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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६ पृष्ठ १२०३

बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६

बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ
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बुच्ची
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ऊपर छत पर सन्नाटा था।



लावा भुजने की रसम, बाहर घर के पीछे के मैदान में होने वाली थी, तो सब औरतें, लड़कियां, काम करने वालियां वहीँ जमा हो रहे थे। ये रस्म बूआ की थी और कांती बूआ खूब ठनगन कर रही थीं,

इसके बाद सिलपोहना होना था जो आँगन में होता था।

मर्द लड़के सब भी बाहर दालान पे, कुछ लोग ताश खेल रहे थे, कुछ गप्प मार रहे थे और कुछ बस ऊँघ रहे थे।



थोड़ी देर पहले पूनम और लीला, दूल्हे को खाना खिला के बरतन ले के नीचे चली गयी थीं और वो दोनों भी बाकी लड़कियों के साथ बाहर जहाँ लावा भूजा जाना था, काम में लगी थीं।

कमरे में इमरतिया, सूरजु और बुच्ची थे और अगले तीन घंटे तक उन्हें कमरे के बाहर नहीं जाना था, जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाए, नीचे से संझा जगाने की आवाज न आने लगे, उन तीनो को यहीं ऊपर रहना था, और तीनो के मन में यही था, तीन घंटे में तो बहुत कुछ हो सकता था।



इमरतिया उठी, एक बड़ा सा डेढ़ सेर का ताला लिया, उसकी लंबी-सी चाभी और बाहर छत पर। एक बार उसने सीढ़ी से नीचे झाँका, …पूरे घर में सन्नाटा था, सब लोग बाहर थे। धीरे से नीचे से आने वाली सीढ़ी का इमरतिया ने दरवाजा बंद किया, सांकल लगाई और वो डेढ़ सेर का ताला बंद कर दिया। खींचकर भी देख लिया।


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बुच्ची सूरजु को देख रही थी, मीठा मीठा मुस्करा रही थी, बचपन से जब वो जवान होना शुरू भी नहीं हुयी थी, सूरजु भैया को देख के उसे कुछ कुछ होता था। सहेलियां तो छोड़िए उसकी माई, चाची भी चिढ़ाती, 'सूरज से बियाह करबी'। और कुछ दिनों में जब वो राखी बाँधने आती तो सूरज भैया की निगाह उसके जोबन के आते अंकुर पे चिपक जाती। और वो उसे छेड़ते हुए कहती

" का भैया का देख रहे हो, …पहले पैसा निकालो "


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जानती वो भी थी, भैया क्या देख रहें हैं। अरे उसके क्लास की आधी से ज्यादा लड़कियों की चिड़िया उड़ने लगी थी और उसमे से भी दर्जन भर से ज्यादा ऐसी थीं जिनका नाडा उनके सगे भैया ने ही खोला था, और वो सब आके रोज बुच्ची को अपने किस्से सुना सुना के जलाती थीं। मालूम था उसे की बेचारा उसका भाई उसकी हवा मिठाई देख के ललचाता रहता था, पर बुद्धू , एक दिन तो बुच्ची ने वो दोनों अकेले थे तो अपनी कच्ची अमिया सूरजु के सीने पे रगड़ते हुए साफ़ साफ़ बोल भी दिया था,
" लालची, ललचाने से काम नहीं चलेगा, कुछ चाहिए तो मांग लेना चाहिए, बल्कि ले लेना चाहिए, भाई का हक तो सबसे पहले "

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है, वाला हाल था। बुच्ची की सब सहेलियां, स्कूल की भी, गाँव की रिश्ते की भी, बुच्ची का चक्कर जानती थीं, सिवाय सूरजु के। हाँ अच्छी उसे भी लगती थी, कई साल छोटी थी, लेकिन चिपका रहता था, और अगर सूरजु ने लंगोट न बाँधा होता, अखाड़े में न उतरा होता, तो पक्का बुच्ची और इलू इलू हो जाता, बल्कि घपाघप भी भाई बहन के बीच,

पर, जो चीज जब होनी होती है तभी होती है और आज बुच्ची और सूरजु दोनों को लग रहा था वो मौका आ गया है।

और बुच्ची के चाहने वाले भी बहुत थे,

साल भर से ऊपर से गप्पू ही लाइन मार रहा था, इसी सावन में जब आयी थी, और अपनी सहेली शीलवा के साथ,…

इस गाँव में आग लगा दी थी और फिर तब से गाँव भर के लौंडो का तो बुच्ची के नाम से ही खड़ा हो जाता था,

पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,

बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे।



और उसी समय इमरतिया कमरे में,… और कमरा भी अंदर से बंद

न सिर्फ ऊपर की सांकल लगाई बल्कि नीचे की कुण्डी भी लगा दी और सूरजु को देखा तो उनकी आँख बुच्ची पे जमी थी और एकदम नदीदे की तरह देख रहे थे।

और बुच्चिया थी भी ऐसी, संगमरमर की माफिक शफ्फाक सफ़ेद, जवानी के दरवाजे की सांकल खटखटाती, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, मुट्ठी बराबर, पतली सी कमर लेकिन जान मारती थी उसकी दूध खील सी बिखरती हंसी, और बस उभरते हुए जोबन, एकदम टेनिस के बॉल्स की तरह कड़े कड़े, छोटे छोटे, अपनी हमउम्र लड़कियों से भी २ नंबर ज्यादा,
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इमरतिया देख रही थी कि कौन पहल करता है। गरमाये दोनों थे, सूरजु का खूंटा फडफ़ड़ा रहा था, बुच्ची की बिल बिलबिला रही थी, अभी अभी अपनी मौसी की जबरदस्त चुदाई देख के आ रही थी,



दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे, लेकिन पहल बुच्ची ने की।

और सूरजु ने उसे दबोच लिया, बुच्ची की टॉप सूरजु की बनियान एक दूसरे गुत्थगुत्था, जमीन पर पड़े थे।
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बुच्ची के गोल गोल कड़े कड़े जुबना देख के सरजू भैया की हालत खराब हो गयी। वैसे तो कौन भाई होगा जो अपनी छोटी बहन की आ रही छोटी छोटी चूँचियों के को देख के न पागल हो जाए, पर बुच्ची के उभार भी एकदम जबरदस्त थे, और बुच्ची भी टॉप खुलने पर अपने उभार दिखा दिखा के भैया को और ललचा रही थी, और वैसे तो दर्जा नौ दस वालियों के चूँचिया उठान के आगे पूरी दुनिया मात और बुच्ची की भी बाकी उसके क्लास की दर्जा नौ वाली ऐसे थीं, हाँ थोड़ी बड़ी ज्यादा थीं, ज्यादा गदरायी, उभरी लेकिन एकदम अलग भी थी, एक तो संगमरमर जैसी सफ़ेद, और वैसी ही कड़ी और तराशी हुयी, एकदम गोल गोल, दोनों लगता है सूरजु की मुट्ठी के लिए ही बनी थीं, और दूसरे सूरजु की छोटी बहन की दावत देती आँखे, शरारत से भरी बुलाती मुस्कान, ... सूरजु की हालत खराब थी।

और अब सूरजु ने भी जम के चूँची का रस ले लिया था, इमरतिया भौजी के बड़े बड़े गदराये जोबना को सूरजु ने कस कस के मसला था, रगड़ा था, चूसा था और आज हल्दी की रस्म में बुच्ची से भी छोटी लड़कियों, से लेकर उसकी चाची, मामी, बुआ यहाँ तक की माई तक, किसी की चूँची न बची होगी जिसे उसने आँखों से न चोदा हो.

इमरतिया ने सिखाया भी था और उसका मन भी अब मान नहीं रहा था और ऊपर से माई और आग लगा रही थीं, बुच्ची जब हल्दी लगा रही थी तो वो खुद चिढ़ाते बोलीं सूरजु से,


" अरे मुन्ना, जब तक तोहार दुलहिनिया नहीं आती, तब तक यही दुलहिनिया है तुम्हारी "

बुच्ची की सगी बड़ी मौसी और सूरजु की बुआ, कांती बुआ ने एकदम साफ़ साफ़ बोल दिया

" और का,.... कुल नेग ये लेंगी, तो दूल्हे क लौंड़ा कौन घोंटेगा , ये भी तो इसी का काम है "
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रामपुर वाली भौजी तो सिर्फ अपने भाई गप्पू के फायदे के चक्कर में रहती थीं, तो उन्होंने भी बहती नदी में हाथ धोया,
" और दूल्हे के बाद दूल्हे के सालों का भी घोंटेंगी, हमार ननद बुच्ची रानी "

सूरजु सब सुन रहे थे और बस सोच रहे थे कब ये कच्ची अमिया कुतरने को मिलेगी और अब वो टिकोरे एकदम खुले, उनके सामने थे, दरवाजा अंदर से बंद था, इमरतिया ने छत पे ताला लगा दिया था और माई ने बुच्ची और इमरतिया से बोल दिया, " खबरदार, संझा के पहले दुनो जन, दूल्हा को छोड़ के नीचे आउ और ऊपर छत पे भी रात के पहले कोई नहीं जाएगा "

पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,
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बुच्ची अपने जोबना कस कस के भैया के सीने पे रगड़ रही थी, एक हाथ भैया की पीठ पे था और दूसरा उसकी नेकर के अंदर और सूरजु पागलों की तह अपनी छोटी बहन को चूम रहा था, उसके गुलाबी होंठों को चूस रहा था, कभी जीभ बहन के मुंह में डाल देता तो कभी कचाक से गाल काट लेता। एक हाथ से सूरजु ने बहन की नंगी पीठ पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से उसके छोटे छोटे चूतड़ स्कर्ट उठा कर चूतड़ों का मजा ले रहे थे।



भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

सूरजु से नहीं रहा गया, स्कर्ट ने भी उसकी बहन का साथ छोड़ दिया तो बुच्ची कैसे पीछे रहती, नेकर भी स्कर्ट के ऊपर चढ़ा
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और दोनों फर्श पर थे गुत्थमगुथा,



बगल में ही खीर से भरा कटोरा रखा था, भरा, जड़ी बूटियों से युक्त जो खूंटे को घंटो खड़ा रखे और मन को काम भावना से भर दे,



इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,

Ufff kya baat kahi hai
 

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६

बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ
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बुच्ची
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ऊपर छत पर सन्नाटा था।



लावा भुजने की रसम, बाहर घर के पीछे के मैदान में होने वाली थी, तो सब औरतें, लड़कियां, काम करने वालियां वहीँ जमा हो रहे थे। ये रस्म बूआ की थी और कांती बूआ खूब ठनगन कर रही थीं,

इसके बाद सिलपोहना होना था जो आँगन में होता था।

मर्द लड़के सब भी बाहर दालान पे, कुछ लोग ताश खेल रहे थे, कुछ गप्प मार रहे थे और कुछ बस ऊँघ रहे थे।



थोड़ी देर पहले पूनम और लीला, दूल्हे को खाना खिला के बरतन ले के नीचे चली गयी थीं और वो दोनों भी बाकी लड़कियों के साथ बाहर जहाँ लावा भूजा जाना था, काम में लगी थीं।

कमरे में इमरतिया, सूरजु और बुच्ची थे और अगले तीन घंटे तक उन्हें कमरे के बाहर नहीं जाना था, जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाए, नीचे से संझा जगाने की आवाज न आने लगे, उन तीनो को यहीं ऊपर रहना था, और तीनो के मन में यही था, तीन घंटे में तो बहुत कुछ हो सकता था।



इमरतिया उठी, एक बड़ा सा डेढ़ सेर का ताला लिया, उसकी लंबी-सी चाभी और बाहर छत पर। एक बार उसने सीढ़ी से नीचे झाँका, …पूरे घर में सन्नाटा था, सब लोग बाहर थे। धीरे से नीचे से आने वाली सीढ़ी का इमरतिया ने दरवाजा बंद किया, सांकल लगाई और वो डेढ़ सेर का ताला बंद कर दिया। खींचकर भी देख लिया।


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बुच्ची सूरजु को देख रही थी, मीठा मीठा मुस्करा रही थी, बचपन से जब वो जवान होना शुरू भी नहीं हुयी थी, सूरजु भैया को देख के उसे कुछ कुछ होता था। सहेलियां तो छोड़िए उसकी माई, चाची भी चिढ़ाती, 'सूरज से बियाह करबी'। और कुछ दिनों में जब वो राखी बाँधने आती तो सूरज भैया की निगाह उसके जोबन के आते अंकुर पे चिपक जाती। और वो उसे छेड़ते हुए कहती

" का भैया का देख रहे हो, …पहले पैसा निकालो "


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जानती वो भी थी, भैया क्या देख रहें हैं। अरे उसके क्लास की आधी से ज्यादा लड़कियों की चिड़िया उड़ने लगी थी और उसमे से भी दर्जन भर से ज्यादा ऐसी थीं जिनका नाडा उनके सगे भैया ने ही खोला था, और वो सब आके रोज बुच्ची को अपने किस्से सुना सुना के जलाती थीं। मालूम था उसे की बेचारा उसका भाई उसकी हवा मिठाई देख के ललचाता रहता था, पर बुद्धू , एक दिन तो बुच्ची ने वो दोनों अकेले थे तो अपनी कच्ची अमिया सूरजु के सीने पे रगड़ते हुए साफ़ साफ़ बोल भी दिया था,
" लालची, ललचाने से काम नहीं चलेगा, कुछ चाहिए तो मांग लेना चाहिए, बल्कि ले लेना चाहिए, भाई का हक तो सबसे पहले "

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है, वाला हाल था। बुच्ची की सब सहेलियां, स्कूल की भी, गाँव की रिश्ते की भी, बुच्ची का चक्कर जानती थीं, सिवाय सूरजु के। हाँ अच्छी उसे भी लगती थी, कई साल छोटी थी, लेकिन चिपका रहता था, और अगर सूरजु ने लंगोट न बाँधा होता, अखाड़े में न उतरा होता, तो पक्का बुच्ची और इलू इलू हो जाता, बल्कि घपाघप भी भाई बहन के बीच,

पर, जो चीज जब होनी होती है तभी होती है और आज बुच्ची और सूरजु दोनों को लग रहा था वो मौका आ गया है।

और बुच्ची के चाहने वाले भी बहुत थे,

साल भर से ऊपर से गप्पू ही लाइन मार रहा था, इसी सावन में जब आयी थी, और अपनी सहेली शीलवा के साथ,…

इस गाँव में आग लगा दी थी और फिर तब से गाँव भर के लौंडो का तो बुच्ची के नाम से ही खड़ा हो जाता था,

पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,

बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे।



और उसी समय इमरतिया कमरे में,… और कमरा भी अंदर से बंद

न सिर्फ ऊपर की सांकल लगाई बल्कि नीचे की कुण्डी भी लगा दी और सूरजु को देखा तो उनकी आँख बुच्ची पे जमी थी और एकदम नदीदे की तरह देख रहे थे।

और बुच्चिया थी भी ऐसी, संगमरमर की माफिक शफ्फाक सफ़ेद, जवानी के दरवाजे की सांकल खटखटाती, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, मुट्ठी बराबर, पतली सी कमर लेकिन जान मारती थी उसकी दूध खील सी बिखरती हंसी, और बस उभरते हुए जोबन, एकदम टेनिस के बॉल्स की तरह कड़े कड़े, छोटे छोटे, अपनी हमउम्र लड़कियों से भी २ नंबर ज्यादा,
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इमरतिया देख रही थी कि कौन पहल करता है। गरमाये दोनों थे, सूरजु का खूंटा फडफ़ड़ा रहा था, बुच्ची की बिल बिलबिला रही थी, अभी अभी अपनी मौसी की जबरदस्त चुदाई देख के आ रही थी,



दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे, लेकिन पहल बुच्ची ने की।

और सूरजु ने उसे दबोच लिया, बुच्ची की टॉप सूरजु की बनियान एक दूसरे गुत्थगुत्था, जमीन पर पड़े थे।
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बुच्ची के गोल गोल कड़े कड़े जुबना देख के सरजू भैया की हालत खराब हो गयी। वैसे तो कौन भाई होगा जो अपनी छोटी बहन की आ रही छोटी छोटी चूँचियों के को देख के न पागल हो जाए, पर बुच्ची के उभार भी एकदम जबरदस्त थे, और बुच्ची भी टॉप खुलने पर अपने उभार दिखा दिखा के भैया को और ललचा रही थी, और वैसे तो दर्जा नौ दस वालियों के चूँचिया उठान के आगे पूरी दुनिया मात और बुच्ची की भी बाकी उसके क्लास की दर्जा नौ वाली ऐसे थीं, हाँ थोड़ी बड़ी ज्यादा थीं, ज्यादा गदरायी, उभरी लेकिन एकदम अलग भी थी, एक तो संगमरमर जैसी सफ़ेद, और वैसी ही कड़ी और तराशी हुयी, एकदम गोल गोल, दोनों लगता है सूरजु की मुट्ठी के लिए ही बनी थीं, और दूसरे सूरजु की छोटी बहन की दावत देती आँखे, शरारत से भरी बुलाती मुस्कान, ... सूरजु की हालत खराब थी।

और अब सूरजु ने भी जम के चूँची का रस ले लिया था, इमरतिया भौजी के बड़े बड़े गदराये जोबना को सूरजु ने कस कस के मसला था, रगड़ा था, चूसा था और आज हल्दी की रस्म में बुच्ची से भी छोटी लड़कियों, से लेकर उसकी चाची, मामी, बुआ यहाँ तक की माई तक, किसी की चूँची न बची होगी जिसे उसने आँखों से न चोदा हो.

इमरतिया ने सिखाया भी था और उसका मन भी अब मान नहीं रहा था और ऊपर से माई और आग लगा रही थीं, बुच्ची जब हल्दी लगा रही थी तो वो खुद चिढ़ाते बोलीं सूरजु से,


" अरे मुन्ना, जब तक तोहार दुलहिनिया नहीं आती, तब तक यही दुलहिनिया है तुम्हारी "

बुच्ची की सगी बड़ी मौसी और सूरजु की बुआ, कांती बुआ ने एकदम साफ़ साफ़ बोल दिया

" और का,.... कुल नेग ये लेंगी, तो दूल्हे क लौंड़ा कौन घोंटेगा , ये भी तो इसी का काम है "
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रामपुर वाली भौजी तो सिर्फ अपने भाई गप्पू के फायदे के चक्कर में रहती थीं, तो उन्होंने भी बहती नदी में हाथ धोया,
" और दूल्हे के बाद दूल्हे के सालों का भी घोंटेंगी, हमार ननद बुच्ची रानी "

सूरजु सब सुन रहे थे और बस सोच रहे थे कब ये कच्ची अमिया कुतरने को मिलेगी और अब वो टिकोरे एकदम खुले, उनके सामने थे, दरवाजा अंदर से बंद था, इमरतिया ने छत पे ताला लगा दिया था और माई ने बुच्ची और इमरतिया से बोल दिया, " खबरदार, संझा के पहले दुनो जन, दूल्हा को छोड़ के नीचे आउ और ऊपर छत पे भी रात के पहले कोई नहीं जाएगा "

पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,
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बुच्ची अपने जोबना कस कस के भैया के सीने पे रगड़ रही थी, एक हाथ भैया की पीठ पे था और दूसरा उसकी नेकर के अंदर और सूरजु पागलों की तह अपनी छोटी बहन को चूम रहा था, उसके गुलाबी होंठों को चूस रहा था, कभी जीभ बहन के मुंह में डाल देता तो कभी कचाक से गाल काट लेता। एक हाथ से सूरजु ने बहन की नंगी पीठ पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से उसके छोटे छोटे चूतड़ स्कर्ट उठा कर चूतड़ों का मजा ले रहे थे।



भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

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और दोनों फर्श पर थे गुत्थमगुथा,



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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

Uffff
 

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६

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इसके बाद सिलपोहना होना था जो आँगन में होता था।

मर्द लड़के सब भी बाहर दालान पे, कुछ लोग ताश खेल रहे थे, कुछ गप्प मार रहे थे और कुछ बस ऊँघ रहे थे।



थोड़ी देर पहले पूनम और लीला, दूल्हे को खाना खिला के बरतन ले के नीचे चली गयी थीं और वो दोनों भी बाकी लड़कियों के साथ बाहर जहाँ लावा भूजा जाना था, काम में लगी थीं।

कमरे में इमरतिया, सूरजु और बुच्ची थे और अगले तीन घंटे तक उन्हें कमरे के बाहर नहीं जाना था, जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाए, नीचे से संझा जगाने की आवाज न आने लगे, उन तीनो को यहीं ऊपर रहना था, और तीनो के मन में यही था, तीन घंटे में तो बहुत कुछ हो सकता था।



इमरतिया उठी, एक बड़ा सा डेढ़ सेर का ताला लिया, उसकी लंबी-सी चाभी और बाहर छत पर। एक बार उसने सीढ़ी से नीचे झाँका, …पूरे घर में सन्नाटा था, सब लोग बाहर थे। धीरे से नीचे से आने वाली सीढ़ी का इमरतिया ने दरवाजा बंद किया, सांकल लगाई और वो डेढ़ सेर का ताला बंद कर दिया। खींचकर भी देख लिया।


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" का भैया का देख रहे हो, …पहले पैसा निकालो "


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" लालची, ललचाने से काम नहीं चलेगा, कुछ चाहिए तो मांग लेना चाहिए, बल्कि ले लेना चाहिए, भाई का हक तो सबसे पहले "

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है, वाला हाल था। बुच्ची की सब सहेलियां, स्कूल की भी, गाँव की रिश्ते की भी, बुच्ची का चक्कर जानती थीं, सिवाय सूरजु के। हाँ अच्छी उसे भी लगती थी, कई साल छोटी थी, लेकिन चिपका रहता था, और अगर सूरजु ने लंगोट न बाँधा होता, अखाड़े में न उतरा होता, तो पक्का बुच्ची और इलू इलू हो जाता, बल्कि घपाघप भी भाई बहन के बीच,

पर, जो चीज जब होनी होती है तभी होती है और आज बुच्ची और सूरजु दोनों को लग रहा था वो मौका आ गया है।

और बुच्ची के चाहने वाले भी बहुत थे,

साल भर से ऊपर से गप्पू ही लाइन मार रहा था, इसी सावन में जब आयी थी, और अपनी सहेली शीलवा के साथ,…

इस गाँव में आग लगा दी थी और फिर तब से गाँव भर के लौंडो का तो बुच्ची के नाम से ही खड़ा हो जाता था,

पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,

बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे।



और उसी समय इमरतिया कमरे में,… और कमरा भी अंदर से बंद

न सिर्फ ऊपर की सांकल लगाई बल्कि नीचे की कुण्डी भी लगा दी और सूरजु को देखा तो उनकी आँख बुच्ची पे जमी थी और एकदम नदीदे की तरह देख रहे थे।

और बुच्चिया थी भी ऐसी, संगमरमर की माफिक शफ्फाक सफ़ेद, जवानी के दरवाजे की सांकल खटखटाती, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, मुट्ठी बराबर, पतली सी कमर लेकिन जान मारती थी उसकी दूध खील सी बिखरती हंसी, और बस उभरते हुए जोबन, एकदम टेनिस के बॉल्स की तरह कड़े कड़े, छोटे छोटे, अपनी हमउम्र लड़कियों से भी २ नंबर ज्यादा,
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इमरतिया देख रही थी कि कौन पहल करता है। गरमाये दोनों थे, सूरजु का खूंटा फडफ़ड़ा रहा था, बुच्ची की बिल बिलबिला रही थी, अभी अभी अपनी मौसी की जबरदस्त चुदाई देख के आ रही थी,



दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे, लेकिन पहल बुच्ची ने की।

और सूरजु ने उसे दबोच लिया, बुच्ची की टॉप सूरजु की बनियान एक दूसरे गुत्थगुत्था, जमीन पर पड़े थे।
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बुच्ची के गोल गोल कड़े कड़े जुबना देख के सरजू भैया की हालत खराब हो गयी। वैसे तो कौन भाई होगा जो अपनी छोटी बहन की आ रही छोटी छोटी चूँचियों के को देख के न पागल हो जाए, पर बुच्ची के उभार भी एकदम जबरदस्त थे, और बुच्ची भी टॉप खुलने पर अपने उभार दिखा दिखा के भैया को और ललचा रही थी, और वैसे तो दर्जा नौ दस वालियों के चूँचिया उठान के आगे पूरी दुनिया मात और बुच्ची की भी बाकी उसके क्लास की दर्जा नौ वाली ऐसे थीं, हाँ थोड़ी बड़ी ज्यादा थीं, ज्यादा गदरायी, उभरी लेकिन एकदम अलग भी थी, एक तो संगमरमर जैसी सफ़ेद, और वैसी ही कड़ी और तराशी हुयी, एकदम गोल गोल, दोनों लगता है सूरजु की मुट्ठी के लिए ही बनी थीं, और दूसरे सूरजु की छोटी बहन की दावत देती आँखे, शरारत से भरी बुलाती मुस्कान, ... सूरजु की हालत खराब थी।

और अब सूरजु ने भी जम के चूँची का रस ले लिया था, इमरतिया भौजी के बड़े बड़े गदराये जोबना को सूरजु ने कस कस के मसला था, रगड़ा था, चूसा था और आज हल्दी की रस्म में बुच्ची से भी छोटी लड़कियों, से लेकर उसकी चाची, मामी, बुआ यहाँ तक की माई तक, किसी की चूँची न बची होगी जिसे उसने आँखों से न चोदा हो.

इमरतिया ने सिखाया भी था और उसका मन भी अब मान नहीं रहा था और ऊपर से माई और आग लगा रही थीं, बुच्ची जब हल्दी लगा रही थी तो वो खुद चिढ़ाते बोलीं सूरजु से,


" अरे मुन्ना, जब तक तोहार दुलहिनिया नहीं आती, तब तक यही दुलहिनिया है तुम्हारी "

बुच्ची की सगी बड़ी मौसी और सूरजु की बुआ, कांती बुआ ने एकदम साफ़ साफ़ बोल दिया

" और का,.... कुल नेग ये लेंगी, तो दूल्हे क लौंड़ा कौन घोंटेगा , ये भी तो इसी का काम है "
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रामपुर वाली भौजी तो सिर्फ अपने भाई गप्पू के फायदे के चक्कर में रहती थीं, तो उन्होंने भी बहती नदी में हाथ धोया,
" और दूल्हे के बाद दूल्हे के सालों का भी घोंटेंगी, हमार ननद बुच्ची रानी "

सूरजु सब सुन रहे थे और बस सोच रहे थे कब ये कच्ची अमिया कुतरने को मिलेगी और अब वो टिकोरे एकदम खुले, उनके सामने थे, दरवाजा अंदर से बंद था, इमरतिया ने छत पे ताला लगा दिया था और माई ने बुच्ची और इमरतिया से बोल दिया, " खबरदार, संझा के पहले दुनो जन, दूल्हा को छोड़ के नीचे आउ और ऊपर छत पे भी रात के पहले कोई नहीं जाएगा "

पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,
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बुच्ची अपने जोबना कस कस के भैया के सीने पे रगड़ रही थी, एक हाथ भैया की पीठ पे था और दूसरा उसकी नेकर के अंदर और सूरजु पागलों की तह अपनी छोटी बहन को चूम रहा था, उसके गुलाबी होंठों को चूस रहा था, कभी जीभ बहन के मुंह में डाल देता तो कभी कचाक से गाल काट लेता। एक हाथ से सूरजु ने बहन की नंगी पीठ पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से उसके छोटे छोटे चूतड़ स्कर्ट उठा कर चूतड़ों का मजा ले रहे थे।



भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

सूरजु से नहीं रहा गया, स्कर्ट ने भी उसकी बहन का साथ छोड़ दिया तो बुच्ची कैसे पीछे रहती, नेकर भी स्कर्ट के ऊपर चढ़ा
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और दोनों फर्श पर थे गुत्थमगुथा,



बगल में ही खीर से भरा कटोरा रखा था, भरा, जड़ी बूटियों से युक्त जो खूंटे को घंटो खड़ा रखे और मन को काम भावना से भर दे,



इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "
Garam update komaalrani ji
 

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६

बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ
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बुच्ची
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ऊपर छत पर सन्नाटा था।



लावा भुजने की रसम, बाहर घर के पीछे के मैदान में होने वाली थी, तो सब औरतें, लड़कियां, काम करने वालियां वहीँ जमा हो रहे थे। ये रस्म बूआ की थी और कांती बूआ खूब ठनगन कर रही थीं,

इसके बाद सिलपोहना होना था जो आँगन में होता था।

मर्द लड़के सब भी बाहर दालान पे, कुछ लोग ताश खेल रहे थे, कुछ गप्प मार रहे थे और कुछ बस ऊँघ रहे थे।



थोड़ी देर पहले पूनम और लीला, दूल्हे को खाना खिला के बरतन ले के नीचे चली गयी थीं और वो दोनों भी बाकी लड़कियों के साथ बाहर जहाँ लावा भूजा जाना था, काम में लगी थीं।

कमरे में इमरतिया, सूरजु और बुच्ची थे और अगले तीन घंटे तक उन्हें कमरे के बाहर नहीं जाना था, जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाए, नीचे से संझा जगाने की आवाज न आने लगे, उन तीनो को यहीं ऊपर रहना था, और तीनो के मन में यही था, तीन घंटे में तो बहुत कुछ हो सकता था।



इमरतिया उठी, एक बड़ा सा डेढ़ सेर का ताला लिया, उसकी लंबी-सी चाभी और बाहर छत पर। एक बार उसने सीढ़ी से नीचे झाँका, …पूरे घर में सन्नाटा था, सब लोग बाहर थे। धीरे से नीचे से आने वाली सीढ़ी का इमरतिया ने दरवाजा बंद किया, सांकल लगाई और वो डेढ़ सेर का ताला बंद कर दिया। खींचकर भी देख लिया।


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बुच्ची सूरजु को देख रही थी, मीठा मीठा मुस्करा रही थी, बचपन से जब वो जवान होना शुरू भी नहीं हुयी थी, सूरजु भैया को देख के उसे कुछ कुछ होता था। सहेलियां तो छोड़िए उसकी माई, चाची भी चिढ़ाती, 'सूरज से बियाह करबी'। और कुछ दिनों में जब वो राखी बाँधने आती तो सूरज भैया की निगाह उसके जोबन के आते अंकुर पे चिपक जाती। और वो उसे छेड़ते हुए कहती

" का भैया का देख रहे हो, …पहले पैसा निकालो "


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जानती वो भी थी, भैया क्या देख रहें हैं। अरे उसके क्लास की आधी से ज्यादा लड़कियों की चिड़िया उड़ने लगी थी और उसमे से भी दर्जन भर से ज्यादा ऐसी थीं जिनका नाडा उनके सगे भैया ने ही खोला था, और वो सब आके रोज बुच्ची को अपने किस्से सुना सुना के जलाती थीं। मालूम था उसे की बेचारा उसका भाई उसकी हवा मिठाई देख के ललचाता रहता था, पर बुद्धू , एक दिन तो बुच्ची ने वो दोनों अकेले थे तो अपनी कच्ची अमिया सूरजु के सीने पे रगड़ते हुए साफ़ साफ़ बोल भी दिया था,
" लालची, ललचाने से काम नहीं चलेगा, कुछ चाहिए तो मांग लेना चाहिए, बल्कि ले लेना चाहिए, भाई का हक तो सबसे पहले "

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है, वाला हाल था। बुच्ची की सब सहेलियां, स्कूल की भी, गाँव की रिश्ते की भी, बुच्ची का चक्कर जानती थीं, सिवाय सूरजु के। हाँ अच्छी उसे भी लगती थी, कई साल छोटी थी, लेकिन चिपका रहता था, और अगर सूरजु ने लंगोट न बाँधा होता, अखाड़े में न उतरा होता, तो पक्का बुच्ची और इलू इलू हो जाता, बल्कि घपाघप भी भाई बहन के बीच,

पर, जो चीज जब होनी होती है तभी होती है और आज बुच्ची और सूरजु दोनों को लग रहा था वो मौका आ गया है।

और बुच्ची के चाहने वाले भी बहुत थे,

साल भर से ऊपर से गप्पू ही लाइन मार रहा था, इसी सावन में जब आयी थी, और अपनी सहेली शीलवा के साथ,…

इस गाँव में आग लगा दी थी और फिर तब से गाँव भर के लौंडो का तो बुच्ची के नाम से ही खड़ा हो जाता था,

पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,

बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे।



और उसी समय इमरतिया कमरे में,… और कमरा भी अंदर से बंद

न सिर्फ ऊपर की सांकल लगाई बल्कि नीचे की कुण्डी भी लगा दी और सूरजु को देखा तो उनकी आँख बुच्ची पे जमी थी और एकदम नदीदे की तरह देख रहे थे।

और बुच्चिया थी भी ऐसी, संगमरमर की माफिक शफ्फाक सफ़ेद, जवानी के दरवाजे की सांकल खटखटाती, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, मुट्ठी बराबर, पतली सी कमर लेकिन जान मारती थी उसकी दूध खील सी बिखरती हंसी, और बस उभरते हुए जोबन, एकदम टेनिस के बॉल्स की तरह कड़े कड़े, छोटे छोटे, अपनी हमउम्र लड़कियों से भी २ नंबर ज्यादा,
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इमरतिया देख रही थी कि कौन पहल करता है। गरमाये दोनों थे, सूरजु का खूंटा फडफ़ड़ा रहा था, बुच्ची की बिल बिलबिला रही थी, अभी अभी अपनी मौसी की जबरदस्त चुदाई देख के आ रही थी,



दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे, लेकिन पहल बुच्ची ने की।

और सूरजु ने उसे दबोच लिया, बुच्ची की टॉप सूरजु की बनियान एक दूसरे गुत्थगुत्था, जमीन पर पड़े थे।
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बुच्ची के गोल गोल कड़े कड़े जुबना देख के सरजू भैया की हालत खराब हो गयी। वैसे तो कौन भाई होगा जो अपनी छोटी बहन की आ रही छोटी छोटी चूँचियों के को देख के न पागल हो जाए, पर बुच्ची के उभार भी एकदम जबरदस्त थे, और बुच्ची भी टॉप खुलने पर अपने उभार दिखा दिखा के भैया को और ललचा रही थी, और वैसे तो दर्जा नौ दस वालियों के चूँचिया उठान के आगे पूरी दुनिया मात और बुच्ची की भी बाकी उसके क्लास की दर्जा नौ वाली ऐसे थीं, हाँ थोड़ी बड़ी ज्यादा थीं, ज्यादा गदरायी, उभरी लेकिन एकदम अलग भी थी, एक तो संगमरमर जैसी सफ़ेद, और वैसी ही कड़ी और तराशी हुयी, एकदम गोल गोल, दोनों लगता है सूरजु की मुट्ठी के लिए ही बनी थीं, और दूसरे सूरजु की छोटी बहन की दावत देती आँखे, शरारत से भरी बुलाती मुस्कान, ... सूरजु की हालत खराब थी।

और अब सूरजु ने भी जम के चूँची का रस ले लिया था, इमरतिया भौजी के बड़े बड़े गदराये जोबना को सूरजु ने कस कस के मसला था, रगड़ा था, चूसा था और आज हल्दी की रस्म में बुच्ची से भी छोटी लड़कियों, से लेकर उसकी चाची, मामी, बुआ यहाँ तक की माई तक, किसी की चूँची न बची होगी जिसे उसने आँखों से न चोदा हो.

इमरतिया ने सिखाया भी था और उसका मन भी अब मान नहीं रहा था और ऊपर से माई और आग लगा रही थीं, बुच्ची जब हल्दी लगा रही थी तो वो खुद चिढ़ाते बोलीं सूरजु से,


" अरे मुन्ना, जब तक तोहार दुलहिनिया नहीं आती, तब तक यही दुलहिनिया है तुम्हारी "

बुच्ची की सगी बड़ी मौसी और सूरजु की बुआ, कांती बुआ ने एकदम साफ़ साफ़ बोल दिया

" और का,.... कुल नेग ये लेंगी, तो दूल्हे क लौंड़ा कौन घोंटेगा , ये भी तो इसी का काम है "
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रामपुर वाली भौजी तो सिर्फ अपने भाई गप्पू के फायदे के चक्कर में रहती थीं, तो उन्होंने भी बहती नदी में हाथ धोया,
" और दूल्हे के बाद दूल्हे के सालों का भी घोंटेंगी, हमार ननद बुच्ची रानी "

सूरजु सब सुन रहे थे और बस सोच रहे थे कब ये कच्ची अमिया कुतरने को मिलेगी और अब वो टिकोरे एकदम खुले, उनके सामने थे, दरवाजा अंदर से बंद था, इमरतिया ने छत पे ताला लगा दिया था और माई ने बुच्ची और इमरतिया से बोल दिया, " खबरदार, संझा के पहले दुनो जन, दूल्हा को छोड़ के नीचे आउ और ऊपर छत पे भी रात के पहले कोई नहीं जाएगा "

पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,
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बुच्ची अपने जोबना कस कस के भैया के सीने पे रगड़ रही थी, एक हाथ भैया की पीठ पे था और दूसरा उसकी नेकर के अंदर और सूरजु पागलों की तह अपनी छोटी बहन को चूम रहा था, उसके गुलाबी होंठों को चूस रहा था, कभी जीभ बहन के मुंह में डाल देता तो कभी कचाक से गाल काट लेता। एक हाथ से सूरजु ने बहन की नंगी पीठ पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से उसके छोटे छोटे चूतड़ स्कर्ट उठा कर चूतड़ों का मजा ले रहे थे।



भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

सूरजु से नहीं रहा गया, स्कर्ट ने भी उसकी बहन का साथ छोड़ दिया तो बुच्ची कैसे पीछे रहती, नेकर भी स्कर्ट के ऊपर चढ़ा
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और दोनों फर्श पर थे गुत्थमगुथा,



बगल में ही खीर से भरा कटोरा रखा था, भरा, जड़ी बूटियों से युक्त जो खूंटे को घंटो खड़ा रखे और मन को काम भावना से भर दे,



इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "
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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "
“भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।”

Uffff garam 🔥🔥🔥🔥🔥🔥
 

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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "

और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "


Ufff ye to mere dil ki baat bol di इमरतिया ne
 

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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "



अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "



Kab
Kab




Kab


Kab
 

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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "

हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे,


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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "



" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से

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इमरतिया ने दोनों को अलग किया,

थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली

" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "

दूध से गोरे गोरे जोबन, बड़े बड़े,


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भरे भरे, रस से छलकते, अपने भैया को ललचाते, बुलाते, और उन दूधिया जोबन पर वो गाढ़ी गाढ़ी खीर, जो इमरतिया धीरे धीरे सूरजु को दिखा के गिरा रही थी, और इस तरह से निपल तब भी खीर से डूबे भी रहें और दिखते भी रहें।

पूरे बड़े कटोरे भर खीर थी, और उसकी दर्जा नौ वाली कोरी कुँवारी ननद की कच्ची अमिया पे धीरे धीरे इमरतिया भौजी चुवा रही थी।

खीर भी ऐसी वैसी नहीं, दस तो जड़ी बूटियां पड़ी थी, जिसका केंचुआ ऐसा हो सांड़ ऐसा हो जाए, लम्बा भी तगड़ा भी, और उसके ऊपर से असली केसर और शिलाजीत। दस मिनट में असर औजार पर भी होता था और दिमाग पे भी। और बुच्चिया के भाई का तो वैसे ही सांड़ से भी तगड़ा था, पांच बच्चो की माँ, एकदम असल भोंसडे वाली की चीख निकल जाय और आज तो इस कुँवारी कली की फटनी थी। कल भी इसी अपने भैया की जूठी खीर बच्ची बुच्ची ने खायी थी, चाट चाट के बिना ये जाने की उसमे उसके होने वाले भतार की दो बार की निकली कटोरी भर मलाई मिली है। और आज खीर उसका भाई बहन की चूँची पर से,



लेकिन बुच्ची भी कम बदमाश नहीं थी।



वह लेटे लेटे साइड में देख के अपने भैया को ललचा रही थी, उसकी मुस्कराहट में दावत थी और बदमाशी भी। और इमरतिया ने भी मौके का फायदा उठाया, और अपने देवर को रगड़ती बोली,

" हे हमरे छोट ननद क कच्ची अमिया चाही, तो उसकी एकलौती मामी का बड़ा बड़ा आम भी लेना होगा, वो भी सबके सामने, "



बुच्ची की मामी मतलब सूरजु की माई। लेकिन बुच्ची भी अपने भाई को चिढ़ाने के मूड में थी, मुड़े मुड़े भाई को देखती, जुबना दिखा के ललचाती बोली,

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" अरे भैया को ऐसे नहीं समझ में आएगा, साफ़ साफ़ बोला न भौजी "

" अरे तोहरे माई क गद्दर चूँची, इतनी बड़ी और मस्त चूँची तो दस पांच गाँव में नहीं होगी तो तीन बार कसम खाओ तो बुच्ची क मिली "

" अरे हमरे भैया को समझती का हो, जब् बड़े हो गए तब तक तो दूध पीते थे, तब ही यह सुन्दर तगड़ी देह बनी है तो जवानी में भी पी लेंगे, कल रतजगा में तो इनकी माई सबके सामने कबूली हैं, तो हमरे भैया क्यों पीछे रहेंगे, " बुच्ची भी महा बदमाश, सूरजु को चिढ़ाते, उकसाते बोली।



ननद भौजाई ने मिल के सूरजु से खूब अच्छी तरह कबूल करवा लिया की वो अपनी माई की भी चूँची,

इमरतिया ने फुसफुसा के बुच्ची को समझा दिया था, " सुन, एकदम चुप चाप पड़ी रहना, न बोलना, न अपने हाथ से उसे पकड़ने की कोशिश करना "

लेकिन नयी आती कच्ची अमिया पर मर्द की जीभ, और मरद वो भी भाई, जिसे बचपन से आज तक राखी बांधती चली आयी, थोड़ी ही देर में बुच्ची पहले अपनी जाँघे रगड़ने लगी, फिर अपने आप उसके मुंह से सिसकियाँ निकल रही थीं,

" उफ़ भैया उफ्फ्फ्फ़, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसे ही करो ओह्ह "
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गाढ़ी गाढ़ी खीर थोड़े देर में भैया के पेट में, और बुच्ची के निपल खड़े, चूँची पथराई, एक चूँची भाई की मुट्ठी में और दूसरे निपल को मुंह में लेकर वो चुसूर चुसूर चूस रहा था। पहली बार कच्चे टिकोरे कुतर रहा था,

इमरतिया सूरजु के चेहरे की ख़ुशी देख रही थी, खुश हो रही थी, सोच रही थी

" सूरजु बाबू, अभी तो शुरुआत है, इसके बाद लीला, इससे भी कच्ची अमिया और बरात जाने के पहले पक्का चार पांच कच्ची अमिया तो चखाउंगी ही। "

बुच्ची की हालत खराब थी, भौजाइयों ने जोबन पर हाथ लगाया था लेकिन मरद की बात और है, बुच्ची चूतड़ पटक रही थी और बुदबुदा रही थी

" भैया करो न, …कर न यार " और कस के भैया के अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, जकड़ लिया,


" क्या करे तेरे भैया, लाज छोड़ के बोल खुल के जोर से, तब करेगा मेरा देवर वरना सुलगती रहना " इमरतिया ने हड़काया,

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बुच्ची ने बढाकर एक हाथ से भैया का तड़पता खूंटा पकड़ लिया, बोली

"यह कर, दे दे मुंझे अपना खूंटा, पेल दे "

वो गरमी से पागल हो रही थी और उसके भैया की उँगलियाँ उसकी बुलबुल की बंद चोंच फ़ैलाने की कोशिश कर रही थीं। दूसरा हाथ एक चूँची को रगड़ रगड़ के पागल कर रहा था,

" भैया कर न, कर न यार, पेल दे अपना "


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और जैसे नीचे अपनी बूआ, मामी, मौसी के सामने खुल के भैया की मथानी मथ रही थी,… मुन्ना बहू ने सब ट्रिक सीखा रखा था, कभी सुपाडे को अंगूठे से रगड़ देती तो कभी लम्बे नाख़ून से भैया के लंड के एकलौते छेद में सुरसुरी कर देती।

दोनों मस्त हो रहे थे



और थोड़ी देर में सीन बदल गया।

सूरजु फर्श पर लेटे और और अब इमरतिया मैदान में थी और मोटा गन्ना चूस रही थी, चुभला रही थी बुच्ची बगल में बैठी ललचा रही थी,



" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "

उसका मुंह उसके भैया के सुपाडे पर कस के लगाते इमरतिया बोली, और कुछ देर में बुच्ची गों गों कर रही थी, आँखे उबली पड़ रही थीं, नीचे से पूरा जोर लगा के उसके भैया ने कस के मोटा खूंटा अपनी बहिनिया के मुंह में ठूंस रखा था।


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लेकिन बहिनिया भले पहली बार खुल के मुसल मजा ले रही थी लेकिन खेल देखा उसने बहुत्त था, अपने बचपन में घर से लेकर अभी थोड़ी देर पहले अपनी बड़ी मौसी का, वही सूरजु की कांती बूआ, जो अभी लावा भूजने में लगी थीं,


थोड़ी देर बाद ननद भौजाई दोनों मिल के, एक गन्ना चूस रही थी तो दूसरा रसगुल्ला,



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लेकिन सूरजु से नहीं रहा गया और खड़े हो के बुच्ची का सर कस के पकड़ के उसके मुंह में खूंटा करीब करीब जड़ तक ठूंस दिया, इमरतिया ने उन्हें साफ़ साफ़ पक्का समझा दिया, रहम नहीं करने चाहिए, चाहे चूसवाने में चाहे चोदने में। हलक तक सुपाड़ा उसने उतार दिया।

इमरतिया सोच रही थी, अगर ये सूरजु का लंड आराम से एक बार चूस लेगी तो फिर कल जो रतजगे में कबूला की रामपुर वाली के भाई गप्पू का,

और जो पंडित जी ने बोला था की बरात बिदा करने के बाद सीधे घर में घुसने के पहले, दस लौंडो का लंड और मुन्ना बहू ने बोल दिया था की वो सिवान से सीधे अपनी भरौटी में ले जायेगी, फिर अहिराने वाले भी, ....तो आज के बाद वो पूरे गाँव का चूस लेगी।

सूरजु अब बजाय चूसवाने के अपनी छोटी बहन का मुंह अपने बित्ते से लम्बे बांस से चोद रहे थे। बुच्ची की मुँह से लार टपक रही थी, वह एकदम थरथर हो गई थी और इमरतिया के चेहरे पर ख़ुशी थी।



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उसका देवर अब पक्का हो रहा था। कच्ची कलियाँ को ऐसे ही रगड रगड़ के पेलने से वो जिंदगी भर के लिए छिनार हो जाती हैं।

थोड़ी देर में बुच्चिया फर्श पर लेटी थी, इमरतिया ने बची हुयी सब खीर उसके बुर पर उड़ेल दी थी


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और उसका भाई सपड़ सपड़ चाट रहा था।

भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,

बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,

इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,

इमरतिया ने अपने देवर को जबरदस्त चूत चटोरा बना दिया था और उसकी गारंटी थी की बड़ी से बड़ी चुदवासी छिनार औरतों भी पानी बुच्ची का भाई चूस चूस के तीन चार मिनट में निकाल सकता था, एकदम कुँवारी भी कोई होगी, किसी के आगे बियाह के पहले टांग न फ़ैलाने की दस कसम खायी होगी, उसकी प्रेमपियारी पर भी बुच्चिया के भाई की जीभ अगर पड़ जाए तो मिनट भर में लंड के लिए चोकरने लगेगी। सूरजु के माई की मालिश करते जब उनकी चुनमुनिया रगड़ रही थी तो कल ही वो चिढ़ा रही थी,

" बड़की ठकुराइन, जउने दिन यह रसमलाई पे हमरे देवर क जीभ लग जाई न तो फेचकुर छोड़ दोगी, ऐसी बाढ़ आएगी, इतना पानी कभी न निकला होगा "
" अरे जा जा न तो तोहरे देवर क हिम्मत है न ओकरे भौजाई क " हँसते हुए सूरजु की माई ने जवाब दिया।
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" अरे अब सूरजु ठाकुर पुरान वाला लजाधुर ना हैं, बरात जाने के पहले ही अपनी माई का झरना का रस पी के जाएंगे " इमरतिया ने एक ऊँगली अभी भी कसी सूरजु की माई की बिल में करते कहा।
" अरे तोहरे मुंह में घी गुड़, तोहें चांदी क पायल सोने क हार दूँगी, जो तोहार कहा हो जाए " हँसते हुए बड़की ठकुराइन बोली।

तो जो आज बहिन की चूत चूस रहा है कल माई की भी चूसेगा, वो भी इमरतिया के और बुच्ची के सामने, इमरतिया यह सोच के मुस्करा रही थी और देख रही थी , भाई की बदमाशी।
बहन की चूत पर से सपड़ सपड़ खीर चाट रहा था। सूरजु एकदम बदमाश, अपनी बहिनिया का दीवाना, वो अब सिर्फ चूत नहीं चाट रहा था, जब बहिनिया ज्यादा गरमा जाती तो लौट के कभी उसके गाल पे चुम्मा ले लेता, कभी चूँची पे लगी खीर चाट लेता तो कभी कभी जोबन से लेकर पेट तक जीभ से सहलाते एक बार फिर से प्रेमपियारी पे झप्पटा मारता।
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थोड़ी देर में ही बुच्ची अफल तफल हो गयी, कभी हाथ पटकती, कभी चूतड़, कभी कस कस के अपने भैया को गुहारती,

" अरे सूरजु भैया का कर रहे हो, तोहार गोड़ लागी, तोहार जिन्नगी भर गुलामी करब, झाड़ दो मोर भाई, नहीं नहीं अब छोड़ दो, रुक, रुक स्साले, मादरचोद, ओह्ह्ह नहीं भैया नहीं "



इमरतिया देख देख के खुस हो रही थी, चूत चाटने के ५६ तरीके उसने अपने देवर को सिखाये थे और सूरजु था बड़ा दिमाग वाला, सब गाँठ बाँध लिया जैसे अखाड़े में एक बार में दांव सीख लेता था। औरत तो काबू इसी से आती है, वरना डंडा तो कोई भी ठूंस देता है।

खीर तो कब की साफ़ हो गयी थी, अब तो सूरजु की जीभ बहिनिया की चूत पे मुजरा कर रही थी, जब वो बहुत तड़पती तो दोनों होंठों में भर के अपनी बहिनिया की फूलो फूली क्लिट चाभता न तो बस बुच्चिया गज भर चूतड़ ऊपर उछालती,

" हाय मोर भैया, कहाँ थे अबतक"
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एक से एक औरतें घर में गर्मायी बैठी हैं, कांती बूआ, छोटी मामी, शीतल मौसी, सब की सब,…. इमरतिया सोच रही थी और मान जाएंगी, की इमरतिया ने सच में दूल्हे को सब गुन आगर कर दिया है।



और अगर कहीं बड़की ठकुराइन पे चढ़ गया तो, … इमरतिया सोच के मुस्करा रही थी

और बुच्ची चोकर रही थी, " भैया, मोरे भैया, करो न , और मत तड़पाओ "

" का करूँ बोल न मेरी बहना"


एक पल के लिए फड़कती तितलियों से मुंह उठा के सूरजु ने चंदा से मुंह वाली अपनी छोटी बहन से पूछा, और भाई के दोनों हाथ बहन के जोबना पे जिसे लूटने के लिए इस गांब के दर्जनो लौंडे बेताब थे, क्या रगड़ा मसला। और सूरजु भैया के होंठ भी निचले होंठों से हट के कभी अपने बहन के होंठों पे, तो कभी चूँची पे



" लौंडिया की देह में २४ जगह होती है, उसे गरम करने के लिए चूँची और चूत छोड़ के " इमरतिया भौजी ने सिखाया था और आज भाई की उँगलियाँ होंठ बहन के उन सरे २४ जगहों पर कभी बारी बारी से कभी एक साथ हमला करता, और बुच्ची खुल के बोल रही थी,

" भैया पेल न अपनी बहिनिया को, कब से तुझे देख के मोहा रही थी तेरी बहन,"

: और मैं भी तो न जाने कब से तड़प रहा हूँ, तुझे देख के सोचता था, जब तेरे टिकोरे आएंगे तो कुतरने में कितना मजा आएगा, सब से पहले में ठोर मारूंगा अपनी बुच्चिया की अमिया पे, मुंह में ले चूसूंगा " सूरजु ने न जाने कब की मन की गाँठ खोली,

" तो चूस न स्साले अरे मैं तो कब से तुझ से चुदना चाह रही थी, न जाने कितने स्साले लौंडे आगे पीछे निहोरा कर रहे थे, लेकिन मैंने तय कर लिया था, बुच्ची तेरी डिबिया खोलेगा तो सबसे पहले तेरा भैया, सूरजु भैया का हक सबसे पहले "



बुच्ची ने भी अपनी मन की बात कह दी और अपने भैया के होंठ खींच के अपने छोटे छोटे जोबन पे रख दिए, निपल भैया के मुंह में ठूँस दिए।



और थोड़ी देर बाद, सूरजु ने फिर रसमलाई का भोग लगाना शुरू कर दिया।

पांच बार, पूरे पांच बार बुच्ची झड़ने के कगार पर पहुँच के लौटी, बुर से रसधार बह रही थी,

सूरज का खूंटा भी इतना खड़ा था, ऐसा कड़ा कि दीवार में घुसाए तो उसमें छेद हो जाए। सांडकी तरह वो फुंकार रहा था।

पर इमरतिया ने दोनों को अलग कर दिया, और देवर के कान में बोली, " बस दो मिनट, उसके बाद तो आज तेरी मर्दनगी देखूंगी "


" ले छिनार चूस अपने भतार का लेमनचूस "



Waaaah kya baat kahi hai
 
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