Update:-31
अपस्यु कैंटीन के गेट से, ये सारा तमाशा होते देख रहा था। कुंजल जब अपना गुस्सा दिखाई तो अपस्यु सामने देख कर इतना ही सोचा… "एक तरफ प्यार तो दूसरी तरफ परिवार। तू तो पीस गया बेटा।
क्या तेवर थे। लावणी तो बिल्कुल दुबक ही गई। अराव को कमर से पकड़कर खींचना पड़ा वरना कुंजल तो आज भीड़ ही गई थी। साची को भी लगा शायद वो इतने लोगों के बीच कुछ ज्यादा ही बोल गई, इसलिए वो लावणी को लेकर चुपचाप वहां से निकल गई।
"बस रे कितना गुस्सा करेगी"…. अराव उसे खींचकर पार्किंग लाते हुए बोला।
"हद है मोनू, बिना कोई बात समझे वो कैसे ओवर्रिएक्ट कर रही थी। तेरा खून नहीं खौला क्या"… कुंजल अभी भी अपनी भड़ास निकलती कहने लगी।
अराव ने अपने पॉकेट से सिगरेट निकालकर जलाते हुए…. "तो तू उसे सफाई में क्या कहती। कैसे उसकी बहन अचानक से चली आई, कैसे समझाएगी"..
कुंजल, अराव के हाथ से सिगरेट लेकर एक कस खींचती…. "ठीक है तेरी बात, लेकिन देखा नहीं कितनी बदतमीजी कर रही थी"…
"हां बदतमीजी की तो है उसने, लेकिन अपस्यु की खातिर इग्नोर मार"… अराव एक कस खींचते बोला…
"चल क्लास का टाइम हो गया, चलते हैं, समझने दे उन लैला मजनू को अपना मैटर। लेकिन एक बात तो तय रहा उनका पैचअप भी हुआ ना तो भी आज के बात का बदला तो मैं लेकर रहूंगी"…. कुंजल के चेहरे पर कुटिल मुस्कान और आखों में शरारत साफ दिख रही थी।
अपस्यु के लिए भी दूसरा दिन बस चूहे बिल्ली के खेल से ज्यादा कुछ नहीं था, उल्टा कैंटीन में हुई घटना के बाद मामला अब और उलझ चुका था क्योंकि कुंजल भी खफा हो चुकी थी।
रात के करीब 2 बज रहे होंगे… घर में सब सोए हुए थे… अराव चुपचाप उठा और सभी सिक्योरिटी को भेदकर लावणी के घर में घुस चुका था। लावणी के दरवाजे के पास खड़े होकर उसने पूरे दरवाजे को देखा… "हाहहा, आधुनिक ताले.. शुक्र है मेहनत बच गई। छिटकिनी होती तो मेहनत बढ़ जाती"… किसी चोर कि भांति वो दरवाजे का ताला खोल कर चुपचाप कमरे में प्रवेश किया।
अंधेरा कमरा और एसी लगभग 18 डिग्री पर। अराव ने मोबाइल का फ़्लैश जलाकर, लाइट का स्विच ढूंढा और पहले लाइट ऑन किया, फिर एसी को बंद करके एक कोने में खड़ा हो गया।
लावणी को जब गर्मी लगीं तब सबसे पहले उसने अपने ऊपर के चादर को हटा दिया….. उसे चादर हटाते देख अराव के आखों में चमक अा गई थी लेकिन…… "धत… ये पूरे कपड़े में कौन सोता है। फिल्मों की हेरोइन कितना सेक्सी कपड़े पहने सोती है… कोई-कोई तो टूपीस में ही सोई रहती हैं। इसको देखो, बच्चों की तरह एबीसीडी वाले कुर्ता पजामा पहन कर सोई है। क्लीवेज तक ना दिख रहा।.. उफ्फ ! लेकिन क्या लग रही है"..…
अराव अपने ख्यालों में ही था और लावणी अपनी आखें मीजती उठकर बैठ गई… "ओह इतनी गर्मी क्यों लग रही है।".. नींद में ही बड़बड़ाते वो उठी और पास पड़े पानी के बॉटल को उठाकर पानी पीने लगी। बॉटल मुंह से लगाए 2 घूंट पानी अंदर ही गया था कि जली लाइट देखकर वो सोच में पड़ गई।
अभी सोंच, कुछ निष्कर्ष पर पहुंचती उससे पहले ही कोने में खड़ा अराव दिख गया। वो पानी पीते-पीते सरक गई। अराव उसके पास पहुंच कर… "पानी तो आराम से पी लिया करो"
"तुम इस वक़्त मेरे कमरे में क्या कर रहे हो".. और चादर को सीने से लगा कर खुद को ढकने लगी…
"एक तो पहले से पूरे बदन पर चादर की तरह कपड़े चढ़ा कर सोई हो, ऊपर से खुद को चादर लेेकर ढक रही। डरो मत, मैं यहां कोई रेप नहीं करने आया"… अराव एसी चलाते हुए बोला..
"प्लीज यहां से जाओ, देखो मेरी धड़कने कितनी बढ़ी हुई है"… लावणी खुद को समेट कर मिन्नतें करने लगी।
अराव उछलकर उसके पास बिस्तर पर बैठ गया और उसके सीने पर हाथ रखकर…. "हां यार धड़कने तो बढ़ी हुई है"..
लावणी दूर हटती…. "ये क्या कर रहे हो"..
अराव:- तुमने ही धड़कन देखने कही, हैं मैं देख रहा था।
लावणी:- अराव प्लीज परेशान नहीं करो ना, डर से मैं कहीं मार ना जाऊं।
अराव:- तुम सच बताना, अभी मुझ से डर लगा रहा है या ये डर है कि कहीं किसी ने देख लिया तो तुम्हारी बैंड ना बज जाए।
लावणी, थोड़ा निश्चिंत होती… "दोनों से"..
अराव:- ठीक है, यदि ऐसी बात है तो मेरे कुछ सवालों के जवाब देदो मैं चला जाता हूं।
लावणी:- पाऊं कहां है तुम्हारे कहो तो वो पकड़ लूं, लेकिन प्लीज अभी चले जाओ। कॉलेज में कल क्लास भले छोड़ दुं लेकिन तुम्हारे सभी सवालों के जवाब जरूर दूंगी। प्लीज अब मान जाओ मेरी बात। प्लीज प्लीज प्लीज….
अराव:- ठीक है मैं जा रहा हूं लेकिन पहले यहां आकर खड़ी हो जाओ।
"मानने वाले तो हो नहीं, बेकार में बहस करने का कोई मतलब नहीं, लो खड़ी हो गई"… थोड़े गुस्से के भाव उसके चेहरे पर थे। लेकिन अगले ही पल उसकी आंखें बिल्कुल बड़ी होते चली गई और मुंह से "ऊऊ… ऊऊऊ" निकालने लगा। इधर लावणी जैसे ही सामने खड़ी हुई, अराव ने उसके कमर में हाथ डाला और होंठ से होंठ लगा कर चंद सेकंड का एक चुम्बन लिया और उससे अलग होकर खिड़की के रास्ते बाहर चल दिया।
अचंभित आखें और स्थूल परा बदन। लगभग 1 मिनट बाद वो अपनी जगह से हिली। चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी और होंठ पर … "पागल कहीं का"..
सुबह का वक़्त था.. लावणी ठीक वैसे ही फुदक रही थी जैसे 3 दिन पहले साची कर रही थीं। चाल-ढाल और चेहरे की रंगत सब बदला हुए था। साची उसे देख कर थोड़ा हैरान हो गई और उसका हाथ पकड़ कर कमरे में लेे जाती हुई…
साची:- क्या हुआ है तुझे..
लावणी:- मुझे क्या होगा। ठीक तो हूं…
साची:- अच्छा ! और ये जो तू इतनी चहक रही है, गीत गुनगुना रही है उसका क्या…
लावणी, साची के कंधे को पकड़कर घूमती हुई कहने लगी… तो तुम भी मेरे साथ गाओ ना दीदी….
साची:- हट पहली, चल कॉलेज।
वो लावणी को पहली बार इतनी खुश देख रही थी लेकिन अगले ही पल जब ख्याल आया की कहीं ये उन दोनों भाइयों के चंगुल में तो नहीं फसी तब उसका दिमाग ठनक गया।
इधर रघुवंशी परिवार में सुबह का वक़्त था। सभी नॉर्मल ही तैयार हो रहे थे.. लेकिन जब तीनों खाने के टेबल पर इकट्ठा हुए तब कुंजल और अपस्यु डायनिंग टेबल पर ताल देते हुए गाने लगे… "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"
अराव:- कोई सिंगिंग कॉम्पिटिशन है क्या.. दोनों बहुत बढ़िया गा रहे हो।
उधर से नंदनी टेबल पर प्लेट लगाती… "बेटा, गाने का मतलब भी बहुत शानदार है"…
अपस्यु और कुंजल दोनों एक साथ…. "बताओ .. बताओ… बताओ.. इस गाने का शानदार मतलब भी बताओ".…
नंदनी अपनी हंसी छिपाती हुई… वहीं अगर कोई तुम्हारे यहां ना अा पाए तो तुम उनके यहां पहुंच जाओ…
मतलब समझ में आते ही अराव ने जो गर्दन झुकाकर खाना शुरू किया, फिर वो घर के बाहर निकालने तक झुका ही रहा लेकिन ये दोनों भाई-बहन लगातार ताल देते हुए गाते रहे…. "तेरे दर पर सनम चले आये.. तू ना आया तो हम चले आये।"
अराव जल्दी खाना खत्म करके कॉलेज भगा। कुंजल भी कॉलेज के लिए निकली लेकिन उसे लंबोर्गिनी इतनी पसंद आ गई, की आज भी वो कॉलेज उसी कार से चली गई। अपस्यु थोड़ी देर नंदनी से बात करने के बाद, अपने पास पड़े सभी दस्तावेज नंदनी को सौंप दिया।
नंदनी उन पेपर्स को फिर से अपस्यु को सौंपकर सारे बॉन्ड्स को रुपए में बदलकर पैसा बैंक में जमा करवाने के लिए बोल दी। मां बेटे के बीच थोड़ी घरेलू बात-चित के बाद अपस्यु भी कॉलेज के लिए निकल गया। रास्ते में बस एक ही ख्याल अा रहा था… "देखते हैं आज का तेवर कैसा है"..
पहली क्लास समाप्त हो चुकी थी। अपस्यु और साची ने यूं तो आज एक कवि की भावना के ऊपर विश्लेषण सुना था लेकिन अपने अंदर की भावनाओ का दोनों विश्लेषण नहीं कर पा रहे थे। क्लास समाप्त होते ही आज अपस्यु ने भी साची का कोई पीछा नहीं किया और सीधा कैंटीन चला गया।
वहां कुंजल अपने किसी दोस्त के साथ बैठी थी लेकिन अराव वहां नहीं था।अपस्यु उनके बीच बैठते हुए… "ये अराव कहां है"..
कुंजल:- जिसके दर गया था, उसे लेकर दर-दर भटकने गया है।..
अपस्यु:- ओह ! और ये भाई साहब कौन है..
कुंजल:- मनोज उपाध्याय, मेरा अच्छा दोस्त और क्लासमेट।
अपस्यु:- हेल्लो मनोज…
मनोज उसे घूरते हुए…. "क्या तुमने मुझे सचमुच नहीं पहचाना, मैं वहीं हूं जिसने तुम्हे उस दिन रोका था, जब तुम कुंजल के साथ बदतमीजी कर रहे थे"..
कुंजल:- मनोज .. नहीं।
अपस्यु:- एक मिनट कुंजल.. इसे पूरा बोलने दे.... हां जी मनोज जी.. आगे..
मनोज:- आगे क्या, कुछ नहीं..
अपस्यु:- तुम्हारा वो ग्रुप ना दिख रहा है जो उस दिन खड़ा था…
मनोज:- वो सब अपने-अपने ज़िन्दगी में व्यस्त हैं।
अपस्यु:- मनोज अब मैं जो कहूंगा वो अपनी बहन को कहूंगा, इसलिए बात को तुम दिल पर मत लेना। कुंजल, बेटा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से अच्छा है कि एक सांप पाल लो। केवल दोस्त कह देने से दोस्त हो जाते हैं क्या?
मनोज:- क्या मतलब है तुम्हारा..
अपस्यु:- सीईईईईईईईईई...…. चुप। पहले ही कहा ना अपनी बहन से बात कर रहा हूं।
कुंजल:- क्या हुआ सोनू, ये लड़का है इसलिए कोई परेशानी है क्या..
अपस्यु:- नही रे पागल… तू बस मेरी बात सुन। यही वो तेरे दोस्त है ना जिसके सामने से मैं तुम्हे ले गया और इसकी इतनी हिम्मत तक ना हुई कि बचाने कि कोशिश भी करे। हम 2 थे, ये 5 फिर भी सब तमाशा देखते रहे। पुलिस तक में किसी ने कंपलेंट नहीं की। मुझे बस इतना ही कहना था। बाकी तुझ पर छोड़ा।
कुंजल:- देखो मनोज हम क्लासमेट है और तुम शायद गलत टेबल पर बैठ गए हो। इसलिए प्लीज कहीं और चले जाओ। लव यू भाई..
अपस्यु:- लव यू टू सिस…
कुंजल:- बार बार दरवाजे पर क्यों देख रहे हो, बात ना बनी तो मैं बात करूं क्या तुम्हारे लिए।… लो 100 साल जिएगी.. अभी बात ही कर रहे थे कि सामने से चली भी अाई।
साची लावणी को ढूंढ़ती हुई अा रही थी। अाकर सीधा वो दोनो भाई-बहन के बीच बैठ गई…. "लावणी कहां है".. टेढ़े मुंह सवाल पूछती
कुंजल:- कौन लावणी..
ऐसा लग रहा था सास बहू के सीरियल वाला एक्सप्रेशन साची में घुस गया हो। कुंजल के सवाल पर वो ठीक वैसे ही गर्दन झटक कर कुंजल को देखी जैसे किसी सीन को इंटेंस बनाने के लिए सीरियल का कोई कैरेक्टर झटकता है, बस एक्शन रिप्ले की कमी रह गई।
साची:- मैंने पूछा लावणी कहां है।
अपस्यु:- हमे नहीं पता।
साची:- अराव कहां है।
कुंजल:- हमारे माथे पर क्या इंक्वायरी काउंटर लिखा है। मैं जा रही हूं भाई। … और कुंजल इतना कहकर साची को घूरती हुई वहां से चली गई।
यूं तो कैंटीन में लोगों की आवाज़ अा रही थी लेकिन साची और अपस्यु के बीच पूरी खामोशी। दोनों बस खामोश, चेहरे को अलग-अलग दिशा में घुमाए चुप चाप वहीं बैठे हुए थे।