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Romance भंवर (पूर्ण)

nain11ster

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Update:-58



माहौल गमगीन होता, सुनंदा और आरव की आखें नम होती किंतु अपस्यु के चेहरे पर ठीक गुरु निशी जैसा तेज होता, जो मुस्कुराते हुए अपने भाई और अपनी मां को जाते हुए देखता था।

साल के मध्य तक ऐमी, अपस्यु के पास होती और जब वो आती फिर तो ऐसा लगता, उस माहौल में कोई सबसे अलग आ पहुंचा है। वो दिन भर अपस्यु के साथ रहती, उससे बातें करती और उसी के साथ सोती भी थी। दोनों एक दूसरे से काफी जुड़े हुए थे और जब भी साथ होते तो ये दिखता भी था।

वक़्त बीतने के साथ-साथ शिष्यों के बीच… और ऐमी और आरव का अपस्यु से जुड़े उनके दोस्तों के बीच रिश्ते गहराते चले गए। आरव अक्सर स्वस्तिका को नॉटी कहकर चिढ़ाता था, क्योंकि उसका मानना था कि गुरु निशी, एक अपनी बेटी की खुशी के कारण बाकी बच्चों को यहां कैद में रखे हैं। इस जगह पर सबके होने का कारण स्वस्तिका ही है।

वर्ष 2005 था, जब जेके और पल्लवी अपस्यु से मिलने वहां पहुंचे थे। हालाकि दोनों पहले भी बीच-बीच में अपस्यु से मिलकर उसका हाल चाल लेते रहते थे और उसके प्रशिक्षण को नई दिशा दिया करते थे।

उस वर्ष जेके और पल्लवी अपस्यु से मिलने पहले से उस पहाड़ी पर पहुंच चुके थे जहां अपस्यु सुबह के अंधेरे में हर रोज महादेव वंदना के लिए आया करता था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, कि अपस्यु सुबह जागकर जब महादेव वंदना को जा रहा हो, तब ऐमी कभी जागी हुई मिलती थी।

ये पहला अवसर था जब ऐमी सुबह जाग कर आज देखना चाहती थी, कि अपस्यु रोज सुबह उसे अकेला छोड़ कर कहां जाता था। अपस्यु उठकर जबतक स्नान कर रहा था, ऐमी भी स्नान करके पहले से तैयार बैठी थी।… अपस्यु जब अपने कुटिया ने प्रवेश किया और दिए की रौशनी में ऐमी को जागते हुए पाया तब वो उससे जागने का कारण पूछने लगा।

ऐमी भी जवाब में जिद पकड़ ली, की उसे भी देखना है कि वो कहां जा रहा है। अपस्यु दुविधा में फस चुका था। उस पहाड़ की लगभग सीधी चढ़ाई थी और ऐमी इतने जिद पकड़े थे कि उसे जाने ही नहीं दे रही थी।

पूजा अपने निश्चित समय में होनी थी और अपस्यु उसमे चूक नहीं सकता था और इसी काश-म-काश में अपस्यु ने महादेव का नमन किया और हर हर महादेव करता ऐमी को लेकर बढ़ चला। लगभग सीधे पहाड़ की चढ़ाई देखकर ही ऐमी को चक्कर आने लगे और उसने पहले फैसला किया की वो ऊपर नहीं जाने वाली। किंतु जब अपस्यु थोड़ा ऊपर आसानी से चढ़ गया, तब ऐमी को भी चढ़ने की हिम्मत मिली…

अब वो भी अपस्यु के नक्शे पर चढ़ने लगी। अपस्यु जब आगे बढ़ते नीचे देखा तब पाया की ऐमी भी ऊपर चढ़ रही थी। मजबूरन उसे वापस से नीचे आना पड़ा। अब ऐमी ऊपर और उसके ठीक नीचे अपस्यु था। वो लोग जब पहाड़ के मध्य में थे, तब सिन्हा जी और उनकी धर्म पत्नी सुनीता, जो सुबह भ्रमण को निकला करते थे, उन्होंने दूर से देखा कि आज उस पहाड़ पर केवल अपस्यु नहीं बल्कि उसके साथ कोई लड़की भी चढ़ रही है।

ऐमी की मॉम सुनीता को लगा कि कोई गुरुकुल की छात्रा होगी लेकिन सिन्हा जी को शंका हुआ कि ऐमी पूरे दिन और रात अपस्यु के साथ रहती है, कहीं वहीं तो नहीं। जब उन्हें ऐसा संका हुआ, दोनों दौड़े उस पर्वत के ओर। इधर ऊपर से जेके और पल्लवी दोनों भी उन दोनों को ऊपर चढ़ते देख रहे थे।

ऊपर पहुंचने में लगभग 100 मीटर और बचे होंगे जब ऐमी गलती से नीचे देखी और जब नीचे देखी तब उसकी डर कि कोई सीमा नहीं रही। अपस्यु उसे समझा रहा था कि बस उपर देखते बढ़ती रहो, कुछ नहीं होगा। किंतु ऐमी अब डर के साथ बढ़ रही थी और उसे बार-बार ऊंचाई का ख्याल आ रहा था।

इसी क्रम में ऐमी ऊपर के ओर पाऊं बढ़ा रही थी और वो पूरा संतुलन नहीं बना सकी। पहले उसका पाऊं फिसला फिर उसका हाथ छूटा। अपस्यु के पास बस एक पल का समय। उस एक पल में अपस्यु ने गहरी सांस खिंचा और गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध किसी भारी चीज को थामने में लगे फोर्स का ख्याल किया और अपना एक हाथ नीचे करता ऐमी को कंधे से पकड़ा, और दूसरे हाथ के पंजे से वो पहाड़ को जकड़े था।

ऐमी उचाई से गिर रही और अपस्यु तेजी के साथ उसका कंधा पूरी ताकत से पकड़ा…… बाएं हाथ से जैसे ही अपस्यु ने उसे पकड़ा दाएं हाथ की कलाई पूरी अकड़ गई और उंगलियां सीधी होकर उन खुरदरे पत्थर से घिसते हुए नीचे आने लगा। ऐसा लग रहा था अपस्यु अपने दाएं पंजे का पूरा जोर लगा कर पत्थरों में छेद करने की कोशिश कर रहा है और उसका पंजा लगातार उसके पूरे जोर लगने के विरूद्ध घिसते हुए नीचे फिसलता जा रहा था।

घिसते-घिसते वो तकरीबन 3 फिट तक नीचे आया। ऐमी को लगातार पकड़े होने के कारण, गिरने का दवाब धीरे-धीरे कम होने लगा और अंततः 3 फिट नीचे अाकर उसने एक बार फिर पूरी पकड़ बना चुका था।

ऐमी को हिम्मत देते हुए, उसने ऐमी को कंधे पर लिया और बची दूरी को तय करते वो ऊपर चढ़ गया। इस हुई घटना के साक्ष्य बने मिस्टर एंड मिसेज सिन्हा की तो दूर से देख कर ही चींखें निकल गई। इधर जेके और पल्लवी भी इस घटना को देखकर हैरान थे।

अपस्यु ऊपर आते ही बिना समय गंवाए अपनी आराधना में लग गया, जबकि जेके और पल्लवी, ऐमी को को सदमे से बाहर लाते हुए उसे नीचे लेकर गए। कुछ देर तक दोनों उसे दिलासा देते रहे और जब उन दोनों ने ऐमी के मॉम-डैड को पास आते देखा, तो वहां से गायब हो गए।

इधर अपस्यु, ऊपर जब पूजा समाप्त कर चुका था, तब उसे अपने हाथों का ख्याल आया, जिसके सहारे अब वो नीचे नहीं उतर पता। कलाई पूरी खींच चुकी थी जिसमें सुजन आ चुका था। दाएं हाथ की उंगली के नाखून उखड़ चुके थे, उंगली का उपरी हिस्से का भाग लगभग चिथरा हो चुका था और उंगलियां कांप रही थी।

इस हाथ के सहारे अब नीचे उतर पाना संभव नहीं था, अतः उसने अपने आस पास देखना शुरू किया। कुछ ही दूरी पर उसे रस्सी दिखी और वो समझ चुका था कौन जानता था कि वो अब अपने हाथो के सहारे से नीचे नहीं उतर पाएगा।

अपस्यु रस्सी के सहारे नीचे उतरा और वापस गुरुकुल लौटकर आया। जबतक वो वापस लौटा, तब तक सिन्हा जी पूरा माहोल बना चुके थे और गुरु निशी अन्य शिष्यों के साथ उसकी प्रतीक्षा में थे।

गुरु नुशी को रास्ते में देखकर अपस्यु ने तुरंत अपने हाथ पीछे किए और अपने रास्ते बढ़ने लगा। जैसे ही वो प्रवेश द्वार पर पहुंचा गुरु निशी हुए हटना पर उससे जवाब मांगने लगे। अपस्यु अपने प्रति उत्तर में केवल इतना ही कहा कि… "किसी के निः स्वार्थ सेवा का वो बस केवल छोटा सा भुगतान कर रहा था।"..

अपस्यु का जवाब सुनकर जैसे गुरु निशी गर्व महसूस करने लगे हो। कई साल पहले की बात थी जब गुरुजी ने ऐमी के सेवा के बदले उसका फल मिलना चाहिए ऐसी बोला था… और अपस्यु आज तक उस सेवा को याद रखे था। किंतु यह जवाब एक माता-पिता के लिए ये कतई ही सुकून देने वाला नहीं था, ऊपर से सिन्हा जी थोड़े गरम मिजाज के थे।

एक तो उन्हें यहां आकर ये बात खलने लगती थी कि काम में होने के वजह से वो अपने परिवार को समय नहीं दे पाते इसलिए छुट्टियां मनाने वो यहां आते है। उसपर से भी यहां वो अपनी बच्ची को प्यार करने से भी तरस जाया करते थे अपस्यु के कारण और आज तो नीचे गिरते देख प्राण ही सुख चुका था। उनसे बर्दास्त नहीं हुआ और उन्होंने अपस्यु पर हाथ उठा दिया।

हर किसी को अपनी परी थी। एक छोटा लड़का जो दर्द छिपाए चेहरे पर मुस्कान लिए वहां सामने खड़ा था… उसपर गुरुजी ने अपना रोष दिखाया और जवाब सुनकर अती संतुष्ट हो गए। वहीं सिन्हा जी भी अपने आक्रोश में अपनी छिपी पिरा, अपस्यु पर हाथ उठा कर दिखा रहे थे। किन्तु किसी ने भी ये ध्यान नहीं दिया कि उतनी ऊंचाई से बचाने के प्रयास में अपस्यु ने क्या किया?

शायद एक मूल इंसानी स्वभाव जो केवल अपना दर्द और खुशी देख रही थी लेकिन वहां खड़ा एक छोटा सा बालक सबकी भावनाओ की कदर करते बस शांत खड़ा सबके लिए अपने हृदय में प्रेम का संदेश दे रहा था। इसके साथ ही एक साहस कि कहानी, जो वो अबोध बालक लिख चुका था। अपने दृढ़ संकल्प और विश्वास के दम पर, उसने वो कर दिखाया था जो अच्छे-अच्छे प्रशिक्षित के सोच से परे था। जब उसकी उंगली से खून टपक कर नीचे गिर रहा था, गुरु निशी अपस्यु पर गर्व महसूस किए जा रहे थे, तो सिन्हा जी उसपर हाथ उठा रहे थे।

ऐमी की नजर उस टपकते खून पर पड़ी, जो उंगलियों में खून के बने थक्के (blood clot) से टप-टप करके बूंद बनकर टपक रही थी, और इसी के साथ अपस्यु के साहस की कहानी पता चल रही थी। ऐमी सहम सी गई, जब उसे याद आता रहा की किस जोड़ से अपस्यु ने अपने पंजे से पकड़ रखा था उस पहाड़ के पत्थर को और वो घिसता हुआ कितने नीचे तक आया था। और इन्हीं ख्यालों के साथ, ऐमी सदमे में जाती हुई धम्म से गिरी जमीन पर।


_________________________________​



गहरी नींद की ये वाकया, दिमाग के कहीं कोने से निकलकर अपस्यु के अंदर चलने लगी और ऐमी के गिरते देख, अपस्यु लंबी-लंबी श्वांस लेते हुए तेजी के साथ उठकर बैठ गया। उसने अपने हाथ और सीने पर लगे हर वो वस्तु हटाई जो उसे बिस्तर से जोड़े रखे थी, अपस्यु उठकर तुरंत बाहर आया…

जब घड़ी पर नजर गई तो रात के 2 बज रहे थे और ऐमी वहीं पास एक लम्बी टेबल के हैंड रेस्ट पर अपना सर रखकर सोई हुई थी। अपस्यु उसके पास बैठा और उसके सर पर हाथ रखकर अपने हाथ फिराने लगा…

एक पूरी रात वो सोई नहीं थी इसलिए वो काफी गहरी नींद में थी। सुबह जब ऐमी की आखें खुली तब उसका सिर तकिए के नीचे था और अपस्यु उसके पाऊं के पास बैठे-बैठे सो गया था।

"पागल बाहर क्यों हो, चलो अन्दर जाओ आईसीयू में।"… ऐमी, अपस्यु को जगाते हुए कहने लगी।

अपस्यु, ऐमी को पास देखकर मुस्कुराते हुए कहने लगा….. "अभी सवेरा हो गया है, मुझे लगा फिर दिए की रौशनी में तुम्हे देखूंगा।"

ऐमी:- वेरी फनी.. हा .. हा… हा .. नाइस जोक। चलो अब आईसीयू में जाओ। तुम बाहर क्यों हो?

अपस्यु:- मै गहरी नींद में था जब तुम मेरे हाथ का खून देख कर गिर गई और मेरी नींद खुल गई। मुझे लगा तुम भी मेरे साथ कहीं आईसीयू में तो ना हो।

ऐमी:- तब मै बच्ची थी समझे.. अब मै बच्ची नहीं रही, जो खून देखकर मै खुद एडमिट हो जाऊं। यदि ऐसा होता ना सर, तो आप यहां मुझसे बात नहीं कर रहे होते।

अपस्यु:- ठीक है बाबा मान लिया… वैसे समझ लो अब मुझे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है तो अब मै चल-फिर कर सकता ही हूं।

तभी उनके बीच स्वस्तिका पहुंची, अपस्यु को देख कर वो उसके गले लगती कहने लगी….. "क्या जरूरत थी ये सब करने की। जानते हो कितना डर गई थी मै।

अपस्यु:- अरे वहां परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बनी की क्या बताऊं। छोड़ो ये बाद में चर्चा करेंगे… पहले आरव से मेरी बात करवाओ…

बंगलौर में 21 जून रात के सुबह के 6.30 बज रहे थे और USA में 20 जून दिन के लगभग शाम के 8 बजे रहे थे….

दिन के लगभग 1 बजे कुंजल अपने पूरे जत्थे के साथ न्यूयॉर्क से शिकागो पहुंची थी, किंतु जैसे ही वो कमरे में आयी, यहां का पूरा हाल ही उल्टा-पुल्टा था। आरव बिस्तर के नीचे बैठा बिस्तर से टिक कर सो रहा था और आस-पास कई सारी शराब कि बॉटल लुढ़की पड़ी थी।

कुंजल को समझते देर न लगी कि ये पूरा टूल होकर बेहोश पड़ा है। वीरभद्र के साथ मिलकर, उसे उठाकर दोनों ने बिस्तर पर लिटाया फिर वीरभद्र ने उसके कपड़े बदले। जबतक इधर क्रिश ने होटल स्टाफ को बुलवाकर पूरा रूम साफ करवाया। होटल स्टाफ से पता चला कि कल ही आरव ने इनके लिए 2 कमरे और बुक करवा रखे है। कुंजल और वीरभद्र तो वहां से नहीं गए लेकिन क्रिश और विन्नी ने अपना कमरा शिफ्ट कर लिया।

वीरभद्र कुंजल से पूछने लगा कि क्या आरव को उठाना चाहिए, इसपर कुंजल उसे माना करती हुई कहने कहीं… "सोने दो वीरे जी, वैसे भी मेरे भाई बहुत कम नींद लेते है।"

कुंजल ने वीरभद्र को भी आराम करने दूसरे कमरे में भेज दी, और खुद फ्रेश होकर वहीं आरव के पास टिक कर बैठ गई। कुछ देर के बाद कुंजल ने साची को इक्तला कर दिया कि वो शिकागो पहुंच चुकी है।

दोनों बहने अपना पारिवारिक मीटिंग खत्म करके सीधा कुंजल से मिलने चली आयी। कुंजल और साची के बीच बातचीत चलता रहा और लावणी आरव को देख-देख बस उन सब के बात पर "हां हूं" किए जा रही थी।

इतने में ही आरव का फोन बजने लगा और नाम लिखा आ रहा था… नॉटी। साची और कुंजल तो गप्पे मारने में लगी थी और लावणी फोन पर नाम पढ़कर झटपट फोन उठाई… वो कमरे के दूसरे हिस्से में जाती हुई … "हेल्लो" की।

इधर स्वस्तिका किसी लड़की की आवाज सुनकर फोन स्पीकर पर डालकर अपस्यु से पूछने लगी कि ये कौन है। अपस्यु ने भी इशारों में समझा दिया कि ये आरव की गर्लफ्रेंड है। "आरव की गर्लफ्रेंड" ये बात सुनते ही स्वस्तिका ने कुटिल मुस्कान हंसी, और उसकी इस मुस्कान को देखकर ऐमी और अपस्यु भी समझ गए कि अब तो बजने वाली है आरव की।
 

Arv313

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Ye bhi adbhut tha re maza aai gawa padhake.
These lines for apsayu by Ami:-
Rota h yaad kar un lamho ko jab-Jab pareshan hota h
Kyoki uske khawabo me bhi mera chehra hota h.

Bhai ji aapse anurodh hai ki es sanchi aur uske sare kunbe ka dhang me sal baitha do(matlab ki inki akal thikane lagao).
Waiting for the next update.
 

Chinturocky

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Bichare dono bhaiyon ko koi chain se rahane nahi deta.
Aarav ki to full lagane wali hai.???
Apasyu yaar kya kahu usake baare me, aap jo usaka atit dikha rahe ho na wo bahut hi adbhut hai, chhoti si ghatna ke jariye bahut badi baat aap bata dete Ho.
Wakai me yaar isake liye heroine bhi bahut hi vishesh honi chahiye.
Is apasyu se to pyar ho gaya hai.
Isaki kahani jarur Saanchi ko aarav se sunani chahiye wo bhi jald se jald.
 

rgcrazyboy

:dazed:
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lo bechare aarav ka nasha bhi na utra use pehele he uski band bajane pe tule hai ye log.
kise ko aarav ke gum ki parawaha he nhi hai.
sab ke sab swarthi log :bat:

paki first part ke bare main kuch nhi bona mere ko :superb:
 

Milan2010

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hahaha .. yahan sab rattamar hi hain milu bhai .. ab unka writer hi ratta mar hai to bakiyon ka kuch kha hi nahi ja sakta :D.... hum sab ratta mar hain .. waise aunty ko samjhane ka koi matlab na hai ... agar itni hisamjhdar hoti to bahas hi nahi hota ... waise yadi 19-20 sal ki knya ju ke liye aunty ho gayi fir tom ujhe shaq hai ki milu to abhi kiddo hi rah jayega :D

fir sachi se kaise riste ki baat aage badhegi .. jara bata do mujeh :D...

thanks for such a wonderful comment :)
sachi ke saath baat kese aage badhegi yeh toh aap ko maalum :D
 
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