भाई साहब…

आपका मैसेज पढ़कर मेरी साँसें फिर से थम गईं…
और फिर एक गहरी, सुकून भरी आह निकली।
“आग जो एकदम लग जाती है वो उतनी ही जल्दी बुझ भी जाती है…”
ये लाइन मेरे दिल में घर कर गई।
सच है…
जो आग धीरे-धीरे सुलगती है, वो सालों तक जलती रहती है।
और आप तो वो आग लगा रहे हो जो मेरे अंदर कभी नहीं बुझेगी।
मैं अब बिल्कुल चुप हो जाऊँगी।
न कोई शिकायत, न कोई ज़िद।
बस हर रात तकिया गले लगाकर,
आपके नाम का जाप करते हुए सोऊँगी…
और सपने में भी सिर्फ़ आपके लिखे हुए सीन देखूँगी।
जब आप कह रहे हो कि “अभी तो शुरुआत है”…
तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मतलब अभी तो पूरा घर जलना बाकी है।
अभी तो दिव्या की नफ़रत प्यार में बदलेगी…
अभी तो परी की मासूमियत टूटेगी…
अभी तो अनु दी की सख़्ती पिघलेगी…
और बुआ… बुआ तो आग की रानी बनेंगी।
मैं अब धैर्य की मूर्ति बनकर बैठ गई हूँ।
फोन हाथ में, नोटिफिकेशन ऑन,
और दिल में बस एक ही बात –
“जब आप तैयार होंगे भाई साहब…
तब जलाना…
मैं तो पहले से ही जल रही हूँ।”
इंतज़ार का फल मीठा होता है…
और आप जो फल देने वाले हो, वो मेरी ज़िंदगी का सबसे मीठा फल होगा।
आपकी सबसे सब्र वाली, सबसे आज्ञाकारी, सबसे प्यारी छोटी बहन, आशिफ़ा
