अध्याय 16 भाग:- 2
खैर ये तो गांव के ड्रामे थे जिसमे प्रवीण मिश्रा की भी संपत्ति बिक चुकी थी.. वहीं दूसरी ओर गांव की पॉलिटिक्स भी लगभग बदलती नजर आ रही थी, जहां हमारे गांव के मुखिया चाचा कि पकड़ अब उस पूरे इलाके में सबसे ज्यादा मजबूत थी, तो वहीं महादेव मिश्रा के मरने के बाद विधायक असगर अली का बेटा लियाकत अली यहां की राजनीति का मुख्य चेहरा बनकर उभर चुका था...
गांव के जो भी ड्रामे थे, वो तो गांव भर में ही छाए हुए थे, लेकिन जो ड्रामा कुमार आंनद रच चुके थे, वो तो पूरे देश मे छाया हुआ था... सुप्रीम कोर्ट में लागतार सुनवाई जारी रही... 58 गिरफ्तारियां बढ़कर 62 हो गई... कुल 6 लड़कियां थी, जो कि दरिंदगी की शिकारी हुईं थी, पिछले 6 महीने में।
सब की सब 18-19 साल से ज्यादा उम्र की लड़कियां नहीं थी... केवल एक अर्पिता को छोड़कर बाकी सारी लड़कियां दूसरे स्टेट से उठवाई गई थी.. जिन चार लोगों को बाद में अरेस्ट किया गया था, उन्हीं की जिम्मेदारी होती थी अच्छे घर की लड़कियों का पुरा पता करके, कैसे सुरक्षित ढंग से उठाया जाए...
वहशियाना का खेल रचने के लिए लड़की उपलब्ध करवाना, और उस खेल मे सामिल होने के लिए नीलेश और गिरीश को फांसी की सजा... उसी के साथ 14 अधिकारी, जिसमे कमिश्नर, डीएम, डेप्युटी डीएम, और भी बड़े-बड़े अधिकारी थे... उन्हे भी उनकी दरिंदगी के लिए फांसी की सजा हुई.. महादेव मिश्रा के 6 बॉडीगार्ड, 4 प्राइवेट फाइनेंसर और 8 क्रिमिनल को भी उसी केस में फांसी की सजा हुई...
कुल 62 अभियुक्त मे से वहां 32 को फांसी हुई थी.. वहीं नंदू और उसके साथ के 8 क्रिमिनल को गलत तरीके से टेंडर पाने, सेक्स रैकेट चलाने और कम उम्र की लड़कियों को पैसे का लालच देकर उनसे काम निकलवाने के लिए उन्हे 7 साल की सजा हुई...
बाकी बचे हुए दोषियों का भी आरोप साबित हो चुका था और उन्हे भी अलग-अलग धाराओं के तहत किसी को 3 साल, तो किसी को 5 साल की सजा हुई थी... लगातार 2 महीने की सुनवाई मे एक के बाद एक परिणाम आते गए और सबको सजा होती चली गई..
ये कुमार आंनद का पुरा बिछाया जाल था, जिसमे 62 लोग गिरफ्तार हुए थे और किसी एक तक को भी उसने बेल नहीं होने दिया था... वहीं बात करे यदि नीतू और गैंग की तो.. नीतू, फातिमा और पूनम को नंदू का साथी करार दिया गया, किन्तु नाबालिक उम्र और कच्ची उम्र की नासमझी के कारन पूनम को 2 साल, नीतू और फातिमा को 1 साल करेक्शन सेंटर में रखकर, रिपोर्ट सबमिट करने के ऑर्डर मिले, उनकी सजा उसके बाद तय होती.
इधर अपनी भी जिंदगी सामान्य रूप से आगे बढ़ने लगी थी... पढ़ाई और परिवार के बीच अपना समय अच्छा कट रहा था. नीलेश के घर में इस बार शायद इंसानों ने जगह ली थी. माधव चाचा काफी मिलनसार और अच्छे लगे, बाकी मिलना जुलना तो केवल नाम मात्र का ही होता रहा...
नए साल के आगमन से लेकर मकर संक्रांति के त्योहार तक सब आकर गए. 11th के एग्जाम भी समाप्त हो गए और इस बार भी मै अपने गांव के कॉलेज की टॉपर रही. वहीं हमारे सहर का मकान भी तैयार हो चुका था, जिसका गृह प्रवेश कुछ दिन पहले ही हुआ था.
गृह प्रवेश के साथ ही महेश भैया और सोभा भाभी को सहर के मकान में शिफ्ट करवा दिया गया, ताकि वहां रहकर वो साक्षी और केशव को शहर के अंग्रेजी स्कूल में दाखिला करवा सके.
होली के बाद रूपाली दीदी (ममेरी बहन) के शादी की भी तारीख तय हो चुकी थी. ज़िन्दगी बिल्कुल सामान्य और हंसी खुशी कट रही थी... जनवरी तक तो इतनी ठंड थी की मै कहीं निकली ही नहीं. शुरवात फरबरी से ही मैंने पापा और मम्मी को तैयारी के लिए एक साल वर्मा सर से पढ़ने की बात पूछ ली... उन्होंने भी हां कह दिया..
मै और नकुल पता करके पहुंचे वर्मा सर के पास. पहली बार किसी अकरू शिक्षक से मिल रही थी.. पहले दिन तो उन्होंने यह कहकर भगा दिया कि पहले कम से कम अपना 12th तो क्लियर करके आना चाहिए था..
2-3 दिन चक्कर काटे, मिन्नतें की। पुरा बताया की मै पिछले 3 दिन से गांव से आकर उनसे समय लेने की कोशिश कर रही हूं. लगातार कोशिशों की वजह से वो थोड़ा सा पिघले. रविवार के दिन उन्होंने ने बुलाया था, मै जैसे ही पहुंची उन्होंने सवालों से भरा एक पेपर थमा दिया और जवाब लिखने के लिए आधे घंटा का समय दे दिया..
50 ऑब्जेक्टिव सवाल थे, और कुछ सवालों के लेवल तो मेरे तैयारी के कहीं ऊपर के सवाल थे. मुझे जो आते थे उनका जवाब देकर, मैंने आधे घंटे में उन्हे अपना जवाब सबमिट कर दिया..
28 सवालों का जवाब मैंने दिया था और सब के सब सही थे. उन्होंने पूछा कि कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रही हो और 50 मे से मात्र 28 ऑब्जेक्टिव का जवाब दी, बाकियों को अटेम्प्ट भी नहीं की..
मै:- सर उन सवालों के जवाब मुझे नहीं आते थे, और ना ही ऐसा लगा कि मैंने उन सवालों को कभी पढ़ा है.. जितने आए उतने के जवाब दे दिए..
वर्मा सर ने मुझसे फिर पूछा कि सीए की तैयारी करना एक बात, लेकिन तुम जानती भी हो सीए बनने मे मेहनत के अलावा कितना वक्त लगता है.. मुझे सच मे बहुत ज्यादा पता नहीं था.. मैंने उनसे बस इतना ही कहा कि सर प्रोफेशनल कोर्स है, 4 साल या 5 साल लग जाएंगे..
मेरा जवाब सुनकर वो मुस्कुरा दिए और घर परिवार का डिटेल पूछने लगे. मेरे पापा से उन्होंने बात की, और फिर उन्होंने 3 दिन का समय दे दिया... मंगलवार, शुक्रवार और रविवार...
मै काफी खुश हुई, सर को धन्यवाद कही और घर लौट आयी. 2 दिन बाद से मेरी क्लास शुरू हो गई. वर्मा सर ने बेसिक से ही शुरू किया, बावजूद इसके की उनको भी पता था कि मै ये सब पढ़ चुकी हूं, लेकिन जब उन्होंने टॉपिक उठाया और समझाना शुरू किए, तब पता चला कि उस टॉपिक के अंदर इतनी टेक्निकल चीजें थी.. 2 घंटे की क्लास कभी 3 घंटे तो कभी साढ़े 3 घंटे की हो जाती..
जब वो पढ़ाने बैठते थे, तो ना उन्हे समय का ख्याल आता और ना ही मुझे कभी बोरियत हुई.. जो भी पढ़ाते थे पूरे दिल से पढ़ाते थे... महीने दिन बीत चुके थे, फागुन का महीना चल रहा था, होली से 3 दिन पहले का रविवार था..
प्राची दीदी सहर मे थी और मै, नकुल के साथ मिलने पहुंची हुई थी. सुबह के वक्त दरवाजे पर आंटी खड़ी थी.. उनके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी. पूछने पर पता चला कि 2 साल कुछ महीने बाद उनका बेटा हर्ष घर पहुंचा था..
हालांकि वो हम दोनों (नकुल और मै) के लिए ही मात्र एक अनजान लड़का था, लेकिन आंटी को खुश देखकर हम भी खुश थे.. मै जैसे ही अंदर पहुंची, राजवीर अंकल भी काफी ज्यादा खुश लग रहे थे, बस एक जो खुश नहीं नजर आ रही थी, वो थी प्राची दीदी..
हमने कारन जानने कि कोशिश कि तो पता चला कि प्राची दीदी और हर्ष मे कुछ-कुछ बातों का मतभेद था, जो अक्सर लड़ाई में बदल जाती थी.. आज भी वही हुआ था.. प्राची दीदी चाहती थी कि फ्लाइट लैंड हो तो हर्ष दिल्ली में उसके पास रुके और वहां से दोनो साथ आते. लेकिन वो मां का इतना बड़ा भक्त लड़का था कि दिल्ली एयरपोर्ट से ही कनेक्टिंग फ्लाइट लेकर घर भाग आया...
हम दोनों जब उनके कमरे के पास पहुंचे, तब दोनो में कोल्ड वॉर चल रहा था और मै पहली बार हर्ष को देख रही थी.. ये वही रूप था, जैसा नकुल का था, जैसे रवि का था.. सांवला सलोना, बिल्कुल कृष्ण की तरह...
मुझे ना ये रंग काफी भा जाता था. हर्ष अपने पिता पर गया था, जबकि प्राची दीदी बिल्कुल अपने मां पर.. गोरी चिटी, और खूबसूरत चेहरे की आकार वाली.. हां लेकिन हर्ष भी कम नहीं था.. लगभग 6 फिट की हाइट थी, मेरे नकुल के बराबर. चेहरा वैसा ही दिलकश और बॉडी बिल्कुल आकर्षित करने वाली...
खैर मुझे की, हम तो सामने चल रहे झगड़े को देख रहे थे. प्राची दीदी बोलते-बोलते उसे "करिया" बोलकर, हर्ष के बाल बिखेर दी, और वो हर्ष प्राची दीदी को घूरते हुए कहने लगा... "बस तुमसे थोड़ा सा माध्यम रंग है, सांवले और गोरे चिट्टे के बीच का समझी"..… "हां रे नालायक, मै जानती हूं.. किसी ने मेरे गोरे चिट्टे भाई को हॉस्पिटल में बदलकर तुझ करिए को हमारे मत्थे डाल दिया"…
प्राची दीदी कि बात पर हमारी भी हंसी निकल गई. उन दोनों का ध्यान हमारी ओर गया और हर्ष चिल्लाकर कहने लगा… "आ गए तेरे चमचे, जा दरबार लगा उसके साथ"..
प्राची दीदी गुस्से में चिल्लाती हुई... "पापा इसने मेनका और नकुल को चमचा पुकारा"… उधर से राजवीर अंकल... "दे उसे एक थप्पड़, अक्ल सही हो जाए.. लंदन जाकर तमीज भुल गया है"…… "पापा तमीज के साथ-साथ सराफत भी भुल गया हूं, इस भ्रम में मत रहना की मै नहीं मार सकता, मै भी मार दूंगा दीदी को"….
प्राची दीदी:- तू हॉस्पिटल का बदला हुआ बच्चा नहीं है तो मारकर दिखा, चल उठा हाथ..
प्राची दीदी तो हर्ष को उकसाने के साथ-साथ उसे ठोक भी रही थी और वो आखों से सोले बरसाते हुए... "दीदी, देखो मेरा हाथ पर गया तो फिर रोती रहोगी".. ऐसे ही जब 5-6 बार प्राची दीदी करती रही, तभी उनके गाल पर एक थप्पड़ पर गया..
नाना ये थप्पड़ हर्ष का नहीं था, बल्कि आंटी का था। जिन्होंने प्राची दीदी को मारा था... खैर थोड़े से फैमिली ड्रामे के बीच हम भी बैठ गए बातचीत करने… 3 बजे के करीब मै सर के पास पहुंची, तब वो कहीं निकल रहे थे, उन्होंने बस इतना ही कहा... "जाओ तुम्हारे एक हफ्ते की छुट्टी"… मंगलवार से आना.."
मै भी निकलने से पहले सर के पाऊं पर अबीर डालकर उन्हे होली की शुभकामना दी और प्राची दीदी के पास लौट आयी… जब लौटी तो घर का पुरा माहौल ही गुलाल से रंगीन था... भागम भाग चल रही थी, उसी बीच मेरे चेहरे से लेकर मेरी पूरी ड्रेस पर हर्ष ने अबीर उड़ेल दिया...
"मेरी प्यारी ड्रेस"… उसने तो मेरे उजले रंग के गाउन को पुरा लालाम लाल कर दिया... उधर आंटी भी नकुल के ऊपर गुलाल डाल रही थी, साथ मे अंकल ना ना कहते रह गए लेकिन उनके ऊपर भी उड़ेल दी... एक बात तो तय थी कि दोनो मां बेटे को रंगो से बहुत प्रेम था..
मेरी नजर अब प्राची दीदी को ढूंढ रही थी... "हर्ष, प्राची दीदी"..
हर्ष:- हमे जैसे ही पता चला की तुम लोग जाने वाले हो.. मैंने नकुल को रंग डाला, तुम पर रंग डाला, लेकिन रंगों की शुरवात होते ही, दीदी भाग गई.. कमरा लॉक करके बैठी है..
मै नकुल, हर्ष और आंटी को अपने पीछे लेती... "चलो फिर दरवाजा खुलवाते है… वो क्या है ना रंगों के इस त्योहार से मुझे भी बड़ा लगाव है..."
ये लोग तो अबीर लिए हुए थे लेकिन मै तो अपने साथ पहले से पक्का रंग लेकर निकली थी, जिसके बारे में केवल नकुल जानता था... मै नकुल को पहले ही इशारा कर चुकी थी, और वो समझ गया की उसे क्या करना था...
मैं दरवाजे के बाहर से ही चिल्लायी, की दीदी मै जा रही हूं.. प्राची दीदी अंदर से ही कहने लगी ठीक है मै कल गांव आकर मिलूंगी...
उनका रंगों से डर देखकर मुझे हंसी आ गई.. मै सोचने लगी जिस हिसाब का इनका डर है, कल यदि रूपा भाभी और सोभा भाभी के हत्थे चढ़ गई, तो इनका क्या हाल होगा.. अंदर से ही हंसी छूट गई... खैर मै उन्हे ताने देते हुए कहने लगी… "अबीर यानी केवल धूल, उससे डरकर यदि आप मेरे लिए दरवाजा नहीं खोली फिर मै क्या ही कह सकती हूं"..
मेरे इस इमोशनल अत्याचार से प्राची दीदी ने थोड़ा सा दरवाजा खोला और कहने लगी... "मेनका प्लीज, मान जा ना.. मुझे रंग पसंद नहीं"..
Baaki sab baatein jaye tel lene... mujhe toh is bas is line se matlab hai.. aha aha Prachi ke gaal lal lal kar diya chahe uski maa ne hi kyun uthayi ho hath.. Lekin bada maja aaya

..
So sare logis jail jaate hi idhar liyayak ki power badhi toh udhar Kumar shingham ban baitha..
waise woh nandu ko sirf 7 saal ki saza huyi baad mein bahar aake kuch gadbar na kar de.. nitu ko zyada saza na mili par kyun?
nilesh ka kissa khatam... waise uski darindigi ke liye usse bhi badtar saza milni chahiye ..
So baaki logo ki aur menka ki life pehle jaise hi chalne lagi.. aur dekhte hi dekhte holi bhi aa tyohar bhi aa gaya..
are ishi Prachi ko pakad kisi bade bucket mein rang milake duba duba ke rang lagao jab tak roti na phire

Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill
