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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

jaggi57

Abhinav
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बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय कहानी है भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई आपकी शानदार सहयोग के लिए ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें💐💐💐
 

jitutripathi00

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अध्याय- 2

ये थे आचार्य यग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे।
इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

अब आगे ---

कोई एक घंटे बाद, आचार्य अपनी घोड़े पर पूर्व की ओर दौड़ते हुए, पहाडी रस्तो से होते हुए मैदानी इलाकों में पहुचे, अब तक उनका क्रोध थोडा ठंडा हो गया था।

परंतु एक प्रश्न उनके मन में अभी भी चल रहा था की, आखिर क्यों उनके साथ ऐसा हुआ उनके परिवार ने पीढीयो से देवताओं की पूजा की थी , अपना सारा जीवन लोक कल्याण और लोगों की भलाई में लगाया था , फिर भी उन्हें क्या प्राप्त हुआ ।

अपने बीते जीवन के बारे में सोचते सोचते उनके मन में देवताओं के प्रति घृणा और प्रबल हो गई।

दूर आगे ऐसे ही चलते चलते वो उस जगह पहुंचे जहां कभी बचपन में अपनी छोटी बहन के साथ बैठकर पूरे शहर को देखते थे वह एक टीला था जहां से पूरा नगर दिखाई देता ,

इस समय देवनगर की ऊंची-ऊंची दीवारों के ऊपर सैकड़ों मशाले जल रही थी , जो आकाश मे चमकने वाले तारों की भांती लग रहे थे। इस शहर को देखते देखते ही यग्नेश बडा हुआ था ।


आचार्य वही उस टीले पर आंख बंद करके लेट गए और अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगे।

यह रहा देव नगर शहर जो भौगोलिक दृष्टि से उसका क्षेत्रफल किसी बडे राज्य से कम नहीं था ऐसे ही 5 और शहर मिलाकर बनती है यहां की सभ्यता , जो आज भी आधुनिक समाज और सभ्यता से कटी हुई है , या यु कहो के कोई अदृश्य आयाम इसे बाकी पृथ्वी से अलग बनाए हुए हैं ।


पृथ्वी पर रहते हुए भी इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है जो इसी पृथ्वी पर मौजूद किसी अलग आयाम में स्थित हैं।
चारों ओर से पर्वतों से घिरे हरे भरे बाग बगीचे झरने तलाब और अद्भुत जड़ी बूटी से सुसज्जित यहां के घने वन, अद्भुत शिल्पकला, इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है।

यह नगर देवनगर के नाम से विख्यात था। यह नगर चारों ओर से छोटे छोटे मंदिरों से सुसज्जित था और नगर के मध्य में यहां के मुख्य देवता गजेंद्र का विशाल मंदिर था और साथ ही एक बड़ा आश्रम था।

इस मंदिर और आश्रम के आचार्य की बड़ी गरिमा थी यहां आचार्य देवता का प्रतिनिधि मानकर देव तुल्य ही सम्मान देते थे उनका हर आदेश यहां की प्रजा के लिए देवता का ही आदेश माना जाता था।

तीन पीढ़ियों से आचार्य याग्नेश के परिवार के सदस्य ही यहां के आचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे पहले याग्नेश के दादा अग्निवेश यहां के आचार्य बने और उनके बाद याग्नेश के पिता आचार्य विग्नेश ने यहां का पदभार संभाला

जब याग्नेश के दादा की मृत्यु हुई थी तभी याग्नेश बहुत छोटा था परंतु आज भी वह वो दिन नहीं भूल पाया था जिस दिन उसके दादा की मृत्यु हुई थी।

यग्नेश अपने दादा से बहुत प्रेम करता था बिना दादा से मिले उसके दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती थी रोज की तरह इस दिन भी प्रातः वह अपने दादा से मिलने उनके कक्ष में गया

अपने दादा के कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे वह दो चार कदम आगे बढ़ा तो सामने का दृश्य देखकर वह स्तंभित हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई सांसे तेज चलने लगी दिल जोरो से धड़कने लगा सामने उसके दादा का क्षत-विक्षत शव पड़ा हुआ था, उनके शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव से रिस्ता लाल रक्त और सीने में गड़ा हुआ एक बड़ा सा खंजर उस दृश्य को और भी भयावह बना रहा था।

अपने प्यारे दादा को ऐसी स्थिति में देखकर याग्नेश को गहरा सदमा लगा उसके मुख से एक जोरदार चीख निकली और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा , उसकी आवाज सुनकर कक्ष के बाहर मौजूद आश्रम के शिष्य कक्ष के भीतर आए कक्ष के भीतर का भयावह दृश्य देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई ।

अपने प्यारे आचार्य को इस स्थिति में देखकर सबकी आंखों में आंसू आ गए सब क्रंदन करने लगे इस दुखद घटना की सूचना जब विग्नेश तक पहुंची तब वह तुरंत वहां पहुंचा ।

एक तरफ अपने पिता का क्षत-विक्षत शव और दूसरी तरफ नन्हा याग्नेश बेहोश स्तिथी में विग्नेश के नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगे उसने अपने पिता को कई बार पुकारा परंतु उस पुकार का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला।

अपने पिता के बाद उसके कंधे पर आने वाली आश्रम की जिम्मेदारियों को वह जानता था , इसलिए उसने अपने ह्रदय को कठोर किया और अपने पिता के शव को उठाकर उनके आसन पर लिटा दिया ।


तभी वहां कोलाहल शुरू हुआ जब आश्रम के शिष्यों ने वहां मौजूद ऊंचे आसन की तरफ देखा जहां उनका दिव्य क्रिस्टल रखा हुआ होता था उस क्रिस्टल को वहां ना पाकर सभी भयभीत हो गए क्योंकि क्रिस्टल के वहां ना होने का अर्थ था उनके नगर का विनाश।

विग्नेश अभी अपने पिता की मृत्यु के बारे में ही विचार कर रहा था के नगर के विनाश के भय ने भी उसके हृदय को घेर लिया उसने वहां मौजूद सभी को शांत रहने का परामर्श दिया और क्रिस्टल वापस लाने का आश्वासन दिया।

आश्रम के बाकी शिष्य विग्नेश का बड़ा आदर करते थे , इसलिए उसकी बात मानकर सब शांत हो गए विग्नेश ने उन सब को अपने पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी करने को कहां और सभी को कक्ष से बाहर भेज दिया।

सभी के कक्ष के बाहर जाने के बाद विग्नेश उस पक्ष में कुछ ढूंढने लगा, वह अपने पिता को अच्छी तरह जानता था ,उसे पता था कि मृत्यु से पूर्व का उसके पिता ने कुछ ना कुछ क्रिस्टल के बारे में निशान छोड़े होंगे।

ढूंढते ढूंढते उससे एक जगह रक्त से बने हुए कुछ चिन्ह मिले जिन्हें देखकर वह समझ गया कि उसके पिता ने वह क्रिस्टल कहां रखा हुआ है शायद उसके पिता को इस स्थिति का पूर्व अंदेशा था इसलिए उन्होंने विग्नेश को कई तरह के गुप्त चिन्हों और आश्रम में पदासीन आचार्यों के रहस्य के बारे में सब कुछ बता दिया था।

वह अपने पुत्र की योग्यता को जानते थे और यह भी जानते थे, कि उनके बाद उनका पुत्र विग्नेश ही आचार्य के पद को संभालेगा

विग्नेश सबकी नजर बचाते हुए कक्ष में मौजूद पत्थर के चबूतरे के पास पहुंचा जहां उनके प्रमुख देवता गजेंद्र की प्रतिमा रखी हुई थी ।

उसने उस प्रतिमा को पहले प्रणाम किया फिर तीन बार उस प्रतिमा को घुमाया तभी उस पत्थर के चबूतरे के पीछे एक छोटा सा द्वार प्रगट हुआ विग्नेश उस द्वार में प्रवेश कर गया और नीचे की सीढ़ियां उतरते हुए वह वहां के गुप्त कक्ष में पहुंचा।

यह एक ऐसा गुप्त कक्ष था जिसके बारे में केवल आश्रम के पदासीन आचार्य को पता होता था , इस कक्ष में आश्रम का गुप्त खजाना और भी कई तरह की दिव्य जड़ी बूटियां और अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे ।

विग्नेश ने उस कक्ष में एक आसन पर रखे दिव्य क्रिस्टल की तरफ देखा उसने उस क्रिस्टल को लाल कपड़े में लपेटा और वापस उसी रास्ते से होकर अपने पिता के कक्ष में आया और क्रिस्टल को उसके यथा योग्य स्थान पर स्थापित कर दिया।


क्रिस्टल के वहां स्थापित होते वहां एक अदृश्य सुरक्षा घेरा प्रकट हुआ ।

विग्नेश ने क्रिस्टल के मिलने की सूचना आश्रम के बाकी शिष्यों तक पहुंचाई क्रिस्टल की मिलने की सूचना पाकर सभी का भय दूर हो गया उसके बाद ही था योग्य रीति से विग्नेश के पिता का अंतिम संस्कार किया गया।

जब तक याग्नेश को होश आया तब तक उसके दादा राख में बदल चुके थे अगले कई दिनों तक याग्नेश की स्थिति बड़ी विकट थी रोज रात को वह अपने दादा को पुकारता हुआ चीखता हुआ उठ जाता था , अपनी दादा की वह खुली आंखें और रक्तरंजित शव का दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।


परंतु कहते हैं ना कि समय गहरे से गहरे घावो को भर देता है याग्नेश के साथ भी ऐसी हुआ ।

परंतु उसके घाव पूरी तरह तो नहीं भर पाए , कभी-कभी आज तक ईतने वर्षो बाद , भी उसे उसके दादा के मृत्यु का वह दृश्य सपनों में उसे डराते है।

समय आगे बढता गया , वहा के राजा और आश्रम के अनुयायियो ने सर्वसम्मति से विग्नेश को वहां के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया।।

अपने अतीत के बारे मे सोचते हुए याग्नेश उस टीले पर लेटा हुआ था के तभी आकाश में बादलों की गर्जना की आवाज के कारण वह अपने अतीत से बाहर आया, उसने एक नजर नगर में टिमटिमाते हुए मशालों पर डाली और एक गहरी सांस छोड़ी।

उस नगर का राजा और कुटिल मंत्री राजगुरु शायद इस समय अपने महंगे घरों में सुरक्षित और गर्म होकर सोए थे।
गजेन्द्र के अनुयायिओं के कुलपतियों की कमी नहीं थी।

नगर के मध्य में स्थित वहां के देवता के मुख्य मंदिर के शिखर पर जब उसकी नजर पड़ी तो उसके जबड़े क्रोध के कारण भी कि गए आंखें लाल हो गई जिस गजेंद्र को उसकी कई पीढ़ियां और नगर के सभी लोग सदियों से देवता मानकर पूजते थे क्या वह सही में कोई देवता है या कोई शैतान

आखिर उसकी पूजा करके उन्हें क्या मिला दुख दर्द अपनों से जुदाई और हृदय पर गहरे घाव।

याग्नेश जानता था कि देवता उसी को कहते हैं जो सबको निस्वार्थ भाव से अपनी करुणा देता है , उसे नही जो अपने मानने वालो को ही दुःख दे ।

उसका मानना था के यहां का देवता जिसने नगर वासियों की और उसकी खुशियां छीनी है वो कोई देवता नही हो सकता ।

उसने देवता गजेन्द्र के विरुद्ध युद्ध का मानो बिगुल फुंक दिया था और इस राह पर चलते चलते कब वह मानव से दानव बन गया था उसे पता ही नही चला, आज वह शक्तिया प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने अपने ही लोगो की बलीया चढा चूका था ।


याग्नेश के पिता आचार्य विघ्नेश जिन्होंने सदैव ही अपने ज्ञान अपनी शक्तियों का उपयोग जनकल्याण और पीड़ितों रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया, उन्हें भी अपने परिवार को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा अपने परिवार की रक्षा करते करते स्वयं भी अनजाने बीमारी का शिकार हो गए थे ।

उनके पिता अजीब बीमारी से मरने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के पश्चात अपनी बीमार मां के प्राणों की रक्षा के लिए याग्नेश ने पिता से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग किया परंतु सभी प्रयास उसके विफल रहे उसने देवताओं के कई अनुष्ठान किए प्रार्थनाये कि , देवताओं ने भी उनके जीवन के कई वर्ष ले लिए ।

शुरुआत में, लगा यह सब प्रार्थनाये काम कर रही हैं , और वह कुछ स्वस्थ भी हो गई थी । परंतु पुनः बीमारी वापस आ गई और याग्नेश के माता को निगल गई ।


जीवन में इतना कुछ सहने के पश्चात भी याग्नेश की धर्म के प्रति श्रद्धा आस्था कम नहीं हुयी , वो अपना कार्य निरंतर करता रहा और इसी के फलस्वरूप अपने पिता के पश्चात वहां के अनुयायियों ने याग्नेश को वहा के आचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया।

जीवन चक्र का पहिया एक बार फिर घुमा, इस बार याग्नेश की बहने उस अनजाने रोग से ग्रसित हो गई थी।

वह किसी भी प्रकार अपने माता पिता की तरह अपनी बहनों को खोना नहीं चाहता था, चाहे उसे इसके लिए कुछ भी करना पड़े ।

याग्नेश इस रोग का समूल नाश करना चाहता था उसे भय था के कही उसकी पत्नी नीरजा और उसका नन्ना सा पुत्र देव भी कहीं इस रोग की चपेट में ना आ जाए।

आचार्य के पद पर रहते हुए आचार्य याग्नेश ने देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के शीघ्र उपायों के बारे में अध्ययन किया जहां उसे देवताओं के प्रति किए गए बलिदान विधि की एक प्राचीन प्रतिलीपी कीसी के द्वारा प्राप्त हुई ।


प्राचीन प्रतिलिपि में जीव बली के द्वारा देवताओं की शक्ति प्राप्त करने के कई अनुष्ठानों की विधियां लिखी हुई थी,
याग्नेश ने जब उसे पढ़ा तब उसे प्रथम उस बात पर विश्वास नहीं हुआ देवता कैसे किसी की बलि से प्रसन्न हो सकते हैं ।

परंतु प्रतिलिपि देने वाला भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था वह क्यों उसे इस प्रकार की प्रतिलिपि देगा जिसका कोई उपयोग ना हो इस प्रतिलिपि में लिखे गए अनुष्ठानों को पढकर उसे एक आशा की किरण नजर आई जिससे वह इस अनजाने रोग के भय से निजात पा सकता था।

बहुत सोच समझ कर उसने इस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया परंतु वह इस बात को भूल गया कि बलिदान अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने को कहते हैं।

याग्नेश ने पहला मानव बलिदान एक महिला का किया जो बेघर थी और प्रार्थना करने के लिए उसके मंदीर में आई थी।

उसने अपने निजी कक्ष में उस महिला को भोजन की पेशकश की और अपनी बहनों के लिए प्रार्थना की उसके पश्चात् उसने महिला को सम्मोहीत करके गला रेत कर उसकी बली चढा दी , इस उम्मीद में कि एक जीवन दूसरे को बहाल कर सकता है।

देवताओं ने इस दिए गए बलिदान को स्वीकार नहीं किया। उस दिन से, साधारण प्रार्थनाओं ने भी उनके लिए काम करना बंद कर दिया था।


वह अब दिव्य दृष्टि का उपयोग नहीं कर सकता था या अपनी जीवन शक्ति का उपयोग करके चोटों को ठीक नहीं कर सकता था।

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।

आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

सभी पाठकों से निवेदन है कि उन्हें यह कहानी कैसी लग रही है यह बताएं और साथ ही साथ अपने अनमोल सुझाव दे ---
धन्यवाद 🙏🙏

अगला अपडेट जल्द ही कृपया प्रतीक्षा करें--

आपका अपना मित्र ------अभिनव🔥
Shandar update bhai
 

jaggi57

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अध्याय - 3

आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।
आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र

अब आगे -----

अपने अतीत में खोए हुए याग्नेश की तंद्रा आकाश में होने वाली गर्जना ने भंग की । उस टीले पर लेटे लेटे उसे बहुत वक्त हो गया था। एक बार उसने उस नगर के ऊपर नजर डाली और अपने कपड़ों को झाड़ता होगा खड़ा हुआ।
आकाश में बादल और घने हो गए थे, बिजली के कड़कने की आवाज और तेज चलती हुई आंधी , ने वहां का मौसम भयावह बना दिया था ।

अचानक हुए मौसम में इस बदलाव को देखकर , याग्नेश मन में कुछ सोचते हुए अपने घोड़े की तरफ गया घोड़े पर बैठकर लगाम थामी और अपना घोड़ा वहां से आगे दौड़ा दिया ।

घोड़ा भी थोड़ा आगे चला ही था कि उसके पैर वहीं जम गए और भय के कारण घोड़ा जोर जोर से हिनहिना ने लगा तभी याग्नेश ने आकाश से दो विशाल पंखों वाले किसी जीव को बड़ी तेजी से अपनी तरफ आते हुए देखा।

जैसे ही घोड़ा रुका, धूल का एक बादल उमड़ पड़ा। अपने तरफ तेजी से आते हुए विशाल और अजीब से जीव को देखकर याग्नेश की सांसे तेज हो गई , घोड़ा भी अपने आगे के दोनों पैर उठाकर जोर-जोर से हीनहीनाने लगा । पंख वाला प्राणी उनके पांच मीटर से भी कम दूरी पर उतरा था।
घोडे ने कई बार लात मारी और दौड़ने से पहले याग्नेश को अपनी पीठ से फेंक दिया। याग्नेश कंधे के बल नीचे गीरा , और थोडी दूर तक लूढकता चला गया , उसके कंधे मे तेज दर्द होने लगा ।

बडी कठीनाई से अपने आप को संभालते हुए वो खडा हुआ और अपनी आंखो को मलते हुए उस जीव को देखने लगा , जैसे ही उसने अपने सामने खड़े प्राणी पर नजर डाली, वह दर्द के बारे में सब भूल गया।

सामने वह अजीब सा जीव अब एक सुंदर तेजोमय नौजवान में परिवर्तित हो चुका था। दो श्वेत पंख , अद्भुत तेज, दिव्य आभूषण के साथ वह किसी देवता के समान प्रतीत हो रहा था ,उसके लंबे सुनहरे बाल हवा में उड़ रहे थे और उनकी चमकीली पीली आँखें रात में लगभग चमक रही थीं।

न जाने क्यों उसका वह सुंदर रुप और अद्भुत व्यक्तित्व याग्नेश को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था । न जाने क्यों उसे सामने खड़ा वह तेजोमय पुरुष अपना सा लगने लगा था उसकी वह अद्भुत मुस्कान देखकर याग्नेश के ह्रदय में कई प्रकार की भावनाएं प्रगट हो रही थी वह सब कुछ भूल कर बस एकटक उस तेजोमय पुरुष को देख रहा था।

तभी आकाश में घर गर्जना हुई जिस कारण याग्नेश उस तेजोमय पुरुष के मोहपाश से बाहर आया।

याग्नेश - कौन हो तुम ? और इस प्रकार मेरा मार्ग का क्या कारण हैं ? तुम्हारे इस जादुई खेल का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा इसलिए अपना यह जादुई प्रयोग बंद करो , और सीधी तरह मेरा मार्ग अवरुद्ध करने का कारण बताओ।

तेजोमय पुरुष -- ओह ! मेरे आने मात्र से आपकी यह दशा हो गई फिर भी आप का अहंकार गया नहीं आपको अपनी शक्तियों पर इतना अहंकार है तो चलो पहले उन शक्तियों का प्रयोग करके मुझे बांधकर दिखाओ।

याग्नेश - मैं हूं आचार्य याग्नेश ।। कई जादुई शक्तियों का मालिक , क्या समझते हो तुम कि तुम अपनी इस हरकत से मुझे डरा दोगे , मैं डरने वालों में से नहीं हूं इतना कहकर याग्नेश ने काली शक्तियों का आह्वान किया , परंतु उसे घोर आश्चर्य हुआ क्यों उसकी कोई भी शक्ति वहां काम नहीं कर रही थी ।।

याग्नेश की बातें सुनकर वह दिव्य पुरुष जोर जोर से हंसने लगा उसकी हंसी याग्नेश के कानों को किसी गर्म पिघले हुए शीशे की तरह लग रही थी अपनी हंसी को रोक कर वह दिव्य पुरुष बोल उठा।

दिव्य पुरुष - क्या कहा आपने आचार्य याग्नेश शायद आप भूल गए हो अब आप आचार्य नहीं रहे धर्म के प्रति किए गए विश्वासघात और शक्तियों को पाने की होड़ में किए गए क्रूर कर्मो ने आपसे आचार्य पद कब का छीन लिया है ।

जिन काली शक्तियों को पाने के लिए आपने इतने लोगों की बलि दी वह सब मेरे सामने व्यर्थ है , ध्यान रहे आचार्य अंधेरा जितना प्रबल और घना हो वह प्रकाश के समक्ष नही टीक सकता।

मैं यहां आपको कोई दंड देने नहीं आया, आपके द्वारा पूर्व मे किये गये अच्छे कर्मो के कारण , बस अंतीम चेतावनी देने आया हूं कि अभी भी समय है संभल जाइए अपने पापों का प्रायश्चित करें और वापस सन्मार्ग पर लग जाए तो हो सकता है आपको क्षमा मिल जाए।

याग्नेश - कहीं आप वह तो नहीं जो मैं सोच रहा हूं हां लगता है शायद आप वही हो जिसकी मैं कब से प्रतीक्षा कर रहा था

दिव्य पुरुष - मैं वह नहीं जो आप सोच रहे हो मैं नहीं हूं मैं तो केवल उस परम सत्ता ईश्वर का जिनके आधीन होकर संपूर्ण देवता कार्य करते है उनका एक छोटा सा सेवक हूं । जो आपको अंतिम बार सचेत करने आया हूं

याग्नेश - आखिर मेरा अपराध क्या है, क्यों मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया गया , मेरे अपने , मेरी शक्तियां सब कुछ मेरा आचार्य पद। हमने कई पीढीयो से देवताओ की पूरे तन मन लगाकर उपासना की है , परंतु उसका परिणाम क्या निकला, क्या प्राप्त हुआ मुझे इतनी उपासना श्रद्धा और आस्था से केवल दुख । तुम्हारे ईश्वर ने मेरा सब कुछ मुझसे छीन लिया अब तुम यहां मुझे उपदेश देने आए हो, तब कहा गया था तुम्हारा ईश्वर , जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा आवश्यक्ता थी, चले जाओ यहां से।।

दिव्य पुरुष - आपसे आपका आचार्य पद आपकी शक्तियां और आपके अपनों को आपसे दूर कर दिया गया इसका कारण कोई और नहीं केवल आप है केवल आप ।

आपने धर्म के प्रति विश्वासघात किया है अपनी शरण में आए हुए एक लाचार महिला का बलिदान के नाम पर बड़ी क्रूरता से उसकी हत्या कर दी ,
आपकी इस जघन्य अपराध के कारण ही देवताओं ने आपकी सारी दैवीय शक्तियां वापस ले ली याग्नेश,

वही आपके माता-पिता और बहनों के साथ जो हुआ , वह क्यों हुआ ? क्या कभी आपने यह जानने का प्रयत्न किया है, ईश्वर कभी भी किसी के साथ अन्याय नहीं करता उसके लिए सभी जीव एक बराबर है।
सुख और दुख तो व्यक्ति अपने कर्मों के कारण ही प्राप्त करता है। परंतु मनुष्य से भूलकर सुख को अपना श्रेय देता है और दुखो का दोष ईश्वर को देता है।

याग्नेश - मैंने कोई गलत नहीं किया मैंने वही किया जो आप के देवता उपासना पद्धति के ग्रंथों में लिखा गया है, मैंने उसी में से बलिदान की पद्धति को अपनाया तो बताओ मैं कहां गलत हुआ।

दिव्य पुरुष - आप शायद भूल गए हैं, कि बलिदान किसे कहते हैं । बलिदान उस त्याग को कहते हैं जो दूसरों की भलाई के लिए अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करें आपने तो बलिदान के नाम पर न जाने कितने मासूम लोगों की क्रूरता पूर्वक हत्या की है उसी घोर पाप का दंड आप भुगत रहे हो इसलिए कह रहा हूं के अभी भी संभल जाइए।।

इतना कह कर उस दिव्य पुरुष के पंख फिर से प्रकट हो गए, और वह मुड़ गया, उड़ान भरने के लिए । उडान भरने से पहले उसने याग्नेश की तरफ फिर से देखा और कहा,

"हमने वह किया जो हम मदद कर सकते थे, लेकिन आपके परिवार ने रास्ता गलत चूना और उनसे भी बढकर आप बहुत दूर चले गए, और मेरी कही बातो पर ध्यान दिजीए, आप फिर कभी किसी को चोट न पहुँचाएँ। अपने अपराधो का प्रायश्चीत कजिए।

इतना कह कर वह दिव्य पुरुष उड गया और आकाश मे फिर कहीं खो गया

उसके जाने के बाद याग्नेश थोड़ी देर वही खड़ा रहा उसका चेहरा पहले से और कठोर हो गया शायद उसने मन ही मन कुछ फैसला लिया था वह वापस अपने घोड़े पर बैठा और अपनी गुफा की तरफ निकल पड़ा

जब याग्नेश अपनी गुफा में पहुंचा तो वहां का हाल देख कर वह स्तब्ध रह गया, क्रोध के कारण उसके जबड़े भींच गए सारी गुफा तहस-नहस हो गई थी, गुफा का सारा सामान बिखरा पड़ा था।
उसकी यज्ञ वेदी टूटी हुई थी , उसके लगभग 10 अनुयाई जमीन पर क्षत-विक्षत हालत में जमीन पर पड़े हुए थे शायद सब मृत्यु को प्राप्त हो गए थे ।

याग्नेश अपनी गुफा को देख ही रहा था कि उसे किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी , उसका एक अनुयाई अपनी अंतिम सांसे ले रहा था याग्नेश तुरंत उसके पास पहुंचा और उसे आवाज देकर जगाने का प्रयत्न करने लगा ।

याग्नेश की आवाज सुनकर उसने हल्की सी अपनी आंखें खोली सामने अपने मालिक को देख कर उसने थोड़ी राहत की सांस ली और टूटे फूटे शब्दों में वहां क्या हुआ वह सब बता दिया और अंतिम हिचकी के साथ अपने प्राण त्याग दिए।

अपनी गुफा में घटित इस वीभत्स पूर्ण घटना को देखकर याग्नेश की आंखें लाल हो गई उसका क्रोध चरम सीमा पर पहुंच गया उसका अंतर्मन जो अभी भी थोड़ा जागृत था जो उसे कभी कभी सन्मार्ग पर लाने की सलाह देता था वह भी अब कहीं छुप गया इस घटना ने उसके भीतर के दरिंदे को जगा दिया ।

आज उसे आर या पार की लड़ाई लड़नी थी उसने अपने मन में दृढ़ निश्चय किया और चल पड़ा गुफा के पीछे जहां एक तहखाने में उसका गुप्त कक्ष था।

उस गुप्त तहखाने में एक और एक काला बड़ा सा क्रिस्टल था और दूसरी ओर एक छोटी सी कैद में कुछ कन्याएं बंधी हुई थी जो वहां किसी विशेष बलि के लिए लाई हुई थी
याग्नेश ने अपने कदम उसी तहखाने में बने हुए कैद की तरफ बढ़ाएं और भीतर प्रवेश कर गया।

उन सभी कन्याओं में एक कन्या ऐसी थी जो गुमसुम की एक कोने में बैठी थी, उसके सारे शरीर पर लाल निशान थे वर कन्या अपना सिर दोनों घुटनों के बीच में रखकर आंसू बहा रही थी याग्नेश उस कन्या के आगे जाकर रुका।

याग्नेश - चलो सुलेखा अब तुम्हारा समय आ गया है , तुम्हारे पिता विक्रम सिंह को तो अपने किए की सजा मिली, वह मूर्ख क्या समझता था कि वह अपनी बलि तुम्हें ठीक करने के लिए दे रहा है। " हा हा हा हा "( एक क्रूर हसी के साथ ) बेचारा अपनी अंतिम सांस तक यही समझता रहा कि मैं उसकी मदद कर रहा हूं ।

मदद तो मैं अपनी कर रहा था अपने प्रतिशोध का प्रथम चरण पूरा करने के लिए परंतु जब तक तुम जीवित हो मेरा वह प्रतिशोध का प्रथम चरण पूर्ण नहीं हो सकता।

इतना कहकर याग्नेश ने उसके बाल पकड़कर उसका सिर ऊपर उठाया, अपने पिता के मृत्यु के बारे में सुनकर सुलेखा का मानो ह्रदय फटने को हो गया था वह चीखना चाहती थी चिल्लाना चाहती थी , परंतु उसके मुख से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था ।

उसके नेत्रों से अविरल अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी, उस मृगनयनी के सुंदर नेत्र लाल हो गए थे ,उसने कातर नेत्रों से याग्नेश को देखा उसके नेत्रों को देखते ही याग्नेश को एक जोरदार झटका लगा उसके हाथ सुलेखा के बालों से हट गए याग्नेश ने आगे बढ़कर फिर से उसे पकडना चाहा परंतु हुआ फिर वही एक जोरदार झटका।

ना जाने वह कौन सी शक्ति थी जो उसे सुलेखा के पास आने से रोक रही थी

सुलेखा उसी व्यक्ति विक्रम सिंह की कन्या थी जिस की बलि का उल्लेख इस कहानी के प्रथम अध्याय में किया गया है । विक्रम सिंह कौन था याग्नेश उसे किस बात का बदला लेना चाहता था यह सब आगे कहानी में पता चलेगा ।

याग्नेश को आज अपना संकल्प पूरा करना था जो उसने गुफा में हुई घटना को देखकर लिया था, इसलिए उसने सुलेखा के प्रकरण को कुछ दिन डालने का निश्चय करके , उसी कैद में मौजूद दूसरी कन्या को पकड़ लिया वह कन्या चीखती रही चिल्लाती रही
बार-बार अपने को छोड़ने की प्रार्थना करने लगी , परंतु याग्नेश के कठोर ह्रदय पर उसका कुछ भी असर नहीं हुआ ।

उस कन्या को बालों से घसीट कर याग्नेश उस बड़े से काले क्रिस्टल के सामने लाया और दहाड़ा

याग्नेश -- हे मेरे मालिक कितने दिनों से मैंने तुम्हें इतनी बलिया दी, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी शक्तियों से दूर ---
क्या प्राप्त हुआ मुझे इतने वर्षों की आप की उपासना करके, देवताओं से धोखा खाने के बाद मैंने सोचा शायद आप ही वह हो जो मेरी मदद कर सकते हो , परंतु सब व्यर्थ रहा आज व्यक्ति से जो अपने आप को देवताओं का दूत कह रहा था, उसके सामने मैं विवश हो गया।

मेरी एक भी शक्ति उसके सामने नहीं चल पाई , आखिर क्यों ? आज मुझे आपसे अपने प्रश्नों का उत्तर चाहिए यदि आज भी आपकी साधना बेकार गई तो आज मैं भी अपना जीवन ही समाप्त कर दूंगा क्या फायदा है ऐसी जीवन का जो शक्तिहीन हो असहाय ।

उस काले क्रिस्टल को देखकर वह कन्या समझ गई कि उसके साथ क्या होने वाला है उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर याग्नेश को कातर दृष्टी से देखा और अपने आप को बचाने का आखरी प्रयास किया ,

परंतु अब याग्नेश कोई मानव नहीं दरिंदा बन गया था। उसने उस कन्या के सारे वस्त्र बड़ी निर्दयता पूर्वक फाड़ दिए और उसे पूरा निर्वस्त्र कर दिया उस कन्या ने एक हाथ से अपने स्तन और दूसरे हाथ से अपनी योनि को ढक कर अपनी लाज बचाने का प्रयास किया , परंतु याग्नेश के इरादे कुछ और थे ।

आज के लिए इतना ही, अब देखते हैं आगे इस कहानी के किरदार इस कहानी को किस दिशा और काल में ले जाते हैं ।
अगला अध्याय जल्द ही ।

आप सब पाठकों का साथ देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । खुश रहिए और स्वस्थ रहिए कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव जरूर दें ।

आपका अपना मित्र ---- अभिनव 🔥
 

sunoanuj

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Bahut hi behtarin kahani hai… or aapki lekhni bhi gajab hai mitr… 👏🏻👏🏻👏🏻
 
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