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Romance भंवर (पूर्ण)

Akki ❸❸❸

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क्लास चल रही थी प्रोफेसर बोर्ड पर कुछ लिख रहे थे और इतने में दोनों भाई अंदर जाकर सीधा कुंजल के पास वाली सीट पर आकर खड़े हो गए।

वहां कुंजल सबसे आखरी में बैठी थी उसके दाएं एक लड़का और उस लड़के के दाएं फिर एक लड़की बैठी थी। "ये सीट तो पहले से बुक है भाई".. आरव ने दोनों को घूरते हुए कहा…. "तो अभी खाली करवा देते हैं"… अपस्यु ने भी हंसते हुए जवाब दिया।

वहीं कुंजल जब दोनों को एक नजर देखी तो आरव का चेहरा उसे कुछ जाना पहचाना सा लगा लेकिन वो दिमाग पर ज्यादा जोड़ ना देकर वहां चल रहे ड्रामे पर फोकस करने लगी। तबतक दोनों भाई उन दोनों को हुल देते हुए वो जगह खाली करने को बोल रहे थे।

चूंकि वो लड़का, आरव को उस मिनिस्टर वाले कांड के दिन लावणी के साथ देखा था, इसलिए वो चुपचाप वहां से जाने लगा लेकिन उसके पास बैठी लड़की ने उसका हाथ पकड़ कर वहीं रोक लिया… "ये क्या बात हुई, इसने एक बार कहा और तुम जाने लगे क्रिश"..

दोनों भाई ने जब क्रिश नाम सुना तो हंसते हुए कहने लगे… "जादू, .. जादू".. इतना सुनकर वहां के आस पास के छात्र-छात्राएं भी हसने लगे।.. और मास्टर जी बोर्ड पर लिखते-लिखते ही जोड़ से "साइलेंट" चिल्ला दिए। वो लड़का क्रिश तो शांत ही बैठा रहा किंतु उसके साथ वाली लड़की कुछ कहने को हुई, तभी उस लड़के ने उसका हाथ पकड़ कर कहा.. "इनके मुंह मत लगो विन्नी, वो शशांक याद है ना, उसका पंगा इन्हीं के ग्रुप से हुआ था"… "तो.. तो अब ये दादागिरी करेंगे".. विन्नी भी गुस्सा दिखाती हुए बोली…

विन्नी का गुस्सा देख दोनो भाई आपस में ही जुगलबंदी करने लगे…. "अपस्यु ये विन्नी का पूरा नाम शायद वीनिता होगा, नहीं"….. "हां लगता तो ऐसा ही है आरव"…… "कैसे-कैसे लोग हैं, अच्छे नाम को भी कांट-छांट कर देते है"….. "सही कहा आरव, शुक्र है पद्मावत नहीं नाम रखा वरना शॉर्ट करके पाद बुलाते"

"How dare you to talking like this"... विन्नी गुस्से में थोड़ा चिल्ला कर बोली, और दोनों वहां से निकलने लगे। तभी प्रोफेसर साहब पीछे मुरे और…

प्रोफेसर:- तुम लोग पूरी क्लास को दिस्ट्रब कर रहे हो। वहां चारो खड़े होकर क्या तमाशा लगा रखा है?

आरव:- गुरु जी आप जारी रखिए, हमारा पूरा ध्यान पढ़ने में है।… (आरव और अपस्यु जबतक बैठ गए, और वो दोनों पीछे चले गए)

प्रोफेसर:- मिस्टर ध्यानचंद जरा ये बताओ, प्रथम विश्व युद्ध में भारत का क्या योगदान रहा था?

इस सवाल के जवाब के लिए अपस्यु खड़ा हुआ और जो उसने प्रथम विश्व युद्ध में भारत के योगदान के बारे में बोला, प्रोफेसर साहब तो हक्के-बक्के रह गए। शुरवात ही उसने 1918 के हैफा युद्ध से कि जहां राजपूताना शौर्य गाथा सुनते, उसने तलवार और भालों की वो आखरी युद्ध याद दिलवाई, जिसके प्रतिद्वंद्वी उस वक़्त के सबसे एडवांस वैपन से लड़ रहे थे। फिर भी 900 जाने गंवा कर भारतीयों ने अपनी जीत सुनिश्चित की थी।

और जब अपस्यु ने एक बार बोलना शुरू किया, फिर तो ऐसा समा बांधा की क्लास की घंटी बजने तक सब ध्यान लगा कर उसे ही सुनते रहे, सिवाय 2 लोग के। एक तो आरव जो कुंजल को छोटे-छोटे नोट्स लिख कर दे रहा था पढ़ने और दूसरी कुंजल जो ना चाहते हुए भी उसके नोट्स को पढ़ रही थीं।

कुछ ही समय में कुंजल के दिमाग में भी सारी तस्वीरे साफ हो चुकी थी। आश्चर्य के भाव उसके चेहरे पर भी थे और वो दोनों भाइयों के चेहरे को बड़े गौर से देखें जा रही थी। इधर क्लास ख़त्म हुआ उधर कुंजल दोनों को अनदेखा कर अपने दोस्तों के बीच चली गई।

आरव तो उनके बीच ही घुसने वाला था लेकिन अपस्यु ने उसे रोक लिया और इंतजार करने के लिए कहा। कुंजल अपने दोस्तों से बात करती हुई बाहर निकाल अयी और इनके पीछे-पीछे ये दोनों भाई भी। कुंजल उनसे बात करते हुए चल भी रही थी और बीच बीच में दोनों भाई को देख भी रही थी।

इधर साची जब गुस्से में क्लास पहुंची तब अपने पीछे अपस्यु को ना आते देख उसकी नजरें दरवाजे पर टिकी, उसी का इंतजार करती रही। पहले थोड़ी नाराजगी फिर अंतरमन ने अफसोस होने लगा। कुछ देर पहले हुई घटना पर सोचती वो थोड़ा मायूस होकर अपने मन में ख्याल करने लगी…. "मुझे इतना ओवर रिएक्ट नहीं करना चाहिए था, कहीं नाराज तो नहीं हो गया"… उसका मासूम सा खिला चेहरा अफसोस करते उतर आया था।

क्लास में मन ना लगने कि वजह से वो क्लास को बीच में ही छोड़कर अपस्यु को ढूंढ़ने निकल गई। बहुत ढूंढ़ने के बाद भी जब अपस्यु नहीं मिला तो दिल में ना जाने कैसी चुभन सी होने लगी और वो अफसोस करती जाकर कैंटीन में अकेली बैठ गई। इतनी खूबसूरत लड़की, कैंटीन में अकेली बैठी। फूल को देखकर जैसे भंवरे खिंचे चले आते हैं ठीक उसी प्रकार कुछ लड़के भी उसके आस पास मंडराने लगे।

उनमें से एक ने हिम्मत कर उसके पास बैठ गया…. "Hi I am Kapil".. वो लड़का अपना हाथ आगे बढ़ता हुए कहने लगा। साची अपने नजर उठा कर उसे एक बार देखी … "क्यों बोर कर रहा है भाई, जा ना यहां से"

"अरे मेरे पापा तुम्हारे घर कब गए"… कपिल ने कुछ प्रैंक वीडियो देख कर अपनी स्मार्टनेस दिखाते हुए बोल कर जोड़-जोड़ से हंसने लगा। साची उसकी बात सुनकर पूरी चिढ़ गई.. लेकिन खुद पर काबू करती वो कहने लगी…

"साले तेरा बाप का तो पता नहीं लेकिन तेरी मां जरूर मेरे घर आई थी, जाकर डीएनए टेस्ट करवा ले। अब निकल वरना इतने सैंडल मारूंगी की, कुत्ते तेरी आनी वाले पीढ़ी मेरे सैंडल के निशान के साथ पैदा लेगी। चल भाग यहां से।"

वो अपने दोस्तों के सामने घोर बेइज्जत होकर वहां से निकला, लेकिन जाते जाते फिर से धमकी देता गया और उसकी धमकी सुनकर एक बार फिर साची भड़क गई। खैर उसके जाते ही लावणी उसके पास आकर बैठी। वो साची को देखते ही बोली… "घर से निकलते वक़्त इतना खिला चेहरा इतनी जल्दी कैसे उतर गया"..

"कुछ नहीं यार !! मैं ही कुछ ज्यादा रिएक्ट कर गई छोटी सी बात पर, और पता नहीं तबसे अपस्यु कहां चल गया। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा।".. साची मायूसी से बोली।

लावणी, जिसका क्लास अभी-अभी समाप्त हुआ था वो पीछे से दोनों भाई का ड्रामा देखते आ रही थी कैसे वो 3-4 लड़कियों के पीछे पीछे चला अा रहा था.. साची की बात पर वो चुटकी लेती बोलने लगी… "2 मिनट यहीं बैठो, अभी दोनों भाई दिख जाएंगे। हां लेकिन उनकी हरकतें देख कर शायद तुम बर्दास्त ना कर पाओ।"

साची:- क्या मतलब मैं बर्दास्त नहीं कर पाऊंगी, तू कहना क्या चाह रही है, खुल कर बोल।

लावणी:- खुल कर कहना क्या है, पीछे मुड़ कर देख मेरी बातों का मतलब भी समझ में आ जायेगा।

साची जब पीछे मुड़ी तब 3-4 लड़कियां कैंटीन में आ रही थी और उनके पीछे-पीछे दोनों भाई भी आ रहे थे। दोनों भाई ठीक उन दोनों बहनों के पास से निकाल गए लेकिन उन्होंने ध्यान तक नहीं दिया। बेचारी साची का चेहरा तो देखने लायक था। गुस्से में आकर कब उसने हाथ में परी किताब के पन्नो के चिथरे उड़ा दिए उसे पता भी नहीं चला। लेकिन अभी कहां, ये तो शुरवात थी।
Bdiya update bhai ji :love3:
पद्मावत नहीं नाम रखा वरना शॉर्ट करके पाद बुलाते
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साची जब पीछे मुड़ी तब 3-4 लड़कियां कैंटीन में अा रही थी और उनके पीछे पीछे दोनों भाई अा रहे थे। दोनों भाई ठीक उन दोनों बहनों के पास से निकल गए लेकिन उन्होंने ध्यान तक नहीं दिया। बेचारी साची का चेहरा तो देखने लायक था। गुस्से में आकर कब उसने हाथ में परी किताब के पन्नो के चिथरे उड़ा दिए उसे पता भी नहीं चला। लेकिन अभी कहां, ये तो शुरवात थी।

कुंजल अपनी सहेलियों के साथ एक टेबल पे बैठी। ठीक उसी वक़्त दोनों भाई वहां पहुंचे और बाकी लड़कियों को वहां से जाने के लिए कहा। कुंजल को इस बात पर बेहद गुस्सा आया और उसने सबके सामने आरव को खींच कर एक तमाचा जड़ दिया…. "नफ़रत है मुझे तुम से, तुम्हारे मां बाप से। हमे पता होता कि तुमलोग इस सहर में मिलोगे तो हम दिल्ली कभी आते ही नहीं… चलो नम्रता।"

गुस्से में वो पागल होकर वहां से चली गई। आरव भी उसके पीछे जाने वाला था लेकिन अपस्यु ने उसका हाथ पकड़कर उसके पीछे जाने से रोक लिया।…. "अपस्यु छोड़ मेरा हाथ, वो मां के बारे में होती कौन है बोलने वाली".. आरव भी पूरा गुस्सा दिखाते हुए कहने लगा।

"शांत हो जा अभी, बिल्कुल शांत"… अपस्यु, आरव को समझा ही रहा था कि इसी बीच साची और लावणी भी चली आईं…. "कमाल का थप्पड था। काश उस लड़की के जगह मै होती। कमाल का सरप्राईज था ये, मैं जिंदगी में इस से ज्यादा फिर कभी ही शायद सरप्राइज हो पाऊं। चल लावणी"…. साची ताली बजाकर अपनी बात कहती हुई निकालने लगी।

"तुझे नहीं कुछ कहना, तू भी कुछ कहती जा ना।"… आरव ने पीछे से जाती हुई लावणी से कहा। आरव की हरकत पर अपस्यु आग बबूला हो गया, लेकिन इस बार अपस्यु ने अपने मुंह से कोई शब्द नहीं निकला, बस अपनी आखें उसे दिखाई और वो बिल्कुल शांत हो गया।

अपस्यु:- कितनी बार मैं समझता रहूं की गुस्से को इस्तमाल करना सीख, लेकिन तू है कि….
आरव:- सॉरी यार। एक तरफ ये कुंजल इतना पगलाई क्यों है वो समझ में नहीं अा रहा। जबकि इसके मां बाप ने कभी हमारी सुध तक ना ली। उसपर से ये दोनों बहने है, अक्ल की पैदल। मामला क्या है कुछ समझती नहीं बस कुछ भी प्रतिक्रिया देती रहती है। गुस्सा तो आएगा ना। अब हर कोई तेरी तरह संत तो नहीं होता ना।
अपस्यु:- उल्लू है तू। अगर तू अपने गुस्से पर काबू रखता तब तो तुझे कुछ समझ में भी आता…
आरव:- क्या?
अपस्यु:- हमारी नजर में अंकल और आंटी बुरे है। कुंजल के नजर में उसके अंकल और आंटी बुरे है। कुछ तो बात है जो हमे भी पता नहीं।
आरव:- पता कैसे होगा अंकल और आंट से जब झगड़ा हुआ था तब हमें अक्ल ही कितनी थी। और उसके कुछ दिन बाद तो…
अपस्यु:- कोई नहीं। यह वक़्त है पहले फैमिली रियूनियन का। एक काम कर कार के जीपीएस को फॉलो करके तू मेरे पीछे आ।

आरव:- तू कहां जा रहा है।
अपस्यु:- कुंजल को किडनैप करने।
आरव:- कार की चाभी तो देता जा, वरना पार्किंग तक उठा कर ले जाते हुए जो सीन बनेगा वो अच्छा ना लगेगा।
अपस्यु:- गूड आइडिया । जा कार लेे अा।

अपस्यु तेजी के साथ निकला और सीधा कुंजल के पास पहुंचा। कुंजल उसे नजरअंदाज करती आगे बढ़ गई। अपस्यु उसका हाथ पकड़ कर उसे रोकते हुए…. "सुनो कुंजल, तुमसे कुछ बात करनी है"

कुंजल:- मुझे तुम्हारी शक्ल ही पसंद नहीं। हाथ छोड़ो मेरा और यहां कोई सीन क्रिएट करने की कोशिश मत करो।
अपस्यु:- बस एक बार हमे बात करनी है, फिर तुम है जैसा चाहोगी वैसा ही होगा।
कुंजल अजीब सी हंसी हंसती हुई कहने लगी…. "बस 500 रुपए है हमारे पास। इतना ही तुम बेईमानी कर सकते हो। जाओ किसी और को ढूंढो शायद मोटी रकम बेईमानी करने के लिए मिल जाए।"
अपस्यु:- तुम अगर यहां सीन ही क्रिएट करना चाहती हो तो वही सही। लेकिन बिना बात पूरी हुए मैं नहीं जाने वाला।
कुंजल:- हाथ छोड़ो मेरा।

"क्या हुआ कुंजल, और ये लड़का जबरदस्ती कर रहा है क्या?".. कुंजल के कुछ क्लासमेट उसके पास आकर पूछने लगे।
अपस्यु:- यहां कोई तमाशा नहीं चल रहा, ये हमारा पारिवारिक मामला है। इसलिए निकलो तुम लोग यहां से।
"तू है कौन बे, और कुंजल के साथ ऐसे जबरदस्ती क्यों कर रहा है।"… उन में से एक और लड़का ने पूछा।
कुंजल:- हाथ छोड़ो मेरा, तुम यहां पर ड्रामा कर रहे हो।

इतने में आरव वहां गाड़ी लेे कर पहुंच गया। सभी लड़के गाड़ी देखते ही उसके हैसियत के बारे में सोचकर वहां से कट लिए। और जब कुंजल ने उनके पास इतनी मंहगी कार देखी तो वो ताने मारती कहने लगी… "तो तुम्हरे बेईमान बाप ने यहां खर्च किए हैं पैसे।"

अपस्यु उसकी बातों का कोई जवाब नहीं दिया बस गुस्से से अपनी आखें लाल करता हुआ उसे गाड़ी में बैठने के लिए बोला। लेकिन कुंजल को किसी के भी आखों का भय थोड़े ना था। वो भी विरोध करती रही। अंत में फिर उसे किडनैप ही करना पड़ा।

अपस्यु और आरव के बीच में कुंजल बैठी, बस गुस्से से फुंफकार रही थी।.. "अपस्यु यार बहन तो अपनी ही लग रही है, बिल्कुल अपने जैसा तेवर है"…. आरव चुटकी लेते हुए बोला…… "मुझे बहन मत बुलाओ, घृणा आती है तुम से और तुम्हारे परिवार से"… कुंजल गुस्से में फुफकारती बोली…. "घर का एड्रेस बताओ"… अपस्यु ने पूछा…. "मुझे नहीं पता" … कुंजल गुस्से में जवाब देती मुंह बना कर सीधी बैठ गई।

दोनों भाई पता पूछते रहे लेकिन कुंजल भी इन्हीं की तरह ढीट थी। मुंह फुलाए और और गुस्से से फुफकारती बस आगे देखती रही। इसी बीच वो किसी चौराहे से गुजरे जहां पुलिस चेक पोस्ट लगी थी। अपस्यु ने जैसे ही गाड़ी रोका कुंजल कूद कर पुलिसवाले के पास भागी और किडनैपिंग की सिकायत करने लगी।

वहां मौजूद सभी पुलिसवाले ने तुरंत ही दोनों भाई को घेर लिया और गाड़ी से उतरने के लिए कहने लगे। दोनों भाई हाथ ऊपर करके बाहर आए। दोनों भाई थाने में और कुंजल अपनी रपट दर्ज करवाकर वहां से सीधा अपने घर चली गई।

थानेदार इससे पहले की कोई एक्शन लेता, अपस्यु कहने लगा… "तो हम चले सर।"
थानेदार:- बैंचो, तुझे ये क्या सराय लगता है जो मुंह उठाए चले आए और जब जी चाहे, चले गए। बंद करो सालों को और इतने डंडे मारो की इनसे किडनेपिंग का भूत उतर जाए। और माचो से पता करो ये गाड़ी कहां से उड़ाई इसने।

अपस्यु:- सर टेक्निकली आप मुझे अरेस्ट नहीं कर सकते। रपट सोनू और मोनू के नाम पर लिखा है जिसमें ना तो पता आपने लिखा है और ना ही पिता का नाम। (सोनू और मोनू नाम से दोनों भाई को घर में बुलाते थे)

थानेदार:- ईब हम पता लगा लेंगे छोड़े तेरा पता और तेरे बाप का नाम भी। अब जो किडनैप हुई, उसे थोड़े ना किडनैपर की डिटेल पता होती है। हम अपनी रपट पूरी कर लेंगे, तू चिंता ना कर। लेकिन बैंचों आज तेरे पिछवाड़े को ऐसा सुझाएंगे की तू अपनी हालत पर रोएगा। और ये जो तू जिस किसी के दम पर भी इतना अकड़ कर बात कर रहा है ना, तेरी हालत देखकर उसकी पतलून भी गीली हो जाएगी।

अपस्यु:- जानते हो थानेदार साहब, बड़े बुजुर्गो ने कहा है किसी के फैमिली मैटर में नहीं पड़ते वरना वो फैमिली तो एक हो जाति है लेकिन बीच में जो पड़ता है वो पीस जाता है।
थानेदार:- के मतलब है?
अपस्यु:- यहीं की कुंजल मेरी कजिन है और उनके पापा का नाम भूषण रघुवंशी है।
थानेदार, उसके ऊपर हंसते हुए… "चुटिया कहीं का.. माचो आज कल तो हर किडनैपर इतनी डिटेल लेकर चलता है।"

अपस्यु:- अपनी जुबान पर थोड़ा काबू रखिए सर, हम कोई उठाएगीरा या क्रिमनाल नहीं है, और ना ही मेरे खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज हुई हैं। ये लो मेरा ड्राइविंग लाइसेंस और पढ़ो इसमें मेरे पिता का नाम.. चन्द्रभान रघुवंशी। किसने बनाया आप को थानेदार, थोड़ी भी अक्ल की नहीं। कोई किडनैपर चेकपोस्ट पर गाड़ी रोकता है क्या? अभी मैंने वकील बुला लिया ना तो सारी जिंदगी घर में ही गाली बकते रहना, स्टेशन दोबारा देखना नसीब भी नहीं होगा।

अपस्यु के तेवर और उसके पेश किए गए दस्तावेज को देखने के बाद, थानेदार भी थोड़ी सोच में पर गया। उसने अपने कुछ लोगों को बुलाकर, सलाह-मशवरा करने के बाद…... "ठीक है यदि ऐसी बात है तो अभी हम उसके घर चलकर सारी बातों की तहकीकात करेंगे। अगर तुम्हारी बातें सच निकली तो ठीक वरना तेरी जवानी का पूरा जोश लॉकअप में ठंडा करेंगे।

आरव, अपस्यु को देख कर हंसने लगा और आंखों से जैसे कह रहा हो… "मास्टर्स स्ट्रोक"… वहां से लंबोर्गिनी में एक हवलदार और अपस्यु बैठा और पुलिस जीप में आरव। पुलिस जीप किसी रेलवे ट्रैक के पास रुकी और पटरियों को पार करके वो लोग एक गंदी बस्ती में घुसे। चारों ओर अजीब सी बदबू और हर जगह कचरा फैला हुआ। अपस्यु और आरव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे उनका पैर जैसे स्थूल (भारी) परने लगे थे। एक-एक कदम आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था।
Bdiya update nain bhai :love3:
आरव:- पता कैसे होगा अंकल और आंट से जब झगड़ा हुआ था तब हमें अक्ल ही कितनी थी। और उसके कुछ दिन बाद तो…
Aunt english :D
Aur ye dono bhai police ko kon se ghar le ke aye h :hmm:
 

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उस गंदी बस्ती में प्रवेश करते ही चारों ओर अजीब सी बदबू और हर जगह कचरा फैला हुआ। अपस्यु और आरव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे उनका पैर जैसे स्थूल (भारी) परने लगे थे। एक-एक कदम आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था।

जो बातें इस वक़्त आरव के दिमाग में चल रही थी वहीं बातें अपस्यु भी सोच रहा था। दोनों की आंखें डबडबाई सी थी बस आखों से आंसू छलकने बाकी थे। दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया हो। कुछ भी समझ पाना मुश्किल था। कुछ ही देर में दोनों भाई एक झोपड़ी के सामने थे। एक पुलिसवाले ने आवाज़ लगाई और दोनों मां बेटी दरवाजे पर खड़ी थी।

कुंजल तो उन दोनों को देख कर ही गुस्से में अंदर भाग गई, लेकिन उसकी मां यानी की दोनों भाई की आंटी नंदनी, बस एक झलक दोनों भाई को देखी और देखते ही पहचान गई। वो दोनो से लिपट कर ऐसे रोई, मानो वर्षों से ये आशु किसी के लिए बचा रखे हो। डबडबाई आखें तो दोनों भाई की थी लेकिन अपस्यु के आशु आखों में ही छलकते रहे और आरव फुटफुट कर रो रहा था।

उनलोगों को ऐसे देख पुलिसवालों को भी अपस्यु की बात समझ में अा गई थी। थानेदार ने अपस्यु के कंधे पर हाथ रखा और साथ चलने का इशारा किया। अपस्यु अपनी डबडबाई आखों को रुमाल से साफ करते हुए अपने आंटी से अलग हुआ। थोड़ी दूर चलने के बाद थानेदार ने अपस्यु को सरा मामला समझाते हुए हुए कहने लगा.…. "अपनी बहन में साथ अाकर अपनी रपट कैंसल करवाओ वरना शाम तक ये रिपोर्ट एसपी ऑफिस पहुंच जाएगी, फिर ज्यादा परेशानी होगी"।

अपस्यु उनके साथ कार तक आया और अपना डिक्की खोल कर कहने लगा… "सर आप का एहसान है मुझ पर। जितना आप की इक्छा हो उठा लीजिए।"… कार डिक्की में उस वक़्त कम से कम 30 लाख कैश थे। थानेदार को समझते देर नहीं लगी कि ये लड़का खुद इतनी आसानी से थाने क्यों आया। वो डिक्की बंद करते हुए सिर्फ इतना ही कहा.. "सिर्फ जुबान गंदी है लड़के, पर अपना दामन बिल्कुल साफ है। मैं नहीं जानता कि तुमलोग के परिवार के बीच क्या हुआ लेकिन इतना तो जरूर समझ में अा गया है कि तुम्हे अपने परिवार से कितना लगाव है"

जो आशु कहीं नहीं छलके वो थानेदार के सामने हाथ जोड़ कर अपने दोनो आखों से आंसू बहा रहा था। …. उसने अपना नंबर थानेदार साहब को दिया और वापस जुग्गी के ओर चल दिया।

लौट कर जब वो पहुंचा तब रास्ते में ही उसे कुंजल मिली जो बड़े गुस्से में कहीं जा रही थी। अपस्यु उसका रास्ता रोकते… "तुम्हारा गुस्सा जायज है, लेकिन बात करने से ही समस्या का समाधान होता है… भागने वाले हर वक़्त भागते ही रहते हैं।" …... "मैं कहीं भाग नहीं रही, अपने भतीजे के लिए ठंडा और नाश्ता का ऑर्डर मेरी मां ने दिया है उसे ही पूरा करने जा रही हूं।".. कुंजल फिर से गुस्से में अपनी प्रतिक्रिया दी।

जैसे 2 दोस्त गले में हाथ डाल कर साथ चलते हैं। ठीक वैसे ही अपस्यु, कुंजल के गले में हाथ डाल कर वापस घर के ओर ले जाने लगा। कुजल के आखों में आशु और गुस्सा दोनों थी, बस अंदर वो हिम्मत नहीं बची थी कोई विरोध कर सके। पूरी तरह टूट जाना जिसे कहते हैं वहीं स्थिति कुंजल की थी। जुबान से बस इतना ही निकल रहा था… "हमारा कोई नहीं, अपने ही अपनों को लुट लेते हैं, तुम सब बेईमान हो"…

अपस्यु उसके गले में हाथ डाले उसे कंधों का भी सहारा दे रहा था और दोनों वापस घर में लौटकर आए। अंदर आरव नीचे जमीन पर बैठा था और उसी के पास नंदनी रघुवंशी बैठकर, दोनों बातें कर रहे थे। अपस्यु ने कुंजल को जैसे ही छोड़ा वो बेसुध होकर रोते-रोते नीचे जमीन पर गिर गई।

नंदनी तुरंत उठकर अपनी बेटी के पास पहुंची और उसका सर अपने गोद में लेते हुए उसे चुप कराने लगी, लेकिन कुंजल के आशु थे कि वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तभी उस जुग्गी में अपस्यु की तेज आवाज गूंजी और वो जोर से चिल्लाकर कहने लगा…. "बस, बहुत हुआ, रोना बंद करो सब। पागलों की तरह कब से सब रोए जा रहे हैं। मुझे अभी बात करनी है, इसलिए सब बिल्कुल शांत।"

अचानक बदले माहौल को देखकर कुंजल उठकर बैठ गई। अपने आशु पोंछति …. "तुम चले ही क्यों नहीं जाते, सबकुछ भूलकर तो हम यहां जी रहे थे ना, फिर वो दर्द कुरेदने क्यों पहुंच गए?"

अपस्यु:- क्या दर्द तुम्हारे ही पास है, और दर्द है तो फासी लगा कर मर जाओ पर हर वक़्त दुख-दर्द के नाम पर सहानुभूति बटोरने की कोशिश न करो।

अपस्यु की बात सुनकर कुंजल लगभग शांत हो गई। नंदनी दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरती कहने लगी:- इनकी भी क्या गलती है कुंजल, बड़े लोगों के गलती का जिम्मेदार इन्हे क्यों ठहराना। लड़ाई तो उन दोनों भाइयों में हुई थी फिर तुमलोग क्यों आपस में लड़ रहे हो।

अपस्यु:- आंटी पहले मुझे आप ये बता दो कि कुंजल की तरह आप के मन में तो हमारे लिए बैर नहीं ना।

नंदनी की मुस्कान दर्द भड़ि थी, वो मुस्कुराती हुई कहने लगी… "पागल हो क्या? तुम्हारे मम्मी पापा से लाख बैर हो, बच्चों से कैसी बैर। तुम दोनों तो मेरे ही बेटे हो। 4 साल तक तुम दोनों को मैंने भी पाला है और अपने छाती से दूध भी पिलाई है। अपने बेटो के लिए कैसी बैर। और शायद तुम्हारे मम्मी-पापा को भी कुंजल से ऐसा ही लगवा होगा। हालांकि लगाव तो बड़ों में भी था बस कुछ गलतफहमी और थोड़ी लालच ने हमे अलग कर दिया।

अपस्यु:- जानती है, मां मुझ से जब भी मिलने आती थी तो एक ही बात कहती थी। तुझे मेरा नहीं नंदनी का बेटा होना चाहिए था। उनका मानना था कि आप कि समझदारी और सूझ-बुझ मुझ में अाई है। सुना था, लेकिन आज देख भी लिया। आप से मुझे बहुत कुछ सीखना है। लेकिन पहले मुझे ये बताइए दोनों भाई इतना प्यार करने वाले थे फिर आपस में गलतफहमी और लालच कैसे पैदा हो गई। क्योंकि हम दोनों में से किसी को पता नहीं कि झगड़े का मुद्दा क्या था और दोनों में इतनी भी क्या बैर की एक बार जो अलग हुए तो फिर कभी एक दूसरे की सुध तक ना ली।

नंदनी:- तुमलोग बहुत छोटे थे उस वक़्त और तुम तो यहां रहते भी नहीं थे सोनू। पहले सरा बिजनेस ज्वाइंट ही था तुम्हारे पापा का कारोबार फ्रांस में इनका कनाडा में। दोनों भाइयों में बिजनेस को लेकर कुछ मतभेद हो गया और ये चाहते थे कि दोनों अपने-अपने बिजनेस को अलग कर लें।

अपस्यु:- आंटी आप रोना बंद कीजिए और आगे बताइए।

नंदनी:- कुछ दिल के जख्म होते हैं जो आशुओं के रूप में छलक आते हैं। फिर उसके बाद तो हमारी दुनिया ही जैसे उजाड़ गईं। और एक के बाद एक घटनाएं होती चली गई।

आरव, अपने आंटी के आशु पोंछते….. "क्या हुआ आंटी, आप पूरी बात बताइए।"

कुंजल:- होना क्या था पूरी कंपनी तुम्हारे पापा ने हड़प लिया और जब मेरे पापा ने उनसे कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की तो उन्होंने अपने ऑफिस से धक्के मारकर भगा दिया।

अपस्यु:- हैम्म ! इस वक़्त अंकल कहां है और मानस।

नंदनी:- कुंजल बेटा तू बाहर जाएगी क्या? 2 मिनट हमे कुछ बातें करनी है।

अपस्यु:- नहीं। कोई बीच का भेद नहीं। उसे भी जानने दीजिए ।

नंदनी:- नहीं बेटा। शायद वो बर्दास्त ना कर पाए।

अपस्यु:- वो उसे फैसला करने दीजिए। आप बस अपनी बात कहिए आंटी।
Bdiya update nain bhai :love3:

Thoda sa emotional bhi ?
जैसे 2 दोस्त गले में हाथ डाल कर साथ चलते हैं। ठीक वैसे ही अपस्यु, कुंजल के गले में हाथ डाल कर वापस घर के ओर ले जाने लगा
?
 
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अपस्यु:- वो उसे फैसला करने दीजिए। आप बस अपनी बात कहिए आंटी।

कुंजल:- क्या बात है मां, आप को इतना बताने में क्यों वक़्त लग रहा है कि इनके पापा के धोक की वजह से मेरे पापा ने आत्महत्या कर ली और मेरा छोटा भाई ये हादसा बर्दास्त नहीं कर पाया।

अपस्यु:- क्या ???? अंकल और मानस नहीं रहे?

नंदनी:- मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं। तुमलोग अपनी बहन को ढूंढ़ते यहां तक आए वही बहुत है। अब तुम जाओ, वरना कहीं तुम्हारे मम्मी-पापा को पता चला कि तुम मुझसे मिलने आए थे, तो वो गुस्सा करेंगे।

अपस्यु:- गुस्सा करने के लिए गुस्सा करने वालों को जिंदा भी रहना पड़ता है। जो जिंदा ही नहीं वो क्या गुस्सा करने आएंगे?

कुछ देर पहले आरव और अपस्यु अचरज में थे अब बारी नंदनी और कुंजल की थी। नंदनी आश्चर्य से देखती उनसे पूछने लगी… "ये कब हुआ?"

अपस्यु:- 14 जून 2007…

नंदनी अपने सिर पर हाथ रख कर बिलखती हुई कहने लगी…. "मुझे आज तक लगता रहा की तुम्हारे पापा ने मेरे बच्चे और पति का कत्ल करवाया है"…

"ये क्या बोल रही हैं आप?".. यह इतना बड़ा झटका था कि सबके चेहरे पर केवल आश्चर्य के भाव थे और कुंजल तो जैसे टूट ही गई हो। उसको ऐसा झटका लगा था कि उसका दिमाग जी सुन्न पड़ गया।

नंदनी:- ये बात आज तक मैंने कुंजल को भी नहीं बताई। ये घटना ठीक एक दिन बाद की है, 15 जून 2007. हम टोरंटो में थे अपने घर, जब मुझे ये सूचना मिली कि ओटावा में मेरे पति और बच्चे की लाश मिली है। गला घोंटा कर हत्या किया गया था और कातिलों का कोई सुराग तक नहीं मिला।

"आपने इतनी बड़ी बात आज तक मुझसे छिपाए रखी।" कुंजल फुटफुट कर रोती अपनी मां से पूछने लगी। नंदनी अपनी आशु छिपाती, अपने बेटी के सिर को वापस गोद में रखकर उसके आंसू पोंछती उसके सर पर अपने हाथ फेरने लगी।

अपस्यु:- बहुत सी बातें है कुंजल उस वक़्त की जो मुझे भी पता नहीं, और शायद आंटी तुम्हारे मन में भी जहर नहीं घोलना चाहती थी इसलिए नहीं बताया। हां लेकिन इस वक़्त मैं केवल इतना ही कहूंगा कि मेरे पापा और मम्मी ने आप लोगों के साथ कोई बेईमानी नहीं किया।

कुंजल, अपने प्रियजनों कि हत्या के बारे में सुनकर सिसक रही थी और सिसकती आवाज़ में ही पूछने लगी…. तो फिर मेरे पापा को उनका हिस्सा क्यों नहीं मिला?

अपस्यु:- इस "क्यों" ने ही हमारे पूरे परिवार को आज इस मोड़ पर ला खड़ा किया है। मुझे बस इतनी शिकायत थी कि दो भाइयों में आपसी अन-बन होते रहती है, किंतु इतना भी बड़ा क्या बैर की अपने भाई की मौत पर उसकी लाश तक देखने नहीं आए परन्तु आप लोगों को सुनने के बाद कहानी पूरी समझ में अा गई।

नंदनी:- कैसी कहानी।

अपस्यु:- सी.ए.बी (चन्द्रभान एंड भूषण) लिमिटेड 2003 से घाटे में चल रही थी। केवल कनाडा ही नहीं बल्कि फ्रांस में भी अपनी कंपनी नीचे गिर रही थी।

नंदनी:- लेकिन फ्रांस में तो लगातार ग्रोथ दिख रहा था।

अपस्यु:- वो इसलिए क्योंकि एक बात जो आप को पता नहीं, पापा अपना घाटा पूरा करने के लिए हवाला का काम करने लगे थे। दूसरों के ब्लैक मनी को व्हाइट करना और ये कंपनी के प्रॉफिट में शो होता रहा।

नंदनी:- क्या ??? तुम्हे ये सब कैसे पता।

कुंजल:- तो क्या तुम दोनों भी वही काम कर रहे हो इस वक़्त। तुम्हारे रहन-सहन देख कर तो ऐसा ही लगता है।

अपस्यु:- पागल, ये सब पैसे तो सी.ए.बी को पूरी तरह से बेचकर मिले है। तकरीबन 200 करोड़ है जिसके व्याज के पैसे पर हम ऐश करते हैं।

आरव:- तू क्यों मुंह छोटा कर रही है, तुम्हे भी पूरे पैसे मिलेंगे ऐश करने के लिए।

कुंजल:- ये बोलता भी है क्या? इतनी देर से सारी बातें सोनू ही बोल रहा था तो मुझे लगा इसे बोलना नहीं आता।

अराव:- बोलना, समझना और समझाना ये सब इसी का डिपार्टमेंट है। मुझसे ये नहीं होता।

"मुझसे भी नहीं होता"… कुंजल हंसती हुई बोली और आरव के ओर हाथ बढ़ा कर ताली बजाने लगी।

नंदनी:- भाई साहब ये कैसा काम कर रहे थे। क्या उन्हें कभी ख्याल नहीं आया कि गलत काम कर रहे है?

अपस्यु:- बहुत लंबी कहानी है आंटी। पहले आप लोग चलो यहां से। आपसे कभी इस हाल में मुलाकात होगी सोचा ना था। कुंजल को पता है कि आप रॉयल फैमिली से बिलोंग करती है।

नंदनी:- उस परिवार का दामन तो मेरी शादी के बाद ही छूट गया था, इसलिए मुड़ कर दोबारा ख्याल भी नहीं आया की मैं किसी रॉयल फैमिली से बिलोंग करती हूं।

कुंजल:- मोम आपने मुझसे कितना कुछ छिपाए रखा?

नंदनी:- नहीं बेटा, अभी जब सोनू ने रॉयल फ़ैमिली बोला तब याद आया कि मेरा मयका भी है, वरना शादी के बाद तो भूल ही गई थी। ये सब छोड़ो सोनू तुम मुझे पूरी बात बताओ ये अधूरी बात काटने दौड़ती है।

अपस्यु:- अभी चलते हैं यहां से … आप को यहां तो मैं एक पल भी नहीं रहने दूंगा।

नंदनी:- नहीं जो तुम्हारे पास है वो तुम्हारा है .. तुमदोनो बस मिलते रहना। हम यहां खुश हैं।

अपस्यु:- आरव, लेे भाई अब जोर जबरदस्ती वाला सीन अा गया है .. संभाल इन्हे तू।

फिर क्या था आरव कुंजल को लेकर निकल गया और इस बार वो अपस्यु से कहता गया कि कार कि जीपीएस फॉलो कर आंटी को साथ लेकर अा। हालांकि नंदनी तो जिद पकड़े थी लेकिन अराव कुंजल को जबरदस्ती वहां से लेकर गया। कुंजल को लगा कि वो अराव के साथ उसके घर जाएगी लेकिन अराव उसे सीधा लेकर पहुंचता है शहर से सबसे बड़े शॉपिंग मॉल।

नंदनी जिद्दी थी तो अपस्यु भी हटी था, वो तब तक नहीं माना जबतक नंदनी ने हां नहीं की। नंदनी उस जुग्गी से कुछ सामान लेना चाहती थी लेकिन अपस्यु उसे खींच कर बाहर लेे आया और एक समान तक उठाने नहीं दिया। दोनों पैदल ही सड़क तक निकले।

"तुमने पूरी बात अब तक नहीं बताई अपस्यु, कुछ संदेह मेरे अंदर उठ रहे हैं, मैं उनके सामने मैं जाहिर नहीं करना चाहती थी लेकिन मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है"… नंदनी ने अपना सवाल रखा।

"यदि आप सोच रहे हैं कि पापा के गलत काम के वजह से अंकल का कत्ल हुआ तो आप गलत सोच रही है। क्योंकि अब मुझे समझ में आ रहा है कि पापा ने उस वक़्त अंकल से झगड़ा क्यों किया होगा?"

नंदनी:- क्यों किया था?

अपस्यु:- पापा को पता था कि वो क्या कर रहे है और गलत काम में वो पूरे परिवार को सामिल नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने दिखाने के लिए अंकल के साथ बेईमानी किया। वो नहीं चाहते थे कि उनके राजदार को ये लगे की पापा के धंधे में उसका भाई भी हिस्सेदार है।

नंदनी:- हम्मम ! तो फिर वो कत्ल की वजह क्या रही होगी?

अपस्यु:- मैं बस उन्हीं कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। हां लेकिन पापा ने कुछ बॉन्ड्स और पेपर चाचा के लिए छोड़े थे जो तकरीबन इस वक़्त 100 करोड़ से ऊपर के होंगे, मैंने सब संभाल कर रखा है। पापा भारत से फ्रांस लौटकर किसी तरह उन पेपर्स को अंकल तक पहुंचा ही देते लेकिन ऐसा हो ना सका।

नंदनी:- तुम तो बहुत छोटे से ही यहां आश्रम में रहते थे ना सोनू, फिर तुमने कंपनी कैसे बेच दी और इतनी सारी बातें तुम्हे कैसे पता?

अपस्यु:- जब मैं नैनीताल में गुरुजी के पास था, तब वहां मुझे एक गॉडफादर मिल गए थे। मेरी सारी जानकारी के पीछे उनका ही पूरा योगदान रहा है बस एक ही चूक हो गई, हमने अंकल के बारे में थोड़ी छानबीन की होती तो आप को इस हाल में नहीं रहना पड़ता और ना ही मुझे अपने ही परिवार के लोगों से नफरत करनी पड़ती।

नंदनी:- तुम्हारा हर जवाब मन में एक सवाल छोड़ रहा है सोनू। मुझे तुम केवल इतना बता दो कि क्या तुम उन लोगों के पीछे हो जिन्होंने तुम्हारे मॉम्-डैड का कत्ल किया? क्योंकि छानबीन की बात करना और जितने विश्वास के साथ तुमने अपनी बात रखी है ये उसी ओर इशारा करते हैं।

अपस्यु:- नहीं मैं किसी के पीछे नहीं हूं। पापा ने गलत किया था और उनके किए की सजा मेरी मां और हम दोनों भाइयों को मिली। वो गुजरा वक़्त था बीत गया। मेरे गॉडफादर ने मुझे उस वक़्त संभला था और उन्होंने ही मेरे पापा के बारे में पूरी जानकारी दी थी। साथ में उनके पास मेरे पापा के कुछ दस्तावेज भी थे, जो उन्होंने सबकी नजर से बचा कर मुझे लाकर दिए थे। उन दस्तावेजों में, दिल्ली के 3 बेनामी फ्लैट, सी.ए.बी का पूरा पेपर और अंकल के नाम के बोंड पेपर्स थे।

नंदनी:- तो फिर तुमने वो बोंड पेपर के खातिर भी अपने अंकल को ढूंढ़ने की कोशिश क्यों नहीं की?

अपस्यु:- उस वक़्त मैं खुद ही संभलने कि कोशिश कर रहा था। मेरी कोई उम्र थी क्या? वैसे भी उन बोंड को मैंने अपना धन कभी नहीं माना, इसलिए आज भी लॉकर में वो पड़ा है। हां लेकिन कभी उस पेपर को उसके सही मालिक तक पहुंचने की कोशिश भी ना किया। क्योंकि आप ही बताइए, एक छोटा लड़का जो अनाथ हो गया हो और उसके परिवार से कोई ना आया देखने तो कैसा मेहसूस करेगा। और वो कैसी सोच रखेगा परिवारवालों के लिए।

"कितना अजीब लगता है ना सब कुछ लूट जाने के बाद अपनी लूटी-पिटी जिंदगी की समीक्षा करना। इसमें कोई दो राय नहीं कि तुम्हारे पापा के वजह से हम सब का ये हाल हुआ"… नंदनी खुद को संतुष्ट करती अपस्यु से अपनी बात कही।
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Chalo inke gile shikve bhi dur hue ?
 

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"कितना अजीब लगता है ना सब कुछ लूट जाने के बाद अपनी लूटी-पिटी जिंदगी की समीक्षा करना। इसमें कोई दो राय नहीं कि तुम्हारे पापा के वजह से हम सब का ये हाल हुआ"… नंदनी खुद को संतुष्ट करती अपस्यु से अपनी बात कही।

अपस्यु:- इसमें कोई दो राय नहीं। इस पूरे प्रकरण का एक ही दोषी है चन्द्रभान रघुवंशी, जिसे मैं तो कभी इस जीवन में माफ़ नहीं कर सकता।

नंदनी:- वो पिता है तुम्हारे और अब इस दुनिया में भी नहीं रहे। उनके लिए ऐसा नहीं बोलते।

अपस्यु:- किसी सिंडिकेट के सदस्य के लिए मेरे विचार कभी नहीं बदल सकते और ना ही ये नफरत कभी ख़त्म होगी। 10000 की कमाई हो, चार सुखी रोटी और एक छोटी सी छत के नीचे, प्यार से जिंदगी बिताई जा सकती है लेकिन खून से सना हुआ पैसा खाने वाले कभी चैन से नहीं रह सकते। अपने पापा के कृपा से कुछ पैसे हमने भी कहा लिए थे शायद, इसलिए तो आज तक परिवार को तरसते रहे।

नंदनी:- बड़ी बड़ी बातें हां, चलो अब बीती बातों पर मिट्टी डालो, फिर कभी जब हमे रोना होगा तब याद करेंगे इन्हे। अच्छा सुनो सोनू, मुझे अच्छा लगेगा अगर तुम मुझे चाची, काकी या फिर छोटी मां कहो, क्योंकि ये आंटी शब्द मुझे बार-बार उस कल्चर और जगह की याद दिलाती रहेगी जिसे मैं याद नहीं करना चाहती।

अपस्यु, नंदनी के साइड से गले पड़ते… "क्यों मां नहीं कह सकता क्या"… नंदनी उसके गाल को प्यार से सहलाती बस मुकुरती हुई उसे देखी और दोनों चल दिए। इधर आरव अपनी बहन को प्यार से शॉपिंग करवा रहा था, उधर अपस्यु अपनी मां को। कुछ तो कुंजल और नंदनी अपने पसंद की के रही थी और बहुत कुछ ये दोनों भाई अपनी मां और बहन के लिए खरीद रहे थे।

ऐसा लग रहा था दोनों भाई दिल खोलकर पैसा लुटा रहे थे। शॉपिंग के दौरान जब कुंजल और नंदनी दोनों किसी अंडरगार्मेंट शॉप में घुसे तब अपस्यु, आरव के पास आकर पूछने लगा…. "ओ बेवड़े, तूने शराब की बोतल कहीं किसी कोने में इधर उधर तो ना रखी।"

अराव:- सच में मुझे याद नहीं। वैसे भी मुझे पता है आज तू उन्हें अपना फ्लैट तो नहीं ही देखने देगा।

अपस्यु:- साला जुड़वा होने का यही गम होता है, तू कभी-कभी ना मेरा दिमाग पढ़ लेता है।

अराव:- छी इतने बुरे दिन ना आए की तेरा दिमाग पढूं। तेरी सोच मैं जानता हूं कितनी दूर की है इसलिए मैंने कहा। वैसे भी गोबर भड़ा है तेरे दिमाग में… तेरा दिमाग पढ़ने की भी शक्ति किसी को मिले ना तो मैं उसे यहीं कहूंगा.. भाई जिंदगी से ऊब गए हो और बाबा बनने कि ख्वाहिश हो तभी इसका दिमाग पढ़ना।

अपस्यु:- कुत्ता है तू और कुत्ता ही रहेगा। कभी ना सुधर सकता। वैसे मुझे लगता है कि अपनी कुंजल के लिए भी एक फटफटी और फैमिली के लिए एक कार लेे लेनी चाहिए।

अराव:- हां हां क्यों नहीं। अपनी भी फैमिली है तो एक नहीं 2 फ़ैमिली कार होनी चाहिए।

अपस्यु:- ओए पागल अभी एक ही रहने देते हैं दूसरी फिर कभी देखते हैं।

तबतक सामने से दोनों भी अा गए। आते ही कुंजल दोनों भाइयों के बीच खड़ी हो गई और अपनी मां को फोन देती कहने लगी… "एक फोटो मम्मा भाइयों के साथ। आज मैं भी एफबी पर पोस्ट करके सबको बताऊंगी मेरे पास 2 भाई हैं।"

अराव ने वो पुराना सा फोन देखा और उसके अंदर से सिम निकाल कर उसे नीचे फेंक दिया।… "ये क्या किया, मेरा फोन"… कुंजल नकियाते हुई बोलने लगी।

अराव:- ओह सॉरी। अब तो फोन टूट गया, कुछ नहीं किया जा सकता। चलो चलकर नया देख लेते हैं।…

नंदनी दोनों भाई को आखें दिखाती….. "जितना का तुमने शॉपिंग की है ना उतने में कितने गरीब कई महीनों तक खा लेते।"

अराव:- मां एक अपस्यु कम था क्या? प्लीज आपको जो सुनाना है सुना देना। चाहे तो मार भी लेना, लेकिन अभी मैं पैसे नहीं खर्च कर रहा बल्कि अपनी बहन के लिए खुशियां खरीद रहा हूं।

नंदनी:- पैसे के नशे में इतना भी अंधा होने की जरूरत नहीं। यदि तुम्हारा ऐसा ही सोचना है कि पैसों से तुम खुशियां खरीद रहे हो तो मैं यहां से जा रही हूं।

अपस्यु:- आप का गुस्सा जायज है। मैं भी आप की बातों से सहमत हूं लेकिन हर वक़्त की अपनी कहानी होती है मां। अब ये भी तो है ना, कि हम जो भी सामान खरीद रहे हैं उसे बनाने वाला कोई मजदूर ही होगा, क्योंकि इन फैक्ट्री में भी तो कोई ना कोई गरीब ही काम करता होगा। ऊपर से इन वस्तुओं का टैक्स सरकार के पास जाता है तो सरकार फिर उन्ही पैसों को जन-कल्याण के लिए लगाती हैं। यदि हम पैसा अपने घर में रखे रहेंगे तो पैसा बाजारों में नहीं पहुंचेगा और पैसे बाजार में ना पहुंचने के कारन….

नंदनी:- बस…बस…. तुम मुझे अर्थशास्त्र मत सिखाओ। तुम मुझे ये समझाने की कोशिश कर रहे हो कि इतने बड़े मॉल में सामान खरीदने से गरीबों का कल्याण होगा। बहुत ही निम्न स्तर की बातें थी ये।

अपस्यु:- अरे मां सुनो तो, क्यों गुस्सा हो रही हो। बस 1 दिन छूट देदो बस आज के दिन। केवल आज .. आज .. आज…

नंदनी:- ठीक है सिर्फ आज… भविष्य में कुछ भी पैसों का नाजायज करते हुए पकड़े गए तो सोच लेना।

"उफ्फ ! सही है समझने और समझाने का काम इन्हीं दोनो को करने दो"… कुंजल फिर से हंसती हुई अपनी बात कही और हाथ अराव के ओर बढ़ा दी ताली के लिए… दोनों वहां से निकल गए फोन खरीदने और अपस्यु नंदनी को ग्राउंड फ्लोर पर बेंज शोरूम में लेे आया।

"अब तुम ये मत कहना कि यहां हम कार खरीदने आए हैं"… नंदनी अपनी आखें दिखाती हुई कहने लगी। अपस्यु ने अपने दोनो कान पकड़े और मुंह से बस "प्लीज, प्लीज" करने लगा। एक बच्चे कि जिद और हट के आगे नंदनी को भी हार मानना ही परा, और शोरूम से उठ गई बीएमडब्लू 1 सीरीज की कार।

तबतक अराव और कुंजल भी वहां पहुंच चुके थे। कुंजल सामने नई बीएमडब्लू देख कर कभी इधर उछल रही थी तो कभी उधर। नंदनी उसे देख मुस्कुराती हुई कहने लगी… "ये तो आज पागल हो गई है और तुम सब भी.. अब घर चलो, शॉपिंग खत्म हो गई।"

अपस्यु:- मां आप इनके ड्राइवर के साथ जाओ, मैं कागजी कार्यवाही पूरा करके आया। और ये दोनों अभी पीछे से दूसरी कार में जा रहे है।

अपस्यु ने सभी को भेज दिया और वहां पूरे पेपर वर्क खत्म करने के बाद, एक नई स्कूटी खरीदा और सीधा अपार्टमेंट पहुंचा। वहां कुंजल और अराव पहले से ही पहुंचे हुए थे और अपार्टमेंट के मुख्य द्वार पर ही इंतजार कर रहे थे।

"ये किसकी स्कूटी उठा लाया"… कुंजल, अपस्यु को दूर से ही देखती हुई पूछने लगी…. "ध्यान से देख, सब समझ में आएगा"… अराव ने उसके सर पर पीछे से हाथ मारते हुए बोला…

कुंजल:- ये तो नई स्कूटी है?
अराव:- ये नई स्कूटी नहीं तुम्हारी नई फटफटी है।

"सच में" कुंजल उत्सुकतावश पूछी और अराव ने सर हिला कर हां में जवाब दिया। वो खुशी से उछल पड़ी और अराव के गले लग गई। गले तो लगी लेकिन साथ में आशु भी अा गए।

अराव:- तुझे क्या हुआ.. रोने क्यों लगी।
कुंजल:- जब मैं सड़क पर चलती थी तब अपने अतीत को याद करके बस यही सोचती कि आज मेरे पापा होते तो मैं ये सब करती वो सब करती।… हां जानती हूं थोड़ी स्वार्थी हो रही हूं.. लेकिन मेरे तो एक भी अरमान कभी बाहर ही नहीं आए बस जिंदगी ही पीस कर रह गई।
अराव:- बस कर पागल मुझे भी रुला रही है। और हां हम अपने सारे अरमान पूरा करेंगे बस दो काम करना पहले तो अगर रोना हो तो बाथरूम में चली जाना..
"और दूसरी"… कुंजल हंसती हुई अपने आशु पोछती अलग हुई।
अपस्यु:- दूसरी ये की मां को कभी पता नहीं चलने देना। मैंने हिटलर शब्द नहीं कहे जो ये जरूर कहता।
अराव:- अब कौन किसका दिमाग पढ़ रहा है।
अपस्यु:- मैं कोई चमत्कारी बाबा हूं क्या जो तेरे मन की बात पढ़ लूंगा। बस तेरी जुबान और भाषा पर मुझे पक्का यकीन है।
कुंजल:- भाई मेरी स्कूटी से उतरो। मुझे पसंद नहीं कोई मेरी निजी चीज को हाथ लगाए।
अपस्यु:- ओ मैडम जी, नई गाड़ी को लाने और उस गाड़ी से ड्राइवर को उतारने की बक्शीस लगती है। वो पेड करी और लेे जाई अपनी स्कूटी..
"ये लो अपना मेहनताना मिस्टर ड्राइवर"… कुंजल 2 रुपए का सिक्का उसे निकला कर देने लगी जिसे देख अराव जोड़-जोड़ से हंसने लगा।

तभी हॉर्न बजाती हुई उस सड़क पर बेंज दिखी। यूं तो थी वो दिल्ली ही, लेकिन कुछ गाड़ियों का रूतवा ही अलग होता है, लोग मुड़ कर देखने को विवश हो ही जाते हैं। फिर अंदर बैठा आदमी भले ही भिखारी के कपड़े क्यों ना पहने हो, लोगों को उसमे भी फैशन नजर अा ही जाता है।

सब पैसे की माया है और अपस्यु ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी इस माया को खुलकर बरसाने में। शायद उसके मन में भी कहीं ना कहीं ये बात बैठी थी कि कुंजल और मां ये सब भौतिक सुख सुविधा की योग्यता शुरू से रखती थी बस वक़्त और हालत ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबुर कर दिया।
10000 की कमाई हो, चार सुखी रोटी और एक छोटी सी छत के नीचे, प्यार से जिंदगी बिताई जा सकती है लेकिन खून से सना हुआ पैसा खाने वाले कभी चैन से नहीं रह सकते।
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Ab khi sachi lavni ye na soche ki ye bhai kunjal ko sidhe ghar hi le aye :haha:
 

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सब पैसे की माया है और अपस्यु ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी इस माया को खुलकर बरसाने में। शायद उसके मन में भी कहीं ना कहीं ये बात बैठी थी कि कुंजल और मां ये सब भौतिक सुख सुविधा की योग्यता शुरू से रखती थी बस वक़्त और हालत ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबुर कर दिया।

कुछ ही देर में नंदनी भी अपार्टमेंट पहुंची। अराव ने ड्राइवर को कुछ पैसे देकर वहां से भेज दिया और कार पार्किंग में लगाकर सभी ऊपर फ्लैट के ओर बढ़ने लगे।

3 बेनामी फ्लैट में से 2 फ्लैट यहीं आजू-बाजू थे। एक फ्लैट नंबर 301, जो सबसे आखरी में था, जिसकी बालकनी से साची का पूरा घर दिखता। और दूसरी ठीक उसके बाजू में फ्लैट नंबर 302 थी, जिसे दोनों भाई बस साफ रखते थे लेकिन कभी इस्तमाल नहीं किया। तीसरी फ्लैट वहीं थी जहां लावणी को बेहोशी की हालत में लेकर गए थे।

अपस्यु ने 302 का दरवाजा खोला और सभी लोग अंदर। 4 बीएचके डबल स्टोरी फ्लैट थी, जिसके नीचे के फ्लोर पर केवल हॉल, किचेन और एक स्टोर रूम था। ऊपर 3 कमरे और बालकनी था। यूं तो अपस्यु और अराव ने कभी इसे प्रयोग में नहीं लाया, लेकिन सुख सुविधा का सारा समान यहां था, जो हर घर की जरूरत होती है।

कुंजल फ्लैट देख कर काफी खुश हुई और वो अपने कमरे का चुनाव करने सीधा ऊपर चली गई। नंदनी नीचे से ऊपर पूरे घर को देखती हुई चली। ऊपर पहुंचकर वो सभी कमरों को देखने के बाद, अपस्यु और अराव दोनों के कान पकड़ती हुईं… "तुम दोनों जहां रहते हो मुझे वो फ्लैट भी देखना है।"

कुंजल:- मॉम इतना व्यवस्थित घर है, फिर भाई कहीं और क्यों रहता होगा?

नंदनी:- अभी 2 मिनट में पता चल जाएगा कि कहां रहता है।

इधर अराव और अपस्यु एक दूसरे को देखते हुए, संकेत में ही बात करने लगे… "पकड़े गए यार, लेकिन मां को पता कैसे चला।"

"पता नहीं रे अराव, शायद यहां कुछ भी अव्यवस्थित नहीं इसलिए पकड़ ली"

"अब चप्पल भी पड़ेंगे"….. "लगता तो ऐसा ही है भाई"…. "दोनों भाई जो आखों ही आखों में इशारा खेल रहे हो ना, उससे काम नहीं बनने वाला। मुझे अभी ही तुम्हारे घर को देखना है।"…नंदनी दोनों के इशारों की चर्चा को भंग करती हुई अपनी बात कही।

बेमन होकर दोनों को ना चाहते हुए भी 301 का दरवाजा खोलना पड़ा। उस फ्लैट में घुसते ही आखों के सामने हॉल का जो नजारा था उसे देखकर…. "हां तो सारे राज यहां दफन है। क्या मैं जान सकती हूं, तुम दोनों भाई अपने इस कबाड़खाना पर कितना खर्च कर चुके हो"..

अराव लॉकर से फाइल निकाल कर नंदनी को दिखाते हुए… "मां इस हॉल में लगे सभी उपकरणों पर हमे 6 करोड़ का खर्च हुआ है।".. 6 करोड़ का नाम सुनते ही नंदनी अपना सिर पकड़ ली। फिर बात आगे ना बढ़ाते हुए सीधा किचेन की ओर गई और वहां लगे बड़े से डबल डोर फ्रिज को देखती हुई पूछने लगी….. "और इसके विषय में क्या कहना है?"

पूरा फ्रिज ही बियर और वाइन से भड़ा परा था, और वाइन भी काफी कीमती नजर आ रही थी। इसी बीच कुंजल एक छोटे से बनी काउंटर के पीछे गई और वहां दीवार पर लगे पर्दे को हटा दी…. "मॉम यहां तो पूरा बार खुला है।"

नंदनी कुंजल को लेकर वहां से गुस्से में निकली और जाते-जाते बोलती हुई निकली……. " पहेल मुझे एक-एक पैसे का हिसाब चाहिए… उसके बाद मैं तुम दोनों की खबर लेती हूं।"

नंदनी के जाते ही अराव अपना चेहरा बनाते हुए कहने लगा…. "उस राजीव मिश्रा की बद्दुआ लगी है मुझे"

अपस्यु:- कौन राजीव मिश्रा?

अराव:- लावणी के पिताजी और कौन…

अपस्यु, जोड़-जोड़ से हंसते हुए:- "लावणी का बाप" से "लावणी के पिताजी" .. तेरे भाषा में तो सुधार आने लगा है रे…

अराव, उसके बाल को नोचते… "चल फाइल लेकर हिसाब देने। मेरे सामने तुझे बहुत कॉमेडी सूझ रही है ना.. करके दिखाना नंदनी रघुवंशी के सामने कॉमेडी"..

दोनों भाई बिल्कुल किसी मासूम बच्चे की तरह अपनी गर्दन नीचे झुकाए, 5 मोटी-मोटी फाइल्स के साथ नंदनी के पास पहुंचे।

नंदनी:- ये सब क्या है?

अपस्यु:- ये सारे बिल्स है जो हमने आज तक खर्च किए हैं।

कुंजल:- तू इधर अाकर बैठ ना मोनू, वो दोनो बात कर रहे है ना।

नंदनी:- तुम्हे बहुत मस्ती सूझ रही है ना तो तुम भी अाकर सामने खड़ी हो जाओ।

कुंजल:- जाने भी दो ना मॉम, अब से भाई कुछ भी नाजायज पैसे नहीं खर्च करेगा। और ना ही फिर कभी शराब को हाथ लगाएगा। क्यों भाई?

अराव:- हां मां आज से हम बिल्कुल भी ऐसा नहीं करेंगे।

नंदनी:- चुप हो जाओ तुम सब। यहां की बॉस मैं हूं और यहां सिर्फ मैं बोलूंगी। समझे तुम सब।

पहले तो नशे और उसके उत्पाद जो घर में रखे थे उसपर दोनों भाई की पूर्ण रूप से क्लास लगी। उठक बैठक भी करना पड़ा, साथ में वादा भी लिया गया। उसके बाद इनकी फिजूलखर्ची पर नजर डाली गई और किन-किन मदों में पैसे लुटाए जाते रहे हैं, उस विषय पर चर्चा होने लगी।

इन मामलों में दोनों भाइयों ने अपनी मां का दिल जीत लिया, इन्होंने जो भी वस्तु खरीदी थी उन सभी सामानों का बिल फाइल में रखा था। साथ ही साथ फिजूल खर्ची में बस दारू ही मुख्य वस्तु था, जिसका सालाना खर्चा 10 लाख का था। जिसे अब नंदनी ज़ीरो होते देखना चाहती थी।

सभी पैसों के हिसाब भी वहीं मिल गए जहां 200 करोड़ का सालाना व्याज लगभग 9 करोड़ बैंक से मिला करता था, सभी टीडीएस और इनकम टैक्स काट कर। 4 साल से ये ब्याज दोनों भाई को मिल रहे थे जिसके मुख्य खर्चों में केवल उनकी एक स्पोर्ट्स और एक लग्जरी गाड़ि का बिल 7 करोड़ का था। इसके आलवा 8 करोड़ कुल खर्चा दोनों फ्लैट रेनोवेशन में और सालाना 2 करोड़ ये लोग अपने द्वारा चलाए जाने वाले अनाथालय सुनंदा चिल्ड्रंस केयर में देते थे।

4 साल के 36 करोड़ के व्याज के पैसों में से अब भी इनके पास 12 करोड़ बैंक में ही पड़े थे, और 8 करोड़ का दान इन लोगों ने अपने मां के नाम से शुरू किए हुए अनाथालय में दिया था। नंदनी पूरा हिसाब देखते-देखते जैसे फक्र सी मेहसूस करने लगी हो दोनों पर।

नंदनी:- ये बताओ इतनी सारी फाइल ऑडिट किसने कि है।

अपस्यु:- अराव ने किया है मां…

नंदनी:- गुड, तो इसे बिजनेस मैनेजमेंट करने दो। इसमें बिजनेसमैन वाले सभी गुण नजर आते हैं।

आज दोनों भाई, परिवार का होना और परिवार के मुखिया कैसा होता है उसे मेहसूस कर रहे थे। सभी बच्चे अपनी मां के साथ कुछ खट्टे-मीठे पल बिताने लगे। कुछ घंटे पहले जिनके पास कुछ नहीं था, मात्र कुछ ही घंटों में सबकुछ मिल गया था। एक घर और पूरा परिवार। खुशियां, जो अंदर और बाहर हर जगह अपनी छाप छोड़ रही थी।

अपस्यु, अराव और कुंजल इस वक़्त ठीक अपने उन्हीं पलों को जी रहे थे जिसमे आपस का प्यार इतना गहरा था कि लगता ही नहीं अभी कुछ ही घंटे पहले ये पूरा परिवार मिले है।

रात के 8 बज रहे होंगे, जब अपस्यु, अराव और कुंजल तीनों अपने पुनर्मिलन का जश्न मनाने निकले। ठीक इसी वक़्त साची अपने कमरे में इधर से उधर कर रही थी। शायद जब प्यार होता है तो थोड़ी उम्मीदें भी बढ़ जाती है। साची भी अपस्यु से थोड़ी उम्मीद लगाकर बैठी थी। उसे लग रहा था कि वो अपने किए पर सफाई देते उसे मनाने के लिए फोन या मैसेज जरूर करेगा, लेकिन सुबह के 11 बजे से रात के 8 बज चुके थे और अपस्यु ने कोई जानकारी लेना भी उचित नहीं समझा।

उसकी हालत तो उस छटपटाती मछली जैसी हो गई थी जिसे पानी के बाहर लाकर छोड़ दिया गया हो और वो दम घुटने की वजह से फाड़-फड़ा रही हो। ना जाने कितनी चक्कर वो अपने कमरे के लगा चुकी थी। दिल को जब कहीं चैन ना मिला तब उसने अपना लैपटॉप खोला और "अननोन गर्ल" की आईडी से ऑनलाइन हो गई।

उसने 3-4 संदेश क्रेज़ी बॉय को भेजे लेकिन आज शायद वो भी व्यस्त था इसलिए उसे जवाब देते-देते लगभग 1 घंटे लग गए।

"हुंह"… साची अपना गुस्सा दिखाती हुई बस इतना ही पोस्ट कि।

क्रेजी बॉय:- मुंह कहे लाला टमाटर जैसा बना है।

अननोन गर्ल:- ये दुनिया ही मतलबी हो गई है आरजी (क्रेज़ी बॉय का निक नेम)

क्रेजी बॉय:- ????

अननोन गर्ल:- क्या हुआ ऐसे मुंह फाड़ कर क्यों हंस रहे हो…

क्रेजी बॉय:- लगता है तुम्हे तुम्हरा बेहतरीन सरप्राइज आज मिल गया इसलिए गुस्सा में मुहा लाला टमाटर जैसा हो गया। एक सेल्फी देना तो।

(इनके जल्दी-जल्दी टाइपिंग के दौरान ऐसे छोटे-छोटे टाइपिंग एरर होना आम बात थी। और साची ने बीती रात क्रेजी बॉय से सबकुछ शेयर की थी)

अननोन गर्ल:- हुंह !!

क्रेजी बॉय:- ठीका है बाबा, बात क्या हुआ वो बताओ।

अननोन गर्ल:- मुझे कुछ बात ही नहीं करनी…

क्रेजी बॉय:- अब मैंने क्या कर दिया, जो मुझे भी नहीं बताना चाहती। अब तो हम दोस्त हैं ना।

अननोन गर्ल:- क्या बताऊं! मैंने जिसे प्यार किया वो पहले ही धोखेबाज निकला।

क्रेजी बॉय:- ????

अननोन गर्ल:- मुझे रोना आ रहा है और तुम मेरे हालत पर हंस रहे। तुम भी बहुत बुरे हो।

क्रेजी बॉय साची को मानते हुए उससे पूरी घटना की जानकारी लेने लगा। साची अपनी पूरी भड़ास टाइप करती हुई, पूरी कहानी क्रेजी बॉय को बता दी। क्रेजी बॉय पूरे मज़े के साथ उसकी कहानी और भड़ास दोनों का आनंद उठाते रहा। अंत में साची की जब पूरी कहानी समाप्त हुई तब वो सभी घटनाओं को जोड़ कर कमाल का समीक्षा किया….

"एक भोली भाली लड़की को बड़ी ही आसानी से उसने फसा लिया। वो आज तुम्हे चिढ़ना चाहता था और तुम चिढ़ गई। जरा सोचो जिस लड़के की महीने कि इनकम लगभग ₹40000-₹60000 के बीच हो, (दार्जलिंग के चाय बागान के आय का आकलन) उसके पास लगभग 4 करोड़ की लंबोर्गिनी कहां से आई। तुम लड़कियां तो बस प्यार में अंधी हो जाती हो और जब कोई लड़का इस्तमाल कर के धोखा देदे, तब बस रोते रहना। लेकिन साफ-साफ सामने से दिख रहा है कि वो तुम्हे उल्लू बना रहा, उन सब बातों पर जरा भी ध्यान मत देना"

अपनी इस महान राय के पीछे, क्रेजी बॉय की मनसा क्या थी, वो तो वहीं जाने लेकिन बम कि सुतली में तो उसने आग लगा ही दिया था, अब बस उसे फटना बाकी था।
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नंदनी:- चुप हो जाओ तुम सब। यहां की बॉस मैं हूं और यहां सिर्फ मैं बोलूंगी। समझे तुम सब।
:buttkick:

Khi ye crazy boy arav, apsyu me se to koi nahi h ?
 

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अपनी इस महान राय के पीछे, क्रेजी बॉय की मनसा क्या थी, वो तो वहीं जाने लेकिन बम कि सुतली में तो उसने आग लगा ही दिया था, अब बस उसे फटना बाकी था।

जश्न मानकर जब तीनों भाई बहन वापस लौटे, तबतक नंदनी ने सबके लिए खाना बना कर रखा था। ना जाने कितने सालों बाद दोनों भाइयों ने ऐसा खाना खाया था। खाते-खाते दोनों कि आखें डबडबा गई, फिर नंदनी ने दोनों को संभाला और प्यार से, अपने हाथ से कुछ निवाले भी खिलाए।

रात को तीनों भाई बहन वहीं नीचे हॉल में अपना बिस्तर लगा लिए और पड़े-पड़े बात करने लगे। कुंजल ने फिर एक-एक कर के वो सब बताने लगी जो उसने 2007 से लेकर अब तक झेला था। कैसे कनाडा कि हर चीज नीलाम हो गई। हालात ऐसी हो गई थी कि वहां कोई काम नहीं मिल रहा था ऊपर से वहां के खर्चे। भारत वापस आने के लिए जेवर बेचना पड़ गया लेकिन वहां के ऊंची-ऊंची सोशियाटी में कम्युनिटी बना कर रह रहे किसी लोगों ने हाल तक नहीं पूछा… बात करते-करते फिर वो उठकर बैठ गई और कहने लगी….

"भाई मेरे सीने में कहीं जलन सी हो रही है। काश मुझे पता चल जाता की किसने मेरे पापा को मारा, उसे तो मैं अपने हाथ से मारती। उस कमिने कि वजह से मुझे और मां को बहुत दर्द झेलने पड़े हैं।"

"अपने गुस्से को बचा कर रखो, सीने की आग सुलगने दो और इंतजार करो सही वक़्त का। क्योंकि वो भगवान है ना सबको एक मौका देता है। बस वो मौका चूकना नहीं। अब सो जाओ और जिस पल में हो, उस पल को खुशी से जीने की कोशिश करो"…. अपस्यु उसके माथे को चूमते कुंजल को लिटा दिया।

कुछ देर तक बात करते-करते अराव और कुंजल दोनों सो गए। अपस्यु की आखों से नींद कोसों दूर था। वो बगल के अपने फ्लैट में गया, कुछ पल अपनी बालकनी में खड़े होकर साची के घर की ओर निहारने लगा और मुस्कुराते हुए कहा…. "कल तुम्हारे साथ रियूनियन होगा।"… बालकनी से नीच हॉल में अाकर, वो कुछ वर्कआउट करने लगा और साथ ही साथ अपनी नजर फोन पर भी बनाए हुए था।

रात के करीब 1 बजे….

"बीप बीप".. मैसेज टोन बजा.. अपस्यु ने तुरंत अपना संदेश खोला और संदेश देखकर वो मुस्कुराते हुए जवाब दिया… "बहुत देर से इंतजार कर रहा था"… उधर से फिर संदेश आया… "प्राइवेट लाइन कनेक्ट करो"

अपस्यु ने तुरंत ही प्राइवेट लाइन कनेक्ट किया… थोड़ी देर इंतजार के बाद….

"कहां लगा है आज कल मेरा चेला"… उधर से आवाज़ अाई..

"गॉडफादर कहां हो आप, मिलकर बात करनी है".. अपस्यु ने जवाब दिया..

"फिलहाल कुछ काम है तो वो बताओ, हम दोनों एक मिशन के बीच में है।"… उधर से गॉडफादर ने जवाब दिया..

"ठीक है, जब दिल्ली आना तो बात करना, बहुत जरूरी है।"…. अपस्यु मायूस होते जवाब दिया।

"ले तू पहले पल्लवी से बात कर, तभी तेरा लटका थोपरा ठीक होगा"… गॉडफादर ने अपस्यु के मन को टटोलते हुए जवाब दिया।

"नहीं उस हवाशी शक्ति कपूर से मुझे ना बात करनी"… अपस्यु इधर से चिल्लाया..

"तू बेटा कितना भी चिल्ला लेे, इस बार 1 महीने के लिए दिल्ली अा रही हूं.. तेरी वर्जिनिटी तो गई समझ लेे। वैसे अब तक कोई पोर्न भी देखे कि नहीं"… उधर से गॉडफादर की पत्नी पल्लवी अपस्यु के मज़े लेती पूछने लगी…

"पहले ही कहा था उस हवशी को फोन मत देना। मैं कॉल डिस्कनेक्ट कर रहा हूं।"… अपस्यु नाराज होता कहने लगा।

"तू कहां तक भागेगा अपस्यु, तू तो "Me & My Husband Series" का छोटा ही सही लेकिन एक हिस्सा है।".... अपस्यु के चिढ़ का पल्लवी ने हंसते हुए जवाब दिया।

"हद है तेरा भी अपस्यु, तेरे नखरे तो छोड़ियों से भी ज्यादा है। काश मुझे ऐसा ऑफर मिला होता तो मैं कब का वर्जिनिटी लूज कर लेता".. इस बार गॉडफादर ने भी मज़े ले लिए।

"वहां केस सॉल्व करने गए हो तो उसपर ध्यान दो ना। यहां जब आओगे तब बात करते हैं।"… अपस्यु फिर चिढ़ते हुए जवाब दिया।

"रुक मेरी बात ध्यान से सुन।"… गॉडफादर थोड़े गंभीर होते हुए बोले…

"हां कहिए ना, मैं लाइन पर ही हूं"… अपस्यु अपना पूरा ध्यान केंद्रित करता…

"सुन हमारे पास उदयपुर हत्याकांड की फाइल पहुंच चुकी है, इस मर्डर मिस्ट्री के बाद उसी केस पर काम करना है, और हां इसे खुद सेंट्रल होम मिनिस्ट्री मॉनिटर करेगी। अधिकारियों के नाम नहीं बता सकता बस जबतक मैं ना आऊं कोई स्टेप मत लेना।"…. गॉडफादर मुद्दे कि बात बताकर उसे चेतावनी देते कहने लगे।

"हम्मम !! ठीक है। वैसे एक खबर मेरे पास भी है। 15 जून 2007, भूषण रघुवंशी और मानस रघुवंशी का गला घोट कर हत्या।"

"अरे …. ये क्या कह रहा है"… गॉडफादर पूरे अचंभित होते हुए..

"जी हां, मैं जब आंटी से मिला तब उधर की कहानी पता चली"… अपस्यु ने अपनी बात रखी।

"बैन चो…. मुझसे इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई। अब मिलना ज्यादा जरूरी हो गया है। ठीक है इस केस को निपटा कर मिलते हैं। तबतक अपनी आंटी का जितना डेटा है मुझे भेज। इसपर काम पहले शुरू करना है।"

अपस्यु अपने गॉडफादर , जुगल किशोर उर्फ जेके से बात करने के बाद कुछ राहत मेहसूस कर रहा था, लेकिन दिमाग के अंदर अब भी उस रात की कहानी चल रही थी जब उसके आखों के सामने उसका पिता दम तोड़ रहा था।

सुबह का वक़्त…

कोई अपने प्रियसी के रिएक्शन के बारे ने सोच कर तैयार हो रहा था कि "कैसा वो फील करेगी जब उसे पता चलेगा कि मेरा भी परिवार है"… तो कोई अपने अंदर नफरत कि आग सीने ने दबाए बस इतना ही प्लान कर रही थी "किसी भी तरह 2-4 थप्पड मार लूं तो उस कुत्ते को पता चल जाए कि वो किसको धोका देने कि सोच रहा था।"

दोनों भाई तो कल अपनी फटफटी कॉलेज के पार्किंग में ही छोड़ आए थे। इसलिए तय यह हुआ कि कुंजल आज लंबोर्गिनी लेे जाएगी और साथ में अराव जाएगा और अपस्यु कुंजल की स्कूटी से कॉलेज जाएगा।

अपार्टमेंट से पहली गाड़ी अपस्यु की निकली। गेट पर स्कूटी खड़ी कर वो सामने साची को देख अपना हाथ हिलाया, लेकिन साची अजीब सी प्रतिक्रिया दी और ऐटिट्यूड दिखाती अपने बैग से सन ग्लासेस निकाल कर बड़े शान से पहनने लगी।

इतने में सन ग्लासेस हाथ से छूटकर, नीचे सड़क पर गिर गई। साची बेचारी स्कूटी लगाकर उसे उठाने का मन में विचार बना ही रही थी, कि इतने मे कुंजल ने उसपर से लंबोर्गिनी चढ़ा कर कॉलेज कि लिए निकल गई।

"कैसा रहा ये एक्शन मोनू"… कुंजल अपनी हाथ अराव के ओर बढ़ती।

अराव भी ताली देता… "एक्शन तूने किया रिएक्शन उधर निकल रहा होगा।"

"चेहरा देखा था उसका, कैसा ऐटिट्यूड से भड़ा हुआ था। बड़ी अाई मेरे भाई को ऐटिट्यूड दिखाने वाली"…. कुंजल थोड़ा नाराजगी दिखाते बोली।

"ओ पागल तेरी भाभी है वो, और हां दिल की भी बहुत अच्छी है। हसी मज़ाक ठीक है लेकिन उसके लिए दिल में कोई बैर नहीं"… अराव समझाते हुए बोला।

"हां ठीक है समझ गई।".. कुंजल बात टालती हुई गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। इधर जैसे ही कार साची के सन ग्लासेस को रौंद कर गई, अपस्यु ने अपना सर पिट लिया। साची एक बार उस चलती कार को घुरी, फिर अपस्यु को घूरती उसने गुस्से में अपना नाक सिकोड़ ली और लावणी के साथ कॉलेज के लिए निकल गई।

"ये दोनों भी पागल ही है, बेकार में बेचारी को चिढ़ा दी"… अपस्यु भी आगे का सोच कर साची के पीछे-पीछे कॉलेज निकला। पूरे दिन टॉम एंड जेरी का खेल चलता रहा। अपस्यु क्लास में उसके साथ बैठा तो वो उठकर, वहां से दूसरी जगह चली गई। बात करने के लिए मुंह खोला तो वो गर्ल्स कॉमन रूम में चली गई।

साची के पीछे-पीछे जब वो कैंटीन जाने लगा तब साची ने अपना रास्ता बदलकर कैंटीन से कहीं और चली गईं। लगभग पूरा दिन वो अपस्यु को दौड़ती ही रही। अपस्यु बस समझ नहीं पा रहा था कि…..

"आखिर साची को हुआ क्या है। कल की कुछ छोटी सी गलतफहमी ही तो थी बस। क्या उसे दिख नहीं रहा था कि कुंजल उसके साथ है? कितने अरमान थे कि अपनी बहन से मिलवाएगा, अपनी फैमिली के बारे में बताएगा.. लेकिन ये थी कि चूहे बिल्ली का खेल शुरू किए हुए थी।"

दिन बीत गया लेकिन बिगड़ती बात बनते हुए नजर नहीं आई। घर लौटकर अपस्यु ने साची को सिर्फ इतना ही संदेश भेजा कि "बात कर लो बस थोड़ी सी गलतफहमी है।".. फिर क्या था साची ने उसे हर जगह से ही ब्लॉक कर दिया।

घर भी अब पहले की तरह नहीं रह चुका था। जबतक तीनों भाई-बहन घर वापस लौटकर आते, दोनों फ्लैट के बीच की हॉल कि दीवार हटा दी गई थीं। कचरे साफ हो गए थे और दोनों भाइयों को यह भी निर्देश मिल चुका था कि अपने कबाड़खाना को रेनोवेट करके उसे ढंग से घिरवा दे।

बेचारे अपस्यु को साची को देखने के लिए अब बालकनी में 3-4 किताब लेकर जानी पड़ी, ताकि दिखा सके कि वो पढ़ रहा है। लेकिन बालकनी से भी कोई फायदा ना मिल रहा था। वो तो एक बार भी झांकने तक नहीं आई।

पहला दिन गुस्सा ज्यादा होता है। दूसरा दिन गुस्से के तापमान में अपने आप ही थोड़ी कमी अा जाती है, बस यही सोच अपस्यु ने अपनी अगली सुबह की शुरवात की, लेकिन उसकी सोच ही गलत साबित हो गईं। आज तो तापमान इतना बढ़ा था कि, साची ने जो बीते काल की सुबह तय कि थी, वो आज पूरी कर ली। यानी कि अपस्यु गाल पर एक चिपका दी। थप्पड खाकर भी अपस्यु बस आजू-बाजू ये देखने में लगा था कि किसी ने उसे थप्पड खाते देखा तो नहीं।

इसी बीच एक उम्मीद किरण तब जागृत हुई जब कैंटीन में लावणी को पता चला कि कुंजल उन दोनों की बहन है। हालांकि ये बात पता चलते ही लावणी को अपने आप में बुरा सा अनुभव होने लगा। लेकिन वो माफी भी नहीं मांग सकती थी क्योंकि उसे माफी का कारण बताना पड़ता जो शायद वो बता नहीं पाती।

अराव, कुंजल और लावणी की बात चल ही रही थी कि लावणी को ढूंढते हुए साची भी वहां पहुंच गई। साची ने जब लावणी को उनके बीच पाया तो वो गुस्से में अपनी आखें लावणी को दिखाती हुई कहने लगी… "तुम्हे क्या कह कर फसाया इन झूठे लोगों ने"…

साची की बात सुनकर कुंजल पलटी लेकिन अराव उसका हाथ पकड़ कर आखों से बस बैठे रहने का इशारा किया। …. "नहीं दी, तुम जैसा सोच रही हो वैसी बात नहीं है। इनसे मिलो ये कुंजल है, अराव और अपस्यु की सिस्टर".. लावणी, साची को समझते हुई बोली।

"15 दिन पहले जब इसका एक्सिडेंट हुआ था तब इसका भाई अराव छाती पीट-पीट कर कह रहा था कि मैं अनाथ हूं। और जरा देखो, 15 दिन में इतनी बड़ी बहन भी पैदा हो गई। इन लोगों के शक्ल पर ही फरेबी लिखा है। अब तो मुझे पक्का यकीन हो गया है कि इसका वो ऐक्सिडेंट भी एक नाटक था, केवल सिंपैथी बटोरने कि कोशिश। तू यहां बैठे-बैठे क्या पूरी कहानी सुनेगी… उठा ना"… साची गुस्से में अंधी होकर जो जी में आया बोलती चली गई।

"इस से पहले की मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूं, भागो यहां से"… गुस्से से निकली कुंजल की ये आवाज़। जब उसने पूरे जोड़ से दोनो हाथ टेबल पर पटक कर अपना तेवर दिखाई तो पूरा माहौल ही शांत हो गया।

अपस्यु कैंटीन के गेट से, ये सारा तमाशा होते देख रहा था। कुंजल जब अपना गुस्सा दिखाई तो अपस्यु सामने देख कर इतना ही सोचा… "एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार। तू तो पीस गया बेटा।"
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Ye sachi kuch jyada hi hwaa le rahi h :buttkick:
Kunjal ne sahi sabak sikhaaya use, bada attitude jhad rhi thi
 
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Chunmun

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Last tak k update padh liye. Ab sath sath chalunga.
Bahut behatrin story hai lekin kahi kahi mujhe na aap ki purani story ki jhalak bhi is mai dikh rahi thi.
Family drama to superb hai nainu. Iske liye 10/10 aap ko.
Apasyu or Sanchi ki ya fir Aarav ya lavni k bich ka connection ho wo bhi kabile tarif.
Aap jaise maje khiladi se koi or kya ummid kr sakta hai.
Bahut bahut entertaining story.
Do judva bhai jin k sukh dukh mai sath dene wala koi nahi ho waha aap apasyu or Aarav ka chitran bahut achhe dhang se kiya hai.
Jaha ek taraf apasyu sagar k sant jal ki tarah nirmal wahi Aarav badh k pani ki tarah tufani hai.
Lekin dono k bich jo connection hai wo adyuitya hai.
Sath mai Sinha ji fir Pallavi jo bich bich mai maje ki pitara kholte hai wo lajavav.
Misra ji family ka bhi bahut badhiya chitran prastut kiya hai aap ne.
Agle update ka intjar rahega...
 

Akki ❸❸❸

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अपस्यु कैंटीन के गेट से, ये सारा तमाशा होते देख रहा था। कुंजल जब अपना गुस्सा दिखाई तो अपस्यु सामने देख कर इतना ही सोचा… "एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार। तू तो पीस गया बेटा।

क्या तेवर थे। लावणी तो बिल्कुल दुबक ही गई। अराव को कमर से पकड़कर खींचना पड़ा वरना कुंजल तो आज भीड़ ही गई थी। साची को भी लगा शायद वो इतने लोगों के बीच कुछ ज्यादा ही बोल गई, इसलिए वो लावणी को लेकर चुपचाप वहां से निकल गई।

"बस रे कितना गुस्सा करेगी"…. अराव उसे खींचकर पार्किंग लाते हुए बोला।
"हद है मोनू, बिना कोई बात समझे वो कैसे ओवर्रिएक्ट कर रही थी। तेरा खून नहीं खौला क्या"… कुंजल अभी भी अपनी भड़ास निकलती कहने लगी।

अराव ने अपने पॉकेट से सिगरेट निकालकर जलाते हुए…. "तो तू उसे सफाई में क्या कहती। कैसे उसकी बहन अचानक से चली आई, कैसे समझाएगी"..

कुंजल, अराव के हाथ से सिगरेट लेकर एक कस खींचती…. "ठीक है तेरी बात, लेकिन देखा नहीं कितनी बदतमीजी कर रही थी"…
"हां बदतमीजी की तो है उसने, लेकिन अपस्यु की खातिर इग्नोर मार"… अराव एक कस खींचते बोला…
"चल क्लास का टाइम हो गया, चलते हैं, समझने दे उन लैला मजनू को अपना मैटर। लेकिन एक बात तो तय रहा उनका पैचअप भी हुआ ना तो भी आज के बात का बदला तो मैं लेकर रहूंगी"…. कुंजल के चेहरे पर कुटिल मुस्कान और आखों में शरारत साफ दिख रही थी।

अपस्यु के लिए भी दूसरा दिन बस चूहे बिल्ली के खेल से ज्यादा कुछ नहीं था, उल्टा कैंटीन में हुई घटना के बाद मामला अब और उलझ चुका था क्योंकि कुंजल भी खफा हो चुकी थी।

रात के करीब 2 बज रहे होंगे… घर में सब सोए हुए थे… अराव चुपचाप उठा और सभी सिक्योरिटी को भेदकर लावणी के घर में घुस चुका था। लावणी के दरवाजे के पास खड़े होकर उसने पूरे दरवाजे को देखा… "हाहहा, आधुनिक ताले.. शुक्र है मेहनत बच गई। छिटकिनी होती तो मेहनत बढ़ जाती"… किसी चोर कि भांति वो दरवाजे का ताला खोल कर चुपचाप कमरे में प्रवेश किया।

अंधेरा कमरा और एसी लगभग 18 डिग्री पर। अराव ने मोबाइल का फ़्लैश जलाकर, लाइट का स्विच ढूंढा और पहले लाइट ऑन किया, फिर एसी को बंद करके एक कोने में खड़ा हो गया।

लावणी को जब गर्मी लगीं तब सबसे पहले उसने अपने ऊपर के चादर को हटा दिया….. उसे चादर हटाते देख अराव के आखों में चमक अा गई थी लेकिन…… "धत… ये पूरे कपड़े में कौन सोता है। फिल्मों की हेरोइन कितना सेक्सी कपड़े पहने सोती है… कोई-कोई तो टूपीस में ही सोई रहती हैं। इसको देखो, बच्चों की तरह एबीसीडी वाले कुर्ता पजामा पहन कर सोई है। क्लीवेज तक ना दिख रहा।.. उफ्फ ! लेकिन क्या लग रही है"..…

अराव अपने ख्यालों में ही था और लावणी अपनी आखें मीजती उठकर बैठ गई… "ओह इतनी गर्मी क्यों लग रही है।".. नींद में ही बड़बड़ाते वो उठी और पास पड़े पानी के बॉटल को उठाकर पानी पीने लगी। बॉटल मुंह से लगाए 2 घूंट पानी अंदर ही गया था कि जली लाइट देखकर वो सोच में पड़ गई।

अभी सोंच, कुछ निष्कर्ष पर पहुंचती उससे पहले ही कोने में खड़ा अराव दिख गया। वो पानी पीते-पीते सरक गई। अराव उसके पास पहुंच कर… "पानी तो आराम से पी लिया करो"

"तुम इस वक़्त मेरे कमरे में क्या कर रहे हो".. और चादर को सीने से लगा कर खुद को ढकने लगी…

"एक तो पहले से पूरे बदन पर चादर की तरह कपड़े चढ़ा कर सोई हो, ऊपर से खुद को चादर लेेकर ढक रही। डरो मत, मैं यहां कोई रेप नहीं करने आया"… अराव एसी चलाते हुए बोला..

"प्लीज यहां से जाओ, देखो मेरी धड़कने कितनी बढ़ी हुई है"… लावणी खुद को समेट कर मिन्नतें करने लगी।

अराव उछलकर उसके पास बिस्तर पर बैठ गया और उसके सीने पर हाथ रखकर…. "हां यार धड़कने तो बढ़ी हुई है"..

लावणी दूर हटती…. "ये क्या कर रहे हो"..

अराव:- तुमने ही धड़कन देखने कही, हैं मैं देख रहा था।

लावणी:- अराव प्लीज परेशान नहीं करो ना, डर से मैं कहीं मार ना जाऊं।

अराव:- तुम सच बताना, अभी मुझ से डर लगा रहा है या ये डर है कि कहीं किसी ने देख लिया तो तुम्हारी बैंड ना बज जाए।

लावणी, थोड़ा निश्चिंत होती… "दोनों से"..

अराव:- ठीक है, यदि ऐसी बात है तो मेरे कुछ सवालों के जवाब देदो मैं चला जाता हूं।

लावणी:- पाऊं कहां है तुम्हारे कहो तो वो पकड़ लूं, लेकिन प्लीज अभी चले जाओ। कॉलेज में कल क्लास भले छोड़ दुं लेकिन तुम्हारे सभी सवालों के जवाब जरूर दूंगी। प्लीज अब मान जाओ मेरी बात। प्लीज प्लीज प्लीज….

अराव:- ठीक है मैं जा रहा हूं लेकिन पहले यहां आकर खड़ी हो जाओ।

"मानने वाले तो हो नहीं, बेकार में बहस करने का कोई मतलब नहीं, लो खड़ी हो गई"… थोड़े गुस्से के भाव उसके चेहरे पर थे। लेकिन अगले ही पल उसकी आंखें बिल्कुल बड़ी होते चली गई और मुंह से "ऊऊ… ऊऊऊ" निकालने लगा। इधर लावणी जैसे ही सामने खड़ी हुई, अराव ने उसके कमर में हाथ डाला और होंठ से होंठ लगा कर चंद सेकंड का एक चुम्बन लिया और उससे अलग होकर खिड़की के रास्ते बाहर चल दिया।

अचंभित आखें और स्थूल परा बदन। लगभग 1 मिनट बाद वो अपनी जगह से हिली। चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी और होंठ पर … "पागल कहीं का"..

सुबह का वक़्त था.. लावणी ठीक वैसे ही फुदक रही थी जैसे 3 दिन पहले साची कर रही थीं। चाल-ढाल और चेहरे की रंगत सब बदला हुए था। साची उसे देख कर थोड़ा हैरान हो गई और उसका हाथ पकड़ कर कमरे में लेे जाती हुई…

साची:- क्या हुआ है तुझे..
लावणी:- मुझे क्या होगा। ठीक तो हूं…
साची:- अच्छा ! और ये जो तू इतनी चहक रही है, गीत गुनगुना रही है उसका क्या…
लावणी, साची के कंधे को पकड़कर घूमती हुई कहने लगी… तो तुम भी मेरे साथ गाओ ना दीदी….
साची:- हट पहली, चल कॉलेज।

वो लावणी को पहली बार इतनी खुश देख रही थी लेकिन अगले ही पल जब ख्याल आया की कहीं ये उन दोनों भाइयों के चंगुल में तो नहीं फसी तब उसका दिमाग ठनक गया।

इधर रघुवंशी परिवार में सुबह का वक़्त था। सभी नॉर्मल ही तैयार हो रहे थे.. लेकिन जब तीनों खाने के टेबल पर इकट्ठा हुए तब कुंजल और अपस्यु डायनिंग टेबल पर ताल देते हुए गाने लगे… "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"

अराव:- कोई सिंगिंग कॉम्पिटिशन है क्या.. दोनों बहुत बढ़िया गा रहे हो।

उधर से नंदनी टेबल पर प्लेट लगाती… "बेटा, गाने का मतलब भी बहुत शानदार है"…

अपस्यु और कुंजल दोनों एक साथ…. "बताओ .. बताओ… बताओ.. इस गाने का शानदार मतलब भी बताओ".…

नंदनी अपनी हंसी छिपाती हुई… वहीं अगर कोई तुम्हारे यहां ना अा पाए तो तुम उनके यहां पहुंच जाओ…

मतलब समझ में आते ही अराव ने जो गर्दन झुकाकर खाना शुरू किया, फिर वो घर के बाहर निकालने तक झुका ही रहा लेकिन ये दोनों भाई-बहन लगातार ताल देते हुए गाते रहे…. "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"

अराव जल्दी खाना खत्म करके कॉलेज भगा। कुंजल भी कॉलेज के लिए निकली लेकिन उसे लंबोर्गिनी इतनी पसंद आ गई, की आज भी वो कॉलेज उसी कार से चली गई। अपस्यु थोड़ी देर नंदनी से बात करने के बाद, अपने पास पड़े सभी दस्तावेज नंदनी को सौंप दिया।

नंदनी उन पेपर्स को फिर से अपस्यु को सौंपकर सारे बॉन्ड्स को रुपए में बदलकर पैसा बैंक में जमा करवाने के लिए बोल दी। मां बेटे के बीच थोड़ी घरेलू बात-चित के बाद अपस्यु भी कॉलेज के लिए निकल गया। रास्ते में बस एक ही ख्याल अा रहा था… "देखते हैं आज का तेवर कैसा है"..

पहली क्लास समाप्त हो चुकी थी। अपस्यु और साची ने यूं तो आज एक कवि की भावना के ऊपर विश्लेषण सुना था लेकिन अपने अंदर की भावनाओ का दोनों विश्लेषण नहीं कर पा रहे थे। क्लास समाप्त होते ही आज अपस्यु ने भी साची का कोई पीछा नहीं किया और सीधा कैंटीन चला गया।

वहां कुंजल अपने किसी दोस्त के साथ बैठी थी लेकिन अराव वहां नहीं था।अपस्यु उनके बीच बैठते हुए… "ये अराव कहां है"..
कुंजल:- जिसके दर गया था, उसे लेकर दर-दर भटकने गया है।..
अपस्यु:- ओह ! और ये भाई साहब कौन है..

कुंजल:- मनोज उपाध्याय, मेरा अच्छा दोस्त और क्लासमेट।

अपस्यु:- हेल्लो मनोज…

मनोज उसे घूरते हुए…. "क्या तुमने मुझे सचमुच नहीं पहचाना, मैं वहीं हूं जिसने तुम्हे उस दिन रोका था, जब तुम कुंजल के साथ बदतमीजी कर रहे थे"..
कुंजल:- मनोज .. नहीं।
अपस्यु:- एक मिनट कुंजल.. इसे पूरा बोलने दे.... हां जी मनोज जी.. आगे..
मनोज:- आगे क्या, कुछ नहीं..
अपस्यु:- तुम्हारा वो ग्रुप ना दिख रहा है जो उस दिन खड़ा था…
मनोज:- वो सब अपने-अपने ज़िन्दगी में व्यस्त हैं।

अपस्यु:- मनोज अब मैं जो कहूंगा वो अपनी बहन को कहूंगा, इसलिए बात को तुम दिल पर मत लेना। कुंजल, बेटा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से अच्छा है कि एक सांप पाल लो। केवल दोस्त कह देने से दोस्त हो जाते हैं क्या?
मनोज:- क्या मतलब है तुम्हारा..
अपस्यु:- सीईईईईईईईईई...…. चुप। पहले ही कहा ना अपनी बहन से बात कर रहा हूं।
कुंजल:- क्या हुआ सोनू, ये लड़का है इसलिए कोई परेशानी है क्या..

अपस्यु:- नही रे पागल… तू बस मेरी बात सुन। यही वो तेरे दोस्त है ना जिसके सामने से मैं तुम्हे ले गया और इसकी इतनी हिम्मत तक ना हुई कि बचाने कि कोशिश भी करे। हम 2 थे, ये 5 फिर भी सब तमाशा देखते रहे। पुलिस तक में किसी ने कंपलेंट नहीं की। मुझे बस इतना ही कहना था। बाकी तुझ पर छोड़ा।

कुंजल:- देखो मनोज हम क्लासमेट है और तुम शायद गलत टेबल पर बैठ गए हो। इसलिए प्लीज कहीं और चले जाओ। लव यू भाई..
अपस्यु:- लव यू टू सिस…
कुंजल:- बार बार दरवाजे पर क्यों देख रहे हो, बात ना बनी तो मैं बात करूं क्या तुम्हारे लिए।… लो 100 साल जिएगी.. अभी बात ही कर रहे थे कि सामने से चली भी अाई।

साची लावणी को ढूंढ़ती हुई अा रही थी। अाकर सीधा वो दोनो भाई-बहन के बीच बैठ गई…. "लावणी कहां है".. टेढ़े मुंह सवाल पूछती

कुंजल:- कौन लावणी..

ऐसा लग रहा था सास बहू के सीरियल वाला एक्सप्रेशन साची में घुस गया हो। कुंजल के सवाल पर वो ठीक वैसे ही गर्दन झटक कर कुंजल को देखी जैसे किसी सीन को इंटेंस बनाने के लिए सीरियल का कोई कैरेक्टर झटकता है, बस एक्शन रिप्ले की कमी रह गई।

साची:- मैंने पूछा लावणी कहां है।

अपस्यु:- हमे नहीं पता।

साची:- अराव कहां है।

कुंजल:- हमारे माथे पर क्या इंक्वायरी काउंटर लिखा है। मैं जा रही हूं भाई। … और कुंजल इतना कहकर साची को घूरती हुई वहां से चली गई।

यूं तो कैंटीन में लोगों की आवाज़ अा रही थी लेकिन साची और अपस्यु के बीच पूरी खामोशी। दोनों बस खामोश, चेहरे को अलग-अलग दिशा में घुमाए चुप चाप वहीं बैठे हुए थे।
Bdiya update nain bhai :love3:
होंठ से होंठ लगा कर चंद सेकंड का एक चुम्बन लिया और उससे अलग होकर खिड़की के रास्ते बाहर चल दिया।
:kiss1:
साची:- हट पहली, चल कॉलेज
:what1:
कुंजल:- हमारे माथे पर क्या इंक्वायरी काउंटर लिखा है। मैं जा रही हूं भाई।
:haha:
 
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