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Shayari — अनकही बातें — kuch ehsaas jo lafzon mein bayaan na hue...

Silent lover

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रूह से मोहब्बत है तेरी, जिस्म की चाहत नहीं,
तू पास ना भी हो, फिर भी तेरी कमी लगती नहीं।

तेरा नाम साँसों में घुला है ऐसे, जैसे दुआ में असर,
ये इश्क़ दिखता नहीं, पर हर पल महसूस होता है अंदर।

तू मिले ना मिले, ये किस्मत की बात होगी,

पर तुझसे जो रूह का रिश्ता है… वो हर जनम साथ होगी।
 

vakharia

ℜ𝔬𝔪 𝔅𝔞𝔯𝔬
Supreme
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पापा
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मेरा ताज मेरी मिनार - पापा
रविवार को भी सोमवार - पापा
तपता घिसता पिसता जलता
शिकन का नामोनिशान न पापा
नाइन टू फाइव ट्वेंटी फॉर सेवन पापा
मेरी पुलिस मेरा अस्पताल पापा

ऑफिस की टेंशन, ज़िंदगी से युद्ध
घर में ऐसे आएंगे जैसे गौतम बुद्ध

कोई एक पानी का गिलास दे दे उसी में खुश हो जाते है
ये पापा है.. अपने बच्चे की मुस्कान पर बिक जाते है

फर्ज निभाना कर्ज चुकाना
अपने शौक अधूरे छोड़
बच्चों के सपने सजाते है..
क्रेडिट लेने का शौक नहीं इन्हें
बस झोली भरते जाते है..
जेब में फूटी कौड़ी न हो फिर भी
पॉकेट मनी का जुगाड़ कर लाते है

ये मम्मियाँ हरदम ले जाती है सारा क्रेडिट
पापा तो डेबिट में भी ताली बजाते है

ये पापा है.. अपने बच्चे की मुस्कान पर बिक जाते है
 

Silent lover

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हम overthink नहीं करते,
हम बस हर एहसास को ज़रूरत से ज़्यादा जी लेते हैं…
जहाँ लोग एक पल में आगे बढ़ जाते हैं,
वहीं हम उसी पल में बार-बार टूटते रहते हैं।

दिमाग हर बात का जवाब चाहता है,
और दिल बस थोड़ा सा यकीन…
पर जब दोनों लड़ते हैं,
तो इंसान अंदर से चुपचाप बिखर जाता है।

रात को नींद नहीं आती हमें,
क्योंकि सवाल खत्म ही नहीं होते…
और दिन में मुस्कुरा देते हैं,
ताकि कोई ये ना समझ पाए कि अंदर कितना शोर है।

सब कहते हैं “इतना मत सोचो”,
पर कोई ये नहीं समझता…
कि ये सोच हमारी आदत नहीं,

हमारी मजबूरी बन चुकी है।
 
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जब अपने ही रास्ता रोकने लगें,
तो ठोकरों से ज़्यादा दिल टूटता है…
जिन हाथों ने हौसला देना था,
वही खामोशी से पीछे खींचने लगें,
तो दर्द जीत का नहीं… रिश्तों का हारना लगता है।
सबसे ज़्यादा चोट तब लगती है,
जब गैर नहीं… अपने ही तुम्हें छोटा साबित करने में लगे हों,
और तुम मुस्कुराकर भी अंदर से बिखरते रहो।
कभी सोचा नहीं था,
कि मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही
अपने ही इम्तिहान बन जाएंगे…
अब समझ आया—
कभी-कभी कामयाबी का रास्ता अकेले ही तय करना पड़ता है,
क्योंकि साथ चलने वाले ही मोड़ पर छोड़ जाते हैं।
 
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नज़रें मिली थीं… पर रूहों का रिश्ता अधूरा रह गया,
तू चाहता था मैं बदल जाऊँ… और मैं खुद में पूरा रह गया।

तूने चाहा मुझे अपने हिसाब से लिखना,
पर मैं वो लफ़्ज़ था… जो किसी किताब में क़ैद नहीं होता।
हम झुक जाते तो शायद तू साथ रहता,
पर फिर आईने में खुद से नज़रें मिलाना मुश्किल होता।

तूने रिश्ता चाहा शर्तों के साथ,
और मैंने इश्क़ चुना…
अपनी असलियत के साथ।

अब अगर दूर हूँ… तो ये हार नहीं मेरी,

बस खुद को खोने से बचा लिया मैंने, ये जीत है मेरी। 🔥
 
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माँ की मजबूरी भी क्या अजीब इम्तिहान होती है,
खुद टूटकर भी बेटे के लिए हमेशा मजबूत जान होती है…

वो डांटती है, रोकती है, कभी सख़्त भी बन जाती है,
पर हर सख़्ती के पीछे उसकी दुआ छुपी रह जाती है…

रातों को खुद रोकर, दिन में मुस्कुराना पड़ता है,
बेटे के सपनों के लिए खुद को भूल जाना पड़ता है…

उसे गलत रास्तों से खींच लाने के लिए,
कभी उसकी नज़र में बुरी भी बन जाना पड़ता है…

माँ की ये जंग कोई देख नहीं पाता,

वो हर दर्द चुपचाप सहकर भी बस अपने बच्चे को सही बनाना चाहती है… 💔
 
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