Update:-57
साची और ध्रुव को ऐसे हंसकर बातें करते हुए देख सभी लोगों के ख्यालों में ऐसा गलतफहमी का बीज उगा की दोनों की कुंडलियां बदलते हुए कहने लगे… "लगता है दोनों ने एक दूसरे को पसंद करना शुरू कर दिया है… हम भी कुंडलियां मिला ही लेते है।"…
रात के वक़्त दोनों बहने अपने रूम में थी। लावणी साची के पास बैठकर उसे देखती हुई, आज शाम की हुई घटना को बताने लगी। आश्चर्य तो उसे तब हो गया जब साची ने उसे ये कहा कि उसे सारी बातें पहले से पता थी। बस एक लड़के मिलना था.. सो वो मिल ली, अब वक़्त बताएगा की वो पसंद आता है कि नहीं, वैसे लगता है पसंद आ ही जाएगा।
साची की बात पर लावणी को यकीन नहीं हुआ और वो बार-बार यही कहती रही की आप हर काम में जल्दबाजी करने लग जाती है। इसपर साची उसे समझाती हुई कहने लगी….. "ब्वॉयफ्रैंड तो 10 मिल जाएंगे, जीवन साथी एक ही होता है। हां थोड़ा खिंचाव था अपस्यु को लेकर, कोई बात नहीं। ध्रुव को भी वक़्त दूंगी, झुकाव उस ओर भी हो ही जायेगा"
लावणी:- और यदि इसका भी पहले से कोई चक्कर हुआ तो?
"ये कम से कम उस गधे अपस्यु की तरह बताने तो नहीं आएगा। और जिसे ना देखा और ना सुना उसके बारे में क्या सोचना। वैसे भी आज शाम को ही आरव ने मुझे बताया था.. अच्छे लोग ज्यादा दर्द देते है। मैंने उसकी बात पर गौर किया और पाया कि वो सच बोल रहा था।"…
फिर जब एक बार अराव की बात शुरू हुई तब तो साची ने लावणी को घेर ही लिया। सोने तक में तो साची ने लावणी को लगभग रुला ही दिया। सुबह उठकर दोनों बहन तैयार हुई और नाश्ते के बाद वो दोनों पहुंची कमरा नंबर 806 में। आरव अपने कमरे में बैठा टॉम एंड जेरी का मज़ा ले रहा था, तभी उसके रूम की बेल बजी और दरवाजा खोला तो दोनों बहने बाहर खड़ी थी।
आरव और लावणी ने जब एक दूसरे को देखा, तो एक दूसरे से लिपटने को मचल गए, लेकिन साथ में साची थी, कुछ किया भी नही जा सकता था। दोनों अंदर आते हुई बैठी और साची आरव के ओर देखती हुई अपनी भौंहें चढ़ा कर लावणी के ओर इशारा करने लगी… आरव अपने हाथ जोड़कर साची के पाऊं में सीधा दंडवत हो गया… साची उसे आशीर्वाद देती कहने लगी… "खुश रहो बच्चा।"..
तीनों के बीच बातें शुरू हुई। यूं तो बात तीनों ही कर रहे थे, लेकिन ध्यान दोनों का एक दूसरे पर ही था जिनके बीच साची कुंडली मार कर बैठ चुकी थी। कुछ देर बात करने के बाद साची ने अचानक ही कुंजल को कॉल लगाने के लिए बोल दी…
आरव उसे कॉल लगाते हुए साची को फोन थामा दिया…. "हां मोनू…"
"मोनू नहीं साची बोल रही हूं। किधर हो अभी तुम"..
कुंजल:- न्यूयॉर्क आयी हूं साची। बाय द वे, हैप्पी हॉलीडे..
साची:- अच्छा हैप्पी हॉलीडे, इसलिए कामिनी अकेली भाग गई घूमने, सोची यहां रहोगी तो कहीं मेरा मेलोड्रामा ना झेलनी पड़े।
कुंजल:- ना रे बाबा, तुम्हारा बिल्कुल सोचना गलत है। मै यहां पहले आयी थी तो विन्नी और क्रिश के साथ न्यूयॉर्क पहुंच गई मस्ती करने।
साची:- बहुत मस्ती हो गई चल अब वापस आ जाओ। मेरे किसी दोस्त का यहां ना होना मुझे खल रहा हैं।
कुंजल:- क्या हुआ फिर किसी बात को लेकर परेशान हो क्या?
साची:- हां बहुत बड़ी परेशानी है। मैंने एक लड़का पसंद किया है और बस ऐसे वक़्त में एक दोस्त के सहारे की बहुत जरूरत है। अब हर बात हर किसी से शेयर तो नहीं कर सकती ना।
कुंजल:- ओहके डार्लिंग, आज भर यहां मस्ती मार लेने दे कल सुबह मिलती हूं।
कुंजल से बात समाप्त करके जब साची कमरे के कोने से पीछे मुड़ी… एकदम ध्यान मुद्रा में दोनों बिस्तर पर बैठे बैठे ऐसे गले लगे थे, मानो एक दूसरे से लिपट कर वहीं सो रहे हो। साची गले की खराश के साथ दोनों का ध्यान भंग करती अपनी आखें दिखाने लगी… और इधर दोनों ही शर्माकर एक लेफ्ट तो दूसरी राईट को ताकने लगी।…
इधर साची और लावणी दोनों उसके कमरे से निकले और आरव के दिल में अजीब सी बेचैनी उठने लगी। उसे अचानक ही बिना किसी चोट के तेज दर्द मेहसूस होने लगा। श्वांस लेने में काफी तकलीफ़ सी होने लगी। आरव ने जब समय देखा तो सुबह के लगभग 11 बज रहे थे।
बेचैन होकर उसने नंदनी को फोन लगाया। नंदनी उससे बात करने लगी और वहां का हाल चाल लेने लगी। आरव को बात करने में भी तकलीफ़ हो रही थी, लेकिन वो किसी तरह हंसते हुए अपनी मां से बात कर रहा था। फिर अंत में उसे पता चला कि अपस्यु सिन्हा जी के काम से बंगलौर निकला है।
आरव का दिमाग सन्न और दिल बेचैन हो उठा। बार काउंटर पर जाकर उसने पूरी बॉटल पी ली, दिल को फिर भी चैन नहीं। पीते-पीते उसके होश उड़े थे रास्ते में क्या हुआ किससे टकराया, किस से कितनी बातें हुई, कोई खबर नहीं।
अपने कमरे पहुंच कर वो ऐमी को फोन लगाया कोई जवाब नहीं। लगातार वो फोन लगाता रहा किंतु ऐमी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वो प्रतिक्रिया देती भी कैसे अपस्यु और प्लैनिंग के बीच ऐसी फसी थी कि उसका ध्यान ही नहीं गया फोन पर।
हार कर उसने स्वस्तिका को कॉल लगाया। स्वस्तिका फ्लाइट में थी इसलिए वो फोन ले नहीं सकती थी। आरव कॉल करके थक चुका था और अब एकटक बस अपने फोन को देख रहा था।
रात के तकरीबन 12.30 बज रहे होंगे। आरव अब भी बस अपनी खुली आंखों से फोन को ही देख रहा था। ठीक इस वक़्त स्वस्तिका और ऐमी अपनी चिट-चैट खत्म करके कैफेटेरिया से निकल रही थी। तभी ऐमी को ख्याल आया कि आरव से तो उसने बात ही नहीं की और जब उसने अपने कॉल लॉग पर ध्यान दी तब उसकी रूह सिहर गई…
तुरंत उसने आरव को कॉल लगाए… ऐमी का फोन देखते ही आरव ने अपनी पलकें झपकी और फोन उठाया…. "सुरक्षित है कि नहीं मेरा भाई।"…
ऐमी:- हां वो ठीक है। सॉरी आरव..
आरव:- नाह … सॉरी नहीं.. तुम ठीक हो..
ऐमी:- नहीं मुझे कुछ नहीं हुआ…
आरव, गहरी श्वांस लेते… नॉटी है क्या वहां..
ऐमी:- हां यहीं है..
आरव:- बात करवाओ मेरी..
ऐमी, स्वस्तिका को फोन देती… आरव है लाइन पर.. "कहां घूम रहा है लड़के"… स्वस्तिका फोन उठाती हुई पूछने लगी…
आरव:- नॉटी ऐमी ठीक है ना… उसकी कंडीशन स्टेबल तो है ना।
स्वस्तिका:- तू शॉक्ड हो जाता अगर ऐमी को यहां अभी देखता तो। बहुत हिम्मत दिखाई इसने तो।
आरव:- भाई को दिखाएगी क्या… मुझे देखना है?
स्वस्तिका:- हां दिखाती हूं रुको…
थोड़ी ही देर में स्वस्तिका आईसीयू में थी जहां अपस्यु बेसुध लेटा हुआ था। कुछ देर वो अपने भाई को देखता रहा, फिर उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ तसल्ली हुई आरव को, और वो वहीं परे-परे ही गहरी नींद में सो गया। इधर आरव गहरी नींद में सोया था और उधर अपस्यु।
नींद की गहराइयों में धीरे धीरे फिर से वही छवि बनना शुरू हो गया। दिमाग के कोने में वो गहरी सी यादें……
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वर्ष 2002….
दिए की रौशनी में जब आखें खुली सामने ऐमी उस फूल को मांग रही थी जिसे तोड़ने अपस्यु ऊपर चढ़ा हुआ था। गुरु निशी कुटिया में जैसे ही पहुंचे.. अपस्यु उठकर बैठ गया। सदैव की भांति गुरु के मुख पर वहीं तेज और चेहरे पर मुस्कान थी जिसे देखने मात्र से कई पिरा का निवारण हो जाए…
"अपस्यु, आप को पहले भी माना किया था ना ऊंचाई से दूर रहने"
"क्षमा गुरु देव, मै केवल मोह वाश उस फूल को तोड़ने चला गया था।"
"आप ने मेरा हृदय दुखाया है, आप को इसका दंड मिलेगा"
अपस्यु अपने शिस झुकाकर नमन करते हुए…. "आज्ञा गुरुदेव।"
"आज से महादेव वंदना और उनकी आराधना आप की जिम्मेदारी होगी। और आप बिना विफल हुए रोज ये कार्य करेंगे।
"जी गुरुदेव"
"अब आराम कीजिए और इस बालिका ने आपकी बहुत सेवा की है, इसलिए इसके निः स्वार्थ कार्य का फल मिले ऐसी कोशिश कीजिएगा।"
"जैसी आपकी इक्छा गुरुदेव"
गुरु निशी के जाते ही अपस्यु उठा और अपने बैग से वो उजला नीला फूल निकालकर ऐमी को भेंट करते हुए कहने लगा…. "यहीं फूल चाहिए था ना।"
ऐमी:- हां .. लवली फ्लॉवर। ए सुनो, तुम्हे डर नहीं लगता उस बाबा से। वो बच्चों को उठा कर ले जाते है।
अपस्यु, उसकी बात पर हंसते हुए कहने लगा…. "चिंता नहीं कीजिए आप यहां सुरक्षित है। इतनी रात को आप मेरे समीप है आप के माता-पिता आप को ढूंढ़ रहे होंगे।
ऐमी:- ऊफ़् ओ बहुत टफ लैंग्वेज में तुम बात करते हो, मुझे समझ में नहीं आया। दोबारा बताओ।
अपस्यु;- आप को फूल मिल गया ना, अब आप यहां से जाइए, आपके मम्मी-पापा इंतजार कर रहे होंगे।
ऐमी:- मै तो कई दिनों से तुम्हारे साथ ही सोती हूं डफर। अब चलो सोते हैं।
अपस्यु:- ठीक है।
ऐमी जबतक जागती रही तबतक वो बातें करती रही और अपस्यु बस उसे सुनता जा रहा था। गुरु निशी के कहे अनुसार अपस्यु सुबह के प्रहर उठकर स्नान किया और 900 मीटर की लगभग सीधी चढ़ाई के बाद ऊपर बने भगवान शिव के मंदिर पहुंचा और विधिवत पूजा करी।
महादेव वंदना की समाप्ति के बाद अपस्यु वापस उसी रास्ते से उतरने वाला था लेकिन उसके सामने जेके और पल्लवी थे… दोनों ने फिर पूछना शुरू किया कि वो 10 दिनों से कहां गायब था। अपस्यु ने सारी घटना बता दिया। अपस्यु को सुनने के बाद दोनों वापस चले गए।
उस दिन जब अपस्यु खाली समय में जेके और पल्लवी के पास पहुंचा तब वहां एक जाना पहचाना आवाज़ की भनक अपस्यु के कान में लगी। अपस्यु आवाज़ के सहारे ऐमी तक पहुंचा जो एक तरह से जेके और पल्लवी के कैद में थी।
यह कोई पहला मौका नहीं था जेके और पल्लवी के लिए, जब अपस्यु ने दोनों को चौंकाया था। नाम मात्र की निकली आवाज़ का दूर से पीछा करके वहां तक पहुंचने की अद्भुत कला पर दोनों दंपत्ति हैरान हो गए। अपस्यु के प्रशिक्षण को नया दिशा देते हुए अब उसे ब्लाइंड मूव्स और किसी अनजान जगह को दिमाग में बिल्कुल इंच दर इंच प्लॉट करने की सिक्षा मिलनी शुरू हो चुकी थी।
कुछ दिनों के बाद ऐमी अपनी छुट्टियां बीता कर वहां से चली गई। जबतक ऐमी छुट्टियों में वहां रुकी, बस अपस्यु के ही साथ होती। यहां तक कि वो उसके प्रशिक्षण के वक़्त भी उसी के साथ रहती। लगभग 6 मिहिने हुए थे अपस्यु को जेके और पल्लवी के साथ, उसके बाद वो दोनों भी वहां से चले गए और जाते जाते पूरा कॉटेज ही अपस्यु को देकर चले गए। जहां अपस्यु के लिए नई चीजों को सीखने का पूरा खजाना छोड़ा गया था।
2002 के साल का अंत भी हो रहा था, जब गुरुजी निशी अपने शिष्यों में से "प्रथम" और सहायक को चुनते। इस वर्ष पार्थ को "प्रथम" चुना गया था और वशी को "सहायक".. इसी के साथ इस वर्ष अपस्यु के दल में भी एक छोटा सा बदलाव किया गया था। उसके विज्ञान कि रुचि और जीव विज्ञान में उसके ज्ञान को देखते हुए गुरु जी ने उसके साथ अपनी पुत्री स्वस्तिका और 2 अन्य शिष्यों को उसके साथ रखे, जिनका लक्ष्य मानव जीवन को पिरा रहित सेवा देना था।
ये अपस्यु का ही प्रभाव था कि उसके साथी मित्र हर समय अपस्यु से कुछ ना कुछ नया सीखते थे। इसी क्रम में अपस्यु अक्सर पार्थ और स्वस्तिका के साथ उस कॉटेज में भी जाया करता था और उन्हें विज्ञान के साथ-साथ अन्य कला भी थोड़ी-बहुत सीखने के लिए मिल जाती थी।
2003 की सुरवात हो रही थी। हर साल अपस्यु के लिए जनवरी का महीना खुशियों से भड़ा होता था, क्योंकि पूरे महीने उसका भाई आरव और मां सुनंदा उसके साथ होती। जहां एक ओर सभी शिष्य ठंड के कारण अपने काम की गति को धीमा कर चुके होते वहीं अपस्यु हर काम को सही तरीके से जल्दी निपटाकर अपना पूरा वक़्त अपने भाई और मां को दिया करता था।
हालांकि वो उम्र ऐसी थी जहां चीजें समझ में ना आना एक आम सी बात होती है और आरव भी इसी खुन्नस में वहां रहता था, कि क्यों उसे अपने दोस्तों से दूर इस जंगल में 1 महीने के लिए पटक दिया गया है। सुनंदा आरव के इस चिढ़ को अपने प्यार से खत्म करती और अपस्यु के साथ उसे रहने के लिए प्रेरित किया करती थी।
दोनों भाई में सीखने की क्षमता तो एक जैसी थी लेकिन एक पुरव था तो दूसरा पश्चिम। अपस्यु जिस काम को लगन के साथ पूरा कर देता वहीं आरव पूरे लापरवाही के साथ उस काम को पूरा करता। हां लेकिन पूरा जरूर कर देता था। सुनंदा अपने आंचल तले अपने दोनों बच्चों पर पूरा प्यार बिखेर देती। वो वक़्त भी काफी भारी होता जब सुनंदा महीने के अंत में वापस जाती। अपस्यु रोना तो भूल चुका था, शायद चेहरे से उसके दर्द के एहसास को भी नहीं पढ़ा जा सकता था लेकिन उसके अंदर की भावना हर पल रोते रहती जिसे सिर्फ़ सुनंदा मेहसूस कर सकती थी।
वो जब भी अपस्यु को छोड़ कर जाती बस इतना ही कहती…. "मेरा बच्चा, बस कुछ दिन और यहां सीख लो, फिर हम सब साथ होंगे।" … वैसे एक हैरानी कि बात और भी इस दौरान होती, जब भी आरव उसे छोड़ कर जाता, ना चाहते हुए भी वो बिलख-बिलख कर रोता था… और अपस्यु भी उसे चुप कराते बस अपनी मां के कहे शब्द को उससे कह दिया करता।
माहौल गमगीन होता, सुनंदा और आरव की आखें नम होती किंतु अपस्यु के चेहरे पर ठीक गुरु निशी जैसा तेज होता, जो मुस्कुराते हुए अपने भाई और अपनी मां को जाते हुए देखता था