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कुछ पन्ने अक्सर कोरे ही रह जाते हैं,
कुछ किस्से बस आँखों से बह जाते हैं।
लबों तक आकर जो रुक गई सरहद पर,
वही सबसे गहरी अनकही बातें होती हैं।
वो बातें...
जो ज़िक्र में नहीं, बस फिक्र में होती हैं,
जो महफ़िल में नहीं, बस तन्हाई के ज़िक्र में होती हैं।
कभी किसी की याद में धुंधली सी मुस्कुराहट,
कभी बिन बात के ही आँखों में आई वो आहट।
अजीब बोझ होता है इन खामोश लफ़्जों का,
न ये ज़ुबान से निकलते हैं, न दिल से उतरते हैं।
जैसे पुराने संदूक में रखी कोई कीमती चीज़,
इन्हें हम दुनिया की नज़रों से छुपा कर रखते हैं।
कभी सोचा है?
कि क्यों कुछ कहना इतना मुश्किल होता है?
शायद इसलिए, क्योंकि सुनने वाला हर कोई नहीं होता।
भीड़ तो बहुत है इस शोर भरे ज़माने में,
पर खामोशी को पढ़ने वाला... कोई एक ही होता है।
वो जो हमने कभी किसी से कहा ही नहीं,
वो जो दर्द हमने कभी सहा ही नहीं।
वो 'अलविदा' जो गले में ही अटक गया,
वो 'शुक्रिया' जो वक्त पर भटक गया।
ये अनकही बातें, बस एक अहसास हैं,
जो दूर होकर भी सबसे ज़्यादा पास हैं।
कलम जब उठती है, तो बस यही बिखरती हैं,
कागज़ पर उतरकर ये फिर से सँवरती हैं।
तो चलो, आज इन बातों को थोड़ा हक देते हैं,
जो दब गई थीं भीतर, उन्हें एक दस्तक देते हैं।
क्योंकि जो लफ़्ज़ों में नहीं आ सका, वही तो रूह है,
वही मेरी नज़्म
है, और वही मेरी गुफ़्तगू है।



