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वक़्त की धूप में जलती रही ये ज़िंदगी,
छाँव मिली भी तो कुछ पल की ही बंदगी…
हर मोड़ पे इम्तिहान लिखता रहा वक़्त,
और खामोश रह के सहती रही ज़िंदगी…
कभी हँसी के पीछे छुपा लेती है दर्द,
कभी आँसुओं में खुद को बहा ले ज़िंदगी…
वक़्त कहता रहा — “चल, अभी सफ़र बाकी है”,
और थक के हर बार रुकना चाहे ज़िंदगी…
कुछ अधूरी ख्वाहिशें, कुछ टूटे हुए ख़्वाब,
इन ही टुकड़ों से खुद को सजाती रही ज़िंदगी…
वक़्त ने छीना भी बहुत, दिया भी बहुत कुछ,
इसी हिसाब में उलझती रही ये ज़िंदगी…
आख़िर एक दिन दोनों ही थम जाएंगे कहीं,
वक़्त भी रुक जाएगा… ठहर जाएगी ज़िंदगी…

