Part -38
मानिक सुबह जल्दी उठा, आस्था को विदा किया और कॉटेज से निकलकर वापस शहर की ओर चल पड़ा। रास्ते में, उसने तुरंत अपना फ़ोन उठाया और परि को मैसेज किया।
मानिक (मैसेज): "सबसे ज़रूरी मीटिंग है आज। तुरंत घर आओ। आज स्कूल मत जाना! तुम्हें पता है न, सारी 'ग्रुप स्टडी' की रिपोर्ट तुम्हें ही देनी है। घर पर मेरा इंतज़ार करना।"
परि, जो अभी नाश्ता कर रही थी, मैसेज पढ़कर ही उत्सुकता से भर उठी। उसे पता था कि मानिक ज़रूर कोई धमाकेदार बात लेकर आ रहा है। उसने तुरंत अनु दीदी और दिव्या से झूठ बोला कि उसे पेट दर्द है, और वह स्कूल नहीं जा पाएगी। दोनों के जाने के बाद, परि घर पर अकेली रह गई, बेचैनी से अपने भाई का इंतज़ार कर रही थी।
दोपहर होते-होते मानिक घर पहुँचा। वह थका हुआ था, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक, संतुष्टि और जीत का भाव था।
परि, जो अब तक अपने उत्साह को रोक रही थी, मानिक के कमरे में दौड़कर गई। मानिक सीधा अपने बेड पर बैठा, और परि तुरंत उसके पास कसकर सटकर बैठ गई। मानिक ने सहजता से अपना हाथ परि के कंधे पर रखा और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
परि: (उत्साह से, फुसफुसाते हुए) बताओ! बताओ! सब कुछ ठीक रहा? 'हथियारों का इस्तेमाल' हुआ या नहीं?
मानिक मुस्कुराया। उसने गहरी साँस ली, और आँखें बंद करके रात के सारे दृश्य याद करने लगा। उसका हाथ, जो परि के कंधे पर था, अब धीरे से उसकी नंगी बाँह पर फिसलने लगा।
मानिक: (आवाज़ धीमी, पर भारी) परि... जो कुछ भी हुआ... वह अविश्वसनीय था। तुमने मुझे जो आज़ादी दी, वह कमाल कर गई। आस्था... वह पूरी तरह से समर्पित थी।
मानिक अब यह भूल चुका था कि परि उसकी बहन है। वह अपनी सबसे अच्छी दोस्त और साथी से बात कर रहा था, जिसने उसे यह रास्ता दिखाया था। वह अपनी यादों में इतना खो गया था कि वह हर बात को खुलकर बताने लगा।
मानिक: सबसे पहले, हमारी 'सीमा' टूटी, और फिर रात को... हमने '69' किया। तुम सोच भी नहीं सकती कि जब आस्था... जब वह मेरे लंड को चूस रही थी, तो उस ठंडी रात में कैसी आग लगी थी। और जब मैं... जब मैं उसकी चूत को चाट रहा था... वह इतनी मीठी, इतनी गर्म था कि मैं पागल हो गया था!
परि का शरीर, जो मानिक से सटा हुआ था, अब तेज़ी से काँपने लगा। मानिक के हाथ का स्पर्श, और उसके मुँह से निकली हर उत्तेजक बात, सीधे परि के शरीर में उत्तेजना पैदा कर रही थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं और वह बिस्तर पर थोड़ा आगे की ओर खिसक गई, अनजाने में मानिक के और करीब आ गई।
मानिक: (आँखों में वासना और याद का मिश्रण) और सुबह तो... हमने एक नया खेल किया! वह क्रोइसैन वाला! आस्था ने जैम लगाकर क्रोइसैन का टुकड़ा... अपने निजी अंग पर रखा! और मैंने... मैंने उसे अपनी जीभ से चाटकर खाया! जब मैं उसकी चूत के बाहरी हिस्सों को चूम रहा था... उस पर क्रोइसैन की मिठास और उस जगह की गर्माहट... मैं तुम्हें बता नहीं सकता...
मानिक ने उत्साह में अपनी आँखें खोलीं और देखा कि परि का मुँह खुला हुआ था, और उसकी आँखें पूरी तरह से वासना और रोमांच से भरी हुई थीं। उसकी साँसों की गति मानिक से भी ज़्यादा तेज़ थी।
मानिक: (अब सीधे परि की आँखों में देखते हुए, उसकी उत्तेजित साँसों को महसूस करते हुए) और फिर हमने शावर में... खड़े-खड़े ही सेक्स किया। आस्था को बहुत मज़ा आया। मैंने उसे जोर से, दना-दन किया! मुझे लगता है कि मैंने अपने और तुम्हारे, दोनों के लिए... बदला ले लिया!
मानिक अपनी बात पूरी करते हुए, जोश में परि की बाँह पर कसकर दबाव डालता है। परि की आँखों में अब भाई-बहन का संकोच नहीं था, बल्कि एक गहरा यौन आकर्षण था, जो मानिक की इस खुली, बेबाक कहानी ने पैदा किया था। वह अंदर ही अंदर, मानिक के साथ आस्था की जगह खुद को कल्पना कर रही थी।
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मानिक की बेबाक कहानी ख़त्म होने के बाद, दोनों भाई-बहन कुछ देर तक उसी उत्तेजित अवस्था में रहे। मानिक का हाथ परि की बाँह पर था, और वे एक-दूसरे से कसकर जफ़ी) पाए हुए थे। कमरे में गहन चुप्पी थी, जिसे सिर्फ़ उनकी तेज़ साँसों की आवाज़ें तोड़ रही थीं।
परि, अपने भाई की बातों से पूरी तरह उत्सुकता और उत्तेजना के चरम पर थी। वह मानिक से अलग नहीं होना चाहती थी। मानिक के शरीर की गर्माहट, जो आस्था के शरीर की यादों से भरी थी, परि को एक अजीब सी राहत और रोमांच दे रही थी।
धीरे-धीरे, परि ने उस चुप्पी को तोड़ा।
परि: (बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में) भाई... मुझे यकीन नहीं हो रहा। तुम... तुमने सच में वह सब किया?
मानिक: (आँखें बंद किए हुए, संतुष्टि से) हाँ, परि। सब कुछ।
परि: (अब और उत्सुकता से) मुझे फिर से बताओ न... जब तुमने... जब तुमने आस्था के प्राइवेट पार्ट पर जैम लगा क्रोइसैन खाया, तो कैसा महसूस हुआ? उसकी त्वचा... वह गर्म थी?
परि ने मानिक के सीने पर और ज़ोर दिया, उसे अपनी ओर खींचते हुए, ताकि वह हर शब्द को ध्यान से सुन सके।
मानिक, जो अब अपनी बहन को अपना अंतरंग राज़दार मान चुका था, को यह जानकर मज़ा आया कि उसकी कहानी परि को कितना उत्तेजित कर रही है। उसने अपनी यादों को और vivid बनाने के लिए, आँखें बंद करके, उन यौन स्मृतियों को बार-बार दोहराया।
मानिक: (धीमी, कामुक आवाज़ में) हाँ... बहुत गर्म थी। क्रोइसैन और जैम की मिठास... और उसकी त्वचा की गंध... सब कुछ मिलकर इतना ज़बरदस्त था कि... मुझे लगा कि मैं अब खुद को रोक नहीं पाऊंगा। आस्था ने भी... (वह हँसा) ...बहुत आहें भरीं।
परि: (उसकी हर बात को ध्यान से सुनती हुई) और शावर में... जब तुमने उसे खड़े-खड़े... जोर से किया... तब वह कैसी आवाज़ें निकाल रही थी? और पानी... पानी की बूँदें...
परि जानबूझकर उन उत्तेजक क्षणों को दोहराने के लिए कह रही थी, क्योंकि हर बार मानिक जब उन क्षणों का वर्णन करता था, तो मानिक का शरीर तनावग्रस्त हो जाता था, और वह खुद भी गहराई से उत्तेजित हो जाती थी।
मानिक भी अब उस क्षण का मज़ा ले रहा था, जहाँ उसकी सबसे करीबी रिश्तेदार, उसकी बहन, उसकी कामुक उपलब्धियों की गवाह बन रही थी।
मानिक: (अब सीधे परि की आँखों में देखते हुए, अपने हाथ से परि की बाँह को सहलाते हुए) वह सिर्फ़ 'आह' नहीं... वह 'चीख़' रही थी। उसे लगा जैसे मैं उसे दीवार में धँसा दूँगा। उस गर्म पानी के नीचे... वह हमारे प्यार का सबसे तूफ़ानी पल था।
परि ने एक गहरी, तृप्ति भरी साँस ली। उनके बीच का आलिंगन और भी कस गया। इस समय, उनके बीच भाई-बहन का रिश्ता नहीं, बल्कि दो युवा थे जो एक-दूसरे की यौन ऊर्जा और रोमांच को साझा कर रहे थे।
परि को अपनी उत्तेजना महसूस हो रही थी, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट थी कि उसके भाई को अब सकारात्मक और स्वस्थ रास्ता मिल गया है, भले ही उसकी ख़ुशी उसे खुद ही उत्तेजित कर रही थी।
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