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Adultery खलिश

Hell Strom

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Update no. 38





अब तक .....

मयंक ने फोन काटा और नहाने के लिए बाथरूम की तरफ बड गया। नहाने के बाद नीचे आया ओर सीधे उस कमरे में गया वहां अभी भी छोटू था बस फर्क ये था की अब वो स्कूल ड्रेस में था उसने छोटू को उस टाइम की रिकॉर्डिंग दिखाने को कहा छोटू ने वो रिकोर्डिंग चलाई और उन दोनों आदमियों को ध्यान से देखने के बाद डाइनिंग टेबल पर आ गया जहां आकर उसको पता चला नास्ता नहीं है। बीस मिनट से ज्यादा टाइम हो गया था बात किए पर अब तक चंद्र का कोई अता पता नहीं था मयंक फोन लगाने वाला था की तब ही मैंन गेट की घंटी बजी।






आगे...


मयंक रीत और जानवी के यहां आया हुआ था और यहां आकर जब जानवी ने उससे पूछा की सुबह से कहां थे तो उसे याद आया के कैसे छोटू ने उसको बताया की कुछ लोग बंगले पर नजर रखे हुए हैं और ये जानकर मयंक ने चंद्र को आने के लिए कहा और पचीस मिनट बाद घर की घंटी बजी और जब मयंक ने गेट खोला तो देखा की चंद्र खडा था मयंक को देखते ही चंद्र ने उसको गले लगाया और फिर मयंक ने उसको भी रिकोर्डिंग दिखाई पर रिकोर्डिंग देखकर चंद्र जोर से हंसने लगा।






मयंक -"रे बाबली गांड हस क्यूं रहा है"





चंद्र -"आजा तुझको दिखाता हूं"







और इतना कहने के साथ ही मयंक को चंद्र ने अपने साथ बिठाया और दोनों सीधा अस्पताल पहुंचे जो की चंद्र के चाचा का था चंद्र उसको सीधे तलघर में ले गया जहां कोई नहीं था चंद्र ने किसी को फोन मिलाया.....







"उन पांचों को लेकर तलघर में आ जाओ .....अरे चूतिए अस्पताल के तलघर में"....... इतना कहने के साथ फोन काट दिया ।






मयंक -"चल क्या रहा है साले थोडा समझा ना तो तूझे सूतना शुरू करता हूं जब से बस शांत रहने के लिए कह रहा है ना कुछ बता रहा है ना बोल रहा है बस हसे जा रहा है "







चंद्र -"शांति रख भाई अभी पता चल जाएगा"






चंद्र के मुंह से जैसे ही शांति निकला मयंक उसको मारने के लिए भागा पर चंद्र उससे बचते हुए जोर से हंसने लगा तब ही मयंक को किसी के आने का एहसास हुआ और उस तलघर में आने वाले रास्ते से एक आदमी ढरकता हुआ नीचे आया और उसके पीछे चार और ऐसे ही आते गये उन सभी को देखकर मयंक एक दम रुक गया जैसे उसको सांप सूंघ गया हो।







"ये ..ये कहां मिल गये तुझे साले"....... मयंक ने चंद्र का रुख करते हुए कहा।






चंद्र -"मिल गये बस "






ये पांचों आदमियों में से दो वही थे जो मयंक के घर पर नजर रख रहे थे इसलिए मयंक इतना चौंक गया था।







मयंक -"बहनचोदों घर पर नजर किसके कहने पर रख रहे थे "






उन दोनों को देखते हुए मयंक ने उनसे पूछा जिसके जबाब में वो दोनों चुप रहे पर तब ही मयंक के कंधे पर हाथ आया जो की चंद्र का था ।







चंद्र -"ये काम ये मेरे बंधु देख लेंगे आजा हम सुट्टा मार के आते हैं"






मयंक -"मैं ना पीता भाई सिगरेट तू जाके आ तब तक मैं इनसे उगलवाता हूं "........ आस्तीन को बाजुओं पर चढ़ाते हुए मयंक ने कहा।







"ये नहीं पता करना ये कैसे मिले.......आजा तू मत पीना मैं पीयुंगा और तू सुन लेना इनको कैसे पकडा.... इनसे मेरे आदमी उगलबा लेंगे ये किसके आदमी हैं और किसके कहने पर इन्होंने तुझ पर नजर रखी ।"....... चंद्र ने जोर देते हुए कहा।








ये दोनों बहार निकल गये और चंद्र के साथ वालो ने उन पांचों को मारना शुरू कर दिया (यहां चंद्र ने मयंक ने क्या बताया इसको राज ही रहने देते हैं) जब मयंक ने चंद्र से पूरी घटना सुनी तो उसकी हंसी निकल गई।







पर बहुत मार खाने के बाद भी उन पांचों ने कुछ नहीं बोला जब मयंक और चंद्र अंदर आए तो चंद्र के एक साथी ने बोला






"चंद्र यो ना मान रहे भाई कोई अंग ना छोडा पर मुंह नहीं खोल रहे"







मयंक -"चंद्र कोई चाकू बगेरा या कोई नुकीली चीज है?"






मयंक की बात सुनते ही एक आदमी ने उसको चाकू पकडा दिया मयंक उस चाकू को हाथ में घुमाते हुए उन पांचों में से एक के पास पहुंचा और उसके सामने हाथ करते हुए मुट्ठी खोल कर दो उंगलियां उसके सामने की ✌️ .......







"इन दो उंगली में एक को चुन "...... मयंक ने उस आदमी से कहा जो मार खाकर बैठा हुआ था।







"अरे भोसडीके नखरे दिखा रहा है.....चट्टटाक्क््कक "......जब उस आदमी ने कुछ रिस्पांस नहीं दिया तो चंद्र ने उसमें थप्पड़ लगाते हुए कहा।






और इसका नतीजा ये हुआ की उसने बडी यानी बीच वाली उंगली को चुना और अगले ही पल वो चाकू उस आदमी की दाईं आंख में जा घुसा और भयंकर चीख उस तलघर में गूंज गई आंख से निकले खून के छीटे मयंक की शर्ट पर फैल गये ये मंजर इतना भयानक था की एक बार के लिए तो चंद्र का दिल भी कांप गया और उन पांचों में बचे चार में से एक का टायलेट निकल गया ।







"पूरे कपड़े खराब कर दिए बहनचो ......अब बोलेगा खसम के एक बार चूस करेगा उंगली "......... मयंक ने घायल व्यक्ति से पूछा पर उसको तो जैसे होश ही नहीं था वो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था ।







मयंक ने उसक़ो लात मारी और दूसरे की तरफ बड गया पर तब ही मयंक का फोन बजा उसने फोन उठाया ये उन्ही काका का था जो रीत और जानवी की सोसाइटी के चौकीदार है और साथ ही छोटू इनका ही लडका है।..... मयंक ने ही इन्हें इस सोसाइटी पर चौकीदार लग वाया था जिससे वह रीत और जानवी पर नजर रख सके ।






मयंक -"हां काका "





काका -"कहां रह गये बेटा रीत बेटी का लाइब्रेरी जाने का टाइम हो गया उसके जाने के बाद आओगे एक घंटा रह गया है सिर्फ"






मयंक -"आता हूं काका "






मयंक ने फोन काटा और चंद्र की तरफ रुक करते हुए कहा ।






मयंक -"यार मुझे जरा एक जगह छुडवा दे और खेल तो तू समझ ही गया है तो बाकी चार के साथ तू खेल मुझे जाना है.....और हां अपनी टी-शर्ट दे इसने मेरी खराब कर दी ।"






चंद्र ने अपने एक साथी को भेजा मयंक को छोडने
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"भाई... भाई कहां खो गये".......जानवी ने मयंक को वर्तमान में लाते हुए कहा और मयंक भी सुबह की घटनाओं से बहार आया और जब देखा तो रीत नास्ता कर चुकी थी और अपने वर्तन उठाते हुए किचिन की तरफ बड गई मयंक भी अपना नास्ता करने लगा ।







"कहां जा रही हो रीत "....... किचिन से निकलते ही रीत अपने कमरे में गई और कमरे से एक बैग टांगें हुए बहार निकली तो मयंक ने ये सवाल पूछा।






रीत -"कहां... क्या जहां रोज जाती हूं वहीं जा रही हूं लाइब्रेरी "






जानवी -"आज तो घूमने जाना है हमें यार भईया आए हैं और तुझे लाइब्रेरी की पडी है।"






रीत -"पर ....






मयंक -"पर बर कुछ नहीं तुम हमारे साथ जाओगी बस "







इसके बाद ये तीनों काफी देर तक बहार घूमें और इन्जोए किया और शाम को पांच बजे जब वापस फ्लैट पहुंचे तो मयंक ने दोनों से जाने का कहा ।







जानवी -"क्या भाई अभी तो हमको कितनी बातें करनी हैं "






मयंक -"देख तू ऐसी दुखी होगी तो देखा नहीं जाएगा उस दिन फोन पर गुस्सा हो गई थी तो मनाने यहां आ गया क्योंकि उस दिन गुस्सा जायज़ था आखिर मैं तुझसे मिला नहीं था बहुत दिन से पर अब हम मिल लिए तूने जो कहा पूरे दिन वही किया .....पर अब जाना भी पडेगा ना यार और तो और मैं किसी को बता कर भी नहीं आया "







रीत -"ये क्या बात हुई पहले मन हुआ तो आ गये मन हुआ तो मजाक कर लिया मेरी लाइब्रेरी छुट वा दी जो मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ती और अब मन हुआ तो जा रहे हो "







मयंक -"मेरी फ्लाइट है यार रात की और कुछ घंटे पहले तो जाना ही होता है और मुझे एक आदमी से भी मिलना है और तुम्हें क्या हुआ रीत तुम तो समझदार हो और ऐसे कभी नहीं करती चाहे मैं आऊं या जाऊं फिर आज क्या हुआ "







रीत -"समझदार हूं इसलिए ही रुकने को बोल रहीं हूं.....अब रुकना हो तो रुको वरना चले जाओ मुझे क्या दिक्कत "







जानवी -"क्या है आप दोनों को अब लडने का हक भी छीन लो आप लोग मुझसे और रीत यार लडना तो मुझे था ना तू क्यूं लड रही है "






मयंक -"वाह लोगों को पढने का शौक होता है खेलने का शौक होता है किसी किसी को खाने को शौक होता है और मेरी बहन को ...मेरी बहन को लडने का शौक है "







इन दोनों से कुछ देर और बात करने के बाद मयंक ने एक चैक दिया रीत को जानवी से थोडा अलग होकर .......







"ये क्या है एक लाख का चैक मुझे क्यूं दे रहे हो ?"......रीत ने चौंकते हुए पूछा।







मयंक -"मुझे पता है तुमने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी है और उसके लिए पैसे तो चाहिए ना और ये तुम जो गैस्ट टीचर बनकर पढाती हो वो भी बंद करो और पूरा फोकस अपनी तैयारी पर रखो समझी .....जो भी सामान है पढाई के लिए वो ले आना "








रीत -"जासूसी करते हो तुम हमारी ?!...... कैसे पता सब और तैयारी शुरू की है इसी लिए पढाने जाती हूं जिससे की अपना खर्च खुद उठा सकूं वैसे भी तुम हमारे लिए बहुत कुछ कर रहे हो शायद कोई सगा भी ना करता "







मयंक -"सगा भी ना करता से क्या मतलब है?..... मैं सगा नहीं हूं क्या?"







रीत -"तुम बेशक सगे से बढकर हो पर सगे नहीं हो .....जानवी की याददाश्त चली गई और मैं नहीं जानती की अगर उसकी याददाश्त ना जाती तो जानवी तुम्हें भाई मानती या दुश्मन और असलियत में हमारा कोई रिश्ता नहीं है "







मयंक -"और अगर मैं कहूं की मैं तुमसे प्यार करता हूं फिर ....फिर तो होगा ना हमारा रिश्ता तब भी ऐसे ही कहोगी मुझसे?"







जैसे ही रीत ने मयंक के मुंह से ये सुना तो वो बहुत बुरी तरह से अचंभित हुई उसको समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहे वो







"बोलो रीत "..... मयंक ने रीत के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।







"प्यार..... तुमसे क्या मैं किसी से भी प्यार नही करती और ना करुंगी मेरा लक्ष्य है और जब तक वो लक्ष्य जब तक ना पा लूं मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती समझे ......और कभी ऐसा लगे भी तो उस ख्याल को वही मार देना ".........रीत ने मयंक के हाथों को झटकते हुए कहा।







और मयंक के भीतर जैसे एक एक नस में ये शब्द जहर का काम कर रहे थे उसका दिल ये सुनते ही जैसे धम्म इस अवाज के साथ रुक सा गया ...आंखों के सामने अंधेरा सा होने लगा और जब थोडा होस आया तो रीत जानवी का हाथ पकडे उसे गेट की तरफ ले जाने लगी । मयंक जैसे नींद से जागा और तुरंत दोनों की तफ दौडा तो जानवी भी उसकी तरफ आ रही थी मुस्कुराते हुए।







जानवी -"मुझे पता है रीत गुस्सा हो गई है ना ....आप फिकर मत करो उसको मैं मना लूंगी आप शांत मन के साथ जाओ और मैं गुस्सा भी नहीं हूं"







"तू कभी मुझसे गुस्सा मत होना जानवी कभी भी नहीं सिर्फ एक ही तो बहन है मेरी "....... मयंक ने जानवी को गले लगाते हुए कहा।








जानवी -"अरे आप कब से इतना भावुक हो गये भईया....आप रो रहें हैं?....आप रो रहे हो भईया"







"नहीं तो "........ मयंक ने जानवी को गले लगाए रखा और कहा ।







"क्या हुआ भईया "......इस बार जानवी की आवाज में घबराहट भी शामिल थी ।







"कुछ नहीं इतने दिन बाद तेरे से मिला और आज ही जा रहा हूं इसलिए आ गये आंसू अब मैं पत्थर तो हूं नहीं "...... मयंक ने आंसू पोंछते हुए कहा।






थोडा और बात करके मयंक ने वो चैक जानवी को सौंपा और उससे कहा की रीत को स्कूल जाने से रोके जिससे वह अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा सके और जानवी के जाते ही मयंक ने एक बार फिर चंद्र को फोन लगाया ।







मयंक -"वो आदमी कहां रखे हैं? ... चंद्र "







चंद्र -"वहीं तलघर में एक कमरा है उनकी पट्टी करवा कर वहीं डाल दिया था ....क्या हुआ? "







मयंक -"कुछ नहीं रात को या सुबह उनकी लाश साफ करवा देना मैं उनके पास ही जा रहा हूं "







और इतना कहते ही मयंक ने बंगले पर फोन किया और एक नौकर से गाडी , पिस्तौल के साथ एक जोडी कपड़े लाने को कहा । और खुद सोसाइटी से बहार पैदल पैदल उस जगह की तरफ चल फडा जहां गाड़ी आने वाली थी .....पर अब जब अकेला था मयंक तो ना जाने कैसे शरीर दो गुना ज्यादा बजनी महसूस होने लगा था आंखें आंसुओं को संभाल ना पा रहीं थी और जब आंसू ज्यादा हो जाते तो खुद ही पलक झपकने पर बह निकलते आंखों से.....
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बीस मिनट में गाडी आई जब तक मयंक चलते हुए या खडे होकर बस अपने मन को समझा रहा था पर पता नहीं ये भाव कैसा था जिसने ना सिर्फ दिमाग को बल्कि आत्मा को भी अपने अधीन कर लिया था ।







मयंक नौकर को हटाकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठा और गाडी अस्पताल की तरफ बढ गई।







"भड्डाक्क््् "......लात के साथ उस तलघर में मौजूद अकेले कमरे का गेट खुला और वो पांचों जो नींद में थे एक दम से हड़बड़ा कर जागे।







"नाम बता अपने मालिक "...... मयंक ने उनमें से एक के मुंह को पकड़ते हुए पूछा।







"बताया तो था सुबह भी बलवीर और दद्दा "...... पहले तो पांचों की मयंक को देखकर फट गई पर फिर जिसका मुंह पकडा था उसने हिम्मत जुटाकर कहा ।








और जबाब सुनते ही मयंक जो घुटने मोड़कर बैठा था सीधा खडा हुआ और आसपास देखने लगा तो कमरे के एक कोने में घन (हथौड़े का बडा रूप जो दीवाल आदि तोडने के लिए प्रयोग किया जाता है) वो रखा दिखाई दिया मयंक फुर्ती के साथ उसकी तरफ बढा ।









"धम्ममम ".......वो घन मयंक के हाथ मैं आते ही घूमा और दीवार में जा लगा पर अफसोस ये था दीवार और घन के बीच में उस आदमी का सिर था जिसने जबाब दिया था ।









"सालों तुमको मैं चूतिया दिखाई देता हूं क्या जिन दोनों का तुम नाम ले रहे हो उनके भेजे पांचों आदमी में सुबह पांच बजे ही बहा कर आ रहा हूं नाले में.......अब मैं तुमसे एक बार और पूछुंगा किसने भेजा है?....बताओ "......... मयंक ने चिल्लाते हुए कहा।








"हम सच कह रहे हैं भईया उनके ही आदमी है"........ दूसरे जब अपने साथी की हालत देखी जिसका सर फट चुका था और सर की नसें बिखरी डली थी तो जल्दी से बोला








"साआआआंएएएए ........आह्हहह "..........एक बार और घन घूमा और दूहरा वाला जो पैर सीधे किए हुए बैठा था उसका सीधा घुटना चूर चूर हो गया उसकी चीख उस कमरे में गूंज गई।








"हमें उसका धाम नहीं पता भाई .....बस फोन आया और उस फोन के साथ ही एक आदमी मुंह बांधे हुए आया और चार लाख दे गया तुम पर नजर रखने के और हमसे ये कसा गया की हम तुम्हारी पकड में आसानी से आ जाएं और जब पूछा जाए तो नाम बलवीर और दद्दा का लेना है।"........तीसरा वाला रोते हुए बोला








मयंक ने कमर से पिस्तौल निकाली और चार गोलियां चलीं और पांचों स्वर्ग सिधार गये ।








लेकिन अब मयंक बहुत दुबीधा में था की ऐसा कौन था जिसको उसके आने जाने का पता था और साथ ही साथ ये भी पता था की बलवीर और दद्दा क्या प्लेन कर रहे हैं और सबसे बडा सवाल उसने अपने आदमियों से बलवीर और दद्दा का नाम क्यूं कहलवाया यानी वो चाहता है की मयंक विष्णु और अनिल बलवीर और दद्दा को मार दे या दद्दा और विष्णु इन तीनों को मतलब ये पांचों ही शतरंज के प्यादे हैं ????





 

Hell Strom

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बढ़िया केमेस्ट्री है जाहन्वी और मयंक की, लेकिन ये रीत का सीन भी क्लियर करो भाई, क्या ये अब ग्वालियर वाली है, या बस ऐसे ही साइड चिक??


Interesting. AwesomeGreat and amazing writing
✍️
he'll Strom. Super update. Ye Chandra ka name kuch suna suna sa lagta hai..
Interesting. Awesome


💯💯💯🔥🔥🔥🔥🔥💥💥💥💥❤️🎊🎊🎊🎊🎊✨✨✨✨✨✨✨🔥🔥🔥

Nice and superb update.....

Bahut hi badhiya update diya hai Hell Strom bhai.....
Nice and beautiful update.....

छोटू की चौकस नजरे और मयंक साहब के खैर - ख्वाहिशमंद नेटवर्क की वजह से एक बार फिर मयंक साहब ने अपने दुश्मनों पर नकेल कस दिया ।
लेकिन मयंक साहब डायरेक्ट बकरे की मां की गर्दन दबोचने की कोशिश क्यों नही करते ? न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी । बलवीर और दद्दा कभी भी इनका बड़ा भारी नुकसान पहुंचा सकते है ।

रीत के रूप मे एक और कदरदान लड़की मिली मयंक साहब को । लड़कियों की फेहरिस्त काफी लम्बी होती जा रही है । कितनो का दिल टूटेगा और कितने लड़कियों की हाय लगेगी , यह भगवान ही जानता है ! क्योंकि साहब के दिल मे कोई और ही बसी हुई है । पर कौन ? कौन है वह लड़की ? क्या अबतक उनकी एन्ट्री स्टोरी मे हुई है ?

जानवी के सुखद भविष्य के लिए मेरी शुभकामनाएँ सदैव ही रहेगी । लेकिन रीत के सच्चे दोस्ती के भी हम कायल हो गए । रीत ने एक सच्चे दोस्त की मिसाल पेश की । बढ़िया होता जानवी की याददाश्त वापस लौट आए और एक बहादुर लड़की की तरह जीवन जीए ।

बहुत ही बेहतरीन अपडेट भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।

Bohot hi shaandaar update 😍

Mayank ke ajube khel aur uske Dosto ki avam pyar karnewalion ki lambi list. Pratiksha agle rasprad update ki

Nice update....

Nice update

Nice update....

Bhai waiting for next update
Update posted bhailog :declare: .....Do give ur reviews :heart:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Update no. 38





अब तक .....

मयंक ने फोन काटा और नहाने के लिए बाथरूम की तरफ बड गया। नहाने के बाद नीचे आया ओर सीधे उस कमरे में गया वहां अभी भी छोटू था बस फर्क ये था की अब वो स्कूल ड्रेस में था उसने छोटू को उस टाइम की रिकॉर्डिंग दिखाने को कहा छोटू ने वो रिकोर्डिंग चलाई और उन दोनों आदमियों को ध्यान से देखने के बाद डाइनिंग टेबल पर आ गया जहां आकर उसको पता चला नास्ता नहीं है। बीस मिनट से ज्यादा टाइम हो गया था बात किए पर अब तक चंद्र का कोई अता पता नहीं था मयंक फोन लगाने वाला था की तब ही मैंन गेट की घंटी बजी।






आगे...


मयंक रीत और जानवी के यहां आया हुआ था और यहां आकर जब जानवी ने उससे पूछा की सुबह से कहां थे तो उसे याद आया के कैसे छोटू ने उसको बताया की कुछ लोग बंगले पर नजर रखे हुए हैं और ये जानकर मयंक ने चंद्र को आने के लिए कहा और पचीस मिनट बाद घर की घंटी बजी और जब मयंक ने गेट खोला तो देखा की चंद्र खडा था मयंक को देखते ही चंद्र ने उसको गले लगाया और फिर मयंक ने उसको भी रिकोर्डिंग दिखाई पर रिकोर्डिंग देखकर चंद्र जोर से हंसने लगा।






मयंक -"रे बाबली गांड हस क्यूं रहा है"





चंद्र -"आजा तुझको दिखाता हूं"







और इतना कहने के साथ ही मयंक को चंद्र ने अपने साथ बिठाया और दोनों सीधा अस्पताल पहुंचे जो की चंद्र के चाचा का था चंद्र उसको सीधे तलघर में ले गया जहां कोई नहीं था चंद्र ने किसी को फोन मिलाया.....







"उन पांचों को लेकर तलघर में आ जाओ .....अरे चूतिए अस्पताल के तलघर में"....... इतना कहने के साथ फोन काट दिया ।






मयंक -"चल क्या रहा है साले थोडा समझा ना तो तूझे सूतना शुरू करता हूं जब से बस शांत रहने के लिए कह रहा है ना कुछ बता रहा है ना बोल रहा है बस हसे जा रहा है "







चंद्र -"शांति रख भाई अभी पता चल जाएगा"






चंद्र के मुंह से जैसे ही शांति निकला मयंक उसको मारने के लिए भागा पर चंद्र उससे बचते हुए जोर से हंसने लगा तब ही मयंक को किसी के आने का एहसास हुआ और उस तलघर में आने वाले रास्ते से एक आदमी ढरकता हुआ नीचे आया और उसके पीछे चार और ऐसे ही आते गये उन सभी को देखकर मयंक एक दम रुक गया जैसे उसको सांप सूंघ गया हो।







"ये ..ये कहां मिल गये तुझे साले"....... मयंक ने चंद्र का रुख करते हुए कहा।






चंद्र -"मिल गये बस "






ये पांचों आदमियों में से दो वही थे जो मयंक के घर पर नजर रख रहे थे इसलिए मयंक इतना चौंक गया था।







मयंक -"बहनचोदों घर पर नजर किसके कहने पर रख रहे थे "






उन दोनों को देखते हुए मयंक ने उनसे पूछा जिसके जबाब में वो दोनों चुप रहे पर तब ही मयंक के कंधे पर हाथ आया जो की चंद्र का था ।







चंद्र -"ये काम ये मेरे बंधु देख लेंगे आजा हम सुट्टा मार के आते हैं"






मयंक -"मैं ना पीता भाई सिगरेट तू जाके आ तब तक मैं इनसे उगलवाता हूं "........ आस्तीन को बाजुओं पर चढ़ाते हुए मयंक ने कहा।







"ये नहीं पता करना ये कैसे मिले.......आजा तू मत पीना मैं पीयुंगा और तू सुन लेना इनको कैसे पकडा.... इनसे मेरे आदमी उगलबा लेंगे ये किसके आदमी हैं और किसके कहने पर इन्होंने तुझ पर नजर रखी ।"....... चंद्र ने जोर देते हुए कहा।








ये दोनों बहार निकल गये और चंद्र के साथ वालो ने उन पांचों को मारना शुरू कर दिया (यहां चंद्र ने मयंक ने क्या बताया इसको राज ही रहने देते हैं) जब मयंक ने चंद्र से पूरी घटना सुनी तो उसकी हंसी निकल गई।







पर बहुत मार खाने के बाद भी उन पांचों ने कुछ नहीं बोला जब मयंक और चंद्र अंदर आए तो चंद्र के एक साथी ने बोला






"चंद्र यो ना मान रहे भाई कोई अंग ना छोडा पर मुंह नहीं खोल रहे"







मयंक -"चंद्र कोई चाकू बगेरा या कोई नुकीली चीज है?"






मयंक की बात सुनते ही एक आदमी ने उसको चाकू पकडा दिया मयंक उस चाकू को हाथ में घुमाते हुए उन पांचों में से एक के पास पहुंचा और उसके सामने हाथ करते हुए मुट्ठी खोल कर दो उंगलियां उसके सामने की ✌️ .......







"इन दो उंगली में एक को चुन "...... मयंक ने उस आदमी से कहा जो मार खाकर बैठा हुआ था।







"अरे भोसडीके नखरे दिखा रहा है.....चट्टटाक्क््कक "......जब उस आदमी ने कुछ रिस्पांस नहीं दिया तो चंद्र ने उसमें थप्पड़ लगाते हुए कहा।






और इसका नतीजा ये हुआ की उसने बडी यानी बीच वाली उंगली को चुना और अगले ही पल वो चाकू उस आदमी की दाईं आंख में जा घुसा और भयंकर चीख उस तलघर में गूंज गई आंख से निकले खून के छीटे मयंक की शर्ट पर फैल गये ये मंजर इतना भयानक था की एक बार के लिए तो चंद्र का दिल भी कांप गया और उन पांचों में बचे चार में से एक का टायलेट निकल गया ।







"पूरे कपड़े खराब कर दिए बहनचो ......अब बोलेगा खसम के एक बार चूस करेगा उंगली "......... मयंक ने घायल व्यक्ति से पूछा पर उसको तो जैसे होश ही नहीं था वो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था ।







मयंक ने उसक़ो लात मारी और दूसरे की तरफ बड गया पर तब ही मयंक का फोन बजा उसने फोन उठाया ये उन्ही काका का था जो रीत और जानवी की सोसाइटी के चौकीदार है और साथ ही छोटू इनका ही लडका है।..... मयंक ने ही इन्हें इस सोसाइटी पर चौकीदार लग वाया था जिससे वह रीत और जानवी पर नजर रख सके ।






मयंक -"हां काका "





काका -"कहां रह गये बेटा रीत बेटी का लाइब्रेरी जाने का टाइम हो गया उसके जाने के बाद आओगे एक घंटा रह गया है सिर्फ"






मयंक -"आता हूं काका "






मयंक ने फोन काटा और चंद्र की तरफ रुक करते हुए कहा ।






मयंक -"यार मुझे जरा एक जगह छुडवा दे और खेल तो तू समझ ही गया है तो बाकी चार के साथ तू खेल मुझे जाना है.....और हां अपनी टी-शर्ट दे इसने मेरी खराब कर दी ।"






चंद्र ने अपने एक साथी को भेजा मयंक को छोडने
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"भाई... भाई कहां खो गये".......जानवी ने मयंक को वर्तमान में लाते हुए कहा और मयंक भी सुबह की घटनाओं से बहार आया और जब देखा तो रीत नास्ता कर चुकी थी और अपने वर्तन उठाते हुए किचिन की तरफ बड गई मयंक भी अपना नास्ता करने लगा ।







"कहां जा रही हो रीत "....... किचिन से निकलते ही रीत अपने कमरे में गई और कमरे से एक बैग टांगें हुए बहार निकली तो मयंक ने ये सवाल पूछा।






रीत -"कहां... क्या जहां रोज जाती हूं वहीं जा रही हूं लाइब्रेरी "






जानवी -"आज तो घूमने जाना है हमें यार भईया आए हैं और तुझे लाइब्रेरी की पडी है।"






रीत -"पर ....






मयंक -"पर बर कुछ नहीं तुम हमारे साथ जाओगी बस "







इसके बाद ये तीनों काफी देर तक बहार घूमें और इन्जोए किया और शाम को पांच बजे जब वापस फ्लैट पहुंचे तो मयंक ने दोनों से जाने का कहा ।







जानवी -"क्या भाई अभी तो हमको कितनी बातें करनी हैं "






मयंक -"देख तू ऐसी दुखी होगी तो देखा नहीं जाएगा उस दिन फोन पर गुस्सा हो गई थी तो मनाने यहां आ गया क्योंकि उस दिन गुस्सा जायज़ था आखिर मैं तुझसे मिला नहीं था बहुत दिन से पर अब हम मिल लिए तूने जो कहा पूरे दिन वही किया .....पर अब जाना भी पडेगा ना यार और तो और मैं किसी को बता कर भी नहीं आया "







रीत -"ये क्या बात हुई पहले मन हुआ तो आ गये मन हुआ तो मजाक कर लिया मेरी लाइब्रेरी छुट वा दी जो मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ती और अब मन हुआ तो जा रहे हो "







मयंक -"मेरी फ्लाइट है यार रात की और कुछ घंटे पहले तो जाना ही होता है और मुझे एक आदमी से भी मिलना है और तुम्हें क्या हुआ रीत तुम तो समझदार हो और ऐसे कभी नहीं करती चाहे मैं आऊं या जाऊं फिर आज क्या हुआ "







रीत -"समझदार हूं इसलिए ही रुकने को बोल रहीं हूं.....अब रुकना हो तो रुको वरना चले जाओ मुझे क्या दिक्कत "







जानवी -"क्या है आप दोनों को अब लडने का हक भी छीन लो आप लोग मुझसे और रीत यार लडना तो मुझे था ना तू क्यूं लड रही है "






मयंक -"वाह लोगों को पढने का शौक होता है खेलने का शौक होता है किसी किसी को खाने को शौक होता है और मेरी बहन को ...मेरी बहन को लडने का शौक है "







इन दोनों से कुछ देर और बात करने के बाद मयंक ने एक चैक दिया रीत को जानवी से थोडा अलग होकर .......







"ये क्या है एक लाख का चैक मुझे क्यूं दे रहे हो ?"......रीत ने चौंकते हुए पूछा।







मयंक -"मुझे पता है तुमने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी है और उसके लिए पैसे तो चाहिए ना और ये तुम जो गैस्ट टीचर बनकर पढाती हो वो भी बंद करो और पूरा फोकस अपनी तैयारी पर रखो समझी .....जो भी सामान है पढाई के लिए वो ले आना "








रीत -"जासूसी करते हो तुम हमारी ?!...... कैसे पता सब और तैयारी शुरू की है इसी लिए पढाने जाती हूं जिससे की अपना खर्च खुद उठा सकूं वैसे भी तुम हमारे लिए बहुत कुछ कर रहे हो शायद कोई सगा भी ना करता "







मयंक -"सगा भी ना करता से क्या मतलब है?..... मैं सगा नहीं हूं क्या?"







रीत -"तुम बेशक सगे से बढकर हो पर सगे नहीं हो .....जानवी की याददाश्त चली गई और मैं नहीं जानती की अगर उसकी याददाश्त ना जाती तो जानवी तुम्हें भाई मानती या दुश्मन और असलियत में हमारा कोई रिश्ता नहीं है "







मयंक -"और अगर मैं कहूं की मैं तुमसे प्यार करता हूं फिर ....फिर तो होगा ना हमारा रिश्ता तब भी ऐसे ही कहोगी मुझसे?"







जैसे ही रीत ने मयंक के मुंह से ये सुना तो वो बहुत बुरी तरह से अचंभित हुई उसको समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहे वो







"बोलो रीत "..... मयंक ने रीत के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।







"प्यार..... तुमसे क्या मैं किसी से भी प्यार नही करती और ना करुंगी मेरा लक्ष्य है और जब तक वो लक्ष्य जब तक ना पा लूं मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती समझे ......और कभी ऐसा लगे भी तो उस ख्याल को वही मार देना ".........रीत ने मयंक के हाथों को झटकते हुए कहा।







और मयंक के भीतर जैसे एक एक नस में ये शब्द जहर का काम कर रहे थे उसका दिल ये सुनते ही जैसे धम्म इस अवाज के साथ रुक सा गया ...आंखों के सामने अंधेरा सा होने लगा और जब थोडा होस आया तो रीत जानवी का हाथ पकडे उसे गेट की तरफ ले जाने लगी । मयंक जैसे नींद से जागा और तुरंत दोनों की तफ दौडा तो जानवी भी उसकी तरफ आ रही थी मुस्कुराते हुए।







जानवी -"मुझे पता है रीत गुस्सा हो गई है ना ....आप फिकर मत करो उसको मैं मना लूंगी आप शांत मन के साथ जाओ और मैं गुस्सा भी नहीं हूं"







"तू कभी मुझसे गुस्सा मत होना जानवी कभी भी नहीं सिर्फ एक ही तो बहन है मेरी "....... मयंक ने जानवी को गले लगाते हुए कहा।








जानवी -"अरे आप कब से इतना भावुक हो गये भईया....आप रो रहें हैं?....आप रो रहे हो भईया"







"नहीं तो "........ मयंक ने जानवी को गले लगाए रखा और कहा ।







"क्या हुआ भईया "......इस बार जानवी की आवाज में घबराहट भी शामिल थी ।







"कुछ नहीं इतने दिन बाद तेरे से मिला और आज ही जा रहा हूं इसलिए आ गये आंसू अब मैं पत्थर तो हूं नहीं "...... मयंक ने आंसू पोंछते हुए कहा।






थोडा और बात करके मयंक ने वो चैक जानवी को सौंपा और उससे कहा की रीत को स्कूल जाने से रोके जिससे वह अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा सके और जानवी के जाते ही मयंक ने एक बार फिर चंद्र को फोन लगाया ।







मयंक -"वो आदमी कहां रखे हैं? ... चंद्र "







चंद्र -"वहीं तलघर में एक कमरा है उनकी पट्टी करवा कर वहीं डाल दिया था ....क्या हुआ? "







मयंक -"कुछ नहीं रात को या सुबह उनकी लाश साफ करवा देना मैं उनके पास ही जा रहा हूं "







और इतना कहते ही मयंक ने बंगले पर फोन किया और एक नौकर से गाडी , पिस्तौल के साथ एक जोडी कपड़े लाने को कहा । और खुद सोसाइटी से बहार पैदल पैदल उस जगह की तरफ चल फडा जहां गाड़ी आने वाली थी .....पर अब जब अकेला था मयंक तो ना जाने कैसे शरीर दो गुना ज्यादा बजनी महसूस होने लगा था आंखें आंसुओं को संभाल ना पा रहीं थी और जब आंसू ज्यादा हो जाते तो खुद ही पलक झपकने पर बह निकलते आंखों से.....
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बीस मिनट में गाडी आई जब तक मयंक चलते हुए या खडे होकर बस अपने मन को समझा रहा था पर पता नहीं ये भाव कैसा था जिसने ना सिर्फ दिमाग को बल्कि आत्मा को भी अपने अधीन कर लिया था ।







मयंक नौकर को हटाकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठा और गाडी अस्पताल की तरफ बढ गई।







"भड्डाक्क््् "......लात के साथ उस तलघर में मौजूद अकेले कमरे का गेट खुला और वो पांचों जो नींद में थे एक दम से हड़बड़ा कर जागे।







"नाम बता अपने मालिक "...... मयंक ने उनमें से एक के मुंह को पकड़ते हुए पूछा।







"बताया तो था सुबह भी बलवीर और दद्दा "...... पहले तो पांचों की मयंक को देखकर फट गई पर फिर जिसका मुंह पकडा था उसने हिम्मत जुटाकर कहा ।








और जबाब सुनते ही मयंक जो घुटने मोड़कर बैठा था सीधा खडा हुआ और आसपास देखने लगा तो कमरे के एक कोने में घन (हथौड़े का बडा रूप जो दीवाल आदि तोडने के लिए प्रयोग किया जाता है) वो रखा दिखाई दिया मयंक फुर्ती के साथ उसकी तरफ बढा ।









"धम्ममम ".......वो घन मयंक के हाथ मैं आते ही घूमा और दीवार में जा लगा पर अफसोस ये था दीवार और घन के बीच में उस आदमी का सिर था जिसने जबाब दिया था ।









"सालों तुमको मैं चूतिया दिखाई देता हूं क्या जिन दोनों का तुम नाम ले रहे हो उनके भेजे पांचों आदमी में सुबह पांच बजे ही बहा कर आ रहा हूं नाले में.......अब मैं तुमसे एक बार और पूछुंगा किसने भेजा है?....बताओ "......... मयंक ने चिल्लाते हुए कहा।








"हम सच कह रहे हैं भईया उनके ही आदमी है"........ दूसरे जब अपने साथी की हालत देखी जिसका सर फट चुका था और सर की नसें बिखरी डली थी तो जल्दी से बोला








"साआआआंएएएए ........आह्हहह "..........एक बार और घन घूमा और दूहरा वाला जो पैर सीधे किए हुए बैठा था उसका सीधा घुटना चूर चूर हो गया उसकी चीख उस कमरे में गूंज गई।








"हमें उसका धाम नहीं पता भाई .....बस फोन आया और उस फोन के साथ ही एक आदमी मुंह बांधे हुए आया और चार लाख दे गया तुम पर नजर रखने के और हमसे ये कसा गया की हम तुम्हारी पकड में आसानी से आ जाएं और जब पूछा जाए तो नाम बलवीर और दद्दा का लेना है।"........तीसरा वाला रोते हुए बोला








मयंक ने कमर से पिस्तौल निकाली और चार गोलियां चलीं और पांचों स्वर्ग सिधार गये ।








लेकिन अब मयंक बहुत दुबीधा में था की ऐसा कौन था जिसको उसके आने जाने का पता था और साथ ही साथ ये भी पता था की बलवीर और दद्दा क्या प्लेन कर रहे हैं और सबसे बडा सवाल उसने अपने आदमियों से बलवीर और दद्दा का नाम क्यूं कहलवाया यानी वो चाहता है की मयंक विष्णु और अनिल बलवीर और दद्दा को मार दे या दद्दा और विष्णु इन तीनों को मतलब ये पांचों ही शतरंज के प्यादे हैं ????
Awesome 👌 update and great 👍 👌 story theme. Maja aagaya. Mayank meet ko chahta hai. To uske sath kya lauda hai jo use college me hai bhai???.
 

Yasasvi3

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Update no. 38





अब तक .....

मयंक ने फोन काटा और नहाने के लिए बाथरूम की तरफ बड गया। नहाने के बाद नीचे आया ओर सीधे उस कमरे में गया वहां अभी भी छोटू था बस फर्क ये था की अब वो स्कूल ड्रेस में था उसने छोटू को उस टाइम की रिकॉर्डिंग दिखाने को कहा छोटू ने वो रिकोर्डिंग चलाई और उन दोनों आदमियों को ध्यान से देखने के बाद डाइनिंग टेबल पर आ गया जहां आकर उसको पता चला नास्ता नहीं है। बीस मिनट से ज्यादा टाइम हो गया था बात किए पर अब तक चंद्र का कोई अता पता नहीं था मयंक फोन लगाने वाला था की तब ही मैंन गेट की घंटी बजी।






आगे...


मयंक रीत और जानवी के यहां आया हुआ था और यहां आकर जब जानवी ने उससे पूछा की सुबह से कहां थे तो उसे याद आया के कैसे छोटू ने उसको बताया की कुछ लोग बंगले पर नजर रखे हुए हैं और ये जानकर मयंक ने चंद्र को आने के लिए कहा और पचीस मिनट बाद घर की घंटी बजी और जब मयंक ने गेट खोला तो देखा की चंद्र खडा था मयंक को देखते ही चंद्र ने उसको गले लगाया और फिर मयंक ने उसको भी रिकोर्डिंग दिखाई पर रिकोर्डिंग देखकर चंद्र जोर से हंसने लगा।






मयंक -"रे बाबली गांड हस क्यूं रहा है"





चंद्र -"आजा तुझको दिखाता हूं"







और इतना कहने के साथ ही मयंक को चंद्र ने अपने साथ बिठाया और दोनों सीधा अस्पताल पहुंचे जो की चंद्र के चाचा का था चंद्र उसको सीधे तलघर में ले गया जहां कोई नहीं था चंद्र ने किसी को फोन मिलाया.....







"उन पांचों को लेकर तलघर में आ जाओ .....अरे चूतिए अस्पताल के तलघर में"....... इतना कहने के साथ फोन काट दिया ।






मयंक -"चल क्या रहा है साले थोडा समझा ना तो तूझे सूतना शुरू करता हूं जब से बस शांत रहने के लिए कह रहा है ना कुछ बता रहा है ना बोल रहा है बस हसे जा रहा है "







चंद्र -"शांति रख भाई अभी पता चल जाएगा"






चंद्र के मुंह से जैसे ही शांति निकला मयंक उसको मारने के लिए भागा पर चंद्र उससे बचते हुए जोर से हंसने लगा तब ही मयंक को किसी के आने का एहसास हुआ और उस तलघर में आने वाले रास्ते से एक आदमी ढरकता हुआ नीचे आया और उसके पीछे चार और ऐसे ही आते गये उन सभी को देखकर मयंक एक दम रुक गया जैसे उसको सांप सूंघ गया हो।







"ये ..ये कहां मिल गये तुझे साले"....... मयंक ने चंद्र का रुख करते हुए कहा।






चंद्र -"मिल गये बस "






ये पांचों आदमियों में से दो वही थे जो मयंक के घर पर नजर रख रहे थे इसलिए मयंक इतना चौंक गया था।







मयंक -"बहनचोदों घर पर नजर किसके कहने पर रख रहे थे "






उन दोनों को देखते हुए मयंक ने उनसे पूछा जिसके जबाब में वो दोनों चुप रहे पर तब ही मयंक के कंधे पर हाथ आया जो की चंद्र का था ।







चंद्र -"ये काम ये मेरे बंधु देख लेंगे आजा हम सुट्टा मार के आते हैं"






मयंक -"मैं ना पीता भाई सिगरेट तू जाके आ तब तक मैं इनसे उगलवाता हूं "........ आस्तीन को बाजुओं पर चढ़ाते हुए मयंक ने कहा।







"ये नहीं पता करना ये कैसे मिले.......आजा तू मत पीना मैं पीयुंगा और तू सुन लेना इनको कैसे पकडा.... इनसे मेरे आदमी उगलबा लेंगे ये किसके आदमी हैं और किसके कहने पर इन्होंने तुझ पर नजर रखी ।"....... चंद्र ने जोर देते हुए कहा।








ये दोनों बहार निकल गये और चंद्र के साथ वालो ने उन पांचों को मारना शुरू कर दिया (यहां चंद्र ने मयंक ने क्या बताया इसको राज ही रहने देते हैं) जब मयंक ने चंद्र से पूरी घटना सुनी तो उसकी हंसी निकल गई।







पर बहुत मार खाने के बाद भी उन पांचों ने कुछ नहीं बोला जब मयंक और चंद्र अंदर आए तो चंद्र के एक साथी ने बोला






"चंद्र यो ना मान रहे भाई कोई अंग ना छोडा पर मुंह नहीं खोल रहे"







मयंक -"चंद्र कोई चाकू बगेरा या कोई नुकीली चीज है?"






मयंक की बात सुनते ही एक आदमी ने उसको चाकू पकडा दिया मयंक उस चाकू को हाथ में घुमाते हुए उन पांचों में से एक के पास पहुंचा और उसके सामने हाथ करते हुए मुट्ठी खोल कर दो उंगलियां उसके सामने की ✌️ .......







"इन दो उंगली में एक को चुन "...... मयंक ने उस आदमी से कहा जो मार खाकर बैठा हुआ था।







"अरे भोसडीके नखरे दिखा रहा है.....चट्टटाक्क््कक "......जब उस आदमी ने कुछ रिस्पांस नहीं दिया तो चंद्र ने उसमें थप्पड़ लगाते हुए कहा।






और इसका नतीजा ये हुआ की उसने बडी यानी बीच वाली उंगली को चुना और अगले ही पल वो चाकू उस आदमी की दाईं आंख में जा घुसा और भयंकर चीख उस तलघर में गूंज गई आंख से निकले खून के छीटे मयंक की शर्ट पर फैल गये ये मंजर इतना भयानक था की एक बार के लिए तो चंद्र का दिल भी कांप गया और उन पांचों में बचे चार में से एक का टायलेट निकल गया ।







"पूरे कपड़े खराब कर दिए बहनचो ......अब बोलेगा खसम के एक बार चूस करेगा उंगली "......... मयंक ने घायल व्यक्ति से पूछा पर उसको तो जैसे होश ही नहीं था वो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था ।







मयंक ने उसक़ो लात मारी और दूसरे की तरफ बड गया पर तब ही मयंक का फोन बजा उसने फोन उठाया ये उन्ही काका का था जो रीत और जानवी की सोसाइटी के चौकीदार है और साथ ही छोटू इनका ही लडका है।..... मयंक ने ही इन्हें इस सोसाइटी पर चौकीदार लग वाया था जिससे वह रीत और जानवी पर नजर रख सके ।






मयंक -"हां काका "





काका -"कहां रह गये बेटा रीत बेटी का लाइब्रेरी जाने का टाइम हो गया उसके जाने के बाद आओगे एक घंटा रह गया है सिर्फ"






मयंक -"आता हूं काका "






मयंक ने फोन काटा और चंद्र की तरफ रुक करते हुए कहा ।






मयंक -"यार मुझे जरा एक जगह छुडवा दे और खेल तो तू समझ ही गया है तो बाकी चार के साथ तू खेल मुझे जाना है.....और हां अपनी टी-शर्ट दे इसने मेरी खराब कर दी ।"






चंद्र ने अपने एक साथी को भेजा मयंक को छोडने
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"भाई... भाई कहां खो गये".......जानवी ने मयंक को वर्तमान में लाते हुए कहा और मयंक भी सुबह की घटनाओं से बहार आया और जब देखा तो रीत नास्ता कर चुकी थी और अपने वर्तन उठाते हुए किचिन की तरफ बड गई मयंक भी अपना नास्ता करने लगा ।







"कहां जा रही हो रीत "....... किचिन से निकलते ही रीत अपने कमरे में गई और कमरे से एक बैग टांगें हुए बहार निकली तो मयंक ने ये सवाल पूछा।






रीत -"कहां... क्या जहां रोज जाती हूं वहीं जा रही हूं लाइब्रेरी "






जानवी -"आज तो घूमने जाना है हमें यार भईया आए हैं और तुझे लाइब्रेरी की पडी है।"






रीत -"पर ....






मयंक -"पर बर कुछ नहीं तुम हमारे साथ जाओगी बस "







इसके बाद ये तीनों काफी देर तक बहार घूमें और इन्जोए किया और शाम को पांच बजे जब वापस फ्लैट पहुंचे तो मयंक ने दोनों से जाने का कहा ।







जानवी -"क्या भाई अभी तो हमको कितनी बातें करनी हैं "






मयंक -"देख तू ऐसी दुखी होगी तो देखा नहीं जाएगा उस दिन फोन पर गुस्सा हो गई थी तो मनाने यहां आ गया क्योंकि उस दिन गुस्सा जायज़ था आखिर मैं तुझसे मिला नहीं था बहुत दिन से पर अब हम मिल लिए तूने जो कहा पूरे दिन वही किया .....पर अब जाना भी पडेगा ना यार और तो और मैं किसी को बता कर भी नहीं आया "







रीत -"ये क्या बात हुई पहले मन हुआ तो आ गये मन हुआ तो मजाक कर लिया मेरी लाइब्रेरी छुट वा दी जो मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ती और अब मन हुआ तो जा रहे हो "







मयंक -"मेरी फ्लाइट है यार रात की और कुछ घंटे पहले तो जाना ही होता है और मुझे एक आदमी से भी मिलना है और तुम्हें क्या हुआ रीत तुम तो समझदार हो और ऐसे कभी नहीं करती चाहे मैं आऊं या जाऊं फिर आज क्या हुआ "







रीत -"समझदार हूं इसलिए ही रुकने को बोल रहीं हूं.....अब रुकना हो तो रुको वरना चले जाओ मुझे क्या दिक्कत "







जानवी -"क्या है आप दोनों को अब लडने का हक भी छीन लो आप लोग मुझसे और रीत यार लडना तो मुझे था ना तू क्यूं लड रही है "






मयंक -"वाह लोगों को पढने का शौक होता है खेलने का शौक होता है किसी किसी को खाने को शौक होता है और मेरी बहन को ...मेरी बहन को लडने का शौक है "







इन दोनों से कुछ देर और बात करने के बाद मयंक ने एक चैक दिया रीत को जानवी से थोडा अलग होकर .......







"ये क्या है एक लाख का चैक मुझे क्यूं दे रहे हो ?"......रीत ने चौंकते हुए पूछा।







मयंक -"मुझे पता है तुमने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी है और उसके लिए पैसे तो चाहिए ना और ये तुम जो गैस्ट टीचर बनकर पढाती हो वो भी बंद करो और पूरा फोकस अपनी तैयारी पर रखो समझी .....जो भी सामान है पढाई के लिए वो ले आना "








रीत -"जासूसी करते हो तुम हमारी ?!...... कैसे पता सब और तैयारी शुरू की है इसी लिए पढाने जाती हूं जिससे की अपना खर्च खुद उठा सकूं वैसे भी तुम हमारे लिए बहुत कुछ कर रहे हो शायद कोई सगा भी ना करता "







मयंक -"सगा भी ना करता से क्या मतलब है?..... मैं सगा नहीं हूं क्या?"







रीत -"तुम बेशक सगे से बढकर हो पर सगे नहीं हो .....जानवी की याददाश्त चली गई और मैं नहीं जानती की अगर उसकी याददाश्त ना जाती तो जानवी तुम्हें भाई मानती या दुश्मन और असलियत में हमारा कोई रिश्ता नहीं है "







मयंक -"और अगर मैं कहूं की मैं तुमसे प्यार करता हूं फिर ....फिर तो होगा ना हमारा रिश्ता तब भी ऐसे ही कहोगी मुझसे?"







जैसे ही रीत ने मयंक के मुंह से ये सुना तो वो बहुत बुरी तरह से अचंभित हुई उसको समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहे वो







"बोलो रीत "..... मयंक ने रीत के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।







"प्यार..... तुमसे क्या मैं किसी से भी प्यार नही करती और ना करुंगी मेरा लक्ष्य है और जब तक वो लक्ष्य जब तक ना पा लूं मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती समझे ......और कभी ऐसा लगे भी तो उस ख्याल को वही मार देना ".........रीत ने मयंक के हाथों को झटकते हुए कहा।







और मयंक के भीतर जैसे एक एक नस में ये शब्द जहर का काम कर रहे थे उसका दिल ये सुनते ही जैसे धम्म इस अवाज के साथ रुक सा गया ...आंखों के सामने अंधेरा सा होने लगा और जब थोडा होस आया तो रीत जानवी का हाथ पकडे उसे गेट की तरफ ले जाने लगी । मयंक जैसे नींद से जागा और तुरंत दोनों की तफ दौडा तो जानवी भी उसकी तरफ आ रही थी मुस्कुराते हुए।







जानवी -"मुझे पता है रीत गुस्सा हो गई है ना ....आप फिकर मत करो उसको मैं मना लूंगी आप शांत मन के साथ जाओ और मैं गुस्सा भी नहीं हूं"







"तू कभी मुझसे गुस्सा मत होना जानवी कभी भी नहीं सिर्फ एक ही तो बहन है मेरी "....... मयंक ने जानवी को गले लगाते हुए कहा।








जानवी -"अरे आप कब से इतना भावुक हो गये भईया....आप रो रहें हैं?....आप रो रहे हो भईया"







"नहीं तो "........ मयंक ने जानवी को गले लगाए रखा और कहा ।







"क्या हुआ भईया "......इस बार जानवी की आवाज में घबराहट भी शामिल थी ।







"कुछ नहीं इतने दिन बाद तेरे से मिला और आज ही जा रहा हूं इसलिए आ गये आंसू अब मैं पत्थर तो हूं नहीं "...... मयंक ने आंसू पोंछते हुए कहा।






थोडा और बात करके मयंक ने वो चैक जानवी को सौंपा और उससे कहा की रीत को स्कूल जाने से रोके जिससे वह अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा सके और जानवी के जाते ही मयंक ने एक बार फिर चंद्र को फोन लगाया ।







मयंक -"वो आदमी कहां रखे हैं? ... चंद्र "







चंद्र -"वहीं तलघर में एक कमरा है उनकी पट्टी करवा कर वहीं डाल दिया था ....क्या हुआ? "







मयंक -"कुछ नहीं रात को या सुबह उनकी लाश साफ करवा देना मैं उनके पास ही जा रहा हूं "







और इतना कहते ही मयंक ने बंगले पर फोन किया और एक नौकर से गाडी , पिस्तौल के साथ एक जोडी कपड़े लाने को कहा । और खुद सोसाइटी से बहार पैदल पैदल उस जगह की तरफ चल फडा जहां गाड़ी आने वाली थी .....पर अब जब अकेला था मयंक तो ना जाने कैसे शरीर दो गुना ज्यादा बजनी महसूस होने लगा था आंखें आंसुओं को संभाल ना पा रहीं थी और जब आंसू ज्यादा हो जाते तो खुद ही पलक झपकने पर बह निकलते आंखों से.....
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बीस मिनट में गाडी आई जब तक मयंक चलते हुए या खडे होकर बस अपने मन को समझा रहा था पर पता नहीं ये भाव कैसा था जिसने ना सिर्फ दिमाग को बल्कि आत्मा को भी अपने अधीन कर लिया था ।







मयंक नौकर को हटाकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठा और गाडी अस्पताल की तरफ बढ गई।







"भड्डाक्क््् "......लात के साथ उस तलघर में मौजूद अकेले कमरे का गेट खुला और वो पांचों जो नींद में थे एक दम से हड़बड़ा कर जागे।







"नाम बता अपने मालिक "...... मयंक ने उनमें से एक के मुंह को पकड़ते हुए पूछा।







"बताया तो था सुबह भी बलवीर और दद्दा "...... पहले तो पांचों की मयंक को देखकर फट गई पर फिर जिसका मुंह पकडा था उसने हिम्मत जुटाकर कहा ।








और जबाब सुनते ही मयंक जो घुटने मोड़कर बैठा था सीधा खडा हुआ और आसपास देखने लगा तो कमरे के एक कोने में घन (हथौड़े का बडा रूप जो दीवाल आदि तोडने के लिए प्रयोग किया जाता है) वो रखा दिखाई दिया मयंक फुर्ती के साथ उसकी तरफ बढा ।









"धम्ममम ".......वो घन मयंक के हाथ मैं आते ही घूमा और दीवार में जा लगा पर अफसोस ये था दीवार और घन के बीच में उस आदमी का सिर था जिसने जबाब दिया था ।









"सालों तुमको मैं चूतिया दिखाई देता हूं क्या जिन दोनों का तुम नाम ले रहे हो उनके भेजे पांचों आदमी में सुबह पांच बजे ही बहा कर आ रहा हूं नाले में.......अब मैं तुमसे एक बार और पूछुंगा किसने भेजा है?....बताओ "......... मयंक ने चिल्लाते हुए कहा।








"हम सच कह रहे हैं भईया उनके ही आदमी है"........ दूसरे जब अपने साथी की हालत देखी जिसका सर फट चुका था और सर की नसें बिखरी डली थी तो जल्दी से बोला








"साआआआंएएएए ........आह्हहह "..........एक बार और घन घूमा और दूहरा वाला जो पैर सीधे किए हुए बैठा था उसका सीधा घुटना चूर चूर हो गया उसकी चीख उस कमरे में गूंज गई।








"हमें उसका धाम नहीं पता भाई .....बस फोन आया और उस फोन के साथ ही एक आदमी मुंह बांधे हुए आया और चार लाख दे गया तुम पर नजर रखने के और हमसे ये कसा गया की हम तुम्हारी पकड में आसानी से आ जाएं और जब पूछा जाए तो नाम बलवीर और दद्दा का लेना है।"........तीसरा वाला रोते हुए बोला








मयंक ने कमर से पिस्तौल निकाली और चार गोलियां चलीं और पांचों स्वर्ग सिधार गये ।








लेकिन अब मयंक बहुत दुबीधा में था की ऐसा कौन था जिसको उसके आने जाने का पता था और साथ ही साथ ये भी पता था की बलवीर और दद्दा क्या प्लेन कर रहे हैं और सबसे बडा सवाल उसने अपने आदमियों से बलवीर और दद्दा का नाम क्यूं कहलवाया यानी वो चाहता है की मयंक विष्णु और अनिल बलवीर और दद्दा को मार दे या दद्दा और विष्णु इन तीनों को मतलब ये पांचों ही शतरंज के प्यादे हैं ????
Nice update... Per thoda timely diya kare☺
 

park

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Update no. 38





अब तक .....

मयंक ने फोन काटा और नहाने के लिए बाथरूम की तरफ बड गया। नहाने के बाद नीचे आया ओर सीधे उस कमरे में गया वहां अभी भी छोटू था बस फर्क ये था की अब वो स्कूल ड्रेस में था उसने छोटू को उस टाइम की रिकॉर्डिंग दिखाने को कहा छोटू ने वो रिकोर्डिंग चलाई और उन दोनों आदमियों को ध्यान से देखने के बाद डाइनिंग टेबल पर आ गया जहां आकर उसको पता चला नास्ता नहीं है। बीस मिनट से ज्यादा टाइम हो गया था बात किए पर अब तक चंद्र का कोई अता पता नहीं था मयंक फोन लगाने वाला था की तब ही मैंन गेट की घंटी बजी।






आगे...


मयंक रीत और जानवी के यहां आया हुआ था और यहां आकर जब जानवी ने उससे पूछा की सुबह से कहां थे तो उसे याद आया के कैसे छोटू ने उसको बताया की कुछ लोग बंगले पर नजर रखे हुए हैं और ये जानकर मयंक ने चंद्र को आने के लिए कहा और पचीस मिनट बाद घर की घंटी बजी और जब मयंक ने गेट खोला तो देखा की चंद्र खडा था मयंक को देखते ही चंद्र ने उसको गले लगाया और फिर मयंक ने उसको भी रिकोर्डिंग दिखाई पर रिकोर्डिंग देखकर चंद्र जोर से हंसने लगा।






मयंक -"रे बाबली गांड हस क्यूं रहा है"





चंद्र -"आजा तुझको दिखाता हूं"







और इतना कहने के साथ ही मयंक को चंद्र ने अपने साथ बिठाया और दोनों सीधा अस्पताल पहुंचे जो की चंद्र के चाचा का था चंद्र उसको सीधे तलघर में ले गया जहां कोई नहीं था चंद्र ने किसी को फोन मिलाया.....







"उन पांचों को लेकर तलघर में आ जाओ .....अरे चूतिए अस्पताल के तलघर में"....... इतना कहने के साथ फोन काट दिया ।






मयंक -"चल क्या रहा है साले थोडा समझा ना तो तूझे सूतना शुरू करता हूं जब से बस शांत रहने के लिए कह रहा है ना कुछ बता रहा है ना बोल रहा है बस हसे जा रहा है "







चंद्र -"शांति रख भाई अभी पता चल जाएगा"






चंद्र के मुंह से जैसे ही शांति निकला मयंक उसको मारने के लिए भागा पर चंद्र उससे बचते हुए जोर से हंसने लगा तब ही मयंक को किसी के आने का एहसास हुआ और उस तलघर में आने वाले रास्ते से एक आदमी ढरकता हुआ नीचे आया और उसके पीछे चार और ऐसे ही आते गये उन सभी को देखकर मयंक एक दम रुक गया जैसे उसको सांप सूंघ गया हो।







"ये ..ये कहां मिल गये तुझे साले"....... मयंक ने चंद्र का रुख करते हुए कहा।






चंद्र -"मिल गये बस "






ये पांचों आदमियों में से दो वही थे जो मयंक के घर पर नजर रख रहे थे इसलिए मयंक इतना चौंक गया था।







मयंक -"बहनचोदों घर पर नजर किसके कहने पर रख रहे थे "






उन दोनों को देखते हुए मयंक ने उनसे पूछा जिसके जबाब में वो दोनों चुप रहे पर तब ही मयंक के कंधे पर हाथ आया जो की चंद्र का था ।







चंद्र -"ये काम ये मेरे बंधु देख लेंगे आजा हम सुट्टा मार के आते हैं"






मयंक -"मैं ना पीता भाई सिगरेट तू जाके आ तब तक मैं इनसे उगलवाता हूं "........ आस्तीन को बाजुओं पर चढ़ाते हुए मयंक ने कहा।







"ये नहीं पता करना ये कैसे मिले.......आजा तू मत पीना मैं पीयुंगा और तू सुन लेना इनको कैसे पकडा.... इनसे मेरे आदमी उगलबा लेंगे ये किसके आदमी हैं और किसके कहने पर इन्होंने तुझ पर नजर रखी ।"....... चंद्र ने जोर देते हुए कहा।








ये दोनों बहार निकल गये और चंद्र के साथ वालो ने उन पांचों को मारना शुरू कर दिया (यहां चंद्र ने मयंक ने क्या बताया इसको राज ही रहने देते हैं) जब मयंक ने चंद्र से पूरी घटना सुनी तो उसकी हंसी निकल गई।







पर बहुत मार खाने के बाद भी उन पांचों ने कुछ नहीं बोला जब मयंक और चंद्र अंदर आए तो चंद्र के एक साथी ने बोला






"चंद्र यो ना मान रहे भाई कोई अंग ना छोडा पर मुंह नहीं खोल रहे"







मयंक -"चंद्र कोई चाकू बगेरा या कोई नुकीली चीज है?"






मयंक की बात सुनते ही एक आदमी ने उसको चाकू पकडा दिया मयंक उस चाकू को हाथ में घुमाते हुए उन पांचों में से एक के पास पहुंचा और उसके सामने हाथ करते हुए मुट्ठी खोल कर दो उंगलियां उसके सामने की ✌️ .......







"इन दो उंगली में एक को चुन "...... मयंक ने उस आदमी से कहा जो मार खाकर बैठा हुआ था।







"अरे भोसडीके नखरे दिखा रहा है.....चट्टटाक्क््कक "......जब उस आदमी ने कुछ रिस्पांस नहीं दिया तो चंद्र ने उसमें थप्पड़ लगाते हुए कहा।






और इसका नतीजा ये हुआ की उसने बडी यानी बीच वाली उंगली को चुना और अगले ही पल वो चाकू उस आदमी की दाईं आंख में जा घुसा और भयंकर चीख उस तलघर में गूंज गई आंख से निकले खून के छीटे मयंक की शर्ट पर फैल गये ये मंजर इतना भयानक था की एक बार के लिए तो चंद्र का दिल भी कांप गया और उन पांचों में बचे चार में से एक का टायलेट निकल गया ।







"पूरे कपड़े खराब कर दिए बहनचो ......अब बोलेगा खसम के एक बार चूस करेगा उंगली "......... मयंक ने घायल व्यक्ति से पूछा पर उसको तो जैसे होश ही नहीं था वो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था ।







मयंक ने उसक़ो लात मारी और दूसरे की तरफ बड गया पर तब ही मयंक का फोन बजा उसने फोन उठाया ये उन्ही काका का था जो रीत और जानवी की सोसाइटी के चौकीदार है और साथ ही छोटू इनका ही लडका है।..... मयंक ने ही इन्हें इस सोसाइटी पर चौकीदार लग वाया था जिससे वह रीत और जानवी पर नजर रख सके ।






मयंक -"हां काका "





काका -"कहां रह गये बेटा रीत बेटी का लाइब्रेरी जाने का टाइम हो गया उसके जाने के बाद आओगे एक घंटा रह गया है सिर्फ"






मयंक -"आता हूं काका "






मयंक ने फोन काटा और चंद्र की तरफ रुक करते हुए कहा ।






मयंक -"यार मुझे जरा एक जगह छुडवा दे और खेल तो तू समझ ही गया है तो बाकी चार के साथ तू खेल मुझे जाना है.....और हां अपनी टी-शर्ट दे इसने मेरी खराब कर दी ।"






चंद्र ने अपने एक साथी को भेजा मयंक को छोडने
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"भाई... भाई कहां खो गये".......जानवी ने मयंक को वर्तमान में लाते हुए कहा और मयंक भी सुबह की घटनाओं से बहार आया और जब देखा तो रीत नास्ता कर चुकी थी और अपने वर्तन उठाते हुए किचिन की तरफ बड गई मयंक भी अपना नास्ता करने लगा ।







"कहां जा रही हो रीत "....... किचिन से निकलते ही रीत अपने कमरे में गई और कमरे से एक बैग टांगें हुए बहार निकली तो मयंक ने ये सवाल पूछा।






रीत -"कहां... क्या जहां रोज जाती हूं वहीं जा रही हूं लाइब्रेरी "






जानवी -"आज तो घूमने जाना है हमें यार भईया आए हैं और तुझे लाइब्रेरी की पडी है।"






रीत -"पर ....






मयंक -"पर बर कुछ नहीं तुम हमारे साथ जाओगी बस "







इसके बाद ये तीनों काफी देर तक बहार घूमें और इन्जोए किया और शाम को पांच बजे जब वापस फ्लैट पहुंचे तो मयंक ने दोनों से जाने का कहा ।







जानवी -"क्या भाई अभी तो हमको कितनी बातें करनी हैं "






मयंक -"देख तू ऐसी दुखी होगी तो देखा नहीं जाएगा उस दिन फोन पर गुस्सा हो गई थी तो मनाने यहां आ गया क्योंकि उस दिन गुस्सा जायज़ था आखिर मैं तुझसे मिला नहीं था बहुत दिन से पर अब हम मिल लिए तूने जो कहा पूरे दिन वही किया .....पर अब जाना भी पडेगा ना यार और तो और मैं किसी को बता कर भी नहीं आया "







रीत -"ये क्या बात हुई पहले मन हुआ तो आ गये मन हुआ तो मजाक कर लिया मेरी लाइब्रेरी छुट वा दी जो मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ती और अब मन हुआ तो जा रहे हो "







मयंक -"मेरी फ्लाइट है यार रात की और कुछ घंटे पहले तो जाना ही होता है और मुझे एक आदमी से भी मिलना है और तुम्हें क्या हुआ रीत तुम तो समझदार हो और ऐसे कभी नहीं करती चाहे मैं आऊं या जाऊं फिर आज क्या हुआ "







रीत -"समझदार हूं इसलिए ही रुकने को बोल रहीं हूं.....अब रुकना हो तो रुको वरना चले जाओ मुझे क्या दिक्कत "







जानवी -"क्या है आप दोनों को अब लडने का हक भी छीन लो आप लोग मुझसे और रीत यार लडना तो मुझे था ना तू क्यूं लड रही है "






मयंक -"वाह लोगों को पढने का शौक होता है खेलने का शौक होता है किसी किसी को खाने को शौक होता है और मेरी बहन को ...मेरी बहन को लडने का शौक है "







इन दोनों से कुछ देर और बात करने के बाद मयंक ने एक चैक दिया रीत को जानवी से थोडा अलग होकर .......







"ये क्या है एक लाख का चैक मुझे क्यूं दे रहे हो ?"......रीत ने चौंकते हुए पूछा।







मयंक -"मुझे पता है तुमने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी है और उसके लिए पैसे तो चाहिए ना और ये तुम जो गैस्ट टीचर बनकर पढाती हो वो भी बंद करो और पूरा फोकस अपनी तैयारी पर रखो समझी .....जो भी सामान है पढाई के लिए वो ले आना "








रीत -"जासूसी करते हो तुम हमारी ?!...... कैसे पता सब और तैयारी शुरू की है इसी लिए पढाने जाती हूं जिससे की अपना खर्च खुद उठा सकूं वैसे भी तुम हमारे लिए बहुत कुछ कर रहे हो शायद कोई सगा भी ना करता "







मयंक -"सगा भी ना करता से क्या मतलब है?..... मैं सगा नहीं हूं क्या?"







रीत -"तुम बेशक सगे से बढकर हो पर सगे नहीं हो .....जानवी की याददाश्त चली गई और मैं नहीं जानती की अगर उसकी याददाश्त ना जाती तो जानवी तुम्हें भाई मानती या दुश्मन और असलियत में हमारा कोई रिश्ता नहीं है "







मयंक -"और अगर मैं कहूं की मैं तुमसे प्यार करता हूं फिर ....फिर तो होगा ना हमारा रिश्ता तब भी ऐसे ही कहोगी मुझसे?"







जैसे ही रीत ने मयंक के मुंह से ये सुना तो वो बहुत बुरी तरह से अचंभित हुई उसको समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहे वो







"बोलो रीत "..... मयंक ने रीत के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा।







"प्यार..... तुमसे क्या मैं किसी से भी प्यार नही करती और ना करुंगी मेरा लक्ष्य है और जब तक वो लक्ष्य जब तक ना पा लूं मैं किसी से प्यार नहीं कर सकती समझे ......और कभी ऐसा लगे भी तो उस ख्याल को वही मार देना ".........रीत ने मयंक के हाथों को झटकते हुए कहा।







और मयंक के भीतर जैसे एक एक नस में ये शब्द जहर का काम कर रहे थे उसका दिल ये सुनते ही जैसे धम्म इस अवाज के साथ रुक सा गया ...आंखों के सामने अंधेरा सा होने लगा और जब थोडा होस आया तो रीत जानवी का हाथ पकडे उसे गेट की तरफ ले जाने लगी । मयंक जैसे नींद से जागा और तुरंत दोनों की तफ दौडा तो जानवी भी उसकी तरफ आ रही थी मुस्कुराते हुए।







जानवी -"मुझे पता है रीत गुस्सा हो गई है ना ....आप फिकर मत करो उसको मैं मना लूंगी आप शांत मन के साथ जाओ और मैं गुस्सा भी नहीं हूं"







"तू कभी मुझसे गुस्सा मत होना जानवी कभी भी नहीं सिर्फ एक ही तो बहन है मेरी "....... मयंक ने जानवी को गले लगाते हुए कहा।








जानवी -"अरे आप कब से इतना भावुक हो गये भईया....आप रो रहें हैं?....आप रो रहे हो भईया"







"नहीं तो "........ मयंक ने जानवी को गले लगाए रखा और कहा ।







"क्या हुआ भईया "......इस बार जानवी की आवाज में घबराहट भी शामिल थी ।







"कुछ नहीं इतने दिन बाद तेरे से मिला और आज ही जा रहा हूं इसलिए आ गये आंसू अब मैं पत्थर तो हूं नहीं "...... मयंक ने आंसू पोंछते हुए कहा।






थोडा और बात करके मयंक ने वो चैक जानवी को सौंपा और उससे कहा की रीत को स्कूल जाने से रोके जिससे वह अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा सके और जानवी के जाते ही मयंक ने एक बार फिर चंद्र को फोन लगाया ।







मयंक -"वो आदमी कहां रखे हैं? ... चंद्र "







चंद्र -"वहीं तलघर में एक कमरा है उनकी पट्टी करवा कर वहीं डाल दिया था ....क्या हुआ? "







मयंक -"कुछ नहीं रात को या सुबह उनकी लाश साफ करवा देना मैं उनके पास ही जा रहा हूं "







और इतना कहते ही मयंक ने बंगले पर फोन किया और एक नौकर से गाडी , पिस्तौल के साथ एक जोडी कपड़े लाने को कहा । और खुद सोसाइटी से बहार पैदल पैदल उस जगह की तरफ चल फडा जहां गाड़ी आने वाली थी .....पर अब जब अकेला था मयंक तो ना जाने कैसे शरीर दो गुना ज्यादा बजनी महसूस होने लगा था आंखें आंसुओं को संभाल ना पा रहीं थी और जब आंसू ज्यादा हो जाते तो खुद ही पलक झपकने पर बह निकलते आंखों से.....
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बीस मिनट में गाडी आई जब तक मयंक चलते हुए या खडे होकर बस अपने मन को समझा रहा था पर पता नहीं ये भाव कैसा था जिसने ना सिर्फ दिमाग को बल्कि आत्मा को भी अपने अधीन कर लिया था ।







मयंक नौकर को हटाकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठा और गाडी अस्पताल की तरफ बढ गई।







"भड्डाक्क््् "......लात के साथ उस तलघर में मौजूद अकेले कमरे का गेट खुला और वो पांचों जो नींद में थे एक दम से हड़बड़ा कर जागे।







"नाम बता अपने मालिक "...... मयंक ने उनमें से एक के मुंह को पकड़ते हुए पूछा।







"बताया तो था सुबह भी बलवीर और दद्दा "...... पहले तो पांचों की मयंक को देखकर फट गई पर फिर जिसका मुंह पकडा था उसने हिम्मत जुटाकर कहा ।








और जबाब सुनते ही मयंक जो घुटने मोड़कर बैठा था सीधा खडा हुआ और आसपास देखने लगा तो कमरे के एक कोने में घन (हथौड़े का बडा रूप जो दीवाल आदि तोडने के लिए प्रयोग किया जाता है) वो रखा दिखाई दिया मयंक फुर्ती के साथ उसकी तरफ बढा ।









"धम्ममम ".......वो घन मयंक के हाथ मैं आते ही घूमा और दीवार में जा लगा पर अफसोस ये था दीवार और घन के बीच में उस आदमी का सिर था जिसने जबाब दिया था ।









"सालों तुमको मैं चूतिया दिखाई देता हूं क्या जिन दोनों का तुम नाम ले रहे हो उनके भेजे पांचों आदमी में सुबह पांच बजे ही बहा कर आ रहा हूं नाले में.......अब मैं तुमसे एक बार और पूछुंगा किसने भेजा है?....बताओ "......... मयंक ने चिल्लाते हुए कहा।








"हम सच कह रहे हैं भईया उनके ही आदमी है"........ दूसरे जब अपने साथी की हालत देखी जिसका सर फट चुका था और सर की नसें बिखरी डली थी तो जल्दी से बोला








"साआआआंएएएए ........आह्हहह "..........एक बार और घन घूमा और दूहरा वाला जो पैर सीधे किए हुए बैठा था उसका सीधा घुटना चूर चूर हो गया उसकी चीख उस कमरे में गूंज गई।








"हमें उसका धाम नहीं पता भाई .....बस फोन आया और उस फोन के साथ ही एक आदमी मुंह बांधे हुए आया और चार लाख दे गया तुम पर नजर रखने के और हमसे ये कसा गया की हम तुम्हारी पकड में आसानी से आ जाएं और जब पूछा जाए तो नाम बलवीर और दद्दा का लेना है।"........तीसरा वाला रोते हुए बोला








मयंक ने कमर से पिस्तौल निकाली और चार गोलियां चलीं और पांचों स्वर्ग सिधार गये ।








लेकिन अब मयंक बहुत दुबीधा में था की ऐसा कौन था जिसको उसके आने जाने का पता था और साथ ही साथ ये भी पता था की बलवीर और दद्दा क्या प्लेन कर रहे हैं और सबसे बडा सवाल उसने अपने आदमियों से बलवीर और दद्दा का नाम क्यूं कहलवाया यानी वो चाहता है की मयंक विष्णु और अनिल बलवीर और दद्दा को मार दे या दद्दा और विष्णु इन तीनों को मतलब ये पांचों ही शतरंज के प्यादे हैं ????
Nice and superb update.....
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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ये तो दिल लगाते ही कोड़े पड़े हो गया मयंक के साथ।

रीत उससे नफरत क्यों करती है वो समझ आ रहा है, लेकिन अब तो सुधर गया है न, फिर भी? खैर आप किसी से जबरदस्ती तो प्यार करवा नही सकते।

वैसे अब ये नया कौन आ गया है जो मयंक के पीछे हैं? वो आतंकवादी, लेकिन उनको इतना कैसे पता चलेगा की मयंक के पीछे कौन पड़ा है और उसे ही फसाना है पकड़े जाने पर। ये कोई पहचान वाला ही है, पक्का।
 
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