छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - भाग ११६
बुच्ची और बुआ की लावा भुजाइ
31,55,538
बुच्ची
ऊपर छत पर सन्नाटा था।
लावा भुजने की रसम, बाहर घर के पीछे के मैदान में होने वाली थी, तो सब औरतें, लड़कियां, काम करने वालियां वहीँ जमा हो रहे थे। ये रस्म बूआ की थी और कांती बूआ खूब ठनगन कर रही थीं,
इसके बाद सिलपोहना होना था जो आँगन में होता था।
मर्द लड़के सब भी बाहर दालान पे, कुछ लोग ताश खेल रहे थे, कुछ गप्प मार रहे थे और कुछ बस ऊँघ रहे थे।
थोड़ी देर पहले पूनम और लीला, दूल्हे को खाना खिला के बरतन ले के नीचे चली गयी थीं और वो दोनों भी बाकी लड़कियों के साथ बाहर जहाँ लावा भूजा जाना था, काम में लगी थीं।
कमरे में इमरतिया, सूरजु और बुच्ची थे और अगले तीन घंटे तक उन्हें कमरे के बाहर नहीं जाना था, जब तक सूरज पूरी तरह ढल न जाए, नीचे से संझा जगाने की आवाज न आने लगे, उन तीनो को यहीं ऊपर रहना था, और तीनो के मन में यही था, तीन घंटे में तो बहुत कुछ हो सकता था।
इमरतिया उठी, एक बड़ा सा डेढ़ सेर का ताला लिया, उसकी लंबी-सी चाभी और बाहर छत पर। एक बार उसने सीढ़ी से नीचे झाँका, …पूरे घर में सन्नाटा था, सब लोग बाहर थे। धीरे से नीचे से आने वाली सीढ़ी का इमरतिया ने दरवाजा बंद किया, सांकल लगाई और वो डेढ़ सेर का ताला बंद कर दिया। खींचकर भी देख लिया।
बुच्ची सूरजु को देख रही थी, मीठा मीठा मुस्करा रही थी, बचपन से जब वो जवान होना शुरू भी नहीं हुयी थी, सूरजु भैया को देख के उसे कुछ कुछ होता था। सहेलियां तो छोड़िए उसकी माई, चाची भी चिढ़ाती, 'सूरज से बियाह करबी'। और कुछ दिनों में जब वो राखी बाँधने आती तो सूरज भैया की निगाह उसके जोबन के आते अंकुर पे चिपक जाती। और वो उसे छेड़ते हुए कहती
" का भैया का देख रहे हो, …पहले पैसा निकालो "
जानती वो भी थी, भैया क्या देख रहें हैं। अरे उसके क्लास की आधी से ज्यादा लड़कियों की चिड़िया उड़ने लगी थी और उसमे से भी दर्जन भर से ज्यादा ऐसी थीं जिनका नाडा उनके सगे भैया ने ही खोला था, और वो सब आके रोज बुच्ची को अपने किस्से सुना सुना के जलाती थीं। मालूम था उसे की बेचारा उसका भाई उसकी हवा मिठाई देख के ललचाता रहता था, पर बुद्धू , एक दिन तो बुच्ची ने वो दोनों अकेले थे तो अपनी कच्ची अमिया सूरजु के सीने पे रगड़ते हुए साफ़ साफ़ बोल भी दिया था,
" लालची, ललचाने से काम नहीं चलेगा, कुछ चाहिए तो मांग लेना चाहिए, बल्कि ले लेना चाहिए, भाई का हक तो सबसे पहले "
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है, वाला हाल था। बुच्ची की सब सहेलियां, स्कूल की भी, गाँव की रिश्ते की भी, बुच्ची का चक्कर जानती थीं, सिवाय सूरजु के। हाँ अच्छी उसे भी लगती थी, कई साल छोटी थी, लेकिन चिपका रहता था, और अगर सूरजु ने लंगोट न बाँधा होता, अखाड़े में न उतरा होता, तो पक्का बुच्ची और इलू इलू हो जाता, बल्कि घपाघप भी भाई बहन के बीच,
पर, जो चीज जब होनी होती है तभी होती है और आज बुच्ची और सूरजु दोनों को लग रहा था वो मौका आ गया है।
और बुच्ची के चाहने वाले भी बहुत थे,
साल भर से ऊपर से गप्पू ही लाइन मार रहा था, इसी सावन में जब आयी थी, और अपनी सहेली शीलवा के साथ,…
इस गाँव में आग लगा दी थी और फिर तब से गाँव भर के लौंडो का तो बुच्ची के नाम से ही खड़ा हो जाता था,
पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,
बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे।
और उसी समय इमरतिया कमरे में,… और कमरा भी अंदर से बंद
न सिर्फ ऊपर की सांकल लगाई बल्कि नीचे की कुण्डी भी लगा दी और सूरजु को देखा तो उनकी आँख बुच्ची पे जमी थी और एकदम नदीदे की तरह देख रहे थे।
और बुच्चिया थी भी ऐसी, संगमरमर की माफिक शफ्फाक सफ़ेद, जवानी के दरवाजे की सांकल खटखटाती, बड़ी बड़ी कजरारी आँखे, मुट्ठी बराबर, पतली सी कमर लेकिन जान मारती थी उसकी दूध खील सी बिखरती हंसी, और बस उभरते हुए जोबन, एकदम टेनिस के बॉल्स की तरह कड़े कड़े, छोटे छोटे, अपनी हमउम्र लड़कियों से भी २ नंबर ज्यादा,
इमरतिया देख रही थी कि कौन पहल करता है। गरमाये दोनों थे, सूरजु का खूंटा फडफ़ड़ा रहा था, बुच्ची की बिल बिलबिला रही थी, अभी अभी अपनी मौसी की जबरदस्त चुदाई देख के आ रही थी,
दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे, लेकिन पहल बुच्ची ने की।
और सूरजु ने उसे दबोच लिया, बुच्ची की टॉप सूरजु की बनियान एक दूसरे गुत्थगुत्था, जमीन पर पड़े थे।
बुच्ची के गोल गोल कड़े कड़े जुबना देख के सरजू भैया की हालत खराब हो गयी। वैसे तो कौन भाई होगा जो अपनी छोटी बहन की आ रही छोटी छोटी चूँचियों के को देख के न पागल हो जाए, पर बुच्ची के उभार भी एकदम जबरदस्त थे, और बुच्ची भी टॉप खुलने पर अपने उभार दिखा दिखा के भैया को और ललचा रही थी, और वैसे तो दर्जा नौ दस वालियों के चूँचिया उठान के आगे पूरी दुनिया मात और बुच्ची की भी बाकी उसके क्लास की दर्जा नौ वाली ऐसे थीं, हाँ थोड़ी बड़ी ज्यादा थीं, ज्यादा गदरायी, उभरी लेकिन एकदम अलग भी थी, एक तो संगमरमर जैसी सफ़ेद, और वैसी ही कड़ी और तराशी हुयी, एकदम गोल गोल, दोनों लगता है सूरजु की मुट्ठी के लिए ही बनी थीं, और दूसरे सूरजु की छोटी बहन की दावत देती आँखे, शरारत से भरी बुलाती मुस्कान, ... सूरजु की हालत खराब थी।
और अब सूरजु ने भी जम के चूँची का रस ले लिया था, इमरतिया भौजी के बड़े बड़े गदराये जोबना को सूरजु ने कस कस के मसला था, रगड़ा था, चूसा था और आज हल्दी की रस्म में बुच्ची से भी छोटी लड़कियों, से लेकर उसकी चाची, मामी, बुआ यहाँ तक की माई तक, किसी की चूँची न बची होगी जिसे उसने आँखों से न चोदा हो.
इमरतिया ने सिखाया भी था और उसका मन भी अब मान नहीं रहा था और ऊपर से माई और आग लगा रही थीं, बुच्ची जब हल्दी लगा रही थी तो वो खुद चिढ़ाते बोलीं सूरजु से,
" अरे मुन्ना, जब तक तोहार दुलहिनिया नहीं आती, तब तक यही दुलहिनिया है तुम्हारी "
बुच्ची की सगी बड़ी मौसी और सूरजु की बुआ, कांती बुआ ने एकदम साफ़ साफ़ बोल दिया
" और का,.... कुल नेग ये लेंगी, तो दूल्हे क लौंड़ा कौन घोंटेगा , ये भी तो इसी का काम है "
रामपुर वाली भौजी तो सिर्फ अपने भाई गप्पू के फायदे के चक्कर में रहती थीं, तो उन्होंने भी बहती नदी में हाथ धोया,
" और दूल्हे के बाद दूल्हे के सालों का भी घोंटेंगी, हमार ननद बुच्ची रानी "
सूरजु सब सुन रहे थे और बस सोच रहे थे कब ये कच्ची अमिया कुतरने को मिलेगी और अब वो टिकोरे एकदम खुले, उनके सामने थे, दरवाजा अंदर से बंद था, इमरतिया ने छत पे ताला लगा दिया था और माई ने बुच्ची और इमरतिया से बोल दिया, " खबरदार, संझा के पहले दुनो जन, दूल्हा को छोड़ के नीचे आउ और ऊपर छत पे भी रात के पहले कोई नहीं जाएगा "
पहल बुच्ची ने ही की सीधे सूरजु की गोद में, भाई की गोद में बहन नहीं बैठेगी तो कौन बैठेगा,
बुच्ची अपने जोबना कस कस के भैया के सीने पे रगड़ रही थी, एक हाथ भैया की पीठ पे था और दूसरा उसकी नेकर के अंदर और सूरजु पागलों की तह अपनी छोटी बहन को चूम रहा था, उसके गुलाबी होंठों को चूस रहा था, कभी जीभ बहन के मुंह में डाल देता तो कभी कचाक से गाल काट लेता। एक हाथ से सूरजु ने बहन की नंगी पीठ पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से उसके छोटे छोटे चूतड़ स्कर्ट उठा कर चूतड़ों का मजा ले रहे थे।
भाई की एक ऊँगली बहन की पिछवाड़े की कसी कसी दरार में धंस गयी,
बुच्ची ने जोर से सिसकी ली,
इमरतिया ने फैसला ले लिया, इस स्साली की गाँड़ भी आज फड़वा दी जायेगी, आगे की झिल्ली अभी फटेगी, और रात में पिछवाड़ा,
सूरजु से नहीं रहा गया, स्कर्ट ने भी उसकी बहन का साथ छोड़ दिया तो बुच्ची कैसे पीछे रहती, नेकर भी स्कर्ट के ऊपर चढ़ा
और दोनों फर्श पर थे गुत्थमगुथा,
बगल में ही खीर से भरा कटोरा रखा था, भरा, जड़ी बूटियों से युक्त जो खूंटे को घंटो खड़ा रखे और मन को काम भावना से भर दे,
इमरतिया ने दोनों को अलग किया,
थोड़ी देर में बुच्ची हंसती खिलखिलाती फर्श पर लेटी थी, अपने उभारों को उचकाती और इमरतिया धीरे धीरे खीर उसके जोबन पर गिरा रही थी, और फिर अपने देवर से बोली
" लो खाओ खीर, अपनी बहिनिया के दूध के कटोरों से "
“
पर बुच्ची के मन में तो सूरजु भैया थे और सावन ख़त्म होते ही जब रामपुर वाली भाभी ने बताया की सूरजु का लंगोट खुल गया है, अखाड़ा छूट गया है तो बुच्ची का इरादा पक्का हो गया और यहाँ आ के इमरतिया की संगत, रोज गानों में रगड़ाई, कोहबर की पाठशाला, और आज थोड़ी देर पहले जो उनसे कांती बूआ पर चढ़े,मामा की बातें अपनी माई के बारे में सुनी, उस से साल भर से ज्यादा छोटी थीं तब से,
बुच्ची की बुरलासा हो रही थी, पंख फड़फड़ा रहे थे
“
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