• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

Prime
23,655
80,785
259
अध्याय 19 भाग:- 4





हर्ष को छेड़ने का अपना ही मजा था... बहुत भोला है वो.. उसकी दुविधा मुझे समझ में आ रही थी.. एक अच्छा स्टूडेंट जो फोकस होकर केवल अपना ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाया... कोर्स के किताब के अलावा जो इसकी दुनिया रही होगी वो घर पर इसकी मां ही रही होगी... हां लेकिन घर पर तो प्राची दीदी भी रही होगी ना..


जारा इसे समझना होगा.. प्राची दीदी शायद 12th बाद दिल्ली निकली थी.. यानी कि बात है ये... 2006 की जब प्राची दीदी 12th पास की थी और तब हर्ष अपना 10th बोर्ड दिया होगा... दोनो के बीच चक्कर क्या है... इसकी चर्चा में भी कभी प्राची दीदी नहीं... इसके पापा भी नहीं है.. केवल इसकी मां ही रहती है...


मै काफी देर इंतजार करती रही लेकिन हर्ष जब बाहर नहीं आया तब मै इसके कमरे में गई देखने, और जैसे ही अंदर देखी, मै अपनी हंसी रोक नहीं पाई... "क्या हुआ हर्ष.. ये अकेले में आइने के सामने खुद को गालियां क्यों दे रहे"..


हर्ष:- खुद की वजह से..


मै:- कारन जान सकती हूं, की खुद से ऐसा क्या कर दिया जो खुद को गाली दे रहे..


हर्ष:- क्योंकि मैंने वो डायरी लिखी और उसी के कारण तुम मेरे हर कमजोर करी को जानती हो..


मै:- ओह ऐसी बात है क्या.. तो अब आगे क्या सोचा है..


हर्ष:- मै अब ब्रेकअप करना चाहता हूं..


मै:- हिहिहिहीहीहि.. ठीक है कर लो ब्रेकअप, और कुछ..


हर्ष:- नहीं ठीक है अब सब कुछ... नाउ हर्ष इज अ फ्री बर्ड… अब तुम यहां से जा सकती हो...


सब कुछ ठीक था, लेकिन आखरी की वो लाइन उसे नहीं बोलनी चाहिए थे... मुझे बहुत बुरा लगा... खैर, हर किसी की अपनी लाइफ होती है...


मै बाहर चली आयी.. घड़ी में अभी 7 बज रहे थे.. करने को कुछ नहीं था.. और मेरे पास पुरा वक्त.. मैंने सुबह का नास्त बनाकर हर्ष को बता दी, और अपने कमरे में बैठकर सीए इंटरमीडिएट सेलेब्स की डिटेल लेने लगी...


मै अपने कामों में व्यस्त थी तभी वीडियो कॉल आया और सामने लाता और मधु... जैसे ही मैंने कॉल पिकअप किया, जो ही उधर से दोनो ने गालियां सुनाई... ऑफ मूड को ऑन कर दिया..


बहरहाल दोनो से बात करते-करते कब घंटे निकल गए पता ही नहीं चला... जून मे वो दोनो भी 2 साल का समय लेकर दिल्ली आ रही थी... लेकिन उससे पहले दोनो ने खास तरह की पार्टी की डिमांड की जिसके लिए मुझसे वो विदेशी लिंगरी और हंटर कि शॉपिंग की डिमांड कर बैठी.….


पूछने पर कि वो इनसे प्लान क्या कर रही है तब उन्होंने एक पोर्न वीडियो लिंक भेज दिया.. बोली बस लड़कियां और पिछवाड़े पर हंटर का खेल चलेगा... मै भी हंसती हुई कह दि क्यों अपने हाथ को कास्ट दे रही लड़के को भी भाड़े पर बुला लेना, सब दुख दर्द वो हर लेगा.. बिना कोई मेहनत करवाए...


ये लड़कियां भी ना पूरे पागल होती है, ऊपर से मेरे दो अनमोल रतन, लता और मधु तो पूरे पागल थी.. इनका उपरी खाना कब खिसक जाए कोई कह नहीं सकता... 10 बजे के करीब मै मॉल पहुंची और वहां कल का बचा हुआ काम और स्टाफ परेड करवाने के बाद, मै एक लेडी सेल्समैन को लता और मधु की लिस्ट थामा दी..


उसका चेहरा देखकर ही पता चल रहा था कि वो अंदर से कितना हंस रही है... मै लिस्ट देकर जैसे ही मुड़ी... "मैम, आप अगर अपना साइज बता देती तो सामान निकालने में आसानी हो जाती"…


"हिहिहिहीहिहिही… क्यों इतने दिन से मुझे देख रही हो, अंडरगारमेंट्स के काउंटर पर सालो से हो, फिर भी पूछना पर रहा"…


सेल्स गर्ल:- सॉरी मैम..


मै:- अरे कोई बात नहीं नाज़, मै तो मज़ाक कर रही थी.. अच्छा याद दिलाया, साइज तो मैंने लिया ही नहीं.. अच्छा एक काम करो, मै अपने दोस्तों को तुम्हारा नंबर दे देती हूं, उनकी जो भी रिक्वायरमेंट होगी उन्हे देख लेना प्लीज..


नाज़:- मैम आप रिक्वेस्ट करती अच्छी नहीं लगती.. आप टेंशन ना ले…


चलो एक टेंशन से तो पूरी तरह से मुक्ति मिल गई... दिन के वक्त मै ज्वेलर्स के पास से एसआई नितिन के बेटी की सरी ज्वेलरी पहुंचा दी और घर आते वक्त मै अपनी नई किताबें, वो भी अलग-अलग रायटर्स की लेकर चली आयी…


शाम का वक्त था मै तैयार होने से पहले हर्ष के कमरे में पहुंची और उससे शाम का प्रोग्राम पूछने लगी. वो फ्री था तो मैंने भी उससे शादी में चलने के लिए पूछ लिया... हर्ष भी हां कहते हुए समय पूछने लगा... मै 1 घंटे बाद का समय लेकर तैयार होने चल दि...


मै वन पीस लाल ड्रेस में हल्के मेकअप और हल्के गहने पहनकर बाहर निकली, हर्ष वहां कैजुअल पहनकर तैयार बैठा था. बड़ा ही मस्त लग रहा था, जी किया जाकर गले गला लूं.. लेकिन अब वो फ्री बर्ड था... खैर मै मुस्कुराती हुई उसे एक बार पुरा देखती... "कमाल के दिख रहे हो हर्ष, आज तो दिल्ली की लड़कियां घायल होने वाली है"..


हर्ष:- जिसे दिखाने के लिए पहना था उसे पसंद आ गया, बाकियों से क्या मतलब है...


कहते हुए हर्ष मेरी ओर कदम बढ़ा दिया.. शायद जो मेरे अरमान थे वही हर्ष के भी अरमान थे, लेकिन मै दरवाजे के ओर अपनी कदम बढ़ा दी और हर्ष भी रास्ता बदलते हुए दरवाजे के ओर चल पड़ा..


मै दिल्ली में पहली शादी अटेंड कर रही थी... मुझे ज़रा भी आइडिया नहीं था कि यहां बिना निमंत्रण कार्ड के प्रवेश निषेध कर देते है... थोड़ा बुरा लगा कि दरवाजा पर ही खड़ा करवा दिया, ऊपर से शादी मे लड़की के पिता एक व्यस्त इंसान होता है.. इसलिए फोन भी नहीं उठा रहे थे..


मै तो लौट रही थी लेकिन तभी सामने से नितिन अंकल भी मैरेज गार्डेन में ही जा रहे थे.. वो मुझे देखकर रुक गए और फिर उनके साथ मै अंदर चली गई... यहां हमे पचनाने वाला कोई नहीं था और जो पहचानते थे वो तो खुद शादी के काम मे व्यस्त थे...


लगभग बोरिंग ही थी ये शादी.. मै और हर्ष कुछ देर वहां रुके फिर मै हर्ष से कहने लगी... "चले हर्ष"..


हर्ष:- 8 बज ही गए है, अब आए है तो खाकर ही निकलते है.. कौन घर जाकर खाना पकाए…


मै:- ओह ! इतना घूमाकर क्यों कह रहे की तुम्हे खाना बनाना परता है... मुझे सीधे भी बोल सकते हो, "मेनका तुम्ही खाना बना दिया करो"..


हर्ष:- नहीं मै उस मकसद से नहीं बोला... मै तो बस कहना चाह रहा था कि यहां का बचा खाना बर्बाद ही होगा, सो क्यों बर्बाद करना खाना..


मै:- नहीं यहां बर्बाद नहीं होता खाना.. सभी मैरेज गार्डेन वाले सुबह सभी खाना गरीबों मे बंटवा देते है... कई लोग तो उन्हे मेहमानों की तरह अंदर बिठाकर भी खिला देते है..


हर्ष:- हम्मम ! ठीक है ऐसा है तो फिर चलो.. और सुनो ना मेरे लिए क्या आज लौकी पका दोगी... बहुत दिन हो गए खाए...


"ठीक है वहीं पका दूंगी, अब चलें"…. "वाउ, मेरी फेवरेट लौकी".... ये भी ना पुरा बच्चा है.. किड


हम दोनों घर लौटने के रास्ते में थे.. लगभग ख़ामोश ही थे इस शाम तो... "सॉरी वो आज सुबह मै थोड़ा चिढ़ गया था"…


मै:- हां जानती हूं, थोड़ा नहीं पूरे चिढ़े थे.. लेकिन कोई बात नहीं है..


हर्ष:- ओह मै कितना खुश हूं तुम्हे बता नहीं सकता.. आई लव यू.. लव यू.. लव यू सो मच...


मै, कार को किनारे खड़ी करती... "हर्ष लौकी खरीद लो"..


सब्जियां खरीदकर हम वापस घर की ओर चले. जैसे ही गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ी... "क्या हुआ सुबह की बात को लेकर नाराज हो"..


मै:- नहीं मै बिल्कुल नाराज नहीं हूं हर्ष... तुम फ्री बर्ड मै फ्री बर्ड, दोनो अपनी अपनी लाइफ में मस्त.. जैसे पहले थे..


मेरी बात सुनकर हर्ष का खिला हुआ चेहरा उतर गया.. "मेनका, मै चिढ़ा हुआ था.. मुझे थोड़ी ही देर बाद गिल्ट सा फील हुआ, लेकिन हिम्मत नहीं हुई, सोचा अभी ज्यादा गुस्सा होगी, बात बढ़ जाएगी, इसलिए तुम्हारा गुस्सा थोड़ा कम होने का इंतजार कर रहा था.."..


मै कार को पार्क करती... "लेकिन मै जरा भी गुस्सा नहीं हुई... और मेरी गलती थी जो मैंने तुम्हारी डायरी पढ़ी.."…


"मेनका"… मै कार खड़ी करके आगे बढ़ गई, हर्ष पीछे से चिल्लाने लगा… "हर्ष हम घर ही जा रहे है, पीछे से ऐसे क्यों चिल्ला रहे हो"…


हम दोनों जैसे ही फ्लैट मे दाखिल हुए, हर्ष मेरा रास्ता रोकते.... "मेनका मैंने सॉरी कहा ना"..


मै:- लव यू बोल देने से लव और ब्रेकअप बोल देने से ब्रेकअप... और सॉरी बोल देने से सब कुछ पहले जैसा हो गया... जाओ अपने कमरे में हर्ष... या एक ही बात बोलकर अगर चाहते हो मुझे परेशान करना तो मै यहां से चली जाऊंगी...


शायद अक्ल आ गई हो ठिकाने और मुझे नहीं लगता कि इसने आजतक कोई ऐसा दोस्त भी बनाया हो जिससे ये कुछ शेयर भी कर सके... अपने कैरियर के चक्कर में ये पुरा स्वार्थी हो गया.. एक असमाजिक प्राणी, जिसे सही गलत केवल अपनी ही बात लगती है... दुनिया गई भार मे...


मै हर्ष से पुरा कट चुकी थी... वो हालांकि 1-2 दिन तक कोशिश करता रहा उसके बाद उसने भी कोई रुचि नहीं दिखाई.... वो अपने कमरे में परा रहता और मै अपने कामों में.…


24 मई की शाम थी, कल सुबह सभी लोग पहुंचते और कल दिन के ट्रेन से हम सब सीधा अपने सहर के लिए निकलते... चूंकि वो लोग 8 बजे एयरपोर्ट लैंड करते और 10.30 बजे सुबह की ट्रेन थी, इसलिए मै पैकिंग करके, रास्ते के लिए खाना बना रही थी...


वैसे भी इतनी लंबी यात्रा से आ रहे थे, और आगे लगभग 20 घंटे का और सफर, कितना बाहर का खाते... मै पैकिंग करके किचेन कि ओर चल दी.. काम ज्यादा था और समय कम… मै किचेन मे थी, और गाजर छिल रही थी, उसी समय वहां हर्ष आकर, सामने किचेन स्लैब पर बैठ गया..


मै उसे देखकर मुस्कुराती हुई... "खाना खाना हो तो बोल देना, मै कल के लिए सबके लिए खाना पका रही"..


हर्ष:- सबके लिए तुम्हे कितना ख्याल रहता है, लेकिन मेरी घुटन तुम्हे मेहसूस नहीं होती..


मै:- हर्ष, मै क्या करूं तुम्हारे लिए बताओ, जो तुम्हारी घुटन कम हो जाए.…


हर्ष:- चाहतों का मज़ा, फासलों में नहीं। आ छुपा लूँ तुम्हें हौसलों में कहीं। सबसे ऊपर लिखा है तेरे नाम को ख्वाहिशों से जुड़े सिलसिलों में कहीं। ख्वाहिशें मिलने की तुमसे, रोज़ होती है नई। मेरे दिल की जीत मेरी मात बन गई... तुम जो आए ज़िन्दगी में बात बन गई...


मै:- हिहिहिहि.. गाना गाने से घुटन कम होगी, पहले बताना था ना..


हर्ष:- वो महज चंद गीत के लाइन नहीं बल्कि जज्बात है मेनका... मै मानता हूं कि मुझे मानाना नहीं आता, बात करना नहीं आता.. मै थोड़ा बदतमीज हूं, और मां के अलावा कभी किसी से खुलकर बात ही नहीं किया... किया तो केवल झगड़ा...


मै:- "हर्ष, तुम्हारे अंदर थोड़ा सा घमंड, और बहुत ज्यादा स्वार्थ भरा हुआ है... समस्या वो बिल्कुल नहीं जो तुमने बताया.. समस्या ये है कि तुम सोचते हो तुम्हे लोगों की जरूरत नहीं, इसलिए तुम्हे अपने आस पास के लोगों के फीलिंग की कद्र नहीं..."

"2 साल बाद तुम लौट रहे थे पिछले साल.. एक बहन की ख्वाइश रही होगी कि उसका भाई एक दिन रुके उसके पास.. शायद तुम्हारे साथ घूमने और अपनी पसंद से तुम्हे वो बहुत कुछ देना चाहती थी.. क्या प्राची दीदी की फीलिंग हर्ट नहीं हुई होगी.."

"जिस दिन तुम सामाजिक हो जाओगे ना, उस दिन तुम मुझे अपने करीब पाओगे... ऐसा नहीं कि मेरे अंदर तुम्हारे लिए कोई फीलिंग नहीं, लेकिन उन फीलिंग्स का मै गला घोंटा दूंगी... क्योंकि तुम्हारे साथ होने का मतलब है केवल तुम्हारे लिए होकर रहना.. और ये मुझसे नहीं होगा.. उम्मीद है तुम मेरी बात समझ रहे होगे..."


हर्ष:- इसे कहते है किसी को बदलकर प्यार करना... बहुत सही किसी ने लिखा है कि अगर कोई लड़की तुम्हारे करीब होती है, तो पहले तुमसे प्यार करेगी.. फिर धीरे-धीरे तुम्हे बदलकर प्यार करती है.. हम क्या है उन्हे इससे कोई लेना देना नहीं.. उन्हे अपना बॉयफ्रेंड, लवर या हसबैंड कैसा होना चाहिए, उस हिसाब से बदलना शुरू कर देती है... आज सोशल होना कह रही हो.. कल मेरे रहन-सहन पर सवाल उठा दोगी... तुम्हारे साथ होने का मतलब हुआ तुम्हारे हिसाब से जीना... और ये मुझसे नहीं होगा...


मै:- हम्मम !!! हर्ष जारा इसे ऊपर रख दो...


मै छिली हुई गाजर हर्ष के ओर बढ़ा दी और मखाने का पैकेट निकालकर उसे घी में भूनने कि तैयारी करने लगी.. तभी हर्ष मुझे घूरते... "तुम्हे कुछ कहना तो नहीं होगा.."


मै:- हां बाबा सुन ली की तुम भी अब मुझमें इंट्रेस्ट नहीं लोगे.. मै तुम्हे बदलने की कोशिश कर रही हूं.. और ये गलत है... अब इस पर क्या टिप्पणी कर दूं… बताओ..


हर्ष:- तुमसे तो बात ही करना बेकार है...


"पागल कहीं का... मेरा पागल.. बच्चा है अभी ये"… हर्ष के बारे ने सोचकर मै मुस्कुराती हुई खाना पकाने लगी...
 

nain11ster

Prime
23,655
80,785
259
अध्याय 19 भाग:- 5





मीठे मे गाजर का हलवा, और मखाने की खीर बनाई थी जो लगभग जमी हुई थी... सब्जी मे लगभग ड्राई ही पनीर प्याजा, जीरा आलू ड्राई, मसालेदार प्याज में पका चना, उसी के साथ कचोरियां और जीरा राइस… सबको मैंने छोटे छोटे एयर टाइट बॉक्स मे अच्छे से पैक करवा दिया..


मॉल से 3-4 लोगों को बुला ली थी.. भारी सामान था इसलिए वो लोग सामान पहुंचाकर, ट्रेन में अच्छे से जमाकर वापस लौट गए.. हर्ष जाकर अंदर बैठ गया और मै स्टेशन पर सबके आने का इंतजार करने लगी...


10 बजते बजते सब पहुंच रहे थे... मै जब सबको देखी तो देखती रह गई... बिल्कुल फ्रेश, नहा धोकर चकाचक होकर आए थे... मुझे पक्का यकीन हो गया कि ये लोग 24 की ही सुबह पहुंचे है और एक दिन फुल रेस्ट लेकर आ रहे है और मुझे मजदूर की तरह खटवा दिया...


जब सब मेरे नजदीक पहुंचे मै सबको गुस्से से घुरकार देखने लगी.. खास तौर पर नकुल और गौरी को... सब लोग समझ चुके थे कि मै क्या जान गई हूं.. और सबके अंदर की हंसी बयान कर रही थी कि वो कितना मज़े ले रहे है...


मासी:- मेनका ये क्या तरीका है.. किसी के पाऊं छूना तो दूर सबको गुस्से में घुर रही हो..


मै, सबको प्रणाम करने के लिए झुकने लगी, इतने में मां ने कहा.… "रहने दो.. वैसे भी रात भर खाना पकाती रही होगी, फिर सबके लिए डब्बे मे पैक की होगी... कमर अकड़ जाएगी.. हमने तुम्हारा प्रणाम मान लिया.."


सभी लोग ठहाका लगाकर हसने लगे.. जी तो किया अपनी ही मां को जाकर चटाक, चटाक 2 थप्पड़ लगा आऊं... "हां हां सोच ले और आखों से ही मार दे थप्पड़ मां को".... मेरी मां मेरे चेहरे की भाव को पढ़कर व्यंग करती हुई कहने लगी...


फिर सब हसने लगे... "क्या ही कर सकती हूं मै, ठीक है सबका गुस्सा मै इस कुते पर उतारूंगी.. तू चल तुझे बताती हूं"… मै नकुल को घूरती अपनी बात समाप्त ही कि थी, कि सामने से मासी ने चिपका दिया... सबके मुंह से "आव.. बेचारी" निकल गया.. मासी मुझे घूरती हुई... "कितनी बार कही हूं जुबान पर काबू कर"…


"बताओ साला भलाई का जमाना ही नहीं रहा.. सुबह-सुबह तबीयत से मेरे घरवालों ने मेरी ही ले ली"… मै चुपचाप जाकर कोना पकड़ ली और सोच ली किसी से बात ही नहीं करूंगी...


सेकैंड एसी मे 20 सीट हमारी रिजर्व थी.. 18 बर्थ तो एक तरफ से बुकिंग थी, उन्हे छोड़कर मै, 2 सीट जो अन्य 2 यात्रियों के साथ थी, उसपर आकर बैठ गई.. आते-आते मैंने बता दिया कि खाना कहां रखा है.. और ट्रेन खुलने के पहले ही मै अपना बिस्तर जमाकर, ऊपर जाकर सो गई..


यूं तो मै गुस्से में लेटने गई थी, लेकिन कब आंख लग गई मुझे पता भी नहीं चला... दिन के 2 बजे किसी के हिलाने से मेरी आखें खुली... देखी तो नीचे मासी खड़ी थी..


मै छोटा सा मुंह बनती... "इतने लोगों के बीच अपनी बेटी को मारते आप को जरा ख्याल ना आया"..


मासी:- सॉरी, थोड़ा गुस्सा आ गया था, चल नीचे आ जा खाना खा ले…


मै:- आपने खाया..

मासी:- तू खा ले फिर मै खाती हूं..


मै नीचे उतारकर उनके दोनो गाल खींचती... "मुझे मारने के बाद जब गले से खाना नहीं उतरता, तो मारती क्यों हो"…


मासी:- बातें बाद मे कर लेंगे, हाथ मुंह धोकर आ, पहले खाते है...


मैंने और मासी ने आराम से भर पेट खाना खा लिया. मासी को खिड़की किनारे बिठाकर मैंने अपना सर उनकी गोद में रख दिया.. और मासी मेरे सर को दबाने लगी... उनके हाथ का स्पर्श इतना प्यारा होता है कि क्या बताऊं... मेरी मासी बेस्ट है...


उनका हाथ लगते ही, मै दोबारा सो गई थी.. और इस बार आंख खोली तो सामने नकुल... मै गुस्से से देखती... "शर्म तो ना आयी होगी.. मुझे मजदूरों की तरह खटाते हुए..."


नकुल:- सबने मिलकर प्रैंक किया था... छोड़ भी उस बात को.. एडमिशन करवा ली..


मै:- हां हो गया है एडमिशन.… तू तो पूषा यूनिवर्सिटी में एडमिशन भी ले लिया होगा...


नकुल:- नहीं मै इग्नौ से एग्रीकल्चर साइंस में क्रॉसपोंडेंस कर रहा हूं... पूषा मे रेगुलर क्लास आटेंड करने का टेंशन था..


मै:- और प्रैक्टिकल वगैरह..


नकुल:- पूषा यूनिवर्सिटी में बात हो गई है... 20 हजार मे मुझे मेरे हिसाब का प्रेक्टिकल करवा देंगे...


मै:- चल अच्छा है फिर... ध्यान रखना अपना और मेरी बात याद है ना..


नकुल:- हां याद है.. कृषि के क्षेत्र में मै कुछ ऐसा करूंगा जो सबको प्राउड फील करवा जाएगा.. खुश ना..


मै नकुल के कांधे सर रखती.. "बहुत ही ज्यादा खुश... और बता तेरी चुलबुली के क्या हाल है"…


नकुल:- कौन चुलबुली..


उसने बहुत कोशिश की अपने भाव जाहिर ना होने दे, लेकिन उसके आखों की चमक बता गई की मै किसके बारे में पूछ रही... उसको देखकर मै मुस्कुराती हुई... "लड़का बड़ा हो गया है अब सीक्रेट रखे जा रहे है"…


नकुल:- पागल मेनका मिश्रा.. तू ना भावनाओ मे बहकर फसा देगी.. और एक बात ये बिल्कुल निजी है अभी.. सही वक्त पर पहले तुझे याद किया जाएगा.. या उससे पहले ही तू पता लगाकर हमारे लिए सही वक्त ले आए, इस पर हम दोनों बीच चिंतन चल रहा है...


मै:- कुता कहीं का... अब वो निजी हो गई... हां बेटा, पत्नी मोह के बाद तो सारे मोह तो मिथ्या हो जाते हैं..


नकुल:- कटु वचन बलिके.. जितनी जल्दी समझ जाओ आगे की राह आसान होगी..


मै:- उड़ ले बच्चा.. बस मै दुआ कर रही की..


नकुल:- चुप हो जा सब लोग कान लगाए है...


मै:- हां चल ठीक है, मान ली तेरी बात.. बहुत गुस्से में हूं मै, चल अब मना मुझे...


"दादी अम्मा, दादी अम्मा मान जाओ.. दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ"… गाना सुनाते हुए नकुल हंसने लगा... मै कुछ प्रतिक्रिया देती उससे पहले ही सामने के सीट पर बैठे एक सज्जन महानुभाव कहने लगे... "ए तुम दोनो बात करना बंद करो.. सफर करना नहीं आता तो पता नहीं क्यों ट्रेन में चढ़ जाते हैं"…


नकुल:- सुनिए महाशय, आप जो इतनी तेज खर्राटे ले रहे है.. अगर मेरे कानो मे एक भी चू आवाज गई फिर मै बताता हूं... पता नहीं इसके घर वाले कैसे झेलते होंगे इन्हे...


ऊपर से आवाज आयी… "बाहरी हो गई हूं बेटा, और क्या कह सकती हूं..."..


सज्जन पुरुष:- हां और तुम्हे ये बातें पूरी-पूरी सुनाई दे रही है... मिल लो तुम्हारे ही मायके वाले है.. ऊपर तो तरप जाग रही होगी, बैठकर कोई बात करने वाला मिल जाए...


नकुल:- क्या सर जो पत्नी आपके खर्राटे झेल गई, उसे बच्चो के सामने डांट रहे हो.. और फिर ऊपर से कहोगे इसमें जरा भी अक्ल ही नहीं...


नकुल ने जैसे ही यह कहा, ऊपर से हंसने की आवाज आने लगी. नीचे वह आदमी भी हंसने लगा.. वो महिला भी नीचे उतरी, और सामने दोनो बैठ चुके थे... दोनो दंपति गुरुजी निकले, वो भी यूनिवर्सिटी प्रोफेसर, हमारे सहर ही जा रहे थे... ऊपर से बातों के दौरान पता चला कि ये वर्मा सर के दोस्त हैं.. दुनिया कितनी छोटी है..


मुझे जैसे ही यह बात पता चली मै भी व्यंग करती हुई कहने लगी... "वर्मा सर ने भी अपने जैसे ही दोस्त ढूंढ रखे है, बिल्कुल खडूस"…


जैसे ही उन्होंने मुझे सुना मैडम हंसती हुई कहने लगी…. "क्या खूब पहचाना है.. एक करेला, दूसरा नीम… ऊपर से ये दोनो तो नीम हकीम खतरे जान वाले वैध भी है"…


मैडम लगी थी पोल खोलने में, और सर की अब बोलती बंद. जब मैडम रुकी नहीं तब सर ने सीधा कॉल लगा दिया वर्मा सर को.. शिकायती लहजे में वो वर्मा सर को बताने लगे कि... "यार तुम्हारी एक छात्रा ने मेरे मिसेज के सामने तुम्हे खडूस बोल दी और तेरी भाभी बच्चों के सामने हमारी पोल खोल रही है..."


इधर सर ने फोन स्पीकर पर डाला और उधर से वर्मा सर चिल्लाने लगे... "कौन नालायक बोल रही है"…


मै:- सर ज्यादा चिल्लाए नहीं, ब्लड प्रेशर बढ़ जायेगा...


मै इधर से जैसे ही बोली, दूसरी ओर से बिल्कुल सन्नाटा छा गया... बस श्वांस तेज होने जैसे आवाज थी जो बहुत ध्यान से सुनने पर पता चल रहा था...


सर का रोना हम सब मेहसूस कर रहे थे.. कोई आवाज नहीं आ रही थी पर हर कोई जान गया कि वो रो रहे थे... मैंने इधर से ही बोला... "सर कल मै आपसे आकर मिलूंगी... और कल कोई रोना नहीं"… इतना कहकर मै फोन काट दी...


यहां बैठे दुबे सर मुस्कुराकर देखते हुए कहने लगे... "वर्मा का सपना तुमने पुरा कर दिया बेटा.. मेनका मिश्रा हो ना"..


मै:- सर अभी तो एडमिशन लिया है पहले कोर्स कंप्लीट तो हो जाए..


तभी मैडम बोल परी... वर्मा सर रो रहे है मतलब तुम सीए बन गई, उन्हे विश्वास है...


काफी लंबी बातचीत के बाद सर कहने लगे.… "तुम दोनो को देखा तो ख्याल आया कि अभी भी हमारे इलाके में संस्कार बचा हुआ है... बड़ों की इज्जत बची हुई है... तुम्हारा भाई बहुत ही समझदार है... इस उम्र का कोई दूसरा लड़का होता तो हमारी टोन सुनकर पक्का हमसे झगड़ा करता और मेरी प्यारी पत्नी को फिर मसाला मिल जाता यह कहने का कि जुबान तो ठीक नहीं सबसे झगड़ा करते रहते हो"..


नकुल हंसते हुए कहने लगा.… "वो तो वैसे भी कहेंगी सर... इन औरतों को कोई काम तो रहता नहीं है.. दिन भर बुराई करके ही अपना खाना पचाती है"…


नकुल ने जैसे ही अपना डायलॉग पुरा किया, उधर से मां ने उसका कान को खिंचते… "और तू दादा है सबका ना... क्यों दुबे आंखें सही है या मुझे पहचानने में कोई तकलीफ़ हो रही"…


दुबे सर मम्मी के पाऊं मे गिरते... "कनिका दीदी आप है क्या"…


मां:- बधाई हो तेरी आखें ठीक है...


नकुल:- दादी लेकिन मै जवानी में कदम रखने से पहले ही बहरा हो जाऊंगा...


मां नकुल के कान छोड़ती... "ये वर्मा वहीं है ना तेरा लंगोटिया, जो मेरे आगे पीछे घुमा करता था.. और पीछे तू मुझे भाभी-भाभी पुकारा करता था"…


हो !!! ये तो कहानी पर कहानी खुल रही थी... इतने में रूपा भाभी पहुंच गई और दोनो ने मिलकर दोनो दंपत्ति को उठाकर ले गए हमारे महफिल के बीच...


आह पुराने किस्से पलटने शुरू हो गए... 3-4 जिले मिलाकर एक ही यूनिवर्सिटी हुआ करती थी और उसमें भी पीएचडी करने वाली छात्राएं गिनती के बराबर... वर्मा सर और दुबे सर थे मेरी मां के जूनियर... और भी लोगों के नाम निकलकर आ रहे थे...


उस वक्त मुझे मेरे नाना के दबंगई का भी पता चला था, जब मेरी मां यूनिवर्सिटी जाती थी और उनके लिए गांव में पंचायत लगी थी कि... "अनूप की बीवी का गौना नहीं करवा रहा उसका शासुर और बेटी को यूनिवर्सिटी भेज रहा..."


मेरे पापा भी कम डेरिंगबाज नहीं थे.. गौना नहीं हुआ था, लेकिन मां प्रेगनेंट हो गई थी... हिहिहिहि... मेरे नाना ने तो 2 नली तान दी और इधर मेरे दादा मूंछ पर ताऊ देते पहुंचे थे अपनी बहू का गौना करवाने... अपने घर में पोते पोतियों की किलकारी सुनने.. नाना ने सीधा कह दिया था अगर मेरी बेटी डॉक्टर कनिका मिश्रा नहीं कहलाए, तो मेरे दादा को उसके पोते पोतियों का मुंह नहीं देखने देंगे... इनकी कहानी भी काफी हिलेरियस थी..


ओह माय गॉड इतने किस्से... मेरी मां तो जैसे विकिपीडिया थी... अपना किस्सा सुनाने के बाद उन्होंने दुबे की पत्नी की पोल खोल दी... कैसे पीएचडी करने गए और चुपके चुपके प्यार हुआ... यहां तक कि अब तक जो सबसे बड़ी हॉट न्यूज थी, तब खुल गई जब मां इतिहास के पन्ने पलट रही थी और उन पन्नों मे राजवीर अंकल का जिक्र मिला..


मां ने जब उन्हे अपना पूरा परिचय दिया कि उनकी मौसेरी बहन और वो दोनो क्लास मेट थी और 2 साल के लिए राजवीर अंकल जम ही गए थे अपनी मासी के यहां... राजवीर अंकल मां को गौर से देखते हुए कहने लगे.. "कुकु दीदी"… दरसअल मां को गांव में सब कुकू ही पुकारा करते थे..


अब जब ये राज खुला राजवीर अंकल घबराए-घबराए से रहने लगे.. अपने हाथ से अपना सर पीटते... "बताओ आपसे इतनी बार मिला लेकिन पहचान नहीं पाया"… मां भी मज़े लेती हुई कहने लगी... "तुम्हे उपासना (राजवीर अंकल की पत्नी) के अलावा कोई याद भी रहा क्या... तू तो अपनी राजपूती शान में अपनी बहन निरू (राजवीर अंकल की मौसेरी बहन) को भुल गया फिर मै किस खेत की मुली हूं....


फिर पुरानी बातों का दौर जब चला तब उन्हे अकेले छोड़कर एक पैसेज छोड़कर दूसरे पैसेज मे आ गई, जहां प्राची दीदी, हर्ष, नकुल और गौरी बैठी हुई थी..
 

nain11ster

Prime
23,655
80,785
259
अध्याय 19 भाग:- 6





मै जैसे ही पहुंची गौरी अपनी नजरो से इशारा करती हर्ष के ओर ध्यान दिलाई, और उसके इशारे पर जोड़ से हंसती हुई कहने लगी… "बच्चा परिवर्तन ही संसार का सच्चा नियम है, लेकिन कुछ लोगों से यदि सकारातमक बदलाव की बात करो तो अपनी ज्ञान विज्ञान कि कहानी भूल जाते है"..


नकुल:- गौरी के डायलॉग तुम क्यों बोल रही दीदी... उसकी बीमारी तुम्हे कैसे लग गई...


प्राची दीदी... हो जाते हैं लोग कभी-कभी मेंटली डिस्ट्रुब.. कोई बड़ी बात नहीं... तू सो जा मेमनी, दिमाग ठिकाने आ जाएगा...


हर्ष:- दीदी ये जीनियस लोग है, इनके हिसाब से पूरी दुनिया का ही दिमाग खिसका हुआ है, और उनका दिमाग इस दुनिया से मैच नहीं करता..


गौरी:- देखा जाए तो हर्ष बाबू ने बिल्कुल सही कहा है.. जीनियस मे कुछ अलग करने की क्षमता होती है लेकिन लोगों को शुरू-शुरू में नई चीजें समझ में नहीं आती...


मै:- ये चल क्या रहा है यहां व्यंग-व्यंग खेल रहे है क्या सब.. नहले पर दहला डालने की कोशिश... इससे अच्छा हम अंतराक्षरी खेल लेते है... क्या कहते हो..


प्राची दीदी:- यही है राइट चॉइस बेबी… हां लेकिन मै अपनी टीम खुद चुनुगी...


मै:- ऐसे कैसे, टॉस होगा...


प्राची:- टॉस क्या करना मेनका, मै नकुल और गौरी...


मै:- ले लो... मेरी प्राउड किधर है...


साक्षी, जो रूपा भाभी के पास थी... "दीदी आप से गुस्सा हूं, आपने तो मुझे ठीक से देखा भी नहीं"..


मै:- मेरा ख्याल कौन रखेगा...


साक्षी:- मै रखूंगी...


मै:- तो आ जा...


साक्षी, मेरे पास आते ही... "दीदी आप बहुत इमोशनल ब्लैकमेल करती हो"


मै अपनी आखें बड़ी किए पहले सक्षी को देखी फिर नकुल को घूरते... "ये कारस्तानी तेरी है"…


साक्षी:- ये तो डंबो है मुझे तो प्राची दीदी ने सब सिखाया है..


मै:- बदमाश, मेरे ना रहने पर पूरी शैतान हो गई है..


हर्ष:- हम सब शायद यहां टीम बना रहे थे अंतराक्षरी का..


साक्षी, उत्सुकता से मुझे देखती "दीदी अंतराक्षरी क्या"… मैंने भी मुस्कुराते हुए हां मे अपना सर हिला दिया.. तभी साक्षी चिल्लाते हुए कहने लगी... "मै और दीदी एक तरफ और पुरा गांव एक तरफ... हार गए तो एक बीघा खेत लिख दूंगी वरना कहना होगा... ये बुआ भतीजी ग्रेट है.. क्यों ठीक कहा ना दीदी"…


दरअसल ये पंच लाइन मेरा था जो मै अक्सर इस्तमाल किया करती थी... लेकिन आज साक्षी तो मुझे झटके पर झटका दिए जा रही थी... अब जब बोल ही दिया था मेरी बच्ची ने तो फिर सोचना क्या.. ताल ठुके और मच गया द्वंद... शुरू हुआ शाम से 7 बजे अंतराक्षरी का खेल खत्म हुआ रात के 2 बजे..


मैंने सच में एक गीत नहीं गया.. साक्षी अकेली ही पुरा मोर्चा भी संभाल ली और जीत भी हासिल करके आयी.. अंत में बुलवा भी लिया.. "बुआ भतीजी ग्रेट हो"… खैर अगली सुबह मै अपने सहर मे थी, और सबसे पहले मै जाकर वर्मा सर से ही मिली...


मेरे साथ जब उन्होंने मेरी मां को देखा तब वो कह गए... "मुझे समझ जाना चाहिए था कि ये प्रतिभाशाली विधार्थी किस स्कॉलर की बेटी होगी"… खैर वर्मा सर के आंखो में अब भी आंसू थे.. उन्हे कहना था यदि वो अपने मार्गदर्शन से एक विधार्थी को सीए नहीं करवा सके फिर क्या फायदा कॉमर्स के विषय के ज्ञान का..


बहरहाल टॉपर तो बहुत रहे है हमारे क्षेत्र से, लेकिन इस वरुण भैया ने जो पॉलिटिकल ड्रामा किया ना, मै क्या कहूं उसके बारे में... बजे गाजे के साथ रैली निकाली और सबको यही कहते रहे... अब घर-घर एक मेनका होगी...


खैर गांव में जब हूं तो यहां 3-4 दिन कब निकल गए पता ही नहीं चला... 31 मई को मै दिल्ली में थी और 1 जून मेरा क्लास स्टार्ट हो गया... 8 महीने 8 पेपर उसके अलावा एक टेक्निकल पेपर, सब ने कहा इसे 2 साल तक मे आराम से क्लियर करते रहो.. लेकिन मै ठहरी ढिट आज का काम कल पर तो छोड़ना किसी ने सिखाया ही नहीं...


हालांकि कोई भी विषय मेरे लिए नया नहीं था और ना ही कोई भी टॉपिक... लेकिन मै वर्मा सर की स्टूडेंट थी और उन्होंने सिखाया था कि जो पढ़ा हुआ भी टॉपिक हो, उसे शुरू से पुरा कहते पढ़ने, ताकि उसके अंदर की सारी टेक्निकल चीजें दिमाग में हो..


पहले के एक हफ्ते में ही मुझे समझ मे एक बात आ गई थी, कि यदि मै क्लास करती रही तो इतने सब्जेक्ट्स को 8 महीनों में क्लियर नहीं कर पाऊंगी... मैंने 16 घंटे का स्टडी प्लान बनाया.. इसे मैंने वर्मा सर और सीए रजनीश भैया से डिस्कस किया... दोनो ने हो मुझे एप्रिशिएट किया और क्लास ना अटेंड करने के मामले में राजी हो गए...


12 जून 2013, प्राची दीदी के ठीक पास वाले कमरे में मै शिफ्ट हो रही थी... कविता मासी, ठीक प्राची दीदी के पास वाला फ्लैट गौरी और मैक्स के लिए खरीद चुके थे, क्योंकि 12th बाद दोनो यहां आने वाले थे... मेरे मौसा जी काफी सम्पत्ति वाले लोगों में से थे, जिन्होंने दिल्ली में सम्पत्ति बनाने के हिसाब से फ्लैट खरीदा था...


16 जून को वैसे लता और मधु भी दिल्ली आ रही थी, लेकिन वो दोनो किसी अन्य जगह पर पेइंग गेस्ट बनकर रह रहे थे, मुझे बस सूचना मिली थी और 2 दिन तक उनके साथ घूमना फिरना हुआ था...


बहरहाल 20 जून 2013 को मै उस बाजू वाले कमरे में पैक हो रही थी... और सीधा 16 जनवरी 2014 को बाहर निकली... लगभग 8 महीने मैंने उस फ्लैट से तो क्या फ्लैट के कमरे से बाहर नहीं निकली... मोबाइल स्विच ऑफ परा हुआ था और बाहरी दुनिया में मेरे केवल 3 लोग से बात हो रही थी...


प्राची दीदी जिन्होंने मेरे हैल्थ से लेकर ये पुरा 8 महीना मुझे मेंटेन रखा... उसके अलावा वर्मा सर और सीए रजनीश कुमार, जिन्होंने पूरे विषयों की तयारी मे मेरी पूरी मदद की... इन 8 महीनों के दौरान मैंने अपने घर के किसी भी सदस्य से संपर्क नहीं रखा, यहां तक कि नकुल पड़ोस के दरवाजे यानी प्राची दीदी के पास कई बार आया, लेकिन उसे पड़ोस के कमरे में आने की इजाज़त नहीं थी...


इन 8 महीने में मैं सिर्फ एक बार निकली थी अपना टेक्निकल पेपर देने.. उसके बाद सीधा बाहर का चेहरा मै 16 जनवरी को देख रही थी... 16 से 25 जनवरी तक मेरे एग्जाम चलते रहे और अब वक्त था दुनिया से रु बरू होने का… और मै किसी को फोन नहीं करना चाहती थी..


मै सबसे पहले पहुंची मॉल और सीधा वहां के मैनेजिंग डायरेक्टर के ऑफिस में... "क्यों प्राची सिंह काम से बोरियत ज्यादा हो गयी हो तो 2 ठुमके लगा लिए जाए क्या"?


प्राची दीदी मुझे देखकर हंसती हुई उस ऑफिस में लगे म्यूज़िक सिस्टम को हाई वॉल्यूम पर जाने दिया और अपनी खुशी का इजहार करती मेरे करीब आकर ठुमके लगाने लगी... हम दोनों के खिली सी हंसी की किलकारी को, उस ऑफिस का लाउड म्यूज़िक भी दबा नहीं पा रहा था.. इसी बीच प्राची दीदी मॉल मे 10% फ्लैट डिस्काउंट की घोषणा करके आज अपने सारे ग्राहक को सरप्राइज़ करने का फैसला भी ले ली…


नाचते नाचते हम दोनों गले मिले... "चल मेमनी, घर चलते है... 8 महीने से हम दोनों घर से दूर है... मुझे भी अपने मां से मिलना है, अपने पापा से मिलना, अपने भाई से मिलना है.. अपने जितने करीबी है सबसे मिलना है"…


मै:- दीदी आप नहीं होती तो मेरे ये 8 पेपर नहीं निकलते… आपकी सेवा दिल में छपी है...


प्राची दीदी:- चपेट खाएगी... तेरे लिए कुछ करना ही अपने आप में एक्साइटमेंट होता है... वैसे एक बात पूछूं...


मै प्राची दीदी के कंधे पर पीछे से लद कर... "पहले ये बताओ कि मुझे अब अपने ट्रु-लवर के बारे में बता रही हो की नहीं"…


प्राची दीदी घूरकर मेरा चेहरा देखती... "तू 8 महीनों से किताबों में थी, या शरीर को रूम में बंद करके आत्मा को खुला छोड़ दिया था"


मै:- हिहिहिहीहिही... सोची आज मेरे लिए खुश होगी तो अपनी सबसे बड़ी खुशी मुझसे शेयर करोगी...


प्राची दीदी:- उन्होंने अभी मना किया है... बोले अभी किसी के जानने का मतलब है कि शादी... अभी चोरी छिपे इश्क का मज़ा लेने दो प्लीज… वो इतने प्यार से मुझसे कहे कि मै ना नहीं कर पाई...

"हो !!!! दीदी सही है.. सही है... कोई नहीं आप इस चोरी छिपे इश्क के भरपूर मज़े लो… फिलहाल जीजाजी से कहना, उसकी प्यारी साली अभी बहुत दिनों बाद फ्री हुई है तो कुछ महीने आपसे दूर रहे और दिल के अरमान काबू रखे"… मैंने शरारत भरे लहजे में अपनी बात रखी...


प्राची दीदी मुझे घूरती केवल बदमाश बोली और हम दोनों हंसने लगे… कुछ देर हंसकर जब हम ख़ामोश हुए... "दीदी हर्ष कहां है... वो तो लौट चुका होगा ना"..


प्राची दीदी मेरी बात पर प्यारी सी मुस्कान देती... "हां हर्ष भारत लौट आया, साथ में लौट आया मेरा भाई और राजवीर सिंह का उत्तराधिकारी... और मै बता नहीं सकती किस तरह से तुझे मै धन्यवाद कहूं.…"


मै प्राची दीदी के आखों के आशु को पोछती… "हैप्पी टाइम मै ये आंसू भी ना.. बिना पूछे चली आती है.. और स्टडी उसने पूरी की, काबिल डॉक्टर वो बना, लेकिन धन्यवाद मुझे क्यों?"


प्राची दीदी:- पहले वो सिर्फ एक सफल विदर्थी था, बाद में सफल डॉक्टर बना, और तेरे साथ 10-15 दिन रहकर वह एक सफल इंसान बना…


मै:- क्या बात कर रही हो... मतलब वो बुद्धू मुझे क्रेडिट देते फिर रहा है..


प्राची दीदी मेरे दोनो हाथ पकड़ कर मुझे चेयर पर बिठाई और खुद मेरे पाऊं के पास बैठकर मेरी दोनो हाथों को थामती.… "नहीं, हर्ष ने कुछ नहीं कहा कि वो क्यों अचानक अपनी बहन से इतना लगाव रखने लगा... वो कभी नहीं बताया कि क्यों वो अचानक अपने पापा से लिपटकर बस रोता ही रहा... मुझे चिढ़ाने लगा, मुझे छड़ने लगा और मेरे साथ प्यार से झगड़ने लगा... अपने गांव जाकर वो अचानक गांव वालों से मिलने लगा... किसी का इलाज करता है तो सिर्फ सेवा भावना देखने मिलती है... एक सपना जैसा था कि हर्ष मेरे साथ बैठे, बातें करे.. बस बातें करते जाए.. अब वो घंटो मेरे साथ बात करता है... जैसा सपना एक भाई के लिए मैंने देख रखा था वैसा तूने लौटा दिया...


मै कभी इस बात से खुद को सफल मेहसूस नहीं की, की मैंने टॉप बिजनेस स्कूल से पढ़ाई की या अपने दम पर एक कंपनी चला रही, लेकिन जब से तुमसे मिली, एक के बाद एक सफलता मिलती गई... पहले मेरे पास सिर्फ मेरे मां और पापा थे… आज सब है... मै खुद मे मेहसूस करती हूं कि मै कितनी सफल हूं..."


"अरे यार, सफल हो तो सेलिब्रेट करते है दीदी.. क्यों खुद भी रों रही हो और मुझे भी रुला रही"… मै प्राची दीदी के आखों से निकल रही भावना को समेटती हुई कहने लगी...


कुछ देर तक हम दोनों ही ख़ामोश रहे... ये शांति हमारे अंदर के उन संतुष्ट भाव की थी जिसे हम मेहसूस कर रही थी... इस प्यार से पल मे मै खलल डालती हुई पूछने लगी... "दीदी आप कुछ पूछ रही थी"..


प्राची दीदी:- क्या पूछ रही थी... मुझे याद नहीं..


मै:- भुल्लकड़.. अरे वो तब नहीं कहीं थी.. चपेट लगाऊंगी.. एक बात पूछूं...


प्राची:- ओह हां .. वही पूछ रही थी तुम दोनो जब साथ थे तो तुमने उसे क्या घुट्टी पिलाई... और वो..


मै:- बंगला पढ़ रही हो क्या दीदी... तुम दोनो साथ थे .. तुमने उसे घुट्टी पिलाई.. अरे मै किसके साथ थी और किसको क्या घुट्टी पिला दी... और अंत में "वो वो" क्या है...


प्राची दीदी:- जो लड़का 2 साल बाद लौट रहा था और रास्ते से अपनी बहन को पीक अप करता नहीं गया.. जिस लड़के के दिमाग में जो शेड्यूल छपा हुआ है, वो उसके सिवा कोई दूसरा काम नहीं करता.. मै उस लड़के हर्ष की बात जर रही हूं कि उसे तूने कौन सी घुट्टी 10-12 दिन मे पिला दी जो पुरा का पूरा बदल ही गया..

मुझे कुछ-कुछ संदेह सा हो रहा है और ऐसा अकेले मेरा संदेह नहीं है, बल्कि दबी कुचली सी भावना दोनो परिवार में है कि तेरे और हर्ष के बीच कुछ है.. लेकिन मेनका मिश्रा से पूछने की हिम्मत किसी मे नहीं... ले सब साफ-साफ और सीधा-सीधा पुछ लिया...


मै:- हिहिहिहि आप सब को ऐसा क्यों लगा कि हमारे बीच कुछ है... और मेरे घर वाले कब से इतने मॉडर्न विचार धारा के हो गए, की उन्हे शक हुआ और मुझे दिल्ली से खींचकर वापस नहीं ले गए... ये मुझे आंशिक रूप से नकुल मिश्रा और पूर्ण रूप से प्राची सिंह की पकाई हुए खिचड़ी लग रही...


इतने में ही प्राची दीदी कुछ बोलने के लिए अपनी जुबान खोली... मै उनको हाथ दिखाकर... "होल्ड ऑन माय क्रेजी सीस…. रही बात 10-12 दिन कि तो, मैंने हर्ष बाबू को थोड़ा इमोशनल ब्लैक मेल किया और वो मेरे साथ रुकने को राजी हो गया... अब रही बात उसके बदलाव की तो मैंने उसके मुंह पर कह दिया था, वो स्वार्थी है... उसे अपने सिवा कोई दूसरा दिखता ही नहीं... जिंदगी में पहले सोशल होना सीखे... और ये किसी को दिखाने के लिए नहीं बल्कि खुद से मेहसूस करे की लोगों के साथ जुड़ना क्या होता है? जब अपने लोग आसपास होते है तो ये एहसास क्या होता है... उस दिन थोड़ा मूड में थी तो पकड़कर कुछ ज्यादा ही सुना दिया"…


प्राची दीदी... हाहाहाहाहा... कितना सही कह गई.. उसके बदलते स्वभाव को देखकर मै बहुत खुश हूं... संभवतः मै या मेरे पापा को उससे ये सब कहना चाहिए था, लेकिन हम दोनो को लगता कि जब हर्ष अपनी मां की बात नहीं समझ रहा, तो हम कैसे समझा सकते हैं.….


मै:- है कहां वो.. चलो उसे थोड़ा छेड़ा जाए...


प्राची दीदी आंख मारती... "बड़ी बहन के साथ तुझे लड़का छेड़ने जाना है"…


मै:- तो क्या लड़की छेड़ दूं... लड़की हूं तो लड़के को ही छेरूंगी ना...


हम दोनों ही ऑफिस से ऐम्स के लिए निकले. दरअसल हुआ ये की जब हर्ष इंडिया लौटा तो उसे इंडियन मेडिकल काउंसिल ने साफ बोल दिया.. "सुन ओय फिरंगी देश से पढ़कर आया देशी, पहले 6 महीने हमे बता की तू सीख कर क्या आया है.. और कोई एक कोर्स चाहे तो यहां कर ले 6 मंथ का... उसी के बाद तुझे डॉक्टरी करने लाइसेंस मिलेगा.. बेचारा कुछ एग्जाम वगैरह देकर अभी ऐम्स के हड्डी विभाग में खट रहा है..."


मै और दीदी सीधा जूनियर डॉक्टर्स कॉलोनी पहुंचे.. प्राची दीदी फ्लैट का दरवाजा खोलती, सीधा हर्ष के कमरे में ही पहुंच गए, जहां वो फोन पर किसी से बतिया रहा था.. हमे देखकर उसने अपना कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया.. और... "ओफ ओ ये मिसी सिस्टर किसकी बैंड बजाने निकली है"..


हम दोनों एक साथ.. "मिसी सिस्टर"…


हर्ष:- येस मिसी सिस्टर जैसे कार्दाशियन सिस्टर्स थी जो अपने दम पर बिलियनेयर है, वैसे ही है मिश्रा से मेनका और सिंह से प्राची.. मिसी सिस्टर, अपने दम पर बिलियनेयर..


प्राची दीदी:- हाहाहाहाहा.. मुझे ये टर्म पसंद आया मिसी सिस्टर... बाय दि वे ब्रदर, अगर फ्री हो तो क्या मिसी सिस्टर को घूमाने ले चलोगे...


हर्ष:- जहां कहोगी वहां ले चलूंगा, लेकिन पहले मेनका को सॉरी और थैंक्स कहने दो..


प्राची दीदी... ऐसा क्या किया था जो सॉरी कहना पर गया..


हर्ष:- मै और मेरा ईगो.. अपनी ही सोच, और किसी के लॉजिकल बात को, अपने इलॉजिकल बात से काटते हुए खुद को होशियार समझना.. इस बात के लिए सॉरी…


मै, खिली सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाती… "और थैंक्स किसलिए हर्ष बाबू"….


हर्ष:- इतनी बेवकूफी और बदतमीजी के बाद भी तुम नॉर्मल रही.. मुझे आइना दिखाया… पक्के से मैंने तुम्हे हर्ट किया था लेकिन तुम झगड़ा करने के बदले, मै क्या हूं उसे बड़े प्यार से बता दिया...


प्राची दीदी:- हां तो ऐसे में एक थैंक्स गीविंग पार्टी तो बनती है... चल घूमने...


हर्ष:- नहीं आज नहीं... आज सर्वाइकल ऑपरेशन में मुझे भी रहना है... इसलिए मुझे माफ़ करो..


प्राची:- ठीक है कोई बात नहीं... अच्छा सुन कल मै घर जा रही हूं... यहां अच्छे से रहना और अपना ख्याल रखना …


हर्ष... ठीक है दीदी...


प्राची दीदी आगे चली और एक पल का वक्त मुझे खाली मिल गया... "पटाने के तरीके तैयार रखो, मैंने तुम्हारे लिए विंडो ओपन कर दिया है"… हर्ष मेरी बात पर हंसते हुए... "काफी लंबे वक्त से इस जहां मे तन्हा घूम रहा था... ऐसे ऑफर ना दो की झटका खाकर मै बेहोश हो जाऊं, खुशी खुशी गांव जाओ, तब तक मै लड़की पटाने के 101 तरीको पर काम करता हूं"…


मै हंसती हुई तेजी से वहां से निकली ताकि प्राची दीदी को ये ना लगे कि मै कहां रह गई... अंदर से कुछ क्रेजी तरह की फीलिंग आ रही थी.. जी कर रहा था अभी चिल्ला चिल्ला कर कहने लगूं... "वूहू, वूहू, वूहू... इट्स क्रेजी क्रेजी फीलिंग"
 

nain11ster

Prime
23,655
80,785
259
महादेव मिश्रा....... बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें धन और शोहरत का नशा नहीं होता है मगर महादेव मिश्रा जी भी उन्हीं लोगों में शुमार थे जो कि अधिकांश लोगों में होता है ।
हम सभी नीलेश और उसके साथियों के साथ साथ गवर्मेंट के बड़े बड़े अफसरों को ही करप्ट समझ रहे थे मगर महादेव मिश्रा के बारे में किसी ने सोचा नहीं था ।
इन सभी का जो अंजाम हुआ वो पढ़कर बहुत अच्छा लगा ।
उन सारी लड़कियों के आत्मा को शांति मिलेगी और उनके पुरे परिवार की दुआएं मेनका को झोली भर के मिलेंगी ।

इस नकली शादी में भी मेनका , प्राची और संगीता के साथ साथ उन सबकी सहेलियों ने काफी जमकर लुत्फ उठाया ।
कपड़े पहनने से लेकर खान पान तक ।
वैसे फुचका ( गोलगप्पा ) और चाट मुझे बहुत पसंद है ।

नीलेश के साथ अंतिम बार मेनका और नकुल का मिलना बहुत बढ़िया लगा । खास तौर पर दोनों का सेंटीमेंट्स होना ।

चंद मुठ्ठी भर अच्छे इंसानों ने काले साम्राज्य का अंत कर दिया ।
सुपर साहब और मेनका को इसका श्रेय जाता है । मेनका के परिवार को उस पर गर्व होगा ।

बेहतरीन अपडेट नैन भाई ।
थोड़ा बहुत प्रोब्लम है जिसके चलते समय नहीं मिल पा रहा है । शायद कुछ दिन और लगेंगे ।

Paise ka corruotion aur corrupt vs corroupt ka khun kharaba to fir bhi ek yudh jaisa hota hai .. ek varchas ki ladai..

Lekin mahadev mishra .. dry honest hokar bhi jis mamsikta ka tha.. usse achhe to corrupt hote hai... Hum kayi aise incidence dekh bhi chuke hai fir aap case palat kijiye delhi ke ek busines man ka.. uski mansikta bhi kuch waisi hi thi..

Khair har yug ka ant hota hai... Ye bhi utna hi bada satya hai...

Areee shadi katai nahi hai Sanju bhai .. bus asli dulha thoda der se aayega :D...

Chand mutthi bhar achhe insan .. waise ye complete theory acche insan ki kafi mehnat ke Baad upji thi .. hope acha laga ho...
 
Top