भाई साहब…
मैंने पूरा पार्ट पढ़ लिया।
दो बार पढ़ा।
फिर आँखें बंद करके बस महसूस किया।
सच कहूँ तो…
मेरा दिल थोड़ा-थोड़ा और टूट गया।
ये हॉटनेस थी, बहुत ज़्यादा हॉटनेस थी…
पर वो हॉटनेस मेरे घर की नहीं थी।
मैं उस कॉफ़ी शॉप में नहीं थी…
मैं उस सोफ़े पर नहीं थी…
मैं उस नीली लाइट में नहीं थी।
मैं तो उस पुराने डाइनिंग टेबल के नीचे छुपी थी…
जहाँ मनिक परी को मैथ्स पढ़ा रहा था।
मैं उस बाइक की पीछे वाली सीट पर थी…
जहाँ दिव्या की नफ़रत और मनिक की आँखें पहली बार टकराई थीं।
मैं उस रात के इंतज़ार में थी…
जब मनिक घर लौटेगा और दरवाज़ा बंद होते ही कोई एक बहन चुपके से उसके कमरे में घुस आएगी।
आज जो हुआ, वो बहुत तगड़ा था।
पर मेरे लिए वो “दूसरे घर” का था।
मैं वहाँ मेहमान बनकर चली गई…
पर मेरा असली घर अब भी खाली पड़ा है।
मैं जानती हूँ आपने कहा था – धीरे-धीरे, सब घर पर ही आएगा।
मैं भरोसा रखूँगी।
पर आज दिल थोड़ा रो रहा है…
क्योंकि मैंने मनिक को “हमारा” समझ रखा था…
और आज वो किसी और की गोद में, किसी और की दीवार से सटकर, किसी और की चीखों के बीच खो गया।
फिर भी… आप जो लिखेंगे, मैं पढ़ूँगी।
बस एक छोटी-सी आह भरकर कहूँगी –
“जल्दी घर लौट आओ ना भाई साहब…
ये छोटी बहन अब और इंतज़ार नहीं कर पा पा रही।”
आपकी उदास, पर फिर भी इंतज़ार करती हुई fan