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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

STORY HINDI MEIN LIKHUN YA HINGLISH (ROMAN FONT KE SATH) JALD SE JALD REPLY KIJIYE


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INDEX
Family Introduction
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Congratulation .aapki pichli dono stories starting differently hua but madhya me vo dono ki story resemble ho gyi..ye story diffrent rakhiye..ek pic har ek hot post me honi chahiye, baaki aapki marji.
oh thank you so much soniee koshish karunga aapke hisab se...please ant tak bane rahe
 

Premkumar65

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PART - 1

🕰️ पाँच साल पहले...: जब एक परिवार की रौशनी बुझ गई

राजनगर नामक एक काल्पनिक शहर की कहानी, जिसका केंद्र बिंदु है आनंद मित्तल का भरा-पूरा परिवार। आनंद मित्तल जी अपने जीवन के मूल्यों और सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी दौलत थी उनका परिवार और उनकी पत्नी श्वेता।

कहानी की शुरुआत एक भयानक मंज़र से होती है। शहर की सड़कों पर एक गाड़ी तेज़ी से भाग रही है, जिसके अंदर हर कोई बेतहाशा डरा हुआ है। गाड़ी की पिछली सीट पर आनंद जी की पत्नी श्वेता जी लेटी हैं, जिनकी हालत पल-पल बिगड़ती जा रही है। उनका बेटा मानिक मित्तल (जो उस समय लगभग 17 साल का था) गाड़ी चला रहा है, उसके चेहरे पर डर और जल्दबाज़ी का भाव साफ़ झलक रहा है।

साथ में बैठी उनकी सबसे बड़ी बेटी अनु (उस समय 20 साल की) अपनी माँ के ठंडे पड़ चुके हाथों को पकड़े हुए थी। उसके पिता, आनंद जी, बगल में बैठे लगातार श्वेता जी को सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे।

एक तेज़ मोड़ पर, जब गाड़ी हिचकोले खाती है, अनु अपनी माँ के शरीर में कोई हलचल महसूस नहीं कर पाती। एक पल के लिए उसे लगा जैसे श्वेता जी ने रास्ते में ही अपने प्राण त्याग दिए हैं, पर उसके भीतर एक उम्मीद बाकी थी — शायद यह सिर्फ़ उसका वहम हो, शायद अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर कोई चमत्कार कर दें। इस गहरी आशंका को छिपाकर उसने यह बात अपने भाई और बापू को नहीं बताई। उसने हिम्मत बटोरी और अपनी प्रार्थनाओं में ध्यान लगा दिया।

लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था।

जैसे ही वे शहर के मुख्य अस्पताल पहुँचे, मानिक और आनंद जी जल्दी से श्वेता जी को स्ट्रेचर पर ले गए। डॉक्टर ने तेज़ी से जाँच की। चंद मिनटों की ख़ामोशी के बाद, डॉक्टर ने भारी मन से उन्हें मृत घोषित कर दिया।

यह शब्द सुनते ही मानिक और अनु का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उनका संसार जैसे एक पल में उजड़ गया। मानिक ज़मीन पर बैठ गया और अनु दहाड़ें मारकर रोने लगी, जैसे उस उम्मीद का महल गिर गया हो जिसे उसने रास्ते भर सँभाल कर रखा था। आनंद जी ख़ुद टूटे हुए थे, लेकिन उन्हें एहसास था कि उन्हें ही अपने बच्चों को सँभालना है। उन्होंने मज़बूती से मानिक और अनु को अपने गले लगा लिया, और उस दुख की घड़ी में तीनों ने एक दूसरे का सहारा लिया। श्वेता जी का जाना, मित्तल परिवार के जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ गया।


🏘️ वर्तमान: पाँच साल बाद की धड़कन (संशोधित)

पाँच साल बीत चुके हैं। समय ने ज़ख़्म थोड़े भरे ज़रूर हैं, पर श्वेता जी की यादें आज भी घर के हर कोने में मौजूद हैं। आनंद मित्तल के घर में अब चार युवा सदस्य हैं, जो अपने-अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर बढ़ रहे हैं:

  • अनु (25 साल): एक सख़्त संरक्षिका
    वह परिवार में सबसे बड़ी है। माँ को खोने के बाद उसने घर और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है, जिससे उसका स्वभाव काफ़ी सख़्त और दिशा-निर्देश देने वाला हो गया है। वह एक माँ की तरह अपने भाई-बहनों पर निगरानी रखती है और पढ़ाई, अनुशासन या घर के काम में कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती। उसके लिए, नियम पहले हैं। परिवार में उसकी शादी की बातें होती हैं, लेकिन वह हर बार यह कहकर टाल देती है कि "जब तक यह तीनों अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, मैं घर नहीं छोड़ सकती।"
  • मानिक मित्तल (22 साल): सपनों का वारिस
    वह चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) की पढ़ाई कर रहा है। वह ज़िम्मेदार है, लेकिन घर में सबसे छोटा बेटा होने के कारण उसे हमेशा से थोड़ा 'एक्स्ट्रा' प्यार और छूट मिली है, जो अनु और दिव्या को कभी-कभी खटकता है। वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहता है, जिसका एक कारण अतीत की यादों से दूर रहना भी है।
  • दिव्या (23 साल): विद्रोही गंभीरता
    परिवार की दूसरी बेटी दिव्या, डॉक्टर बनने का सपना देखती है और अपनी पढ़ाई में पूरी तरह समर्पित है। वह स्वभाव से गंभीर और अक्सर तनाव में रहती है, जिसका एक बड़ा कारण उसके मन में मानिक के प्रति नाफ़रत का भाव है। उसे लगता है कि मानिक को सिर्फ़ "घर का लड़का" होने की वजह से परिवार और बापू से ज़रूरत से ज़्यादा लाड और सहूलियतें मिलती हैं, जबकि उसे (दिव्या को) और अनु को हमेशा अधिक त्याग करना पड़ा है। यह भावना उसे अक्सर मानिक से दूरी बनाए रखने पर मजबूर करती है।
  • परी (18 साल): सबसे छोटी और लाड़ली
    सबसे छोटी परी $+2$ (बारहवीं कक्षा) में पढ़ रही है। वह घर की लाडली है और अपनी किशोरावस्था की दुनिया और पढ़ाई में खोई हुई है। वह अक्सर अपनी बड़ी बहन अनु की सख़्त निगरानी और दिव्या की गंभीर चुप्पी के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती है।
आनंद मित्तल जी आज भी परिवार के मुखिया हैं, पर अब उनकी भूमिका एक मार्गदर्शक की ज़्यादा है। इस तरह, यह परिवार श्वेता जी की यादों, अनु के सख़्त नियमों और दिव्या के आंतरिक असंतोष के बीच, राजनगर में अपने नए भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

💼 वर्तमान: अनु और मल्लिका की दुनिया और घर की उलझनें

🌸 "शादी की डोली" – अनु और मल्लिका

पाँच साल बीतने के बाद, अनु ने अपने दुख को किनारे रखकर अपना करियर बनाया। वह अपनी बचपन की दोस्त मल्लिका के साथ मिलकर एक सफल मैरिज प्लानिंग फर्म, "शादी की डोली" चलाती है। दोनों ने छोटी उम्र में ही इस व्यापार में काफ़ी तरक्की हासिल कर ली है।

इन दोनों दोस्तों का स्वभाव एकदम विपरीत है।


  • मल्लिका (Bold and Frank): मल्लिका खुली सोच वाली, बेबाक और बोल्ड है। वह बिज़नेस में नए प्रयोग करने से नहीं डरती और क्लाइंट्स के साथ बेझिझक मज़ेदार बातचीत कर लेती है। वह जानती है कि आधुनिक इवेंट मैनेजमेंट के लिए खुले विचार रखना कितना ज़रूरी है।
  • अनु (Narrow-minded but Sharp): वहीं, अनु अपनी माँ की ज़िम्मेदारियों और घर के मूल्यों से बंधी हुई, स्वभाव में काफ़ी संकीर्ण सोच वाली (Narrow-minded) है। हालाँकि वह काम में बहुत तेज़ है और अकाउंट्स, लॉजिस्टिक्स तथा प्लानिंग के सूक्ष्म विवरण (minute details) में माहिर है। उसका कठोर और सख़्त स्वभाव यहाँ भी दिखता है, जहाँ वह मल्लिका के ज़्यादा खुलेपन पर अक्सर आपत्ति जताती है।
आज शाम दोनों एक हाई-प्रोफ़ाइल क्लाइंट की मीटिंग से लौटी थीं और अपने दफ़्तर में बैठी थीं।

मल्लिका ने सोफ़े पर आराम से पैर फैलाए, "यार अनु, मिस्टर खुराना की बेटी की शादी में हमें थीम थोड़ी और मॉडर्न रखनी चाहिए थी। मैंने कहा था, 'हॉलीवुड रीजेंसी,' पर तू 'ट्रेडिशनल राजस्थानी' पर अड़ गई।"

अनु ने फ़ाइलों को करीने से जमाया और सख़्ती से कहा, "ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ में 'मॉडर्न' घुसड़ना ही तरक्की हो, मल्लिका। हमारा क्लाइंट बेस मध्यम आयु वर्ग के संभ्रांत लोग हैं, और वे 'परंपरा' को ज़्यादा महत्व देते हैं। और हाँ, काम के वक़्त तू अपनी हँसी और फ़्लर्टिंग ज़रा कंट्रोल किया कर।"

मल्लिका हँस पड़ी, "ओह! मैडम अनु, अगर मैं थोड़ी मीठी बात कर लेती हूँ तो इसका मतलब फ़्लर्टिंग नहीं है, यह 'नेटवर्किंग' है। तू थोड़ा खुल जा, ज़िंदगी में हर चीज़ को रूल्स और कैलकुलेशन से मत देख। पर ठीक है, तेरी 'नैरो-माइंडेड' प्लानिंग से भी हमें बहुत मुनाफ़ा हो रहा है।"


अनु ने उसकी आँखों में देखा, "मेरा दिमाग़ खुला हो या संकीर्ण, पर तेरी तरह लापरवाह नहीं है। इसलिए बिज़नेस का सारा फ़ाइनेंशियल कंट्रोल मेरे पास है। अब चल, घर जाना है। दिव्या का ट्यूशन का वक़्त हो गया होगा।"
nast start Looking for an exciting story,
 
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Premkumar65

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Part -2





👔 आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर की उलझन

उधर, आनंद मित्तल, जो एक बड़ी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) हैं, अपने दफ़्तर में थे। वह एक गंभीर और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, लेकिन अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद वह भावनात्मक रूप से काफ़ी अकेले पड़ गए थे।

उनके दफ़्तर में उनकी रीजनल HR हेड, सविता ग्रोवर, आई। सविता एक तेज़-तर्रार, आकर्षक और बहुत ही काबिल पेशेवर महिला थीं।

सविता ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर आते ही एक ख़ास, अनकहा तनाव कमरे में फैल गया।

सविता (फाइल टेबल पर रखते हुए): "सर, हमने उत्तरी क्षेत्र (Northern Region) के लिए नई भर्ती की प्रक्रिया पूरी कर ली है। आपके कहने पर मैंने सारे चेक खुद किए हैं।"

आनंद जी ने सिर हिलाया, "धन्यवाद, सविता। मैं जानता हूँ, तुम हमेशा चीज़ों को त्रुटिहीन रखती हो।"

बातें जल्दी ही दफ़्तर के काम से हटकर निजी बातों की ओर मुड़ गईं। आनंद जी को श्वेता की याद सताती थी, और इस भावनात्मक रिक्ति (emotional vacuum) को भरने के लिए वह सविता के साथ एक अनूठा रिश्ता रखते थे। यह रिश्ता उनकी शारीरिक ज़रूरतों पर आधारित था, जिसमें सविता उन्हें केवल हैंड जॉब तक ही सीमित रखती थी। आनंद जी इस रिश्ते में भावनात्मक जुड़ाव और श्वेता जी की अनुपस्थिति को महसूस करते थे।

आनंद जी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "सविता, मुझे पता है कि मैं तुम्हारे काम के बदले में तुम्हें ज़्यादा तवज्जो देता हूँ... तुम्हारी हाल की तरक्की..."

सविता ने उन्हें बीच में ही काट दिया। उसकी आवाज़ में एक सख़्त आत्म-सम्मान था।

सविता: "सर, मेरी तरक्की इसलिए हुई है क्योंकि मैं काबिल हूँ। मैं बाज़ार के रुझानों को आपसे बेहतर समझती हूँ और मैंने पिछले तीन वर्षों में रीजनल उत्पादकता (regional productivity) में $20\%$ की वृद्धि की है। मैं यह सब इसलिए नहीं करती कि मैं आपकी दिवंगत पत्नी श्वेता की दोस्त की बहन हूँ, और आपको भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है... मैं यह इसलिए करती हूँ क्योंकि मेरा काम ही मेरी पहचान है।"

यह सुनकर आनंद जी कुछ पल के लिए चुप हो गए।

सविता (थोड़ा नरम होकर): "श्वेता मेरी बहन की सबसे अच्छी दोस्त थी, और मैं जानती हूँ कि आप कैसा महसूस करते हैं। मैं आपको यहाँ 'हेल्प' ज़रूर कर सकती हूँ, क्योंकि आप उस तनाव से बाहर निकल सकें जो आप पर बीता है, लेकिन अपनी तरक्की के लिए मुझे किसी की 'हेल्प' की ज़रूरत नहीं है। मैं अपनी जगह अपनी मेहनत से बनाती हूँ।"

सविता के ये शब्द आनंद जी को यह एहसास दिलाते थे कि वह एक कमज़ोर भावनात्मक पलों में हैं, जबकि सविता एक मज़बूत पेशेवर है। वह दोनों एक जटिल डोर से बंधे थे: भावनात्मक सहारा, शारीरिक ज़रूरत, और श्वेता के नाम पर एक अनकहा कर्ज़।

सविता का पति विनोद ग्रोवर भी शहर की एक दूसरी बड़ी कंपनी में मैनेजर था, और वह अपने रिश्ते की प्रकृति को लेकर काफ़ी सतर्क रहती थी। उसका काम और व्यक्तिगत सम्मान उसके लिए सबसे ऊपर था, यहाँ तक कि आनंद मित्तल जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के सामने भी।


💔 आनंद और सविता: एकतरफ़ा चाहत और बेरुख़ी का रिश्ता

🥵 दफ़्तर में बढ़ती बेचैनी

अगले सप्ताह, आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर के बीच का अजीब रिश्ता और भी ज़्यादा तनावपूर्ण हो गया था। आनंद जी को श्वेता के जाने के बाद जिस भावनात्मक और शारीरिक नज़दीकी की तलाश थी, वह सविता में मिल तो रही थी, लेकिन वह हमेशा एक लक्ष्मण रेखा खींच देती थी।

एक शुक्रवार की शाम, दफ़्तर में लगभग ख़ामोशी थी। आनंद जी ने सविता को अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने अपनी कुर्सी घुमाई और खिड़की से बाहर देखती शाम की धुंध को निहारने लगे।

आनंद जी (दबी हुई आवाज़ में): "सविता... पिछले कुछ महीनों से... तुम मेरी सिर्फ़ एक दोस्त या HR हेड नहीं हो। मैं... मैं तुम्हारी तरफ़ आकर्षित महसूस करता हूँ। तुम मेरी ज़िंदगी में एक रौशनी की तरह आई हो।"

सविता (शांत, मगर सख़्त लहजे में): "सर, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करती हूँ। आप अकेले हैं, और मैं समझती हूँ। लेकिन जैसा मैंने पहले कहा, हमारे रिश्ते की एक सीमा है।"

आनंद जी ने अपनी कुर्सी घुमाकर उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में उदासी और बेताबी साफ़ दिख रही थी। "मुझे यह सीमा समझ नहीं आती, सविता। तुम मुझे हैंड जॉब तक सीमित क्यों रखती हो? जब हम इतने करीब आ जाते हैं, तो मुझे लगता है कि तुम भी... तुम भी आगे बढ़ना चाहती हो। मैं तुमसे चुदाई (chut marna) करना चाहता हूँ, सविता।"

सविता ने अपनी भौहें चढ़ाईं। उसकी पेशेवर मुखौटा (professional mask) टूट गया, लेकिन उसने तुरंत ख़ुद को संभाला।

सविता: "आप मेरी क्षमताओं और मेरी इज़्ज़त को एक बार फिर कम आँक रहे हैं, आनंद जी। मैंने जो कुछ किया है, वह सिर्फ़ इसलिए कि मैं आपको भावनात्मक रूप से स्थिर देखना चाहती हूँ, क्योंकि आप मेरी बहन की सहेली के पति हैं। मैं आपके निजी काम आती हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए बाध्य हूँ।"

आनंद जी ने बेचैन होकर मेज पर हाथ मारा। "लेकिन एक बार... एक बार तुमने मुझे लिप किस किया था! वह क्या था? क्या वह भी महज़ एक 'भावनात्मक सहारा' था?"


💋 एहसान का बोझ

सविता ने धीरे से सिर हिलाया। "हाँ, वह एक बार हुआ था। और मैं आपको बता दूँ, वह मैंने इसलिए किया था ताकि आप उस पल का भावनात्मक बोझ कम कर सकें जो आप पर बीता था। उस एक किस के बाद आपने मुझसे हफ़्तों बात नहीं की थी, आप शर्मिंदा थे। और हाँ, उस पर मैं एहसान भी जताती हूँ।"

उसने सीधे आनंद जी की आँखों में देखते हुए कहा।

सविता: "आनंद जी, मुझे कोई ज़रूरत नहीं है कि मैं अपनी तरक्की या अपनी सुरक्षा के लिए आपके साथ शारीरिक रूप से और आगे जाऊँ। मैं सक्षम हूँ। मैं जानती हूँ कि आप मेरी सुंदरता और मेरी नज़दीकी से तड़पते हैं, और मैं आपको यह तड़प इसलिए देती हूँ ताकि आप ज़मीन पर रहें। मैं आपको हर पल यह एहसास कराती हूँ कि मैं यहाँ हूँ, लेकिन सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से।"

आनंद जी के चेहरे पर लाचारी का भाव आ गया। वह जानते थे कि सविता सही कह रही है। वह सचमुच तड़प रहे थे — उसकी नज़दीकी उन्हें भावनात्मक शांति देती थी, लेकिन उसकी लगाई सीमाएं उन्हें और भी ज़्यादा बेचैन कर देती थीं। वह चाहते थे कि यह रिश्ता पूरी तरह से शारीरिक हो जाए, ताकि उनकी तन्हाई मिट जाए, पर सविता उन्हें बस किनारे पर रखती थी।

सविता खड़ी हुई। "सर, मैं जा रही हूँ। अगले सप्ताह आपके लिए एक नया समझौता (new contract) तैयार है, जिसमें आपका कमीशन बढ़ाया गया है। मैंने यह किया है, क्योंकि आप इसके काबिल हैं। न कि इसलिए कि आपने मुझसे और कुछ करने की उम्मीद रखी थी।"

यह कहकर, सविता बिना किसी भावना को दर्शाए कमरे से बाहर निकल गई।

आनंद जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्हें महसूस हुआ कि वह इस महिला के हाथों में पूरी तरह से तड़प रहे हैं। वह उसे अपनी पत्नी की तरह चाहते थे, पर वह उन्हें बस एक मजबूर क्लाइंट की तरह डील कर रही थी, जिसे वह 'हेल्प' कर रही थी, लेकिन अपनी शर्तों पर।


उनका दिल दर्द से भरा था, उन्हें मालूम था कि वह जो चाहते थे, वह कभी नहीं मिलेगा। उनकी यह एकतरफ़ा चाहत उन्हें दिन-ब-दिन और भी अकेला महसूस करा रही थी।
Savita Anannd ko kisi strong step lene par majboor kar rahi hai.
 
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Part -3

🌑 पाँच सालों की तड़प: आनंद और एक अनचाहा प्रस्ताव

पिछले पाँच सालों से, आनंद मित्तल की ज़िंदगी एक अजीब भावनात्मक और शारीरिक सूखे से गुज़र रही थी। अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद, वह अंदर से बुरी तरह टूट गए थे। काम और बच्चों की देखरेख ने उन्हें व्यस्त रखा था, लेकिन बिस्तर की हर रात और दिन का हर एकांत पल उन्हें श्वेता की कमी और अपनी शारीरिक तड़प का एहसास कराता था।

सविता ग्रोवर का उनकी ज़िंदगी में आना इस तड़प को कम करने के बजाय और बढ़ा गया था। सविता उन्हें भावनात्मक सहारे के नाम पर नज़दीकी देती थी, लेकिन उनकी सीमाओं ने आनंद को हमेशा किनारे पर रखा। वह जो अंतरंगता (चूत मारने की चाहत) चाहते थे, वह उन्हें कभी नहीं मिली। वह सविता के दिए हुए 'एहसान' के एक लिप किस और 'हैंड जॉब' के बीच फँसकर रह गए थे, जहाँ उन्हें सिर्फ़ तड़पाया जा रहा था।

🤝 दोस्त का प्रस्ताव

एक शाम, आनंद जी अपने सबसे पुराने दोस्त और अपनी कंपनी के चेयरमैन, दीपक कोहली के साथ एक एक्सक्लूसिव क्लब में डिनर कर रहे थे। दीपक, जो आनंद की स्थिति से भली-भाँति परिचित था, उसे कुछ ज़्यादा ही शांत और बुझा हुआ महसूस कर रहा था।

दीपक ने अपना ग्लास नीचे रखा और गंभीरता से आनंद की ओर देखा। दीपक: "आनंद, हम बचपन के दोस्त हैं। मैं तुम्हें ऐसे और नहीं देख सकता। तुम अंदर से मर रहे हो। तुम इतने बड़े MD हो, करोड़ों का बिज़नेस संभालते हो, पर अपनी निजी ज़िंदगी में ख़ुद को सज़ा दे रहे हो।"

आनंद जी ने धीमी आवाज़ में कहा, "यह सज़ा नहीं है, दीपक। यह... श्वेता के प्रति मेरा सम्मान है।"

दीपक हँस पड़ा, थोड़ी झुंझलाहट के साथ। दीपक: "सम्मान! पांच साल हो गए, यार! श्वेता स्वर्ग में तुम्हारी ख़ुशी चाहती होगी। और यह सविता क्या कर रही है? वह तुम्हें 'ज़रूरत' के नाम पर बस बेवकूफ़ बना रही है! वह तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रही है, और तुम एक हैंड जॉब के लिए उसके एहसानों का बोझ ढो रहे हो। यह सरासर ग़लत है!"

दीपक ने चारों तरफ़ देखा, फिर अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा: दीपक: "देखो, मैंने आज रात तुम्हारे लिए इंतज़ाम कर दिया है। शहर में एक नया बुटीक अपार्टमेंट खुला है, जहाँ बहुत ही उच्च श्रेणी की एस्कॉर्ट्स (Escorts) हैं। कोई 'नॉर्मल' नहीं, ये हाई-प्रोफ़ाइल, पढ़ी-लिखी और समझदार लड़कियाँ होती हैं। तुम्हारी पहचान ज़ाहिर नहीं होगी।"

आनंद जी का चेहरा फीका पड़ गया। उन्होंने अचानक अपनी प्लेट से नज़रें हटा लीं।

आनंद जी (झटके से): "नहीं, दीपक। मैं... मैं यह नहीं कर सकता।"

दीपक: "क्यों नहीं कर सकते? तुम्हें चूत की ज़रूरत है, आनंद! यह कोई पाप नहीं है। तुम पुरुष हो! तुम्हारी ज़रूरतें हैं। और अगर तुम्हारी सविता जैसी 'आधुनिक देवी' तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर रही, तो इसे पैसे देकर पूरा करने में क्या हर्ज है? वे पेशेवर हैं, कोई ड्रामा नहीं, कोई भावनात्मक एहसान नहीं।"


🛑 आनंद का इनकार

आनंद मित्तल उठे, उनके हाथ मेज के नीचे काँप रहे थे। उनकी आवाज़ में दुख और दृढ़ता का अजीब मिश्रण था।

आनंद जी: "तुम सही कह रहे हो, दीपक। मुझे ज़बरदस्त तड़प है। पिछले पाँच साल एक-एक दिन करके काटे हैं। सविता ने जो कुछ किया, उसने मुझे तड़पाया ज़रूर, पर उसने कभी मुझे इतना नीचे नहीं गिरने दिया।"

वह रुके, लंबी साँस ली।

आनंद जी: "श्वेता मेरी पत्नी थी, दीपक। वह मेरी प्रेमिका थी। मैं किसी भी रिश्ते को उसके नाम और सम्मान से ऊपर नहीं रखता। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं कभी किसी और से प्यार नहीं करूँगा, लेकिन मैं पैसे देकर एक एस्कॉर्ट के साथ अपनी शारीरिक ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता।"

उनकी आँखों में एक अजीब सी लाचारी और उदासी थी।

आनंद जी: "मैं एक रात के लिए... सिर्फ़ अपनी शारीरिक तड़प मिटाने के लिए... अपने आप को और श्वेता के सम्मान को किसी ऐसी औरत के सामने बेचना नहीं चाहता, जिसके साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं है। सविता मुझे तड़पाती है, लेकिन उसके अंदर भी एक सम्मान है, जिसे वह बेचती नहीं है। और यही वजह है कि मैं उसे छोड़ नहीं पाता।"

दीपक ने निराशा में सिर हिलाया। दीपक: "तुम बहुत जटिल हो, आनंद। बहुत जटिल।"

आनंद जी ने अपना कोट उठाया। "शायद हूँ। पर मैं अपने बच्चों की आँखों में गिरना नहीं चाहता। मेरी बेटी अनु... वह माँ के जाने के बाद घर और संस्कारों को एक सख़्त रस्सी से बाँधे हुए है। अगर उसे पता चला कि मैं एस्कॉर्ट्स के पास जा रहा हूँ, तो वह टूट जाएगी।"

"तुमने जो ऑफ़र किया, उसके लिए धन्यवाद, दीपक। पर मैं अपनी तड़प के साथ जीना सीख लूँगा। किसी पेशेवर औरत के हाथों की कठपुतली बनने से बेहतर है कि मैं अपनी तन्हाई में तड़पूँ।"

वह तेज़ी से क्लब से बाहर निकल गए, अपनी 'तड़प' और 'सम्मान' के बोझ को एक बार फिर अपने कंधे पर लादकर। उनकी कार शहर की सन्नाटे भरी सड़कों पर दौड़ रही थी, लेकिन उनकी आत्मा में शोर और बेचैनी भरी थी।


💥 घर का युद्धक्षेत्र: मानिक-दिव्या की तकरार और अनु की बेचैनी

मित्तल परिवार का घर बाहर से जितना संभ्रांत (Sophisticated) दिखता था, अंदर से उतना ही तनाव और खींचतान से भरा हुआ था। इसका मुख्य कारण था मानिक और दिव्या के बीच का कभी न ख़त्म होने वाला टकराव। दिव्या की आँखों में मानिक के लिए जो नफ़रत थी — लड़के होने के कारण मिली 'एक्स्ट्रा' तवज्जो को लेकर उपजा असंतोष — वह हर छोटी बात पर भड़क उठती थी।

⚔️ भाई-बहन की जंग

आज सुबह का माहौल भी कुछ अलग नहीं था। मानिक CA की पढ़ाई के लिए अपनी नोट्स बुक को ढूंढ रहा था, जो उसे नहीं मिली।

मानिक (चिल्लाते हुए): "दिव्या! मेरी अकाउंट्स की फ़ाइल कहाँ रखी है? तुम जानती हो न कि कल मेरा टेस्ट है!"

दिव्या, जो अपने कमरे में बैठकर डॉक्टरी की मोटी किताबें पढ़ रही थी, तुरंत तल्ख़ होकर बाहर आई।

दिव्या (तेज़ आवाज़ में): "ज़रा ऊँची आवाज़ में बात मत करना, मानिक! और मुझे क्या पता तेरी फ़ाइल कहाँ है? क्या मैं तेरी निजी असिस्टेंट हूँ? या तेरी देखभाल करने वाली नौकरानी?"

मानिक: "ओह! ये ही तो प्रॉब्लम है। तुम हमेशा एक मरीज़ जैसी शक्ल बनाकर बैठी रहती हो। क्या फ़र्क पड़ता है अगर मैं तुमसे पूछ लूँ? तुम्हें तो वैसे भी बापू से ज़्यादा तवज्जो मिलती है, थोड़ा काम तो कर लिया कर।"

दिव्या (गुस्से से लाल): "बस यहीं रुक जा! मुझे ज़्यादा तवज्जो मिलती है? हाँ? यह मत भूल कि तुम्हारी $50,000$ की कोचिंग फ़ीस बापू ने बिना पूछे भर दी थी, जबकि मेरे NEET के ट्यूशन के लिए मुझे हर बार लड़ना पड़ता है! तुम घर के 'हीरो' हो, इसलिए तुम कुछ भी कह सकते हो।"

मानिक (ताने मारते हुए): "और तुम! तुम घर की 'शहीद' हो। हमेशा ये साबित करने की कोशिश करती रहती हो कि तुम कितनी मेहनत करती हो। जाकर पढ़ो, डॉक्टर साहिबा! शायद उससे तुम्हारा स्वभाव थोड़ा ठीक हो जाए।"

तभी, सबसे छोटी परी (18) बीच में आई। वह हमेशा अपने भाई का पक्ष लेती थी, क्योंकि मानिक उसके लिए बाहर से चॉकलेट और उसकी पसंद की चीज़ें लाता था, और वह उसे 'प्यारा भाई' मानती थी।

परी (दिव्या को चिढ़ाते हुए): "दीदी, क्यों मानिक भैया से रोज़ लड़ती हो? वह तो बस पूछ ही रहे थे। तुम ही हमेशा हर बात को इतना बढ़ा देती हो।"

दिव्या का ग़ुस्सा अब परी पर भी उतर आया। दिव्या को हमेशा लगता था कि परी मानिक की तरफ़दारी इसलिए करती है क्योंकि उसे मानिक से छोटे-मोटे फ़ायदे मिलते हैं।

दिव्या (परी को घूरते हुए): "तुम बीच में मत बोलो, परी! तुम हमेशा अपने प्यारे भैया का पक्ष लोगी ही, क्योंकि वह तुम्हें हर दूसरे दिन महंगे गैजेट्स लाकर देता है। तुम भी उसी की तरह हो — सिर्फ़ फ़ायदा देखती हो। तुम तीनों के कारण ही इस घर में शांति नहीं है।"

परी की आँखें भर आईं। मानिक ने तुरंत परी का हाथ पकड़ लिया।

मानिक: "अब बहुत हो गया, दिव्या! परी को कुछ मत कहना। अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम है, तो मुझसे बात करो। तुम ख़ुद को इतनी गंभीर बनाकर क्यों रखती हो कि तुम किसी को भी पसंद नहीं करती?"


😔 अनु की बढ़ती बेचैनी

यह सारा शोर और ड्रामा घर की सबसे बड़ी बेटी अनु (25) के लिए रोज़ाना का सिरदर्द बन गया था। अनु अपने दफ़्तर 'शादी की डोली' के तनाव और घर के नियमों को लेकर पहले से ही सख़्त थी। इन झगड़ों से वह और भी ज़्यादा परेशान और खींची-खींची रहती थी।

अनु अपने कमरे से तेज़ी से बाहर आई, उसके चेहरे पर गहरी झुंझलाहट थी।

अनु (ज़ोर से): "बस! क्या हो रहा है यह सब? यह घर है या मछली बाज़ार? तुम तीनों को ज़रा भी लिहाज़ नहीं है कि बापू दफ़्तर जा रहे हैं, और घर में कोई शांति होनी चाहिए?"

उसकी सख़्त आवाज़ सुनकर तीनों एक पल के लिए चुप हो गए।

अनु (दिव्या से): "दिव्या! तू बड़ी है, तुझे पता है कि मानिक का टेस्ट है। तू चुपचाप उसकी मदद कर सकती थी या कम से कम अपनी पढ़ाई पर ध्यान देती। तेरे डॉक्टर बनने का क्या फ़ायदा अगर तेरा स्वभाव ही किसी मरीज़ को डरा दे?"

अनु (मानिक से): "और मानिक! तुम छोटे भाई हो। तुम क्यों दिव्या को उकसाते हो? तुम्हें पता है कि वह क्यों नाराज़ रहती है।"

अनु (परी से): "परी! तुम्हारा काम सिर्फ़ पढ़ना है। किसी की लड़ाई में तुम्हें जजमेंट देने की ज़रूरत नहीं है।"

उसने गहरी साँस ली, "मैं पागल हो जाऊँगी तुम लोगों के कारण। मैं बाहर की दुनिया संभालती हूँ, क्लाइंट्स को शांत करती हूँ, और तुम लोग घर को 'युद्धक्षेत्र' बनाकर रखते हो! अगर अगली बार मैंने यह शोर सुना, तो मैं बापू को तुम्हारी सारी सहूलियतें बंद करने को कह दूँगी। अब मानिक, अपनी फ़ाइल ढूंढो, और दिव्या, अपने कमरे में जाओ!"

मानिक और दिव्या एक दूसरे को घूरते हुए अपने-अपने रास्ते चले गए, लेकिन उनके चेहरे पर अब भी पुरानी दुश्मनी की लकीरें खिंची हुई थीं। परी डर कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।


अनु अकेली खड़ी रही। उसने अपने माथे को सहलाया। उसे महसूस हुआ कि माँ के जाने के बाद उसने घर की व्यवस्था तो सँभाल ली है, लेकिन वह अपने भाई-बहनों के बीच के भावनात्मक संतुलन को कभी नहीं सँभाल पाई। यह रोज़ की तकरार उसके सख़्त स्वभाव को और ज़्यादा कठोर बना रही थी।
Good going. Kahani sahi aage badh rahi hai.
 

parkas

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Part -3

🌑 पाँच सालों की तड़प: आनंद और एक अनचाहा प्रस्ताव

पिछले पाँच सालों से, आनंद मित्तल की ज़िंदगी एक अजीब भावनात्मक और शारीरिक सूखे से गुज़र रही थी। अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद, वह अंदर से बुरी तरह टूट गए थे। काम और बच्चों की देखरेख ने उन्हें व्यस्त रखा था, लेकिन बिस्तर की हर रात और दिन का हर एकांत पल उन्हें श्वेता की कमी और अपनी शारीरिक तड़प का एहसास कराता था।

सविता ग्रोवर का उनकी ज़िंदगी में आना इस तड़प को कम करने के बजाय और बढ़ा गया था। सविता उन्हें भावनात्मक सहारे के नाम पर नज़दीकी देती थी, लेकिन उनकी सीमाओं ने आनंद को हमेशा किनारे पर रखा। वह जो अंतरंगता (चूत मारने की चाहत) चाहते थे, वह उन्हें कभी नहीं मिली। वह सविता के दिए हुए 'एहसान' के एक लिप किस और 'हैंड जॉब' के बीच फँसकर रह गए थे, जहाँ उन्हें सिर्फ़ तड़पाया जा रहा था।

🤝 दोस्त का प्रस्ताव

एक शाम, आनंद जी अपने सबसे पुराने दोस्त और अपनी कंपनी के चेयरमैन, दीपक कोहली के साथ एक एक्सक्लूसिव क्लब में डिनर कर रहे थे। दीपक, जो आनंद की स्थिति से भली-भाँति परिचित था, उसे कुछ ज़्यादा ही शांत और बुझा हुआ महसूस कर रहा था।

दीपक ने अपना ग्लास नीचे रखा और गंभीरता से आनंद की ओर देखा। दीपक: "आनंद, हम बचपन के दोस्त हैं। मैं तुम्हें ऐसे और नहीं देख सकता। तुम अंदर से मर रहे हो। तुम इतने बड़े MD हो, करोड़ों का बिज़नेस संभालते हो, पर अपनी निजी ज़िंदगी में ख़ुद को सज़ा दे रहे हो।"

आनंद जी ने धीमी आवाज़ में कहा, "यह सज़ा नहीं है, दीपक। यह... श्वेता के प्रति मेरा सम्मान है।"

दीपक हँस पड़ा, थोड़ी झुंझलाहट के साथ। दीपक: "सम्मान! पांच साल हो गए, यार! श्वेता स्वर्ग में तुम्हारी ख़ुशी चाहती होगी। और यह सविता क्या कर रही है? वह तुम्हें 'ज़रूरत' के नाम पर बस बेवकूफ़ बना रही है! वह तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रही है, और तुम एक हैंड जॉब के लिए उसके एहसानों का बोझ ढो रहे हो। यह सरासर ग़लत है!"

दीपक ने चारों तरफ़ देखा, फिर अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा: दीपक: "देखो, मैंने आज रात तुम्हारे लिए इंतज़ाम कर दिया है। शहर में एक नया बुटीक अपार्टमेंट खुला है, जहाँ बहुत ही उच्च श्रेणी की एस्कॉर्ट्स (Escorts) हैं। कोई 'नॉर्मल' नहीं, ये हाई-प्रोफ़ाइल, पढ़ी-लिखी और समझदार लड़कियाँ होती हैं। तुम्हारी पहचान ज़ाहिर नहीं होगी।"

आनंद जी का चेहरा फीका पड़ गया। उन्होंने अचानक अपनी प्लेट से नज़रें हटा लीं।

आनंद जी (झटके से): "नहीं, दीपक। मैं... मैं यह नहीं कर सकता।"

दीपक: "क्यों नहीं कर सकते? तुम्हें चूत की ज़रूरत है, आनंद! यह कोई पाप नहीं है। तुम पुरुष हो! तुम्हारी ज़रूरतें हैं। और अगर तुम्हारी सविता जैसी 'आधुनिक देवी' तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर रही, तो इसे पैसे देकर पूरा करने में क्या हर्ज है? वे पेशेवर हैं, कोई ड्रामा नहीं, कोई भावनात्मक एहसान नहीं।"


🛑 आनंद का इनकार

आनंद मित्तल उठे, उनके हाथ मेज के नीचे काँप रहे थे। उनकी आवाज़ में दुख और दृढ़ता का अजीब मिश्रण था।

आनंद जी: "तुम सही कह रहे हो, दीपक। मुझे ज़बरदस्त तड़प है। पिछले पाँच साल एक-एक दिन करके काटे हैं। सविता ने जो कुछ किया, उसने मुझे तड़पाया ज़रूर, पर उसने कभी मुझे इतना नीचे नहीं गिरने दिया।"

वह रुके, लंबी साँस ली।

आनंद जी: "श्वेता मेरी पत्नी थी, दीपक। वह मेरी प्रेमिका थी। मैं किसी भी रिश्ते को उसके नाम और सम्मान से ऊपर नहीं रखता। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं कभी किसी और से प्यार नहीं करूँगा, लेकिन मैं पैसे देकर एक एस्कॉर्ट के साथ अपनी शारीरिक ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता।"

उनकी आँखों में एक अजीब सी लाचारी और उदासी थी।

आनंद जी: "मैं एक रात के लिए... सिर्फ़ अपनी शारीरिक तड़प मिटाने के लिए... अपने आप को और श्वेता के सम्मान को किसी ऐसी औरत के सामने बेचना नहीं चाहता, जिसके साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं है। सविता मुझे तड़पाती है, लेकिन उसके अंदर भी एक सम्मान है, जिसे वह बेचती नहीं है। और यही वजह है कि मैं उसे छोड़ नहीं पाता।"

दीपक ने निराशा में सिर हिलाया। दीपक: "तुम बहुत जटिल हो, आनंद। बहुत जटिल।"

आनंद जी ने अपना कोट उठाया। "शायद हूँ। पर मैं अपने बच्चों की आँखों में गिरना नहीं चाहता। मेरी बेटी अनु... वह माँ के जाने के बाद घर और संस्कारों को एक सख़्त रस्सी से बाँधे हुए है। अगर उसे पता चला कि मैं एस्कॉर्ट्स के पास जा रहा हूँ, तो वह टूट जाएगी।"

"तुमने जो ऑफ़र किया, उसके लिए धन्यवाद, दीपक। पर मैं अपनी तड़प के साथ जीना सीख लूँगा। किसी पेशेवर औरत के हाथों की कठपुतली बनने से बेहतर है कि मैं अपनी तन्हाई में तड़पूँ।"

वह तेज़ी से क्लब से बाहर निकल गए, अपनी 'तड़प' और 'सम्मान' के बोझ को एक बार फिर अपने कंधे पर लादकर। उनकी कार शहर की सन्नाटे भरी सड़कों पर दौड़ रही थी, लेकिन उनकी आत्मा में शोर और बेचैनी भरी थी।


💥 घर का युद्धक्षेत्र: मानिक-दिव्या की तकरार और अनु की बेचैनी

मित्तल परिवार का घर बाहर से जितना संभ्रांत (Sophisticated) दिखता था, अंदर से उतना ही तनाव और खींचतान से भरा हुआ था। इसका मुख्य कारण था मानिक और दिव्या के बीच का कभी न ख़त्म होने वाला टकराव। दिव्या की आँखों में मानिक के लिए जो नफ़रत थी — लड़के होने के कारण मिली 'एक्स्ट्रा' तवज्जो को लेकर उपजा असंतोष — वह हर छोटी बात पर भड़क उठती थी।

⚔️ भाई-बहन की जंग

आज सुबह का माहौल भी कुछ अलग नहीं था। मानिक CA की पढ़ाई के लिए अपनी नोट्स बुक को ढूंढ रहा था, जो उसे नहीं मिली।

मानिक (चिल्लाते हुए): "दिव्या! मेरी अकाउंट्स की फ़ाइल कहाँ रखी है? तुम जानती हो न कि कल मेरा टेस्ट है!"

दिव्या, जो अपने कमरे में बैठकर डॉक्टरी की मोटी किताबें पढ़ रही थी, तुरंत तल्ख़ होकर बाहर आई।

दिव्या (तेज़ आवाज़ में): "ज़रा ऊँची आवाज़ में बात मत करना, मानिक! और मुझे क्या पता तेरी फ़ाइल कहाँ है? क्या मैं तेरी निजी असिस्टेंट हूँ? या तेरी देखभाल करने वाली नौकरानी?"

मानिक: "ओह! ये ही तो प्रॉब्लम है। तुम हमेशा एक मरीज़ जैसी शक्ल बनाकर बैठी रहती हो। क्या फ़र्क पड़ता है अगर मैं तुमसे पूछ लूँ? तुम्हें तो वैसे भी बापू से ज़्यादा तवज्जो मिलती है, थोड़ा काम तो कर लिया कर।"

दिव्या (गुस्से से लाल): "बस यहीं रुक जा! मुझे ज़्यादा तवज्जो मिलती है? हाँ? यह मत भूल कि तुम्हारी $50,000$ की कोचिंग फ़ीस बापू ने बिना पूछे भर दी थी, जबकि मेरे NEET के ट्यूशन के लिए मुझे हर बार लड़ना पड़ता है! तुम घर के 'हीरो' हो, इसलिए तुम कुछ भी कह सकते हो।"

मानिक (ताने मारते हुए): "और तुम! तुम घर की 'शहीद' हो। हमेशा ये साबित करने की कोशिश करती रहती हो कि तुम कितनी मेहनत करती हो। जाकर पढ़ो, डॉक्टर साहिबा! शायद उससे तुम्हारा स्वभाव थोड़ा ठीक हो जाए।"

तभी, सबसे छोटी परी (18) बीच में आई। वह हमेशा अपने भाई का पक्ष लेती थी, क्योंकि मानिक उसके लिए बाहर से चॉकलेट और उसकी पसंद की चीज़ें लाता था, और वह उसे 'प्यारा भाई' मानती थी।

परी (दिव्या को चिढ़ाते हुए): "दीदी, क्यों मानिक भैया से रोज़ लड़ती हो? वह तो बस पूछ ही रहे थे। तुम ही हमेशा हर बात को इतना बढ़ा देती हो।"

दिव्या का ग़ुस्सा अब परी पर भी उतर आया। दिव्या को हमेशा लगता था कि परी मानिक की तरफ़दारी इसलिए करती है क्योंकि उसे मानिक से छोटे-मोटे फ़ायदे मिलते हैं।

दिव्या (परी को घूरते हुए): "तुम बीच में मत बोलो, परी! तुम हमेशा अपने प्यारे भैया का पक्ष लोगी ही, क्योंकि वह तुम्हें हर दूसरे दिन महंगे गैजेट्स लाकर देता है। तुम भी उसी की तरह हो — सिर्फ़ फ़ायदा देखती हो। तुम तीनों के कारण ही इस घर में शांति नहीं है।"

परी की आँखें भर आईं। मानिक ने तुरंत परी का हाथ पकड़ लिया।

मानिक: "अब बहुत हो गया, दिव्या! परी को कुछ मत कहना। अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम है, तो मुझसे बात करो। तुम ख़ुद को इतनी गंभीर बनाकर क्यों रखती हो कि तुम किसी को भी पसंद नहीं करती?"


😔 अनु की बढ़ती बेचैनी

यह सारा शोर और ड्रामा घर की सबसे बड़ी बेटी अनु (25) के लिए रोज़ाना का सिरदर्द बन गया था। अनु अपने दफ़्तर 'शादी की डोली' के तनाव और घर के नियमों को लेकर पहले से ही सख़्त थी। इन झगड़ों से वह और भी ज़्यादा परेशान और खींची-खींची रहती थी।

अनु अपने कमरे से तेज़ी से बाहर आई, उसके चेहरे पर गहरी झुंझलाहट थी।

अनु (ज़ोर से): "बस! क्या हो रहा है यह सब? यह घर है या मछली बाज़ार? तुम तीनों को ज़रा भी लिहाज़ नहीं है कि बापू दफ़्तर जा रहे हैं, और घर में कोई शांति होनी चाहिए?"

उसकी सख़्त आवाज़ सुनकर तीनों एक पल के लिए चुप हो गए।

अनु (दिव्या से): "दिव्या! तू बड़ी है, तुझे पता है कि मानिक का टेस्ट है। तू चुपचाप उसकी मदद कर सकती थी या कम से कम अपनी पढ़ाई पर ध्यान देती। तेरे डॉक्टर बनने का क्या फ़ायदा अगर तेरा स्वभाव ही किसी मरीज़ को डरा दे?"

अनु (मानिक से): "और मानिक! तुम छोटे भाई हो। तुम क्यों दिव्या को उकसाते हो? तुम्हें पता है कि वह क्यों नाराज़ रहती है।"

अनु (परी से): "परी! तुम्हारा काम सिर्फ़ पढ़ना है। किसी की लड़ाई में तुम्हें जजमेंट देने की ज़रूरत नहीं है।"

उसने गहरी साँस ली, "मैं पागल हो जाऊँगी तुम लोगों के कारण। मैं बाहर की दुनिया संभालती हूँ, क्लाइंट्स को शांत करती हूँ, और तुम लोग घर को 'युद्धक्षेत्र' बनाकर रखते हो! अगर अगली बार मैंने यह शोर सुना, तो मैं बापू को तुम्हारी सारी सहूलियतें बंद करने को कह दूँगी। अब मानिक, अपनी फ़ाइल ढूंढो, और दिव्या, अपने कमरे में जाओ!"

मानिक और दिव्या एक दूसरे को घूरते हुए अपने-अपने रास्ते चले गए, लेकिन उनके चेहरे पर अब भी पुरानी दुश्मनी की लकीरें खिंची हुई थीं। परी डर कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।


अनु अकेली खड़ी रही। उसने अपने माथे को सहलाया। उसे महसूस हुआ कि माँ के जाने के बाद उसने घर की व्यवस्था तो सँभाल ली है, लेकिन वह अपने भाई-बहनों के बीच के भावनात्मक संतुलन को कभी नहीं सँभाल पाई। यह रोज़ की तकरार उसके सख़्त स्वभाव को और ज़्यादा कठोर बना रही थी।
Bahut hi badhiya update diya hai manikmittalme07 bhai....
Nice and beautiful update....
 

dhparikh

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PART - 1

🕰️ पाँच साल पहले...: जब एक परिवार की रौशनी बुझ गई

राजनगर नामक एक काल्पनिक शहर की कहानी, जिसका केंद्र बिंदु है आनंद मित्तल का भरा-पूरा परिवार। आनंद मित्तल जी अपने जीवन के मूल्यों और सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी दौलत थी उनका परिवार और उनकी पत्नी श्वेता।

कहानी की शुरुआत एक भयानक मंज़र से होती है। शहर की सड़कों पर एक गाड़ी तेज़ी से भाग रही है, जिसके अंदर हर कोई बेतहाशा डरा हुआ है। गाड़ी की पिछली सीट पर आनंद जी की पत्नी श्वेता जी लेटी हैं, जिनकी हालत पल-पल बिगड़ती जा रही है। उनका बेटा मानिक मित्तल (जो उस समय लगभग 17 साल का था) गाड़ी चला रहा है, उसके चेहरे पर डर और जल्दबाज़ी का भाव साफ़ झलक रहा है।

साथ में बैठी उनकी सबसे बड़ी बेटी अनु (उस समय 20 साल की) अपनी माँ के ठंडे पड़ चुके हाथों को पकड़े हुए थी। उसके पिता, आनंद जी, बगल में बैठे लगातार श्वेता जी को सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे।

एक तेज़ मोड़ पर, जब गाड़ी हिचकोले खाती है, अनु अपनी माँ के शरीर में कोई हलचल महसूस नहीं कर पाती। एक पल के लिए उसे लगा जैसे श्वेता जी ने रास्ते में ही अपने प्राण त्याग दिए हैं, पर उसके भीतर एक उम्मीद बाकी थी — शायद यह सिर्फ़ उसका वहम हो, शायद अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर कोई चमत्कार कर दें। इस गहरी आशंका को छिपाकर उसने यह बात अपने भाई और बापू को नहीं बताई। उसने हिम्मत बटोरी और अपनी प्रार्थनाओं में ध्यान लगा दिया।

लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था।

जैसे ही वे शहर के मुख्य अस्पताल पहुँचे, मानिक और आनंद जी जल्दी से श्वेता जी को स्ट्रेचर पर ले गए। डॉक्टर ने तेज़ी से जाँच की। चंद मिनटों की ख़ामोशी के बाद, डॉक्टर ने भारी मन से उन्हें मृत घोषित कर दिया।

यह शब्द सुनते ही मानिक और अनु का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उनका संसार जैसे एक पल में उजड़ गया। मानिक ज़मीन पर बैठ गया और अनु दहाड़ें मारकर रोने लगी, जैसे उस उम्मीद का महल गिर गया हो जिसे उसने रास्ते भर सँभाल कर रखा था। आनंद जी ख़ुद टूटे हुए थे, लेकिन उन्हें एहसास था कि उन्हें ही अपने बच्चों को सँभालना है। उन्होंने मज़बूती से मानिक और अनु को अपने गले लगा लिया, और उस दुख की घड़ी में तीनों ने एक दूसरे का सहारा लिया। श्वेता जी का जाना, मित्तल परिवार के जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ गया।


🏘️ वर्तमान: पाँच साल बाद की धड़कन (संशोधित)

पाँच साल बीत चुके हैं। समय ने ज़ख़्म थोड़े भरे ज़रूर हैं, पर श्वेता जी की यादें आज भी घर के हर कोने में मौजूद हैं। आनंद मित्तल के घर में अब चार युवा सदस्य हैं, जो अपने-अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर बढ़ रहे हैं:

  • अनु (25 साल): एक सख़्त संरक्षिका
    वह परिवार में सबसे बड़ी है। माँ को खोने के बाद उसने घर और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है, जिससे उसका स्वभाव काफ़ी सख़्त और दिशा-निर्देश देने वाला हो गया है। वह एक माँ की तरह अपने भाई-बहनों पर निगरानी रखती है और पढ़ाई, अनुशासन या घर के काम में कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती। उसके लिए, नियम पहले हैं। परिवार में उसकी शादी की बातें होती हैं, लेकिन वह हर बार यह कहकर टाल देती है कि "जब तक यह तीनों अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, मैं घर नहीं छोड़ सकती।"
  • मानिक मित्तल (22 साल): सपनों का वारिस
    वह चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) की पढ़ाई कर रहा है। वह ज़िम्मेदार है, लेकिन घर में सबसे छोटा बेटा होने के कारण उसे हमेशा से थोड़ा 'एक्स्ट्रा' प्यार और छूट मिली है, जो अनु और दिव्या को कभी-कभी खटकता है। वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहता है, जिसका एक कारण अतीत की यादों से दूर रहना भी है।
  • दिव्या (23 साल): विद्रोही गंभीरता
    परिवार की दूसरी बेटी दिव्या, डॉक्टर बनने का सपना देखती है और अपनी पढ़ाई में पूरी तरह समर्पित है। वह स्वभाव से गंभीर और अक्सर तनाव में रहती है, जिसका एक बड़ा कारण उसके मन में मानिक के प्रति नाफ़रत का भाव है। उसे लगता है कि मानिक को सिर्फ़ "घर का लड़का" होने की वजह से परिवार और बापू से ज़रूरत से ज़्यादा लाड और सहूलियतें मिलती हैं, जबकि उसे (दिव्या को) और अनु को हमेशा अधिक त्याग करना पड़ा है। यह भावना उसे अक्सर मानिक से दूरी बनाए रखने पर मजबूर करती है।
  • परी (18 साल): सबसे छोटी और लाड़ली
    सबसे छोटी परी $+2$ (बारहवीं कक्षा) में पढ़ रही है। वह घर की लाडली है और अपनी किशोरावस्था की दुनिया और पढ़ाई में खोई हुई है। वह अक्सर अपनी बड़ी बहन अनु की सख़्त निगरानी और दिव्या की गंभीर चुप्पी के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती है।
आनंद मित्तल जी आज भी परिवार के मुखिया हैं, पर अब उनकी भूमिका एक मार्गदर्शक की ज़्यादा है। इस तरह, यह परिवार श्वेता जी की यादों, अनु के सख़्त नियमों और दिव्या के आंतरिक असंतोष के बीच, राजनगर में अपने नए भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

💼 वर्तमान: अनु और मल्लिका की दुनिया और घर की उलझनें

🌸 "शादी की डोली" – अनु और मल्लिका

पाँच साल बीतने के बाद, अनु ने अपने दुख को किनारे रखकर अपना करियर बनाया। वह अपनी बचपन की दोस्त मल्लिका के साथ मिलकर एक सफल मैरिज प्लानिंग फर्म, "शादी की डोली" चलाती है। दोनों ने छोटी उम्र में ही इस व्यापार में काफ़ी तरक्की हासिल कर ली है।

इन दोनों दोस्तों का स्वभाव एकदम विपरीत है।


  • मल्लिका (Bold and Frank): मल्लिका खुली सोच वाली, बेबाक और बोल्ड है। वह बिज़नेस में नए प्रयोग करने से नहीं डरती और क्लाइंट्स के साथ बेझिझक मज़ेदार बातचीत कर लेती है। वह जानती है कि आधुनिक इवेंट मैनेजमेंट के लिए खुले विचार रखना कितना ज़रूरी है।
  • अनु (Narrow-minded but Sharp): वहीं, अनु अपनी माँ की ज़िम्मेदारियों और घर के मूल्यों से बंधी हुई, स्वभाव में काफ़ी संकीर्ण सोच वाली (Narrow-minded) है। हालाँकि वह काम में बहुत तेज़ है और अकाउंट्स, लॉजिस्टिक्स तथा प्लानिंग के सूक्ष्म विवरण (minute details) में माहिर है। उसका कठोर और सख़्त स्वभाव यहाँ भी दिखता है, जहाँ वह मल्लिका के ज़्यादा खुलेपन पर अक्सर आपत्ति जताती है।
आज शाम दोनों एक हाई-प्रोफ़ाइल क्लाइंट की मीटिंग से लौटी थीं और अपने दफ़्तर में बैठी थीं।

मल्लिका ने सोफ़े पर आराम से पैर फैलाए, "यार अनु, मिस्टर खुराना की बेटी की शादी में हमें थीम थोड़ी और मॉडर्न रखनी चाहिए थी। मैंने कहा था, 'हॉलीवुड रीजेंसी,' पर तू 'ट्रेडिशनल राजस्थानी' पर अड़ गई।"

अनु ने फ़ाइलों को करीने से जमाया और सख़्ती से कहा, "ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ में 'मॉडर्न' घुसड़ना ही तरक्की हो, मल्लिका। हमारा क्लाइंट बेस मध्यम आयु वर्ग के संभ्रांत लोग हैं, और वे 'परंपरा' को ज़्यादा महत्व देते हैं। और हाँ, काम के वक़्त तू अपनी हँसी और फ़्लर्टिंग ज़रा कंट्रोल किया कर।"

मल्लिका हँस पड़ी, "ओह! मैडम अनु, अगर मैं थोड़ी मीठी बात कर लेती हूँ तो इसका मतलब फ़्लर्टिंग नहीं है, यह 'नेटवर्किंग' है। तू थोड़ा खुल जा, ज़िंदगी में हर चीज़ को रूल्स और कैलकुलेशन से मत देख। पर ठीक है, तेरी 'नैरो-माइंडेड' प्लानिंग से भी हमें बहुत मुनाफ़ा हो रहा है।"


अनु ने उसकी आँखों में देखा, "मेरा दिमाग़ खुला हो या संकीर्ण, पर तेरी तरह लापरवाह नहीं है। इसलिए बिज़नेस का सारा फ़ाइनेंशियल कंट्रोल मेरे पास है। अब चल, घर जाना है। दिव्या का ट्यूशन का वक़्त हो गया होगा।"
Nice update....
 

dhparikh

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Part -2





👔 आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर की उलझन

उधर, आनंद मित्तल, जो एक बड़ी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) हैं, अपने दफ़्तर में थे। वह एक गंभीर और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, लेकिन अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद वह भावनात्मक रूप से काफ़ी अकेले पड़ गए थे।

उनके दफ़्तर में उनकी रीजनल HR हेड, सविता ग्रोवर, आई। सविता एक तेज़-तर्रार, आकर्षक और बहुत ही काबिल पेशेवर महिला थीं।

सविता ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर आते ही एक ख़ास, अनकहा तनाव कमरे में फैल गया।

सविता (फाइल टेबल पर रखते हुए): "सर, हमने उत्तरी क्षेत्र (Northern Region) के लिए नई भर्ती की प्रक्रिया पूरी कर ली है। आपके कहने पर मैंने सारे चेक खुद किए हैं।"

आनंद जी ने सिर हिलाया, "धन्यवाद, सविता। मैं जानता हूँ, तुम हमेशा चीज़ों को त्रुटिहीन रखती हो।"

बातें जल्दी ही दफ़्तर के काम से हटकर निजी बातों की ओर मुड़ गईं। आनंद जी को श्वेता की याद सताती थी, और इस भावनात्मक रिक्ति (emotional vacuum) को भरने के लिए वह सविता के साथ एक अनूठा रिश्ता रखते थे। यह रिश्ता उनकी शारीरिक ज़रूरतों पर आधारित था, जिसमें सविता उन्हें केवल हैंड जॉब तक ही सीमित रखती थी। आनंद जी इस रिश्ते में भावनात्मक जुड़ाव और श्वेता जी की अनुपस्थिति को महसूस करते थे।

आनंद जी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "सविता, मुझे पता है कि मैं तुम्हारे काम के बदले में तुम्हें ज़्यादा तवज्जो देता हूँ... तुम्हारी हाल की तरक्की..."

सविता ने उन्हें बीच में ही काट दिया। उसकी आवाज़ में एक सख़्त आत्म-सम्मान था।

सविता: "सर, मेरी तरक्की इसलिए हुई है क्योंकि मैं काबिल हूँ। मैं बाज़ार के रुझानों को आपसे बेहतर समझती हूँ और मैंने पिछले तीन वर्षों में रीजनल उत्पादकता (regional productivity) में $20\%$ की वृद्धि की है। मैं यह सब इसलिए नहीं करती कि मैं आपकी दिवंगत पत्नी श्वेता की दोस्त की बहन हूँ, और आपको भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है... मैं यह इसलिए करती हूँ क्योंकि मेरा काम ही मेरी पहचान है।"

यह सुनकर आनंद जी कुछ पल के लिए चुप हो गए।

सविता (थोड़ा नरम होकर): "श्वेता मेरी बहन की सबसे अच्छी दोस्त थी, और मैं जानती हूँ कि आप कैसा महसूस करते हैं। मैं आपको यहाँ 'हेल्प' ज़रूर कर सकती हूँ, क्योंकि आप उस तनाव से बाहर निकल सकें जो आप पर बीता है, लेकिन अपनी तरक्की के लिए मुझे किसी की 'हेल्प' की ज़रूरत नहीं है। मैं अपनी जगह अपनी मेहनत से बनाती हूँ।"

सविता के ये शब्द आनंद जी को यह एहसास दिलाते थे कि वह एक कमज़ोर भावनात्मक पलों में हैं, जबकि सविता एक मज़बूत पेशेवर है। वह दोनों एक जटिल डोर से बंधे थे: भावनात्मक सहारा, शारीरिक ज़रूरत, और श्वेता के नाम पर एक अनकहा कर्ज़।

सविता का पति विनोद ग्रोवर भी शहर की एक दूसरी बड़ी कंपनी में मैनेजर था, और वह अपने रिश्ते की प्रकृति को लेकर काफ़ी सतर्क रहती थी। उसका काम और व्यक्तिगत सम्मान उसके लिए सबसे ऊपर था, यहाँ तक कि आनंद मित्तल जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के सामने भी।


💔 आनंद और सविता: एकतरफ़ा चाहत और बेरुख़ी का रिश्ता

🥵 दफ़्तर में बढ़ती बेचैनी

अगले सप्ताह, आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर के बीच का अजीब रिश्ता और भी ज़्यादा तनावपूर्ण हो गया था। आनंद जी को श्वेता के जाने के बाद जिस भावनात्मक और शारीरिक नज़दीकी की तलाश थी, वह सविता में मिल तो रही थी, लेकिन वह हमेशा एक लक्ष्मण रेखा खींच देती थी।

एक शुक्रवार की शाम, दफ़्तर में लगभग ख़ामोशी थी। आनंद जी ने सविता को अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने अपनी कुर्सी घुमाई और खिड़की से बाहर देखती शाम की धुंध को निहारने लगे।

आनंद जी (दबी हुई आवाज़ में): "सविता... पिछले कुछ महीनों से... तुम मेरी सिर्फ़ एक दोस्त या HR हेड नहीं हो। मैं... मैं तुम्हारी तरफ़ आकर्षित महसूस करता हूँ। तुम मेरी ज़िंदगी में एक रौशनी की तरह आई हो।"

सविता (शांत, मगर सख़्त लहजे में): "सर, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करती हूँ। आप अकेले हैं, और मैं समझती हूँ। लेकिन जैसा मैंने पहले कहा, हमारे रिश्ते की एक सीमा है।"

आनंद जी ने अपनी कुर्सी घुमाकर उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में उदासी और बेताबी साफ़ दिख रही थी। "मुझे यह सीमा समझ नहीं आती, सविता। तुम मुझे हैंड जॉब तक सीमित क्यों रखती हो? जब हम इतने करीब आ जाते हैं, तो मुझे लगता है कि तुम भी... तुम भी आगे बढ़ना चाहती हो। मैं तुमसे चुदाई (chut marna) करना चाहता हूँ, सविता।"

सविता ने अपनी भौहें चढ़ाईं। उसकी पेशेवर मुखौटा (professional mask) टूट गया, लेकिन उसने तुरंत ख़ुद को संभाला।

सविता: "आप मेरी क्षमताओं और मेरी इज़्ज़त को एक बार फिर कम आँक रहे हैं, आनंद जी। मैंने जो कुछ किया है, वह सिर्फ़ इसलिए कि मैं आपको भावनात्मक रूप से स्थिर देखना चाहती हूँ, क्योंकि आप मेरी बहन की सहेली के पति हैं। मैं आपके निजी काम आती हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए बाध्य हूँ।"

आनंद जी ने बेचैन होकर मेज पर हाथ मारा। "लेकिन एक बार... एक बार तुमने मुझे लिप किस किया था! वह क्या था? क्या वह भी महज़ एक 'भावनात्मक सहारा' था?"


💋 एहसान का बोझ

सविता ने धीरे से सिर हिलाया। "हाँ, वह एक बार हुआ था। और मैं आपको बता दूँ, वह मैंने इसलिए किया था ताकि आप उस पल का भावनात्मक बोझ कम कर सकें जो आप पर बीता था। उस एक किस के बाद आपने मुझसे हफ़्तों बात नहीं की थी, आप शर्मिंदा थे। और हाँ, उस पर मैं एहसान भी जताती हूँ।"

उसने सीधे आनंद जी की आँखों में देखते हुए कहा।

सविता: "आनंद जी, मुझे कोई ज़रूरत नहीं है कि मैं अपनी तरक्की या अपनी सुरक्षा के लिए आपके साथ शारीरिक रूप से और आगे जाऊँ। मैं सक्षम हूँ। मैं जानती हूँ कि आप मेरी सुंदरता और मेरी नज़दीकी से तड़पते हैं, और मैं आपको यह तड़प इसलिए देती हूँ ताकि आप ज़मीन पर रहें। मैं आपको हर पल यह एहसास कराती हूँ कि मैं यहाँ हूँ, लेकिन सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से।"

आनंद जी के चेहरे पर लाचारी का भाव आ गया। वह जानते थे कि सविता सही कह रही है। वह सचमुच तड़प रहे थे — उसकी नज़दीकी उन्हें भावनात्मक शांति देती थी, लेकिन उसकी लगाई सीमाएं उन्हें और भी ज़्यादा बेचैन कर देती थीं। वह चाहते थे कि यह रिश्ता पूरी तरह से शारीरिक हो जाए, ताकि उनकी तन्हाई मिट जाए, पर सविता उन्हें बस किनारे पर रखती थी।

सविता खड़ी हुई। "सर, मैं जा रही हूँ। अगले सप्ताह आपके लिए एक नया समझौता (new contract) तैयार है, जिसमें आपका कमीशन बढ़ाया गया है। मैंने यह किया है, क्योंकि आप इसके काबिल हैं। न कि इसलिए कि आपने मुझसे और कुछ करने की उम्मीद रखी थी।"

यह कहकर, सविता बिना किसी भावना को दर्शाए कमरे से बाहर निकल गई।

आनंद जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्हें महसूस हुआ कि वह इस महिला के हाथों में पूरी तरह से तड़प रहे हैं। वह उसे अपनी पत्नी की तरह चाहते थे, पर वह उन्हें बस एक मजबूर क्लाइंट की तरह डील कर रही थी, जिसे वह 'हेल्प' कर रही थी, लेकिन अपनी शर्तों पर।


उनका दिल दर्द से भरा था, उन्हें मालूम था कि वह जो चाहते थे, वह कभी नहीं मिलेगा। उनकी यह एकतरफ़ा चाहत उन्हें दिन-ब-दिन और भी अकेला महसूस करा रही थी।
Nice update....
 
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