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Adultery खलिश

Yasasvi3

😈Devil queen 👑
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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







***********






इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
Nice update ❣️
 

park

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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







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इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
Nice and superb update....
 

Pawan6888

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एक बेहतरीन कहानी ओर साथ मे एक बहुत अच्छा प्लॉट। जारी रखिए मित्र ऐसी कहानिया बहुत कम हे इस फोरम पर।
 
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kas1709

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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







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इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
Nice update.....
 
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Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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Update no - 41






इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।









"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।









"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।







मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....








"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।









मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "








"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।







मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "








और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।









मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"








अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "









मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "








अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "







मयंक -"क्या ?"








अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "







मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "








अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"








मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "








अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"








मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "









अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "







मयंक -"उनकी बेटी ?"







अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "







मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "








अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "









मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "










अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "










मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......







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इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"








इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "








इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "








इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "








इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "







इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"









इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "









इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "









इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।








इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "








इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"







"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।








इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..

......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।








इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"







इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
तो पूरी कहानी का बैकड्रॉप ये है, दद्दा और विष्णु के बीच की गलतफहमी।

बढ़िया।

इफ्तीका भी इश्क में गिर गई, क्या होगा जब सच का सामना करेंगी 2 गहरी दोस्त, देखेंगे हम लोग!!
 
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