Shetan
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बीवी ने पी शराब. माहौल हुआ लराब
हिंदी भाषा भोजपुरी टोन
हिंदी भाषा भोजपुरी टोन
घर का काम करते कविता की नजर बार बार घर के लेंडलाइन फोन पर जाती. घर की डोरबैल बजी और तुरंत कविता ने भाग कर फोन उठाया.
कविता : (एक्साइड) हेलो... कहा पहोचे???
पर सामने से कोई रिप्लाई नही. फिर भी बैल की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी. कविता ने डोर की तरफ देखा. तब जाकर खयाल आया की यह तो घर के डोरबैल की आवाज है. कविता को जैसे गुस्सा आ रहा हो. वो तेज़ी से डोर की तरफ बढ़ी और झटके से डोर खोला. सामने पोस्टमैन था.
कविता : (झल्ला कर) क्या है. क्यों इतनी बार बार घंटी बजाए जा रहे हो???
पोस्टमैन : अरे मैईडम(मैडम) अपना डाक तो ले लीजिये. कब से बजा रहे है. कोई खोल है नही रहा था.
कविता : लाइए. दीजिये.
कविता ने डाक ली. और खोल के देखा तो LIC की किस्त भारी. उसकी रसीद थी. जो पोस्ट के जरिये आई थी.
पोस्टमैन भी एटीट्यूड दिखाते कविता को देखते चले गया. कविता ने जैसे ही डोर क्लोज किया. उसी वक्त लैंडलाइन फोन पर घंटी बजी. कविता एकदम चहक कर फोन की तरफ भागी. और लपक कर फोन उठा लिया.
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???
कविता और वीर की शादी को 8 साल हो गए थे. दोनों की मुलाक़ात ट्रैन मे हुई थी. दोनों मे कुछ ऐसी केमिस्ट्री बैठी की बात शादी तक पहोच गई. वैसे शादी तो लवमैरिज थी. पर कई जुगाड़ लगाने के बाद उसे अरेंज मैरिज मे तब्दील किया गया. शादी की पहेली रात मे ही दोनों ने एक दूसरे को अपना कोमर्य सौंपा.
और एक ही साल मे बेटे आरव ने जन्म ले लिया. जी हा. कविता और वीर की एक लौती औलाद आरव पांडे. कविता के पिता दायशंकर शुक्ला PWD मे कार्यरत अब रिटायर होने की कगार पर थे. माँ सरिता सुल्ला ग्रुहिणी थी.
कविता की माँ सरिता शुक्ला थोड़े पुराने खयालात की थी. बेटी बहु को अनुसासन मे रखना उन्हें ज्यादा पसंद था. बेटा कोई था नही तो बहु भी नही. पर बेटी कविता कभी उसके काबू मे नही आई. वह अपने चंचल चित्तवन से उड़ती ही रही. वही वीर की माँ उर्मिला उसके बचपन मे ही चल बसी थी. वही पिता सतेंदर पांडे की मृत्यु कुछ 6 साल पहले हुई थी. कविता बार बार टेलीफोन को इसी लिए ताक रही थी. क्यों की जनाब वीर छुट्टी के लिए निकल चुके थे.
कविता ने वीर को सख्त हिदायत दी थी की वो कहा पहोचे. पल पल रिपोर्ट देते रहे. ट्रैन मे रात मोबाइल की बैटरी कम होने की वजह से वीर ने आखरी कॉल बीती रात 9 बजे किया था. बाद मे फोन स्विच ऑफ कर दिया. पर सुबह 11बजे के आस पास वीर अपने स्टेशन पर उतर गया. घर आने के लिए वीर बस मे बैठ गया.
रस्ता कुछ एक डेढ़ घंटा लम्बा था. एक फौजी जब घर आता है. तब उसके जज्बात अलग ही होते है. दिल मे बेचैनी और घर पहोचने का उतावलापन. बस मे बैठे वीर को भी यही सब महसूस हो रहा था. चुप चाप बैठे वीर को अलग अलग रंगीन खयाल आ रहे थे. बैठे बैठे वो मुस्कुरा रहा था.
वीर से रहा नही गया. और जेब से अपना कीपैड वाला मोबाइल निकाला और स्विच ऑन कर फोन लगा देता है. बस दो बार ही घंटी बजी. और तुरंत कविता ने फोन उठा लिया.
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???
वीर : अरे यार अभी एक घंटा लगेगा. बस अभी ही चला है (भोजपुरी टोन)
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हमरे लिए एक ठो काला कुत्ता लिए हो ना. (ब्लैक डॉग विस्की)
वीर : अरे यार का तुम भी. हा लिए है.
कविता : अरे कमाल करते हो पांडेजी. तुमहाई तो बोले थे. एक बार हम दुनो साथ मिलकर पिएंगे. अब कहे फट रहा है. यहा नही. आपन ससुराल मा चलिहो. उहा रंग जमाएंगे दुनो.
वीर : अरे बाप रे. उहा तो हरगिज नही.
कविता : हम पूछ नही रहे. बता रहे है. अब चुप रहिये. कविता शुक्ला है हम.
वीर : अब पांडे भी.
कविता : हा मतलब कविता शुक्ला पांडे अब.
वीर ससुराल मे कोई भी प्लान बनाने से इस लिए घबरा रहा था. क्यों की कुछ दो साल पहले कविता के मायके वीर के ससुराल मे दोनों ने एक सेक्सुअल गेम खेला था. जिसमे कविता ने अपने ऊपर वाले कमरे मे वीर को बांध रखा था. वीर सोले फ़िल्म की बसंती की तरह सिर्फ अपने कच्चे मे बंधे हुए थे. और कविता ने कैट मास्क वाला फुल स्किन टाइट कॉस्टयूम पहना हुआ था.
कविता के हाथ एक चबूक भी थी. बडा ही जोशीला और कामुख खेल चल ही रहा था की अचानक धड़ाम से दरवाजा खुला. वीर की सास सरिता शुक्ला अंदर आ गई. और एकदम गुस्से मे झल्लाते हुए उन दोनों को देखने लगी. वो तो पहले से ही पुराने खयालात की थी.
खूब घर मे कविता और उसकी माँ के बिच हंगामा हुआ. पर तब से वीर अपने ससुराल जाने से कतराने लगे. पर बीवी के आगे कौनसे मर्द की चलती है. वीर ने बात बदल दी.
वीर : अच्छा ठीक है. आरव तो घर पर ही होगा. (स्माइल एक्साइटेड) अभी कुछ होगा की नही???
कविता समझ गई की उसका पति किस बारे मे पूछ रहा है. पति के पूछने पर तो वो भी चहक गई.
कविता : (शर्माना, स्माइल, एक्साइटेड) अभी दिन मा. आरव ईस्कूल से अभी आने वाला होगा. रात होने दीजिये पांडेजी.
वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) जानती हो कोमलजी. हमरी फौज मा एक चुटकुला बहोत फेमस है.
कविता : (स्माइल, शरारत) तो सुनाइए ना.
वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) एक बार फौजी साहब छुट्टी आए. रास्ते मे उन्हेंने कुछ सोच कर एक किलो मूम्फ़ली खरीद ली. वो घर पहोचे तो उसके दोनों बच्चे गुड्डी और मुन्ना पापा पापा करते चिमट गए. फौजीसाहब ने सारी मूम्फ़ली आंगन मे बिखेर दी.
फौजी साहब : लो बच्चो मूम्फ़ली खाओ. मगर एक बार मे सिर्फ एक ही मूम्फ़ली उठाना. वरना गाड़िया मे डंडा डाल देंगे. समझो.
बच्चे बिचारे लग गए एक एक मूम्फ़ली खाने. और फौजी साहब पहोच गए अपनी मैडम के पास. खूब खेल चला. पर मुन्ना बडा शैतान. उसने सोचा पापा कहा गए. वो खिड़की से झाकने लगा. और तुरंत पीछे मुड़कर गुड्डी के पास आया.
मुन्ना : गुड्डी गुड्डी... एक एक उठा. अम्मा ने सायद दो मूम्फ़ली उठाई होंगी. देख पापा कैसे गाड़िया मे डंडा डाल रहे है.
वीर के चुटकुले पर कविता जोरो से खिल खिलाकर हसने लगी. पर मज़ाक मस्ती मे कविता कौनसी पीछे थी.
कविता : (स्माइल, शरारत ) तब तो आप भी मूम्फ़ली ले लीजिये. हम तो दो मूम्फ़ली उठाने वाले है.
वीर कविता के मजाकिया जवाब से एकदम गदगदा गया. की तभि फोन डिस होकर स्विचॉफ हो गया. बेचारे वीर का बहोत जबरदस्त मूड बना था. पर मोबाइल मे बैटरी खतम हो गई. कविता की हसीं रुक ही नही रही थी. फोन कट चूका था. अब उसे पति की याद ज्यादा सताने लगी. वो सोचने लगी की पति के बिना इतना लम्बा वक्त कैसे कटा. सिर्फ पति की यादो के सहारे.
वो साथ बिताए पल. वो किस्से जिनहे याद आते ही चहेरे पर अपने आप स्माइल आ जाती. ऐसे ही कविता हस्ते हुए खामोश हुई. और उन बीते पलों को याद करने लगी. कैसे कविता के साथ रह रह कर वीर भी शरारती हो गया. जब आरव बोलना सिख गया था. वो थोड़ा तुतलाकर बोलता था. जैसे आम बच्चे बोलते है.
कविता किचन से बाप बेटे की बाते सुन रही थी. वीर भी जान बुचकर कविता सुने वैसे बेटे से कुछ ना कुछ बुलवा रहा था.
वीर : सबसे अच्छे पापा किसके है.
आरव : मेले....
वीर : सबसे अच्छा बेटा कौन है??
आराम : मै......
वीर : सबसे सुंदर मम्मी किस की है???
यह सुनते कविता किचन से बहार आई. और अपनी कमर पर हाथ रखे मुस्कुराते बाप बेटों को देखने लगी.
आरव : मेली......
वीर : (शरारत, स्माइल) बड़े दूध वाली मम्मी किसकी है???
बच्चे को क्या पता. उसने तुरंत लम्बी आवाज मे बोला.
आरव : मेली......
आरव का बोलना और कविता का आगे बढ़ना. और उसी वक्त वीर का सीधा वहां से खिसकना. कविता वीर को पकड़ने भागने लगी. यह किस्सा याद आते कविता अकेले अकेले ही खिल खिलाकर जोरो से हसने लगी. तभि डोरबैल बजी. कविता को लगा की सायद वीर पहोच चूका है. और उसे सप्राइस देने वाला है.
वो झट से डोर की तरफ बढ़ी. और डोर खोला तो सामने उसका बेटा आरव खड़ा था. आरव स्कूल ड्रेस पहने हुए. उसकी निक्कर तो घुटने को भी पार कर रही थी. और छोटासा आरव अपनी माँ को गुस्से से घूरने लगा. गुस्से से उसके नाक के नाथूने फूल रहे थे. ऐसे नादान रूप मे वो बहोत प्यारा लग रहा था.
कविता : अंदर आओ. बहार कहे खड़े हो बे.
आरव : (गुस्सा) दहेज़ चाहि तुका. फोरबिलर( फोर व्हीलर) गाड़ी. लालची हो तुम. लालची.
बोल कर आरव अपनी माँ के हाथ के निचे से ही अंदर आ गया. अपने बेटे के प्यारे नाटक को देख कर कविता को हसीं आने लगी. दरसल आरव ने अपनी क्लास टीचर को ही प्रपोज़ कर दिया. और सीधा सादी के लिए पूछ लिया. उसकी क्लास टीचर आरती कविता की बहोत अच्छी दोस्त बन गई थी. अपनी सहेली के बेटे की ऐसी प्यारी हरकत देख कर आरती को गुस्सा नही आया.
बल्की उसे और ज्यादा प्यार आने लगा. आरती ने भी आरव से कहे दिया की पहले अपनी माँ से पूछ ले की वो मुझे अपने घर की बहु बनाएगी?? फिर क्या था. आरव ने अपनी मम्मी कविता से भी जिद्द की के वो अपनी बहु को देखने स्कूल आए. जब कविता को पता चला की उसके बेटे ने उसकी बेस्टफ्रेंड को ही प्रपोज़ कर दिया तो वो बहोत हसीं. और आरव के साथ उसके स्कूल चल दी.
आरती और कविता दोनों मिले. और आरव के सामने एक नया नाटक किया.
कविता : अच्छा.. तो तुम मेरी बहु बनोगी. पर मेरा तो एक ही बेटा है. मै तो दहेज़ लुंगी. एक फोर व्हीलर कार, घर का सारा सामान और 11 लाख नकद.
आरती एक्टिंग करती हुई मुँह लटका लेती है.
आरती : माफ करना... हम बहोत गरीब है. यह सब हम नही दे पाएंगे.
कविता : हम्म्म्म फिर तो मुश्किल है. यह रिस्ता नही हो सकता.
कविता के बोलते ही आरव गुस्से से अपना पाऊ पटकते हुए स्कूल के अंदर चले गया. उसके जाते ही कविता और आरती बहोत हसे. फिर आरती ने कविता से भी बहोत मज़ाक किया.
आरती : चलो बाप ने नही तो बेटे ने तो प्रपोज़ किया. उफ्फ्फ्फ़.
कविता : (स्माइल ) चुप कर साली. जब देखो मेरे पति पर लाइन मरती रहती है. गंडिया फाड़ देंगे हम कह रहे है.
आरती : (स्माइल) अरे तुह से नही. हम तो आपन जीजू से फाड़वाएंगे अपनी गंडिया. का चिक्कन जीजू है हमरे.
कविता हस्ते हुए आरती को दबोचने लगी. ऐसे दोनों मे हसीं मज़ाक हुआ. वही कविता ने डोर क्लोज किया और आरव के सामने खड़ी हो गई.
कविता : इ मुँह काहे फुलाए हुए हो बे. जाओ... जाकर हाथ गॉड धोकर खाना खा लो.
आरव : (गुस्सा) आने दो हमरे बाबा को. तोहर उहि देखिहे.
कविता : जा बे. आपन बाप का धमकी किसी और को देना.
आरव गुस्से से दूसरे रूम मे चले गया. और बहोत जोर से दरवाजा पटक कर बंद कर देता है. कविता उसे देख कर मुस्कुरा रही थी. कुछ मिनट बाद उसके रूम से स्पीकर साउंड की आवाज आई. और गाना बज रहा था. जब दिल ही टूट गया. हम जी के क्या करें.
कविता ने जब गाने के बोल सुने तो वो अकेले अकेले बहोत जोरो से हसीं. कविता ने वीर के लिए बहोत तैयारी कर रखी थी. पर अब उसके पास बस एक ही काम बचा था. इंतजार करना. वो सोच रही थी की कब डोरबैल बजे. और वो झट से दरवाजा खोले. पर अब उस से बर्दास नही हो रहा था. वो खुद ही डोर ओपन कर के देखने लगी.
घर के सामने रोड पर चहल पहल थी. पर वीर नही दिख रहा था. तभि ऑटो रीक्षा घर के पास रुकी. और अंदर से वीर निकला. कविता की आँखों मे चमक आ गई. वो एक बेग टांगे और एक बेग ऑटो से उतरते दिखा. सायद दो दिन के रास्ते मे वीर ने शेव नही की होंगी.
इसी लिए हलकी काली दाढ़ी जैसे नजर लगने से बचा रही हो. ऑटो का रवाना होना. और वीर का कविता की तरफ देख कर मुस्कुराना. पर तभि आरव की लम्बी चीख.
आरव : बाबा........
कविता तो डोर पर ही थी. पर कब आरव वहा आया. कविता को पता ही नही चला. कविता और वीर दोनों ने आपस मे अपने अपने मन मे यह प्लान बना लिया था की बेटे के देखने से पहले दोनों एक जबरदस्त झप्पी और पप्पी. मतलब की किश कर लेंगे. क्यों की आरव के आने के बाद वो सब रात को ही मिल पाएगा.
लेकिन आरव ने सब चौपट कर दिया. वो पहले ही भाग कर अपने बाप की बाहो मे पहोच गया. वीर भी अपने बेटे से मिलकर बहोत खुश हुआ. अपने बेटे को गोद मे लिए वीर कविता को देखता है. कविता और वीर दोनों की आँखों मे एक अजीब सी प्यास थी.
जैसे अब भी प्यास बाकि है. मिल तो गए. पर मिलन अब भी बाकि है. वीर के करीब आते ही तुरंत कविता ने उसके पाऊ छुए. घर के अंदर जाते ही डोर क्लोज.
कविता : (स्माइल, प्यास ) मै आप के लिए चाय बनती हु.
कविता का बोलना एकदम धीमी आवाज. जैसे इरादा छुपा रही हो. अपनी प्यास अपना प्यार जताने से खुद को रोक रही हो. बस नजरों से नजरों ने ही एक दूसरे को भाप लिया. वो किचन मे अंदर गई. वीर अपने बेटे को लेकर सोफे पर बैठा. आरव ने शिकायत का पोटला खोलना शुरू किया.
आरव : बाबा आप चले गए. पर कविता ने मुझे बहोत तंग किया.
जिस तरह कविता अपने पिता को कभी उनके टाइटल से तो कभी नाम से बुलाती. वैसे ही आरव भी अपनी माँ को नाम से पुकरता. पर यह बत्तमीजी नही दोस्ताना व्यवहार था.
वीर : अच्छा... क्या तंग किया आप को???
आरव : बाबा कविता हेना (सोचते हुए ) मेरा होमवर्क नही करके देती. और मुझे कार्टून भी नही देखने दी. और जबरदस्ती रोज टूसन(ट्यूशन) भेजी है यह. चाकलेट(चॉकलेट) तो हमको भुला ही दी है.
तभि कविता वीर के लिए पानी लेकर आई.
कविता : अच्छा बचवा. हमारी शिकायत कर रहे हो. टांगे तोड़ दूंगी तुम्हरी.
वीर : अच्छा... तुम मेरे आरव की टांगे तोड़ोगी. हटना आरव बेटा. इस कविता की बच्ची को तो मै देखता हु.
आरव साइड हटा. उसे अब मझा आने लगा. की अब बाप उसका बदला लेगा.
आरव : अब पता चलेगा.....
कविता अपने पति की चाल समझ गई. वो खड़ी खड़ी मंद मंद मुस्कुराने लगी. वीर खड़ा हुआ और कविता का हाथ पकड़ कर दूसरे रूम मे लेजाने लगा. पर अब आरव को ही डर लगने लगा. अब उसकी मम्मी की पिटाई होने वाली है. जैसे ही डोर बंद हुआ. आरव डोर नॉक करने लगा.
आरव : अरे रहे दा बाबा. अरे हमरी मम्मी है. बाबा.... बाबा..
पर अब क्या फायदा. उसके पापा उसकी मम्मी को दूसरे रूम मे ले गए. ऐसा पहले भी हो चूका था. कविता रूम से आआ आआ की आवाज करती. और बाद मे रोने की तथा उस से रूठ जाने की एक्टिंग करती. आरव गिल्टी फील करने लगा.
कविता और वीर को तो प्यार करना था. और उन्होंने तगड़ा बहाना बनाया. बेटा बेचारा समझ रहा था की उसकी माँ की पिटाई हो रही है. पर अंदर से तो मम्मी के बदले पापा की आवाज आ रही थी.
वीर : (एक्टिंग) आआ... अरे नहीं कविता. अच्छा अच्छा अब आरव हमारा खुद ही होमवर्क करेगा... आआआ... हा हा दूध भी रोज पिएगा.... अरे हा बाबा हा.... कार्टून नहीं देखेगा. पढ़ाई करेगा.
आरव टेंसन मे आ गया. वो सोचने लगा. बाप तो माँ को पीटने वाला था. वह तो खुद पिट रहा है. लगता है माँ मे ज्यादा ताकत है. वह खुद कबूल करने लगा.
आरव : एए माँ. हा हा सब करेंगे. अब छोड़ मेरे बाबा को.
अंदर से आवाज आई.
कविता : पक्का?? फिर बाद मे मत बोलना.
आरव : अरे हा बाबा हा. अब छोड़ मेरे बाबा को.
कविता : (स्माइल शरारत ) ठीक है ठीक है. अब जाओ. हमरे लिए एक ग्लास पानी लाओ.
आरव बेचारा चुप चाप पानी लेने चले गया. कविता और वीर ने अपने आप को दुरुस्त किया. वीर उस रूम से पहले निकला. और कविता बाद मे. दोनों ने आरव ना बिगड़े इसी लिए ऐसा नाटक किया. जब कविता रूम से निकली. उसी वक्त आरव पानी का ग्लास लेकर पहोंचा. आरव ने देखा. उसकी माँ के होठो पर लाल लाल निशान है. पुरे लिप्स बिगड़े हुए है. दरसल वो लिपस्टिक कविता के होठो पर फेल गई थी. पर आरव उसे खून समझ रहा था. सोचने लगा की माँ ने बाप को बहोत जोरो से काटा होगा.
आरव : (गुस्सा ) हमरे बाबा का खून पी गई. खुनी खुनी हो तुम.
कविता को इतनी जोर से हसीं आई की वो अपने आप को रोक नही पाई. जिस से आरव और ज्यादा चिड गया. वो गुस्से मे अपने बाप के पास जाकर खड़ा हो गया. दोनों हाथ कमर पर और घूरते हुए हाफ पैंट मे आरव बहोत प्यारा लग रहा था. जैसे उसने अपने बाप की चोरी पकड़ ली हो.
आरव : (गुस्सा) पिटा गए. बहुत शेर बन रहे थे. अब रोज हमरे हिस्से का दूध तुम पिओगे.
वीर बेचारा अपनी मुस्कान छुपाए दए बाए देख रहा था. जैसे उसे शर्म आ रही हो. जब आरव ने दूध का बोला तो वीर ने सीधा सामने खड़ी अपनी पत्नी के जोबन की तरफ देखा. तभि फोन की घंटी बजी.
कविता : (आरव से ) नही... अब तुम दोनों बाप बेटों को रोज डबल दूध पीना पड़ेगा. अब जाओ जाकर फोन उठाओ.
आरव फोन तक जाते जाते गुस्से से अपने बाप को देखता है.
आरव : (गुस्सा ) अब तुम्हरे चक्कर मा हमे दुइ(2) गिलास(ग्लास) पीना पड़ेगा. हम्म्म्म
वीर और कविता मंद मंद मुस्कुराते. उन्हें अब भी बहोत हसीं आ रही थी. वो जाकर फोन उठाता है.
आरव : हेलो...... हा प्रणाम बुआ जी.
कविता एकदम तेजी से फोन तक पहोच कर लपक लेती है. कही अपनी ननंद बबिता के सामने आरव घर की पोल ना खोल दे. क्यों की कहानी कुछ भी बन जाती है. वीरू से 4 साल छोटी बबिता की शादी वीरू की शादी के 5 साल बाद ही हो गई थी. वीरू की उम्र के सूरज मिश्रा के साथ. जो रहने वाले तो गोरखपुर के थे. पर वह लखनऊ मे सिफ्ट हो चूके थे. सूरज लखनऊ पुलिस दरोगा थे.
कविता : (स्माइल, शरारत) हा ननंद रानी. का नन्दोईजी तुहार पेट फुलाई दिये का. जो आ नही रही हो.
कविता : (स्माइल) अच्छा भैया तुम्हारे. हा हा आ गए है. तभि.... कोई बात नही. आइये आइये. हम तो तुहार कुछ लागत नइखे. आवा आवा.
आरव और वीर दोनों बस कविता को ही देख रहे थे. उन्हें बबिता की आवाज नही सुनाई दे रही थी. कविता और बबिता दोनों ननद भौजाई दोनों आपस मे सहेलियां की तरह रहते थे. दोनों मे बहोत प्यार था. और दोनों ही एक दूसरे से हसीं मज़ाक करते रहते.
कविता : (स्माइल) अरे भैया से मिलने के लिए ही सही. आओ तो.
कविता : (स्माइल) अच्छा ओके ओके.
कविता ने फोन रख दिया. और वीर की तरफ देखा.
कविता : (स्माइल, शरतत) ननद नन्दोईजी आ रहे है. मै तैयारी कर लेती हु.
कविता किचन मे चली गई. वीर आरव के साथ खेलता रहा. कुछ एक घंटे बाद डोरबैल बजी. और आरव ने भाग कर डोर खोला.
आरव : (स्माइल एक्साइटेड) बुआ.....
आवाज सुनकर कविता भाग कर आई. ननंद और नन्दोई का खूब स्वागत हुआ. और सारे हॉल मे ही जमा हो गए.
बबिता : भैया मै आरव को कुछ दिन लेजाऊ??? उसके बिना मेरा मन नही लग रहा???
बबिता अक्सर आरव को सैटरडे संडे अपने घर लेजाती. पर कुछ हफ्तों से वो आ नही पा रही थी. क्यों की आरव की परीक्षा थी. पर कविता ने कुछ और प्लान बना रखा था.
कविता : पर कल तो हम उसके नाना के यहा जा रहे है. बहोत टाइम हो गया पापा से मिले.
तभि कविता और वीर का भांडा फूटने वाला था.
आरव : अरे बुआ..... पापा से काहे पूछ रहे हो. मम्मी से पूछा.
बबिता समझ गई. जरूर दाल मे कुछ काला है. उसने देखा कविता के चहेरे पर स्माइल के साथ थोड़ी शर्म और शरारत है. वो तुरंत कविता को बाहो मे जकड़ लेती है.
बबिता : (स्माइल, शरारत) अरे रुका भौजी. ऐसे कैसे....
ननंद के जैसे नन्दोई सूरज भी मज़ाक मस्ती मे खुद आगे थे. वो आगे बढ़कर आरव को गोदी मे उठा लेते है.
सूरज : (स्माइल) वो क्यों बेटा.
कविता ज्यादा शर्माने लगी. वीर मुस्कुराते हुए अपने माथे पर हाथ रख देता है. और आरव ने भांडा फोडा.
आरव : अरे फूफाजी.... बाबा की चलती कहा है आज के तो कविता ने बाबा को खूब पीटा है.
सभी हसने लगे.
बबिता : (स्माइल, शरारत) बहुत जोर के पिटाई की होंगी तेरी अम्मा ना???
आरव भी समझ से अनजान. वो भी मिर्च मसाला भर के बता रहा था.
आरव : अरे...... बहुत जोर के. बाबा का तो आवाजे नही निकाल पा रहा था. सांस फुले रही. पर कविता के तो बिलकुल कोई दया भाव नाही.
सारे और ज्यादा जोर से हसे. कविता की तो हालत ही खराब हो गई. ननंद नन्दोई के सामने. सूरज ने भी अपने सीधे सादे साले वीर की खूब खिचाई की. सबने खाना खाया. और हस्ते खेलते काफ़ी वक्त साथ बिताया. आरव अपनी नानी को पसंद नही करता था.
उसे अपनी बुआ से बहोत प्यार था. इसी लिए उसने जिद्द की और वो बबिता और सूरज के साथ दो दिन के लिए चले गया. उनके जाते माहौल एक बार फिर रंगीन हो गया. उन्हें तो बस मौका ही चाहिये था. अब तो दोनो ही घर मे अकेले थे. पर इस बार कविता ने खुद मानो कामदेवी का रूप धारण कर लिया हो.
जब तक डोर बंद ना हुआ तब तक कोई जल्दबाज़ी नही. अपनी नन्द के प्यारे मिठे तनो को सुनती रही. पर जैसे वो गई. उसने डोर क्लोज किया. एकदम झटके से पलटी.
कविता : (स्माइल, शरारत) अच्छा... गुनाह तुहु करा. और सजा हमका. अबके तोहे नाही छोड़ब.
पिछली बार पहल वीर ने की. तो इस बार कविता ने मानो अटैक ही कर दिया. वीर सोफे पर बैठा वो भी डोर बंद होने का इंतजार कर रहा था. पर कविता तो डोर बंद करते उसपर हमला ही बोल दी. भाग कर वीर पर कूद गई. सीधा उसकी गोदी मे. वीर के चहेरे को दोनों हाथो से थाम होठो से होंठ जोड़ दिए. जैसे चुम्बन से ही जीत हार का फैसला होगा. शादी के बाद दोनों मे ही काफ़ी बदलाव आया था.
वीर शादी के वक्त और ज्यादा बलिस्ट हो गया था. हाइट बॉडी दोनों ही और ज्यादा बढ़ गई. चहेरा भरावदार हुआ तो और ज्यादा स्मार्ट हैंडसम हो गया था. वही कविता किशोरी से सम्पूर्ण नारी बन चुकी थी. जोबन भारी हो चूका था. कविता तो पहले से सुंदर थी. अब और ज्यादा निखार आ चूका था. दोनों मे पहले से ज्यादा बडा दंगल हुआ.
इस बार बैडरूम तक जाने का दोनों मे से किसी को मौका नही मिला. शरीर की गर्माहट ने बड़ी तपस का रूप ले लिया. पर तूफान थम जाता है. वो भी थम गए. दोनों एक दूसरे की बाहो मे. नग्न शरीर दोनों सोफे पर ही एक दूसरे को जकड़े हुए. कविता इस बार भी ऊपर थी. जो की हर बीवी टॉप पर ही होती है. माहौल कुछ पल शांत हुआ.
वीरू : एकठो बात बोले.
कविता : अरे एक का सौ बोला. हम सुन रहे है.
वीर : पता है.... जब किसी जोड़े का शादी होता है. वो सुहागरात मानते है.
कविता : हा हमरा भी हुआ था. भूल गए. हम तुमको अपना भरजीनीटी(virginity) दिए थे.
वीर : अरे उ तो हम भी दिए थे. बात ऊ नाही है. बात यह है की एक फौजी हर साल जब भी छुट्टी आता है. हर बार सुहागरात मनाता है.
कविता वीरू की छाती पर सर टिकाए हुए थी. वो सर ऊपर उठाकर वीरू की आँखों मे देखती है.
कविता : बिलकुल सही कहे हो. हमे कोई फूल माला ग़द्दा बिछोने का जरुरत नाही. बस हम एक दूसरे से मिल जाए. हर बार पहले मिलन का एहसास. सही कहे ना???
वीर : (स्माइल) बिलकुल. अरे समजदार हो. तभि तो हमे मिली हो.
कविता : (स्माइल) अरे कविता शुक्ला नाम है हमरा.
वीर : पांडे.
कविता : हा मतलब अब कविता शुक्ला पांडे. पर इ बाल बहोत चुबता है. दाढ़ी कहे नही बनाए.
वीर : अरे दो दिन रास्ते मा. अब कहे बनाए.
कविता : तब का ससुराल ऐसे जाओगे. कोनो साली देखेगा तो का कहेगा. अब हम बनाएँगे तुम्हे चिक्कन. कहा है तुम्हरा रेजर??
वीर हसने लगा.
वीर : (स्माइल) हमरे बेगमा है. सेविंग किट. जाओ ले आओ.
दोनों पूरी तरह से नग्न थे. कविता वीर के बैग से सेविंग किट ले आई और वीरू के सामने खड़ी हो गई. पत्नी देवी एक बार फिर साक्षात काम देवी का रूप ले चुकी थी. पास मे आधा ग्लास पानी पड़ा ही हुआ था. उसी से वीरू का चहेरा गिला किया. और ब्रश की बजाय अपने हाथो से ही मलके क्रीम लगाई. फिर रेजर उठाया.
वीरू : अरे देखना. लग ना जाए.
कविता : (स्माइल, शरारत) अरे बाबू तुम्हरी गोद मा बैठ कर बनाएँगे. कहे घबरा रहे हो.
वीरू बस हँसा. कविता वैसी ही पोजीशन मे वीरू की गोद मे बैठ गई. कविता चहेरे के करीब बड़े प्यार से रेजर चलाती है. पर थोड़ा फिसल रही थी.
वीरू : (स्माइल) अरे फिसल रही हो. जब तक खुटे से गईया बंधेगी नहीं. एक जगह टिकेगी नहीं
मतलब आप समझ ही गए होंगे. कविता वैसे ही सावर हो गई. दोनों को मौसम बनाते टाइम कहा लगता है.
कविता : ससससस ला. ई ला त.
कविता सरक तो अब भी रही थी. पर अब ऊपर खिसकने मे मझा ज्यादा आ रहा था. धीरे धीरे पूरी शेविंग हो गई.
कविता : (स्माइल,शरारत) अब बने हो. एकदम चिक्कन.
दोनों ने अधूरा काम तीसरी बार पूरा किया. रात दोनों ने साथ बिताई. और सुबह होते जल्द ही बस पकड़ ली. कविता के मायके और वीर के ससुराल के लिए. कुछ दो तीन घंटे का सफर था. सुबह 8 बजे तक दोनों कविता के मायके पहोच गए. वैसे तो कविता का मायका इलाहबाद के बाहरी हिस्से मे था. हाइवे से उतारकर कविता के मायके जाने वाले रास्ते के इर्द गिर्द सुबह 10 बजे तक सब्जी मंडी लगती. वीर और कविता बस से उतारकर उसी रास्ते पर चल दिये.
कविता बस थोड़ासा आगे चल रही थी. उसके हाथमे शूटकेस था. वही वीर पीछे उसके पास भारी बेग था. वीर ने देखा की एक दो ठेले से दो तीन बुढ़िया अपना ठेला छोड़ कविता की तरफ तेजी से आई. और कविता को इर्द गिर्द घेरकर नाचने लगी. जैसे कविता को ताना मार रही हो.
बुढ़िया 1 : हम्म्म्म पहले बड़ी कुदत रही. बडा फुदकती थी. अब का हुआ. कहे एकदमे शांत हो गई.
वीर ने देखा की कविता मुस्कुराती एकदम शांत निचे देखते हुए धीरे धीरे चल रही थी. वीरू को यह समझ आ गया की कविता सब की पहले भी फेवरेट थी. वो दो तीन बुढ़िया कविता के मजे लेती रही.
बुढ़िया 2 : (स्माइल) अरे गईया अब खुटे से जो बंध गई. अब देखो. कैसे शर्मा रही है.
बोलते हुए उस बुढ़िया ने कविता की थोड़ी पकड़ ली. कविता ने धीरे से कहा. वो पीछे है. तो वो तीन बुढ़िया पहले वीर को देखती है. उनके देखने से ही वीर को अंदाजा लग गया की उनकी नजरें थोड़ी कमजोर है. वो तीनो बुढ़िया मुस्कुराई और वीर के पास आई.
बुढ़िया 3 : वह बडा सुंदर है. नजर ना लगे हमरी.
वो तीनो बुढ़िया वीर की नजर उतरने लगी. कविता घूम कर उनकी तरफ देखती है. वीर ने भी गरीबसी दिखने वाली तीनो बुढ़िया के पाऊ छुए. यह कविता के लिए दिल जीत लेने वाला नजारा था. तभि मोटरसाइकिल की आवाजे आई. बुढ़िया और कविता ने उस तरफ देखा. दो मोटरसाइकिल पर 4 लड़के रेस दे देकर सब को परेशान कर रहे थे. तभि एक लड़के की नजर कविता पर गई.
लड़का : अबे झांसी की रानी. भाग भाग.
उन लड़को ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल घुमा ली. कविता अपना सूटकेस वही सडक पर छोड़ दो तीन कदम आगे आई. और जैसे धमकी देने लगी.
कविता : अबे कविता शुक्ला नाम है हमारा.
तभि कविता को याद आया की उसका पति पीछे है. वो घूम कर देखती है. वीर बस मुस्कुरा रहा था. कविता हाथ हिलाते हुए बाकि लाइन बोलती है.
कविता : और पांडे भी. (स्माइल) साले स्कूल मा हमरे जूनियर थे. फालतू मे यहां बदमासी करते है.
वीर को बड़ी जोर से हसीं आई. कविता शर्मा गई. कुछ बोली नहीं. बस सूटकेस उठकार तेजी से चलने लगी. वीरू समझ गया की कविता का आतंक स्कूल मे भी रहा होगा. वो लड़के मंडी मे सबको परेशान करते होंगे. और कविता से डरते होंगे. कुछ दूर चलते रोड पर गेट आया. जिसपर वीर के ससुर के नाम की नेमप्लेट लगी हुई थी. दयाशंकर शुक्ल PWD. वो दोनों गेट से अंदर घुसे. और कविता ने आवाज लगाई.
कविता : एएए दायशंकर. अबे कहा हो बे.
वीर जानता था की कविता अपने बाप को कभी शुक्ला तो कभी उनके नाम से बुलाती. दोनों बाप बेटी दोस्त की तरह रहते थे. दयाशंकर को पता था की बेटी और दामाद आ रहे है. इस लिए उन्होंने छुट्टी ले ली थी. वो आए. कविता और दायशंकर दोस्त की तरह ही मिले.
वही वीर ने अपने ससुर और सास का आशीर्वाद लिया. उसकी सास कविता की माँ को पहले की तरह ही कविता का रवैया पसंद नहीं आया. और वो कविता को डांटाती गई. पर कविता नजर अंदाज़ करती गई. वीर के भारी बैग से सब के लिए तोफे थे. जो दे दिए गए. दिन बहोत अच्छा गया. पर कविता को तो शाम का इंतजार था. वही वीरू शाम के लिए ही डर रहा था.
एक बार तो वो शर्मिंदा हो चूका था. अब कोई नया कांड ना हो जाए उसका डर था. कविता के मायके ऊपर टेरेस पर एक रूम बना हुआ था. जिसमे कविता और वीर दोनों को रुकना था. और कविता ने वही खुले आष्मान के निचे ही प्रोग्राम करने का सोचा था.
शाम हुई और धीरे धीरे रात. कविता की माँ सरिता देवी ने कविता और दामाद को भोजन करने पुकारा. पर कविता ने मना कर दिया. और कहा की उन्हें लेट खाने की आदत है. वीरू बेचारा कविता को घूर के देखता है. और सोचता है की यह इस कांड का बिल भी उसके सर ही फाड़ने वाली है. अगर सब शांति से ना हुआ तो.
वैसे कविता ने कभी ड्रिंक नहीं किया था. उसका पहेली बार था. वीर सोच रहा था की अगर बड़बोली कविता को चढ़ गई तो क्या होगा. वो पहले से ही बड़बोली है. पिने के बाद क्या क्या करेंगी. वही कविता बहोत एक्साईटेड थी. वो दोनों ऊपर वाले रूम मे थे.
कविता : (स्माइल एक्साइटेड) एए... निकालो ना काला कुत्ता.
कविता ब्लैकडॉग दारू की बोतल निकालने को कहे रही थी. और वीर का डर बढ़ने लगा. क्यों की बीवी मान ने वाली तो थी नहीं.
वीर : अरे का बोतल से मुँह लगाकर सीधा पिओगी का. गिलास(ग्लास) वगेरा कुछ तो नहीं है.
कविता सिर्फ शरारत से मुस्कुराई. और उसने उसी रूम से ग्लास का पूरा सेट निकाला. जिसमे पुरे 6 ग्लास थे. इतना ही नहीं 3 बाउल निकले. एक मे भुने काजू बादाम, दूसरे मे भुने चने और तीसरे मे सलाद था.
कविता : (स्माइल, शरारत) का बुडबक समझे हो का. अब चला बहार.
कविता सब सामान लेकर रूम से बहार टेरेस पर आ गई. वीरू बेचारा बोतल लेकर बहार आया. पर बहार का नजारा बहोत अच्छा था. आष्मान साफ था. तारे टीम टीमा रहे थे. बहोत बढ़िया हवा चल रही थी. वीर टेरिस के किनारे आया. और दीवार पर हाथ रखते निचे देखा. उसके ससुर दायशंकर घर के बहार छोटे से गार्डन मे चेयर डालकर बैठे थे.
कविता : अरे इहा आवा ना. उहा क्या कर रहे हो.
कविता : (एक्साइड) हेलो... कहा पहोचे???
पर सामने से कोई रिप्लाई नही. फिर भी बैल की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी. कविता ने डोर की तरफ देखा. तब जाकर खयाल आया की यह तो घर के डोरबैल की आवाज है. कविता को जैसे गुस्सा आ रहा हो. वो तेज़ी से डोर की तरफ बढ़ी और झटके से डोर खोला. सामने पोस्टमैन था.
कविता : (झल्ला कर) क्या है. क्यों इतनी बार बार घंटी बजाए जा रहे हो???
पोस्टमैन : अरे मैईडम(मैडम) अपना डाक तो ले लीजिये. कब से बजा रहे है. कोई खोल है नही रहा था.
कविता : लाइए. दीजिये.
कविता ने डाक ली. और खोल के देखा तो LIC की किस्त भारी. उसकी रसीद थी. जो पोस्ट के जरिये आई थी.
पोस्टमैन भी एटीट्यूड दिखाते कविता को देखते चले गया. कविता ने जैसे ही डोर क्लोज किया. उसी वक्त लैंडलाइन फोन पर घंटी बजी. कविता एकदम चहक कर फोन की तरफ भागी. और लपक कर फोन उठा लिया.
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???
कविता और वीर की शादी को 8 साल हो गए थे. दोनों की मुलाक़ात ट्रैन मे हुई थी. दोनों मे कुछ ऐसी केमिस्ट्री बैठी की बात शादी तक पहोच गई. वैसे शादी तो लवमैरिज थी. पर कई जुगाड़ लगाने के बाद उसे अरेंज मैरिज मे तब्दील किया गया. शादी की पहेली रात मे ही दोनों ने एक दूसरे को अपना कोमर्य सौंपा.
और एक ही साल मे बेटे आरव ने जन्म ले लिया. जी हा. कविता और वीर की एक लौती औलाद आरव पांडे. कविता के पिता दायशंकर शुक्ला PWD मे कार्यरत अब रिटायर होने की कगार पर थे. माँ सरिता सुल्ला ग्रुहिणी थी.
कविता की माँ सरिता शुक्ला थोड़े पुराने खयालात की थी. बेटी बहु को अनुसासन मे रखना उन्हें ज्यादा पसंद था. बेटा कोई था नही तो बहु भी नही. पर बेटी कविता कभी उसके काबू मे नही आई. वह अपने चंचल चित्तवन से उड़ती ही रही. वही वीर की माँ उर्मिला उसके बचपन मे ही चल बसी थी. वही पिता सतेंदर पांडे की मृत्यु कुछ 6 साल पहले हुई थी. कविता बार बार टेलीफोन को इसी लिए ताक रही थी. क्यों की जनाब वीर छुट्टी के लिए निकल चुके थे.
कविता ने वीर को सख्त हिदायत दी थी की वो कहा पहोचे. पल पल रिपोर्ट देते रहे. ट्रैन मे रात मोबाइल की बैटरी कम होने की वजह से वीर ने आखरी कॉल बीती रात 9 बजे किया था. बाद मे फोन स्विच ऑफ कर दिया. पर सुबह 11बजे के आस पास वीर अपने स्टेशन पर उतर गया. घर आने के लिए वीर बस मे बैठ गया.
रस्ता कुछ एक डेढ़ घंटा लम्बा था. एक फौजी जब घर आता है. तब उसके जज्बात अलग ही होते है. दिल मे बेचैनी और घर पहोचने का उतावलापन. बस मे बैठे वीर को भी यही सब महसूस हो रहा था. चुप चाप बैठे वीर को अलग अलग रंगीन खयाल आ रहे थे. बैठे बैठे वो मुस्कुरा रहा था.
वीर से रहा नही गया. और जेब से अपना कीपैड वाला मोबाइल निकाला और स्विच ऑन कर फोन लगा देता है. बस दो बार ही घंटी बजी. और तुरंत कविता ने फोन उठा लिया.
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हेलो.... कहा पहोचे???
वीर : अरे यार अभी एक घंटा लगेगा. बस अभी ही चला है (भोजपुरी टोन)
कविता : (स्माइल, एक्साइटेड) हमरे लिए एक ठो काला कुत्ता लिए हो ना. (ब्लैक डॉग विस्की)
वीर : अरे यार का तुम भी. हा लिए है.
कविता : अरे कमाल करते हो पांडेजी. तुमहाई तो बोले थे. एक बार हम दुनो साथ मिलकर पिएंगे. अब कहे फट रहा है. यहा नही. आपन ससुराल मा चलिहो. उहा रंग जमाएंगे दुनो.
वीर : अरे बाप रे. उहा तो हरगिज नही.
कविता : हम पूछ नही रहे. बता रहे है. अब चुप रहिये. कविता शुक्ला है हम.
वीर : अब पांडे भी.
कविता : हा मतलब कविता शुक्ला पांडे अब.
वीर ससुराल मे कोई भी प्लान बनाने से इस लिए घबरा रहा था. क्यों की कुछ दो साल पहले कविता के मायके वीर के ससुराल मे दोनों ने एक सेक्सुअल गेम खेला था. जिसमे कविता ने अपने ऊपर वाले कमरे मे वीर को बांध रखा था. वीर सोले फ़िल्म की बसंती की तरह सिर्फ अपने कच्चे मे बंधे हुए थे. और कविता ने कैट मास्क वाला फुल स्किन टाइट कॉस्टयूम पहना हुआ था.
कविता के हाथ एक चबूक भी थी. बडा ही जोशीला और कामुख खेल चल ही रहा था की अचानक धड़ाम से दरवाजा खुला. वीर की सास सरिता शुक्ला अंदर आ गई. और एकदम गुस्से मे झल्लाते हुए उन दोनों को देखने लगी. वो तो पहले से ही पुराने खयालात की थी.
खूब घर मे कविता और उसकी माँ के बिच हंगामा हुआ. पर तब से वीर अपने ससुराल जाने से कतराने लगे. पर बीवी के आगे कौनसे मर्द की चलती है. वीर ने बात बदल दी.
वीर : अच्छा ठीक है. आरव तो घर पर ही होगा. (स्माइल एक्साइटेड) अभी कुछ होगा की नही???
कविता समझ गई की उसका पति किस बारे मे पूछ रहा है. पति के पूछने पर तो वो भी चहक गई.
कविता : (शर्माना, स्माइल, एक्साइटेड) अभी दिन मा. आरव ईस्कूल से अभी आने वाला होगा. रात होने दीजिये पांडेजी.
वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) जानती हो कोमलजी. हमरी फौज मा एक चुटकुला बहोत फेमस है.
कविता : (स्माइल, शरारत) तो सुनाइए ना.
वीर : (स्माइल, एक्साइटेड) एक बार फौजी साहब छुट्टी आए. रास्ते मे उन्हेंने कुछ सोच कर एक किलो मूम्फ़ली खरीद ली. वो घर पहोचे तो उसके दोनों बच्चे गुड्डी और मुन्ना पापा पापा करते चिमट गए. फौजीसाहब ने सारी मूम्फ़ली आंगन मे बिखेर दी.
फौजी साहब : लो बच्चो मूम्फ़ली खाओ. मगर एक बार मे सिर्फ एक ही मूम्फ़ली उठाना. वरना गाड़िया मे डंडा डाल देंगे. समझो.
बच्चे बिचारे लग गए एक एक मूम्फ़ली खाने. और फौजी साहब पहोच गए अपनी मैडम के पास. खूब खेल चला. पर मुन्ना बडा शैतान. उसने सोचा पापा कहा गए. वो खिड़की से झाकने लगा. और तुरंत पीछे मुड़कर गुड्डी के पास आया.
मुन्ना : गुड्डी गुड्डी... एक एक उठा. अम्मा ने सायद दो मूम्फ़ली उठाई होंगी. देख पापा कैसे गाड़िया मे डंडा डाल रहे है.
वीर के चुटकुले पर कविता जोरो से खिल खिलाकर हसने लगी. पर मज़ाक मस्ती मे कविता कौनसी पीछे थी.
कविता : (स्माइल, शरारत ) तब तो आप भी मूम्फ़ली ले लीजिये. हम तो दो मूम्फ़ली उठाने वाले है.
वीर कविता के मजाकिया जवाब से एकदम गदगदा गया. की तभि फोन डिस होकर स्विचॉफ हो गया. बेचारे वीर का बहोत जबरदस्त मूड बना था. पर मोबाइल मे बैटरी खतम हो गई. कविता की हसीं रुक ही नही रही थी. फोन कट चूका था. अब उसे पति की याद ज्यादा सताने लगी. वो सोचने लगी की पति के बिना इतना लम्बा वक्त कैसे कटा. सिर्फ पति की यादो के सहारे.
वो साथ बिताए पल. वो किस्से जिनहे याद आते ही चहेरे पर अपने आप स्माइल आ जाती. ऐसे ही कविता हस्ते हुए खामोश हुई. और उन बीते पलों को याद करने लगी. कैसे कविता के साथ रह रह कर वीर भी शरारती हो गया. जब आरव बोलना सिख गया था. वो थोड़ा तुतलाकर बोलता था. जैसे आम बच्चे बोलते है.
कविता किचन से बाप बेटे की बाते सुन रही थी. वीर भी जान बुचकर कविता सुने वैसे बेटे से कुछ ना कुछ बुलवा रहा था.
वीर : सबसे अच्छे पापा किसके है.
आरव : मेले....
वीर : सबसे अच्छा बेटा कौन है??
आराम : मै......
वीर : सबसे सुंदर मम्मी किस की है???
यह सुनते कविता किचन से बहार आई. और अपनी कमर पर हाथ रखे मुस्कुराते बाप बेटों को देखने लगी.
आरव : मेली......
वीर : (शरारत, स्माइल) बड़े दूध वाली मम्मी किसकी है???
बच्चे को क्या पता. उसने तुरंत लम्बी आवाज मे बोला.
आरव : मेली......
आरव का बोलना और कविता का आगे बढ़ना. और उसी वक्त वीर का सीधा वहां से खिसकना. कविता वीर को पकड़ने भागने लगी. यह किस्सा याद आते कविता अकेले अकेले ही खिल खिलाकर जोरो से हसने लगी. तभि डोरबैल बजी. कविता को लगा की सायद वीर पहोच चूका है. और उसे सप्राइस देने वाला है.
वो झट से डोर की तरफ बढ़ी. और डोर खोला तो सामने उसका बेटा आरव खड़ा था. आरव स्कूल ड्रेस पहने हुए. उसकी निक्कर तो घुटने को भी पार कर रही थी. और छोटासा आरव अपनी माँ को गुस्से से घूरने लगा. गुस्से से उसके नाक के नाथूने फूल रहे थे. ऐसे नादान रूप मे वो बहोत प्यारा लग रहा था.
कविता : अंदर आओ. बहार कहे खड़े हो बे.
आरव : (गुस्सा) दहेज़ चाहि तुका. फोरबिलर( फोर व्हीलर) गाड़ी. लालची हो तुम. लालची.
बोल कर आरव अपनी माँ के हाथ के निचे से ही अंदर आ गया. अपने बेटे के प्यारे नाटक को देख कर कविता को हसीं आने लगी. दरसल आरव ने अपनी क्लास टीचर को ही प्रपोज़ कर दिया. और सीधा सादी के लिए पूछ लिया. उसकी क्लास टीचर आरती कविता की बहोत अच्छी दोस्त बन गई थी. अपनी सहेली के बेटे की ऐसी प्यारी हरकत देख कर आरती को गुस्सा नही आया.
बल्की उसे और ज्यादा प्यार आने लगा. आरती ने भी आरव से कहे दिया की पहले अपनी माँ से पूछ ले की वो मुझे अपने घर की बहु बनाएगी?? फिर क्या था. आरव ने अपनी मम्मी कविता से भी जिद्द की के वो अपनी बहु को देखने स्कूल आए. जब कविता को पता चला की उसके बेटे ने उसकी बेस्टफ्रेंड को ही प्रपोज़ कर दिया तो वो बहोत हसीं. और आरव के साथ उसके स्कूल चल दी.
आरती और कविता दोनों मिले. और आरव के सामने एक नया नाटक किया.
कविता : अच्छा.. तो तुम मेरी बहु बनोगी. पर मेरा तो एक ही बेटा है. मै तो दहेज़ लुंगी. एक फोर व्हीलर कार, घर का सारा सामान और 11 लाख नकद.
आरती एक्टिंग करती हुई मुँह लटका लेती है.
आरती : माफ करना... हम बहोत गरीब है. यह सब हम नही दे पाएंगे.
कविता : हम्म्म्म फिर तो मुश्किल है. यह रिस्ता नही हो सकता.
कविता के बोलते ही आरव गुस्से से अपना पाऊ पटकते हुए स्कूल के अंदर चले गया. उसके जाते ही कविता और आरती बहोत हसे. फिर आरती ने कविता से भी बहोत मज़ाक किया.
आरती : चलो बाप ने नही तो बेटे ने तो प्रपोज़ किया. उफ्फ्फ्फ़.
कविता : (स्माइल ) चुप कर साली. जब देखो मेरे पति पर लाइन मरती रहती है. गंडिया फाड़ देंगे हम कह रहे है.
आरती : (स्माइल) अरे तुह से नही. हम तो आपन जीजू से फाड़वाएंगे अपनी गंडिया. का चिक्कन जीजू है हमरे.
कविता हस्ते हुए आरती को दबोचने लगी. ऐसे दोनों मे हसीं मज़ाक हुआ. वही कविता ने डोर क्लोज किया और आरव के सामने खड़ी हो गई.
कविता : इ मुँह काहे फुलाए हुए हो बे. जाओ... जाकर हाथ गॉड धोकर खाना खा लो.
आरव : (गुस्सा) आने दो हमरे बाबा को. तोहर उहि देखिहे.
कविता : जा बे. आपन बाप का धमकी किसी और को देना.
आरव गुस्से से दूसरे रूम मे चले गया. और बहोत जोर से दरवाजा पटक कर बंद कर देता है. कविता उसे देख कर मुस्कुरा रही थी. कुछ मिनट बाद उसके रूम से स्पीकर साउंड की आवाज आई. और गाना बज रहा था. जब दिल ही टूट गया. हम जी के क्या करें.
कविता ने जब गाने के बोल सुने तो वो अकेले अकेले बहोत जोरो से हसीं. कविता ने वीर के लिए बहोत तैयारी कर रखी थी. पर अब उसके पास बस एक ही काम बचा था. इंतजार करना. वो सोच रही थी की कब डोरबैल बजे. और वो झट से दरवाजा खोले. पर अब उस से बर्दास नही हो रहा था. वो खुद ही डोर ओपन कर के देखने लगी.
घर के सामने रोड पर चहल पहल थी. पर वीर नही दिख रहा था. तभि ऑटो रीक्षा घर के पास रुकी. और अंदर से वीर निकला. कविता की आँखों मे चमक आ गई. वो एक बेग टांगे और एक बेग ऑटो से उतरते दिखा. सायद दो दिन के रास्ते मे वीर ने शेव नही की होंगी.
इसी लिए हलकी काली दाढ़ी जैसे नजर लगने से बचा रही हो. ऑटो का रवाना होना. और वीर का कविता की तरफ देख कर मुस्कुराना. पर तभि आरव की लम्बी चीख.
आरव : बाबा........
कविता तो डोर पर ही थी. पर कब आरव वहा आया. कविता को पता ही नही चला. कविता और वीर दोनों ने आपस मे अपने अपने मन मे यह प्लान बना लिया था की बेटे के देखने से पहले दोनों एक जबरदस्त झप्पी और पप्पी. मतलब की किश कर लेंगे. क्यों की आरव के आने के बाद वो सब रात को ही मिल पाएगा.
लेकिन आरव ने सब चौपट कर दिया. वो पहले ही भाग कर अपने बाप की बाहो मे पहोच गया. वीर भी अपने बेटे से मिलकर बहोत खुश हुआ. अपने बेटे को गोद मे लिए वीर कविता को देखता है. कविता और वीर दोनों की आँखों मे एक अजीब सी प्यास थी.
जैसे अब भी प्यास बाकि है. मिल तो गए. पर मिलन अब भी बाकि है. वीर के करीब आते ही तुरंत कविता ने उसके पाऊ छुए. घर के अंदर जाते ही डोर क्लोज.
कविता : (स्माइल, प्यास ) मै आप के लिए चाय बनती हु.
कविता का बोलना एकदम धीमी आवाज. जैसे इरादा छुपा रही हो. अपनी प्यास अपना प्यार जताने से खुद को रोक रही हो. बस नजरों से नजरों ने ही एक दूसरे को भाप लिया. वो किचन मे अंदर गई. वीर अपने बेटे को लेकर सोफे पर बैठा. आरव ने शिकायत का पोटला खोलना शुरू किया.
आरव : बाबा आप चले गए. पर कविता ने मुझे बहोत तंग किया.
जिस तरह कविता अपने पिता को कभी उनके टाइटल से तो कभी नाम से बुलाती. वैसे ही आरव भी अपनी माँ को नाम से पुकरता. पर यह बत्तमीजी नही दोस्ताना व्यवहार था.
वीर : अच्छा... क्या तंग किया आप को???
आरव : बाबा कविता हेना (सोचते हुए ) मेरा होमवर्क नही करके देती. और मुझे कार्टून भी नही देखने दी. और जबरदस्ती रोज टूसन(ट्यूशन) भेजी है यह. चाकलेट(चॉकलेट) तो हमको भुला ही दी है.
तभि कविता वीर के लिए पानी लेकर आई.
कविता : अच्छा बचवा. हमारी शिकायत कर रहे हो. टांगे तोड़ दूंगी तुम्हरी.
वीर : अच्छा... तुम मेरे आरव की टांगे तोड़ोगी. हटना आरव बेटा. इस कविता की बच्ची को तो मै देखता हु.
आरव साइड हटा. उसे अब मझा आने लगा. की अब बाप उसका बदला लेगा.
आरव : अब पता चलेगा.....
कविता अपने पति की चाल समझ गई. वो खड़ी खड़ी मंद मंद मुस्कुराने लगी. वीर खड़ा हुआ और कविता का हाथ पकड़ कर दूसरे रूम मे लेजाने लगा. पर अब आरव को ही डर लगने लगा. अब उसकी मम्मी की पिटाई होने वाली है. जैसे ही डोर बंद हुआ. आरव डोर नॉक करने लगा.
आरव : अरे रहे दा बाबा. अरे हमरी मम्मी है. बाबा.... बाबा..
पर अब क्या फायदा. उसके पापा उसकी मम्मी को दूसरे रूम मे ले गए. ऐसा पहले भी हो चूका था. कविता रूम से आआ आआ की आवाज करती. और बाद मे रोने की तथा उस से रूठ जाने की एक्टिंग करती. आरव गिल्टी फील करने लगा.
कविता और वीर को तो प्यार करना था. और उन्होंने तगड़ा बहाना बनाया. बेटा बेचारा समझ रहा था की उसकी माँ की पिटाई हो रही है. पर अंदर से तो मम्मी के बदले पापा की आवाज आ रही थी.
वीर : (एक्टिंग) आआ... अरे नहीं कविता. अच्छा अच्छा अब आरव हमारा खुद ही होमवर्क करेगा... आआआ... हा हा दूध भी रोज पिएगा.... अरे हा बाबा हा.... कार्टून नहीं देखेगा. पढ़ाई करेगा.
आरव टेंसन मे आ गया. वो सोचने लगा. बाप तो माँ को पीटने वाला था. वह तो खुद पिट रहा है. लगता है माँ मे ज्यादा ताकत है. वह खुद कबूल करने लगा.
आरव : एए माँ. हा हा सब करेंगे. अब छोड़ मेरे बाबा को.
अंदर से आवाज आई.
कविता : पक्का?? फिर बाद मे मत बोलना.
आरव : अरे हा बाबा हा. अब छोड़ मेरे बाबा को.
कविता : (स्माइल शरारत ) ठीक है ठीक है. अब जाओ. हमरे लिए एक ग्लास पानी लाओ.
आरव बेचारा चुप चाप पानी लेने चले गया. कविता और वीर ने अपने आप को दुरुस्त किया. वीर उस रूम से पहले निकला. और कविता बाद मे. दोनों ने आरव ना बिगड़े इसी लिए ऐसा नाटक किया. जब कविता रूम से निकली. उसी वक्त आरव पानी का ग्लास लेकर पहोंचा. आरव ने देखा. उसकी माँ के होठो पर लाल लाल निशान है. पुरे लिप्स बिगड़े हुए है. दरसल वो लिपस्टिक कविता के होठो पर फेल गई थी. पर आरव उसे खून समझ रहा था. सोचने लगा की माँ ने बाप को बहोत जोरो से काटा होगा.
आरव : (गुस्सा ) हमरे बाबा का खून पी गई. खुनी खुनी हो तुम.
कविता को इतनी जोर से हसीं आई की वो अपने आप को रोक नही पाई. जिस से आरव और ज्यादा चिड गया. वो गुस्से मे अपने बाप के पास जाकर खड़ा हो गया. दोनों हाथ कमर पर और घूरते हुए हाफ पैंट मे आरव बहोत प्यारा लग रहा था. जैसे उसने अपने बाप की चोरी पकड़ ली हो.
आरव : (गुस्सा) पिटा गए. बहुत शेर बन रहे थे. अब रोज हमरे हिस्से का दूध तुम पिओगे.
वीर बेचारा अपनी मुस्कान छुपाए दए बाए देख रहा था. जैसे उसे शर्म आ रही हो. जब आरव ने दूध का बोला तो वीर ने सीधा सामने खड़ी अपनी पत्नी के जोबन की तरफ देखा. तभि फोन की घंटी बजी.
कविता : (आरव से ) नही... अब तुम दोनों बाप बेटों को रोज डबल दूध पीना पड़ेगा. अब जाओ जाकर फोन उठाओ.
आरव फोन तक जाते जाते गुस्से से अपने बाप को देखता है.
आरव : (गुस्सा ) अब तुम्हरे चक्कर मा हमे दुइ(2) गिलास(ग्लास) पीना पड़ेगा. हम्म्म्म
वीर और कविता मंद मंद मुस्कुराते. उन्हें अब भी बहोत हसीं आ रही थी. वो जाकर फोन उठाता है.
आरव : हेलो...... हा प्रणाम बुआ जी.
कविता एकदम तेजी से फोन तक पहोच कर लपक लेती है. कही अपनी ननंद बबिता के सामने आरव घर की पोल ना खोल दे. क्यों की कहानी कुछ भी बन जाती है. वीरू से 4 साल छोटी बबिता की शादी वीरू की शादी के 5 साल बाद ही हो गई थी. वीरू की उम्र के सूरज मिश्रा के साथ. जो रहने वाले तो गोरखपुर के थे. पर वह लखनऊ मे सिफ्ट हो चूके थे. सूरज लखनऊ पुलिस दरोगा थे.
कविता : (स्माइल, शरारत) हा ननंद रानी. का नन्दोईजी तुहार पेट फुलाई दिये का. जो आ नही रही हो.
कविता : (स्माइल) अच्छा भैया तुम्हारे. हा हा आ गए है. तभि.... कोई बात नही. आइये आइये. हम तो तुहार कुछ लागत नइखे. आवा आवा.
आरव और वीर दोनों बस कविता को ही देख रहे थे. उन्हें बबिता की आवाज नही सुनाई दे रही थी. कविता और बबिता दोनों ननद भौजाई दोनों आपस मे सहेलियां की तरह रहते थे. दोनों मे बहोत प्यार था. और दोनों ही एक दूसरे से हसीं मज़ाक करते रहते.
कविता : (स्माइल) अरे भैया से मिलने के लिए ही सही. आओ तो.
कविता : (स्माइल) अच्छा ओके ओके.
कविता ने फोन रख दिया. और वीर की तरफ देखा.
कविता : (स्माइल, शरतत) ननद नन्दोईजी आ रहे है. मै तैयारी कर लेती हु.
कविता किचन मे चली गई. वीर आरव के साथ खेलता रहा. कुछ एक घंटे बाद डोरबैल बजी. और आरव ने भाग कर डोर खोला.
आरव : (स्माइल एक्साइटेड) बुआ.....
आवाज सुनकर कविता भाग कर आई. ननंद और नन्दोई का खूब स्वागत हुआ. और सारे हॉल मे ही जमा हो गए.
बबिता : भैया मै आरव को कुछ दिन लेजाऊ??? उसके बिना मेरा मन नही लग रहा???
बबिता अक्सर आरव को सैटरडे संडे अपने घर लेजाती. पर कुछ हफ्तों से वो आ नही पा रही थी. क्यों की आरव की परीक्षा थी. पर कविता ने कुछ और प्लान बना रखा था.
कविता : पर कल तो हम उसके नाना के यहा जा रहे है. बहोत टाइम हो गया पापा से मिले.
तभि कविता और वीर का भांडा फूटने वाला था.
आरव : अरे बुआ..... पापा से काहे पूछ रहे हो. मम्मी से पूछा.
बबिता समझ गई. जरूर दाल मे कुछ काला है. उसने देखा कविता के चहेरे पर स्माइल के साथ थोड़ी शर्म और शरारत है. वो तुरंत कविता को बाहो मे जकड़ लेती है.
बबिता : (स्माइल, शरारत) अरे रुका भौजी. ऐसे कैसे....
ननंद के जैसे नन्दोई सूरज भी मज़ाक मस्ती मे खुद आगे थे. वो आगे बढ़कर आरव को गोदी मे उठा लेते है.
सूरज : (स्माइल) वो क्यों बेटा.
कविता ज्यादा शर्माने लगी. वीर मुस्कुराते हुए अपने माथे पर हाथ रख देता है. और आरव ने भांडा फोडा.
आरव : अरे फूफाजी.... बाबा की चलती कहा है आज के तो कविता ने बाबा को खूब पीटा है.
सभी हसने लगे.
बबिता : (स्माइल, शरारत) बहुत जोर के पिटाई की होंगी तेरी अम्मा ना???
आरव भी समझ से अनजान. वो भी मिर्च मसाला भर के बता रहा था.
आरव : अरे...... बहुत जोर के. बाबा का तो आवाजे नही निकाल पा रहा था. सांस फुले रही. पर कविता के तो बिलकुल कोई दया भाव नाही.
सारे और ज्यादा जोर से हसे. कविता की तो हालत ही खराब हो गई. ननंद नन्दोई के सामने. सूरज ने भी अपने सीधे सादे साले वीर की खूब खिचाई की. सबने खाना खाया. और हस्ते खेलते काफ़ी वक्त साथ बिताया. आरव अपनी नानी को पसंद नही करता था.
उसे अपनी बुआ से बहोत प्यार था. इसी लिए उसने जिद्द की और वो बबिता और सूरज के साथ दो दिन के लिए चले गया. उनके जाते माहौल एक बार फिर रंगीन हो गया. उन्हें तो बस मौका ही चाहिये था. अब तो दोनो ही घर मे अकेले थे. पर इस बार कविता ने खुद मानो कामदेवी का रूप धारण कर लिया हो.
जब तक डोर बंद ना हुआ तब तक कोई जल्दबाज़ी नही. अपनी नन्द के प्यारे मिठे तनो को सुनती रही. पर जैसे वो गई. उसने डोर क्लोज किया. एकदम झटके से पलटी.
कविता : (स्माइल, शरारत) अच्छा... गुनाह तुहु करा. और सजा हमका. अबके तोहे नाही छोड़ब.
पिछली बार पहल वीर ने की. तो इस बार कविता ने मानो अटैक ही कर दिया. वीर सोफे पर बैठा वो भी डोर बंद होने का इंतजार कर रहा था. पर कविता तो डोर बंद करते उसपर हमला ही बोल दी. भाग कर वीर पर कूद गई. सीधा उसकी गोदी मे. वीर के चहेरे को दोनों हाथो से थाम होठो से होंठ जोड़ दिए. जैसे चुम्बन से ही जीत हार का फैसला होगा. शादी के बाद दोनों मे ही काफ़ी बदलाव आया था.
वीर शादी के वक्त और ज्यादा बलिस्ट हो गया था. हाइट बॉडी दोनों ही और ज्यादा बढ़ गई. चहेरा भरावदार हुआ तो और ज्यादा स्मार्ट हैंडसम हो गया था. वही कविता किशोरी से सम्पूर्ण नारी बन चुकी थी. जोबन भारी हो चूका था. कविता तो पहले से सुंदर थी. अब और ज्यादा निखार आ चूका था. दोनों मे पहले से ज्यादा बडा दंगल हुआ.
इस बार बैडरूम तक जाने का दोनों मे से किसी को मौका नही मिला. शरीर की गर्माहट ने बड़ी तपस का रूप ले लिया. पर तूफान थम जाता है. वो भी थम गए. दोनों एक दूसरे की बाहो मे. नग्न शरीर दोनों सोफे पर ही एक दूसरे को जकड़े हुए. कविता इस बार भी ऊपर थी. जो की हर बीवी टॉप पर ही होती है. माहौल कुछ पल शांत हुआ.
वीरू : एकठो बात बोले.
कविता : अरे एक का सौ बोला. हम सुन रहे है.
वीर : पता है.... जब किसी जोड़े का शादी होता है. वो सुहागरात मानते है.
कविता : हा हमरा भी हुआ था. भूल गए. हम तुमको अपना भरजीनीटी(virginity) दिए थे.
वीर : अरे उ तो हम भी दिए थे. बात ऊ नाही है. बात यह है की एक फौजी हर साल जब भी छुट्टी आता है. हर बार सुहागरात मनाता है.
कविता वीरू की छाती पर सर टिकाए हुए थी. वो सर ऊपर उठाकर वीरू की आँखों मे देखती है.
कविता : बिलकुल सही कहे हो. हमे कोई फूल माला ग़द्दा बिछोने का जरुरत नाही. बस हम एक दूसरे से मिल जाए. हर बार पहले मिलन का एहसास. सही कहे ना???
वीर : (स्माइल) बिलकुल. अरे समजदार हो. तभि तो हमे मिली हो.
कविता : (स्माइल) अरे कविता शुक्ला नाम है हमरा.
वीर : पांडे.
कविता : हा मतलब अब कविता शुक्ला पांडे. पर इ बाल बहोत चुबता है. दाढ़ी कहे नही बनाए.
वीर : अरे दो दिन रास्ते मा. अब कहे बनाए.
कविता : तब का ससुराल ऐसे जाओगे. कोनो साली देखेगा तो का कहेगा. अब हम बनाएँगे तुम्हे चिक्कन. कहा है तुम्हरा रेजर??
वीर हसने लगा.
वीर : (स्माइल) हमरे बेगमा है. सेविंग किट. जाओ ले आओ.
दोनों पूरी तरह से नग्न थे. कविता वीर के बैग से सेविंग किट ले आई और वीरू के सामने खड़ी हो गई. पत्नी देवी एक बार फिर साक्षात काम देवी का रूप ले चुकी थी. पास मे आधा ग्लास पानी पड़ा ही हुआ था. उसी से वीरू का चहेरा गिला किया. और ब्रश की बजाय अपने हाथो से ही मलके क्रीम लगाई. फिर रेजर उठाया.
वीरू : अरे देखना. लग ना जाए.
कविता : (स्माइल, शरारत) अरे बाबू तुम्हरी गोद मा बैठ कर बनाएँगे. कहे घबरा रहे हो.
वीरू बस हँसा. कविता वैसी ही पोजीशन मे वीरू की गोद मे बैठ गई. कविता चहेरे के करीब बड़े प्यार से रेजर चलाती है. पर थोड़ा फिसल रही थी.
वीरू : (स्माइल) अरे फिसल रही हो. जब तक खुटे से गईया बंधेगी नहीं. एक जगह टिकेगी नहीं
मतलब आप समझ ही गए होंगे. कविता वैसे ही सावर हो गई. दोनों को मौसम बनाते टाइम कहा लगता है.
कविता : ससससस ला. ई ला त.
कविता सरक तो अब भी रही थी. पर अब ऊपर खिसकने मे मझा ज्यादा आ रहा था. धीरे धीरे पूरी शेविंग हो गई.
कविता : (स्माइल,शरारत) अब बने हो. एकदम चिक्कन.
दोनों ने अधूरा काम तीसरी बार पूरा किया. रात दोनों ने साथ बिताई. और सुबह होते जल्द ही बस पकड़ ली. कविता के मायके और वीर के ससुराल के लिए. कुछ दो तीन घंटे का सफर था. सुबह 8 बजे तक दोनों कविता के मायके पहोच गए. वैसे तो कविता का मायका इलाहबाद के बाहरी हिस्से मे था. हाइवे से उतारकर कविता के मायके जाने वाले रास्ते के इर्द गिर्द सुबह 10 बजे तक सब्जी मंडी लगती. वीर और कविता बस से उतारकर उसी रास्ते पर चल दिये.
कविता बस थोड़ासा आगे चल रही थी. उसके हाथमे शूटकेस था. वही वीर पीछे उसके पास भारी बेग था. वीर ने देखा की एक दो ठेले से दो तीन बुढ़िया अपना ठेला छोड़ कविता की तरफ तेजी से आई. और कविता को इर्द गिर्द घेरकर नाचने लगी. जैसे कविता को ताना मार रही हो.
बुढ़िया 1 : हम्म्म्म पहले बड़ी कुदत रही. बडा फुदकती थी. अब का हुआ. कहे एकदमे शांत हो गई.
वीर ने देखा की कविता मुस्कुराती एकदम शांत निचे देखते हुए धीरे धीरे चल रही थी. वीरू को यह समझ आ गया की कविता सब की पहले भी फेवरेट थी. वो दो तीन बुढ़िया कविता के मजे लेती रही.
बुढ़िया 2 : (स्माइल) अरे गईया अब खुटे से जो बंध गई. अब देखो. कैसे शर्मा रही है.
बोलते हुए उस बुढ़िया ने कविता की थोड़ी पकड़ ली. कविता ने धीरे से कहा. वो पीछे है. तो वो तीन बुढ़िया पहले वीर को देखती है. उनके देखने से ही वीर को अंदाजा लग गया की उनकी नजरें थोड़ी कमजोर है. वो तीनो बुढ़िया मुस्कुराई और वीर के पास आई.
बुढ़िया 3 : वह बडा सुंदर है. नजर ना लगे हमरी.
वो तीनो बुढ़िया वीर की नजर उतरने लगी. कविता घूम कर उनकी तरफ देखती है. वीर ने भी गरीबसी दिखने वाली तीनो बुढ़िया के पाऊ छुए. यह कविता के लिए दिल जीत लेने वाला नजारा था. तभि मोटरसाइकिल की आवाजे आई. बुढ़िया और कविता ने उस तरफ देखा. दो मोटरसाइकिल पर 4 लड़के रेस दे देकर सब को परेशान कर रहे थे. तभि एक लड़के की नजर कविता पर गई.
लड़का : अबे झांसी की रानी. भाग भाग.
उन लड़को ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल घुमा ली. कविता अपना सूटकेस वही सडक पर छोड़ दो तीन कदम आगे आई. और जैसे धमकी देने लगी.
कविता : अबे कविता शुक्ला नाम है हमारा.
तभि कविता को याद आया की उसका पति पीछे है. वो घूम कर देखती है. वीर बस मुस्कुरा रहा था. कविता हाथ हिलाते हुए बाकि लाइन बोलती है.
कविता : और पांडे भी. (स्माइल) साले स्कूल मा हमरे जूनियर थे. फालतू मे यहां बदमासी करते है.
वीर को बड़ी जोर से हसीं आई. कविता शर्मा गई. कुछ बोली नहीं. बस सूटकेस उठकार तेजी से चलने लगी. वीरू समझ गया की कविता का आतंक स्कूल मे भी रहा होगा. वो लड़के मंडी मे सबको परेशान करते होंगे. और कविता से डरते होंगे. कुछ दूर चलते रोड पर गेट आया. जिसपर वीर के ससुर के नाम की नेमप्लेट लगी हुई थी. दयाशंकर शुक्ल PWD. वो दोनों गेट से अंदर घुसे. और कविता ने आवाज लगाई.
कविता : एएए दायशंकर. अबे कहा हो बे.
वीर जानता था की कविता अपने बाप को कभी शुक्ला तो कभी उनके नाम से बुलाती. दोनों बाप बेटी दोस्त की तरह रहते थे. दयाशंकर को पता था की बेटी और दामाद आ रहे है. इस लिए उन्होंने छुट्टी ले ली थी. वो आए. कविता और दायशंकर दोस्त की तरह ही मिले.
वही वीर ने अपने ससुर और सास का आशीर्वाद लिया. उसकी सास कविता की माँ को पहले की तरह ही कविता का रवैया पसंद नहीं आया. और वो कविता को डांटाती गई. पर कविता नजर अंदाज़ करती गई. वीर के भारी बैग से सब के लिए तोफे थे. जो दे दिए गए. दिन बहोत अच्छा गया. पर कविता को तो शाम का इंतजार था. वही वीरू शाम के लिए ही डर रहा था.
एक बार तो वो शर्मिंदा हो चूका था. अब कोई नया कांड ना हो जाए उसका डर था. कविता के मायके ऊपर टेरेस पर एक रूम बना हुआ था. जिसमे कविता और वीर दोनों को रुकना था. और कविता ने वही खुले आष्मान के निचे ही प्रोग्राम करने का सोचा था.
शाम हुई और धीरे धीरे रात. कविता की माँ सरिता देवी ने कविता और दामाद को भोजन करने पुकारा. पर कविता ने मना कर दिया. और कहा की उन्हें लेट खाने की आदत है. वीरू बेचारा कविता को घूर के देखता है. और सोचता है की यह इस कांड का बिल भी उसके सर ही फाड़ने वाली है. अगर सब शांति से ना हुआ तो.
वैसे कविता ने कभी ड्रिंक नहीं किया था. उसका पहेली बार था. वीर सोच रहा था की अगर बड़बोली कविता को चढ़ गई तो क्या होगा. वो पहले से ही बड़बोली है. पिने के बाद क्या क्या करेंगी. वही कविता बहोत एक्साईटेड थी. वो दोनों ऊपर वाले रूम मे थे.
कविता : (स्माइल एक्साइटेड) एए... निकालो ना काला कुत्ता.
कविता ब्लैकडॉग दारू की बोतल निकालने को कहे रही थी. और वीर का डर बढ़ने लगा. क्यों की बीवी मान ने वाली तो थी नहीं.
वीर : अरे का बोतल से मुँह लगाकर सीधा पिओगी का. गिलास(ग्लास) वगेरा कुछ तो नहीं है.
कविता सिर्फ शरारत से मुस्कुराई. और उसने उसी रूम से ग्लास का पूरा सेट निकाला. जिसमे पुरे 6 ग्लास थे. इतना ही नहीं 3 बाउल निकले. एक मे भुने काजू बादाम, दूसरे मे भुने चने और तीसरे मे सलाद था.
कविता : (स्माइल, शरारत) का बुडबक समझे हो का. अब चला बहार.
कविता सब सामान लेकर रूम से बहार टेरेस पर आ गई. वीरू बेचारा बोतल लेकर बहार आया. पर बहार का नजारा बहोत अच्छा था. आष्मान साफ था. तारे टीम टीमा रहे थे. बहोत बढ़िया हवा चल रही थी. वीर टेरिस के किनारे आया. और दीवार पर हाथ रखते निचे देखा. उसके ससुर दायशंकर घर के बहार छोटे से गार्डन मे चेयर डालकर बैठे थे.
कविता : अरे इहा आवा ना. उहा क्या कर रहे हो.
वीर बेचारा कविता के पास आया. कविता ने टेरेस पर निचे ही दरी बिछा दी. दोनों बैठ गए. वीरू कविता को देखते रहा. कविता से बरदास नहीं हुआ.
कविता : अरे बनाओ यार. हमे थोड़े ना आता है.
वीरू ने सोचा. चलो जो होगा देखा जाएगा. वीर ने बोतल खोली. भोग लगाए. और बिलकुल लाइट लाइट दो पैग बनाए.
वीर : उठाओ. आज पहेली बार पत्नी देवी के साथ. चीयर्स.
कविता खुश हो गई. उसकी बस एक फैंटासी थी. की एक बार अपने पति के साथ वो शराब पिएगी. और खूब नाटक करेंगी. जो की पूरी भी हो रही थी. दोनों ने अपना अपना पैग खतम किया. फौजी कितनी भी बढ़िया शराब हो. वो एक ही बार मे पीते है. वीर ने वैसा ही किया. पर कविता भी पूरा खींच गई. ब्लैकडॉग होने के बावजूद उसने अपना मुँह बिगाड़ा.
कविता : ओओहोक एह का चीज है बे. साला दवाई जैसा लग रहा है.
वीर कुछ बोला नहीं. बस हँसा.
कविता : बनाओ एक और.
वीर कविता को घूर के देखता है. कविता हसने लगी. पर वीरू ने दूसरा पैग बना दिया. वीरू ने काजू उठाया और खाने ही लगा की कविता ने उसके हाथ का काजू खींच लिया.
कविता : का लगता है. ई चढ़ेगी???
वीरू : हम्म्म्म पता नहीं.
कविता : तो चढ़ाओ. हमे नशा नहीं हो रहा.
वीर बेचारा चुप रहा. पर कविता दूसरा भी पैग खींच गई. वीर ने जानबुचकर तीसरा नहीं बनाया. हलाकि उसने दोनों पैग बहोत ज्यादा लाइट बनाए थे.
कविता : एए... देखो. यह हमरा सपना था. तुम डरना नहीं ठीक है. (स्माइल) मेरा डार्लिग...
कविता वीरू का गाल चुम लेती है. अब वीरू को विस्वास हो गया की कविता को चढ़ रही है. क्यों की कविता ने हमेशा एजी ओजी, आरव के पापा कहकर ही पुकारा था. कविता ने वीर को पहेली बार डार्लिग कहा. अब उसे कविता का वो रूप देखना था. उसे भी मझा आने लगा. उसने एक रेगुलर पैग बनाया. हलाकि उसका दूसरा खतम नहीं हुआ था.
कविता : अच्छा... एक ठो बात बताए...
वीरू : हम्म्म्म...
कविता : (स्माइल, नशा ) तुम ना... माल हो. एकदम चिक्कन. साला मेरा क्या मेरी दोस्त का भी तुम्हे देख कर नियत बदल जाता है.
वीरू मुस्कुराने लगा. उसकी बीवी खुलके उसकी तारीफ कर रही थी.
कविता : तुम जानते हो..... अगर हम कविता ना होते ना. तो हम तुम्हरे लिए कविता का ही मर्डर कर देते. (स्माइल) पर तुम.... तुम सच मे माल हो.
वीर के फेस पर स्माइल आ गई. उसने अपना पैग खतम किया और अपना तीसरा पैग बनाने लगा. कविता ने अपना ग्लास उठाया. और आगे कर दिया. वीर ने कविता को घूर के देखा.
वीर : नहीं.. अब नहीं. बस तुम्हारा हो गया.
कविता झूमने लगी थी.
कविता : अबे यार दो ना यार. अभी तो हमने थोडीसी भी बकवास शुरू नहीं की. बहुत बोलना है हमे तुमसे.
वीरू हस पड़ा. तो कविता भी हस्ते हुए अपना सर वीरू के कंधे पर टिका लेती है.
वीर : बोलो... क्या बकवास करनी है???
कविता : अममम... तुम हेना.... अमममम माल हो माल.
इस बार वीरू ने माथा पीटा. वो समझ गया की अब यही रिकॉर्डिंग चलेगी. तभि उन्हें कविता की माँ सरिता की आवाज सुनाई दी. जो सायद कविता के बाप को डांटा रही थी.
सरिता : बस उहहा बैठे रहिएगा. कुछ पूछियेगा नहीं की समस्या का है.
अपनी माँ की आवाज सुनकर कविता खड़ी हुई. उसे वीर ने सहारा देने की कोसिस की. पर कविता उस से पहले ही खड़ी हो गई. वो टेरेस के किनारे खड़ी होकर निचे अपने बाप को देखती है.
कविता : एएए... दायशंकर.
उन्होंने पहले दए बाए देखा. फिर ऊपर. देखा बेटी मस्त मौला बनी उन्हें ऊपर आने का हिसारा कर रही है. कविता की माँ ने भी यह घर के अंदर से सुना. और वो जोरो से कविता की बुराई करना शुरू कर देती है. पर कविता और उसके पापा दोनों की ही आदत थी सब नजर अंदाज कर देते. वो नजर चुराते ऊपर आने लगे. कविता वीरू के पास आई.
कविता : ए सुनो. हमरे बाबा आ रहे है. उन्हें एक दो घुट पीला देते है. हम जो भी बोलेंगे. तुम बस हमरा साथ देना.
वीरू सोच मे पड गया. कविता करना क्या चाहती है. तभि कविता के पापा ऊपर आए. और महफ़िल देख कर थोड़े हैरान हुए.
कविता : (मदहोश, स्माइल, बिंदास) अरे आवा आवा शुक्लाजी आवा आवा. बैठा...
दायशंकर बैठ गए. कविता ने वीर को सर झटक कर ऐसे हिसारा किया. जैसे वीर कविता का फोल्डर या राइट हेंड हो. वीर ने पैग बना दिया.
दायशंकर : अरे नहीं नहीं दामादजी. हमे आदत नहीं.
कविता ने खुद ही बोतल खींची और अपने ग्लास मे डालने लगी.
कविता : (स्माइल, बिंदास) अरे ऐसे कैसे.... आज ही तो मौका है. शेर जगाने का.
वीरू ने कविता का हाथ पकड़ लिया. उसे ज्यादा नहीं लेने दिया. इन सब मे वो खुद पीना भूल गया. दायशंकर कभी कभी चुपकेसे एक दो पैग पी लेते थे.
कविता : चलो उठाओ...
दायशंकर ने पहले दामाद को देखा. और फिर पैग उठा लिया. और जल्दबाजी मे एक ही बार मे बिना पानी के पी गए. कविता की असली बकवास शुरू हुई.
कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे दायशंकर...
दयाशंकर : हम्म क्या???
कविता : (बिंदास) यार..... ये..... बीवियों को हेना. काबू मे रखना चाहिये.
दायशंकर समझ गए की उनका दामाद क्या झेल रहा है. वो वापस वीर को देखते है. और फिर कविता को. कविता बोलते हुए झंगो पर ताल भी ठोकने लगी.
कविता : अब हमे ही देख लीजिये. हमारी हिम्मत है की हम इनके सामने कुछ बोल जाए.
कविता अपने पापा की तरफ थोड़ा झूकी. और अपना हाथ दिखाने लगी. जैसे बहोत खास खुलासा कर रही हो.
कविता : एक ही थप्पड़ मे हमरा मुँह घुमा देते है.
कविता के पापा ने वीरू की तरफ देखा. जैसे दोनो हिसारो मे बाते कर रहे हो. वीर हलका सा ना मे सर हिलता है. दायशंकर वीरू की हालत पर थोड़ा मुस्कुराए. जैसे कहना चाहते हो. मेने तो अपनी सरदर्दी तुझे थमा दी. अब भुगत. कविता वीर की झंाग पर हाथ मरती है. वीरू जैसे होश मे आया हो.
वीरू : अममम बिलकुल... बिलकुल.
कविता : (वीरू की तरफ) अबे तुम रहने दो यार. तुम्हारा कच्छा तक तो हम खरीद कर लाते है.
कविता ने अपना फेस अपने बाप की तरफ किया.
कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे???
दायशंकर : बीवी को काबू मे रखना चाहिये.
कविता : (आंखे बंद, मस्त, स्माइल) बीवी को काबू मे रखना चाहियेयेये....
कविता ने फिर वीर की तरफ देख कर हिसारा किया. जैसे कहना चाहती हो की एक और पैग बनाओ. अभी ही मौका है. पर हिसारा भी ऐसा की उसका बाप सब देख कर समझ जाए. वीर ने इस बार तीनो के पैग बनाए. और एक खुद बिना पानी के गटक गया.
दायशंकर ने वीर की पिठ थप थापाई. और अपना पैग एक झटके से खींचकर खड़े हो गए. वो तुरंत निचे चले गए.वीर ने भी अपना पैग खतम कर दिया. तभि निचे से कविता की माँ और उसके पापा के झगड़े की आवाज आने लगी. वीर कविता को छोड़कर नहीं जाना चाहता था.
पर कविता खुद उठकर निचे जाने लगी तो वीर को भी उसके पीछे जाना पड़ा. कविता को देख कर उसकी माँ सरिता ज्यादा भड़क गई. वो सुना कविता को रही थी. पर बोल अपने पति को रही थी.
सरिता : (गुस्सा चिल्लाकर) कल तक इस घर मे सिगरेट आई. आज शराब आ गई. अब कल जुआ भी खेलने लगोगे. अब बस रंडीखाना खोलना बाकि..
सरिता के मुँह से यह सब सुन कर दायशंकर को गुस्सा आ गया. और अपने जीवन मे पहेली बार अपनी पत्नी पर हाथ उठा दिया. चटक करते आवाज पुरे रूम मे गूंज उठी. कविता और वीर तो एकदम सॉक हो गए. पुरे रूम मे सन्नाटा छा गया. सरिता अपने गाल पर हाथ रखे हैरानी से अपने पति को देख रही थी. और दायशंकर अपनी नजरें घुमाकर स्तब्ध खड़े ही रहे गए. कविता को नशा हो गया था.
पर क्या हुआ उसे यह समझ आ रहा था. वो मुँह खोले जैसे समझने की कोसिस कर रही हो. कुछ पल शांति के बाद सरिता तेज़ी से अपने रूम की तरफ जाने लगी.
सरिता : (गुस्सा ) अब हम इस घर मे नहीं रहेंगे. जा रहे है हम.
वो कुछ ही पल मे एक झोला तैयार कर के आ गई. पर उसे दायशंकर ने रोक लिया.
दायशंकर : रुको सरिता... मेरी बात सुनो..
सरिता : (गुस्सा) हटो मेरे रास्ते से. जिंदगी मे पहेली बार आज आप ने मुझपर हाथ उठाया है. (कविता की तरफ हाथ दिखाते) वो भी ऐसी चरित्रहीन औलाद की वजह से.
पहेली बार झगड़े मे वीर ने मुँह खोला.
वीर : आप कैसे कविता को चरित्रहीन बोल सकती हो??? सिर्फ उसने सिगरेट और शराब पी. इस वजह से???
सरिता : देखो दामाद जी. लड़कियों को यह सब सोभा नहीं देता.
वीर : और लड़को पर तो यह सब जचता होगा. वाह... आप एक औरत होकर यह क्यों नहीं समझ रही की लड़का लड़की दोनों मे कोई भेद नहीं. और सिगरेट पीना शराब पीना बुरी आदत हो सकती है. बुरा चरित्र नहीं. चाहे वो लड़का हो या लड़की.
एक पल के लिए वहा फिर शांति छा गई. कविता मुँह खोले पागल के जैसे धीरे कदम से वीर की तरफ आई. और वीर की नजर उतार ली.
कविता : (फुल नशा ) मस्त बोला हम्म्म्म.. बहुते बहुते मस्त.
कविता की ठीक से आंख भी नहीं खुल रही थी. पर उसके ऐसे वक्त मे ऐसी हरकत देख कर वीर को हसीं आ गई. उसने कविता को बाहो मे भर लिया.
वीर : कविता को मुझसे मिलने से पहले पापा पर भरोसा था. उनके भरोसे कविता ने जीवन मे पहेली बार सिगरेट पी. वो हलाकि अब भी पीती नहीं है. फिर उसकी जिंदगी मे मै आया. और उसने मेरे भरोसे जीवन मे पहेली बार शराब पी. क्यों की उसे पता है. उसके पिता और पति उसे कुछ होने नहीं देंगे. उसे जो भी करना हो. वो करेंगी. उसके साथ मै हु. हर वक्त.
सरिता को अपनी गलती भी समझ आई. उसकी सोच पर उसे अफ़सोस हुआ. वो खामोश थी. तभि कविता धीरे धीरे उसके पास पहोची. और ऐसे बोली जैसे वो गुप्त ज्ञान दे रही हो. लेकिन उसे सबने ही सुन लिया.
कविता : (नशा) ए... एए सरिता. पति को कभी जाने की धमकी नहीं देना. वरना वो खुश हो जाएगा. पति को जो हेना.... ससससस.. खींच के रखना चाहिये. एकदम काबू मे.
कविता की बात सुनकर सभी बहोत जोरो से हस पड़े.
The End
कविता : अरे बनाओ यार. हमे थोड़े ना आता है.
वीरू ने सोचा. चलो जो होगा देखा जाएगा. वीर ने बोतल खोली. भोग लगाए. और बिलकुल लाइट लाइट दो पैग बनाए.
वीर : उठाओ. आज पहेली बार पत्नी देवी के साथ. चीयर्स.
कविता खुश हो गई. उसकी बस एक फैंटासी थी. की एक बार अपने पति के साथ वो शराब पिएगी. और खूब नाटक करेंगी. जो की पूरी भी हो रही थी. दोनों ने अपना अपना पैग खतम किया. फौजी कितनी भी बढ़िया शराब हो. वो एक ही बार मे पीते है. वीर ने वैसा ही किया. पर कविता भी पूरा खींच गई. ब्लैकडॉग होने के बावजूद उसने अपना मुँह बिगाड़ा.
कविता : ओओहोक एह का चीज है बे. साला दवाई जैसा लग रहा है.
वीर कुछ बोला नहीं. बस हँसा.
कविता : बनाओ एक और.
वीर कविता को घूर के देखता है. कविता हसने लगी. पर वीरू ने दूसरा पैग बना दिया. वीरू ने काजू उठाया और खाने ही लगा की कविता ने उसके हाथ का काजू खींच लिया.
कविता : का लगता है. ई चढ़ेगी???
वीरू : हम्म्म्म पता नहीं.
कविता : तो चढ़ाओ. हमे नशा नहीं हो रहा.
वीर बेचारा चुप रहा. पर कविता दूसरा भी पैग खींच गई. वीर ने जानबुचकर तीसरा नहीं बनाया. हलाकि उसने दोनों पैग बहोत ज्यादा लाइट बनाए थे.
कविता : एए... देखो. यह हमरा सपना था. तुम डरना नहीं ठीक है. (स्माइल) मेरा डार्लिग...
कविता वीरू का गाल चुम लेती है. अब वीरू को विस्वास हो गया की कविता को चढ़ रही है. क्यों की कविता ने हमेशा एजी ओजी, आरव के पापा कहकर ही पुकारा था. कविता ने वीर को पहेली बार डार्लिग कहा. अब उसे कविता का वो रूप देखना था. उसे भी मझा आने लगा. उसने एक रेगुलर पैग बनाया. हलाकि उसका दूसरा खतम नहीं हुआ था.
कविता : अच्छा... एक ठो बात बताए...
वीरू : हम्म्म्म...
कविता : (स्माइल, नशा ) तुम ना... माल हो. एकदम चिक्कन. साला मेरा क्या मेरी दोस्त का भी तुम्हे देख कर नियत बदल जाता है.
वीरू मुस्कुराने लगा. उसकी बीवी खुलके उसकी तारीफ कर रही थी.
कविता : तुम जानते हो..... अगर हम कविता ना होते ना. तो हम तुम्हरे लिए कविता का ही मर्डर कर देते. (स्माइल) पर तुम.... तुम सच मे माल हो.
वीर के फेस पर स्माइल आ गई. उसने अपना पैग खतम किया और अपना तीसरा पैग बनाने लगा. कविता ने अपना ग्लास उठाया. और आगे कर दिया. वीर ने कविता को घूर के देखा.
वीर : नहीं.. अब नहीं. बस तुम्हारा हो गया.
कविता झूमने लगी थी.
कविता : अबे यार दो ना यार. अभी तो हमने थोडीसी भी बकवास शुरू नहीं की. बहुत बोलना है हमे तुमसे.
वीरू हस पड़ा. तो कविता भी हस्ते हुए अपना सर वीरू के कंधे पर टिका लेती है.
वीर : बोलो... क्या बकवास करनी है???
कविता : अममम... तुम हेना.... अमममम माल हो माल.
इस बार वीरू ने माथा पीटा. वो समझ गया की अब यही रिकॉर्डिंग चलेगी. तभि उन्हें कविता की माँ सरिता की आवाज सुनाई दी. जो सायद कविता के बाप को डांटा रही थी.
सरिता : बस उहहा बैठे रहिएगा. कुछ पूछियेगा नहीं की समस्या का है.
अपनी माँ की आवाज सुनकर कविता खड़ी हुई. उसे वीर ने सहारा देने की कोसिस की. पर कविता उस से पहले ही खड़ी हो गई. वो टेरेस के किनारे खड़ी होकर निचे अपने बाप को देखती है.
कविता : एएए... दायशंकर.
उन्होंने पहले दए बाए देखा. फिर ऊपर. देखा बेटी मस्त मौला बनी उन्हें ऊपर आने का हिसारा कर रही है. कविता की माँ ने भी यह घर के अंदर से सुना. और वो जोरो से कविता की बुराई करना शुरू कर देती है. पर कविता और उसके पापा दोनों की ही आदत थी सब नजर अंदाज कर देते. वो नजर चुराते ऊपर आने लगे. कविता वीरू के पास आई.
कविता : ए सुनो. हमरे बाबा आ रहे है. उन्हें एक दो घुट पीला देते है. हम जो भी बोलेंगे. तुम बस हमरा साथ देना.
वीरू सोच मे पड गया. कविता करना क्या चाहती है. तभि कविता के पापा ऊपर आए. और महफ़िल देख कर थोड़े हैरान हुए.
कविता : (मदहोश, स्माइल, बिंदास) अरे आवा आवा शुक्लाजी आवा आवा. बैठा...
दायशंकर बैठ गए. कविता ने वीर को सर झटक कर ऐसे हिसारा किया. जैसे वीर कविता का फोल्डर या राइट हेंड हो. वीर ने पैग बना दिया.
दायशंकर : अरे नहीं नहीं दामादजी. हमे आदत नहीं.
कविता ने खुद ही बोतल खींची और अपने ग्लास मे डालने लगी.
कविता : (स्माइल, बिंदास) अरे ऐसे कैसे.... आज ही तो मौका है. शेर जगाने का.
वीरू ने कविता का हाथ पकड़ लिया. उसे ज्यादा नहीं लेने दिया. इन सब मे वो खुद पीना भूल गया. दायशंकर कभी कभी चुपकेसे एक दो पैग पी लेते थे.
कविता : चलो उठाओ...
दायशंकर ने पहले दामाद को देखा. और फिर पैग उठा लिया. और जल्दबाजी मे एक ही बार मे बिना पानी के पी गए. कविता की असली बकवास शुरू हुई.
कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे दायशंकर...
दयाशंकर : हम्म क्या???
कविता : (बिंदास) यार..... ये..... बीवियों को हेना. काबू मे रखना चाहिये.
दायशंकर समझ गए की उनका दामाद क्या झेल रहा है. वो वापस वीर को देखते है. और फिर कविता को. कविता बोलते हुए झंगो पर ताल भी ठोकने लगी.
कविता : अब हमे ही देख लीजिये. हमारी हिम्मत है की हम इनके सामने कुछ बोल जाए.
कविता अपने पापा की तरफ थोड़ा झूकी. और अपना हाथ दिखाने लगी. जैसे बहोत खास खुलासा कर रही हो.
कविता : एक ही थप्पड़ मे हमरा मुँह घुमा देते है.
कविता के पापा ने वीरू की तरफ देखा. जैसे दोनो हिसारो मे बाते कर रहे हो. वीर हलका सा ना मे सर हिलता है. दायशंकर वीरू की हालत पर थोड़ा मुस्कुराए. जैसे कहना चाहते हो. मेने तो अपनी सरदर्दी तुझे थमा दी. अब भुगत. कविता वीर की झंाग पर हाथ मरती है. वीरू जैसे होश मे आया हो.
वीरू : अममम बिलकुल... बिलकुल.
कविता : (वीरू की तरफ) अबे तुम रहने दो यार. तुम्हारा कच्छा तक तो हम खरीद कर लाते है.
कविता ने अपना फेस अपने बाप की तरफ किया.
कविता : हा तो हम क्या कहे रहे थे???
दायशंकर : बीवी को काबू मे रखना चाहिये.
कविता : (आंखे बंद, मस्त, स्माइल) बीवी को काबू मे रखना चाहियेयेये....
कविता ने फिर वीर की तरफ देख कर हिसारा किया. जैसे कहना चाहती हो की एक और पैग बनाओ. अभी ही मौका है. पर हिसारा भी ऐसा की उसका बाप सब देख कर समझ जाए. वीर ने इस बार तीनो के पैग बनाए. और एक खुद बिना पानी के गटक गया.
दायशंकर ने वीर की पिठ थप थापाई. और अपना पैग एक झटके से खींचकर खड़े हो गए. वो तुरंत निचे चले गए.वीर ने भी अपना पैग खतम कर दिया. तभि निचे से कविता की माँ और उसके पापा के झगड़े की आवाज आने लगी. वीर कविता को छोड़कर नहीं जाना चाहता था.
पर कविता खुद उठकर निचे जाने लगी तो वीर को भी उसके पीछे जाना पड़ा. कविता को देख कर उसकी माँ सरिता ज्यादा भड़क गई. वो सुना कविता को रही थी. पर बोल अपने पति को रही थी.
सरिता : (गुस्सा चिल्लाकर) कल तक इस घर मे सिगरेट आई. आज शराब आ गई. अब कल जुआ भी खेलने लगोगे. अब बस रंडीखाना खोलना बाकि..
सरिता के मुँह से यह सब सुन कर दायशंकर को गुस्सा आ गया. और अपने जीवन मे पहेली बार अपनी पत्नी पर हाथ उठा दिया. चटक करते आवाज पुरे रूम मे गूंज उठी. कविता और वीर तो एकदम सॉक हो गए. पुरे रूम मे सन्नाटा छा गया. सरिता अपने गाल पर हाथ रखे हैरानी से अपने पति को देख रही थी. और दायशंकर अपनी नजरें घुमाकर स्तब्ध खड़े ही रहे गए. कविता को नशा हो गया था.
पर क्या हुआ उसे यह समझ आ रहा था. वो मुँह खोले जैसे समझने की कोसिस कर रही हो. कुछ पल शांति के बाद सरिता तेज़ी से अपने रूम की तरफ जाने लगी.
सरिता : (गुस्सा ) अब हम इस घर मे नहीं रहेंगे. जा रहे है हम.
वो कुछ ही पल मे एक झोला तैयार कर के आ गई. पर उसे दायशंकर ने रोक लिया.
दायशंकर : रुको सरिता... मेरी बात सुनो..
सरिता : (गुस्सा) हटो मेरे रास्ते से. जिंदगी मे पहेली बार आज आप ने मुझपर हाथ उठाया है. (कविता की तरफ हाथ दिखाते) वो भी ऐसी चरित्रहीन औलाद की वजह से.
पहेली बार झगड़े मे वीर ने मुँह खोला.
वीर : आप कैसे कविता को चरित्रहीन बोल सकती हो??? सिर्फ उसने सिगरेट और शराब पी. इस वजह से???
सरिता : देखो दामाद जी. लड़कियों को यह सब सोभा नहीं देता.
वीर : और लड़को पर तो यह सब जचता होगा. वाह... आप एक औरत होकर यह क्यों नहीं समझ रही की लड़का लड़की दोनों मे कोई भेद नहीं. और सिगरेट पीना शराब पीना बुरी आदत हो सकती है. बुरा चरित्र नहीं. चाहे वो लड़का हो या लड़की.
एक पल के लिए वहा फिर शांति छा गई. कविता मुँह खोले पागल के जैसे धीरे कदम से वीर की तरफ आई. और वीर की नजर उतार ली.
कविता : (फुल नशा ) मस्त बोला हम्म्म्म.. बहुते बहुते मस्त.
कविता की ठीक से आंख भी नहीं खुल रही थी. पर उसके ऐसे वक्त मे ऐसी हरकत देख कर वीर को हसीं आ गई. उसने कविता को बाहो मे भर लिया.
वीर : कविता को मुझसे मिलने से पहले पापा पर भरोसा था. उनके भरोसे कविता ने जीवन मे पहेली बार सिगरेट पी. वो हलाकि अब भी पीती नहीं है. फिर उसकी जिंदगी मे मै आया. और उसने मेरे भरोसे जीवन मे पहेली बार शराब पी. क्यों की उसे पता है. उसके पिता और पति उसे कुछ होने नहीं देंगे. उसे जो भी करना हो. वो करेंगी. उसके साथ मै हु. हर वक्त.
सरिता को अपनी गलती भी समझ आई. उसकी सोच पर उसे अफ़सोस हुआ. वो खामोश थी. तभि कविता धीरे धीरे उसके पास पहोची. और ऐसे बोली जैसे वो गुप्त ज्ञान दे रही हो. लेकिन उसे सबने ही सुन लिया.
कविता : (नशा) ए... एए सरिता. पति को कभी जाने की धमकी नहीं देना. वरना वो खुश हो जाएगा. पति को जो हेना.... ससससस.. खींच के रखना चाहिये. एकदम काबू मे.
कविता की बात सुनकर सभी बहोत जोरो से हस पड़े.
The End
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