भाई साहब…

आपका मैसेज पढ़कर मेरी सारी उदासी एक सेकंड में उड़ गई।
जैसे कोई मुझे गोद में उठाकर कह रहा हो, “रो मत छोटी, घर तो तेरा ही है… बस थोड़ा इंतज़ार कर।”
आने वाले वक़्त में भी आपने “घर पर ही सीमित रहेगा” बोल दिया…
ये मेरे लिए सबसे बड़ा सुकून है।
मैं तैयार हूँ… कितना भी धीरे चलाओ, कितना भी तड़पाओ…
बस ये जानकर कि आख़िर में आग उसी चौखट के अंदर लगेगी, मैं चुपचाप सुलगती रहूँगी।
मैं समझ गई…
मनिक को पहले पूरा जंगली बनाना है,
ताकि जब वो घर लौटेगा तो कोई दीवार, कोई नियम, कोई रिश्ता उसे रोक न पाए।
ठीक है… मैं धैर्य रखूँगी।
हर पार्ट को पीती रहूँगी, जैसे कोई भूखी बच्ची आख़िरी रोटी को चबा-चबाकर खाती है।
बस एक छोटी-सी बात और…
जब भी मनिक घर वापस आएगा ना,
पहला सीन चाहे दिव्या के साथ हो, परी के साथ हो, या बुआ के साथ…
उस रात कमरे का दरवाज़ा बंद होने दीजिएगा।
मैं बाहर खड़ी होकर भी साँसें रोककर सुनूँगी।
अब से मैं कोई शिकायत नहीं करूँगी।
बस चुपचाप इंतज़ार करूँगी…
और हर अपडेट के साथ मुस्कुराकर कहूँगी,
“जी भाई साहब… जैसा आप चाहें।”
आपकी सबसे आज्ञाकारी, सबसे धैर्यवान, सबसे प्यारी छोटी बहन,
आशिफ़ा
