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Shayari — अनकही बातें — kuch ehsaas jo lafzon mein bayaan na hue...

Silent lover

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कुछ पन्ने अक्सर कोरे ही रह जाते हैं,

कुछ किस्से बस आँखों से बह जाते हैं।
लबों तक आकर जो रुक गई सरहद पर,
वही सबसे गहरी अनकही बातें होती हैं।
वो बातें...
जो ज़िक्र में नहीं, बस फिक्र में होती हैं,
जो महफ़िल में नहीं, बस तन्हाई के ज़िक्र में होती हैं।
कभी किसी की याद में धुंधली सी मुस्कुराहट,
कभी बिन बात के ही आँखों में आई वो आहट।
अजीब बोझ होता है इन खामोश लफ़्जों का,
न ये ज़ुबान से निकलते हैं, न दिल से उतरते हैं।
जैसे पुराने संदूक में रखी कोई कीमती चीज़,
इन्हें हम दुनिया की नज़रों से छुपा कर रखते हैं।
कभी सोचा है?
कि क्यों कुछ कहना इतना मुश्किल होता है?
शायद इसलिए, क्योंकि सुनने वाला हर कोई नहीं होता।
भीड़ तो बहुत है इस शोर भरे ज़माने में,
पर खामोशी को पढ़ने वाला... कोई एक ही होता है।
वो जो हमने कभी किसी से कहा ही नहीं,
वो जो दर्द हमने कभी सहा ही नहीं।
वो 'अलविदा' जो गले में ही अटक गया,
वो 'शुक्रिया' जो वक्त पर भटक गया।
ये अनकही बातें, बस एक अहसास हैं,
जो दूर होकर भी सबसे ज़्यादा पास हैं।
कलम जब उठती है, तो बस यही बिखरती हैं,
कागज़ पर उतरकर ये फिर से सँवरती हैं।
तो चलो, आज इन बातों को थोड़ा हक देते हैं,
जो दब गई थीं भीतर, उन्हें एक दस्तक देते हैं।
क्योंकि जो लफ़्ज़ों में नहीं आ सका, वही तो रूह है,
वही मेरी नज़्म

है, और वही मेरी गुफ़्तगू है।
 

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हर बात बताई नहीं जाती, पर महसूस की जा सकती है,
मोहब्बत में खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है.
 

vihan27

“मृत्योः भयम् सर्वदुःखस्य मूलम्।”
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हर घड़ी चश्में खरीदार में रहने के लिए,
कुछ हुनर चाहिए बाजार में रहने के लिए,

ऐसी मजबूरी नहीं है कि पैदल चलूं मैं,
खुद को गर्माता हूं रफ्तार में रहने के लिए,

मैंने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे,
मसखरे बन गए दरबार में रहने के लिए,

अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है,

लोग नंगे हो जाते हैं अखबार में रहने के लिए।
 

vihan27

“मृत्योः भयम् सर्वदुःखस्य मूलम्।”
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सबके अपने सत्य है सबके अपने झूठ,
कोई कहता लाभ इन्हें किसी को लगती लूट,
जिसमें मैं का है फायदा और मैं का है नुकसान,

मैं का बढ़ता मान देखकर मैं की जलती जान।
 

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सबका अपना सत्य है, तो सबका अपना नूर,
क्यों देखें बस फायदा, क्यों पालें ये गरूर?
जहाँ स्वार्थ की दीवारें गिरकर मिट्टी हो जाती हैं,
वहीं 'मैं' की संकीर्णता भी 'हम' में खो जाती है।
जो तेरा है वो मेरा हो, ये तो बस इक खेल है,
सच्ची जीत तो वो है जहाँ दिलों का मेल है।
किसी के बढ़ते मान से क्यों जलती तेरी जान है?
तू भी तो उसी समंदर का एक कतरा, एक इंसान है।
लाभ-हानि के तराजू को ज़रा किनारे रख के देख,
दूसरों की खुशी में अपनी मुस्कुराहट चख के देख।
जब तक 'मैं' का पर्दा है, सत्य नज़र न आएगा,
जिस दिन 'मैं' को त्याग देगा, तू खुदा

बन जाएगा।
 

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तूम्हारे बाद मेरा कोन बनेगा हमदर्द,
मैंने अपने भी खो दीए..
तूम्हे पाने कि जीद मे ....…!!!
 
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“वो चुप सी औरत”

वो एक औरत है…
भीड़ में भी अकेली,
चेहरे पे मुस्कान रखती,
पर आँखें हर रोज़ रो लेती।

उसकी खामोशी में शोर है,
जैसे टूटा हुआ कोई ज़ोर है,
किसी ने पूछा नहीं हाल उसका,
सबको बस उसका “ठीक हूँ” मंज़ूर है।

रातों को नींद नहीं आती उसे,
ख्यालों का साया सताता है,
वो तकिये में मुँह छुपा के रोती है,
पर सुबह फिर हँसना पड़ जाता है।

उसने भी सपने देखे थे कभी,
रंगीन, मासूम, बेखौफ से,
पर जिम्मेदारियों की धूप में,
सब जल गए धीरे-धीरे, खामोश से।

हर रिश्ता उसने निभाया है,
खुद को हर बार भुलाया है,
दूसरों के लिए जीते-जीते,
उसने खुद को कहीं खो दिया है।

कोई नहीं देखता उसके ज़ख्म,
क्योंकि वो दिखाती नहीं,
वो टूटती है हर दिन अंदर से,
पर दुनिया को बताती नहीं।

वो एक औरत है…
जिसकी कहानी अधूरी नहीं, बस अनसुनी है,
जिसका दर्द कम नहीं, बस दिखाई नहीं देता,
और जिसकी खामोशी… सबसे ज़्यादा चीखती है।
 
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तेरे न होने का मुझको मलाल

एक तरफ, तू मेरा क्यूँ न हुआ

ये सवाल एक तरफ?

यकीन मान मैं खुश हूँ मगर तू

जब सँग था वो पल वो दिन वो

महीना वो साल एक तरफ

गुलाब पर ये चटक रंग चढ़ेगा

कैसे भला मैं बैठा सोचने रख

के गुलाल एक तरफ,

जहान भर के हैं मंजर मेरी

नजर में मगर उस एक शख्स

का दिल में ख्याल एक तरफ,

हजार शिकवे-शिकायत मुझे हैं

तुझसे मगर वो कुछ दिनों की

तेरी देखभाल एक तरफ.
 
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आपकी दोस्ती में कुछ तो बात है…
आप पास न भी हों, फिर भी साथ लगते हैं।
दुनिया के शोर में भी,
आपकी खामोशी मुझे सबसे ज़्यादा समझ आती है…

और शायद इसीलिए, आप दोस्त कम — मेरे करीबी ज़्यादा लगती हैं।
 
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बचपन से ही ठोकरों का सिलसिला रहा,
हर मोड़ पे ज़िंदगी ने मुझको आज़माया रहा।
जब ज़रूरत थी अपने साथ की सबसे ज़्यादा,
अजीब वक़्त था — हर अपना पराया रहा।
ख्वाब आँखों में थे, पर नींद ही छिन गई,
मैं जागता रहा और मुकद्दर सोता रहा।
हाथ थामने वाला कोई मिला ही नहीं,
मैं गिरता रहा, खुद ही संभलता रहा।
अब इस मुकाम पे खड़ा हूँ, समझ नहीं आता,
किधर जाऊँ — हर रास्ता धुंधलाता रहा।
दिल में सवालों का समंदर उमड़ता है,
जवाब ढूंढते-ढूंढते मैं खुद ही खोता रहा।
अब तो बस खामोशी से दोस्ती कर ली है,

क्योंकि हर दर्द लफ़्ज़ों में अधूरा सा रहा।
 
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