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Adultery खलिश

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Update - 40







पार्क से घर आकर मयंक ने राजीव खो फोन कर के कोचिंग का पूछा तो उसने कुछ देर में आने का बताते हुए फोन काट दिया जब तक मयंक नहाकर तैयार हो चुका था ।







बहार हार्न की आवाज सुनते ही वह बहार आया और घर के दरवाजे पर ताला लगाकर राजीव के सखथ बैठ गया ......







राजीव -"क्या हुआ ऐसा क्यूं लग रहा है जैसे किसी ने मार ली हो तेरी साले हाहहाहा "







"साले सुबह सुबह शुरू हो गया "........ मयंक ने पीछे से मुक्का मारते हुए कहा।







राजीव -"मिल आया जानवी से ?"






मयंक -"हां यार सब ठीक है उधर "






राजीव -"अगली बार मैं भी जाऊंगा और इस बार की तरह कुछ नहीं सुनने वाला"







मयंक -"अच्छा ये दद्दा को जानता है तू?"






राजीव -"दद्दा ? "






मयंक -"हां यार "






राजीव -"होगा किसी का दद्दा ..... मैं नहीं जानता"







मयंक -"अरे भोसडीके मैं किसी के दादा की बात नहीं कर रहा मैंने नाम तो सुना था इसका जब बलवीर के साथ था मैं ठीक से याद नहीं आ रहा "







राजीव -"पर तू क्यूं पूछ रहा है इसके बारे में?"







मयंक -"बलवीर को पता चल गया है मैं यहां हूं अब मारने की कोशिश करेगा पर कुछ दिन तक तो कोई हलचल नहीं होगी जितना मुझे अंदाजा है.....अब बात ये है की बलवीर के साथ ये दद्दा भी मिल गया है पर ये जानना होगा की इससे फायदा क्या होगा इसको मेरी तो कोई दुश्मनी नहीं इससे पता लगाना पड़ेगा "









राजीव -"हां तो इसमें कौन सी बडी बात है पापा जरूर जानते होगे इस दद्दा को "






मयंक -"हां यार आज चाचा से मिलते हैं फिर "







बात करते हुए ये कोचिंग तक आ चुके थे और आज शायद टाइम पर भी थे ।और चुपचाप जाकर ये अपनी अपनी जगह बैठ गये पहला पीरियड बिना किसी परेशानी के गुजर गया और तीन और गुजर जाने के बाद जो ब्रेक टाइम मिला उसमें राजीव ने मयंक से कहा.....







"यार पंडत अब तुझे तो पता चल ही गया है तो तुझसे क्या छुपाना चल जरा सुट्टा मार के आते हैं"...... राजीव ने हाथ पकड कर कहा।







मयंक -"नहीं यार तू जा मैं नही जा रहा वैसे भी ज्योग्राफी वाली मैडम का है पीरियड है और वो कुछ कहेगी आज तो मेरा मूड भी नहीं है सुनने का ।"







राजीव -"फिर मैं भी नहीं जा रहा ..... वैसे दो मिनट लगती चलता तो"






मयंक -"चल "







मयंक को पता था राजीव कोंचा करता रहेगा इसलिए वो चल दिया राजीव के साथ बहार आ गया और नुक्कड़ पर छोटी सी दुकान पर आते ही राजीव दुकान में मौजूद छोटी सी जगह से भीतर की ओर बड गया और मयंक उसके पीछे अंदर आते ही एक बडी सी जगह थी जैसे ये जगह खास उसके लिए हो जो छुपकर सिगरेट पीता है।








"बताओ दुकान बैठने जितनी जगह में है और उसके पीछे रनिंग ट्रेक है"...... मयंक ने एक पत्थर पर बैठते हुए कहा।






राजीव -"भाई लडके लोग सिगरेट तो कहीं से भी लेले पर ऐसे छुपकर पीने के लिए जगह हर जगह नहीं है ना इसलिए यहां ज्यादा भीड होती है"







खैर कुछ देर बाद राजीव की सिगरेट खत्म हुई तो ये दोनों बहार की तरफ निकल चले क्लास की तरफ बढ़ते हुए मयंक क्लास के गेट तक पहुंचा तो सामने मैडम को खडे पाया और मयंक के पीछे राजीव के मुंह से आवाज निकली..... ",लग गये बहनचो"







"बहार क्या खडे हो अंद आओ दोनों".......मैडम ने राजीव और मयंक से कहा और दोनों अपनी सीट की तरफ जाने लगे तब ही






मैडम -"ज्यादा लेट नहीं हो इसलिए अंदर आने दिया पर वहां क्या जा रहे हो यहां सबसे पहली पर बैठधा पडेगा क्योंकि मैं अपनी क्लास में कोई डिस्ट्रैक्शन नहीं चाहिए"








राजीव और मयंक तो सोच चुके थे की अंदर जाने नहीं मिलेगा पर मैडम ने अंदर आने दिया वो उसी से खुश थे तो बिना कुछ कहे चुपचाप पहली डेस्क पर आ बैठे जहां सिर्फ इफ्तिका ही बैठी थी ।






इफ्तिका -"सब ठीक है ना मयंक"....... मयंक इफ्तिका के बगल से और राजीव मयंक के बगल से बैठा था अभी क्लास शुरू हुए दस मिनट हुए थे की तब ही ये सवाल इफ्तिका ने मयंक से किया ।






मयंक -"हां सब ठीक है....पर तुमने ऐसा क्यों पूछा ?"






इफ्तिका -"बाजी ने हमसे कुछ कहा था सुबह आपके बारे में "






मयंक -"क्य क्क क्या कहा था बाजी ने?"






इफ्तिका -"हमें लगता है ये आप जानते हैं.....पर हम आपसे इतना ही कहेंगे आप हम पर विश्वास कर सकते हैं तो कोई भी दिक्कत हो तो हमारे साथ शेयर कर सकते हैं मन हल्का हो जाएगा आपका "






मयंक -"ऐसा कुछ नहीं है इफ्तिका "







मयंक के इस सपाट लहजे को देखते हुए इफ्तिका ने आगे ज्यादा कुछ ना कहा और चुपचाप बस ध्यान क्लास में लगाए रखा ।






इसके बाद धीरे-धीरे बाकी क्लास भी खत्म हुई और राजीव और मयंक निकल गये कोचिंग से







"यार पहले मुझे छोड दे घर "....... मयंक ने राजीव को उसके घर की तरफ जाते हुए देख कहा।







राजीव -"मैं कौन सा तुझे किडनैप कर रहा हूं लोंडू खाना तो खाएगा ना यहा खाली पेट रहेगा "





मयंक -"मन नहीं है यार "







राजीव -"क्यूं अच्छी लुगाई के लिए उपवास रखने लगा है क्या ?"






इसके बाद मयंक ने कुछ नहीं कहा क्योंकि वह समझ गया थ राजीव फुल मस्ती के मूड में था और वो कुछ भी कहेगा तो उसका मजाक ही बनाया जाएगा।








राजीव -"क्या हुआ पंडत तुझे कब से बुरा लगने.....याद है ना बुरा उसको ही लगता है जिसके बुर होती है "





मयंक -"अरे ऐसा कुछ नहीं है साले "







"लगता है ग्वालियर से प्लास्टिक वाली लगवाकर आया है "...... राजीव ने हंसते हुए कहा और राजीव की बात सुनकर मयंक की भी हसी निकल गई।







मयंक ने राजीव के यहां जाने से पहले अवनी और दीदी के लिए चाॅकलेट ली और घर जाकर अवनी के साथ खेला और वहां खाना खाकर राजीव उसको घर छोडकर चला गया।








अभी मयंक अपने कमरे में आया था और कपड़े चेंज कर ही रहा था की तब ही घर की बेल बजी तो वह तुरंत नीचे आया और जैसे ही गेट खोला तो सामने इफ्तिका खडी थी








"हटिए जरा ".......दरवाजा खुलते ही इफ्तिका ने मयंक से कहा








मयंक -"इफ्तिका इस वक्त यहां.....पर साक्षी का तो पता ही है वो घर नहीं है"








इफ्तिका -" हां पता है तब ही तो हम आए हैं चलिए आप हाथ मुंह धो लीजिए जब तक हम खाना लगाते हैं आपके लिए"





इफ्तिका मयंक के लिए खाना लेकर आई थी मयंक के लिए पर मयंक तो पहले ही चाची के यहां खाकर आया था ।






"आप खड़े क्यूं है बिरयानी ठंडी हो‌ जाएगी जल्दी जाएं"....... इफ्तिका ने किचिन से बर्तन लाते हुए कहा।






"तुम से साक्षी ने कहा ये करने के लिए?"....... मयंक जैसे अपने मन की शंका को दूर करना चाह रहा था उसको लग रहा था की जरूर इफ्तिका से साक्षी ने कहा होगा‌







"ऐसा नहीं है!.....हमारा मतलब है की हमने पहले ही सोच लिया था खाना लाने का और शायद आपको पता नहीं होगा की हम कल भी आए थे पर घर पर ताला लगा हुआ था और साक्षी ने भी हमको फोन करके बोला था आपके लिए खाना लाने के लिए"......... इफ्तिका ने एक सांस में ही सब कह डाला ।








"पर मैं बिरयानी नहीं खा सकता "....... मयंक ने इफ्तिका की हालत को देखते हुए कहा।







"क्यूं भला हमने अपनी जिंदगी में किसी को बिरयानी के लिए मना करते हुए नहीं देखा है"....... इफ्तिका ने बडे ही आश्चर्य से पूछा








मयंक -"पर ये बात शाकाहारी पर लागू नहीं होती "







"है अल्** हम तो भूल ही गये थे ".......... इफ्तिका ने अपने सर पर हाथ रखते हुए कहा।







अभी इन‌ लोगों की बात चल ही रही थी की तब ही घर की घंटी एक बार और बजी और मयंक ने आगे बढकर दरवाजा खोला तो सामने मैडम खडी थी टिफिन लिए हुए मयंक तो देखकर चौंक गया .....








"क्या हुआ मैं क्लास में आने नही देती तो बदला ले रहे हो ?"......जब मयंक दरवाजे पर खडा रहा तो रावी ने कहा।







"ऐसा नहीं है मेम आइए "..... मयंक ने दरवाजे से हटते हुए कहा।








पर जैसे ही रावी अंदर आई तो इफ्तिका को सोफे पर बैठा पाया पता नहीं क्यूं उसके शरीर में आग सी लग गई उसको गुस्सा क्यूं आया ये तो वह खुद नहीं जान पाई ।






रावी -"इफ्तिका तुम यहां"






इफ्तिका -"मेम हम मयंक के लिए खाना लेकर आए थे.....पर हमें याद नहीं रहा की मयंक मांसाहारी नहीं है और हम बिरयानी ले आए"






रावी -"मुझे पता नहीं था की तुम आ रही हो..... ये लो मयंक टिफिन "






रावी को ये सुनकर बडा ही अच्छा लगा की मयंक इफ्तिका का खाना नहीं खा पाएगा और उसने मयंक को टिफिन दिया पर एकदम से जाने क्या याद आ गया और एक बार फिर मन में क्रोध उमड आया और जल्दी से बहार निकल गई।......मेम के जाते ही मयंक सोफे के पास आया तो एक खाली प्लेट ,चाकू और सब्जियां रखी हुई थी।






मयंक -"ये सब क्या है"






"वो हमने सोचा आप ये तो खाएंगे नहीं तो कुछ बना ही देते हैं आपके लिए"........ इफ्तिका ने गर्दन झुकाते हुए कहा।







मयंक -"तुम्हें पता है राजीव मुझे पहले ही अपने घर ले गया था ठाने के लिए चाची ने बहुत खिला कर भेजा है"







इफ्तिका -"क्या ?.......और हम यूं ही इतनी महनत कर रहे थे वो भी खाली पेट "







मयंक -"इफ्तिका लेकिन इसकी जरूरत नहीं थी ......ठीक है चलो तुम टेबल पर बैठो मैं खाना लगाता हूं ".








इफ्तिका -"नहीं अब तो हम घर जाकर ही खा लेंगे "







मयंक -"क्या यार मैडम खाना देकर ग ई हैं खाकर तो देखें ये खाना भी तीखा ही बनाती हैं जैसे खुद है "






इस बात को सुनकर इफ्तिका के चेहरे पर मुस्कान आ गई।






इफ्तिका -"फिर साथ में खाना पड़ेगा "





मयंक -"पर मैं...






इफ्तिका -"हम कुछ नहीं कर सकते इसमें खाना पडेगा और सबसे पहले नंबर दें अपना आपके चाहने वाले कुछ ज्यादा ही हैं पूछकर ही आपकी फिक्र करेंगे"






मयंक -"ठीक है फिर यही सही और चाहने वाले की बात है तो मेरा ऐसा मानना है की चाहने और ना चाहने वाले तो बहुत होते हैं पर शुकून तो तब ही है जब हम जिसको चाहते हैं वो चाहता हो ......
Great writing ✍️ and super Great 👌 update.
Per kahani abhi aage badhi nahi hai Mitra. Iftika ghar pe baithi hai. Khali mat bhej dena. :madno: .
Awesome :applause:
 

Sanju@

Well-Known Member
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Update - 40







पार्क से घर आकर मयंक ने राजीव खो फोन कर के कोचिंग का पूछा तो उसने कुछ देर में आने का बताते हुए फोन काट दिया जब तक मयंक नहाकर तैयार हो चुका था ।







बहार हार्न की आवाज सुनते ही वह बहार आया और घर के दरवाजे पर ताला लगाकर राजीव के सखथ बैठ गया ......







राजीव -"क्या हुआ ऐसा क्यूं लग रहा है जैसे किसी ने मार ली हो तेरी साले हाहहाहा "







"साले सुबह सुबह शुरू हो गया "........ मयंक ने पीछे से मुक्का मारते हुए कहा।







राजीव -"मिल आया जानवी से ?"






मयंक -"हां यार सब ठीक है उधर "






राजीव -"अगली बार मैं भी जाऊंगा और इस बार की तरह कुछ नहीं सुनने वाला"







मयंक -"अच्छा ये दद्दा को जानता है तू?"






राजीव -"दद्दा ? "






मयंक -"हां यार "






राजीव -"होगा किसी का दद्दा ..... मैं नहीं जानता"







मयंक -"अरे भोसडीके मैं किसी के दादा की बात नहीं कर रहा मैंने नाम तो सुना था इसका जब बलवीर के साथ था मैं ठीक से याद नहीं आ रहा "







राजीव -"पर तू क्यूं पूछ रहा है इसके बारे में?"







मयंक -"बलवीर को पता चल गया है मैं यहां हूं अब मारने की कोशिश करेगा पर कुछ दिन तक तो कोई हलचल नहीं होगी जितना मुझे अंदाजा है.....अब बात ये है की बलवीर के साथ ये दद्दा भी मिल गया है पर ये जानना होगा की इससे फायदा क्या होगा इसको मेरी तो कोई दुश्मनी नहीं इससे पता लगाना पड़ेगा "









राजीव -"हां तो इसमें कौन सी बडी बात है पापा जरूर जानते होगे इस दद्दा को "






मयंक -"हां यार आज चाचा से मिलते हैं फिर "







बात करते हुए ये कोचिंग तक आ चुके थे और आज शायद टाइम पर भी थे ।और चुपचाप जाकर ये अपनी अपनी जगह बैठ गये पहला पीरियड बिना किसी परेशानी के गुजर गया और तीन और गुजर जाने के बाद जो ब्रेक टाइम मिला उसमें राजीव ने मयंक से कहा.....







"यार पंडत अब तुझे तो पता चल ही गया है तो तुझसे क्या छुपाना चल जरा सुट्टा मार के आते हैं"...... राजीव ने हाथ पकड कर कहा।







मयंक -"नहीं यार तू जा मैं नही जा रहा वैसे भी ज्योग्राफी वाली मैडम का है पीरियड है और वो कुछ कहेगी आज तो मेरा मूड भी नहीं है सुनने का ।"







राजीव -"फिर मैं भी नहीं जा रहा ..... वैसे दो मिनट लगती चलता तो"






मयंक -"चल "







मयंक को पता था राजीव कोंचा करता रहेगा इसलिए वो चल दिया राजीव के साथ बहार आ गया और नुक्कड़ पर छोटी सी दुकान पर आते ही राजीव दुकान में मौजूद छोटी सी जगह से भीतर की ओर बड गया और मयंक उसके पीछे अंदर आते ही एक बडी सी जगह थी जैसे ये जगह खास उसके लिए हो जो छुपकर सिगरेट पीता है।








"बताओ दुकान बैठने जितनी जगह में है और उसके पीछे रनिंग ट्रेक है"...... मयंक ने एक पत्थर पर बैठते हुए कहा।






राजीव -"भाई लडके लोग सिगरेट तो कहीं से भी लेले पर ऐसे छुपकर पीने के लिए जगह हर जगह नहीं है ना इसलिए यहां ज्यादा भीड होती है"







खैर कुछ देर बाद राजीव की सिगरेट खत्म हुई तो ये दोनों बहार की तरफ निकल चले क्लास की तरफ बढ़ते हुए मयंक क्लास के गेट तक पहुंचा तो सामने मैडम को खडे पाया और मयंक के पीछे राजीव के मुंह से आवाज निकली..... ",लग गये बहनचो"







"बहार क्या खडे हो अंद आओ दोनों".......मैडम ने राजीव और मयंक से कहा और दोनों अपनी सीट की तरफ जाने लगे तब ही






मैडम -"ज्यादा लेट नहीं हो इसलिए अंदर आने दिया पर वहां क्या जा रहे हो यहां सबसे पहली पर बैठधा पडेगा क्योंकि मैं अपनी क्लास में कोई डिस्ट्रैक्शन नहीं चाहिए"








राजीव और मयंक तो सोच चुके थे की अंदर जाने नहीं मिलेगा पर मैडम ने अंदर आने दिया वो उसी से खुश थे तो बिना कुछ कहे चुपचाप पहली डेस्क पर आ बैठे जहां सिर्फ इफ्तिका ही बैठी थी ।






इफ्तिका -"सब ठीक है ना मयंक"....... मयंक इफ्तिका के बगल से और राजीव मयंक के बगल से बैठा था अभी क्लास शुरू हुए दस मिनट हुए थे की तब ही ये सवाल इफ्तिका ने मयंक से किया ।






मयंक -"हां सब ठीक है....पर तुमने ऐसा क्यों पूछा ?"






इफ्तिका -"बाजी ने हमसे कुछ कहा था सुबह आपके बारे में "






मयंक -"क्य क्क क्या कहा था बाजी ने?"






इफ्तिका -"हमें लगता है ये आप जानते हैं.....पर हम आपसे इतना ही कहेंगे आप हम पर विश्वास कर सकते हैं तो कोई भी दिक्कत हो तो हमारे साथ शेयर कर सकते हैं मन हल्का हो जाएगा आपका "






मयंक -"ऐसा कुछ नहीं है इफ्तिका "







मयंक के इस सपाट लहजे को देखते हुए इफ्तिका ने आगे ज्यादा कुछ ना कहा और चुपचाप बस ध्यान क्लास में लगाए रखा ।






इसके बाद धीरे-धीरे बाकी क्लास भी खत्म हुई और राजीव और मयंक निकल गये कोचिंग से







"यार पहले मुझे छोड दे घर "....... मयंक ने राजीव को उसके घर की तरफ जाते हुए देख कहा।







राजीव -"मैं कौन सा तुझे किडनैप कर रहा हूं लोंडू खाना तो खाएगा ना यहा खाली पेट रहेगा "





मयंक -"मन नहीं है यार "







राजीव -"क्यूं अच्छी लुगाई के लिए उपवास रखने लगा है क्या ?"






इसके बाद मयंक ने कुछ नहीं कहा क्योंकि वह समझ गया थ राजीव फुल मस्ती के मूड में था और वो कुछ भी कहेगा तो उसका मजाक ही बनाया जाएगा।








राजीव -"क्या हुआ पंडत तुझे कब से बुरा लगने.....याद है ना बुरा उसको ही लगता है जिसके बुर होती है "





मयंक -"अरे ऐसा कुछ नहीं है साले "







"लगता है ग्वालियर से प्लास्टिक वाली लगवाकर आया है "...... राजीव ने हंसते हुए कहा और राजीव की बात सुनकर मयंक की भी हसी निकल गई।







मयंक ने राजीव के यहां जाने से पहले अवनी और दीदी के लिए चाॅकलेट ली और घर जाकर अवनी के साथ खेला और वहां खाना खाकर राजीव उसको घर छोडकर चला गया।








अभी मयंक अपने कमरे में आया था और कपड़े चेंज कर ही रहा था की तब ही घर की बेल बजी तो वह तुरंत नीचे आया और जैसे ही गेट खोला तो सामने इफ्तिका खडी थी








"हटिए जरा ".......दरवाजा खुलते ही इफ्तिका ने मयंक से कहा








मयंक -"इफ्तिका इस वक्त यहां.....पर साक्षी का तो पता ही है वो घर नहीं है"








इफ्तिका -" हां पता है तब ही तो हम आए हैं चलिए आप हाथ मुंह धो लीजिए जब तक हम खाना लगाते हैं आपके लिए"





इफ्तिका मयंक के लिए खाना लेकर आई थी मयंक के लिए पर मयंक तो पहले ही चाची के यहां खाकर आया था ।






"आप खड़े क्यूं है बिरयानी ठंडी हो‌ जाएगी जल्दी जाएं"....... इफ्तिका ने किचिन से बर्तन लाते हुए कहा।






"तुम से साक्षी ने कहा ये करने के लिए?"....... मयंक जैसे अपने मन की शंका को दूर करना चाह रहा था उसको लग रहा था की जरूर इफ्तिका से साक्षी ने कहा होगा‌







"ऐसा नहीं है!.....हमारा मतलब है की हमने पहले ही सोच लिया था खाना लाने का और शायद आपको पता नहीं होगा की हम कल भी आए थे पर घर पर ताला लगा हुआ था और साक्षी ने भी हमको फोन करके बोला था आपके लिए खाना लाने के लिए"......... इफ्तिका ने एक सांस में ही सब कह डाला ।








"पर मैं बिरयानी नहीं खा सकता "....... मयंक ने इफ्तिका की हालत को देखते हुए कहा।







"क्यूं भला हमने अपनी जिंदगी में किसी को बिरयानी के लिए मना करते हुए नहीं देखा है"....... इफ्तिका ने बडे ही आश्चर्य से पूछा








मयंक -"पर ये बात शाकाहारी पर लागू नहीं होती "







"है अल्** हम तो भूल ही गये थे ".......... इफ्तिका ने अपने सर पर हाथ रखते हुए कहा।







अभी इन‌ लोगों की बात चल ही रही थी की तब ही घर की घंटी एक बार और बजी और मयंक ने आगे बढकर दरवाजा खोला तो सामने मैडम खडी थी टिफिन लिए हुए मयंक तो देखकर चौंक गया .....








"क्या हुआ मैं क्लास में आने नही देती तो बदला ले रहे हो ?"......जब मयंक दरवाजे पर खडा रहा तो रावी ने कहा।







"ऐसा नहीं है मेम आइए "..... मयंक ने दरवाजे से हटते हुए कहा।








पर जैसे ही रावी अंदर आई तो इफ्तिका को सोफे पर बैठा पाया पता नहीं क्यूं उसके शरीर में आग सी लग गई उसको गुस्सा क्यूं आया ये तो वह खुद नहीं जान पाई ।






रावी -"इफ्तिका तुम यहां"






इफ्तिका -"मेम हम मयंक के लिए खाना लेकर आए थे.....पर हमें याद नहीं रहा की मयंक मांसाहारी नहीं है और हम बिरयानी ले आए"






रावी -"मुझे पता नहीं था की तुम आ रही हो..... ये लो मयंक टिफिन "






रावी को ये सुनकर बडा ही अच्छा लगा की मयंक इफ्तिका का खाना नहीं खा पाएगा और उसने मयंक को टिफिन दिया पर एकदम से जाने क्या याद आ गया और एक बार फिर मन में क्रोध उमड आया और जल्दी से बहार निकल गई।......मेम के जाते ही मयंक सोफे के पास आया तो एक खाली प्लेट ,चाकू और सब्जियां रखी हुई थी।






मयंक -"ये सब क्या है"






"वो हमने सोचा आप ये तो खाएंगे नहीं तो कुछ बना ही देते हैं आपके लिए"........ इफ्तिका ने गर्दन झुकाते हुए कहा।







मयंक -"तुम्हें पता है राजीव मुझे पहले ही अपने घर ले गया था ठाने के लिए चाची ने बहुत खिला कर भेजा है"







इफ्तिका -"क्या ?.......और हम यूं ही इतनी महनत कर रहे थे वो भी खाली पेट "







मयंक -"इफ्तिका लेकिन इसकी जरूरत नहीं थी ......ठीक है चलो तुम टेबल पर बैठो मैं खाना लगाता हूं ".








इफ्तिका -"नहीं अब तो हम घर जाकर ही खा लेंगे "







मयंक -"क्या यार मैडम खाना देकर ग ई हैं खाकर तो देखें ये खाना भी तीखा ही बनाती हैं जैसे खुद है "






इस बात को सुनकर इफ्तिका के चेहरे पर मुस्कान आ गई।






इफ्तिका -"फिर साथ में खाना पड़ेगा "





मयंक -"पर मैं...






इफ्तिका -"हम कुछ नहीं कर सकते इसमें खाना पडेगा और सबसे पहले नंबर दें अपना आपके चाहने वाले कुछ ज्यादा ही हैं पूछकर ही आपकी फिक्र करेंगे"






मयंक -"ठीक है फिर यही सही और चाहने वाले की बात है तो मेरा ऐसा मानना है की चाहने और ना चाहने वाले तो बहुत होते हैं पर शुकून तो तब ही है जब हम जिसको चाहते हैं वो चाहता हो ......
बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट हैइफ्तिका ने सही कहा है कि मयंक के चाहने वालो की संख्या बढ़ रही है इफ्तिका ,मैडम भी मयंक पर फिदा है इफ्तिका को देखकर रीवा मैडम गुस्सा हो गई और चली गई देखते हैं क्लास में क्या करती है
 

Hell Strom

🦁
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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







***********






इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......

 

Hell Strom

🦁
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174
Super update Bhai

Nice and superb update....

Nice update 🥰per kabhi to thoda jyada likh de🥺hum baccho k liye

रीत गई, इफ्तिका आई, रीवा को साथ लाई :eekdance:

Bahut hi shaandar update diya hai Hell Strom bhai.....
Nice and awesome update....

Nice update....

Mayank ke dono hatho me laddu hai Ek taraf Ravi aur dusri taraf Iftiqa. Kya baat hai? Pratiksha agle rasprad update ki

Great writing ✍️ and super Great 👌 update.
Per kahani abhi aage badhi nahi hai Mitra. Iftika ghar pe baithi hai. Khali mat bhej dena. :madno: .
Awesome :applause:

Hell Strom bhai next update kab tak aayega?

Nice update

बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट हैइफ्तिका ने सही कहा है कि मयंक के चाहने वालो की संख्या बढ़ रही है इफ्तिका ,मैडम भी मयंक पर फिदा है इफ्तिका को देखकर रीवा मैडम गुस्सा हो गई और चली गई देखते हैं क्लास में क्या करती है

good update
Update posted guyss.....do give ur reviews :declare:
 

only_me

I ÂM LÕSÉR ẞŪT.....
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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







***********






इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......

Super update Bhai
 

parkas

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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







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इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
Bahut hi badhiya update diya hai Hell Strom bhai.....
Nice and beautiful update....
 
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