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Incest पाप ने बचाया

Sweet_Sinner

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Index

~~~~ पाप ने बचाया ~~~~

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aman rathore

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Update- 32

अगले दिन सुबह उदयराज जल्दी ही उठ गया, उसे लगा वह काफी जल्दी उठ गया है कहीं रजनी पर उसकी नज़र न पड़ जाए, पर रजनी तो उससे भी पहले उठकर घर में जा चुकी थी।

काकी उठकर अपनी खाट पर बैठी थी, उदयराज ने सुबह का नित्यकर्म किया और काकी ने उसको नाश्ता लाकर दिया, उसने नाश्ता किया और आज अमावस्या की रात से ठीक सातवें दिन का पहला दिन था, रात का उसे बहुत बेसब्री से इंतज़ार था, अपनी किस्मत पर वो फूला नही समा रहा था, सोच सोच कर अपने में ही मुस्कुराये जा रहा था फिर अपने दिल पर काबू करते हुए वो उठा, बैलों को तैयार किया और खेतों की तरफ जाने लगा, बिरजू के घर के नजदीक आकर उसने सोचा एक बार बिरजू से मिल ले।

वह वहीं बैलों को एक पेड़ के पास बांधकर बिरजू के घर गया, बिरजू अभी नाश्ता कर रहा था उदयराज को देखते ही उठ खड़ा हुआ।

बिरजू- अरे भैया आप इतनी सुबह सुबह, आओ बैठो, नीलम, ओ नीलम, अपने बड़े बाबू के लिए नाश्ता ले आ (नीलम उदयराज को बड़े बाबू कहकर बुलाती थी)

उदयराज- अरे नही बिरजू मैं नाश्ता करके आया हूँ, मैं जरा खेतों में जा रहा था बैल लेके सोचा तेरे से मिलता चलूं। (इतना कहते हुए उदयराज खाट पे बैठ गया)

तभी नीलम उदयराज के लिए चाय और महुवे का नमकीन पोहा लेके आयी और आते ही उसने उदयराज को प्रणाम किया।

उदयराज ने नाश्ता किया हुआ था लेकिन फिर भी नीलम की जिद पर उसे ठूस ठूस के खाना पड़ा।

उदयराज- नीलम तू मेरी बिटिया रजनी से कम नही है, वो भी मुझे ऐसे ही जिद करके खिलाती है।

नीलम- बड़े बाबू आपका पद तो पिता से भी ऊंचा है आप तो मेरे बड़े बाबू हैं तो भला मैं आपकी सेवा में क्यों पीछे रहूँगी।

बिरजू- ये बात तो सही है भैया, भले ही बेटा एक बार को पिता की सेवा में पीछे हट जाए पर ये बेटियां कभी पीछे नही हटती, इसलिए ये बेटियां पिता के दिल के इतने करीब होती हैं (बिरजू ने नीलम को देखते हुए कहा)

उदयराज- दिल के करीब नही रहती बिरजू, बल्कि दिल में बसी होती हैं।

नीलम यह सुनकर गदगद हो गयी और अपने बाबू बिरजू को तिरछी नजरों से देखकर शर्मा कर घर में चली जाती है।

उदयराज बिरजू से कुछ गांव के काम की बात करता रहा फिर उठकर अपने खेतों में चला गया।

उदयराज बार बार अपने ध्यान को दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करता रहा पर बार बार उसका मन रात में मिलने वाली खुशी को महसूस कर वासना से भर जाता। वो बार बार सोचता कि आज रात को जिंदगी में पहली बार वो अपनी ही सगी बेटी के साथ ऐसा करेगा, कितना मजा आएगा, कैसी होगी रजनी की? कैसा लगेगा जब मैं उसको छुउंगा, बरसों से मैं स्त्री की योनि के लिए तरस गया हूँ और आज मैं अपनी ही बेटी की बूर छुउंगा, उसको छेड़ूँगा, मसलूंगा, यही सब सोच सोच के वो कामोन्माद में पागल हुआ जा रहा था।

यही हाल घर में रजनी का भी था, उसके लिए भी दिन काटना किसी पहाड़ से कम नही था, आज उसने अपनी बेटी को दिन में सुलाया ही नही ताकि वो रात भर सोती रहे और उसे रात में कोई परेशानी न हो, वो निश्चिन्त होकर अपने बाबू के साथ महापाप कर उसका आनंद ले सके।

उदयराज दोपहर को भोजन करने के लिए घर आया, काकी ने उसको खाना दिया, खाना खाकर वो फिर से खेतों में चला गया।

खैर किसी तरह दिन बीता शाम हुई और उदयराज घर आया, बैलों को हौदे में बांधकर चारा डाल दिया।

नाहा धोकर तरो ताज़ा हो गया, फिर खाट उठायी और कुएं के पास जाकर लेट गया, अंधेरा हो चुका था, दिल की धड़कने बढ़ गयी थी।

खाना अभी बना नही था, रजनी घर में जल्दी जल्दी बना रही थी, बेटी तो उसकी आज जल्दी ही सो गई थी, दिन में रजनी ने सुलाया जो नही था।

आखिर खाना बन गया और काकी ने उदयराज को खाना बाहर ही लाकर दिया, उदयराज के खाना खा लेने के बाद घर में रजनी और काकी ने भी खाना खाया, फिर काकी बाहर आके रजनी की बिटिया को अपनी खाट पे लेके लेट गयी।

उदयराज भी अपनी खाट पे लेट के बड़ी बेसब्री से इतंज़ार करने लगा, अभी तो रात के 10 बजे थे, सीधा सीधा 2 घंटा बचा था, बिस्तर पर करवटें बदल बदल के उसका बुरा हाल हो गया, कभी लेटता, कभी उठकर धीरे धीरे टहलने लगता, फिर लेट जाता।

उधर रजनी ने आज घर की पीछे वाली कोठरी में जा के उसके अंदर पड़ी खाट बाहर निकाल कर उसमे एक चटाई बिछा दी, दिन में फूलों से बनाई हुई मालाओं से उसने पूरी कोठरी सजा दी और उसमे मिट्ठी की कटोरी में कुछ कपूर रखकर जला दिए, कपूर और फूलों की महक ने पूरी कोठरी को सुगंधित कर डाला, यहां तक कि उसकी सुगंध आंगन तक आ रही थी।

फिर रजनी आंगन में आके पड़ी हुई खाट पर लेट गयी अभी काफी वक्त बचा था, इंतज़ार तो उससे भी नही हो रहा था।

आखिरकार जैसे तैसे 11:30 हो गए, रजनी की सांसे तेज चलने लगी, वह खाट से उठी और एक हल्का पीला चादर लिया, घर के सारे दिये और लालटेन बुझा दिए बस एक छोटा सा घी का दिया जलाकर कोठरी के दरवाजे पर रख दिया।

बाहर का मेन दरवाजा खुला हुआ था बस वैसे ही उसके किवाड़ सटाये हुए थे।

रजनी कोठरी में जाके चादर ओढ़कर चटाई पर लेट गयी, और बेसब्री से अपने बाबू का इंतज़ार करने लगी, सांसे उसकी भारी हो चली थी। मंद मंद वो मुस्कुराये जा रही थी, आज क्या होने वाला है।

रात का सन्नाटा छा चुका था, सब सो गए थे।
उदयराज धीरे से अपनी खाट से उठा, धीरे धीरे चलता हुआ वो घर की तरफ बढ़ने लगा, जब काकी की खाट के पास से गुजरा तो देखा कि काकी सो रही थी।

आखिरकार वो घर के मेन दरवाजे पर पहुँचा, दरवाजा हल्का सा आपस में सटाया हुआ था उसने हल्का हाथ लगा के दरवाजा खोला, बस इतने से ही रजनी जान गई कि उसके बाबू घर में आ गए हैं वो सिरह उठी, चादर को उसने अच्छी तरह तान के अपना पूरा बदन उससे ढक लिया।

जैसे ही उदयराज ने दरवाजा खोला पूरे घर में फैल चुकी कपूर और फूल की महक उसके नथुनों में पड़ी, इस महक ने काम वासना को और भड़काने में आग में घी का काम किया।

घर के अंदर दाखिल होकर उदयराज दरवाजे को अंदर से धीरे से बंद कर आगे बढ़ा, गुप्प अंधेरा था बरामदे में, अंदाजे से वो अलमारी के पास गया और दिव्य तेल की शीशी उठा ली, जैसे ही आंगन में आया तो देखा सबसे पीछे बनी कोठरी के दरवाजे पर दिया रखा हुआ है जिसकी मध्यम हल्की रोशनी आस पास तक ही फैली हुई थी।

दरवाजा खुला हुआ था, वातावरण बिल्कुल शांत था, जैसे ही उदयराज दरवाजे तक आया रजनी को इसका अहसास हो गया वो कसमसा उठी, उदयराज ने उसे देखा, जमीन पर चटाई बिछा कर सर से लेकर पाँव तक पीले रंग का चादर ओढ़े उसकी सगी शादीशुदा बेटी लेटकर पाप का आनंद लेने के लिए अपने पिता का इंतज़ार कर रही है, इस बात को सोचकर वो झूम उठा, आखिर वो पल आ ही गया। चादर से पूर्ण रूप से ढके होने के बाद भी अपनी बेटी के पूर्ण शरीर की लंबाई चौड़ाई देखकर उसे जोश चढ़ गया। रजनी पीठ के बल बिल्कुल सीधी लेटी थी हाथों को उसने सर के ऊपर ले जाकर मुठ्ठी से चादर तान कर चादर को पकड़ा हुआ था जिससे उसकी मोटी मोटी दोनों चूची तन कर ऊपर को उठ गई थी और उसके उभार चादर के ऊपर से ही दिख रहे थे, काम वासना से वशीभूत होकर तेज चलती हुई सांसों की वजह से उसके उन्नत मोठे उरोज सांसों के साथ साथ ऊपर नीचे होते हुए बहुत मादक लग रहे थे। कुछ देर उदयराज पास खड़े होकर उसके पूर्ण शरीर को बहुत बेशर्मी और कामुक नज़र से निहारता रहा फिर एक नज़र उसने पूरी कोठरी में डाली, पूरी कोठर फूलों से सजी थी, मानो वो उसका सुहागरात कक्ष हो, खुद रजनी ने उसे सजाने में इतनी मेहनत कर डाली थी तो इसका मतलब ये था कि खुद उसकी सगी बेटी उसके साथ पाप का सुख भोगने के लिए कितनी बेताब है। इतना मजा तो उसे बहुत वर्ष पहले सुहागरात में अपनी पत्नी के साथ भी नही आया था जितना आज सगी बेटी के साथ आ रहा था जबकि अभी तो उसने कुछ शुरू भी नही किया था, आखिर छुप छुप कर सगे रिश्ते में किये गए व्यभिचार और पाप में कितना मजा छिपा होता है।

फिर वह एकाएक चादर के ऊपर से ही सांसों के साथ ऊपर नीचे होते हुए रजनी के भारी चूचीयों को निहारते हुए उसके दायीं तरफ कमर के पास बैठ गया।

रजनी ने कसमसा कर अपनी जांघे भीच ली, उदयराज ने तेल की शीशी बगल में रखी, अपना सीधा हाथ उसने चादर के अंदर डाला और धीरे धीरे रजनी की नाभि पर रखा, रजनी स्पर्श महसूस कर गनगना गयी उसके मुँह से हल्की ही aaahhhh निकल गयी, फिर उदयराज अपना हाँथ नाभि के नीचे की ओर बढ़ाने लगा रजनी कंपन से थरथरा उठी, उदयराज की उंगलियां नाभि के नीचे बंधी साड़ी के छोर से टकराई, रजनी बार बार वासना में अपनी जाँघे भीच ले रही थी, उदयराज ने अपनी उंगलियां साड़ी के अंदर प्रवेश करा दी पर तुरंत उसे साड़ी के नीचे बंधे साये के नाड़े ने रोक दिया, उदयराज ने तुरंत चादर में ढके रजनी के मुंह की तरफ मदहोश आंखों से देखा, रजनी को महसूस हुआ कि उसके बाबू उसकी तरफ देख रहे हैं वह चादर के अंदर ही वासना से वशीभूत हो मुस्कुरा उठी।

फिर एकाएक उदयराज ने नाड़े की डोरी को सर्रर्रर्रर्रर से खींचकर खोल दिया, डोरी खुल गयी, रजनी ने लाज के मारे अपनी जाँघे और भीच ली, माना कि वो खुद बेताब थी अपने बाबू की उंगलिया अपनी बूर पर महसूस करने के लिए पर एक सगी बेटी होने के नाते और आज जीवन में ये पहली बार हो रहा था कि उसके बाबू उसके साथ ये कर रहे थे तो वह लज़्ज़ा से गड़ी भी जा रही थी। उसकी सांसे भारी हो चली थी, माथे और चेहरे पर वासना की गर्मी से पसीना आना शुरू हो गया था।

उदयराज ने अपना हाथ साये के अंदर डाल दिया और उसकी उंगलियां बूर के ऊपरी हिस्से पर जा पहुँची, बूर के उस हल्के फूले हुए ऊपरी हिस्से (जो हल्के बालों से भरा था) पर उदयराज अपनी उंगलियां चलाने और सहलाने लगा, एकाएक उसने अपनी बीच की उंगली जहां से बूर की फांक की शुरुवात होती है उसपर रखा और बूर की दरार में हल्का सा उंगली डुबोते हुए पूरी बूर को हथेली में भर लिया।

रजनी ने aaaaahhhhhh bbaaabbbuuu की हल्की सी मादक आवाज निकालते हुए अपनी जाँघे हल्का सा खोलकर अपनी मक्खन जैसी बूर अपने बाबू को छूने के लिए परोस दी।

उदयराज होश खो बैठा, आज वो अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर छू चुका था, क्या मक्खन जैसी बड़ी बड़ी फांकों वाली बूर थी उसकी अपनी ही सगी बेटी की, बूर की फांकों पर भी हल्के बाल थे, फांकों की साइड में भी हल्के बाल थे, उदयराज ने चार पांच बार बूर को पूरा पूरा हथेली में भरकर भींचा, रजनी होशो हवास खो चुकी थी।

दोनों के शरीर का कोई भी अंग नही छू रहा था बस उदयराज रजनी की साड़ी में हाथ डाले उसकी बूर को सहला और मसल रहा था।

उदयराज अपनी चारों उंगलिया बूर पर फिराने लगा, कभी वो बूर के ऊपरी हिस्से को सहलाता कभी फांकों और दरार को सहलाता हुआ बूर के नीचे तक हाथ ले जाता, इतना मजा तो उसे अपनी पत्नी की बूर चोदकर भी नही आया था जितना बेटी की खाली छूकर ही आ रहा था।

कामवासना में रजनी की बूर फूलकर खुल चुकी थी, पर उसका कसाव बरकरार था, रजनी को चुदे हुए कई साल हो गए थे, बूर उसकी जल्द ही रिसना चालू हो गयी, और रस उदयराज की उंगलियों को गीला करने लगा, चादर के अंदर रजनी बेसुध पसीने पसीने हो गयी थी, वासना में उसकी आंखें बंद थी, अपने होंठों को वो बड़ी कामुकता से दांतों से काट ले रही थी, मन तो उसका बेसब्र हो चुका था कि कस के बाबू से लिपट जाए पर....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

रजनी ने अब अपनी जाँघे और खोल दी, उदयराज ने फांकों को उंगलियों से फैलाकर बूर की भगनासा (cliteries) पर उंगली गोल गोल घूमने लगा रजनी का बदन थरथरा गया, नस नस गनगना गयी, मुँह से न चाहते हुए भी hhhhaaaaiiiiiiii bbbbaaaabbuuuu, aaaaaahhhhhhhh, oooooooohhhhhhh, mmmmaaaaaaa सिसकते हुए बोल ही पड़ी।

तभी उदयराज को तेल का ध्यान आया उसने झट हाथ बाहर निकाल कर वो दिव्य तेल अपनी अंजुली में शीशी से निकालकर उड़ेला वह लाल रंग का दिव्य तेल था दिए कि हल्की रोशनी में वह चमक रहा था और उसकी मन मोहक खुशबू पूरी कोठरी में फ़ैल गयी, अब कोठरी में फूल, कपूर और तेल की मिश्रित खुशबू फैल कर सम्मोहित सा कर दे रही थी उदयराज एक हाँथ पर तेल को अंजुली में लिए रहा और दूसरे हाथ से साड़ी को उठा कर तेल वाला हाथ साड़ी में डालकर बूर पर तेल उड़ेल दिया, बूर पर तेल गिरते ही रजनी फिर गनगना गयी।
तेल को उसने पूरी बूर पर अच्छे से मला, फिर हाथ बाहर निकाल कर और तेल लिया और एक बार फिर साड़ी में हाथ डाल कर बूर पर अच्छे से तेल लगाया और बूर सहलाने लगा, तेल की मनमोहक गंध ने समा बांध दिया, हाथ से उसने बूर को थपथपाया, फांकों को सहलाया, रजनी हाय हाय करने लगी।

पूरी बूर तेल से सन गयी थी, फूल कर उसका आकार बड़ा हो गया था, भगनासा खिलकर बाहर हो उठ आया था। बूर की फांकें मुँह खोल चुकी थी। बूर ने थरथरा कर कामरस छोड़ना शुरू कर दिया था, उदयराज भगनासा को सहलाता जा रहा था, कभी वो अपने हाथ को बूर की दरार में चलाता हुआ नीचे ले जाता और फिर वापिस ऊपर लाता कभी चार उंगलियों को एक साथ भगनासा पे रखकर गोल गोल रगड़ने लगता।

रजनी haaaai bbaabu, uuuuufffc bbbbaaau, uuuhhhiii mmaaaannn, hhhhhhaaaaiiiiiii ddddaaaiyyyyyaaa, न चाहते हुए भी बोले जा रही थी।

एकएक उदयराज ने बूर की दोनों फांक को तर्जनी और अनामिका उंगली से फैलाकर चीरा और बीच वाली उंगली से बूर की छेद पर गोल गोल सहलाने लगा, रजनी की बूर अब बेताहाशा कामरस छोड़ने लगी। रजनी उदयराज के इस प्रहार से थरथरा गयी और वह अपनी दोनों जांघों को कस के भीचते हुए hhhhhhaaaaiiiiiiii bbbaaaaabbuuuuu बोलते हुए बायीं ओर पलट गई, उदयराज का हाँथ बूर पर था और जांघ भिचने से दब गया था उसने वहां से अपना हाथ निकाला और मुस्कुराते हुए चादर के ऊपर से रजनी के नितम्ब देखने लगा, फिर उसने पीछे से हाथ को साड़ी में डालना शुरू किया, रजनी समझ गयी और मुस्कुरा पड़ी, उदयराज ने भारी नितम्ब को न छूते हुए सीधा अपना हाथ पीछे की तरफ से ले जाकर बूर पर रख दिया, रजनी चिहुँक उठी और उसकी जोर से सिसकी निकल गयी, उदयराज फिर से पीछे से बूर सहलाने लगा, उसने बूर के संकरी छेद पर फिरसे उंगली घुमाना चालू कर दिया

उदयराज अचंभित था कि शादीशुदा होने के बाद भी और एक बच्ची होने के बावजूद उसकी सगी बेटी की बूर का छेद कितना संकरी था, जैसे की वो कुवारी हो।
कितना छोटा सा नरम नरम मुलायम सा मनमोहक छेद था उसकी अपनी ही सगी बेटी की मक्खन जैसी बूर का।
आग की भट्टी की तरह धधकने लगी थी बूर उसकी, कितना गर्म था वो छोटा सा बूर का छेद, वो समझ गया कि उसके दामाद के बस का नही था इस बूर को फाड़ना, इसलिए ये अभी तक कुंवारी जैसी है।

उदयराज ने रजनी के बूर के छेद से निकलते हुए कामरास को बीच वाली उंगली से ऐसे उठाया जैसे मक्ख़न के भरे हुए डिब्बे में से उंगली डाल कर कोई मक्खन उठाता है।

फिर उस कामरस में भीगी हुई उंगली को उसने अपनी नाक के पास ला के सूंघा।

पेशाब और कामरस की भीनी भीनी महक ने उदयराज को पागल ही कर दिया, उसके मुँह से आखिर निकल ही गया- aaaaaahhhhhhh bbeeeettttiiii, hhhhhaaaaaiii

रजनी के मुंह से भी uuuuuuffffff bbbbaaabbbuuuu निकला। वह सिसकारियों पे सिकारियाँ ले रही थी।

उस कामरस में पेशाब की महक ज्यादा थी जिसने उदयराज को बदहवास कर दिया। मन तो उसका कर रहा था कि लप्प से बूर को मुँह में भर के खा जाए, पर.....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

कामरस सूंघने के बाद उसने उसे चाट लिया, फिर हाथ साड़ी के अंदर डाला और हाँथ बूर से दुबारा लगते ही रजनी फिर गनगना गयी, उदयराज ने फिर बूर की संकरी छेद से रिसते कामरस को उंगली से उठाया और फिर चाट गया ऐसा उसने पांच बार किया, पूरे मुँह में उसके रजनी का कामरस लगा हुआ था।

रजनी बेचैन होकर सिसकते हुए फिर पीठ के बल लेट गयी और उदयराज ने फिर से साड़ी में हाथ डाल दिया, फिर बूर को सहलाने लगा, बूर ने और कामरस छोड़ा, उदयराज ने इस बार वो कामरस उंगली में लगाया और चादर के अंदर रजनी के मुँह तक ले गया, अपनी ही पेशाब और कामरस की गंध से लिपटी अपने बाबू की उंगली को सूंघकर रजनी भी मचल उठी, पहले उदयराज ने उंगली उसकी नाक के पास ले जाकर उसे सुंघाया फिर एकाएक रजनी ने स्वयं ही वासना से आसक्त होकत अपने होंठ उस कामरास को चाटने के लिए खोल दिये।

उदयराज ने उंगली रजनी के मुँह में डाल दी और वो उसे बहुत की कामुक अंदाज़ में चाटने लगी, उदयराज ने रजनी को भी पांच बार उसी की बूर का कामरस चटाया, रजनी पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी।

ये सब करते करते लगभग दस मिनट या उससे भी ज्यादा हो गया था, उदयराज ने बेमन से अपनी बेटी की बूर से हाँथ हटा लिया और तेल की शीशी उठा कर अपनी तड़पती बेटी को कोठरी में छोड़कर जाने लगा, उसने पलटकर एक बार फिर रजनी को देखा और कोठर से बाहर निकल गया, रजनी तड़पती सिसकती रह गयी, उदयराज का लंड तनकर विकराल रूप ले चुका था, उसने बरामदे में आकर लंड को adjust किया और शीशी को अपनी जगह पर रखा फिर धीरे से घर से बाहर निकल गया और जाकर अपनी खाट पर औंधे मुंह लेट गया, आज जो हो चुका था उसपर उसे विश्वास ही नही हो रहा था और लग रहा था कि उसके हाथ अब भी अपनी सगी बेटी की बूर को सहला रहे हैं काफी देर तक मदहोश होकर वो यही सब सोचता रहा की कितनी मस्त मक्खन जैसी बूर है रजनी की, कितना छोटा सा छेद है बूर का, और अब जल्द ही वो मुझे देखने को मिलेगी और फिर भोगने को और फिर न जाने कब आंख लगी कुछ पता नही।

रजनी भी काफी देर तक कोठरी में पड़ी सिसकती रही, उसे अभी भी ऐसा लग रहा था कि उसके बाबू की उंगलियां उसकी बूर को छेड़ रही हैं, सहला रही हैं, फांकों को फैला रही हैं। उसमे इतनी भी हिम्मत नही बची थी कि वो उठकर बाहर आ जाये, कामाग्नि में पूरी तरह जल रही थी वो, बहुत देर तक सिसकते सिसकते कब उसकी आंख लगी कुछ पता नही।
:superb: :good: amazing update hai bhai,
behad hi shandaar lajawab aur hot update hai bhai
 

aman rathore

Enigma ke pankhe
4,859
20,222
158
Update- 33

अगले दिन उठते ही उदयराज को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे नया युग आरंभ हो चुका हो, मन और तन में अद्भुत खुमारी का अहसास हो रहा था, मन इतना खुश था कि मानो संसार की सारी खुशियाँ आज उसकी झोली में हो, जैसे कोई ऐसा कठिन युद्ध जीत लिया हो जो असंभव था, उसने अपने हांथों को देखा और सोचने लगा बीती रात को किस चीज़ को छुआ था इन्होंने uuuuffff, मानो अभी भी बूर पर रेंग रहे हों, वो नरम नरम बूर की फांकें, उसकी गंध, सुबह उठते ही जैसे उसके नथुनों से वही गंध हवा में मिलकर टकरा रही हो। पाप का आगाज हो चुका था।

रजनी तो वहीं कोठरी में पड़ी पड़ी सिसकते हुए सो गई थी, सुबह 5 बजे करीब उसकी आंख खुली तो ऐसा लगा जैसे नई दुनियां में आ गयी हो, सब कुछ वही था, वही घर, वही आंगन, पेड़, पशु, सब वही था पर फिर भी सब नया नया सा लगने लगा, उसके साथ उसके अपने ही पिता ने रात को क्या किया?, कैसे किया? ये सोचते ही सुबह सुबह ही उसकी बूर फिर तड़प उठी, बहुत बेचैन हो गयी वो, फिर जैसे तैसे उठी, और आज फिर होने वाले उसी पापकर्म को सोचकर मुस्कुराते हुए घर के काम में लग गयी।

उदयराज कल की तरह आज भी जल्दी नाश्ता करके खेतों में चला गया।

दोपहर हुई, दोपहर से शाम हुई और शाम से रात, खाना खा के उदयराज आज फिर बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था, जैसे ही घड़ी की सुई ने 11:45 बजाए, वो तुरंत उठा और घर की तरफ चल दिया, दरवाजा कल की तरह खाली भिड़ाया हुआ था, धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर गया, तेल की शीशी उठायी और कोठरी की तरफ चल दिया, सामने कोठरी के दरवाजे पर आकर रजनी को देखा तो वो आज भी कल की तरह पूरा चादर ओढ़े लेटी तो थी पर कुछ खास तरीके से, दरअसल रजनी बायीं तरफ करवट होकर लेटी थी, उसके नितम्ब दरवाजे की ओर थे, उसके पैर घुटनो तक मुड़े हुए थे जिससे उसकी भारी मदमस्त गांड उभरकर पीछे को निकल आयी थी।

अपने बाबू की आहट पाकर वो हल्का सा कसमसाकर हिली।

रजनी का दरवाजे की तरफ गांड करके लेटने का अर्थ उदयराज को समझ आते ही उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी वो समझ गया कि उसकी बेटी चाहती है कि वो आज उसकी बूर को पीछे से हाथ डाल के सहलाये।

उदयराज ने देखा कि ठीक कल की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को नए फूलों से सजा रखा था और फूल तथा कपूर की खुशबू से कोठरी महक उठी थी।

उदयराज धीरे से आ के रजनी की गांड के पास बैठ गया, और अपना हाथ धीरे धीरे नाभी की ओर बढ़ाया, साड़ी के अंदर हाथ डालकर उसने नाड़े को खींचकर खोल दिया, साड़ी और साये की पकड़ अब ढीली हो गयी थी, रजनी सिसक उठी aaaahhhhhhh, उसकी बूर तो आज पहले ही रस छोड़ रही थी।

फिर उदयराज ने वहां से अपना हाथ निकालकर गांड की तरफ से गांड को न छूते हुए अपना हाथ सीधा बूर पर रख दिया, रजनी oooooohhhhh bbbaabbuuu कहकर चिहुँक उठी, उसका पूरा बदन थरथरा और गनगना उठा, उदयराज को हाथ लगाते ही ये महसूस हुआ कि उसकी बेटी की बूर तो पहले से ही भट्ठी की तरह जल रही है, मदहोश हो गया वो इतनी नरम और गरम बूर को छूकर, बूर तो फूलकर अपने सामान्य आकार से काफी ज्यादा बड़ी हो चुकी थी पर उसका प्यारा सा नरम नरम संकरी छेद वैसे ही कसा हुआ था, बूर की फांकें संभोग की आग में गरम होकर जल रही थी। उदयराज अपनी सगी बेटी की
पूरी बूर को हथेली में भरकर मीजने लगा, फांकों पर तर्जनी उंगली से दबाने लगा, पूरी बूर का मानो मुआयना कर रहा हो, कभी अपनी बीच वाली उंगली को बूर की दरार में डुबोता तो कभी फांकों पर हल्के हल्के बालों को सहलाता।

रजनी का बदन अब थरथराने लगा, उत्तेजना चरम सीमा तक इतनी जल्दी चढ़ जाएगी ये रजनी को विश्वास नही था, उसकी बूर नदी की तरह बहकर कामरस छोड़ने लगी।

रजनी हाय हाय करने लगी, उसको असीम आनद की अनुभूति होने लगी, काफी देर उदयराज अपनी सगी बेटी की बूर को छेड़ता, सहलाता, और भींचता रहा, कभी वो cliteries को दो उंगलियों से पकड़कर सहलाता, कभी अपनी तर्जनी उंगली cliteries पर गोल गोल घुमाता और फिर कभी उँगलियों से बूर के मदमस्त नरम नरम छोटे से छेद को छेड़ता। जैसे ही उदयराज अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर के भागनाशे को छेड़ता रजनी बुरी तरह थरथरा जाती, उसका पूरा बदन ऐंठ जाता और उसके मुंह से
aaaaaahhhhhhh, hhhhaaaaaiiiiiiiii, uuuuuuuuuuffffffffff, bbbaaaaabbbbbuuuuu, धीरे धीरे सिसकारियों के साथ निकलने लगता। रजनी को इतना मजा अभी तक कभी नही आया था वो तो जैसे जन्नत में पहुँच गयी थी।

रजनी के काम रस से उदयराज की पूरी उंगली काफी पहले ही भीख चुकी थी, उदयराज ने अपना हाथ साड़ी के अंदर से निकाला और दिव्य तेल को हाथ पर उड़ेला, फिर हाथ को बड़ी सावधानी से बचाते हुए की वो भारी नितंबों को न छू जाए, बूर तक ले गया और सारा तेल बूर पर उड़ेलकर मर्दन करने लगा, उदयराज कुछ पल तक कस कस के बूर का मर्दन करता रहा, रजनी को एकाएक लगा कि वो अब झड़ जाएगी, इतना उनसे बर्दाशत नही हो पायेगा अब, तो एकदम से उसने चादर के अंदर से ही अपने बाबू का हाथ पकड़ लिया और कुछ देर पकड़े रही, अपनी उखड़ती सांसों को काबू करती रही। वो नही चाहती थी कि वो यूँ ही सिर्फ हाथ से सहलाने से झड़े, कई वर्षों से वो चुदी नही थी, वो अपने बाबू का लंड खाकर उसकी जबरदस्त चुदाई से झड़ना चाहती थी।

उदयराज रजनी के इस तरह उसका हाथ पकड़ने से समझ गया कि रजनी क्या बोल रही है, उसने अपना हाथ कुछ देर रोककर बूर पर रखे रहा फिर उंगलियों को अपनी नाक के पास लाके सूंघा और कामरस को चाटने लगा

रजनी ने अपना हाथ वहां से हटा लिया और पीठ के बल लेट गयी, उसने महसूस किया कि उसके बाबू बड़े चाव से कामांध होकर उसकी बूर का रस चाट रहे हैं, कोठरी में बहुत कम रोशनी थी और चादर के अंदर से तो बिल्कुल दिख नही रहा था, वह खाली आवाज से ये महसूस कर रही थी कि उसके बाबू उसकी बूर का मक्ख़न चाट रहे हैं, वह मुस्कुरा उठी, उदयराज ने फिर अपना हाथ नाभी की तरफ से साड़ी के अंदर डाला और फूली हुई बूर की दरार में तर्जनी उंगली डालकर मक्ख़न निकाला, जैसे ही उदयराज ने तर्जनी उंगली को बूर की दरार में डुबोया, रजनी के मुंह से फिर से एक बड़ी ही aaaaaaaaahhhhhhhhhh निकल गयी।

पेशाब की महक में सना वो बूर का मक्ख़न उदयराज मदहोश होकर चाट गया, अपनी सगी शादीशुदा बेटी के पेशाब की महक उदयराज को इतनी अच्छी लग रही थी कि उसका मन कर रहा था कि वो बस अपनी बेटी के बूर पर मुँह लगा के उससे निकलने वाला पेशाब जी भरके पी ले, वो देखना चाहता था कि उसकी बेटी की बूर से पेशाब कैसे निकलता है, जब वो बैठ कर मूतती है तो उसकी बूर देखने में कैसी लगती है, वो दृश्य कितना मादक होगा।

पर अभी उसमे कुछ वक्त बाकी था जल्दी ही वो अपना ये ख्वाब पूरा करेगा। यही सब सोचते हुए उसने पांच बार अपनी बेटी की बूर से काम रस रूपी मक्ख़न अपनी तर्जनी उंगली से निकलकर चाटा।

फिर उसने कल की तरह रजनी की ही बूर का मक्ख़न अपनी उंगली में लगा के उसके होंठो तक ले गया, रजनी उसकी महक से फिर मदहोश हो गयी और लब खोल दिये, उदयराज ने उंगली उसके मुँह में डाल दी और वो चाटने लगी जैसे बरसों की प्यासी हो, उदयराज कभी उसके होंठों पर अपनी उंगली से वो रस लिपिस्टिक की तरह लगाता और रजनी जीभ होंठों पर फिरा फिरा के चाटती तो कभी अपनी पूरी उंगली उसके मुँह में घुसेड़ देता और रजनी लॉलीपॉप की तरह चूसती, ऐसे ही उसने पांच बार बूर का रस अपनी बेटी को चटाया।

देखते ही देखते लगभग दस मिनट से ऊपर हो गए थे, उदयराज को अब बेमन से उठकर जाना था, जैसे ही उसने साड़ी की अंदर से अपना हाथ निकाला और तेल की शीशी बंद करने लगा रजनी समझ गयी कि अब बाबू चले जायेंगे, वो मन ही मन बहुत तड़प उठी, जैसे कह रही हो कि बाबू न जाओ, न जाओ मुझे तड़पता हुआ छोड़कर, आपकी छुवन से मेरी बूर में आग लग गयी है इसमें अपना मोटा मूसल जैसा लन्ड डालकर इसको रात भर चोदो, फाड़ डालो इसे बाबू, बहुत प्यासी है ये, अभी न जाओ बाबू, आपकी बेटी आपसे चुदना चाहती है, उसकी बूर सिर्फ आपकी है चोदो उसे।

पर जो कर्म लिखा था उसका पालन तो करना ही था, उदयराज भी बेमन से उठा और एक नज़र उसने रजनी को देखा और वहीं उसी के सामने खड़े खड़े ही, उसे दिखाते हुए उसने अपना मूसल जैसा बलशाली लंड धोती के ऊपर से ही adjust किया, रजनी को साफ साफ तो नही दिखा पर इतना तो जरूर दिखा की उसके बाबू का हाथ उनके लन्ड पर था, ये समझकर उसकी हल्की सी सिसकी निकल गयी कि उसके बाबू का लंड उसकी बूर में जड़ तक घुसने के लिए दहाड़े मार कर खड़ा हो चुका है।

उदयराज कोठरी से बाहर निकल गया और रजनी तड़पती रही।

इसी तरह एक रात और बूर की सहलाई और छुआई में निकल गयी।

उदयराज और रजनी को बेसब्री से इंतज़ार था अब चौथी रात का जिसमे होना था- "नग्न"

कमर से नीचे तक नग्न होकर अपना अनमोल खजाना अपने बाबू की आंखों के सामने लाने के लिए रजनी बेसब्र हो रही थी तो वहीं उदयराज भी अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था, वह बार बार ये सोचकर सिरह उठता था कि जब वो रात को कमर से नीचे का जिस्म साड़ी उतारकर पूर्ण नग्न कर देगा तो उस वक्त उसकी अपनी सगी शादीशुदा बेटी का नंगा जिस्म देखने में कैसा लगेगा, उसकी बूर कैसी होगी, बूर की बनावट कैसी होगी, उसकी जाँघे कैसी होंगी, उसकी गांड कैसी और कितनी बड़ी होगी, देखकर कैसा लगेगा, अभी तक तो उसने सिर्फ बूर को ही छुआ था पर अब वो कमर से नीचे का सारा जिस्म नंगा करके देखेगा। यही सब सोचकर वह वासना में गनगना जाता। अब उसे और रजनी को इंतज़ार था तो बस बूर दिखाई की रात का।
:superb: :good: amazing aur hot update hai bhai
 
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हाहाहाहा, तब तो next update बहुत जल्द देना देना पड़ेगा, बहुत खुशी हुई कि आपको ऐसा लगा, कहानी लिखने का मजा ही writer को तब आता है जब reader उसमे ऐसे ही डूब जाए।

बहुत बहुत शुक्रिया
Kahani aisi chal rahi he man krta he bs khatam na ho
 

Jangali

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Update- 33

अगले दिन उठते ही उदयराज को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे नया युग आरंभ हो चुका हो, मन और तन में अद्भुत खुमारी का अहसास हो रहा था, मन इतना खुश था कि मानो संसार की सारी खुशियाँ आज उसकी झोली में हो, जैसे कोई ऐसा कठिन युद्ध जीत लिया हो जो असंभव था, उसने अपने हांथों को देखा और सोचने लगा बीती रात को किस चीज़ को छुआ था इन्होंने uuuuffff, मानो अभी भी बूर पर रेंग रहे हों, वो नरम नरम बूर की फांकें, उसकी गंध, सुबह उठते ही जैसे उसके नथुनों से वही गंध हवा में मिलकर टकरा रही हो। पाप का आगाज हो चुका था।

रजनी तो वहीं कोठरी में पड़ी पड़ी सिसकते हुए सो गई थी, सुबह 5 बजे करीब उसकी आंख खुली तो ऐसा लगा जैसे नई दुनियां में आ गयी हो, सब कुछ वही था, वही घर, वही आंगन, पेड़, पशु, सब वही था पर फिर भी सब नया नया सा लगने लगा, उसके साथ उसके अपने ही पिता ने रात को क्या किया?, कैसे किया? ये सोचते ही सुबह सुबह ही उसकी बूर फिर तड़प उठी, बहुत बेचैन हो गयी वो, फिर जैसे तैसे उठी, और आज फिर होने वाले उसी पापकर्म को सोचकर मुस्कुराते हुए घर के काम में लग गयी।

उदयराज कल की तरह आज भी जल्दी नाश्ता करके खेतों में चला गया।

दोपहर हुई, दोपहर से शाम हुई और शाम से रात, खाना खा के उदयराज आज फिर बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था, जैसे ही घड़ी की सुई ने 11:45 बजाए, वो तुरंत उठा और घर की तरफ चल दिया, दरवाजा कल की तरह खाली भिड़ाया हुआ था, धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर गया, तेल की शीशी उठायी और कोठरी की तरफ चल दिया, सामने कोठरी के दरवाजे पर आकर रजनी को देखा तो वो आज भी कल की तरह पूरा चादर ओढ़े लेटी तो थी पर कुछ खास तरीके से, दरअसल रजनी बायीं तरफ करवट होकर लेटी थी, उसके नितम्ब दरवाजे की ओर थे, उसके पैर घुटनो तक मुड़े हुए थे जिससे उसकी भारी मदमस्त गांड उभरकर पीछे को निकल आयी थी।

अपने बाबू की आहट पाकर वो हल्का सा कसमसाकर हिली।

रजनी का दरवाजे की तरफ गांड करके लेटने का अर्थ उदयराज को समझ आते ही उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी वो समझ गया कि उसकी बेटी चाहती है कि वो आज उसकी बूर को पीछे से हाथ डाल के सहलाये।

उदयराज ने देखा कि ठीक कल की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को नए फूलों से सजा रखा था और फूल तथा कपूर की खुशबू से कोठरी महक उठी थी।

उदयराज धीरे से आ के रजनी की गांड के पास बैठ गया, और अपना हाथ धीरे धीरे नाभी की ओर बढ़ाया, साड़ी के अंदर हाथ डालकर उसने नाड़े को खींचकर खोल दिया, साड़ी और साये की पकड़ अब ढीली हो गयी थी, रजनी सिसक उठी aaaahhhhhhh, उसकी बूर तो आज पहले ही रस छोड़ रही थी।

फिर उदयराज ने वहां से अपना हाथ निकालकर गांड की तरफ से गांड को न छूते हुए अपना हाथ सीधा बूर पर रख दिया, रजनी oooooohhhhh bbbaabbuuu कहकर चिहुँक उठी, उसका पूरा बदन थरथरा और गनगना उठा, उदयराज को हाथ लगाते ही ये महसूस हुआ कि उसकी बेटी की बूर तो पहले से ही भट्ठी की तरह जल रही है, मदहोश हो गया वो इतनी नरम और गरम बूर को छूकर, बूर तो फूलकर अपने सामान्य आकार से काफी ज्यादा बड़ी हो चुकी थी पर उसका प्यारा सा नरम नरम संकरी छेद वैसे ही कसा हुआ था, बूर की फांकें संभोग की आग में गरम होकर जल रही थी। उदयराज अपनी सगी बेटी की
पूरी बूर को हथेली में भरकर मीजने लगा, फांकों पर तर्जनी उंगली से दबाने लगा, पूरी बूर का मानो मुआयना कर रहा हो, कभी अपनी बीच वाली उंगली को बूर की दरार में डुबोता तो कभी फांकों पर हल्के हल्के बालों को सहलाता।

रजनी का बदन अब थरथराने लगा, उत्तेजना चरम सीमा तक इतनी जल्दी चढ़ जाएगी ये रजनी को विश्वास नही था, उसकी बूर नदी की तरह बहकर कामरस छोड़ने लगी।

रजनी हाय हाय करने लगी, उसको असीम आनद की अनुभूति होने लगी, काफी देर उदयराज अपनी सगी बेटी की बूर को छेड़ता, सहलाता, और भींचता रहा, कभी वो cliteries को दो उंगलियों से पकड़कर सहलाता, कभी अपनी तर्जनी उंगली cliteries पर गोल गोल घुमाता और फिर कभी उँगलियों से बूर के मदमस्त नरम नरम छोटे से छेद को छेड़ता। जैसे ही उदयराज अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर के भागनाशे को छेड़ता रजनी बुरी तरह थरथरा जाती, उसका पूरा बदन ऐंठ जाता और उसके मुंह से
aaaaaahhhhhhh, hhhhaaaaaiiiiiiiii, uuuuuuuuuuffffffffff, bbbaaaaabbbbbuuuuu, धीरे धीरे सिसकारियों के साथ निकलने लगता। रजनी को इतना मजा अभी तक कभी नही आया था वो तो जैसे जन्नत में पहुँच गयी थी।

रजनी के काम रस से उदयराज की पूरी उंगली काफी पहले ही भीख चुकी थी, उदयराज ने अपना हाथ साड़ी के अंदर से निकाला और दिव्य तेल को हाथ पर उड़ेला, फिर हाथ को बड़ी सावधानी से बचाते हुए की वो भारी नितंबों को न छू जाए, बूर तक ले गया और सारा तेल बूर पर उड़ेलकर मर्दन करने लगा, उदयराज कुछ पल तक कस कस के बूर का मर्दन करता रहा, रजनी को एकाएक लगा कि वो अब झड़ जाएगी, इतना उनसे बर्दाशत नही हो पायेगा अब, तो एकदम से उसने चादर के अंदर से ही अपने बाबू का हाथ पकड़ लिया और कुछ देर पकड़े रही, अपनी उखड़ती सांसों को काबू करती रही। वो नही चाहती थी कि वो यूँ ही सिर्फ हाथ से सहलाने से झड़े, कई वर्षों से वो चुदी नही थी, वो अपने बाबू का लंड खाकर उसकी जबरदस्त चुदाई से झड़ना चाहती थी।

उदयराज रजनी के इस तरह उसका हाथ पकड़ने से समझ गया कि रजनी क्या बोल रही है, उसने अपना हाथ कुछ देर रोककर बूर पर रखे रहा फिर उंगलियों को अपनी नाक के पास लाके सूंघा और कामरस को चाटने लगा

रजनी ने अपना हाथ वहां से हटा लिया और पीठ के बल लेट गयी, उसने महसूस किया कि उसके बाबू बड़े चाव से कामांध होकर उसकी बूर का रस चाट रहे हैं, कोठरी में बहुत कम रोशनी थी और चादर के अंदर से तो बिल्कुल दिख नही रहा था, वह खाली आवाज से ये महसूस कर रही थी कि उसके बाबू उसकी बूर का मक्ख़न चाट रहे हैं, वह मुस्कुरा उठी, उदयराज ने फिर अपना हाथ नाभी की तरफ से साड़ी के अंदर डाला और फूली हुई बूर की दरार में तर्जनी उंगली डालकर मक्ख़न निकाला, जैसे ही उदयराज ने तर्जनी उंगली को बूर की दरार में डुबोया, रजनी के मुंह से फिर से एक बड़ी ही aaaaaaaaahhhhhhhhhh निकल गयी।

पेशाब की महक में सना वो बूर का मक्ख़न उदयराज मदहोश होकर चाट गया, अपनी सगी शादीशुदा बेटी के पेशाब की महक उदयराज को इतनी अच्छी लग रही थी कि उसका मन कर रहा था कि वो बस अपनी बेटी के बूर पर मुँह लगा के उससे निकलने वाला पेशाब जी भरके पी ले, वो देखना चाहता था कि उसकी बेटी की बूर से पेशाब कैसे निकलता है, जब वो बैठ कर मूतती है तो उसकी बूर देखने में कैसी लगती है, वो दृश्य कितना मादक होगा।

पर अभी उसमे कुछ वक्त बाकी था जल्दी ही वो अपना ये ख्वाब पूरा करेगा। यही सब सोचते हुए उसने पांच बार अपनी बेटी की बूर से काम रस रूपी मक्ख़न अपनी तर्जनी उंगली से निकलकर चाटा।

फिर उसने कल की तरह रजनी की ही बूर का मक्ख़न अपनी उंगली में लगा के उसके होंठो तक ले गया, रजनी उसकी महक से फिर मदहोश हो गयी और लब खोल दिये, उदयराज ने उंगली उसके मुँह में डाल दी और वो चाटने लगी जैसे बरसों की प्यासी हो, उदयराज कभी उसके होंठों पर अपनी उंगली से वो रस लिपिस्टिक की तरह लगाता और रजनी जीभ होंठों पर फिरा फिरा के चाटती तो कभी अपनी पूरी उंगली उसके मुँह में घुसेड़ देता और रजनी लॉलीपॉप की तरह चूसती, ऐसे ही उसने पांच बार बूर का रस अपनी बेटी को चटाया।

देखते ही देखते लगभग दस मिनट से ऊपर हो गए थे, उदयराज को अब बेमन से उठकर जाना था, जैसे ही उसने साड़ी की अंदर से अपना हाथ निकाला और तेल की शीशी बंद करने लगा रजनी समझ गयी कि अब बाबू चले जायेंगे, वो मन ही मन बहुत तड़प उठी, जैसे कह रही हो कि बाबू न जाओ, न जाओ मुझे तड़पता हुआ छोड़कर, आपकी छुवन से मेरी बूर में आग लग गयी है इसमें अपना मोटा मूसल जैसा लन्ड डालकर इसको रात भर चोदो, फाड़ डालो इसे बाबू, बहुत प्यासी है ये, अभी न जाओ बाबू, आपकी बेटी आपसे चुदना चाहती है, उसकी बूर सिर्फ आपकी है चोदो उसे।

पर जो कर्म लिखा था उसका पालन तो करना ही था, उदयराज भी बेमन से उठा और एक नज़र उसने रजनी को देखा और वहीं उसी के सामने खड़े खड़े ही, उसे दिखाते हुए उसने अपना मूसल जैसा बलशाली लंड धोती के ऊपर से ही adjust किया, रजनी को साफ साफ तो नही दिखा पर इतना तो जरूर दिखा की उसके बाबू का हाथ उनके लन्ड पर था, ये समझकर उसकी हल्की सी सिसकी निकल गयी कि उसके बाबू का लंड उसकी बूर में जड़ तक घुसने के लिए दहाड़े मार कर खड़ा हो चुका है।

उदयराज कोठरी से बाहर निकल गया और रजनी तड़पती रही।

इसी तरह एक रात और बूर की सहलाई और छुआई में निकल गयी।

उदयराज और रजनी को बेसब्री से इंतज़ार था अब चौथी रात का जिसमे होना था- "नग्न"

कमर से नीचे तक नग्न होकर अपना अनमोल खजाना अपने बाबू की आंखों के सामने लाने के लिए रजनी बेसब्र हो रही थी तो वहीं उदयराज भी अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था, वह बार बार ये सोचकर सिरह उठता था कि जब वो रात को कमर से नीचे का जिस्म साड़ी उतारकर पूर्ण नग्न कर देगा तो उस वक्त उसकी अपनी सगी शादीशुदा बेटी का नंगा जिस्म देखने में कैसा लगेगा, उसकी बूर कैसी होगी, बूर की बनावट कैसी होगी, उसकी जाँघे कैसी होंगी, उसकी गांड कैसी और कितनी बड़ी होगी, देखकर कैसा लगेगा, अभी तक तो उसने सिर्फ बूर को ही छुआ था पर अब वो कमर से नीचे का सारा जिस्म नंगा करके देखेगा। यही सब सोचकर वह वासना में गनगना जाता। अब उसे और रजनी को इंतज़ार था तो बस बूर दिखाई की रात का।
Oooooooopooooo
 

S_Kumar

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कहानी अच्छी से भी बहुत अच्छी है...
लजबाब फोरम की सबसे मस्त कहानी
अपडेट.....
जी तहे दिल से आभार आपका
 

S_Kumar

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Update- 34

तीसरी रात जब उदयराज ने अपनी सगी बेटी की बूर का मर्दन करके और बूर का मक्ख़न खा के कर्म को पूरा किया तो वह अपने साथ लाये एक कागज पर कुछ लिखने लगा और लिखकर रजनी के सर के पास रखकर कोठरी से निकल गया, दिन में ये बात उसके दिमाग में आई थी कि कर्म के अनुसार एक दूसरे को देख नही सकते, एक दूसरे से बोल नही सकते पर लिखकर बयां तो कर ही सकते हैं। इसलिए उदयराज ने कागज पर कुछ लिखा और रजनी के पास रखकर चला गया। रजनी को उस वक्त ज्यादा साफ न दिखने से ठीक से पता नही चल पाया कि उसके बाबू क्या कर रहे हैं, उसे ये लगा कि पिछली रात की तरह वो अपने दहाड़ते हुए लन्ड को समझा रहे हैं कि थोड़ा सा और सब्र कर ले, और यह सोचकर वो मुस्कुराकर सिसकते हुए सो गई थी, पर चौथे दिन जब वो सुबह 4 बजे उठी तब उसे वो कागज मिला, रात का दिया तो बुझ चुका था, झट से उसने दिया जलाया और कागज खोला-

"मेरी प्रिय बेटी इतना सुख मुझे जीवन में कभी नही मिला....कभी नही, तू इतनी सुंदर है, तेरा वो अंग इतना कोमल और नरम नरम है कि मैं होश खो देता हूँ, इन तीन दिनों में मैंने जो तेरा काम रस चखा है, उससे मुझे कभी दूर मत करना, तुझे पाकर मैं धन्य हूँ, तेरे हुस्न से, तेरी अदा से मैं कायल हो गया हूँ तू सिर्फ मेरी है सिर्फ मेरी।


तीन रात तो बीत गयी अब चौथी रात होगी, उस रात का मुझे बहुत ही बेसब्री से इंतज़ार है, तब मैं तेरी वो देखूंगा.....वो, जिसको मैं तीन दिन से छू कर महसूस कर रहा था, चौथी रात मेरे जीवन की एक बहुत ही अनमोल रात है। ऊपर के रसीले होंठ को तो मैंने हमेशा देखा है जो कि दुनियाँ में सबसे रसीले हैं पर अब मैं नीचे के भी रसीले और नशीले होंठ देखूंगा, मैं तो दीवाना हो गया हूँ, जैसे कोई दूल्हा अपनी दुल्हन को उसकी मुँह दिखाई पर कुछ उपहार देकर या उसकी कोई मनोकामना पूरी कर उसके तन मन का सम्मान करता है वैसे ही मेरे मन में भी आवाज उठ रही है कि मैं अपनी बेटी को उसकी वो दिखाई पर उसकी मनोकामना पूर्ण कर उसका सम्मान करूँ, बोल मेरी रानी बिटिया मैं तेरी क्या मनोकामना पूर्ण करूँ?"

इतना पढ़ते ही रजनी तो सातवें आसमान में उड़ने लगी, गदगद हो गयी वो, उसने भी जल्द ही एक कागज कलम उठाया और मुस्कुराते हुए कुछ लिखने लगी। जब काकी घर में आई तो उनको देकर बोली- काकी ये पर्ची बाबू के तकिए के नीचे चुपचाप रख देना, कर्म से संबंधित कुछ है।

काकी समझ गयी कि इसको खोलना नही है और तुरंत ही जाकर उदयराज के तकिए के नीचे धीरे से रखकर चली आयी।

अभी थोड़ा अंधेरा था उदयराज सो ही रह था 5 बज चुके थे फिर 5:15 हुए, थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा, उदयराज उठा, आज कौन सा दिन था उठते ही सबसे पहले ये ख्याल उसके मन में आते ही ख़ुशी से पगला गया।

बिस्तर समेटने के लिए जैसे ही तकिए को उठाया, सामने कागज fold कर पड़ा हुआ था, मन मयूर झूम उठा उसका ये जानकर की बेटी ने उसकी उसकी छोड़ी हुई पर्ची पढ़ ली है और ये उसका जवाब है, हो न हो जरूर उसने ये काकी के हाथ रखवाया होगा, मन में तो उसके हुआ कि घर में जाके रजनी को बाहों में भरकर ताबड़तोड़ चूमने लगे, पर वासना और खुशी का घूंट पीकर रह गया। उस पर्ची को उसने उठाकर धोती में ये सोचते हुए खोंस लिया कि खेत में जाके तसल्ली से पढ़ेगा।

जल्दी जल्दी वो तैयार होकर खेतों में हल और बैल लेकर निकल गया, आज उदयराज को अपने दूर वाले खेत की मेड़ पर मिट्टी भी चढ़ानी थी, एक खेत तो उसका कुल वृक्ष के पास भी था पर वो खाली जोतकर छोड़ा हुआ था उस खेत के बाद नदी थी तो उसमें अक्सर वो धान की फसल लगाता था।

उदयराज ने जल्दी से खेत में पहुँचकर वो कागज खोला-


मेरे बाबू, मेरे दिल के राजा, मैं भी आपके बिना अब नही जी सकती, मेरा सिर्फ काम रस ही क्या, सबकुछ आपका है, और आजीवन रहेगा जितना जी भरके चाहो उतना चखो, मैं तो खुद आपकी दीवानी हूँ, मैं सिर्फ आपकी हूँ सिर्फ आपकी, मेरी हर चीज़ आपकी है, मेरे हर अंग पर सिर्फ आपका हक़ है, ऐसा यौन सुख एक बेटी को सिर्फ अपने बाबू से ही मिल सकता है और किसी से नही, और बाबू आज रात को जो आप देखोगे न उसको बूर कहते हैं, बताया तो था अभी कुछ दिन पहले धीरे से आपके कान में मेरे भोले बाबू जी। कितना शर्माते हो आप, अपनी ही बेटी से कोई इतना झिझकता है पगलू कहीं के। बेटी तो अपने बाबू के दिल में बसी होती है छुप छुप कर अपने पिता के दिल में रहती है मां से भी ज्यादा।

आपकी बेटी सिर्फ आपकी है और उसकी बूर सिर्फ आपके लिए है, एक बात बोलूं बाबू, मैं अभी भी कुंवारी जैसी ही हूँ कई वर्षों से, बस आप समझ जाइये की अब आपको मुझे कैसे और कितना प्यार देना है, आज रात का मुझे भी बहुत बेसब्री से इतंज़ार है, मैं आज लाल रंग की साड़ी पहनूँगी और अपने बगल में एक और घी का दिया बिना जलाए रखे रहूँगी क्योंकि बाहर वाले दिये से अच्छे से दिखेगा नही आप जब आना तो वो दिया जला लेना।


और मुझे आपसे जो चाहिए वो है सिर्फ आपका साथ और बस आपका प्यार, लेकिन फिर भी आपका मान रखने के लिए जब वक्त आएगा तब मैं मांग लूंगी अपने बाबू से क्योंकि अभी मुझे सिर्फ आपका प्यार पाने के सिवा कुछ सूझ नही रहा, और आपने ये जो तरीका निकाला है बात करने का उस पर तो मैं वारी वारी जाऊं मेरे बाबू मैं भी आपसे बात करना चाहती थी पर बेबस थी। आज की रात आपकी बेटी बहुत बेसब्री से आपका इंतजार करेगी।"

उदयराज ये पढ़ते ही झूम उठा किसी तरह उसने दिन भर सारा काम किया और शाम को जल्दी ही घर आ गया, काकी द्वार पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी, उठकर गयी और पानी लायी, उदयराज ने पानी पिया और जाकर नहा लिया।

रजनी ने जल्दी जल्दी खाना बनाया और काकी ने उदयराज को बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाना दिया और घर में रजनी और काकी ने भी खाना खा लिया, आज रजनी की बेटी थोड़ा रो रही थी रजनी ने उसे दूध पिलाया फिर काकी उसे काफी देर बाहर घुमाती रही और वो सो गई, काकी उसको लेकर अपनी खाट पर लेट गयी थोड़ी देर बाद उसकी भी आंख लग गयी। जैसे ही वक्त हुआ उदयराज अपनी खाट से उठा, रोज की तरह धीरे धीरे कदमों से चलता हुआ दरवाजे तक पहुँचा, जैसे ही हल्के दरवाजे की खुलने की आवाज हुई उधर कोठरी में लेटी रजनी ने नशे में अपनी आंखें मूंद ली, सांसे तेज चलने लगी, दिल धक धक करने लगा।

उदयराज ने आज तेल की शीशी नही ली बस कागज और कलम लिया।

आज कोठरी से लाल गुलाब की अत्यंत मनमोहक खुशबू आ रही थी जिसमे कपूर की खुशबू भी मिली हुए थी।

उदयराज कोठरी के दरवाजे के सामने आकर खड़ा हो गया, रजनी का दिल रोमांच से भर गया, उसने रोज की तरह कसमसा के अपने बाबू को ये आभास कराया कि वो उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है।

आज दिये कि मध्यम रोशनी में लाल गुलाब से सजी कोठरी काम वासना को चरम पर पहुँचा रही थी, उदयराज अपनी बेटी की मेहनत पर गदगद हो गया, आखिर रोज रजनी हमारे इस प्यार को और सुखमय बनाने के लिए कितनी मेहनत कर रही है, मैं कसम खाता हूं कि अपनी बेटी के एक एक अंग को चरम सुख की प्राप्ति कराऊंगा, इतना प्यार दूंगा उसे की रोम रोम पुलकित हो उठेगा उसका। उदयराज ने एक संकल्प किया और एक भरपूर नज़र कोठरी में सजे फूलों पर डाली और उसमे से एक गुलाब तोड़कर हाथ में ले लिया।

उदयराज ने देखा रजनी ने बगल में एक छोटा दिया और माचिस रख दिया था, रजनी आंखें मूंदें चादर ओढ़े अपने बाबू की हर हरकत को भांप रही थी उसके दिमाग में बस अब एक ही बात थी कि अब आगे बाबू क्या करेंगे, अब क्या करेंगे, सारी दुनियां भूल चुकी थी वो।

उदयराज ने एक भरपूर नज़र अपनी बेटी के बदन पर डाली और उसके घुटनों के पास दायीं ओर बैठ गया, कागज और कलम बगल में रखकर कागज के ऊपर फूल जो उसने तोड़ा था उसको रख दिया।

रजनी से बर्दाश्त नही हो रहा था वो बार बार कसमसा के अपने बाबू को यह इशारा कर रही थी कि बाबू खोलो न।

उदयराज ने रजनी के पैरों से दबे चादर को पकड़कर ऊपर की तरफ हटाना शुरू किया जैसे ही रजनी के पैर बाहर दिखे उदयराज अपनी बेटी के गोरे गोरे दोनों पैर देखकर ही सम्मोहित सा हो गया, आज तीन दिन के बाद वो रजनी के पैर देख रहा था, रजनी ने अपने पैर के अंगूठे और उंगलियों को आपस में रगड़कर अपने बाबू को रिझाया।

पैरों में पड़ी पायल और दोनों पैर की उंगलियों में पड़ी बिछिया ने उदयराज का मन मोह लिया, लाल रंग की नेल पॉलिश उस गोरे गोरे पैर पर कयामत ही लग रही थी, कोठरी में हल्की रोशनी थी पर फिर भी रजनी का गोरा बदन चमक रहा था।

उदयराज ने पैरों को घूरते हुए चादर को खींचकर पूरा कमर तक पलट दिया, रजनी की सांसें तेज तेज चलने लगी, उदयराज ने देखा कि रजनी ने लाल साड़ी पहनी हुई थी आज वो दुल्हन की तरह लाल साड़ी पहनकर लेटी थी, चादर खिंचने से रजनी की साड़ी थोड़ा ऊपर चढ़ गई थी जिससे उसके गोरे गोरे पैर और उसपर भूरे भूरे रोएं देखकर उदयराज का लन्ड हरकत करने लगा।

पहले तो उदयराज ने पैर की तरफ से साड़ी ऊपर करने की सोची पर उसने इरादा बदलकर अपना हाथ ऊपर की तरफ बढ़ाया। रजनी समझ गयी और उसने साड़ी का पल्लू जो पीठ के नीचे दबा हुआ था उसको खींचकर लेकर कमर के पास रख दिया ताकि उसके बाबू को दिक्कत न हो, उदयराज ने चादर को और ऊपर तक किया अब रजनी की नाभि दिखने लगी, रजनी की गहरी नाभि देखकर उदयराज मदहोश हो गया एकदम से उसके दिमाग में आया कि योनि चुम्बन की रात तो कल है पर मैं नाभि तो चूम ही सकता हूँ और एकदम उसने नाभि पर एक गर्म जोरदार चुम्बन जड़ दिया।

रजनी को इसका आभास बिल्कुल नही था वह oooohhhhhhh bbbbaabbbuuuu कहकर चिहुँक उठी, उदयराज ताबड़तोड़ किसी बरसों के प्यासे की तरह नाभि और उसके आस पास कई चुम्बन अंकित करने लगा फिर उसने अपनी जीभ रजनी की गहरी नाभि में डाल दिया और डालकर काफी देर घुमाता रहा, कभी चूमता कभी घुमाता, रजनी uuuuuuuuffffffffff bbbbaaaaabbbbuuuuu करते हुए सिसक उठी।

उदयराज ने कुछ देर नाभि और उसके आस पास चूमने के बाद साड़ी के अंदर हाथ डालकर नाड़े की डोर खींचकर नाड़ा खोल दिया, साड़ी ढीली हो गयी और साया भी ढीला हो गया।

रजनी ने खुद ही अब सिसकते हुए अपने दोनों पर फैला कर अपने बाबू को जैसे पैरों के बीच आने का इशारा किया, उदयराज तुरंत समझ गया और उठकर दोनों पैरों के बीच आ गया।

और फिर वो हुआ जिसका बड़ी बेसब्री से इंतज़ार केवल उदयराज और रजनी को ही नही बल्कि नियति को भी था।

उदयराज ने अपने दोनों हांथों से रजनी की साड़ी को कमर से दोनों ओर से पकड़ा और धीरे धीरे नीचे की ओर सरकाने लगा, रजनी ने सिसकते हुए स्वयं ही अपने भारी नितंबों को उठाकर साड़ी को साये सहित नीचे खींचे जाने में अपने बाबू की मदद की, जैसे जैसे साड़ी नीचे सरकती गयी वैसे वैसे रजनी का निचला दूधिया बदन उजागर होता गया, रजनी की लाल रंग की पैंटी जो आज उसने जानबूझकर पहनी थी धीरे धीरे उदयराज की आंखों के सामने आती गयी, मोटी मोटी केले के तने के समान मांसल जांघे और उसमे फंसी छोटी सी लाल रंग की पैंटी ने उदयराज के होशो हवास उड़ा दिए।
जाँघों के बीच पैंटी के अंदर रजनी की फूली हुई बूर का आकार, दिये कि माध्यम रोशनी में साफ दिख रहा था, पैंटी उसकी बूर की फांकों में कुछ अंदर तक धंसी हुई थी और बूर जो वासना में काम रस छोड़े जा रही थी उससे बूर की जगह पर पैंटी गीली हो चुकी थी।

अभी साड़ी और साये को उदयराज ने घुटनों तक नीचे सरकाया था और उसकी नज़र अपनी सगी बेटी की माँसल मोटी मोटी कसी हुई जाँघों से हट ही नही रही थी, बहुत ही कामुक और बेशर्मी से आंखें फाड़े वो अपनी बेटी की टांगें, जांघ, पैंटी और नाभि को निहारता रहा फिर अचानक झुककर उसने दोनों जांघों को चूम लिया, उदयराज के होंठ अपनी जांघों पर लगते ही रजनी के जिस्म में गहराई तक कामुक तरंगे दौड़ गयी, वह सिरह उठी, तन और मन गनगना उठा, "उफ्फ बाबू" की हल्की आवाज निकालते हुए उसका बदन थरथराया।

वो डर भी रही थी कि कहीं बाबू बदहवासी में उसकी बूर को न चूम लें, क्योंकि बूर को चूमने और चाटने की रात कल है आज तो केवल दर्शन और सूंघने की रात है।

उदयराज बदहवासी में जांघों को चूमे जा रहा था और रजनी भी पागलों की तरह छटपटा रही थी, उसके मुंह से धीरे धीरे लगातार uuuuuiiiiimmmmmaaaaaaa........hhhhhhaaaaiiiiiiiiii.....bbbbbbbaaaabbbuuuuuuu, uuuuufffffffff....dddddaaaiiiiiyyyyyaaaaaa
निकले जा रहा था
उसका मन कर रहा था कि वो अपने पैरों की उंगलियों को आपस में रगड़े पर दोनों पैर के बीच उदयराज बैठा था, एकाएक उदयराज ने उठकर उसकी साड़ी को साये समेत खींचकर दोनों पैर से निकालकर बगल में रख दिया, रजनी ने भी अपने दोनों पैर अच्छे से उठाकर साड़ी को पूरा निकलने में अपने बाबू की मदद की। रजनी के बदन पर अब कमर से नीचे सिर्फ लाल रंग की पैंटी रह गयी थी, उदयराज रजनी के दोनों पैरों के बीच खड़ा मंत्र मुग्द होकर अपनी बेटी की मांसल गोरी गोरी जांघे और घुटने फिर नीचे के पैर घूरता रहा कुछ देर देखता रहा, उसका लन्ड फौलाद की तरह तनकर खड़ा हो चुका था, एक पल को उसे लगा कि वो अपना कंट्रोल खो देगा पर जैसे तैसे अपने को संभाला, रजनी ने चादर के अंदर से अपने बाबू को जब अपनी जांघे और पैंटी के ऊपर से बूर को घूरते देखा तो शर्म से अपने हांथों से अपने चेहरे को ढक लिया जबकि उसने चादर ओढा हुआ था फिर भी लज़्ज़ा वश वह सिरह उठी।

उदयराज पागलों की तरह रजनी के नंगे बदन को घूरे जा रहा था, इतनी सुंदर तो उसकी पत्नी भी नही थी जितनी उसकी बेटी थी, क्या मोटी मोटी गोरी गोरी मांसल जाँघे थी, तभी उदयराज नीचे बैठ गया और अपने दोनों हाथ से पैंटी को पकड़ा जैसे ही रजनी को अपने बाबू की उंगलियां अपनी पैंटी पर कमर के दोनों ओर महसूस हुई उसके बदन में हलचल हुई और सांसे और भी उखड़ने लगी, उदयराज ने पैंटी को नीचे सरकाना चालू किया, एक बार फिर रजनी ने धीरे से oooohhhhh mmmeerrrrreeee bbbbbbaaaabbbuuu बोलते हुए अपने भारी मांसल गुदाज नितम्ब को धीरे धीरे ऊपर ऊठाकर पैंटी को आसानी से निकल जाने में अपने बाबू की भरपूर मदद की

और......

उदयराज ने पैंटी को खींचकर नीचे घुटनों तक उतार दिया और जो उसने देखा उससे उसका मन मयूर और झूम उठा, रजनी ने पैंटी के अंदर भी गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों से अपनी प्यारी सी मक्ख़न जैसी मादक कसी हुई जवान बूर को छुपा रखा था। जब उदयराज ने पैंटी को घुटनों तक नीचे उतार दिया तो उसने देखा कि रजनी की बूर पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां रखी हुई है जिससे उसको देख पाना मुश्किल है, उदयराज अपनी बेटी की इस नटखट अदा पर फिदा हो गया और ताबड़तोड़ उसकी जाँघों और नाभि, कमर के आस पास, और पैरों को चूमने लगा, रजनी hhhhaaaaaiiiiiii, hhhhaaaaaiiiiii करती हुई मादक सिसकारी लेने लगी, अपनी इस शरारत पर वो मुस्कुरा भी रही थी। उदयराज को तो होश ही नही था उसको तो जैसे जन्नत मिल चुकी थी जन्नत।

उदयराज ने जब मदहोशी की हालत में चूमकर उठा तो पास रखे घी के दिये को जलाकर थोड़ा पास रख लिया, अब कोठरी में थोड़ा ज्यादा उजाला हो गया, फिर उदयराज धीरे से रजनी की बूर पर झुका और गुलाब की एक एक पंखुड़ी को अपने होंठों से पकड़कर हटाने लगा, जैसे ही उदयराज की सांसें रजनी के बूर पर लगी, वो तो aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.....hhhhhhhhhaaaaiiiiiiiiiiiiii............bbbbbbbaaaaaaaabbbbbbbuuuuu बोलते हुए अपने होंठों को दांतों से दबाकर मचल उठी, उसका निचला बदन हल्का सा थरथरा उठा।

उदयराज ने एक एक करके सारी गुलाब की पंखुड़ियों को हटाकर बूर को पा ही लिया। अब बूर का अंतिम आवरण भी हट चुका था। एक सगी बेटी की बूर उसके पिता के सामने खुल चुकी थी, नियति भी इस महापाप की शुरुवात पर मुस्कुरा उठी।

रजनी की वो प्यारी प्यारी नरम नरम मदहोश कर देने वाली गोरी गोरी बूर उदयराज के आंखों के सामने थी, रजनी अब नीचे से मदरजात नग्न अपने बाबू के सामने पड़ी थी। ऊऊफफ बूर की वो मक्ख़न जैसी फांकें, क्या मस्त बूर थी रजनी की, गोरी गोरी मोटी मोटी मांसल जाँघों के बीच वो बड़ी सी फांकों वाली अपनी सगी बेटी की बूर को देखकर उदयराज बदहवास हो गया, उसे मानो होश ही नही, इतनी सुंदर बूर है उसकी अपनी ही सगी बेटी की, वो फूला नही समा रहा था, उत्तम श्रेणी की बूर थी रजनी की, बड़ी बड़ी नरम नरम फांकें थी बूर की, बूर की फांकों के बीच से हल्का काम रस रिस रहा था, दोनों फांकों पर हल्के हल्के बाल थे और फांकों के बीच प्यारा सा भगनासा हल्का हल्का दिख रहा था, रजनी ने लज़्ज़ा से अपने चेहरे को अपने हांथों से ढक लिया।
बूर के ऊपर हल्के हल्के काले काले बाल थे, बूर के नीचे जाँघों के बीच चटाई पर गुलाब की पंखुड़ियां गिरी हुई थी।

एकएक उदयराज ने बगल में रखा दिया उठा लिया और उसको बूर के पास बूर को अच्छे से देखने के लिए लाया, बूर को दिए कि रोशनी में नजदीक से देखते ही उदयराज ने नशे से एक पल के लिए आंखें बंद कर ली, सांसे उसकी भी उखड़ने लगी, लन्ड ने धोती में हाहाकार मचा रखा था, जैसे अभी इजाजत मिले तो फाड़कर बाहर आ जाये।

एकएक जब रजनी ने देखा कि उसके बाबू दिया उठाकर उसकी बूर नजदीक से देख रहे हैं तो उसने खुद ही अपने दोनों पैर को फैलाने की कोशिश की पर पैंटी अभी घुटनों में फंसी थी।

उदयराज ने ये देखते ही दिया रखकर पैंटी को खींच कर पूरा पैर से बाहर निकाल दिया और बगल में साड़ी के ऊपर रखने ही वाला था कि अपनी सगी शादीशुदा बेटी की काम रस और पेशाब से सनी पैंटी से आती भीनी भीनी महक ने उसका ध्यान खींचा लिया और उसने रजनी को दिखाते हुए उसकी पैंटी को अपनी नाक से लगा के कस के उसे सूंघा और नशे से उसकी आंखें बंद हो गयी, रजनी भी धीरे से खिलखिला के हंस पड़ी पर उसने जल्द ही अपनी आंखें बंद कर ली क्योंकि दो दिए कि रोशनी में अब उसके बाबू चादर के अंदर से हल्के हल्के दिख रहे थे।

उदयराज ने जी भरके पैंटी को सूंघा मानो जैसे को वो अपनी बेटी की कोई भी चीज़ छोड़ना नही चाहता हो, रजनी भी ये सोचकर मुस्कुरा रही थी कि उनकी बेटी की नंगी बूर सामने खुली हुई है और मेरे बाबू अपनी बेटी की कच्छी में उलझे हैं।

पैंटी निकल जाने के बाद रजनी ने धीरे धीरे पैरों को फैलाते हुए घुटनों को मोड़कर अपनी जाँघों को खोलकर फैला दिया, उदयराज ने दिया फिर से उठाकर रजनी की बूर के पास किया।

जाँघों के फैलने से रजनी की बूर फ़ैलती और खुलती चली गयी दोनों फांकों के फैलने से वो प्यारा सा गुलाबी संकरी, छोटा सा बूर का छेद उदयराज की आंखों के सामने आ गया, बूर की cliteries खिलकर बाहर आ गयी और दोनों फांकों के हल्का खुलने से उनके बीच रिस रहे लिसलिसे काम रस से हल्के दो तीन तार बन गए, रजनी की बूर काम रस से सराबोर हो चुकी थी।

बूर की ये आभा देखकर उदयराज से अब बर्दाश्त नही हुआ और कुछ देर बूर को निहारने के बाद झट से उसने दिया बगल में रखा और अपनी नाक अपनी सगी शादीशुदा बेटी के बूर की फांकों के बीच लगा कर एक गहरी सांस खींचकर उसको सूंघा, कामरस और पेशाब की भीनी भीनी गंध उसके रोम रोम तक समाती चली गयी, बूर पर नाक लगाते ही रजनी की जोरदार सिसकी निकल गयी और मचलकर aaaahhhhhhhhhh mmmeeeerrrrreeeee pppppyyyaaaaarrrrrreeeeee bbbaaaaabbbbuuuuuu कहते हुए उसने तड़पकर अपनी कमर से ऊपर का हिस्सा धनुष की तरह ऊपर को मोड़ लिया, जिससे उसकी दोनों विशाल चूचीयाँ ऊपर को उठ गई। उसकी आंखें नशे में बंद हो गयी, एकएक रजनी के हाथ अपने बाबू के सर को पकड़कर अपनी दहकती बूर पर और दबाने तथा बालों को सहलाने के लिए उठे पर कर्म के नियम का ध्यान आते ही वो मन मकोसकर रह गयी और अपनी मुट्ठी भींच कर हाय हाय करने लगी।

उदयराज ने पांच छः मिनट तक रजनी की बूर को खूब जी भरके सूंघा, दोनों हांथों से कभी नरम नरम फांकों को खोलकर सूंघता, और कभी फांकों के बगल, ऊपर, नीचे और भागनाशे को सूंघता, कभी अपनी नाक से भागनाशे को रगड़ता और जब जब ऐसा करता रजनी हाय हाय करने लगती और उसका बदन पूरी तरह हिल जाता, उदयराज का बहुत मन कर रहा था कि वो अपनी सगी बेटी की बूर चाट चाट के खा जाए पर आज रात उसकी इजाजत नही थी। रजनी भी यही चाहती थी पर क्या करे। रजनी की बूर तड़प तड़प कर लिसलिसा काम रस छोड़ने लगी, जो पूरी तरह से उदयराज की नाक और मुँह पर लग चुका था, उदयराज ने बूर से मुँह हटा के काम रस को जीभ निकल कर होठों पे लगे काम रस को चाट लिया, क्योंकि वो आज रात बूर पर न तो जानबूझ कर होंठ लगा सकता था और न ही जीभ।

काफी देर बूर सूंघने के बाद उठकर बैठ गया, मस्त हो चुका था वो अपनी बेटी की बूर सूंघकर, रजनी ने तड़पकर अब अपने पैर सीधे किये और उदयराज पैरों के बीच से उठकर खड़ा हो गया, रजनी ने अपने पैरों को सटा कर बड़ी अदा से एक बार फिर अपनी मदमस्त बूर अपने बाबू के सामने कर दी, खड़े होकर उदयराज ने रजनी की फूली हुए मदमस्त चौड़ी और लंबी बूर को ललचाई नज़रों ने एक बार फिर घूरा, पर अब वक्त पूरा होने वाला था या हो सकता था ज्यादा भी हो गया हो, आज वो अपनी बेटी की बूर देखकर धन्य हो चुका था और अब आगे आने वाले असीम आनंद की कल्पना कर वो वासना से भर गया।

रजनी भी समझ गयी कि अब बाबू जाने वाले हैं वह चाहती तो थी कि अपने बाबू को अपने नितम्ब भी दिखाऊँ पर ये उसने फिर "बाद" पर छोड़ दिया, उदयराज ने बगल में जलता हुआ दिया बुझा दिया और एक बार फिर अपनी बेटी की बूर को झुककर जल्दी से जोर से सूंघा रजनी एकदम से चिहुँक उठी, उदयराज ने फिर बगल में कागज के ऊपर रखे गुलाब की पंखुड़ियों को तोड़ा और और बूर को उससे ढक दिया, रजनी अपने बाबू के इस सम्मान पर गदगद हो गयी, और उदयराज ने साड़ी और साये से रजनी के निवस्त्र हिस्से को ढक दिया फिर चादर उसके ऊपर डाल दी और कागज लेकर वहीं बैठकर कुछ लिखा और अपने खड़े लन्ड को adjust करता हुआ पर्ची को बगल में रखकर कोठरी से बाहर निकल गया।

रजनी काफी देर तक लेटी सिसकती रही उसकी बूर रह रहकर अब भी काम रस छोड़ रही थी।

वो सोचने लगी कि आज आखिर उसके बाबू ने उसकी बूर देख ही ली, एक बाप ने अपनी सगी बेटी की बूर को देख लिया, छू लिया और सूंघ भी लिया, कितना मादक है ये महापाप, ये व्यभिचार, मेरे बाबू मुझे पहले क्यों नही मिले? खैर आखिर मिल तो गए देर से ही सही, कितना मजा आएगा जब वो मुझे तृप्त करेंगे।
यही सब सोचते हुए रजनी काफी देर तक खोई रही फिर सो गई।
 
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