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DREAMBOY40

सपनो का सौदागर
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कानपुर से गोवा : एक यात्रा वृतांत

अनुनय-विनय एवं लवड़ा-लह्सन
इस कहानी के पात्र , घटनाये , स्थान सभी पुर्ण रूप से लेखक का चुतियापा है और इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, जाति धर्म प्रथा से कोई संबंध नहीं है। ये कहानी लिखते वक़्त दिमाग का जरा भी इस्तेमाल नही किया गया है तो पाठको से निरोध है कि वो भी इसे बिना दिमाग के ही पढे ।

परिचय

बृजकिशोर तिवारी : पेशे से गणित के अध्यापक है और स्वभाव से थोडे चिडचिडे किस्म के है इसिलिए इनकी बडी खिचाई होती है । मगर अपनी पत्नी मालती से खासा मोह है और अक्सर उसके शब्दो और स्पर्शो के जाल मे तिवारी जी फसते रह्ते है ।
अशरफीलाल वर्मा : थोडे गंभीर स्व्भाव मगर छुपारुस्तम इन्सान है ।
बैजनाथ चौरसिया : ढिठ और एक नम्बर का स्वार्थी और कंजूस , हिस्से मे आया एक ढेला भी ना दे किसी को ।
रामखिलावन यादव : मस्तमौला और ग्रुप का सबसे चंचलवृति वाला आदमी

सब के सब कनपुरिये बकलण्ड है और GGIC यानी राजकिय कन्या इंटर कालिज , चुन्नीगंज कानपुर मे अध्यापक है । सब 50+ उम्र पार कर लिये और एक नम्बर के ठरकी है यहा तक कि इनके व्हाट्सअप ग्रुप का नाम भी THE THARKI TEACHERS है ।
ये कहानी वैसे तो चार ठरकी दोस्तो की है लेकिन मूल रूप से इसके मुख्य किरदार बृजकिशोर तिवारी जी होंगे और उन्ही के सन्दर्भ में ये कहानी चलेगी ।


सफ़र की शुरुआत

संध्या काल का समय था और बृजकिशोर तिवारी तेजी से कदम बढ़ाते हुए घर की ओर ऐसे चले जा रहे थे मानो दीर्घशंका अपनी मर्यादा लांघकर उनकी नयी स्त्री की हुई धोती पर अपनी पीली छाप छोडने वाली हो ।
दरवाजे पर पहुचते ही तिवारी जी ने कुंडा खड़का कर कन्धे पर रखे केसरिया गमछे से माथे पर रसते हुए पसीने को थपथपा कर पोछा और वापस से कुंडा खड़का दिया ।

तभी सामने से बृजकिशोर तिवारी की धर्मपत्नी मालती देवी ने दरवाजा खोला - जे आप आ गये
तिवारी जी थोड़ा खुद को सामान्य रखते हुए बिना मालती से नजर मिलाये घर मे प्रवेश करते हुए - अ ब ब हा हा , जरा एक गिलास पानी लयि आओ

मालती फटाफट रसोई से ग्लास मे पानी लाकर देती है जिसे तिवारी जी एक सास मे गले तक उतार लेते है । मालती थोडा उलझन भरे भाव तिवारी जी की हालत पर गौर करती है लेकिन कुछ सवाल जवाब नही करती है ।

पानी का ग्लास खाली करने और गला तर करने के बाद तिवारी जी थोडा मालती से नजरे चराते हुए - अच्छा सुनो सरोज की अम्मा !! वो जो बबुवा नवा पिठ्ठु बैग लावा है उसमे दो जोड़ी कपडे बान्ध दयो ।

मालती को बहुत आश्चर्य हुआ और वो थोडा परेशान होते हुए - का हुआ जी , सब ठीक है ना

तिवारी जी थोडा अटके लेकिन फिर कुछ सोच कर - हा हा सरोज की अम्मा सब ठीक है ,, ऊ का हय कल भोर मा ही हम निकल रहे है अलाहाबाद के लिए

मालती कुछ सोच कर - लेकिन आप तो ई बरस इही कानपुर मा ही नहाए वाले थे ना

तिवारी थोडा खीझ कर - हा तो उसमे का है , पिलान तो कबहो भी बन सकत है ना
तिवारी - अब देर ना करो , हमाओ सारा बान्ध देओ और खाना लगाओ

मालती तुनक कर - जे मतलब , आप हमको नाही लिया जायेंगे का

तिवारी जी थोडा अटके और समझ गये कि उनकी बीवी का ड्रामा शुरु हो गया इसिलिए बात घुमाने की कोशिस करते है ।

तिवारी जी - अब ऊ का है सरोज की अम्मा , जे हम तो जाने को तैयार ही नही थे लेकिन ऐन मौके पे रामखेलावन ने बिना पुछे टिकट करा दी

बृजकिशोर की बात सुन कर मालती का चेहरा लटक गया तो वो उसका मन बहलाने के लिए मुस्कुरा कर बोले - अरे मन छोटा ना करो । हम तुमाए लिये बनारसी साड़ी लाएंगे उहा से


मालती पहले थोडी चहकी लेकिन फिर कुछ सोच कर - जे आप तो अलाहाबाद जाई रहे ना तो बनारासी साड़ी ??

मालती की बाते सुन कर बृजकिशोर की हृदयगति तेज हो गयी और वो मुह से पानी से अणुओ को गले मे उतारते हुए - का सरोज की अम्मा तुम भी ना , अरे उहा मेला लागत है और साड़ीन की दुकानन भी सजी रहत है

मालती के दिल मे भी मेले को लेके अरमान जाग गये तो थोडा इतरा कर और बृजकिशोर को रिझाने के मकसद से उनके बगल मे बैठते हुए उनकी बाजू थामकर - जे फिर हमको भी लिवा चलिए ना

बृजकिशोर मालती का स्पर्श पाकर सिहर उठे और खुद को बेकाबू पाने लगे ।
लेकिन उन्होंने खुद को सम्भाला और अपनी बाह से मालती का हाथ हटाते हुए - अरे सरोज की अम्मा समझो ,,, इ बेर सिरफ हम मर्द लोगन का ही पोग्राम हुआ है । तुम अगिला साल चलना

मालती बडे उखड़े हुए मन से हा मे सर हिलाया और रसोई मे चली गयी यहा तिवारी जी ने एक गहरी आह्ह भरी और कुछ सोच कर उनके चेहरे की मुस्कान ने अपने क्षेत्रफल मे इजाफा कर लिया ।
थोडी ही देर बाद रात्रि के भोज के बाद पंडित जी गहरी निद्रा मे खो गये ।


दो हफ्ते पहले

लोकेशन - राजकिय कन्या इंटर कालिज का स्टाफरूम
समय - लंच पीरियड

बैजनाथ - अच्छा खेलावन इ बताओ , आने जाने का बन्दोबस्त है

रामखेलावन - अबे उकी चिन्ता ना करो तुम बे ,, कानपुर से गोवा की चार टिकिट का बन्दोबस्त कर दिये है हम

अशर्फीलाल - यार लेकिन एक सम्स्या है
बैजनाथ उखड़ते हुए भाव - अबे याररर अशर्फी भईया तुम्हारा हर बार का रन्डीरोना है, बको का हुई गवा अब
अशर्फीलाल आसपास देखते हुए थोडा दबे आवाज मे खीझकर - ज्यादा अपरपेलयी ना बतियाया करो बैजनाथ,,, साले घर पर का बोल के निक्लोगे हा कुछ सोचे हो

बृजकिशोर अशर्फीलाल की बातो पर सहमती दिखाते हुए थोडा परेशान लहजे मे - हा यार खेलावन ये दिक्कत तो होगी ना कि क्या बहाना बनाकर निकलेंगे हम लोग

रामखेलावन दाँत पीसते हुए दबी आवाज मे - तुम लोग हो एक नम्बर के चुतिया ,,, अबही बोले है कि माघमेला जाने के बहाने निकलेंगे

अशर्फीलाल धीमी आवाज मे - हा लेकिन अगर बच्चे और घर के लोग भी जाने के लिए जिद कर दिये तो ,,, लभेड़ मच जायेगा जान लो

रामखेलावन - ऊ सब हम नाही जानत है , सबको आना है और फला तारीख को सुबह 05:15 की ट्रेन रहेगी

रामखिलावन - और तिवारी तुम खास तौर पर सुनो ,,, तुम जरा अपनी भावनाओ पर काबू रखना,,हग मत देना भौजी के सामने आज ही समझे , याद है ना पिघले साल शिमला वाला पिलान तुम्हारे वजह से ही चौपट हुआ था

बृजकिशोर को अपनी गलती का आभास था तो वो हा मे हुन्कारि भर दिया
और तय किया कि आखिरी समय मे ही वो घर पर मालती को बतायेंगे ताकि उसको मौका ही ना मिले कि वो उन्हे किसी तरह रिझा कर मामला चौपट कर दे ।


सुबह की ट्रेन


आज सुबह 3 बजे तड़के ही पंडित जी की मोबाईल ने तय समय पर melody with vibration वाले tune पर अलार्म बजाना शुरु किया ।

दो बार की रिंग के बाद मालती ने खुद उठ कर तिवारी जी को जगाया और तिवारी जी आवाक होकर उठे ।
आनन फानन मे फटा फट नल पर रखी बालटी को भरा और लेके शौचालय मे घुसे । कुछ पल की बेला बीती , मगर पेट तो साफ हुआ नही इसीलिये जल्दी से नहा धोकर साढ़े तीन बजे तक अपनी पिठ्ठु बैग लेके निकल पड़े चौपाल के पास जहा इन्तजार मे थे उनके कुछ खास मित्रगण ।

बृजकिशोर - अबे यार ये रामखिलावन कहा रह गवा , 05:15 की ट्रेन हय और इ चुतिया लेट करवाये जा रहा है ।

तभी तिवारी जी के सामने पिठ्ठु बैग टाँगे 2 लोगो मे से एक ने बोला - अबे यार तिवारी तुम अफनाओ ना , ऊ टेम्पो लिवाये गवा है आयी रहा है

बृजकिशोर उस व्यकित से मुखातिब होते हुए - हा लेकिन टेम भी तो देखो अशर्फी भईया ,,, पौने चार हुई रहा है ।

तभी सामने एक टेम्पो आती है।

अशर्फीलाल - लेओ आ गवा , तुम झुटहे अफनाये रहत हो ।

तभी वो टेम्पो सामने रुकती है और ड्राईवर के बगल मे बैठा रामखिलावन टेम्पो से बाहर गरदन निकाल कर - अरे सब आई गये का ,,चलो फटाफट बैठो ।

रामखिलावन के आवाज पर पहले लपक कर अशर्फीलाल ने एक किनारे जगह लेली और फिर बैजनाथ भी अन्दर घुस गया , वही जब तिवारी जी ने अन्दर नजर मारी तो बहुत थोडी ही जगह दिख रही थी और उसमे तिवारी जी को अपना कुल्हा सेट होता नजर नही आ रहा था ।

तिवारी जी - अरे यार बैजनाथ तुम बीच मे नही एक किनारे दब के बइठो ,,,तुम्हारा कुल्हा चौड़ा हय यार

बैजनाथ मुह बनाते हुए - अबे यार तिवारी अब इत्ती ठंड मा किनारे ना बईठाओ हमको , पाजामा हल्का है हमारा और हवा उपर जांघन तक जात है ।

रामखिलावन आगे की सीट पर बैठा था वो बृजकिशोर और बैजनाथ की झड़प को देखकर तनमनाते हुए से उतरा - अइसा है सुबह सुबह गुह की मक्खी जईसे भीनभीनाओ ना

रामखिलावन - और तिवारी तुम चलो आगे बईठो , हम बईठ जाते है पिछे ।

बृजकिशोर जी थोडा कुनमुनाते हुए ड्राईवर के बगल मे बैठ गये और रामखिलावन की आवाज पर टेम्पो कानपुर सेंट्रल के लिए हाईवे पकड लिया ।

माघ महीने मे खुली टेम्पो का सफ़र था तो चारो ने साल चादर ओढ़ रखा था लेकिन तिवारी जी का पजामा थोडी देर बाद गरम होना शुरु हो गया ।
कारण था आज बृजकिशोर जी असमय उठ कर शौच के लिये चले गये थे लेकिन पेट साफ हुआ नही और फिर अब भोर की बेला चढ़ रही थी तो तिवारी जी का मौसम बनने लगा था ।

तिवारी जी ने घड़ी देखी अभी 04:40 हो रहा था और वो स्टेशन ने लगभग 2 किमी ही दुर थे ऐसे मे उनकी शंका और जोर पकडना शुरु कर दिया ,, चुतड की गांठ के साथ साथ अंडकोष की नशो मे भी पेसाब का जोर बढने लगा ।

नतिजन तिवारी जी अब हाईवे के ब्रेकर पर खासा नजर रखने लगे और जब भी ब्रेकर आता अपनी चुतड उचका कर झटके से बचने की कोसिस करते

ऐसे मे जब उन्हे चैन नही मिला तो उन्होने स्टेशन से डेढ़ किमी पहले टेम्पो को एक खाली सुनसान जगह रुकवाया और पीने वाले पानी का बोतल लेके हाईवे से सटे नहर की ओर मोबाईल की टॉर्च जला कर निचे उतर गये और पाजामा खोलते हुए बैठ गये ।

यहा टेम्पो मे उनके सारे दोस्त ठहाका ले ले उन्ची आवाज मे तिवारी को बुलाने लगे कि जल्दी करे लेट हो रहा है
लेकिन बृजकिशोर जी दर्द सिर्फ वो ही समझ सकते थे ।

एक तो शारिरीक दबाव से बन्धे हुए सरासर अपनी नीचली नाली को खाली किये जा रहे थे , वही उपर सड़क से उनके दोस्तो ने उन्हे छोड कर जाने की धमकी देनी शुरु कर दी थी ।
नतिजन तिवारी इस दोहरे दबाव से परेशान हो गये थे । और इधर रामखिलावन ने मजाक मे टेम्पो का इंजन शुरु करवा दिया ,,अब तो तिवारी जी की गाड़ फटने के बाद भी टट्टी अटक गयी ।
मन मारकर तिवारी जी ने गालिया बकते हुए फटाफट चुतड धोकर उपर आने लगे।

मगर रामखिलावन मजे लेने के लिये टेम्पो को 10 मीटर आगे चलवा दिया ।

तिवारी जी तेजी से चिल्लाते हुए टेम्पो की ओर भागे - अबे मादरचोदो रोको बे ,

पूरी सवारी ने हस के मस्त हुई जा रही थी , तिवारी जी ने दौड़ कर आगे की सीट पकड़ी और खुद की सांसो को बराबर करने लगे ।
स्टेशन आने तक पंडित जी खिलावन को कुछ पारिवारिक संबंधो से जुडी अनुचित वक्तव्य सुनाते रहे मगर खिलावन ने बुरा नही माना ।

खैर समय बीता और सब लोग स्लिपर बोगी मे रिजर्व अपने अपने सीट पकड़ लिये और चादर तान लिये ।
ठंड का मौसम था तो सोना ही सबने बेहतर समझा और गाडी स्टेशन दर स्टेशन पटरी बदलती आगे बढती रही ।

इटारासी से भुसावल

दस घंटे से उपर का समय बीत चुका था और शाम के करीब 4 बज रहे थे । तिवारी जी ट्रेन इटारसी जनशन पर रुकी हुई थी और सारे दोस्त उपर की बर्थ छोड कर निचे की शीट पर बैठे हुए गप्पे हाक रहे थे ।

लेकिन इनसब के बीच अशर्फीलाल वर्मा की जौहरी निगाहे खिड़की से बाहर प्लेटफॉर्म टहलती भीड़ मे हीरे की तालाश कर रही थी कि कही से कोई चमचमाती सिल्क साड़ी मे कोई ग्लैमर दिख जाये ।

तभी अशर्फीलाल की आंखे चमकी और वो वापस अपनी सीट पर सही से बैठते कुर्ते की कालर को ठिक करते हुए बालो को सहेजा कि तभी बोगी मे एक दम्पति जोडा तिवारी जी के कंपार्टमेन्ट के सामने रुका ।
चारो रन्गबाजो की नजरे एक साथ उस बला सी चमकती मतवाली मोटे नैनो वाली के हसिन चेहरे से उसके सभी उतार चढ़ाव पर नाचाने लगी ।

उस महिला ने जब उन चारो पर ध्यान दिया कि उनकी नाचती पुतलिया उसके हुस्न के भवर मे अटक गयी तो अनायास उसकी हसी फूट पड़ी ।

अशर्फीलाल - अ ब ब भाईसाहब का हुआ ,,कौन सा नम्बर सीट है आपका

आदमी थोडा झिझकते हुए - दरअसल भाई साहब हमारी टिकट वेटिंग मे है और मेरी बीवी को भुसावल तक एक जरुरी काम से जाना पड़ रहा है ।

अशर्फीलाल की आंखे चम्की - ओह्ह्ह तो इसमे परेशान होने वाली क्या बात है ,,,आप भाभी जी यही बिठा दीजिये और 4 5 घन्टे का सफ़र है कट जायेगा

वो आदमी अपनी बिवी को एक नजर देख कर उसकी सहमती जानने की कोसिस करता है तो वो औरत मुस्कुरा कर हा मे इशारा कर देती है ।

अशर्फीलाल की आंखे एक बार फिर से चमक उठती और एक शरारती मुस्कान के साथ वो अपने बाकी मित्रो की ओर देखता है तो उसे सब लार टपकाते नजर आते है ।

इधर खेलावन ने लपक कर उस औरत का बैग पकडता है - लाजिये भाभी जी ,,,मुझे दीजिये मै इसे साइड मे रख देता हू ।

फिर वो आदमी सबको धन्यवाद बोलकर निकल जाता है और वो औरत कम्पार्टमेंट मे नजर घुमा कर बैथने की जगह देखती है

अशर्फीलाल मौका देख कर अपने बगल मे बैठे तिवारी जी की कमर मे खोदते हुए - अरे तिवारी जी देख क्या रहे है उठिए ,,,वहा सामने वाली सीट पर जाईये भाई ।

तिवारी जी थोडा मुह बिचका कर अशर्फीलाल का हरामपन से मुस्कुराता चेहरा देख्ते है और खडे हो जाते है ।

तभी तिवारी जी की नजर उस महिला के उपर के पहाडी दरारो पर गयी और तुंरत उन्होने अपनी कल्पना मे उठे त्रिकोणमिति के एक प्रशन को फटाफट हल करते हुए निचे बैठने के बजाय उपर के बर्थ पर चढ गये ।

तिवारी के उपर जाते ही बाकी के सभी लोग समझ गये कि तिवारी ने अपना कैलकुलेसन कर लिया है और अब वो object A औ B के बीच की उचाई और दुरी बखूबी मापेगा ।
कुछ मिनटो मे हॉर्न बजा और ट्रेन ने अपनी गति पकड ली ।
इधर चारो सिविल इन्जीनियर उस गलैमरस ऑब्जेक्ट का टॉप , साइड और फ़्रंट व्यू का मुआयना करते रहे ।

बीच बीच में अशर्फीलाल उस महिला से बाते करता रहा , जबकि उपर लेटे हुए तिवारी जी अपनी त्रिकोणमिति के सवाल के हल के काफी करीब पहुच गये थे और कुर्ते के निचे हाथ रखे हुए ऊँगलीयो से कुछ गणना किये जा रहे थे ।

खैर थोडी देर बाद तिवारी निचे उतरे और कान मे जनेऊ लपेटते हुए बोगी के शौचालय की ओर बढ़ लिये और इधर मौका पाते ही बैजनाथ ने उपर चढ गया और उसकी आंखे चमक उठी ,,,थोडे थोडे अंतराल के बाद बारी बारी से बैजनाथ फिर रामखेलावन और फिर अशर्फीलाल भी शौचालय से निबट लिये ।
फिर चारो रात 8 बजे तक नीचे ही बैठे रहे जब तक ट्रेन भुसावल जनशन पर नही पहुच गयी ।

भुलावल जनशन आते ही अशर्फीलाल खुद उस महिला का बैग लेके निचे तक छोडने गया और बाकी तीनो बेगाने खिडकी मे मुह डाले आखिर तक उस चंचल हसिना के चौडे कुल्हो का दोलन आंदोलन निहारते रहे ।

भुसावल जनशन से अपने सहयात्रि को बिदा करने के बाद सब लोग अपने अपने जगह पर बैठ गये ,, सबने एक दुसरे को देखा और जोर का ठहाका लगाया ।

गाडी की हॉर्न बजी और ट्रेन अपनी गन्तव्य की ओर बढ़ने लगी ।
रात ढलने के कारण सभी लोग खाना खाकर अपने अपने बर्थ पर चादर तान कर लम्बे हो गये ।

अगली सुबह 4 बजे तड़के ही गाडी छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मीनस पर खड़ी हो गयी ।
यात्रियो की चहल पहल से चारो की नीद खुली सब लोग फटाफट अपना बैग लेके प्लेटफार्म 15 पर उतरे ।

तिवारी जी - यार खिलावन अब आगे कहा जाना हय कुछ तय किये हो

रामखिलवान - तय का करना है यार,,, अब उतरे हो टट्टी पेसाब कर लयो ,,मन हो नहा लयो और फिर कुछ नाश्ता पानी करके बस पकड के सीधे बाम्बे टू....

बैजनाथ खिलावन की बात पूरी होने से पहले ही चहक कर कमर हिलाते हुए - गोवा वाले बिच पे , रानी फ़ोटो खिच के

बैजनाथ की उत्सुकता और चहकपने सबने ठहाका लगाया ।


बाम्बे टू गोवा

अगले कुछ पलो मे सभी लोग उसी स्टेशन के पास मे बने एक सार्वजनिक शौचालय की लाईन मे लगे थे। सर्दियो मे हरि मटर और मूली ने तिवारी जी को खासा तंग कर रखा था और सुबह की बेला चढ रही थी तो कुछ प्राकृतिक दबाव भी अंदर ही अंदर बढ रहा था । हर एक से डेढ़ मिंट के अन्तराल पर तिवारी जी का कुरता पीछे की तरफ कुछ गरम आंतरिक हवा के प्रेशर से तेज गर्जना के साथ उठ जाया करता था और जांघो मे एक गरमाहत का अह्सास होता था ।
मगर तिवारी जी के पीछे खडे बैजनाथ को जरा भी अच्छा मह्सूस नही हो रहा था ।
चेहरे पर गम्छा लपेटने बावजूद भी उपर से हाथ रखने की नौबात बनी हुई थी ।

तभी शौचालय का दरवाजा खुला और तिवारी जी के आगे खडे अशर्फी भैया जैसे ही अन्दर घूसने वाले थे कि बैजनाथ ने टोका

बैजनाथ मुह पर लपेटे गमछे पर हाथ रखते हुए - अरे अशर्फी भैया तनिक रुक जाओ , जरा तिवारी जी को निबट लेन देओ ,, जाओ तिवारी जल्दी करो

तिवारी जी की स्थिति ये ना थी कि वो बैजनाथ से कोई वाद विवाद करे ,,, वो पहले ही एक प्राकृतिक दबाव तले झुके जा रहे थे । मौका मिलते ही लपक कर घुस गये ।

बाहर अशर्फी मुह पर गम्छा दबाते हुए - का हुआ बैजनाथ कुछ बात रही का
तभी अन्दर पड़पडाने की तेज गर्जना हुई
बैजनाथ बाथरूम की ओर इशारा करके - देखो यही बात रही ,, हा यार हर आधा मिंट मे भुट्ट भाय्य्ं पादे जा रहा

अशर्फी बैजनाथ की बात सुन कर गमछे के अन्दर ही हसने लगा ।

खैर थोडे समय बाद सभी जन नहा धो कर एक ढाबे पर गये और वहा भर पेट ताजा नासता किया । फिर एक वॉल्वो बस से बाम्बे टू गोवा के लिए निकल पड़े
मोहिनी लाज

करीब दस घंटे के लम्बे और थका देने वाले सफ़र के बाद सारे लोग देर शाम तक बागा बस स्टाप पर पहुचे ।

बस स्टैंड पर उतरते ही रंग बिरंगी रोशनी और डीजे के बेस पर उछल कूद करने वाले इस अनोखी दुनिया मे चारो लोग प्रवेश कर चुके थे ।
मगर सफ़र की थकान ने इतना चुर कर दिया था । इच्छा रहते हुए भी किसी की हिम्मत नही हुई कि पास के बिच पर जाकर नाइटशो का मजा ले सके ।

खैर सभी लोग पास मे एक लाज मे शरण लेते है और एक ही एक डबल बेड का कमरा बुक किया जाता है ।
थोडी देर बाद खाना खाने के बाद सबके बदन मे जान आ जाती है और चेहरे खिल उठते है ।
फिर चारो लोग दो अलग अलग कम्बल मे लेटते है ।

बैजनाथ और अशर्फी एक कम्बल मे , तिवारी और खेलावन एक मे ।
बाकी सब थोडे बातो मे लगे रहे और इधर रामखेलावन को मस्ती सुझी ।

उसने सोने का नाटक शुरु कर दिया और कुछ ही पलो मे नकली खर्राटे लेने लगा ।
मगर तिवारी जी बेचैनी बढने लगी ,,रामखेलावन मे मस्ती मे तिवारी के से चिपके हुआ था ।

तिवारी जी - उम्म्ंम ये खेलावन तनी उधर सोवो यार ,,चढ़े ही जा रहे हो

खेलावन जानबुझ कर कुनमुना कर अपनी टांग तिवारी जी के उपर फेकते हुए - अह्ह्ह रजनी , कहा थी तुम

तिवारी जी भडकते हुए खेलावन का पैर हटाते हुए - ये खेलावन , पगला गये हो का बे , सही से सोवो

इधर दुसरे कम्बल मे बैजनाथ और अशर्फी मुह दबाये हसे जा रहे थे क्योकि वो खेलावन की मस्ती समझ रहे थे ।

इधर खेलावन ने वापस अपनी टांग तिवारी के उपर फेकि और हाथ को उसके सीने के उपर फिराते हुए अपनी बीवी रजनी का नाम लेके कुनमुनाने लगा ।

तिवारी जी को अपनी इज्जत पर बात आती देख तनमना कर उठ खडे हुए और भागकर सोफे पर बैठ गये
यहा खेलावन ह्स्ते हुए उठ कर बैठ गया ।

खेलावन मस्ती भरे मूड मे - का हुआ रजनी कहा चली गयी
खेलावन के इस वक्तव्य पर अशर्फी और बैजनाथ कम्बल मे मुह डाले हस्ते रहे ।

तिवारी अब तेवर दिखाते हुए - अबे यार इ का गाण्दूगिरी पर उतारु हो गये हो तुम खेलावन हमम्म

खेलावन हसने लगता है ।
तिवारी जी उठ कर वापस बिस्तर की ओर आते है ।

तिवारी - ये बैजनाथ तुम खेलावन के साथ सोवो यार

अशर्फी ह्स्ते हुए बैजनाथ को खेलावन के पास जाने का इशारा करता है तो बैजनाथ हस्ता हुआ कम्बल से निकल गया और तिवारी की अशर्फी भईया के साथ हो लिये


आखिरी पड़ाव

अगली सुबह कमरे मे होड़ मची हुई थी , हर कोई आधा घंटा समय लेके बाथरूम मे बदन घिसकर चमकाये जा रहा था और वही तिवारी आयिने के सामने अपनी शेविंग किट खोले दाढ़ी बनाने के बाद मूछ सेट कर रहे थे ।

ऐसे मे रामखेलावन जो भी अभी जान्घिये मे घूम रहा था वो तिवारी के पास जाकर उनकी जिलेट मैच 3 का रेजर लेके कांख मे भिड़ा लिये और तिवारी जी नजर जब अपने महगे रेजर पर गयी तो कैची छोड बिफर पड़े ।

तिवारी झल्लाते हुए - हा झाट भी बना लो उसी से बकचोद साले

रामखेलावन तिवारी जी बातो का बिना बुरा माने बड़े इत्मीनान से - अरे काहे बौराये जा रहे हो तिवारी , कांख छील रहे है इससे गाड़ नही ,,तुम भी ना

तिवारी उतरे हुए मुह से बड़बड़ाये - यार तुमको रेजर चाहिये था तो बताते ना ,,,हम रखे थे एक प्लास्टिक वाला अलग से


रामखेलावन - नाही यार प्लास्टिक वाले से कटने का डर रहता है और इस्से देखो एक दमहे समूथ ,,,लो हो गया

तिवारी चिडचिडाकर अपना शेविंग कीट बंद करते हुए - गाड़ मे डाल लेओ अब इसको

फिर तिवारी जी बडबड़ाते हुए तौलिया लेके बाथरूम मे नहाने के लिये घुस गये ।

खेलावन तिवारी को भडकता देख हसते हुए - अरे dettol लगा दे रहे तिवारी ,,, सुनो तो


खिलवाड़ था चल रहा था , तिवारी जी जह्की स्वभाव के इन्सान थे तो खेलावन मजे ले लेता था ।
खैर थोडी देर बाद सारे लोग नहा धो कर तैयार हुए और फिर नाश्ता करके एक टेम्पो से निकल गये बागा बीच की ओर ।

सबने रंगबिरंगे शर्ट डाले थे और पैंट के निचे चुन्नीगंज ,कानपुर के मशहूर वसिम दर्जी का सिला हुआ धारीदार जांघिया
निकल पड़े थे चारो अतरंगी मिजाज वाले कानपुरिये गोवा बिच का मजा लेने ।


कहानी का क्या है शब्दो को जोडते रहो वो आगे बढ़ती रहेगी । मगर कहानी का मजा तब है जब वो लेखक के शब्दो मे नही बल्कि पाठक की कल्पनाओ मे आगे बढे ।

तो कानपुर की गंगा घाट से गोवा की बागा बिच की यात्रा वृतांत को यही विराम देते हैं ।
लेकिन याद रहे विराम सिर्फ लेखक के शब्दो में लगा है आपकी कलपनाओ पर नही ।

आप तो बस आंखे बंद करिये और कल्पना किजीए कि ये चार कनपुरिये अधेड़ उम्र के रंगबाज दोस्त बृजकिशोर तिवारी , अशर्फीलाल वर्मा , बैजनाथ चौरसिया और रामखेलावन यादव
जब अपने स्पेशल धारिदार जान्घिये मे गोवा के बीच पर सनग्लास लगाये हुए घूमेंगे तो क्या नयी कहानिया तैयार होगी ।



धन्यवाद
 

Lews Therin Telamon

It was a pleasure to burn
Supreme
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प्रत्‍युत्‍पन्‍नमतिस्‍व

"अच्छा मैं जा रहा हूँ, गेट बंद कर लेना." और फिर दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई.

नवीन दफ़्तर जा चुका था, रश्मि ने बेसन से सने अपने हाथ सिंक में धोए और रसोई से बाहर निकल आई. घर में सन्नाटा पसरा था. पिछले रोज़ ही उसकी सास अपने छोटे बेटे नरेश के पास मुंबई गई थी, नहीं तो उनके भजन-कीर्तन की आवाज़ें घर में गूंज रही होतीं. एक अरसे बाद नवीन का दफ़्तर फिर से खुल गया था.

महामारी के दौर ने सबकी आदतें ख़राब कर दी थीं और घर पर रहते-रहते सभी का टाइम टेबल बिगड़ गया था. शायद इसीलिए आज सुबह जल्दी उठ कर रसोई संभालना रश्मि को थोड़ा अखरा था.

"ऑफ़िस तुम्हारा खुला है और काम मुझे करना पड़ रहा है." उसने झुंझलाकर अपने पति से कहा था.

रश्मि ने मेन गेट की कुंडी लगाई और रसोई समेटने चल दी.

लेकिन एक तरह से अच्छा भी था, घर बैठे-बैठे सब आलसी होते जा रहे थे, उसने सोचा. सवेरे उठने में देरी से लेकर घर का हर काम देर से होने लगा था. रसोई में जाते-जाते वह हॉल में रखा रेडियो चला गई थी. कुछ नए और कुछ पुराने गानों की धुनें बजने लगी.

धीरे-धीरे उसने छिट-पुट काम निपटाए और वॉशिंग मशीन में कपड़े लगा, बालकनी में बैठ एक घरेलू साज-सज्जा की मैगजीन के पन्ने पलटने लगी.

अपना घर लिए उन्हें सालभर ही हुआ था. अपना आशियाना सजाने के अरमान लिए वह इस घर में आई थी लेकिन उसी वक्त पैंडेमिक आ धमका था और सब तरफ़ बंदी हो गई. धीरे-धीरे चीजें वापस खुलने लगी थी और रश्मि ने मन ही मन बाक़ी पड़े कामों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी थी. लिस्ट में सबसे ऊपर लकड़ी का काम था, बिल्डर ने दरवाज़ों के सिवा और कुछ नहीं लगा कर दिया था. कमरों में बनी अलमारियाँ तक उन्होंने कामचलाऊ पर्दे लगा कर ढँक रखी थी.

एक बार फिर अपने घर की साज-सज्जा के सपने देखते हुए वह मोडयूलर किचन का एक डिज़ाइन देख-परख रही थी जब डोरबेल बजी.

सोसाइटी का कामदार एक लड़का था. नई सोसाइटी बनी होने के कारण बिजली-पानी का कुछ ना कुछ काम अक्सर निकल आता था और इन लोगों को बुलाना पड़ता था. एक दो बार बिन बुलाए भी वे लोग कुछ ना कुछ चेक करने आते रहते थे.

"हाँ, क्या हुआ?"
"जी मैडम, वो... पानी पिला देंगी थोड़ा." लड़के ने थोड़ा अटकते हुए कहा. उसका एक साथी फटा सा झोला उठाए, जिसमें से बिजली फ़िटिंग का सामान झलक रहा था, लिफ़्ट के पास खड़ा था.
"पानी?"
"जी मैडम, वो 804 में कुछ काम करने आए थे, उसके रेज़िडेंट शिफ़्ट होंगे कुछ दिनों में."
"अच्छा..."

काम नेकी का था मगर रश्मि फिर भी थोड़ी उखड़ती हुई रसोई में पानी लेने गई थी. इतने दिनों बाद उसे थोड़ा एकांत मिला था और उस में भी ये लड़का उसके आराम को हराम करने आ धमका था.

रेडियो पर भी विज्ञापन आने लगे थे.

"यह सब तो नॉर्मल रूटीन की चीजें हैं." सोच रश्मि ने अपने मन को थोड़ा शांत किया और लड़के को एक पुरानी बोतल में पानी दे दिया. उसका साथी तब तक जा चुका था.
"बोतल रख लो भैया."
"जी मैडम... वेलकम."
उसकी बात सुन रश्मि मुस्कुरा उठी.
"जब कोई कुछ देता है तो, थैंक यू कहते हैं, ठीक है?"
"जी. थैंक यू." लड़का थोड़ा असहज हो कर बोला.

गेट बंद कर रश्मि ने दीवार घड़ी की ओर देखा तो पाया सिर्फ़ 9:30 बजे थे. यकायक उसे अपनी सास की कमी खली थी. आज का दिन लम्बा होने वाला था.

तभी वॉशिंग मशीन का टाइमर बजने लगा.

कपड़े सुखा कर रश्मि ने TV चला लिया और कुछ देर एक न्यूज़ चैनल पर लॉकडाउन खुलने की रपट देखने लगी. एंकर काफ़ी जोर-शोर से नए नियम समझा रहा था. उसके बाद बढ़ती क्राइम रेट, चोरियों और हत्याओं की सनसनीखेज़ ख़बर आने लगी तो वह चैनल बदल एक पुरानी हिन्दी फ़िल्म, जो अक्सर उस चैनल पर आया करती थी, देखने लगी.

दोपहर का खाना उसके पति ऑफ़िस में ही खाने वाले थे, सो सुबह ही उसने अपने लिए थोड़ा चावल-भात बना लिया था. खाना खाने के बाद अचानक उसे एहसास हुआ कि आज तो वे दोनों घर में अकेले होंगे, तो क्यों ना कुछ रोमांटिक प्लान कर नवीन को सरप्राइज़ किया जाए?

बस फिर क्या था, रश्मि ने अपनी कुक बुक निकाली और बटर मशरूम की रेसिपी देख तैयारी शुरू कर दी. घर में मशरूम तो थे नहीं, लेकिन उनकी सोसाइटी में एक छोटा शॉपिंग सेंटर था जहाँ ज़रूरत का सब सामान मिल ज़ाया करता था. सो, वह झटपट जा कर सब सामान ले आई थी और डिनर का सब सामान तैयार करके हॉट-केस में रख दिया.

अब खुद तैयार होने की बारी थी.

अपने कमरे में जा कर एक अरसे बाद उसने मेकअप और वैक्सिंग का सामान निकाला. उनकी शादी को साढ़े-चार साल हो चुके थे और प्यार की वो शुरुआती कसक थोड़ी कम हो चली थी. उधर उसके पीहर और ससुराल दोनों तरफ़ से बच्चा कर लेने का दबाव भी बढ़ने लगा था. अपना घर लेने की बात कर वे अभी तक टालते आए थे लेकिन शायद अब उनके पास ज़्यादा वक्त नहीं बचा था. कुछ सामाजिक दबाव और कुछ खुद की इच्छा दोनों ही बातें थी. यह सोच रश्मि का उत्साह थोड़ा बढ़ गया. नवीन को अंदाज़ा भी नहीं होगा कि आज उसके साथ क्या होने वाला है यह सोच उसके चेहरे पर एक अल्हड़ मुस्कान तैर गई.

सुबह जहाँ रश्मि दिन कैसे कटेगा यह सोच कर परेशान हुई थी, अब मानो वक्त के पर लग गए थे. जब वह तैयार होकर निकली और एक नज़र कमरे में एक ओर रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे में खुद को देखा तो लजाए बिना ना रह सकी. उसके मेकअप किए चेहरे की दमक उसके पर्म किए काले बालों की लहक से और बढ़ गई थी. उसने एक पारदर्शी सी सफ़ेद नाइटी पहन रखी थी, जो उन्होंने हनीमून पर ख़रीदी थी. सफ़ेद नाइटी में उसका हल्का गेरुआ रंग निखर आया था और नाइटी की लम्बाई भी ज़्यादा नहीं थी.

तभी डोरबेल बज गई. रश्मि उत्साह और ख़ुशी से भर उठी. नवीन आ गया था, अच्छा हुआ, वरना उसे बैठ कर इंतज़ार करना पड़ता. फिर भी गेट के पास पहुँच उसने एक बार पीपहोल से देख कर कन्फ़र्म किया कि कोई और तो नहीं आया था.

नवीन ही था. उसने ख़ुशी से चहकते हुए गेट खोला.

"अरे कितनी देर लगा..." नवीन कहते-कहते रुक गया.

उसके अवाक से चेहरे को देख रश्मि की हंसी छूट गई और वो इठला कर उसे चिढ़ाती हुई अंदर भागी. नवीन भी तब तक उसकी शैतानी समझ चुका था और अंदर आते हुए अपना ऑफ़िस बैग सोफ़े की तरफ़ फेंक उसके पीछे लपका.

रश्मि भाग कर बालकनी की तरफ़ गई थी लेकिन फिर अपने कपड़ों का ख़याल कर ठिठक कर वापस मुड़ी, तब तक नवीन पीछे-पीछे आ गया था. अब भागने का कोई रास्ता ना था, सो वह खिलखिलाती हुई उसके आग़ोश में समा गई. उसके पति ने कुछ पल उसके चेहरे को हाथों में लेकर निहारा था और कहा था "बहुत हॉट लग रही हो." और फिर उसे एक लम्बा किस किया.

दोनों पर खुमार चढ़ने लगा था, लेकिन रश्मि ने नवीन को पीछे धकेला और उसका हाथ पकड़ डिनर टेबल की तरफ़ ले गई जो उसने बड़े क़रीने से सेट कर रखा था. "आज तो..." नवीन ने फ़िदा होते हुए उसे कहा.

खाना खाते हुए भी पति-पत्नी में छेड़ चलती रही, टेबल के नीचे पाँव-कुश्ती और नज़र-नज़र में एक हसीन रात के ख़्वाब.

डिनर करते ही नवीन उठा और शरारत भरे अन्दाज़ में रश्मि की तरफ़ बढ़ा.

"नो! नवीन... मैं डिनर कर रही हूँ ना." रश्मि झूठी सख़्ती दिखाते हुए बोली.
"लेकिन मेरा तो डेज़र्ट का टाइम हो गया है." उसने हंसते हुए क़रीब आकर कहा और रश्मि को गोद में उठा लिया.
"अरे हाथ तो धोने दो..." रश्मि भी हंसते उसके आग़ोश में मचल रही थी.
नवीन उसे उठा कर वाशबेसिन तक ले गया. हाथ तो क्या धुलने थे, बस जैसे-तैसे हाथ गीले कर रश्मि ने बदमाशी से उसके शर्ट से हाथ पोंछ डाले.
"अच्छा ये बात है..." नवीन उसे बेडरूम की तरफ़ ले जाने लगा.
"हाहाहा... हूँ." रश्मि उसके सीने से सिर सटाते हुए बोली थी.

बेडरूम में एंट्री करते ही हंसी-मज़ाक़ पीछे छूट गया था. उनकी साँसें गरम होने लगी और कपड़ों में क़ैद जिस्म छटपटाने लगे. रश्मि ने पहले ही कमरे में मद्धम रोशनी कर रखी थी और बिस्तर एक सिल्की चद्दर से सजा रखा था. यह देख नवीन ने उसके होंठों को बड़े ही पैशन से चूमा.

रश्मि को बेड पर लेजा नवीन ने उसे अपनी गिरफ़्त से अलग किया और बदहवास सा शर्ट उतारने लगा. रश्मि भी पीछे खिसक अपने पैर घुटनों से मोड़ एक मादक पोज़ में बैठ बेताब आँखों से उसे देखने लगी. पलक झपकते ही रश्मि एक बार फिर नवीन के आग़ोश में थी. इस बार उसकी गरम साँसे उसकी गर्दन पर सिहरन पैदा कर रहीं थी और उसके चुम्बन उसका रोम-रोम रोमांचित कर रहे थे.

नवीन का हाथ अब उसकी नाइटी की ज़िप टटोल रहा था, लेकिन रश्मि पीठ के बल लेटी थी, सो उसकी कश्मकश काम नहीं कर रही थी. रश्मि को उनकी सुहागरात की याद आ गई थी, जब ऐसी ही कुछ कश्मकश के बाद नवीन ने उसके ब्रा के हुक से हार मान ली थी और आख़िर उसी ने शरमाते हुए अपना तन और मन उसे सौंपा था.

अब नवीन के प्यार ने उसे भी दहका दिया था और वो अधखुली आँखों से उसकी गर्दन और चेहरे पर किस कर रही थी. मन ही मन पुलकित होते हुए रश्मि हल्की सी उठी ताकि उसके पति की तृष्णा शांत हो सके.

"नव?" एक पल बाद रश्मि ने नवीन के सीने से लगते हुए कहा.
नवीन की बढ़ी धड़कन वो अपने सीने पर महसूस कर पा रही थी और अब उसका धड़कता दिल उसकी ताल से ताल मिला रहा था.
"हम्म?" नवीन ने उसके चेहरे से चेहरा सटाते हुए कहा.
आख़िरकार वह ज़िप को नीचे खींचने में कामयाब हो गया था.
"वो मेन गेट... तुमने बंद कर दिया था?" रश्मि ने उसे थोड़ा पीछे धकेल पूछा.
"क्या... हाँ."

इस सब के बीच यह बात सुन नवीन के चुम्बन और हाथ एक पल रुक गए. पर वह फिर से उसे प्यार करने लगा.

"नहीं. शायद तुमने नहीं किया... एक बार चेक कर आओ." रश्मि ने उसके गले लगते हुए कहा.
"क्या बोले जा रही हो जान." नवीन खुमार में था.
"अरे गेट बंद नहीं किया... एक बार देख आओ ना."
"ओहो... तुम भी ना, पूरा मूड ऑफ़ कर रही हो. बाद में कर देंगे नहीं किया तो." नवीन ने उसे बाँहों में भरना चाहा.
"बाद में कौन जाएगा जान... तुम तो सो जाओगे... जाओ पहले चेक करके आओ वरना कुछ नहीं मिलेगा." रश्मि ने हंसते हुए उसे पीछे धकेला.
"ठीक है... ठीक है... जा रहा हूँ, लेकिन वापस आने के बाद तुम्हारी ख़ैर नहीं." नवीन अनमना सा बेड से उतरने लगा.

जैसे ही नवीन कमरे से बाहर निकला उसे पीछे-पीछे रश्मि के आने का एहसास हुआ.
"अब क्या... क्या हुआ?" वो मुड़ते हुए कहने लगा लेकिन रश्मि की दशा देख आख़िरी शब्द कहते-कहते उसकी आवाज़ ऊँची हो गई थी. रश्मि के चेहरे पर हवाइयाँ तैर रहीं थी और बदन पसीने से तरबतर कांप रहा था.

रश्मि ने कमरे से बाहर आते ही धड़ाम से बेडरूम का दरवाज़ा खींच कर बंद किया और और जल्दी-जल्दी कुंडी लगा रही थी.

"रश्मि... क्या कर रही हो?"
"वो... वो... वो... दूसरा लड़का... पानी माँगने आया था उसके साथ वाला... वो अलमारी के ऊपर... चाकू..." कहते हुए रश्मि बेहोश हो गिर पड़ी.

आख़िरी ख़याल जो उसके मन में आया था वो वही न्यूज़ चैनल का एंकर था.


...

प्रत्‍युत्‍पन्‍नमतिस्‍व: Presence of Mind
 

harshit1890

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"Flight"
Asman mein chamakte suraj ko dekhte hue usne samne dekha aur sidiyun ki taraf badha. Sidiyun se chadte hue vo plane ke andar dakhil hua.

" Good Morning Sir, May I see your ticket " air-hostess ke kehne par usne air-hostess ke muskurate khubsurat chehre ko dekha fir nazre niche karke uske sine par lage name tag ko
' Soumaya Tondon' Padte hue usne apni ticket aage badha di.

" 4th row left side, window seat sir " ticket wapis lekar vo andar dakhil hua to uski nazar pehli seat ke uppar lage pamplet par gayi ' Cool Flight, Fly Calmly ' Pamplete padte hue vo apni seat ki taraf badha aur 4th row left side ki window seat par jaa baitha. Baithte sath usne apna black briefcase niche rakha aur dusri taraf dekhne laga. Us row ki sabhi seat khali thi aur na hi koi piche wali row mein baitha tha. Uske kuch minute baad flight announcement hui aur plane takeoff ke liye ready ho gaya.

Takeoff ke kuch der baad air-hostess drink lekar uske pas ayi " Do you like to have a drink sir? " Usne drink lene se pehle uske chehre ko dekha aur fir uske sine par lage name tag ko
' Neha Devgan' Usne han ka ishara kiya aur air-hostess glass rakh kar aage badh gayi. Uske jane ke baad usne glass utha kar muh se lagaya aur juice pikar glass rakh diya. Juice pite hi uski nazar window se bahar jam gayi.

Jab plane apni raftar se badlon ke uppar aage badh raha tha uski nazar us samay bhi window ke bahar plane ke wings par thi jiske niche lage engine ka shor hawa ke pressure se badh raha tha. Usne apni kaliyan rotate ki aur watch ki screen par co-ordinated dekhte hue usne briefcase ko seat ke niche se bahar ki taraf khincha aur intezar karne laga. Jaise hi watch par beep ki awaz hui usne briefcase par lagge button ko press kar diya. Button ke dabte hi usne briefcase chhod diya aur usme se awaz hone lagi jiske baad energy aur light ki tarangein wahan udne lagi aur plane extreme turbalance ke karran tezi se hilne laga. Juice ka glass chatakne laga aur ise pehle logon ka shor gunjta safed roshni ne pure plane ko apni chapet mein le liya.

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Asman mein chamakte suraj ko dekhte hue vo plane ki taraf badha aur andar ghuste hi samne khadi air-hostess use dekhte hue boli.

" Good morning Sir, May I see your ticket " air-hostess ki taraf ticket badhate hue usne pehle uske khubsurat muskurate chehre ko dekha fir uske sine par lage name tag ko ' Soumaya Tondon '

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Jab plane apni raftar se badlon ke uppar aage badh raha tha uski nazar us samay bhi window ke bahar plane ke wings par thi jiske niche lage engine ka shor hawa ke pressure se badh raha tha. Usne apni kaliyan rotate ki aur watch ki screen par co-ordinated dekhte hue usne briefcase ko seat ke niche se bahar ki taraf khincha aur intezar karne laga. Jaise hi watch par beep ki awaz hui usne briefcase par lagge button ko press kar diya. Button ke dabte hi usne briefcase chhod diya aur usme se awaz hone lagi jiske baad energy aur light ki tarangein wahan udne lagi aur plane extreme turbalance ke karran tezi se hilne laga. Juice ka glass chatakne laga aur ise pehle logon ka shor gunjta safed roshni ne pure plane ko apni chapet mein le liya.

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Asman mein chaye hue badlon ko dekhte hue vo plane ki taraf badha. Plane ke andar dakhil hote hi samne khadi air-hostess boli.

" Good Afternoon Sir, May I see your ticket " air-hostess ki taraf ticket badhate hue usne pehle uske khubsurat muskurate hue chehre ko dekha fir uske sine par lage name tag ko ' Pallavi Mehta '

" 4th row left side, center seat sir " use ticket lekar vo andar dakhil hua to uski nazar pehli seat ke uppar lage pamplet par gayi ' Wind Flight, Fly with Wind ' Padte hue vo apni seat ki taraf badha aur 4th row ki center seat par jaa baitha. Baithe sath usne apna briefcase window seat par rakha aur dusri taraf dekha. Us row ki baki seat khali thi aur na hi koi piche wali row mein baitha tha. Kuch minute baad flight announcement hui aur plane takeoff ke liye ready ho gaya.

Takeoff ke kuch der baad air-hostess service karti hui uske pas ayi " Do you like to have a drink sir? " Usne drink lene se pehle uske chehre ko dekhte hue uske sine par lage name tag ko dekha ' Kriti Singh ' Naam dekhte hi usne han mein sar hilaya aur air-hostess use drink serve karke aage badh gayi. Usne glass utha kar juice khatam kiya aur window se bahar dekhne laga.

Plane apni raftar mein aage badh raha tha aur uski nazar window ke bahar hi thi. Halki-halki baarish gir rahi thi aur usi ke sath bich-bich mein bizli kadkada rahi thi. Plane ke andar thoda-thoda turbulance maujud tha. Usne apni kaliyian rotate ki aur watch ki screen par co-ordinates dekhne laga jo lal akshron mein badal rahe the, eka-ek watch mein beep bajne laga jise dekhte hi usne apne briefcase mein lage button ko daba diya. Button ke dabte hi usme awaz hone lagi, bahar bizli gir rahi thi aur dekhte hi dekhte energy aur light ki tarangein us briefcase ke charon taraf felhne lagi aur plane ke andar ka turbulance badhne laga. Samne rakha kanch ka glass chatak kar tut gaya aur itni energy wahan jama ho gayi ki pura plane zor-zor se hilne laga aur safed roshni ke bante gubbar mein visfot ho gaya jisne pure plane ko apne chapet mein le liya.

" Excuse me sir " awaz sunte hi uski ankh khuli. Uske samne air-hostess khadi use hi dekh rahi thi. Usne chehre ke sath uske name tag ko dekha ' Pallavi Mehta '

" Excuse me sir? " usne dubara awaz lagai, use samajh nahi aa raha tha ki vo so raha hai ya jaag raha hai.

" hmm " usne bas itna hi kaha.

" The flight is about to land, Please fasten your seat-belts " Air-hostess ki baat sun usne apni seat belt lagai aur uske baad vo wahan se chali gayi. Uske jatte hi usne apni window seat par dekha, briefcase wahin rakha hua tha, uske baad use apne glass ki yaad ayi jo usne samne hi rakha hua tha par ab vo wahan maujud nahi tha. Vo wahin dekhta raha aur thodi hi der mein flight land ho gayi.

Flight ke land hote hi vo airport ki parking ki taraf badha. Wahan se usne lift li aur basement mein aa khada hua. Wahan akar usne apni watch par dekha ek number likha hua tha. Vo number ko khojte hue ek kone mein khadi black sedan ke pas aya. Watch mein jo number tha vo us car ke number se match kar gaya tha. Usne sedan ke handle ko pakad kar khincha jise gadi ka darwaja khul gaya. Andar baithte sath usne briefcase ko bagal wali seat par rakha, darwaja band kiya aur gaddi start karke wahan se nikal gaya. Sadak par gaddi daudate hue vo kuch der mein ek jagah aa ruka. Jagah bahut halchal wali thi, road ke dono taraf market thi jahan logon ki chehal pehal thi. Usne watch par likhe number ko dekha '11th floor 34B ' Vo gaddi se utra, utarte waqt briefcase uske pas hi tha. Apartment mein dakhil hote hue usne lift ki jagah sidiyun ko chunna aur tez kadmo se chadte hue uppar jane laga.

'34B - Manak ' Darwaje ke samne khada vo intezar kar raha tha. Ek khamoshi vahan maujud pasri hui thi jo watch mein ati beep se tuti. Beep hote hi usne darwaja ek pattern ke tehat knock kiya. Do baar ek-ek tap diya, tisri baar do-tap aur chauthi baar mein panje se tap kiya. Aisa karte hi andar se darwaja khula aur samne ek admi aa khada hua.

" come inside " usne apne aaju baju bane apartment ki taraf dekhte hue kaha. Vo andar ghusa aur uske ghuste sath hi manak ne darwaja band kiya aur uski taraf ghuma " I suppose you have my thing which we have agreed on " manak ke kehte hi usne han mein sar hilaya " let me get you the address " Vo wahin counter par rakhe paudhe ke pass gaya aur usko gamle se ukhad diya. Usne mitti se kagaz nikala jise nikalte hue uske hath kanp rahe the. Kagaz nikal kar usne paudhe ko gamle mein dala aur uski taraf aya " I want my thing then you can have your " Manak ne itna hi kaha aur piche ki taraf zameen par gir gaya. Uske galle se khoon nikal raha tha sath hi main uske muh se khoon ki chintte bahar aa rahe the. Vo manak ke najdeek aya, zameen par pada kagaz uthaya aur mitti ko hath se hata kar padne laga.

' GALTI MAT KARNA ' usne kagaz ko apni watch se scan kiya aur kagaz ko muh mein dal chabate hue watch par aye akshron ko dekhne laga jo aage piche ho rahe the.

' ATM GALI N, KATRA ' Watch par word bante hi usne Navigation par dala aur uski location se end location tak map ban gaya. Map bante hi vo apartment se bahar nikla aur gaddi start karke location ke liye ravana ho gaya.

Location : ATM GALI, KATRA

Galiyun ki market mein jitna shor tha utni hi raunak bhi wahan maujud thi. Jitni dukane utni khubsurti wahan kharidari ke liye maujud thi. Sham ka samay aur ghumti sundar kaliyan ko dekhte hue vo market mein badh raha tha. Dukano par sajawat aur bagal se guzarte thele wale ke shor ko piche chhodte hue vo roz ki tarah apne dono taraf dekh raha tha. Anek logon ke bich uski nazar kaliyun ko hi khoj rahi thi. Kisi ne kurti pehna tha to kisi ne t-shirt aur jeans, kisi ki kamar saree mein jhalak rahi thi to koi apna top niche sarka rahi thi jo baithne ki wajah se uth raha tha. Sham ke samay aksar use kuch jane pehchane chehre mil jaya karte the jo ya to dukano par hoti ya fir apne ghar ki balcony mein khadi hokar niche ane jane walon par nazar rakhti. Uska bhi man karta tha ki sirf in khusburat kaliyun ko dur se dekhne ki jagah najdeek jakar chu bhi sake lekin abhi tak sirf dekh kar hi tassali karni padh rahi thi. Dhalte din mein ghurna asan hota tha kyun ki agar koi use pakadne ke liye piche bhage bhi to in andheri galiyun mein uske liye kho jana asan tha. Isi umeed mein ki aaj kuch use mil jaye vo apni nazar se tak-taki lagaye kabhi kisi ki chattiyun par nazar dalta to kabhi samne chal rahi ladki ki tight jeans mein matakti chutdon par. Aur jab use kisi ki khubsu leni hoti to unke bagal se nikal kar unke badan ki khusbu le leta.

Aisa karte hue aaj bhi sham dhal gayi, aaj bhi use kuch hath nahi laga, vo apni nazron se bhanp liya karta tha ki ek ladki kya chahti hai. Kisi ne bhi bhav nahi diya. Vo wapis bahar jane ke liye mudta use pehle us gali ke dusre chor par use ek aurat khadi dikhi. Halka bhari badan par chehra utna hi sundar, purple sarre mein jhalkta uska pet aur blouse mein kasi chatiyan. Dekhte hue vo ek pal wahin khada dekhta raha. Vo samne thele se kuch saman lene mein lagi thi aur vo use niharne mein. Use laga kuch der dekh kar hi man behla le par usi pal us aurat ne nazar utha kar uski taraf dekha. Dono ki nazre apas mein mili to use samajh aa gaya ki yahan bhi ghans nahi dalegi, vo apni nazre ferta use pehle vo muskura di. Muskurane ke baad usne thele walle ko chhoda aur wahan se chal padi. Vo abhi bhi wahin khada dekh raha tha, dusre hint ka intezar tha shayad use aur tabhi use vo mila, jab usne palat kar ek baar uski taraf dekha aur fir chalne lagi. Ye dekhte hi uska man jag-mag ho gaya aur uske piche ho liya. Galiyan dar galiyan, galiyun ke modh vo sab chhodta hua bas us aurat ke piche lag gaya. Andhera ho chuka tha aur gali mein bheed kam bhi hone lagi thi. Vo gali se dayein aur muda ki use wahan kuch nahi dikha, vo aurat jaise lupt ho gayi. Dono taraf ghar the, kis ghar mein ghusi hogi? vo ye soch raha tha ki tabhi piche se kisi ne uska hath pakda aur apni aaur khincha.

" tum " vo us aurat ko dekhte hi bola jo usko kas kar apne se lapete hue thi.

" lagta hai jada hi aag lagi hai "

" bahut jada " muskurate hue vo bola jise dekh vo muskurai aur uske honton ko chum liya. Honth par honth padte hi jaise uske badan mein lehar daud gayi usne bhi apne honth uske honth par rakhe aur chum liya aur usi pal wahan se kisi ko guzrta dekh usne use chhod diya.

" yahan to log aarhe hai "

" darte bhi ho... " vo hansi aur hanste hue use pakad kar wahan khadi ek gaddi ke piche le gayi.

" Yahan kisi ki nazar nahi padegi " utwala to vo khud bhi tha isliye usne bina der kiye apne honth uske hoton par rakhe aur pagalon ki tarah use chusne laga, ek pal ko to vo bhi piche girne ko ho gayi. Honth jaban sab usne laga diye uske muh mein ghusane ko tabhi piche se atte shor ne use hakikat mein laa khada hua. Jahan vo khade the theek uske piche ghar bana tha, kisi ne balcony ka darwaja khola tha.

" Mar gaya.. yahan koi dekh lega to dikat ho jayegi "

" darte bahut ho tum.. itna hi dar hai to kahin lekar chalte "

" kahan chalta.. jagah nahi hai.. "

" to fir mere sath chaloge? "

" tumhare sath? tumhare pas jagah hai? "

" hmm.. hai... "

" to chalo " vo muskura utha aur uske sath chal diya. Raste mein kitni galiyan padi aur kaun si gali se vo kis direction mein muda use yaad nahi kyun ki jabse vo wahan se nikla tha vo ek chiz se pareshan tha.

" muh mein baal kaha se aa gaye " vo bar-bar honton par ya jeebh par chipke balon ko hata raha tha. Use gudgudi ke sath ghin aa rahi thi " kahan se aye ye baal thuu thuu " vo muh se thukte hue bola jaa raha tha.

" Kya hua? " usne palat kar pucha

" kuch nahi " usne pareshani hata kar muskurate hue kaha

Chalte hue vo dono ek ghar ke samne aa ruke, jiski sidiyan niche ki taraf ko jaa rahi thi. Us ghar mein roshni aur halla gulla macha hua tha jiska shor bahar tak aa raha tha. Par use fikar nahi thi, ye jagah uske ghar se bahut dur thi aur yahan use pehchane wala bhi koi nahi tha. Use bas andar us aurat ke sath bistar par jana tha, bina kapdon ke uske badan ko apne badan se chuna tha. Bas uske dimag mein yahi ghum raha tha.

" chappal yahin utaro aur mobile phone is admi ko pakda do " us aurat ki baat sun usne samne dekha to counter ke piche ek patla dubla admi baitha tha jo baithe-baithe hil raha tha. Usne apne muh mein fanse balon ko hatate hue use dekha aur ek pal sochne laga ki phone de na de.

" phone... " vo ladhkhadati awaz mei bola to samajh aa gaya ki usne pii rakhi hai. Par phone diya bina andar nahi jaa sakta tha isliye usne apna phone aage badaya par ise pehle vo admi pakdta wahan na jane kahan se bachon ka ek group aya aur unhone phone le liya.

" bachon mera phone do.. aee... ruk.. gir jayega.. " bache us phone ko khilone samjh uske sath khelne lage aur vo phone unse lene mein laga hua tha. Kareeb do-dahi minute ki mehnat ke baad usne phone un bachon ke hath se chinna aur samne bande ko pakda diya jisne phone desk ke niche daal diya.

" harami bache " usne chappal utari aur jab dusri taraf muda to wahan use vo aurat nahi dikhi, balki us hall mein kuch log baithe the aur unpar kuch ladkiyan chadi hui thi.

" kahan gayi ye.. " vo hall mein idhar udhar dekhne laga tabhi kone mein bane ek kamre ki taraf nazar padi jiska darwaja band hone wala tha. Vo udhar ki taraf bhaga aur darwaja band hone se pehle usne kamre ke andar entry maar li. Kamre ke andar ghuste hi jaise vo muda to uski ankhein khuli reh gayi. Samne vo aurat darwaje se lag kar khadi thi jiske jism par sirf bra aur penty thi. Chatiyan kasi hui thi ya latki use bra mein samajh nahi aa rahi thi, pet halka sa latka tha bilkul zara sa, tangon ke bich fansi choti si chadi aur masal jhangein, ye sab dekhte hi uska lund khada ho gaya. Usne fauran uske chehre ki taraf dekha, 35-40 ke bich ki umar, naak par nathni aur gol sundar chehra. Ab use jada dekh kar ruka nahi gaya isliye vo sidhe uspar tut pada. Uske honton ko pagalon ki tarah chusta aur apni jeebh se honton ke charon taraf uska chehra gilla kar deta.

" bas.. khaoge kya.. ya aur kuch nahi karna " usne use hatate kar khud se piche kar diya. Vo apni kamar matkati hui uske piche gayi aur bistar ke dusri taraf jaa khadi hui.

" abhi to bahut kuch hai " usne bra ki clips kholi aur bra utar kar jism se alag kar diya. Uski nazar uski chatiyun par jami reh gayi, itne bade sudol aur itne dandedar nippples, uske lund ne jhatke khaye aur tabhi ankhon par parda sa cha gaya. Jaise hi use abhas hua to malum chala ki usne apni bra fenk di hai. Bra hatate hi jab ankhon se andhera hata to paya vo wahan thi hi nahi. Vo awaz deta use pehle uski nazar kone mein padi jahan ka darwaja khula tha. Vo muskura utha, shayad andar aur bhi sundar jagah hai, aaj to maza ayega. Vo apni shirt utarte hue wahan pahuncha aur wahan jatte hi usne apni jeans bhi khiska kar niche kar di lekin vo abhi jeans tangon se nikalta uski nazar samne padi. Kamre mein dim light thi lekin itni roshni thi ki samne asani se dekha jaa sake.

Kamre mein aurat ke sath ek ladka bhi tha, chadi mei khada patla sa, chehra bhi ek dum chikna tha. " ye kaun hai? " usne chikne ladke ko dekh fauran pucha.

" kyun kabhi do-do ke sath maze nahi liye kya mere raja.. " vo aurat uske pas chalte hue ayi aur theek use chipak kar khadi ho gayi. Itni bhari jawani vo bhi adhi nangi pehli bar uske koi itne nikat aya tha.

" m..main kuch samjha nahi... " vo bola.

" bhola hai re tu ... " usne uske lund ko kache ke uppar se masala to uski ek pal ke liye 'aah' nikal gayi. Yahi jannat hai bas.. vo yahi sochne laga.

" tu meri lega aur vo teri.. " bas jaise hi ye baat uske kano mein padi uski jannat wahin utar gayi.

" kya boli " vo ek kadam piche hua aur deewar se takra gaya. " ma..in vo nahi hun.. pagal ho kya "

" acha main pagal hun? salle .... to tujhe kya laga ye jawani tujhe aise hi mil rahi hai "

" matlab? kya tum paise logi? "

" halkat chutiye.. bina paise ke tujhe koi ladki milegi kya aur vo bhi meri jaisi jawani "

" par... mere pas paise nahi "

" to mere raja tujhse paise kahan mange hai mene.. mange mene tujhse " vo uske kareeb ayi.

" main to tujhe apni jawani free mein de rahi hun.. bas uski choti si rakam hai.. 5 minute mein jhad jayega ye " usne uske kan mein kaha to use aisa laga jaise kisi ne jabardast gali di ho use. Usne fauran use dhakka diya jise vo piche table se takra gayi.

" areee kutriya salle... haramjada.. maar diya.. " vo apni kamar ko pakadte hue boli.

" ae khada kya hai.. leni hai to pakad use.. " usne us chikne ladke se kaha jo sab hota dekh raha tha. Uski baat sunte hi vo uski taraf dauda. Apni taraf chikne ladke ko ata dekh vo kabhi us aurat ko to kabhi us ladke ko dekhne laga, waqt jaise uske liye dhima ho gaya tha. Kya karun? tabhi uski nazar nche zameen par padi jahan vo khada tha wahin theek uske bagal mein ek patla danda pada tha. Vo chikna ladka uske kareeb aa hi chuka tha par tabhi usne furti dikhate hue vo danda uthaya aur chikne ladke ke ghutne par de mara.

" oiiii maaa... " vo chikha lekin usne uske dard ko nahi samjha aur dubara de mara taki vo khada hi na ho sake.

" kamini aurat " danda chhod usne fauran apni jeans uppar uthai aur shirt pehnte hue bahar nikla jisme usne us aurat ki akhri baat suni.

" are mere customer ka nuksan kar gaya, haramjade chhodungi nahi tujhe.. ruk.. "

Bahar nikalte hi usne us darwaje ki kundi lagai aur shirt pehen kar bahar ki taraf tezi se nikla. Bahar nikalte hi vo counter tak aya jahan ab vo sharabi admi nahi baitha tha, usne counter ke niche se apna phone nikala aur chappal pehnne laga jo usne wahin utari thi.

" ye kya ho raha hai.. " vo sidhe per ki chapal pehen raha tha lekin jab bhi aisa karta to sidhe per mein ulti chapal aa jati. Vo janta tha ki jada samay nahi hai uske pas, vo aurat halla kar degi to uska yahan se jana mushkil ho jayega.

" kya ho raha hai ye.. " usne apni baat dauhrai aur is baar usne ulte per ki chappal mein per dala lekin is baar per dalte hi use malum chala ki vo sidhe per ki chappal hai. Uska sar bhanna gaya ye dekh kar ki chapal apne aap kaise badal rahi hai. Use lag raha tha ye sab jald bazi ka natiza hai, andar shor kuch badh gaya tha. Akhir mein usne dono per par sahi chapal chadai aur wahan se nikal gaya. Vo nahi janta tha ki jana kahan hai isliye raste ke sath hi aage badh gaya. Raste mein usne apni shirt utari aur use ulti karke pehen liya jise uske shirt ka rang badal gaya. Vo aram se isliye hi chal raha tha taki kisi ko uspar koi shaq na ho. Lekin Aachanak hi uske kano mein kuch logon ki awaz padi " kahin vo to nahi.. abee ruk salle.. " awaz sunte hi vo janta tha ki use bhagna hai isliye vo bhaga aur jahan jahan use jagah milti us galiyun se hote hue vo nikal jata. Sans aur dil dono hi puri raftar se daud rahe the. Bhagte-bhagte kabhi uske per kisi pathar se ladhkhadate to kabhi fisalte per ki wajah se side deewar se takra jata lekin usne bhagna band nahi kiya. Gali dar gali vo bhag raha tha aur piche se vo sabhi gunde use rukne ki warning de rahe the. Kuch der pehle ki shant gali mein halla macha hua tha.

Bhagte hue vo bas kisi tarah bahar ka rasta khoj raha tha lekin vo jaise ek maze mein fans gaya tha aur use bahar ka rasta mil hi nahi raha tha. Bhagte hue jab vo ek chaude raste mein aya to samne use do gali dikhai di, kaun si gali thi jo bahar ka rasta thi, use yaad nahi tha ki vo kahan se aya tha. Samay kam tha aur rasta chunna jaruri, vo gunde use jada dur nahi the, akhir usne ek taraf jane ka faisla kiya aur vo GALI - N mein ja ghusa.

Gali mein ghuste hi use laga vo bahar nikal jayega aur umeed thi ki shayad vo log uske baju wali gali mein chale jayenge, yahi dekhne ke liye usne piche nazar ki aur jaise hi samne ki vo samne khade admi se takra kar piche ki taraf girta use pehle us admi ne uska hath pakad liya. Hath pakadte hi vo use side mein khinchte hue le gaya. Vo gali ke bagal mein ek patli si jagah thi jo nalle ki taraf jaa rahi thi.

" lagta hai gaye.. " hafte hue vo wahin khada sunne laga. Jo gunde uska picha kar rahe the wo gali se bahar aa gaye the.

" ek kaam kar tu aage jakar dekh main piche wapis jakar dusri gali mein dekhta hu " usko ye baat sunai di aur uske baad wahan khamoshi cha gayi. Bhag bhag kar thak jane ki wajah se vo ghutne par hath rakhe khada tha. Sans par kabu patte hi jaise vo ghuma to samne wahi admi khada paya jisne abhi kuch der pehle uski madad ki thi.

" Thank you ... apne meri madad ki .. aap yahan is jagah nahi latte to main pakda jata... " usne apna hath uske left kandhe par rakhte hue kaha.

Us admi ne pehle apne kandhe ki taraf dekha jispar hath rakha hua tha aur fir nazar uske chehre ki taraf ki aur dekhte hue muskura diya. Vo uski muskan samajh pata use pehle uski ankhein puri tarah khuli reh gayi aur ek aseem dard uske chehre par umad pada. Sharir mein kuch chubne ka ehsas karte hi usne apni nazre niche ki to sine se khoon nikalta paya. Sharir ladhkhadane laga aur kandhe par rakha hath fisalte hue uski kaliyun mein aa fansa jo ghadi ki wajah se atak gaya tha. Sharir se jaan nikalne lagi to peron ne jawab de diya aur niche gir pada jiske sath hath mein us admi ki ghadi bhi aa gayi. Sharir ke girte hi zameen par khoon jama hona shuru ho gaya.

Us admi ne gun wapis rakhi, apna suit theek kiya aur wahan se bahar nikal gaya. Bahar nikalte hi wahan ruka jahan vo ladke se takraya tha aur takrane ki wajah se uska chasma niche gir gaya tha. Usne briefcase zameen par rakha, chasma utha kar use suit se saaf kiya aur ankhon par chadate liya. Inform karne ke liye usne apni kalaiyun ko moda taki watch se information bhej sake lekin kalai par watch thi hi nahi. Use watch ke bare mein yaad aya par tabhi wahan tez roshni ne us jagah ko apni chapet mein gher liya.

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Asman mein suraj ke samne atte badlon ko dekhte hue vo plane ki taraf badha. Andar ghuste hi use gate par koi air-hostess nahi mili. Vo ek pal wahan khada raha aur fir plane ke bheetar aya, kuch log wahan baithe hue the. Uski nazar pehli seat ke uppar gayi to use wahan Flight ke naam ka koi pamplet nahi dikha. Vo aage badha aur ticket par likhe number ke anusar plane ke second last row ke left side ki corner seat par jaa baitha. Seat par baithte sath hi usne apna briefcase bich wali seat par rakha aur apne dusri taraf dekha jahan baki seat khali thi. Uske kuch minute baad flight announcement hui aur plane takeoff ke liye ready ho gaya.

Takeoff ke kuch der baad air-hostess drink lekar uske pas ayi " Do you like to have a drink sir? " Usne drink lene se pehle uske chehre ko dekha aur fir uske sine par lage name tag ko dekha jiska naam use padne mein nahi aa raha tha, kuch ajeeb tarah likha hua tha. Usne fir uske chehre ko dekha jo muskurate hue use drink offer kar rahi thi. Usne han mein sar hilaya aur vo drink rakh kar piche chali gayi. Ek pal vo waise hi baitha raha aur fir glass utha kar juice pii gaya aur glass wapis wahin rakh diya. Juice pite hi vo window se bahar dekhne laga ki eka-ek uske sharir mein kuch hone laga, use apne nason mein behte khoon ke behne tak ka ehsas hone laga, ek ajeeb si ghutan uske galle mein hone lagi, hathon ki ungliyun akadne lagi aur sans lene ke liye usne muh khola to uska muh akad gaya, na vo use jada khol paa raha tha aur na hi band. Sans dhire-dhire kam hoti jaa rahi thi.

" Extreme Paralytic attack, thoda dard deta hai janta hun lekin chinta mat karo jab tak main tumhe samjhaunga ki main zinda kaise bach gaya tumhe sirf tab tak hi is dard ko jhelna padega " Awaz piche se ayi thi aur use sun kar ek uski ankh pehle se jada khul gayi thi. Uski ankh hi ek matr chiz thi jo is waqt physically hil sakti thi.

" Tumhe laga ki tum mujhe khoj kar ek goli se maar doge aur Time Vault ka badla le loge. Ek baar bhi nahi socha ki main itni asani se pakda jaunga aur mara jaunga? haa.. I killed the Time Vault Leader kam se kam thodi to respect dete yaar.. " usne ek lambi sans chhodi.

" Chalo koi nahi, next time jab uski beti ko marunga tab thodi achi kosish kar lena, maybe sach mein pakad pao " usne shaitani muskan ke sath kaha aur chup hua. Aage baithe admi ki sans dhire-dhire jaa rahi thi, vo is kosish mein tha ki apni banduk nikal kar uspar chala de par uska sharir hil hi nahi raha tha.

" Janta hun marna chahte ho par nahi maar sakte, abhi to bataya Extreme Paralytic attack, vo tumne drink pii na usi wajah se hua ye.. sab kuch tuta sa lag raha hai na? ki main tumhare timeline mein aya to kaise aya aur to aur tumhari drink mein is poision ko milaya to milaya kaise aur tum aise aur main aise? confuse? " vo ek pal ruka.

" ruko.. thoda rewind karke easy way mein samjhata hun. To kahan se shuruwat karun? Time vault se ? Multiverse se? Ya fir meri information dene wale Manak se? " vo fir usi andaz mein hansa.

" Main janta tha ki Time Vault ke leader ko marne ke baad tum log mere piche jarur aoge, You know Ideology mis-match, vo chahta tha ki multiverse mein travel karne ka haq sirf Time Vault Gaurds ko hai yani ki jaise tumhe hai taki timeline mein koi ched-chad na ho lekin mera sochna thoda alag tha. Multi-verse mein travel karne ka haq har us shaks ko hai jo timeline samajh sakta hai, use alter karne ki kshamta rakh sakta hai. Par vo meri ideology ki wajah se mujhe hamesha ke liye Time Cell mein daal kar block kar dena chahta tha kyun ki main mutiverse ko jodna chahta tha, ek walkthrough banana chahta tha jiske liye mujhe uska Time Vault chahie tha par usne vo nahi diya aur mujhe use marna pada. Lekin main Time vault ko hassil karta use pehle uski beti ne sab planing kharab kar di aur mujhe bhagna pada. Ab bas wahi bachi hai jise maar kar mein apna sapna pura kar paunga. Ye baat to mere sapne ki thi ki main aisa kyun kar raha hun, ab tumhe ye bata dun ki main bacha kaise kyun ki tumhare andar ki bechaini ko main samajh paa raha hun " usne Time Guard ka mazak banate hue kaha.

" To suno, jis informer Manak ko tumne mara " vo ek pal chup hua.

" Bechara manak, vo bevkuf ye maan baitha tha ki tum logon ki madad karke vo do kaam kar payega ek mera aur dusra use inam mein Time Watch bhi mil jayegi par vo tum logon ki asliyat kahan janta tha. Tumhe kya laga tha tum mujhe multiverse mein khoj sakte ho vo bhi apne Time Briefcase ki madad se. Tumhe to kabhi pata hi nahi chalta mein kaun se multiverse mein hun agar manak tumhe nahi batata, usne hi tumhe multiverse ke cordinates diye the aur usi ne mera address bhi jiski madad se tumne mujhe khoja aur ye sab usne mere kehne par kiya. Ab tum sochoge ki mujhe to goli lagi thi to main mara kyun nahi? Ha... itni to budhi tumhare pas bhi hogi .. jo address tumhe manak ne diya tha vo koi jagah nahi thi balki ek Time Maze tha " uske kehte hi Time Guard ki ankhein badi ho gayi lekin vo sunne ke alawa ab kuch aur nahi kar sakta tha.

" Vo Time maze mene hi banaya tha aur uska Reset button tha main, yani ki agar main mara to time reset matlab samjhe? tumhe ab samajh aya ki tum mujhe marne ke baad bhi yahan kaise aye, usi flight mein ? " uske kehte hi Time gaurd ko yaad aya ki vo apni watch se information send karne hi wala tha jiske baad kya hua tha use kuch yaad nahi.

" maaf karna time reset mein kuch kami reh gayi jo tumhe mehsus ho rahi hogi " uske kehte hi time guard ko jaise yaad aya ki har baar ki tarah kyun koi air-hostess use gate par nahi mili, na hi use koi pamplet dikha aur na hi drink serve karne wali ka naam.

" Ab tum soch rahe hoge ki mene tumhe Time maze mein kyun nahi pehchana? Aur pehchana to mara kyun nahi? " usne ek lambi sans li.

" Mere liye ye janna sabse jada jaruri tha ki Time Guard mujhe pakadne kab ane wala hai uske liye mene apne Time Maze mein Time Dizziness ka istemal kiya aur usi ki wajah se mujhe malum hua ki tum wahan aa chuke ho " usne vo pal yaad kiya jab vo muh mein fanse baal ko thuk raha tha jiska wahan hone ka koi reason nahi tha aur fir us chappal ki adla badli.

" Time Dizziness sirf tabhi kaam karti hai jab Time Gaurd wahan maujud ho aur mere Dizziness se main samajh gaya tha ki tum aa chuke ho. Tumhe dekhte hi main tumhe wahan maar sakta tha, vo bhi ek goli mein lekin mera aisa karna mujh par bhari padh jata aur Time Vault ko mere multiverse ke bare mein malum chal jata isliye mene vo Time chuna jise tum jude the, ye Flight kyun ki yahi aisa moment tha jab tum multiverse mein travel kar rahe hoge aur Time Vault tumhe track nahi kar payega, halaki aisa karne mein mujhe do baar tumhare hathon marna pada par itna kasht main bardasht kar sakta tha."

Apna Briefcase utha kar usne apna chehra Time Gaurd ke najdeek kiya " Don't worry my firend, Like Time Vault Always said, You cannot Alter time, And you will not because you will travel this Flight again and again and you will die again and again " usne halki awaz mein use kaha.

" Tumhare briefcase aur watch se main Time Vault ke leader ki beti tak pahunch jaunga aur use maar kar apne multiverse ke sapne ko sakaar kar lunga aur agar uske baad mujhe tum par daya ayi to shayad tumhe bhi is Flight se azad kar du " usne apne sath laye Time Briefcase ko uski seat par rakha aur uske button ko dabate hue, uske Time Briefcase ko utha liya.

" Good Bye, Have A Safe Flight " usne Time Gaurd ko akhri baat kahi aur apne Time Briefcase ke button ko daba diya jiske baad vo is timeline ke existance se bahar ho gaya aur thodi der baad Flight mein teevr matra mein roshni felh gayi.

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Asman mein suraj ko dekhte hue vo plane ki taraf badha " Good Morning sir, Welcome To the Loop Flight, May I see you ticket? "
 

aamirhydkhan

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माचिस की तीली
एक दिन मेरे एक दोस्त रजनीकान्त का फ़ोन आया और उसने किसी और दोस्त की बहन के बारे में बताया जो मॉडलिंग में अपना कॅरियर बनाना चाहती थी और मुझे उसकी कुछ मदद करने के लिए कहा। मुझे उसके बारे में अन्य जानकारी भी उसने दी -उम्र 20 थी और उसकी शादी नहीं हुई-लगभग 5 ' 6" लंबी-बजन 52 किलो-रंग गोरा, लंबे बाल-उसका चेहरा खूबसूरत और उसका खूबसूरत चेहरे की विशेषता ठीक चीनी मिट्टी के बरतन तरह दोष मुक्त त्वचा हैं-देखने में पतली लम्बी और आकर्षक दिखती है-स्तन बड़े और उसकी गांड दिल के आकार की थी ।

हमारे परिवार के अनेको व्यवसायों में एक व्यवसाय वस्त्रो और खासकर के हैदराबादी मोतियों और आभूषणों का भी है। और अपने एक्सपोर्ट और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए हमे हमेशा मॉडल बनने के लिए सुंदर महिलाओं की तलाश रहती है। उसने मुझसे बोला की भाई एक बार आलिया से मिल लो । तो मैंने कहा भी मुझे कुछ काम के लिए लखनऊ जाना है । उसके बाद मिल लेते हैं ।

मैंने उसे हमारी कम्पनी के अधिकारी का नंबर दे दिया और उसे कहा की वह लड़की उससे बात कर ले ।

जब मैं कॉलेज में था तो कॉलेज में दोस्तों के साथ सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी। वैसे तो मैंने कॉलेज की सारी पढाई लंदन में की है लेकिन एक बार छुट्टियों में जब घर आया तो व्यापार के किसी काम से दिल्ली से लखनऊ शताब्दी ट्रैन से 2-3 दिनों के लिए जा रहा था । वैसे तो वहाँ प्लेन से भी जाया जा सकता था लेकिन मेरे पास काफी सामान था इसलिए ट्रैन से जाने का कार्यक्रम बना र्और वही होटल में रुकने का प्रोग्राम था।


ट्रैन में चाय पीने के बाद ज्यादातर लोग ऊँघने लगे। ट्रैन वैसे तो आधी ही भरी हुई थी पर मेरे साथ की सीट पर एक साहब थे और मैं कुछ देर बाहर के नज़ारे देखता रहा पर जल्दी ही बोर हो गया इस बीच मेरे पडोसी साहब सो रहे थे ।

चुकी मैं सिगरेट पीता था और ट्रैन में तो सिगरेट पीने की दिक्कत रहती है पर फिर भी एयरकंडीशन केबिन से बाहर निकल कर टॉयलेट के पास ट्रैन का गेट खोलकर खड़ा हो गया और सिगरेट पीनी में झिझक रहा था । वहाँ इतने में टीटी गुजरा तो उसने बोला अपना ध्यान रखियेगा! मैंने टीटी से पुछा क्या यहाँ सिगरेट पी सकते हैं उसने कुछ जवाब नहीं दिया । मैंने कहा साहब ट्रैन का सफर लम्बा होता है इसमें भी कोई स्मोकिंग केबिन होना चाहिए ।

तो वह मुस्कुरा कर बोलै आप सरकार को सुझाव भेज दीजिये तो मैंने कहा सर आप सुझाव शिकायत बुक दे दीजिये मैं लिख देता हूँ तो उसने मुझे किताब पकड़ा दी और मैंने लिख दिया । मैंने कहा सर इस पर तो अमल जब होगा तब होगा। वह मुस्कुरा दिया ।

मैंने पुछा क्या सर आप भी पीते हैं?

तो वह बोला कभी-कभी पीता तो हूँ पर अभी ड्यूटी पर हूँ किसी ने देखकर शिकायत कर दी तो बेकार की मुसीबत हो जायेगी ।

मैंने कहा सर कुछ करने को तो है नहीं ट्रैन में तो या तो सो जाओ अब नींद नहीं आ रही मेरा लखनऊ का शताब्दी से वह पहला सफर था इसीलिए उससे पुछा ट्रैन कहाँ रुकेगी तो उसने बताया एक ही स्टॉप है कानपुर में । मैंने कहा सर तलब लग रही है क्या किया जाए । सर आपको तलब लगती है कैसे करते हैं?




वह बोला वैसे तो ट्रैन में मना है फिर ही आप पैसेंजर हो दरवाजा खोलकर पी लो । मैं चलता हूँ तो मुझे जैसे हरी झंडी मिल गयी सो सिगरेट निकाली और एक दो सिगरेट उसको भी पकड़ा दी । वह सिगरेट लेकर चला गया और टीटी के जाने के बाद एक सिगरेट सुलगा कर कुछ कश मारे ही थे की कुछ देर में एक बहुत हॉट लड़की आयी , बिलकुल मॉडर्न कपडे एक टाइट घुटनो के ऊपर स्कर्ट और लाल रंग का टाइट टॉप पहना हुआ था । उसके बड़े-बड़े चुचे थे और वही मेरे पास ही खड़ी हो गयी ।

उसकी पोशाक उसके शरीर के चारों ओर कसकर लपेटी गई थी जिसमें उसके बदन के सारे वक्र और आकार सब कुछ दिख रहा था । पहले तो मैं उसे देखता रहा। मेरा लंड थोड़ा ताव ले रहा था फिर ये सोच कर रुक गया कही मेरी सिगरेट पीने पर ऐतराज न करने लगे और शिकायत करने लगे तो सिगरट खुले गेट से बाहर कर खड़ा हो गया और इंतज़ार करने लगा ये चली जाए तो पिऊंगा ।

बड़ी अजीब स्थिति थी उस समय मेरी कहाँ तो ऐसी हसीना को देख कर हर लड़का सोचता है ये मेरे पास ही खड़ी रहे पर मैं सोच रहा था कि ये यहाँ से जल्दी जाए । पर वह वही खड़ी रही तो मुझे लगा ये जाने वाली नहीं है तो एक कश मार कर पहली सिगरेट बाहर फेंकने लगा, तो वह मुस्कुरा कर बोली आप आराम से पी लीजिये मुझे पता है तलब लगने पर रुका नहीं जाता।

तो मैंने कहा जी मोहतरमा ट्रैन का सफर लम्बा होता है और इसमें कोई स्मोकिंग केबिन भी नहीं होता । इनको कुछ सोचना चाहिए स्मोकर्स के लिए । तो वह मुस्कुरा दी और वापिस केबिन में चली गयी ।

अपने सिगरेट ख़त्म कर मैं भी अपनी सीट पर वापिस आ गया और आकर अखबार वगैरा पढ़ने लगा उन दिनों ट्रैन में फ़ोन और नेट नहीं चला करते थे । तो मैं उसके बाद कुछ देर बोर होता रहा मेरे साथ वाली सीट पर बैठे हुए पैसेंजर भी दुसरी खाली सीट पर चले गए शायद उन्हें मेरे मुँह से आ रही सिगरट की गंध पसंद नहीं थी और मेरे पास की सीट खाली हो गयी । फिर कुछ देर बाद सोचा चलो कुछ करने को नहीं है तो एक सिगरेट ही और हो जाए ।

तो मैं उठकर टॉयलेट की तरफ चल दिया सिगरेट फूकने । रास्ते में वह लड़की भी कुछ सीट के बाद बैठी हुई थी उससे मेरी नज़रे मिली मैं उसे देख मुस्कुराया तो वह भी मुस्कुरा दी । मैं बाहर आया तो वहाँ अब कोई नहीं था मैंने दरवाजा खोला और सिगरेट जला ली और कुछ कश मारे । कुछ देर बाद तो वह लड़की मेरे पास दुबारा आकर खड़ी हो गयी .और मैंने उसको पुछा लगता है आप भी बोर हो रही हैं और नींद भी नहीं आ रही है । वह बोली हाँ मुझे ट्रैन में नींद कम ही आती है तो मैंने कहा मेरा भी यही हाल है तो मैंने कहा ये ट्रैन का सफर बहुत लम्बा है।

तो मैंने पुछा आप कहाँ तक जा रही है तो उसने बताया मैं लखनऊ तक जा रही हूँ

तो मैंने कहा आप लखनऊ रहती हैं तो वह बोली वह वैसे तो हिमाचल शिमला की है आजकल दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रही है । लखनऊ में उसका कुछ काम है और शायद दो तीन दिन रुकना होगा तो मैंने कहा मैं भी लखनऊ ही जा रहा हूँ और दो तीन दिन रुकूंगा और मैंने उसे अपना नाम बताया । उसने कहा मेरा नाम आलिया है और हम दोनों ने हाथ मिलाया, उसका मुलायम स्पर्श पाकर मेरा लंड कठोर हो गया और मैंने कहा आप से मिल कर अच्छा लगा ।

उसके बाद इधर उधर की बाते होती रही मैंने उसे बताया मैं अकेला ही लखनऊ जा रहा हूँ और इस बीच मैं सिगरेट के कश मारता रहा और धुआँ ट्रैन के बाहर फेंकता रहा जिससे उसे कोई तकलीफ न हो ।

वह बोली मेरी साथ वाली सीट खाली हो गयी है आप भी अकेले हो तो मेरे साथ वाली सीट पर आ जाओ, तो मैं अंदर उसके साथ ही बैठ गया और हम गप्पे मारते रहे।

कुछ देर बाद मैं उठा और बोला आलिआ मैं आता हूँ और बाहर चला गया और सिगरेट पीने लगा तो वह फिर कुछ देर बाद मेरे पास आकर बोली "एक माचिस की तीली मिलेगी ?

तो मैंने कहा तुम स्मोक करती हो! तो वह बोली हाँ!

तो मैंने कहा फिर पहले क्यों नहीं बताया तो वह बोली मैंने सोचा था तुम सिगरेट ऑफर करोगे तो ले लूंगी पर तुमने की ही नहीं ।

मैंने कहा सॉरी मुझे लगा तुम नहीं पीती हो,अगर पीती होती तो इतनी देर कैसे रूकती, तो वह बोली इतनी नहीं पीती कभी-कभी पी लेती हूँ पर तुम्हारे मुँह से आ रही सिगरेट की स्मेल ने तलब जगा दी है।

तो उसने अपनी जेबे टटोली और बोली मेरी सिगरेट लगता है बैग में है । मैं लेकर आती हूँ तो मैंने कहा आप कौन-सा ब्रांड लेती हो इससे पहले वह कुछ बोलती मैं फिर बोला गर ब्रांड की परवाह नहीं करती हो तो मेरी डिब्बी से ले लो और अपनी क्लासिक की डिब्बी खोल कर एक सिगरेट आगे निकाल कर उसके-उसके आगे कर दी। तो वह बोली मेरा भी यही ब्रांड है ।

उसके बाद उसने एक सिगरेट अपनों लाल रसभरे ओंठो से लगाई तो मैंने माचिस जलाकर उसकी सिगरेट जला दी उसने कहा थैंक यू और फिर दोनों जोर से हस दिए ।

मैंने कहा इतनी देर तक तलब कैसे बर्दाश्त कर ली तुमने1 मेरे सामने कोई पी रहा हो तो मुझसे तो रुका ही नहीं जाता।


वह बोली मैं कभी-कभी दोस्तों सहीलियो के साथ पी लेती हूँ तो मैंने कहा कभी-कभी पीती हो और डिब्बी रखती हो! तो वह मुस्कुरा कर बोली दिल्ली के बाहर कई बार ब्रांड नहीं मिलता इसलिए स्टॉक लेकर चलना पड़ता है।

अब आप से परिचय हो गया है इसलिए कोई दिक्कत नहीं है । । खैर इस तरह सफर कटा और हम दोनों दोपहर से पहले लखनऊ पहुँच गए।

लखनऊ में हम अलग हो गए और जब होटल पहुँचे तो वह भी उसी होटल में ठहरी जिसमे मैं ठहरा ।


हमारी कम्पनी ने कुछ विदेशी ग्राहकों को अपने नए प्रोडक्ट और वस्त्र पेश करने थे और हमारी टीम वहीँ पर थी और मैं कुछ कीमती समान खुद ले कर गया था। वहाँ पहुँच कर मुझे मेरे मैनेजर ने बताया की आपके दोस्त रजनी ने किसी मॉडल को मेरा नंबर दिया था और वह लड़की लखनऊ में है और मैंने उसे आपसे मिलने को बोलै है । चुकी उस समय हम एक छोटा-सा फैशन शो अपने ग्राहकों के लिए कर रहे थे तो काफी सामान मेरे साथ आया था । उस समय हम थोड़ा बिजी थे तो मैंने मैनजेर को बोला लड़की को शाम को आने को बोलो ।

शाम के समय में मेरे कमरे की बेल बजी और मैंने दरवाजा खोला तो आलिआ मेरे सामने थी। उसके गले में डबल मोती की माला थी, जो उसके हंस जैसी सुंदर गर्दन, और उंगलियों पर हीरे की अंगूठी उसकी सुंदरता की बढ़ा रही थी थी। मेरे लिए वह मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स दोनों का मिला जुला रूप लग रही थी और हम दोनों एक दुसरे को देख कर बहुत हैरान और खुश हुए और मैंने उसे खाने पर आमंत्रित किया और हमने मेरे कमरे में ही खाना खाया ।

उसके खूबसूरत चेहरे को देखकर मैं सोच रहा था कि उसकी चूत कितनी खूबसूरत होगी और मेरा लंड खड़ा हो गया। हमारी बातचीत के दौरान समय-समय पर मेरा लंड सख्त होता रहा। कुछ मौकों पर मुझे अपनी स्थिति को समायोजित करना पड़ा ताकि मैं अपने लंड की कठौता को छुपा सकूं।

तो आलिया ! आप फैशन मॉडल बनना चाहती हैं? मैंने उसके घुटने थपथपाते हुए कहा। हमने इसके बारे में थोड़ी देर बात की और मैं इतना केयरिंग और विचारशील लग रहा था कि उसने मेरे साथ खुल कर बात करना शुरू कर दिया। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह यौन रूप से भी सक्रिय नहीं थी। बातचीत काफी सुकून भरी थी भले ही थोड़ी-सी सेक्स पर चर्चा की गई पर उसे यह अजीब नहीं लगा कि उसने अपने सबसे करीबी दोस्तों के साथ भी अपनी सेक्स लाइफ के बारे में कभी चर्चा नहीं की थी और फिर भी यहाँ वह मेरे साथ काफी खुल गयी थी। शायद हमारा परिचित होना उसके संकोच को कम कर रहा था।


मैं उसे बोला आलिया आप बहुत सुंदर हो और क्या आप वह सब पहनेगी जो फैशन मॉडल पहनती हैं तो वह बोली वह सब कुछ करेगी ।

मैंने पुछा क्या मैं तुम्हे किस कर सकता हूँ तो उसने पल के झुका अपनी सहमति दी।

मैंने उसके गालो पर किस किया तो उसने मुझे पकड़ कर वापिस मेरे होंठो को किस किया और मेरे सर को जकड़ के अपने मुंह से मेरा मुंह लगा दिया और वह मेरे ओंठ चूसने लगी और मैं उसके ओंठ चूसने लगा। थोड़ी देर बाद उसने अपना मुंह थोड़ा-सा खोला और मेरी जीभ आलिया के मुंह में चली गयी।

आलिया ने मेरी जीब चूसने लगी फिर मेरी झीब से खेलने लगी मैं उसकी जीभ से खेलने लगा और मुँह घुमा-घुमा कर उसे चूमा औरउसके मुँह पर उसकी सारी लिपस्टिक फ़ैल गयी कुछ देर सांस लेने के बाद वह मेरे-मेरे साथ लिपट गयी कम से कम 15 मिनट हम एक दुसरे के लबों को चूमते रहे ।

और मैंने मुँह आगे किया और उसे किश किया तो उसने भी किश का जवाब दिया और फिर मैं उसके पीछे हाथ ले गया और मैं उसकी गर्दन के चारों ओर एक हाथ लपेटा और दुसरे हाथ से उसके और उसके स्तनों की सहलाने लगा और उन्हें दबाया। उसने अपनी कमीज के बटन खोलने शुरू कर दिए और फिर उसने अपने आंशिक बटन वाले ब्लाउज को उसकी बाहों से और भी नीचे खिसका दिया। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता उसका ब्लाउज उसके स्तनों से फिसल गया और उसकी बाँहों से बाहर निकाल दिया।

"वाह आलिया तुम सच में बहुत सुंदर हो" मैंने उसकी तनावपूर्ण प्रतिक्रिया को भांपते हुए कहा, " निश्चित रूप से अन्य लोगों ने आपको पहले भी ब्रा में देखा है! उसके बड़े स्तन उनके बीच की दरार, उसकी लंबी टांगें, उसकी चुभती बड़ी आँखें, उसके गोल, कूल्हे मुझे आमंत्रित कर रहे थे । आलिया बोली आज से पहले मैंने कभी किसी पुरुष के सामने इस तरह से बिकनी पहन कर नहीं गयी हूँ । मैंने उसके स्तनों को चूसा ।

बेशक! आलिया अब मैं तुम्हे पूरी नग्न देखना चाहता हूँ। मेरा लंड कड़ा और खड़ा हो गया था । मैं उसके पास गया और उसकी पीठ के पास गया तो वह बोली प्लीज मेरी ब्रा खोलने में मदद करो

मैंने आएगी बढ़ कर उसकी बिकनी खोल दी और उसके बड़े स्तन उछल कर बाहर आ गये और मैं उन्हें देखने लगा और उन्हें छुआ और हलके से दबा कर उसके चुचकों को सहलाया और बोल ये बहुत सुंदर हैं ।

फिर मैंने उसकी स्कर्ट की ज़िप जो की उसकी पीठ की तरफ थी उसे खोलने में उसकी मदद की और वह सरररर से जमीन पर गिर गयी ।

अब तुम्हारी सुंदर बैंगनी पैंटी के बारे में क्या विचार है। "मैं उसके कान में फुसफुसाया।" मुझे उसे उतारने के लिए कहो। "शब्दों को बाहर निकालने से पहले उसने कुछ गहरी कंपकंपी भरी साँसें ली।" कृपया उसे भी ले लो। उउउ। "" बिल्कुल सही आलिया। मैं इसे तुम्हारे लिए करूँगा। "

मैं अपने हाथों को उसकी पेंटी तक सरकाया और उन्हें नीचे उसकी टखनों तक खींच दिया। जैसा कि अपेक्षित था, उसका शरीर बहुत सुंदर और बिना किसी प्रकार के दोष या दाग के था। उसके सुडौल स्तन सख्त औरबिलकुल ढीले नहीं थे। उसके निप्पल उत्तेजना से सख्त थे और मेरी ओर इशारा कर रहे थे। उसकी सूजी हुई भगंदर उसके निचले होंठों के बीच से बाहर झाँक रही थी, उसकी बाल रहित योनि चिकनी लग रही थी

"अब देखते हैं कि हमारे पास यहाँ क्या है।" मैंने उसकी गांड के गालों को पकड़कर अलग किया तो मुझे उसकी सुंदर गुलाबी चूत और उसके गुदा का फीका पड़ा हुआ घेरा दिखाई दिया। "मम्म, अच्छा। देखते हैं आप कैसा महसूस करती हो।" मैंने अपने दाहिने हाथ से उसकी गांड को छोड़ा और उसके टांगो के बीच योनि क्षेत्र में सरका दिया। उसकी चूत गर्म थी।

मैंने पीछे से अपना हाथ उसके पेट तक पहुँचाया और पाया कि वह क्लीन शेव है। वह अब कांप रही थी उत्तेजना और डर के साथ। मैंने अपनी उँगलियों को उसकी चूत के साथ आगे-पीछे, आगे-पीछे, आगे-पीछे रगड़ना शुरू कर दिया। कभी-कभी मैं उसके भगशेफ पर रुक जाता और उसे एक छोटे से घेरे में रगड़ता। फिर आगे-पीछे। ऐसा होने में केवल एक या दो मिनट का समय लगा। वह जानती थी कि वह अब झड़ने वाली है। उसे लगता है जैसे किसी ने उसके अंदर एक अंगूर कुचल दिया हो। उसकी उत्तेजना का गर्म, चिपचिपा तरल बहने लगा।

उसे चूमते हुए और उसकी चूच को सहलाते हुए अपनी उँगलियों को दौड़ाते हुए, मैंने धीरे से उसे बिस्तर लेटा दिया मैंने अपने कपड़े उतार दिए और नंगा हो गया और मेरा लंड पूरी तरह से सीधा हो गया और मैं उसकी बगल में लेट गया।

वह मेरे खड़े हुए लंड को घूर रही थी। तुम्हारा लंड बहुत बड़ा है, " उसने कहा।

" मैंने उसकी खड़ी भगशेफ को अपने अंगूठे के बीच ले लिया और तर्जनी और उसे दबाया।

"ओउओ," उसने मेरे हाथ से अपने नितम्बो से थपथपाते हुए कहा।

मैंने उसकी भगशेफ रगड़ना जारी रखा और फिर, बहुत मुश्किल से उसके अंदर एक ऊँगली और गिर दूसरी उंगली खिसका दी उसकी योनि तंग थी, बहुत तंग थी, मुझे आश्चर्य हुआ कि क्या वह मेरे विशाल लंड को समायोजित कर पाएगी। मेरी उँगलियाँ उसके अंदर गहराई तक मालिश कर रही थी और जब मैंने उसका जी स्पॉट सहलाया। " मैं उसके क्लिट को दबाता रहा और धीरे-धीरे उसकी गीली चुत में अपनी उँगलियाँ घुमाता रहा और धीरे उसे उँगलियों से चोदने लगा। जब मैंने अपनी उंगली बाहर की ओर खींची तो उसने उंगली को पीछे हटने से रोकने के लिए अपनी नितम्ब ऊपर उठा दिए।

वह मजे से कराहती रही जबकि मैंने उसे उंगली से चोदा। थोड़ी देर बाद उसने मेरा लंड पकड़ लिया और मुझे अपने ऊपर खींचने की कोशिश की। मैंने उस पर चढ़ गया लेकिन उसकी चूत में लंड घुसाने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय, मैंने उसके गीली चूत के ऊपर अपना लंड ऊपर-नीचे रगड़ा और उसके क्लीट से उसकी चूत तक लंड रगड़ा।

वह अपनी आँखें बंद करके बड़बड़ाती रही, "ओह आमिर," और उसके कूल्हे चुदाई की गति में ऊपर-नीचे हो रहे थे।

आह्ह्ह्ह! "वह हांफ गयी और उसने खुद को झटका दिया क्योंकि उसकी उत्तेजना की पहली लहर उसके ऊपर सवार थी और मैंने कहा।" अच्छा बहुत बढ़िया! अब आप तैयार हैं। "

मेरा लंड गर्व से खड़ा होकर तैयार था। मैंने सही पोजीशन बनायीं और चिकनाई देने के लिए कुछ बार अपने हाथ का उपयोग अपने लंड के सिर को उसके चूत के होठों के ऊपर आगे-पीछे करने के लिए किया फिर एक जोर से ढ़ाके के साथ, मैं अपने; ंद को पूरी तरह से उसके अंदर घुसने के लिए मजबूर कर दिया। "उन्घ्ह!" वह चिल्लायी है। मैंने लंड को धीरे-धीरे बाहर खींचा और फिर से, इस बार पहले से भी ज्यादा जोर से लंड अंदर धकेल दिया और लंड योनि के ह्यमन को चीरता हुआ उसकी चूत में जड़ तक चला गया। कुछ देर वह सबकी और फिर कुछ ही झटके में, मैंने अपनी लय पर चुदाई शुरू कर दी बार-बार मैं पूरा बाहर निकालता सिर्फ लंड मुंड चूत में रहने देता और फिर पूरा अंदर धकेल देता। उसकी चूत बहुत तंग थी और पूरी गीली थी। चूत के ओंठ लंड पर कस कर चिपके हुए थे और मेरे ओंठ उसके ओंठो से और मेरे हाथ उसे स्तनों से चिपके हुए थे।

जब मैं लंड बाहर निकालता और फिर अंदर धक्का मारता। प्रत्येक धक्के से उसके मुँह से इच्छा और भय और सुख और दर्द की एक और पशुवत ध्वनि युक्त कराह निकलती। फिर, कुछ ही मिनटों में, मुझे लगा कि उसकी योनि मेरे लंड के चारों ओर सिकुड़ रही है। वह कामोत्तेजना के चार्म पर थी और हांफती हुई सांस ले रही थी, रो रही थी, आधा कराह रही है और आधा सह रही है। फिर मैं भी चरम पर पहुँचा और मेरे धक्को की गति बढ़ गयी। मैं इसे अब और नियंत्रित करने में असमर्थ हो गया और मैंने उसे करीब खींच लिया और अपने वीर्य की उसमें पिचकारीया मार दी।

मैंने कुछ मिनटों के लिए उसे ऐसे ही पकड कर रखा । जब मेरी सांसें थम गईं मेरा स्खलन पूरा हो गया तो मैंने अपने लंड को उसके अंदर सिकुड़ता हुआ महसूसकिया। मैं पीछे हटा और उसकी योनी को देखा। खून से सना मेरा वीर्य उसकी चूत से बह कर चूत के द्वार पर जमा हो गया था। मैंने उसे किश करना शुरू किया और साथ-साथ उसके स्तनो को दबाने लगा मैं जल्द ही फिर से लंड को कठोर होता हुआ महसूस करने लगा। मैंने लंड को चूत के अंदर और बाहर तब तक किया जब तक कि उसकी चूत से निकलने वाला तरल पदार्थ कम होने लगा और उनका अंदर खिसकना कठिन और कठिन होता गया।

वह अपनी पीठ के बल लेट गयी और अपने पैरों को चौड़ा कर लिया। जैसे ही मैं उसके पैरों के बीच चढ़ा, उसकी आँखें बंद हो गईं, उसका शरीर मेरे राक्षसी लंड के हमले की आशंका से कांप रहा है। मेरे बड़े लंड का सिर उसकी चूत के होठों को अलग कर रहा था। "प्लीज आमिर।" उसने अपनी एड़ी को बिस्तर में खोदा, मैंने उसकी कलाइयों को पकड़ कर दबाया, उसका शरीर मेरे वजन से दब गया। , मैं उसके गले को चूमने लगा। एक जानवर की तरह मैंने उसके स्तनों को चूसा और कुतरा। उसने मेरी तरफ देखा, मेरा लंड उछल रहा था मैंने उसमें प्रवेश किया। उसकी चूत में मेरे बड़े लंड को फिर घुसा दिया उसके पैर की उंगलियाँ एक परमानंद के साथ मुड़ जाती हैं और एक कराह निकली। "अरे नहीं। आह्हः हाय।" उसने कहा और इंच दर इंच लंड उसकी चूत में समा गया और लंड का सर उसके गर्भशय ग्रीवा से टकराया और उसमें दब गया। मेरा मोटा लम्बा और बड़ा लंड उसकी योनि को धक्का दे रहा था ।

"आलिया," मैंने एक मुस्कान के साथ कहा, फिर मैं अपनी चूतड़ उठा-उठा कर धक्के मारने लगा। " ओह आलिया मैं खुद को उसके अंदर-बाहर करते हुए कहता रहा। उसकी तंग चूत ने मेरे लंड को ऐसे जकड़ा हुआ था जैसे वह चाहता था। उसने अपने शरीर को शाप दिया। उसकी लम्बी चिकनी टांगो के बीच की तंग गुलाबी दीवारों ने मुझे खुश करने की पूरी कोशिश की और अब मेरे हर धक्के के साथ कराह रही थी।

"नहीं, नहीं। आमिर आप नहीं जानते कि आप क्या कर रहे हैं।" "हाँ, आलिया।" मैंने अपनी बाँहों को उसकी पीठ के चारों ओर लपेटा और उसकी गहराई में लम्बे-लम्बे शॉट लगाते हुए उसे चोदना जारी रखा। मेरे होंठ उसकी ओंठो गर्दन और छाती और निपल्स पर घूम रहे थे और मैं उसे कह रहा था वाह! आलिया मजा आ गया ओह आलिआ "रुको आमिर," उसने साँस छोड़ते हुए कहा। उसके पैर चौड़े फैले हुए और हर धक्के के साथ जोर से हिल रहे थे। मेरी मर्दानगी उसके अंदर और बाहर जबरदस्ती और तेजी से फिसल रही थी और उसे बार-बार खोल रही थी, जहाँ तक जा सकता था वहाँ तक मेरा लंड हर बार जा रहा था और थप-थप का आवाज आ रही थी क्योंकि मेरी गेंदे भी उसकी चूत के ओंठो से टकरा रही थी । उसके शरीर ने जितना हो सके उतना चिकनाई दी लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। "ओह्ह्ह्ह, ओह, आमिर तुम मुझे दर्द हो रहा है। कृपया रुको। मत करो।" "हाँ, आह...आह, आलिया तुम बहुत टाइट हो।"

उसके हाथ मेरे कंधों को धकेल रहे हैं। फिर भी वह सावधान थी की कि वह मुझे पंजा या खरोंच न मार दे इसलिए उसने आधे-अधूरे मन से मुझसे लड़ाई की और पलट गयी और वह अपने पेट के बल लेट गई। मैंने अपना लंड उसकी चूत में पीछे से पूरा अंदर तक धकेल दिया। मैंने उसकी पीठ पर लेट गया, दोनों हाथों को उसके स्तनों के नीचे ले जाकर स्तनों के दबाने लगा और उसके निपल्स को निचोड़ दिया। मेरा सिर उसके उलझे काले बालों में दब गया है। उसमे से पसीने और सेक्स की गंध आ रही थी। जैसे ही मेरा लंड उसके अंदर और बाहर होने लगा कुछ हो देर में उसका शरीर काम्पा और अकड़ा और उसकी चूत से सफेद और चिपचिपा रस निकला। ओह आलिआ। " मैं कहता रहता हूँ कि मेरी जांघें उसके नितम्ब के गालों के खिलाफ तेजी से और तेज टकराने लगती हैं। वह तकियो को अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लेती है। मैं उसकी टखनों को अलग करता हूँ, उसके कूल्हों को थोड़ा ऊपर उठाता हूँ और उसे घोड़ी बना कर फिर छोड़ने लगता हूँ।

"आमिर ओउ, ओउ, यह बहुत गहरा गया है।" "हाँ," मैं उसके कान में फुसफुसाया। "और वह अब पहली बार बोली चोदो जोर से चोदो आमिर और तेज करो-करो और तेज अहह! मैंने अपने स्पीड बढ़ा दी और बोलै आलिया मेरा होने वाला है।" "हाँ, जोर से करो रुको मत तेज और जोर से।" वह भीख माँगती है।

वह भीख माँगती है क्योंकि वह चाहती है कि यह खत्म हो जाए। वह यह भी नहीं जानती थी कि उसने क्यों कहा। उसे बस इसे खत्म करने की जरूरत थी । वह बोली रुको मत ! अंदर ही करो! उसने हिसाब लगाया वह सुरक्षित दिनों में थी अब मेरा वीर्य उसे गर्भवती नहीं करने वाला था। कराहते हुए मैंने तेज पम्पिंग जारी रखी ओह हाँ। "मेरा शरीर काँप उठा।" आप बहुत आकर्षक हैं। " उसके पैर कांप रहे थे उसकी चूत गर्म हो रही थी। वह मेरे वजन के साथ सांस नहीं ले सकती थी। उसके भीतर गहरे से ज्वालामुखी मैग्मा की तरह फूट पड़ा। मेरा वीर्य हिंसक फुहारों में निकला, मेरे कूल्हों के आगे के झटके के साथ, उसे पसीने से लथपथ, सेक्स से लथपथ सोफे में दबा दिया। मैं उससे उठ गया। रिहाई की सांस के साथ, मैं एक और शब्द के बिना अपनी कुर्सी पर बैठ गया। फिर हम दोनों बाथरूम में गए और खुद को साफ़ किया और धोया और फिर एक बार और मैंने उसे चौदा और उसके बाद उसकी टाइट चूत में ही लंड दाल कर उसके साथ रात में सो गया । मेरे पास उसके लिए और भी थे।

सुबह एक बार फिर मैंने उसे चौदा और अगले दिन के फैशन शो में वह शो स्टॉपर थी । हमे बहुत सारे एक्सपोर्ट आर्डर मिले और आलिया को हमारे ग्राहकों से मॉडलिंग का काम मिला और अगले तीन दिनों तक हम दोनों चुदाई करते रहे ।


(संवैधानिक चेतावनी: सिगरट पीना स्वाथ्य के लिए हानिकारक है)
 

nilu12

kaise batau nilu ladke ko bhi kahate hai.
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Ghar aur fuck screen

Toh aap ne ghar dekh liya na bhabhi ji. Ha bhaisab ghar thik laga mujhe. Raj tumhe kaise laga ghar. Haa... mummy mujhe bhi acha laga..( bat darasal ye hai ki main aaj apne mummy aur sisters ke sath ek ghar dekhane aya tha. Yahi discussion chal raha hai). Mummy main mera bedroom dekh ke ata hun.
Mummy: thik hai beta.
Main jab room main enter kiya ek thande hawa ka jhoka mere sharir ko chhu gaya...
" tum mujhe dekh sakte ho na" mere piche se awaj aa gaye aur is achanak ke awaj ki wajah se main darr gaya..maine piche mudake dekha toh ek bahot hi handsome ladaka khada tha achi khasi body thi. Lambe baal gora rang..
Main:- kon ho tum, aur dekh sakta hun mtlb tu insan hai koi bhi dekh sakata hai..
Ladka:- ha ha ha kya bat kar raha hai main insan nahi hun..MAIN EK BHOOT HUN.
"Bhaiya sara saman se ho gaya hai bus tumhara hi room baki hai" neha mujhe kuch bol rahi thi aur main dara hun khada tha Q ki neha ne jab room main pravesh kiya tab woh us ladke ke aar paar gujar chuki thi...
Haan ha ha dekh liya choti tu ja kar mummy ki help kar.
Jab neha chali gaye tab maine ladake se pucha tum sirf mujhe hi q dikh rahe ho. Kya tum sach main bhoot ho...
Ladka :- shayad mere purvajo ne tumhe chuna ye kam aage badane ke liye. Is liye main sirf tume dikhai de raha hun.
Mai:- konsa kam?
Us ladke ne mere sir pe hath rakha aur kuch budbudaya..
Mere andar kuch jyada hi tandrusti mehsus hone lagi.
Ladka: ab tumhe kisi bhi ladki ya aurat ko chuna hi sirf.
Mai :- ise kya hoga?
Ladka :- pahile tum chhu lo fir pata chalega.
Mai bahar nikala mere samane maa khadi thi uske hato main kuch saman tha... mai madat karne ke bahane maa ka hath chu liya.
Dinggg ke sath maa ke sar par ek screen open ho gaya.. uspe likha tha
FUCK SCREEN
Name :- kajal thakur
Sex interest:- B Interest in me :- A
Open sex desire:- B
Phrase to say:- maa main apaka pasina poch deta hun.
Reward:' two sex increasing pills

Husshhhh ye kya tha. Mere pao latlat karne lage.. main us ladke ki taraf dekh aur pucha ye kya hai bhai..
Ladka:- ab se tum ho night king....tum jab chaho jise chaho chod sakate ho tumhe sirf usko chuna hai aur jo phares diya hai usko bolna hai..
Mai:- ok thik hai par tum ne ye mujhe q diya? aur tume ye taqat kaha se aye? Aur tum kam kya karte the?
Ladka:- shayad mere papa se mujhe mili thi. Agar mera bacha ho jata toh ye takat mai use de deta. Par mera achanak se death hone ke wajah se ye taqat main tume de raha hun.
Mai:- tum mare kaise?
Ladka:- hahaha ha ha . Mujhe batane main sharam ayegi.
Mai: are bata na.
Ladka:- bathroom gaya tha toh sabun se pair fisal gaya. Aur khallas
Mai:- woh sab thik hai par tumne ye taqat mujhe q di.
Ladka:- mai aab sex toh nahi kar sakata toh tum mujhe dikha sakto ho... is liye ye tume di gaye hai..chalo aab kam pe lag jao. Jo diya hai woh phrase maa ko bol dena.
Mai:- pagal hai kya? Mai nahi bolunga bahar chalate hai kisi aur ko touch karke dekhate hai.
Ladka:- nahi nahi tum isi pe try karo.. agar nahi kiya toh main ye taqat wapas le lunga
Mai: per kaise yar maa hai woh meri?
Ladka:- toh kya hua jara dekh use kya gajab maal hai.. etna hot maal maine aaj tak nahi choda.
Mai:- par mai kaise?
Ladka:- karega kya taqat wapas lun
(Mai soch raha tha karu ya na karu. Q ki abji tak main kawara tha. Koi ladaki mujhe bat bhi nahi karati thi.. dikhane main avrage hi tha toh kon ghas dalega mujhe.)
Ok ok thik hai kahate hue mai bahar maa ke pass chala gaya...
Mai:- maa kitana kam karogi thoda aram karo..dekho kitana pasina aya hai lao main poch deta hun.
Jaise hi maine rumal se maa ke gal ke aas pas ka pasina puchane ke liye aage bada toh hum dono ekdam najdeek aa gaye.. iske chalate maa ka khubsurat gora sa chahera mere samne aa gaya.. maine jaise hi chehara pucha....

Dinggg
KISS HER ON HER CHEEKS
 

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THE CREATER OF DEVIL FIGHTER
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Man Bawlo



Mai apni badi si gaadi ke piche ek sire pe apna ek hath pe apna sir rakhe apne ek per ko mod uspe rakhe leta ek geet joro se gaa raha tha gaa kya raha tha apni kukur jesi aawaz me chilla raha tha or geet ke bol kuch aise the " Maro dildo le ek pappi de "

Tbi mere kokuch khil khilati hasne ki aawaz aati he to unko sun mero man bawlo unko dekhne ko karah hai jese hi dekhne ko sir utha guma ke dekhu hu pta nhi konsa tufan aawa hai mai dhaam ki aawaz ke sath mati me giru hu

Jo aawaz pehle aa rahi thi ab we itni joro howe hai ki maro gaadiwalo drawar jo shehar me howa he na wo bi apni 10 pahiya wali gaadi (2 bel yani saand wali belgaadi) ne rok uh aawaz traf dekh he fir uki najar mar pe pad he

Gaadiwala - are chhora tu mati me kyo pado he dekh chhoraya tann dekh has he tuth jaldi su

Mai baat puri bolwa se pehle kapda saaf kar uth khado ho gayo fir gussa su gaddiwala ne dekhu hu

mai - kai kaka pehla to patak diyo ab chhoraya samah nuah or keh raho he pta hona ki mai pachhe soto hu

Abhi kaka kuch kehto fir wo hi hasi ki aawaza man fir bawlo he dekhne ko ho gayo jaha 4-5 chhoraya thi lekin ek unme kalo burko dale thi jiki wo kaali kaali moti aankha nu dekh sab bulwa lago kuch bera na raho manh bich bich shayam ki tandi hawa ji me udato wo kaalo nakab jimah dikhta wo gulabi hotho me dudh sa safed daant bas ito hi dekh maro man bawalo ho gayo

Gaav ki har chhori ne behan mann tho aas paas ke gaav ki ne bi sath muskil najar aawa chhoraya thi kyoki din me kaalo padwa ko yo dar maa sab chhora ke liye shaap se kam kona tho or shayam - subah ghar ko kaam se fursat kona mila tho aah samjho akaal hi pado chho

Aaj ramo ki byah se pehla ko din ho jimah sirf gaav lugaya (mahilaye) ho thi unko masti gandi hasi majak ke sath naach gaano chho(hai) jinah dekhne ke liya gaav ka sabhi chooraya no man bawlo tho lekin kai kare gaav ka kisi bhi mard ne jaba ki manahi thi shehar me inha garam belan karaykaram kehaw hai

Un chhoraya ne jate hi mai jaldi su ek tarf bhago apni pent utar kachho nicha kar lund bahar nikal maarane lago " ohh betichod uth , uth sale abhi to mujhe apne bachho ki amma mili hai ye yeh gajab ho gaya ab use apne bachho ki amma kese banaunga "

ohh thari majo aa gayo uthgo lodo amma banegi ab to.. mai bada khus ho gayo ki maro saman kam kar raho hai agar kaam na karto ne to kaka ki lugayi or chhoro mara naam kara leto bhosdiko ghar sansar mitawa lag raho chho

Fir bina kaka ki gaadi ke mai paidal hi chal diyo jaha gaav ka chhora aaj ko gaav ki aurata ko karyakaram dekhwa ke liye jhugad laga raha tha ab itno sidho to mai bhi kon chho lekin jab dekhba ne na milno chho to fir kahe ki panchayat karno

Ghar baitho un aankho me khone lag raho chho ki tbi ek bhari aawaz se kho ba bach gayo yah to ramu ka baap mara bada kaka tha ve bula raha tha to mai gayo

bada kaka - sun chhora ja ghara kaki ne kehjo me bajar ja raho hu saman lewa der ho jayegi

mai - thik hai kaka keh dougo

bada kaka - are pachhe kai karoge abhi jana

Kaka ki baat sun bado raji ho gayo jadah gaav ka sab chhora dekhwa ki jugad me lada pada hai mane wahi bhej raha hai mai bhi chal diyo shayam ka 5 baja tha bahar baitha kaka ne puchha kathe ja raho chhe to bta diya to kaha ja tari kaki ne keh de ja ke

Mai aagan mai dekho sab neem ke ped niche ek ghera aurata bethi thi sath gaav ki sab chooraya bhi thi kisi ki marape najar na padi thi do aurata gandi gaali ke sath nachti gaati ja rahi thi jimah sab aurata sath de rahi thi ek aurat dusri ko lenga ne pura utha nangi kar pachhe lag chudai kare he jisa kar rahi thi sab hasba lag raha tha mari gud ki dali wah kaali moti aankha wali bhi sharam se niche dekh has rahi thi sathi ek aurat or thi jo bhi burka me thi wo pako uki ammi chhi

Gaav ki bhabhiya or kaki ko nango dekh wo bhi pehli wari hath paav kaam karana band kar diya tha saas jora se aa raho tho niche sab ki kaali thi baal tha kabhi devar to kabhi nandoyi ke sath dusra aadmi ko naam le aurata chut chodwa ki keh gita me gaali de rahi thi ye sab dekh galo sukh raho tho

Ab samjha aayo sab gaav ka chhora dekhan ne kyo mar raha tha tabi ek bhabhi kehwe he "" sabki kaali kaali bhosdi ne dekhne ne koyi salma bhosdi chat re koi "" ye sun sab jora se hase he or wo aurat jo burka me thi sharama jawe he ek kaki maje me kehwe hai to fir aaj dekh hi lewa chha aisi kai baat he salma ki bhosdi me

Ye keh 2 aurata salma ki tarf jatwe he jo nahi nahi bhabhi keh rahi fir burka sahit hi taanga utha li ek dusri burko niche kar salwar khol di or sabne khol ke dikha di sach me salma ki chut ora su gori thi bhuri fuli huyi fir ramu k maa ne kaalo tiko laga diyo fir sab hasne lagi par maro jse kaam hoto hoto bach gayo ahiya lago jese marto marto bacho hu

Fir salma uth naachne lagi salwar uthari ne pehni koni bas burka se sab chhup gayo chho niche karta hi wo khud nachati huyi burko utha kabhi gaand to kabhi chut dikha nachane lagati kabhi kisi bhabhi ya kaki ki chut pakadti to kabi dudh daba deti tabi ek bhabhi salma ki nangi gaand pe mari or uki gaand laal padgi " mari salma ki kar di gaand laal balam jora toke ' bas fir hasba lag gaya sabhi

Mari wali apni ammi ka nanga jalwa dekh sharam se laal huyi padi thi tbhi pato nahi kaha se ek saanp aagayo bas fir kai chho bhane lagi lekin mari joru wahi regi bhag na saki un saanp kaat liyo sab dekh joro se chillawa or roba lagi aawaz sun bahar baith aadmi bhi aa gaya tha

we sab dekhan laga ki mai bina sucha u chhori ko pag ne pakad muh laga jahar bahar khich thukto ja raho chho ji ko naam bhi nahi janto tho uka liye apni jaan daav pe laga chuko chho mai bhi kai karto man bawlo thodi itni baat soche hai jipe man aawe he unha khatra me dekha sab karne man howe jise unhe kuch na howe ye dekh to salma ki bhi aankha fati thi

Fir mai dekhu hu wo kaali moti khubsurat aankha fir khol mane dekhan lag rahi hai bas mai bhi dekhato kab achet ho gayo mane pato na chalo jab aankha khuli to vedhji ke sath hi wah chhori maro hath pakade apni aankha me aashu ke sage mane dekh rahi thi

Wah kya jigar he chhori me sab ka samne maro hath thama baithi hai jese mai uko mard ho fir unha apni aankha se dekh khudne uko naam puchan se khud na na rok sako - kai naam hai tharo

Noor


Note - abhi mai jaha reh raha hu ye waha ki boli hai jisme mene ye kahani likhi hai
 

deeppreeti

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रजनी और तनु की गुडलक अकादमी

कमरे में तनाव का माहौल था क्योंकि शीना कल गर्मी की छुट्टियों में गुडलक अकादमी में जा रही थी, जो की युवा लड़कियों के लिए एक विशेष ग्रीष्मकालीन स्कूल है। गुडलक अकादमी, लखनऊ में मेरे मित्र रजनीकांत और उनकी पत्नी तनु द्वारा संचालित है। यह सबसे प्रतिष्ठित संस्थान है जिसका काम युवा लड़कियों को त्रुटिहीन शिष्टाचार पूर्ण व्यवहार के लिए प्रशिक्षित करना था।

शीना के पिता कबीर सिंह को पता था कि गुडलक में छुट्टिया बिताने के विचार से उनकी लड़की कितनी नफरत करती थी, लेकिन उनकी पत्नी नाज़नीन बहुत जिद कर रही थी कि शीना वह प्रक्षिशण ले। कबीर पंजाबी मूल का एक बांका सुंदर युवक था और नाज़नीन अपने तीसवें दशक के मध्य में लंबे काले बालों और बड़ी बैंगनी आँखों वाली एक असाधारण रूप से सुंदर महिला थी और इन दोनों के युवा दिनों में मिलन ने एक शानदार सुंदरी पैदा की और उन्होंने उसका नाम शीना रखा।

नाजनीन जो एक शानदार सामाजिक और राजनीतिक महिला थी लगातार शीना को उसकी इच्छा के विरुद्ध धकेल रही थी। अपनी सामाजिक और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के लिए उत्साह में, उसने अपने पति की यौन जरूरतों को काफी सालो से पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था और परिणामस्वरूप, कबीर हाल के वर्षों में अपनी शारीरिक जरूरते अपनी सचिव और नाजनीन की सहेलियों और राजनीतिक सेविकाओ से पूरी कर रहे थे।

शीना अभी कुछ दिन पहले 18 साल की हुई थी और अपनी अंतिम स्कूली परीक्षा देने के बाद अपने परिणामों की प्रतीक्षा कर रही थी। उसका अपनी माँ के समान सुंदर मनमोहक युवा शरीर था। वह वहाँ खड़ी एक छोटी गुड़िया की तरह लग रही थी, उसका नग्न मांस रोशनी के नीचे चमक रहा था। वह लंबी, कॉम्पैक्ट और खूबसूरती से गठित थी। उसके स्तन बड़े अनार के आकार के थे और बड़े सख्त निपल्स उसके चमकते मांस से पूरी तरह से बाहर निकल रहे थे।

"जी, मॉम," शीना ने आह भरी। "काश मुझे कल उस बेकार जगह पर नहीं जाना पड़ता।"

"यह एक बेकार जगह नहीं है," उसकी माँ ने जोर देकर कहा। "सभी बेहतरीन परिवारों की लड़कियाँ उसमे जा पाती हैं और किसी दिन आप हमें ऐसा शानदार अवसर देने के लिए धन्यवाद दोगी।" आपको मालूम होना चाहिए आपके लिए मुझे नवाब साहब से सिफारिश करवानी पड़ रही है और आप उसे बेकार जगह कह रही हैं?

गुडलक अकादमी केवल तीन घंटो की ड्राइव की दूरी पर थी अगली दिन शीना को माँ कार में बिठा कर ले गयी

शीना उस जगह से बहुत प्रभावित नहीं हुई थी। पेड़ों के झुरमुट में, इमारतें लंबी संकरी खिड़कियों के साथ सुनहरे पत्थर से बनी थीं जो की राजस्थानी स्थापत्य कला से निर्मित था व्यापक लॉन और घुमावदार रास्तों के साथ मैदान विशाल थे जिसे देख आकर नाजनीन ने उनकी तारीफ शीना से की तो शीना बोली ये मुझे किसी जेल की तरह लगता है

ड्राइवर ने जब कार पार्क कर दी तो शीना की माँ उसे प्रशासनिक भवन की ओर ले गई, शीना ने उन छात्रों का अध्ययन किया जो मैदान में टहल रहे थे। लड़कियों ने छोटी गुलाबी स्कर्ट और सफेद ब्लाउज पहने हुए थे जो स्पष्ट रूप से स्कूल की वर्दी थी।

वह और शीना जब स्कूल की बिल्डिंग में दाखिल हुईं और उन्हें निदेशक के कार्यालय में भेज दिया गया। नाज़नीन और उसकी बेटी दोनों ही बिल्डिंग की साज सज्जा और कला और फिर डेस्क के पीछे बैठे निदेशक से प्रभावित हुए। युवा निदेशक काले घुंघराले बालों के साथ श्याम रंग का था और उसकी एक गहरी भूरी आँखें थीं उस पर सुंदर लग रही थीं। कमरे में अभिनेता रजनी कान्त के फोटो सजे हुए थे

"मैं रजनीकांत हूँ," वह मुस्कुराया, नाज़नीन और उसकी बेटी का अभिवादन करने के लिए अपनी कुर्सी से उठा। "मैं स्कूल निदेशक हूँ।" उन्होंने अभिनेता रजनीकांत की कुछ शैलियों की नकल की।

वाह! अभिनेता रजनी कांत ये देख शीना प्रसन्न हो गयी । शीना को रजनीकांत का मन्नेरिस्म पसंद आया

"आप को कौन नहीं जानता, मिस्टर कांत," नाज़नीन ने मुस्कराते हुए कहा, उस आदमी की उपस्थिति और मन्नेरिस्म से विधिवत प्रभावित हो कर बोली। "मैं... नाज़नीन सिंह और यह मेरी बेटी शीना है, जो इस गर्मी आपके स्कूल में रहेगी।"

"और कितनी प्यारी युवती है," वह शीना पर मुस्कराया। "अब कृपया बैठ जाइए और मैं रजनी कान्त हूँ और मेरे इष्ट हैं एक्टर रजनीकांत।"

सुश्री सिंह मुझे आपको और आपकी बेटी को निराश करने के लिए बहुत खेद है, लेकिन हमारी सभी सीटें न केवल इस साल के लिए बल्कि अगले साल के लिए भी भरी हुई हैं।

महोदय, यह मेरी बेटी के प्रवेश के लिए सिफारिश पत्र है उसने हमारे प्यारे नवाब फैसल खान हैदराबाद जो की हमारे प्यारे दोस्त आमिर खान के पिता का लिखा एक पत्र तैयार रजनीकांत को पकड़ा दिया । आपको उसे किसी तरह से मेरी बेटी को एडजस्ट करना होगा।

रजनी उठा तो नाजनीन और शीना भी आदर स्वरुप उठ कड़ी हुई और उसने एक चक्कर लगाया एक फाइल निकाली और वापस अपनी सीट पर आ गया। इस पूरे समय वह शीना को ताड़ता रहा और उसका लंड कुछ कठोर हुआ और उसने उसे थोड़ा एडजस्ट किया, शीना बहुत सुंदर गोरी और लंबी थी, उसका बदन अच्छी तरह से निर्मित था, लेकिन उसके फ्रेम पर कही कोई फ़ालतू चर्बी नहीं थी। उसका पेट पतला और नरम था, जो शीना की आकर्षक लम्बी टांगो में खो गया था। उसकी टाँगे लम्बी थी और जिसे उसने पैर रखे हुए थे उससे स्पष्ट था कि वह डांसर के पैर हैं। उसकी आँखें बड़ी और गहरे भूरे रंग की थीं।

रजनी ने ये भी नोट किया कि इस युवती के युवा अनछुए स्तन कितने ऊंचे, दृढ़ और सुडौल थे। और शीना के एकदम सही आधे खरबूजे के आकर के स्तन उसकी छाती पर सर उठा कर आराम कर रहे थे और उसके निप्पल खड़े थे। वह उसकी बिना बाजू की सफेद शर्ट में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे और उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी क्योंकि उसके स्तनों को सहारे की कोई जरूरत नहीं थी।

उसकी छोटी टॉप से उसकी कमर और नाभि देख रही थी जो इस तरफ इशारा कर रही थी की उसकी गांड चिकनी थी, और कमर और गांड के बीक रोमांचक कर्व्स स्पष्ट थे उसके बाल लंबे सुनहरे और घने थे और उसकी पीठ के नीचे उसके नितम्बो को छू रहे थे और हर संभव कोण से उसके नंगे चमचमाते शरीर को सुशोभित कर रहे था। रजनी उसे बार-बार देखना चाहता था ।

उन्होंने कहा कि सुश्री सिंह आपको ऐसे व्यक्ति द्वारा अनुशंसित किया गया है जिसे मैं मना नहीं कर सकता तो मुझे देखने दो कि आपकी बेटी को कैसे इस सत्र में समायोजित किया जा सकता है।

रजनी मेरा दोस्त था और लखनऊ के एक सफल व्यवसायी का लम्बा, पतला और सुन्दर पुत्र था जिनका दिल्ली में भी घर था। कॉलेज में पढ़ाई से ज्यादा वह लड़कियों के पीछे लगा रहता था। लड़कियाँ भी उसे पसंद करती थीं। वह पैसे और मस्ती से भरा और हमेशा ही दिलफेंक था। लड़कियों उसे उसके लुक्स और मनेरिज्म के लिए पसंद करती थी और वह उन पर काफी पैसा भी खर्च करता था।

हम सब दोस्त उसे रजनी कहते थे। क्योंकि वह फिल्मस्टार रजनीकांत के बहुत बड़ा प्रशंसक है और उनकी तरह ही दीखता है लेकिन उसकी चमड़ी का रंग अभिनेता रजनीकान्त से काफी बेहतर था और स्कूल में नाटको में अक्सर उनकी नकल करता था और हमने अपना हाई स्कूल दिल्ली से एक साथ किया था।

अपने रोमांटिक और दिलफेंक मिजाज के बावजूद कॉलेज के दिनों में , वह तान्या (तनु) नामक एक लड़की के साथ रोमांस कर रहा था। तनु पास के गर्ल्स कॉलेज की छात्रा थी। तनु बहुत सुंदर, 5' 5" लंबी, छरहरी, पतली और बड़े स्तन और चमकती काली आँखों वाली थी। जब मैंने पहली बार उसे देखा, तो मेरा लंड सख्त हो गया था और मैं उसे चोदना चाहता था।

उसने मुझे तनु के साथ अपनी शादी में आमंत्रित किया था लेकिन दुर्भाग्य से मैं नहीं जा सका था । उसने मुझे पत्र लिखा था कि शादी के बाद तनु ने उनके कॉलेज में टीचर के तौर पर ज्वाइन किया है।

मैं उसके पास पिछले ही दिन उसके पास कुछ दिन रहने आया था और उसने तुरंत मुझे बुलवाया । मैं उन दिनों उसके पास छुट्टियों में मिलने गया हुआ था और उसने मुझे नाजनीन और शीना से मिलवाया और पूरी बात संक्षेप में बता दी ।

मैंने कहा हम उसके लिए कक्षा में एक अतिरिक्त सीट रख सकते हैं लेकिन समस्या उसके रहने की है। हमारा छात्रावास भरा हुआ है और बेहतरीन स्कूल होने के नाते हम किसी को एडजस्ट करने के लिए नहीं कह सकते। व्यवस्था करने के लिए कुछ समय दो।

नाजनीन ने मेरा और रजनी का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया।

रजनी कांत और मैंने उन्हें स्कूल का कार्यक्रम समझाने में अगला आधा घंटा बिताया और नाज़नीन उससे काफी प्रभावित हुईं।

उसने जो कुछ भी सुना, उससे उसे यकीन था कि गर्मियों में शीना के शिष्टाचार, व्यवहार और आकर्षण में बहुत सुधार होगा।

जब साक्षात्कार समाप्त हो गया, तो रजनी ने शीना को एक सूची दी, जिसकी उसे यहाँ अपने प्रवास में आवश्यकता होगी और सुझाव दिया कि वह और उसकी माँ स्कूल की दुकान में जाएँ और उन्हें व्यवस्थित करें और उन्हें फिर वापिस आने को बोला।

"बहुत बहुत धन्यवाद," शीना मुस्कराई, अपनी माँ के कार्यालय से बाहर निकलते हुए वह अपनी माँ से बोली थैंक यू माँ आप सही थी । ये आपका एक और उत्तम निर्णय है ।

महिलाओं के जाने के बाद, रजनीकांत उस कमरे में पहुँचे, जिसे तनु शीना के साथ साझा करने जा रही थी ।

"नमस्ते, दीपकजी," तनु मुझे देख कर मुस्कुराई और दरवाजा खोला। "अंदर आइये।"

खूबसूरत तनु जो की मेरे दोस्त रजनीकांत की बीबी है और जिसकी मैं पिछली रात ही चुदाई कर चूका था ताकि रजनी अपनी नौकरानी नीरा की चुदाई कर सके । उसने उस समय एक ब्रा और पैंटी के अलावा कुछ नहीं पहना था, फिर भी वह हम दोनों के सामने बिकुल शर्मिंदा नहीं थी क्योंकि हम तीनो ने कल रात एक दुसरे को नग्न ही नहीं देखा था बल्कि एक साथ चुदाई भी की थी। तनु पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। समय के साथ उसकी ख़ूबसूरती में कोई कमी नहीं आयी थी। वो आज भी कॉलेज जाने वाली लड़की ही लगती थी। ये बात अलग है कि वह अब पढ़ने नहीं पढ़ाने जाती थी। समय ने केवल उसके आकर्षण में इजाफा ही किया था। उम्मीद के मुताबिक उसे इस हालत में देखते ही मेरा लंड सख्त हो गया और उसे चोदने की इच्छा फिर से ताजा हो गई।

"आपको एक नया रूममेट मिल रहा है," रजनी ने घोषणा की कि वह सोफे पर बैठ गया है।

"वह कौन है?"

"उसका नाम शीना है," रजनी ने उत्तर दिया। "और वह एक शानदार गुड़िया है।"

"मुझसे सुंदर?" वह हँसी, आगे बढ़ी और उसकी गोद में बैठ गई।

"नहीं, प्रिय," उसने मुस्कुराते हुए, उसकी ब्रा की सामग्री के बावजूद उसके स्तनों में से एक को सहलाते हुए कहा। "लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप और नीरा उसे त्यार करें।"

" कब

"शुभस्य शीघ्रम, हो सके तो आज ही रात," रजनी मुस्कुराया।

"हम कोशिश करेंगे," वह फुसफुसायी उसके कान पर हल्के से कुतरते हुए रजनीकांत ने धीरे से उसके स्तनों को सहलाया।

और रजनी के सामने ही मैंने तनु के सुंदर युवा चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए, तनु का मुंह अपनी ओर झुका लिया और उसे चूमने लगा और उसके स्तनों को दबाने लगा और जब हमारे के होंठ आखिरकार अलग हो गए, तो हम दोनों छोटी गर्म हांफने में सांस ले रहे थे और उसके सूजे हुए निप्पल उसकी ब्रा की सामग्री के खिलाफ दबाव डाल रहे थे। जैसे ही मैंने अपना मुंह फिर से उसके स्तनों पर लगाया, तनु अपने प्यारे छोटे पैंटी-पहने नितम्बो के खिलाफ रजनि की पतलून के बावजूद उसके गर्म लंड को धड़कता हुआ महसूस कर सकती थी।

फिर रजनी वापिस चला गया इस बीच मैं वहीँ कमरे में तनु के पास रहा और बोलै मैं व्यवस्था करता हूँ।

आधे घंटे बाद शीना और नाजनीन रजनी के कमरे में लौट आयी "यह तुम्हारे कमरे का नंबर है," उसने मुस्कुराते हुए शीना को एक कार्ड दिया। "आप कुछ दिन अन्य व्यवस्था होने तक इसे सुश्री तनु के साथ साझा करेंगी, और मुझे यकीन है कि आप उनके साथ समायोजित हो जाएंगी। तनु एक बहुत ही आकर्षक युवा महिला है और वार्डन है। हम आपके लिए वैकल्पिक व्यवस्था अगले कुछ दिनों में कर देंगे"

"क्या मुझे अब वहाँ जाना चाहिए?" शीना से पूछा।

"नहीं। अभी नहीं," रजनी ने उसे समझाया। मैंने आपके बैग भेज दिए हैं। तनु शायद अब वहाँ नहीं है और वहाँ आपके ठहरने की व्यवस्था की जा रही है तो आप आज दोपहर बाद में चेक कर लीजिये? " तब तक आप फीस इत्यादि जमा करा दीजिये और मैं आपको पूरी अकादमी दिखा देता हूँ । फिर रजनी ने उसने पूरी अकादमी दिखायी और अब शीना पूरा भवन देख कर बहुत खुश थी और बोली माँ ये तो हमारे स्कूल से काफी बड़ा सुंदर और व्यवस्थित है ।

उधर उस कमरे में मैं और तनु चिपके हुए थे। मेरे से चिपकी तनु की सांसें फूल रही थीं, हमारे होंठ आखिरकार अलग हो गए और तनु ने कुशलता से मेरा कोट और टाई हटा दी।

"मुझे आज बहुत जलन हो रही है," तनु ने मुझे सोफे पर अपनी तरफ घुमाते हुए कहा।

हमारे मुँह फिर से एक-दूसरे से सटे हुए थे और शरीर मजबूती से एक साथ दबे हुए थे, मैंने तनु की पैंटी के कमरबंद के बावजूद अपना हाथ उसमे खिसका दिया और धीरे से उसके नरम झूलते हुए नितम्बो के गालों को पकड़ लिया। दोनों ने अपनी कमर को एक साथ रगड़ते हुए अपने कूल्हों को बिस्तर पर टिका दिया।

उत्तेजना से काँपते हुए, तनु की उँगलियों ने पाया कि मेरी कमीज उसके ढीले-ढाले के कमरबंद के ठीक ऊपर खुल रही थी। तनु ने कुशलता से मेरी कमीज के बटन खोले और अपना हाथ अंदर कर लिया। वह मेरे पेट और छाति को सहलाने लगी। जब मैंने अपनी शर्ट निकाल दी तो तनु ने मेरी बेल्ट खोल दी और ज़िप नीचे कर दी।

"आप निश्चित रूप से जानतेी हैं कि आप क्या कर रही हैं, है ना," मैंने अपने कूल्हों को ऊपर उठाते हुए मुस्कुराते हुए कहा, ताकि उसके लिए मेरी पैंट नीचे खींचना आसान हो जाए।

"तुम बकवास मत करो," जब मैंने अपना झांगिया उतरा, तो वह मुस्कुराई।

मेरा एक हाथ उसकी ब्रा के नीचे फिसल गया और उसके सूजे हुए स्तन को सहलाया, तो उसकी कमर में एक झुनझुनी हुई। जैसे ही मैंने उसके स्तनों को सामग्री की तंग परिधि से मुक्त किया, उसका गुलाबी निप्पल सख्ती से बाहर खड़ा हो गया।

मैंने तुरंत निप्पल की रसदार मोटाई के चारों ओर अपने होंठ बंद करते हुए अपना सिर नीचे कर लिया।

मैंने उसके गर्म उत्तेजित स्तन की जलती हुई चोटी को चाटा और चूसा और उसकी ब्रा की निकाल दिया ताकि दोनों स्तन मुक्त हो जाएँ और फिर मैं उसकी छोटी-छोटी पैंटी को निकालने के लिए आगे बढ़ा।

तनु ने अपने होठों को चाटा और वह उत्साह से मेरी भारी बड़ी गेंदों को देखती रही और फिर मेरे की खूबसूरत मढे और मोठे नीली-नसों वाली लंड को उसने अपनी योनि के ऊपर दबाब बनाते हुए देखा।

"ओह, दीपक जी" सोफे पर फैलते ही तनु फुसफुसायी और पीठ के बल लेट गयी " ओह, दीपक जी

"वह हँस पड़ी।" तुम मुझे चोदना चाहते हो। "

"बिलकुल इसमें क्या शक है मैं तो तुम्हे तब से बार-बार चोदना चाहता था जब मैंने तुम्हे पहली बार देखा था और मैं तुम्हे चाहता हूँ ,," मैंने मुस्कुराते हुए, उसके एक दृढ़ युवा स्तन पर अपने होंठ नीचे कर दिए और अपनी उंगलियों को उसके गांड की नरम दरार में डाल दिया।

"तो फिर चौदो," वह फुसफुसायी और मेरे लंड को उसने अपनी तड़पती चूत में निर्देशित किया ।

जब मेरा लंड उसकी गर्म नन्ही योनी में गहराई से दब गया, तो मैंने उसके सूजे हुए गुलाबी निप्पल से अपना मुँह उठा लिया और उसके होठों पर दबा दिया। हमारे भूखे मुंह मिले और उसके मुँह में मेरी जीभ फिसल गई साथ ही में मने अपने बड़े धड़कते हुए लंड को उसकी तंग, गर्म योनि में पूरा गहरा अंदर कर घुसा दिया और मेरी बड़ी गेंदे उसकी छूट के होंठो से चिपक गयी। तनु खुशी के साथ धीरे से फुसफुसा और कराह रही थी, क्योंकि मेरा बड़ा लंड उसकी चूत में तेजी से अंदर बाहर हो रहा था और हर चूत के कोने में मन मर्जी से घूम रहा था।

"ओह, तनु ने कहा, उसकी उँगलियाँ मेरी पीठ में गढ़ गयी क्योंकि उसके सूजे हुए स्तन मेरी छाती पर रगड़ रहे थे।" मुझे लगता है कि तुम दुनिया के सबसे बढ़िया चौदु हो। "

मेरे धड़कते हुए लंड की लंबाई के आसपास उसकी गर्म योनी के मांस का गीला रेशमीपन मुझे जंगली बना रहा था। मजा और भी बढ़ गया क्योंकि उसकी मांसपेशियाँ एक प्यार भरे दुलार में मेरे के लंड के चारों ओर कसकर बंद हो गईं। मैं उसकी सुडौल जाँघों को अपनी कमर से दबाते हुए महसूस कर सकता था और उसकी गांड सोफे पर गर्माहट से थरथरा रही थी क्योंकि मैं तालबद्ध रूप से अपने मोटे लम्बे लंड को उसकी गहरी गहराई में अंदर और बाहर ले जा रहा था।

इस तरह से हम प्यारी-प्यारी चुदाई का आनंद ले रहे थे और मेरी और तनु की आँखें बंद थीं क्योंकि हमने लंड की धीमी-और-तेज की गति का स्वाद चखा था-प्रत्येक आगे के जोर से मेरा लंड उसके गर्म पहले पेट में गहरा और गहरा जा रहा था।

सालों से मैंने आनंद के लिए अपने साथ की सबसे खूबसूरत युवा छात्राओं के साथ सेक्स किया था, लेकिन तनु उस सबमे से सबसे हॉट लड़कियों में से एक थी।

"ओह, दीपक" तनु ने सिसकते हुए कहा, उसकी चूत को मेरे लंड के मोटे आधार के चारों ओर कस दिया। "आपने मेरे लिए जो कुछ किया है, उसके लिए मैं आपको कभी भी पर्याप्त धन्यवाद नहीं दे पाऊंगा।"

"क्या आप मुझे अभी मुझे धन्यवाद नहीं दे रहे हैं," उसने कहा। "आप मेरी चुदाई करके ही मुझे प्यार के साथ मुझे धन्यवाद दिया करो।"

वो मुझसे कसकर लिपटकर मुझे बेतहाशा मेरे ओंठो और चेहरे पर किश करने लगी, उसकी उंगलियाँ मेरी पीठ पर टिकी हुई थीं "ओह, डार्लिंग," वह फुसफुसाई, वह अपने चरमोत्कर्ष को महसूस कर रही थी। उसकी गर्म योनी का रस जल्द ही मेरे लंड के चारों ओर उबल रहा था क्योंकि तनु का संभोग उसकी कमर की कम्पन के साथ गूंज रहा था।

"मुझे ये पसंद है! दीपक तुम मुझे बहुत पसंद हो!" वह अपने संकुचित गले के माध्यम से चिल्ला रही थी और उसका सिर सोफे पर एक तरफ से दूसरी तरफ फिसल गया।

मैंने किसी महिला के चेहरे पर ऐसी वासना पहले कभी नहीं देखी थी, क्योंकि मैंने खूबसूरत तनु को शानदार संभोग के दौरान रोते और कराहते हुए देखा था। उसके लंबे बाल उसके दमकते चेहरे के चारों ओर बेतहाशा फ़ैल गए थे और उसका प्यारा मुँह खुला हुआ था और उसकी भौहें ऊँची उठी हुई थीं और उसकी चमकीली आँखों में पूर्ण आनंद की अभिव्यक्ति थी क्योंकि उसकी योनी मेरे लंड के चारों ओर गर्मागर्म रस छोड़ रही थी।

इस तीव्र कामोत्तेजना के बाद सुंदर तनु सांस लेने के लिए हांफ रही थी, महसूस कर रही थी कि मेरा अद्भुत लंड अभी भी उसकी रसदार चूत के अंदर और बाहर तेजी से आ जा रहा है, जबकि मेरी उंगलियाँ उसकी प्यारी गांड की नरम छोटी दरार में घुस गई थीं।

"ओह, दीपक वह फुसफुसाई, अंत में अपनी आँखें खोलकर और मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा मैं अभी भी उसे पंप कर रहा था," वह बोली ये मेरा अब तक का सबसे अद्भुत स्खलन था। "

उसने मेरे गालों को अपने हाथों में अधिक मजबूती से पकड़ लिया और मैंने उसकी योनी को अपने लंड के खिलाफ कसकर खींच लिया जिससे मेरा लंड उसकी गहरी गहराई में और भी गहरा चला गया और उसकी गर्भशय से टकराने लगा। अपने संभोग के पूरी तरह से बीत जाने के साथ, तनु अपनी योनी की मांसपेशियों को मेरे मोठे लंड को पकड़ते हुए महसूस कर सकती थी और वह अपने कूल्हे उछालने लगी और अब हम दोनों अब जोर से धक्के मारने लगे। नीचे पहुँचकर तनु ने मेरी गांड के गालों को पकड़ लिया और मेरे मोटे लंड को और भी अपनी ओर खींचने की कोशिश की। अब हम दोनों बेदम हांफते हुए कराह रहे थे।

मैंने अपने लंड को कॉर्कस्क्रू की तरह घुमाया और उसकी योनी को अंदर और बाहर पंप किया। अविश्वसनीय गर्मी के विस्फोट के साथ मेरे शुक्राणु मेरी गेंदों से निकल मेरे लंड की लंबाई में चल कर बाहर निकलने को त्यार थे। उसके सख्त छोटे स्तन मेरी छाती के खिलाफ रगड़ रहे थे। मेरा लंड उसके गर्म, चूसने वाले छोटे से छेद में और भी बड़ा हो कर सूज रहा था। मेरी गेंदे भी फूल गयी थी और उनमे धड़कन तेज़ हो रही थी और मुझे उम्मीद थी कि अब मैं तनु को एक और संभोग सुख देने के लिए काफी देर तक नहीं टिक पाऊँगा।

लेकिन तनु भी चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयी थी और अपने शरीर में चरमोत्कर्ष का निर्माण शुरू होने का अनुभव करते हुए, तनु की अपने फिसलन वाले योनी-होंठों ने लंड की मोटाई के आसपास और अधिक गर्म हो गयी मैंने अपने लंड की उसकी भूखी योनी में दाए बाए ऊपर और नीचे और गोल घुमाया। जैसे ही मैंने उसके होठों को चाटा, उसका चरमोत्कर्ष करीब आ गया।

"ओह, दीपक," उसने कहा। "मुझे लगता है कि मैं फिर से आऊंगी।"

वह अपने कान में मेरी कराह सुन सकती थी क्योंकि उसकी योनी में कम्पन शुरू हो गया था और मेरी सांसें छोटी-छोटी गर्म हांफों में आ रही थीं, क्योंकि मैंने अब महसूस किया कि उसकी तंग छोटी योनी म्यान मेरे लंड को तेजी से निचोड़ रही है। मेरे फेफड़े ऐसा महसूस कर रहे थे जैसे वे फटने के लिए तैयार थे और मेरी भारी गेंदें अपने चारों ओर उबल रहे गर्म शुक्राणुओं के सह को छोड़ने के लिए दर्द कर रही थीं।

छोड़ो मुझे। "मुझे आने दो... मुझे आने दो! कह कर तनु झड़ने लगी"

हमारे कूल्हे एक साथ बेतहाशा धड़क रहे थे, मेरा लंड उसके झागदार योनि में जोर से गड़गड़ाहट की आवाज कर रहा था क्योंकि मेरी गेंदे उसकी योनि के ओंठो पर जोर से थप्पड़ मार रही थी। जिससे ठप्प्प ठप्प की आवाज आ रही थी

"मैं आ रहा हूँ!" मैं चिल्लाया और सम्भोग की तीव्र गर्मी उसके पैरों के बीच से उसकी योनि से मेरे लंड में गयी और हमारे शरीर के हर हिस्से में फैल गई थी।

मेरे नीचे झुंझलाते हुए चरमोत्कर्ष वाली तनु जोर-जोर से योनी को निचोड़ रही थी और लंड समेत मेरे अपने रस और सह को अंदर खींच रही थी। अचानक तनु हाथ नीचे ले गयी और उसने मेरी गेंदों को पकड़ कर दबा दिया और ट्रिगर किया और सफेद-गर्म वीर्य की एक धार मेरे लंड से भरी उसकी योनि में घुस गई। मैंने तब तक पंप करना जारी रखा जब तक कि मैंने अपनी गेंदे उसमें खाली नहीं कर दिया, फिर वह उसके नग्न शरीर पर गिर पड़ा। और उसकी योनि को अपने वीर्य से भर दिया।

"ओह, जानेमन," वह कुछ क्षण बाद फुसफुसायी जब मैंने धीरे-धीरे अपने लंड को उसके सह से भीगी हुई चूत से बाहर निकाला। "ये बहुत शानदार था।"

"यह निश्चित था," मैं मुस्कराया और अपने कपड़े पहनने के लिए खड़ा हुआ। "लेकिन आपके नए रूममेट के आने से पहले मुझे जाना होगा।"

"तुमने क्या कहा उसका नाम क्या था?" तनु ने पूछा।

"शीना," मैंने जवाब दिया।

आपका दीपक
 

Azriel

Death is wisest of all in labyrinth of darkness
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Finally
20220215-202511
Hello, friends here I come with one erotic story with a bit of kinky stuff I hope you guys will enjoy it.
So let's start with an introduction part there are only two limited characters in this story.

Megha is a 22-year-old girl short at 5.2" with black hair till her shoulders. She had a very curvy and a bit chubby body but the fat of her body was perfectly proportionate in the correct corners. she had perfectly round shaped tits, fatty butt cheeks and a beautiful face. She’s made for fucking.

Aarv is a muscular guy with 5.10" height fair skin and a handsome look as well overall he is like a dream guy of every girl's mind

In this story megha describing her experience with her bf, I hope you'll enjoy it :blush:
I'm sharing my experience with my bf when we met after a long time. Actually, we were dating each other for the last two years but coz of his job he moved to another town and we get separated.
In the past year, we were had a good time with each other and our sex life was awesome too.
He has always known that I'm a sub, he sorta figured it out from the start.
We always tried new things but We didn't really go into detail about how much of a sub I am. He spanked me a few times here and there not so much, he forced fingered me, he made things get pretty rough when we fuck, but it's never gotten as out of hand as I would prefer, still amazing. but I was always craving for a bit more.
After getting separated from him I started reading lots of sub dom stories it always turned me on so much and I wouldn't stop masturbating to them I also shared those stories with him
Finally, We met with each other after almost more than 6 months he told me he made some plans for our date. So I was pretty much excited about that.
I wanted to go to the airport to pick him up but he refused me and asked me to meet him in a shopping mall where we usually went to watch movies. So his hint was clear that he wanted to start the date with a movie
Finally, he arrived and we went inside the movie theatre he brought corner seats and the theatre was almost empty he purposefully brought tickets for the non-famous movie. only a few couples were there.
Well, about fifteen minutes into the movie he turned toward me and we started kissing and then making out and he forced his way into my mouth. It's made me a little wet. Next, I realized that he moved his hand onto my crotch and he was lightly rubbing it. Fast forward a bit, things have escalated after a bit of him rubbing my clit he stopped and turned back to the movie out of nowhere. I can't stand it so I started to rub my own clit for a bit. After a few minutes, I feel at least a little more satisfied and I pulled my hand out of my pants and focused all my attention on the screen. In the last half hour, we started making out again, then he reached over and pulled my boob out of my low cut shirt and he fiddled with the tit a little before subtly moving down to suck and nip at it. I'm getting really turned on, I was about to start massaging my clit again when he repositioned himself so his elbow was pushing into my pussy. He was not letting me masturbate. A feeling of desperation washed over me, I was trying to push his arm away but he won't budge. I go so far as to lightly grind against his arm. He won't even let me play with my tits when I tried he grabbed my hand and gave me a stern look.
I was super horny at that moment But then I knew he decided I shouldn't get to play with myself anymore.
Then I whispered in his ear that now "I can't handle any more" my panty was completely wet and my pussy water started dripping through it so we left the movie in middle and he Took me to the hotel room which he already booked for today's date.
When I entered the hotel room I get amazed after watching the room from inside. The room was fully decorated with thousands of flowers and many candles. what I feel at that moment I can't express my feelings in words.
Later he grabbed my waist from behind and started kissing my neck I asked him what is this then he whispered in my ear "you earn this" and he continued neck kissing. Then he started moving his hand on my body my pussy started dripping again it's started turning me on again I settled my palm on his hand and guided him towards my boobs he grabbed both of my boobs and started squeezing them.
I really need this Megha he again whispered in my ear and on next moment he pushed me towards the floor it was a gentle push but It gets happened suddenly My face is about to hit the floor. my short shirt falling forward exposing not only my back but my hanging breasts too.
When I turned my face I saw he Was unbuckling his belt.
Now I had no idea what is going to happen to me.
"Oh Megha ..." He whispered.
I heard the snap right before feeling the bite of the leather. I was shuddered and inhaled sharply at the surprise and pain as he hit a bit hard. Again and again, the belt fell and he beat me flesh, ever so slightly hitting a different spot each time. My pale complexion was reddened by the belt. My skin was aflame with the brutality of the strikes.
Later he started running his fingers on my back and then he pulled me up and threw me into the bed. Then he comes towards me and started undressing me within a few moments I was completely naked in front of him.
"Turn upside down" he ordered me and I followed his order without saying a single word
He took one ice cube from the jar and started moving that on my red belt marks
I felt really nice when he started grinding the ice cube on my back I forgot my all pain I started moaning with pleasure.
"Are you ready for another surprise" I came back from my unconscious mindset when he addressed me with his soft but dusky voice
"Another surprise what is it?" I replied

"Wait for a minute" he get down from the bed and opened his bag and he came back on the bed with handcuffs.
"Turn around" again he ordered me and I followed his order like a slave. he put handcuffs in my both hands and tied its rope to the corners of the bed
Then he took some ice cubes and put a few of them on my belly button area my whole body start shaking with joy. He slowly slowly started sliding ice cubes towards my pussy side I was excited and curious to know about his next step later he started grinding ice cube on my pussy lips and suddenly he put on cube into my pussy
Ahhhhh..... I yelled with pleasure within a second he put another cube with a bit roughly for this time
"No no....no plz get them out" I yelled again I was nearly about to cry at that moment. My pussy area started hurting coz of a sudden cold attack and he kept both cubes inside of my pussy for more than a minute it made my pussy senseless later he took off both cubes out of my vagina I felt a bit relaxed but not for long coz his next step was more surprising and more painful too.
He took one candle from the bad side
"Are you ready for this" he whispered
Umm-hmm I gave him my permission to go beyond
"Ask me to stop when u reach ur extreme limit" he took the candle flame near to my pussy
My pussy scene started to burn it was the most irritating and joyful moment of my life that feeling can't describe in words.
I was half crying and half moan I wanted to play with my boobs I wanted to squeeze them but I was helpless I started rubbing my toes with the bed and he just changed the position of flame very calmly like he was showing his aggression without being aggressive.
My pussy started burning "plz remove it it's hurting now"
I almost screamed so he took off the candle from my vagina
But he was not in the mood to stop neither did I want to stop him.
Later he started pouring wax of candle on my naked body, every inch of my body started burning like hell but at that moment I want that pain every single drop of wax leads me towards the joy of satisfaction. I was just screaming crying I want him to stop but I even wanted him to continue it.
Later he came close to my face and whispered in my ear
"Tell me who earned this pretty face," he asked me while pulling my chicks
"You my master" I replied
He put his hand on my right boob and squeezed it very badly. With his other hand, he twisted my other nipple hard while he lifted me. I cried out and without prompting said, "Yours, Master."
"Say it properly," he instructed.
"My nipples belong to you, Master. My breasts are your property."
Later he slides his hand on my pussy and put several fingers inside me
Ahhhh....... I screamed very loudly I felt like my pussy get teared

"To whom does this belong?" he asked.
"Master, my cunt is your property."
He removed one finger from my cunt and pushed it into my ass, hard, making me gasp. "And this?"
"My ass belongs to you, Master."

He removed his hand from between my legs, lifting my head by the hair with his other hand and bringing my mouth to his hand. I licked it clean and he forced his fingers into my mouth. "This?"
"This is your mouth, Master," I said as best as I could around his probing fingers. "It belongs to you."
"That's right," he said. "Your body belongs to me"
"Yes master my whole body belongs to you master plz punish me like ur slave" I yelled loudly
He removed his fingers from my mouth and opened my handcuffs and he get down from the bed to took off his shirt. He removed his jeans as well and he asked me to come on the edge of the bed
I did the same as he addressed me I was on my knees looking up at him with a pleading glance.
He pulled out his cock and He gently slided his hand through my hair until it gets to my ponytail. He grabbed it hard and pulled on it, tugging my head back. My nipples were hard, proudly pointing towards him.
"Suck it bitch" he ordered me to suck his cock with a tight slap on my face. His slap encouraged me and I took his cock's top inside my mouth
he made deep sounds I felt proud and excited, encouraged to go further
"Deeper baby"
I opened my mouth wider, slowly taking more of him in my mouth. In an impatient movement, he grabbed my hair and push himself all the way in until he reached my throat I gasp of surprised as he moans. He proceeded with slow thrusts down my throat, letting me catch my breath in between his motions . I felt used, his hand holding my head firmly in place each of his moans making me wetter. I was so proud of making him feel so good. I could taste pre-cum on my tongue. His thrusts grew faster and eager, letting me no time to breathe anymore. He was so close to cum. Even I didn't know when I started rubbing my clint while sucking his hard rock dick.
"Ur master gonna feed you baby but don’t swallow right away"
I felt my mouth filling with a warm and thick liquid, a salty taste. He exhaled of pleasure, emptying himself in my mouth. I just stayed there, mouth open and full of cum. He looked at me, visibly appreciating what he sees. I was still kneeled, my mouth open and full of him. I guessed my cheeks as my chest were both coloured pink.
"Swallow it now"
I did as he said, swallowing his cum, my pussy was wet and felt the bedsheet of the bed also get wetted coz of my pussy water and I was still rubbing my pussy I was about to cum but he grabbed my hand and pulled out it from my pussy
"do you like to touch yourself, Honey?" He asked me
"Yes my master" I replied with a blush ☺️
"How can u touch yourself without my permission" he roared
"I'm sorry master" I squeaked
"well, I'm going to punish you now, you slut. you'll learn to behave yourself are you ready for punishment?"
"Yes, Master plz punish your slut"

he took his belt again and then he told me to come over and lay across his lap. he started spanking me, hard, with the belt. he did this one-handed and with his other hand, he started fingering me. ignoring my clit he started filling up my pussy, pumping impossibly hard. one, two, three fingers... and my ass burned. I whimpered, and he paused.
after a bit more spanking, he decided I'd had my punishment after that he got onto the bed with me and kissed me quickly. he kissed his way down my body to my pussy and set to work licking it expertly. not to sound weird but he was like a pussy licking machine, like he was a robot eating pussy was what he was programmed for... needless to say he made me come within a few minutes just with his tongue. then, he worked his way up my body again, to my tits- not really kissing anymore... leaving a line of hickeys from my pussy up to my collarbone. then he worked on my nipples for a bit, sliding fingers into my pussy after a little while.
he made sure I was very, very wet. the wet patch in the bed was almost a puddle by this point. he removed his fingers and stopped touching me for a moment. then he asked me if I wanted him. I whimpered and nodded. he said, "use your words."
"I want you inside me."
"Turn around" he ordered me
I turned and bent knew what was coming so I get excited, always am excited when I know I'm about to get filled with his nine inches
He slid into me and then starts pounding me, thrusting in and out while I moan and wine like crazy.
like was showing me what sex was. in, out, in-out, filling me up completely with his hard cock.
Later he started spanking me again and again while I was like half cry half moan.
"Do you want me to fuck you harder"
"Yes master Fuck me harder"
"Go deep inside me"
"Yeah fuck me, right there"
"Plz don't stop"
"Don't stop until you come"
"I want you cum deep inside me"
He grabbed my ponytail from behind

"Keep fucking me like that.
Pull my hair "

He pounded me even harder, this time he started slapping me on the sides of my ass hard making me fall into fits of moaning, driving me crazy. he speeded up when he came inside me and at that point, he pumped furiously and then released his warm cum right inside me. i felt the orgasm building and building. I crested and my pussy squeezed his cock in waves.
I filled my pussy with his thick cum which is started sliding on my hips.
Finally, On that day I got what I always want from him......
The End
 

Mr. Magnificent

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Bhoot-e-Jasoosi



Jaydev janardan deshpande ya in short JD, ek ajeeb vyaktimatva, waise JD ye kaam usne khud ne apne aap ko diya waisa aur koi use us naam se bulata bhi nahi tha, to ab chalte hai pehle boli huyi line pe, ek ajeeb vyaktimatva, wo isiliye ke bachpan me agar kisi ko pucha jata hai ke usko bada hokar kya banna hai to wo jawab dekha ke pilot, doctor, engineer, teacher wagaira wagaira butt! butt! butt! Jaydev bakiyo jaisa kaha hai
Jaydev ka bachpan se sapna tha ek jasoos banne ka, ab uske piche ka reason bhi waisa hi tha, jaydev ke ghar me sabko kitabe padhne ka bhayankar shauk tha usme bhi jasoosi kitabe aur isiliye ghar me bahut saari kitabe thi jisme ki kareeb 80% kitabe jasoosi novels thi

Kolhapur me unka baap dada se mila hua aaj ki bhasha me jise bhavya kaha jaye aisa 2 manjila wada tha, jisme jaydev ka pura parivar rehta tha jisme dada-dadi, 3 chacha- chachiya unke sab mila ke dus bara bacche, jaydev ke mata pita aur wo aisa pura 24 logo ka parivar tha

Ghar ki lagbhag sari purush mandali ko jasoosi kahaniya padhne ka shauka tha, bas agli peedhi me bas jaydev aisa tha jisko ye shauk tha

Aur yahi kahaniya padh ke jaydev ne bhi sapna dekha tha jasoos banne ka, apni kahaniyo me pasandida nayak ke jaise banne ka, bhes badal ke apradhiyo ko pakadne ka

Ab jasoos banna yani gunahgaro se ladna aur uske liye chahiye shakti isiliye jaydev ne body bhi achi banayi huyi thi, wada bahut bada tha aur uske piche ke side me purane bahut se ped bhi lage the, unhi pedo pe chadhne, idhar udhar kudna aur apne kiye upadravo ke liye ghar wali ki baate sunna ye sab to jaydev ke liye roj ka kaam tha

Par ab kare kya, jasoos banna hai to ye sab to karna hi padega, chapalta to rakhni hi padegi

Aise me hi jaydev ka highschool education pura hua, dimag hokar bhi usne apne is jasoosi ke bhoot ke piche kabhi dhang se padhai nahi ki aur ab college me bhi same chize shuru thi aur sath hi sath, ghar me gharwalo ki jasoosi bhi

Aaj sunday ka din tha to college ko chhutti thi isiliye aaj market me jake bhes badalne ka saaman lane ka jaydev me plan banaya, aur uske liye usko lagne aala tha ek kala pant kala shirt aur muh chipane ke liye ek kala mask, ab halanki ye saari chize use kisi bhi readymade kapdo ko dukan me easily mil jati butt! Butt! Butt! Sab itna easily bhi nahi hona chahiye na, to jaydev sahab se dukan me jakar shirt pant ka kapda kharida aur apne ghar se bahut door aaya taki waha kisi tailor se fitting me kapde sikwa sake

Kisi bhi tailor ko apne pe shaq na ho iska dhyan rakhte huye wo sari dukano par ko dhyan se dekh raha tha, sabhi bade dukano e gardi thi isiliye usne chhote tailors ko dekhna shuru kiya aur fir use ek dukan mila, wo ek chota khoke type dukan tha jisme bas ek hi silai machine thi jispe ek 60 paar kiya hua aadmi kuch sil raha tha, aur sabse important waha koi customer bhi nahi tha

Jaydev jaan gaya ke ye wali dukan hai jo use chahiye tha aur tailor budha tha to wo jyada puchtach kare bagair kaam bhi kar dega

Wo dukan me ghusa aur kapdo ki thaili counter par rakh kar bola

“kaka, ek dress silana hai, jald se jald, mil jayega?”

Tailor uski baat sunkar utha aur kapdo ko dekhte huye bola

“pant shirt banana hai na ? teen char din lagenge”

Aur usne JD ka naap lena shuru kiya aur pant ka naap pant ke kapde pe aur shirt ka shirt ke kapde pe likhne laga, ab us kapde ka adha meter ka tukda bach raha tha aur tailor ko samajh nahi aa raha tha ke iska kya karna hai, unhone sawaliya najro se JD ko dekha

Ek pal ko JD sakpakaya, ab kya jawab de use samajh nahi aa raha tha par batana to tha hi, usne ekdum dheeme awaj me jawab kiya

“mask, matlab thoda alag mask, jo pura chehra dhak de, waha aankho ki jagah do ched aur naak ke paas ek aur use puche bandhne ke liye do nade lagana”

Ab wo tailor thoda sochne laga ke ye ladke ko mask kyu chahiye, kahi ye sala koi chor to nahi ya atankwadi fir tailor ne usse naam pata pucha to usne jhat se apna naam bata diya, chandrakant par pata batate time wo thoda sochne laga aur par fir bhi apna asal pata uske muh se nikal hi gaya aur pata sunte hi to tailor thoda chauka, ke ye ladka itni dur se ye kala kapde silwane aaya hai matlab kuch to gadbad hai aisa use laga wo JD ko wai rukwa ke paanch minute me aata hu bol ke nikal gaya

Aur panch hi minute me wapis bhi aa gaya aur pucha, “ye mask kyu chahiye ?”

JD ki to bolti hi band ho gayi thi, natak me kaam karna hai wagire aise faltu jawab wo dene laga aur akhir me bola ke “ab to naap le liya hai aapne kab aau kapde lene”

Par tailor ne usko kuch ka kuch reason deke waha roke rakha, JD satakne ko dekh raha tha par tailor jane nahi de raha tha, ab JD ko paseena aane laga wo samajh gaya tha ke tailor ko uspe shaq ho gaya hai par waha se wo nikal nahi pa raha tha aur isi me 15 min beete aur dukan ke samne ek police ki gadi aakar ruki aur police ko dekh ke JD ki halat kharab

Gaadi se utarke inspector chauhan ander aaye “kaha hai wo haramkhor” inspector ne aate hi pucha to tailor ne JD ki taraf ishara kiya aur agle hi pal JD ki gardan inspector ke hath me thi aur apne kadak awaj me inspector ne pucha

“kya be bhadwe kya kar raha? Ye kale kapde kyu chahiye aur mask ka kya karega bata?”

JD pura ghabra gaya tha, aankho se pani aane laga pair kampne lage “sir maine kuch nahi kiya” bas itna hi bol paya wo par inspector fir garje “char dande padenge to sab batayega, naam kya hai tera?”

“jaydev” JD ne darte huye kaha

Ispar inspector kuch bolte usse pehle hi tailor bola “jhuth bol raha hai mujhe isne candrakant bataya tha”

Ab halat aur kharab, ab police ka danda padna tay tha tabhi JD jhat se bola “par..par pata sahi bataya hai maine”

“aur ye chandrakant kaun hai” inspector ne garaj se pucha

“wo sir, mera favourite hero” JD ne kaha

Waise to inspector ko filmo ke bare me jyada nahi pata tha par itna wo jaante the ke is naam ka koi hero nahi hai, unhone ghur ke JD ko dekha to JD bola “wo sir.. filmo wala nahi jasoosi kahaniyo ka hero hai”

“aur uska tere kale kapde se kya sambandh?”

“wo sir, mujhe bhi uske jaisa banna hai, jasoos banke gunahgaro ko pakadna hai” JD ne kaha

Police ki najar badi barik ho ti hai, kaun aparadhi hai kaun nahi ye wo jhat se pehchan jate hai, usme bhi chauhan bade anubhavi officer the, wo pehchan gaye the ke ye ladka aatankwadi to kya gunda bhi nahi hai bas unko ye kale kapdo ka reason janna tha unhone wo kapde liye aur JD ko leke dukan ke baahar aaye aur unki gadi khadi thi wo, JD ko leke gadi me baithe

Ab apan giraftar ho gaye hai ye baat JD ko confirm ho gayi thi aur wo darr ke kam raha tha aur aansu to ruk hi nahi rahe the aur baar baar wo bas ek hi baat bol raha tha ke usne kuch nahi kiya hai

Gadi me baith ke inspector ne pucha ke “sach me pata barabar bataya tha” JD ne ha me gardan hila di fir wo samjhane ke swar me bola, “arey bete ye sab kalpanik hota hai jasoos wagaira, aise kale kapde pehan ke raat me kisi ko dikh gaya to police to dur log hi maar denge isiliye ye sab band kar, wapis aisa kuch karte pakda gaya to sidha ander karunga, ab yaha se sidha ghar jana, hamari najar rahegi tere pe”

JD ne jaise hi suna ke sidha ghar jana hai wo jhat se utar ke shortcut pakad keghar ki taraf nikla, inspector ne uske piche ek hawaldar ko bhi bheja bas unko ye janna tha ke pata barabar hai ya nahi

Us din ke baad JD college ke alawa ghar se bahar nahi nikla, man kar raha tha ke ye jasoosi ka picha chhod de pr fir 4-5 din baad wo ghar se bahar nikla aur ye dekhte huye ke kahi police uspar najar to nahi rakhe huye aur fir ek baar fir se usne apne liye bhes badalne wale kapde kharide par mask kharidne hi himmat usme nahi thi aur ek khushi thi ke koi uspar najar nahi rakh raha tha

Ab jasoos banna to final tha par uske liye chori se kahi par bhi ghusne ki practice bhi chahiye thi to JD ne ek plan banaya aur raat ka intajar karne laga, jaise hi raat huyi usne apn jasooso wale kale kapde pehne par bagair mask ke wo feel nahi aa raha tha to bas muh par kapda lapega to dheeme se ghar ke bahar nikla aur fir sane ke chauk se hote huye apne hi ghar ke piche ki side aaya, uska hath chehre par hi tha ke agar koi aaye to jhat se kapda hata sake taki maar na pade aur fir ghar ki boundry waal kud ke bhai aa pahucha usi ke room ke khidki ke niche, waha ka ground floor jamin se kuch 3-4 foot ucha tha aur waha se pehla majla 12-13 foot aur waha se uske room ki khidki 2 foot par thi aisa JD ko pura 19-20 foot chadhna tha aur jasoosi kapdo use bada romanch mehsus ho raha tha, uske room ke khudki ke paas ne water supply ka bada pipe tha to bhai ne usi ke sahare upar chadhne ka socha au, 10 foot wo aram se chadh gaya aur fir uska confidence badha ayr usne jaldi se upar chadhne ke liye aur pair thoda jyada ucha uthaya aur yahi gadbad ho gayi, wo kacchi silayi ki pant ne yaha daga de diya aur ek tarrr ka awaj aaya, ek pal ko JD ne socha ke niche utar jate hai par jasoosi ka bhoot manne ko tayar nahi tha ab usne apne daye hath ne pipe ko padka aur is baar shirt ne daga de diya, aur in sab fada fadi ne sharir ki thodi hulchal huyi aur uske pant ki clip tut gayi aur pant niche ab apan kaha hai ye soche bagair usne dono hatho se pant sambhalne ki koshish ki aur jab hosh aaya to wo jamin par pada tha aur uske sath pipe bhi dharashayi ho gaya aur us adhe tute pipe ke se tanki me jama pani sab JD ke upar, ab halat aurkharab. Kal ghar me pani nahi milega aur kisi ko kuch samjhe isse pehle JD ne apna room pakda aur kapde badl ke so gaya

Ab JD apne janamjaat sapne se dur ho raha tha, uska college me jana regular ho gaya tha aur ab dinbhar uske dimag me jasoos banne ka khayal nahi rehta tha par raat me uske ander ka jasoos apna sar uthata tha aur uski neend kharab karta tha par ab JD ne khud pr kabu pa liya tha aur kabhi kabhi wo inspector chauhan se bhi mil aata tha aur chauhan use hamesha samjhate the ke ye sab baate dimag se nikal de aur itna hi hai to UPSC de ips ban aur fir gunahgaro ko pakad par nahi bhai ko banna to jasoos hi tha

Ek din usko kuch kaam se bus se bahargao jana th, usne bus pakdi, jyada gardi nahi thi usne badhiya khaidki ke paas ki seat mil gayi, aur ab uske dimag me aaya yaha jasoosi karne ka, bus pe baith te huye usne ek line padhi thi ke kisi bhi anjaan chiz ko hath na lagaye, binamalak saman dikhte hi conducctor ko bataye aur JD ki najar bus ke darwaje par jam gayi aur wo aane wale har bande par unke saman par najar rakhne laga sath hi kaun kaha baith raha hai ye bhi dekhne laha, ab bus me gardi bhi badh gayi thi par shaq ho aisa kuch nahi dikha aur conductor ne bell mari aur gadi aage badh gayi

JD uski seat par akela baitha hua tha aur aur ab wo apne phone me kuch kar raha tha, bus ab dheere dheere shahar ka traffic paar karte huye bahar ki or nikal rahi thi conductor ticket faad raha tha aur fir bus abhi shahar ke thoda door nikli hi thi ke achanak JD chauka, uske dhyan me aaya ke usne uske baad bus me chadhe logo par to najar rakhi hi thi par uske pehle bhi to kuch log bus me chadhe the unko to wo bhul hi gaya tha fir agar kisi pehle chadhe huye insan ne bus me bomb plant kiya hoga to?

JD ab pura bechain ho gaya tha, bus me ab kabhi bhi bomb fat sakta hai aur sab marenge ye khayal se hi wo ghabrane laga tha, ab kare to kare kya, kuch na kuch rasta to nikalna hi tha, uske bus me rehte agar bomb fat gaya to iske jaisi dusri koi beijjati nahi thi, usne is baat ko najarandaj karne ke liye pehle to khud ko gaaliya di air fir sochne laga

JD ne decide kar liya tha ke pure bus ki talashi leni padegi, kaam mushkil tha aur ho sakta hai log uski taraf shaki najro se dekhe ya maar bhi padne ke chances the par usne himmat nahi hari aur wo apni jagah se utha, bus me upar rack par rakhe sare bags dekhne laga sath hi ye bhi ye us bag ke niche ki seat par koi baitha hai ya nahi, ek do logo ne to usse puch bhi liya ke wo kua kar raha hai, par JD ne unhe najarandaj karke apna kaam jari rakha aur akhir me use wo dikhi, ek lawaris bag, jiske niche ki seat par koi nahi baitha tha

Aage ka kaam ab easy tha, bas conductor ko jakar batana tha aur JD ne wahi kiya aur dhime awaj me baat ki gambhirta conductor ko samjhane ki koshish ki par shayad ko conductor ko ache se samjha nahi paya aur conductor us bag ke paas jakar sabse chilla kar puchne laga ke wo bag kiski hai, par koi jawab nahi aaya, ab conductor ki bhi fat rahi thi, kyuki char panch baar puchne par bhi kisi ne us bag ko claim nahi kiya tha conductor ne jakar bus ke driver ko sara kissa bataya aur unme kuch charcha huye aur conductor bahar aakar bus ke gate ke paas khada ho gaya, itne me bus ek gaon me pahuchne wali thi aur waha ka police station gao ke baahar side hi tha to driver ne bus sidha police station par roki aur sabse pehle JD conductor aur driver bahar aakar ruke, tum to bach gaye yahi bas unke man me chal raha tha

Ab lawaris bag ki baat police tak pahuch gayi, unko bhi apni jaan pyari thi yo wo bus ke bahar se hi sab logo ko apne apne saman le sath niche utarne ka bolne lage par logo ne under se puchtach jari rakhi to thak me police ko bus me bomb hai batana pada jiske sath hi sari janta ek jhatke me apne apne saman ke sath bus ke baahar

Ab asli challenge tha us lawaris bag ko baahar lane ka police ne conductor ko dekha aur usne JD ko aur kaha "ye... Isine sabse pehle dekha tha us bag ko"

Ab JD samajh gaya ke aage kya hoga.. darr to lag raha tha par ander ka jasoos shant baithne ko khali nahi tha, darte darte hi JD ne bus ka darwaja khola aur ander aaya, uske piche police wale the hi, aur chalte chalte JD us seat tak aaya jaha uper wo bag rakhi thi aur jaise hi usne is jagah par dekha, ashcharya!!! Waha par ab koi bag hi nahi thi!!

"Kiya hua kaha hai bag?" Police wale ne pucha "yahi... Yahi thi sir par ab nahi hai" JD ne jawab diya

"Nahi hai matlab? Kaha gayi? Kaun le gaya?" Police wale ne kadak awaj me puchtach ki aur JD ka to haal hi bura tha use to samajh hi nahi aa raha tha ke wo bag gayab kaha huyi upar se police walo ki baate mano is sab ko wo hi jimme daar ho

"Yahi thi bag maine conductor ko bhi dikhayi thi unhone sabse pucha tha uske bare me kisi ne jawab nahi diya" JD ne darte huye kaha fir conductor ko bulaya gaya lekin wo ander aane de par raha tha par usne bahar se hi JD ki baat ka samarthan kar diya, police walo ne fir puri bus ki talashi li lekin unko koi bhi lawaris bag nahi mili aur akhir me wo log bus ke niche aaye

Police bhau ne pehchan liya tha ke wo lawaris bag uske malik ke sath niche aa gayi hai unhone JD ne pucha "kaisi bag thi ?"

"Suitcase thi"

"Badi ke chhoti?"

"Grey color ki medium size"sawal jawab lamba na chale isiliye JD ne details me bataya aur aisi bag jis kisi ke bhi paas ho wo sab aage aaye aisa police bhau ne order de diya.. aur aisi bah wala waha bas ek hi insan tha to kaam aur bhi aasan ho gaya, ab police bhau ne wo bag ke malik ko pucha “kaunsi seat pe baitha tha ?” us bande ne bhi andaje se bataya ke kaunsi seat pe baitha tha “aur bag kaha rakhi thi?” police bhau ne pucha to us bande ne jawab diya “seat ke dusri side”

“kyu tere sar ke upar jagah nahi thi”

“wo kya hai na saheb, apni seat par upar bag rakho to dhyan nahi rehta hai aur fir kisi ne bag chor li to, dusri baju rakho to dhyan rehta hai”

“abey par jab conductor chilla chilla ke puch raha tha tab bola kyu nahi tu, tab so raha tha kya?”

“ha saheb, wo kya hai namujhe gadi me baithte hi neend aa jati hai, to ye sab kab hua neend me pata hi nahi chala”

“arey bhalemanas jab tujhe itni gehri neend lagti hai to bag kahi par bhi rakhta kya fark padta ?” police wale ne thoda chidh kar raha

Ab mamla pura palat gaya tha aur sara kissa sabke dhyan me aa gaya tha aur ab sab log JD ko khari khoti sunane lage, khud ko detective samajhta hai kya, faltu me time waste kara diya wagaira wagaira sab waha ab sunai de rahe the itna hi kya to police aur bus conductor bhi uski taraf gusse de dekh rahe the, ab apni khair nahi ye JD samajh gaya aur chup chap jake gadi me baith gaya aur sar par hath marte huye police ne bhi bus ko aage badhne keh diya aur ab bus me sab JD ko gusse se dekh rahe the

Sham ko jab JD apne ghar wapis aaya to usne pakka man bana liya tha ke ab ye sab jasoosi wagaire band, ye apna kaam nahi hai, padhai puri karo aur mile wo naukri karo..

Par raat me use neend hi nahi aa rahi thi, bhoot-e-jasoosi itni jaldi kaise nikalne wala tha, wo apne room me hi idhar se udhar ghoom raha tha, raat ke 12 baj chuke the, wo khidki ke paas aake khada hua to andhere me uske uskle ghar ke piche ke side ek buinding ke paas kuch hulchal dikhi.. ek parchai raste ki baju se diwar ke sahare dheere dheere chal rahi thi.. “lagta hai koi chor hai” JD ne socha aur isike sath uske ander ka jasoos bahar aa gaya, JD jasoos ko shant karna chahta tha par wo sunne ko tayar hi nahi tha aur akhir me jasoos jeet gaya aur JD ne apna dhyan us parchai ki taraf lagaya

“ye pakka chor hai, abhi isko pakadta hu matlab polico me bhi apna vat padega” ye baat JD ke dimag me aayi, uske paas inspector chauhan ka number tha hi aur usne phone laga diya aur chauhan sahab bhi night duty par the to unhone bhi phone uthaya, JD ne unhe jaldi sab bataya aur us parchai par najar rakhne laga

Ab wo parchai chalte huye ek bulding ke khuidki ke paas aakar ruki, wo khidki abhi band thi aur khidki ke paas hi ek pip[e laga hua tha, us parchai ne fir apne hatho par thodi mitti lagayi aur dheere dheere pipe chadhne lagi, ekdum kisi trained insan ke jaisa wo pipe par chadh rahi thi jiske dekh ke JD ko thoda ashcharya hua ur use khud ka pipe par chadhne ki ghatna yaad aayi aur ab use yakin ho gaya ke ho na ho ye ek shatir chor hai.. itne me police ke siren ka awaj aa raha aur police ki gadi waha us gali me dakhil huyi aur JD khidki me se police ko jor se awaj dene laga, uske chillane se aur police ke siren se wo aadmi thoda chauka aur jaldi se upar chadhne ke chakker me wo niche gir gaya wo bhi sidha police ke gadi ke samne

JD bhi jaldi se bhag ke waha pahucha.. use police ko dikha dena tha ke wo kitna jagruk hai aur kamal ka jasos bhi.. is sab chillam chilli me ab waha kafi log jama ho gaye the aur police ne us aadmi ko pakad liya tha wo wo aadmi apna muh chipa raha tha taki koi use dekhe na

JD waha pahucha tabhi waha us building ki malkin aur 5-6 log aur aaye aur unko dekhte hi us aadmi ne apna chehra aur dhak liya

Us lady ko thoda shaq hua wo aage aayi aur us aadmi ka hath hataya aur uska chehra dekh ke wo thoda chillayi.

Waha kisi ko samajh nahi aa raha tha ke ye chal kya raha hai, police bhi confuse the ke ye aurat chillayi kyu tab wo lady boli

“aapne inko kyu pakda hai, ye mere pati hai”

“ye aapke pati hai to ye pipe se ghar me kyu ghus rahe the? Aapke ghar ko darwaja nahi hai kya?” chauhan sahab ne pucha aur fir us aadmi se pucha “kyu ghar ka darwaja pata nahi hai ye mil nahi raha tha.. itni pite kyu ko ke khidki darwaje m fark na kar sako.”

Ab us lady ke sab dhyan me aa gaya,us ghar ke malik ko daru pine ka shauk tha aur ghar me iska virodh tha to bas ye uska upay tha.. ghar ke sab so gaye uske baad wo aadmi khidki se nniche utarta tha aur pine ka karyakran ho gaya ke khidki se chadh ke wapis jake chup chap so jata ttha… Aaj JD ke wajah se uska ye raaz bahar aa gaya tha isiliye wo JD ko gaaliya de raha tha dusri taraf waha jama log, ye kissa dekh ke has ke maje le rahe the aur sabke saamne ijjat ki dhajjiya ud gayi isiliye wo lady bhi JD ko gusse se dekh rahi thi

Halanki is sab ne JD ki koi galti nahi thi, fir bhi sab usi ko suna rahe the ke kyu kisi se fate me tang adayi aur akhir me polico ne bhi bol diya ke aise agar sabko takleef di ainda to ander kar denge..

Ab galti ki us aadmi ne par usse jyada gaaliya khani padi JD ko, khair ye sab khatam hua aur wo ghar aaya aur aate huye hi usne ptarigya kar li ye ab ye sab band, dobara jasoosi ka naam nahi lega par stah hi use ye sawal sata raha tha ke us bewde ke mukable wo jyada saksham hai aur wo daru pike pipe chadh sakta hai to apne ko ye kyu nahi jama ? aur isike sath Bhoot-e-jasoosi dobara apna sar uthane laga.
 

Moody_Jatt

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JENNIFER​


JENNIFER​


Dan was a little nervous as he pulled in front of the big white house. He'd been enthralled with the looks of Jennifer Grayson for close to three months, ever since he'd seen her in the halls of school, and was as close to "in love" as any eighteen year old guy could be.

He'd only recently gotten up the nerve to ask her out, and had spent a good share of his time simply fantasizing and watching her in the halls and in class. Almost every boy at Washington High was doing the same thing.

Jennifer was the type of girl that was simply too beautiful to be approached by the normal high schooler. Her habit of wearing short skirts that showed her incredibly long legs, and her obvious distaste for bras made her food for every boys dreams.

Jennifer was any boy's dream come true. Long, thick brown hair that reached almost to her waist, a wonderful sense of humor, a lot of brains, and a body most men, sixteen or not, would kill for. Although she didn't possess large breasts that most of his friends lusted after, hers were firm and high, with nipples that stood out proudly against her blouses and sweaters.

And she had more of a sophisticated style of dressing than most of her friends. It was definitely sexy, but also very classy. In fact, Jennifer Grayson oozed sex. It radiated from her with each and every move she made.

Jennifer's only problem was that, because of her classy, sexual exterior, she appeared out of reach to most of the guys. She'd been dating fairly often, since she'd transferred from her old high school, but usually they were just one night. She hadn't chanced to meet Mr. Right yet. Or, for that matter, Mr. Okay.

What Dan didn't realize, as he pined for her from a distance, was that Jennifer had been watching him, too, and hoping he would get up the nerve to ask her out! Jennifer had her own fantasies.

They'd finally met on the beach during the summer, and, he had to admit, it was her body that attracted him first. She'd been wearing a small bikini that barely covered her full, upturned breasts, and, although it wasn't a 'thong', had ridden up into her ass crack, exposing most of her butt to all who happened to look.

She was also eighteen, although she carried herself with the poise of a worldly model. She also carried herself within a body that was definitely worthy of modeling.

And on that day at the beach, every male eye was following her around. He'd gotten up the nerve to introduce himself, and was pleasantly surprised when she reacted positively to his overtures.

He especially liked the way her eyes drifted over his body as they talked about the day, the beach, and life in high school.

And he was mildly surprised when she accepted his offer for a date that coming Friday. When he asked her out, she merely said "Sure...call me..." and had walked away down the beach, her hips swaying in a wonderfully sexy way. It wasn't until later that he realized he didn't get her number.

If this were a movie, there'd be a few minutes of comic scrambling as Dan combed the beach, looking for his lost lady. Finally, he ran into a girlfriend of hers he'd seen her with earlier, and finagled the number from her.

That evening, to his major relief, he dialed the number and heard her sexy voice on the other end. And, after a couple minutes of chatter, they'd made a date for this evening.

All this to explain Dan's nervousness as he sat in front of her house. He'd dressed rather casually, in Docker's and a knit shirt, and he was hoping that Jennifer would approve.

Dan considered himself very lucky, although his young ego would never admit that to anyone. He knew all the guys envied him, and he liked that. but it was Jennifer, most of all that he liked. Tonight was going to be their first, official "date".

He felt his cock stiffening inside his pants as he thought of her.

He had suggested a light dinner and a movie, but she had countered with the suggestion of getting a bottle of wine and going to the drive-in. She'd said she could 'liberate' a bottle from her parent's pantry.

When Dan had asked what was playing at the drive-in, there was a pause on the line before she whispered..."Does it matter...?" Jennifer loved to tease, and she did it very well. He'd felt his cock stiffening as their conversation continued, her sexy voice driving him crazy.

When they'd finally hung up the phone, Dan went to the bathroom and masturbated, his cum shooting in a wide arc into the sink as he thought of Jennifer.

Back in his room, he drifted off to sleep with visions of this lovely lady dancing in his head. The next three days seemed like an eternity as he waited for this night to arrive.

Now tonight, as he sat in his car, waiting for his hardness to subside, he tried to control his excitement. Finally he felt ready to walk the final 'mile' to the door. He took a deep breath as he pushed the doorbell.

He was expecting to be greeted by a stern faced 'father face', and breathed a sigh of relief when Jennifer herself opened the door.

"Come in, Dan..." she breathed. "My parents are at a party for another hour or so, but I'm almost ready."

He was glad to see that she'd dressed as casually as he had. His eyes drifted over her body as she walked up the stairs. She told him to make himself at home in the parlor, but instead, he stood in the foyer, watching her ass as she walked up the steps.

She wore a short denim skirt that accented her ass beautifully, and he felt himself getting hard again as he watched her walk. She paused on the top landing and turned to him as if she KNEW he'd be watching.

"I'll be right there, Dan..." she smiled, then moved out of sight. Dan shook his head in disbelief at his luck, and went to sit in the living room.

Jennifer was true to her word. In less than five minutes, she appeared in the doorway. She stood there, her leg cocked to one side, and her hands clasped behind her back. Dan sighed inwardly as he drank in the sight of her. She wore sandals on her feet, and Dan's eyes started there, moving slowly up her long legs, over the denim skirt and up to her chest.

She wore a short cotton top, kind of 'T-shirt' material, but with buttons up the front. The bottom was cut to about three inches above her belt, exposing a delicious expanse of her midriff. The bottom hem stayed away from her skin, held out by her firm breasts

It was painfully obvious to Dan that she'd opted to not wear a bra. Her nipples stood out against the cotton, and seemed to expand as Dan watched.

He whistled under his breath.

"So you approve...?" Jennifer whispered with a smile. Dan could only nod, his mouth suddenly dry and unmovable. Jennifer's smile grew as she watched his discomfort.

"So let's go, shall we...?" she laughed, pulling a short jacket out of the closet. She turned to Dan as he walked up to her, and put the jacket over her shoulders. The movement of her arms caused her tits to press against the cotton of her shirt, and made Dan lose his voice once again.

They were almost out the door when Jennifer asked him to wait. She ran inside and returned in a second with a bottle of White Zinfandel under her jacket. She looked at him with an evil smile.

"It'll help us to relax...." she grinned, and led the way to his car.

Dan held the door for her as she got in and whistled again as she let her skirt ride up her thighs as she slid over the seat. He shook his head as he shut her door and ran over to his side.

He grinned when he got in, seeing that she had moved over to his side of the seat. Her denim skirt stayed high on her thighs.

Dan pulled away and headed for the drive-in. His heart was pounding in his chest as he paid the attendant and drove into the lot. It was already fairly crowded, and as Dan drove from lane to lane, looking for a good spot, he felt Jennifer's hand on his leg. He slowed and turned to her.

"We can see pretty well from the back, you know. There's a couple good spots up there..." She raised her eyebrows and grinned at him. Dan didn't hesitate, finding a spot in the back, and away from the concession stand, almost immediately.

He parked the car, and reached for the speaker, rolling up the window to hold it securely. He nervously tried to adjust the sound and the position, but finally ran out of things to do. He sighed and turned to Jennifer. He found her leaning back into the seat, a huge grin on her face.

"Wine...?" she said, offering him the bottle. He opened the wine and they sat there in the dim light, drinking from paper cups and watching the first movie. It was a movie called "Body of Evidence" with Madonna and Wilhem Defoe. As it turned out, it was pretty erotic thriller, with a lot of excitement and a fair amount of nudity. And there were a number of shots of Madonna nude and semi-nude.

Dan found himself getting engrossed in the film, many of the scenes were making his cock harden in his pants. In one scene, Madonna was standing on the hood of a car, in a parking garage. Defoe was standing in front of her as she hiked her skirt up
her legs, exposing her stockinged thighs and black garter belt. Dan was engrossed, but was pulled from his hypnosis, by Jennifer's' voice.

"Do you think she has nice breasts...?" Jennifer asked him "innocently", staring at the screen.

Dan's brow furrowed. He knew from experience that this was a loaded question. He thought for a moment before answering. He turned in his seat, letting his eyes drift over Jennifer's body. They settled on her breasts and then moved back to her face.

"Madonna has a pretty decent body..." he replied, "but it's her attitude that I find attractive. She enjoys what she does and it's obvious." He watched Jennifer as she turned to him, listening intently. He felt instinctively that he'd chosen the right approach in his answer.

"It seems to me", he continued," that she understands how people think, and she enjoys the game of sex as much as the physical part." He hoped his answer would suffice.

Jennifer looked at him for a minute, a blank expression on her face, then smiled broadly. Dan mentally released a sigh of relief. His method of answer had been the right one.

She leaned forward, placing a hand on his thigh, and kissed him lightly.

"Good answer..." she whispered. Dan grinned and put his arm around her, squeezing her tight as they turned back to the screen. Jennifer kept her hand on his leg, and the feel of her warm palm on his thigh made his cock bloom to full hardness. Out of the corner of his eye, he saw Jennifer look down at his bulge, then turn back to the screen, a sexy grin on her face.

They watched the actors making love on the screen, and Dan was getting extremely turned on. He felt his cock was going to rip through his pants as Jennifer began to stroke his thigh lightly. His own hand began to move up and down her soft arm, as the smell of her perfume began to take it's toll on his senses. Jennifer responded by cuddling closer, leaning her head on his shoulder.

Dan was in heaven. He was sitting in a dimly lit car with the girl of his (and everyone's) dreams, with his arm around her and her hand on his leg. His bravery increased as the moments ticked by. As his hand moved up and down her arm, Dan spread his fingers wider. His thumb barely grazed her right breast as he passed and he waited for a response.

When none came, he grew bolder. On the next pass of his hand, his thumb made heavier contact with the side of her tit, being obvious in the fact that it was not merely an accidental contact.

Jennifer sighed and moved even closer, her own hand continuing to move along his thigh. Dan's heart was pounding in his chest as he took the next step. This time he allowed his fingers to join his thumb, running his hand over the soft curve of her breast. Her skin felt very warm, even under the fabric of her shirt.

Dan got bolder, moving his arm around and running his hand over her breast, cupping it lightly, and feeling the hardness of her nipple as his palm brushed over it. Jennifer let go with a low moan, sliding her hand higher on his thigh.

Dan continued to play with Jennifer's right breast, then boldly moved to her left, cupping and squeezing that one also as they silently watched the movie.

He had a moment of fear, when Jennifer pulled away slightly. She drew her head away from his shoulder, and leaned back into the seat. Dan's first thought was that the fun was over before it began, but Jennifer was merely adjusting her position to allow him more comfortable access to her breasts.

She looked up at him and smiled. "That feels good..." she whispered, then turned back to the movie. She leaned her head against the seat back and her eyes closed to thin slits.

Dan thought he was going to have a seizure right then and there, his heart was pounding so fast. He pushed a finger in between two buttons, and felt her bare flesh underneath. Pressing on he found the hard nipple of her left breast, running his fingertip over it again and again.

Jennifer sighed and moved her left hand higher up his leg. Her hand was still a ways away from his hard-on, but her new position caused her elbow to make contact with it. Dan groaned and he saw Jennifer smile. She pushed her elbow down against his cock and squeezed his thigh. Dan was afraid he'd come right there, but steeled himself and held back. It simply wouldn't do to come in his pants on their first date. He turned his mind from the burning in his pants, and returned his attention to his fingers.

His breathing was ragged as he made contact with the top button of her blouse. He flicked it open effortlessly, causing Jennifer to begin to breath heavier as well. He quickly undid four of the buttons and reached his hand inside her blouse.

"Mmmmmm..." Jennifer sighed as Dan cupped one naked breast, then the other. She looked up at him again, a look of lust on her face.

"Do you think I have nice tits, Dan...?" Dan looked down at her. Her lips were parted and she was breathing through her mouth. Her lips glistened in the flickering light of the movie screen.

Dan grinned at her foolish question. "You've got the most incredible body I've ever seen, Jennifer." he said sincerely. He cupped her breast and then gently pinched her nipple. "Yeah....I think you have nice tits..."

Jennifer smiled and tilted her head up to him. Dan leaned over kissing her lightly, then harder as he felt her tongue brush his. Jennifer moaned and turned towards him, pressing her chest against his.

Dan almost screamed as he felt Jennifer's right hand move over to his thigh. She broke their kiss, leaning back and looking into his eyes as she slid her hand higher and higher up his thigh. She was grinning as she continued higher. Her hand cupped his full balls and then moved to cover his hard cock.

"God, Dan..." she whispered, "You're hard as a rock..."

Her eyes closed to slits once again as she wrapped her palm around him and began a rhythmic squeezing. Dan groaned a gain and returned his lips to hers. Their tongues intertwined, dueling wetly as they breathed each other's air. Jennifer was moaning as they kissed and her hand was working wonders on his cock, running up and down it's full length, squeezing and pawing.

Dan's left hand was busy also. He undid the last of her buttons, and pulled the thin cotton away from her tits, exposing them to the cool night air. Her naked flesh felt wonderful under his hand, and he gently teased and stroked her breast, paying particular attention to her nipples. She'd shown that she enjoyed that, and the only thought he had was to pleasure this girl as well as he possibly could.

Well, maybe not his ONLY thought.... His breath caught in his throat as he felt Jennifer move up to his belt buckle. He pulled back allowing her the space to work. He began to moan as she undid his belt, then unbuttoned his pants. She was kissing him fiercely as she pulled his zipper down and reached her hand inside his open pants. He groaned loudly as she pulled his underwear back and wrapped her hand around his hard cock, pulling it out into the dim light of the car. She began to stroke him up and down, jerking him off as they continued to kiss.

Dan dropped his hand to her thigh. Jennifer thrust her tongue deep into his mouth and spread her legs wider, inviting him higher. Dan grinned into her mouth and slid his hand up until he felt the hot dampness of her panties under his palm.

There was no more teasing now. Both of them were fully intent on exploring their lustful fantasies. "You've got a great cock, Dan... Mmmm...it's so hard.. "

Dan was excited beyond belief. He'd never been with a girl who so obviously enjoyed sex as much as he did. He'd gotten hand jobs before, at this same drive-in and in this same car, but always from girls who had to be "coaxed". He'd never had a girl take his cock into her hand so eagerly. And he'd never, ever heard a girl use the word "cock" as she stroked it.

Jennifer stroked him faster, as Dan moved her panties aside. She stiffened when his fingers found her naked pussy lips, then she let out a long "Aaahhhh...." as he worked his fingers between them. Dan flicked his thumb lightly over her clitoris, stimulating her further as he slid his finger into her pussy.

She was wet enough to allow him effortless passage, and he pushed deeper until his entire middle finger was inside her. Jennifer's hips began to move, and he followed her rhythm, fucking his finger in and out, continuing to pay attention to her clit at the same time.

Jennifer broke their kiss, pushing her face into Dan's shoulder. Her hand maintained it's grip on his cock, but her stroking stopped, much to Dan's relief. He'd felt he was going to come at any second, and didn't want to spray all over the two of them. He looked down at this lovely vision beside him.

He continued to slide his finger in and out of her pussy, as he gently pushed her back onto the seat. Jennifer didn't resist at all, leaning back until her head was against the passenger door. She was an incredible sight as she lay there. Her skirt was hiked up to her hips, and her blouse lay on either side of her firm tits.

Dan continued to finger her as she looked up at him with smoldering eyes. She brought both hands up to her tits, squeezing them as she spread her legs wider.

"Make me come, Dan...." she panted, "God, your finger feels so good inside me...Please make me come...oh....yes..."

Dan was happier than he'd ever been in his short life. Jennifer's hand had felt wonderful on his cock, but he felt even better to know he was pleasuring this girl of his dreams as much as he was. He'd never been with anyone who was this exciting and free. He only wanted to do more.

Although his experience with cunnilingus was limited, so far, to his fantasies, he didn't hesitate for a moment. He leaned forward, until the sweet smell of Jennifer's pussy greeted his senses. He pushed his face deeper and began to lick her wet pussy with the tongue of a master.

Jennifer groaned as she saw his head begin to descend, anticipating something she'd only dreamed of. She stifled a scream as Dan began to lick and suck her pussy. She reached down with both hands, cradling Dan's head as he licked the full length of her, starting at her asshole and ending at her clit. He sucked her clitoris into his mouth and ran his tongue over it in tiny circles, then he repeated the process, over and over, driving Jennifer over the edge.

She spread her legs as wide as the car would allow, knowing that she must look like a complete slut if anyone happened to pass the car and look inside. She truly did not care, though. In fact, the thought of someone watching her as she got her pussy eaten only heightened her lust.

She was about to pour her cum into this handsome boy's mouth, and that was ALL she cared about right then. She began to move her hips up and down, in the opposite motion of Dan's tongue. She could feel her orgasm approaching, and knew it was going to be a good one.

Dan could feel Jennifer tensing up as he licked and sucked her. He was loving every aspect of what he was doing. The sloppy wetness of her pussy as it moved over his face was particularly exciting. His whole lower face was covered with her wetness, and the taste and texture of her juice on his tongue made his cock throb. But he especially loved the smell of her pussy as her orgasm approached.

He began to shake his head from side to side as he ran his tongue up and down her lips. Each time he made contact with her clit, Jennifer would let out a tiny scream. He knew she was close and doubled his efforts.

Jennifer stiffened, and pulled Dan's head tight against her cunt. Dan grinned and continued to lick, holding his head still. Jennifer's hips began to shake like San Francisco, and she released a huge sigh.

Dan felt her juice begin to flow into his mouth. Jennifer began to moan, shaking like a tree, and Dan sucked like a madman, as she filled his mouth with her cum. She began to moan over and over and her hips started to fuck against his face as her orgasm overtook her and she spilled wave after wave of cum into Dan's sucking mouth.

She'd never, EVER, had an orgasm this powerful! She humped against Dan's tongue as she pulled him deeper with her hands. She wanted to scream out, but a small voice in her head told her they were still at the drive-in, and she was able to control her voice. But she continued to moan low as she poured load after load of sweet cum into Dan's greedy mouth.

Finally, after what seemed like hours, she collapsed, exhausted, against the door. She looked down at Dan and began to laugh with sheer pleasure.

"God!! That was incredible! Dan...that was the most incredible....that was...oh my....Dan! Where did you learn....Oh....my...!"

Dan looked up and grinned at her. His face was covered in her juices, and he was licking his lips to get as much as he could into his mouth. He didn't bother to tell Jennifer that it had been his first time. Some things are just better left unsaid. She reached down and pulled his head up to hers. she kissed him hard, thrusting her tongue deep into his mouth, and when she tasted her own cum on his tongue, began to lick his lips and face, drawing her juice into her mouth.
Leaning over her, as he was, Dan felt the wetness of Jennifer's pussy against his hard cock. As they kissed, he began to slide his cock against her slick lips. Jennifer groaned and parted her thighs, loving the feel of his meat as he slid it's length along her outer lips.

Dan pulled his hips back slightly, causing his cock to stand out straight. He positioned his cock head against the entrance to her pussy, and groaned when he felt her lips fold around him. Jennifer tensed, though, and pushed his hips back.

"We can't....Dan...we can't..I mean I've never...I've never done that...." Dan stopped his forward progress. He was disappointed, but looked down at her with a grin.

"That's okay..." he whispered. "Either have I..." Jennifer relaxed visibly. "Maybe some other time...huh?" His grin was disarming, and Jennifer smiled. She looked up at him with love.

"Yeah..." she replied. "Definitely another time. Thanks, Dan..." She reached a hand between them and found his hard cock. Dan groaned as she wrapped her fingers around it. She looked at him with a big grin.

"But there are other places this can go, you know...." she teased. She began to stroke him as Dan began to push in and out of her fist. "Maybe we should try them first...." She grinned again and began to sit up, pushing Dan backwards as she did.
 
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