयी)

नीलम उखड़ती सांसों से बोली- पर बाबू ये होगा कैसे, कैसे ये इच्छा पूरी होगी? सोच तो लिया हमने पर....

(नीलम ने अपने एक हाँथ से अपने बाबू का वो हाँथ पकड़ा जो उसकी बूर को साड़ी के ऊपर से सहला रहा था और खुद भी अपने हाँथ से अपने बाबू के हाँथ को अपनी बूर पर दबाने लगी पर थोड़ा उदास सी हो गयी, बिरजू भी सोचने लगा, पर कुछ देर बाद)

बिरजू- एक रास्ता है।

नीलम - क्या?

बिरजू- मेरा एक मित्र है बहुत पुराना, उसका जड़ी बूटियों से बहुत लगाव है, अक्सर वो मुझे अपनी खोजी हुई जड़ी बूटियों के बारे में बताता रहता है, की ये जड़ी बूटी ये काम करती है, ये वाली इस चीज़ पर असर करती है, उस चीज़ को ठीक कर देती है वगैरह वगैरह, पर मैं ज्यादा ध्यान नही देता था, मैं सोच रहा हूँ उसके पास जाऊं, क्या पता कुछ उपाय हो उसके पास।

नीलम- पर बाबू आप उनसे कहेंगे क्या?, और वैसे भी रात भर बारिश हुई है, खेत खलिहान में पानी भरा है, वो आपका मित्र रहता कहाँ है?, घर कहाँ है उसका?

बिरजू- अरे वो मैं उससे अपने तरीके से बात कर लूंगा, वो दूसरे गांव में रहता है, उत्तर की तरफ जो गांव है न बंसीपुर उसी गांव में है उसका घर, ज्यादा दूर नही है, तीन चार घंटे में होके वापिस आ सकते हैं।

नीलम- तो जाइये न बाबू, कैसे भी करके।

बिरजू- हाँ बेटी जाता हूँ, मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा है कि हो न हो उसके पास कोई ऐसी जड़ी बूटी तो जरूर होगी जो इंसान को बेसुध या नशे में कर दे।

नीलम- बाबू.....पर मेरी इच्छा हो रही है कि वो होश में रहें और सब देखें, पर कुछ कर न सकें, अगर वो सोते रहेंगे तो क्या फायदा, और अगर नशे में भी रहेंगे तो भी क्या फायदा, काश ऐसा हो जाये की हम उन्हें दिखाकर पाप करें.....बाबू उस पाप का नशा ही कुछ और होगा, एक अद्बुत अहसास एक अलग आनंद।

बिरजू नीलम को चूमते हुए- तू चिंता न कर मेरी बेटी, कुछ न कुछ हल होगा जरूर उसके पास, दामाद जी को दिखाकर ही अपनी बिटिया को चोदूंगा।

नीलम के चेहरे पर वासना भारी मुस्कान फैल गयी- ठीक है आप जाइये, तब तक मैं दोपहर का खाना बनाती हूँ।

बिरजू- मैं वहां दोपहर में जाऊंगा ताकि शाम तक आ जाऊं, अभी मैं दामाद को लेकर खेत वगैरह दिखाने जाता हूँ, तू तबतक खाना बना लेना और हां थोड़ा आराम कर लेना, सो जाना....ठीक है....मेरी बच्ची

नीलम- मेरी बच्ची नही.....मेरी रांड बोलो....रांड...... आपकी रांड हूँ न

बिरजू- हाय.... मेरी रांड

नीलम- हाँ अब ठीक.........तो ठीक है आप जाइये बाबू मैं खाना बनाती हूँ।

बिरजू नीलम के होंठों को चूमकर अपना खड़ा लंड सही करता हुआ बाहर निकल जाता है और नीलम अपने पिता को ऐसा करता देखकर हंस पड़ती है और अपनी जाँघों को आपस में दबाकर रिसती हुई अपनी बूर को हल्का सा जाँघों से भींच देती है।
Uff ze baaate
yaar meri puri life me itni hot story aur khaskar ye wala hot update kabhi bhi nahi padha

Uff kya theme hai yaar
lajawab script eski toh film banni chahiye

Damaad se chup chup ke Baap-Beti ka romance ahhh
Ab ghar me full on paapi kand honge
Vyabhichar ki pariseema hai ye toh

Bechara damaad ab kya hi kr sakta hai
use toh pehle hi khush karna chahiye tha neelam ko

pr ab kya fayda
Damaad ne khilya phul, phul ko le gaya Baap harami

wah apko Best Erotica ka award meri taraf se.

waise mwri bhi kahaniya hai.. Thanks
 

DeewanaHuaPagal

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Update- 72

महेन्द्र बड़ी सी जीभ निकाले नीलम की वासना में फूली हुई पनियायी बूर को नीचे से लेकर ऊपर तक चाटने लगा, महेन्द्र की जीभ की रगड़ अपनी बूर की दोनों फाँकों के बीच, फांकों पर, बूर के तने हुए दाने पर पाकर नीलम के विशाल 36 साइज के नितंब बरबस ही सनसनाहट में थिरक जा रहे थे, पहले तो उसने अपने दोनों पैर महेन्द्र की पीठ पर रखे हुए थे पर बूर चटाई का और सुख लेने के लिए नीलम ने दोनों पैरों को और चौड़ा करके हवा में फैला दिए और इतना ही नही फिर नीलम ने जानबूझ कर महेन्द्र को और जोश चढ़ाने के लिए अपने सीधे हाँथ की उंगली से अपनी बूर की दोनों फाँकों को चीरकर उसका प्यारा सा गुलाबी छेद दिखाते हुए बड़े ही विनती के भाव में बोली- भैया जल्दी जल्दी चाटो अपनी दीदी की बुरिया को............कहीं अम्मा न आ जाये.............जल्दी जल्दी सब कुछ करो न......... बहुत मजा आ रहा है.......कभी कभी तो मौका मिलता है.......…..बहुत मजा आता है भाई के साथ गंदा काम करने में........ऊऊऊऊऊईईईईईईईईई.......अम्मा।

महेन्द्र ने अपनी जीभ नुकीली बना के नीलम की बूर के गुलाबी छेद पर भिड़ा दी थी इसलिए नीलम सिसकारी लेते हुए चिहुँक गयी।

नीलम के मुँह से ये बोल सुनकर महेन्द्र से रहा नही गया वो और तेज तेज बूर का चप्पा चप्पा चाटने लगा, नीलम जोश और बदन में उठ रही तेज सनसनी के मारे अपने ही दोनों हांथों से अपनी गुब्बारे जैसी फूली हुई दोनों चूचीयों को मसलने लगी, दोनों तने हुए निप्पल को खुद ही मीजने लगी, चुदास इतना सर चढ़ जाएगी ये उसने भी कभी सोच नही था।

काफी देर बूर का चप्पा चप्पा चाटने से बूर एकदम गीली हो गयी, नीलम की बूर महेन्द्र के थूक से लबालब सन गयी थी, बूर पर हल्के हल्के काले काले बाल थूक से सराबोर हो चुके थे, बूर पूरी फूलकर किसी पावरोटी की तरह उभर आई थी और दोनों फांकों के बीच तना हुआ दाना जोश के मारे लाल हो गया था, सच पूछो तो बूर अब लन्ड मांग रही थी, नीलम तड़पते हुए छोटी टॉर्च को बुझाकर अपने दोनों हांथों से सर हो अगल बगल तड़पकर पटकते हुए अपनी चूचीयों को खुद ही मसले दबाए जा रही थी, कभी वो जोश के मारे सर को अगल बगल हिलाती तो कभी अपनी चूची और कमर से ऊपर के हिस्से को किसी धनुष की तरह ऊपर को मोड़कर तान देती जिससे उसकी चूचीयाँ किसी दो पहाड़ की तरह और ऊपर को उठ जाती।

नीलम के बदन में वासना की तरंगे, चुदाई की खुमारी अब उफान पर आ चुकी थी, किसी सागर की बेकाबू लहरों की तरह उसका बदन मचल रहा था और सच में एक गदराए यौवन की स्त्री के बदन में वासना जब खुलकर हिलोरे मारने लगती है और वो लोक लाज छोड़कर तड़पने मचलने लगती है तो एक अनुभवी पुरुष ही उसे अच्छे से काबू कर सकता है, आज महेन्द्र की बूर चटाई नीलम के मन भा गयी थी न जाने क्यों आज महेन्द्र से बूर चटवाने में नीलम को मजा आया था शायद इसकी वजह उसके बाबू की मौजूदगी थी, ये सोचकर उसे अति आनंद और रोमांच हो रहा था कि कैसे वो अपने बाबू की जानकारी में अपने पति से बूर चटवा रही है, हो न हो बाहर से जरूर उसके बाबू उसे देख रहे होंगे और ये सच भी था बाहर बिरजू खिड़की के पास खड़ा अपनी बेटी की मादक सिसकियां सुनकर अति उत्तेजित हो ही रहा था।

नीलम से जब नही रहा गया तो उसने महेन्द्र के चेहरे को पकड़ा और उसका मुँह बूर से छुड़ाया और कंधों से पकड़कर ऊपर चढ़ने का इशारा किया महेन्द्र झट से नीलम के ऊपर चढ़ गया नीलम ने अपने पैर महेन्द्र की कमर पर दुबारा कैंची की तरह लपेट दिए, महेन्द्र का लोहे की तरह तन्नाया लंड नीलम की बूर पर, उसकी फाँकों पर, फांकों के बीच में जहां तहां ठोकरें मारने लगा, और एकाएक बूर के गरम गरम रसीले छेद पर सेट हो गया तो नीलम जोर से सिसक उठी- ओओओहहहह........भैयायायाया........चोद दो न जल्दी.........डालो न अपना लंड अपनी दीदी की बुरिया में.....कहीं अम्मा न आ जाये......आज पहली बार अपनी बहन को चोदने जा रहे हो.......आह कैसा लग रहा है भाई के ही साथ चुदाई करने में, जिसको मैं राखी बांधती हूँ आज उसी से चुदवा रही हूं.........आह भैया...…..करो न.......डालो अब बर्दाश्त नही होता।

(नीलम जानबूझ कर महेन्द्र से ऐसी कामुक बातें कर रही थी)

आखिर महेन्द्र भी कब तक चुप रहता वासना उसके सर चढ़कर गरजने लगी, इतना जोश उसे कभी नही चढ़ा था, उसने नीलम को कस के अपनी बाहों में जकड़ लिया और गालों होंठों पर ताबड़तोड़ चूमते और लंड को बूर की फांकों पर ऊपर ऊपर रगड़ते हुए नीलम से बोला- दीदी आज कितना अच्छा लग रहा है तुझे पा के, मैंने कभी सपने में भी नही सोचा था कि मुझे अपनी ही सगी बहन की मखमली बूर मिलेगी चोदने को।

(महेन्द्र लगतार अपना लंड नीलम की बूर की फांकों के बीच रगड़ रहा था)

नीलम- हां भैया मैं भी तेरा लंड पाकर निहाल हो गयी, अब चोद न जल्दी, कोई आ जायेगा नही तो घर में, बड़ी मुश्किल से मौका मिला है तू देर क्यों कर रहा है।

ऐसा कहते हुए नीलम ने खुद ही अपने नितंब को ऊपर की ओर उठाने लगी।

महेन्द्र से भी अब नही रहा गया और उसने जोर का एक धक्का नीलम की तरसती बूर में मारा तो महेन्द्र का लंड सरसराता हुआ गच्च से बूर की गहराई में उतर गया। बूर अंदर से किसी तेज भट्टी की तरह सुलग रही थी, उसकी तेज गर्माहट अपने लन्ड की चमड़ी पर महसूस कर महेन्द्र मदहोश हो गया, दोनों के मुँह से ही एक जोर की मादक सिसकारी निकली, नीलम ने महेन्द्र को कस के अपने से लिपटा लिया और महेन्द्र ने अपने दोनों हांथों से नीलम के भारी नितंब थामकर अपना लन्ड एक बार तेजी से बाहर निकाल कर दुबारा गच्च से बूर में पेल दिया तो नीलम लंड के लज़्ज़त भरे मार से सिसकते हुए कराह उठी।

दोनों अमरबेल की तरह एक दूसरे से लिपट गए, कुछ देर दोनों आंखें बंद किये एक दूसरे के बदन की लज़्ज़त और लंड-बूर के मिलन के असीम आनंद को अच्छे से महसूस करते रहे, कोई कुछ बोल नही रहा था बस आंखें बंद किये एक दूसरे को महसूस कर रहे थे, बीच बीच में महेन्द्र अपना लंड बूर में से बाहर खींचकर दुबारा किसी पिस्टन की तरह बूर की गहराई तक पेलता तो नीलम लन्ड की लज़्ज़त भरी मार को गहराई में महसूस कर चिहुकते हुए महेन्द्र की पीठ पर नाखून से चिकोट लेती, महेन्द्र नीलम के गालों को चूमने लगा और धीरे से बोला- दीदी

नीलम- हम्म

महेन्द्र- रोशनी करो न थोड़ा अपने चेहरे पर।

नीलम- क्यों भैया

महेन्द्र- आज बरसों तड़पने के बाद अपनी बहन की बूर मिली है मैं देखना चाहता हूं कि मेरी दीदी के चेहरे का क्या हाव भाव है, तुम्हे अच्छा लग रहा है कि नही।

नीलम- धत्त....गंदे भैया.....एक तो बहन की बूर में अपना खूंटे जैसा लन्ड घुसाए हुए हो ऊपर से उसका चेहरा भी देखना है, मुझे लाज आती है।

(नीलम ने जानबूझ कर नाटक किया)

महेन्द्र- जलाओ न बत्ती दीदी, देखूं तो सही तुम्हारे चेहरे की लज़्ज़ा

नीलम ने बगल में पड़ी टॉर्च उठा के महेन्द्र को दी और बोली- लो खुद ही जला के देख लो बहन की लाज.....गंदे

महेन्द्र ने टॉर्च को जलाकर नीलम के चहरे पर किया तो नीलम शर्मा गयी, टॉर्च की रोशनी ज्यादा तो थी नही, सिर्फ चेहरे और उनके आस पास तक ही थी।

महेन्द्र ने नीलम को शर्माते हुए देखा तो और भी जोश से भर गया, नीलम ने एक बार महेन्द्र की आंखों में देखा फिर शर्मा कर मुस्कुराते हुए चेहरा बायीं तरफ घुमा लिया और बोली- धत्त बेशर्म भैया, एक तो अपनी सगी बहन को चोरी चोरी चोदते हो ऊपर से उसकी लज़्ज़ा भी देखते हो.....हम्म....गंदे।

महेन्द्र- हाय मेरी बहना, कितनी खूबसूरत है तू

नीलम- सच

महेन्द्र- बिल्कुल सच मेरी बहना, मेरी सुनीता, मेरी जान

नीलम- आह मेरे भैया

(दरअसल महेन्द्र ने एक गच्चा बूर में तेज़ी से मार दिया था तो नीलम चिहुँक पड़ी)

नीलम ने टॉर्च बंद कर दी और धीरे से बोली- अब चोदो न अपनी बहन को

(दरअसल नीलम देर नही करना चाहती थी, उसे तो इंतज़ार था अपने बाबू का, अपने मन पसंद पुरूष का, महेन्द्र के साथ ये सब खेल तो वो बस इसलिए खेल रही थी की वो जल्दी निपट जाए)

हालांकि वासना और चुदास कि तड़प में तर बतर तो वो भी हो चुकी थी पर वो झड़ना अपने बाबू के अत्यधिक मजबूत लंड की रगड़ से चाहती थी न कि महेंद्र के, और उपाय के नियम भी यही थे।

नीलम ने टार्च बंद कर दी तो महेन्द्र अब नीलम की गीली बूर में धीरे धीरे धक्के मारने लगा, नीलम हल्का हल्का सिसकने लगी, दोनों पैर उसने महेन्द्र की कमर पर लपेट रखे थे और उसकी पीठ और कमर को बड़े दुलार के साथ लगातार सहला रही थी, महेन्द्र ने धक्के मारते वक्त महसूस किया कि वो अपने सामर्थ्य से तो अपना समूचा लंड नीलम की बूर की गहराई में पेल रहा है पर फिर भी वो उसकी बूर की गहराई के आखिरी छोर को छू नही पा रहा है, मानो उसका लंड नीलम की बूर की गहराई के हिसाब से छोटा पड़ रहा हो, हालांकि मजा तो उसे भरपूर आ रहा था, पर वो धक्के मारते हुए अपने दोनों पैरों को पलंग की पाटी से टेक लगाकर तेज तेज धक्के लगाते हुए नीलम की बूर की अत्यंत गहराई तक लंड पहुचाने की भरपूर कोशिश कर रहा था पर वो उस गहराई को छू नही पा रहा था और इस बात को नीलम पहले ही अच्छे से महसूस कर चुकी थी, वो भी कई बार नीचे से अपने मादक विशाल नितंब उठाकर महेन्द्र के लन्ड के टोपे को बूर की गहराई के आखिरी छोर तक टच कराने की कोशिश करती पर लन्ड वहां तक नही पहुंच पा रहा था, जिससे नीलम को कुछ कमी महसूस हो रही थी, वो मजा उसे नही मिल पा रहा था हालांकि महेन्द्र को पूरा मजा मिल रहा था और वो अब ताबड़तोड़ धक्के पे धक्के मारे बूर चोद रहा था, नीलम भी दिखावे की सिसकारी लेते हुए महेन्द्र को सहलाती और चूमती जा रही थी पर कहीं न कहीं कुछ खालीपन था।

जबकि पहले ऐसा नही था पहले महेन्द्र का लंड जब नीलम की बूर में घुसता था तो नीलम और महेन्द्र दोनों को यही लगता था कि बूर बस इतनी ही गहरी है, महेन्द्र का पूरा लंड बूर में समा जाता था तो महेन्द्र को लगता था कि बूर की गहराई तक वो पहुँच गया है पर असल में नीलम की बूर की गहराई की और परतों को खोलकर उसे और गहरा बनाया था उसके सगे पिता के विकराल लंड ने, नीलम को भी पहले क्या पता था कि उसकी बूर और गहरी है, जब पहली बार महेन्द्र का लंड सुहागरात में नीलम की बूर में गया था तो उसे भी यही लगा था कि लंड इतना ही बड़ा होता है और गहराई इतनी ही होती है बूर की, पर कल की रात जब पहली बार उसके बाबू का लंड उसकी कमसिन बूर में उतरा तब उसे समझ में आया कि लंड क्या होता है, उसे वो पल याद है जब कल उसके बाबू का लन्ड उसकी बूर की अनंत गहराई की अनछुई मांसपेशियों को चीरता हुआ उस जगह पर जा पहुँचा था जो बरसों से वीरान पड़ी थी जिसका आभास स्वयं नीलम को भी नही था, कैसे उसके बाबू के विशाल लन्ड ने वहां पँहुच कर उस जगह के चप्पे चप्पे को बड़े प्यार और दुलार से चूमा था, कैसे वहां अपना परचम लहराया था, तभी तो उसके बदन में एक अत्यंत खूबसूरत झनझनाहट हुई थी, जैसे बरसों की प्यास बुझी हो और वो उसी सुख को पाकर अपने बाबू के लन्ड की कायल हो गयी थी, दरअसल बूर को भी वही लंड भाता है जो उसकी अनछुई गहराई तक पहुँचकर वहां कलश में रखे मटके को फोड़कर उसका रस पी सके और वहां के चप्पे चप्पे को चूमकर एक झनझनाहट बूर में पैदा कर दे, और इस दौरान जब महेन्द्र भी नीलम को हुमच हुमच कर चोद रहा था तो नीलम उसी सनसनाहट और सुख को पाने का भरकस प्रयास अपनी गाँड़ को उछाल उछालकर कर रही थी पर वो झनझनाहट वाला मजा उसे महेन्द्र के लन्ड से मिल नही पा रहा था।

दूसरा फर्क ये था कि उसके बाबू का काला लंड जब फुंकार मारकर खड़ा होता है तो उसपर काफी सारी नसें उभर आती है, और जब वो लंड बूर में अंदर बाहर होता है तो वो नसें बूर की दीवारों से एक दरदरा सा घर्षण पैदा करके असीम सुख देती हैं, साथ ही साथ लंड के इर्द गिर्द काले काले बाल, जब लंड बूर में जड़ तक घुसता है तो वो काले काले बाल बूर की फांकों और बूर के तने हुए दाने से बार बार टकराकर बदन में बिजली जैसा कंपन पैदा करते है जिससे नीलम को अपार सुख मिलता है, और इस वक्त उसे वो सुख महेन्द्र के लंड से न मिलने पर वो उस लन्ड को मिस कर रही थी।

चोदते चोदते महेन्द्र रुक गया। नीलम ने सवालिया निगाहों से अंधेरे में उसे देखा।


नीलम- क्या हुआ भैया......चोदो न रुक क्यों गए, बहन की बूर में मजा नही है क्या?


महेन्द्र- दीदी.....तेरी बूर में मजा तो इतना है कि जी करता है उम्र भर इसे चोदता रहूं।


नीलम- फिर......फिर क्या हुआ मेरे राजा भैया....चोदो न अपनी बहना को......कितना मजा आ रहा था।


महेन्द्र- मुझे बस एक बात पूछनी है दीदी।


नीलम- तो पूछ न.....चोदता भी रह और पूछता भी रह।


महेन्द्र फिर हल्का हल्का बूर चोदने लगा और बोला- दीदी


नीलम- ह्म्म्म........ .........आह.... हाँ ऐसे ही चोद


महेन्द्र- जीजा तुम्हे नही चोदते न


नीलम- एक बात बताऊं मेरे भैया


महेन्द्र- हाँ मेरी प्यारी दिदिया।


नीलम- अगर वो मुझे चोदते होते न, फिर भी मैं तुझसे छुप छुप के चुदवाती, तुझे तेरे हक़ का देती, नही तो भगवान भी मुझे माफ़ नही करेगा।


महेन्द्र- कैसा हक़ दीदी? क्या से सच है....की फिर भी तुम मुझसे चुदवाती।


नीलम- हां मेरे भैया सच........आह....ऐसे ही गप्प गप्प लंड डाल मेरी बूर में.....आह भाई.... मजा आ रहा है बहुत।


महेन्द्र- पर क्यों दीदी?


नीलम सिसकते हुए- क्योंकि तू मेरा भाई है......मैं तुझे राखी बांधती हूँ न, और तू मेरी रक्षा का वचन देता है।


महेन्द्र- हाँ देता तो हूँ वचन।


नीलम- तो जरा सोच मेरे प्यारे भैया........जब एक पुरुष 18 19 साल बाद किसी स्त्री के जीवन मे आकर उससे शादी करता है..........और शादी के फेरों के दौरान वो उस स्त्री की रक्षा का वचन देता है फिर उस पुरुष को उस स्त्री की बूर सुहागरात में मिलती है चखने को.......... और दूसरी तरफ वो भाई जो बचपन से उसकी रक्षा का वचन देता आ रहा है बदले में उसको कुछ नही?.........उसको भी तो बहना की बूर चखने को मिलनी चाहिए न............बहन की शादी से पहले न सही पर शादी होने के बाद कभी न कभी चुपके से तो उसे उसके हक़ का मिलना चाहिए न.......... आखिर वो भी तो उसकी रक्षा का वचन बचपन से देता चला आ रहा है और रक्षा कर भी रहा है, तो ये नाइंसाफी एक भाई के साथ क्यों भला?......इसलिए मेरे भैया मेरी बूर पर तेरा पूरा हक है.......कोई बहन अपने भैया को अपनी बूर चखाये या न चखाये मैं तो जरूर चाखाउंगी अपने प्यारे भैया को.........आखिर एक दिन मर ही जाना है ये मिट्टी का तन मिट्टी में मिल ही जाना है.............और जवानी भी तो हमेशा नही रहेगी.......तो क्यों तड़पे मेरा भाई बूर के लिए ...क्या उसकी बहन के पास नही है बूर........अगर भाई नही चाह रहा होता तो बात अलग थी......जब भाई प्यासा है.......तो क्यों न बहन अपनी बूर चखाये अपने सगे भाई को.....औऱ चुपके से उसकी प्यास बुझा दे.....जो जीवन भर उसकी रक्षा का वचन देता है.........आखिर एक भाई बचपन से बहन की रक्षा का वचन निभाता है.....एक रस भरी मिठाई की रक्षा बचपन से जवानी तक जब तक बहन की शादी नही हो जाती करता है.......और शादी होने के बाद बहन उस मिठाई को किसी ऐसे पुरुष को खिला देती है जो इतने सालों बाद उसकी जिंदगी में आया है..............इतना भी नही सोचती की इस मिठाई पर थोड़ा हक़ तो उस भाई का भी है जिसने बचपन से इसकी रक्षा की है..........उस नए पुरुष को वो मिठाई दे देती है चाहे वो उसकी इज्जत करे या न करे, पर उसे नही देती जिसने उस मिठाई पर कभी एक मक्खी तक नही बैठने दी........ सिर्फ समाज के डर से, पर ये एक भाई के साथ नाइंसाफी है, और केवल शादी तक ही नही भाई तो बहन की रक्षा शादी के बाद भी मरते दम तक करता है, पर बहन शादी होने के बाद भी भाई को उसके हक़ की मिठाई नही खिलाती, कम से कम शादी के बाद चुपके से कभी न कभी अपनी बूर का स्वाद एक बहन अपने सगे भाई को चखा ही सकती है, क्या भाई बहन को कम संतुष्टी देगा.......कदापि नही........ इसलिए मेरे भाई चोद लो अपनी बहन को जी भरके........तेरे लंड की प्यासी है तेरी बहना की बूर, और इसलिए अगर तेरे जीजा मुझे चोदते होते तो भी मैं तुझे अपनी बूर चखाती।


नीलम ने सिसकते और कराहते हुए लंबा चौड़ा एक मादक भाषण दे डाला, महेन्द्र नीलम की लॉजिक भरी बातें सुनकर दंग रह गया, ऐसे ही बेबाक जवाब होते थे नीलम के, महेन्द्र को ये सब सुनके इतनी मस्ती चढ़ी की उसने कस के नीलम को दबोचा और "ओह मेरी दीदी......हाय मेरी प्यारी दीदी........तू मुझे इतना प्यार करती है......की अपनी मिठाई मुझे परोस दी........सच में तेरी बूर के आगे सारी मिठाई फीकी है........मैं मर जाऊंगा तेरे बिना.........तेरी बूर के बिना मैं नही रह पाऊंगा.......आह क्या बूर है तेरी मेरी बहन" कहते हुए दनादन नीलम की बूर में गच्च गच्च लंड पेल पेल कर नीलम को चोदने लगा।


नीलम की चाल को महेन्द्र फिर नही समझ पाया, नीलम मंद मंद मुस्कुराती रही और हल्का हल्का कभी कभी लंड के आड़े तिरछे धक्के बूर की दीवारों पर लगने से आह....ऊई अम्मा करते हुए सिसकती रही, पर वो एक कमी उसे बहुत खल रही थी।


इतनी मादक बातें सुनकर और नीलम की लज़्ज़त भरी बूर में काफी देर से लंड पेलते रहने की वजह से अब महेन्द्र का टिक पाना मुश्किल था, उधर बिरजू भी कमरे से आ रही मादक सिसकियों को सुनकर बेचैन होता जा रहा था, कभी वो इधर उधर घूमने लगता तो कभी खिड़की के पास खड़ा हो जाता, उमस और गर्मी हो ही रही थी, तभी आंगन में खड़े होने की वजह से बिरजू के ऊपर बारिश की हल्की हल्की दो चार बूंदे गिरी, बिरजू ने सर उठा के ऊपर देखा तो काले काले बादल छा चुके थे, बारिश होने वाली थी अब तेज।


बिरजू ने अब अंदर जाना उचित समझा, जैसे ही उसने घर के अंदर प्रवेश करने के लिए दरवाजा खोला हल्की चर्रर्रर्रर की आवाज हुई और तभी जोर से बादल गरजे और बिजली चमकी, बिलजी इतनी तेज चमकी की एक पल के लिए पूरा आंगन जगमगा गया और कमरे में भी भरपूर रोशनी हुई, जिससे नीलम और बिरजू की नजरें मिल गयी, नीलम मारे लज़्ज़ा के गनगना गयी की कैसे एक पिता ने अपनी
सगी बेटी को चुदवाते हुए देख लिया, और वो किस तरह लेटकर महेन्द्र से चुदवा रही है।


महेन्द्र ने भी पलटकर बिरजू की ओर देखा, बिरजू ऊपर से बिल्कुल नंगा था, नीचे उसने धोती पहन रखी थी, जिसमे उसका काला जंगली सा लंड कब से फुंकार मार रहा था, एक पल के लिए तेज रोशनी होने से बिरजू ने महेंद्र को नीलम के ऊपर चढ़कर उसको हचक हचक के चोदते हुए देख लिया, नीलम और महेन्द्र मदरजात नंगे थे, नीलम ने झट से एक बड़ा चादर उठा कर महेंद्र और अपने ऊपर डालकर ढक लिया, और मारे उत्तेजना के तेज तेज अपने बाबू के सामने सिसकने लगी, महेन्द्र से भी अब रुका नही जा रहा था वो नीलम को बहुत तेज तेज चोदने लगा, बिरजू की मौजूदगी का अहसाह कर अब नीलम के बदन में अजीब सी झुरझुरी होने लगी, एक अलग ही रोमांच का अहसाह उसे होने लगा, जिससे वो हल्का हल्का झड़ने के करीब जाने लगी थी कि तभी महेंद्र हुंकार मारते हुए नीलम की बूर में आखिरी धक्का लगाकर गनगना के झड़ने लगा, धक्का उसने इतना तेज मारा था कि पलंग हल्का सा चरमरा गई थी पर लंड उसका फिर भी बूर की उस गहराई को नही छू पाया था जहां तक जाने की आशा नीलम कर रही थी। पूरे कमरे में न चाहते हुए भी तेज तेज कामुक सीत्कार गूंज उठी।


एक बड़ी चादर के अंदर महेन्द्र और नीलम एक दूसरे से गुथे पड़े थे, पूरा बदन दोनों का ढका हुआ था बस पैर और मुँह बाहर थे, महेन्द्र के लंड से वीर्य की एक मोटी धार झटके ले लेकर कई बार निकली और नीलम की प्यासी बूर को भरने लगी, महेन्द्र जोर जोर से हाँफता हुआ, नीलम के ऊपर ढेर हो गया, नीलम ने उसे किसी बच्चे की तरह दुलारते हुए अपने आगोश में भर लिया और हौले हौले उसकी पीठ सहलाने लगी, अपने अंदर का सारा लावा नीलम की प्यासी बूर में उड़ेलने के बाद महेन्द्र धीरे धीरे शांत हुआ।


अब नीलम और महेन्द्र दोनों को ये तो पता था कि बाबू कमरे में मौजूद हैं, और बिरजू को भी पता था कि महेन्द्र उसकी बेटी की बूर में झड़ चुका है।


उपाय के नियम के अनुसार कुछ देर शांत पड़े रहने के बाद अब महेन्द्र धीरे धीरे अपना हल्का सा मुरझाया लंड नीलम की बूर में पेलने लगा, नीलम को अब और मस्ती चढ़ने लगी और वो जानबूझ कर सिसकने लगी, महेन्द्र लगातार लंड बूर में पेलने लगा, बूर एकदम गीली थी, महेन्द्र के वीर्य से लबालब भरी हुई थी।


इधर बिरजू अपनी धोती खोलकर पलंग पर रख देता है और पूरा नंगा हो जाता है वो पलंग पर चढ़कर बिल्कुल महेन्द्र के पीछे आ जाता है, नीलम और महेन्द्र का बदन तो चादर में ढका हुआ था, नीलम ने अपने दोनों पैर फैलाकर अब हवा में उठा लिए थे, पलंग पर बिरजू के चढ़ने से पलंग एक बार फिर चरमरा गई और नीलम और महेन्द्र को बिरजू के एकदम करीब आने से एक तेज सनसनाहट का अहसाह हुआ, बिरजू नीलम के दोनों पैरों के बीच महेन्द्र के पीछे पूरा नंगा अपना दैत्याकार काला लन्ड हाँथ में लिए बैठा था, वो सब कुछ बिल्कुल उपाय के अनुसार करना चाहता था कहीं कोई चीज़ छूट न जाये, नीलम और महेन्द्र भी बिल्कुल वैसा ही कर रहे थे पर शर्म और लज़्ज़ा से उनका बुरा हाल था। महेन्द्र लगातार अपना लंड नीलम की बूर में अंदर बाहर कर रहा था उसकी गाँड़ ऊपर नीचे हिलती हुई गुप्प अंधेरे में भी दिख रही थी, बूर वीर्य से लबालब भरी होने की वजह से कमरे में फच्च फच्च की लगातार गूंज रही थी।


अब महेन्द्र का लन्ड भी अपने ससुर को बिल्कुल ठीक अपने पीछे मौजूद होने से एक अजीब रोमांच में सख्त होने लगा की तभी नीलम को अपनी बूर की गहराई में झनझनाहट महसूस हुई उसे लगा कि अब वो झड़ जाएगी तभी उसने जोर से कहा- अब बस....अब रुक जाओ।


(ये इशारा था महेन्द्र को, की वो अब उपाय के अनुसार हट जाय, महेंद्र और बिरजू दोनों समझ गए कि नीलम झड़ने की राह पर आ चुकी है)


महेन्द्र ने पक्क़ से वीर्य से सना हुआ खड़ा लंड नीलम की वीर्य से भरी लबालब बूर में से निकाला और चादर के अंदर से निकलकर बगल में पड़ा एक दूसरा चादर ओढ़ते हुए नीलम के बायीं ओर पलंग पर लेटकर अपने खड़े लंड पर लगे वीर्य को चादर में ही पोछने लगा।


इधर नीलम ने झट से अपने दोनों पैर फिर से फैला लिए हालांकि उसने अपने बदन को पूरा चादर से ढका हुआ था, बिरजू पोजीशन बनाकर हाहाकारी मूसल जैसा काला लंड खोले उसकी दोनों टांगों के बीच बैठ गया और धीरे से बोला- मेरी बेटी.....मेरी बच्ची


नीलम शर्म से कुछ नही बोली और तेज तेज सांसें लेने लगी।


बिरजू ने अंधेरे में फिर बोला- नीलम.....मेरी बच्ची


नीलम बहुत धीरे से- हाँ बाबू


बिरजू- आखिर वो पाप करने का वक्त आ ही गया न, मुझे माफ़ कर देना बेटी।


नीलम- ऐसे न बोलो बाबू......बहुत शर्म आ रही है मुझे।


बिरजू- नीलम मेरी बच्ची......तू मेरी प्यारी बच्ची होने के साथ साथ एक यौवन से भरपूर स्त्री भी है और मैं सगा पिता होने के साथ साथ एक पुरुष भी हूँ, वैसे तो एक पुरुष जब एक यौवना स्त्री को देखता है या उसके बारे में सोचता है तभी उसके मन मे संभोग की इच्छा जागृत हो जाती है पर यहां मेरे और तेरे बीच सगे पिता पुत्री का जो रिश्ता है वो मुझे उत्तेजना के उस चरम पर नही जाने दे रहा जिससे एक सफल यौन संबंध स्थापित हो पाए और हम एक सफल संभोग करते हुए चरम सुख की प्राप्ति करें। ये पवित्र रिश्ता बीच में आड़े आ रहा है मेरी बच्ची। एक पिता का अपनी बेटी के साथ यौन संबंध बनाना महापाप है शायद यह सोच मुझे उत्तेजित होने से रोक रही है, और जब तक एक पुरुष अच्छे से उत्तेजित न हो वो सफल यौन संबंध कैसे बना पायेगा और सफल सभोग कैसे कर पायेगा, तू इस सोच के खंडित कर दे मेरी बच्ची।


नीलम बहुत लजाते हुए- मेरे बाबू.....एक बेटी होने के नाते मुझे बहुत लज़्ज़ा आ रही है पर मैं नही चाहती कि मेरे बाबू अपने दिए वचन को पूरा न कर पाएं और मेरी इच्छा अधूरी रह जाये, और उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचे, इसलिए आप ही मुझे बताइए कि आप पूर्ण रूप से कैसे उत्तेजित होंगे और में आपके आदर्श सोच को कैसे खंडित करूँ।


बिरजू कुछ देर चुप रहा फिर बोला- जब तक मैं तेरी महकती हुई जवान योनि नही देख लेता मुझे चरम उत्तेजना नही आएगी बेटी, एक आमंत्रित करती हुई योनि देखने के बाद ही एक पुरुष के अंदर मान मर्यादा की दीवार टूटती है मेरी बच्ची और वो रिश्ते नाते तक भूल जाता है, इतना तो तू समझ ही सकती है और जबतक ये पवित्र रिश्ते की दीवार नही गिरेगी हम उस कार्य को अंजाम नही दे सकते।


नीलम- बाबू......


बिरजू- हां मेरी बच्ची......मुझे अपना यौवन दिखाना होगा तुझे.......अपनी महकती हुई योनि दिखानी होगी आज अपने बाबू को।


नीलम सच में शर्मा गयी, क्योंकि महेंद्र भी एकदम बगल में चादर ओढ़े लेटा सब सुन रहा था उसका लंड भी लोहे की तरह दुबारा सख्त हो चुका था अपने ससुर की बातें सुनकर।


नीलम कुछ देर चुप रहने के बाद धीरे से शर्माते हुए बोली- बाबू जी तो फिर अपनी आंखें बंद कीजिए पहले......मैं धीरे से दिखती हूँ आपको अपनी योनि, आपकी अपनी ही सगी बेटी की योनि और आप भी उधर मुँह कर लीजिए (नीलम ने महेन्द्र को कहा तो महेन्द्र ने करवट बदलकर मुँह चादर में ढककर पलटकर लेट गया)


बिरजू ने अंधेरे में आंखे बंद की नीलम ने चादर को ऊपर कमर तक खींचकर अपनी मांसल जांघे बड़ी ही मादक अदा से खोल दी जिससे उसकी कमसिन रसीली बूर की फांके फैल गयी और बूर उभरकर बाहर की तरफ आ गयी, नीलम ने फिर शर्माते हुए टॉर्च उठायी और उसको अंधेरे में एकदम अपनी बूर के ऊपर लाकर जला दी।


बिरजू आँखे फाड़े अपनी सगी शादीशुदा बेटी की दामाद के वीर्य से भरी गीली बूर को देखकर मानो पागल ही हो गया, और बोला- आह मेरी बच्ची क्या योनि है तेरी, बहुत नरम और रसीली है ये तो और तेरी जांघे कितनी मोटी मोटी हैं मेरी बच्ची मेरी बेटी?


नीलम शर्म के मारे पानी पानी हो गयी


क्या बूर थी नीलम की, कितनी गीली हो रखी थी, दोनों फांके, फांकों के बीच मे तना हुआ भगनासा जो कि फूलकर लगभग अलग ही चमक रहा था, गीले गीले फांक फैलने से उनके बीच वीर्य के दो तीन तार बन गए थे, काले काले बालों से घिरी लगभग एक बित्ता लंबी बूर, जांघे फैलने से लगभग दोनों फांक खुल गए थे और अंदर का गुलाबी छेद जिसमे से महेन्द्र का वीर्य अब भी बहकर बाहर आ रहा था बरबस ही जल्द से जल्द लंड डालने के लिए ललचा रहा था। नीलम ने चुपके से अपना बायां हाँथ नीचे लेजाकर अपनी दो उंगलियों से बूर की फाँकों को अच्छे से चीरकर उसका गुलाबी गुलाबी रसीला छेद अपने बाबू को दिखाकर उनको और ललचाया और फिर अपने बूर के दाने को रगड़कर उनको जल्दी से जल्दी अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर में अपना लंड डालने की विनती सी की और जमकर चोदने का इशारा किया।


बिरजू सच में आज नीलम की बूर देखकर वासना में दहाड़ उठा, अभी कल ही सारी रात इसी बूर को चोदा था पर न जाने क्यों आज अलग ही नशा चढ़ गया उसका लन्ड अपने पूरे ताव में आ गया, नीलम से झट से टॉर्च बंद की और बगल में रख दी वो समझ गयी कि अब उसके बाबू उसे रौंद डालेंगे उसने जिस तरीके से अपने बाबू को ललचाया था वो सच में आग लगा देने वाला था, बिरजू ने गरजते हुए जल्दी से अपने दहाड़ते लंड के मोटे सुपाड़े पर से चमड़ी खींचकर पीछे की और सीधे हाँथ से लंड को थामकर अपनी बेटी के मखमली गुदाज बदन पर चढ़ गया, नीलम ने भी झट से अंधेरे में अपने दोनों पैर फैलाकर अपने मनपसंद पुरुष की कमर में कैंची की तरह लपेट दिया और खुद ही अपनी विशाल गुदाज गाँड़ उठा कर अपने सपनो का पसंदीदा लौड़ा अपनी बूर की असीम गहराई में उतरवाने के लिए लपकने लगी, बिरजू ने जल्दी से उसपर झुकते हुए एक हाँथ को नीचे लेजाकर उसकी बूर की दोनों फांकों को चीरा और दूसरे हाँथ से 8 इंच लंबा और 3 इंच मोटा काले नाग जैसे लंड का फूला हुआ छोटी सी गेंद जैसा सुपाड़ा उसकी बूर की कमसिन से गुलाबी छेद पर रखा, गरम गरम सुपाड़े की छुवन अपने बूर की छेद पर महसूस कर नीलम हल्का सा सिसक गई, महेन्द्र ने भी इस सिसकन को भांप लिया कि लंड का सुपाड़ा बूर की छेद पर रखा जा चुका है, बिरजू ने वासना में चिंघाड़ते हुए "ओह मेरी बेटी मुझे माफ़ कर देना" अपना समूचा लंड एक ही बार में गनगना के बूर की अनंत गहराईयों में उतार दिया। नीलम इतनी जोर से सीत्कारी की उसकी आवाज आंगन तक गयी,
नीलम- "आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआहहहहहहहहहहहहहहहहहह.........बबबबबबाबाबाबाबाबूबूबू बूबूबूबूबूबूबूबूबूबूबू............... मेरीबूबूबूबूबूबूररररररर..........मर गयी दैय्या............हाय.......अम्मा............


धक्का इतना तेज था कि नीलम की दोनों जांघे अच्छे से फैल गयी थी और उसका बदन लगभग एक फुट ऊपर को सरक गया दोनों चूचीयाँ बुरी तरह हिल गईं, दोनों पैर हवा में ऊपर को उठ गए, दर्द से उसका मुँह खुल गया और वो बुरी तरह तड़प उठी, एक ही बार में उसके बाबू का काला लंड बूर की गहराई को चीरता हुआ उस जगह पर जा पहुंचा जिसके लिए नीलम कब से तरस रही थी, तेज तेज सिसकारियां लेते हुए उसकी साँसे फूलने लगी, पर न जाने क्यों उसे बहुत अच्छा लगा।


महेन्द्र भी समझ गया कि उसकी पत्नी की बूर में उसके ही सगे पिता का लंड समा चुका है, एक पिता का मूसल जैसा लन्ड अपनी ही शादीशुदा बेटी की कमसिन बूर में जड़ तक घुस चुका है, एक पिता और बेटी के बीच एक दर्दभरा रसीला यौनसंबंध कायम हो चुका है, उसका लंड जोश के मारे चिंघाड़ने लगा कि कैसे उसकी पत्नी उसी के बगल में लेटकर, उसकी मौजुदगी में ही अपने सगे पिता से चुद रही है और वो भी अपनी मर्ज़ी से........ये बात वाकई में उत्तेजना से लंड की नसें तक को फाड़ देने वाली थी, ये बात सच है कि लंड और बूर का कोई रिश्ता नही होता, महेन्द्र ने अंधेरे में धीरे से चादर में से मुँह निकाल कर दोनों बाप बेटी को देखने की कोशिश की तो देखकर उसका मुँह खुला का खुला रह गया।


महेन्द्र ने चुपके से देखा कि कैसे उसके ससुर ने अपनी बेटी को दबोच रखा है जैसे कोई शेर किसी कमसिन हिरन के बच्चे को दबोच के रखता है, दरअसल बिरजू पूरी तरह नीलम के ऊपर चढ़ गया था और उसका लन्ड जड़ तक नीलम की बूर में समाया हुआ था, नीलम तड़पती मचलती हुई बिरजू के नीचे सिसकते हुए पड़ी थी, थोड़ी देर चुप शांत पड़े रहने के बाद महेन्द्र ने जो देखा वो देखकर वो सन्न रह गया, नीलम ने अंधेरे में हल्का सा सिसकते हुए अपने दोनों हाँथ अपने बाबू की पीठ पर ले गयी और धीरे धीरे प्यार से सहलाने लगी, फिर उसने प्यार से अपने बाबू के बालों को सहलाया और धीरे धीरे दोनों हाँथ कमर से नीचे गाँड़ पर ले गयी और अपने बाबू की गाँड़ को अपनी बूर की तरफ बड़े प्यार से कई बार दबाया और दबाकर ये इशारा किया कि उसे उनका लन्ड अत्यधिक पसंद आया, इसका मतलब ये था कि बाबू आपका लंड मेरे पति के लंड से कहीं ज्यादा आनंददायक और रसीला है और मुझे यह भा गया, इतना ही नही नीलम ने अपने बदन को और मोड़कर अपने हाँथ को और नीचे लेजाकर सिसकते हुए अपने बाबू के दोनों बड़े बड़े लटकते हुए आंड मस्ती में भरकर हल्का हल्का कराहते हुए सहलाने लगी, ये एक स्त्री का अपना मनपसंद पुरुष प्राप्त करने के बाद अपनी खुशी जाहिर करने का तरीका था कि उस पुरुष का साथ उसका लंड उसे स्वीकार है, वो उससे चुदना चाहती है।

महेन्द्र ये देखकर एक अजीब सी गुदगुदी अपने अंदर महसूस करने लगा और चादर के अंदर ही अपना लंड हल्का हल्का हिलाने लगा, न जाने कौन सा आनंद उसे अपनी ही पत्नी को अपने पिता से चुदवाते हुए देखकर मिल रहा था।

महेन्द्र ने फिर देखा कि कैसे बिरजू ने नीलम के इस तरह उसे कबूल करने पर, उसके लंड की लज़्ज़त को स्वीकार करने पर, अपना आधा लंड बूर में से निकाल कर फिर दुबारा गच्च से बूर में घुसेड़ दिया तो इस बार नीलम के मुँह से न चाहते हुए भी निकल ही गया- ओह बाबू.....आपका लंड.....जरा धीरे घुसाइये।

आखिर नीलम भी कब तक चुप रहती वासना की आग में वो भी कब से जल रही थी

बिरजू ये सुनकर नीलम को बेताहाशा चूमने लगा और नीलम जोर जोर कराहने सिसकने लगी, नीलम भी अपने बाबू के सर को पकड़कर दनादन जहां तहां चूमने लगी, काफी देर तक दोनों एक दूसरे को चूमते रहे, नीलम से रहा नही गया तो उसने कह ही दिया- बाबू आप बहुत अच्छे हो।

बिरजू- आह मेरी बच्ची तू भी बहुत रसीली है......बहुत रसीली, ऐसा सुख मुझे आजतक नही मिला।

बिरजू का समूचा लन्ड महेन्द्र के वीर्य से सन चुका था।

नीलम ने धीरे से सराहा- बाबू

बिरजू- हाँ मेरी बच्ची

नीलम- अपना वो बहुत मोटा और लंबा है

(नीलम ने ये जानबूझकर महेन्द्र को सुनाने के लिए कहा)

बिरजू- वो क्या मेरी बेटी?

नीलम ने कराहते हुए कहा- आप समझ जाइये न बाबू?

बिरजू- मुझे नही समझ आ रहा तू बता न मेरी बच्ची।

नीलम ने कुछ नही बोला तो बिरजू ने दुबारा पूछा- बोल न नीलम....मेरी प्यारी बच्ची......बाबू का क्या अच्छा है।

नीलम - वो

बिरजू ने लन्ड से एक गच्चा बूर में मारा तो नीलम फिर कराह उठी और बिरजू बोला- बोल न बेटी.......तेरे मुँह से सुनकर ही शुरू करूँगा।

नीलम ने फिर शर्माते हुए बोला- आपका लंड

बिरजू- हाय मेरी बच्ची.......सच

नीलम- हाँ बाबू......बहुत रसीला है.......उसका आगे का भाग....उसका मुँह कितना चिकना है और बड़ा है इस वक्त मेरी बूर में कितने अंदर तक घुसा हुआ है।

बिरजू- तेरी वो भी तो कितनी रसीली और नरम नरम है।

नीलम - वो क्या बाबू?

बिरजू- वही जहां से मेरा नाती पैदा होगा?

नीलम- कहाँ से पैदा होगा बाबू.....बोलो न

बिरजू- मेरी बच्ची की बूर से, मेरी बेटी की चूत से।

नीलम ये सुनकर मस्ती में मचल गयी और बिरजु को "ओह मेरे बाबू" अपने मेरी इच्छा पूरी कर दी, करो न बाबू अब

महेन्द्र ने देखा कि कैसे उसके ससुर ने अपनी बेटी की चूचीयों पर से चादर हटा के उसको निवस्त्र कर दिया और नीलम ने रात के अंधेरे में उनका पूरा साथ दिया, महेन्द्र की आंखों के सामने अंधेरे में भी नीलम की दोनों विशाल चुचियाँ जोश के मारे तनी हुई थी अंधेरे में उनकी तनी हुई आकृति देखकर, उनका फूला हुआ आकार देखकर महेन्द्र का लंड मारे जोश के तन्नाया हुआ था, दोनों निप्पल कितने कड़क हो चुके थे ये साफ दिख रहा था, और अब कितनी बेशर्मी से नीलम खुद अपनी दायीं चूची को पकड़कर कराहते हुए अपने सगे बाबू के मुँह में चूसने के लिए दे रही थी।

बिरजू पागलों की तरह अपनी सगी बिटिया की मदमस्त फूली फूली गुदाज चूचीयों को मुँह में भर भर के बारी बारी पीने लगा और नीलम जोर जोर से मचलते हुए उन्हें बड़े प्यार से उनका सर सहलाते हुए अपनी चूचीयों पर दबाने लगी, नीलम खुलकर अब सिसकने लगी थी, तेज तेज अपने बाबू के सर को और पीठ को सहलाते हुए उन्हें बारी बारी से अपनी चूचीयाँ परोस परोस के निप्पल पिलाने लगी, महेंद्र ने चुपके से साफ देखा कि कैसे नीलम ने रुककर अपनी एक चूची अपने हांथों में ली और कितने प्यार से अपनी बाबू के मुँह में डाल दी।

इतना जोश महेन्द्र को अपने जीवन में कभी नही चढ़ा था, एक सगे बाप बेटी का मिलन वो अपनी आंखों से देख रहा था और न जाने क्यों उसे ये रोमांचित कर रहा था।

बिरजु नीलम की चूचीयों को खूब जोर जोर से कराहते हुए दोनों हांथों से दबाने मसलने लगा और दोनों पलंग पर एक दूसरे को बाहों में लिए पलटने लगे, नीलम से अब बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो गया तो उसने आखिर बिरजू से धीरे से कहा- बाबू

बिरजू- हाँ मेरी बच्ची

नीलम- पेलिये न अब......अब चोद दीजिए मुझे.......अपनी बच्ची को

बिरजू ये सुनकर फिर वासना से और भर गया और उसने बगल में रखा तकिया उठाया और उसको नीलम की गाँड़ के नीचे लगाने लगा नीलम ने अच्छे से गाँड़ उठा कर पूरा सहयोग किया।

नीलम की गाँड़ ऊपर उठने से बूर और ऊपर उठकर ऊपर को उभर गयी फिर बिरजू ने कस के एक तेज धक्का मारा तो नीलम दर्द से सिरहते हुए बोली- बस बाबू.....बहुत अंदर तक जा चुका है......अब चोदिये मुझे.....बर्दाश्त नही हो रहा है मुझे.....मर जाउंगी मैं........मेरी प्यास बुझा दीजिए........तृप्त कर दीजिए अपनी बच्ची को अपने लन्ड से।

नीलम का इतना कहना था कि बिरजु ने अपने दोनों हाँथ नीचे ले जाकर नीलम की चौड़ी गाँड़ के दोनों मांसल पाटों को थाम कर हल्का सा और उठा लिया जिससे नीलम का बदन अब किसी धनुष की तरह मुड़ गया था, पर उसे मजा बहुत आ रहा था, तेज दर्द में भी असीम सुख की अनुभूति उसे हो रही थी।

बिरजू ने नीलम के होंठों को चूमते हुए धीरे धीरे बूर में धक्का मारना शुरू किया, नीलम ने भी अपने बाबू के होंठ चूसते हुए कस के उन्हें बाहों में भरकर अपने पैरों को अच्छे से उनकी कमर से लपेट दिए।

अभी धीरे धीरे ही बूर में धक्के लग रहे थे कि इतने से ही नीलम को असीम आनंद आने लगा और वो सातवें आसमान में उड़ने लगी, उसे अपनी बूर में अपने ही सगे पिता के लन्ड का आवागमन इतना प्यारा लग रहा था कि वो सबकुछ भूलकर लन्ड में ही खो गयी, लन्ड के ऊपर फूली हुई मोटी मोटी नसें कैसे बूर की अंदरूनी मांसपेशियों से रगड़ खा रही थी, कैसे उसके बाबू के लन्ड का मोटा सा सुपाड़ा बार बार बूर की गहराई में अंदर तक बच्चेदानी पर ठोकर मारकर उसे गनगना दे रहा था, कैसे उसके बाबू चोदते वक्त बीच बीच में अपनी गाँड़ को गोल गोल घुमा घुमा कर लन्ड को आड़ा तिरछा बूर में कहीं भी पेल दे रहे थे जिससे नीलम जोर से सिसक जा रही थी।

बिरजू अब थोड़ा तेज तेज धक्के मारने लगा, नीलम का समूचा बदन तेज धक्कों से हिल जा रहा था, नीलम की आंखें असीम आनंद में बंद थी और वो परमसुख की अनुभूति और रसीले धक्कों की कायल होकर " आह.... बाबू....ऊई मां.....उफ़्फ़फ़फ़.....आह.....ऐसे ही बाबू........तेज तेज बाबू........पूरा पूरा डालो न........हाँ ऐसे ही........अपने दोनों हांथों को मेरी पीठ के नीचे ले जाकर कस के आगोश में लो न बाबू मुझे.........हाँ ऐसे ही.......गोल गोल घुमा के गच्च से पेलो न बूर में.. ....हाँ बिल्कुल ऐसे ही..........आआआआहहहह.......और पेलो बाबू....ऐसे ही........मारो मेरी चूत बाबू.......अपनी बच्ची की चूत मारो......आखिर चूत तो मारने के लिए ही होती है........तेज तेज करो.........कितना अंदर तक जा रहा है अब आपका लंड........... मेरी बच्चेदानी को हर बार चूम कर आ रहा है मेरे सपनों का लन्ड.........चोदो बाबू मुझे......ऐसे ही.......हां..... ऊऊऊऊऊईईईईईईईईई......... मां....... कितना तेज धक्का मारा इस बार.......थोड़ा धीरे बाबू........हाय मेरे बाबू।


अत्यधिक जोश में नीलम ऐसे ही बोले जा रही थी, अब वो बिल्कुल खुल चुकी थी उसे अब ये भी होश नही था कि बगल में महेंद्र लेटा हुआ चादर के अंदर से सब देख रहा है, और खुद महेन्द्र नीलम को अपने पिता से चुदवाते हुए देखकर अपना लन्ड हिलाकर एक बार और झड़ चुका था।

बिरजू बीच बीच में रुककर अच्छे से अपनी गाँड़ को गोल गोल घुमाकर अपने मोटे लन्ड को बूर में गोल गोल बूर के किनारों पर रगड़ने की कोशिश करता था जो नीलम को बहुत पसंद था वो अपने बाबू के इसी हरकत की कायल थी, जब भी बिरजू ऐसा करता नीलम जोर जोर से अपनी गाँड़ नीचे से उछाल उछाल के अपने बाबू की ताल में ताल मिलाती और रसभरी चुदाई का भरपूर मजा लेती।

बिरजू का लन्ड इतना जबरदस्त नीलम की बूर को चीरकर उसमे घुसा हुआ था कि नीलम की बूर किसी रबड़ के छल्ले की तरह लन्ड के चारों ओर फैलकर चिपकी हुई थी।

बिरजू के धक्के अब बहुत तेज हो चले थे पूरी पलंग हल्का हल्का चरमरा रही थी, जहां पहले शर्म और लज़्ज़ा कि वजह से बड़ी मुश्किल से सिसकियां निकल रही थी वहीं अब पूरा कमरा तेज तेज चुदाई के आनंद भरे सीत्कार से गूंज उठा था, चुदाई की फच्च फच्च की आवाज वासना को और बढ़ा दे रही थी, तेज तेज धक्कों से दोनों बाप बेटी की अंदरूनी जाँघों की टकराने की थप्प थप्प की आवाज अलग ही आनंद दे रही थी।

इतनी तेज तेज वहशीपन से भी बूर को चोदा जाता है ये नीलम आज महसूस कर रही थी और इस वहशी और जंगलीपन चुदाई का तो अनोखा ही मजा था, और बगल में लेटा कोई देख रहा है ये रोमांच अलग ही सुरसुरी बदन में पैदा कर रहा है।

बिरजू अब पागलों की तरह बहुत तेज तेज हुमच हुमच कर अपनी कमसिन सी बेटी की बूर में अपना वहशी लन्ड पेलने लगा और नीलम को इससे अथाह आनंद आने लगा, नीलम जोर जोर से कराहते और हाय हाय करते हुए नीचे से अपनी गाँड़ तेज तेज उछालने लगी, दोनों बाप बेटी अब मदरजात नंगे पलंग पर एक दूसरे में समाए हुए थे, चादर अस्त व्यस्त होकर बदन से हट चुका था, बाहर घनघोर बारिश होने लगी थी, काफी देर तक बिरजू दनादन अपनी बेटी की चूत मारता रहा, तभी तेज बिजली कड़की और एक बार फिर पूरे कमरे में रोशनी फैल गयी, एकाएक नीलम और बिरजू ने एक दूसरे को देखा और दोनों वासना में मुस्कुरा उठे नीलम ने मारे शर्म के अपना चेहरा अपने बाबू के सीने में छुपा लिया, तभी न जाने क्यों बिजली कई बार चमकी, कभी धीरे कभी तेज, कभी बहुत तेज, इस दौरान नीलम और बिरजू ने एक दूसरे को आपस मे चुदाई करते हुए अच्छे से देखा और नीलम बार बार शर्मा गयी, बिरजू कस कस के अपनी शादीशुदा बेटी की चूत मारते हुए उसके होंठों को अपने मुंह में भरकर पीने लगा, नीलम के बदन में एक सनसनाहट सी होने लगी, उसकी रसीली बूर की गहराई में तरंगे उठने लगी, किसी का होश नहीं रहा उसे अब, नीचे से खुद भी गाँड़ उछाल उछाल के अपने पिता से अपनी चूत मरवा रही थी, तभी बिरजू ने अपनी जीभ नीलम के मुँह में डाली और जैसे ही तेज तेज धक्के चूत में मारते हुए अपनी जीभ नीलम के मुंह में घुमाने लगा नीलम जोर से कराहती हुई गनगना के अपनी गाँड़ को ऊपर उठाते हुए अपनी बूर में अपने बाबू का लंड पूरा लीलते हुए झड़ने लगी, उसकी बूर से रस की धार किसी बांध की तरह टूटकर बहने लगी, उसकी बूर अंदर से लेकर बाहर तक संकुचित होकर काम रस छोड़ने लगी, उसकी बूर की एक एक नरम नरम मांसपेशियां मस्ती में सराबोर होकर मानो अपने बाबू के लन्ड से लिपटकर उसका धन्यवाद करने लगीं, गनगना कर वो बहुत देर तक अपने बाबू से लिपटकर हांफती रही, काफी देर तक उसकी बूर झड़ती रही, इतना सुख सच में आज पहली बार उसे मिला था। बिरजू का लन्ड अभी भी नीलम की चूत में डूबा हुआ था, वो नीलम को अपने आगोश में लिए बस प्यार से चूमे सहलाये जा रहा था, बिजली अब भी हल्का हल्का कड़क रही थी, बारिश हो रही थी, अब बिरजू से भी बर्दाश्त नही हो रहा था उसके लन्ड की नसें भी मानो जोश के मारे फटी जा रही थी।

थोड़ी ही देर के बाद जब नीलम की उखड़ती साँसे कुछ कम हुई बिरजू ने अपने लंड को अपनी बेटी की चूत से बाहर खींचा और गच्च से दुबारा रसीली चूत में डाल दिया नीलम फिर से गनगना गयी लेकिन अब बिरजू कहाँ रुकने वाला था अपनी बेटी को उसने फिर अपने आगोश में अच्छे से दबोचा और जमकर उसकी चूत मारने लगा नीलम बेसुध सी हल्का हल्का सिसकते हुए अपनी कमसिन सी चूत फिर से अपने बाबू से मरवाने लगी, तेज तेज धक्के मारते हुए अभी दो तीन ही मिनिट हुए होंगे कि बिरजू भी अपनी बेटी की नरम चूत की लज़्ज़त के आगे हार गया और तेज तेज कराहते हुए झड़ने लगा "ओह मेरी बच्ची कितनी मुलायम और नरम चूत है तेरी......आआआआआहहहहह.......इतना मजा आएगा अपनी बेटी को चोदकर........उसकी चूत मारकर......ये कभी सपने में भी नही सोचा था.......आह मेरी बच्ची......चूत इतनी भी नरम और लज़्ज़त भरी होती है आज तेरी चूत मारकर आभास हुआ मेरी बच्ची.......आह

नीलम ने बिरजू को चूमते हुए अपनी बाहों में भर लिया और बिरजू मोटी मोटी वीर्य की गरम गरम धार नीलम की चूत में उड़ेलते हुए उसपर जोर जोर से हांफते हुए लेट गया, नीलम की बूर अपने बाबू के गरम गरम गाढ़े वीर्य से भर गई, नीलम अपने बाबू का गाढ़ा गर्म वीर्य अपनी बूर की गहराई में गिरता महसूस कर गुदगुदा सी गयी, दोनों बाप बेटी अपनी उखड़ी सांसों को काबू करते हुए एक दूसरे को बेताहाशा चूमने लगे, बाहर तेज बारिश लगातार हो रही थी, कभी तेज बिजली चमकती तो दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते, बिरजू ने बड़े प्यार से नीलम के चेहरे को अपने हांथों में लिया और होंठों को चूमते हुए बोला- मेरी बच्ची.......आज कितना अनमोल सुख दिया तुमने अपने पिता को।

नीलम ने भी प्यार से अपने बाबू के होंठों को चूमा और बोली- मेरे प्यारे बाबू.....अपने भी तो अपनी बच्ची को तृप्त कर दिया अपने मोटे लन्ड से।

महेन्द्र चादर में मुंह ढके दोनों को देखता रहा।
ahh dhoti side me rakh kar

daamaad ke samne hi apni beti ko ahh..
 
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