जब अपने ही रास्ता रोकने लगें,
तो ठोकरों से ज़्यादा दिल टूटता है…
जिन हाथों ने हौसला देना था,
वही खामोशी से पीछे खींचने लगें,
तो दर्द जीत का नहीं… रिश्तों का हारना लगता है।
सबसे ज़्यादा चोट तब लगती है,
जब गैर नहीं… अपने ही तुम्हें छोटा साबित करने में लगे हों,
और तुम मुस्कुराकर भी अंदर से बिखरते रहो।
कभी सोचा नहीं था,
कि मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही
अपने ही इम्तिहान बन जाएंगे…
अब समझ आया—
कभी-कभी कामयाबी का रास्ता अकेले ही तय करना पड़ता है,
क्योंकि साथ चलने वाले ही मोड़ पर छोड़ जाते हैं।