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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

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अध्याय 18 भाग:- 1





एयर इंडिया की ब्रिटेन जाने वाली फ्लाइट बिहारियो ने हाईजेक कर रखी थी... सबसे ज्यादा फनी था मेरी मासी का एक्सप्रेशन.. बेचारी..


वैसे तो मेरे पापा के सामने उनकी कभी हिम्मत नहीं हुई थी कि मौसा को पीने से मना कर दे, लेकिन आज तो दिन मे ही दारू चल रही थी... वो भी उन्हीं के आखों के सामने.. मासी ने आज तो पापा को भी रखकर सुना दिया. राजवीर अंकल "साली-साली" बोलकर थोड़े मजाकिया क्या हुए, मासी उन्हे कुछ सुनाई तो नहीं, लेकिन उफ्फ वो गुस्से वाली उनकी लुक.…


हर 10 मिनट पर एयर होस्टेज "मैम मैम" करती आ रही थी और उनको अपने जगह पर बिठाकर शांत रहने की विनती करती... कुछ शोफेस्टिकेटेड यात्री हमे हीन नजर से देख रहे थे, तो वहीं कई ऐसे विदेशी यात्री थे जिन्होंने ये फैमिली ड्रामा एन्जॉय किया...


हम लंदन एयरपोर्ट पर लैंड किए.. हर्ष वहां हमारा पहले से इंतजार कर रहा था.. एक बड़ी सी वैन मे हर कोई सवार होकर रिजॉर्ट के लिए निकल लिए...


थीम रिजॉर्ट मे हमारा कारवां पहुंचा... काफी खूबसूरत रिजॉर्ट था, लड़के की बुकिंग देखकर मै काफी इंप्रेस थी.. कपल बूढ़े अलग सेक्शन मे थे.. कपल जवान चूंकि एक दूसरे से परहेज़ वाले थे, इसलिए उनको थोड़ा दूर-दूर वाला अलग-अलग कमरा और उनके कमरे के साथ एक छोटा कमरा भी अटैच था जहां बच्चों को सुलाया जा सकता था...


और हम जवानों का अपना कमरा, एक पूरे लाइन से.. हां बस मेरा कमरा जो था वो सीधे एक लाइन में ना होकर, एक पैसेज खत्म होने के बाद, लेफ्ट पैसेज से जहां कमरा शुरू होता है, उस ओर था...


मय 9, 2013 ब्रिटेन में पहला दिन... तकरीबन शाम के 7 बजे...


रिजॉर्ट के हॉल में इंडियन ऑर्गनाइजर को बुलाकर गेम का आयोजन किया गया था.. मै भी वहीं जाने के लिए तैयार हो रही थी... तभी दरवाजे पर आहट हुई और मैंने जैसे ही दरवाजा खोला सामने हर्ष था.. "जी हर्ष सर कहिए कैसे याद किया"..


उसने अपनी चोर नजरो से एक झलक मेरे रूप को ऊपर से लेकर नीचे तक निहारने के बाद... "तुमसे कुछ बात करनी थी, फ्री हो क्या"


मै:- अमम्म ! रुको मै अपने पीए को बुलाकर आज की अपॉइंटमेंट चेक करती हूं..


हर्ष:- वेरी फनी … हाहाहा... इधर आओ अंदर तुम पहले..


"अरे अरे अरे.. ये क्या कर रहे हो"…. हर्ष दरवाजे से हाथ पकड़कर मुझे अंदर बिस्तर तक लेकर चला आया, और प्रतिक्रिया मे में सिकायती नज़रों से देखती उससे कहने लगी..


हर्ष:- 2 मिनट तुम आराम से बिस्तर पर बैठो और पहले मुझे कहने दो..


मै:- हां हां कहो, मै सुन भी रही हूं और घड़ी के 2 मिनट भी चेक कर रही..


टिक टिक टिक टिक टिक.. हम दोनों के बीच पीन ड्रॉप साइलेंट, 2 मिनट ऐसे ही खामोशी मे बीत गए.. हां लेकिन पीछे से उसके कांपते पाऊं मुझे यह एहसास करवा रहा था कि वो कितना नर्वस है...


मै:- 2 मिनट हो गए हर्ष मै जा रही हूं वरना नकुल यहां आता है होगा...


हर्ष:- जहरीला नाग कहीं का...


बहुत ही उसने धीमे कहा था, लेकिन उसे क्या पता था कि मै उसके ठीक पीछे खड़ी थी. अपनी बात कहकर जैसे ही वो मेरी ओर मुड़ा... "तुम्हारे जगह कोइ दूसरा होता ना तो मै उसका अभी इलाज कर देती"…. "अरे मेनका, सॉरी, सुनो तो, प्लीज"…. मै अपनी बात कहकर मूड गई और आगे से हंसती हुई बिना मुड़े चल दी..


इस कहानी का सृजन मार्च 2012 मे हुआ था जब हर्ष 2 साल बाद घर लौटा था.. मै, राजवीर अंकल और पापा के बहुत से छोटे-छोटे कामों में हेल्प कर दिया करती थी, उसी दौरान कुछ मुलाकात हर्ष के साथ हुई थी..


उसकी बेकरारी मुझे एहसास करवा चुकी थी कि वो बार-बार मेरे करीब रहने की कोशिश कर रहा है.. मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा है.. लेकिन उस दौरान हर्ष को कभी वक्त नहीं मिल पाया और मै जब भी उसका अफ़सोस भरा चेहरा देखती, मुझे बड़ा प्यारा लगता था..


उसके लंदन जाने बाद, बीच-बीच में हमारी फोन पर बात होती और जब भी 2,3 मिनट से ज्यादा हर्ष लाइन पर रहता, मै नकुल के कॉल का बहाना या फिर नकुल ही आ गया है मै बाद मे बात करती हूं, ऐसा कहकर कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया करती थी... आज भी बेचारे का वैसा ही अफ़सोस से भरा चेहरा था.. ऊपर से नकुल फिर बीच मे आ गया.. मै हंसती हुई आगे चल रही थी और वो मायूस होकर मेरे पीछे आ रहा था...


नकुल को बुरा कहा उसने, इस बात को लेकर मै 1,2 दिन तक हर्ष से दूरी ही बनाकर रखी.. वो अलग बात है कि वो पूरी कोशिश करता मेरे पास होने की, लेकिन मै भी पूरी कोशिश करती उस वक्त कोई ना कोई मेरे पास हो... उफ्फ उसका वो परेशान चेहरा... हिहीहिहिहि.. मै बता नहीं सकती की कितना क्यूट लगता था..


11 मय, 2013.. हम एक हफ्ते की टूर पर थे, इटली के कुछ जगह, फ्रांस के कुछ जगह, स्विट्ज़रलैंड की कुछ जगह और फाइनली वापस आकर ब्रिटेन जितने दिनों तक घूम सके..


हम सब वेनिस, इटली में थे.. इस फ्लोटिंग सहर को नाव में घूमना था.. हमारे टूर गाइड ने सब पहले से कॉर्डिनेट कर रखा था.. हम सब अलग-अलग नाव में सवार होकर सहर घूमने निकले, और सभी नाविक को पहले से बता दिया गया था कि कितने बजे सबको एक ही जगह उतारना है... ये अच्छा था.


सभी लोग नाव में सवार होकर अलग-अलग रास्तों से घूमने निकले. अब हर्ष की प्लांनिंग थी या उसकी किस्मत, आखरी के नाव पर जाने के लिए मै और हर्ष बचे हुए थे.. और हर्ष के चेहरे की मुस्कान बता रही थी कि वो कितना खुश है…


मै उसके चेहरे की भावना को देखकर हंस रही थी और वो बेचारा मेरी हंसी देखकर ऐसे शर्मा जाता की मुझे और भी जोर से हंसी आ जाती... "क्या हर्ष सर बड़ा ही क्यूट सा एक्सप्रेशन दे रहे है, लगता है कुछ सिद्दात से चाहा था वो पुरा हो गया"… मै नाव में कदम बढ़ाती हुई हर्ष के छेड़ दी..


हर्ष:- हां कुछ-कुछ ऐसा ही है मेनका...


नाव अभी आगे बढ़ने ही वाली थी कि तभी मैंने नाव वाले को रुकने के लिए कह दिया. गौरी लगभग भागती हुई हमारे नाव मे चढ़ गई और पानी के 2 घूंट पिती… "शुक्र है तुम्हारा नाव आगे नहीं बढ़ा था, वरना मै इसी स्पॉट पर रह जाती"..


मै सामने हर्ष का छोटा सा चेहरा देखकर खिल खिलाकर हंसती हुई... "ऐसा क्या हो गया गौरी"..


गौरी:- मुझे उस नकुल के साथ चिपका दिया था.. उसे देखकर ही भागी मै...


मै:- पागल कहीं की.. कोई नहीं आ जा सेल्फी लेते है...


गौरी:- ये छायाचित्र तो मोबाइल मे ही कैद रह जाएंगे, आखों से नजरो को कैद करो, उम्र भर दिल में बस जाएंगे...


हर्ष:- क्या बात कही है गौरी... वैसे नकुल और तुम्हारे बीच ऐसा क्या है.. कहीं वो गंदी नजर से तो नहीं देखता...


मेरे हाथ में पानी का बॉटल था, मैंने खींच कर दे मारा. निशाना सीधा हर्ष के माथे का बयां हिस्सा और वो पूरी जगह लाल दिख रही थी... मैंने नाव वाले से कह दिया "किसी भी जगह किनारे कर दो मुझे उतारना है..."


गौरी मेरा हाथ पकड़ कर मेरा गुस्सा शांत करवाती हुई कहने लगी… "मेरी बहना, मेनका दीदी"..


मै:- देख गौरी मेरा पारा अभी चढ़ा हुए है.. प्लीज


नाव वाला नाव को किनारे ले जाने लगा, तभी गौरी उसे साइट विजिट को लेकर चलने के लिए कहती हुई... "अब क्या मुझे भी ये जगह नहीं दिखाओगी, अच्छा रुको पहले इनकी गलतफहमी दूर कर दूं, फिर वो माफी मांगेगा..."


"सुनिए हर्ष जी, वैसे तो आप दिखने में बहुत अच्छे है, प्रेसनलाइटी भी खूब मस्त है, लेकिन मेनका को नकुल के नाम से चिढ़ाकर यदि पटाने की सोच रहे है तो वो आपका ख़ून कर देगी"…


मै अपनी आखें बड़ी करके... "गौरी ये सब क्या है"..


गौरी:- अरे चुप करो जरा बात करने दो... मुझे बच्ची समझना बंद करो, जो समझ ना पाए की ये किस कोशिश में लगे है... और आप सर... यूके में रहकर कोई लड़की से बात करने में इतना शर्माता है क्या?... हर्ष सिंह की जगह हर्ष शर्मा होना चाहिए आपका नाम...


मै:- गौरी तू ज्यादा बकवास करेगी तो मै तुझे पानी में फेक दूंगी, सोच ले..


गौरी:- आज के बाद तुम जैसा कहोगी मै उस हिसाब से तैयार हो जाऊंगी, कभी किसी के गिफ्ट देने पर ऐतराज नहीं करूंगी... अब जरा बात पूरी करने दो..


गौरी की ये बात सुनकर, मुझे थोड़ा सुकून मिला.. थोड़ी खुश भी थी मै.. उसके इस कमिटमेंट पर तो 7 खून माफ.. वो अपनी बात आगे बढ़ते हुए कहने लगी... "नकुल एक बड़े भाई जैसा है बिल्कुल केयरिंग, जो मुझे बस लोगों के साथ घुलने मिलने के लिए प्रेरित करता है.. उसे भी अच्छा नहीं लगता जब मै बिल्कुल शांत और अकेली रहती हूं.. और बता दूं, मेरी मां और दीदी के बाद केवल नकुल और मेनका ही है जो मुझे समझते है, सो अब मैंने मेंनका को शांत कर दिया है.. जाकर माफी मांगो"…


हर्ष, मेरे करीब बैठते... "तुम मेरी हालात समझते हुए हंस रही थी और मै अंदर से चिढ़ा हुआ था.. कोई गलत इंटेंशन नहीं था, बस तुम्हे चिढ़ाने के लिए बोल दिया.. हां कुछ ज्यादा ही गलत बोल दिया.. बताओ मै क्या करूं जो तुम्हारा गुस्सा शांत हो जाए"..


मै:- इस जगह तुम पहले आ चुके हो..


हर्ष:- हां आ चुका हूं..।


मै:- ठीक है मेरे साथ शॉपिंग पर चलो.. कपड़े ज्वेलरी और पार्लर...


हर्ष, उस नाव वाले को किसी जगह कहा उतारने. वहां उतरकर हम एक डिपार्टमेंटल स्टोर पहुंचे, जहां से मैंने गौरी के लिए 3-4 प्यारी ड्रेस खरीदी... मै तो अंदर से खुश थी..


फिर ज्वेलरी शॉप जाकर उसके लिए पुरा सेट खरीदा.. फाइनली हम ब्यूटीपार्लर मे थे.. मैंने ब्यूटीशियन से बोला हमे जल्दी घूमने निकालना है, बस हल्के मेकअप के बाद इसे तैयार कर देना है...


वो जैसे ही अंदर गई, मै हर्ष से... "हाथ आगे करो".. हर्ष ने जैसे ही अपना हाथ आगे किया.. उसके हाथ में एक प्यारा सा ब्रेसलेट डालती… "तुम्हारे बेतुके मज़ाक ने आज मुझे बहुत ज्यादा खुश कर दिया है... गौरी मेरे कहे अनुसार कपड़े पहन रही, मेकअप कर रही, ऐसा लग रहा है मै कोई सपना देख रही.. लेकिन सच सच बताओ, बस मुझे चिढ़ाने के लिए बोले थे ना, अंदर कुछ बात तो नहीं"..


हर्ष:- कान पकड़कर उठक बैठक लगाते हुए ये बात कहूं की बस चिढ़ाने के लिए तुमसे कहा था.. और हां अंदर से तो थोड़ा सा चिढ़ा ही रहता हूं उससे, क्योंकि ये नकुल तो मेरे जिंदगी मे सनी बाना हुआ है...


मै:- शक्ल मत दिखना आज तुम अपनी हर्ष, कुत्ते की दुम हो सुधर नहीं सकते... नकुल पसंद नहीं इसका मतलब मै भी उस इंसान को पसंद नहीं.. तुम यहां से जा रहे हो या गौरी को लेकर मै जाऊं...


बेचारा मुझे लाख मनाते रह गया लेकिन मै मानी नहीं और एक ही बात कह दी.. नो शक्ल दिखाना, मतलब नो शक्ल दिखाना... वो वहां से मुंह लटकाकर चला गया और मै अंदर ही अंदर हंसती हुई… "आव बेचारा"…


कुछ देर बाद गौरी बाहर आयी.. मै बता नहीं सकती की वो कितनी प्यारी लग रही थी... उसके आते ही मैंने पार्लर से काजल मांगकर उसे काला टिका लगाते हुए कहने लगी... "तुझे हमारे ही घर के लोगों की ही नजर ना लग जाए"..


गौरी:- आखिर-आखिर तक भगा ही दिया बेचारे को..

हम दोनों नाव की ओर चलते हुए... "वो कहने लगा थोड़ी तो चिढ़ है ही नकुल के लिए"..


गौरी:- किसी सच्चे को उसकी सच्चाई के लिए मिली सजा.. निर्दई मेनका मिश्रा..


मै:- अच्छा जी, मतलब मेरे खिलाफ बोला जा रहा है...


गौरी:- मुझे जीजाजी पसंद आए.. और उनका आपके लिए नर्वस होना और भी ज्यादा क्यूट लगा..


मै, गौरी के कान खींचती... "तू इतना आगे कैसे पहुंच गई.. यूरोप आने से सच्चाई नहीं बदलती की हम बिहार के एक छोटे से गांव से है.. एक बार मां बाप को तो मनाया भी जा सकता है, लेकिन इतने रिश्तेदारों और गांव वालों का क्या करूंगी, कोई ना कोई इज्जत मान मर्यादा की ऐसी घुट्टी पिला ही देगा कि.. आगे कुछ बताने की जरूरत ही नहीं है..."
 

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अध्याय 18 भाग:- 2





गौरी:- मतलब हर्ष बाबू अभी बस अच्छे लगते है.. वो प्यार अभी जागा नहीं ..


मै:- ओय बदमाश.. तू ये लव और आफैर के मैटर मे कब से इंट्रेस्ट ले रही, कहीं तेरा तो कोई चक्कर नहीं..


गौरी:- और यदि चक्कर हो तो..


मै:- नहीं तेरा चक्कर नहीं हो सकता..


गौरी:- और यदि हुआ तो..


"कहीं ना तेरा चक्कर नहीं हो सकता, नो मोर टॉक"…. "अच्छा और यदि मैक्स (मौसेरा भाई) का कोई चक्कर हुआ तो"… "हिहिहिहिहिही... उसका भी नहीं हो सकता"…. "और नकुल का"…


नकुल का नाम सुनकर मै कुछ पल ख़ामोश चलती रही.. गौरी मुझे दोबारा टोकती... "बताओ ना मेनका"…


मै:- तुझसे साल भर बड़ी हूं, कुछ तो शर्म कर..


गौरी:- मैंने तो दोस्त ही माना है शुरू से... मेरी प्यारी दोस्त जिससे मै बहुत कम बात करती हूं, लेकिन फिर भी वो मुझे पुरा समझती है..


मै:- मस्का पॉलिश, तुझमें तो ये गुण कभी नहीं थे.. सीधा-सीधा सवाल पूछने वाली और काम बताने वाली लड़की, इतनी घुमा फिरा कर किस बात की बाउंड्री बांध रही.. सीधे बता..


गौरी:- मुझे हर्ष पसंद है.. वो मुझे सच्चा लगा.. मै चाहती हूं तुम उसके बारे में सोचो..


मै:- दोबारा शुरू हो गई...


गौरी:- हर्ज ही क्या है…


मै:- जबरदस्ती है क्या सोचूं उसके बारे में.. बता तो दी वो अच्छा लगता है..


गौरी:- मुझे ये अच्छा लगने वाला जवाब नहीं चाहिए.. मै चाहती हूं तुम उसे थोड़ा वक्त दो.. एक मौका तो दो..


मै:- मौका देने से कोई दिल में नहीं जगह बनाता बेवकूफ.. ये अग्रीमेंट हुआ… थोड़े वक्त मे खुद व खुद दिल में जगह बनने लगती है... समझी कि नहीं समझी..


गौरी:- पूरी क्लेरिटी के साथ समझाओ...


मै:- मासी के ऊपर तू चिल्लाई है कि नहीं.. जो मुंह मै आया बक देती है ना..


गौरी:- वो तो तुम भी करती हो मासी के साथ.. तुम भी तो उनसे झगड़ा करती हो..


मै:- मै तो अपनी भाभी से भी सीरियस झगड़ा कर लेती हूं, और नकुल से भी.. कभी इन लोगो के बीच रहकर लगा ही नहीं की ये प्यार कुछ अलग से होता है... जिस दिन कुछ ऐसी बात हो जाती है भावनाएं छाती फाड़कर बाहर आती है...


गौरी:- कुछ-कुछ समझ रही... थोड़ा और कहो..


मै:- जैसे कि नीलेश भैया, धूर्त था पता चल गया था, लेकिन जब सुनी की फांसी लग रही है.. गले से खाना नहीं उतरा.. जिसे हम चाहते है उसके लिए कभी अलग से फीलिंग नहीं आती.. बस दिल में जगह बन जाए, वही प्यार है..


गौरी:- तुम यहां थोड़ी सी कंफ्यूज हो.. ये घरवालों के प्यार में और लवर के प्यार में अंतर होता है..


मै:- तुझे कैसे पता..


गौरी:- क्योंकि मैंने देखा है..


मै:- किसे..


गौरी:- दीदी को.. हम उनसे दूर है तो 2-3 दिन मे एक बार बात होती है.. लेकिन जीजाजी से दूर होती है तो किसी ना किसी बहाने दिन में 3-4 बार बात हो जाती है.. इसलिए कही कपल प्यार अलग होता है...


मै:- चल आ जा सेल्फी लेते है.. फिर ऊपर वाले से मनाना की वो मुझे अच्छा ही लगे केवल, ये दिल ने कपल वाला प्यार ना आए..


गौरी:- क्यों, फिर से वही घरवालों की टेंशन हो गई..


मै:- तो क्या ना करूं.. सुन गौरी अगर दिल में किसी के लिए चाहत होगी, तो मै उसे अपनी चाहत दिखा दूंगी.. उसके लिए एक बार तो क्या बार-बार लड़ती भी रहूंगी.. लेकिन भगवान ना करे, यदि मेरी चाहत अधूरी रह जाती है तो उस केस में मुझे सिर्फ एक लड़के को भूलना होगा, लेकिन हर्ष के केस में मुझे पूरे एक परिवार को भूलना होगा, ऊपर से खून खराबा होने के 100 फीसदी चांस है..


गौरी:- हम्मम ! बात पूरी तरह भेजे मे अटक गई... बस एक आखरी सवाल.. क्या होगा जब तुम्हारे दिल में भी हर्ष के लिए चाहत आ गई..


मै:- जय श्री कृष्णा.. फिर लंबे ड्रामे होंगे .. लेकिन जो भी होगा, पीछे नहीं हटूंगी.. अब हैप्पी..


गौरी:- तुम शुरू से मेरी इंस्पिरेशन रही हो.. हर बात मे बहुत क्लेरिटी होती है... लेकिन भूलना मत, जब भी कोई भी ड्रामा होगा किसी के लिए भी.. मै तुम्हारे साथ खड़ी मिलूंगी.. और उस वक्त अपनी काबिलियत दिखाऊंगी..


मै:- तू पहले से बहुत काबिल है.. तभी तो हर सवाल का जवाब दिया, वरना इन मामलों में मै नकुल को भी साझेदार नहीं बनाती…


गौरी:- हां मै जानती हूं.. लेकिन नकुल के बारे में अब तक नहीं बताई... क्या उसका भी कोई चक्कर है..


मै:- मेरे साथ कम वक्त बिता रहा, तब भी नहीं समझी की वो किसी के चक्कर में है और शायद इस बार उसकी चुलबुली जीवन साथी मिल गई है...


गौरी:- हो.. कौन है वो..


मै:- पागल वो मुझे आकर अपनी प्रेम कहानी बताएगा.. तू भी ना.. जब शादी की बात फाइनल करनी होगी, और लड़की इंटर कास्ट कहीं निकली, तब आएगा मेरे पास..


गौरी:- तो चलो ना पता लगाते है..


मै:- घूमने भी देगी की नहीं.. करमचंद की नानी बनने पर तुली है... वो अपने जिंदगी के सही राह पर है.. काम और काम के बाद एक प्यारी सी गर्लफ्रेंड…


काफी लंबी चली बातचीत के दौरान बहुत सी दिल की बातें मै गौरी से साझा कर गई.. करती भी क्यों ना.. एक तो भरोसा की वो किसी के पास इसे चर्चा तक नहीं करेगी ऊपर से मेरी बहन दिल खोलकर बातें कर रही थी.. हां बस बेचारे हर्ष को आज भी निराशा हाथ लगी...


मिलान और रोम घूमकर हम पहुंचे दूसरे खूबसूरत डेस्टिनेशन जेनेवा, स्विटजरलैंड... क्या हसीन वादियां और बर्फीली जगह थी, और यहां के प्यारे मनमोहक दृश्य को देखकर हर प्यार करने वाला रोमांस की अलग दुनिया में ही खो जाए...


14, मय, 2013… इस जगह का पर एक दिन बीतने के बाद सबका यही मानना था कि यहां कम से कम हमे 1 हफ्ते बिताना चाहिए, फिर जीवन में कभी ऐसा दूसरा मौका मिले की ना मिले...


ऐसा मेरे महेश भैया बोल गए जो काफी सीधे है, यकीन यहां के मौसम का असर था या उनकी बीवी सोभा का, वो पता नहीं... हिहिहिहिहिही.. जो भी हो बाकियों का भी वही मन था फिर हमे कोई ऐतराज भी नहीं, क्योंकि जीवन में यूरोप घूमने का फिर मौके मिल ही जाएंगे...


दिन के समय मै अकेली थी, अपने कमरे में.. सब लोगो बर्फबारी करने निकले थे और मेरे पाऊं मे इतना दर्द मेहसूस हो रहा था कि, मै गोली लेकर आराम कर रही थी.. झटके से मैंने अपना पाऊं खींचा, जब यह एहसास हुआ कि कोई मेरे ऐड़ियों को अपने हाथ में थामे है... जैसे ही उठकर बैठी तो सामने हर्ष था..


हर्ष:- लेटी रहो, भारी बूट पहनकर तुम्हे घूमने की आदत नहीं है इसलिए दर्द हुआ है..


मै:- हर्ष प्लीज, मत हाथ लगाओ पाऊं को..


हर्ष:- कहा ना लेट जाओ, ये बस ट्रीटमेंट का हिस्सा है..


मै:- क्या तुम एक फिजियोथेरपिस्ट हो..


हर्ष:- नहीं मेम साहब हड्डियों का डॉक्टर हूं.. इसलिए ना चाहते हुए भी लोगों के हाथ, पाऊं, कमर, रीढ़, गर्दन सब पकड़ना परता है..


मै:- तब भी हर्ष, मुझे बहुत अजीब लगेगा.. वैसे भी मेडिसिन तो तुम्हारी ही दी हुई है... मै ठीक हूं अभी..


मै मुस्कुराती हुई उससे बात कर रही थी और वो बड़े ध्यान से मेरा चेहरा देख रहा था... पता नहीं क्यों उसका यूं देखना मेरी श्वांस को असमान्य कर रहा था.. "हर्ष, ऐसे ध्यान से क्या देखने लगे"…


हर्ष:- तुम्हारा मुस्कुराते हुए चेहरे को देखकर तो खडूस से खडूस इंसान भी पिघल जाए.. आज समझ में आ रहा है कि कैसे तुमने मेरी खडूस बहन और मेरे बैल बुद्धि बाप को पिघला दी..


मै:- तुम्हे फिर झगड़ा करना है मुझसे..


हर्ष:- अरे यार किसी की तो बुराई करने दो..


मै:- आंटी (हर्ष की मां) की बुराई कर दो.. मै बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगी... हिहिहीहिहि


हर्ष:- 2 लोगों में बुराई ढूंढने से भी नहीं मिल सकती.. एक मेरी मां दूसरी तुम..


मै:- पटाने की कोशिश हां.. वो भी मीठी मीठी बातों से.. डॉक्टर साहब यहां तो वैसे भी 8-10 गोरी मेम आपके पीछे होगी, फिर भी मुझ जैसी लड़की के पीछे पड़े हो..


हर्ष:- कोई भी गोरी मेम, या देसी मेम, अपनी मां की वो बेटी नहीं होगी, जिसका ये सपना नहीं की कोई हायर प्रोफेशनल डिग्री, वो भी दुनिया के सबसे टफ एग्जाम्स मे से एक.. वो केवल इसलिए कर रही हो, क्योंकि उसकी मां की ख्वाइश है.. बल्कि वो मां की बेटियां केवल खुद को प्रूफ करने के लिए, और एक मुकाम हासिल करने के लिए करती है..


मै:- ओह तो सर चुपके से जो मेरी बातें सुन लिए अब उसे सॉफ्ट कॉर्नर के तौर पर इस्तमाल कर रहे.. ताकि मै ये सोच लूं की तुम मेरे विचार से काफी प्रभावित हुए.. कितने अच्छे हो..


हर्ष:- ऑफ़ ओ तुम तो हर बात को तोड़ मोड़ देती हो.. मेरी हर बात तुम्हे ऐसा क्यों लगता है कि तुम्हे इंप्रेस करने के किए किया गया है..


मै:- क्या तुम मुझे इंप्रेस करने की कोशिश नहीं कर रहे.. सिर्फ हां या ना..


हर्ष:- वो तो..


मै:- हां या ना..


हर्ष छोटा सा मुंह बनाते... "हां"..


मै:- तो मै हर बात को उससे क्यों ना लिंक करूं..


हर्ष:- ठीक है बिना इंप्रेस करने वाली बात बताता हूं..


मै:- काफी एक्साइटेड हूं सुनने के लिए..


हर्ष:- तुम्हारे इस एक्सप्रेशन पर जी तो करता है सर तोड़ दूं, कठोर दिल... परसो से तुम्हे इंप्रेस करने वाला कोई नहीं होगा क्योंकि मै इंडिया जा रहा हूं.. ऑर्थो कॉन्फ्रेंस में..


मै:- कमाल है हमारे यहां के डॉक्टर कंपनी के खर्चे से विदेश आते है कॉन्फ्रेंस करने.. अरे जेनेवा कॉन्फ्रेंस में तो बापू तक को यहां आना पड़ा था और तुम इंडिया जा रहे..


हर्ष:- नालंदा विशवविद्यालय मे पूरे विदेश के लोग आते थे उसका भी तो कहो... भले हमारे यहां के इंस्टीट्यूट को विश्व स्तर पर काफी पीछे मना जाता है.. लेकिन इंडियन डॉक्टर्स आज भी बेस्ट है.. उनके अनुभव और किताबों से ऊपर के ज्ञान का कोई जोड़ा नहीं..


मै:- इसलिए तुम ऑक्सफोर्ड मे आ गए..


हर्ष:- यहां भी तुम्हे नुष्ख ही निकालना है.. एम्स में जगह नहीं मिली, और ऑक्सफोर्ड मे एडमिशन मिल गया.. अब इसे क्या कहोगी.. इसलिए यहां चला आया.. नेक्स्ट ईयर मार्च तक यहां का सारा कहानी खत्म..


मै:- उसके बाद..


हर्ष:- इंडियन मेडिकल काउंसिल मे अप्लाई करूंगा.. और क्या...


मै:- ठीक है लेकिन मै अपने इलाज का फीस नहीं दूंगी..


हर्ष:- हाहाहाहाहा.. पागल..


"सो तो मै हूं"… हल्की सी हंसती मै अपनी बात कही.. एक बार फिर से हर्ष मेरे चेहरे को निहारने लगा.. एक बार फिर मेरी श्वांस असमान्य होने लगी...


तभी हर्ष मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर... "लंदन में ये मेरा पांचवा साल है, 22 साल उम्र हो रही है और मै अपने मेडिकल स्कूल का प्रचलित लड़का होने के बावजूद भी आज तक कभी किसी लड़की मे इंट्रेस्ट नहीं ली… बात तो सबसे अच्छे से होती रही, लेकिन कभी मेरा दिल किसी के लिए नहीं धड़का.. और तुम्हारे अलावा ये किसी और के लिए धड़क भी नहीं सकता... आई लव यू.."


मै भी थोड़ी संजीदा हो गई.. हर्ष के हाथों को थामकर उसकी आंखों में देखती हुई धीमे से कही.. "पूरे बायो डेटा के साथ ये भी सफाई दे रहे की 5 साल से तुमने किसी गोरी मेम को नहीं देखा हर्ष.. और ये दिल सिर्फ मेरे लिए धड़का है.. ये लव परपोज था या बायोडेटा... हिहिहिहि"..


हर्ष अपना हाथ छुड़ाकर... "अच्छे खासे इमोशन का कचरा कर दिया.. जा रहा हूं बाय"..


हिहिहिहिही... क्या झुंझलाकर गया हर्ष.. देखने लायक था... मगर… मेरे दिल में भी थोड़ी-थोड़ी गुदगुदी हो रही थी.. और अंदर से कुछ मीठा-मीठा एहसास...


शाम के तकरीबन 8 बज रहे थे... और ऐसा हुआ कि दिन में जो केवल एक बार हर्ष आया था, उसके पहले सब लोग घूमने निकले और अब तक कोई मेरा हाल तक पूछने नहीं आया...


अपने आप में ये घोर आश्चर्य हो गया.. तभी होटल का एक स्टाफ पहुंचा और मुझे सूचना देकर गया कि 10 मिनट में हॉल में फैमिली पार्टी शुरू होगी, तैयार होकर पहुंचने.. मै थोड़ी सोच मे पर गई की आखिर सबने मिलकर क्या गुल खिलाया होगा..


फिर अगले पल सोची.. अब तो जा ही रही हूं देखने, ये भी देख लेते हैं कि क्या सरप्राइज़ रखा गया है.. मै ड्रेस चेंज करके, चेहरे पर थोड़ा साबुन, पानी और क्रीम मारकर देखने निकली की चल क्या रहा है...


मैने जैसे ही हॉल का दरवाजा खोला, पुरा अंधेरा और एक स्पॉट लाइट मेरे ऊपर फोकस हो गई.. उसी बीच तालियों कि जोर की गरगराहट सुनाई देने लगी... वो स्पॉट लाइट आगे के ओर हल्का बढ़ा.. मेरे लिए ये इशारा था और मै स्पॉट लाइट के साथ बढ़ने लगी..
 

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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304
अध्याय 16 भाग:- 2




खैर ये तो गांव के ड्रामे थे जिसमे प्रवीण मिश्रा की भी संपत्ति बिक चुकी थी.. वहीं दूसरी ओर गांव की पॉलिटिक्स भी लगभग बदलती नजर आ रही थी, जहां हमारे गांव के मुखिया चाचा कि पकड़ अब उस पूरे इलाके में सबसे ज्यादा मजबूत थी, तो वहीं महादेव मिश्रा के मरने के बाद विधायक असगर अली का बेटा लियाकत अली यहां की राजनीति का मुख्य चेहरा बनकर उभर चुका था...


गांव के जो भी ड्रामे थे, वो तो गांव भर में ही छाए हुए थे, लेकिन जो ड्रामा कुमार आंनद रच चुके थे, वो तो पूरे देश मे छाया हुआ था... सुप्रीम कोर्ट में लागतार सुनवाई जारी रही... 58 गिरफ्तारियां बढ़कर 62 हो गई... कुल 6 लड़कियां थी, जो कि दरिंदगी की शिकारी हुईं थी, पिछले 6 महीने में।


सब की सब 18-19 साल से ज्यादा उम्र की लड़कियां नहीं थी... केवल एक अर्पिता को छोड़कर बाकी सारी लड़कियां दूसरे स्टेट से उठवाई गई थी.. जिन चार लोगों को बाद में अरेस्ट किया गया था, उन्हीं की जिम्मेदारी होती थी अच्छे घर की लड़कियों का पुरा पता करके, कैसे सुरक्षित ढंग से उठाया जाए...


वहशियाना का खेल रचने के लिए लड़की उपलब्ध करवाना, और उस खेल मे सामिल होने के लिए नीलेश और गिरीश को फांसी की सजा... उसी के साथ 14 अधिकारी, जिसमे कमिश्नर, डीएम, डेप्युटी डीएम, और भी बड़े-बड़े अधिकारी थे... उन्हे भी उनकी दरिंदगी के लिए फांसी की सजा हुई.. महादेव मिश्रा के 6 बॉडीगार्ड, 4 प्राइवेट फाइनेंसर और 8 क्रिमिनल को भी उसी केस में फांसी की सजा हुई...


कुल 62 अभियुक्त मे से वहां 32 को फांसी हुई थी.. वहीं नंदू और उसके साथ के 8 क्रिमिनल को गलत तरीके से टेंडर पाने, सेक्स रैकेट चलाने और कम उम्र की लड़कियों को पैसे का लालच देकर उनसे काम निकलवाने के लिए उन्हे 7 साल की सजा हुई...


बाकी बचे हुए दोषियों का भी आरोप साबित हो चुका था और उन्हे भी अलग-अलग धाराओं के तहत किसी को 3 साल, तो किसी को 5 साल की सजा हुई थी... लगातार 2 महीने की सुनवाई मे एक के बाद एक परिणाम आते गए और सबको सजा होती चली गई..


ये कुमार आंनद का पुरा बिछाया जाल था, जिसमे 62 लोग गिरफ्तार हुए थे और किसी एक तक को भी उसने बेल नहीं होने दिया था... वहीं बात करे यदि नीतू और गैंग की तो.. नीतू, फातिमा और पूनम को नंदू का साथी करार दिया गया, किन्तु नाबालिक उम्र और कच्ची उम्र की नासमझी के कारन पूनम को 2 साल, नीतू और फातिमा को 1 साल करेक्शन सेंटर में रखकर, रिपोर्ट सबमिट करने के ऑर्डर मिले, उनकी सजा उसके बाद तय होती.


इधर अपनी भी जिंदगी सामान्य रूप से आगे बढ़ने लगी थी... पढ़ाई और परिवार के बीच अपना समय अच्छा कट रहा था. नीलेश के घर में इस बार शायद इंसानों ने जगह ली थी. माधव चाचा काफी मिलनसार और अच्छे लगे, बाकी मिलना जुलना तो केवल नाम मात्र का ही होता रहा...


नए साल के आगमन से लेकर मकर संक्रांति के त्योहार तक सब आकर गए. 11th के एग्जाम भी समाप्त हो गए और इस बार भी मै अपने गांव के कॉलेज की टॉपर रही. वहीं हमारे सहर का मकान भी तैयार हो चुका था, जिसका गृह प्रवेश कुछ दिन पहले ही हुआ था.


गृह प्रवेश के साथ ही महेश भैया और सोभा भाभी को सहर के मकान में शिफ्ट करवा दिया गया, ताकि वहां रहकर वो साक्षी और केशव को शहर के अंग्रेजी स्कूल में दाखिला करवा सके.


होली के बाद रूपाली दीदी (ममेरी बहन) के शादी की भी तारीख तय हो चुकी थी. ज़िन्दगी बिल्कुल सामान्य और हंसी खुशी कट रही थी... जनवरी तक तो इतनी ठंड थी की मै कहीं निकली ही नहीं. शुरवात फरबरी से ही मैंने पापा और मम्मी को तैयारी के लिए एक साल वर्मा सर से पढ़ने की बात पूछ ली... उन्होंने भी हां कह दिया..


मै और नकुल पता करके पहुंचे वर्मा सर के पास. पहली बार किसी अकरू शिक्षक से मिल रही थी.. पहले दिन तो उन्होंने यह कहकर भगा दिया कि पहले कम से कम अपना 12th तो क्लियर करके आना चाहिए था..


2-3 दिन चक्कर काटे, मिन्नतें की। पुरा बताया की मै पिछले 3 दिन से गांव से आकर उनसे समय लेने की कोशिश कर रही हूं. लगातार कोशिशों की वजह से वो थोड़ा सा पिघले. रविवार के दिन उन्होंने ने बुलाया था, मै जैसे ही पहुंची उन्होंने सवालों से भरा एक पेपर थमा दिया और जवाब लिखने के लिए आधे घंटा का समय दे दिया..


50 ऑब्जेक्टिव सवाल थे, और कुछ सवालों के लेवल तो मेरे तैयारी के कहीं ऊपर के सवाल थे. मुझे जो आते थे उनका जवाब देकर, मैंने आधे घंटे में उन्हे अपना जवाब सबमिट कर दिया..


28 सवालों का जवाब मैंने दिया था और सब के सब सही थे. उन्होंने पूछा कि कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रही हो और 50 मे से मात्र 28 ऑब्जेक्टिव का जवाब दी, बाकियों को अटेम्प्ट भी नहीं की..


मै:- सर उन सवालों के जवाब मुझे नहीं आते थे, और ना ही ऐसा लगा कि मैंने उन सवालों को कभी पढ़ा है.. जितने आए उतने के जवाब दे दिए..


वर्मा सर ने मुझसे फिर पूछा कि सीए की तैयारी करना एक बात, लेकिन तुम जानती भी हो सीए बनने मे मेहनत के अलावा कितना वक्त लगता है.. मुझे सच मे बहुत ज्यादा पता नहीं था.. मैंने उनसे बस इतना ही कहा कि सर प्रोफेशनल कोर्स है, 4 साल या 5 साल लग जाएंगे..


मेरा जवाब सुनकर वो मुस्कुरा दिए और घर परिवार का डिटेल पूछने लगे. मेरे पापा से उन्होंने बात की, और फिर उन्होंने 3 दिन का समय दे दिया... मंगलवार, शुक्रवार और रविवार...


मै काफी खुश हुई, सर को धन्यवाद कही और घर लौट आयी. 2 दिन बाद से मेरी क्लास शुरू हो गई. वर्मा सर ने बेसिक से ही शुरू किया, बावजूद इसके की उनको भी पता था कि मै ये सब पढ़ चुकी हूं, लेकिन जब उन्होंने टॉपिक उठाया और समझाना शुरू किए, तब पता चला कि उस टॉपिक के अंदर इतनी टेक्निकल चीजें थी.. 2 घंटे की क्लास कभी 3 घंटे तो कभी साढ़े 3 घंटे की हो जाती..


जब वो पढ़ाने बैठते थे, तो ना उन्हे समय का ख्याल आता और ना ही मुझे कभी बोरियत हुई.. जो भी पढ़ाते थे पूरे दिल से पढ़ाते थे... महीने दिन बीत चुके थे, फागुन का महीना चल रहा था, होली से 3 दिन पहले का रविवार था..


प्राची दीदी सहर मे थी और मै, नकुल के साथ मिलने पहुंची हुई थी. सुबह के वक्त दरवाजे पर आंटी खड़ी थी.. उनके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी. पूछने पर पता चला कि 2 साल कुछ महीने बाद उनका बेटा हर्ष घर पहुंचा था..


हालांकि वो हम दोनों (नकुल और मै) के लिए ही मात्र एक अनजान लड़का था, लेकिन आंटी को खुश देखकर हम भी खुश थे.. मै जैसे ही अंदर पहुंची, राजवीर अंकल भी काफी ज्यादा खुश लग रहे थे, बस एक जो खुश नहीं नजर आ रही थी, वो थी प्राची दीदी..


हमने कारन जानने कि कोशिश कि तो पता चला कि प्राची दीदी और हर्ष मे कुछ-कुछ बातों का मतभेद था, जो अक्सर लड़ाई में बदल जाती थी.. आज भी वही हुआ था.. प्राची दीदी चाहती थी कि फ्लाइट लैंड हो तो हर्ष दिल्ली में उसके पास रुके और वहां से दोनो साथ आते. लेकिन वो मां का इतना बड़ा भक्त लड़का था कि दिल्ली एयरपोर्ट से ही कनेक्टिंग फ्लाइट लेकर घर भाग आया...


हम दोनों जब उनके कमरे के पास पहुंचे, तब दोनो में कोल्ड वॉर चल रहा था और मै पहली बार हर्ष को देख रही थी.. ये वही रूप था, जैसा नकुल का था, जैसे रवि का था.. सांवला सलोना, बिल्कुल कृष्ण की तरह...


मुझे ना ये रंग काफी भा जाता था. हर्ष अपने पिता पर गया था, जबकि प्राची दीदी बिल्कुल अपने मां पर.. गोरी चिटी, और खूबसूरत चेहरे की आकार वाली.. हां लेकिन हर्ष भी कम नहीं था.. लगभग 6 फिट की हाइट थी, मेरे नकुल के बराबर. चेहरा वैसा ही दिलकश और बॉडी बिल्कुल आकर्षित करने वाली...


खैर मुझे की, हम तो सामने चल रहे झगड़े को देख रहे थे. प्राची दीदी बोलते-बोलते उसे "करिया" बोलकर, हर्ष के बाल बिखेर दी, और वो हर्ष प्राची दीदी को घूरते हुए कहने लगा... "बस तुमसे थोड़ा सा माध्यम रंग है, सांवले और गोरे चिट्टे के बीच का समझी"..… "हां रे नालायक, मै जानती हूं.. किसी ने मेरे गोरे चिट्टे भाई को हॉस्पिटल में बदलकर तुझ करिए को हमारे मत्थे डाल दिया"…


प्राची दीदी कि बात पर हमारी भी हंसी निकल गई. उन दोनों का ध्यान हमारी ओर गया और हर्ष चिल्लाकर कहने लगा… "आ गए तेरे चमचे, जा दरबार लगा उसके साथ"..


प्राची दीदी गुस्से में चिल्लाती हुई... "पापा इसने मेनका और नकुल को चमचा पुकारा"… उधर से राजवीर अंकल... "दे उसे एक थप्पड़, अक्ल सही हो जाए.. लंदन जाकर तमीज भुल गया है"…… "पापा तमीज के साथ-साथ सराफत भी भुल गया हूं, इस भ्रम में मत रहना की मै नहीं मार सकता, मै भी मार दूंगा दीदी को"….


प्राची दीदी:- तू हॉस्पिटल का बदला हुआ बच्चा नहीं है तो मारकर दिखा, चल उठा हाथ..


प्राची दीदी तो हर्ष को उकसाने के साथ-साथ उसे ठोक भी रही थी और वो आखों से सोले बरसाते हुए... "दीदी, देखो मेरा हाथ पर गया तो फिर रोती रहोगी".. ऐसे ही जब 5-6 बार प्राची दीदी करती रही, तभी उनके गाल पर एक थप्पड़ पर गया..


नाना ये थप्पड़ हर्ष का नहीं था, बल्कि आंटी का था। जिन्होंने प्राची दीदी को मारा था... खैर थोड़े से फैमिली ड्रामे के बीच हम भी बैठ गए बातचीत करने… 3 बजे के करीब मै सर के पास पहुंची, तब वो कहीं निकल रहे थे, उन्होंने बस इतना ही कहा... "जाओ तुम्हारे एक हफ्ते की छुट्टी"… मंगलवार से आना.."


मै भी निकलने से पहले सर के पाऊं पर अबीर डालकर उन्हे होली की शुभकामना दी और प्राची दीदी के पास लौट आयी… जब लौटी तो घर का पुरा माहौल ही गुलाल से रंगीन था... भागम भाग चल रही थी, उसी बीच मेरे चेहरे से लेकर मेरी पूरी ड्रेस पर हर्ष ने अबीर उड़ेल दिया...


"मेरी प्यारी ड्रेस"… उसने तो मेरे उजले रंग के गाउन को पुरा लालाम लाल कर दिया... उधर आंटी भी नकुल के ऊपर गुलाल डाल रही थी, साथ मे अंकल ना ना कहते रह गए लेकिन उनके ऊपर भी उड़ेल दी... एक बात तो तय थी कि दोनो मां बेटे को रंगो से बहुत प्रेम था..


मेरी नजर अब प्राची दीदी को ढूंढ रही थी... "हर्ष, प्राची दीदी"..


हर्ष:- हमे जैसे ही पता चला की तुम लोग जाने वाले हो.. मैंने नकुल को रंग डाला, तुम पर रंग डाला, लेकिन रंगों की शुरवात होते ही, दीदी भाग गई.. कमरा लॉक करके बैठी है..


मै नकुल, हर्ष और आंटी को अपने पीछे लेती... "चलो फिर दरवाजा खुलवाते है… वो क्या है ना रंगों के इस त्योहार से मुझे भी बड़ा लगाव है..."


ये लोग तो अबीर लिए हुए थे लेकिन मै तो अपने साथ पहले से पक्का रंग लेकर निकली थी, जिसके बारे में केवल नकुल जानता था... मै नकुल को पहले ही इशारा कर चुकी थी, और वो समझ गया की उसे क्या करना था...


मैं दरवाजे के बाहर से ही चिल्लायी, की दीदी मै जा रही हूं.. प्राची दीदी अंदर से ही कहने लगी ठीक है मै कल गांव आकर मिलूंगी...


उनका रंगों से डर देखकर मुझे हंसी आ गई.. मै सोचने लगी जिस हिसाब का इनका डर है, कल यदि रूपा भाभी और सोभा भाभी के हत्थे चढ़ गई, तो इनका क्या हाल होगा.. अंदर से ही हंसी छूट गई... खैर मै उन्हे ताने देते हुए कहने लगी… "अबीर यानी केवल धूल, उससे डरकर यदि आप मेरे लिए दरवाजा नहीं खोली फिर मै क्या ही कह सकती हूं"..


मेरे इस इमोशनल अत्याचार से प्राची दीदी ने थोड़ा सा दरवाजा खोला और कहने लगी... "मेनका प्लीज, मान जा ना.. मुझे रंग पसंद नहीं"..
Baaki sab baatein jaye tel lene... mujhe toh is bas is line se matlab hai.. aha aha Prachi ke gaal lal lal kar diya chahe uski maa ne hi kyun uthayi ho hath.. Lekin bada maja aaya :toohappy:..
So sare logis jail jaate hi idhar liyayak ki power badhi toh udhar Kumar shingham ban baitha..
waise woh nandu ko sirf 7 saal ki saza huyi baad mein bahar aake kuch gadbar na kar de.. nitu ko zyada saza na mili par kyun?
nilesh ka kissa khatam... waise uski darindigi ke liye usse bhi badtar saza milni chahiye ..
So baaki logo ki aur menka ki life pehle jaise hi chalne lagi.. aur dekhte hi dekhte holi bhi aa tyohar bhi aa gaya..
are ishi Prachi ko pakad kisi bade bucket mein rang milake duba duba ke rang lagao jab tak roti na phire :D
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 

nain11ster

Prime
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अध्याय 18 भाग:- 3







1,2,3,4,5 सीढ़ियां चढ़ते मै स्टेज पर पहुंची और जैसे ही मै स्टेज पर पहुंची चारो ओर उजाला ही उजाला.. ऊपर से फुल, वो चमकने कुछ सिल्वर लाल गुलाबी पेपर, लगातार बरसते ही रहे...


मुझे समझते देर नहीं लगी कि मेरा रिजल्ट आ गया है.. सभी मेरे करीब ही थे मुझे घेरे... और मै सबके पाऊं छूने लगी.. लेकिन हर कोई मुझे गले लगाकर बस मेरे सर पर हाथ फेर रहे थे...


सब इतने खुश थे कि उन्हें खुश देखकर मेरी आंखें भर आयी.. वो जो राजवीर अंकल ने बताया था.. गौरव करने वाले क्षण, सब अभी वही मेहसूस कर रहे थे.. तभी टीवी ऑन किया गया.. भारत में रात के 12 बजे से ऊपर हो गए थे और नेशनल न्यूज पर आंनद जीजू और मुक्ता दीदी का इंटरव्यू आ रहा था..


दोनो मेरे बारे में बोल रहे थे... वो लोग भी काफी खुश थे.. फिर दिखे हमारे क्षेत्र के नए विधायक वरुण मिश्रा, बोलते-बोलते उनके आखों में आशु आ गए. दिल्ली से हमारे सांसद लियाकत अली भी मेरे लिए बोले.. मेरे घर के सारे लोग उन्हे सुनकर भाव विभोर हो गए...


तभी होटल वाला एक फोन लेकर देते हुए हमे कहने लगा इंडिया से फोन है.. फोन पर मुक्ता दीदी थी जिन्होंने लंदन रिजॉर्ट मे फोन करके पता लगवाया की हम कहां है...


मुझे बधाइयां देती हुई कहने लगी… "फीलिंग प्राउड, अब जल्दी से एक बार अपने सहर और गांव आओ, बहुत से लोग तुम्हे मिस कर रहे है"..


मैंने भी कह दिया बस एडमिशन करवाकर आती हूं वहां.. इससे ज्यादा मुझसे बोला नहीं गया.. मुक्ता दीदी भी कुछ देर पापा से बात करने के बाद फोन रख दी..


इस भावुक क्षण से निकलने मे हमे कुछ वक्त लग गया.. जब सब नॉर्मल हुआ, तब बात होने लगी कि काउंसलिंग कल से शुरू हो जाएगी और एडमिशन तो टॉप आईसीएसआई (ICAI) के कॉलेज में ही चाहिए..


मै सबका मन सुबह ही पढ़ चुकी थी और मै नहीं चाहती थी कि उनका यूरोप टूर बर्बाद हो, पता ना फिर ये बाल बच्चो वाले इंसान, दोबारा यहां आए की ना आए.. भरी सभा में मै खड़ी होती.…


"हेल्लो, हेल्लो, हेल्लो.. सब यहां ध्यान देंगे... मै गांव से पढ़ी, और अपने छोटे से सहर मे कोचिंग लेकर मैंने टॉप किया. सीए की पढ़ाई मै किसी भी इंस्टीट्यूट से कर सकती हूं. कॉलेज टॉप का हो या बॉटम का, सेलेब्स सबका एक जैसा होता है, और डिग्री पर एग्जामिनेशन बोर्ड का नाम होता है ना कि कॉलेज का"..


सब लोग एक साथ मुझे घूरते हुए... "अब ये क्या नया नाटक है.."..


मै:- आप लोग जैसा कॉलेज चाहते है वैसे कॉलेज में मै एडमिशन ले लूंगी.. लेकिन यहां दाव पर मेरी खुशियां लगी है..


मां:- नौटंकीबाज, जल्दी बोल अपनी खुशी..


बाकी सब भी पीछे से... "हां हां बताओ ना"..


मै:- मै यहां से अकेली निकलूंगी, आईसीएआई के कॉलेज में एडमिशन लूंगी... आप लोग हॉलिडे पुरा करके वापस लौटाना और मै आप लोगों के साथ गांव जाऊंगी.. जून से पहले मेरी क्लास शुरू नहीं होगी.. 15 से 20 यहां रहिए, 21 और 22 को फ्रांस घूमिए.. 23 और 24 लंदन में रहिए.. 25 को इंडिया, और 26 को गांव.. मै 26 मई से 29 मई तक गांव में रहूंगी और फिर वापस लौटकर दिल्ली अपने क्लास के लिए.. कोई चू तक ना बोले कि नकुल को लेती जाओ.. मेरी इस खुशी को आप पुरा करोगे और मै आप लोगों की खुशी को.. बोलो मंजूर..


मां:- हां री मेरी टॉपर बिटिया.. "नाउ सी बिकेम बिग गर्ल (now she became big girl)"… ठीक है जा.. अरे हर्ष बेटा तुम्हे कब इंडिया निकालना है..


"हे भगवान इसे तो मै भुल ही गई थी... हे छलिया ये क्या खेल रच दिए.. कहीं मै दिल ना हार जाऊं.. देख लेना अब सब आपके हाथ में है".. अंदर से ये ख्याल आया..


हर्ष:- जी आंटी मै वो अर्थो कॉन्फ्रेंस के लिए परसो इंडिया के लिए निकालने वाला हूं..


राजवीर अंकल:- हां तो तू कल ही मेनका को लेकर निकल जा..


हर्ष:- पापा मै परसो अपने ग्रुप के साथ निकलूंगा और इंडिया मतलब केवल दिल्ली नहीं होता.. पहला कॉन्फ्रेंस मुंबई में है, फिर हैदराबाद, उसके बाद बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का कॉन्फ्रेंस होगा और अंत में ऐम्स का कॉन्फ्रेंस..


उपासना सिंह (प्राची दीदी कि मां)… यहां से कल तुम मेनका को लेकर दिल्ली जाओगे, उसे फ्लैट तक छोड़कर आओगे.. वहां से फिर मुंबई निकल लेना.. और बाकी मेरे लाल पुरा देश भ्रमण करना.. एक और बात.. तुम्हारा मुख्य कॉन्फ्रेंस तो ऐम्स का ही है.. बाकी जगह तो सुनने ही जाना है.. तो मेरे लाल हो सके तो तुम वीडियो कॉन्फ्रेंस कर लेना.. और मेनका के साथ ही रहना जब तक हम पहुंच ना जाए.. इज दैट क्लियर (Is that clear)..


हर्ष:- मै सिर्फ ड्रॉप करने जाऊंगा.. मंजूर हो तो बताओ.. और ये टिकट कैंसल और नए टिकट मे जो पैसा लगेगा उसे मै अपने पॉकेट से पेमेंट नहीं करूंगा..


प्राची दीदी:- कंजूस कहीं का.. चिंता मत कर वो पेमेंट मै दे दूंगी और अगर तू मेनका के साथ रहा तो हर दिन 100 यूरो दूंगी अलग से..


हर्ष:- नहीं 1000 यूरो..


प्राची दीदी:- 99 यूरो..


हर्ष:- 800 से कम नहीं लूंगा..


प्राची दीदी:- 95..


हर्ष:- मै नहीं जाऊंगा...


प्राची दीदी:- पॉकेट मनी बंद..


हर्ष:- ये तो गले पर चाकू रखकर काम करवाना हुआ..


मै:- बस भी करो दोनो, मै क्या दिल्ली में अकेली पहले कभी नहीं रही क्या? उसी दौरान मै टीवी पर भी आयी थी.. भुल गए क्या.. हर्ष मुझे छोड़कर कॉन्फ्रेंस अटेंड करेगा.. और प्राची दीदी उसे 100 यूरो रोज के हिसाब से देगी.. मै जा रही हूं टिकट बनाकर सोने.. हर्ष तुम अपनी डिटेल भेज देना...


हर्ष:- 10 मिनट यहीं रुको मै टिकट का काम करवा देता हूं..


उसने किसी ट्रैवल एजेंट को फोन किया.. सुबह 7 बजे लंदन, और शाम के 6 बजे लंदन से इंडिया की फ्लाइट टिकट कन्फर्म.. हां लेकिन उसके लिए मेरे अकाउंट से ढेर सारा धन खर्च कर दिया इन लोगों ने..


अगले दिन जब हम लंदन मे थे.. हर्ष को कुछ जरूरी पेपर और कुछ चीजें कॉन्फ्रेंस के लिए चाहिए थी, वो अपने रूम से कलेक्ट कर रहा था.. मै उसका कमरा देख रही थी.. 8 बाय 10 का छोटा सा कमरा था, जिसमे चारो ओर किताबे ही बिछी हुई थी. टेबल पर एक लैपटॉप रखा हुआ था जिसकी धूल बता रही थी कि वो इस्तमाल नहीं होती..


"बिहारी स्टूडेंट जहां भी होते है उनका पढ़ने का तरीका नहीं बदलता"… मेरे व्यंग भरे शब्द..


हर्ष, अपना काम करते.. "जो अपने मूल को छोड़ दे, फिर वो किसका होगा.. जब कोई कहता है कि मै बिहारी स्टूडेंट की तरह रहता हूं.. तुम सोच नहीं सकती कितना प्राउड फील होता है..."


उसके जवाब सुनकर मै मुस्कुराई.. और इधर-उधर बिखरी चीजों को समेटकर एक जगह रखने लगी… तभी हर्ष चिल्लाया... "प्लीज समेटो मत, वरना ढूंढने में दिक्कत होगी"..


मै:- कोई दिक्कत नहीं होगी.. कुछ ना मिले तो कॉल लगा लेना, मै बता दूंगी..


हर्ष:- रंडमली समेट कर रख रही हो और कहती हो की फोन लगा लो..


हर्ष अपनी चेयर से पीछे मुड़कर एक बार किताबों का जायजा लिया.. "अच्छा एबी एनाटॉमी की बुक दो".. मैंने उसे दे दी.. "अच्छा स्ट्रक्चरल यूनिट करके मैंने एक टॉपिक पर लिखा है, पन्ने पर ही हेडिंग"… बात पूरी भी नहीं हुई की सामान हाजिर... उसने ऐसे ही 3-4 टेस्ट लिए..


हम दोनों टेस्ट-टेस्ट खेल रहे थे, इसी बीच धराम से दरवाजा खुला और एक लड़की दरवाजा फाड़कर अंदर आयी. छोटा सा शॉर्ट्स, जिसमे उसके जांघ की पूरी मोटाई पता चल रही थी. ऊपर काले रंग का छोटा टॉप जो वी गला का था, जिसमे उस लड़की स्तन के किनारे के उभार और बीच की गहराई, उसके अति कामुक रूप का विवरण दे रहे थे.. इतना गोरा चेहरा होने के बावजूद भी इतना सारा मेकअप और लिपस्टिक, की लोगों की आखें उसके चेहरे और बदन को ताड़ने पर मजबूर हो जाए..


20-21 वर्षीय इस बाला को मै देख ही रही थी, तभी वो पीछे से, हर्ष के कंधे से अपना पूरा सिना चिपकाती… "क्या कर रहा है मेरा बेबी"..


"हिहिहिहिहिहिही… बेबी…." अनायास ही मेरे मुख से निकला. हर्ष की भी छोटी सी हंसी निकली.. वो लड़की अपने चेहरे पर गुस्से के भाव लाती... एक बार मुझे घूरकर, बड़े ही कामुक अंदाज में वो हर्ष के कानो के नीचे चूम ली.. हर्ष बिना उसपर ध्यान दिए... "शैबा क्या हुआ"..


शैबा:- ये लड़की कौन है, इसे बाहर कहो जाए, मुझे कुछ पर्सनल बातें करनी है...


हर्ष, अपना काम जारी रखते... "तुम यहां खड़ी हो, क्योंकि ये लड़की मेरे साथ मेरे स्टडी रूम मे है, नहीं तो मै अपने स्टडी रूम मे किसी को आने की अनुमति नहीं देता..


मै:- फेकू चंद..


हर्ष हंसते हुए मेरी ओर देखा और अपने दोनो हाथ जोड़ लिए.. इधर वो लड़की शैबा.. "अब जब तुम्हारे प्राइवेट एरिया में आ ही गई हूं तो कुछ प्राइवेट बातें कर लूं"..


हर्ष:- मै तो कब से कह रहा हूं कि कहो… तुम्हे ही मेनका की मौजूदगी खटक रही है...


शैबा:- आई लव यू..


हर्ष:- हाहाहाहाहा.. ये बात तो आजकल लोग माईक लगाकर पूरे कॉलेज के सामने करते है...


शैबा:- हां लेकिन उसके बाद का मुझे सबके सामने नहीं किया जायेगा...


हर्ष:- हम्मम ! 9XXXXXXX53 मेरे पापा का नंबर है, अपने पापा को बोलना बात कर लेने.. एक बार रिश्ता पक्का हो गया, फिर ये लंदन है बेबी.. जहां मर्जी वहां सेक्स करो.. सब एप्रिशिएट करेंगे...


शैबा:- व्हाट ???


हर्ष:- और कोई इंपॉर्टेंट बात करनी है क्या ?


मै:- थैंक्स हर्ष...


हर्ष:- दे कर देखो नंबर … मै भी हर्ष सिंह भदोरिया हूं..


शैबा:- ये तुम्हे अपने पापा का नंबर क्यों देगी...


हर्ष:- इसने तुम्हारे सामने अपनी प्राइवेट बात कह भी दी और खत्म भी हो गई बात... तुम क्यों दूसरों के प्राइवेट बात मे ज्यादा इंटरेस्टेड हो शैबा...


हर्ष अपनी जगह से उठकर उसके गाल को थपथपाते हुए... "चलो शैबा, यहां का काम हो गया.." हर्ष अपना बैग पैक करते हुए कहने लगा...


शैबा:- हर्ष, 2 मिनट जरा रुको ना..


मै:- हर्ष मै बाहर इंतजार कर रही हूं..


हर्ष:- रुक मै भी आया, शैबा, जल्दी से बोल दो क्या चाहिए वरना ये रूम लॉक हो गया तो दोबारा नहीं खुलेगा…


शैबा:- मुझे कुछ टॉपिक समझ में बिल्कुल भी नहीं आ रहे.. अगर वो टॉपिक क्लियर नहीं हुए तो मेरे ग्रेड नीचे आ जाएंगे..


हर्ष:- आज से अगले 15 दिन का पुरा समय उस लड़की का दिया हुआ है, यदि वो राजी होती है तो मै तुम्हे 2 घंटे दे सकता हूं...


शैबा:- कौन है ये लड़की...


हर्ष:- लगता है तुम कौन है और क्यों है, इसी पर अपना वक्त बिताने वाली हो… चलो मेनका हम चलते है, ये थोड़ी कंफ्यूज लग रही है...


जैसे ही हर्ष बाहर जाने वाला हुआ, शैबा, उसका हाथ पकड़कर रोकने लगी... मुझसे पूछने लगी कि क्या वो कुछ समय ले सकती है... मुझे क्या परेशानी हो सकती थी भला, मैंने भी कह दिया हां ठीक है ले लो…


मै बाहर जाने लगी तो हर्ष ने मुझे अपने घर की चाबी थामा दी, जो ठीक इस कमरे के बगल वाला कमरा था... मै उसके 1 बीएचके के छोटे से घर को देखने लगी.. ये लड़के भी ना कभी घर को घर नहीं रहने दे सकते.. पुरा कमरा बिखरा पड़ा था... हां लेकिन यहां मै नहीं समेटने वाली थी कुछ भी, पता चलता की कल को फोन करके पूछ रहा है मेरी अंडरवेयर कहा है.. हीहिहिहिहिही


चलते-चलते मै एक डेस्क के पास पहुंची, जहां एक खूबसूरत डायरी परी हुई थी... डायरी देखकर मेरी जिज्ञासा बढ़ने लगी और मैंने उसे खोल दिया... डायरी के पहले पन्ने पर इंट्रो मे लिखा था...


"मै अपनी जीवन गाथा नहीं लिख रहा जो इसे खोलकर पढ़ लिए और मेरे बारे में जान लिए.. उसके लिए मेरे साथ वक्त बिताना होगा.. बाकी रही बात इसके अंदर क्या लिखा है तो रख दीजिए. क्या लिखा है वो ना तो आपके लिए लिखा है और ना ही आपको समझ आएगा"


"अब तो लगता है खोलना ही होगा"… यही सोचकर मै आगे कर पन्ने पलटी और अंदर का लिखा देखकर मेरी इतनी ही प्रतिक्रिया थी... "हांय, ऐ की है"… दरसअल वो किस भाषा में लिखा हुआ था समझना मुश्किल था..


मैंने काजुअली एक पन्ने की तस्वीर लेकर उसे मुक्ता दीदी को भेज दिया और हर्ष से फोन मांगकर ले आयी.. कुछ देर इधर-उधर की बात करके, उनसे फिर वो तस्वीर की डिटेल पूछने लगी..


उन्होंने कुछ वक्त मांगा और तकरीबन एक घंटे बाद उन्होने कॉल बैंक किया... ये बड़े-बड़े अधिकारी भी ना कितना फॉर्मल होते है.. फोन करती ही मुक्ता दीदी कहने लगी "सॉरी बेटा मै काम मै व्यस्त हो गई इसलिए कॉल ही नहीं कर पाई"…


बताओ यहां सरकारी ऑफिस के चक्कर लगा लगाकर लोगों के चप्पलें घिस जाती है.. बड़ा बाबू आजकल-आजकल करके लोगों के धैर्य के साथ खेल जाता है और उन्हे यदि गलती से किसी ने झुंझलाकर उनका दिया वक्त याद दिला दिया, तब तो आयी शामत. बाबू साफ कह देगा काम नहीं होगा.. लो जी फिर उनके मिन्नतें भी करते रहो… कमाल का होता है ना ये सरकारी दफ्तर...


वैसे जिंदगी में मैंने बस एक ही सपना देखा है.. जैसे हम किसी शॉप मे जाते है और वहां के कर्मचारी कितने प्यार से हमे बिठाकर हमारी इक्छा जानते है और उसके बाद मनचाहे सामान की कितनी वरियटी दिखा देता है... हमारा सरकारी ऑफिस भी बिल्कुल ऐसा ही हो... स्वागत करते बाबू लोग खड़े रहे और पब्लिक को मनचाहे काम करवाने के लिए कई तरह के ऑप्शन हो…


हिहिहिहि मुक्ता दीदी को लाइन पर अटकाकर मै ये सब सोचने लगी और उधर से वो मुझे पुकार-पुकार कर थक गई... मै हड़बड़ी मे उन्हें जवाब दी और अपने खोने के पूरी कहानी बताती हुई कहने लगी.. इसका जवाब मत दीजिए अभी, वो मिलकर बता देना की सरकारी ऑफिस ऐसा क्यों नहीं हो सकता..


वो मेरी बात सुनकर हसने लगी और फिर मुझसे पूछने लगी कि कौन है जो मेरी बहन के आगे पीछे कर रहा इस वक्त... उनकी बात एक इशारा था कि उस पन्ने मे हर्ष ने कुछ मेरे बारे में ही लिखा हुआ था..


मैंने बहुत जिद की उनसे जानने की, कि पन्ने पर क्या पढ़ा, लेकिन वो साफ कहने लगी कि उन्हे पूरी डियारी की कॉपी चाहिए... बहस मे वो जीती और मै हारी.. अरे यार जिलाधिकारी होने का फायदा ले गई... पता ना इतने सारे सटीक लॉजिक कौन उनके दिमाग में डालता है.. बोलती बंद कर दी...


मामला यहां आकर सैटल हुआ कि मै उन्हे पूरी कॉपी भेज दूं, और ये सिक्रेट हम दोनों बहन के बीच रहेगा.. दिल्ली एयरपोर्ट पर मै जैसे ही अपना नेट ऑन करूंगी, वो पूरी डायरी मुझे पीडीएफ मे मिल जाएगी वो भी अपनी भाषा में..


मैंने भी इस होशियार हर्ष की पूरी डायरी चुरा ली, और मुक्ता दीदी को भेजकर आराम से टीवी देखने लगी... ये सब करते हुए तकरीबन 2-3 घंटे बीत गए..


कुछ देर बाद हर्ष भी पहुंच गया, और मै उसके साथ लंदन की शैर करने निकल गई... पहले वो अच्छा लगता था, अब उसके साथ घूमने अच्छा लगने लगा था.. उसकी प्यारी बातें दिल में कुछ-कुछ एहसास करवा रही थी..


बहरहाल हम लंदन से उड़ान भर चुके थे और दिल्ली एयरपोर्ट पर जैसे ही मेरा फोन ऑन हुआ, मुक्ता दीदी अपना काम कर चुकी थी... हर्ष आगे चल रहा था और मै पीछे.. जितने वक्त से हम साथ थे, और उसका एप्रोच मेरी ओर जिस हिसाब से था, प्यारा था.. उसके बाद जब मै उसके डायरी की चुपके से एक झलक मारी.. मुस्कुरा रही थी....
 

Naina

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Sare update mat dijiye aaj hi.. kyun ki raat ko story completed nahi karni chahiye... kal kariye complete ye story :D
aaj reply kariye aapke counter replies kaafi dilchasp aur rochak hote hai :D
 
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Naina

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तू जानती नहीं है मेनका, रंग मेरे चेहरे पर कितना रिएक्शन करता है. मै छोटी थी, रंग के कारन पूरे चेहरे पर छोटे-छोटे स्पॉट आ गए थे.. एक महीना तक मुंह छिपाकर चलना परा"…
is story wali Prachi ko bhi same problem hoti hai :shocked2:
phir toh badhiya hai.. ghins ghins lagao ushe rang :vhappy:
 
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