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Romance भंवर (पूर्ण)

nain11ster

Prime
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Update:-57



साची और ध्रुव को ऐसे हंसकर बातें करते हुए देख सभी लोगों के ख्यालों में ऐसा गलतफहमी का बीज उगा की दोनों की कुंडलियां बदलते हुए कहने लगे… "लगता है दोनों ने एक दूसरे को पसंद करना शुरू कर दिया है… हम भी कुंडलियां मिला ही लेते है।"…

रात के वक़्त दोनों बहने अपने रूम में थी। लावणी साची के पास बैठकर उसे देखती हुई, आज शाम की हुई घटना को बताने लगी। आश्चर्य तो उसे तब हो गया जब साची ने उसे ये कहा कि उसे सारी बातें पहले से पता थी। बस एक लड़के मिलना था.. सो वो मिल ली, अब वक़्त बताएगा की वो पसंद आता है कि नहीं, वैसे लगता है पसंद आ ही जाएगा।

साची की बात पर लावणी को यकीन नहीं हुआ और वो बार-बार यही कहती रही की आप हर काम में जल्दबाजी करने लग जाती है। इसपर साची उसे समझाती हुई कहने लगी….. "ब्वॉयफ्रैंड तो 10 मिल जाएंगे, जीवन साथी एक ही होता है। हां थोड़ा खिंचाव था अपस्यु को लेकर, कोई बात नहीं। ध्रुव को भी वक़्त दूंगी, झुकाव उस ओर भी हो ही जायेगा"

लावणी:- और यदि इसका भी पहले से कोई चक्कर हुआ तो?

"ये कम से कम उस गधे अपस्यु की तरह बताने तो नहीं आएगा। और जिसे ना देखा और ना सुना उसके बारे में क्या सोचना। वैसे भी आज शाम को ही आरव ने मुझे बताया था.. अच्छे लोग ज्यादा दर्द देते है। मैंने उसकी बात पर गौर किया और पाया कि वो सच बोल रहा था।"…

फिर जब एक बार अराव की बात शुरू हुई तब तो साची ने लावणी को घेर ही लिया। सोने तक में तो साची ने लावणी को लगभग रुला ही दिया। सुबह उठकर दोनों बहन तैयार हुई और नाश्ते के बाद वो दोनों पहुंची कमरा नंबर 806 में। आरव अपने कमरे में बैठा टॉम एंड जेरी का मज़ा ले रहा था, तभी उसके रूम की बेल बजी और दरवाजा खोला तो दोनों बहने बाहर खड़ी थी।

आरव और लावणी ने जब एक दूसरे को देखा, तो एक दूसरे से लिपटने को मचल गए, लेकिन साथ में साची थी, कुछ किया भी नही जा सकता था। दोनों अंदर आते हुई बैठी और साची आरव के ओर देखती हुई अपनी भौंहें चढ़ा कर लावणी के ओर इशारा करने लगी… आरव अपने हाथ जोड़कर साची के पाऊं में सीधा दंडवत हो गया… साची उसे आशीर्वाद देती कहने लगी… "खुश रहो बच्चा।"..

तीनों के बीच बातें शुरू हुई। यूं तो बात तीनों ही कर रहे थे, लेकिन ध्यान दोनों का एक दूसरे पर ही था जिनके बीच साची कुंडली मार कर बैठ चुकी थी। कुछ देर बात करने के बाद साची ने अचानक ही कुंजल को कॉल लगाने के लिए बोल दी…

आरव उसे कॉल लगाते हुए साची को फोन थामा दिया…. "हां मोनू…"

"मोनू नहीं साची बोल रही हूं। किधर हो अभी तुम"..

कुंजल:- न्यूयॉर्क आयी हूं साची। बाय द वे, हैप्पी हॉलीडे..

साची:- अच्छा हैप्पी हॉलीडे, इसलिए कामिनी अकेली भाग गई घूमने, सोची यहां रहोगी तो कहीं मेरा मेलोड्रामा ना झेलनी पड़े।

कुंजल:- ना रे बाबा, तुम्हारा बिल्कुल सोचना गलत है। मै यहां पहले आयी थी तो विन्नी और क्रिश के साथ न्यूयॉर्क पहुंच गई मस्ती करने।

साची:- बहुत मस्ती हो गई चल अब वापस आ जाओ। मेरे किसी दोस्त का यहां ना होना मुझे खल रहा हैं।

कुंजल:- क्या हुआ फिर किसी बात को लेकर परेशान हो क्या?

साची:- हां बहुत बड़ी परेशानी है। मैंने एक लड़का पसंद किया है और बस ऐसे वक़्त में एक दोस्त के सहारे की बहुत जरूरत है। अब हर बात हर किसी से शेयर तो नहीं कर सकती ना।

कुंजल:- ओहके डार्लिंग, आज भर यहां मस्ती मार लेने दे कल सुबह मिलती हूं।

कुंजल से बात समाप्त करके जब साची कमरे के कोने से पीछे मुड़ी… एकदम ध्यान मुद्रा में दोनों बिस्तर पर बैठे बैठे ऐसे गले लगे थे, मानो एक दूसरे से लिपट कर वहीं सो रहे हो। साची गले की खराश के साथ दोनों का ध्यान भंग करती अपनी आखें दिखाने लगी… और इधर दोनों ही शर्माकर एक लेफ्ट तो दूसरी राईट को ताकने लगी।…

इधर साची और लावणी दोनों उसके कमरे से निकले और आरव के दिल में अजीब सी बेचैनी उठने लगी। उसे अचानक ही बिना किसी चोट के तेज दर्द मेहसूस होने लगा। श्वांस लेने में काफी तकलीफ़ सी होने लगी। आरव ने जब समय देखा तो सुबह के लगभग 11 बज रहे थे।

बेचैन होकर उसने नंदनी को फोन लगाया। नंदनी उससे बात करने लगी और वहां का हाल चाल लेने लगी। आरव को बात करने में भी तकलीफ़ हो रही थी, लेकिन वो किसी तरह हंसते हुए अपनी मां से बात कर रहा था। फिर अंत में उसे पता चला कि अपस्यु सिन्हा जी के काम से बंगलौर निकला है।

आरव का दिमाग सन्न और दिल बेचैन हो उठा। बार काउंटर पर जाकर उसने पूरी बॉटल पी ली, दिल को फिर भी चैन नहीं। पीते-पीते उसके होश उड़े थे रास्ते में क्या हुआ किससे टकराया, किस से कितनी बातें हुई, कोई खबर नहीं।

अपने कमरे पहुंच कर वो ऐमी को फोन लगाया कोई जवाब नहीं। लगातार वो फोन लगाता रहा किंतु ऐमी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वो प्रतिक्रिया देती भी कैसे अपस्यु और प्लैनिंग के बीच ऐसी फसी थी कि उसका ध्यान ही नहीं गया फोन पर।

हार कर उसने स्वस्तिका को कॉल लगाया। स्वस्तिका फ्लाइट में थी इसलिए वो फोन ले नहीं सकती थी। आरव कॉल करके थक चुका था और अब एकटक बस अपने फोन को देख रहा था।

रात के तकरीबन 12.30 बज रहे होंगे। आरव अब भी बस अपनी खुली आंखों से फोन को ही देख रहा था। ठीक इस वक़्त स्वस्तिका और ऐमी अपनी चिट-चैट खत्म करके कैफेटेरिया से निकल रही थी। तभी ऐमी को ख्याल आया कि आरव से तो उसने बात ही नहीं की और जब उसने अपने कॉल लॉग पर ध्यान दी तब उसकी रूह सिहर गई…

तुरंत उसने आरव को कॉल लगाए… ऐमी का फोन देखते ही आरव ने अपनी पलकें झपकी और फोन उठाया…. "सुरक्षित है कि नहीं मेरा भाई।"…

ऐमी:- हां वो ठीक है। सॉरी आरव..

आरव:- नाह … सॉरी नहीं.. तुम ठीक हो..

ऐमी:- नहीं मुझे कुछ नहीं हुआ…

आरव, गहरी श्वांस लेते… नॉटी है क्या वहां..

ऐमी:- हां यहीं है..

आरव:- बात करवाओ मेरी..

ऐमी, स्वस्तिका को फोन देती… आरव है लाइन पर.. "कहां घूम रहा है लड़के"… स्वस्तिका फोन उठाती हुई पूछने लगी…

आरव:- नॉटी ऐमी ठीक है ना… उसकी कंडीशन स्टेबल तो है ना।

स्वस्तिका:- तू शॉक्ड हो जाता अगर ऐमी को यहां अभी देखता तो। बहुत हिम्मत दिखाई इसने तो।

आरव:- भाई को दिखाएगी क्या… मुझे देखना है?

स्वस्तिका:- हां दिखाती हूं रुको…

थोड़ी ही देर में स्वस्तिका आईसीयू में थी जहां अपस्यु बेसुध लेटा हुआ था। कुछ देर वो अपने भाई को देखता रहा, फिर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ तसल्ली हुई आरव को, और वो वहीं परे-परे ही गहरी नींद में सो गया। इधर आरव गहरी नींद में सोया था और उधर अपस्यु।

नींद की गहराइयों में धीरे धीरे फिर से वही छवि बनना शुरू हो गया। दिमाग के कोने में वो गहरी सी यादें……



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वर्ष 2002….


दिए की रौशनी में जब आखें खुली सामने ऐमी उस फूल को मांग रही थी जिसे तोड़ने अपस्यु ऊपर चढ़ा हुआ था। गुरु निशी कुटिया में जैसे ही पहुंचे.. अपस्यु उठकर बैठ गया। सदैव की भांति गुरु के मुख पर वहीं तेज और चेहरे पर मुस्कान थी जिसे देखने मात्र से कई पिरा का निवारण हो जाए…

"अपस्यु, आप को पहले भी माना किया था ना ऊंचाई से दूर रहने"
"क्षमा गुरु देव, मै केवल मोह वाश उस फूल को तोड़ने चला गया था।"
"आप ने मेरा हृदय दुखाया है, आप को इसका दंड मिलेगा"

अपस्यु अपने शिस झुकाकर नमन करते हुए…. "आज्ञा गुरुदेव।"

"आज से महादेव वंदना और उनकी आराधना आप की जिम्मेदारी होगी। और आप बिना विफल हुए रोज ये कार्य करेंगे।
"जी गुरुदेव"
"अब आराम कीजिए और इस बालिका ने आपकी बहुत सेवा की है, इसलिए इसके निः स्वार्थ कार्य का फल मिले ऐसी कोशिश कीजिएगा।"
"जैसी आपकी इक्छा गुरुदेव"

गुरु निशी के जाते ही अपस्यु उठा और अपने बैग से वो उजला नीला फूल निकालकर ऐमी को भेंट करते हुए कहने लगा…. "यहीं फूल चाहिए था ना।"

ऐमी:- हां .. लवली फ्लॉवर। ए सुनो, तुम्हे डर नहीं लगता उस बाबा से। वो बच्चों को उठा कर ले जाते है।

अपस्यु, उसकी बात पर हंसते हुए कहने लगा…. "चिंता नहीं कीजिए आप यहां सुरक्षित है। इतनी रात को आप मेरे समीप है आप के माता-पिता आप को ढूंढ़ रहे होंगे।

ऐमी:- ऊफ़् ओ बहुत टफ लैंग्वेज में तुम बात करते हो, मुझे समझ में नहीं आया। दोबारा बताओ।

अपस्यु;- आप को फूल मिल गया ना, अब आप यहां से जाइए, आपके मम्मी-पापा इंतजार कर रहे होंगे।

ऐमी:- मै तो कई दिनों से तुम्हारे साथ ही सोती हूं डफर। अब चलो सोते हैं।

अपस्यु:- ठीक है।

ऐमी जबतक जागती रही तबतक वो बातें करती रही और अपस्यु बस उसे सुनता जा रहा था। गुरु निशी के कहे अनुसार अपस्यु सुबह के प्रहर उठकर स्नान किया और 900 मीटर की लगभग सीधी चढ़ाई के बाद ऊपर बने भगवान शिव के मंदिर पहुंचा और विधिवत पूजा करी।

महादेव वंदना की समाप्ति के बाद अपस्यु वापस उसी रास्ते से उतरने वाला था लेकिन उसके सामने जेके और पल्लवी थे… दोनों ने फिर पूछना शुरू किया कि वो 10 दिनों से कहां गायब था। अपस्यु ने सारी घटना बता दिया। अपस्यु को सुनने के बाद दोनों वापस चले गए।

उस दिन जब अपस्यु खाली समय में जेके और पल्लवी के पास पहुंचा तब वहां एक जाना पहचाना आवाज़ की भनक अपस्यु के कान में लगी। अपस्यु आवाज़ के सहारे ऐमी तक पहुंचा जो एक तरह से जेके और पल्लवी के कैद में थी।

यह कोई पहला मौका नहीं था जेके और पल्लवी के लिए, जब अपस्यु ने दोनों को चौंकाया था। नाम मात्र की निकली आवाज़ का दूर से पीछा करके वहां तक पहुंचने की अद्भुत कला पर दोनों दंपत्ति हैरान हो गए। अपस्यु के प्रशिक्षण को नया दिशा देते हुए अब उसे ब्लाइंड मूव्स और किसी अनजान जगह को दिमाग में बिल्कुल इंच दर इंच प्लॉट करने की सिक्षा मिलनी शुरू हो चुकी थी।

कुछ दिनों के बाद ऐमी अपनी छुट्टियां बीता कर वहां से चली गई। जबतक ऐमी छुट्टियों में वहां रुकी, बस अपस्यु के ही साथ होती। यहां तक कि वो उसके प्रशिक्षण के वक़्त भी उसी के साथ रहती। लगभग 6 मिहिने हुए थे अपस्यु को जेके और पल्लवी के साथ, उसके बाद वो दोनों भी वहां से चले गए और जाते जाते पूरा कॉटेज ही अपस्यु को देकर चले गए। जहां अपस्यु के लिए नई चीजों को सीखने का पूरा खजाना छोड़ा गया था।

2002 के साल का अंत भी हो रहा था, जब गुरुजी निशी अपने शिष्यों में से "प्रथम" और सहायक को चुनते। इस वर्ष पार्थ को "प्रथम" चुना गया था और वशी को "सहायक".. इसी के साथ इस वर्ष अपस्यु के दल में भी एक छोटा सा बदलाव किया गया था। उसके विज्ञान कि रुचि और जीव विज्ञान में उसके ज्ञान को देखते हुए गुरु जी ने उसके साथ अपनी पुत्री स्वस्तिका और 2 अन्य शिष्यों को उसके साथ रखे, जिनका लक्ष्य मानव जीवन को पिरा रहित सेवा देना था।

ये अपस्यु का ही प्रभाव था कि उसके साथी मित्र हर समय अपस्यु से कुछ ना कुछ नया सीखते थे। इसी क्रम में अपस्यु अक्सर पार्थ और स्वस्तिका के साथ उस कॉटेज में भी जाया करता था और उन्हें विज्ञान के साथ-साथ अन्य कला भी थोड़ी-बहुत सीखने के लिए मिल जाती थी।

2003 की सुरवात हो रही थी। हर साल अपस्यु के लिए जनवरी का महीना खुशियों से भड़ा होता था, क्योंकि पूरे महीने उसका भाई आरव और मां सुनंदा उसके साथ होती। जहां एक ओर सभी शिष्य ठंड के कारण अपने काम की गति को धीमा कर चुके होते वहीं अपस्यु हर काम को सही तरीके से जल्दी निपटाकर अपना पूरा वक़्त अपने भाई और मां को दिया करता था।

हालांकि वो उम्र ऐसी थी जहां चीजें समझ में ना आना एक आम सी बात होती है और आरव भी इसी खुन्नस में वहां रहता था, कि क्यों उसे अपने दोस्तों से दूर इस जंगल में 1 महीने के लिए पटक दिया गया है। सुनंदा आरव के इस चिढ़ को अपने प्यार से खत्म करती और अपस्यु के साथ उसे रहने के लिए प्रेरित किया करती थी।

दोनों भाई में सीखने की क्षमता तो एक जैसी थी लेकिन एक पुरव था तो दूसरा पश्चिम। अपस्यु जिस काम को लगन के साथ पूरा कर देता वहीं आरव पूरे लापरवाही के साथ उस काम को पूरा करता। हां लेकिन पूरा जरूर कर देता था। सुनंदा अपने आंचल तले अपने दोनों बच्चों पर पूरा प्यार बिखेर देती। वो वक़्त भी काफी भारी होता जब सुनंदा महीने के अंत में वापस जाती। अपस्यु रोना तो भूल चुका था, शायद चेहरे से उसके दर्द के एहसास को भी नहीं पढ़ा जा सकता था लेकिन उसके अंदर की भावना हर पल रोते रहती जिसे सिर्फ़ सुनंदा मेहसूस कर सकती थी।

वो जब भी अपस्यु को छोड़ कर जाती बस इतना ही कहती…. "मेरा बच्चा, बस कुछ दिन और यहां सीख लो, फिर हम सब साथ होंगे।" … वैसे एक हैरानी कि बात और भी इस दौरान होती, जब भी आरव उसे छोड़ कर जाता, ना चाहते हुए भी वो बिलख-बिलख कर रोता था… और अपस्यु भी उसे चुप कराते बस अपनी मां के कहे शब्द को उससे कह दिया करता।

माहौल गमगीन होता, सुनंदा और आरव की आखें नम होती किंतु अपस्यु के चेहरे पर ठीक गुरु निशी जैसा तेज होता, जो मुस्कुराते हुए अपने भाई और अपनी मां को जाते हुए देखता था
 
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Chinturocky

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Wakai me apasyu bahut hi vishesh bachchha/insan hai.
Bas insani bhawnao ke mamale me thoda kachcha hai.
Wakai me mujhe samajh nahi aa raha hai ki apasyu aur Ami Saath kyon nahi hai,
Shayad dono ek jaise hai Kai mayano me isliye ek dusare ki kami ko wo pura nahi kar sakte.
Agar kunjal ki Jodi Saanchi ke BHAI se bana di jaaye to maza aa jayega. Unhe support karne ko ek aur sadasya mil jaayega.
 

Akki ❸❸❸

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Update:-5


लावणी कि इस बात पर सांची को थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उसकी बातों से ऐसा लग नहीं रहा था कि आज जो बुक स्टोर में हुआ वह पहली बार हो रहा था…..

थोड़ी देर तक साची उसे शांत करती रही, फिर जब उसकी स्तिथि थोड़ी सी समन्या हुई तब साची ने उस से साफ शब्दों में पूछा "कि आखिर उसके और आरव के बीच चल क्या रहा है"

लावणी फिर गहरी सांस लेती हुई कहने लगी…. लगभग 15-20 दिन पहले की बात है, जब ये लोग सामने रहने आए थे। उसके अगले ही दिन जब मैं शाम को टहलने पार्क में गई तभी इस से मुलाकात हुई थी। मैं पार्क के बेंच पर बैठी थी और ये भी मेरे बिल्कुल करीब अा कर बैठ गया। मैं एक दम से चौंक गई, क्योंकि बेंच बिल्कुल खाली थी फिर भी ये मेरे करीब आ कर बैठ गया। इसी बीच जब तक मैं इस से कहती कि पूरी बेंच खाली है थोड़ा उधर खिसक कर बैठो की तब तक…

साची:- तब तक क्या लावणी..

लावणी:- दीदी मेरी बात समाप्त होने से पहले ही इसने मेरे गाल को चूम लिया।

लावणी की ये बात सुन कर साची बिल्कुल हैरान सी हो गई.. फिर से आगे बताने को कही….

लावणी अपनी बात आगे बढ़ाती हुई कहने लगी :- फिर दीदी ये जहां भी मुझ से मिलता मुझे अकेला देख कर उल्टी-सीधी बातें करता..

साची उसे बीच में ही रोकती हुई… "उल्टी-सीधी मतलब किस तरह की, पूरी बात बताओ"

लावणी:- वैसी ही दीदी जिस तरह कि आज किया था। यहीं की तुम से पहली नजर का प्यार है, तुम्हारे ऐसे वैसे सपने आते हैं। तुम्हरे शरीर पर कहां-कहां तिल हैं.. और भी गंदी- गंदी बातें। और जो 3 रात पहले घटना हुई थी ना पापा और इसके बीच। उस रात भी ये मुझे ही धक्का मारने कि कोशिश कर रहा था। अब दी सोचो ना कितना ढीठ है, मैं पापा के साथ थी तब भी ये मुझे धक्के मारने की कोशिश कर रहा था।

साची:- ढीठ तो है ही साथ ही पहुंच वाला भी है तभी तो ये जेल में ना हो कर बाहर घूम रहा है। इस से हमे संभल कर डील करना पड़ेगा। वैसे इसका भाई कैसा हैं।

लावणी:- उसे मैंने कभी इसके साथ नहीं देखा। पहले दिन ही जो इसे अपार्टमेंट के गेट पर देखी थी, उसके बाद आज देख रही हूं, वो भी जब आप ने इसे बालकनी में दिखाया।

साची:- एक भाई उचक्का है तो दूसरा ताका-झांकी वाला है। दोनों ही मुझे आवारा लगते हैं। खैर चल तू तैयार हो जा कॉलेज नहीं चलना क्या?

कॉलेज चलने कि बात पर लावणी थोड़े असमंजस में पड़ जाती है। तभी साची एक बार फिर कहती है "अब उठ भी जा, बैठे-बैठे क्या सोच रही है"।…… "दीदी, वो भी कॉलेज अा रहा है। मुझे बहुत डर लग रहा है, मैं नहीं जाऊंगी कॉलेज"।

साची:- "जानती है लावणी जब मैं सीतापुर में थी ना तब रोज कॉलेज जाते समय, एक कुत्ता, मेरे स्कूटी के पीछे भौंकते हुए दौड़ता। जैसे ही वो भौंकता ना, मेरे दिल की धड़कनें तेज हो जाती और स्कूटी का एक्सेलेरेटर अपने आप ही बहुत तेज हो जाती। उस कुत्ते का डर मेरे दिल में इतना हो गया था कि मुझे उस रास्ते से गुजरने में भी डर लगने लगा"।

"फिर मैंने वो रास्ता ही बदल दीया। लेकिन दूसरा रास्ता मेन रोड से होते हुए, बड़ा घूम कर मेरे कॉलेज पहुंचता, ऊपर से उस रास्ते में जाम लगा रहता सो अलग। तो कभी-कभी मुझे ना चाहते हुए भी उस रास्ते से हो कर जाना पड़ता था। लेकिन आलम ये था कि उस रास्ते पर जाने के नाम से ही, मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ने लगती थी। लगभग 4 महीने तक ऐसा ही चलता रहा"।

"फिर एक दिन मैंने ठान लिया… जो होगा सो देख लेंगे, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, वो कुत्ता मुझे कटेगा ही ना… मैं 14 इंजेक्शन लगवा लूंगी, पर आज तो इसे सबक सिखाए बिना नहीं छोडूंगी"।

"मैंने दृढ़ निश्चय किया। घर से निकलते वक़्त साथ में डंडा भी रखी लेकिन मैं जैसे-जैसे उस गली के ओर बढ़ रही थी, मेरी धड़कने वैसे-वैसे तेज हो रही थी। मैं खुद को हौसला तो देती रही थी कि "जो होगा सो देखा जाएगा".. लेकिन डर था कि जाने का नाम ही नहीं ले। तू विश्वास नहीं करेगी, वो कुत्ता जब मुझ पर भौंक रहा था ना तब वो सब कुछ भूल गई जो सोच कर घर से निकली थी। एक्सेलेरेटर खुद ही इतना तेज हो गया की, जब मैंने अपने डर पर काबू पाया तो पता चला कि मैं उस गली से बहुत दूर निकल आईं हूं"।

"और अगले 2-3 दिन तक ऐसे ही सब कुछ वैसा दोहराता रहा। घर से सोच कर निकलती आज तो मैं इस कुत्ते को सबक सिखा कर रहूंगी और गली तक पहुंचते पहुंचते सारी हिम्मत हवा हो जाती। लेकिन इस प्रक्रिया में जो एक बदलाव मुझ में आया, वो ये था कि मेरी धड़कने अब थोड़ी काबू में रहती थी और स्कूटी नियंत्रण में। और फिर 1-2 दिन बाद वो वक़्त भी आया जब मैं हिम्मत जुटा कर स्कूटी को ठीक उसी वक़्त रोकी जब वो कुत्ता भौंकना शुरू किया। पैर तो मेरे भौंक सुनते ही कांपने लगे थे किंतु हाथ में डंडा लिए मैं अपने स्कूटी से नीचे उतरी। और हुआ क्या, वो कुत्ता जो भौंकते हुए तेज़ी से स्कूटी के ओर दौड़ा चला अा रहा था, जैसे ही मैंने उसे मारने के लिए डंडा उठाया वैसे ही वो दुम दबा कर भाग गया"।

"बस इतनी सी है डर कि कहानी। अब तुम्हे फैसला करना है कि तुम क्या करोगी? क्योंकि आज तुम डर से कॉलेज नहीं जाओगी तो क्या कभी आगे कॉलेज जाओगी ही नहीं? तुम चाहो तो अपना कॉलेज भी बदलवा सकती हो, तो क्या वो उस कॉलेज में नहीं पहुंचेगा? तुम चाहो तो घर बैठ कर पढ़ाई कर लो कोई कॉलेज जाओ ही मत, फिर भी क्या तुम इस घर से कभी बाहर नहीं जाओगी, क्या केवल एक कॉलेज ही बचा है जहां वो तुम्हे परेशान कर सकता है? मैंने अपनी बात पूरी कर दी आगे तुम्हारी मर्जी, मैं जा रही हूं तैयार होने।

लावणी, साची की बात सुन कर हंसती हुई कहती है…. "ये तुम्हारे साथ सच में हुआ था या किसी इंस्पिरेशनल स्टोरी को चेंप दी"..

साची:- इंस्पिरेशनल स्टोरी में इतनी डिटेल नहीं होता है पागल। वहां तो लिख देते हैं डर का सामना करो डर भाग जाएगा लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं होता है। आप का डर आप पर हमेशा हावी ही रहता है चाहे कितना भी सामना करने का सोच लो। कितना भी सामना करने जाओ फिर भी डर लगता ही है वो तो वक़्त और हमारी आदतो के कारण सामना करते-करते डर बाहर निकल जाता है। अब छोड़ ये सब और चल जा कर तुम भी तैयार हो जाओ।

साची की बातों से लावणी में थोड़ा बदलाव तो आया। वो किसी तरह हिम्मत जुटा कर कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई। दोनों जब बाहर निकाल रही थी तब भी अपस्यु बालकनी में ही खड़ा था। लावणी को तो डर ही इतना लग रहा था कि उसे कुछ सूझ ना रहा था लेकिन साची दबी नजरों से उसे देख लेती है।

वो लावणी का ध्यान भटकाने के लिए कहती भी है कि "आज नहीं बोलेगी कुछ, उस बालकनी वाले लड़के के बारे में"… लेकिन लावणी ने तो जैसे उसकी बात को अनसुना ही कर दिया।

थोड़ी ही देर में दोनों दौलत राम कॉलेज के गेट के बाहर खड़े थे। कॉलेज के गेट पर खड़ी हो कर साची, लावणी से कहती है…… "देखो हम अा गए अपनी मस्ती की पाठशाला में। अब पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ मस्ती भी होगी"

साची की बात सुन कर लावणी एक फीकी मुस्कान दी, जिसमें डर और मुस्कान का मिलजुला संगम था। उसके इस फीकी हसी पर साची, लावणी के कंधे को हिलाती हुई कहने लगी… "चिल मार, इतना डरेगी तो जिएगी कैसे? मैं हूं ना, उस आरव के बच्चे ने यदि आज तुझे छेड़ा तो फिर समझो उसकी शामत आई। और हां प्लीज मैं तेरे पाऊं पड़ती हूं, यहां तू मुझे दीदी मत कहना"।

लावणी, साची की बात पर हां में हां मिलाते हुए अंदर चल देती है। दोनों वहां से अपने-अपने कक्षा के लिए प्रस्थान कर लेती है। लावणी को आरव का डर सता रहा था जो पूरा दिन उस पर हावी रहा, किंतु आरव का कहीं कोई अता-पता नहीं था…

ऐसे ही अगला 2-3 दिन बीता, जब आरव कॉलेज में कहीं नजर नहीं आया और ना ही कॉलोनी में कहीं दिखा। हां अपस्यु भले ही हर वक़्त बालकनी में दिख जाया करता था। असर तो सिर्फ पहले दिन का ही होता है, उसके बात तो सिर्फ रही-सही कहानी रह जाती है। वैसा ही कुछ लावणी के साथ हो रहा था। अब आरव का ख्याल भी उसके मन से निकल चुका था और दोनों बहने नियमित रूप से कॉलेज जाया करती थी…

लगभग महीना बीतने को आया था.. और इतने दिनों में आरव कभी नजर नहीं आया… फिर एक रात करीब डेढ़ बजे दोनों बहाने चुपके से अपने घर के बाहर आईं और रास्ता पकड़ कर नुक्कड़ तक जाने लगी.. दोनों अभी कुछ कदम ही चली होंगी की उधर से आरव अपनी फटफटी लिए सामने से आ रहा था।

आरव अपनी फटफटी दोनों बहनों के सामने रोका और उनसे पूछने लगा… "देर रात दोनों कहां सड़कों पर भटक रही हो, ये दिल्ली है तुम्हारा गांव नहीं" … दोनों बहनों ने कोई जवाब नहीं दिया और अपना रास्ता बदल कर आगे बढ़ गई। आरव भी अपने रास्ते आगे बढ़ गया और अपार्टमेंट के गेट पर अपस्यु का इंतजार करने लगा।

जब दोनों बहने थोड़ी और आगे बढ़ी तब सामने से उन्हें अपस्यु आता हुआ नजर आया। वो दोनो अपनी ही लय में चलती रही लेकिन अपस्यु के टेढ़े-मेढे लड़खड़ाते कदम धीरे-धीरे स्थिर मुद्रा में अा गए। दोनों बहने बिना कोई ध्यान भटकाए उसके पास से निकल गई और अपस्यु वहीं खड़ा रह गया….
Bdiya update bhai ji
आप का डर आप पर हमेशा हावी ही रहता है चाहे कितना भी सामना करने का सोच लो।
Kahi nain bhai apna experience to nahi bta rahe aap :D
"देर रात दोनों कहां सड़कों पर भटक रही हो, ये दिल्ली है तुम्हारा गांव नहीं" …
Jaisa ki pichle update me arav ne kha tha ki mai aur tumhare papa ek jaise h
Kahi ye sach me lavni ka papa to nahi beti lavni kha ghum rahe ho :lotpot:
 

Aakash.

ꜱᴡᴇᴇᴛ ᴀꜱ ꜰᴜᴄᴋ
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Yes, If I look at it from a perspective, I consider Saachi right, Nothing can be said right now, at the moment we allow both of us to open up. ?
At first I was very scared, I suddenly felt what has happened to Aarav, I do not understand anything, everything was all right when fell in love with Lavani, later I understood everything.?
Apasyu and Amy's childhood is once again seen, both are very cute. It is difficult to live without parents at a young age. Whatever Aarav, but his heart is gold. I was a little happy and a bit sad reading the past.
As always the update was great, You are writing very well, Now let's see what happens next, Till then waiting for the next part of the story.

Thank You...

???
 

Akki ❸❸❸

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Update:-6

जब दोनों बहने थोड़ी और आगे बढ़ी सामने से उन्हें अपस्यु आता हुआ नजर आया। वो दोनो अपनी ही लय में चलती रही लेकिन अपस्यु के टेढ़े-मेढे लड़खड़ाते कदम धीरे-धीरे स्थिर मुद्रा में अा गए। दोनों बहने बिना कोई ध्यान भटकाए उसके पास से निकल गई और अपस्यु वहीं खड़ा रह गया….

आरव कुछ देर तक वहीं अपार्टमेंट के गेट पर अपस्यु का इंतजार करता रहा, लेकिन जब वो वापस नहीं लौटा तो आरव खुद आगे बढ़ कर देखने चला गया। आरव ने जब अपस्यु को देखा तो ऐसा लगा रहा था मानो कोई जोगी अपने ध्यान में लीन है। बिल्कुल स्थिर मुद्रा, चेहरे पर मुस्कान और नजरें ना जाने कहां पर टिकी थी, ना तो वो आसमान देख रहा था और ना ही धरती।

आरव उसे हिलाते हुए कहता है… "उठो रेे, कहां खोया है"…

अपस्यु अपने यथावत स्थिति में बिना किसी बदलाव के अपने मुख से साची स्तुति पढ़ने लगता है…. "नीले समंदर से भी गहरी उसके कटिले नैन, जैसे मृगनैनी हो कोई… वो उसका चहकता खिला सा चेहरा, देख कर दिल खिल जाए… तराशा हुआ बदन बिल्कुल हीरे जैसा.. जिसकी चमक आखों में बस जाए"

तभी आरव उसे ठीक पीछे घुमा देता है…. "इतना खो कर काहे इमैजिनेशन कर रहा है, लेे वो सामने से अा रही है उसे देख कर बोल"

अपस्यु की नजर फिर से वही नजारा लेे रही थी जो अब से थोड़ी देर पहले लिया था। उसके मुख से निकल रहे साची पुराण अनायास ही गायब हो गए और वो फिर से उसे देखने में लीन हो गया।

इस बार भी साची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप अपने लय में चलती जा रही थी। जब वो दोनो बहने उन दोनों भाइयों से थोड़े दूरी पर थी, तभी आरव साची को सुनाते हुए कहने लगा… "ओ मैडम.. मेरा भाई पागलों कि तरह तुम्हारे लिए नजरें बिछाए है, कुछ नहीं तो कम से कम एक मुस्कान ही देती चली जाओ"…

अब स्तिथि ये थी कि साची और लावणी लगभग 4 कदम की दूरी पर… अपस्यु वहीं सुकून भरी मुस्कान अपने चेहरे पर लिए साची को देख रहा था और तभी आरव ने ये कमेंट पास कर दिया। अपस्यु बिना अपना नजर साची पर से हटाए, और अपने भावों में बिना किसी बदलाव के, अपना हाथ उठाया और एक तमाचा खींच कर जड़ दिया।

वो तमाचा इतना जोरदार था कि उसकी आवाज़ दोनों बहनों के कानों तक भी पहुंची। अब चूंकि लावणी भी वहां पर थी इसलिए आरव को ये अच्छा नहीं लगा। और इस पर वो अपनी प्रतिक्रिया देते हुए झुंझलाकर कुछ कहा…

अपस्यु बस चंद सेकेंड के लिए अपनी नजर साची से हटा कर आरव पर डाला। इस वक़्त के जो भाव थे वो बिल्कुल ही उलट थे.. आंखें इतनी बड़ी कि देख कर है लगे की इसमें हैवान बस्ता हो… जैसे किसी भूखे भेड़िए की आखें हो। उसने अपने होंठ पर उंगली लगा कर "सुसससससस" की आवाज़ निकाली और शांत रहने का इशारा किया। इसके तुरंत बाद वो पुनः अपने पिछले अवस्था में वापस लौटते हुए फिर से उसी संतोषजनक मुस्कान के साथ साची को देखने लगा…

आरव को थप्पड पड़ना और फिर उसे शांत करवाना, ये देख कर दोनों बहनों के मुख से अचानक ही हंसी फुट गई और दोनों हंसती हुई वहां से बड़ी तेजी में वापस अपने घर को चली गई… इधर एक बार फिर आरव ने झुंझलाते हुए कुछ कहा और इस बार भी उसी तेवर के साथ अपस्यु उसे शांत करते हुए अपने हाथ से घर के ओर जाने का इशारा किया।

इधर दोनों भाई घर पहुंच जाते हैं और उधर दोनों बहने… अपस्यु वापस लौट कर हॉल में बने एक केबिन में घुस जाता है और अपना कंप्यूटर स्टार्ट करने लगता है… इधर आरव अपना कपड़ा बदलते हुए अपस्यु से कहता है… "तू मुझे ऐसे मत मारा कर वरना अच्छा नहीं होगा"

अपस्यु, आरव की बातों को सुन भी रहा था और बड़ी तेजी के साथ कीबोर्ड पर खट्टर-पिट्टर भी कर रहा था…. "तू ये बता 15 दिनों से कहां गायब था"…

आरव चिल्लाते हुए… "मैंने क्या कहा वो तू सुन भी रहा है"

अपस्यु, खट्टर-पिट्टार करते हुए इंटर कि दबाता है और अपने रोलिंग चेयर को घुमा कर पीछे घूम जाता है…. "तुझ से कुछ पूछ रहा हूं, कहां था 15 दिन"

आरव:- कामिना सला, पूछ तो ऐसे रहा है जैसे तुझे कुछ पता ही ना हो। ये कंप्यूटर पर तू मेरे बारे में ही कुछ खिट्टिर-पिट्टीर कर रहा था ना…

अपस्यु:- मेरे साथ हो तो एक बात हमेशा याद रखना… अपना गटर जैसा मुंह बंद रखा कर और जो पूछा उसका सीधा सीधा जवाब दे…

अपस्यु के लगातार रूखेपन से आरव के दिल में टीस सी लगती है और ना चाहते हुए भी उसके आखों में आंशु अा जाते हैं। आरव को रोता देख अपस्यु उसके पास पहुंचकर उसके आशु पोछने लगता है। पहले तिरस्कार फिर प्यार, आरव को बहुत तेज गुस्सा अा गया और वो गुस्से में फुफकारते हुए अपस्यु को धक्का देता है और नजर इधर-उधर दौड़ा कर कुछ ढूंढ़ने लगता है…

पास में ही एक देशी डंडा पड़ा होता है, आरव उसे उठा कर अपस्यु की पिटाई करने लगता है। आरव रोते रहता है और पूरे दम से अपस्यु को पीटते रहता है। पीटते-पीटते उसका गुस्सा भी शांत हो जाता है और इधर अपस्यु बस उसके गुस्से को देख मुस्कुराता रहता है और मार खाता रहता है। "हो गया तेरा" इतना कहते हुए वो उठा और अपने फोरआर्म को देखने लगा। फोरआर्म बहुत ही मजबूत जगह होती है लेकिन आरव डंडा इतना तेज चला रहा था कि हाथों पर उसके निशान साफ देखे जा सकते थे।

आरव जो पहले अपने भाई के बातों के कारण रो रहा था, अब वो अपने द्वारा कि गई हरकत और भाई के हाथ पर डंडे के लाल निशान देखकर व्याकुलता से रो रहा था। अपस्यु उसे शांत करते हुए कहने लगा…. "इसलिए मैं हमेशा कहता हूं गुस्से पर काबू रखा कर, क्योंकि ये गुस्सा अक्सर बाद में अफसोस के सिवा कुछ नहीं देता है"।

आरव "सॉरी-सॉरी" करता हुआ अपने भाई की मरहम पट्टी कर रहा था और साथ में सिकायते भी, की वो अक्सर उसके साथ बुरा व्यव्हार करता है जिसकी वजह से वो और भी ज्यादा चिड़चिड़ा होता जा रहा है।

इस पर अपस्यु उसे जवाब देते हुए कहता है… "मैं तेरे साथ ये सब करना उस दिन छोड़ दूंगा जिस दिन मुझे पता चल जाएगा कि तूने सीख लिया है कहां गुस्सा करना चाहिए और कहां अपनी भावनाओ को काबू में रखना चाहिए। साथ ही साथ कितना गुस्सा दिखना चाहिए और कितना गुस्सा अंदर छिपा रहना चाहिए"

आरव, अपस्यु की बात सुन कर नतमस्तक हो जाता है और कहता है… "ये तेरे 12 साल के उस गुरुकुल का नतीजा है जो तू इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है। वरना है तो तू मेरा भाई ही, तू भी बिल्कुल मेरे जैसा ही होता, यदि तू उस गुरुकुल में ना गया होता"

अपस्यु:- जी सत्य वचन, चल अब सच-सच बता 15 दिनों से कहां था?

आरव:- साला हैकर, रात दिन तो तू मुझ पर ही नजर रखे रहता है, तुझे नहीं पता कि मैं कहां था?

अपस्यु:- अब तू होम सेक्रेटरी के ऑफिस के एक आईएएस (IAS) से पंगे लेगा तो ऐसे ही ना छिपता फिरेगा। किसी ने तुझ पर हाथ तो नहीं उठाया।

आरव:- वो माचो के बच्चे रशियन मेड गन लिए घूम रहे थे और तुझे क्या लगता है वो मुझे हाथ और लात से मारेंगे… मै उसके हाथ लगता तो तू अब तक मुझ से बात भी ना कर रहा होता। वैसे एक बात बता तू तो अपनी आयटम को सरा दिन निहारता रहता था फिर तुझे इतनी बात कहां से पता चली।

अपस्यु:- ये सब बातें कल पूछना फिलहाल मुझे नींद लग रही है और मैं जा रहा हूं सोने।

आरव:- अपस्यु सुन तो, भाई दर्द भी हो रहा है क्या?

अपस्यु:- तेरी कसम कोई दर्द नहीं है मानसिक रूप से। हां बाकी जो इस हाथ कि क्षति हुई है उसे दवा ठीक कर देगी। चल अब मैं जा रहा हूं सोने तू भी सो जा।

आरव:- अच्छा सुन, कल कॉलेज चलेगा क्या?

अपस्यु:- कॉलेज जा कर क्या ही करूंगा मै? नह, कोई इकछा नहीं।

आरव:- नहीं बस सोचा की बता दू, तेरी और मेरी वाली दोनों दौलतराम में ही पढ़ती है।

अपस्यु जिसपर नींद सवार हो रहा था, उसकी भोहें चौड़ी हो गई…. "क्या बोल रहा है तू, तुझे कैसे पता वो दोनो उसी कॉलेज में है"।

आरव:- जिसकी तू अभी गुणगान कर रहा था ना होम सेक्रेटरी का आईएएस (IAS) उसने भी मेरे साथ ही फॉर्म जमा किया था। मै हम दोनों का और वो उन दोनों बहनों का फॉर्म भड़ा था।

अपस्यु:- क्या बात कर रहा है? लेकिन इन दोनों बहनों को देख कर लगता तो नहीं कि इनका एडमिशन स्पोर्ट्स कोटा में हुआ होगा।

आरव:- तू समझा या फिर समझाऊं कैसे हुआ दोनों बहनों का एडमिशन।

अपस्यु:- हां समझ गया। जिसके घर में मच्छर मारने के लिए भी नौकर हो और वो खुद जाए फॉर्म भरने मतलब तो साफ ही है… अपना स्पोर्ट्स कोटा और उनका पैरवी कोटा।

और फिर दोनों भाई ठहाके लगा कर हसने लगे। उसके बाद दोनों चले गए सोने। इधर साची और लावणी चोरी से घर के अंदर घुसे और सीधे लावणी के कमरे में पैक हो गए…

लावणी:- दीदी मुझे ये सब ठीक नहीं लगता।

साची:- बुरा तो मुझे भी लग रहा है लेकिन क्या कर सकते है। वो दोनो मंत्री के बेटे है और छोटे पापा तो उन्हीं के आफिस में काम भी करते है। जब वो कुछ नहीं कर सकते फिर हमें तो ये सब करना ही होगा।

लावणी:- दीदी कब तक ऐसे डर के जिएंगे… वो डर निकालने वाली कुत्ते कि थेओरी पर काम क्यों नहीं करती?

साची:- ठीक है कल से वो भी कर के देख लेंगे। वैसे आज ये दोनों भाई एकदम से अचानक बाहर कैसे घूम रहे थे।

लावणी:- मेरी हालत तो ऐसी है कि मुझे तो ये दोनों भाई याद भी नहीं रहे।

साची:- मुझे भी…

लावणी:- वैसे दी जैसे आप के साथ कुत्ते वाली घटना हुई थी ना वैसे ही डर भागने का मुझे भी एक उपाय मिला है…

साची:- क्या ?

लावणी:- यदि आप किसी चीज से डरती हैं और उस से भी ज्यादा डरावना कुछ और मिल जाता है तो पहले जिस चीज से आप डरती थी उसका डर अपने आप ही खत्म हो जाता है। जैसे कि आज हुआ.. आरव को देख कर डर नाम की कोई चीज ही नहीं रही।

साची:- तो तू क्या चाहती है अब हम इस से भी कुछ ज्यादा डराने वाला को ढूंढना चाहिए।

लावणी:- बिल्कुल नहीं, वो तो बस मेरे साथ बीती डर भागने कि विधि मुझे पता चली तो आप के साथ साझा कर दी। वैसे दीदी एक बात बोलूं आप मुझे डांटेंगी तो नहीं?

साची:- अब बता ना, इतना बाउंड्री क्यों बना रही है?

लावणी:- पक्का ना, कसम खाओ मेरी…

साची:- अब तू बताएगी या मैं सोने जाऊं…

लावणी:- दीदी तुम उस अपस्यु को वहां उन से क्यों नहीं भिड़ा देती… ये लोग आपस में उलझे रहेंगे… और हमसे पीछा छूट जाएगा…

साची, लावणी की बात सुन कर कुछ सोचती है और फिर उसे सोने के लिए कह कर वहां से चली जाती है।
Bdiya update bhai ??
अब चूंकि लावणी भी वहां पर थी इसलिए आरव को ये अच्छा नहीं लगा। और इस पर वो अपनी प्रतिक्रिया देते हुए झुंझलाकर कुछ कहा…
Ek ke no. Ban gye dusre ko rasid dekar
Kuch pane ke liye khona padta h arav
मैं तेरे साथ ये सब करना उस दिन छोड़ दूंगा जिस दिन मुझे पता चल जाएगा कि तूने सीख लिया है कहां गुस्सा करना चाहिए और कहां अपनी भावनाओ को काबू में रखना चाहिए। साथ ही साथ कितना गुस्सा दिखना चाहिए और कितना गुस्सा अंदर छिपा रहना चाहिए
:claps:
मै हम दोनों का और वो उन दोनों बहनों का फॉर्म भड़ा था।
अपस्यु:- कॉलेज जा कर क्या ही करूंगा मै? नह, कोई इकछा नहीं।
:dazed: ?
 

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साची, लावणी की बात सुन कर कुछ सोचती है और फिर उसे सोने के लिए कह कर वहां से चली जाती है।

सुबह का वक़्त कोई रगड़-रगड़ के नहाता है तो कोई चिंता के सागर में डूब कर कॉलेज के लिए तैयार हो जाता है। और फिर सवार होकर निकलती है वाहने.. कोई स्कूटी से तो कोई फटफटी से चल देता है

एक ही वक़्त पर दोनों गाड़ी निकलती है बिल्कुल रेल की पटरी से समानांतर। वैसे ये कोई इत्तेफ़ाक नहीं था बल्कि दोनों लड़के ना जाने कब से अपनी फटफटी को धो कर, चमका कर, अपने अपार्टमेंट के गेट पर खड़े उनके बाहर आने का इंतजार रहे थे।

दोनों गाड़ी जैसे ही गली के नुक्कड़ के आगे बढ़ती है… स्कूटी में अचानक ब्रेक लगता है और वो रुक जाती है… स्कूटी रुकते ही आरव चिल्लाता है… "अरे भाई-भाई स्कूटी रुक गई"… और फिर तभी फटफटी भी रुक जाती है।

साची स्कूटी से उतर कर पैदल ही उन दोनों के पास पहुंचती है… "हे भगवान बस मेरा काम बन जाए। किसी तरह वो शिसे में उतर जाए बस" यही ख्याल लिए साची अपस्यु के ओर अपने कदम बढ़ा रही थी।

साची को अपनी ओर आते देख एक बार फिर अपस्यु खो जाता है। अभी वो पूरे ख्यालों में डूबा भी नहीं था कि नीले-गुलाबी मिश्रित चूड़ियों से भरे हाथ ऊपर उठते हैं जिसकी हथेली अपस्यु के चेहरे के आगे दाएं से बाएं और बाएं से दाएं हो रही थी…

उन कोमल हथेली के ठीक वो मृगनयनी का चमकता चेहरा था जिसके रूप पर अपस्यु मोह गया था। वो खिला सा चेहरा, दिल को रौशन कर देनी वाली हसी उपर से काले, घने और थोड़े से घुंघराले बाल, जो सदैव गाल के शुरवात से ऐसे टकराते मानो उन्हें चूम रहे हो, और ये दृश्य अपस्यु के लिए इतना मनमोहक था कि वो इनमें खो सा जाता था।

हथेलियों के बीच से गुजरने से वो चेहरा बार-बार हथेली के पीछे छिप जाता इसलिए अपस्यु ने तेजी के साथ उस हथेली को अपने हाथों में थाम कर किनारे कर दिया और सुकून से उसका चेहरा देखने लगा।

साची (अरे ये देवदास फिर से मुझे घूर रहा):- तस्वीर भेज दूंगी… बड़ा सा पोस्टर बना कर दिन रात मेरा चेहरा देखते रहना। अभी हाथ छोड़ो और नींद से जाग जाओ…

अपस्यु उसका हाथ छोड़ते हुए:- 700******11

साची (मैं तो गंवार समझी ये तो तेज निकला, सीधा नंबर दे रहा। कोई नहीं मैं भी ना समझने का नाटक करती हूं):- क्या?

अपस्यु:- मेरा मोबाइल नंबर..

साची:- ऑफ ओ.. अच्छा सुनो मुझे तुम से कुछ काम है।

अपस्यु:- हुकुम कीजिए।

साची:- क्या मैं तुम्हारे साथ कॉलेज अा सकती हूं?

अपस्यु आरव की ओर देखते हुए… उतर

आरव:- फिर मैं कैसे जाऊंगा…

अपस्यु:- पैदल अा जाना.. उस से भी ना हो तो आज घर पर ही रह।

साची:- अरे नहीं वो लावणी के साथ चला जाएगा।

बस इतना सुनना था कि आरव सीधा लावणी के स्कूटी पर। दोनों गाडियां, सवारी की अदला-बदली करने के बाद पुनः अपने गंतव्य की ओर चल दी। लेकिन अब दोनों गाडियां एक दूसरे के समनंतर नहीं बल्कि अलग-अलग रास्ते से जा रही थी।

अपस्यु और साची…

आज तो जैसे सूखे रेगिस्तान में बिना किसी उम्मीद के बावजूद बारिश हो गई हो और उस बारिश का पूर्ण आनंद अपस्यु उठा रहा था… उसकी सासें इतनी गहरी थी मानो वो साची की खुशबू को महशुस कर उसे अपने साशों में बसा रहा हो.. अद्भुत क्षण थे… दोनों बिल्कुल खामोश आगे बढ़ रहे थे। लेकिन इस खामोशी से साची बहुत चिढ़ रही थी…

वो अपने मन के ख्यालों में ही बड़बड़ाने लगी… "वैसे तो मुझे देखने के लिए पागलों कि तरह अपने बालकनी में ही खड़ा रहता है। लेकिन अब जब मैं इसके साथ हूं तो कुछ बात ही ना कर रहा। एक इसका भाई है, ना जाने अब तक लावणी के साथ कितनी बक-बक कर चुका होगा। और एक ये हैं देवदास जिसकी आखें तो हमेशा मुझ पर ही टिकी रहती है पर जुबान नहीं खुलता। आज मुसीबत में ना होती तो इसके साथ ना बैठना पड़ता। कुछ तो बोल दो … ऐसे चुप रहोगे तो मैं तुम्हे बातों में कैसे उलझाऊंगी"।

साची इन्हीं उधेड़बुन में आगे बढ़ रही थी लेकिन अपस्यु था कि कुछ बोलने का नाम ही नहीं ले रहा था। और शायद वो कुछ बोलने के स्तिथि में भी नहीं था क्योंकि आधा ध्यान वो फटफटी चलाने में और आधा ध्यान में वो बस साची को अपने साथ मेहशुस करने में लगाए था। जब साची को लगा कि ये अब कुछ नहीं बोलने वाला तब अंत में उसी ने चुप्पी तोड़ दी।

साची:- तुम्हारा नाम क्या है?

अपस्यु:- नाम और ज्ञान की बात होगी तो भेद खुल जाएगा। काम की बात करते है, हम दोनों का भला हो जाएगा।

साची:- मैं समझी नहीं।

अपस्यु:- इतने भी नासमझ नहीं लेकिन पूछ ही लिया है तो बता दू अपनी बातों का मतलब। आप का मेरे साथ बैठना एक फरेब है, कोई जाल बून सा गया है जिसमें मुझे फसना है।

साची (मैं इसके बारे में जो भी सोचती हू वो सब उल्टा ही क्यों होता है, लगता है मैंने ही इसे कम आकां है। अब सीधा काम की बात करूंगी तो बेज्जति हो जाएगी, लगता है थोड़ा नखरा ही दिखना होगा) :- बाइक रोको मुझे उतारना है।

अपस्यु:- बाइक नहीं कहिए ये हमारी फटफटी है।

साची:- जो भी है रोको मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ..

अपस्यु:- मेरे साथ या मेरे बिना, समस्या का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक आप मुझ से बात नहीं करोगी।

साची (प्लीज अब बाइक मत रोक देना वरना मेरा पोपट हो जाएगा):- तुम्हारे साथ बैठ क्या गई ना जाने तुम मेरे बारे में क्या क्या राय बनाने लगे? अभी रोको बाइक मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ….

अपस्यु:- गुस्से में भी आप की आवाज़ शुरिली है, काश पीछे मुड़ कर चेहरा देख सकता। वैसे अभी तो बताया बाइक नहीं फटफटी कहिए।

साची:- जो भी है अभी रोकोओओओओओओओ…

अपस्यु:- ऐसी भी क्या बेरुखी… अब बता भी दीजिए, क्यों संकोच कर रही हो..

साची (बहुत नखरे हो गए साची बेटा ऐसे ही नखरा चलता रहा तो कॉलेज अा जाएगा। अब बंद जिद कर ही रहा है तो तू क्यों संकोच कर रही):- अच्छा बता दूं..... यदि बता दिया तो क्या करोगे…

अपस्यु:- अगर मैंने बता ही दिया कि मैं क्या करूंगा तो फिर मुझे करने में और आप को देखने में मजा नहीं आएगा.. मैं क्या करूंगा वो गोपनीय रखते है केवल इस ख्याल से कि मैं जो भी करूंगा उसे हम दोनों एन्जॉय करेंगे और आखिर में आप सुनिश्चित कर लेना की काम आप के हिसाब से हुआ या नहीं।

साची:- ठीक है तो सुनो, कॉलेज का एक सीनियर है नाम है शशांक वर्मा सेंट्रल होम मिनिस्टर का बेटा, उसने हमारा जीना हराम कर दिया है। अब क्या मै बताऊं बहुत बदतमीजी करता है। किसी के सामने कहीं भी हाथ लगा देता है। उसकी शिकायत मैंने अपने छोटे पापा से भी की थी लेकिन वो भी कुछ नहीं कर पाए।

अपस्यु:- क्या…..? मतलब उसकी बेटी और भतीजी को कोई लड़का यहां-वहां हाथ लगाता है और वो कुछ कर नहीं पाए…

साची:- नहीं हमने शुरू ही किया था कि छोटे पापा ने सीधा कह दिया "कॉलेज बदल लो".. पूरी बात बताने भी कहां दिए।

अपस्यु:- ओह तो ये माजरा है, ठीक है चलो कॉलेज.. वैसे मेरा मेहनताना क्या होगा?

साची:- मतलब..

अपस्यु:- अपना फंडा क्लियर है मैडम… मैं काम करूंगा तो अपना मेहनताना लूंगा…

साची:- और क्या है तुम्हारा मेहनताना?

अपस्यु:- बस एक घंटे आप मेरे सामने रहो और मैं आप को देखता रहूं।

साची:- एक बात बताओ मुझे…

अपस्यु बीच में ही टोकते हुए… जो आप जानना चाह रही है आप को पता नहीं चलेगा। मैं क्या देखता हूं और क्या सोचता हूं वो मेरी भावनाएं है आप को बता भी दू तो आप के लिए महज चंद शब्द, वो भी एक पागल के द्वारा बोला गया शब्द होगा… इसलिए उसे आप को अभी बताने का कोई फायदा नहीं… और जिस वक़्त बताने का फायदा होगा शायद उस वक़्त बताने कि जरूरत नहीं होगी।

साची बड़े प्यार से हंसती हुई कहने लगी…. "बहुत खूब.. वैसे मैं तुम से काफी प्रभावित हुई और हां मुझे लगता है कि मुझे अपने सोच के लिए तुम से माफी मांगनी चाहिए। वैसे सच कहूं तो मुझे अभी बहुत बुरा लग रहा है लेकिन मै अभी इस बात को नहीं करना चाहूंगी क्योंकि पता नहीं क्यों अब मुझे यकीन हो गया है कि तुम जरूर अपना मेहनताना वसूल कर लोगे। तो ये बात उसी एक घंटे में मै कर लूंगी… मुझे मंजूर है लेकिन मेहनताना तभी मिलेगा जब मुझे लगेगा की तुम्हारा काम सराहनीय है।

अपस्यु:- मंजूर….
Bdiya update bhai ji??

Apsyu interesting character h story ka
साची:- अरे नहीं वो लावणी के साथ चला जाएगा।
Andhe ko do ankhe milna :haha:
साची (प्लीज अब बाइक मत रोक देना वरना मेरा पोपट हो जाएगा):-
:lotpot:
Bdiya ?
 

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एक रास्ते जहां अपस्यु की फटफटी, साची को लिए, कॉलेज के ओर बढ़ रही थी, वहीं आरव भी लावणी के पीछे सवार हो कॉलेज के ओर निकाल परा था। एक तो लावणी पर दिल आया था ऊपर से उम्र का तकाजा, नादानी और छेड़खानी तो होनी ही थी।

स्कूटी के रफ्तार पकड़ते ही, आरव अपनी बाहें फैला कर उसके बदन के मध्य हिस्से को अपनी बाहों के जकड़ में लिया। लावणी को जैसे ही ये मेहसूस हुआ उसकी आंखें आश्चर्य से बड़ी हो गई और अगली हरकत ने तो उसे अनियंत्रित ही कर दिया।

बाहों में जकड़ने के बाद आरव अपने चेहरे को लावणी के बाएं कंधे पर रख कर, साइड से हेलमेट को ही चूमते उसे "I Love You" कहने लगा… लावणी को कुछ समझ में ही नहीं अा रहा था कि वो क्या करे और अचानक ही उसने ब्रेक लगा दी।

ब्रेक लगते ही पीछे से एक बाइक ने उसे धराम से ठोका। कुछ गाडियां अनियंत्रित होती, उसके स्कूटी के दाएं बाएं से 2-4 बातें सुनाते हुए निकली। वो जिसकी बाइक पीछे ठुकी थी वो बेचारा तो सड़क पर गिर गया। हाथ-पाऊं उसके छिल गए थे और जब गुस्से में वो हेलमेट निकाल कर लावणी के ओर बढ़ा तो लावणी पाऊं डर से थर-थर कांपने लगे।

वो लड़का उनके पास गुस्से में पहुंचा तो जरूर, परन्तु किसी लड़की को चालक देख, उसके तेवर ही बदल गए। आरव और उस लड़के के बीच कुछ देर बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और अंत में लावणी उसे सॉरी कह कर कुछ मुआवजा दी और वो चला गया।

लावणी, रोती हुई गुस्से में कहने लगी… "ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है, मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ कहीं"

लड़की सड़क पर रो रही थी, वो भी दिल्ली में, सीन तो क्रिएट होना ही था। आरव वहां के माहौल को भांपते हुए तुरंत चालक की जगह बैठ कर हेलमेट लगाया और लावणी को पीछे बैठने के लिए बोलने लगा, लेकिन लावणी बस आंसू बहाए जा रही थी बैठने का नाम ही नहीं के रही थी…

किसी तरह मिन्नतें कर, वादा कर की अब वो छेड़छाड़ नहीं करेगा, तब कहीं जा कर लावणी बैठी। दोनों बैठ कर कॉलेज के ओर बढ़ने लगे.. सम्पूर्ण शांति स्थापित हो चुकी थी दोनों के बीच और बिना किसी बताचित के गाड़ी आगे बढ़ रही थी।

अभी कुछ दूर ही स्कूटी आगे बढ़ी होगी की आरव के मोबाइल पर अपस्यु का संदेश पहुंचा। अपस्यु का इसलिए क्योंकि उसकी कॉल और मैसेज ट्यून दोनों अगल सेट की हुईं थीं। आरव एक काफी शॉप के बाहर गाड़ी खड़ी करके चोरी से अपस्यु का संदेश पढ़ने लगा।

इधर लावणी थोड़ा झुक-झुक कर उसके संदेश पढ़ने की कोशिश करती हुई कहती है… "कॉलेज चलो ना, स्कूटी यहां पर रोक कर किसका मैसेज पढ़ रहे"…

आरव:- कुछ नहीं, चलो एक कप कॉफी पीते हैं।

लावणी:- मैं नहीं पीती कॉफी-वॉफी.. चुपचाप सीधा कॉलेज चलो।

लावणी की बात सुनकर आरव उसे आंख दिखाते हुए… "चल चुपचाप, कोई डेट पर कॉफी पिलाने नहीं लाया बस मन कर गया"…

आरव की कड़क आवाज़ सुनते ही लावणी तेजी से जा कर टेबल पर बैठ गई उसके पीछे-पीछे आरव भी जा कर बैठ गया… "आरव कॉफी की एक चुस्की लेते हुए… "ये बता तू और तेरी वो बहन दोनों दिमाग से पैदल ही हो या फिर कुछ ज्यादा ही समझदारी भगवान ने तुमलोगों को दी है"

लावणी गुस्से में अपनी जगह से थोड़ा उठ कर आरव को उंगली दिखाती कहने लगी…. ये क्या बकवास है, मेरी बहन के बारे में कुछ मत बोलना।

आरव:- सॉरी सॉरी.. तू गुस्सा कहे कर रही, बैठ जा आराम से.. वैसे मेरा सवाल सही था पर तुझे गुस्सा अा गया इसलिए थोड़ा बदल कर पूछता हूं.. ये बताओ तुम दोनों बहने किस योजना के कारण आज हमारे साथ कॉलेज जा रही…

लावणी:- ना-ना कोई योजना वोजना नहीं है, आप गलत सोच रहे हैं। वो तो हम पड़ोस में रहते ना, तो साची दी ने सोचा कि साथ जाएंगे तो जान-पहचान बढ़ेगी…

आरव:- वाह क्या नेक ख्याल है.. सारे जवाब रटा दिया क्या तेरी बहन ने.. तू जो बोले, उस हम मान ले इतने बड़े वाले है क्या हम दोनों। हमारे माथे पर क्या 'चूउउ'.. खैर जाने दे

लावणी… ये कैसी बातें कर रहे हो?

आरव:- दिमाग सटका हुआ है लावणी। यार हमारे नाम से दूर भागने वाली तुम लोग इतना मेहरबान अचानक से हो जाओगी तो क्या हमे पता भी नहीं चलेगा कि तुम हम से कोई काम निकलवा रही। इससे कहीं ज्यादा बेहतर होता कि तुम सीधे अा कर प्रॉब्लम बता देते। ये धोके से फसा कर काम निकलवाना… मेरी तो जुबान गंदी है पर तुम्हारी तो सोच ही गंदी है।

लावणी को शायद अपने किए का पछतावा हुआ… "I am sorry, Aarav"

आरव:- कोई नहीं, शायद गुस्से में मैं भी कुछ ज्यादा बोल गया.. चलो अब समस्या बताओ… और किस बिना पर तुम्हे लगा कि हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं।

लावणी फिर पूरी कहानी बताने लगी… "कॉलेज के शुरवात दिनों से लेकर रैगिंग तक। फिर रैगिंग के बाद भी होम मिनिस्टर के बेटे शशांक वर्मा का दोनों बहनों को बुरी तरह परेशान किया जाना। अलग-अलग तरह की मांगे, जैसे कल सिगरेट पिलाना है, ये पिलाना वो पिलाना। साथ में ये भी बताई की कल रात दोनों बहने बाज़ार से सिगरेट लेना भूल गई थी तो उन्ही के लिए सिगरेट खरीदने गई थी"…

आरव बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था… "ओह तो ये समस्या है चल अब ये बता कि तुम्हे ऐसा क्या दिखा हम में कि इस समस्या के समाधान के लिए हमे बकड़ा बना रही"

लावणी:- वो आप आवारा टाइप हो ना..

इतना सुनते ही आरव अपनी जगह से उठकर अपना चेहरा लावणी के चेहरे के बिल्कुल करीब लेे जाकर, अपनी बड़ी-बड़ी आंखें दिखाते… "क्या बोली"

लावणी थोड़े पीछे हटती हुई डर से अपनी आंखें बंद करते … "सॉरी सॉरी वो फ्लो में निकाल गया"

तबतक आरव पीछे जा चुका था और उसे देख कर हंसते हुए… "बस भी करो यार इतना डरना… हर बात पर डर जाती हो.. मैं तो मज़ाक में आगे आया था" …

लावणी थोड़ी सी निश्चिंत होती हुई…. क्या करूं, मेरा स्वभाव ही ऐसा है या शायद शुरू से पापा ने इतना डरा कर रखा है कि अब तो किसी भी बात पर, किसी से भी डर जाती हूं। ये तो अब मेरे जीवन का हिस्सा है… वैसे अब मैं डर भागने के लिए थोड़ा वर्कआउट कर रही हूं समय लगेगा पर नतीजा जरूर निकलेगा..

आरव… डर भागने का वर्कआउट, कोई क्लास ज्वाइन किया है या किसी बाबा का ताबीज खरीदा है।

लावणी "नहीं नहीं" कहती हुई.. डर भागने वाला वो पूरा नुस्खा.. जो साची ने लावणी को बताया था वो शब्दों में बिना किसी बदलाव के पूरा चिपकाती हुई कहती है… "सामना करने जाती हूं डर जाती हूं.. फिर भी हिम्मत नहीं हारी। फिर से सामना करने की सोचूंगी, फिर सामना करने जाऊंगी और फिर भी ना हुआ तो अगली कोशिश…

इस पर आरव जोड़-जोड़ से हंसते हुए… "ऐसे ही कोशिश करते करते पूरी उम्र निकाल जाएगी… चलो".. आरव अपना हाथ आगे बढ़ते हुए कहने लगा..

लावणी:- लेकिन चलना कहां है?

आरव उसकी आखों में देख कर उसे भरोसा दिखाते हुए… "तुम्हारा डर भागने लावणी.. चलो"

लावणी को भी शायद कुछ यकीन सा हुआ और वो आरव की आंखों में देखती हुई उसका हाथ थाम लेती है और चल देती है आरव के साथ। इस बार स्कूटी सीधा एक वाइन शॉप के आगे रुकी।

लावणी:- यहां क्या दिखाने वाले हो..

आरव:- डर निकालने का देसी नुस्खा.. जाओ एक बॉटल वोदका खरीद कर लाओ।

एक तो दारू ऊपर से लावणी को खरीदने के लिए भेजना.. पहले तो ना-नुकर करने लगी। फिर जब आरव ने तना मारा.. "उस लड़के के डर ये सब खरीद सकती हो, पर मेरे कहने पर नहीं। वो तुम्हारा सोशन करे तो उस डर से खरीदो पर मदद करने वाला बोले तो मना कर दो".. फिर क्या था आखिरकार लावणी मन बना कर वोदका खरीदने चली गई..

इधर लावणी ने जैसे ही अपना कदम वाइन शॉप के ओर बढ़ाना शुरू की उधर आरव ने भी अपना संदेश मोबाइल में छापना शुरू किया… "इधर का काम लगभग हो गया है.. हम आधे से एक घंटे में कॉलेज में होंगे… तुम अपना गेम प्लान कर सकते हो"… और टाइप कर के कबूतर उड़ा दिया अपस्यु के नंबर पर।
Bdiya update bhai
लावणी:- वो आप आवारा टाइप
Kisi ki madad pane ke liye itni khatarnaak tarif ?
इस पर आरव जोड़-जोड़ से हंसते हुए… "ऐसे ही कोशिश करते करते पूरी उम्र निकाल जाएगी…
फिर जब आरव ने तना मारा..
Ye to whi baat ho gyi raja dushyant ne rani skuntla ko dala mara :lotpot:
Baaki update super tha ?
 

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इधर लावणी ने जैसे ही अपना कदम वाइन शॉप के ओर बढ़ाना शुरू की उधर आरव ने भी अपना संदेश मोबाइल में छापना शुरू किया… "इधर का काम लगभग हो गया है.. हम आधे से एक घंटे में कॉलेज में होंगे… तुम अपना गेम प्लान कर सकते हो"… और टाइप कर के कबूतर उड़ा दिया अपस्यु के नंबर पर।

लावणी जब वोदका की बोतल लेकर पहुंची तब आरव मोबाइल को अपने जेब में रख रहा था.. लावणी को देखकर… "लेे अाई, इसे बैग में डाल कर चलो बैठो"..

लावणी भी बिना कोई सवाल किए जैसा आरव ने कहा ठीक वैसा ही किया और जाकर पीछे बैठ गई। स्कूटी अब सीधा एक पान दुकान पर रुकी जहां से आरव ने बाकी जरूरी सामान जैसे की ग्लास, कुछ पैकेट चखने के, ठंडा, सोडा, और सिगरेट। ये सब सामान अपने बैग में डाल कर वहां से निकल गया।

पीने के लिए उसने एक जगह चुनी और स्कूटी पर ही ग्लास, सोडा, चखना और ठंडा बिछा कर महफ़िल शुरू करने की तैयारी कर लिया.. अब बचा था अहम चीज जिसे आरव ने लावणी को निकालने के लिए बोला.. वोदका

लावणी को कुछ समझ ना आने की स्थिति में वो बॉटल निकलती हुई पूछने लगी… "तुम ये सब क्या कर रहे हो, कहीं यहीं पर दारू पीने का तो इरादा ना है"

आरव हंसते हुए… "नहीं रे, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं। हम यहां पीने नहीं बल्कि तुम्हारे दिल से डर निकालने आए हैं"

लावणी:- और वो कैस होगा?

आरव उसे बॉटल दिखाते हुए…. देखो, इसे कहते हैं दवा। इसके बारे में जितना जनों उतना ही कम लगता है और इसका प्रयोग तुम किसी भी मौके पर कर सकती हो। दुनिया की इकलौती ऐसी चीज है जो हर मौके पर सही फिट बैठ कर सीधा परिणाम देती है वो भी अपने मन मुताबिक। बस अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग डोज की जानकारी होनी चाहिए।

लावणी:- तुम्हारी ये बकवास मेरे समझ से बाहर है.. जो भी करना है जल्दी करो कॉलेज के लिए देर हो रही है।

आरव:- देखा इस दवा का असर, कुछ देर पहले "आप-आप" कर रही थी दवा देख कर .. "तुम-तुम" करने लगी.. थोड़ी देर ठहर जाओ अभी तो "तू" आना बाकी है… खैर बातों में वक़्त ना जाया करते हुए शुरू करते हैं डर भागने कि प्रक्रिया… इसके लिए सब से पहले बॉटल खोला.. अब चूंकि मामला डर का है और तुम्हारा पहला मौका तो डोज बनता है 180ml वो भी तीन हिस्सो में। ये लो तुम्हारा डर भागने का पहला डोज 60ml।

लावणी अपने आखें बड़ी किए… "पागल हो गए हो क्या… किसी को पता चला ना तो मेरा कॉलेज छुड़वा कर घर में बिठा देंगे"।

आरव:- ठीक है तुम मत पियो, लेकिन मै तुम्हे कुछ बताता हूं, अगर उसके बाद लगे तो तुम ग्लास उठा कर पी लेना वरना कोई बात नहीं। वोदका ही सही पर है तो दारू, मैं बर्बाद थोड़े ना जाने दूंगा।

लावणी:- ऐसा होगा ही नहीं की तुम मुझे दारू पीने के लिए कनविंस कर लो..

आरव… देखते है.. तो सुनो .. वो लड़का शशांक तुम्हारे बदन पर हाथ लगाया.. तुम ने सह लिया। अब मैं तुम्हारे सामने सरिर के उस भाग नाम तो नहीं ले सकता…. लेकिन धिक्कार है….. मुझे यहां तुम्हारे सामने नाम लेने में शर्म अा रही है और शायद उसने तो सब के सामने पकड़ लिया होगा। और यदि ना भी पकड़ा हो, तो भी तुम्हारा ये डर एक दिन उसे हिम्मत दे ही देगा… फिर कपड़े फटेंगे.. फिर वीडियो बनेगा। ये डर का सिलसिला है.. शशांक से बच भी गए तो कोई दूसरा मिलेगा, नहीं तो कोई तीसरा.. तुम डरती रहोगी वो तुम्हे नोचते रहेंगे..

लावणी:- "बस"…. एक ही झटके में 60ml गटक गई। "तुम्हे पक्का यकीन है, इस से डर दूर हो जाएगा"….

आरव:- पक्के से भी पक्का.. तुम अब बस ध्यान लगाओ कि उस शशांक के साथ क्या करना है?

शशांक के बाड़े में सोचते-सोचते, लावणी 180ml के बदले 240ml गटक गई। 240ml गटकने के बाद थोड़े से नशे में वो पूछने लगी… "यार मुझे तो कुछ हुआ ही नहीं। तू तो कहता था डर भाग जाएगा पर ये तो असर ही नहीं करती"..

आरव हंसते हुए… "करेगी लावणी जरूर करेगी, चलो अब कॉलेज चलते है"

लावणी, पूरे जोश में... ए रुक, मेरी स्कूटी है मैं चलाऊंगी, आज उस शशांक को मैं इसी स्कूटी से ठोक दूंगी"

आरव:- अरे नहीं लावणी तुम यदि ड्राइव करोगी तो…

लावणी:- चुप, मैं ही चलाऊंगी, तुम्हे क्या लगता है इस वोदका से कुछ नशा भी होता है क्या, बेकार दारू"

आरव, स्कूटी लावणी को थामते हुए… "ठीक है लो ड्राइव करो"

लावणी स्कूटी चलाने लगी, जैसे जैसे उसे हवा लगती अंदर से कुछ अच्छा मेहसूस होता और साथ ही साथ नशा भी थोड़ा-थोड़ा कर के बढ़ने लगा, इसी क्रम में आरव ने फिर से बात छेड़ दी शशांक की..

शशांक का नाम सुनकर, लावणी चिढ़ती हुई बोली… "नाम मत लो उसका"

आरव:- नह, तुम्हारा डर कभी नहीं जा सकता।

लावणी:- ओए पागल, मैं किसी से नहीं डरती।

आरव:- जाने भी दो, अगर किसी से नहीं डरती तो ऐसे थोड़े ना बोलती.. "नाम मत लो उसका"

लावणी:- अच्छा.. फिर कैसे बोलती मैं..

आरव:- कहती नाम ना लो उस साले का..

लावणी:- रुको मुझे ट्राय करने दो… "नाम ना लो उस साले का".. हां यार फील तो हुआ कि बातों में वजन बढ़ा है… रूको मैं शशांक को कैसे डांटती हूं वो सुनो और एडिट कर के उसमे दमदार शब्द डालो.. आज इसकी फाड़ देनी है।

आरव:- साबश.. ऐसे ही चिर फाड़ करना.. मैं तुम्हे इस से भी ज्यादा दमदार बातें सिखाता हूं …


___________________________________________________________

आरव का जब संदेश आया तबतक अपस्यु कॉलेज पहुंचने ही वाला था। कॉलेज के पास एक कैंटीन को देख कर उसने अपनी फटफटी वहीं रोकी और दोनों अंदर चले गए।

साची:- तुम कुछ प्लान कर रहे हो क्या?

अपस्यु:- नहीं बस कुछ वक्त बीतने का इंतजार, बताओ क्या लोगी।

साची:- अभी मूड नहीं है दिमाग बस वहीं अटका है।

अपस्यु:- डोंट वरी, कुछ दिनों बाद ये नहीं अटकने वाला.. वैसे तुम्हारा विषय क्या है?

साची:- हिंदी साहित्य..

अपस्यु:- तुम साहित्य कि छात्रा नहीं लगती।

साची:- क्या मतलब है तुम्हारा..

अपस्यु:- इस पर लंबी चर्चा हो जाएगी। माफ करना अभी ये विषय उठाने के लिए, इसपर फिर कभी बात करेंगे। अभी पूरा ध्यान समस्या के समाधान पर लगाते है।

साची:- वहीं तो मैं शुरवात में पूछी, कोई प्लान कर रहे हो क्या?

अपस्यु:- इस वक़्त कहां मिलेगा वो?

साची:- वो तो अभी कैंटीन में बैठा होगा और मुझे वहां जाकर सिगरेट जलानी है और उसके मुंह से लगा कर रखना है।

अपस्यु ने पहले अपनी घड़ी देखी, फिर संदेश आने का समय देखा.. लगभग 20 मिनट हो चुके थे संदेश आए… "ठीक है जैसा उसने कहा तुम जा कर वैसा ही करो"

साची:- मगर…

अपस्यु:- भरोसा रखो, सब कुछ तय हो चुका है। बस जैसा मैं कैह रहा हूं, तुम ठीक वैसे ही करो।

साची हामी भड़ती, फिर से फटफटी पर बैठ गई और दोनों कॉलेज पहुंचे। अपस्यु कॉलेज के मुख्य द्वार पर खड़ा हो कर आरव के आने का इंतजार करने लगा, इधर साची डरते-डरते कैंटीन के अंदर पहुंची..

सहमी सी वो धीमे-धीमे आगे बढ़ रही थी और उसे आते देख शशांक और उसके दोस्त जोड़-जोड़ से हसने लगे… "कितनी देर लगा दी जानेमन आते-आते, कब से सिगरेट की तलब लगी थी"

साची बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सिगरेट जला कर, शशांक के मुंह के आगे लाकर रख देती है और अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लेती है। शशांक सिगरेट की एक कस खींचते हुए, साची के कमर में हाथ डालकर उसे चेयर के हैंडरेस्ट पर बिठा देता है… "अरे तू भी एक कस खींच ले, मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा"..

ऐसा लग रहा था पर्दे पर चल रहा कोई सीन असल जिंदगी में उतर आया हो जहां मनमानी करने की पूरी आज़ादी है पर डर से कोई कुछ बोलता नहीं। घोर प्रताड़ना चल रही थी और इच्छा के विरूद्ध जबरन ऐसे काम को अंजाम दिया जा रहा था जो किसी के भी दिल और दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़ जाए।

अपस्यु को पहले तो ये मामला, मात्र कुछ रैगिंग कर रहे लडको का लगा। लेकिन जब साची के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देखा और पिछले एक महीने की बात जब ध्यान में अाई तो बस इतना ही ख्याल आया कि, ये लड़के तो कब का सीमा लांघ चुके हैं।

अभी इनकी हरकतें जारी ही थी कि अब अाई लावणी।…. "साले कुत्ते के बच्चे चल दूर हट मेरी दी से"

पूरा कैंटीन जो मौन बैठा तमाशा देख रहा था .. सब का ध्यान लावणी के ओर केंद्रित हुआ। साची, लावणी का ये रूप देख कर बिल्कुल हैरान हो गई .. और उधर ये असुर प्रवृति के लड़के ने जब लावणी को अपने खिलाफ बोलते पाया… फिर असुर तो असुर ही होते है।
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आरव:- साबश.. ऐसे ही चिर फाड़ करना.. मैं तुम्हे इस से भी ज्यादा दमदार बातें सिखाता
Ye arav sarif laundiya ko bigad raha h :bat1:
 

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पूरा कैंटीन जो मौन बैठा तमाशा देख रहा था .. सब का ध्यान लावणी के ओर केंद्रित हुआ। साची, लावणी का ये रूप देख कर बिल्कुल हैरान हो गई .. और उधर ये असुर प्रवृति के लड़के ने जब लावणी को अपने खिलाफ बोलते पाया… फिर असुर तो असुर ही होते है।

लावणी का इस तरह से बोलना उन्हें रास ना आया। शशांक लावणी को कुछ अपशब्द कहते हुए गुस्से में अपनी जगह से उठा। उठने के क्रम में साची, जो चेयर के हैंडरेस्ट पर बैठी थी, वो खुद को संभाल ना पाने की स्थिति में नीचे गिर जाति है।

साची को नीचे गिरते देख लावणी अपना आपा खो देती है और सैंडल निकाल कर शशांक के ओर दौड़ लगा देती है… लेकिन शशांक उसका गला पकड़ कर पूरे हाथों कि दूरी बनाए.. "देखो कूतिया को आज भौंक और काट दोनों रही है। लगता है आज ज्यादा ही गर्मी चढ़ी है इसे"।

लावणी:- छोड़, साले छोड़… और उसने क्या सिखाया था… ए आरव किधर है रेय, वर्ड कौन सा था … हां.. साले, हरामि, कुत्ते के पिल्ले, छोड़ मुझे, तुझे अभी बताती हूं। बहुत सह लिया तेरा .. बहुत डर-डर के जी लिया .. आज फैसला होगा..

इतने में चटाक से एक जोरदार तमाचा लावणी के गाल पर। इतना जोड़ का, की थप्पड लावणी को पड़े और दर्द साची तक गया। साची को ना जाने क्या हुआ, वो गुस्से से उठी और शशांक को इतना तेज धक्का दी की वो लड़खड़ा कर नीचे गिर गया। जब तक शशांक के दोस्त साची को संभालते, लावणी शशांक के ऊपर बैठ कर जल्दी-जल्दी पूरे दम से जो चार पांच सैंडल घुमा कर उसके थोपरे पर चिपकाई, उसकी गवाही तो उसका चेहरा ही दे रहा था।

सैंडल का सोल आरा-तिरछा लगने की वजह से उसके चेहरे पर सैंडल के सोल की लंबी-लंबी लाइनिंग छप गई। दिमाग बिल्कुल सन्न रह गया और जबतक उसके दोस्त लावणी को हटाते तबतक तो उसने शशांक का दिमाग ठंडा कर दिया था। ऊपर से उसे हटाने के क्रम में वो "वैय-वैय" करती उसने शशांक के ऊपर ही उल्टियां कर दी। लगभग उसके सिना और चेहरा इस उल्टी के चपेट में अा गया।

इतना सब तमाशा होता रहा लेकिन वहां मौजूद सभी छात्र-छत्राएं तमाशबीन की तरह तमाशा देखते रहे, कई लोग तो वीडियो बनाने का असफल प्रयास भी करते रहे लेकिन कोई बीच-बचाव को नहीं गया।

खैर मामला तूल पकड़ता देख, स्टाफ रूम से एडमिनिस्ट्रेशन टीम निकले, इधर सिक्योरिटी गार्ड जो शशांक की सुरक्षा के लिए तैनात थे, उन्होंने साची और लावणी को पकड़ कर अलग कर वहीं बिठा लिया।

अपस्यु बस इनकी भड़ास पूरी होने तक का इंतजार कर रहा था… जैसे ही उसने लावणी का पूरा एक्शन देखा, उसके तुरंत बाद ही दोनों बहनों को वहां से निकालने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

आरव को पहले ही निर्देश मिल चुके थे उसे क्या करना है, इधर अपस्यु सीधा कैंटीन में घुसा और शशांक के सिक्योरिटी गार्ड से भीड़ गया.. बहासा-बहसी होने लगी। वक़्त मज़ा लेने का था तो भीड़ क्यों ना लगे ऊपर से शशांक के सताए कुछ लोग भी पहुंचे जिनमें थोड़ी बहुत हिम्मत अा गई थी।

इधर बहस छिड़ी, भीड़ लगी और उधर आरव ने मौका देख कर दोनों बहनों को वहां से निकाल लिया। हालांकि लावणी को अभी और लड़ना था और वो जाने के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी, लेकिन किसी तरह उसे वहां से निकाल लिया गया। वो तीनो कैंटीन के गेट के नीचे आए ही थे कि उतने में ही पूरा एडमिनिस्ट्रेशन स्टाफ पहुंच गया। लावणी को बड़बड़ाते हुए पा कर उन्हें गेट पर ही सब ने रोका.. "क्या हुआ है इसे, और तुम दोनों (आरव और साची) इसे कहां लेे जा रहे हो"।

आरव:- सर पता नहीं कैंटीन में कुछ खा ली, उल्टियां अा रही है। डॉक्टर से दिखाने लेे जा रहे हैं।

तभी स्टाफ में से किसी ने कहा "उधर चलो, मामला फसा तो समझो नौकरी गई".. सभी स्टाफ कैंटीन निकल लिए और इधर आरव दोनों को स्कूटी पर बिठा कर किसी फ्लैट में लेे आया। अभी तीनों वहां पहुंचे ही थे कि पीछे से अपस्यु भी पहुंचा… "कैसी है वो"..

आरव:- पता नहीं, बेसुध है।

तभी साची गुस्से में तमतमाई दोनों भाई के पास पहुंची :- क्या नाटक हैं.. मदद करने के बदले उल्टा हमे ही फसा दिए। और इसके साथ क्या किया तुम्हारे भाई ने?

अपस्यु:- शांत हो जाओ.. तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है।

साची:- नहीं होना मुझे शांत …

अपस्यु:- एकदम चुप, और जा कर कोना पकड़ लो।.. फिर आरव से बात करते हुए… "कितना पी थी"..

आरव:- बहुत कैपेसिटी है भाई, गटागट 4 पेग मार ली, ना रोकता ती शायद पूरी बॉटल पी जाती।

साची:- मुझे लगा ही था तुम लोगों ने इसे कुछ नशा करवाया है। हे भगवान..

इसे पहले की आगे और कुछ मेलो ड्रामा होता साची का, अपस्यु उस दोबारा चुप करवाते हुए… "देखो तुम क्या चाहती हो कि तुम और तुम्हारी बहन कल अखबार की सुर्खियों में हो"…. साची ने ना में अपना सिर हिलाया… "हां तो जाओ फ्रिज से नींबू निकालो उसे लावणी के मुंह में निचोड़ते रहो। और प्लीज वहीं रहो, और मुझे करने दो जो मैं कर रहा हूं।

साची:- भड़कते क्यों हो, जा रही हूं.. ये बात आराम से भी कर सकतें थे…

अपस्यु:- 4 बजे तक मैं ना आऊं तो इन लोगों को घर भेज देना और तू भी वहीं चले जाना। और हां साची के साथ जाकर उसके लिए कपड़े लेे अा..

आरव:- कपड़े क्यों ?

अपस्यु:- अरे कपड़े गंदे हो गए हैं उसके। चेंज करवा कर, इसके पहने कपड़े धुलवा देना और जाने से पहले फिर चेंज करवा देना.. समझा।

आरव:- ओह अब समझ में आया.. तू कहां जा रहा है।

अपस्यु:- माहौल का जायजा लेकर जरा ये काम भी निपटा आऊं।

अपस्यु सारी बातें समझा कर वहां से निकल गया इधर बच गए ये तीनों जिसमें से एक तो होश में ही ना थी। लेकिन साची उसके होंठ खोल कर उसके मुंह में नींबू निचोड़ रही थी।

आरव:- चलो, इसके लिए कपड़े लेने है।

साची:- कपड़े क्यों?

आरव:- ये ऐसे उल्टी किए हुए कपड़ों में जाएगी तो घर पर क्या जवाब दोगी।

साची:- बेवकूफ, केवल दारू पीने से ही उल्टी होती है क्या… कैंटीन में खाया और हो गया ये सब.. बस

आरव:- ओह, इस बारे में मेरा भाई सोचा ही नहीं। ठीक है फिर..

लगभग 10 मिनट तक दोनों खामोश रहे फिर साची इस चुप्पी को तोड़ती हुई… "तुम्हारा भाई कहां गया"

आरव:- अपस्यु नाम है उसका..

आरव की बात सुन कर साची हंसती हुई… स्टाइलिस्ट नाम के चक्कर में कैसे-कैसे नाम रख देते हैं।

आरव थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए… कभी हिंदी नहीं पढ़ी क्या.. अपस्यु का अर्थ होता है कुशल, सक्रिय.. और ये नाम उसके ऊपर पूरा सार्थक होता है। वैसे तुम्हे खुद के नाम का अर्थ पता भी है या फिर जिंदगी भर डिक्शनरी से इंगलिश के शब्द के ही अर्थ ढूंढ़ती रही हो और हिंदी शब्द के अर्थ के लिए डिक्शनरी खोलने में शर्म आती है।

आरव की बातों में ऐसा ताना था कि बेचारी साची शांत ही हो गई। दोनों के बीच फिर से 10 मिनट की खामोशी और फिर… "वैसे तुम दोनों में बड़ा कौन है, अपस्यु ही होगा"

आरव:- बड़ा नहीं बहुत बड़ा है। कहने को ही हम सिर्फ जुड़वा है लेकिन वो भाई नहीं मेरा बाप है बाप।

साची:- ऐसा क्यों बोल रहे हो?

आरव:- कुछ दिन साथ रहो पता चल जाएगा। तुम्हे एक बात पता है..

साची:- क्या..

आरव:- वो हैंडपंप है ..

साची:- मतलब?

आरव:- हैंडपंप देखा है, ऊपर की लंबाई कितनी छोटी होती है और नीचे कि गहराई कितना ज्यादा। ठीक वो ऐसा ही है। हमारी उम्र अभी 20 की है लेकिन वो अपने उम्र से 20 साल ज्यादा का तजुर्बेकार है।

साची:- हीहीहीही… वैसे बातें तो तुम भी बहुत समझदारी वाली कर लेते हो।

आरव:- हाहाहाहा.. नहीं जी वो तो उस गधे ने दिन रात सुना-सुना कर रटा दिया है। वो ऊपर के नाम के अर्थ वाला डाइलोग उसने किसी दिन मुझे चिपकाया था आज मैंने तुम पर चिपका दिया।

इसी के साथ दोनों ठहाके मार कर हसने लगे…
Bdiya update bhai ji ?
ऊपर से उसे हटाने के क्रम में वो "वैय-वैय" करती उसने शशांक के ऊपर ही उल्टियां कर दी।
????
अपस्यु का अर्थ होता है कुशल, सक्रिय
Mujhe bhi abhi pta chla ?
आरव:- वो हैंडपंप है .
Aise steek example bhi nain bhai hi de sakte h :D
 
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