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Incest ससुराल की नयी दिशा

prkin

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थोड़ा छूट गया था. आज कर दूँगा।
लगभग पूरा हो चूका है.
 

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ससुराल की नयी दिशा
अध्याय १७: दिशा की ससुराल


अब तक:

जहाँ रात भर एक ओर दिशा अपनी ससुराल और अपनी सास के मायके वालों के साथ चुदाई और व्यभिचार में व्यस्त रही थी, वहीं दूसरी ओर उसकी माँ जिसे दिशा सती सावित्री समझती थी, अपनी बड़ी बहन रागिनी के पति और पुत्र के साथ अपने शरीर की तृप्ति में लिप्त रही थी.
ललिता अपने भाई भानु से चुदवाती रही तो महेश ने भानु की बहू पल्लवी की मन भर कर चुदाई की थी. अविका तो पहले से ही देवेश पर आसक्त थी और उससे चुदवाकर ही संतुष्ट हुई थी. दिशा, काव्या, अनुज और अनिल ने एक साथ चुदाई का आनंद लिया था. और परिवार की सबसे वरिष्ठ सदस्या नानी की चुदाई उनके दोनों नातियों ने एक विशिष्ट ही ढंग से की थी.
उधर रागिनी की सामान्य दुहरी चुदाई के उपरांत निमिष और लव ने नलिनी को दुहरी चुदाई की एक नई परिभाषा सिखाई थी.

अब आगे:

रात की भीषण चुदाई और शराब के अधिक सेवन से सरिता कुछ अधिक ही पस्त हो गई थी. जब सबने उसे ये सुझाव दिया कि अब भानु और परिवार को उनके ही साथ रहना चाहिए तो उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया. अविका और ललिता ने मिलकर आज रात के लिए जोड़े बना दिए. महेश और भानु को लौटने में दोपहर हो गई. तब तक सबने भोजन का प्रबंध किया और उनके लौटते ही सबने भोजन किया. सरिता को अपनी छोटी बहू दिशा के द्वारा बनाया भोजन बहुत रुचिकर लगा और उसने दिशा की मन से प्रशंसा की.

इसके बाद देवेश ने रितेश और जयेश को साथ बैठाया और उनके दिशा के नगर में चल रहे अनुबंध के बारे में समझाया. उसने उन दोनों को कुछ गोपनीय बातें भी बतायीं. इसके बाद देवेश अपने कमरे में चला गया और जयेश रितेश अपने में.
अपने कमरे ललिता महेश के लौड़े को मुंह में लेकर चूस रही थी. महेश पत्नी की इस कला का आनंद ले रहा था. अचानक ही ललिता बोल उठी.

“क्या आज रात आप माँ के साथ रहोगे?”
“तुम दोनों ने यही योजना बनाई है न?” महेश का संकेत अविका की ओर था.
“हाँ, पर मेरा मन बदल गया है.”
“अब क्या हो गया?”
“अब जब इतने सारे लोग घर में रहेंगे तो मुझे आपके साथ कम ही समय मिलेगा. तो क्यों नहीं आप माँ की अभी जाकर चुदाई कर लो और रात को मेरे ही साथ रहो?”
“मुझे कोई आपत्ति नहीं है, पर तुम्हें बिना चुदे भी तो शाँति नहीं मिलती.”
“आज मैं शांत रहूंगी. आप जाकर देखो. अगर माँ अकेली हों तो चोद लेना नहीं तो मैं तो यहाँ हूँ ही.” ये कहते हुए ललिता ने महेश के लंड को निकाला और हट गई.

महेश अपनी पत्नी के इस विचित्र व्यवहार से कुछ अचरज में आ गया. फिर उसने कपड़े पहने और सरिता के कमरे की ओर निकल गया. इस समय सभी अपने कमरों में ही थे और घर में सन्नाटा सा छाया हुआ था. सरिता के कमरे के बाहर उसने खटखटाया तो कोई उत्तर नहीं आया. उसने हल्का धक्का दिया तो द्वार खुल गया. उसने अंदर झाँका तो कोई दिखा नहीं. वो लौटने को ही था कि उसे बाथरूम से फ्लश चलने की धीमी ध्वनि सुनाई पड़ी. उसने कमरे में जाकर द्वार बंद कर दिया.

कुछ ही पलों में उसकी सास सरिता बाथरूम से बाहर आयीं और उसे देखकर चौंक गयीं. इस समय उन्होंने एक गाउन पहना था जो कि घर में महिलाएँ पहनती है. उनके चेहरे पर अब सुबह वाली थकान नहीं थी और वो सामान्य लग रही थीं.

“आओ दामादजी, मेरे पास कैसे चले आये?”
“माँ जी, ऐसा तो नहीं कि मैं आपके पास पहले कभी नहीं आया. आप ही मुझसे दूर बनी रहीं. पर आज आपके इस निर्णय से कि अब आप हमारे साथ रहेंगी, मेरा मन बहुत प्रसन्न है. ललिता भी आपसे दूर रहकर कभी पूर्ण रूप से प्रसन्न नहीं रही. इसीलिए मैं आपके इस निर्णय के लिए आपको धन्यवाद करने आया हूँ.”

“सच कहते हो दामादजी, मैंने अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण अपनी बेटी, दामाद और नाती नातिन से ली. ये तो भला हो अनुज और अनिल का कि उन्होंने मुझे दिखाया कि मैं गलत थी. पर अब मैं समझ चुकी हूँ. काश ये समझ मुझे पहले आ जाती तो इनके (सरिता के पति) जाने से पहले ही हम अधिक दूर नहीं रहते. पर होनी को कौन टाल सकता है.”

“जो बीत गई उसे भूलना ही ठीक होता है माँ जी. वैसे अगर आप मुझे मेरे नाम से पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा.”

“ ठीक है दामादजी, ओह! महेश.” सरिता ने कहा तो दोनों हंस पड़े.

महेश सरिता के पास गया और बोला, “मैं आपको हमारे परिवार के नए ढंग से धन्यवाद करना चाहता हूँ, अगर आप अनुमति दें तो.”

सरिता मुस्कुराई. “तो ये बात है, अपनी सास की चुदाई करना चाहते हो. क्यों?”
महेश ने उसकी आँखों में झाँका, “कई वर्षों से, पर आज ये इच्छा पूरी होगी, ऐसा विश्वास है.”
“अब अपने दामाद की बात टाल सकते नहीं. तो आप मुझे धन्यवाद करने के लिए जो प्रयोजन करना चाहते हैं करें. मैं आपके साथ हूँ.”
ये कहते हुए सरिता जाकर सोफे पर बैठ गई और महेश को साथ बैठने के लिए आमंत्रित किया. महेश उसके पास बैठा तो सरिता ने उसका एक हाथ अपने हाथ में ले लिया.

“ये जो मैंने अपना नया जीवन पाया है, मैं उससे बहुत संतुष्ट हूँ. मुझे बस अब एक ही बात का खेद है. अगर मैं इतनी रूढ़िवादी न होती तो सम्भवतः इस आनंद को मैं बहुत पहले पा सकी होती. मैं ये भी नहीं जानती कि अगर तुम्हारे ससुरजी जीवित होते तो ये सब होता या नहीं. उन्हें चुदाई की बहुत इच्छा रहती थी. पर मैं ही बंधी रही. पर आज इसके बारे में सोचने का कोई अर्थ नहीं है. उनके जाने के इतने वर्षों तक भी मैं यूँ ही रही. पर आज नहीं. अब मैं कामक्रीड़ा के हर उस आयाम को अनुभव करना चाहती हूँ जो मैंने जीवन पर्यन्त नहीं पाया.”

“इस विषय मैं अब मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे बच्चे मेरे जैसे नहीं निकले और आज तुम सब एक दूसरे के साथ कितने स्वतंत्र हो और अपने जीवन के हर क्षण का आनंद ले रहे हो.”

महेश अपनी सास की बात सुन रहा था. उसे लगा कि उन्हें उनकी भावनाएं व्यक्त करने का उचित पटल नहीं मिलने के कारण वो अभी भी कुछ दुविधा में हैं.

महेश, “माँ जी, आज किसी भी बीती बात के बारे में सोचने का कोई औचित्य नहीं है. जो बीत गया सो बीत गया. पर मेरी ये धारणा है कि बाबूजी भी इस खेल में सम्मिलित हो जाते. हालाँकि आपको नहीं पता पर उन्हें भानु और ललिता के बारे में ज्ञान था. और बाद में मेरे और अविका के बारे में भी, और हम सबके बारे में.”

ये सुनकर सरिता अचम्भित हो गई.

“ये कैसे, उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं कहा.”
“हाँ, क्योंकि उन्हें ये लगता था कि जानने के बाद आप कहीं हम सबको अलग न कर दें, या घर ही छोड़कर चली जाएँ. इसीलिए उन्होंने इस बात को कभी आपसे नहीं कहा.”
“तो क्या वो भी तुम सबके….”
“नहीं, उनकी इच्छा बहुत थी, पर वे आपके सम्मिलित हुए बिना नहीं जुड़ना चाहते थे.”
“मैंने उन्हें यूँ ही अपनी इच्छाओं को मारने पर विवश किया. मैं कैसे स्वयं को क्षमा कर सकती हूँ?

“ऐसा नहीं है. बाबूजी की इच्छा थी कि अगर आप कभी इस खेल में जुड़ेंगी तो उनकी आत्मा को शांति मिलेगी. मुझे लगता है कि अब वे भी प्रसन्न हैं और आपको भी आनंदित देखना चाहते हैं.”

सरिता महेश की ओर कुछ देर शांति से देखती रही.
“क्या तुम ऐसा सोचते हो महेश?”
“मैं जानता हूँ.”
सरिता फिर चुप हो गई. फिर उसने आँखें बंद करते हुए अपने दिवंगत पति को स्मरण किया और अपने मन से प्रार्थना की. फिर कुछ देर यूँ ही बैठी रही.
“महेश, तुम्हारा ये उपकार मैं सदा याद रखूँगी, बेटा।”
आज पहली बार सरिता ने उसे बेटा कहा था, नहीं तो वो उसे दामादजी ही बुलाती थीं. महेश की भी आँखें भीग गईं।
“नहीं माँ जी. ऐसा न कहें. मैं भी भानु, ललिता या अविका से अलग नहीं हूँ. अपने आज मुझे बेटा कहकर मेरे जीवन का उद्देश्य पूरा कर दिया. मेरे दिवंगत माता पिता भी आज प्रसन्न हुए होंगे.”

सरिता और महेश एक दूसरे से लिप्त गए पर इसमें वासना नहीं आत्मीयता थी. जैसे दो किनारे मिले हों. उसे अपनी पत्नी ललिता पर गर्व हुआ जो उसने उसे इस समय अपनी सास के पास भेजा था. इतनी बातें रात्रिकाल में होना सम्भव नहीं था. कुछ समय तक दोनों यूँ ही एक दूसरे से लिपटे रहे. परन्तु धीरे धीरे उन्हें एक दूसरे की शरीर की गंध ने उन्हें इस बात का आभास करा दिया कि दोनों अब कुछ मात्रा में कामुक हो रहे हैं.

सरिता: “तो अब बताओ मुझे कैसे धन्यवाद देने आये थे?”
महेश: “आप जैसे चाहेंगी.”
सरिता ने महेश की आँखों में झाँका तो इस बार महेश को उसकी आँखों में ममतामई प्रेम नहीं बल्कि वासना की अग्नि दिखी.

सरिता, “मैं जानती हूँ कि मैं किस प्रकार से तुम्हारा धन्यवाद स्वीकार कर सकती हूँ, परन्तु क्या उसके बाद भी तुम मुझे उसी दृष्टि से देखोगे जिस प्रकार देखते आये हो?”

महेश, “क्या आपने अपने नाती पोतों के व्यवहार में कोई अंतर अनुभव किया है, जब से ये सब का आरम्भ हुआ?”

सरिता ने कुछ समय सोचा और फिर उसे उत्तर मिल गया. उसने अपने गाउन को पैरों से ऊपर किया और उठाकर अपनी गांड के नीचे कर लिया. उसकी चूत अब सामने थी.

“इस धन्यवाद के कई हिस्से होंगे, दामाद जी, जब तक वो समाप्त नहीं होते मैं तुम्हें दामाद जी ही कहूंगी. उसके बाद तुम महेश हो जाओगे.” ये कहते हुए सरिता ने अपनी जाँघे फैला लीं. महेश को ये देखकर आश्चर्य हुआ कि उसकी चूत बिलकुल चिकनी सपाट थी. उसके इस भाव को देखकर सरिता ने उसकी इस जिज्ञासा को दूर कर दिया.

“अविका मुझे अपने साथ नगर में लाई थी एक बार और किसी मशीन से मेरे बाल निकलवा दिए थे. तब से कभी नहीं उगे वापिस.” सरिता ने कहा तो महेश समझ गया कि लेज़र से निकाले गए होंगे.

महेश, “मुझे अविका का आभारी होना चाहिए इस दूरदृष्टि के लिए.”
सरिता हँसते हुए बोली, “वो पूरा परिवार कर चुका है.”

महेश अब सरिता की जाँघों के बीच आकर बैठ गया. दोनों ने अब तक कपड़े नहीं उतारे थे. महेश ने सरिता की जाँघों को कुछ और फैलाया और फिर अपनी जीभ से उसके भग्नाशे को छेड़ दिया.

“ओह, दामादजी!” सरिता के मुंह से एक सिसकारी निकली.

पर महेश के लिए उसके कपड़े कठिनाई उत्पन्न कर रहे थे. इसीलिए वो खड़ा हुआ तो सरिता ने उसे प्रश्न भरी आँखों से देखा. पर जब उसने देखा कि महेश अब अपने कपड़े उतार रहा है तो उसने भी वहीं बैठे हुए अपनी नाइटी उतार फेंकी. महेश नंगा होते ही सरिता की जाँघों के बीच लौट आया. इस बार सरिता ने अपनी जाँघें उचित अनुपात में खोल दीं और महेश ने अपनी जीभ से उसकी चूत के पटलों को चाटना आरम्भ कर दिया. इस आयु में भी सरिता की चूत में रस की कमी नहीं थी और शीघ्र ही महेश के मुंह में उसके रस की वृष्टि होने लगी.
इस पूरे समय सरिता ने “आह दामादजी, वाह दामादजी की रट लगाए रखी जिसके कारण महेश को भी अपने उपक्रम को और अच्छा करने का प्रोत्साहन मिल गया. महेश की जीभ अब अपनी सास की चूत की गहराइयों तक पहुंच रही थी. उसे अपनी सास की चूत का स्वाद अपनी पत्नी के स्वाद के ही अनुरूप लग रहा था और वो इसका भरपूर आनंद ले रहा था.
जब महेश ने अपनी जीभ को अंदर घुमाते हुए सरिता के भग्न को छेड़ा तो सरिता का शरीर अकड़ गया और उसकी चूत से इतनी तेज धार छूटी कि महेश का मुंह संभाल ही नहीं पाया और उसके चेहरे पर बिखर गया. सरिता कुछ समय तक कांपती रही और फिर शिथिल पड़ गई. महेश ने अपने मुंह को पोंछा और अपनी सास के शिथिल शरीर को गर्व से देखा. पहला चक्र उसने अपने नाम जो कर लिया था.
कुछ देर तक यूँ ही पड़े रहने के पश्चात सरिता ने अपनी आँखें खोलीं और महेश की ओर देखा, “मेरी बेटी बहुत भाग्यवान है जो उसे तुम जैसा पति मिला दामादजी.”
महेश ने कुछ कहा नहीं. पर उसे अपनी सास के मुंह से अपनी प्रशंसा सुनकर अच्छा लगा.
“अब मेरी बारी है दामादजी, मैं भी देखूँ कि आपने मेरी बेटी को कैसे बाँधे रखा है इतने वर्षों से. लाईये अपना लंड, मैं भी तो चखूँ इसे, घर की हर अन्य महिला तो इसे चख ही चुकी है.”
महेश को और किसी आमंत्रण की आवश्यकता नहीं थी. उसने अपना खड़ा तमतमाया लौड़ा सरिता के मुंह के सामने कर दिया. सरिता ने कुछ समय तक उसे निहारा और फिर अपनी जीभ से उसके टोपे को चाटा। महेश के लंड पर थमी हुई उसके मदन रस की बूँद ने सरिता की जीभ को उसका पहला स्वाद दिया. इसके बाद तो जैसे सरिता अपना आपा ही खो बैठी. उसने महेश के लौड़े पर ऐसे आक्रमण किया जैसे कोई भूखी शेरनी अपने शिकार पर करती है.

महेश भी उसके इस उत्साह की मन ही मन प्रशंसा किये बिना न रह सका. और इस बार महेश ने “ओह सासू माँ, मेरी प्यारी सासू माँ” कहते हुए सरिता को प्रोत्साहित किया. जब महेश को लगा कि उसका रस छूटने वाला है तो उसने सरिता को चेतावनी दी. पर सरिता अब कहाँ रुकने वाली थी, वो लंड को चूसने और चाटने में इतनी व्यस्त थी कि उसने महेश की सुनी अनसुनी कर दी. और कुछ ही महेश के लंड ने अपना फुहारा अपनी सास के मुंह में छोड़ दिया. सरिता इस आयु में भी पूरे रस को गटक गई और फिर महेश के लंड को मुंह से निकालकर उसे भी चाटा। उसने इस एक बार फिर महेश को देखा और मुस्कुरा दी.

“दामादजी, अब तक आप दो परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुके हैं. पर अब अगले पड़ाव में आपके क्षमता का पता चलेगा.”
“कोई नहीं सासू माँ, अब तक इस घर की किसी स्त्री को मैंने अंसतुष्ट नहीं छोड़ा है. तो आपकी ये चुनौती मुझे स्वीकार है.” महेश ने भी उतने ही अभिमान से सरिता को उत्तर दिया.

“तो मेरे विचार से अब हमें बिस्तर पर ही चलना चाहिए. मेरी बूढी हड्डियां बिस्तर पर ही टूटें तो ठीक रहेगा.”
महेश हंस पड़ा, “अरे सासू माँ, जो क्रिया कलाप अपने कल अपने नातियों के साथ किया है, उसे सुनकर तो नहीं लगता कि आपकी हड्डियां इतनी सरलता से टूटेंगी. पर मैं प्रयास पूरा करूंगा.”

सरिता सोचने लगी कि उसने कुछ अधिक तो नहीं बोल दिया, फिर उसे कल रात की चुदाई की स्मृति हुई तो उसे विश्वास हो गया कि महेश की किसी भी प्रकार की चुदाई को वो सहन करने के लिए सक्षम है. बिस्तर पर जाकर दोनों लेट गए और इस बार उन दोनों ने पहली बार एक दूसरे को चूमा. और ये चुम्बन इतना लम्बा और प्रगाढ़ था कि महेश के लंड में फिर से तनाव आ गया.
“लगता है छोटे दामादजी फिर से खड़े हो रहे हैं.” सरिता ने चुंबन तोड़कर मुस्कुराकर कहा.
“इतनी सुंदरता देखने के बाद भी अगर खड़े न हुए तो उनके विरुद्ध कार्यवाही करनी होगी.” महेश ने भी उसी मुस्कान के साथ उत्तर दिया.
“तो उन्हें किसी प्रकार से छुपाना होगा, नहीं तो कोई आकर उन्हें झुका न दे. वैसे दामादजी मेरे पास एक बहुत सुरक्षित स्थान है उनके लिए.”
महेश ने इधर उधर देखा, “मुझे तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है.”
सरिता, “अगर दिख जायेगा तो छुपेगा कैसे?”

दोनों एक दूसरे को फिर से पूरी तत्परता से चूमने लगे.

सरिता, “दामादजी, अब छोटे दामादजी से मेरी चुदाई कर ही दो. जबसे मैं अपने बच्चों से चुदवाने लगी हूँ, मेरी यही इच्छा रही है कि आपसे चुदवा कर अपने लक्ष्य को पूरा कर लूँ.”

“लक्ष्य, कैसा लक्ष्य?”
“मेरे परिवार के हर सदस्य से चुदवाने का लक्ष्य. आपके बाद अब केवल देवेश ही बचेगा।”
“आपका लक्ष्य तो बहुत अच्छा है, माँ जी. तो मैं इसके लिए प्रतिबद्ध हूँ.”

एक गहरे चुंबन के साथ महेश उठ गया और उसने सरिता को सीधे लिटाया और उसके पाँव खोलकर उसकी जाँघों के बीच में आ गया. उसका तना लौड़ा अपनी सास की चुदाई के लिए हिल हिल कर अपनी प्रसन्नता दिखा रहा था. महेश ने सरिता से आँख मिलाई तो एक मूक स्वीकृति मिली. अपने लंड को उसने सरिता के भग्न पर रगड़ा, फिर उसकी चूत के ऊपर रगड़ा. सरिता कुनमुनाने लगी. महेश ने बहुत थोड़ा लंड अंदर किया और बाहर निकाला, जैसे कोई सर्दी में ठंडे पानी को छूकर देखता है.

इस प्रकार से सरिता की चूत में आधा एक इंच लंड डालकर महेश ने सरिता को कमोत्तेजित कर दिया. सरिता के सिसकारियां बढ़ने लगीं. उसकी चूत आने वाले आगंतुक के स्वागत के लिए पनिया गई. महेश ने ये सब अनुभव किया. और जब उसे लगा कि अब अवसर उपयुक्त है तो एक लम्बे धक्के के साथ अपने पूरे लंड को सरिता की चूत में उतार दिया. सरिता इस अकस्मात आक्रमण से चिहुंक पड़ी और उसकी चीख निकल गई.

“उई माँ.” पर अब महेश का लंड पूरी लम्बाई के साथ उसकी चूत के हर अवधान को तोड़ता हुआ अपना झंडा फिर चुका था. सरिता की अब हर छेद में नियमित चुदाई होती थी. पर नए लंड का आनंद अलग होता है. उसने आज अपने दामाद के लंड को भी अपनी चूत में लेकर एक नया अनुभव जो पाया था. महेश ने रुकने की कोई आवश्यकता अनुभव नहीं की और अपने लंड को तीव्र गति से सरिता की चूत में पेलने लगा. सरिता भी अब अपने आश्चर्य से बाहर आ चुकी थी और वो भी महेश के धक्कों का आनंद लेती हुई उसे और अधिक कठोरता और गहराई से चोदने के लिए प्रेरित करने लगी.


सरिता की चुदाई में महेश को भी एक नया आनंद आ रहा था. इस आयु की स्त्री को भोगने का उसका ये पहला अवसर था और उसे इस चुदाई में अतिरिक्त आनंद इसीलिए भी आ रहा था क्योंकि इस समय उसका लंड उसकी सास की चूत में था, वही सास जो इतने वर्षों तक उनसे दूरी बनाये हुई थी. केवल इसीलिए कि वो अपनी बेटी के घर को अपना घर नहीं मानती थी. न जाने क्यों महेश का आक्रोश बाहर आ गया और उसने सरिता की चुदाई की गति और तीव्रता बढ़ा दी.

पर सरिता तो अब किसी भी प्रकार की चुदाई का अनुभव ले चुकी थी, उसे इस बढ़ी हुई तीव्रता में और भी आनंद आने लगा और वो महेश को और उत्साहित करने लगी.

“वाह दामादजी, क्या चोदते हो. तभी तो मेरी बेटी आपकी इतनी प्रशंसा करती है. और मेरी बहू तो आपके गुणगान गाते नहीं थकती. चोदो मेरी बूढ़ी चूत, भर दो इसे अपने पानी से, बुझा लो अपनी प्यास और मेरी भी. और धक्के मारो, और जल्दी, और तेज. हाय माँ, कितना आनंद आ रहा है. चोदो चोदो मुझे चोद चोद कर मार दो.”

महेश ने अपनी गति बनाये रखी, पर सरिता की बातें अब निरर्थक होने लगीं, वो जो कुछ बोल रही थी उसमें न कोई अर्थ था न कोई लय. उसकी शरीर की इस समय वो स्थिति थी जहां उसका मस्तिष्क और शरीर अलग अलग ब्रम्हांड में थे. शरीर काँप रहा था, कुछ स्वतः कुछ शक्तिशाली धक्कों के कारण। उसकी चूत के पानी में महेश के लंड के कारण छप छप की ध्वनि आ रही थी.

महेश ने कुछ समय इस आसन में चुदाई करने के बाद अपनी सास को घोड़ी बनने के लिए कहा और अपने लंड को बाहर निकाल लिया. सरिता ने सम्भलते हुए घोड़ी का आसन लिया और फिर अपनी गांड को ऊपर उठा कर महेश को पीछे मुड़कर देखा.

“जो दिख रहा है, कैसा लग रहा है दामादजी?”
“अत्यंत सुंदर, आपकी गांड के द्वार भी खुले हुए हैं, पर पहले आपकी चूत का उद्धार कर दूँ फिर गांड भी मारूँगा, मुझे बताया गया है कि आपको गांड मरवाना बहुत अच्छा लगता है.”
“हाँ, जब से गांड मरवाई है, तब से इसमें लौड़ा लिए बिना अब नींद ही नहीं आती. और अपने प्यारे दामाद जी से मैं अपनी गांड मरवाने के लिए भी उतनी ही आतुर हूँ. पर जैसा अपने कहा पहले मेरी चूत की माँ चोद दो.”

महेश ने सरिता की चूत को चादर से पोंछा और फिर अपने लंड को एक झटके से पेल दिया. सरिता तकिये में मुंह छुपाकर अपनी चुदाई का आनंद लेने लगी. कोई दस मिनट की भीषण चुदाई के बाद सरिता अनेकानेक बार झड़ी और उसकी शक्ति समाप्त होने लगी. महेश ने भी अपने झड़ने के समय को निकट देखा तो सरिता से पूछा। सरिता ने उसे चूत में ही पानी छोड़ने का आग्रह किया. इसके कुछ ही पलों के बाद महेश के रस ने सरिता की चूत में अपना कामरस छोड़ा और अपने लंड को उसकी चूत में ही डाले हुए सरिता के ऊपर लेट गया. फिर उसने अपने लंड को बाहर निकाला और सरिता की चूत से ढेर सारा रस बिस्तर पर बह गया.

सरिता के बगल में लेट कर महेश ने सरिता को अपनी बाँहों में लिया और दोनों एक दूसरे को चूमने में व्यस्त हो गए.

“कैसा लगा माँ जी?”
“बहुत अच्छा, मन तृप्त हो गया. बस अब कुछ ही देर में आप दामादजी से महेश हो जाओगे. बस एक छेद और है, एक बार उसे भी चोद दो.”
“अवश्य, पर मुझे अब कुछ समय लगेगा.”
“कोई नहीं, मैं कौन सा अभी गांड मारने के लिए कह रही हूँ. मेरी भी स्थिति उस प्रकार की नहीं है. कुछ देर के विश्राम के बाद देखेंगे।”

दोनों एक दूसरे को चूमते हुए लेटे हुए अन्य बातों में संलग्न हो गए.

*********
घर के एक दूसरे हिस्से में अविका और ललिता बैठे हुए चाय पी रही थीं. ललिता ने बताया कि उसने महेश को रात्रि के स्थान पर अभी ही उसकी माँ को चोदने के लिए भेज दिया है. अविका को आश्चर्य तो हुआ पर वो जानती थी कि ललिता इस प्रकार से बदलाव करने में अधिक सोचती नहीं है.

“और आज रात को देवेश को भेजूँगी उनके पास, इसके साथ ही कोई भी किसी से अछूता नहीं रहेगा.”

“जयेश और रितेश बाहर कब जा रहे हैं?”
“दो दिन बाद, इसीलिए, कल माँ के लिए पाँचों भाइयों को भेजूंगी. पाँच पाँच जवान लौंड़ों से चुदवा कर उनकी भी आत्मा तृप्त हो जाएगी और दो तीन दिन तक तो उन्हें लौड़े की चाह भी नहीं होगी.”
“और उस समय हम महिलाएँ उनके दुखते हुए छेदों पर मलहम लगाएँगे।”

ये कहते हुए दोनों के अट्टहास से बंगला गूंज गया.

********
सरिता और महेश बहुत समय तक पिछले वर्षों की घटनाओं के बारे में बात करते रहे. सरिता को ग्लानि थी कि वो अपनी बेटी और उसके परिवार के बार में इतना कम ज्ञान रखती थी. उसने इस कमी को शीघ्र ही पूरा करने का निर्णय लिया. और इसका आरम्भ होना था महेश को उसके नाम से पुकारने से. और इसके लिए महेश को उसके अंतिम द्वार को भेदना आवश्यक था. सरिता ने महेश से कहा कि अब समय है कि वो उसकी गांड को भी तृप्त कर दे. महेश की शक्ति भी अब तक लौट आई थी और इस बात के सुनते ही उसके लंड ने अंगड़ाई ली और अपने आक्रोश में आने लगा.

वो उठकर बाथरूम में गया और वहां उपलब्ध क्रीम को ले आया. जब लौटा तो देखा कि सरिता घोड़ी के आसन में उसकी प्रतीक्षा कर रही थी. अपनी सास के उतावलेपन पर महेश को हंसी आ गई पर उसने अपनी भावनाओं को छुपा लिया. सरिता की गांड मरने के बाद परिवार की हर स्त्री की गांड का वो आनंद ले चुका होगा. उसे इस बात का पश्चाताप हुआ कि इस राह से देवेश के सिवाय अन्य सभी यात्रा कर चुके थे.

उसने सरिता के पीछे अपना स्थान लिया और क्रीम से सरिता की गांड को चिकना कर दिया.

“कौन सी क्रीम लाये हो, दामादजी?”
“फेस क्रीम?”
“कहीं कुछ होगा तो नहीं?”
“अरे सासू माँ, जब मुंह पर लगा लेती हो तो गांड में लगाने से क्या होगा.” महेश ने दो उँगलियों से सरिता की गांड में अंदर तक क्रीम लगते हुए कहा. सरिता भी गांड मटका कर क्रीम लगवा रही थी. एक बार संतुष्ट होने के बाद महेश ने वही क्रीम अपने लंड पर लगाई और उसे भी चिकना कर दिया.

इस बार उसने कुछ कहा नहीं और सरिता की गांड पर लंड रखा और टोपे को अंदर सरका दिया. टोपे के अंदर जाने से सरिता का शरीर काँप उठा और उसके मुंह से हल्की सी आह निकली. जब टोपा स्थापित हो गया तो महेश ने एक लम्बा धक्का मारा और उसका लंड सरिता की कोमल गांड को चीरता हुआ अंदर तक चला गया. सरिता की कराह अब चीख में बदल गई.

“मर गई ,दामादजी, ऐसा कोई मारता ही अपनी सास की गांड, मादरचोद भड़वे!”

महेश ने उसकी गाली पर कोई ध्यान नहीं दिया और हल्के धक्कों के उसकी गांड में लंड चलाने लगा. महेश की इस गति के कारण कुछ ही देर में सरिता की गांड में कीड़े से चलने लगे.

“अब मार भी गांड अच्छे से, ये क्या हिजड़े के जैसे लौड़ा चला रहा है माँ के लौड़े.”
महेश ने ये बात सुन ली और गति बढ़ा दी. सरिता के कूल्हों पर हाथ जमाते हुए उसने लम्बे शक्तिशाली धक्कों से सरिता की बूढ़ी गांड में अपने लंड का पराक्रम दिखाना आरम्भ कर दिया. सरिता की संतोष और कामोत्तेजना भरी सिसकारियां और चीखें अब उसे प्रेरित कर रही थी.
सरिता की गांड की अवस्था अब ऐसी थी जैसे कोई उसमे मुस्ल दल रहा हो, पर वो वासना से इतनी कामातुर हो चुकी थी कि इस भीषण चुदाई में भी उसे आनंद ही आ रहा था.

सरिता की गांड मारते हुए जब पंद्रह मिनट हो गए तो महेश अपने अंत की ओर पहुंच गया. इस बार भी उसने पूछने की आवश्यकता नहीं समझी और अपना रस सरिता की गांड में छोड़ दिया. सरिता अब तक दो बार झड़ चुकी थी जो उसके लिए पर्याप्त था. अपने लंड का रस गांड में छोड़कर महेश ने लंड बाहर निकाला और सरिता के मुंह पर लगा दिया. सरिता ने आँखें खोलीं.

“बहुत गंदे ही दामादजी, अपनी सास की गांड मारने के बाद उसी से अपना लौड़ा भी चटवाओगे?”

“बिलकुल, मुझे विश्वास है कि ये आप अब तक अनगिनत बार कर चुकी होंगी.”

सरिता ने महेश के लंड को बड़े प्रेम से चाटा और मुंह में लेकर अच्छे से साफ किया. महेश के वीर्य की कुछ बूंदें उसके गले को तर कर गयीं. जब सरिता ने लंड मुंह से निकाला तो वो सिकुड़ने लगा था.

“लगता है मैंने तुम्हारा सारा रस निचोड़ ही लिया, महेश.”

महेश ने उनके मुंह से अपना नाम सुना तो समझ गया कि अब संबंध बदल गया है और जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ हो गया है.

“बिलकुल, सरिता जी. माँ जी.”

एक दूसरे की आँखों में देखते हुए सरिता ने अपनी गांड में उँगलियाँ डालीं और महेश के रस को एकत्रित करते हुए अपने मुंह में डाल लिया.

“अब मुझे आज्ञा दें, माँ जी.”

सरिता ने हामी में सिर हिलाया और उठकर बाथरूम में चली गई, जहां से वो इस प्रकरण के पूर्व आई थी. महेश ने अपने कपड़े पहने और कमरे से निकल गया.

क्रमशः
 
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Jisme writers short stories likhte hain aur unko evaluate karke award diye jate hain... Har saal



Update Posted.
Enjoy.
 

prkin

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