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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

jaggi57

Abhinav
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Shandar update he Bhai,

Ab kapti Raja ka ant hona he........lekin in sabme se kuch log bach jayenge aur Yagnesh ki musibate aur badhayenge

Keep posting Bhai
thank you so much Bhai aapke is Shandar review ke liye 👌👌👌
Sahi kaha hai aapane Sujan Singh ka hashra aapko agale kuch update mein dekhne ko milega💥💥

bus aise hi sath banae rakhen🙏💐💐
 

jaggi57

Abhinav
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अध्याय -- 6

महामंत्री विरुपाक्ष -- वाह महाराज वाह आपने क्या खूब जाल बिछाया है , आज तो उस याग्नेश की कहानी खत्म आपके रची हुए व्यू का सामना याग्नेश तो क्या संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी नहीं कर सकता , इसलिए तो मैं कहता हूं कि आप ही हमारे भगवान हैं सर्वश्रेष्ठ हो।।

अभी यहां यह लोग बातें कर ही रहे थे के ताभी महल के मुख्य द्वार से एक जोरदार धमाके की आवाज आई
ऽऽधडाम् 💥💥💥💥💥

अब आगे --------------

वहां महल के द्वार के भीतर काले वस्त्रों में हजारो सशस्त्र सैनिकों की दो दुकड़िया किसी भी प्रकार के हमले के लिए सज्ज थी उन दो टुकड़ियों की अगवाई दो घुड़सवार सेनानायक कर रहे थे।

यहां याग्नेश जब महल के द्वार पर पहुंचा तब उसने सबसे पहले काली शक्तियों के कवच से अपने आप को सुरक्षित कर लिया।

उसके पश्चात उसने अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करके अपने नेत्र खोलें , उसके नेत्रों से नीले रंग की तीव्र किरणें निकली जिसके लगते ही महल का मुख्य प्रवेश द्वार एक बड़े धमाके के साथ ध्वस्त हो गया।
द्वार के साथ-साथ उसके निकट खड़े हुए द्वार पर तैनात सैनिकों के भी परखच्चे उड़ गए।

याग्नेश ने मुख्य प्रवेश द्वार के ध्वसत होते ही जैसे अपना पहला पग भीतर रखा वैसे ही वहां का मौसम अचानक बदलने लगा तारों से टीमटीमाता आकाश भयंकर काले मेघो से भर गया बिजलिया चमकने लगी और घोर गर्जना होने लगी जिससे वहां का मौसम और भी भयावह हो गया।

अचानक आए हुए मौसम में इस बदलाव को देखकर और टूटे हुए द्वार की और वहां पहरे पर मौजूद सैनिकों की दुर्दशा देखकर सेना की दोनों टुकड़ियों में भय उत्पन्न हो गया उनकी नजर सामने खड़े काले चोंगे खड़े आचार्य याग्नेश पर पड़ी जो आज किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

सैनिकों के भीतर पनपते डर को देखकर उनके सेनानायक ने अपने सेना ढाढस बंधाने के लिए जोर से गर्जना करते हुए कहा

सेनानायक -- देव नगर के सेना के शूरवीरो इस माया को देखकर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है , मत भूलो कि तुमने अपने पिछले युद्धो मे ऐसे कई परिस्थितियों का सामना वीरता पूर्वक किया है, मत भूलो कि हमारे देवता गजेंद्र का आशीर्वाद सदैव हम पर है इस हत्यारे याग्नेश के छोटे मोटे जादू के प्रयोग देखकर भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आज हम अपने देवता गजेंद्र के अपराधी को दंड देकर उसका शीश काटकर अपने देवता को अर्पण करेंगे इसलिए सज्ज हो जाओ और घेर लो इसे----
अपने सेनानायक की बात सुनकर सभी सैनिकों के भीतर का डर चला गया और दोनों सेना की टुकड़ियों ने याग्नेश को घेर लिया।

अपने आप को उन सैनिकों द्वारा घेरे जाने को देखकर याग्नेश गोर गर्जना करते हुए बोला

याग्नेश-- हट जाओ तुम सब तुम सब से मेरी कोई शत्रुता नहीं है यदि अपने प्राणों की रक्षा करना चाहते हो मेरे सामने से हट जाओ यह मेरी तुम सबके लिए अंतिम चेतावनी है।

सेनानायक -- लगता है अपने समक्ष मृत्यु को देखकर तुम भयभीत हो गए हो याग्नेश, इसीलिए व्यर्थ का प्रलाप कर रहे हो अब अपनी मृत्यु के लिए सज्ज हो जाओ।

सैनिकों देख क्या रहे हो समाप्त कर दो इसे आक्रमण-----

सेनानायक के इतना कहते ही दोनों टुकड़ियों के प्रथम श्रेणी में खड़े हुए सारे सैनिक अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।

उन्हें अपनी ओर बढ़ते हुए देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक क्रुर मुस्कान उमर आई

याग्नेश - मेरी चेतावनी को प्रलाप समझने वालो अब तूम सब मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ

इतना कहते हुए याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए जिनमें से एक साथ सैकड़ों नुकीली चकरिया निकाल करो 9 सैनिकों के शरीर में प्रवेश कर गई और इसके साथ ही उन सब की दर्दनाक चीखें वहां गूंजने लगी देखते ही देखते हम सैनिकों के शरीर के टुकड़े कट कट कर जमीन पर गिरने लगे

अपने साथियों सैनिकों की यह दुर्दशा देखकर पीछे खड़े सभी सैनीक भय के मारे कांपने लगे

अपने सैनिकों की मना स्थिति को समझते हुए दूसरा सेनानायक सैनिकों का ढाडस बंधाते हुए बोला

" इस प्रकार भयभीत होने से कुछ नहीं होने वाला मत भूलो कि तुम इस समय युद्ध भूमि में हो अपनी उर्जा को एकत्रित करो और वार करो"
इतना कहकर उस सेनानायक ने अपने सैनिकों की तरफ कुछ इशारा किया जिसे वह बखुबी समझ गये

सभी सैनिकों ने अपनी उर्जा को एकत्रित किया और अपने शस्त्रों को याग्नेश की ओर कर दिया याग्नेश अभी कुछ समझ पाता तभी उन सभी सैनिकों के शस्त्रों से उर्जा कीरणे निकलकर एक हो गई और बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश को जाकर लगी

याग्नेश को उन सैनिकों से इस प्रकार के हमले की कोई आशंका नहीं थी यह सब कुछ ही पलों में हुआ जिससे याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह ऊर्जा किरण बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश के सीने में जाकर लगी।

काली शक्तियों के कवच के कारण यह वार याग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाया परंतु इसकी तीव्रता के कारण वह पीछे की ओर कुछ कदम लड़खड़ा या परंतु फिर संभल कर खड़ा हो गया।

यहां सैनिक फिर से अपने अगले वार करने की तैयारी में लग गए और फिर एक बार ऊर्जा किरण चमकी और याग्नेश की तरफ बढ़ी याग्नेश ने उस वार को रोकने के लिए अपने हाथ आगे किए

अभी वह इस बार को रोकता के तभी किले की दीवार पर तैनात धनुर्धर ओके धनुष से एक साथ सैकड़ों तीर साए साए करते हुए याग्नेश की तरफ बढ़े

यह दो तरफा हमला जितनी तीव्रता के साथ हुआ था यदि याग्नेश की जगह कोई और होता तो उसकी जीवन लीला यहीं समाप्त हो जाती

परंतु याग्नेश भी कोई कम नहीं था उसने एक हाथ से अपनी ऊर्जा प्रकट करके सैनिकों की उर्जा के वार को रोक दिया था और दूसरे हाथ की ऊर्जा से उन तीरों का रुख शत्रु सेना की ओर ही मोड़ दिया जिससे सैकड़ों चीखें एक बार फिर वहां गुंजायमान होने लगी।

धनुर्धर द्वारा किए गए वार को समझने और रोकने के लिए याग्नेश को जितना समय लगा इतने समय में कुछ तीर याग्नेश को भी आकर लगे काली शक्ति की उर्जा के घेरे में होने के कारण वह तेरी अग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाए परंतु फिर भी हल्के हल्के घाव तो दे ही गये।

याग्नेश के लिए एक आश्चर्य की बात थी के उन साधारण धनुर्धर ओके तीर उसके काली शक्ति की उर्जा के घेरे को कैसे भेज सकते हैं परंतु अभी समय सोचने का नहीं था वार करने का था

याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाएं और कुछ मंत्र बुदबुदाया इसके साथ ही उसकी आंखें चमकने लगी और आकाश से बिजली की तरंगे उन सैनिकों पर पड़ने लगी उनकी दर्दनाक चीखें एक बार फिर वहां गूंजने लगी।

अपने सैनिकों की ऐसी दुर्दशा देखकर एक सेनानायक ने अपने घोड़े को संपूर्ण गति के साथ याग्नेश की ओर दौडाया, वायु की सी गति के साथ याग्नेश की दाई ओर जोर से टकराया ।

याग्नेश का ध्यान पूरी तरह से सैनिकों पर था। टक्कर का वेग इतना था कि याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह दाई और कुछ दूर जाकर गिरा।

परंतु इससे वह सेनानायक और उसका घोड़ा बच नही पाये, वहा याग्नेश की विद्युत उर्जी के कारण पूरी तरह से झुलस गये ।

इस अप्रत्याशित हमले के कारण याग्नेश का क्रोध अब बहुत बढ़ गया था उसकी आंखें अंगार उगलने लगी थी अब तक इस युद्ध को वह सहजता से ले रहा था।

परंतु अब नहीं--- उसने अपने दोनो हाथ आकाश की ओर फैलाए और काली शक्ति के प्रचंड समूल प्रणांनतक ऊर्जा का आह्वान करने लगा यह एक ऐसा वार था, जो वहां उपस्थित संपूर्ण जीवधारी चाहे वह जीव जंतु हो या आकाश में उड़ने वाले पंछी सभी को पल भर में राख के ढेर में बदलने की क्षमता रखता था।

वहीं दूसरी ओर महल के भीतर जब राजा सुजान सिंह अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा कर रहे थे उसी समय मुख्य द्वार के ध्वस्त होने की ध्वनि ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

उस ध्वनि से राजा इतना तो समझ गया था मुख्य द्वार ध्वस्त हो गया है और उसका सबसे बड़ा शत्रु याग्नेश जिसके आने की वह प्रतीक्षा कर रहा था वह आ चुका है।

सुजान सिंह को अपनी योजना पर पूरा भरोसा था उसे यकीन था के आज वह याग्नेश नाम के इस कांटे को जड़ से उखाड़ फेंकेगा।

सुजान सिंह -- चलो साथियों जिस पल की हमें प्रतीक्षा थी वह सन्मुख है चलो जरा अपने बाल सखा का स्वागत तो कर ले
सेनापति जी, युद्धवीर सिंह, राजगुरु जी चलो अपनी योजना को मूर्त रूप देने का समय आ गया है परंतु ध्यान रहे जरा सी भी चूक भयंकर परिणाम को निमंत्रण दे सकती है।

इतना कहकर राजा सुजान सिंह और साथ ही साथ सभी महल से निकलकर मुख्य द्वार की दिशा में बढ़ चले जहां से अभी सैनिकों की दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थी।

यहां याग्नेश लगभग प्रणांतक ऊर्जा का आह्वान कर चुका था, जिसका असर उसके प्रयोग करने से पूर्व ही सैनिकों पर दिखाई देने लग गया था , उस अस्त्र के प्रभाव से कई दुष्ट आत्माए वहां प्रकट हो गई थी जो अस्त्र के प्रयोग होते ही वहां मौजूद सभी शरीर धारियों के प्राणों को सोख लेने के लिए तत्पर थी उनकी डरावनी आवाजें वहां के वातावरण को और भी भयावह बना रही थी।

युद्ध भूमि में अपने साथियों के कटे हुए शव और बहते हुए रक्त को देखकर सैनिक पहले ही भयभीत थे अपने किसी भी वार का याग्नेश पर कोई भी असर ना होता हुआ देखकर हताश भी थे और रही सही कसर इस भयंकर अस्त्र के आवाहन से प्रगट हुई दुष्ट प्रेत आत्माओं की ध्वनि ने पूरी कर दी अब उन सब को अपनी मृत्यु स्पष्ट नजर आने लगी थी।

याग्नेश ने एक नजर बची हुई शत्रु सेना पर डाली और अपने आव्हान किए हुए अस्त्र का प्रयोग करने ही वाला था के एक श्वेत ऊर्जा का बड़ा सा गोला उस अस्त्र की काली शक्तियों की ओर जा से टकराया और देखते ही देखते जितने भी दुष्ट आत्माएं वहां प्रकट हुई थी सभी पल भर में लुप्त हो गई।

अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी

" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "

इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई

आज के लिए इतना ही -----अगला अपडेट शीघ्र ही-------
सभी पाठकों से निवेदन हैं इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें आपके सहयोग का अभिलाषी -----

आपका मित्र ------- अभिनव 🔥
 

Naik

Well-Known Member
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अध्याय- 2

ये थे आचार्य यग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे।
इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

अब आगे ---

कोई एक घंटे बाद, आचार्य अपनी घोड़े पर पूर्व की ओर दौड़ते हुए, पहाडी रस्तो से होते हुए मैदानी इलाकों में पहुचे, अब तक उनका क्रोध थोडा ठंडा हो गया था।

परंतु एक प्रश्न उनके मन में अभी भी चल रहा था की, आखिर क्यों उनके साथ ऐसा हुआ उनके परिवार ने पीढीयो से देवताओं की पूजा की थी , अपना सारा जीवन लोक कल्याण और लोगों की भलाई में लगाया था , फिर भी उन्हें क्या प्राप्त हुआ ।

अपने बीते जीवन के बारे में सोचते सोचते उनके मन में देवताओं के प्रति घृणा और प्रबल हो गई।

दूर आगे ऐसे ही चलते चलते वो उस जगह पहुंचे जहां कभी बचपन में अपनी छोटी बहन के साथ बैठकर पूरे शहर को देखते थे वह एक टीला था जहां से पूरा नगर दिखाई देता ,

इस समय देवनगर की ऊंची-ऊंची दीवारों के ऊपर सैकड़ों मशाले जल रही थी , जो आकाश मे चमकने वाले तारों की भांती लग रहे थे। इस शहर को देखते देखते ही यग्नेश बडा हुआ था ।

आचार्य वही उस टीले पर आंख बंद करके लेट गए और अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगे।

यह रहा देव नगर शहर जो भौगोलिक दृष्टि से उसका क्षेत्रफल किसी बडे राज्य से कम नहीं था ऐसे ही 5 और शहर मिलाकर बनती है यहां की सभ्यता , जो आज भी आधुनिक समाज और सभ्यता से कटी हुई है , या यु कहो के कोई अदृश्य आयाम इसे बाकी पृथ्वी से अलग बनाए हुए हैं ।

पृथ्वी पर रहते हुए भी इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है जो इसी पृथ्वी पर मौजूद किसी अलग आयाम में स्थित हैं।
चारों ओर से पर्वतों से घिरे हरे भरे बाग बगीचे झरने तलाब और अद्भुत जड़ी बूटी से सुसज्जित यहां के घने वन, अद्भुत शिल्पकला, इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है।

यह नगर देवनगर के नाम से विख्यात था। यह नगर चारों ओर से छोटे छोटे मंदिरों से सुसज्जित था और नगर के मध्य में यहां के मुख्य देवता गजेंद्र का विशाल मंदिर था और साथ ही एक बड़ा आश्रम था।

इस मंदिर और आश्रम के आचार्य की बड़ी गरिमा थी यहां आचार्य देवता का प्रतिनिधि मानकर देव तुल्य ही सम्मान देते थे उनका हर आदेश यहां की प्रजा के लिए देवता का ही आदेश माना जाता था।

तीन पीढ़ियों से आचार्य याग्नेश के परिवार के सदस्य ही यहां के आचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे पहले याग्नेश के दादा अग्निवेश यहां के आचार्य बने और उनके बाद याग्नेश के पिता आचार्य विग्नेश ने यहां का पदभार संभाला

जब याग्नेश के दादा की मृत्यु हुई थी तभी याग्नेश बहुत छोटा था परंतु आज भी वह वो दिन नहीं भूल पाया था जिस दिन उसके दादा की मृत्यु हुई थी।

यग्नेश अपने दादा से बहुत प्रेम करता था बिना दादा से मिले उसके दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती थी रोज की तरह इस दिन भी प्रातः वह अपने दादा से मिलने उनके कक्ष में गया

अपने दादा के कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे वह दो चार कदम आगे बढ़ा तो सामने का दृश्य देखकर वह स्तंभित हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई सांसे तेज चलने लगी दिल जोरो से धड़कने लगा सामने उसके दादा का क्षत-विक्षत शव पड़ा हुआ था, उनके शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव से रिस्ता लाल रक्त और सीने में गड़ा हुआ एक बड़ा सा खंजर उस दृश्य को और भी भयावह बना रहा था।

अपने प्यारे दादा को ऐसी स्थिति में देखकर याग्नेश को गहरा सदमा लगा उसके मुख से एक जोरदार चीख निकली और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा , उसकी आवाज सुनकर कक्ष के बाहर मौजूद आश्रम के शिष्य कक्ष के भीतर आए कक्ष के भीतर का भयावह दृश्य देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई ।

अपने प्यारे आचार्य को इस स्थिति में देखकर सबकी आंखों में आंसू आ गए सब क्रंदन करने लगे इस दुखद घटना की सूचना जब विग्नेश तक पहुंची तब वह तुरंत वहां पहुंचा ।

एक तरफ अपने पिता का क्षत-विक्षत शव और दूसरी तरफ नन्हा याग्नेश बेहोश स्तिथी में विग्नेश के नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगे उसने अपने पिता को कई बार पुकारा परंतु उस पुकार का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला।

अपने पिता के बाद उसके कंधे पर आने वाली आश्रम की जिम्मेदारियों को वह जानता था , इसलिए उसने अपने ह्रदय को कठोर किया और अपने पिता के शव को उठाकर उनके आसन पर लिटा दिया ।

तभी वहां कोलाहल शुरू हुआ जब आश्रम के शिष्यों ने वहां मौजूद ऊंचे आसन की तरफ देखा जहां उनका दिव्य क्रिस्टल रखा हुआ होता था उस क्रिस्टल को वहां ना पाकर सभी भयभीत हो गए क्योंकि क्रिस्टल के वहां ना होने का अर्थ था उनके नगर का विनाश।

विग्नेश अभी अपने पिता की मृत्यु के बारे में ही विचार कर रहा था के नगर के विनाश के भय ने भी उसके हृदय को घेर लिया उसने वहां मौजूद सभी को शांत रहने का परामर्श दिया और क्रिस्टल वापस लाने का आश्वासन दिया।

आश्रम के बाकी शिष्य विग्नेश का बड़ा आदर करते थे , इसलिए उसकी बात मानकर सब शांत हो गए विग्नेश ने उन सब को अपने पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी करने को कहां और सभी को कक्ष से बाहर भेज दिया।

सभी के कक्ष के बाहर जाने के बाद विग्नेश उस पक्ष में कुछ ढूंढने लगा, वह अपने पिता को अच्छी तरह जानता था ,उसे पता था कि मृत्यु से पूर्व का उसके पिता ने कुछ ना कुछ क्रिस्टल के बारे में निशान छोड़े होंगे।

ढूंढते ढूंढते उससे एक जगह रक्त से बने हुए कुछ चिन्ह मिले जिन्हें देखकर वह समझ गया कि उसके पिता ने वह क्रिस्टल कहां रखा हुआ है शायद उसके पिता को इस स्थिति का पूर्व अंदेशा था इसलिए उन्होंने विग्नेश को कई तरह के गुप्त चिन्हों और आश्रम में पदासीन आचार्यों के रहस्य के बारे में सब कुछ बता दिया था।

वह अपने पुत्र की योग्यता को जानते थे और यह भी जानते थे, कि उनके बाद उनका पुत्र विग्नेश ही आचार्य के पद को संभालेगा
विग्नेश सबकी नजर बचाते हुए कक्ष में मौजूद पत्थर के चबूतरे के पास पहुंचा जहां उनके प्रमुख देवता गजेंद्र की प्रतिमा रखी हुई थी ।

उसने उस प्रतिमा को पहले प्रणाम किया फिर तीन बार उस प्रतिमा को घुमाया तभी उस पत्थर के चबूतरे के पीछे एक छोटा सा द्वार प्रगट हुआ विग्नेश उस द्वार में प्रवेश कर गया और नीचे की सीढ़ियां उतरते हुए वह वहां के गुप्त कक्ष में पहुंचा।

यह एक ऐसा गुप्त कक्ष था जिसके बारे में केवल आश्रम के पदासीन आचार्य को पता होता था , इस कक्ष में आश्रम का गुप्त खजाना और भी कई तरह की दिव्य जड़ी बूटियां और अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे ।

विग्नेश ने उस कक्ष में एक आसन पर रखे दिव्य क्रिस्टल की तरफ देखा उसने उस क्रिस्टल को लाल कपड़े में लपेटा और वापस उसी रास्ते से होकर अपने पिता के कक्ष में आया और क्रिस्टल को उसके यथा योग्य स्थान पर स्थापित कर दिया।

क्रिस्टल के वहां स्थापित होते वहां एक अदृश्य सुरक्षा घेरा प्रकट हुआ ।

विग्नेश ने क्रिस्टल के मिलने की सूचना आश्रम के बाकी शिष्यों तक पहुंचाई क्रिस्टल की मिलने की सूचना पाकर सभी का भय दूर हो गया उसके बाद ही था योग्य रीति से विग्नेश के पिता का अंतिम संस्कार किया गया।

जब तक याग्नेश को होश आया तब तक उसके दादा राख में बदल चुके थे अगले कई दिनों तक याग्नेश की स्थिति बड़ी विकट थी रोज रात को वह अपने दादा को पुकारता हुआ चीखता हुआ उठ जाता था , अपनी दादा की वह खुली आंखें और रक्तरंजित शव का दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।

परंतु कहते हैं ना कि समय गहरे से गहरे घावो को भर देता है याग्नेश के साथ भी ऐसी हुआ ।

परंतु उसके घाव पूरी तरह तो नहीं भर पाए , कभी-कभी आज तक ईतने वर्षो बाद , भी उसे उसके दादा के मृत्यु का वह दृश्य सपनों में उसे डराते है।

समय आगे बढता गया , वहा के राजा और आश्रम के अनुयायियो ने सर्वसम्मति से विग्नेश को वहां के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया।।

अपने अतीत के बारे मे सोचते हुए याग्नेश उस टीले पर लेटा हुआ था के तभी आकाश में बादलों की गर्जना की आवाज के कारण वह अपने अतीत से बाहर आया, उसने एक नजर नगर में टिमटिमाते हुए मशालों पर डाली और एक गहरी सांस छोड़ी।

उस नगर का राजा और कुटिल मंत्री राजगुरु शायद इस समय अपने महंगे घरों में सुरक्षित और गर्म होकर सोए थे।
गजेन्द्र के अनुयायिओं के कुलपतियों की कमी नहीं थी।

नगर के मध्य में स्थित वहां के देवता के मुख्य मंदिर के शिखर पर जब उसकी नजर पड़ी तो उसके जबड़े क्रोध के कारण भी कि गए आंखें लाल हो गई जिस गजेंद्र को उसकी कई पीढ़ियां और नगर के सभी लोग सदियों से देवता मानकर पूजते थे क्या वह सही में कोई देवता है या कोई शैतान

आखिर उसकी पूजा करके उन्हें क्या मिला दुख दर्द अपनों से जुदाई और हृदय पर गहरे घाव।

याग्नेश जानता था कि देवता उसी को कहते हैं जो सबको निस्वार्थ भाव से अपनी करुणा देता है , उसे नही जो अपने मानने वालो को ही दुःख दे ।

उसका मानना था के यहां का देवता जिसने नगर वासियों की और उसकी खुशियां छीनी है वो कोई देवता नही हो सकता ।

उसने देवता गजेन्द्र के विरुद्ध युद्ध का मानो बिगुल फुंक दिया था और इस राह पर चलते चलते कब वह मानव से दानव बन गया था उसे पता ही नही चला, आज वह शक्तिया प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने अपने ही लोगो की बलीया चढा चूका था ।

याग्नेश के पिता आचार्य विघ्नेश जिन्होंने सदैव ही अपने ज्ञान अपनी शक्तियों का उपयोग जनकल्याण और पीड़ितों रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया, उन्हें भी अपने परिवार को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा अपने परिवार की रक्षा करते करते स्वयं भी अनजाने बीमारी का शिकार हो गए थे ।

उनके पिता अजीब बीमारी से मरने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के पश्चात अपनी बीमार मां के प्राणों की रक्षा के लिए याग्नेश ने पिता से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग किया परंतु सभी प्रयास उसके विफल रहे उसने देवताओं के कई अनुष्ठान किए प्रार्थनाये कि , देवताओं ने भी उनके जीवन के कई वर्ष ले लिए ।

शुरुआत में, लगा यह सब प्रार्थनाये काम कर रही हैं , और वह कुछ स्वस्थ भी हो गई थी । परंतु पुनः बीमारी वापस आ गई और याग्नेश के माता को निगल गई ।

जीवन में इतना कुछ सहने के पश्चात भी याग्नेश की धर्म के प्रति श्रद्धा आस्था कम नहीं हुयी , वो अपना कार्य निरंतर करता रहा और इसी के फलस्वरूप अपने पिता के पश्चात वहां के अनुयायियों ने याग्नेश को वहा के आचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया।
जीवन चक्र का पहिया एक बार फिर घुमा, इस बार याग्नेश की बहने उस अनजाने रोग से ग्रसित हो गई थी।

वह किसी भी प्रकार अपने माता पिता की तरह अपनी बहनों को खोना नहीं चाहता था, चाहे उसे इसके लिए कुछ भी करना पड़े ।
याग्नेश इस रोग का समूल नाश करना चाहता था उसे भय था के कही उसकी पत्नी नीरजा और उसका नन्ना सा पुत्र देव भी कहीं इस रोग की चपेट में ना आ जाए।

आचार्य के पद पर रहते हुए आचार्य याग्नेश ने देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के शीघ्र उपायों के बारे में अध्ययन किया जहां उसे देवताओं के प्रति किए गए बलिदान विधि की एक प्राचीन प्रतिलीपी कीसी के द्वारा प्राप्त हुई ।

प्राचीन प्रतिलिपि में जीव बली के द्वारा देवताओं की शक्ति प्राप्त करने के कई अनुष्ठानों की विधियां लिखी हुई थी,
याग्नेश ने जब उसे पढ़ा तब उसे प्रथम उस बात पर विश्वास नहीं हुआ देवता कैसे किसी की बलि से प्रसन्न हो सकते हैं ।

परंतु प्रतिलिपि देने वाला भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था वह क्यों उसे इस प्रकार की प्रतिलिपि देगा जिसका कोई उपयोग ना हो इस प्रतिलिपि में लिखे गए अनुष्ठानों को पढकर उसे एक आशा की किरण नजर आई जिससे वह इस अनजाने रोग के भय से निजात पा सकता था।

बहुत सोच समझ कर उसने इस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया परंतु वह इस बात को भूल गया कि बलिदान अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने को कहते हैं।

याग्नेश ने पहला मानव बलिदान एक महिला का किया जो बेघर थी और प्रार्थना करने के लिए उसके मंदीर में आई थी।

उसने अपने निजी कक्ष में उस महिला को भोजन की पेशकश की और अपनी बहनों के लिए प्रार्थना की उसके पश्चात् उसने महिला को सम्मोहीत करके गला रेत कर उसकी बली चढा दी , इस उम्मीद में कि एक जीवन दूसरे को बहाल कर सकता है।

देवताओं ने इस दिए गए बलिदान को स्वीकार नहीं किया। उस दिन से, साधारण प्रार्थनाओं ने भी उनके लिए काम करना बंद कर दिया था।

वह अब दिव्य दृष्टि का उपयोग नहीं कर सकता था या अपनी जीवन शक्ति का उपयोग करके चोटों को ठीक नहीं कर सकता था।

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।
आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

सभी पाठकों से निवेदन है कि उन्हें यह कहानी कैसी लग रही है यह बताएं और साथ ही साथ अपने अनमोल सुझाव दे ---
धन्यवाद 🙏🙏

अगला अपडेट जल्द ही कृपया प्रतीक्षा करें--

आपका अपना मित्र ------अभिनव🔥
Bahot khoob shaandaar update bhai
Aisa lag raha h jab Yagnesh per pareshania aani shuru huwi tab use koyi sahi rasta dikhane wala nahi mila kia kerna chahiye islye woh aisa bab gaya or woh jo प्रतिलिपि mili use woh sahi se samajh nahi paya
Baherhal dekhte h aage kia hota h
Bahot khoob shaandaar update bhai
 

Naik

Well-Known Member
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258
अध्याय - 3

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।
आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

अब आगे -----


अपने अतीत में खोए हुए याग्नेश की तंद्रा आकाश में होने वाली गर्जना ने भंग की । उस टीले पर लेटे लेटे उसे बहुत वक्त हो गया था। एक बार उसने उस नगर के ऊपर नजर डाली और अपने कपड़ों को झाड़ता होगा खड़ा हुआ।
आकाश में बादल और घने हो गए थे, बिजली के कड़कने की आवाज और तेज चलती हुई आंधी , ने वहां का मौसम भयावह बना दिया था ।

अचानक हुए मौसम में इस बदलाव को देखकर , याग्नेश मन में कुछ सोचते हुए अपने घोड़े की तरफ गया घोड़े पर बैठकर लगाम थामी और अपना घोड़ा वहां से आगे दौड़ा दिया ।


घोड़ा भी थोड़ा आगे चला ही था कि उसके पैर वहीं जम गए और भय के कारण घोड़ा जोर जोर से हिनहिना ने लगा तभी याग्नेश ने आकाश से दो विशाल पंखों वाले किसी जीव को बड़ी तेजी से अपनी तरफ आते हुए देखा।

जैसे ही घोड़ा रुका, धूल का एक बादल उमड़ पड़ा। अपने तरफ तेजी से आते हुए विशाल और अजीब से जीव को देखकर याग्नेश की सांसे तेज हो गई , घोड़ा भी अपने आगे के दोनों पैर उठाकर जोर-जोर से हीनहीनाने लगा । पंख वाला प्राणी उनके पांच मीटर से भी कम दूरी पर उतरा था।
घोडे ने कई बार लात मारी और दौड़ने से पहले याग्नेश को अपनी पीठ से फेंक दिया। याग्नेश कंधे के बल नीचे गीरा , और थोडी दूर तक लूढकता चला गया , उसके कंधे मे तेज दर्द होने लगा ।

बडी कठीनाई से अपने आप को संभालते हुए वो खडा हुआ और अपनी आंखो को मलते हुए उस जीव को देखने लगा , जैसे ही उसने अपने सामने खड़े प्राणी पर नजर डाली, वह दर्द के बारे में सब भूल गया।

सामने वह अजीब सा जीव अब एक सुंदर तेजोमय नौजवान में परिवर्तित हो चुका था। दो श्वेत पंख , अद्भुत तेज, दिव्य आभूषण के साथ वह किसी देवता के समान प्रतीत हो रहा था ,उसके लंबे सुनहरे बाल हवा में उड़ रहे थे और उनकी चमकीली पीली आँखें रात में लगभग चमक रही थीं।


न जाने क्यों उसका वह सुंदर रुप और अद्भुत व्यक्तित्व याग्नेश को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था । न जाने क्यों उसे सामने खड़ा वह तेजोमय पुरुष अपना सा लगने लगा था उसकी वह अद्भुत मुस्कान देखकर याग्नेश के ह्रदय में कई प्रकार की भावनाएं प्रगट हो रही थी वह सब कुछ भूल कर बस एकटक उस तेजोमय पुरुष को देख रहा था।

तभी आकाश में घर गर्जना हुई जिस कारण याग्नेश उस तेजोमय पुरुष के मोहपाश से बाहर आया।

याग्नेश - कौन हो तुम ? और इस प्रकार मेरा मार्ग का क्या कारण हैं ? तुम्हारे इस जादुई खेल का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा इसलिए अपना यह जादुई प्रयोग बंद करो , और सीधी तरह मेरा मार्ग अवरुद्ध करने का कारण बताओ।

तेजोमय पुरुष -- ओह ! मेरे आने मात्र से आपकी यह दशा हो गई फिर भी आप का अहंकार गया नहीं आपको अपनी शक्तियों पर इतना अहंकार है तो चलो पहले उन शक्तियों का प्रयोग करके मुझे बांधकर दिखाओ।

याग्नेश - मैं हूं आचार्य याग्नेश ।। कई जादुई शक्तियों का मालिक , क्या समझते हो तुम कि तुम अपनी इस हरकत से मुझे डरा दोगे , मैं डरने वालों में से नहीं हूं इतना कहकर याग्नेश ने काली शक्तियों का आह्वान किया , परंतु उसे घोर आश्चर्य हुआ क्यों उसकी कोई भी शक्ति वहां काम नहीं कर रही थी ।।

याग्नेश की बातें सुनकर वह दिव्य पुरुष जोर जोर से हंसने लगा उसकी हंसी याग्नेश के कानों को किसी गर्म पिघले हुए शीशे की तरह लग रही थी अपनी हंसी को रोक कर वह दिव्य पुरुष बोल उठा।

दिव्य पुरुष - क्या कहा आपने आचार्य याग्नेश शायद आप भूल गए हो अब आप आचार्य नहीं रहे धर्म के प्रति किए गए विश्वासघात और शक्तियों को पाने की होड़ में किए गए क्रूर कर्मो ने आपसे आचार्य पद कब का छीन लिया है ।

जिन काली शक्तियों को पाने के लिए आपने इतने लोगों की बलि दी वह सब मेरे सामने व्यर्थ है , ध्यान रहे आचार्य अंधेरा जितना प्रबल और घना हो वह प्रकाश के समक्ष नही टीक सकता।

मैं यहां आपको कोई दंड देने नहीं आया, आपके द्वारा पूर्व मे किये गये अच्छे कर्मो के कारण , बस अंतीम चेतावनी देने आया हूं कि अभी भी समय है संभल जाइए अपने पापों का प्रायश्चित करें और वापस सन्मार्ग पर लग जाए तो हो सकता है आपको क्षमा मिल जाए।


याग्नेश - कहीं आप वह तो नहीं जो मैं सोच रहा हूं हां लगता है शायद आप वही हो जिसकी मैं कब से प्रतीक्षा कर रहा था

दिव्य पुरुष - मैं वह नहीं जो आप सोच रहे हो मैं नहीं हूं मैं तो केवल उस परम सत्ता ईश्वर का जिनके आधीन होकर संपूर्ण देवता कार्य करते है उनका एक छोटा सा सेवक हूं । जो आपको अंतिम बार सचेत करने आया हूं

याग्नेश - आखिर मेरा अपराध क्या है, क्यों मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया गया , मेरे अपने , मेरी शक्तियां सब कुछ मेरा आचार्य पद। हमने कई पीढीयो से देवताओ की पूरे तन मन लगाकर उपासना की है , परंतु उसका परिणाम क्या निकला, क्या प्राप्त हुआ मुझे इतनी उपासना श्रद्धा और आस्था से केवल दुख । तुम्हारे ईश्वर ने मेरा सब कुछ मुझसे छीन लिया अब तुम यहां मुझे उपदेश देने आए हो, तब कहा गया था तुम्हारा ईश्वर , जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा आवश्यक्ता थी, चले जाओ यहां से।।

दिव्य पुरुष - आपसे आपका आचार्य पद आपकी शक्तियां और आपके अपनों को आपसे दूर कर दिया गया इसका कारण कोई और नहीं केवल आप है केवल आप ।

आपने धर्म के प्रति विश्वासघात किया है अपनी शरण में आए हुए एक लाचार महिला का बलिदान के नाम पर बड़ी क्रूरता से उसकी हत्या कर दी ,
आपकी इस जघन्य अपराध के कारण ही देवताओं ने आपकी सारी दैवीय शक्तियां वापस ले ली याग्नेश,


वही आपके माता-पिता और बहनों के साथ जो हुआ , वह क्यों हुआ ? क्या कभी आपने यह जानने का प्रयत्न किया है, ईश्वर कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करता उसके लिए सभी जीव एक बराबर है।
सुख और दुख तो व्यक्ति अपने कर्मों के कारण ही प्राप्त करता है। परंतु मनुष्य से भूलकर सुख को अपना श्रेय देता है और दुखो का दोष ईश्वर को देता है।

याग्नेश - मैंने कोई गलत नहीं किया मैंने वही किया जो आप के देवता उपासना पद्धति के ग्रंथों में लिखा गया है, मैंने उसी में से बलिदान की पद्धति को अपनाया तो बताओ मैं कहां गलत हुआ।

दिव्य पुरुष - आप शायद भूल गए हैं, कि बलिदान किसे कहते हैं । बलिदान उस त्याग को कहते हैं जो दूसरों की भलाई के लिए अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करें आपने तो बलिदान के नाम पर न जाने कितने मासूम लोगों की क्रूरता पूर्वक हत्या की है उसी घोर पाप का दंड आप भुगत रहे हो इसलिए कह रहा हूं के अभी भी संभल जाइए।।

इतना कह कर उस दिव्य पुरुष के पंख फिर से प्रकट हो गए, और वह मुड़ गया, उड़ान भरने के लिए । उडान भरने से पहले उसने याग्नेश की तरफ फिर से देखा और कहा,

"हमने वह किया जो हम मदद कर सकते थे, लेकिन आपके परिवार ने रास्ता गलत चूना और उनसे भी बढकर आप बहुत दूर चले गए, और मेरी कही बातो पर ध्यान दिजीए, आप फिर कभी किसी को चोट न पहुँचाएँ। अपने अपराधो का प्रायश्चीत कजिए।

इतना कह कर वह दिव्य पुरुष उड गया और आकाश मे फिर कहीं खो गया


उसके जाने के बाद याग्नेश थोड़ी देर वही खड़ा रहा उसका चेहरा पहले से और कठोर हो गया शायद उसने मन ही मन कुछ फैसला लिया था वह वापस अपने घोड़े पर बैठा और अपनी गुफा की तरफ निकल पड़ा

जब याग्नेश अपनी गुफा में पहुंचा तो वहां का हाल देख कर वह स्तब्ध रह गया, क्रोध के कारण उसके जबड़े भींच गए सारी गुफा तहस-नहस हो गई थी, गुफा का सारा सामान बिखरा पड़ा था।
उसकी यज्ञ वेदी टूटी हुई थी , उसके लगभग 10 अनुयाई जमीन पर क्षत-विक्षत हालत में जमीन पर पड़े हुए थे शायद सब मृत्यु को प्राप्त हो गए थे ।

याग्नेश अपनी गुफा को देख ही रहा था कि उसे किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी , उसका एक अनुयाई अपनी अंतिम सांसे ले रहा था याग्नेश तुरंत उसके पास पहुंचा और उसे आवाज देकर जगाने का प्रयत्न करने लगा ।

याग्नेश की आवाज सुनकर उसने हल्की सी अपनी आंखें खोली सामने अपने मालिक को देख कर उसने थोड़ी राहत की सांस ली और टूटे फूटे शब्दों में वहां क्या हुआ वह सब बता दिया और अंतिम हिचकी के साथ अपने प्राण त्याग दिए।


अपनी गुफा में घटित इस वीभत्स पूर्ण घटना को देखकर याग्नेश की आंखें लाल हो गई उसका क्रोध चरम सीमा पर पहुंच गया उसका अंतर्मन जो अभी भी थोड़ा जागृत था जो उसे कभी कभी सन्मार्ग पर लाने की सलाह देता था वह भी अब कहीं छुप गया इस घटना ने उसके भीतर के दरिंदे को जगा दिया ।

आज उसे आर या पार की लड़ाई लड़नी थी उसने अपने मन में दृढ़ निश्चय किया और चल पड़ा गुफा के पीछे जहां एक तहखाने में उसका गुप्त कक्ष था।

उस गुप्त तहखाने में एक और एक काला बड़ा सा क्रिस्टल था और दूसरी ओर एक छोटी सी कैद में कुछ कन्याएं बंधी हुई थी जो वहां किसी विशेष बलि के लिए लाई हुई थी
याग्नेश ने अपने कदम उसी तहखाने में बने हुए कैद की तरफ बढ़ाएं और भीतर प्रवेश कर गया।

उन सभी कन्याओं में एक कन्या ऐसी थी जो गुमसुम की एक कोने में बैठी थी, उसके सारे शरीर पर लाल निशान थे वर कन्या अपना सिर दोनों घुटनों के बीच में रखकर आंसू बहा रही थी याग्नेश उस कन्या के आगे जाकर रुका।

याग्नेश - चलो सुलेखा अब तुम्हारा समय आ गया है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो अपने किए की सजा मिली, वह मूर्ख क्या समझता था कि वह अपनी बलि तुम्हें ठीक करने के लिए दे रहा है। " हा हा हा हा "( एक क्रूर हसी के साथ ) बेचारा अपनी अंतिम सांस तक यही समझता रहा कि मैं उसकी मदद कर रहा हूं ।

मदद तो मैं अपनी कर रहा था अपने प्रतिशोध का प्रथम चरण पूरा करने के लिए परंतु जब तक तुम जीवित हो मेरा वह प्रतिशोध का प्रथम चरण पूर्ण नहीं हो सकता।


इतना कहकर याग्नेश ने उसके बाल पकड़कर उसका सिर ऊपर उठाया, अपने पिता के मृत्यु के बारे में सुनकर सुलेखा का मानो ह्रदय फटने को हो गया था वह चीखना चाहती थी चिल्लाना चाहती थी , परंतु उसके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था ।

उसके नेत्रों से अविरल अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी, उस मृगनयनी के सुंदर नेत्र लाल हो गए थे ,उसने कातर नेत्रों से याग्नेश को देखा उसके नेत्रों को देखते ही याग्नेश को एक जोरदार झटका लगा उसके हाथ सुलेखा के बालों से हट गए याग्नेश ने आगे बढ़कर फिर से उसे पकडना चाहा परंतु हुआ फिर वही एक जोरदार झटका।


ना जाने वह कौन सी शक्ति थी जो उसे सुलेखा के पास आने से रोक रही थी

सुलेखा उसी व्यक्ति विक्रम सिंह की कन्या थी जिस की बलि का उल्लेख इस कहानी के प्रथम अध्याय में किया गया है । विक्रम सिंह कौन था याग्नेश उसे किस बात का बदला लेना चाहता था यह सब आगे कहानी में पता चलेगा ।

याग्नेश को आज अपना संकल्प पूरा करना था जो उसने गुफा में हुई घटना को देखकर लिया था, इसलिए उसने सुलेखा के प्रकरण को कुछ दिन डालने का निश्चय करके , उसी कैद में मौजूद दूसरी कन्या को पकड़ लिया वह कन्या चीखती रही चिल्लाती रही
बार-बार अपने को छोड़ने की प्रार्थना करने लगी , परंतु याग्नेश के कठोर ह्रदय पर उसका कुछ भी असर नहीं हुआ ।

उस कन्या को बालों से घसीट कर याग्नेश उस बड़े से काले क्रिस्टल के सामने लाया और दहाड़ा


याग्नेश -- हे मेरे मालिक कितने दिनों से मैंने तुम्हें इतनी बलिया दी, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी शक्तियों से दूर ---
क्या प्राप्त हुआ मुझे इतने वर्षों की आप की उपासना करके, देवताओं से धोखा खाने के बाद मैंने सोचा शायद आप ही वह हो जो मेरी मदद कर सकते हो , परंतु सब व्यर्थ रहा आज व्यक्ति से जो अपने आप को देवताओं का दूत कह रहा था, उसके सामने मैं विवश हो गया।


मेरी एक भी शक्ति उसके सामने नहीं चल पाई , आखिर क्यों ? आज मुझे आपसे अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए यदि आज भी आपकी साधना बेकार गई तो आज मैं भी अपना जीवन ही समाप्त कर दूंगा क्या फायदा है ऐसी जीवन का जो शक्तिहीन हो असहाय ।

उस काले क्रिस्टल को देखकर वह कन्या समझ गई कि उसके साथ क्या होने वाला है उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर याग्नेश को कातर दृष्टी से देखा और अपने आप को बचाने का आखरी प्रयास किया ,

परंतु अब याग्नेश कोई मानव नहीं दरिंदा बन गया था। उसने उस कन्या के सारे वस्त्र बड़ी निर्दयता पूर्वक फाड़ दिए और उसे पूरा निर्वस्त्र कर दिया उस कन्या ने एक हाथ से अपने स्तन और दूसरे हाथ से अपनी योनि को ढक कर अपनी लाज बचाने का प्रयास किया , परंतु याग्नेश के इरादे कुछ और थे ।

आज के लिए इतना ही, अब देखते हैं आगे इस कहानी के किरदार इस कहानी को किस दिशा और काल में ले जाते हैं ।
अगला अध्याय जल्द ही ।

आप सब पाठकों का साथ देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । खुश रहिए और स्वस्थ रहिए कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव जरूर दें ।


आपका अपना मित्र ---- अभिनव 🔥
Yagnesh ko ek mauka mila tha apne aap ko sudharne
Lekin woh bhi gawane jaa raha h
Woh Divya purush ki baato ka aser ulta hi oad gaya
Sulekha m kon si shkti aa gayi jise haath lagate hi Yagnesh ko jhatke lage
Baherhal dekhte h aage kia hota h
Bahot khoob shaandaar update bhai
 

Naik

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अध्याय - 4

परंतु अब याग्नेश कोई मानव नहीं दरिंदा बन गया था। उसने उस कन्या के सारे वस्त्र बड़ी निर्दयता पूर्वक फाड़ दिए और उसे पूरा निर्वस्त्र कर दिया उस कन्या ने एक हाथ से अपने स्तन और दूसरे हाथ से अपनी योनि को ढक कर अपनी लाज बचाने का प्रयास किया , परंतु याग्नेश के इरादे कुछ और थे ।

अब आगे--------



याग्नेश ने अपनी मजबूत बांहों से उस कन्या को उठाकर वहां बड़े क्रिस्टल के ऊपर लोहे के एक बड़े से हुक में उल्टा लटका दिया ।

लोहे के उस पैने हुक के शरीर मे धसते ही, वह कन्या छटपटाने लगी जोर जोर से चीखने लगी ,

याग्नेश ने उसकी गर्दन को पकडकर स्थिर कि फिर उसकी आंखों में देखकर कुछ बुबुदबुदाया न जाने कोई मंत्र शक्ति थी या कोई सम्मोहन , वह कन्या एकदम स्थिर हो गई।


याग्नेश ने अब वहां पड़ा एक बड़ा सा खंजर उठाया उस क्रिस्टल के आगे घुटनों पर बैठकर उसने उस खंजर को अपने पति से लगाया और कुछ मंत्र पढ़े और वह खंजर लेकर खड़ा हो गया।

बाएं हाथ के उसने उस कन्या के बाल पकड़े और दाहिने हाथ से अभिमंत्रित किया हुआ खंजर उसने उस कन्या की गर्दन पर चला दिया, धीरे-धीरे गर्दन काटता हुआ वह कुछ मंत्र बुदबुदाने लगा ।

उस कन्या की गर्दन से रिस्ता हुआ लाल रक्त काले बड़े क्रिस्टल पर गिरने लगा , अब गर्दन उसके धड़ से अलग हो चुकी थी ,

उसके सिर कटे हुए धड़ से तेज रक्त प्रवाह उस क्रिस्टल को भिगो रहे थे जैसे-जैसे रक्त उस क्रिस्टल पर पड रहा था वह क्रिस्टल एक बैंगनी रंग के प्रकाश से जगमगाने लगा ।
याग्नेश थोड़ी देर उस क्रिस्टल के आगे 1 आसन पर बैठकर कुछ मंत्र पढ़ने लगा , जब उसने देखा कि उस कन्या का सारा रक्त उस क्रिस्टल पर गिर चुका है तो वो खंजर लेकर एक बार फिर खड़ा हुआ ।

वहां आश्चर्य की एक बात और हुई कि उस कन्या के शरीर से इतना इतना रक्त बहा कि वहां चारों तरफ रक्त होना चाहिए था, परंतु वहां उस कन्या के रक्त की एक भी बूंद नजर नहीं आ रही थी । सारा रक्त वह क्रिस्टल अपने भीतर सोख चुका था।

याग्नेश एक बार फिर खड़ा हुआ उसने वह खंजर उस कन्या के धड़ के पेड़ से लेकर सीने तक चलाया और पूरा चीर डाला, उसने उस कन्या की सारी पेट की आंतडियां बाहर निकाल ली फिर उन आंतडियों का हार बना कर उसने उस क्रिस्टल को पहना दिया ।

उसके बाद उसने उस कन्या के सीने में हाथ घुसा कर उसका ह्रदय भी बाहर निकाला और उस हृदय को अपने हाथों से निचोड़ कर उसमें बचा कुचा रक्त भी उसने उस क्रिस्टल पर चढ़ा दिया ऐसा करते ही उस क्रिस्टल का बैंगनी प्रकाश और ज्यादा बढ़ गया और एक अजीब सी आवाज वहां गूंजने लगी जिसको यदि कोई और सुन ले तो उसकी रीढ़ की हड्डी तक सिरहन दौड़ जाए परंतु उस आवाज को सूनकर याग्नेश की प्रसन्नता का कोई ठीकाना न था ,

यह आवाज थी अंधेरे के राजा शैतान इब्लीस की ।

याग्नेश -- ए मेरे मालिक , अंधेरों के राजा परम शक्तिशाली इब्लीस मेरा आपको कोटि-कोटि नमन, आज आपको इतने वर्षों बाद अपने समक्ष पाकर मैं धन्य हो गया ।

इब्लीस -- कहो मुझे क्यों याद किया।


याग्नेश -- ए मेरे आका , इतने वर्षों से मैंने लगातार आप की आराधना की है , मैंने अपने भीतर की मानवता को मार कर हर वह काम किया है जो आपको प्रिय हो , परंतु अभी मैं आपकी शक्तियों से दूर हूं ।
एक अदना सा देवदूत भी मुझे आकर धमका कर चला जाता है और मैं कुछ नहीं कर पाता हूं, ऐसा क्यों ??

आखिर क्या कमी रह गई मेरी आराधना में, आज मेरे शत्रु प्रबल है, वह मेरी गुफा को और मेरी पूजा स्थल को तहस-नहस करके चले गए , मेरे अनुयायियों को निर्ममता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया और मैं विवश शक्तिहीन उनका कुछ भी बिगाड़ने में असमर्थ हूं , कृपया मेरी सहायता करें मेरे मालिक ।


इब्लीस -- इसका कारण भी तुम ही हो याग्नेश। तुम अब तक दो नावों पर सवारी करते आए हो जो कभी भी मंजिल तक नहीं पहुंचा सकती। एक और तो तुम देवताओं की भी शक्ति प्राप्त करना चाहते हो और दूसरी ओर मेरी काली शक्तियां भी ।

तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए अंधेरा और उजाला कभी एक साथ नहीं रह सकता , तुमने सफेद क्रिस्टल में मेरी शक्तियों से भरपूर काले क्रिस्टल को मिलाने का प्रयत्न किया जिसके फलस्वरूप मेरा वह काला क्रिस्टल भी शक्तिहीन हो गया यदि तुम मेरी काली शक्तियां प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें मेरे प्रति संपूर्ण समर्पण करना होगा अपनी आत्मा मुझे समर्पित करनी होगी।

याग्नेश -- क्षमा करें मेरे मालिक क्षमा करें , मैंने विचार किया था कि यदि देवताओं की शक्ति और आपकी काली शक्तियां दोनों मुझे प्राप्त हो जाए तो मैं इस संसार कर सर्वशक्तिमान बन जाऊंगा इसी विचार से मैं इतने वर्षों तक यह गलतियां करता रहा।


इब्लीस - देवताओं की शक्तियां भी तुम प्राप्त कर सकते हो उसके लिए अभी समय है । उससे पहले तुम्हे मेरी काली शक्तियां अपने भीतर समानी होगी , जब तुम पूर्णतया मेरी शक्तिया प्राप्त कर लोगे तब देवताओ की शक्तियां प्राप्त करने का मार्ग भी तुम्हे प्राप्त हो जाएगा । तूम्हे यह याद रखना होगा एक समय पर एक ही रास्ते पर चलकर अपनी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है।

याग्नेश -- मेरे पुर्व के सारे अपराध क्षमा करें मेरे मालिक अब मैं अपने आप को और अपनी आत्मा को , आप के सुपुर्द करता हूं , इसे स्वीकार करें।।

इतना कहकर याग्नेश ने खंजर उठाया और अपने सीने पर जहां दिल होता है ठीक उसी जगह प्रहार किया उसके ह्रदय में वो खंजर घुस गया और बहने लगी लाल रक्त की एक धारा
अपनी असहनीय पीड़ा को सहते हुए, ह्रदय में खंजर धसा होने के बावजूद भी , याग्नेश ने अपनी पूरी शक्ति एकत्रित करके आपने अंजलि में हृदय से बहते हुए रक्त को लिया और उस काले क्रिस्टल पर चढ़ा दिया, इसी के साथ याग्नेश का शरीर एक और लुढ़क गया।

जैसे ही याग्नेश का शरीर एक और लुढ़क गया उसी समय काले क्रिस्टल से एक बैंगनी रंग का प्रकाश याग्नेश के शरीर में प्रवेश करने लगा और आश्चर्यजनक रूप से देखते ही देखते उसके ह्रदय में धंसा हुआ खंजर अपने आप बाहर निकल आया। उसके घाव भरने लगे उसका शरीर पहले से और ज्यादा ताकतवर और सुदृढ़ बनने लगा । धीरे धीरे याग्नेश की आंखें खोल दी उसकी आंखों का रंग अब बिल्कुल काला हो गया था ।

बाहर गुफा के ऊपर घने बादलों की गर्जना और बिजली कड़कने की भयंकर आवाज से वातावरण और भी भयावह हो गया था वन के पशु सभी न जाने सभी ना जाने किस अनिष्ट की आशंका से शोर मचा रहे थे और वहां तहखाने के भीतर याग्नेश अब पूरी तरह होश में आ गया था ।

अब वह पहले वाला याग्नेश नहीं रहा था , इब्लीस ने उसे पृथ्वी पर मौजूद सभी काली शक्तियों का स्वामी बना दिया था अब उसकी आत्मा इब्लीस से जुड़ चुकी थी , याग्नेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े और अपना सिर नीचे करके उस क्रिस्टल के आगे बैठ गया।

इब्लीस -- पुत्र अब तुम मेरा अंश बन चुके हो तुम्हारे भीतर अब वह असीम शक्ति समा गई है , जिसका संसार में कोई भी सामना नहीं कर सकता। परंतु ध्यान रहे तुम्हें केवल खतरा उसी से है जो तुम्हारा ही कोई अंश होगा और उसने अच्छाई और बुराई दोनों शक्तियों का संतुलन बना लिया हो।


कितना कहकर इब्लीस वहां से चला गया। इब्लीस के जाने के बाद याग्नेश इब्लीस के अंतिम शब्दों पर गौर करने लगा कि उसका ही कोई अंश उसके लिए खतरा बन सकता है।

उसका अंश यानी उसका पुत्र जिसको उसकी आंखों के सामने नगर वालों ने उसके सारे परिवार के साथ जलाकर राख कर दिया था ।

याग्नेश ने सिर झटक कर इन सब विचारों को छोड़ा , अब उसका प्रथम कार्य था प्रतिशोध अपने भीतर प्रलय को समेटे हुए याग्नेश तहखाने से बाहर निकला और अपने घोड़े पर बैठकर अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा।

बिजली की सी तेज गति से याग्नेश अपने घोड़े को दौड़ाते हुए नगर के बाहरी दीवार तक पहुंच गया उसने अपना घोड़ा वही एक पेड़ से बांध दिया नगर की ऊंची दीवार को एक ही छलांग में पार करके नगर के भीतर प्रवेश कर गया, वह अब नगर के खुले चौक में पहुंचे।

अंधेरा अभी भी बहुत घना था, इस समय रात के कोई 3 बज रहे होंगे , चौक और गलियां पूरी तरह सुनसान थी घनी अंधेरी काली और सर्द रात्रि में सभी अपने अपने घरों में आराम से सोए हुए थे याग्नेश आराम से चौक से होते हुए नगर के मध्य स्थित मुख्य आश्रम जहां कभी वह आचार्य था के द्वार तक पहुंचा।

याग्नेश ने आश्रम के द्वार को देखा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ के द्वार पर कोई भी रक्षक नहीं था । अपनी शक्तियों का प्रयोग करके उसने द्वार के भीतर देखा तो वहां भी आश्रम का कोई भी योद्धा या सैनिक नहीं था।

उसने विचार किया कि यदि यहां के नए आचार्य और उनके योद्धाओं ने उसकी गुफा में तबाही मचाई है , तो उन्हें अंदेशा होना चाहिए के याग्नेश यहां पर प्रतिशोध लेने जरूर आएगा , फिर भी उसे रोकने के लिए इस समय यहां आश्रम के योद्धाओं की सेना उसे रोकने के नही थी ।

फिर उसके मन में दूसरा विचार भी आया के हो सकता है उसे फंसाने के लिए यह कोई जाल हो सभी विचारों को झटक ते हुए वह आश्रम के बंद द्वार की ओर बढ़ा उसके नेत्रों से निकलती हुई बैंगनी किरणों ने आश्रम के विशाल द्वार को पल भर में ध्वस्त कर दिया द्वार टूटने की आवाज इतनी ज्यादा थी के आश्रम में सोए हुए लगभग सभी अनुयाई और कर्मचारी जाग गए थे।

आश्रम के योद्धा किसी अनहोनी की आशंका से तुरंत अपने कक्षो से निकलकर द्वार की तरफ दौड़े , उन्हें वहां याग्नेश आश्रम के भीतर आता हुआ नजर आया । लंबे काले वस्त्रों , सर्द चेहरा और बैंगनी प्रकाश से चमकते ही उसकी आंखें कुल मिलाकर वह आज कोई मौत का दूत नजर आ रहा था ।

आश्रम के योद्धा उसे देख कर पंक्ति बद्ध तरीके से उसके आगे खड़े हो गए। उन्हें अपना रास्ता रोके देख कर याग्नेश का क्रोध और बढ़ गया।।


याग्नेश -- हट जाओ मेरे रास्ते से , वरना तुम सब के सब मारे जाओगे , आज मेरे और तुम्हारे आचार्य के बीच जो भी आएगा वह बहुत बुरी तरह मारा जाएगा, यदी अपने प्राण बचाना चाहते हो तो आखरी बार कह रहा हुं हट जाओ।।

योद्धाओं का प्रमुख -- हम तुम्हें किसी भी कीमत पर भीतर नहीं जाने दे सकते आप हमारे लिए आदरणीय हो इसलिए अभी तक हमने आप पर कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाया परंतु जब हमारे आचार्य की रक्षा की बारी आएगी तब हम आप पर भी वार करने से नहीं चुकेंगे , इसलिए कहते हैं कृपया यहां से चले जाइए।।

याग्नेश -- तो तुम सब ऐसे नहीं मानोगे , अब अपनी मृत्यु के लिए सब तैयार हो जाओ , आज मुझे कोई भी नहीं रोक सकता ।
इतना कहकर याग्नेश ने अपने हाथ को उन योद्धाओं की तरफ कर दिए , जिस से निकलती हुई बैंगनी किरणों ने किसी पाश की तरह उन सारे योद्धाओं को एक साथ बांध दिया , उसने उन सब को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार निकाली ही थी कि वहां एक गंभीर आवाज उभरी जो यहां के मौजूद आचार्य विजयानंद की थी , जो किसी समय याग्नेश का प्रिय शिष्य हुआ करता था।।


आज के लिए इतना ही , अगला प्रकरण बहुत जल्द ही प्रकाशित होगा ।
आप सभी पाठकों का बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🙏 ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें और अपने सुझाव और प्रतिक्रिया देते रहें ।स्वस्थ रहे खुश रहे ।।


आपका अपना मित्र -- अभिनव🔥
Tow Yagnesh ab poora ka poora shaitan bana gaya iblis ka beta
Lagta h acharya Vijayanad ka namber aa gaya h dekhte h kia hota h
Badhiya update bhai
 

Naik

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अध्याय -- 5

याग्नेश ने उन सब को समाप्त करने के लिए अपनी तलवार निकाली ही थी कि वहां एक गंभीर आवाज उभरी जो यहां के मौजूद आचार्य विजयानंद की थी , जो किसी समय याग्नेश का प्रिय शिष्य हुआ करता था।।

अब आगे --


विजयानंद - रुक जाईये गुरुदेव , इन्हें क्षमा कर दीजिए , यह तो केवल मेरी रक्षा का अपना दायित्व निभा रहे थे ।आप यहां मुझे अपना शत्रु मान कर आए हुए हो, तो लिजीए मैं आज आपके सामने प्रस्तुत हूं , परंतु कृपया इन्हें छोड़ दीजिए।

विजयानंद को अपने सामने देखकर याग्नेश ने सभी योद्धाओं को अपने पाश से मुक्त कर दिया , अपने आचार्य का इशारा पाकर आश्रम के सभी योद्धा एक तरफ हट गए याग्नेश ने देखा के वीजयानंद उसके समक्ष अपने यह दोनों हाथ जोड़े हुए खड़ा है।

याग्नेश -- बंद करो अपना यह झूठा दिखावा विजय , मैं खूब जानता हूं , एक तरफ तो तुम अपने हाथ जोड़ कर मुझे अपना गुरुदेव कह रहे हो और दूसरी तरफ अपने योद्धाओं के साथ मेरे निवास स्थान को तहस-नहस करके आए हो अब तुम्हारा यह अच्छाई का मुखौटा मुझे भ्रमित नहीं कर सकता।

विजयानंद -- गुरुदेव , आप क्या कह रहे हैं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा ।आप किस घटना का यहां उल्लेख कर रहे हो ,उसमें मेरा तनिक भी हाथ नहीं है । आशा है क्या आप मुझे अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करेंगे। परंतु पहले भीतर चलिए
क्योंकि जिस तरह आपने बताया मुझे किसी षड्यंत्र का अंदेशा हो रहा है , इसलिए इस बारे में बात करना यहां उचित नहीं है कृपया करके भीतर चले, यदि आपको मेरी बात सुनने के बाद भी ऐसा लगे इस घटना में मेरा कोई भी हाथ है तो निसंदेह आप मेरा वध कर देना।


याग्नेश को भी विजयानंद की बात उचित लगी और वह भीतर आश्रम के आचार्य के लिए बने विशेष कक्ष की तरफ चल दिया।

यह वही का स्थान था जहां वह अपने दादा से मिलने कई बार आता था , इसी कक्ष में उसने अपने दादा का क्षत-विक्षत मृत देह देखा था । आचार्य बनने के पश्चात इसी कक्षा में रहकर उसने इस नगर के वासियों की बहुत सहायता की थी । कक्ष के भीतर पहुंचकर विजयानंद ने याग्नेश को आसन पर बिठाया और खुद उनके सामने एक आसन पर बैठ गया।


विजयानंद -- अब बताइए गुरुदेव आप किस घटना के बारे में बता रहे थे कृपया करके मुझे विस्तार से बताएं।।

याग्नेश -- यह तुम मुझे बार-बार गुरुदेव कहना बंद करो , मैं कोई तुम्हारा गुरु नहीं रहा , अब हमारे रास्ते भिन्न है और यह बात जितना शिघ्र समझ जाओ उतना अच्छा है ।।
ये अच्छा बनने का दिखावा भी मेरे सामने मत करो , मैं आज तक कभी तुम्हारे रास्ते में नहीं आया , परंतु तुमने मेरी गुफा मेरे निवास स्थान को तहस-नहस करके और मेरे अनुयायियों को आहत करके मुझे अपना शत्रु बना लिया है , अभी तक मैं यह तुम्हारा सारा आश्रम ध्वस्त कर देता, परंतु मैंने अपना बचपन यहां गुजारा है इसलिए तुम्हें अपनी सफाई का एक मौका देना चाहता हूं।।


विजयानंद -- चाहे हमारे मार्ग भीन्न हो गए हो , परंतु मैं यह कैसे भूल सकता हूं आज मैं जो कुछ भी हूं, जो कुछ भी जानता हूं वह सब कुछ आप ही की देन है । आप मेरे गुरु हो मेरे पिता समान हो इसलिए गुरुदेव कहने का अधिकार कृपया मुझसे ना छीने ।
आप जिस घटना के बारे में बता रहे हैं मैं अपने आराध्य , अपने देवता गजेंद्र की शपथ लेकर कहता हूं उस घटना में मेरे आश्रम के किसी भी योद्धा का कोई हाथ नहीं है । यह कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र प्रतीत होता है जो आपके ही किसी शत्रु ने रचाया है। गुरुदेव मैं इस आश्रम में आचार्य के पद पर आसीन हूं, इसलिए मैं अपनी देवता गजेंद्र की झूठी शपथ कभी नहीं खाऊंगा यदि फिर भी आपको मेरी बात पर जरा भी संदेह है तो लिजीए मेरा सिर आपके सामने समर्पित है।।


याग्नेश -- यदि यह बात सत्य है तो मैं इस बात का पता आवश्य लगा लूंगा । परंतु यदि तुम्हारा या इस आश्रम के किसी भी सदस्य का इसमें कोई हाथ होगा तो सावधान , तुम्हारा यह आश्रम मैं पल भर में राख के ढेर में बदल दूंगा और तुम्हारा देवता गजेंद्र भी मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं पाएगा।।

इतना कहकर याग्नेश जाने के लिए खड़ा हुआ परंतु खुद सोच कर फिर रुक गया और विजयानंद की तरफ देख कर बोला

याग्नेश -- यदि तुम मेरा इतना ही आदर करते हो , तो मैं तुम्हें जाते-जाते एक सलाह देता हूं कि छोड़ दो यह सत्यता का मार्ग इस गजेंद्र की उपासना इससे तुम्हें कुछ हासिल ही नहीं होगा । यह सदैव अपने मानने वालों को ही दुख प्रदान करता है आज मैं जिस परिस्थिति में हूं यदि तुम इस परिस्थिति में नहीं आना चाहते तो इस देवता और आश्रम का साथ छोड़ के मेरे साथ आ जाओ।

विजयानंद -- क्षमा करें गुरुदेव मैं आपके ही सिखाये हुए पाठ और सीख पर चल रहा हूं , और जानता हूं कि सत्यता का मार्ग बड़ा कठिन है इसका पालन करने वालो बहुत से त्याग और बलिदान देने पड़ते हैं , और मै इसके लिए प्रस्तुत भी हुं ।।
मानवता का भी यही धर्म है और यही धर्म सबसे श्रेष्ठ है । यही मार्ग हैं आत्मोन्नति का और मुक्ति का साधन है ।। छोटा मुंह बड़ी बात मैं तो आपसे भी कह रहा हूं कि आप यह पापूर्ण मार्ग का त्याग करें प्रायश्चित करें और लौट आए गुरुदेव ।। आपको पुनः अपनी शक्तियां और पद प्राप्त हो जाएगा।।


याग्नेश -- तुम मुझे ज्ञान देने का प्रयत्न ना करो विजयानंद , यदि तुम्हें अपने देवता गजेंद्र पर इतना ही विश्वास है तो मैं तुम्हें पूर्ण 1 वर्ष देता हूं । इस 1 वर्ष में तुम अपने देवता की शक्ति जितनी प्राप्त करना चाहते हो प्राप्त कर लो फिर 1 वर्ष के पश्चात तुम्हारा सामना मुझसे होगा यदि तुम उस समय हार गए तो तुम्हारा सारा आश्रम सारे अनुयायी और नगरवासी सब मेरे मालिक को ही अपना भगवान मानेंगे , क्या तुम मेरी इस चुनौती को स्वीकार करते हो।। यदि तुम्हें अपने देवता गजेंद्र पर इतना विश्वास और श्रद्धा है तो अवश्य तुम मेरी चुनौती को स्वीकार करोगे , क्योंकि यदि मैं हार गया तो मैं प्रायश्चित भी करूंगा और जो भी तुमको कहोगे वह सब मैं कर लूंगा।।

विजयानंद -- मैं तैयार हूं गुरुदेव। मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूं , परंतु यह आप भी जानते हैं कि मेरे पास देवता का दिव्य क्रिस्टल नहीं है , जो अनेक दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण था और श्वेत उर्जा का स्रोत था , वह तो क्रिस्टल आप ले गए थे, फिर भी मैं प्रयत्न करूंगा, सत्य के पथ पर मेरा सर्वस्व न्योछावर हो जाए तो भी मुझे प्रसन्नता ही होगी ।।

याग्नेश अपनी जेब से सफेद क्रिस्टल निकालते हुए विजय आनंद की ओर बढ़ा देता है

याग्नेश -- हा हा हा हा ( जोर से हसते हुए ) तुम क्या सोचते हो कि तुम मुझे इस सफेद क्रिस्टल की शक्तियों से मुझे हरा दोगे तो यह लो अपना क्रिस्टल भी तुम ही रख लो अब मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।।

विजयानंद क्रिस्टल को दोनों हाथों से थाम लेता है और अपने माथे से लगाकर उसे देखता है

विजयानंद -- धन्यवाद गुरुदेव । जो आज आपने इस आश्रम की धरोहर वापस की है , जानता हूं कि इस समय यह क्रिस्टल पूर्ण रूप से शक्तिहीन हो गया है, परंतु मुझे अपने देवता गजेंद्र पर पूर्ण विश्वास है शीघ्र ही में अपने तप और आराधना से इस क्रिस्टल को पूर्ववत दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण कर दुंगा। इतना कहकर विजयानंद यग्नेश को प्रणाम करता है ।।

याग्नेश एक नजर विजयानंद को देखता है , उसे आज भी उस में कहीं ना कहीं वह छोटा विजय नजर आता हैं, जो कभी बाबा बाबा कहते हुए नहीं थकता था । याग्नेश भी उसे बहुत अधिक प्रेम करता था एक गहरी सांस छोड़ कर विजय को देखकर उमड़े हुए भावनाओं के वेग को अपने भीतर दबाए याग्नेश मुड़ गया और तेज कदमों से आश्रम के बाहर निकल गया।।

याग्नेश आश्रम से निकलकर चौक से होते हुए नगर के पूर्व दिशा की ओर बढ़ गया , यहां था नगर के राजा सुजान सिंह का विशाल राज भवन ।

याग्नेश को उसके मरते हुए अनुयाई ने गुफा के हमलावरों की जो पहचान बताई थी उसके अनुसार उसे यह तो पता हो गया था की वह हमलावर आश्रम के ही किसी सेना ने किया था यदि इस हमले में विजयानंद का कोई हाथ नहीं था तो आश्रम की ही दूसरी टुकड़ी जो राजा सुजान सिंह आदेशों पर , काम करती थी जिसका निर्माण आश्रम को बाहरी हमलों से बचाने के लिए हुआ था ।

विजयानंद की बातें सुनकर याग्नेश को पूर्ण रूप से विश्वास हो गया था उसकी गुफा में हुए हमले के पीछे सुजान सिंह का ही हाथ है । हो ना हो सुजान सिंह के कहने पर ही उस दूसरी टुकड़ी ने उसके निवास स्थान को तहस-नहस कर दिया था ।

आज याग्नेश जिस परिस्थिति में था उसमे बहुत बड़ा हाथ राजा सुजान सिंह का था । जो अपने लोभ के कारण आश्रम की अकूत संपत्ति और दिव्य वस्तुएं को प्राप्त करना चाहता था। राजा सुजान सिंह ने याग्नेश और उसके परिवार के विरुद्ध कौन सा षड्यंत्र रचा था यह सब आगे कहानी में पता चलेगा
याग्नेश सुजान सिंह के रचे हुए षड्यंत्र को अब भलीभांति जान चुका था।।

यह राज महल नगर के पूर्व दिशा में स्थित था। राज महल के चारों ओर ऊंची ऊंची दीवारें और विशाल द्वार उसकी शोभा बढ़ाते हैं । राज महल के भीतर किसी कक्ष में राजा अपने मंत्रियों के साथ बैठा अपने षड्यंत्र के अंतिम चरण पर विचार कर रहा था।

राजा सुजान सिंह -- हा हा हा हा अब बहुत ही शीघ्र मेरा वर्षों का सपना पूरा होने जा रहा है अब आश्रम की संपूर्ण संपत्ति और नगर इन सब पर केवल हमारी ही सत्ता होगी।
हमारे पूर्वजों द्वारा जो गलती हुई थी , उसे हम सुधरेंगे नगर का राजा होने के पश्चात भी यहां के आधे से ज्यादा अधिकार आश्रम के पद आसीन आचार्य के पास होते थे । परंतु अब ऐसा नहीं होगा, अब ना होगा कोई आश्रम और ना होगा कोई आचार्य , अब नगर की संपूर्ण सत्ता केवल हमारे ही हाथों में होगी।

अब तक तो आचार्य विजयानंद याग्नेश के हाथों मारा जा चुका होगा । विजयानंद के बाद आचार्य के पद को संभालने योग्य हमने कोई योग्य शिष्य छोड़ा ही नहीं इस परिस्थिति में अब आश्रम के संपूर्ण अधिकार हमारे होंगे।

आइए जानते हैं राजा सुजान सिंह के मंत्रिमंडल और कुछ विश्वास पात्रों के बारे में जिनका इस कहानी के भूतकाल वर्तमान काल और भविष्य काल में महत्वपूर्ण भूमिका होगी


राजा सुजान सिंह -- एक ऐसा राजा जो अपनी महत्वकांक्षा, लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इसे शुरू से ही आश्रम के गद्दी खटकती थी यह किसी भी प्रकार आश्रम की परंपरा को समाप्त करके इस नगर पर अपना एक छत्र राज्य चाहता था।।

सेनापति समर सिंह -- एक ऐसा ही योद्धा जो शूरवीर , नेक दिल और मातृभूमि के लिए कुछ भी कर गुजरने की भावना रखता था। सेनापति समर सिंह राज महल की सेना के साथ साथ आश्रम की सेना के भी सेनानायक थे ।

सेनानायक के साथ-साथ यह आश्रम के योद्धाओं को और विद्यार्थियों को युद्ध कला और शस्त्र विद्या की भी शिक्षा देते थे याग्नेश को भी हर प्रकार की युद्ध कला और शस्त्र विद्या की शिक्षा देने वाले समर सिंह ही थे एक तरह से कहा जाए समर सिंह याग्नेश के शास्त्र विद्या के गुरु थे ।।


राजगुरु विद्याधर -- ये इस राज परिवार के राजगुरु थे , अपने से ज्यादा सम्मान और अधिकार आश्रम के आचार्य को प्राप्त होता देखकर इनके भीतर ईर्ष्या और जलन ने जन्म लिया जिसके कारण इन्होंने सुजान सिंह के अहंकार को अपनी कुटिल बुद्धि और षड्यंत्र की हवा दी सुजान सिंह के द्वारा किए गए सारे षड्यंत्र के पीछे मुख्य हाथ और मस्तीष्क राजगुरु विद्याधर का ही था।

महामंत्री विरुपाक्ष -- यह एक ऐसा पात्र है जो बहुत ही कुटिल चालाक चापलूस और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला है

विक्रम सिंह -- जिसकी बली कहानी के प्रथम अध्याय में याग्नेश के द्वारा दी गई इसका संबंध याग्नेश के भूतकाल से है जो कहानी मैं आगे पता चलेगा।


युद्धवीर सिंह -- विक्रम सिंह का बेटा जो स्वभाव से अति क्रूर और कामवासना से भरा हुआ था

इस कहानी में और भी अनेक पात्र है जिनका विवरण जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ेगी वैसे-वैसे होगा

राजा की बातें राजगुरु पूरी गंभीरता पूर्वक सुनते हुए कुछ विचार कर रहा था राजा की बात समाप्त होते ही राजगुरु बोल पड़ा

राजगुरु महाराज -- यदि आप से अभय प्राप्त हो तुम्हें एक बात आपके सामने रखना चाहता हूं।।

सुजान सिंह -- कहो क्या कहना चाहते हो।

राजगुरु -- महाराज आपकी चाल तो अति उत्तम है परंतु यदि याग्नेश ने विजयानंद पर कोई वार ना किया और उसे हमारी सच्चाई पता चली तब उस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए इस पर भी हमें विचार करना होगा।।

सुजान सिंह -- राजगुरु तुम मुझे क्या समझते हो , इन सब बातों पर मैं पहले ही विचार कर चुका हूं । यदि याग्नेश को हमारी चाल का पता भी लग गया और वह यहां पर हमसे अपना प्रतिशोध लेने आया तो उसका भी प्रबंध हमने कर दिया है यहां उसका सामना होगा उसके अपने ही गुरु से यदि वो उससे भी बच गया तो उसके लिए हमने और भी जाल बिछाए हैं जिन से आज तक कोई बच नहीं पाया आज किसी भी प्रकार से हमें याग्नेश नाम के इस कांटे को निकालना ही हैं और रही बात विजयानंद की तो उसके लिए भी हमने कुछ सोच रखा है ध्यान रहे राजगुरु जहां शत्रुओं की सोच समाप्त होती है वैसे हमारी सोच शुरू होती है

युद्धवीर सिंह तुम शीघ्र ही समर सिंह से जाकर मिलो और उन्हें तैयार रहने को बोलो , आज किसी भी कीमत पर याग्नेश यहां से बचकर नहीं जाना चाहिए

युद्धवीर सिंह -- जी महाराज, मैं भी याग्नेश को शीघ्र ही समाप्त करना चाहता हूं । जिसने अंधविश्वास के नाम पर मेरे पिता की बलि चढ़ाई है और मेरी बहन को न जाने कहां छुपा रखा है इतना कहकर युद्धवीर सिंह अपने आसन से खड़ा हुआ और सुजान सिंह को प्रणाम करते हुए समर सिंह की ओर निकल पड़ा।।

महामंत्री विरुपाक्ष -- वाह महाराज वाह आपने क्या खूब जाल बिछाया है , आज तो उस याग्नेश की कहानी खत्म आपके रची हुए व्यू का सामना याग्नेश तो क्या संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी नहीं कर सकता , इसलिए तो मैं कहता हूं कि आप ही हमारे भगवान हैं सर्वश्रेष्ठ हो।।

अभी यहां यह लोग बातें कर ही रहे थे के ताभी महल के मुख्य द्वार से एक जोरदार धमाके की आवाज आई
ऽऽधडाम् 💥💥💥💥💥


आज के लिए इतना ही , अगला अध्याय शीघ्र ही आशा करता हूं यह कहानी आपको अच्छी लग रही हो
आप सभी पाठकों का साथ देने के लिए ह्रदय से धन्यवाद, खुश रहें स्वस्थ रहें।
आपका
मित्र 👉 अभिनव🔥
Saari burayi ki jad iss Raja k drabar se shuru hoti h sara kuch isi ka kia dhara h jo aaj Yagnesh aisa bana ab dekhna yeh ki Raja n jo jaal bichaya h usme fasta h Yagnesh ya fir aaj raja ka akbri din h
Bahot khoob shaandaar update bhai
 

Naik

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अध्याय -- 6

महामंत्री विरुपाक्ष -- वाह महाराज वाह आपने क्या खूब जाल बिछाया है , आज तो उस याग्नेश की कहानी खत्म आपके रची हुए व्यू का सामना याग्नेश तो क्या संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी नहीं कर सकता , इसलिए तो मैं कहता हूं कि आप ही हमारे भगवान हैं सर्वश्रेष्ठ हो।।

अभी यहां यह लोग बातें कर ही रहे थे के ताभी महल के मुख्य द्वार से एक जोरदार धमाके की आवाज आई
ऽऽधडाम् 💥💥💥💥💥

अब आगे --------------


वहां महल के द्वार के भीतर काले वस्त्रों में हजारो सशस्त्र सैनिकों की दो दुकड़िया किसी भी प्रकार के हमले के लिए सज्ज थी उन दो टुकड़ियों की अगवाई दो घुड़सवार सेनानायक कर रहे थे।

यहां याग्नेश जब महल के द्वार पर पहुंचा तब उसने सबसे पहले काली शक्तियों के कवच से अपने आप को सुरक्षित कर लिया।

उसके पश्चात उसने अपने भीतर की शक्तियों को जागृत करके अपने नेत्र खोलें , उसके नेत्रों से नीले रंग की तीव्र किरणें निकली जिसके लगते ही महल का मुख्य प्रवेश द्वार एक बड़े धमाके के साथ ध्वस्त हो गया।

द्वार के साथ-साथ उसके निकट खड़े हुए द्वार पर तैनात सैनिकों के भी परखच्चे उड़ गए।

याग्नेश ने मुख्य प्रवेश द्वार के ध्वसत होते ही जैसे अपना पहला पग भीतर रखा वैसे ही वहां का मौसम अचानक बदलने लगा तारों से टीमटीमाता आकाश भयंकर काले मेघो से भर गया बिजलिया चमकने लगी और घोर गर्जना होने लगी जिससे वहां का मौसम और भी भयावह हो गया।


अचानक आए हुए मौसम में इस बदलाव को देखकर और टूटे हुए द्वार की और वहां पहरे पर मौजूद सैनिकों की दुर्दशा देखकर सेना की दोनों टुकड़ियों में भय उत्पन्न हो गया उनकी नजर सामने खड़े काले चोंगे खड़े आचार्य याग्नेश पर पड़ी जो आज किसी मृत्यु दूत की भांति लग रहा था।

सैनिकों के भीतर पनपते डर को देखकर उनके सेनानायक ने अपने सेना ढाढस बंधाने के लिए जोर से गर्जना करते हुए कहा

सेनानायक -- देव नगर के सेना के शूरवीरो इस माया को देखकर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है , मत भूलो कि तुमने अपने पिछले युद्धो मे ऐसे कई परिस्थितियों का सामना वीरता पूर्वक किया है, मत भूलो कि हमारे देवता गजेंद्र का आशीर्वाद सदैव हम पर है इस हत्यारे याग्नेश के छोटे मोटे जादू के प्रयोग देखकर भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आज हम अपने देवता गजेंद्र के अपराधी को दंड देकर उसका शीश काटकर अपने देवता को अर्पण करेंगे इसलिए सज्ज हो जाओ और घेर लो इसे----

अपने सेनानायक की बात सुनकर सभी सैनिकों के भीतर का डर चला गया और दोनों सेना की टुकड़ियों ने याग्नेश को घेर लिया।

अपने आप को उन सैनिकों द्वारा घेरे जाने को देखकर याग्नेश गोर गर्जना करते हुए बोला

याग्नेश-- हट जाओ तुम सब तुम सब से मेरी कोई शत्रुता नहीं है यदि अपने प्राणों की रक्षा करना चाहते हो मेरे सामने से हट जाओ यह मेरी तुम सबके लिए अंतिम चेतावनी है।

सेनानायक -- लगता है अपने समक्ष मृत्यु को देखकर तुम भयभीत हो गए हो याग्नेश, इसीलिए व्यर्थ का प्रलाप कर रहे हो अब अपनी मृत्यु के लिए सज्ज हो जाओ।

सैनिकों देख क्या रहे हो समाप्त कर दो इसे आक्रमण-----

सेनानायक के इतना कहते ही दोनों टुकड़ियों के प्रथम श्रेणी में खड़े हुए सारे सैनिक अपने शस्त्र लिए याग्नेश की ओर दौड़ पड़े।

उन्हें अपनी ओर बढ़ते हुए देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक क्रुर मुस्कान उमर आई

याग्नेश - मेरी चेतावनी को प्रलाप समझने वालो अब तूम सब मृत्यु के लिए तैयार हो जाओ


इतना कहते हुए याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए जिनमें से एक साथ सैकड़ों नुकीली चकरिया निकाल करो 9 सैनिकों के शरीर में प्रवेश कर गई और इसके साथ ही उन सब की दर्दनाक चीखें वहां गूंजने लगी देखते ही देखते हम सैनिकों के शरीर के टुकड़े कट कट कर जमीन पर गिरने लगे

अपने साथियों सैनिकों की यह दुर्दशा देखकर पीछे खड़े सभी सैनीक भय के मारे कांपने लगे

अपने सैनिकों की मना स्थिति को समझते हुए दूसरा सेनानायक सैनिकों का ढाडस बंधाते हुए बोला

" इस प्रकार भयभीत होने से कुछ नहीं होने वाला मत भूलो कि तुम इस समय युद्ध भूमि में हो अपनी उर्जा को एकत्रित करो और वार करो"

इतना कहकर उस सेनानायक ने अपने सैनिकों की तरफ कुछ इशारा किया जिसे वह बखुबी समझ गये

सभी सैनिकों ने अपनी उर्जा को एकत्रित किया और अपने शस्त्रों को याग्नेश की ओर कर दिया याग्नेश अभी कुछ समझ पाता तभी उन सभी सैनिकों के शस्त्रों से उर्जा कीरणे निकलकर एक हो गई और बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश को जाकर लगी

याग्नेश को उन सैनिकों से इस प्रकार के हमले की कोई आशंका नहीं थी यह सब कुछ ही पलों में हुआ जिससे याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह ऊर्जा किरण बड़ी तीव्रता के साथ याग्नेश के सीने में जाकर लगी।


काली शक्तियों के कवच के कारण यह वार याग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाया परंतु इसकी तीव्रता के कारण वह पीछे की ओर कुछ कदम लड़खड़ा या परंतु फिर संभल कर खड़ा हो गया।

यहां सैनिक फिर से अपने अगले वार करने की तैयारी में लग गए और फिर एक बार ऊर्जा किरण चमकी और याग्नेश की तरफ बढ़ी याग्नेश ने उस वार को रोकने के लिए अपने हाथ आगे किए

अभी वह इस बार को रोकता के तभी किले की दीवार पर तैनात धनुर्धर ओके धनुष से एक साथ सैकड़ों तीर साए साए करते हुए याग्नेश की तरफ बढ़े


यह दो तरफा हमला जितनी तीव्रता के साथ हुआ था यदि याग्नेश की जगह कोई और होता तो उसकी जीवन लीला यहीं समाप्त हो जाती

परंतु याग्नेश भी कोई कम नहीं था उसने एक हाथ से अपनी ऊर्जा प्रकट करके सैनिकों की उर्जा के वार को रोक दिया था और दूसरे हाथ की ऊर्जा से उन तीरों का रुख शत्रु सेना की ओर ही मोड़ दिया जिससे सैकड़ों चीखें एक बार फिर वहां गुंजायमान होने लगी।


धनुर्धर द्वारा किए गए वार को समझने और रोकने के लिए याग्नेश को जितना समय लगा इतने समय में कुछ तीर याग्नेश को भी आकर लगे काली शक्ति की उर्जा के घेरे में होने के कारण वह तेरी अग्नेश का ज्यादा कुछ तो नहीं बिगाड़ पाए परंतु फिर भी हल्के हल्के घाव तो दे ही गये।

याग्नेश के लिए एक आश्चर्य की बात थी के उन साधारण धनुर्धर ओके तीर उसके काली शक्ति की उर्जा के घेरे को कैसे भेज सकते हैं परंतु अभी समय सोचने का नहीं था वार करने का था

याग्नेश ने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाएं और कुछ मंत्र बुदबुदाया इसके साथ ही उसकी आंखें चमकने लगी और आकाश से बिजली की तरंगे उन सैनिकों पर पड़ने लगी उनकी दर्दनाक चीखें एक बार फिर वहां गूंजने लगी।

अपने सैनिकों की ऐसी दुर्दशा देखकर एक सेनानायक ने अपने घोड़े को संपूर्ण गति के साथ याग्नेश की ओर दौडाया, वायु की सी गति के साथ याग्नेश की दाई ओर जोर से टकराया ।

याग्नेश का ध्यान पूरी तरह से सैनिकों पर था। टक्कर का वेग इतना था कि याग्नेश को संभलने का मौका नहीं मिला और वह दाई और कुछ दूर जाकर गिरा।


परंतु इससे वह सेनानायक और उसका घोड़ा बच नही पाये, वहा याग्नेश की विद्युत उर्जी के कारण पूरी तरह से झुलस गये ।

इस अप्रत्याशित हमले के कारण याग्नेश का क्रोध अब बहुत बढ़ गया था उसकी आंखें अंगार उगलने लगी थी अब तक इस युद्ध को वह सहजता से ले रहा था।

परंतु अब नहीं--- उसने अपने दोनो हाथ आकाश की ओर फैलाए और काली शक्ति के प्रचंड समूल प्रणांनतक ऊर्जा का आह्वान करने लगा यह एक ऐसा वार था, जो वहां उपस्थित संपूर्ण जीवधारी चाहे वह जीव जंतु हो या आकाश में उड़ने वाले पंछी सभी को पल भर में राख के ढेर में बदलने की क्षमता रखता था।

वहीं दूसरी ओर महल के भीतर जब राजा सुजान सिंह अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा कर रहे थे उसी समय मुख्य द्वार के ध्वस्त होने की ध्वनि ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

उस ध्वनि से राजा इतना तो समझ गया था मुख्य द्वार ध्वस्त हो गया है और उसका सबसे बड़ा शत्रु याग्नेश जिसके आने की वह प्रतीक्षा कर रहा था वह आ चुका है।

सुजान सिंह को अपनी योजना पर पूरा भरोसा था उसे यकीन था के आज वह याग्नेश नाम के इस कांटे को जड़ से उखाड़ फेंकेगा।

सुजान सिंह -- चलो साथियों जिस पल की हमें प्रतीक्षा थी वह सन्मुख है चलो जरा अपने बाल सखा का स्वागत तो कर ले
सेनापति जी, युद्धवीर सिंह, राजगुरु जी चलो अपनी योजना को मूर्त रूप देने का समय आ गया है परंतु ध्यान रहे जरा सी भी चूक भयंकर परिणाम को निमंत्रण दे सकती है।


इतना कहकर राजा सुजान सिंह और साथ ही साथ सभी महल से निकलकर मुख्य द्वार की दिशा में बढ़ चले जहां से अभी सैनिकों की दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थी।

यहां याग्नेश लगभग प्रणांतक ऊर्जा का आह्वान कर चुका था, जिसका असर उसके प्रयोग करने से पूर्व ही सैनिकों पर दिखाई देने लग गया था , उस अस्त्र के प्रभाव से कई दुष्ट आत्माए वहां प्रकट हो गई थी जो अस्त्र के प्रयोग होते ही वहां मौजूद सभी शरीर धारियों के प्राणों को सोख लेने के लिए तत्पर थी उनकी डरावनी आवाजें वहां के वातावरण को और भी भयावह बना रही थी।


युद्ध भूमि में अपने साथियों के कटे हुए शव और बहते हुए रक्त को देखकर सैनिक पहले ही भयभीत थे अपने किसी भी वार का याग्नेश पर कोई भी असर ना होता हुआ देखकर हताश भी थे और रही सही कसर इस भयंकर अस्त्र के आवाहन से प्रगट हुई दुष्ट प्रेत आत्माओं की ध्वनि ने पूरी कर दी अब उन सब को अपनी मृत्यु स्पष्ट नजर आने लगी थी।

याग्नेश ने एक नजर बची हुई शत्रु सेना पर डाली और अपने आव्हान किए हुए अस्त्र का प्रयोग करने ही वाला था के एक श्वेत ऊर्जा का बड़ा सा गोला उस अस्त्र की काली शक्तियों की ओर जा से टकराया और देखते ही देखते जितने भी दुष्ट आत्माएं वहां प्रकट हुई थी सभी पल भर में लुप्त हो गई।

अपने इस भयंकर अस्त्र को विफल होते हुए देखकर याग्नेश को बड़ा आश्चर्य हुआ और साथ ही मेघ की गर्जना की तरह जानी पहचानी एक आवाज उभरी

" रुक जाओ इन साधारण सैनिकों पर अपनी प्रचंड काली शक्तियों की ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तूने लज्जा नहीं आई क्या यही है तुम्हारी वीरता या इन काली शक्तियों ने तुम्हें अंदर से खोखला कर दिया है "


इस जानी पहचानी आवाज को सुनकर और आवाज की दिशा में खड़े व्यक्ति को देखकर याग्नेश के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई

आज के लिए इतना ही -----अगला अपडेट शीघ्र ही-------
सभी पाठकों से निवेदन हैं इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें आपके सहयोग का अभिलाषी -----
आपका मित्र ------- अभिनव 🔥
Bahot zaberdast
Yagnesh n tow poora intizam ker dia tha isa bahyanker astr ka istemal kerke lekin beech yeh kon aa gaya jisne rok dia
Kon h yeh band jiski awaz sunker Yagnesh k chehre per muskan aa gayi
Dekhte h kia hota h aage
Badhiya shaandaar update bhai
 

jaggi57

Abhinav
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Bahot khoob shaandaar update bhai
Aisa lag raha h jab Yagnesh per pareshania aani shuru huwi tab use koyi sahi rasta dikhane wala nahi mila kia kerna chahiye islye woh aisa bab gaya or woh jo प्रतिलिपि mili use woh sahi se samajh nahi paya
Baherhal dekhte h aage kia hota h
Bahot khoob shaandaar update bhai

Yagnesh ko ek mauka mila tha apne aap ko sudharne
Lekin woh bhi gawane jaa raha h
Woh Divya purush ki baato ka aser ulta hi oad gaya
Sulekha m kon si shkti aa gayi jise haath lagate hi Yagnesh ko jhatke lage
Baherhal dekhte h aage kia hota h
Bahot khoob shaandaar update bhai

Tow Yagnesh ab poora ka poora shaitan bana gaya iblis ka beta
Lagta h acharya Vijayanad ka namber aa gaya h dekhte h kia hota h
Badhiya update
Bahot zaberdast
Yagnesh n tow poora intizam ker dia tha isa bahyanker astr ka istemal kerke lekin beech yeh kon aa gaya jisne rok dia
Kon h yeh band jiski awaz sunker Yagnesh k chehre per muskan aa gayi
Dekhte h kia hota h aage
Badhiya shaandaar update bhai


Bhaut bahut dhanywad Naik bhai aapke iss shandaar aur bahut hi behtareen tarike se likhe gaye Reviews k liye 👌👌👌

aap k jaise behtareen pathako k reviews hi hume kahani likhne ki prerna dete hai

Bas aise hi saath banaye rakhe💐💐💐
 
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