• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest ससुराल की नयी दिशा

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
Last edited:

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
Ab lagta hai nimish ke samne ragini aur love ka raj khul jayega.....
Dekhte hain kya hota hai... Aur fir uska parinam kya hoga

ये जानने का मैं भी इच्छुक हूँ. देखते हैं इसका क्या परिणाम निकलेगा। पर कुछ प्रतीक्षा करनी होगी।
 

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
वाह क्या बयाँ किया है आपने !! प्रेम सुख से प्रकट हुई तृप्ति को।
आपकी लेखनी अपने उच्चस्तर को प्राप्त हुई, ये कड़ी हमेशा याद रहेगी। :perfect:

मगर ऐसा लगता है की आप कहानी को भविष्य में ढाल कर इसे भूत काल में ले जाना चाहते है,
क्योंकि ये सब कैसे शुरू हुआ लव और रागिनी के बीच और उसमे नलिनी की क्या भूमिका रही है,
उसका परिणाम आने वाले समय पर छोड़ दिया है, जिसमे शायद आप प्रकट कर सके या कहानी अन्य किरदारों के साथ निरंतर गति से चली जाएगी। :confused3:

और मेरा ऐसा मत है की निमिष को उसके कर्मों का दंड रागिनी और लव को मिल कर देना चाहिए, अपनी पत्नी के अधिकार लव को सौंपकर। :cowboy1:

अगली कड़ी की उत्सुकता से प्रतीक्षा में . . . . .

कहानी की हर कड़ी लेखक की उस समय की मनःस्थिति पर निर्भर करती है. जब इसका समय आएगा तभी पता चलेगा कि क्या होगा।
 

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
Nimish jab khud apni galti man kar lout kar aa raha hai to use Saza/Dand dene ka kya matlab hai,
yadi Nimish Bahak kar ya Galti se Dusro ko Chodne laga to uski Patni bhi to koi Sati-Savitri si uska intezar to kar nahi rahi thi, wo bhi to Dusro se Chudwa hi rahi thi.

Disha ke Sasural se uske 2 Dever Nalini aur Ragini ko CHODNE ke Plan ke sath aa rahe hai,
LAV ke anusar uski Future wife ki Quality Disha ki Nanad me hai, jo Apne Baap-Bhai se Chudti aa rahi hai to uski yadi Shadi LAV se ho jati hai aur Lav apni Wife ke sath apni Maa ko bhi Chodta hai to kisi ko koi Fark nahi padega.
Nalini aur Ragini ko bhi pahle se Bahuto se Chudne ka Experience hai to Disha ke Sasural walo se bhi Chudne me koi Fark nahi padega,

Nimish ko wapas aa kar Future me Ragini ke sath Nalini, Disha, Disha ki Saas-Nanad etc ko bhi Chodne milega,
LAV bhi sabka Maza lega

भाई,
आपकी इन सभी प्रतिक्रियाओं के लिए आपका धन्यवाद।
देखेंगे क्या होगा।
बस आप इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहें।
 

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
Update aaj 10 baje ke aaspaas ayega.
 
  • Like
Reactions: Evanstonehot

prkin

Well-Known Member
5,641
6,503
189
ससुराल की नयी दिशा
अध्याय ५: ललिता का मायका

अब आगे:

*********

सुबह के दस बजे थे, सबने नाश्ता कर लिया था और जयेश और रितेश की नई परियोजना के बारे में पुरुष वर्ग बात कर रहा था. ललिता का फोन बजा और नंबर देखते ही उसका चेहरा खिल उठा.

“भैया! इतने दिन बाद! कैसे हो आप सब?” ललिता चहकते हुए बोली. दिशा को कुछ समझ न पड़ा पर काव्या का भी चेहरा खिल उठा.

ललिता अपने उत्साह में उठकर बाहर चली गयी. दस मिनट तक उसकी बातें चलती रही थीं.

काव्या ने दिशा को बताया: “मामाजी हैं, मम्मी के बड़े भाई. लगता है कुछ आने का कार्यक्रम है, नहीं तो कम ही बात होती है उनसे. वैसे मामी बहुत हॉट हैं और चुदककड़ भी. देवेश भैया की तो बड़ी फैन हैं. अगर आ रहे हैं तो भैया तो गए. बचपन से भैया से कोई पूछता था तो वो कहते थे कि मामी से शादी करूंगा.” काव्या खिलखुला पड़ी. दिशा का चेहरा देखा तो बोली, “अरे भाभी, ऐसा कुछ नहीं होगा. वैसे मामा के दो लड़के भी हैं. हमारे खानदान में मुझे छोड़कर सबको लड़के ही हैं. इसीलिए मेरी तूती बोलती है.”

दिशा काव्या को देख रही थी. उसकी बातों में कितनी सरलता थी.

दिशा: “वैसे तुम हो भी ऐसी ही, कोई तुम्हारी बात को टाल ही नहीं सकता.” दिशा ने कहा.
“वो तो है. आई एम स्पेशल. हैं न?”
“बिलकुल.”

ललिता लौटी तो जैसे वो चल नहीं उड़ रही हो. सीधे महेश के पास गयी.
“जानते हो कौन आ रहा है?”
“तुम इतना चहक रही हो तो भानु ही होगा?”
“हाँ, अगले सप्ताह आने वाले हैं, शुक्रवार को.”
“अकेला आ रहा है या?”
“पाँचों आ रहे हैं.”

“पाँचों, बहू को भी ला रहा है क्या इस बार?”
“हाँ इसीलिए फोन किया था, कह रहा थे कि पल्ल्वी भी अब सब में मिलजुल कर रहती है.”

“चलो ये अच्छा हुआ. नहीं तो घर में अनबन होने की हमेशा चिंता रहती थी. वैसे तुम्हारी भाभी कैसी हैं?”
“बढ़िया, पूछ रही थीं कि उनकी सौत कैसी है. देवेश ने किसी और से शादी जो रचा ली.”

“हा हा हा, अब ये तो देवेश ही उन्हें समझा पायेगा.”

काव्या और दिशा भी समीप आ चुके थे और बातें सुन रहे थे. इतना उन्मुक्त वातावरण देखकर वो भी हंस पड़ी.

“काव्या बता रही थी कि मैं आपकी दूसरी पसंद हूँ, मामी जो नहीं मिल पायीं आपको.”

देवेश झेंप गया. पर अन्य सभी दिशा की हंसी में जुड़ गए. घर में जैसे एक नयी ऊर्जा का संचार हो उठा था. काव्या ने उन्हें मामा के परिवार के बारे में बताया.

भानु मलिता से दो वर्ष बड़े थे और दूसरे गाँव में उनका अच्छा काम था. दूर नहीं थे, कुछ ३० किमी की ही दूरी थी, पर समय की दुर्लभता के कारण परिवार कम ही मिल पाते थे. उनका विवाह अविका से हुआ था जो ललिता से काफी मिलती थी. मामा अपनी बहन से विवाह तो कर नहीं सकते थे, तो उन्होंने उसके जैसी ही लड़की को पसंद किया था. बिलकुल जैसे सलमान खान ठुकराए जाने के बाद हीरोइन ढूंढता है. पर अविका बहुत सुघड़ स्त्री थी और उसने भानु और उसके परिवार को जितने में अधिक समय नहीं खोया. एक प्रकार से भानु ललिता के साथ संबंधों को भूल गए थे.

मम्मी पापा उनके गाँव जाते रहते थे क्योंकि नाना नानी से मिलने का कोई और प्रकल्प नहीं था. पुराने विचारों के कारण नाना नानी अपनी बेटी के घर नहीं आते थे. पर मामा आते थे मामी के साथ. और एक दिन शराब के अत्यधिक नशे में मामा ने उनके और मम्मी के संबंधों की पोल खोल दी. पापा पहले बहुत आहत हुए, पर फिर उन्होंने इस बात को अनदेखा कर दिया क्योंकि तब तक देवेश भैया का जन्म हो चुका था और रितेश मम्मी के पेट में थे.

पर उनके मन में एक गाँठ थी, और यहीं मामी की सूझ बूझ ने काम किया. उन्होंने पापा को समझाया कि भानु मामा और मम्मी के बीच जो था, उसे क्यों न स्वीकार कर लें और जीवन के आने वाले समय को देखें. पापा ने बहुत देर सोचा फिर उन्होंने जो कहा उसे सुनकर मामी के होश ही उड़ गए.

महेश: “अगर ललिता और भानु चाहते हैं तो वे अपने संबंध फिर से स्थापित कर सकते हैं. पर केवल इस शर्त पर कि हम दोनों भी वंचित न रहें. तो सोच समझ कर उत्तर देना.”

कुछ दिन तक इस विषय में कोई बात न हुई, पर एक दिन मामा और मामी आये तो मामी ने पापा से कहा कि वो दोनों उनकी शर्त पर सहमत हैं. इस प्रकार से हम दोनों के परिवारों में संबंध बन गये. अब तक मामी के दोनों बेटे जन्म ले चुके थे और इधर देवेश और रितेश भैया भी. समय के साथ जयेश और फिर मेरा जन्म हुआ. हम सब बड़े होते गए.

फिर एक दिन एक दुर्घटना ने जीवन अस्त व्यस्त कर दिया. गाँव के अन्य बड़े ठाकुर ने नानाजी की हत्या कर दी. उसका मानना था कि जल्द ही वो जमीन हड़प पायेगा. पर पापा के अधिकारियों से निकटता का उसने अनुमान नहीं किया था. उसके जेल जाने के बाद उसकी आशा के विपरीत, उसकी जान बचने के लिए उसके परिवार ने अपनी जमीन नानी को सस्ते में बेच दी और गाँव छोड़कर चले गए. नानी का मन लगाने के लिए पापा हम चारों को कार से उनके पास भेज देते और हम छः बच्चे उन्हें पूरे दिन अपने खेलों में उलझाए रखते, और यहां पापा, मम्मी मामा मामी के साथ अपने खेल में उलझे रहते.

काव्या ने कुछ देर के लिए विश्राम लिया.

हम सब इन खेलों में कैसे जुड़े वो मैं किसी और दिन बताऊँगी। पर अनुज भैया हम सबमें बड़े हैं, देवेश भैया से कोई तीन महीने बड़े. और अनिल जयेश भैया से दो महीने. गाँव के रीति के अनुसार अनुज भैया का विवाह ३ वर्ष पूर्व ही हो गया था जब आप दोनों अमेरिका में थे. और अब तक देवेश भैया और पल्ल्वी भाभी मिले नहीं हैं. वैसे वो भी आपके जैसी ही स्वीट हैं. और अगर मम्मी ने सही समझा है तो चखने और खेलने के लिए उपलब्ध. दिशा की आँखें फ़ैल गयीं.

“तो क्या?”
“और क्या, जब आ रहे हैं तो खेल तो चलेंगे ही. अब देखना ये है कि पूरा कार्यक्रम है क्या. आप दोनों से मिलना तो बहाना है.”

ये सभी सुनते हुए दिशा बहुत उत्तेजित हो गयी थी. आज दोपहर को उसने देवेश से अच्छे से चुदने का निश्चय किया और घर के कामों में लग गयी.

*******

पूरा कार्यक्रम क्या था ये ही शीघ्र ही पता चल गया. भानु ने अपने घर में कुछ बदलाव करने का निर्णय लिया था और उस पूरे काम में लगभग तीन से चार महीने लगने थे. इसीलिए भानु और उनका परिवार अब उस अवधि में यहीं रहने वाले थे. क्योंकि केवल ३० किमी की ही दूरी थी तो वे प्रतिदिन वहां जाकर लौट सकते थे. ऊपर के कमरे साफ किया गए और उनके रहने का पूरा आयोजन कर दिया गया.

देवेश के मन में एक प्रश्न था, जो उसने खाना कहते समय पूछा, “नानी का क्या होगा? अगर वो आयीं तो?”

इस प्रश्न के बारे में किसी ने भी विचार नहीं किया था. सब ललिता की ओर देखने लगे.

“मेरी भैया से बात हुई थी इस विषय में. उनका कहना है कि माँ साथ ही आएँगी और उनसे कुछ छिपा नहीं है.” ये कहते हुए ललिता के चेहरे पर एक मुस्कान थी.

“क्या कहना चाहती हो, ललिता? माँ जी को सब पता है और उन्होंने कुछ नहीं कहा? जो स्त्री अपनी बेटी के घर का पानी भी नहीं पीती वो ऐसे संबंधों के लिए कैसे मान गयी? मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा है.”

“माँ आ रही हैं न? तो यहाँ का खाना और पानी सब लेंगी. तो आपके दूसरे प्रश्न का कोई औचित्य ही नहीं रहा. और जहाँ तक उनके इन संबंधों से आपत्ति की बात है, तो भैया का कहना है कि अनुज और अनिल ने उन्हें मनाने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया. और उन्होंने अंत में इसकी स्वीकृति दे ही दी.” ललिता ने गर्व से कहा.

काव्या बोल पड़ी, “एड़ी चोटी तो नहीं, मुझे लगता है कि अपने लौंड़ों के जोर से मना लिया उन्होंने नानी को.”

इस बार सब काव्या को देखने लगे जैसे वो पागल हो गयी हो. पर ललिता ने उसे बचा लिया.

“मैं न कहती हूँ, कि मेरी बेटी हम सबसे अधिक बुद्धिमान है.” ये खाकर वो हंस पड़ी.

“यानि?....” महेश हतप्रभ था.

“हाँ, और अब तुम्हारी नानी की दिन में दो बार चुदाई न हो तो नींद नहीं आती. अब यहाँ के बाद दो से भी उनका मन नहीं भरने वाला. ये मेरे चार घोड़े जो और मिल जायेंगे उन्हें सवारी के लिए. वैसे उन्हें जवान लंड अधिक रास आ रहे हैं तो बच्चों के लिए अधिक अवसर हैं.”

“ये साला घर में क्या चल रहा है?” देवेश के मुंह से निकला. “मेरी बीवी तीन दिन में ही लाइन पर आ गयी और अब मेरी रूढ़िवादी नानी अपने पोतों से चुदवा रही है.”

“और नातियों से चुदने के लिए लालायित है.” ललिता ने जोड़ा.
“और मैं?” महेश ने पूछा.

“अरे, आप क्यों चिंता कर रहे हो. आपको माँ और पल्ल्वी दोनों मिलेंगी. आप बस मजे करो.”

इस बात पर सब हंस पड़े. फिर जयेश ने कहा, “पापा, अगर आप कहो तो हम ये परियोजना मामा के जाने के बाद भी आरम्भ कर सकते हैं.”

“बिलकुल नहीं, और वैसे भी तुम्हें मैंने दिशा की माँ के लिए नियुक्त किया है. वो बेचारी भी नानी के समान न जाने कबसे शारीरिक सुख से वंचित है.”

“जी पापा, वैसे हम सप्ताहांत में तो आ ही जायेंगे.” रितेश ने बात संभाली.

“बिलकुल.”

खाना समाप्त हुआ तो दिशा ने देवेश को संकेत किया कि उसकी चुदाई की इच्छा है. देवेश ने उसे संकेत किया कि ठीक है.

*******

भानु का परिवार घर को खाली करने और कीमती सामान को सहेजना में लगा था. जब उन्होंने काम समाप्त किया तो सब खाने के लिए बैठ गए. खाने के समय बुआ और उनके घर के बारे में ही बात चलती रही. भानु का परिवार इस कुछ दिन के बदलाव से बहुत प्रसन्न था. अविका ने सबको मन लगा के भोजन करवाया. फिर भानु ने कहा कि उसे कुछ काम है और वो जा रहा है. थके होने के कारण अविका और पल्ल्वी ने कहा कि वो दोनों कुछ देर के लिए आराम करने के लिए जा रही हैं. उनकी नानी सरिता अपने कमरे में चली गयी. कुछ देर अनुज और अनिल टीवी देखते रहे फिर वे भी उठ गए.

आधे घंटे बाद

काव्या का अनुमान गलत नहीं था, न ही ललिता का अपनी बेटी पर गर्व. जब देवेश दिशा की अपने कमरे में ताबड़तोड़ चुदाई कर रहा था तब उसकी नानी सरिता अपने कमरे में अलग ही व्यायाम में व्याप्त थी.

खाना खाने के बाद वो अपने कमरे में आकर विश्राम कर रही थी. वो लेटी हुई टीवी पर कोई सीरियल देख रही थी कि उसके कमरे का दरवाजा खुला और उसके दोनों पोते अंदर आ गए. इस समय उनके आने का अर्थ वो भली भांति समझती थी. उसके शरीर में एक झुरझुरी सी हुई जब उसने उन्हें दरवाजे को बंद करते हुए देखा. अनुज आगे बढ़ा और उसने टीवी का रिमोट लिया और टीवी बंद कर दिया.

“क्या दादी, हमारे रहते हुए टीवी देखोगी. हम अपना सीरियल बनाते हैं.”
“तू बहू के पास नहीं गया? मेरे पास क्यों आ गया.”
“दादी, पल्ल्वी तक गयी थी, सोने गयी है, मम्मी भी थकी हैं और पापा वैसे भी कुछ देर सोते ही हैं.” वो सरिता के चेहरे पर अपने हाथ फिर रहा था.

“पीछे से अनिल बोला, “और हमें भी टीवी पर कुछ अच्छा नहीं दिखा तो सोचा क्यों न अपनी दादी के पास जाएँ और कुछ प्यार की बात करें.”

“हर दिन तो चोदते हो मुझे, हर रात में मेरी हालत बिगड़ देते हो, पर आज दिन में?”

अनुज अपने कपड़े उतार कर एक ओर रख चुका था, और उसके पीछे अनिल भी अब नंगा हो चुका था.

“दादी, अब देखो हम दोनों तो अपनी पोशाक में आ गए, बस अब आपकी ही कमी है.”
“तुम मानने वाले तो हो नहीं। बुढ़िया के पीछे पड़े रहते हो.”

सरिता बिस्तर से उठी और अपने कपड़े उतारकर एक ओर रख दिए.
“तुम्हारी माँ क्या सोचेगी अगर वो तुम्हें ढूंढने लगी तो?”

“माँ इतनी समझदार है कि वो १ और १ दो बना लेंगी. और अब आप कबसे उनसे शर्माने लगीं.”

सरिता ने कुछ न कहा, ये सच था जब एक बार उसकी कामवासना का बांध टूटा और उसे घर में चल रहे पाप का भान हुआ तो वो भी अब निर्लज्ज हो गयी थी. उसने सबके सामने ही अपने बेटे और पोतों से चुदवाया था. शर्म अब उसका गहना नहीं थी.

अनुज ने उसे अपनी बाँहों में लिया.

“दादी, इतना मत सोचो, अगले सप्ताह तो तुम्हें तीन नाती और दामाद भी चोदने वाले हैं, सोचो कितनी चुदाई होगी तुम्हारी. इसीलिए अब आप दिन रात चुदवाने का अभ्यास कर लो.”

अनुज ने उसे आगे और अनिल ने पीछे से जकड़ लिया. सरिता की चूत से झरना बहने लगा.

वो अपने जीवन की इस बदली दिशा के बारे में सोचने लगी. उसके पोते उसके शरीर पर अपने हाथ चला रहे थे और वो कुछ पुरानी यादों में खोई थी. उसके पति की हत्या के बाद उसका मन जीवन से हट सा गया था. उसके पति ने उसको हमेशा ही संतुष्ट रखा था, हर प्रकार से. पर उनकी मृत्यु के बाद उसका अपने शरीर की इच्छाओं की ओर से मन हट गया था. जब कभी उसे चुदाई की इच्छा होती तो वो अपने कमरे में अपने ही हाथों से उसे पूरा कर लेती थी. पर संतुष्टि कभी नहीं होती थी.

उसे अपने बेटे और बहू के कुछ विशेष व्यव्हार से शक तो हुआ, पर उसने उसे अपना बेकार का वहम समझकर मन से दूर कर दिया. जब बच्चे बड़े हुए तो उनका व्यव्हार कुछ और चिंताजनक हो चला. विशेषकर उसके दोनों पोतों का अपनी माँ के साथ अत्यधिक शारीरिक निकटता. ऐसा लगता था जैसे वो सदैव उसे छूने और उसके अंग दबाने के अवसर ढूंढते थे. अचरज ये था की बहू अविका उनकी इन अठखेलियों का बुरा नहीं मानती थी और सम्भवतः प्रोत्साहित करती थी.

जब भानु और परिवार उसे छोड़कर उसकी बेटी के यहाँ जाते तब उसे एकाकीपन सताता था, पर वो कभी अपनी बेटी के यहाँ जाकर रहने के लिए अपने आप को मना नहीं पायी. फिर समय के साथ उनका मेल मिलाप कुछ कम हो गया. पल्लवी के आने के बाद उसने परिवार के व्यव्हार में फिर बदलाव देखा. अब उसके पोते अपनी माँ से उस प्रकार नहीं खेलते थे. ये सारी बातें उसके मन में घर कर गयीं, पर उसने इन पर कभी कोई अधिक मनन नहीं किया था.

अनुज और अनिल ने उसकी इस कल्पना की उड़ान के समय में उसके कपड़े उतार दिए थे और अब अनुज उसे आगे से चूम रहा था तो अनिल उसके पीछे उसकी गर्दन पर होंठ लगाए थे. एक गहरी साँस के साथ वो वर्तमान में लौट आयी. चुदाई के बाद वो इस पूरे नए समीकरण के बारे में पुनः विचार कर सकती है.

“दादी,” अनिल ने उसके पीछे से उसके कान में बोला, “आज पहले मुझे गांड देना.”

“उँह उँह” सरिता अधिक कुछ न बोल पायी थी. वो इन दोनों के आगे मिट्टी के समान थी, जैसा ये चाहते थे, वो वैसे ही ढल जाती थी. अनिल ने उसे केवल इसीलिए ये कहा था कि खिन अनुज बाजी न मार ले.

“दादी, लंड चूस दो थोड़े.” अनुज ने उससे अनुरोध किया. सरिता बिस्तर पर जा बैठी और दोनों भाई उसके आगे अपने खड़े लौड़े लेकर आ गए. सरिता ने उन दोनों के लंड देखे तो उसे एक बार फिर अपने पति की याद आ गयी. उसके पोतों ने अपने दादा की शक्ति पाई थी. चोदने में भी वे उसके दिवंगत पति से किसी भी ओर से कम नहीं थे. हाँ, उन्होंने उसकी चुदाई इतनी भिन्न आसनों में की थी जो उसने अपने पति के साथ कभी भी प्रयोग नहीं किये थे. दोनों लौडों को हाथ में लेकर सरिता ने एक एक करके दोनों को चाटा और फिर चूसा. इस पूरे अंतराल में एक ओर से अनुज और एक ओर से अनिल उसकी एक एक चूची से खेलते रहे.

“दादी, अब हमारी बारी.” ये सुनकर सरिता का मन उछल गया.

वो समझ गयी कि आज दोनों उसे पूर्ण रूप से संतुष्ट तो करेंगे ही, पर उसकी ऐसी हालत कर देंगे कि वो किसी काम की नहीं रह जाएगी. अनुज बिस्तर पर लेट गया और सरिता ने अपनी चूत उसके मुंह पर रख दी. अनुज कुत्ते के समान उसकी चूत पर जीभ चलाने लगा. सरिता का शरीर सिहर उठा. अभी सरिता अनुज की जीभ से अवगत हुई ही थी कि उसे अपनी गांड पर कुछ रेंगता हुआ अनुभव हुआ. और फिर उसकी गांड के छेद पर उसने कुछ घूमता हुआ अनुभव किया. फिर उसकी गांड के दोनों ओर दो हाथों ने उसकी गोलाइयों को अलग किया और इस बार उसे अपनी गांड में कुछ गीला सा अंदर जाते हुए अनुभव हुआ.

अनिल को गांड से बहुत प्रेम था. घर में उसे इसके इस प्रेम के लिए छेड़ते थे. दादी, माँ, भाभी, बुआ और काव्या सब उसके इस व्यसन से अवगत थे और उसे अपनी इच्छा पूरी करने का पर्याप्त अवसर देते थे. अब ऐसा नहीं कि उसे चूत से लगाव नहीं था, पर उसे स्त्री के नितम्बों की गोलियां बहुत आकर्षित करती थीं. वो उन्हें सहलाये, चाटे और चूमे बिना नहीं रह पाता था.

और इस समय उसकी होंठ अपनी दादी की गांड के चारों ओर घूमते हुए चूमने का काम कर रहे थे और उसकी जीभ उन स्थानों को चाटने का. पर ये सब उसके सामने धूमिल हो गया जब वो अपनी दादी की गांड के भूरे छेद पर पहुंचा. गोल गांड के बीच का ये भूरा छेद उसकी अनेक कल्पनाओं का मुख्य बिंदु था. उसने अपनी जीभ से उसे चाटना आरम्भ किया. गांड के दोनों ओर हाथों से उसे फैलाया जिससे वो छेद खुलकर उसके सामने आ गया. और उसकी जीभ ने बिना विचार किये उसमे प्रवेश कर लिया.

सरिता ने जब अनिल की जीभ को अपनी गांड में सरकता हुआ अनुभव किया तो उसकी चूत अनुज के मुंह में ढेर सा पानी छोड़ बैठी. अनिल के मुंह में जो गया सो गया, शेष उसके चेहरे पर बिखर गया. सरिता के पाँव काँपने लगे और अगर उसे अनुज न संभालता तो वो गिर ही पड़ती.

“दादी, आप घोड़ी बन जाओ, फिर अनिल सहजता से आपकी गांड चाट पायेगा. मैं आपके नीचे आ जाऊंगा.” अनुज ने कहा.

सरिता को भी ये आसन सरल लगता था. जल्दी ही तीनों ने अपना स्थान लिया और अनुज की जीभ सरिता की चूत में प्रवेश कर गयी. ऊपर अनिल ने ललचाते हुए दादी की गांड फैलाई और अपनी जीभ से उसे अंदर तक चाटने लगा. सरिता इस समय अपनी कमान्धता के उस पड़ाव पर थी जहाँ से उसका केवल ऊपर ही जाना सम्भव था. जब दोनों भाइयों को लगा कि दादी के दोनों छेद अगले चरण के लिए उपयुक्त हो चुके हैं तो अनिल ने अनुज से कहा कि आगे बढ़ते हैं.

सरिता को उसी स्थिति में छोड़कर अनुज ने नीचे अपना स्थान बदला और अब उसके मुंह के स्थान पर उसका लंड सरिता की चूत के सामने था.

“दादी, आओ, चढ़ जाओ और मौज करो.” अनुज ने कहा.
“शैतान, दादी की चुदाई करता है बेशर्म और कहता है मौज करो.” सरिता ने ठिठोली में कहा और फिर अपनी चूत को अनुज के लंड पर उतार दिया.

कई वर्षों तक बंद रहने के बाद सरिता की चूत और गांड वैसे तो खुल गए थे, पर अभी भी इतने तंग थे कि उसे इस बार भी अपनी चूत में कुछ कष्ट हुआ. पर वो बिना उसकी चिंता किये हुए अपने कूल्हे तब तक नीचे करती रही जब तक कि अनुज का पूरा लौड़ा उसकी चूत में नहीं समा गया. लंड अंदर लेकर वो रुक गयी. उसकी चूत में हो रहे स्पंदन और लंड के समान स्पंदन का वो आभास कर पा रही थी. उसने अपनी गांड हल्के से उछालकर अनुज से चुदना आरम्भ किया. उसे पता था कि उसे बस कुछ ही क्षणों का व्यायाम मिलगा, उसके बाद तो उसके दोनों पोते ही कमान संभालेंगे।

“दादी, खेला होबे?” अनुज ने आज के प्रसंग में चल रहे एक प्रचलित मुहावरे का उपयोग किया तो सबकी हंसी छूट गयी. अनुज के लंड पर उछलती हुई सरिता हँसी से दोहरी हो गयी.

“होबे होबे, भीषण खेला होबे.” सरिता के इस उत्तर पर सभी हँसते रहे.

“भैया, दादी भीषण खेला बोली हैं, तो आप क्या सोचते हो?” अनिल ने पूछा.
“वही जो गंदगी तेरे मन में है, मेरे भी मन में है.” अनुज ने उत्तर दिया.

“ए बच्चों, मुझसे भी तो पूछो.” सरिता ने रूठने का अभिनय किया। उसने उछलना बंद करने का नाटक किया तो अनुज नीचे से उसकी चूत में लंड पेलने लगा.

“अरे दादी, अपने हमें कभी कुछ मना किया है जो पूछने की आवश्यकता पड़ेगी. जो लेना है, वो हम ले लेंगे और आपको भी जो देना है वो भी दे ही देंगे, क्यों अनिल?” अनुज ने अपने लंड के धक्के सरिता की चूत में लगते हुए अनिल से पूछा.

“बिलकुल भैया, दादी, भाभी और मम्मी से हम जो लेते हैं उससे दुगना देते भी हैं. जैसे अभी हम करने वाले हैं.”

सरिता समझ गयी कि अब उसकी भीषण चुदाई का समय आ चुका है और अब उसके बचने की कोई संभावना नहीं है. उसने अपनी पीठ पर अनिल का हाथ अनुभव किया और उसे आगे की ओर झुका दिया. सरिता के ढलते हुए मम्मे अनुज के मुंह के सामने झूलने लगे तो अनुज ने उन्हें मुंह में लेने का असफल प्रयास किया. फिर उसने अपने दोनों हाथ सरिता की पीठ पर किये और हाथ जोड़ते हुए उसे अपने पाश में ले लिया. सरिता वैसे भी खिन भागने वाली तो थी नहीं, पर अनुज चाहता था कि अनिल को गांड साफ और खुली मिले.

सरिता ने अपनी साँस रोक ली. जब से उसके पोतों से उसे अपनी वासना का शिकार बनाया था, तब से दोनों उसे जब चाहते तब रगड़ देते थे. डबल चुदाई कम ही होती थी, पर जब होती तो सरिता की आत्मा काँप जाती थी. पर उसकी आयु का कोई भी विचार किये बिना दोनों उसे बेदर्दी से चोदते थे. अविका ने उन्हें एक बार समझाया भी था, पर उनमें कोई अंतर नहीं पड़ा. और आज फिर उसे वही दोहरी चुदाई का अमंद मिलने वाला था. सरिता ने कभी कहा नहीं पर मन ही मन उसे दोहरी चुदाई में अधिक आनंद आता था. जब उसने अविका को कहा कि वो अनुज और अनिल को मना न करे, तो अविका ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था.

सरिता को अनुज ने जकड़ा हुआ था. अनिल दादी के पीछे गया और फिर दो तीन मिनट तक उसकी गांड चाटी और अंदर तक थूक से तर कर दी. खुलती पिचकती गांड समझ नहीं पाई कि अभी उसके फटने का समय आ चुका है. अनिल ने अपने लंड पर थोड़ा थूक लगाया और फिर सरिता की गांड के छेद पर लंड लगाया.

“भैया, खेला चालू!” ये कहते ही अनिल ने लंड का सुपाड़ा गांड में धकेल दिया. सरिता के शरीर में पीड़ा की लहर दौड़ गयी. उसने अपनी चीख दबाने के लिए अनुज के होंठों पर एक चुम्बन दिया और दोनों के होंठ मिले रहे. पीछे अनिल अपने लंड को सरिता की गांड में डालता रहा जब तक कि उसके टट्टे सरिता की गांड से नहीं टकरा गए. अब सरिता की चूत और गांड दोनों में लंड घुसे पड़े थे. तीनों इसी अवस्था में रुके रहे.

सरिता को अपनी चूत और गांड में डले लंड जैसे फुदकते हुए लग रहे थे. ये अनुभव अनमोल था और उसके लिए केवल कुछ ही दिन पुराना था. उसने अपने जीवन के इस पड़ाव में आकर ये सुख प्राप्त किया था इसकी उसे ख़ुशी थी. अनुज ने अपने लंड को पहले चलना आरम्भ किया. चूत में चलते लंड के घर्षण से सरिता के शरीर में आनंद की लहर दौड़ गयी. कुछ ही पल बाद उसे अपनी गांड में भी अनिल के लंड के अंदर बाहर जाने का आभास हुआ. उसने अपनी आँखें बंद करते हुए आने वाली भूषण चुदाई के लिए स्वयं को एकत्रित किया. दोनों भाई एक अच्छी ताल में अब अपनी दादी की चूत और गांड में हल चला रहे थे. हल्की धीमी गति से प्रारम्भ हुई इस चुदाई ने सरिता को असीमित सुख के निकट लाया ही था कि दोनों भाइयों ने गति बढ़ा दी.

अब उनके लंड बिना तालमेल के अपने ही ढंग से उसकी चूत और गांड का मर्दन कर रहे थे. कुछ देर की हल्की पीड़ा के उपरांत सरिता को भी आनंद का अनुभव होने लगा. पर वो उस शीर्ष से बहुत दूर थी जहाँ उसके पोते उसे कई बार ले जा चुके थे. इसके पहले सरिता की चुदाई से अधिक उसके साथ प्रेम किया जाता रहा था. उसके पति बहुत ही प्रेम भाव से उसकी चुदाई करते थे. और तो और उन्होंने कभी उसकी गांड को छुआ भी न था. अनिल को जब अपनी दादी की कोरी गांड का उपहार मिला था तो वो जैसे पागल ही हो गया था. उसने सरिता की गांड को घंटों तक चूमा और चाटा था.

पर आज वही लंड उसकी गांड की माँ चोद रहा था. अनुज और अनिल के बेतुके तालमेल के कारण सरिता को इस चुदाई में विलक्षण आनंद आ रहा था. और दोनों भाई अपनी पूरी गति और लम्बाई से अपनी दादी के दोनों छेद मथने में लगे थे. सरिता की आँखें उबलकर बाहर आ रही थीं और अब वो उस शीर्ष की ओर अग्रसर हो रही थी जो इन भाइयों के ही द्वारा सम्भव था. उसके मुंह से निकलने वाली चीखों को सुनने वाला कोई न था, सिवाय इस कमरे के सन्नाटे के. और अगर कोई था भी तो वो सब या तो सोये थे या उसके बेटे भानु के समान बाहर थे.

सरिता का गला चीखते चीखते अब सूखने को आया था, पर अनुज और अनिल की चुदाई में कोई ढील नहीं आयी थी. सरिता भी जानती थी कि ये जवान लड़के बहुत देर तक चोदने में सक्षम थे. उसने उन्हें अपनी बहू अविका और उसकी बहू पल्लवी को भी चोदते हुए देखा था. बिना दया भाव के ऐसे चोदते हैं कि किसी भी मनुष्य का मन द्रवित हो उठे. अब लम्बे और गहरे धक्कों से सरिता के दोनों छेद खुल कर मजा ले रहे थे. सरिता झड़ी थी या नहीं ये अब उसे पता नहीं था, पर वो आनंद की लहरों में कई बार ऊपर और नीचे हुई थी. सम्भव था कि झड़ी भी थी.

अनिल के लंड ने सबसे पहले अपना पानी छोड़ा. सरिता को अपनी जलती हुई गांड में जब उसके पानी की सिंचाई का आभास हुआ तो लगा जैसे ठंडक पद गयी हो. अनिल झड़ने के पश्चात् भी कुछ देर तक उसकी गांड मारता ही रहा, जब तक कि उसके लंड ने झुककर अपने आप को सिकोड़ लिया. आधे मन से अनिल ने अपने मुरझाते हुए लंड को बाहर निकाला और कुछ सोचते हुए दादी के मुंह की ओर बढ़ा.

“उन्हें छोड़ दो, मुझे दो.” ये सुनकर मुड़ा तो अपनी माँ अविका को खड़ा पाया. अविका साथ पड़े सोफे पर धम्म से बैठ गयी. अनिल ने ख़ुशी से उनके आगे खड़े होकर उसके मुंहे में अपना लंड दे दिया. अविका ने प्रेम से उसे पुचकारते हुए चाटा और साफ कर दिया.

“इसके लिए नहीं थके थे तुम दोनों?” अविका ने क्रोधित होने का अभिनय किया.

अनिल हंस पड़ा पर कुछ बोला नहीं, वो भी अपनी माँ के पास जाकर बैठ गया. अविका अभी भी गाउन में ही थी. दोनों सरिता की चुदाई के अंतिम क्षणों को देख रहे थे. सरिता काँपते हुए अनुज के सीने पर ढह गयी. अनुज ने कुछ धक्के और मारे और उसकी चूत में अपना रस छोड़ दिया. सरिता यूँ ही उसके सीने से चिपकी रही. जब अनुज का लंड उसकी चूत से निकला तब वो उसके ऊपर से हटी और एक ओर लुढ़क गयी. अविका ने अनुज को अपनी पास बुलाया. अनुज उठकर धीरे धीरे उसके पास आया. उसके पाँव अभी भी काँप रहे थे. अविका ने उसके लंड को भी चाटकर साफ किया और बिस्तर पर फैली हुई अपनी सास को देखा जो अब निढाल पड़ी थी.

“थोड़ी दया किया करो अपनी दादी पर, देखो कैसी मरणासन्न सी हो गयी हैं.” अविका ने दोनों बेटों को समझाया।

तभी सरिता ने अपना एक हाथ उठाकर हिलाया. अविका उनके पास गयी तो सरिता ने उसकी आँखों में देखकर बोला, “क्या उलटी सीधी पट्टी पढ़ा रही है मेरे पोतों को. ऐसी चुदाई में ही अब शांति मिलती है मुझे. ये जैसे भी चाहें मुझे चोदें, तू बीच में न पड़ना.”

अविका हंसकर बोली, “ठीक है माँ जी. मैं नहीं बोलूंगी. और अब तो आपकी सेवा के लिए चार और लौड़े अपने आप को तैयार कर रहे हैं. आपकी तो चांदी होने वाली है.”

“मुझे लगता है कि मुझे कपड़े लेकर जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.” सरिता ने ये कहते हुए आँख बंद करीं और पल भर में ही सो गयी. अविका ने उसकी चूत और गांड से बहते हुए सफेद रस को देखा और मन को मनाकर उसे पीने से स्वयं को रोका. अनुज और अनिल भी अब कपड़े पहन चुके थे. अविका ने अपनी सास को एक चादर ओढ़ाई और अपने बेटों को लेकर कमरे से चली गई. जाते हुए उसने कमरा बंद कर दिया.

“पल्लू कहाँ है” अनुज को अब अपनी पत्नी का ध्यान आया.
“चाय बना रही है. अभी उठी ही है.” अविका ने कहा.
“और पापा?”
“वो ठेकेदार के पास गए हैं, एक घंटे में आ जायेंगे.”
“कुछ देर ठहर जाते तो वो भी कुछ देर आराम कर लेते.”

अविका ने उनकी ओर देखा, “वो दाम नए सिरे से तय करने गए हैं. समझे.”

अनुज और अनिल के मुंह से निकला, “ओह तेरी.”

पल्ल्वी चाय ले आयी और सब बैठकर चाय पीने लगे.

क्रमशः
 
Last edited:
Top