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Romance भंवर (पूर्ण)

aman rathore

Enigma ke pankhe
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Update:-27




अपस्यु:- वो उसे फैसला करने दीजिए। आप बस अपनी बात कहिए आंटी।

कुंजल:- क्या बात है मां, आप को इतना बताने में क्यों वक़्त लग रहा है कि इनके पापा के धोक की वजह से मेरे पापा ने आत्महत्या कर ली और मेरा छोटा भाई ये हादसा बर्दास्त नहीं कर पाया।

अपस्यु:- क्या ???? अंकल और मानस नहीं रहे?

नंदनी:- मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं। तुमलोग अपनी बहन को ढूंढ़ते यहां तक आए वही बहुत है। अब तुम जाओ, वरना कहीं तुम्हारे मम्मी-पापा को पता चला कि तुम मुझसे मिलने आए थे, तो वो गुस्सा करेंगे।

अपस्यु:- गुस्सा करने के लिए गुस्सा करने वालों को जिंदा भी रहना पड़ता है। जो जिंदा ही नहीं वो क्या गुस्सा करने आएंगे?

कुछ देर पहले आरव और अपस्यु अचरज में थे अब बारी नंदनी और कुंजल की थी। नंदनी आश्चर्य से देखती उनसे पूछने लगी… "ये कब हुआ?"

अपस्यु:- 14 जून 2007…

नंदनी अपने सिर पर हाथ रख कर बिलखती हुई कहने लगी…. "मुझे आज तक लगता रहा की तुम्हारे पापा ने मेरे बच्चे और पति का कत्ल करवाया है"…

"ये क्या बोल रही हैं आप?".. यह इतना बड़ा झटका था कि सबके चेहरे पर केवल आश्चर्य के भाव थे और कुंजल तो जैसे टूट ही गई हो। उसको ऐसा झटका लगा था कि उसका दिमाग जी सुन्न पड़ गया।

नंदनी:- ये बात आज तक मैंने कुंजल को भी नहीं बताई। ये घटना ठीक एक दिन बाद की है, 15 जून 2007. हम टोरंटो में थे अपने घर, जब मुझे ये सूचना मिली कि ओटावा में मेरे पति और बच्चे की लाश मिली है। गला घोंटा कर हत्या किया गया था और कातिलों का कोई सुराग तक नहीं मिला।

"आपने इतनी बड़ी बात आज तक मुझसे छिपाए रखी।" कुंजल फुटफुट कर रोती अपनी मां से पूछने लगी। नंदनी अपनी आशु छिपाती, अपने बेटी के सिर को वापस गोद में रखकर उसके आंसू पोंछती उसके सर पर अपने हाथ फेरने लगी।

अपस्यु:- बहुत सी बातें है कुंजल उस वक़्त की जो मुझे भी पता नहीं, और शायद आंटी तुम्हारे मन में भी जहर नहीं घोलना चाहती थी इसलिए नहीं बताया। हां लेकिन इस वक़्त मैं केवल इतना ही कहूंगा कि मेरे पापा और मम्मी ने आप लोगों के साथ कोई बेईमानी नहीं किया।

कुंजल, अपने प्रियजनों कि हत्या के बारे में सुनकर सिसक रही थी और सिसकती आवाज़ में ही पूछने लगी…. तो फिर मेरे पापा को उनका हिस्सा क्यों नहीं मिला?

अपस्यु:- इस "क्यों" ने ही हमारे पूरे परिवार को आज इस मोड़ पर ला खड़ा किया है। मुझे बस इतनी शिकायत थी कि दो भाइयों में आपसी अन-बन होते रहती है, किंतु इतना भी बड़ा क्या बैर की अपने भाई की मौत पर उसकी लाश तक देखने नहीं आए परन्तु आप लोगों को सुनने के बाद कहानी पूरी समझ में अा गई।

नंदनी:- कैसी कहानी।

अपस्यु:- सी.ए.बी (चन्द्रभान एंड भूषण) लिमिटेड 2003 से घाटे में चल रही थी। केवल कनाडा ही नहीं बल्कि फ्रांस में भी अपनी कंपनी नीचे गिर रही थी।

नंदनी:- लेकिन फ्रांस में तो लगातार ग्रोथ दिख रहा था।

अपस्यु:- वो इसलिए क्योंकि एक बात जो आप को पता नहीं, पापा अपना घाटा पूरा करने के लिए हवाला का काम करने लगे थे। दूसरों के ब्लैक मनी को व्हाइट करना और ये कंपनी के प्रॉफिट में शो होता रहा।

नंदनी:- क्या ??? तुम्हे ये सब कैसे पता।

कुंजल:- तो क्या तुम दोनों भी वही काम कर रहे हो इस वक़्त। तुम्हारे रहन-सहन देख कर तो ऐसा ही लगता है।

अपस्यु:- पागल, ये सब पैसे तो सी.ए.बी को पूरी तरह से बेचकर मिले है। तकरीबन 200 करोड़ है जिसके व्याज के पैसे पर हम ऐश करते हैं।

आरव:- तू क्यों मुंह छोटा कर रही है, तुम्हे भी पूरे पैसे मिलेंगे ऐश करने के लिए।

कुंजल:- ये बोलता भी है क्या? इतनी देर से सारी बातें सोनू ही बोल रहा था तो मुझे लगा इसे बोलना नहीं आता।

अराव:- बोलना, समझना और समझाना ये सब इसी का डिपार्टमेंट है। मुझसे ये नहीं होता।

"मुझसे भी नहीं होता"… कुंजल हंसती हुई बोली और आरव के ओर हाथ बढ़ा कर ताली बजाने लगी।

नंदनी:- भाई साहब ये कैसा काम कर रहे थे। क्या उन्हें कभी ख्याल नहीं आया कि गलत काम कर रहे है?

अपस्यु:- बहुत लंबी कहानी है आंटी। पहले आप लोग चलो यहां से। आपसे कभी इस हाल में मुलाकात होगी सोचा ना था। कुंजल को पता है कि आप रॉयल फैमिली से बिलोंग करती है।

नंदनी:- उस परिवार का दामन तो मेरी शादी के बाद ही छूट गया था, इसलिए मुड़ कर दोबारा ख्याल भी नहीं आया की मैं किसी रॉयल फैमिली से बिलोंग करती हूं।

कुंजल:- मोम आपने मुझसे कितना कुछ छिपाए रखा?

नंदनी:- नहीं बेटा, अभी जब सोनू ने रॉयल फ़ैमिली बोला तब याद आया कि मेरा मयका भी है, वरना शादी के बाद तो भूल ही गई थी। ये सब छोड़ो सोनू तुम मुझे पूरी बात बताओ ये अधूरी बात काटने दौड़ती है।

अपस्यु:- अभी चलते हैं यहां से … आप को यहां तो मैं एक पल भी नहीं रहने दूंगा।

नंदनी:- नहीं जो तुम्हारे पास है वो तुम्हारा है .. तुमदोनो बस मिलते रहना। हम यहां खुश हैं।

अपस्यु:- आरव, लेे भाई अब जोर जबरदस्ती वाला सीन अा गया है .. संभाल इन्हे तू।

फिर क्या था आरव कुंजल को लेकर निकल गया और इस बार वो अपस्यु से कहता गया कि कार कि जीपीएस फॉलो कर आंटी को साथ लेकर अा। हालांकि नंदनी तो जिद पकड़े थी लेकिन अराव कुंजल को जबरदस्ती वहां से लेकर गया। कुंजल को लगा कि वो अराव के साथ उसके घर जाएगी लेकिन अराव उसे सीधा लेकर पहुंचता है शहर से सबसे बड़े शॉपिंग मॉल।

नंदनी जिद्दी थी तो अपस्यु भी हटी था, वो तब तक नहीं माना जबतक नंदनी ने हां नहीं की। नंदनी उस जुग्गी से कुछ सामान लेना चाहती थी लेकिन अपस्यु उसे खींच कर बाहर लेे आया और एक समान तक उठाने नहीं दिया। दोनों पैदल ही सड़क तक निकले।

"तुमने पूरी बात अब तक नहीं बताई अपस्यु, कुछ संदेह मेरे अंदर उठ रहे हैं, मैं उनके सामने मैं जाहिर नहीं करना चाहती थी लेकिन मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है"… नंदनी ने अपना सवाल रखा।

"यदि आप सोच रहे हैं कि पापा के गलत काम के वजह से अंकल का कत्ल हुआ तो आप गलत सोच रही है। क्योंकि अब मुझे समझ में आ रहा है कि पापा ने उस वक़्त अंकल से झगड़ा क्यों किया होगा?"

नंदनी:- क्यों किया था?

अपस्यु:- पापा को पता था कि वो क्या कर रहे है और गलत काम में वो पूरे परिवार को सामिल नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने दिखाने के लिए अंकल के साथ बेईमानी किया। वो नहीं चाहते थे कि उनके राजदार को ये लगे की पापा के धंधे में उसका भाई भी हिस्सेदार है।

नंदनी:- हम्मम ! तो फिर वो कत्ल की वजह क्या रही होगी?

अपस्यु:- मैं बस उन्हीं कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। हां लेकिन पापा ने कुछ बॉन्ड्स और पेपर चाचा के लिए छोड़े थे जो तकरीबन इस वक़्त 100 करोड़ से ऊपर के होंगे, मैंने सब संभाल कर रखा है। पापा भारत से फ्रांस लौटकर किसी तरह उन पेपर्स को अंकल तक पहुंचा ही देते लेकिन ऐसा हो ना सका।

नंदनी:- तुम तो बहुत छोटे से ही यहां आश्रम में रहते थे ना सोनू, फिर तुमने कंपनी कैसे बेच दी और इतनी सारी बातें तुम्हे कैसे पता?

अपस्यु:- जब मैं नैनीताल में गुरुजी के पास था, तब वहां मुझे एक गॉडफादर मिल गए थे। मेरी सारी जानकारी के पीछे उनका ही पूरा योगदान रहा है बस एक ही चूक हो गई, हमने अंकल के बारे में थोड़ी छानबीन की होती तो आप को इस हाल में नहीं रहना पड़ता और ना ही मुझे अपने ही परिवार के लोगों से नफरत करनी पड़ती।

नंदनी:- तुम्हारा हर जवाब मन में एक सवाल छोड़ रहा है सोनू। मुझे तुम केवल इतना बता दो कि क्या तुम उन लोगों के पीछे हो जिन्होंने तुम्हारे मॉम्-डैड का कत्ल किया? क्योंकि छानबीन की बात करना और जितने विश्वास के साथ तुमने अपनी बात रखी है ये उसी ओर इशारा करते हैं।

अपस्यु:- नहीं मैं किसी के पीछे नहीं हूं। पापा ने गलत किया था और उनके किए की सजा मेरी मां और हम दोनों भाइयों को मिली। वो गुजरा वक़्त था बीत गया। मेरे गॉडफादर ने मुझे उस वक़्त संभला था और उन्होंने ही मेरे पापा के बारे में पूरी जानकारी दी थी। साथ में उनके पास मेरे पापा के कुछ दस्तावेज भी थे, जो उन्होंने सबकी नजर से बचा कर मुझे लाकर दिए थे। उन दस्तावेजों में, दिल्ली के 3 बेनामी फ्लैट, सी.ए.बी का पूरा पेपर और अंकल के नाम के बोंड पेपर्स थे।

नंदनी:- तो फिर तुमने वो बोंड पेपर के खातिर भी अपने अंकल को ढूंढ़ने की कोशिश क्यों नहीं की?

अपस्यु:- उस वक़्त मैं खुद ही संभलने कि कोशिश कर रहा था। मेरी कोई उम्र थी क्या? वैसे भी उन बोंड को मैंने अपना धन कभी नहीं माना, इसलिए आज भी लॉकर में वो पड़ा है। हां लेकिन कभी उस पेपर को उसके सही मालिक तक पहुंचने की कोशिश भी ना किया। क्योंकि आप ही बताइए, एक छोटा लड़का जो अनाथ हो गया हो और उसके परिवार से कोई ना आया देखने तो कैसा मेहसूस करेगा। और वो कैसी सोच रखेगा परिवारवालों के लिए।

"कितना अजीब लगता है ना सब कुछ लूट जाने के बाद अपनी लूटी-पिटी जिंदगी की समीक्षा करना। इसमें कोई दो राय नहीं कि तुम्हारे पापा के वजह से हम सब का ये हाल हुआ"… नंदनी खुद को संतुष्ट करती अपस्यु से अपनी बात कही।
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"कितना अजीब लगता है ना सब कुछ लूट जाने के बाद अपनी लूटी-पिटी जिंदगी की समीक्षा करना। इसमें कोई दो राय नहीं कि तुम्हारे पापा के वजह से हम सब का ये हाल हुआ"… नंदनी खुद को संतुष्ट करती अपस्यु से अपनी बात कही।

अपस्यु:- इसमें कोई दो राय नहीं। इस पूरे प्रकरण का एक ही दोषी है चन्द्रभान रघुवंशी, जिसे मैं तो कभी इस जीवन में माफ़ नहीं कर सकता।

नंदनी:- वो पिता है तुम्हारे और अब इस दुनिया में भी नहीं रहे। उनके लिए ऐसा नहीं बोलते।

अपस्यु:- किसी सिंडिकेट के सदस्य के लिए मेरे विचार कभी नहीं बदल सकते और ना ही ये नफरत कभी ख़त्म होगी। 10000 की कमाई हो, चार सुखी रोटी और एक छोटी सी छत के नीचे, प्यार से जिंदगी बिताई जा सकती है लेकिन खून से सना हुआ पैसा खाने वाले कभी चैन से नहीं रह सकते। अपने पापा के कृपा से कुछ पैसे हमने भी कहा लिए थे शायद, इसलिए तो आज तक परिवार को तरसते रहे।

नंदनी:- बड़ी बड़ी बातें हां, चलो अब बीती बातों पर मिट्टी डालो, फिर कभी जब हमे रोना होगा तब याद करेंगे इन्हे। अच्छा सुनो सोनू, मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम मुझे चाची, काकी या फिर छोटी मां कहो, क्योंकि ये आंटी शब्द मुझे बार-बार उस कल्चर और जगह की याद दिलाती रहेगी जिसे मैं याद नहीं करना चाहती।

अपस्यु, नंदनी के साइड से गले पड़ते… "क्यों मां नहीं कह सकता क्या"… नंदनी उसके गाल को प्यार से सहलाती बस मुकुरती हुई उसे देखी और दोनों चल दिए। इधर आरव अपनी बहन को प्यार से शॉपिंग करवा रहा था, उधर अपस्यु अपनी मां को। कुछ तो कुंजल और नंदनी अपने पसंद की के रही थी और बहुत कुछ ये दोनों भाई अपनी मां और बहन के लिए खरीद रहे थे।

ऐसा लग रहा था दोनों भाई दिल खोलकर पैसा लुटा रहे थे। शॉपिंग के दौरान जब कुंजल और नंदनी दोनों किसी अंडरगार्मेंट शॉप में घुसे तब अपस्यु, आरव के पास आकर पूछने लगा…. "ओ बेवड़े, तूने शराब की बोतल कहीं किसी कोने में इधर उधर तो ना रखी।"

अराव:- सच में मुझे याद नहीं। वैसे भी मुझे पता है आज तू उन्हें अपना फ्लैट तो नहीं ही देखने देगा।

अपस्यु:- साला जुड़वा होने का यही गम होता है, तू कभी-कभी ना मेरा दिमाग पढ़ लेता है।

अराव:- छी इतने बुरे दिन ना आए की तेरा दिमाग पढूं। तेरी सोच मैं जानता हूं कितनी दूर की है इसलिए मैंने कहा। वैसे भी गोबर भड़ा है तेरे दिमाग में… तेरा दिमाग पढ़ने की भी शक्ति किसी को मिले ना तो मैं उसे यहीं कहूंगा.. भाई जिंदगी से ऊब गए हो और बाबा बनने कि ख्वाहिश हो तभी इसका दिमाग पढ़ना।

अपस्यु:- कुत्ता है तू और कुत्ता ही रहेगा। कभी ना सुधर सकता। वैसे मुझे लगता है कि अपनी कुंजल के लिए भी एक फटफटी और फैमिली के लिए एक कार लेे लेनी चाहिए।

अराव:- हां हां क्यों नहीं। अपनी भी फैमिली है तो एक नहीं 2 फ़ैमिली कार होनी चाहिए।

अपस्यु:- ओए पागल अभी एक ही रहने देते हैं दूसरी फिर कभी देखते हैं।

तबतक सामने से दोनों भी अा गए। आते ही कुंजल दोनों भाइयों के बीच खड़ी हो गई और अपनी मां को फोन देती कहने लगी… "एक फोटो मम्मा भाइयों के साथ। आज मैं भी एफबी पर पोस्ट करके सबको बताऊंगी मेरे पास 2 भाई हैं।"

अराव ने वो पुराना सा फोन देखा और उसके अंदर से सिम निकाल कर उसे नीचे फेंक दिया।… "ये क्या किया, मेरा फोन"… कुंजल नकियाते हुई बोलने लगी।

अराव:- ओह सॉरी। अब तो फोन टूट गया, कुछ नहीं किया जा सकता। चलो चलकर नया देख लेते हैं।…

नंदनी दोनों भाई को आखें दिखाती….. "जितना का तुमने शॉपिंग की है ना उतने में कितने गरीब कई महीनों तक खा लेते।"

अराव:- मां एक अपस्यु कम था क्या? प्लीज आपको जो सुनाना है सुना देना। चाहे तो मार भी लेना, लेकिन अभी मैं पैसे नहीं खर्च कर रहा बल्कि अपनी बहन के लिए खुशियां खरीद रहा हूं।

नंदनी:- पैसे के नशे में इतना भी अंधा होने की जरूरत नहीं। यदि तुम्हारा ऐसा ही सोचना है कि पैसों से तुम खुशियां खरीद रहे हो तो मैं यहां से जा रही हूं।

अपस्यु:- आप का गुस्सा जायज है। मैं भी आप की बातों से सहमत हूं लेकिन हर वक़्त की अपनी कहानी होती है मां। अब ये भी तो है ना, कि हम जो भी सामान खरीद रहे हैं उसे बनाने वाला कोई मजदूर ही होगा, क्योंकि इन फैक्ट्री में भी तो कोई ना कोई गरीब ही काम करता होगा। ऊपर से इन वस्तुओं का टैक्स सरकार के पास जाता है तो सरकार फिर उन्ही पैसों को जन-कल्याण के लिए लगाती हैं। यदि हम पैसा अपने घर में रखे रहेंगे तो पैसा बाजारों में नहीं पहुंचेगा और पैसे बाजार में ना पहुंचने के कारन….

नंदनी:- बस…बस…. तुम मुझे अर्थशास्त्र मत सिखाओ। तुम मुझे ये समझाने की कोशिश कर रहे हो कि इतने बड़े मॉल में सामान खरीदने से गरीबों का कल्याण होगा। बहुत ही निम्न स्तर की बातें थी ये।

अपस्यु:- अरे मां सुनो तो, क्यों गुस्सा हो रही हो। बस 1 दिन छूट देदो बस आज के दिन। केवल आज .. आज .. आज…

नंदनी:- ठीक है सिर्फ आज… भविष्य में कुछ भी पैसों का नाजायज करते हुए पकड़े गए तो सोच लेना।

"उफ्फ ! सही है समझने और समझाने का काम इन्हीं दोनो को करने दो"… कुंजल फिर से हंसती हुई अपनी बात कही और हाथ अराव के ओर बढ़ा दी ताली के लिए… दोनों वहां से निकल गए फोन खरीदने और अपस्यु नंदनी को ग्राउंड फ्लोर पर बेंज शोरूम में लेे आया।

"अब तुम ये मत कहना कि यहां हम कार खरीदने आए हैं"… नंदनी अपनी आखें दिखाती हुई कहने लगी। अपस्यु ने अपने दोनो कान पकड़े और मुंह से बस "प्लीज, प्लीज" करने लगा। एक बच्चे कि जिद और हट के आगे नंदनी को भी हार मानना ही परा, और शोरूम से उठ गई बीएमडब्लू 1 सीरीज की कार।

तबतक अराव और कुंजल भी वहां पहुंच चुके थे। कुंजल सामने नई बीएमडब्लू देख कर कभी इधर उछल रही थी तो कभी उधर। नंदनी उसे देख मुस्कुराती हुई कहने लगी… "ये तो आज पागल हो गई है और तुम सब भी.. अब घर चलो, शॉपिंग खत्म हो गई।"

अपस्यु:- मां आप इनके ड्राइवर के साथ जाओ, मैं कागजी कार्यवाही पूरा करके आया। और ये दोनों अभी पीछे से दूसरी कार में जा रहे है।

अपस्यु ने सभी को भेज दिया और वहां पूरे पेपर वर्क खत्म करने के बाद, एक नई स्कूटी खरीदा और सीधा अपार्टमेंट पहुंचा। वहां कुंजल और अराव पहले से ही पहुंचे हुए थे और अपार्टमेंट के मुख्य द्वार पर ही इंतजार कर रहे थे।

"ये किसकी स्कूटी उठा लाया"… कुंजल, अपस्यु को दूर से ही देखती हुई पूछने लगी…. "ध्यान से देख, सब समझ में आएगा"… अराव ने उसके सर पर पीछे से हाथ मारते हुए बोला…

कुंजल:- ये तो नई स्कूटी है?
अराव:- ये नई स्कूटी नहीं तुम्हारी नई फटफटी है।

"सच में" कुंजल उत्सुकतावश पूछी और अराव ने सर हिला कर हां में जवाब दिया। वो खुशी से उछल पड़ी और अराव के गले लग गई। गले तो लगी लेकिन साथ में आशु भी अा गए।

अराव:- तुझे क्या हुआ.. रोने क्यों लगी।
कुंजल:- जब मैं सड़क पर चलती थी तब अपने अतीत को याद करके बस यही सोचती कि आज मेरे पापा होते तो मैं ये सब करती वो सब करती।… हां जानती हूं थोड़ी स्वार्थी हो रही हूं.. लेकिन मेरे तो एक भी अरमान कभी बाहर ही नहीं आए बस जिंदगी ही पीस कर रह गई।
अराव:- बस कर पागल मुझे भी रुला रही है। और हां हम अपने सारे अरमान पूरा करेंगे बस दो काम करना पहले तो अगर रोना हो तो बाथरूम में चली जाना..
"और दूसरी"… कुंजल हंसती हुई अपने आशु पोछती अलग हुई।
अपस्यु:- दूसरी ये की मां को कभी पता नहीं चलने देना। मैंने हिटलर शब्द नहीं कहे जो ये जरूर कहता।
अराव:- अब कौन किसका दिमाग पढ़ रहा है।
अपस्यु:- मैं कोई चमत्कारी बाबा हूं क्या जो तेरे मन की बात पढ़ लूंगा। बस तेरी जुबान और भाषा पर मुझे पक्का यकीन है।
कुंजल:- भाई मेरी स्कूटी से उतरो। मुझे पसंद नहीं कोई मेरी निजी चीज को हाथ लगाए।
अपस्यु:- ओ मैडम जी, नई गाड़ी को लाने और उस गाड़ी से ड्राइवर को उतारने की बक्शीस लगती है। वो पेड करी और लेे जाई अपनी स्कूटी..
"ये लो अपना मेहनताना मिस्टर ड्राइवर"… कुंजल 2 रुपए का सिक्का उसे निकला कर देने लगी जिसे देख अराव जोड़-जोड़ से हंसने लगा।

तभी हॉर्न बजाती हुई उस सड़क पर बेंज दिखी। यूं तो थी वो दिल्ली ही, लेकिन कुछ गाड़ियों का रूतवा ही अलग होता है, लोग मुड़ कर देखने को विवश हो ही जाते हैं। फिर अंदर बैठा आदमी भले ही भिखारी के कपड़े क्यों ना पहने हो, लोगों को उसमे भी फैशन नजर अा ही जाता है।

सब पैसे की माया है और अपस्यु ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी इस माया को खुलकर बरसाने में। शायद उसके मन में भी कहीं ना कहीं ये बात बैठी थी कि कुंजल और मां ये सब भौतिक सुख सुविधा की योग्यता शुरू से रखती थी बस वक़्त और हालत ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबुर कर दिया।
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सब पैसे की माया है और अपस्यु ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी इस माया को खुलकर बरसाने में। शायद उसके मन में भी कहीं ना कहीं ये बात बैठी थी कि कुंजल और मां ये सब भौतिक सुख सुविधा की योग्यता शुरू से रखती थी बस वक़्त और हालत ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबुर कर दिया।

कुछ ही देर में नंदनी भी अपार्टमेंट पहुंची। अराव ने ड्राइवर को कुछ पैसे देकर वहां से भेज दिया और कार पार्किंग में लगाकर सभी ऊपर फ्लैट के ओर बढ़ने लगे।

3 बेनामी फ्लैट में से 2 फ्लैट यहीं आजू-बाजू थे। एक फ्लैट नंबर 301, जो सबसे आखरी में था, जिसकी बालकनी से साची का पूरा घर दिखता। और दूसरी ठीक उसके बाजू में फ्लैट नंबर 302 थी, जिसे दोनों भाई बस साफ रखते थे लेकिन कभी इस्तमाल नहीं किया। तीसरी फ्लैट वहीं थी जहां लावणी को बेहोशी की हालत में लेकर गए थे।

अपस्यु ने 302 का दरवाजा खोला और सभी लोग अंदर। 4 बीएचके डबल स्टोरी फ्लैट थी, जिसके नीचे के फ्लोर पर केवल हॉल, किचेन और एक स्टोर रूम था। ऊपर 3 कमरे और बालकनी था। यूं तो अपस्यु और अराव ने कभी इसे प्रयोग में नहीं लाया, लेकिन सुख सुविधा का सारा समान यहां था, जो हर घर की जरूरत होती है।

कुंजल फ्लैट देख कर काफी खुश हुई और वो अपने कमरे का चुनाव करने सीधा ऊपर चली गई। नंदनी नीचे से ऊपर पूरे घर को देखती हुई चली। ऊपर पहुंचकर वो सभी कमरों को देखने के बाद, अपस्यु और अराव दोनों के कान पकड़ती हुईं… "तुम दोनों जहां रहते हो मुझे वो फ्लैट भी देखना है।"

कुंजल:- मॉम इतना व्यवस्थित घर है, फिर भाई कहीं और क्यों रहता होगा?

नंदनी:- अभी 2 मिनट में पता चल जाएगा कि कहां रहता है।

इधर अराव और अपस्यु एक दूसरे को देखते हुए, संकेत में ही बात करने लगे… "पकड़े गए यार, लेकिन मां को पता कैसे चला।"

"पता नहीं रे अराव, शायद यहां कुछ भी अव्यवस्थित नहीं इसलिए पकड़ ली"

"अब चप्पल भी पड़ेंगे"….. "लगता तो ऐसा ही है भाई"…. "दोनों भाई जो आखों ही आखों में इशारा खेल रहे हो ना, उससे काम नहीं बनने वाला। मुझे अभी ही तुम्हारे घर को देखना है।"…नंदनी दोनों के इशारों की चर्चा को भंग करती हुई अपनी बात कही।

बेमन होकर दोनों को ना चाहते हुए भी 301 का दरवाजा खोलना पड़ा। उस फ्लैट में घुसते ही आखों के सामने हॉल का जो नजारा था उसे देखकर…. "हां तो सारे राज यहां दफन है। क्या मैं जान सकती हूं, तुम दोनों भाई अपने इस कबाड़खाना पर कितना खर्च कर चुके हो"..

अराव लॉकर से फाइल निकाल कर नंदनी को दिखाते हुए… "मां इस हॉल में लगे सभी उपकरणों पर हमे 6 करोड़ का खर्च हुआ है।".. 6 करोड़ का नाम सुनते ही नंदनी अपना सिर पकड़ ली। फिर बात आगे ना बढ़ाते हुए सीधा किचेन की ओर गई और वहां लगे बड़े से डबल डोर फ्रिज को देखती हुई पूछने लगी….. "और इसके विषय में क्या कहना है?"

पूरा फ्रिज ही बियर और वाइन से भड़ा परा था, और वाइन भी काफी कीमती नजर आ रही थी। इसी बीच कुंजल एक छोटे से बनी काउंटर के पीछे गई और वहां दीवार पर लगे पर्दे को हटा दी…. "मॉम यहां तो पूरा बार खुला है।"

नंदनी कुंजल को लेकर वहां से गुस्से में निकली और जाते-जाते बोलती हुई निकली……. " पहेल मुझे एक-एक पैसे का हिसाब चाहिए… उसके बाद मैं तुम दोनों की खबर लेती हूं।"

नंदनी के जाते ही अराव अपना चेहरा बनाते हुए कहने लगा…. "उस राजीव मिश्रा की बद्दुआ लगी है मुझे"

अपस्यु:- कौन राजीव मिश्रा?

अराव:- लावणी के पिताजी और कौन…

अपस्यु, जोड़-जोड़ से हंसते हुए:- "लावणी का बाप" से "लावणी के पिताजी" .. तेरे भाषा में तो सुधार आने लगा है रे…

अराव, उसके बाल को नोचते… "चल फाइल लेकर हिसाब देने। मेरे सामने तुझे बहुत कॉमेडी सूझ रही है ना.. करके दिखाना नंदनी रघुवंशी के सामने कॉमेडी"..

दोनों भाई बिल्कुल किसी मासूम बच्चे की तरह अपनी गर्दन नीचे झुकाए, 5 मोटी-मोटी फाइल्स के साथ नंदनी के पास पहुंचे।

नंदनी:- ये सब क्या है?

अपस्यु:- ये सारे बिल्स है जो हमने आज तक खर्च किए हैं।

कुंजल:- तू इधर अाकर बैठ ना मोनू, वो दोनो बात कर रहे है ना।

नंदनी:- तुम्हे बहुत मस्ती सूझ रही है ना तो तुम भी अाकर सामने खड़ी हो जाओ।

कुंजल:- जाने भी दो ना मॉम, अब से भाई कुछ भी नाजायज पैसे नहीं खर्च करेगा। और ना ही फिर कभी शराब को हाथ लगाएगा। क्यों भाई?

अराव:- हां मां आज से हम बिल्कुल भी ऐसा नहीं करेंगे।

नंदनी:- चुप हो जाओ तुम सब। यहां की बॉस मैं हूं और यहां सिर्फ मैं बोलूंगी। समझे तुम सब।

पहले तो नशे और उसके उत्पाद जो घर में रखे थे उसपर दोनों भाई की पूर्ण रूप से क्लास लगी। उठक बैठक भी करना पड़ा, साथ में वादा भी लिया गया। उसके बाद इनकी फिजूलखर्ची पर नजर डाली गई और किन-किन मदों में पैसे लुटाए जाते रहे हैं, उस विषय पर चर्चा होने लगी।

इन मामलों में दोनों भाइयों ने अपनी मां का दिल जीत लिया, इन्होंने जो भी वस्तु खरीदी थी उन सभी सामानों का बिल फाइल में रखा था। साथ ही साथ फिजूल खर्ची में बस दारू ही मुख्य वस्तु था, जिसका सालाना खर्चा 10 लाख का था। जिसे अब नंदनी ज़ीरो होते देखना चाहती थी।

सभी पैसों के हिसाब भी वहीं मिल गए जहां 200 करोड़ का सालाना व्याज लगभग 9 करोड़ बैंक से मिला करता था, सभी टीडीएस और इनकम टैक्स काट कर। 4 साल से ये ब्याज दोनों भाई को मिल रहे थे जिसके मुख्य खर्चों में केवल उनकी एक स्पोर्ट्स और एक लग्जरी गाड़ि का बिल 7 करोड़ का था। इसके आलवा 8 करोड़ कुल खर्चा दोनों फ्लैट रेनोवेशन में और सालाना 2 करोड़ ये लोग अपने द्वारा चलाए जाने वाले अनाथालय सुनंदा चिल्ड्रंस केयर में देते थे।

4 साल के 36 करोड़ के व्याज के पैसों में से अब भी इनके पास 12 करोड़ बैंक में ही पड़े थे, और 8 करोड़ का दान इन लोगों ने अपने मां के नाम से शुरू किए हुए अनाथालय में दिया था। नंदनी पूरा हिसाब देखते-देखते जैसे फक्र सी मेहसूस करने लगी हो दोनों पर।

नंदनी:- ये बताओ इतनी सारी फाइल ऑडिट किसने कि है।

अपस्यु:- अराव ने किया है मां…

नंदनी:- गुड, तो इसे बिजनेस मैनेजमेंट करने दो। इसमें बिजनेसमैन वाले सभी गुण नजर आते हैं।

आज दोनों भाई, परिवार का होना और परिवार के मुखिया कैसा होता है उसे मेहसूस कर रहे थे। सभी बच्चे अपनी मां के साथ कुछ खट्टे-मीठे पल बिताने लगे। कुछ घंटे पहले जिनके पास कुछ नहीं था, मात्र कुछ ही घंटों में सबकुछ मिल गया था। एक घर और पूरा परिवार। खुशियां, जो अंदर और बाहर हर जगह अपनी छाप छोड़ रही थी।

अपस्यु, अराव और कुंजल इस वक़्त ठीक अपने उन्हीं पलों को जी रहे थे जिसमे आपस का प्यार इतना गहरा था कि लगता ही नहीं अभी कुछ ही घंटे पहले ये पूरा परिवार मिले है।

रात के 8 बज रहे होंगे, जब अपस्यु, अराव और कुंजल तीनों अपने पुनर्मिलन का जश्न मनाने निकले। ठीक इसी वक़्त साची अपने कमरे में इधर से उधर कर रही थी। शायद जब प्यार होता है तो थोड़ी उम्मीदें भी बढ़ जाती है। साची भी अपस्यु से थोड़ी उम्मीद लगाकर बैठी थी। उसे लग रहा था कि वो अपने किए पर सफाई देते उसे मनाने के लिए फोन या मैसेज जरूर करेगा, लेकिन सुबह के 11 बजे से रात के 8 बज चुके थे और अपस्यु ने कोई जानकारी लेना भी उचित नहीं समझा।

उसकी हालत तो उस छटपटाती मछली जैसी हो गई थी जिसे पानी के बाहर लाकर छोड़ दिया गया हो और वो दम घुटने की वजह से फाड़-फड़ा रही हो। ना जाने कितनी चक्कर वो अपने कमरे के लगा चुकी थी। दिल को जब कहीं चैन ना मिला तब उसने अपना लैपटॉप खोला और "अननोन गर्ल" की आईडी से ऑनलाइन हो गई।

उसने 3-4 संदेश क्रेज़ी बॉय को भेजे लेकिन आज शायद वो भी व्यस्त था इसलिए उसे जवाब देते-देते लगभग 1 घंटे लग गए।

"हुंह"… साची अपना गुस्सा दिखाती हुई बस इतना ही पोस्ट कि।

क्रेजी बॉय:- मुंह कहे लाला टमाटर जैसा बना है।

अननोन गर्ल:- ये दुनिया ही मतलबी हो गई है आरजी (क्रेज़ी बॉय का निक नेम)

क्रेजी बॉय:- ????

अननोन गर्ल:- क्या हुआ ऐसे मुंह फाड़ कर क्यों हंस रहे हो…

क्रेजी बॉय:- लगता है तुम्हे तुम्हरा बेहतरीन सरप्राइज आज मिल गया इसलिए गुस्सा में मुहा लाला टमाटर जैसा हो गया। एक सेल्फी देना तो।

(इनके जल्दी-जल्दी टाइपिंग के दौरान ऐसे छोटे-छोटे टाइपिंग एरर होना आम बात थी। और साची ने बीती रात क्रेजी बॉय से सबकुछ शेयर की थी)

अननोन गर्ल:- हुंह !!

क्रेजी बॉय:- ठीका है बाबा, बात क्या हुआ वो बताओ।

अननोन गर्ल:- मुझे कुछ बात ही नहीं करनी…

क्रेजी बॉय:- अब मैंने क्या कर दिया, जो मुझे भी नहीं बताना चाहती। अब तो हम दोस्त हैं ना।

अननोन गर्ल:- क्या बताऊं! मैंने जिसे प्यार किया वो पहले ही धोखेबाज निकला।

क्रेजी बॉय:- ????

अननोन गर्ल:- मुझे रोना आ रहा है और तुम मेरे हालत पर हंस रहे। तुम भी बहुत बुरे हो।

क्रेजी बॉय साची को मानते हुए उससे पूरी घटना की जानकारी लेने लगा। साची अपनी पूरी भड़ास टाइप करती हुई, पूरी कहानी क्रेजी बॉय को बता दी। क्रेजी बॉय पूरे मज़े के साथ उसकी कहानी और भड़ास दोनों का आनंद उठाते रहा। अंत में साची की जब पूरी कहानी समाप्त हुई तब वो सभी घटनाओं को जोड़ कर कमाल का समीक्षा किया….

"एक भोली भाली लड़की को बड़ी ही आसानी से उसने फसा लिया। वो आज तुम्हे चिढ़ना चाहता था और तुम चिढ़ गई। जरा सोचो जिस लड़के की महीने कि इनकम लगभग ₹40000-₹60000 के बीच हो, (दार्जलिंग के चाय बागान के आय का आकलन) उसके पास लगभग 4 करोड़ की लंबोर्गिनी कहां से आई। तुम लड़कियां तो बस प्यार में अंधी हो जाती हो और जब कोई लड़का इस्तमाल कर के धोखा देदे, तब बस रोते रहना। लेकिन साफ-साफ सामने से दिख रहा है कि वो तुम्हे उल्लू बना रहा, उन सब बातों पर जरा भी ध्यान मत देना"

अपनी इस महान राय के पीछे, क्रेजी बॉय की मनसा क्या थी, वो तो वहीं जाने लेकिन बम कि सुतली में तो उसने आग लगा ही दिया था, अब बस उसे फटना बाकी था।
Bechare dono bhai ki aaj maa ne achchi class laga di hai,
aur idhar crazy boy ne sanchi ke man mein ek naya sandeh daal diya hai
 

aman rathore

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अपनी इस महान राय के पीछे, क्रेजी बॉय की मनसा क्या थी, वो तो वहीं जाने लेकिन बम कि सुतली में तो उसने आग लगा ही दिया था, अब बस उसे फटना बाकी था।

जश्न मानकर जब तीनों भाई बहन वापस लौटे, तबतक नंदनी ने सबके लिए खाना बना कर रखा था। ना जाने कितने सालों बाद दोनों भाइयों ने ऐसा खाना खाया था। खाते-खाते दोनों कि आखें डबडबा गई, फिर नंदनी ने दोनों को संभाला और प्यार से, अपने हाथ से कुछ निवाले भी खिलाए।

रात को तीनों भाई बहन वहीं नीचे हॉल में अपना बिस्तर लगा लिए और पड़े-पड़े बात करने लगे। कुंजल ने फिर एक-एक कर के वो सब बताने लगी जो उसने 2007 से लेकर अब तक झेला था। कैसे कनाडा कि हर चीज नीलाम हो गई। हालात ऐसी हो गई थी कि वहां कोई काम नहीं मिल रहा था ऊपर से वहां के खर्चे। भारत वापस आने के लिए जेवर बेचना पड़ गया लेकिन वहां के ऊंची-ऊंची सोशियाटी में कम्युनिटी बना कर रह रहे किसी लोगों ने हाल तक नहीं पूछा… बात करते-करते फिर वो उठकर बैठ गई और कहने लगी….

"भाई मेरे सीने में कहीं जलन सी हो रही है। काश मुझे पता चल जाता की किसने मेरे पापा को मारा, उसे तो मैं अपने हाथ से मारती। उस कमिने कि वजह से मुझे और मां को बहुत दर्द झेलने पड़े हैं।"

"अपने गुस्से को बचा कर रखो, सीने की आग सुलगने दो और इंतजार करो सही वक़्त का। क्योंकि वो भगवान है ना सबको एक मौका देता है। बस वो मौका चूकना नहीं। अब सो जाओ और जिस पल में हो, उस पल को खुशी से जीने की कोशिश करो"…. अपस्यु उसके माथे को चूमते कुंजल को लिटा दिया।

कुछ देर तक बात करते-करते अराव और कुंजल दोनों सो गए। अपस्यु की आखों से नींद कोसों दूर था। वो बगल के अपने फ्लैट में गया, कुछ पल अपनी बालकनी में खड़े होकर साची के घर की ओर निहारने लगा और मुस्कुराते हुए कहा…. "कल तुम्हारे साथ रियूनियन होगा।"… बालकनी से नीच हॉल में अाकर, वो कुछ वर्कआउट करने लगा और साथ ही साथ अपनी नजर फोन पर भी बनाए हुए था।

रात के करीब 1 बजे….

"बीप बीप".. मैसेज टोन बजा.. अपस्यु ने तुरंत अपना संदेश खोला और संदेश देखकर वो मुस्कुराते हुए जवाब दिया… "बहुत देर से इंतजार कर रहा था"… उधर से फिर संदेश आया… "प्राइवेट लाइन कनेक्ट करो"

अपस्यु ने तुरंत ही प्राइवेट लाइन कनेक्ट किया… थोड़ी देर इंतजार के बाद….

"कहां लगा है आज कल मेरा चेला"… उधर से आवाज़ अाई..

"गॉडफादर कहां हो आप, मिलकर बात करनी है".. अपस्यु ने जवाब दिया..

"फिलहाल कुछ काम है तो वो बताओ, हम दोनों एक मिशन के बीच में है।"… उधर से गॉडफादर ने जवाब दिया..

"ठीक है, जब दिल्ली आना तो बात करना, बहुत जरूरी है।"…. अपस्यु मायूस होते जवाब दिया।

"ले तू पहले पल्लवी से बात कर, तभी तेरा लटका थोपरा ठीक होगा"… गॉडफादर ने अपस्यु के मन को टटोलते हुए जवाब दिया।

"नहीं उस हवाशी शक्ति कपूर से मुझे ना बात करनी"… अपस्यु इधर से चिल्लाया..

"तू बेटा कितना भी चिल्ला लेे, इस बार 1 महीने के लिए दिल्ली अा रही हूं.. तेरी वर्जिनिटी तो गई समझ लेे। वैसे अब तक कोई पोर्न भी देखे कि नहीं"… उधर से गॉडफादर की पत्नी पल्लवी अपस्यु के मज़े लेती पूछने लगी…

"पहले ही कहा था उस हवशी को फोन मत देना। मैं कॉल डिस्कनेक्ट कर रहा हूं।"… अपस्यु नाराज होता कहने लगा।

"तू कहां तक भागेगा अपस्यु, तू तो "Me & My Husband Series" का छोटा ही सही लेकिन एक हिस्सा है।".... अपस्यु के चिढ़ का पल्लवी ने हंसते हुए जवाब दिया।

"हद है तेरा भी अपस्यु, तेरे नखरे तो छोड़ियों से भी ज्यादा है। काश मुझे ऐसा ऑफर मिला होता तो मैं कब का वर्जिनिटी लूज कर लेता".. इस बार गॉडफादर ने भी मज़े ले लिए।

"वहां केस सॉल्व करने गए हो तो उसपर ध्यान दो ना। यहां जब आओगे तब बात करते हैं।"… अपस्यु फिर चिढ़ते हुए जवाब दिया।

"रुक मेरी बात ध्यान से सुन।"… गॉडफादर थोड़े गंभीर होते हुए बोले…

"हां कहिए ना, मैं लाइन पर ही हूं"… अपस्यु अपना पूरा ध्यान केंद्रित करता…

"सुन हमारे पास उदयपुर हत्याकांड की फाइल पहुंच चुकी है, इस मर्डर मिस्ट्री के बाद उसी केस पर काम करना है, और हां इसे खुद सेंट्रल होम मिनिस्ट्री मॉनिटर करेगी। अधिकारियों के नाम नहीं बता सकता बस जबतक मैं ना आऊं कोई स्टेप मत लेना।"…. गॉडफादर मुद्दे कि बात बताकर उसे चेतावनी देते कहने लगे।

"हम्मम !! ठीक है। वैसे एक खबर मेरे पास भी है। 15 जून 2007, भूषण रघुवंशी और मानस रघुवंशी का गला घोट कर हत्या।"

"अरे …. ये क्या कह रहा है"… गॉडफादर पूरे अचंभित होते हुए..

"जी हां, मैं जब आंटी से मिला तब उधर की कहानी पता चली"… अपस्यु ने अपनी बात रखी।

"बैन चो…. मुझसे इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई। अब मिलना ज्यादा जरूरी हो गया है। ठीक है इस केस को निपटा कर मिलते हैं। तबतक अपनी आंटी का जितना डेटा है मुझे भेज। इसपर काम पहले शुरू करना है।"

अपस्यु अपने गॉडफादर , जुगल किशोर उर्फ जेके से बात करने के बाद कुछ राहत मेहसूस कर रहा था, लेकिन दिमाग के अंदर अब भी उस रात की कहानी चल रही थी जब उसके आखों के सामने उसका पिता दम तोड़ रहा था।

सुबह का वक़्त…

कोई अपने प्रियसी के रिएक्शन के बारे ने सोच कर तैयार हो रहा था कि "कैसा वो फील करेगी जब उसे पता चलेगा कि मेरा भी परिवार है"… तो कोई अपने अंदर नफरत कि आग सीने ने दबाए बस इतना ही प्लान कर रही थी "किसी भी तरह 2-4 थप्पड मार लूं तो उस कुत्ते को पता चल जाए कि वो किसको धोका देने कि सोच रहा था।"

दोनों भाई तो कल अपनी फटफटी कॉलेज के पार्किंग में ही छोड़ आए थे। इसलिए तय यह हुआ कि कुंजल आज लंबोर्गिनी लेे जाएगी और साथ में अराव जाएगा और अपस्यु कुंजल की स्कूटी से कॉलेज जाएगा।

अपार्टमेंट से पहली गाड़ी अपस्यु की निकली। गेट पर स्कूटी खड़ी कर वो सामने साची को देख अपना हाथ हिलाया, लेकिन साची अजीब सी प्रतिक्रिया दी और ऐटिट्यूड दिखाती अपने बैग से सन ग्लासेस निकाल कर बड़े शान से पहनने लगी।

इतने में सन ग्लासेस हाथ से छूटकर, नीचे सड़क पर गिर गई। साची बेचारी स्कूटी लगाकर उसे उठाने का मन में विचार बना ही रही थी, कि इतने मे कुंजल ने उसपर से लंबोर्गिनी चढ़ा कर कॉलेज कि लिए निकल गई।

"कैसा रहा ये एक्शन मोनू"… कुंजल अपनी हाथ अराव के ओर बढ़ती।

अराव भी ताली देता… "एक्शन तूने किया रिएक्शन उधर निकल रहा होगा।"

"चेहरा देखा था उसका, कैसा ऐटिट्यूड से भड़ा हुआ था। बड़ी अाई मेरे भाई को ऐटिट्यूड दिखाने वाली"…. कुंजल थोड़ा नाराजगी दिखाते बोली।

"ओ पागल तेरी भाभी है वो, और हां दिल की भी बहुत अच्छी है। हसी मज़ाक ठीक है लेकिन उसके लिए दिल में कोई बैर नहीं"… अराव समझाते हुए बोला।

"हां ठीक है समझ गई।".. कुंजल बात टालती हुई गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। इधर जैसे ही कार साची के सन ग्लासेस को रौंद कर गई, अपस्यु ने अपना सर पिट लिया। साची एक बार उस चलती कार को घुरी, फिर अपस्यु को घूरती उसने गुस्से में अपना नाक सिकोड़ ली और लावणी के साथ कॉलेज के लिए निकल गई।

"ये दोनों भी पागल ही है, बेकार में बेचारी को चिढ़ा दी"… अपस्यु भी आगे का सोच कर साची के पीछे-पीछे कॉलेज निकला। पूरे दिन टॉम एंड जेरी का खेल चलता रहा। अपस्यु क्लास में उसके साथ बैठा तो वो उठकर, वहां से दूसरी जगह चली गई। बात करने के लिए मुंह खोला तो वो गर्ल्स कॉमन रूम में चली गई।

साची के पीछे-पीछे जब वो कैंटीन जाने लगा तब साची ने अपना रास्ता बदलकर कैंटीन से कहीं और चली गईं। लगभग पूरा दिन वो अपस्यु को दौड़ती ही रही। अपस्यु बस समझ नहीं पा रहा था कि…..

"आखिर साची को हुआ क्या है। कल की कुछ छोटी सी गलतफहमी ही तो थी बस। क्या उसे दिख नहीं रहा था कि कुंजल उसके साथ है? कितने अरमान थे कि अपनी बहन से मिलवाएगा, अपनी फैमिली के बारे में बताएगा.. लेकिन ये थी कि चूहे बिल्ली का खेल शुरू किए हुए थी।"

दिन बीत गया लेकिन बिगड़ती बात बनते हुए नजर नहीं आई। घर लौटकर अपस्यु ने साची को सिर्फ इतना ही संदेश भेजा कि "बात कर लो बस थोड़ी सी गलतफहमी है।".. फिर क्या था साची ने उसे हर जगह से ही ब्लॉक कर दिया।

घर भी अब पहले की तरह नहीं रह चुका था। जबतक तीनों भाई-बहन घर वापस लौटकर आते, दोनों फ्लैट के बीच की हॉल कि दीवार हटा दी गई थीं। कचरे साफ हो गए थे और दोनों भाइयों को यह भी निर्देश मिल चुका था कि अपने कबाड़खाना को रेनोवेट करके उसे ढंग से घिरवा दे।

बेचारे अपस्यु को साची को देखने के लिए अब बालकनी में 3-4 किताब लेकर जानी पड़ी, ताकि दिखा सके कि वो पढ़ रहा है। लेकिन बालकनी से भी कोई फायदा ना मिल रहा था। वो तो एक बार भी झांकने तक नहीं आई।

पहला दिन गुस्सा ज्यादा होता है। दूसरा दिन गुस्से के तापमान में अपने आप ही थोड़ी कमी अा जाती है, बस यही सोच अपस्यु ने अपनी अगली सुबह की शुरवात की, लेकिन उसकी सोच ही गलत साबित हो गईं। आज तो तापमान इतना बढ़ा था कि, साची ने जो बीते काल की सुबह तय कि थी, वो आज पूरी कर ली। यानी कि अपस्यु गाल पर एक चिपका दी। थप्पड खाकर भी अपस्यु बस आजू-बाजू ये देखने में लगा था कि किसी ने उसे थप्पड खाते देखा तो नहीं।

इसी बीच एक उम्मीद किरण तब जागृत हुई जब कैंटीन में लावणी को पता चला कि कुंजल उन दोनों की बहन है। हालांकि ये बात पता चलते ही लावणी को अपने आप में बुरा सा अनुभव होने लगा। लेकिन वो माफी भी नहीं मांग सकती थी क्योंकि उसे माफी का कारण बताना पड़ता जो शायद वो बता नहीं पाती।

अराव, कुंजल और लावणी की बात चल ही रही थी कि लावणी को ढूंढते हुए साची भी वहां पहुंच गई। साची ने जब लावणी को उनके बीच पाया तो वो गुस्से में अपनी आखें लावणी को दिखाती हुई कहने लगी… "तुम्हे क्या कह कर फसाया इन झूठे लोगों ने"…

साची की बात सुनकर कुंजल पलटी लेकिन अराव उसका हाथ पकड़ कर आखों से बस बैठे रहने का इशारा किया। …. "नहीं दी, तुम जैसा सोच रही हो वैसी बात नहीं है। इनसे मिलो ये कुंजल है, अराव और अपस्यु की सिस्टर".. लावणी, साची को समझते हुई बोली।

"15 दिन पहले जब इसका एक्सिडेंट हुआ था तब इसका भाई अराव छाती पीट-पीट कर कह रहा था कि मैं अनाथ हूं। और जरा देखो, 15 दिन में इतनी बड़ी बहन भी पैदा हो गई। इन लोगों के शक्ल पर ही फरेबी लिखा है। अब तो मुझे पक्का यकीन हो गया है कि इसका वो ऐक्सिडेंट भी एक नाटक था, केवल सिंपैथी बटोरने कि कोशिश। तू यहां बैठे-बैठे क्या पूरी कहानी सुनेगी… उठा ना"… साची गुस्से में अंधी होकर जो जी में आया बोलती चली गई।

"इस से पहले की मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूं, भागो यहां से"… गुस्से से निकली कुंजल की ये आवाज़। जब उसने पूरे जोड़ से दोनो हाथ टेबल पर पटक कर अपना तेवर दिखाई तो पूरा माहौल ही शांत हो गया।

अपस्यु कैंटीन के गेट से, ये सारा तमाशा होते देख रहा था। कुंजल जब अपना गुस्सा दिखाई तो अपस्यु सामने देख कर इतना ही सोचा… "एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार। तू तो पीस गया बेटा।"
:superb: :good: amazing update hai bhai,
bechara apasyu to saanchi aur kunjal ke beach mein hi pis gaya hai :lol:
 

Akki ❸❸❸

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दोनों बाहें फैलाए उसने अपनी आंखें मूंद ली और आशुओं की एक धारा चेहरे पर एक रेखा बनाती, धीरे-धीरे टपकने लगी। शायद जो इस वक़्त आरव मेहसूस कर रहा था वहीं अपस्यु भी। वो भी अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा अपनी आखें मुंदे बस आशुओं की एक धारा बहा रहा था।

थोड़ी देर बाद वीरभद्र अपनी गिनती पूरी कर आया और साथ में 2 लोग बेचारे तड़प रहे थे, उनकी तड़प को भी शांत कर आया। जब वो वापस लौटा तब आरव को इस हाल में देखकर, वो जोड़-जोड़ से चिल्लाने लगा…. "गुरुदेव अभी तो हम मिले थे, इतनी जल्दी निकल लिए"…

वीरभद्र का चिल्लाना सुनकर आरव खुद को ठीक करता हुआ उठ खड़ा हुआ, उधर अपस्यु ने जब चिल्लाना सुना तो वो भी चिंतित होकर आरव-आरव करने लगा।

आरव:- कुछ नहीं हुआ ठीक हूं मैं।

अपस्यु:- फिर वो चिल्लाया क्यों?

आरव:- अरे कुछ नहीं बस कुछ याद आ गया था.. जैसे तुझे आया होगा।

अपस्यु:- हम्मम !! वो तो ठीक है लेकिन इतना बड़ा रायता जो फैला दिए हो उसका क्या?

अराव:- बेकार की चिंता कर रहा है। अब तू सो जा और सुबह उठ कर न्यूज देख लेना। मैं यहां अब सब पैक कर रहा हूं। कल मिलते हैं भाई।

अपस्यु:- जल्दी अा जा… तेरे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा।

आरव ने कॉल काटा और वहां से सब समेटना शुरू किया। वीरभद्र भी उसके इस काम में मदद करने लगा। सब कुछ समेट कर आरव जबतक पैक कर रहा था, वीरभद्र ने पैसों से भड़ा बैग उसके पास पटकते हुए…. "आरव, सारे पैसे यहीं रह गए। डॉलर, रुपया, सब…. और इस पैसे के लिए ये सब लड़-भीड़ कर मर गए… हा हाहाहा"

आरव:- पैसा यहीं छोड़ दे वीरे। ये "ब्लड मनी" है। यह पैसा हमेशा अपने पीछे एक जहरीली खुशबू छोड़ता है। हम इसे यहां से ले गए ना तो इसकी जहरीली खुशबू सूंघते ना जाने कितने हमारे पीछे अा जाए।

वीरभद्र:- क्या मतलब पैसा यहीं छोड़ दे? अरे इतना सरा रुपया है। कोई पागल ही इसे छोड़ सकता है।

आरव:- तू वहां से किसी लाश का फोन उठा कर दे मुझे। तुझे अभी समझ नहीं आएगा कि इन पैसों को क्यों नहीं ले जा सकते।

वीरभद्र के तो आंखों में जैसे रुपया ही छप गया हो। इतना सरा रुपया देख कर तो वो होश में ही नहीं था। हां मन डोल तो उसका पूरा रहा था लेकिन इंसान बेईमान नहीं था। आरव ने जैसा कहा उसने फोन लाकर दे दिया, और एक बैग जिसमे केवल डिवाइस थी और कपड़े, वो लेकर उस खंडहर के बाहर अा गया।

आरव ने उदयपुर एसपी के लैंडलाइन पर कॉल लगाया, थोड़ा इंतजार और थोड़े बहाने के बाद एसपी फोन लाइन पर अा गए थे। आरव ने ज्यादा बात को ना घुमाते हुए सीधा कह दिया… "राज्य के शिक्षा मंत्री यहां फसे है और गैंगस्टर अंधाधुन गोलीबारी कर रहे है" ... इतना सुनते ही एसपी साहब के होश उड़ गए।

एसपी :- कौन हो तुम और कहां से बोल रहे हो?

आरव:- मैं पूरी जानकारी तभी दूंगा जब कॉन्फ्रेंस में सिटी पुलिस कमिश्नर भी होंगे।

इतना बड़ा बॉम्ब फटा था, सिटी कमिश्नर को तुरंत लाइन पर लेते हुए एसपी पूछने लगे…. "सर है लाइन पर, अब पूरी बात बताओ"

आरव:- एक ही बात बार-बार कहनी पड़ेगी क्या, सुन नहीं रहे कितनी भीषण गोलीबारी हो रही है। लोगों के मरने और चिंखने की आवाजें नहीं सुनाई दे रही क्या?

एसपी:- सर हमे वहीं चलना चाहिए।

कमिश्नर:- ठीक है, सभी को अलर्ट करो और पूरी फोर्स को पहुंचने बोलो। सुनो तुम जो कोई भी हो, हमे वहां का पता बताओ और वहीं रुकना।

आरव:- मैं बस पता बता कर निकल रहा हूं। मुझे नहीं मारना इस गोलीबारी में।

आरव ने पता बताया और दोनों, वीरभद्र और आरव वहां से निकल गए। कुछ दूर आगे चलकर दोनों ने अपने कपड़े बदले और पहने हुए कपड़े को वहीं जलाकर जॉगिंग करते हुए निकाल गए।

रास्ते में ही सामने से एसपी साहब की जीप आ रही थी, जो बिना रुके सीधे स्पॉट की ओर निकल गई। एसपी, कमिश्नर से… "लगता है कॉलर यही दोनों थे"… कमिश्नर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया…. "इतना चालक कॉलर मैंने आज तक नहीं देखा। जल्दी चलो वरना हम से पहले कहीं फोर्स ना पहुंच जाए"।

कमिश्नर और एसपी तुरंत मौके पर पहुंचे। वहां का नजारा देखकर दोनों को बहुत ज्यादा अचरज नहीं हुआ बस उनकी नजरें अपने काम की चीज ढूंढ़ने में लगी हुई थी। उन्हें ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी, क्योंकि सरा पैसा सामने ही परा था।

एसपी:- जितना बड़ा कांड उतनी ही बड़ी क़ीमत।

कमिश्नर:- कुछ पैसे यहीं छोड़ कर बाकी सरा पैसा जल्दी से जीप में छिपाओ।

एसपी, पैसे को जीप में रखने के बाद वापस आकर… "क्या लगता है ये कॉलर कोई अतंकवादी था"

कमिश्नर:- आईपीएस किसने बनाया तुम्हे। ये कोई निजी मामला लगता है। बहुत ही चालाकी से या तो सबको लड़ाया है या पैसे के चक्कर में सबको यहां बुला कर साफ़ कर दिया। उधर देखो वो स्मोक बॉम्ब, आया कुछ समझ में।

एसपी:- पैसे तो मिल ही गए हैं, और वो लड़का अतंकवादी भी नहीं तो ज्यादा सोचना क्या है क्लोज करते हैं सर केस। आप जाइए यहां का पंचनामा करने में शायद काफी वक़्त लग जाए।

कमिश्नर भूषण को एक लात मारकर:- हां कौन सा साला ये समाजसेवक था जो इसके लिए भागदौड़ करे। जगह ऐसा हो जाना चाहिए कि एनएसए, सीबीआई या फिर रॉ अा जाए, सब को बस अपनी ही कहानी के सबूत मिले। लग जाओ काम पर और एक अच्छी कहानी बनाओ जो पुलिस की इमेज को ऊंचा करे और हां यहां की पूरी टीम को 2 लाख का बोनस भी दे देना।

एसपी साहब जुट गए वहां अपने पैसे बचाने में, इधर आरव और वीरभद्र दोनों जॉगिंग करते हुए आगे बढ़ने लगे। सहर के थोड़े बाहर ही उन्हें एक ऑटोवाला भी मिल गया और दोनों सीधा बस स्टैंड पहुंच गए। एक चाय की टपरी से दोनों ने चाय लिया और वीरभद्र चुस्की लेते हुए…

वीरभद्र:- गुरुदेव आप से बहुत कुछ सीखा है मैंने। कभी कोई काम परे तो याद जरूर कीजिएगा।

आरव:- बस कर यार, तू मुझ से बड़ा दिखता है। मत कह गुरुदेव। अच्छा सुन यहां कौन कौन है तेरा।

वीरभद्र:- मां और छोटी बहन।

आरव:- ठीक है कुछ दिन यहीं रुक फिर सबको लेकर दिल्ली आ जाना। मेरे पास तेरे लिए बहुत से काम है।

वीरभद्र खुश होते हुए…. क्या बात कर रहे हो गुरुदेव, जल्दी मिलता हूं फिर।

आरव, वीरभद्र को अलविदा कहकर वापस लौट आया। इधर आरव से बात समाप्त करने के बाद अपस्यु के आखों में नींद कहां थी। उसकी नजर तो बस टीवी पर टिकी थी और न्यूज चैनल को बार-बार बदल रहा था।

इसी क्रम में कब उसे नींद अा गई उसे पता भी नही चला। सुबह जब आंख खुली और नजर टीवी पर गई तब उसका पूरा ध्यान न्यूज पर ही केन्द्रित हो गया। अभी की सुर्खियों में बस भूषण ही छाया हुआ था। और जो खबर निकालकर अा रही थी, उसे बड़े ही नाटकीय ढंग से आपसी मुठभेड़ का नाम दे दिया गया था। नाटकीय इसलिए क्योंकि हत्या के आरोपी गैंग, मौके पर ही पुलिस मुठभेड़ का शिकार हो गई और इसके बाकी साथियों की तलाश में जुटी है पुलिस।

अब कहीं जाकर चैन की सासें ली अपस्यु ने। इधर खबर सुनकर अपस्यु मुस्कुराया तो उधर सामने से उसकी खुशी चली आईं। आरव बैग पटक कर सीधा अपस्यु के पास पहुंचा और गले लग गया। दोनों भाई थोड़े खुश और आखें थोड़ी नम थी।

कुछ देर के बातचीत के बाद आरव वहां से उठा और जल्दी-जल्दी तैयार हों होकर निकलने लगा। अपस्यु उसकी हरकत को हैरानी से देखते हुए पूछा… "अबे ओ निशाचर, अब ये बन-ठन के कहां निकालने के तैयारी में है?

आरव:- तेरा तो मामला सेट हो गया, मेरा क्या? मैं चला कॉलेज, 3 दिनों से लावणी की सूरत नहीं देखी।

अपस्यु, हंसते हुए…. जा, तेरा मुंह तोड़ने के इंतजार में ही बैठी होगी।

आरव:- मुंह क्या पूरी हड्डियां तोड़ दे बस दिल ना तोड़े।

आरव बिल्कुल फ्रेश होकर निकला और उसकी फटफटी सीधा जाकर पार्किंग में रुकी। अब कभी वो कॉलेज आया हो तो ना पता हो कि कौन सी क्लास कहां है। उसे तो अपना विषय तक याद ना था कि वो किस विषय से स्नातक (ग्रेड्यूशन) कर रहा है, लावणी के विषय की जानकारी तो दूर की बात थी।

ढूंढते-ढूंढते लावणी तो नहीं मिली लेकिन साची जरूर मिल गई। कैंटीन में अकेली बैठी वो कहीं खोई सी थी। आरव चुटकी बजाकर उसका ध्यान अपनी ओर खींचता… "क्या हुआ मिस किन ख्यालों में खोई हुई है"..

आरव को देख कर साची मुस्कुराई और पूछने लगी… "कब पहुंचे आरव"

आरव:- आज ही सुबह पहुंचा हूं साची। लेकिन तुम कहां गुम हो।

साची थोड़ा गुस्सा दिखाते हुई:- सुबह गई थी तुम्हारे भाई से मिलने, आधे घंटे बेल बजती रही लेकिन दरवाजा तक नहीं खोला।

आरव:- ओह तो इसलिए कैंटीन में बैठ कर सोच रही की उसका दरवाजा कैसा खुलवाया जाए।

साची:- हट बदमाश, ऐसा नहीं है। मेरी छोड़ो तुम आज ही पहुंचे और अा गए सीधा कॉलेज?

आरव:- अपनी जानेमन को ढूंढ रहा हूं, वो तो मिल ना रही, और यहां तुम मिल गई।

साची अपनी आखें दिखाती:- ज्यादा चू-चपर वाली बातें की ना तो मैं तुम्हारा जुबान कतर दूंगी?

आरव अपने हाथ जोड़ उसके सामने खड़ा हो गया…. "भूल हो गई, क्षमा माते। अब जरा लावणी का पता बता दीजिएगा।

साची जोर से हंसती हुई… अभी वो हिस्ट्री की क्लास में होगी।

आरव तेजी से वहां से निकला पर जाते-जाते कहता गया…. मैं तुम्हारी जगह होता ना तो अब तक क्लास बंक कर के पहुंच चुका होता खबर लेने की आखिर सुबह दरवाजा क्यों नहीं खोला? और हां 2 बातें.. पहली ये की मेरे अपार्टमेंट में प्रवेश के लिए 2 मुख्य द्वार हैं, और दूसरी ये की अपनी स्कूटी लिए जाना।

आरव तो वहां से लावणी के लिए निकल गया लेकिन जाते-जाते साची को उपाय बताते चला गया। बिना देर किए साची भी निकली, मस्त अपनी स्कूटी से, होटों पर गीत गुनगुनाए…. "तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"
Bdiya update nain bhai :love3:
कमिश्नर:- कुछ पैसे यहीं छोड़ कर बाकी सरा पैसा जल्दी से जीप में छिपाओ
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तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"
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आरव तो वहां से लावणी के लिए निकल गया लेकिन जाते-जाते साची को उपाय बताते चला गया। बिना देर किए साची भी निकली, मस्त अपनी स्कूटी से, होटों पर गीत गुनगुनाए…. "तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"

साची गीत गुनगुनाती हुई मस्त अपने रास्ते चली जा रही थी और इसी चक्कर में वो भूल ही गई की दूसरी गली से अपार्टमेंट में जाना है। जैसे ही वो अपार्टमेंट के गेट पर पहुंची, सुलेखा बाहर के दरवाजे पर खड़ी गाय को रोटी डाल रही थीं।

साची मुड़ कर जैसे ही अपने घर के ओर देखी, उसकी धड़कने हो गई तेज और वो स्कूटी को पूरे स्पीड से गली के मोड़ तक लेे गई। इधर सुलेखा को भी ऐसा लगा कि उसने साची को देखा, लेकिन जबतक वो उसे पूरा पहचान पाती, स्कूटी नजरों से इतनी दूर हो गई की मन में बस शंका ही रह गया… "ये सांची है या कोई और"..

साची जैसे ही मोड़ पर मुड़ी, अपनी स्कूटी किनारे खड़ी करके अपने छाती पर हांथ रख कर अपनी श्वास को सामान्य करने लगी।….. "बच गई साची, वरना छोटी मां ने तो पकड़ ही लिया था"…. अब काहे कोई गीत साची के होटों पर आए। बचे रास्ते बस इतना ही ख्याल रहा की "बच गई आज तू"

किंतु जैसे ही अपस्यु ने दरवाजा खोला और उसके चेहरे का दीदार हुआ, उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ अाई… "हाय !! आज कितना मस्त दिख रहा है। दिल करता है लिपट जाऊं। कंट्रोल, कंट्रोल, कंट्रोल"….

साची वहीं दरवाजे के पास ही खड़ी अपनी मुट्ठी भींचकर, आखें मूंदे बस खुद के भावनाओ पर संयम करने की कोशिश करने लगी। किंतु जब फिर से आखें खोल कर उसे देखी…. "आह्हह ! लगता है आज कोई पागलपन ना हो जाए"

ये इश्क की मुश्क, कितना भी संयम रखो दिख ही जाता है। अपस्यु भी साची के इस मुस्कान को मेहसूस कर रहा था… "क्या हो गया, वहीं खड़े
-खड़े किस सोच में डूब गई"।

साची मुस्कुराती हुई "कुछ नहीं" बोली और अाकर अपस्यु के पास बैठ गई। शायद वो बात करने के लिए कुछ शब्द ढूंढ रही थी, किंतु नजर बार-बार अपस्यु के चेहरे को ही देखने कि कोशिश कर रही थी, जिसे वो काबू करने में लगी थी।

अपस्यु:- हेल्लो मिस, क्या हुआ? आज आप बड़ी खुश नजर आ रही है?

साची:- खुश तो मैं इसलिए हूं क्योंकि छोटे पापा आज मुझे स्कूटी दिलवा रहे हैं (झुट)। और हां मैं तुमसे नाराज हूं..

अपस्यु:- नाराज, वो क्यों भला…

साची:- तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला सुबह। कितना बेकार लग रहा था बाहर खड़े रहकर बार-बार बेल बजाना।

अपस्यु:- हां, फिर तो तुम्हारी नाराजगी जायज है। मैं तुम्हारी जगह होता तो इतना कम गुस्सा कभी नहीं दिखता?

साची:- अच्छा !! तो फिर क्या करते?

अपस्यु:- वहीं सोच रहा हूं क्या कहानी बना दूं कि मैं क्या करता। क्योंकि कभी ऐसा मौका मिला ही नहीं। कभी कोई दोस्त हुआ ही नहीं जो मुझे इंतजार करवा सके।

थोड़ी सी मायूसी जो अपस्यु से चहेरे पर साफ झलक रही थी। साची उसे देखकर अपनी आखें शिकुड़ ली और चेहरे से बनावटी गुस्से कि अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) करती कहने लगी…. "हर वक़्त मुझे देख कर इमोशनल होने की जरूरत नहीं। चलो अब ये चेहरे के ज्योग्राफी को ठीक करो।

अपस्यु खुल कर हंसते हुए…. "मेरे तो पूरे शरीर का भूगोल बिगड़ा हुआ है, तुम्हे केवल चेहरे की पड़ी है"…

साची, अपने सिर पर हाथ रखती….. "मैं भी ना, बस अपनी ही बातें किए जा रही हूं, तुम्हारे बारे में पूछना ही भूल गई"।

अपस्यु:- कोई बात नहीं। लेकिन मैंने भी केवल इस वजह से ध्यान खींचा क्योंकि मुझे एक हेल्पिंग हैंड चाहिए और आरव गायब है।

साची, हंसती हुई:- हां जानती हूं कहां है वो।

अपस्यु:- कमाल है, मुझे पता नहीं और तुम्हे पूरी जानकारी हैं। कर क्या रहा था वो…

साची:- तुम्हे अभी एक हेल्पिंग हैंड चाहिए था ना, उसको देखे। आरव की डिटेल तुम उसी से लेते रहना।

अपस्यु:- हां ये भी ठीक है। हाथ के और शरीर के ऊपरी हिस्से के पालास्टर काट कर निकालने है। क्या तुम मदद कर सकती हो।

साची:- क्यों? प्लास्टर क्यों निकालनी है?

अपस्यु:- कुछ नहीं बस मुझे लगता है यह प्लास्टर जबरदस्ती का लगाया हुआ है। हाथ और पसलियों में केवल चोट था, कोई फ्रैक्चर नहीं।

साची:- तुम क्या डॉक्टर हो? अगर ऐसी बात है तो चलते है हॉस्पिटल। डॉक्टर से संपर्क करके ये प्लास्टर भी हटा देंगे।

अपस्यु:- मुझसे गलती हो गई, तुमसे कहना ही नहीं चाहिए था। मुझे आरव का ही इंतजार कर लेना था।

साची वहां पड़े प्लास्टर कटर को अपने हाथ में लेती हुई कहने लगी…. "हम भारतीयों को अपना काम निकलवाना अच्छे से आता है। कुछ हुआ नहीं की इमोशनल ड्रामा शुरू हो जाता है। हम लड़कियों का तो पता है, तुम लड़कों में भी होता है"…

साची भनभनाते हुई बांह के ओर से कटर लगा कर काटना शुरू की। पहले दाएं हाथ की फिर बाएं हाथ कि प्लास्टर को निकालकर अपस्यु को बैठने के लिए बोली। पीछे जाकर उसने गर्दन से कटर को लगाया और बीचोबीच काटती हुई चली गई। आगे से अपस्यु ने जैसे ही उस प्लास्टर को निकला, उसके पीठ पर खुरदरे कई ज़ख्म के निशान उभर कर सामने अा गए।

साची उन निशानों को बड़े ध्यान से देखते हुए उनपर अपनी उंगली चलाने लगी, मानो वो उस दर्द को जी रही हो। अपस्यु को पीठ पर गिरे उन आशुओं का भी अनुभव हुआ जो इस वक़्त साची के आखों से बहकर नीचे टपक रहे थे।

अपस्यु:- अब कौन इमोशनल हो रहा है साची।

साची अपने आंसू पोंछति…. "इतने गहरे ज़ख्मों के निशान देखकर किसी का भी रूह कांप जाए। अपस्यु ये निशान तो ऐक्सिडेंट के नहीं लगते। कैसे लगे ये ज़ख्म।

अपस्यु:- इसकी कहानी तो बड़ी ही हास्यप्रद है। एक बार मैं फुल तोड़ने के लिए ऊपर चढ़ा था और फिसल कर नीचे गिर गया। और नीचे ढेर सारे कंकड़ पत्थर थे।

साची:- ईईईईईईई !! यह हास्य घटना कैसे हुई जरा बताओगे।

अपस्यु:- कभी फुर्सत में बताऊंगा, कैसे ये घटना हास्य थी। फिलहाल एक काम और करोगी। थोड़ा कपड़ा भिंगो कर पीछे साफ कर दोगी।

साची ने मुस्कुरा कर हां कहा और कपड़े भिगो कर लेे अाई। पीछे साफ करने के बाद वो आगे आई। हालांकि अपस्यु आगे खुद साफ करना चाहता था लेकिन साची ने उसके होटों पर अपनी उंगली डाल कर उसे चुप करा दिया और बिस्तर पर लिटा दी।

पसलियों के ऊपरी हिस्से पर जमे खून के निशान साफ देखे जा सकते थे। साची अपने हाथ धीरे-धीरे उसके बदन पर फुराती, साफ करने लगी। किंतु इन हिस्सों में शायद अब भी दर्द हो रहा था और दर्द के कारण अपस्यु के मुंह से "आह" निकल गई।

साची अपना हाथ उसके बदन पर धीरे धीरे फिराती, उसके नजरों से नजरें मिला कर मुस्कुराती हुई देखती रही। इधर उसके हाथ चलते रहे और उधर दोनों मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखते रहे। तभी अचानक एक बार फिर अपस्यु के मुंह से दर्द भारी चिंखे निकलनी शुरू हुई, लेकिन वजह साची का हाथ लगाना नहीं बल्कि उसने पूरे बदन का ही भार उसके पसलियों पर अा गया था।

साची:- सॉरी सॉरी सॉरी… वो मैंने ध्यान ही नहीं दिया।

अपस्यु:- सॉरी कहने की कोई जरूरत नहीं। शायद बदन ने कुछ ज्यादा ही दर्द मेहसूस कर लिया इसलिए चींख़ निकल गई वरना मस्त वाली फीलिंग अा रही थी।

साची उसके मुंह पर कपड़ा मारती हुई … "धत"… कही और वहां से उठ कर भागने लगी। लेकिन अपस्यु ने उसका कलाई पकड़ कर जाने से रोक लिया। साची भी बिना कोई जोर लगाए नाटकीय रूप से बस दिखाती रही को वो हाथ छुड़ाने की कोशिश में है और बस इतना ही कहती रही…. "हाथ छोड़ो ना प्लीज जाना है"

अपस्यु:- थोड़ी देर और ठहर जाओ….

साची अपनी गर्दन घुमा कर, झुकी हुई पलकों को ऊपर उठा कर उसे देखती हुई बस अपने होटों को हिलाई…. "जाने दो ना बाद मे आती हूं"…

धड़कने दोनों की तेज थी, और गुदगुदी के मीठा एहसास सीने में कहीं उठ रहा था। अपस्यु ने "ठीक है" कहते हुए उसका हाथ छोड़ दिया, और वो दौड़ कर उसके कमरे से बाहर चली अाई। कमरे के बाहर आकर वहीं दीवार से वो चिपक गई। अपनी बढ़ी हुई गुदगुदाती धड़कनों को काबू करती, आखें मूंदकर बस वही पल याद कर रही थी जब अपस्यु ने उसका हाथ पीछे से पकड़ लिया।

साची ठंडी-ठंडी सासें लेती उसी दृश्य को अपने अंदर मेहसूस कर रही थी। इधर अपस्यु भी उसके जाते ही सिरहाने को अपने बाहों में भींच कर करवट बदल-बदल कर उसी के ख्यालों में खोन लगा। साची वहां से खिलखिलाती हुई निकली। चेहरा खिला, चाल में नजाकत और होटों पर मध्यम-मध्यम गुनगुनाए गीत…..

हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गए
गुलों की शोखियाँ जो भँवरे आके लूट गए
बदल रही है आज ज़िन्दगी की चाल ज़रा
इसी बहाने क्यूँ ना मैं भी दिल का हाल ज़रा
संवार लूं हाय सवार लूं
संवार लूं हाय सवार लूं…

लगभग 3.30 बजे दोपहर का समय, दिल्ली की वो गर्मी और ऐसे वातावरण में भी साची को सब खिला-खिला और खुशनुमा मेहसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था पूरा समा ही सुहाना हो और मौसम ने जैसे प्यार के तराने छेड़ दिए हों।

इन्हीं सब को मेहसूस करती होटों पर "सवार लूं"… वाला गीत गुनगुनाती वो स्कूटी चलाने लगी। लेकिन कहते हैं ना हर रंग में कोई ना कोई भंग पर ही जाता है। एक बार फिर वो अपनी गली के सामने वाले ही मुख्य द्वार से निकली और अचानक से बड़ी तेजी में ब्रेक लगाना पड़ गया क्योंकि स्कूटी के ठीक सामने खड़ी थी सुलेखा…

गरम मौसम, कहर बरसाती धूप और सामने सुलेखा जी अपनी आखें छोटी किए हुए। बस साची को ही घूर रही थी।
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Aakhir sulekha ne dekh hi liya sanchi ko
अपस्यु:- सॉरी कहने की कोई जरूरत नहीं। शायद बदन ने कुछ ज्यादा ही दर्द मेहसूस कर लिया इसलिए चींख़ निकल गई वरना मस्त वाली फीलिंग अा रही थी।
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इधर कैंटीन से निकालकर आरव सीधा हिस्ट्री की क्लास के लिए चल दिया। लेकिन क्या ही किया किया जा सकता है, हिस्ट्री के क्लास तक पहुंचने के लिए उसकी जानकारी भी तो होनी चाहिए।

उसने एक छात्र को रोक कर "इतिहास के कक्षा कहां लगती है" उसकी जानकारी पूछने लगा… वो लड़का हाथ दिखता उसे "पागल" कहता हुआ चला गया। इसी तरह 3-4 और छात्र-छात्राओं से भी जानकारी निकालने की कोशिश किया लेकिन किसी ने भी उसके सवालों में तनिक भी रुचि नहीं दिखाई।

अंत में वो सीधा ऑफीस पहुंचा, वहां एक चपरासी को 20 रुपए दिए और तब कहीं जाकर उसे इतिहास के कक्षा के बारे में पता चला। कक्षा के पता चलने के बाद वहां रुकने की कोई वजह नहीं थी इसलिए वो भागने के लिए तैयार ही बैठा था, तभी वो चपरासी उसे टोकते हुए…. "अरे सुन मजनू, कहां भाग रहा है। फर्स्ट ईयर के हिस्ट्री का लैक्चर तो कब का खत्म हो चुका होगा"…

आरव:- ओह ! सब बेकार हो गया।

चपरासी:- 200 रुपए दे मैं पूरी डिटेल बता सकता हूं, कि कौन किसी वक़्त किस क्लास में होगी।

आरव:- तू तो भाई निकला, 500 रुपया लेले.. पर काम जल्दी कर दे…

उस चपरासी ने 500 रुपए लेेकर अपने पीछे आने के लिए बोला। आरव उसके साथ स्टाफ रूम में पहुंचा जहां एक कोने में कंप्यूटर लगा था। चपरासी ने कॉलेज पोर्टल पर किसी स्टाफ के नाम से लॉगिन करने के बाद उसे कहने लगा…. "अभी स्टूडेंट के फोटो के साथ नाम है… उसपर क्लिक कर पूरी क्लास कि डिटेल पता चल जाएगी। फिर मेरे पास आना.. कौन सी क्लास कहां लगती है मैं बता दूंगा। लेकिन उसके पैसे अलग लगेंगे।"

आरव, प्रोफ़ाइल ढूंढ़ते ढूंढ़ते कहने लगा…. भाई पक्का बिजनेसमैन हो… ये मिल गई अपनी जानेमन… ओ तेरी.. ये कहां से प्लॉट हो गई इधर।

चपरासी… मिल गई तो जल्दी डिटेल निकाल ना। यहां ज्यादा देर नहीं रुक सकते।

आरव लावणी ढूंढ़ रहा था… और इंग्लिश के लेटर K के बाद L आता है जहां लावणी के नाम के ठीक ऊपर कुंजल लिखा था वो भी तस्वीर के साथ। अब काहे वो लावणी की डिटेल लेने लगा। कुंजल की पूरी डिटेल वो लिखा और भागते हुए खुद अपनी आखों से देख कर सुनिश्चित करने चला गया कि, वाकई ये कुंजल ही है।

भागते वो कुंजल के क्लास के पास पहुंचा और कुछ दूरी पर छिप कर, वो क्लास की गेट पर नजर जमा लिया। तकरीबन 10 मिनट बाद क्लास ख़त्म हुई और छात्र-छात्राएं बाहर आने लगी। आरव बड़े गौर से सबको देखते जा रहा था। लावणी भी अपनी क्लास समाप्त कर निकल रही थी, कि उसकी नजर आरव पर पड़ गई।

बड़े आराम से वो आरव के पास पहुंची। ऐसा भी नहीं था कि वो दबे पाऊं या छिप कर अा रही हो, लेकिन आरव तो बिल्कुल "बको ध्यानं" (बगुले की तरह ध्यान लगाना) किए था कुंजल के लिए। लावणी उसके दाएं ओर खड़ी होकर उसके कंधे पर हाथ अपना हाथ रखी और वो भी सामने देखने लगी।

कुछ देर तक देखने के बाद…. हूं !!! शॉर्ट, स्कर्ट, स्लीवलेस, टाईट टी शर्ट, टाईट जीन्स, काफी सुकून मिल रहा होगा ना इन्हे देख कर। अब तक तो आखों से ही पूरा माप लेे लिया होगा। काफी सेक्सी लड़कियां है ना....

आरव बिना ध्यान दिए हुए…. हैं तो काफी सेक्सी लेकिन मज़ा कहां अा रहा है देखने में। जल्दी से दिख जाति तो सस्पेंस खत्म हो जाता।

लावणी:- जल्दी से सबकुछ थोड़े ना यहां दिखेगा। अब यहां न्यूड होकर तो नहीं घूम सकती ना, जितना दिख रहा है उतने में ही काम चला लो।

आरव:- अरे नहीं, ऐसा नहीं है.. मैं तो वो कुंजल…… वो ओ ओ !!! लावणी तुम !!

लावणी:- जी हां मै.. आखों में एक्सरे लगवा लो, सब कुछ जल्दी में दिख जाएगा।

आरव:- आंह ! पागल कहीं की मैं जल्दी में क्या दिखने की बात कह रहा हूं और तुम क्या सोच ली।

लावणी:- तुम मुझे बातों में घुमाओ मत। वैसे भी मुझे क्या लेना देना तुम कुछ भी करो। बस साची दी ने कहा था तुम मुझे घर तक छोड़ दोगे, इसलिए यहां अाई मै।

आरव:- ठीक है कैंटीन में जाकर बस 10 मिनट इंतजार करो, मैं आया।

लावणी मुंह बना कर भनभनाते वहां से चली गई और आरव फिर से कुंजल को ढूंढ़ने लगा। चारों ओर उसने अपनी नजर दौड़ाई। तभी उसे 4 लड़कियों का एक समूह दिखा, जहां उसे कुंजल भी दिख गई। कुंजल को देखते ही…. "ये पागल इधर क्या कर रही है। अपस्यु से बात करनी पड़ेगी"…

आरव वहां से दबे पाऊं भाग कर कैंटीन में आया जहां लावणी उसका इंतजार कर रही थी। वहां से फिर दोनों फटफटी में सवार होकर निकल गए। रास्ते में दोनों बिल्कुल खामोश थे और आरव इतनी देर तक खामोश हो रह जाए… कैसे संभव था…

फटफटी पर बैठा, वो भी हैल्मेट लगा कर, बात कर पाना काफी मुश्किल होता था, इसलिए उसने लावणी को कॉल लगाया.. जब लावणी ने अपने फोन को देखी तब वो एक बार फोन तो एक बार आरव को ही देख रही थी। चिल्लाती हुई वो उसके कानों में बोली…. "यहीं तो हूं, फिर कॉल क्यों लगा रहे"

आरव:- कॉल उठाओ बस…

लावणी कॉल रिसीव कर, इयरपीस अपने कानो में लगाती…. "मेरी शांति तुमसे देखी नहीं जाती, बको क्या बकना है"..

आरव, हंसते हुए… "इतना भड़क क्यों रही हो, तुम्हे छोड़ कर किसी और को देख रहा था, इसी बात का गुस्सा हो क्या?"

लावणी, गुस्से से बढ़ी श्वांस को काबू करती…. "मैं क्यों तुमसे गुस्सा होने लगी, मैं तो साची पर गुस्सा हूं की खुद चली गई मुझे फसा दी। आज उसको भी बताती हूं मै।"

आरव फिर से हंसते हुए…. ओह ऐसा है क्या?

लावणी:- मैं कोई कॉमेडी कर रही हूं, जो हर बात पर मुंह फाड़ कर हंस रहे हो। आगे देखो वरना कहीं अपने भाई की तरह तुम भी खटिया ना पकड़ लेना।

आरव:- अच्छा सॉरी बाबा। मैं अब बिल्कुल भी नहीं हंसने वाला, अब तो खुश हो ना।

लावणी:- नहीं । तुम मेरे कुंडली से गायब हो जाओ, तब मैं खुश हो जाऊंगी।

आरव:- अच्छा जी तो ऐसी बात है। वैसे हमारे बीच एक डील हुआ था, उसका क्या?

लावणी:- जाकर उस तस्वीर को इंटरनेट पर डाल दो। उससे भी मन ना भड़े तो मेरे घर की दीवाल पर, कॉलेज में हर जगह उसके पोस्टर लगा दो। लेकिन मैं ब्लैकमेल नहीं होने वाली।

आरव उस वक़्त सिर नहीं खुजा सकता था वरना वो सबसे पहले अपना सिर ही खुजता। लावणी का ये नया और बदला रूप, आरव को बिल्कुल चुप होकर अपने अंदर खुद से बात करने पर मजबुर कर दिया…. " ये वही लावणी है.. पापा की डरपोक पड़ी या कहीं 180ml चढ़ा कर तो ना अाई है। ऐसा लग रहा है कल रात ही इसमें नया अपडेट आया हो और ये नया वर्जन काफी खरनाक है।"

"रोको, रोको, रोको"… आरव अपने आप से बात करने में लगा था, तभी लावणी जोर से चिंखती हुई कहने लगी।

"क्या हुआ, पगला क्यों रही हो"… आरव ने भी चिढ़ जर जवाब दिया।

लावणी:- मोड़ अा रहा है… गाड़ी रोक, मैं पैदल चली जाऊंगी।

आरव, फटफटी को गली के अंदर लेते हुए बोलने लगा…. "क्यों डर रही हो। इतनी तेज धूप में कौन तुम्हारे घर से से बाहर आकर दरवाजे पर……

आरव कुछ दूर पीछे ही था कि उसे अपार्टमेंट के सामने का नजारा दिखा…. सुलेखा ठीक साची के सामने थी और वो स्कूटी का ब्रेक लगा दी।… उनको देख कर आरव कहने लगा… "बच गई लावणी आज तू, तेरी मां का ध्यान साची पर है"…..………….लावणी.. लावणी.. और नजर जब पीछे गई तो कुछ लड़के लावणी के पास खड़े थे…

दरअसल जैसे ही गाड़ी गली के अंदर पहुंची लावणी ने देख लिया कि सुलेखा सड़क पार करके अपार्टमेंट की ओर जा रही है, और ये नजारा देख वो बाइक से कूद गई। आरव तो बातों में लगा था कि "क्यों डर रही हो".. और उसे पता भी नहीं चला कि कब लावणी कूद गई। जब पीछे मुड़ कर देखा तब पता चला कि वो कूद चुकी है….

सामने का नजारा देख साची तो हक्की-बक्कि रह गई। साची के चेहरे के उड़ते रंग को देख आरव समझ गया कि "ये घबराहट में जरूर फसेगी"… इसलिए वो फटफटी को उनके पास लेे आया और कल्च दबा कर जोर से एक्सेलेरेटर लेते हुए…. "ये क्या आप लोग रास्ता रोक खड़े है, थोड़ा किनारे होंगी क्या"..

सुलेखा जो टुकुर-टुकुर साची को घुरे जा रही थी, वो आरव की ओर देखती हुई… "जा ना इतना तो जगह खाली है"..

आरव:- आंटी लगता है आप को धूप लग गया है, और साथ में आपकी बेटी को भी, वहां देखो सड़क पर ही गिर-पड़ रही है।

सुलेखा जब लावणी के बारे में सुनी तब उसने भी अपनी नजर दूर दौड़ाई और बड़ी तेजी से लावणी को देखने गई… साची भी तुरंत लावणी के पास जाना चाहती थी, लेकिन उसे रोकते हुए….. "इतना घबराने से फसोगी। कूल रहो और फूल बनाओ। जाओ अब जाकर उसे भी देखो।"..

इतना कह कर आरव अंदर चला गया और साची भी लावणी के पास पहुंच गई। इधर अपार्टमेंट पहुंचते ही आरव जल्दी में अपने फ्लैट पहुंचा…. अपस्यु वहीं बिस्तर पर बैठा अपने हाथ और बदन को देख रहा था…

"अपस्यु, तू जानता भी है उस कॉलेज में कौन पढ़ रही है"… आरव अंदर आते ही हड़बड़ा कर अपनी बात कहा…

अपस्यु:- कौन पढ़ रही है…

आरव:- कुंजल भी वहां पढ़ रही है.. एक साल सीनियर क्लास में…

अपस्यु:- कौन कुंजल…

"कितने कुंजल को तू जानता है… हां मैं उसी कुंजल की बात कर रहा हूं, जिसके बारे में तू अभी सोच रहा होगा"… आरव ने चिढ़ते हुए अपस्यु को सुना दिया।…
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Ab ye kunjal kon h jiske piche arav pada h :hmm:
 

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"कितने कुंजल को तू जानता है… हां मैं उसी कुंजल की बात कर रहा हूं, जिसके बारे में तू अभी सोच रहा होगा"… आरव ने चिढ़ते हुए अपस्यु को सुना दिया।…

"कितना रिएक्ट कर रहा है, अभी मैं रिकवर हुआ कि नहीं उसपर कोई बात भी नहीं किया। कल रात भर का जागा है, थोड़ी देर आराम भी नहीं किया। और तुझे अब ये कुंजल को लेकर फ़िक्र होने लगी है।".. अपस्यु ने समझते हुए कहा।

आरव, अपस्यु के पास आकर बैठते हुए, उसके हाथ को अपने हाथ में लेता…. "तेरी सभी बातें ठीक है, लेकिन कुंजल को आज देख कर मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नहीं अा रहा, इसलिए तो तेरे पास भगा आया मैं।"

अपस्यु:- कुंजल में तू कौन सी फैमिली ढूंढ़ रहा है मेरे भाई? जो कभी मॉम-डैड के रहते अपने नहीं थे, फिर आज कैसी उम्मीद लगाना।

"तेरे से मुझे बात ही नहीं करनी चाहिए थी। जैसे तू और हम भाई है ना वैसे ही अंकल भी पापा के भाई हैं। क्या दो भाइयों के बीच झगड़े नहीं होते? और झगड़े किस फैमिली में नहीं होते? मैं जा रहा हूं कुंजल से मिलने, तू यहां बैठकर सबको बस मतलबी ही समझा कर"… आरव गुस्से में हाथ झटक कर अपनी बात कहता वहां से उठकर बाहर चला गया।

अपस्यु, उसे पीछे से रोकने की कोशिश करता रहा किंतु वो गुस्से में गेट को पटकता हुआ वहां से निकल गया। उसके जाने के बाद अपस्यु अपनी ही बातों पर सोचता रहा और अफसोस भी हो रहा था।

इधर लावणी जब बाइक से कूदी तब बाइक की रफ़्तार लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रही होगी। लेकिन इस रफ्तार से भी चलती गाड़ी से कूदने पर नुकसान बहुत होता है। बेचारी सड़क पर गिर कर जैसे बिछ गई हो। कहां-कहां चोट अाई वो तो घर जाकर पता चलता फिलहाल वो उठने कि कोशिश में लगी थी।

आस-पास के कुछ लोग वहां जमा हो गए। उसे हांथ देकर उठाने लगे। इतने में ही पहले सुलेखा और उसके पीछे साची पहुंची। साची ने तुरंत उसे स्कूटी पर बिठाया और सीधा घर गई।

"तुझे कहीं चोट तो नहीं आई लावणी"… साची उसके कपड़ों से धूल हटाती हुई पूछने लगी। इतने में अनुपमा भी वहां पहुंच गई, लावणी के हाथ पर चोट के कुछ निशान देखकर वो थोड़ा घबरा गई… "क्या हो गया भुटकी को"

लावणी:- कुछ नहीं बस चक्कर खाकर गिर गई थी बड़ी मां।

"तू ये लकड़ी के तरह बनने की कोशिश करेगी तो यही होगा ना, और साची तू वो अपार्टमेंट में क्या करने गई थी।".. सुलेखा हॉल में पहुंचती ही दोनों पर बराशने लगी।

साची:- आप भी ना छोटी मां, वो तो मोड़ पर जाम लगा था तो मैं स्कूटी को आगे से लेकर अाई और लावणी उतर कर पैदल अा रही थी।

अनुपमा:- सुलेखा जाकर एंटीसेप्टिक लेकर आओ। देख भी नहीं रही बच्ची को चोट लगी है, और तुम चिल्ला रही हो।

सुलेखा के जाते ही अनुपमा लावणी को आखें दिखाती हुई पूछने लगी…. "तुम दोनों का ये क्या नाटक चल रहा है, मुझे सब सच-सच बताओ"..

साची:- हमने सच कहा है मां, हम पर यकीन नहीं।

अनुपमा:- सच को ज्यादा देर छिपा भी नहीं सकती वो सामने अा ही जाएगा। बेहतर होगा अभी सच बोल दो वरना तुम दोनों के चेहरे के हाव-भाव और तुम्हारी कहानी में कोई मेल नहीं।

लावणी:- बड़ी मां। यहां मैं दर्द में हूं और आप है कि उल्टा शक की जा रही है।

"सुलेखा कहां रह गई, जल्दी लाओ ना".. अनुपमा ने आवाज़ दी और कुछ ही पल बाद सुलेखा हाजिर थी। इधर लावणी की मरहम पट्टी चल रही थी उधर दोनों बहने आखों ही आखों में जैसे कह रही हो… "आज तो बच गए"।

शाम को तकरीबन 6 बजे होंगे जब साची अपने कमरे में बैठी अपस्यु के बारे में सोच रही थी। अपनी आज कि फीलिंग को वो किसी के साथ शेयर करना चाहती थी इसलिए वो अपनी करीबी दोस्त भावना कों कॉल लगाई लेकिन भावना अपने ब्वॉयफ्रंड के साथ व्यस्त थी इसलिए उसने बस संदेश छोड़ा।

कुछ देर इधर से उधर वो टहलती रही लेकिन जब कोई नहीं मिला तब वो हार कर अपना लैपटॉप ऑन की और एफबी चेक करने लगी। चेक करते करते उसने अपना फेक अकाउंट भी खोली। वहां देखी तो संदेश का अंबार लगा हुआ था…. "यहां मेरे सभी रियल दोस्त बीजी हैं और एक तुम हो".. साची सोच ही रही थी कि एक सॉरी का स्टिकर उसके मैसेंजर पर क्रेज़ी बॉय ने पोस्ट किया।

साची:- तुम क्या दिन रात एफबी पर ही बैठे रहते हो?
क्रेजी बॉय:- उस दिन शायद मुझे जो नहीं कहना चाहिए था वो कह गया। इसलिए गिल्टी फील कर रहा था। और तुम्हारे आने का इंतजार।
साची:- चलो मैंने माफ़ किया। लेकिन ध्यान रखना अगली बार से।
क्रेजी बॉय:- :) ओके मैम।

दोनों बात करने में व्यस्त हो गए। इधर आरव जब से गुस्सा होकर निकला था उसने एक बार भी अपस्यु का कॉल नहीं उठाया। अपस्यु को उसकी फ़िक्र होने लगी, लेकिन अभी उसकी हालत नहीं थी कि वो कहीं बाहर जा सके। रात के 9 बज चुके थे सोचते-सोचते इसलिए अब साची को भी मदद के लिए बुलाया नहीं जा सकता था…

अपस्यु से जब रहा नहीं गया तब उसने सिन्हा को कॉल लगाया और एक ड्राइवर के साथ किसी एक आदमी को भेजने के लिए मदद मांगी। थोड़ी देर बाद एक कर अपार्टमेंट के मुख्य द्वार पर रुकी और दो लोग अपस्यु के फ्लैट के ओर निकले।

"कैसे हो मुरली, और ये तुम्हारे साथ कौन है"… अपस्यु फ्लैट के बाहर ही इंतजार कर रहा था। ड्राइवर मुरली को सामने से आते देख उसने पूछा।

"ये नंदकिशोर है सर, बंगलो में हैल्पर का काम करता है"… मुरली ने जवाब देते हुए कहा।

वहां से तीनों कार में बैठे और द्वारिका सेक्टर के ओर निकाल गए। आरव का लोकेशन वहीं के आस-पास का अा रहा था। अपस्यु जब वहां पहुंचा तो आरव नशे में धुत, एक बंद दुकान के नीचे बैठा कुछ बड़बड़ा रहा था। मुरली और नंदकिशोर उसे सहारा देकर गाड़ी में बिठाए और दोनों को फ्लैट में छोड़ कर निकाल गए।

आरव जरा भी होश में नहीं था, बस बडबडा रहा था। अपस्यु ने किसी तरह उसके गंदे कपड़े बदले, उसे उठा कर जूस पिलाया और सोने के लिए छोड़ दिया। बीती रात जागे होने के कारण उसकी आंखें तो नहीं खुल रही थी लेकिन वो नींद में लगातार बाड़बड़ा कर सो गया। अपस्यु उसी के पास बैठ सुकून से उसे सोते हुए देखता रहा।

"साची, इस वक़्त"…. अपस्यु के मोबाइल की घंटी बाजी और वो कॉल उठा कर साची से पूछते हुए..
"क्यों इस वक़्त कॉल नहीं कर सकती क्या?"… साची अपने लटों को उंगलियों से गोल-गोल घुमाती पूछने लगी।
अपस्यु:- क्या हुआ कोई ख्याल सोने नहीं दे रहा क्या?
साची:- नहीं शायद .... (और गहरी शवांस लेने लगी)
अपस्यु:- लगता है बड़ा ही प्यारा ख्याल है। क्या मैं जान सकता हूं इस प्यारे से ख्याल के बारे में…… (दोनों ही अजीब सी गुदगुदी अपने अंदर मेहसूस कर खुश हो रहे थे)
साची:- कुछ बातों को बताया नहीं जा सकता। वैसे एक बात कहूं,
अपस्यु:- क्या?
साची:- तुम्हे देखने कि इक्छा हो रही है।
अपस्यु:- मेरे पाऊं अभी पूरी तरह ठीक नहीं, वरना अा जाता मैं।
साची:- हिहिहिहिही !! नहीं रहने दो। वैसे भी इंतजार का भी अपना ही मजा है।
अपस्यु:- ठीक है तुम इंतजार करो और कल मै तुम्हे सरप्राईज करूंगा…

"कैसा सरप्राइज… हेल्लो… हेल्लो"… अपस्यु फोन रख चुका था और साची अपने टैडी को अपने सीने से चिपका… "हाय … ये तेरा दीवानापन… तो कल सरप्राइज मिलने वाला है…. उफ्फ !! नींद नहीं आएगी अब अपस्यु… लगता है ये इंतजार कहीं जान ना लेले।"
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To ye kunjal inki behan h ?

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Dekhte h age kya hota h
 

Akki ❸❸❸

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"कैसा सरप्राइज… हेल्लो… हेल्लो"… अपस्यु फोन रख चुका था और साची अपने टैडी को अपने सीने से चिपका… "हाय … ये तेरा दीवानापन… तो कल सरप्राइज मिलने वाला है…. उफ्फ !! नींद नहीं आएगी अब अपस्यु… लगता है ये इंतजार कहीं जान ना लेले।"

कल के सरप्राइज के ख्याल ने ऐसा बेख्याली में डाला की खुशी की लहर सर से पाऊं तक दौड़ रही थी और करवट बदलते-बदलते कब नींद अा गई पता भी नहीं चला। सुबह जब साची उठी तब सबसे पहले नजर फोन पर ही गई जिसमें अपस्यु का संदेश लिखा था… "सुबह का पहला सरप्राइज, मैं कॉलेज जाने के लायक हूं, और कॉलेज में मिलते हैं।"

साची को तो जैसे पंख लग गए और वो आज पूरे रिझाने के इरादे से तैयार हो रही थीं। वहीं दूसरी ओर रात को कॉल रखने के बाद अपस्यु ने एक बार फिर से "सेल रिपेयर थेरेपी" शुरू किया। सुबह के 4 बजे तकरीबन उसकी नींद खुली और आंख खुलते ही सबसे पहले उसने अपने पाऊं का ही आकलन किया।

"आह ! पूरा सर भरी है"… आरव अपने सिर पकड़ कर उठते हुए कहा।
"पास में ही नींबू पानी का जूस रखा है, गटक जा".. ट्रेडमिल पर भागते हुए अपस्यु ने कहा।

सिर भारी था, आंख पूरी तरह से खुली नहीं थी। नींबू पानी लेने के बाद भी हैंगओवर नहीं उतरा था लेकिन आरव की आखें जरूर खुल चुकी थी। उसके आखों के सामने अपस्यु केवल निक्कर पहने, ट्रेडमिल पर भाग रहा था… "अबे कल तक तो टूटा था, आज भागने कैसे लग गया"..

"तूने कल ध्यान दिया होता तो शाम को ही मैं भागने लग जाता"… अपस्यु, अपने बदन को तौलिए से पोंछता आरव के पास पहुंचा।

आरव:- सारी मेरे भाई, पता नहीं कल मुझे किस बात का फ्रस्ट्रेशन था....
अपस्यु:- शायद मेरे ही बातों का फ्रस्ट्रेशन था। गलती तेरी नहीं मेरी है। तूने कल सही कहा था, है तो वो अपनी बहन, अपना खून।
आरव:- सच भाई। वैसे कल मैं कुंजल से मिलने गया था लेकिन कॉलेज के एड्रेस पर वो नहीं मिली।
अपस्यु:- कोई बात नहीं है, चलकर तैयार होते हैं, आज उससे कॉलेज में ही मिलते हैं।
आरव:- वो सब तो ठीक है, लेकिन क्या उसके दिल में भी हमारे लिए वहीं प्यार होगा, क्योंकि संस्कार तो उसमे कनाडा वाले ही होंगे… "सैपरेट और इंडिपेंडेंट ख्याल वाले।"
अपस्यु:- चलकर मिल तो लेे पहले, फिर देखते हैं क्या होता है?

दोनों भाई तैयार हो चुके थे। अराव कुछ ज्यादा ही खुश नजर आ रहा था, शायद परिवार से मिलने की खुशी थी। तभी अपस्यु के मोबाइल पर साची का कॉल आया। उससे बात करने के बाद वो आरव से कहने लगा… "लगता है आज फिर तुम्हे लावणी के साथ उसके स्कूटी पर जाना होगा।"

आरव:- नहीं मैं फटफटी से जाता हूं तू लैंबोर्गिनी से चला जा।
अपस्यु:- कुछ हुआ है क्या है मेरे भाई।

अपस्यु:- चल कोई नहीं। तू निकल फिर मै भी पीछे से पहुंचा।

आरव वहां से निकल गया अपस्यु अपनी लैंबोर्गिनी एवेंटाडोर लिए अपार्टमेंट के दूसरे गेट पर उसका इंतजार करने लगा। कुछ पल बाद लावणी भी स्कूटी लेकर पहुंची। अपस्यु ने जब साची को देखा तो देखता ही रह गया। क्या लग रही थी आज वो, एकदम क़यामत।

साची को अपस्यु के पास उतार कर लावणी फिके मुंह आरव के बारे में पूछने लगी। अपस्यु का ध्यान साची से हटकर लावणी पर गया जिसे देख कर वो समझ गया की क्यों आरव नहीं गया लावणी के साथ। उसने भी शालीनता से जवाब देते हुए लावणी से बोला… "तुम जाओ वो चला गया कॉलेज"… इधर तब तक साची अाकर कार में बैठ चुकी थी।

"वाउ ! ये लैंबोर्गिनी एवेंटाडोर है ना"… साची पूरे उत्सुकतावश पूछी
"तुम ये बेकार की बेजान सी चीज देखने में व्यस्त हो और मेरी जान कहीं और अटक चुकी है"… एक पूरी नजर साची को देखते हुए अपस्यु ने कहा। डार्क मरून रंग की प्लेन पेंसिल ड्रेस जो घुटनों के थोड़ा ऊपर तक थी, उसके आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। बाल पूरे खुले और चेहरे पर किया ये हल्का मेकअप… उफ्फ ! आज तो पूरे जान लेने के इरादे से निकली थी घर से।

"कहां अटक चुकी है तुम्हारी जान अपस्यु".. साची मुस्कुराती हुई अपस्यु के ओर देखती हुई पूछी.. दोनों की नजरों से नजरें टकरा रही थी और प्रतिक्रिया में अपस्यु भी मुस्कुराया और अपनी कार को स्टार्ट कर निकल लिए कॉलेज के ओर..

बाहर खामोशी और अंदर तूफान चल रहा था। इसी कस-म-कस में दोनों की आवाज़ बिल्कुल धीमी और मुस्कान पूरे तेज देखने मिल रहा था। साची का दिल तो पहले से ही सरप्राइज के नाम से धड़क रहा था और बेसब्री अपने चरम पर थी, केवल इस इंतजार में कि अब कह भी दो अपस्यु। और अपस्यु तो केवल उसके रूप को ही निहार-निहार कर निहाल हुआ जा रहा था।

दोनों के चेहरे की चमक एक अलग ही स्तर पर थी जो देखने वालों को यहीं अनुभव करवाती की दोनों साथ में कितने प्यारे लग रहे है। किंतु आज तो पूरे कॉलेज के लिए आकर्षण का केंद्र उसकी लंबोर्गिनी ही बनी हुई थी। जैसे ही कार कॉलेज के गेट पर रुकी, एक अत्यंत आकर्षित बाला उसके पास खड़ी होकर पूछने लगी…. "Hey handsome, wanna ride with me"

साची का तो खून ही खौल गया…. वो कुछ बोल पाती उससे पहले ही कार आगे बढ़ने लगी और वो लड़की तबतक अपने हैंडबैग से लिपस्टिक निकालकर एक कागज में अपना नंबर लिख दी। उस कागज पर अपने लिपस्टिक लगे होटों के निशान छापकर अपस्यु के गोद में फेक वो आंख मार दी। उसकी इस हरकत पर तो साची और भी जलभुन गई….

"हुंह ! उसे इतना भाव देने की क्या जरूरत थी".. साची गुस्से में पूछने लगी।
"मैंने कहां किसी को भाव दिया। वो तो खुद चिपकी जा रही थी".. अपस्यु सफाई देते कहने लगा।
"हां वो तो मैं भी देख रही थी। तुम्हारे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला और निकलता भी कैसे, उस मिनी स्कर्ट वाली को देखकर तुम्हारे मुंह से लार जो टपक रहा था".. साची एक बार फिर अपने गुस्से का इजहार करती।
"मैंने तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी, फिर तुमने ये सब नोटिस कैसे कर लिया".. अपस्यु, साची का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे समझाते हुए कहने लगा।

"तो जाओ और पहले अपनी प्रतिक्रिया ही देकर आओ, मैं चली क्लास"…साची हाथ झटक कर कार से नीचे उतर गई और अपने क्लास के ओर चल दी। उसे पीछे से जाते देख अपस्यु अपने बालों में हाथ फेरता खुद से ही कहने लगा… "हाय लगता है इजहार से पहले ही इश्क़ के साइड इफेक्ट्स देखने को मिल रहे हैं। मज़ा आएगा"..

अपस्यु कार पार्क कर लौट ही रहा था तभी उसके पास आरव का कॉल आया और उसने कुंजल के बारे में कुछ बात कि.. अपस्यु वहां से सीधा आरव के पास पहुंचा… "अभी-अभी हिस्ट्री की क्लास में गई है".. अपस्यु के आते ही आरव ने कहा।

"तो फिर हम यहां क्या कर रहे है, हम भी चलते हैं क्लास में".. अपस्यु ने पूरे उत्साह के साथ कहा।

"अबे वो हिस्ट्री की क्लास है वो भी 2nd ईयर की"… आरव ने चिंता जाहिर करते हुए कहा। लेकिन आरव की बात को नकारते, अपस्यु उसे खींच कर अंदर लेे गया। क्लास चल रही थी प्रोफेसर बोर्ड पर कुछ लिख रहे थे और इतने में दोनों भाई अंदर जाकर सीधा कुंजल के पास वाली सीट पर आकर खड़े हो गए।
Bdiya update nain bhai :love3:

Story mast chal rahi h ??

Dono behne ek jaisi h, jarasi baat pe jal jati hai
आरव:- कुछ नहीं बस ऐसा लग रहा है मैं उसे परेशान कर रहा हूं।
:alright:
 
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