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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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God se related tha, isliye maine kuchh bhi nahi likha, baki apni story likhta hoon, isliye jyada bada review nahi likhta hoon, baki kisi din mood ban gaya toh 2k words ka review chhap dunga.
Koi baat nahi humko kuch jyada bhi nahi chahiye hota, balki tum khud ek lekhak ho, aur tumko pata hi hai lekhak ko kya chahiye hota hai 😎
And 2nd baad isme kisi bhi dev/bhagwan ka naam clear nahi likha hai, is liye befikar raho. Main khud kya hu wo dekho?. And jaanta hu ki kya and kaise likhna hai, and sabse main baat ye thread non erotic/adult thread hai. So isme agar galti se kahi likh bhi diya and us se kisi ki bhavna ko thes na pahuch rahi hai, to chalega 👍
 

Raj_sharma

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Raj_sharma

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dhparikh

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#179.

शक्ति
- एक ऐसा शब्द जिसे प्राप्त करने के लिये, मनुष्य, देवता, दैत्य ही नहीं अपितु अंतरिक्ष के जीव भी सदैव लालायित रहते हैं।

शक्ति का पर्याय स्वामित्व से जुड़ता है, इसलिये ब्रह्मांड के सभी जीव शक्ति को प्राप्त कर, स्वयं को श्रेष्ठ दिखाना चाहते हैं।

वन में मौजूद एक सिंह भी, अन्य वन्य प्राणियों के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। ठीक उसी प्रकार कुछ देवता भी मनुष्यों के समक्ष, अपना शक्ति प्रदर्शन कर, उनमें भय की भावना उत्पन्न करते रहते हैं।

जैसे देवराज इंद्र के द्वारा जलप्रलय लाना या सूर्यदेव के द्वारा सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देना। यह सब भी शक्ति प्रदर्शन के अद्वितीय उदाहरण हैं।

दैत्यों ने हमेशा त्रिदेवों से ही शक्ति प्राप्त कर, उनका प्रयोग देवताओं के ही विरुद्ध किया है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, मनुष्यों ने भी घोर तप किये हैं।

कुछ ऐसी ही देवशक्तियों को, पृथ्वी की सुरक्षा के लिये, देवताओं ने पृथ्वी के अलग-अलग भागों में छिपा दिया, जिससे समय आने पर कुछ दिव्य मानव, उन देव शक्तियों को धारण कर, पृथ्वी की सुरक्षा का भार उठा सकें।

ऐसे ही देवशक्ति धारक कुछ विलक्षण मनुष्य बाद में ब्रह्मांड रक्षक कहलाये।

समयचक्र- डेल्फानो ग्रह समाप्त होने के बाद, वहां के राजा गिरोट ने अपनी सबसे अद्वितीय रचना समयचक्र को पृथ्वी पर फेंक दिया, जो कि ब्लैक होल के सिद्धांतों पर कार्य करती थी।

यह समयचक्र पृथ्वी पर आने के 20 वर्षों तक सुप्तावस्था में रहा। एक दिन अचानक ही यह समयचक्र अपनी शक्तियों से, समय के कई आयामों को बांधने की कोशिश करने लगा।

इस समयचक्र के पास समय और ब्रह्मांड में यात्रा करने की अद्भुत शक्तियां थीं, पर इसी अद्भुत
शक्तियों को प्राप्त करने के लिये कुछ अंतरिक्ष के जीव भी पृथ्वी पर आ गये।

उन जीवों के पास दूसरी आकाशगंगा की अनोखी शक्तियां थीं, जो हमारे विज्ञान की कल्पनाओं से भी परे थीं।

इसी के साथ शुरु हुआ एक अनोखा टकराव, जिससे अनगिनत प्रश्नों की एक श्रृंखला खड़ी हो गई.

1) क्या व्योम और त्रिकाली, विद्युम्ना की जलशक्ति से बने मायाजाल में, देवराज इंद्र के वज्र से बच सके?

2) क्या हुआ जब कालकूट विष से बने नीलाभ को ब्रह्मांड में, महा..देव के पंचमुखी दर्शन हुए?

3) क्या हुआ जब ओरस, स्वयं अपने ही समयचक्र के जाल में फंसकर समययात्रा कर बैठा?

4) क्या सुयश अपने साथियों के साथ तिलिस्मा के मायाजाल में घूम रही पांचों इन्द्रियों को परास्त कर सका?

5) कौन था अष्टकोण में छिपा वह दिव्य बालक, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था?

6) क्या हुआ जब देवशक्ति धारक माया का टकराव, ग्रीक देवताओं से हुआ?

7) क्या था महा..देव की अमरकथा का रहस्य, जिसे देव ने देवी पा..ती को सुनाया था?

8) वी…भद्र और भद्रक..ली ने किस प्रकार से नीलाभ की परीक्षा ली?

9) क्या धनवंतरी के आयुर्वेद में सभी रोगों का निदान छिपा था?

10) क्या देवशक्ति धारक योद्धा, डार्क मैटर, नेबुला, ब्लैक होल जैसी शक्तियों से पृथ्वी की रक्षा कर पाये?

तो आइये दोस्तों कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिये पढ़ते हैं, विज्ञान और ईश्वरीय शक्ति के मध्य, रहस्य के ताने-बाने से बुना एक ऐसा अविस्मरणीय कथानक, जो आपको मानव शरीर और इन्द्रियों का अद्भुत ज्ञान देगा, जिसका नाम है "अद्भुत दिव्यास्त्र"

चैपटर-1
इंद्रसभा:
(20,005 वर्ष पहले.......) देवराज इंद्र का दरबार, स्वर्गलोक

स्वर्गलोक- एक ऐसा स्थान, जहां जीवित रहते कोई भी मनुष्य नहीं जाना चाहता, पर मृत्यु के उपरांत हर मनुष्य वहीं रहने की कामना करता है।

स्वर्गलोक- पृथ्वी का एक ऐसा भूभाग, जिसके बारे में कोई नहीं जानता, कि वह कहां पर है? एक ऐसा स्थान, जहां देवताओं का निवास है। वह देवता जिन्हें आदित्य भी कहते हैं।

त्रिदेवों ने देओं का राजा इंद्र को चुना था। सूर्य, अग्नि, पवन, वरुण, यम आदि सभी देव इंद्र के साथ मिलकर मनुष्यों की सहायता करते हैं।

इस समय स्वर्गलोक में इंद्र की सभा लगी हुई थी। सभी देव, सिंहासनों पर बैठे हुए थे, पर किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें आज यहां किसलिये बुलाया गया है? बस उन्हें इतना बता या गया था, कि यह सभा त्रि..देवों के कहने पर बुलाई गई है, इसलिये सभी धीरे-धीरे आपस में बातें कर रहे थे।

इंद्र भी सभा के मध्य, अपने सिंहासन पर बैठे हुए थे। पर इस समय इंद्र के चेहरे की बेचैनी, ये साफ बता रही थी, कि इस सभा का उद्देश्य उन्हें भी नहीं पता है। सभी के चेहरे पर बेचैनी एवं असमंजस के भाव थे।

आखिरकार गमणेश से रहा नहीं गया और उसने इंद्र से पूछ लिया- “देवराज, हमें यहां बैठे बहुत समय बीत गया है, पर आप तो कुछ बता ही नहीं रहे, कि आपने हम सभी को यहां किसलिये बुलाया है?"

गणे.. के शब्द सुन इंद्र डर गये। अब वो ये भी नहीं कह सकते थे कि उन्हें भी नहीं पता, नहीं तो सभी देवताओं के सामने उनका अपमान हो जाता।

अतः इंद्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग करते हुए कहा- “कुछ देर और प्रतीक्षा करो गमणेश, त्रि..वों ने हमें कुछ भी बताने से मना किया है, बस वह अब आते ही होंगे। उनके आते ही हम आपको सब कुछ बता देंगे।

इंद्र की बात सुन कार्तिकय जोर से हंस दिया, वो इंद्र का चेहरा देखकर ही जान गया था, कि इंद्र को कुछ नहीं पता?

तभी सभा में एक तीव्र प्रकाशपुंज उत्पन्न हुआ और उस प्रकाशपुंज से त्रि..मदेव प्रकट हो गये।
उन्के आगमन से, सभी के वार्तालापों का भ्रमरगुंजन स्वतः ही समाप्त हो गया। सभी उनके सम्मान में अपने-अपने सिंहासन से खड़े हो गये।

त्रि.देवों के साथ नीलाभ और माया भी थे। गमणेश ने माया को देखकर, अपनी पलकें जोर से झपकाईं।

यह एक प्रकार का शरारत भरा अभिवादन था। माया ने भी मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका कर गणे.. का अभिवादन स्वीकार कर लिया।

माया को देखकर हनुरमान.. को भी वह नन्हा यति याद आ गया। नन्हें यति को यादकर वह एक पल को सिहर उठे।

त्देवों के साथ नीलाभ और माया को देखकर, इंद्र के चेहरे पर आश्चर्य के भाव आ गये, वह समझ गये कि अवश्य ही कोई अत्यंत महत्वपूर्ण बात है, क्यों कि त्रि..देव आज तक किसी को भी लेकर इंद्रसभा में नहीं आये थे? कुछ ही देर में सभी ने आसन ग्रहण कर लिया।

अब सभी देवताओं की नजर त्र..देवों पर थी, सभी साँस रोके बस उन्हें ही देखे जा रहे थे। भगवान व…ष्णु ने महानदेव को बोलने का इशारा किया।

“देवों आप सभी को भली-भांति पता है, कि पृथ्वी पर युगों को 4 भागों में बांटा गया है- सतयुग, त्रेता युग, द्वापरयुग एवं कलयुग।” महानदेव ने कहा - “पहले 3 युगों में मनुष्य हमारे अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह वेद के माध्यम से देवताओं की आराधना करता है, जिसके फलस्वरुप देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और उसे असुरों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। परंतु कलयुग में मनुष्य हमारे अस्तित्व को नकार देता है। हम स्वयं भी इन्हीं कारणों से मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं, परंतु फिर भी हमें उनकी सुरक्षा का दायित्व लेना पड़ता है।

“कलयुग में मनुष्यों की तकनीक इतनी ज्यादा उन्नत हो जाती है कि वह ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों की ओर भी झांकना शुरु कर देते हैं और मनुष्यों की यह क्रिया, प्रत्येक बार उनके विनाश का कारण बनती है। ऐसे समय में हम स्वयं भी, उन मनुष्यों की किसी भी प्रकार से सुरक्षा नहीं कर पाते। इसलिये हमने कलयुग में भी मनुष्यों की रक्षा के लिये एक अनूठा उपाय सोचा है। हम चाहते हैं कि हम सभी देव, अपनी एक देवशक्ति को किसी ऐसे मनुष्य को प्रदान करें, जो कि ब्रह्मांड रक्षक बनकर कलयुग में, हमारी अनुपस्थिति में भी, मनुष्यों की रक्षा कर सके।" यह कहकर महानदेव शांत हो गये।

“पर ..देव, हम ऐसे मनुष्यों का चयन कैसे करेंगे? जो हमारी शक्ति को धारण कर ब्रह्मांड रक्षक का कार्य भली-भांति कर सके।” इंद्र ने परेशान होते हुए कहा।

“और ..देव ऐसे मनुष्यों के चयन में तो हजारों वर्ष लग सकते हैं और फिर हम उनकी परीक्षा कैसे लेंगे? कि वह देवशक्ति को धारण करने योग्य हैं कि नहीं?” सूर्य ने कहा।

"हमें पता है कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। ब्रह्म.. ने कहा- “पर इसका भी उपाय हमारे पास है।... आप में से कोई यह बताये कि हमारे पास ऐसा कौन सा ज्ञान का भंडार है? जो कभी खाली नहीं होगा और वह हमेशा सभी मनुष्यों को उचित मार्ग दिखायेगा।"

“वेदों का ज्ञान।” गमणेश ने हाथ उठाते हुए कहा “वही एक ऐसा ज्ञान है, जो कलयुग में भी सभी को उचित मार्ग दिखा सकता है।'

"बिल्कुल सही कहा ..गमणेश ने।” ब्रह..देव ने अपने एक हाथ में पकड़े वेद को सभी को दिखाते हुए कहा "वह वेदों का ज्ञान ही होगा, जिसके द्वारा हम उचित मनुष्य का चुनाव कर सकते हैं और वेदों के ज्ञानार्जन के बाद, वह मनुष्य कभी भी, कलयुग में भी, अपने मार्ग से विमुख नहीं होगा।”

“परंतु ब्रह्म.., इस वेद को समझना मनुष्य के मस्तिष्क से परे होगा।” कार्तिक... ने कहा- “यह तो अत्यंत जटिल भाषा में है, इसे तो मैं स्वयं भी अभी समझने की कोशिश कर रहा हूं।"


“भ्राता श्री, ये मैं आपको अच्छे से समझा दूंगा। मुझे यह बहुत अच्छे से आ गया है।" गमणेश ने अपनी भोली सी भाषा में कहा।

“मुझे तुमसे ज्ञान लेने की जरुरत नहीं है, मैं इसे स्वयं समझ लूंगा।” कर्तिके.. को उनकी बात सुनकर बहुत बुरा लगा। वह अपने छोटे भाई से किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं लेना चाहते थे।

ब्रह्म… ने कार्तिके.. की बात पर ध्यान नहीं दिया और वह पुनः बोले- “तुम सही कह रहे हो, इसकी भाषा अत्यंत जटिल है, परंतु आज से हजारों वर्षों के बाद, जब कलयुग का पृथ्वी पर प्रवेश होने वाला होगा, तो पृथ्वी पर एक ऋषि कृष्ण द्वैपायन का जन्म होगा। वही ऋषि इस 1 वेद को 4 भागों में विभक्त कर, इसे नया आकार देंगे और वेदों के इसी विभाजन के कारण उन्हें महर्षि वेदव्यास के नाम पर जाना जायेगा। वेद व्यास का अभिप्राय ही होगा, वेदों का विभाजन करने वाला। अब रही बात वेदों के इस विभाजन को सरलता देने की, तो मुझे लगता है कि यह कार्य गणे… बहुत आसानी से कर लेंगे। क्यों गमणेश हमने उचित कहा ना?"

“जी देव, आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।” गणे.. ने सिर झुकाते हुए कहा।

"तो अब बचता है कार्य, मनुष्यों के चयन और उन्हें वेदों का ज्ञान देने का।” तो इसके लिये हम अपने साथ, यहां नीलाभ और माया को लेकर आये हैं। माया निर्माण शक्ति में पूर्ण निपुण है और निर्माण शक्ति के ही माध्यम से, माया पृथ्वी पर अलग-अलग जगहों पर, 15 लोकों का निर्माण करेगी। यह लोक पूर्णतया, एक भव्य नगर की भांति होंगे। इन 15 लोकों में हम 30 अद्भुत शक्तियों को छिपा देंगे और जो मनुष्य वेदों का ज्ञान अर्जित कर, इन 30 शक्तियों को प्राप्त करेगा, उसे ही हम अपनी देवशक्तियां देंगे। अब इसके लिये माया को हिमालय पर, एक विद्यालय 'वेदालय' की रचना भी करनी होगी। जहां पर कुछ चुने हुए मनुष्यों के बालकों को, नीलाभ वेदों के माध्यम से शिक्षा देंगे और उन बालकों को इतना निपुण बनायेंगे कि वह देवशक्ति धारण करने योग्य हो जायें।"

"बालको के हाथ में देवशक्ति देना क्या उचित होगा देव?” पवन ने कहा।

"क्यों नहीं पवनदेव।” ब्रह्म… ने कहा- “वेदालय की प्रतियोगिताएं इतनी दुष्कर होंगी कि आप भी उन्हें सरलता से पूर्ण नहीं कर पायेंगे और अगर वह बालक उसे पूर्ण कर लेते हैं, तो उन्हें देवशक्ति देने में दुविधा ही क्या है?”

“परंतु देव, वह बालक जब तक उन देवशक्तियों का प्रयोग सही से सीखेंगे, तब तक तो वह बूढ़े हो जायेंगे। मनुष्यों की आयु आखिर होती ही कितनी है?" वरुण ने कहा।

"हां, यह बात आपने सही कही वरुणदेव।" ब्रह्म.. ने कहा- “इसी के लिये विद्यालय की पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात्, हम उन्हें अमृतपान करायेंगे, जिससे वह भी आप लोगों की तरह, अमृत्व को प्राप्त कर लेंगे और युगों युगों तक निष्पक्ष भाव से ब्रह्मांड रक्षक का कार्य करते रहेंगे।

यह बात सुन कर इंद्र का हृदय कांप गया। वह सोचने लगे कि कहीं वह मनुष्य आगे चलकर, देवशक्तियों की शक्ति से, उनका ही सिंहासन ना छीन लें? परंतु इंद्र जानते थे कि इस समय त्रि..देवों के सामने कुछ भी बोलना सही नहीं है? अन्यथा वह कहीं अभी ही सिंहासन से ना हटा दिये जायें?

यह सोच इंद्र ने वापस देवों की ओर देखना शुरु कर दिया। पर जैसे ही इंद्र की नजरें भगवान वहिष्णु से टकराईं, वह एकाएक सटपटा गये, क्यों कि भगवान ..ष्णु मुस्कुराते हुए उन्हें ही देख रहे थे।

इंद्र को लगा कि जैसे उनकी चोरी पकड़ ली गई हो, इसलिये वह जल्दी से इधर-उधर देखने लगे।

“चलिये अमृतपान भी ठीक है, पर वह विवाह तो करेंगे ना? फिर विवाहोपरांत वह अपने मार्ग से भ्रमित भी हो सकते हैं? उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा का भार सर्वोपरि लगने लगेगा। फिर वह ब्रह्मांड रक्षक का भार अपने कंधों पर कैसे उठा पायेंगे?” गुरु बृहस्पति ने कहा।

"नहीं, वह तब तक विवाह नहीं करेंगे, जब तक कि उन्हें स्वयं के समान कोई दूसरा मनुष्य नहीं मिल जाता? जब उन्हें दूसरा मनुष्य मिल जायेगा, तो वह अपनी शक्तियों के साथ, अपना अमरत्व भी दूसरे मनुष्य को दे देंगे और स्वयं विवाह कर, एक साधारण मनुष्य की जिंदगी जी सकेंगे।" ब्रह्देव ने कहा।

"क्या हम उन लोकों के नाम जान सकते हैं ब्देव?” शेषनाग ने कहा।

“अवश्य।” यह कह देव ने उन लोकों के नाम बताना शुरु कर दिया- “देवलोक, शक्ति लोक, राक्षसलोक, ब्रह्म…लोक, नागलोक, माया लोक, हिमलोक, नक्षत्रलोक, पाताललोक, भूलोक, सिंहलोक, रुद्रलोक, यक्षलोक, प्रेतलोक और मत्स्यलोक।"

शेषनाग, नागलोक का नाम सुनकर ही प्रसन्न हो गये।

Jaaari rahega……
Nice update....
 
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समुद्री हमला:
(17.01.02, गुरुवार, 08:00, वॉशिंगटन डी.सी., अमेरिका)

धरा और मयूर को गये हुए आज 4 दिन बीत गये थे।

वीनस पिछले 4 दिन से वेगा के घर पर ही रह रही थी, उसे अब अपने भाई लुफासा का भी डर नहीं था, वह अब खुलकर अपनी जिंदगी जीना चाहती थी, भले ही बाद में अंजाम कुछ भी हो।

इस समय सुबह के 8 बज रहे थे। वेगा और वीनस दोनों ही बेडरुम में सो रहे थे कि तभी ‘खट्-खट्’
की हल्की आवाज ने वीनस की नींद खोल दी।

वीनस ने अपने बगल में सो रहे वेगा को देखा और फिर उसके माथे को चूम लिया।

तभी वीनस को फिर वही खट्-खट् की आवाज सुनाई दी। अब वीनस ने अपनी नजरें आवाज की दिशा में घुमाई। वह आवाज बेडरुम की खिड़की से आ रही थी।

वीनस अपने बेड से उठी और पर्दे को हटा कर बंद पड़ी खिड़की की ओर देखने लगी।

तभी उसे खिड़की से बाहर एक नन्हीं चिड़िया, खिड़की के शीशे पर अपनी चोंच मारती हुई दिखाई दी। वह खट्-खट् की आवाज उसी वजह से हो रही थी।

वीनस को वह रंग-बिरंगी नन्हीं चिड़िया बहुत अच्छी लगी, इसलिये उसने खिड़की के शीशे को खोल दिया।

जैसे ही वीनस ने खिड़की का शीशा हटाया, वह चिड़िया कमरे में आ गई और चीं-चीं कर पूरे कमरे में चक्कर लगाने लगी।

यह देख वीनस मुस्कुरा कर चिड़िया की ओर चल दी- “अरे नन्हीं चिड़िया ये तुम्हारा घर नहीं है। यहां कहां से आ गई?”

पर वह चिड़िया अभी भी खुली खिड़की से बाहर जाने का नाम नहीं ले रही थी।

अब वीनस को वह चिड़िया थोड़ी परेशान दिखाई दी।

उसे परेशान देख वीनस ने उस चिड़िया की आवाज में ही उससे पूछा- “क्या हुआ नन्हीं चिड़िया? तुम कुछ परेशान दिख रही हो?”

अब चिड़िया हैरानी से वीनस की ओर देखने लगी, शायद उसने कभी किसी इंसान को अपनी आवाज में बोलते नहीं देखा था।

पर वह वीनस से कुछ कहने की जगह डरकर एक पर्दे के पीछे छिप गई।

अब वीनस को शक होने लगा कि कहीं यह लुफासा तो नहीं? जो कि चिड़िया का रुप धरकर यहां आ गया हो।

इसलिये वीनस धीरे-धीरे पर्दे के पीछे बैठी, उस चिड़िया की ओर बढ़ने लगी।

चिड़िया को बाहर निकालने के चक्कर में, वीनस ने खिड़की को अभी बंद नहीं किया था। तभी खिड़की से अनगिनत चिड़िया और कौए कमरे में घुसने लगे।

यह देख वीनस घबरा गई, वह उस चिड़िया को छोड़ जल्दी से खिड़की के बंद करने के पीछे भागी।

कमरे में चारो ओर चिड़ियों और कौओं का शोर गूंजने लगा। इस शोर को सुनकर वेगा भी घबरा कर उठ गया। उठते ही वेगा की नजर कमरे में घूम रहे, दर्जनों पक्षियों पर पड़ी।

उन पक्षियों को देखकर वह चिल्लाने लगा- “मैंने पहले ही कहा था कि लुफासा खाली नहीं बैठेगा, लो वह आ गया अपने सब दोस्तों को लेकर, मुझसे बदला लेने।”

तभी वेगा की नजर वीनस पर पड़ी, जो कि लगातार खिड़की खोले बाहर की ओर देख रही थी।

वेगा को वीनस का इस प्रकार खिड़की पर खड़े होना, थोड़ा आश्चर्यजनक सा लगा, इसलिये वह तुरंत बिस्तर से कूदकर वीनस के पास आ गया।

वेगा की नजर उस ओर गई, जिधर वीनस देख रही थी, इसी के साथ वेगा आश्चर्य से भर गया।

पूरे वॉशिंगटन डी.सी. की सड़कें, मरे हुए पक्षियों से भरी हुई थी।

कुछ पक्षी तड़प रहे थे, तो कुछ मर चुके थे। पर अभी भी आसमान से पक्षियों का गिरना रुका नहीं था।

“ये सब क्या हो रहा है? ये पक्षी कैसे मर रहें हैं?” वेगा ने वीनस से सवाल कर दिया। कुछ देर के लिये वेगा अपने कमरे में घूम रहे पक्षियों को भूल गया।

“मुझे भी नहीं पता, पर जो कुछ भी हो रहा है, वह ठीक नहीं लग रहा।” वीनस ने कहा- “पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि जैसे कुछ बहुत बुरा होने वाला है?”

अब आसमान से पक्षियों का गिरना बंद हो गया था, जिसका साफ मतलब था कि या तो आसमान में पक्षी ही खत्म हो गये थे या फिर वह अंजानी मुसीबत चली गई थी।

अब वीनस का ध्यान कमरे के अंदर के पक्षियों पर गया। कमरे के अंदर के सारे पक्षी अब उड़ना छोड़, इधर-उधर कमरे में ही छिप गये थे।

यह देख वीनस की नजर एक कबूतर पर गई, जो कि एक टेबल के पीछे छिपा था। वह दूसरों से उम्र में कुछ बड़ा दिख रहा था और थोड़ा सा बेहतर भी महसूस हो रहा था।

वीनस ने कबूतर को देखते हुए उसकी जुबान में कहा- “मुझसे डरो नहीं, मैं तुम्हारी दोस्त हूं, मुझे बताओ कि बाहर क्या हुआ था?”

वीनस को अपनी भाषा में बोलता देख कबूतर टेबल की ओट से बाहर आ गया।

“तुम हमारी भाषा कैसे बोल लेती हो?” कबूतर ने पूछा।

“क्यों कि मैं तुम्हारी दोस्त हूं, इसलिये तुम्हारी भाषा समझ सकती हूं। तुम मुझे बताओ कि बाहर क्या हुआ था?”

“मैं बाहर आसमान में अपनी रोटी लेकर उड़ रहा था कि तभी एक दूसरे कबूतर ने मेरी रोटी छीनने की कोशिश की, मैं अपनी रोटी बचा कर भागा कि तभी पता नहीं मेरे पीछे वाले कबूतर ने कौन सा जादू किया, कि आसमान में मेरे साथ उड़ रहे सभी पक्षियों का दम घुटने लगा और हम नीचे गिरने लगे। वह कोई बहुत बड़ा जादूगर कबूतर था।” उस समझदार कबूतर ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा।

कोई और समय होता, तो वीनस को उस कबूतर की समझदारी पर बहुत तेज हंसी आती, पर यह समय कुछ और था, इसलिये वीनस उस कबूतर को छोड़ दूसरे पक्षियों की ओर देखने लगी।

तभी एक छोटा सा कौआ कमरे की ओट से निकलकर बाहर आ गया और वीनस को देखते हुए बोला- “यह कबूतर तो मूर्ख है, मैं आपको बताता हूं कि क्या हुआ?” मैं उस समय एक ऊंची सी छत पर बैठा था कि तभी एक विचित्र सा जीव आसमान में उड़ता हुआ आया। उसके हाथ में कोई यंत्र था, उसने आसमान में चारो ओर उस यंत्र से कुछ फैला दिया। उसने जो भी चीज आसमान में फैलाई थी, वह दिखाई नहीं दे रही थी, पर उस अदृश्य चीज ने सबको मारा है, मैं भी अगर इस कमरे में नहीं आता, तो मै भी मारा जाता।”

“उसके बाद वह जीव किधर गया?” वीनस ने कौए से पूछा।

“मैंने उसे आखिर में समुद्र की ओर जाते हुए देखा था।” कौए ने कहा।

“बहुत अच्छे, तुम इन सबसे ज्यादा समझदार हो।” वीनस ने उस कौए की तारीफ करते हुए कहा।
कौआ अपनी तारीफ सुनकर खुश हो गया।

“क्या कहा इन पक्षियों ने? क्या इनमें से किसी को पता है कि यह परेशानी कैसे उत्पन्न हुई?” वेगा ने वीनस से पूछा।

वीनस ने कौए की सारी बातें वेगा को बता दीं। पर इससे पहले कि वेगा कुछ और पूछ पाता कि तभी बाहर से शोर की आवाज सुनाई दी।

शोर सुनकर वेगा और वीनस दोनों ही भाग कर खिड़की के पास पहुंच गये।

वह लोग जो कुछ देर पहले अपने घरों से निकलकर पक्षियों की फोटो खींच रहे थे, अब वह चीखकर भाग रहे थे।

कुछ ही देर में वेगा और वीनस को उनके चीखने का कारण पता चल गया, उन लोगों के पीछे समुद्र के कुछ विचित्र जीव दौड़ रहे थे।

“अरे, यह जीव कैसे हैं?” वीनस ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा- “वेगा जरा इन्हें ध्यान से देखो, इनमें से कुछ शार्क जैसे लग रहे हैं और कुछ दूसरी बड़ी और छोटी मछलियों के जैसे। पर यह समुद्री जीव विकृत
होकर पानी से बाहर कैसे आ गये? और ये पानी के बाहर साँस कैसे ले रहे हैं? कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है ...पर हमें सभी लोगों को इन जीवों से बचाना होगा।”

“पर कैसे वीनस, हममें से अगर किसी ने भी बाहर जाकर, अपनी शक्तियों से सब लोगों को बचाने की कोशिश की, तो सभी हमें पहचान लेंगे और फिर बाद में हमें सबके सवालों के जवाब देने पड़ेंगे, जो कि हम नहीं दे सकते।” वेगा ने अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा।

“हम इतनी शक्तियां होते हुए भी ऐसे घर में बैठे नहीं रह सकते वेगा।” यह कहकर वीनस ने अलमारी से कैंची निकाली और एक पर्दे को काट जल्दी से उसमें आँखों के देखने भर की जगह काट कर निकाल दी
और ऐसा करके 2 मास्क तैयार कर दिये।

वीनस ने एक मास्क अपने चेहरे पर कसकर बांधा और दूसरा मास्क वेगा के चेहरे पर। अब उन दोनों के चेहरे छिप गये थे, बस आँख की जगह 2 छेद दिखाई दे रहे थे।

यह करके दोनों अपने घर से निकलकर बाहर की ओर आ गये।

इस समय चारो ओर शोर-शराबा होने की वजह से किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वेगा ने बाहर निकलते समय अपनी जोडियाक वॉच पहनना नहीं भूला था।

बाहर निकलते ही वीनस को एक बड़ी सी मछली, एक 1xxx2 वर्षीय ब..च्चे के पीछे भागती दिखाई दी।
वीनस ने उछलते हुए अपने पास रखा एक ड्रम उस मछली की ओर फेंक दिया।

मछली का सारा ध्यान इस समय ब..च्चे की ओर था। इसलिये वह ड्रम का वार झेल नहीं पायी और लड़खड़ा गयी।

इतनी देर में वीनस ने उस बच्चे को पकड़ अपनी ओर खींच लिया।

उधर वेगा ने अपनी जोडियाक वॉच पर सिंह राशि को सेट कर दिया। ऐसा करते ही वेगा के सामने, एक विचित्र जीव प्रकट हो गया, जिसका सिर शेर का और शरीर किसी ताकतवर इंसान की तरह था।

उस सिंहमानव ने एक सुनहरी धातु का कवच अपने सीने पर पहन रखा था। अचानक उसके हाथ के नाखून बहुत लंबे और स्टील की तरह पैने दिखने लगे।

अब उस सिंहमानव ने अपने हाथों से सामने से आ रही मछलियों को चीरना-फाड़ना शुरु कर दिया।
एक नजर में वह नर…सिंह का अवतार दिखाई दे रहा था।

“अरे वाह, अब तो मुझे कुछ करने की जरुरत ही नहीं है, यह सिंहमानव ही अकेले सबको निपटा देगा।” वेगा खुश होते हुए एक स्थान पर बैठ गया।

तभी उसकी नजर वीनस पर पड़ी, जो कि जमीन से कुछ ना कुछ उठा कर, उन जीवों पर फेंक रही थी और उनसे बचने की कोशिश भी कर रही थी।

यह देख वेगा सटपटा गया और उठकर वीनस की ओर भागा।

“तुम इधर क्यों आ गये? उधर जाकर बैठकर आराम करो, मैं अकेले ही इनसे निपट लूंगी।” वीनस की बात सुन वेगा समझ गया कि वीनस ने उसे बैठे देख लिया था।

“वो ये तुम्हारा बनाया मास्क मेरी आँखों पर आ गया था, उसी को बैठकर एडजेस्ट कर रहा था।” वेगा ने सफाई देते हुए कहा।

“चल झूठे, शर्म नहीं आती झूठ बोलते।” वीनस ने अपने हाथ में पकड़ी कैंची को एक ऑक्टोपस की आँखों में मारते हुए कहा।

“अरे बाप रे, तुम अभी तक आँख मारती थी, अब आँख फोड़ने भी लगी।” वेगा अभी भी आराम से खड़ा होकर शरारतें कर रहा था।

तभी ऑक्टोपस ने अपने एक हाथ से वीनस की गर्दन पकड़ ली। वीनस की साँसें अब घुटने लगीं। कैंची भी उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गई।

यह देख वेगा ने पास पड़े पानी के पाइप से पानी की फुहार, ऑक्टोपस के चेहरे पर मारने लगा।

“अरे बेवकूफ, तुम उसकी ओर हो या मेरी ओर।” वीनस ने अपना गला छुड़ाते हुए कहा- “वह पानी का ही जीव है और तुम उस पर पानी मार रहे हो ।”

वेगा को अपनी गलती का अहसास हो गया, पर तब तक वह ऑक्टोपस आकार में और बड़ा हो गया।

तभी सिंहमानव बाकी जीवों को अपने पंजो से नोचता हुआ उधर आ गया, उसने बिना उस ऑक्टोपस को मौका दिये, उसका पूरा पेट अपने पंजे से फाड़ दिया।

यह देख वीनस डरकर वेगा की ओर आ गई। सिंहमानव अब बाकियों का काल बनकर आगे बढ़ गया।

तभी अचानक पता नहीं कहां से सैकड़ों समुद्री जीवों ने सिंहमानव पर हमला कर दिया।

एकसाथ इतने जीवों से लड़ना सिंहमानव के बस की भी बात नहीं थी, अब वह सभी जीव मिलकर सिंहमानव को काटने लगे।

यह देख वेगा ने अपनी घड़ी के वॉलपेपर को बदलकर ‘सिंह’ से ‘धनु’ कर लिया।

अब वह सिंहमानव अपनी जगह से गायब हो गया और उसकी जगह एक अश्वमानव दिखाई देने लगा।

अश्वमानव के हाथ में तीर और धनुष था। अश्वमानव ने बिना किसी को मौका दिये दूर से ही सबको तीरों से
बेधना शुरु कर दिया।

अश्वमानव के तीर चलाने के गति इतनी अधिक थी, कि कोई जलीय जंतु उसके पास ही नहीं आ पा रहा था।

वह एक साथ अपने धनुष पर 5 तीर चढ़ाकर सबको मार रहा था। सबसे विशेष बात थी कि उसके तरकश से तीर खत्म ही नहीं हो रहे थे।

वेगा और वीनस अब मात्र दर्शक बने उस अश्वमानव को युद्ध करते देख रहे थे।

“क्या ये जलीय जीव तुम्हारा कहना नहीं मान रहे थे?” वेगा ने वीनस से पूछा।

“नहीं, इनका मस्तिष्क इनके बस में नहीं है और ऐसी स्थिति में यह मेरा कहना नहीं मान सकते।” वीनस ने कहा।

तभी पता नहीं कहां से एक ईल मछली आकर वेगा के गले से लिपट गई। यह देख वीनस ने अश्वमानव की ओर देखा, अश्वमानव अभी भी सभी से युद्ध कर रहा था।

वीनस समझ गई कि एक पल की भी देरी वेगा के लि ये घातक हो सकती है, पर परेशानी ये थी कि वीनस उस ईल को अपने हाथों से नहीं छुड़ा सकती थी।

तभी वीनस की नजर सामने एक शेड पर बैठे बाज की ओर गई। बाज को देखते ही वीनस के मुंह से एक विचित्र सी आवाज उभरी।

उस आवाज को सुन बाज तेजी से उस ओर आया और वेगा के गले में फंसी ईल को एक झटके से ले हवा में उड़ गया।

यह देख वीनस ने भागकर वेगा को थामा। गला घुटने की वजह से वेगा की आँखों के आगे अंधेरा छा गया था। पर साँस आते ही वेगा ठीक हो गया।

“मैं भी सोच रही थी कि उस ईल के मुंह पर पानी मार दूं, पर आसपास कहीं पानी था ही नहीं, इसलिये बाज के द्वारा उस ईल को पास के तालाब तक भिजवा दिया है।” वीनस ने मुस्कुराते हुए कहा।

वेगा ने घूरकर वीनस की ओर देखा पर कुछ कहा नहीं। उधर तब तक अश्वमानव ने सभी जलीय जीवों का सफाया कर दिया था।

“सारे जीव खत्म हो गये हैं, पर अब अपने घर कैसे चलें? आसपास के सारे लोग खिड़की से हमें ही देख रहे हैं।” वीनस ने दबी आवाज में कहा।

“तो फिर अभी घर की जगह कहीं और चलो, कुछ देर बाद हम वापस आ जायेंगे।“

यह कह वेगा ने अश्वमानव को गायब किया और चुपचाप अपने घर की विपरीत दिशा में वीनस के साथ दौड़ पड़ा।

आज इन दोनों का एक सुपरहीरो की तरह पहला युद्ध था, लेकिन इस पहले युद्ध ने ही इन्हें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था।


जारी रहेगा______✍️
एक अप्रतिम रोमांचक और अद्भुत अविश्वसनीय अपडेट है भाई मजा आ गया
 

kamdev99008

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राज भाई आज बहुत दिनों बाद आया हूं फोरम पर
जल्द ही इस कथा के छूटे हुए सभी अध्याय पढ़ने को उत्सुक हूं

लेकिन समस्या वहीं पुरानी है
इस फोरम पर कोई पोस्ट पढ़ना और लिखना दोनों ही मुश्किलें भरे हैं redirect & unresponsive
इसी वजह से ना चाहते हुए भी पहले आना और कमेंट करना बन
Update posted friends :declare:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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राज भाई आज बहुत दिनों बाद आया हूं फोरम पर
जल्द ही इस कथा के छूटे हुए सभी अध्याय पढ़ने को उत्सुक हूं

लेकिन समस्या वहीं पुरानी है
इस फोरम पर कोई पोस्ट पढ़ना और लिखना दोनों ही मुश्किलें भरे हैं redirect & unresponsive
इसी वजह से ना चाहते हुए भी पहले आना और कमेंट करना बन
Kaamdev bhaiya bohot khusi hui aapko wapis dekh kar :hug:
Ha aapne sahi kaha, pichle kuch mahino se site me bohot gadbad hui hai, lekin kuch hadd tak control bhi hua hai, and ye verification lagane se hi hua hai, ummeed hai ki jald hi sab theek ho jayega 👍
Rahi baat story ki to aapke liye bohot mehnat kiya hai humne, aapko aanand aayega padh kar, sirf sex ko chhod kar sabkuch milega aapko isme:yo:
Baki sex ka kya hai, wo to aap kisi bhi story me padh sakte ho, lekin novel wala sukh aapko yahi milega
 

Raj_sharma

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एक अप्रतिम रोमांचक और अद्भुत अविश्वसनीय अपडेट है भाई मजा आ गया
Thank you very much for your valuable review bhai, sath bane rahiye :hug:
 
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Raj_sharma

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sunoanuj

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#175.

“पर कैसे? समुद्री घोड़ा तो अपना काम करके वापस झील में चला गया है।” सुयश ने कहा- “अब इतने बर्फ जैसे पानी में जाकर कौन उसे ढूंढ पायेगा?”

“मैं स्वयं जाऊंगी।” शैफाली ने दृढ़ता से कहा- “मैं इसके पहले भी पेंग्विन के पीछे बर्फ में गई थी, उस समय मुझ पर बर्फ की ठंडक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।”

यह सुनकर सुयश ने अपना सिर हिलाकर शैफाली को झील के अंदर जाने की इजाजत दे दी।

सुयश की इजाजत मिलते ही शैफाली ने अपने जूते बाहर उतारे और उसी रास्ते से झील के अंदर दाखिल हो गई, जिस रास्ते से वह समुद्री घोड़ा बाहर आया था।

सच में शैफाली को बर्फ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह आसानी से इतने ठंडे पानी में तैर रही थी।

झील में प्रवेश करते ही शैफाली ने एक डुबकी मारी और पानी के अंदर अपनी नजरें घुमाना शुरु कर दिया। शैफाली को अब कुछ दूरी पर एक खूबसूरत परी की एक मूर्ति दिखाई दी।

यह मूर्ति पानी में एक स्थान पर खड़ी थी। यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी।

परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी। उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था।

उस परी के चारो ओर कुछ जलपरियां, अपने हाथ में त्रिशूल लेकर घूम रहीं थीं।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस जलपरी की रक्षा कर रहीं हों या फिर उसकी परिक्रमा लगा रहीं हों। पर उन्होंने शैफाली से कुछ नहीं कहा।

“यह तो पानी के नीचे भी कोई तिलिस्म बना है?” शैफाली ने अपने मन में सोचा- “लगता है उस परी के हाथ में जो राजदण्ड है, उसमें अवश्य ही इस द्वार का कोई राज है, पर पहले मुझे वह कार्य कर लेना चाहिये, जिसके लिये मैं इस स्थान पर आयी हूं।”

अब शैफाली परी को छोड़कर उस समुद्री घोड़े को ढूंढने लगी। कुछ ही देर में शैफाली की निगाह में वह समुद्री घोड़ा आ गया, जो कि मिसगर्न मछली के बीच छिपकर पानी में तैर रहा था।

शैफाली उस समुद्री घोड़े की ओर बढ़ गयी। समुद्री घोड़े के पास पहुंचकर शैफाली ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर शैफाली के आगे बढ़ते ही वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

पहले प्रयास में शैफाली नाकाम रही। शैफाली ने फिर से पानी में आगे बढ़कर उस समुद्री घोड़े को पकड़ने की कोशिश की, पर इस बार भी वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।

अब यह सिलसिला शुरु हो गया था, जब भी शैफाली आगे बढ़ती, वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो जाता।
यह देख शैफाली ने तेजी से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।

तभी शैफाली की नजर उस समुद्री घोड़े के आगे-पीछे घूम रही मिस गर्न मछली की ओर गई।

अब शैफाली के दिमाग में एक आइडिया आ गया था। शैफाली इस बार ध्यान से समुद्री घोड़े को देखती रही, जैसे ही एक मिसगर्न मछली, उस समुद्री घोड़े के ठीक पीछे पहुंची, शैफाली ने ठीक उसी समय पर, समुद्री घोड़े की ओर छलांग लगा दी।

हर बार की तरह इस बार भी समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे जाने के लिये बढ़ा, पर वह पीछे जा नहीं पाया और मिसगर्न मछली से टकराकर वहीं रह गया।

तभी शैफाली ने झपटते हुए उस समुद्री घोड़े को पकड़ लिया। अब शैफाली ने उसकी आँखों को देखा।

समुद्री घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशा में थीं, जिसे शैफाली ने अपने हाथों से सही कर दिया और इसके बाद उस समुद्री घोड़े को वहीं झील के पानी में छोड़, वह झील की सतह की ओर चल दी।

झील की सतह पर सभी बेसब्री से शैफाली के आने का इंतजार कर रहे थे। पानी से शैफाली का चेहरा निकलते देख सभी खुश हो गये।

शैफाली ने अपना सिर हिलाकर सभी को काम पूरा होने की खबर दे दी।

शैफाली की बात सुन क्रिस्टी ने एक नजर ऐलेक्स की ओर डाली, ऐलेक्स अब अपने रुप में तो वापस आ गया था, पर वह अब भी बर्फ की
मूर्ति बना दिखाई दे रहा था।

“ये ऐलेक्स तो अब बर्फ का बन गया, अब इसे बर्फ से कैसे सही करें?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए कहा- “हो ना हो इस सेन्टौर में ही कोई चक्कर है, इसी की वजह से ऐलेक्स अभी तक सही नहीं हुआ है।” यह कहकर क्रिस्टी उस सेन्टौर के पास जाकर उसकी मूर्ति को जगह-जगह से हिलाकर देखने लगी।

क्रिस्टी से किसी को ऐसी आशा नहीं थी, इसलिये सभी उसे ऐसा करने से रोकने के लिये भागे।

सभी जानते थे कि क्रिस्टी की एक गलत हरकत उन्हें हमेशा के लिये इस तिलिस्म में कैद कर सकती है।

तभी क्रिस्टी के मूर्ति के हिलाने की वजह से सेन्टौर के हाथ में पकड़ा कंटक जमीन पर गिर गया और इसी के साथ सबके सामने एक मुसीबत और खड़ी हो गई।

सेन्टौर जीवित हो गया था और सबको खूनी नजरों से देख रहा था।

“हो गया काम तमाम, बड़ी मुश्किल से अभी उस समुद्री घोड़े से बचे थे, अब यह सेन्टौर जाग गया।” तौफीक ने क्रिस्टी पर नाराज होते हुए कहा।

क्रिस्टी एक पल में ही अपनी गलती को समझ गयी, पर अब क्या हो सकता था? तभी उस सेन्टौर ने अपने पैर को बर्फ की जमीन पर जोर से पटका, उसके ऐसा करने से एक जोर की आवाज हुई और इसी के साथ झील में मौजूद मिसगर्न मछलियां तेजी से गति करने लगीं।

यह देख शैफाली ने चीखकर सबको आगाह करते हुए कहा- “सब लोग सावधान हो जाओ, भूकंप आने वाला है।” तभी पूरी बर्फ की धरती हिलने लगी और बर्फ के उस हिस्से में मौजूद ऊंची चट्टानें गिरना शुरु हो गईं।

सभी किसी प्रकार उन चट्टानों से बचने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक बड़ी चट्टान ऐलेक्स की ओर गिरने लगी, यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।

इतने कम समय में कोई भी ऐलेक्स को बचा नहीं सकता था। जोर से गड़गड़ाती वह चट्टान ऐलेक्स के ऊपर आकर गिरी, पर तभी एक चमत्कार हुआ, वह भारी चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराकर उसमें
समा गई।

“यह बर्फ की चट्टान ऐलेक्स के शरीर के अंदर कैसे चली गई।” जेनिथ ने आश्चर्य से ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।

तभी एक और चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराई, इसका हस्र भी पहले वाली चट्टान के जैसा हुआ, वह चट्टान भी ऐलेक्स के शरीर में समा गई।

यह देख सुयश ने सबसे चिल्लाकर कहा- “सभी लोग ऐलेक्स के शरीर की ओट में छिप जाओ, नहीं तो यह गिरती हुई चट्टानें हमें पीस देंगी।”

सुयश की बात सुन सभी ऐलेक्स की ओर भागे और उसके पीछे जाकर छिप गये।

ऐलेक्स के आसपास बहुत सी चट्टानें गिर रहीं थीं, परंतु समय पर सुयश का दिमाग काम करने की वजह से सभी सुरक्षित थे।

उधर जोर-जोर से सेन्टौर के पैर पटकने की वजह से झील की बहुत सी मछलियां उछलकर झील के बाहर आ गईं थीं।

“कैप्टेन, हमें जल्द से जल्द इस सेन्टौर का इलाज करना होगा, नहीं तो यह हमें चुटकियों में मसल देगा।” क्रिस्टी ने गुस्साये हुए सेन्टौर की ओर देखते हुए कहा।

तभी तौफीक की निगाह सेन्टौर के गिरे अस्त्र कंटक पर गई। उसे देखकर तौफीक बोला- “अगर सेन्टौर का यह अस्त्र भी हमारे हाथ लग जाये तो कुछ देर तक तो इससे बचा ही जा सकता है? पर वह भी कमबख्त बिल्कुल उसके बगल में ही गिरा पड़ा है।”

तौफीक की बात सुन शैफाली की आँखें सिकुड़ गईं- “कैप्टेन अंकल, कंटक तो सेन्टौर के बगल में ही गिरा पड़ा है, तो फिर यह सेन्टौर उसे उठा क्यों नहीं रहा? उसे उठाने के बाद तो यह और विनाश कर सकता है।”

“इसी कंटक के इसके हाथ से निकलने के बाद ही तो यह जिंदा हुआ था।” क्रिस्टी ने कहा।

“इसका मतलब यदि हम इस कंटक को दोबारा से इसके हाथ में पकड़ा दें, तो यह सेन्टौर फिर से बर्फ का बन सकता है।” शैफाली ने कहा।

शैफाली की बात सुन सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “तौफीक, तुम इस सेन्टौर का ध्यान भटकाकर उसे दूसरी दिशा में ले जाओ, तब तक मैं इस कंटक को उठा लूंगा।”

सुयश की बात सुनकर तौफीक ने अपना सिर हिलाया और ऐलेक्स की ओ से बाहर निकल, सेन्टौर से कुछ दूरी पर जाकर दौड़ने लगा।

सामने तौफीक को दौड़ते देख सेन्टौर तौफीक की ओर चल दिया। जैसे ही सेन्टौर का चेहरा दूसरी ओर हुआ, सुयश तेजी से कंटक की ओर भागा।

एक पल में ही सुयश कंटक के पास पहुंच गया, मगर जैसे ही सुयश ने कंटक को उठाया, वह भी बर्फ की मूर्ति में परिवर्तित हो गया।

यह देख शैफाली और तौफीक दोनों ही आश्चर्य से भर उठे। अब दोनों के पास कोई और तरीका नहीं बचा था।


सूर्यपुत्र:
(30 वर्ष पहले.....जनवरी,1972, प्रातः काल, अयोध्या, भारत)

“दादा जी, आप हमेशा बंदूक लेकर क्यों चलते हो?” नन्हें सुयश ने अपने दादा सूर्य नारायण सिंह को सम्बोधित करते हुए पूछा- “क्या आपको बहुत डर लगता है?”

सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

“नहीं हमें डर नहीं लगता, यह हम अपने वंश की शान के लिये, अपने साथ लेकर चलते हैं। हम सूर्यवंशी राजपूत हैं, मेरे दादा जी तो हाथ में तलवार लेकर चलते थे। अंग्रेज भी उन्हें देख थर-थर कांपते थे, पर अब
समय बदलने के साथ तलवारों का चलन खत्म हो गया और तलवारों का स्थान इस अग्नि मारक बंदूक ने ले लिया।”

सुयश से बात करते-करते सूर्य नारायण सिंह, घर के आंगन में खड़ी एक खुली जीप में बैठ गये और सुयश को उन्होंने अपने बगल में बैठा लिया।

“मैं जब बड़ा होऊंगा, तो अपने हाथ में तलवार ही लेकर चलूंगा, बंदूक तो डाकू लोग चलाते हैं।” नन्हें सुयश ने अपने दिल के उद्गार प्रकट किये।

“अच्छा-अच्छा छोटे युवराज, आप तलवार लेकर ही चलना, पर वादा करो कि कुलदेवता के मंदिर में पूजा के समय, आज आप मुझे तंग नहीं करोगे।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आपको नहीं परेशान करुंगा, पर आप भी वादा करो कि वापस आने के बाद आप मुझे कैम्पा कोला पिलाओगे।” सुयश ने अपनी जुबान से चटकारा लगाते हुए कहा।

“ठीक है, मैं वादा करता हूं।” सूर्य नारायण सिंह ने अपनी हथेली को सुयश की नन्हीं हथेली से टकराते हुए कहा।

तभी दूसरी जीप में कुछ महिलाएं पूजा की थाली और कुछ पूजा की सामग्री लेकर बैठने लगीं।

“अरे अभय, तुम अपनी जीप चलाओ, बाकी लोग पीछे से आते रहेंगे। अगर हम थोड़ा जल्दी भी मंदिर पहुंच गये, तो कोई परेशानी की बात नहीं।” सूर्य नारायण सिंह ने जीप के ड्राइवर से कहा।

“जी मालिक।” सूर्य नारायण सिंह की बात सुन ड्राइवर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

“अच्छा दादा जी, आप ये बताओ कि आज आप रात को मुझे कौन सी कहानी सुनाओगे?” सुयश ने अपने दादा जी से पूछा।

“मैं....मैं आज तुम्हारी सबसे प्रिय यति और उड़ने वाले घोड़े की कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के गाल खींचते हुए कहा।

“नहीं दादा जी आज मुझे भगवान सूर्य की कहानी सुननी है।....वह कहानी सुने बहुत दिन बीत गये।” सुयश ने अपने दिमाग के कोनों को खंगालते हुए कहा।

“ठीक है, मैं आज तुम्हें अपने कुल -देवता भग…न सूर्य की ही कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

रास्ते भर सुयश ऐसे ही अपने दादा जी से कुछ ना कुछ पूछता रहा। आधा घंटे के ड्राइव के बाद आखिर कुलदेवता का मंदिर आ ही गया।

अभय ने जीप को मंदिर के प्रांगण के बाहर ही रोक दिया। सूर्य मंदिर एक पर्वत की चोटी पर बना था। सुयश अपने दादा जी के साथ मंदिर के प्रांगण में आ गया।

मंदिर के मुख्य द्वार पर 7 घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्यदेव की मूर्ति लगी थी। शिखर पर सूर्य के मुख की ज्वाला उगलती आकृति बनी थी।

“अरे दादा जी यह आकृति तो बिल्कुल वैसी ही है, जैसी आपके दाहिने हाथ की कलाई पर बनी है।” सुयश ने आश्चर्य से दादा जी की कलाई देखते हुए कहा।

“हां बेटा, यह हमारे कुलदेवता का चिन्ह है, जिसे मैंने अपनी कलाई पर बनवा लिया था। क्या यह चिन्ह आपको पसंद है?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश से पूछा।

“हां दादा जी मुझे यह चिन्ह बहुत पसंद है, मैं एक दिन यही चिन्ह अपनी पूरी पीठ पर बनवाऊंगा।” सुयश ने दादा जी के हाथ पर बने सूर्य चिन्ह को अपनी नन्हीं हथेली से सहलाते हुए कहा।

“ठीक है, जब तुम बड़े होकर कलेक्टर बन जाओगे, तो मैं यह सूर्य चिन्ह तुम्हारे पीठ पर बनवा दूंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने चारो ओर फैले पर्वतों को देखते हुए कहा।

“कलेक्टर? ये कलेक्टर क्या होता है दादा जी?” सुयश ने पूछा।

“कलेक्टर पूरे जिले का सबसे बड़ा ऑफिसर होता है।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश की ओर देखते हुए जवाब दिया।

“नहीं-नहीं दादा जी, मैं कलेक्टर नहीं बनूंगा, मैं तो एक बहुत बड़े से पानी के जहाज का कप्तान बनूंगा और समुद्र की विशाल लहरों में अपना जहाज लेकर घूमूंगा।” सुयश ने अपनी कल्पना को उड़ान देते हुए कहा।

“अरे वाह, छोटे युवराज, आपकी सोच तो कमाल की है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपनी गोद में उठा लिया और चलते हुए मंदिर के प्रांगण के किनारे आ गये।

उस स्थान से उगते हुए सूर्यदेव बिल्कुल साफ नजर आ रहे थे। सूर्य की लालिमा प्रकाश का रुप ले, संपूर्ण आभा मंडल को दैदीप्यमान कर रही थी।

तभी मंदिर का एक पंडित अपने हाथ में 2 तांबे के लोटे में, जल लेकर आ गया। एक तांबे का लोटा थोड़ा छोटा था, जो कि निश्चित ही सुयश के लिये था।

“चलो बेटा, अब सूर्य को अर्घ्य दो, पर ध्यान रहे, यह पात्र तुम्हारे दोनों हाथों में सिर से ऊपर की ऊंचाई पर होना चाहिये और जल की धार टूटनी नहीं चाहिये। इस प्रकार करने से सूर्य की पहली जीवन दायिनी किरण स्वच्छ जल को पारकर हमारे शरीर से टकराती है और हमें सभी प्रकार के रोग से मुक्त करती है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने छोटा लोटा सुयश की ओर पकड़ा दिया और बड़े लोटे से स्वयं सूर्य को अर्घ्य देने लगे।

सुयश ने भी अपने दादा जी को देखते हुए ठीक उसी प्रकार से किया, जैसा कि दादा जी ने कहा था।

तभी दूसरी जीप भी आ गई। यह देखकर सूर्य नारायण सिंह ने सूर्य को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन लोगों की ओर बढ़ गये।

सूर्य नारायण सिंह ने अभय को सुयश का ध्यान रखने के कार्य पर लगा दिया।

दादा जी के जाने के बाद नन्हें सुयश ने भगवान सूर्य को देखा, सूर्य की लालिमा सुयश को बहुत भली लग रही थी।

धीरे-धीरे सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था, पर सुयश अभी भी अपनी नजरें सूर्य से नहीं हटा रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे सूर्य से सुयश का कोई बहुत गहरा रिश्ता हो।

तभी अचानक सुयश को सूर्य, बैंगनी रंग का होता दिखाई दिया। यह देख सुयश अचकचा गया, पर तभी सुयश को अपनी नाक पर बैठी एक नीले रंग की खूबसूरत सी तितली दिखाई दी।

उसी तितली के पंखों की वजह से सुयश को सूर्य का रंग बदलता हुआ दिखा था।

सुयश ने अपने हाथों से उस तितली को पकड़ने की कोशिश की, पर वह तितली सुयश की नाक से उड़कर दूर चली गई।

उस तितली का रंग इतना प्यारा था, कि सुयश का ध्यान अब तितली की ओर आकृष्ट हो गया था।

सुयश अब मंदिर के प्रांगण में तितली के पीछे-पीछे भागकर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा।

उधर अभय को जीप में रखा एक पूजा का सामान याद आ गया, उसने एक बार सुयश को खेलते हुए देखा और फिर बाहर जीप में रखें सामान को लाने के लिये चला गया।

सुयश अभी भी तितली के पीछे-पीछे भाग रहा था। तितली कभी एक स्थान पर बैठती, तो कभी दूसरे स्थान पर।

इस बार तितली मंदिर के प्रांगण के किनारे लगे एक छोटे से पेड़ की शाख पर जा बैठी।

सुयश अपना हाथ बढ़कार तितली को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पर वह पेड़ की डाल सुयश के नन्हें हाथों से थोड़ा दूर थी, इसलिये सुयश ने अपना एक पैर मंदिर के प्रांगण की रेलिंग से बाहर निकाल लिया।

पर इससे पहले कि सुयश उस नीले रंग की तितली को पकड़ पाता, उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे की ओर गिरने लगा।

सुयश के मुंह से चीख निकल गई। तभी सूर्य की किरणों की चमक बढ़ गई और सुयश, बिना किसी सहारे के हवा में झूलने लगा।

उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सूर्य की किरणों से बने झूले पर बैठा हो।

नन्हें सुयश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सुयश को अपने सामने एक दिव्य प्रकाशपुंज स्वरुप एक पुरुष दिखाई दिया।

उसे देख सुयश ने पूछ ही लिया- “आप कौन हो?”

“मैं सूर्यदेव हूं।” सूर्यदेव ने कहा- “मैंने ही तुम्हें इस ऊंचे पर्वत से गिरने से बचाया है।”

“आपने मुझे क्यों बचाया?” सुयश के शब्दों में एक बालरस झलक रहा था।

“क्यों कि मैंने तुम्हें अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया है, फिर भला मैं तुम्हें मरने कैसे देता?” सूर्यदेव ने कहा।

“आप इतनी जल्दी उतनी ऊंचाई से मेरे पास कैसे आ गये?” सुयश ने सूर्यदेव की ओर देखते हुए पूछा।

“क्यों कि मेरी किरणों से तेज चलने वाली चीज अभी इस ब्रह्मांड में नहीं है।....अपना ध्यान रखना सुयश।” सूर्यदेव ने कहा और सुयश को उठाकर, मंदिर के प्रांगण के बाहर लगी घनी झाड़ियों पर बैठा दिया। इसी के साथ सूर्यदेव हवा में कहीं गायब हो गये।

उधर अभय जैसे ही मंदिर के प्रांगण में पहुंचा, उसे सुयश कहीं दिखाई नहीं दिया। घबराकर अभय ने मंदिर के प्रांगण के किनारे जाकर नीचे की ओर देखा।

नीचे की ओर देखते ही अभय की जान सूख गई क्यों कि सुयश इस समय नीचे एक झाड़ी में फंसा दिखाई दे रहा था।

अभय ने घबरा कर अपने चारो ओर देखा, पर उसे आसपास कोई नजर नहीं आया, यह देख अभय ने जल्दी से नीचे लटककर, सुयश का एक हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।

सुयश को सही सलामत देख अभय की जान में जान आयी, पर उसे यही डर था कि कहीं सुयश, सूर्य नारायण सिंह को यह सारी बात बता ना दे।

“देखो बेटा, तुम यह बात किसी को बताना नहीं, मैं तुम्हें ढेर सारी टॉफियां दूंगा।” अभय ने सुयश को फुसलाते हुए कहा।

टॉफियों की बात सुन सुयश तुरंत मान गया। 2 घंटे के बाद सभी पूजा करके वापस घर की ओर चल दिये।

“तुम्हें भगवान सूर्यदेव कैसे लगे सुयश?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपने से चिपटाते हुए पूछा।

“अच्छे लगे, पर जब उन्होंने मुझे गोद में उठाया, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुयश ने भोलेपन से कहा।

“अच्छा, तो भगवान सूर्य ने तुम्हें गोद में उठाकर क्या कहा?” सूर्य नारायण सिंह ने हंसते हुए पूछा।

“उन्होंने कहा कि वो मुझे ढेर सारी टॉफियां देंगे।.....नहीं-नहीं....ये तो अभय अंकल ने कहा था.....उन्होने कहा था.... उन्होने कहा था...... क्या दादा जी आपने तो सब भुलवा दिया?” सुयश ने कहा और दादा जी के सीने से चिपक गया।

“शैतान बच्चा, 2 मिनट में कहानियां बनाकर सुनाने लगता है।” सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह मुस्कुराए और फिर से सुयश के सिर पर हाथ फेरने लगे।

सुयश अब दादा जी से ऐसे चिपका था, जैसे कि वह सूर्य नारायण सिंह ना होकर साक्षात सूर्यदेव हों।


जारी रहेगा_____✍️
बहुत ही उम्दा और खूबसूरत अपडेट है दिमाग़ की चूलें हिला दी इस तिलिस्म ने!
 
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