लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से
इमरतिया ने दोनों को अलग किया,
थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली
" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "
दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,
भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।
पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।
खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,
लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।
वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,
" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "
बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,
" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "
" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "
" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।
ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,
इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "
लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,
" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,
इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी
" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "
बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी
" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,
" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,
बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली
"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "
वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,
" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "
और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।
दोनों मस्त हो रहे थे
और थोड़ी देर में सीन बदल गया।
सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,
" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "
उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।
लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,
थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,
लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।
इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,
और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।
सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।
उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।
थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी
और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।
भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,
बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,
इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,
इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,
" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।
तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,
" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "
इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।
खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,
" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।
और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी
और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "
" का करूँ बोल न मेरी बहना"
एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे
" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,
" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"
: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,
" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "
बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।
और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।
पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,
सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।
पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "
“
और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,
" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "
”
Ufff ye to mere dil ki baat bol di इमरतिया ne