Update:-70
अभी सब एक दूसरे को सवालिया नजरों से देख ही रहे थे कि हॉस्पिटल से कॉल आया। यह कॉल पार्थ का था, अपस्यु की खबर देते हुए उसने सबको तुरंत हॉस्पिटल पहुंचने के लिए बोला….
कोई समझ नहीं पा रहा था कि हुआ क्या है? नंदनी तो अलग ही डर के शाये में चली गई, उन्हें अपस्यु की बातें याद आने लगी, "हमारे परिवार कुछ कातिल यहां है।".. एक अनचाहा डर की कहीं उन कातिलों में से किसी को अपस्यु के बारे में पता तो नहीं चल गया, जिसने अपस्यु के साथ कुछ बहुत ही बुरा किया हो।
नंदनी सदमे से धम्म से गिरी। सभी लोग नंदनी के ओर दौड़े, उन्हें संभला और होश में लाने की कोशिश करने लगे। इधर सभी लोग नंदनी को संभालने में लगे हुए थे, उधर कुंजल गुस्से में निकली और सीधा कबीर के कमरे का दरवाजा खटखटाने लगी। वो भी देर रात सोया था, नींद में ही उसने दरवाजा खोला, और दरवाजे पर कुंजल को देखकर उसे कहने लगा… "तू है, क्या चाहिए।"
कुंजल पर गुस्सा पहले से सवार था, उसने दरवाजे पर जोड़ की एक लात मारी और पूरा दरवाजा खुल गया। दरवाजा तेज से खुलने के कारन कबीर के पाऊं में चोट लगी और वो तेज दर्द में चिल्लाते हुए कुंजल के कंधे को पीछे से पकड़ा।
कुंजल अपने हाथ कंधे तक लाती उसके उंगली को पकड़ी और तेजी से मुड़ते हुई, उसके पकड़ में आयी उंगलियों को उल्टा घुमा कर तोड़ दी। फिर नजर ईधर-उधर दौड़ाती हुई उसे मारने के लिए कोई हथियार ढूंढ़ने लगी। पास में ही पर्दे के ऊपर रोड लगा हुआ था। कुंजल उसे तेजी के साथ निकाली और पहले तो दरवाजा बंद की, फिर कबीर के पाऊं पर इतना तेज मारी की वो जहां था वहीं बैठ गया।
कबीर जैसे ही बैठा, उसे एक लात मारकर कुंजल ने लिटाया और जो ही उसके पीठ को उधेड़ी वो, अपनी चैरिटी में उसने फिर कोई कसर नहीं छोड़ी। कुंजल रोड वहीं पटकती हुई उसे कहने लगी…. "अभी सिर्फ शक है कि कल रात तुमने कुछ ऐसा किया कि मेरा भाई अभी हॉस्पिटल में है। मेरे दोनों भाई केवल परिवार और रिश्तों का लिहाज करके तुझे छोड़ते आ रहे है, लेकिन मै आरव या अपस्यु नहीं हूं। एक बार यदि मुझे पता चला ना की तेरे वजह से मेरा भाई हॉस्पिटल में है तब तो तू सोच लेना, आज बंद कमरे में मारी हूं, बाद में जहां मिलेगा वहां मारूंगी मारकर हॉस्पिटल भी खुद ही पहुंचाऊंगी और जब तू ठीक होकर आएगा तो फिर मारकर तुझे हॉस्पिटल में एडमिट करवाऊंगी।"
कुंजल बड़े गुस्से में वहां से निकली और वापस कमरे में आ चुकी थी। नंदनी पर छींटे मारकर उसे जगाया गया। जैसे ही वो जागी अपने बेटे को देखने के लिए छटपटा गई। लगभग रोई सी आवाज़ में वो जल्दी से अपने बेटे के पास ले चलने की विनती करने लगी। जो जिस हाल में थे, वैसे ही वहां से भागे-भागे निकले। पार्थ के दिए हुए पते पर सभी पहुंचे।
तेजी के साथ भागते हुए सभी अंदर पहुंचे।अंदर पहुंचकर जैसे ही थोड़ा आगे बढ़े, अचानक ही आरव के कदम रुके। 2 कदम अभी ऐमी और स्वस्तिका भी बढ़े थे कि वो दोनों भी जहां थे वहीं रुके…. "कुंजल, मां, आप दोनों जहां है वहीं रुको।".. आरव वहां के माहौल का चारो ओर से जायजा लेते हुए कहने लगा।
नंदनी और कुंजल पीछे मुड़ कर जिज्ञासावश पूछने लगी… "कहां है सोनू (अपस्यु)"…
स्वस्तिका:- आप समझी नहीं यह एक जाल है, हमे फंसाया गया है, आप दोनों हमारे पीछे आ जाइए।
कुंजल:- क्या कुछ ऐसा है जो हम सीधे-सीधे समझ जाए या फिर ज़िन्दगी हमारी पजल सॉल्व करने में ही बीत जाएगी।
आरव:- मां, कुंजल.. अपस्यु बिल्कुल ठीक है, इसलिए दोनों अपना चिंतन छोड़ दीजिए। अब ये सब क्यों हो रहा है उसका इकलौती वजह वो पार्थ है, अंत में ही पता चलेगा वो ऐसा कर क्यों रहा है?..
"यहां जो दिखता है, मात्र एक भ्रम है, अभी एक पल में कोई पास है, तो अगले पल ना जाने कहां।"….. आरव, नंदनी और कुंजल से बात कर ही रहा था, इसी बीच उस जगह की रौशनी चली गई और उस जगह पर ये बातें गूंजने लगी। आवाज़ गूंजना बंद हुआ और पास में ही एक लड़के की इमेज उभरी जो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा…
सभी लोग उस उस इमेज के पीछे चल दिए और आगे अंधेरा ही अंधेरा था। किसी को कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, बस एक दूसरे को सुन रहे थे। तभी उस जगह एक फोकस लाइट जली…. जो सीधा स्वस्तिका के ऊपर थी।
"मिलिए हमारे बीच की सबसे खूबसूरत और प्यारी सी लड़की से, जिससे आप जितनी बार भी मिलो कुछ नया देखने जरूर मिलेगा। मासूम लेकिन खतरनाक, जिद्दी लेकिन तय ना कर सको की जिद भी किया इसने, मोस्ट फैशनेबल लेकिन कभी सजती संवरती नहीं.. मिलिए हमारी बर्थडे गर्ल …. स्वस्तिका से।"…
बैकग्राउंड से इतना चलने के बाद वहां पूरी रौशनी हुई। हैप्पी बर्थडे का म्यूज़िक बजता हुआ, ठीक सामने पार्थ और अपस्यु जो खड़ा-खड़ा मुस्कुरा रहा था। स्वस्तिका दोनों के सरप्राइज पर मुस्कुराती हुई सबको देख रही थी और सभी लोग उसे घेर कर बधाइयां देने लगे। दीप जले, केक कटा, सबने खूब सेलीब्रेट किया और जब सब खुशियां बांटा जा रहा था उसी बीच नंदनी पार्थ के पास पहुंची।
पार्थ नंदनी को देखते ही उसके पाऊं छु लिए और दोनों कान पकड़ कर माफी भी मांगा। नंदनी उसे इशारों में थोड़ा नीचे झुकने कहीं, जैसे ही वो नीचे हुआ… एक थप्पड उसे चिपका दी। उसकी हालत देखकर सब हंसने लगे…. फिर सब जोर जोर से चिल्लाने लगा.. कल रात का सबसे बड़ा मुजरिम अभी बाकी है…
फिर क्या था नंदनी उसका स्वागत भी उसी अंदाज़ में कि। इतने थप्पड अपस्यु को आज तक कभी एक साथ नहीं पड़े थे। वहां जैसे एक परिवार, पूरा हो रहा था। सब लोग आपस में मिल रहे थे, गले लगकर खुशियां बांट रहे थे। पूरा दिन सभी लोग बाहर ही रहे। पूरा परिवार एक होकर आज स्वस्तिका के लिए खुशियां माना रहा था। सबके बीच आज वही स्पेशल गर्ल बनी हुई थी।
शाम के 4 बजे सभी लोग वापस आए। वापस आने के क्रम में ही ध्रुव का संदेश अपस्यु को मिला जिसमें उसे और ऐमी को शाम का खास आमंत्रण मिला हुआ था। ठीक यही संदेश ऐमी के पास भी पहुंचा हुआ था।.. खैर दोनों ही ये संदेश देखकर बिना किसी प्रतिक्रिया के सभी के साथ वापस लौट गए।
सभी रात देर से सोए थे और सुबह जल्दी ही उठकर निकले, सब लोग थकान में चूर अपने अपने कमरे में चले गए सोने। शाम को तकरीबन 7 बजे ऐमी उठकर बिल्कुल कातिलाना अंदाज में तैयार होने लगी, जब वो आधी तैयार हुई थी तभी कुंजल उसके कंधे के ऊपर लटकती हुई कहने लगी… "कहीं बाहर जा रही हो क्या?"..
ऐमी:- हां बाहर तो जा रही हूं, लेकिन इतना चहक कर मेरे पास खड़ी हुई और सिर्फ इतना सा सवाल तुम्हारे मन में कैसे?
कुंजल:- ठीक है मै सीधा-सीधा कह देती हूं। तुम में मुझे अपनी भाभी नजर आ रही है, और मुझे कुछ नहीं समझना कि तुम दोनों दुनिया को क्या बताते हो।
ऐमी, कुंजल की बात पर मुस्कुराती हुई अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की और तुरंत ही तैयार होकर अपस्यु के पास निकल गई। लॉबी के आधे रास्ते में ही थी कि अपस्यु भी तैयार होकर उसी के पास आ रहा था। दोनों एक दूसरे को दूर से ही देखकर हसने लगे और ध्रुव के घर निकल लिए।
ऐमी के जाते ही कुंजल भी थोड़ा बहुत तैयार हुई और वो स्वस्तिका को सोते छोड़कर आरव के कमरे में चली आयी। आरव अब तक सोया हुआ था, वो अपने भाई को एक नजर देखी और उसे भी सोते हुए छोड़कर वीरभद्र के कमरे में चली आयी।
कुंजल:- क्या वीरे जी, क्या कर रहे है।
वीरभद्र:- कुछ नहीं बस ऐसे ही बैठा हुआ था, आप सब आज सुबह से कहां गए थे।?
कुंजल:- मेरी बहन का आज बर्थडे है, वही सुबह से सेलीब्रेट कर रहे थे।
वीरभद्र:- ओह ! और मुझे छोड़ गए.. यहां मै पूरा दिन ऊब गया बैठे-बैठे, कोई काम ही नहीं था।
कुंजल:- सॉरी वीरे जी, वो भाई ने ऐसा सरप्राइज प्लान किया था कि हमलोग बिना प्लान के ही निकाल गए होटल से। वैसे कोई बात नहीं है जी, आप दिन भर बोर हुए लेकिन शाम आप की हसीन होगी। चलिए..
वीरभद्र:- कहां चलना है?
कुंजल:- आप सवाल बहुत करते है वीरे जी, अब जल्दी से तैयार होते है या फिर मै नाराज हो जाऊं आपसे।
वीरभद्र:- तैयार ही तो हूं, अब और कितना तैयार हो जाऊं।
कुंजल वीरभद्र के साथ बार में चली आयी। बार को देखकर ही वीरभद्र को चक्कर आने शुरू हो गए, वो घबराकर कुंजल से पूछने लगा… "कुंजल जी, सुबह का भूल गई, जो यहां आयी है।"
कुंजल:- अरे घबरा क्यों रहे है वीरे जी, अभी सिर्फ 7.30 बजे है, 3-4 घंटे में तो पूरा नशा ही उतर आना है।
वीरभद्र:- एक बात मै सच सच कहना चाहूंगा, मैंने आज से पहले इतनी खतरनाक लड़की से पहले कभी नहीं मिला।
कुंजल:- अच्छा, ऐसा है क्या? तो जरा बताइए किस तरह की लड़कियों से आज तक आपकी मुलाकात हुई है।
वीरभद्र:- आप को छोड़कर मेरी मां, मेरी बहन और गांव की कुछ लड़कियां बस।
कुंजल:- "हीहीहीहीहीही… ऐसी बात है क्या? अच्छा ये बताइए की वो लड़की कैसी लग रही है।"… कुंजल सामने एक हॉट लड़की के ओर इशारे करती हुई पूछने लगी।
वीरभद्र थोड़ा शर्माते हुए… "क्या कुंजल जी आप भी ना"…
कुंजल:- अरे इतना शर्मा क्यों रहे है, थोड़ा मर्दों वाली फीलिंग लाइए…
"और मर्दाना जोश भी इसे दिखाओ, कोई मिल नहीं रहा तो छटपटा रही है।"… कबीर दोनों के बीच दखलंदाजी करते हुए कहने लगा…
वीरभद्र उसकी बदतमीजियों पर आग बबूला होता अपनी जगह से उठकर उसकी ओर बढ़ा ही था… "बैठ जाओ वीरे जी, इसकी कुटाई आज मैंने की है, उसी का भड़ास निकल रहा है, एक लड़की से पीटा है, किसी तरह भड़ास तो निकलेगा ही।"
वीरभद्र:- हाहाहाहा.. ओह ऐसी बात है क्या, वैसे कुंजल जी खातिरदारी पूरी तरह की या कुछ कमी रहा गई थी?
कुंजल:- इसकी बहनों के वजह से छोड़ दी वीरे जी, वरना खातिरदारी में तो कोई कमी नहीं छोड़ने वाली थी। वैसे भी इसके जगह पर, इसी में घर में घुस कर मैंने इसे मारा है वीरे जी, अब इससे ज्यादा और क्या मै और क्या हाईलाइट बताऊं। लगता है थोड़ा कम मार खाया था, इसलिए ऐसी छिछोड़ी हरकत पर उतारू है।
कबीर:- तुझे तो मै वो सबक सिखाऊंगा की तू भी क्या याद रखेगी?
वीरभद्र:- सुन बे छिपकली की कटी हुई दुम, ज्यादा फड़फड़ा नहीं। तू सबक सीखाने की सोचने से पहले जरा इनके बैकग्राउंड का इतिहास उलट लेना। जब इनकी मां ने दहरा था तब तेरा बाप की घिघी नहीं निकली थी। कुंजल जी ने तेरे घर में घुस कर मारा। अभी तो तूने केवल औरतों का जलवा देखा है तो बिलबिला गया, कहीं इसके भाई ने तुझे सीरियसली ले लिया ना, फिर तू खुद को कोसेगा "की मैंने अपने बड़बोलेपन के कारन ये क्या कर दिया।" अब इससे पहले कि मेरा माथा घूम जाए और मै भूल जाऊं की तू आरव का कोई रिश्तेदार है कट ले यहां से।
कुंजल सिटी बजती हुई कहने लगी… "लव यू वीरे जी क्या डायलॉग मारा है। अब बस भी करो, वरना डर के मारे कहीं इसकी सूसू ना निकल आए।
दोनों कबीर पर हंसते हुए लगातार तंज कसे जा रहे थे। कबीर एक बात बोलता और दोनों मिलकर उसे छिल देते। इस शित युद्ध में तो कबीर कहीं दूर-दूर तक खड़ा ना हुआ इन दोनों के सामने और ऐसी भारी बेइज्जती दोनों ने कर डाली कि कबीर बिलबिला कर वहां से भाग गया।
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इधर कुंजल जब आरव के कमरे से निकली, उसके कुछ देर बाद ही लावणी चुपके से आरव के कमरे में दाखिल हुई। आरव वहां अकेला लेटा हुआ था। लावणी उसे सोते देख, वो भी उसके पास जाकर लेट गई और अपना चेहरा बिल्कुल आरव के चेहरे के सामने रखकर, उसे सुकून से सोते हुए देखने लगी।
बहुत दिलकश और मासूम लग रहा था आरव। आरव के सकून से सोने को मेहसूस करती हुई लावणी अपनी उंगलियां उसके चेहरे पर चलाने लगी। उंगलियों के स्पर्श से अराव की आखें खुल गई, और अपने नजरों के सामने अपने कम्बल में लावणी को देखकर, उसने अपनी पलकें 2 बार झपकी, और उसे प्यार से देखते हुए मुस्कुराने लगा। लावणी भी खामोशी से उसे देखती हुई प्रतिक्रिया में मुस्कुरा रही थी। आरव मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में "आई लव यू" कहकर उसके चेहरे पर अपनी उंगलियां चलाने लगा।
लावणी के गुदगुदाते अरमान, और वो खिलकर कुछ पल के लिए हंसी। हंसती हुई वो अचानक ही खामोश हो गई और ध्यान से आरव का चेहरा देखती हुई, उसके होंठ पर अपने होंठ रख उसे प्यार से चूमने लगी। आरव भी उसे चूमते हुए अपने हाथ और पाऊं के बंधन में उसे जकड़ते हुए, धीरे-धीरे पकड़ बनाने लगा। "आऊच! ऐसे कौन करता है।"… लावणी आरव की जकड़ में कसमसाती, किस्स को तोड़ती हुई अपनी आखें दिखाती उसे डांटने लगी।
आरव अपने बंधन खोलते उसके होंठों पर किस्स करते हुए अपने हाथ उसके पीछे रखते, उसके नितम्बों को अपने हाथों से जकड़ दिया। लावणी फिर से किस्स तोड़ती हुई उस घूरने लगी… "ये आज चल क्या रहा है, हां।"..
आरव:- ऑफ ओ.. जो भी कहना है वो किस्स करती हुई कहो, ऐसे अधूरे किस्स में मज़ा नहीं आता।
लावणी:- अच्छा जी, होटों के लिए किस्स और हाथों के लिए बम.. बहुत मस्ती चढ़ी है हां…
आरव बिना कुछ बोले कम्बल के अंदर जाकर, उसके गले के नीचे चूमने लगा और अपना हाथ उसके टी शर्ट के अंदर डालकर लावणी के पेट पर अपने हाथ फेरते, धीरे-धीरे हाथ ऊपर ले जाते.. ब्रा को छू रहा था…. "इशशशशशश… बेबी नो.. प्लीज … छोड़ो भी…"
आरव रुका और उसके ऊपर आकर उसकी आखों में देखते हुए कहने लगा…. "ओह बेबी येस.. आज मै नहीं रुकने वाला।"… इतना कहकर अपना चेहरा उसके सीने में घुसा कर उसे चूमने लगा…. "हीहीहीही.. छोड़ो भी आरव कोई आ जायेगा… उफ्फ … आरव नो.. हटो भी बाबा.. कोई आ जाएगा.. दरवाजा खुला है… आरव.. आरव…"
अचानक ही लावणी उसे तेज तेज हिलाती, हुई कहने लगी… बेबी रुको भी कोई बेल बजा रहा… ऑफ ओ.. आरव स्टॉप एंड लिसेन।" .. लावणी थोड़ा तेज बोली और आरव रुकते हुए उसके ऊपर आया और गुस्से से अभी उसको देख ही रहा था, कि इतने में दरवाजा खुला और नंदनी अंदर… "कब से बेल बजा रही हूं तू दरवाजा क्यों नहीं खोल रहा।"… दरवाजा खुलने के आवाज़ के साथ ही लावणी कम्बल के अन्दर घुस गई और आरव करवट लेकर पलटा और नंदनी के ओर देखने लगा….