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अधांतर
मानसी घर के गेट से अंदर दाखिल हुई.. रिमझिम बारिश की बूंदों को अपने ऊपर झेलते हुए, हाथ में अपना बैग संभालते हुए और आँखों का चश्मा ठीक करते हुए वो आस-पास के बगीचे को अपनी आँखों में बसाने लगी थी..
गेट से लिपटी हुई सायली की बेल नाज़ुक सफेद फूलों से पूरी तरह लदी हुई थी.. बैंगनी और लाल रंग का कृष्ण कमल बेवजह ही शर्माया हुआ सा लग रहा था.. प्राजक्ता के वो केसरी डंठल वाले सफेद रेशमी फूल मानो उसे देखकर खुशी से मुस्कुरा रहे थे.. बिट्टी तो पीले धमक फूलों का श्रृंगार करके किसी गौरी की तरह सजी हुई थी.. बीच में ही कहीं से उग आया तेरडा जैसे अपनी पिचकारी से लाल और गुलाबी रंग उड़ा रहा था.. घर के खंभे का सहारा लेकर ऊपर तक चढ़ी मोगरे की बेल सफेद चमकते सितारों की तरह टिमटिमा रही थी.. सावन की वो हल्की सी धूप बारिश की बूंदों से फिसलकर इन नाज़ुक फूलों को और भी चमका रही थी.. पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे सारा आसमान एक सुगंधी सांस ले रहा हो..
तभी झूले पर बैठी ओवि दौड़ती हुई उसके पास आई..
"क्या बुआ, कितनी राह देखने लगाई तुमने? कल ही क्यों नहीं आ गई? तुम्हें पता है कल से मैं अकेले कितना बोर हो रही हूँ यहाँ?" ओवि ने मानसी पर प्यार से गुस्सा करते हुए कहा..
"अरे बाप रे, कितने सवाल पूछोगी? और ओवि मैडम शादी हो चुकी है अब तुम्हारी! ये तुम्हारा बचपना और धक्कमधुक्की अभी तक गई नहीं.. और तुम अकेली कहाँ थी? दामाद जी भी तो आए होंगे ना साथ में! और घर में आई तात्या तो हैं ही!" मानसी ने प्यार से ओवि के गाल खींचते हुए कहा..
तभी बारिश की एक तेज़ बौछार आई और दोनों भागकर जल्दी से घर के अंदर घुस गईं..
"ये देखो, आते ही तुम्हारी वजह से मैं भी भीग गई!" मानसी ओवि को लाड से डांटने लगी..
"ये सही है तुम्हारा... मैं शादी के बाद पहली बार अपने मायके आई हूँ, पर यहाँ किसी के पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है... तात्या दामाद जी को पूरा गाँव घुमाने ले गए हैं, वो रात से पहले लौटने वाले नहीं हैं... पक्का अपने सारे दोस्तों से मिलवा कर ही लाएंगे उन्हें.. और आई साहेब ने तो अपने प्यारे दामाद जी के लिए छप्पन भोग की तैयारी कर रखी है.. मुझे लगा था मेरे आने का पता चलते ही तुम दौड़कर मुझसे मिलने आओगी... पर तुम्हारे पास भी मेरे लिए टाइम नहीं है... यहाँ सबको बस अपने दामाद का ही कौतुक करना है!" ओवि झूठा गुस्सा दिखाते हुए बड़बड़ा रही थी..
तभी पल्लवी किचन से बाहर आई, "अरे मानसी! आ गई तुम! और ये क्या? तुम दोनों इतना कैसे भीग गईं? जाओ जल्दी से ऊपर जाकर कपड़े चेंज कर लो, मैं तब तक चाय बनाती हूँ.. मानसी तुम्हारे लिए खाने में क्या बनाऊं?"
"गरमागरम कांदा भजी बना लो... मस्त बारिश हो रही है... है ना बुआ?" ओवि ने अपना फरमान सुना दिया..
"नहीं भाभी, मुझे अभी कुछ नहीं खाना! मेरे लिए बस एक कप चाय बना दो.." मानसी ने कहा..
मानसी और ओवि कपड़े बदलकर आ गईं.. ओवि अपने हाथों से गूंथा हुआ मोगरे का एक ताज़ा गजरा मानसी के लंबे लेकिन अब हल्के सफेद हो चुके बालों में लगाने लगी..
"अरे, ये क्या? मोगरे का गजरा? मेरे बालों में मत लगा इसे, भाभी को दे दे..."
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मोगरे का गजरा मतलब मानसी की जान! लेकिन पिछले कई सालों से उसने कभी भूलकर भी अपने बालों में गजरा नहीं लगाया था.. मोगरा, बारिश और आदित्य... अब वो पुरानी यादें उसे बिल्कुल नहीं चाहिए थीं..
करीब पंद्रह साल पहले घटी वो घटना!
आज भी ऐसा लगता था जैसे सब कुछ अभी हुआ हो.. अगर उस वक्त आदित्य और मानसी की शादी हो गई होती, तो तात्या, मंदार दादा और पल्लवी भाभी ने आदित्य का भी बिल्कुल ऐसे ही लाड प्यार और कौतुक किया होता..
मानसी भी ओवि की तरह ही इस घर की सबसे लाडली बेटी थी! वो जो कहती, वही सबके लिए पत्थर की लकीर होती.. उसकी पढ़ाई पूरी होते ही उसके लिए बहुत अच्छे रिश्ते आने लगे थे.. लेकिन मानसी को पहले खुद के पैरों पर खड़ा होना था..
मानसी पढ़ाई में बहुत होशियार थी, और दिखने में बेहद खूबसूरत! नाज़ुक और छरहरा बदन, गोरा रंग, चंपे की कली जैसी नाक, हिरनी जैसी आँखें और लंबे घने बाल... सच में देखते ही कोई भी प्यार में पड़ जाए ऐसी ही थी वो! उसका स्वभाव भी बहुत मीठा था..
आई के गुज़र जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी.. पल्लवी भाभी ने भी उसकी हर बात मानी.. मानसी उम्र में पल्लवी से काफी छोटी थी, इसलिए वो उसे ननद की तरह नहीं बल्कि अपनी छोटी बहन की तरह ही संभालती थी..
पढ़ाई पूरी होने के बाद भी मानसी बैंक के एग्जाम्स दे रही थी.. वो जी तोड़कर पढ़ाई कर रही थी और उसमें उसे कामयाबी भी मिली.. उसे एक सरकारी बैंक में नौकरी मिल गई और गाँव के पास ही एक शहर में उसकी पोस्टिंग पी.ओ. ऑफिसर के तौर पर हो गई..
उसी ब्रांच में आदित्य का भी ब्रांच मैनेजर के तौर पर नया नया ट्रांसफर हुआ था.. आदित्य उस जगह पर बिल्कुल नया था.. उसका घर मुंबई में था.. इसलिए रोज़ उसे दो घंटे का ट्रेन का सफर करना पड़ता था..
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अक्टूबर महीने का वो पहला हफ्ता... इतने दिनों से बहुत कड़क धूप पड़ रही थी.. लेकिन उस दिन अचानक से बारिश वाला माहौल बन गया.. काले घने बादलों ने आसमान को भर दिया.. बिजली कड़कने लगी और धो धो करके मुसलाधार बारिश शुरू हो गई..
शाम तक बारिश ने इतना ज़ोर पकड़ लिया कि लगने लगा जैसे अब ट्रेन भी बंद हो जाएंगी.. टीवी पर खबरें आने लगीं.. कहीं पानी भर गया है.. कहीं बिजली गिर गई है... एक के बाद एक कई खबरें..
ब्रांच में दूर से आने वाले कर्मचारी अपना काम जल्दी जल्दी निपटा कर ट्रेन बंद होने से पहले ही ब्रांच से निकल गए.. आदित्य भी निकलने ही वाला था कि तभी किसी ने उसे बताया कि ट्रेन बहुत लेट चल रही हैं और कई ट्रेनें कैंसिल भी हो रही हैं..
मानसी का घर वहां से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर था.. उसे लेने के लिए उसका दादा गाड़ी लेकर आने वाला था.. निकलते वक्त मानसी ने यूं ही सहजता से आदित्य से पूछ लिया, "सर, आप नहीं निकलेंगे?"
इसपर आदित्य ने बताया कि ट्रेन के प्रॉब्लम की वजह से शायद उसे आज ब्रांच में ही रुकना पड़ेगा.. मानसी ने उससे कहा कि अगर उसे कोई ऐतराज़ ना हो, तो वो उसके साथ उसके घर चल सकता है.. शुरुआत में आदित्य को थोड़ा अजीब लगा कि वो ऐसे किसी के घर कैसे जा सकता है.. लेकिन उसे उस जगह के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी और अकेले ब्रांच में कैसे रुकता? इसलिए वो मानसी के साथ उसके घर जाने के लिए तैयार हो गया..
मानसी ने घर पर फोन करके बता दिया कि उसके साथ उसके सर भी आ रहे हैं और जब तक ट्रेन चालू नहीं हो जाती, वो उनके पास ही रुकेंगे.. दादा घर से गाड़ी लेकर निकल चुका था.. मानसी ने आदित्य से कहा कि वो रोज़ जहाँ दादा का इंतज़ार करती है, वहां चलकर खड़े होते हैं..
ब्रांच से बाहर निकलते ही बाहर का वो खराब माहौल देखकर आदित्य को थोड़ी टेंशन होने लगी.. ट्रैफिक जाम लगा हुआ था.. बारिश बस धो धो करके बरस रही थी.. सड़कों के गड्ढे कीचड़ से भर गए थे.. उन्हीं गड्ढों से रास्ता निकालते हुए आदित्य और मानसी चल रहे थे.. ऐसा अचानक से इतनी बारिश आएगी ये किसी ने सोचा भी नहीं था.. उन दोनों के पास छाता भी नहीं था..
आदित्य परेशान होकर मानसी से कहने लगा..
"मिस मानसी, जब हम अंदर थे तब तो लग भी नहीं रहा था कि बाहर इतना भयंकर माहौल होगा... ये बारिश है या कोई तूफान?"
लेकिन मानसी तो इस बरसते पानी का पूरा मज़ा ले रही थी.. सड़क पर जमा हुए पानी में बारिश की बूंदों से बन रहे गोल गोल डिज़ाइनों को देखते हुए उसने आदित्य से पूछा, "सर, आपको बारिश पसंद नहीं है क्या?"
"अरे पसंद है, पर वो हल्की रिमझिम वाली... ऐसा भयंकर तूफान मचाने वाली, नुकसान करने वाली बारिश भला किसे पसंद आएगी?" आदित्य बोला..
"अरे बारिश का तो स्वभाव ही ऐसा है! वो आते और जाते वक्त ऐसे ही गड़गड़ाहट करती है... अपने आने और जाने की गवाही देती है वो..." मानसी हँसते हुए बोली..
ठीक सामने फुटपाथ पर एक मौसी मोगरे के गजरे बेच रही थी.. आते जाते लोगों से 'एक गजरा ले लो, सस्ते में दे दूंगी', कहकर मिन्नतें कर रही थी.. वो और उसकी गजरों की टोकरी पूरी तरह भीग चुकी थी.. मानसी उसके पास गई और उसने पूछा, "मौसी, कितने गजरे बचे हैं?"
"बस दस ही बचे हैं बेटा," गजरे वाली मौसी बोली..
"मुझे दे दो सारे," मानसी ने कहा और अपनी पर्स से पैसे निकालकर जल्दी से उस मौसी के हाथ में रख दिए..
तभी दादा वहां गाड़ी लेकर आ गया... गजरे वाली मौसी खुल्ले पैसे वापस देने के लिए मानसी के पीछे भागी...
"बेटा... ये बचे हुए पैसे तो लेती जा..."
"रहने दो मौसी, अगली बार हिसाब कर लेंगे," कहकर मानसी गाड़ी में बैठ गई..
दादा ने आदित्य को आगे का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठने को कहा.. मानसी ने गाड़ी में बैठने के बाद आदित्य सर और दादा की एक दूसरे से पहचान करा दी..
गाड़ी शहर से निकलकर एक छोटे से घाट पर चढ़ने लगी.. शहर के भीड़भाड़ वाले माहौल से बाहर निकलकर उनका सफर एक शांत और खूबसूरत गाँव के रास्ते पर शुरू हो गया.. एक तरफ ऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई... और बीच से गुज़रता वो घुमावदार काला रास्ता... जो बारिश के पानी से पूरी तरह धुलकर साफ हो गया था.. रास्ते के एक तरफ ऊंचे ऊंचे हरे भरे पेड़ बारिश में नहाए हुए खड़े थे.. आगे बढ़ने पर हरे भरे खेत दिखाई दिए, जो हवा और बारिश के खेल में पूरी तरह रम गए थे.. बाहर का वो सुहावना मौसम देखते हुए गाड़ी कब बंगले के गेट के अंदर दाखिल हो गई, ये आदित्य को पता ही नहीं चला..
मानसी गाड़ी से उतरी और सबसे पहले वो बगीचे में जाकर ये देखने लगी कि उसके लगाए हुए सारे पौधे ठीक हैं या नहीं.. इसी धुन में वो ये भी भूल गई कि आदित्य पहली बार उनके घर आया है.. मोगरे के फूलों से लदी वो बेल बारिश से पूरी तरह नीचे झुक गई थी.. मानसी उस बेल को पास के खंभे का सहारा देकर वापस ऊपर संभालने लगी.. डार्क वाइन कलर की जॉर्जेट की साड़ी और उसी रंग का स्लीवलेस ब्लाउज़... मानसी बारिश में भीग रही थी... और आदित्य उसका वो दिलकश रूप बस देखता ही जा रहा था..
दादा ने आदित्य से कहा, "आइए... आइए सर... अंदर आइए... हमारी मानसी को तो आप जानते ही हैं... अरे ये बगीचा तो जैसे उसकी जान है... खुद से ज़्यादा तो इसे इन पौधों की फिक्र रहती है... उनके आगे इसे कुछ याद ही नहीं रहता... सॉरी... पर आप घर में चलिए... वो आ जाएगी अभी..."
तभी आदित्य की याद आते ही मानसी उनके पीछे पीछे घर में दाखिल हुई.. "सॉरी सर, वो ज़रा मोगरे की बेल नीचे झुक गई थी ना... मैं बस उसे ठीक कर रही थी... आप आइए ना... बैठिए," कहते हुए मानसी ने तात्या, ओवि और पल्लवी भाभी से आदित्य की पहचान कराई..
"अरे, आपके बगीचे में तो इतने सारे फूल हैं, फिर अभी रास्ते में आपने उस गजरे वाली मौसी से इतने सारे गजरे क्यों खरीद लिए?" आदित्य ने हैरानी से पूछा.. "अरे आदित्य साहब... हमारी मानसी ऐसी ही है... उसे मोगरा बहुत पसंद है... वैसे तो उसे सारे ही फूल पसंद हैं... लेकिन फिर भी उस गजरे वाली मौसी की थोड़ी मदद हो जाए, इसलिए वो रोज़ उसके बचे हुए सारे गजरे खरीद लेती है... फिर वो गजरे बालों में लगाकर मानसी भी खुश हो जाती है और मंदिर में बैठे उसके सारे भगवान भी खुश हो जाते हैं!" तात्या हँसते हुए आदित्य को मानसी के बारे में बता रहे थे..
मानसी और आदित्य हाथ मुँह धोकर फ्रेश होकर आ गए... दादा ने आदित्य को पहनने के लिए अपना कुर्ता और पजामा दे दिया.. तभी सफेद सलवार कुर्ता पहने, बालों में तौलिया लपेटे, मानसी धूपपात्र में धूप जलाकर पूरे घर में घुमाने लगी.. उसका वो सादा सा पहनावा, वो महकती हुई धूप... और उस धूप के धुएं के सफेद छल्लों के बीच घूमती मानसी का वो मनमोहक रूप देखकर आदित्य एक बार फिर इतना खो गया कि उसे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि पास बैठे दादा और तात्या उसे ही देख रहे हैं..
थोड़ी देर बाद पल्लवी ने डाइनिंग टेबल पर सबके लिए खाना परोसना शुरू किया.. पल्लवी आदित्य को बहुत ज़िद करके सब कुछ परोस रही थी.. आदित्य बार बार 'नहीं नहीं' कह रहा था, पर पल्लवी, "खाकर तो देखिए, ये खीर और भिंडी की सब्ज़ी मानसी ने बनाई है... थोड़ी सी लेकर देखिए, आपको ज़रूर पसंद आएगी..." कहते हुए आदित्य की थाली में परोस रही थी..
ओवि उस वक्त स्कूल मे थी.. आदित्य और ओवि की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी.. आदित्य उससे उसके स्कूल और सहेलियों के बारे में पूछ रहा था.. पर तात्या बातों ही बातों में घुमा फिराकर उससे पूछ रहे थे... "आप रहते कहाँ हैं? घर में कौन कौन है? आपकी शादी हुई है या नहीं?"
दादा ने आदित्य के सोने का इंतज़ाम ऊपर के एक कमरे में कर दिया था.. ओवि और मानसी दोनों अपने कमरे की तरफ जाने लगीं.. ओवि मानसी से पूछ रही थी, "बुआ, ये कौन हैं? तुम्हारे फ्रेंड हैं क्या?" मानसी ने कहा, "अरे नहीं, ये कोई फ्रेंड नहीं हैं, ये मेरे बॉस हैं... ऑफिस में अगर इनकी कोई बात ना सुने तो ये बहुत गुस्सा करते हैं! तू भी सो जा अब जल्दी से, वरना ये तुझे भी डांटेंगे!"
"हह! वो मुझपर बिल्कुल गुस्सा नहीं करेंगे... उन्होंने तो मुझे बहुत प्यार किया... और अगली बार आते वक्त वो मेरे लिए गिफ्ट भी लेकर आने वाले हैं... मुझे तो तुम्हारे ये आदित्य अंकल बहुत अच्छे लगे!" पल्लवी, दादा और तात्या ओवि की ये बातें सुन रहे थे... पल्लवी हँसते हुए बोली, "हाँ भई, हमें भी आदित्य सर बहुत अच्छे लगे!"
"क्या भाभी, मैं आने के बाद से देख रही हूँ, आप सबने मिलकर मेरा जो ये कौतुक समारोह चला रखा है ना... और तात्या, आप तो कुछ भी पूछे जा रहे हैं उनसे? अरे बॉस हैं वो मेरे... कोई मुझे देखने नहीं आए हैं वो... प्लीज़ आप सब उनके साथ ऐसा बर्ताव मत कीजिए... उन्हें कैसा लग रहा होगा?" मानसी सब पर थोड़ा गुस्सा होने लगी..
मानसी को गुस्सा आया मतलब घर में सब चुप... बाहर अभी भी ज़ोर से बिजली कड़क रही थी.. मानसी ओवि से बोली, "चलो ओवि ताई, अब सोने चलो... नहीं तो आसमान वाली बुढ़िया आ जाएगी.." सब हँसते हुए अपने अपने कमरों में सोने चले गए.. आदित्य को तो नींद ही नहीं आ रही थी... बस मानसी का चेहरा ही उसकी आँखों के सामने घूम रहा था..
अगले दिन बारिश थोड़ी कम हो गई थी.. टीवी पर खबरें आ रही थीं कि ट्रेन धीरे धीरे चालू हो रही हैं.. रविवार होने की वजह से आज बैंक की छुट्टी थी.. आदित्य भी तैयार होकर, मानसी और उसके घरवालों ने जो खातिरदारी की थी उसके लिए उनका शुक्रिया अदा करके अपने घर जाने के लिए निकल पड़ा.. ओवि आदित्य से कह रही थी, "अंकल आज भी रुक जाओ ना, हम बहुत मज़े करेंगे.."
मानसी को छोड़कर जाने का आज आदित्य का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था.. वैसे तो मानसी उसे रोज़ ही ब्रांच में मिलती थी.. पर अब उसका ये बिल्कुल अलग रूप देखकर वो उसके प्यार में पड़ने लगा था..
...
आदित्य आजकल चुपचाप चोरी छुपे नज़रों से मानसी को निहारता रहता था.. पर बात करते वक्त वो ब्रांच में बाकियों के साथ जैसा बर्ताव करता था, मानसी के साथ भी वैसा ही बर्ताव करता था... लेकिन मानसी का पूरा ध्यान सिर्फ अपने काम पर ही रहता था.. आदित्य के मन में उसके लिए कुछ चल रहा है, इस बात का मानसी को ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था..
आजकल वो गजरे बेचने वाली मौसी कहीं गायब हो गई थी.. पर मानसी की डेस्क पर उसे रोज़ सुबह आते ही मोगरे का एक ताज़ा और खुशबूदार गजरा रखा हुआ मिलता था.. उसकी डेस्क पर रोज़ ये गजरा कौन रखता होगा? ये सवाल उसे परेशान करने लगा था.. क्योंकि बैंक में सबसे पहले मानसी और प्यून काका ही आते थे.. उसने काका से भी उस गजरे के बारे में पूछताछ की.. पर उन्होंने भी यही कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता.. बिना बात के पूरे ऑफिस में गपशप ना हो, इसलिए उसने किसी को कुछ नहीं बताया.. वो रोज़ चुपचाप उस गजरे को अपने पर्स में रख लेती थी..
ऐसे ही आठ दस दिन बीत गए.. एक दिन उसे उस गजरे के साथ एक चिट्ठी भी मिली...
"मिस मानसी... मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या और कैसे लिखूं? पर आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं... अगर आपके मन में भी मेरे लिए कुछ है, तो आज आप ये गजरा अपने पर्स में ना रखकर, अपने बालों में लगा लीजिएगा! ...........आदित्य!"
मानसी ने वो चिट्ठी पढ़ी और बिना कुछ कहे उस चिट्ठी को फाड़ दिया और गजरे को मसलकर कूड़ेदान में डाल दिया..
आदित्य को लगा था कि मानसी हँसते हुए उसके प्यार को अपना लेगी लेकिन मानसी उसकी चिट्ठी और गजरे को ऐसे कूड़ेदान में फेंक देगी, ये उसने सपने में भी नहीं सोचा था.. मानसी के इस बर्ताव से उसे बहुत बुरा लगा.. वो ज़िंदगी में पहली बार किसी के प्यार में पड़ा था... पर उसके प्यार का ऐसा अंजाम हुआ था.. मानसी के चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नहीं थे, ना खुशी के, ना दुख के और ना ही गुस्से के!
आदित्य को लगा कि मानसी उसके पास आकर पूछेगी कि 'आपने मेरी डेस्क पर ये गजरा और चिट्ठी क्यों रखी?' पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.. मानसी रोज़ की तरह बिल्कुल नॉर्मल बर्ताव कर रही थी.. लेकिन आदित्य अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हो गया था.. मुझमें ऐसी क्या कमी है जो मानसी ने मुझे मना कर दिया? कोई भी लड़की उसके एक इशारे पर उससे शादी करने को तैयार हो जाती... पर मानसी के अलावा आज तक उसके दिल में कोई उतरी ही नहीं थी..
मानसी रोज़ उसके सामने ही घूमती फिरती नज़र आती थी और वो उसे देखकर और भी ज़्यादा बेचैन हो जाता था.. चार पाँच दिन बीत गए, आदित्य ऑफिस नहीं आ रहा था.. पर मानसी ने किसी से भी उसके बारे में कुछ नहीं पूछा..
उस दिन अचानक वो गजरे वाली मौसी सामने आ गई.. वो मानसी को आवाज़ लगाने लगी, "बेटा, आज गजरा नहीं चाहिए क्या?" मानसी ने मौसी को पहचान लिया और पूछा,
"अरे मौसी, इतने दिन से कहाँ गायब थी तुम?"
"गायब कहाँ होऊंगी बेटा? रोज़ सुबह एक साहब आकर मेरे सारे गजरे खरीद कर ले जाता था... सामने वाले उस गणपति के मंदिर में चढ़ाने के लिए.. पर चार दिन हो गए, वो गजरे लेने आया ही नहीं.. दो दिन तो मैं भी उस गणपति के मंदिर के पास जाकर बैठी रही... पर वहां के फूल वाले मुझे उधर बैठने ही नहीं देते... तुझे दूँ क्या एकाध गजरा?" मौसी ने मानसी से पूछा..
"दे दो सारे," कहते हुए मानसी ने मौसी से सारे गजरे खरीद लिए.. आदित्य की याद आते ही उसकी आँखों में पानी भर आया.. आदित्य क्यों नहीं आ रहा? किससे पूछे? उसके दिमाग में कई सारे सवाल घूम रहे थे.. वो पहले गणपति मंदिर गई.. बाप्पा के दर्शन किए.. 'आदित्य सलामत रहे', ये प्रार्थना की और वापस बैंक आ गई..
ब्रांच में सब लोग उसी के बारे में बात कर रहे थे.. 'आदित्य सर को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है.. आने वाले रविवार को हम सब मिलकर उन्हें देखने चलेंगे!'
आदित्य हॉस्पिटल में भर्ती है? क्या हुआ होगा उसे? इन ख्यालों से मानसी भी बेचैन हो गई.. उस दिन उसका काम में बिल्कुल मन नहीं लगा.. वो हाफ डे लेकर घर आ गई.. उसका चेहरा पूरी तरह उतरा हुआ था.. आते ही पल्लवी ने पहचान लिया कि मानसी के साथ ज़रूर कुछ बात है.. वरना वो कभी ऐसे हाफ डे लेकर घर नहीं आती.. पल्लवी ने मानसी से पूछना शुरू किया,
"क्या हुआ है? तुम्हारा चेहरा ऐसे क्यों उतरा हुआ है? तबियत ठीक नहीं है क्या?" एक के बाद एक कई सवाल पूछ डाले..
मानसी ने इतने दिनों से जो कुछ भी हुआ और अब आदित्य के हॉस्पिटल में भर्ती होने की बात, सब कुछ पल्लवी को बता दिया.. पल्लवी ने मानसी से सीधा ही पूछ लिया,
"मानसी, सच सच बताना, प्यार व्यार में तो नहीं पड़ गई ना?"
पल्लवी तो मज़ाक कर रही थी पर मानसी को रोना आ रहा था,
"भाभी, मुझे नहीं पता मुझे क्या हो रहा है, पर मुझे आदित्य सर से मिलना है, उनसे माफी मांगनी है... मेरी वजह से तो उन्हें कुछ नहीं हुआ ना?"
पल्लवी ने मानसी को गले लगा लिया,
"अरे मेरी पगली, तुमने क्या किया है? उन्हें ही प्यार का रोग लग गया है, हो जाएंगे जल्दी ही ठीक, तुम फिक्र मत करो, तुम्हें मिलना है ना उनसे? कल ही छुट्टी लेकर जाओ उनसे मिलने, दिल की बातें ऐसे छुपा कर नहीं रखनी चाहिए, बोलकर मन हल्का कर लेना चाहिए, तुम्हारे दिल में उनके लिए जो कुछ भी है, वो तुम उन्हें बता दो!"
...
अगले दिन सुबह ही मानसी ने ब्रांच में तबियत खराब होने की वजह से ना आने की बात कह दी और आदित्य सर को देखने मुंबई के हॉस्पिटल में पहुँच गई.. मानसी ने कमरे के दरवाज़े से अंदर झाँक कर देखा.. बेड पर आदित्य लेटा हुआ था.. उसके हाथ में सलाइन की सुइयां लगी थीं.. दाढ़ी बढ़ी हुई थी.. नींद में भी वो बहुत थका हुआ लग रहा था.. साथ में कोई नहीं था.. अंदर कैसे जाएं, ये सोच ही रही थी कि आदित्य को दरवाज़े पर किसी के होने का एहसास हुआ.. मानसी को दरवाज़े के पास खड़ा देखकर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. वो बेड पर ही उठकर बैठने की कोशिश करने लगा.. मानसी दौड़कर उसके पास गई और उसे उठने में मदद करने लगी.. उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे सीधा करने लगी.. उसके अचानक हुए इस स्पर्श से आदित्य पूरी तरह घबरा गया.. मानसी भी जैसे कुछ याद आने पर, "सॉरी... सॉरी सर," कहते हुए झट से पीछे हट गई..
"आप यहाँ... अचानक?" आदित्य ने मानसी से पूछा..
सच कहें तो मानसी ने हॉस्पिटल में आकर आदित्य को एक बहुत प्यारा सरप्राइज़ दिया था.. मोरपंखी रंग के सलवार कुर्ते में मानसी और भी खूबसूरत लग रही थी... और उसका वो मोरपंखी स्पर्श! उसके मन में तो था ही कि मानसी उसे मिलने आए... पर वो यूं ही भाव खा रहा था..
"हाँ, मतलब... सर आप अकेले ही हैं? साथ में कोई नहीं है?" मानसी ने अपने यहाँ आने की असली वजह बताने से बचते हुए कहा..
"नहीं, आई है, आज डिस्चार्ज मिलने वाला है... इसलिए डॉक्टर से मिलने गई है, आ ही रही होगी, आप बैठिए," सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए आदित्य ने मानसी से कहा..
तभी आदित्य की आई कमरे में आ गई.. आदित्य ने मानसी की अपनी आई से पहचान कराई..
"ओह... तो तुम हो मिस मानसी... बहुत सुना है आदित्य से तुम्हारे बारे में!" आई ने कहा..
मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे.. वो कुछ बोलने ही वाली थी कि आदित्य ने बात बदलते हुए अपनी आई से पूछा,
"आई, क्या हुआ? मिल गया डिस्चार्ज?"
"अरे हाँ, डॉक्टर कह रहे हैं, बिल्कुल ठीक है तू, आज ही घर ले जाओ बोले, अच्छा मैं ज़रा बिलिंग का क्या करना है, पूछ कर आती हूँ.. मानसी तुम बैठोगी क्या आदित्य के पास थोड़ी देर, मुझे शायद वक्त लगेगा... तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं है ना?" आई ने पूछा..
पहले से ही घबराई हुई मानसी ने सिर हिलाकर हाँ कह दिया.. आई के जाने के बाद आदित्य ने मानसी से फिर पूछा,
"आप अकेले ही अचानक मुझे देखने कैसे आ गईं, मिस मानसी?"
"आपकी तबियत खराब होने का पता चला तो मुझसे रहा नहीं गया इसलिए आ गई... नहीं आना चाहिए था क्या?" मानसी ने आदित्य की तरफ देखते हुए कहा..
उसके चेहरे के भाव पढ़ने और आगे कुछ पूछने ही वाला था कि आई हाथ में प्रसाद और मोगरे का गजरा लेकर आ गई..
"ये क्या? तुम तो हॉस्पिटल का बिल भरने गई थी ना?" आदित्य ने आई से पूछा..
"अरे हाँ, नीचे बिलिंग काउंटर पर बिल भरा और सामने ही बाप्पा का मंदिर था, तो वहां होकर आ गई.. तू जल्दी ठीक हो गया ना, इसलिए उनका शुक्रिया तो अदा करना चाहिए ना? वहां के पंडित जी ने ये प्रसाद और बाप्पा के चरणों का गजरा दिया है," आई ने आदित्य के हाथ में प्रसाद देते हुए कहा..
"आई वो गजरा देना ज़रा," आदित्य ने आई से कहा..
आई ने मानसी को प्रसाद दिया और आदित्य को गजरा देते हुए बोली, "क्यों रे बाबा, तुझे कब से मोगरा पसंद आने लगा?"
"मुझे नहीं, मिस मानसी को पसंद है, लीजिए मिस मानसी, बाप्पा का प्रसाद!" आदित्य ने मानसी के सामने गजरा कर दिया..
मानसी ने एक पल के लिए आदित्य की तरफ देखा और गजरा अपने बालों में लगा लिया..
"बाप्पा की कृपा हो गई समझो," आदित्य ने मानसी की तरफ देखते हुए कहा..
मानसी धीरे से शरमा गई.. वो कुछ नहीं बोली पर बिना कुछ कहे ही आदित्य को उसके दिल की सारी बात समझ आ गई थी.. आदित्य बस मंत्रमुग्ध होकर उसे ही देख रहा था.. एक ही पल में उसकी बीमारी, उसके मन की सारी उदासी दूर हो गई थी..
आई को भी आदित्य और मानसी के मन में क्या चल रहा है, इसका अंदाज़ा लग गया था..
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आदित्य के ठीक होने के कुछ दिनों बाद आदित्य के आई पापा ने मानसी के घर आकर पूरे रीति-रिवाज़ के साथ उसकी शादी का प्रस्ताव रखा.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी को तो आदित्य दामाद के रूप में पहले से ही पसंद था.. जब शादी तय ही हो गई है तो बिना बात के इंतज़ार क्यों करना, इसलिए दो महीने बाद की ही तारीख पक्की कर दी गई.. दोनों घरों में खुशी का माहौल था.. आदित्य को तो अब बस इसी बात की जल्दी थी कि कब शादी हो और मानसी उसके घर आए.. शादी मानसी के घर पर ही होने वाली थी.. आदित्य इकलौता बेटा और मानसी इस घर की लाडली बेटी होने की वजह से शादी बहुत धूमधाम से होने वाली थी.. मानसी खुद को दुल्हन के रूप में इमेजिन करके बार बार आईने में देखकर शरमा रही थी.. आदित्य भी मानसी के ही सपने देख रहा था..
शादी में बस आठ दिन बचे थे.. ज़ोरों शोरों से तैयारी चल रही थी.. मंडप सज गया था.. रोशनी हो गई थी.. करीबी रिश्तेदार आना शुरू हो गए थे.. शादी की इस भागदौड़ में आठ दिनों से मानसी और आदित्य मिल नहीं पाए थे.. अब शादी में सिर्फ चार दिन बचे थे.. दो दिन बाद मेहंदी, फिर हल्दी और फिर शादी... मानसी और आदित्य ज़िंदगी भर के लिए एक दूसरे के होने वाले थे.. पर आदित्य को मानसी से मिले बिना चैन ही नहीं पड़ रहा था.. घर के बड़ों ने दोनों को समझा कर रखा था,
'अब तुम दोनों शादी के बाद ही मिलना!'
पर आदित्य ने मानसी से कैसे भी करके आज मुझे मिलने आ जाओ, ऐसी ज़िद की.. आखिर में मानसी से भी रहा नहीं गया और थोड़ी शॉपिंग बाकी है, मुंबई जाकर आती हूँ, ऐसा कहकर वो घर से निकल पड़ी.. मानसी ने सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए ज़िंदगी में पहली बार घर पर झूठ बोला था..
आज इतने दिनों बाद मानसी से मिलकर आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे और क्या ना करे.. आज तक उसने मोगरे के गजरे के अलावा उसे कोई दूसरा गिफ्ट नहीं दिया था! दोनों ने मिलकर खूब शॉपिंग की, खूब घूमे, और इस सब में उन्हें वक्त का अंदाज़ा ही नहीं रहा.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे और पहुँचने में अभी दो तीन घंटे और लगेंगे, ये सोचकर मानसी जल्दी जल्दी में निकल पड़ी.. आदित्य ने उसे स्टेशन तक छोड़ा..
"आगे मैं अकेली चली जाऊंगी, तुम जाओ, अब सीधा शादी के दिन ही मिलेंगे," कहते हुए मानसी ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म पर आ गई.. आदित्य को तो अब ये जुदाई बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रही थी, पर उससे विदा लेकर मानसी निकल चुकी थी..
शाम का वक्त था! प्लेटफॉर्म पर खचाखच भीड़ थी! ट्रेन आई! हाथ में पकड़े भारी बैग और अपना दुपट्टा संभालते हुए, मानसी किसी तरह उस भीड़ में ट्रेन के अंदर चढ़ी.. अंदर पैर रखने की भी जगह नहीं थी.. ट्रेन के खंभे को पकड़कर मानसी बस किसी तरह खड़ी थी.. ट्रेन धीरे धीरे झटके खाते हुए आगे बढ़ी, प्लेटफॉर्म से निकलते ही ट्रेन ने अचानक तेज़ रफ्तार पकड़ ली और आगे खड़ी भीड़ का सारा वज़न मानसी पर आने लगा... और इससे पहले कि उसे कुछ समझ आता, मानसी उस तेज़ दौड़ती ट्रेन से बाहर नीचे गिर पड़ी!
...
मानसी को जब होश आया तो वो एक हॉस्पिटल में थी.. उसके पूरे शरीर पर भयानक चोटें आई थीं.. हाथों और पैरों पर प्लास्टर बंधा था.. तात्या, दादा, आदित्य, पल्लवी भाभी... सब उसके पास ही थे.. आज असल में उनकी शादी का दिन था, पर...
...
दो महीने तक मानसी हॉस्पिटल में ही रही.. 'ये सब मेरी वजह से ही हुआ है', ये सोच सोचकर आदित्य अंदर ही अंदर घुट रहा था.. उसने इतने दिनों में एक पल के लिए भी मानसी को अकेला नहीं छोड़ा था.. मानसी की कमर में बहुत गहरी चोट आई थी.. वो अभी भी ठीक से बैठ और चल नहीं पाती थी.. कई छोटे बड़े ऑपरेशन करने पड़े थे.. पर मानसी अंदर से बहुत मज़बूत थी.. वो उठने और चलने की पूरी कोशिश कर रही थी.. तात्या, दादा, पल्लवी, आदित्य... सब बहुत टेंशन में थे.. डॉक्टरों के मुताबिक मानसी को पूरी तरह से ठीक होने में कितना वक्त लगेगा? मानसी पूरी तरह ठीक हो भी पाएगी या नहीं? वो फिर से खुद अपने पैरों पर चल पाएगी या नहीं? या फिर ज़िंदगी भर उसे ऐसे ही रहना पड़ेगा... कोई कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता था.. पर मानसी को पूरा भरोसा था कि वो बहुत जल्द अपने पैरों पर चलेगी.. उसके अपने लोग और आदित्य सब उसके साथ थे... इसलिए उसे किसी बात की कोई फिक्र नहीं थी..
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मानसी के एक्सीडेंट को एक साल से ज़्यादा का वक्त बीत चुका था.. मानसी अब धीरे धीरे चलने लगी थी.. अपना सारा काम खुद कर सकती थी.. आदित्य रोज़ शाम को मोगरे का गजरा लेकर उससे मिलने आता था.. इतने दिनों में वो पहली बार बैंक के किसी काम से दो दिन के लिए बाहर गया था.. पल्लवी भाभी के किसी करीबी रिश्तेदार के यहाँ कोई कार्यक्रम था.. दादा, भाभी और ओवि वहां जाने वाले थे.. तात्या मानसी के पास रुकने वाले थे, पर मानसी ने ही ज़िद करके उन्हें दादा और भाभी के साथ भेज दिया.. इतने दिनों से मानसी की इस हालत की वजह से उसे छोड़कर कोई भी घर से बाहर नहीं गया था.. पर अब मानसी ठीक हो रही थी.. आखिर में मानसी की ज़िद के आगे हारकर वो लोग गंगू ताई को उसके पास छोड़कर चले गए..
...
मानसी अकेली ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर का नज़ारा देख रही थी.. आसमान में काले बादल घिर रहे थे.. ऐसा लग रहा था कि आज पक्का बारिश होगी.. हवा का एक हल्का सा झोंका मन को सुकून दे रहा था.. और तभी अचानक आसमान में बिजली कड़कने लगी.. पहली बारिश की एक तेज़ बौछार आई और भीगी हुई मिट्टी की वो सोंधी महक मन को खुश कर गई!
गंगू ताई बाहर कुछ काम कर रही थीं.. थोड़ी ही देर में वो मानसी को बताने आईं कि उससे कोई मिलने आया है.. मानसी ने गंगू ताई से कहा कि उन्हें अंदर ले आइए..
मानसी की ही उम्र की एक बेहद खूबसूरत औरत गंगू ताई के साथ कमरे में आई.. उसे देखकर ही लग रहा था कि वो प्रेगनेंट है.. मानसी ने उसे सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा और गंगू ताई को पानी और चाय लाने के लिए भेज दिया.. मानसी ने उससे पूछा,
"माफ कीजिएगा, पर मैंने आपको पहचाना नहीं.."
"हाँ मुझे पता है, आपने मुझे नहीं पहचाना, पर मैं आपको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ! मैं आपके आदित्य सर की पत्नी हूँ, नेहा!"
"क्या? ये कैसे मुमकिन है... आप ये क्या कह रही हैं??" मानसी को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई हो..
'ये औरत आखिर है कौन? अगर आदित्य की सच में शादी हो गई है तो मुझे किसी ने ये बात क्यों नहीं बताई?' मानसी के दिमाग में सवालों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ था..
"मानसी ताई, सच कहूं तो सबको पता है कि मेरी और आदित्य की शादी आठ महीने पहले ही हो चुकी है... आपके घर वालों को भी ये बात पता है... पर अगर आपको ये सब पता चला तो आपको बहुत तकलीफ होगी, इसलिए आदित्य ने मुझे भी कसम दी थी कि मैं आपको कुछ ना बताऊं..
ये बात भी सच है कि आदित्य आपके अलावा किसी और से शादी करने को तैयार ही नहीं थे... पर उनकी आई की वजह से उन्हें मुझसे ज़बरदस्ती शादी करनी पड़ी.. अगर वो मुझसे शादी नहीं करते तो उनकी आई ने खुद को कुछ कर लेने की धमकी दी थी.. मजबूरी में उन्हें अपनी आई की बात माननी पड़ी.. शादी से पहले उन्होंने मुझे आप दोनों के बारे में सब कुछ बता दिया था, उन्होंने तो मुझसे ये भी कहा था कि मैं खुद इस शादी से इंकार कर दूँ.. पर मैं एक अनाथ लड़की हूँ.. आदित्य जैसा पति और इतना अच्छा घर परिवार मिलेगा, ये सोचकर मैंने इस शादी के लिए हाँ कर दी.. उन्होंने सिर्फ अपनी आई की खुशी के लिए मुझसे शादी की है.. वो शरीर से भले ही मेरे पास हों, पर मन से वो हमेशा आपके ही पास रहते हैं.. वो रोज़ आपसे मिलने आते हैं... उन्होंने मुझसे कभी कुछ नहीं छुपाया.. पर अब मैं उनके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ.. अब इस हालत में मुझे और मेरे बच्चे को उनकी बहुत ज़रूरत है.. मैं अपने आने वाले बच्चे के लिए आपसे आपके आदित्य की भीख मांगती हूँ.. क्या आप मेरे बच्चे के लिए प्लीज़ इतना कर देंगी? अगर उन्हें पता चला कि मैंने यहाँ आकर आपको ये सब बता दिया है, तो वो मेरी शक्ल भी नहीं देखेंगे... आप भी तो एक औरत हैं... मेरे दिल का दर्द आप ज़रूर समझेंगी, बस यही सोचकर मैं आपके पास आई हूँ.."
नेहा बुरी तरह रो रही थी और मानसी फटी आँखों से बस उसे ही देखे जा रही थी.. नेहा का एक एक लफ्ज़ मानसी के कानों में खौलते हुए तेल की तरह गिर रहा था.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे पूरा कमरा उसके चारों तरफ गोल गोल घूम रहा हो.. इतने दिनों से उसने जो भी हसीन सपने सजाए थे, वो पल भर में ही टूट कर मिट्टी में मिल गए थे..
"मेरे बच्चे का भविष्य अब सिर्फ आपके ही हाथों में है... अब मैं चलती हूँ... आगे क्या करना है, ये फैसला अब आप ही कीजिएगा..." इतना कहकर नेहा वहां से चली गई..
बाहर बारिश का ज़ोर अब थोड़ा कम हो गया था, पर मानसी की ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा और खौफनाक तूफान आ गया था.. अनगिनत सवालों के काले बादल उसके मन में हाहाकार मचा रहे थे.. नेहा का हर एक लफ्ज़ ज़हर बनकर उसके दिल में उतर रहा था..
'क्या आदित्य ने मुझे धोखा दिया? नहीं! पर वो भी अपनी आई का दिल कैसे तोड़ता... कौन सी माँ अपने सही सलामत बेटे की शादी मुझ जैसी अपाहिज लड़की से खुशी खुशी करवाएगी?? पर फिर इस सब में मेरी क्या गलती है? कितने सारे सपने देखे थे मैंने... अब आदित्य के बिना कैसे जिऊंगी मैं? पर इसमें उस बेचारी नेहा और इस दुनिया में आने वाले उस मासूम बच्चे की क्या गलती है? हे भगवान! ये सब मेरे ही नसीब में क्यों लिखा था? घर के सब लोगों ने मुझसे आदित्य की शादी की बात क्यों छुपा कर रखी?'
मानसी के दिल और दिमाग में एक भयानक जंग छिड़ी हुई थी.. पर अब उसने अपना फैसला कर लिया था.. नेहा उससे मिलने आई थी और उसे आदित्य का सारा सच पता चल गया है, ये बात उसे अपने घरवालों को बिल्कुल नहीं बतानी थी.. इतने दिनों से तात्या, दादा और भाभी के चेहरे पर उसे हमेशा एक अनजाना सा डर दिखाई देता था.. उसे यही लगता था कि उसके एक्सीडेंट की वजह से वो लोग टेंशन में रहते हैं.. शादी से पहले सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए उसे घर पर झूठ बोलना पड़ा था.. आज वो उसी झूठ की इतनी बड़ी सज़ा भुगत रही थी.. आई के जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था.. उसे इस बात का पूरा एहसास था.. अपनी वजह से वो तात्या और दादा को कभी भी दुखी नहीं देख सकती थी.. इस दर्दनाक एक्सीडेंट और इतने सारे ऑपरेशन्स की वजह से होने वाले असहनीय दर्द को भी उसने कभी अपने चेहरे पर नहीं आने दिया था... पर आज नेहा ने आदित्य के बारे में जो सच बताया था, उससे उसके दिल पर जो गहरे ज़ख्म लगे थे, उनके दर्द को अपने चेहरे पर छुपाना अब उसके लिए नामुमकिन सा हो रहा था.. वो अपना दुख तो एक बार के लिए सह भी सकती है, पर उसका परिवार उसे इस तरह टूटते हुए कभी नहीं देख पाएगा..
अगले दो दिनों तक मानसी अपने घरवालों के सामने झूठी खुशी का नकाब पहनकर घूमती रही.. आज फिर से उसे अपनों के साथ ये झूठा नाटक करना पड़ रहा था... सिर्फ आदित्य और उसके परिवार की खुशी के लिए!
दो दिन बाद आदित्य अपना काम खत्म करके शाम को हमेशा की तरह मानसी के लिए मोगरे का गजरा लेकर आया.. मानसी अपने कमरे में ही थी..
आदित्य अंदर आया और मानसी के बिल्कुल करीब जाकर उसके बालों में वो गजरा लगाने लगा.. "रुकिए आदित्य सर, प्लीज़ मुझे हाथ मत लगाइए!" मानसी ने हमेशा की तरह अपने चेहरे के भावों को सख्ती से छुपाते हुए आदित्य से कहा..
मानसी के इस तरह अचानक बदल जाने की वजह आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रही थी.. "मानसी, क्या हुआ? मैं दो दिन तक तुमसे मिलने नहीं आ पाया, इसलिए इतना गुस्सा आ रहा है क्या?" आदित्य ने बड़ी ही मासूमियत का नाटक करते हुए मानसी से पूछा..
"सर, प्लीज़, मुझे आपके बारे में सब कुछ पता चल गया है! आप जाइए यहाँ से! आप मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए, मेरे मुकाबले आपकी पत्नी और आपके आने वाले बच्चे को आपकी कहीं ज़्यादा ज़रूरत है..."
"मानसी..." आदित्य के मन में कई सवाल चल रहे थे.. मानसी को ये सब किसने बताया होगा?
"मेरे लिए आपने आज तक जो कुछ भी किया है, उसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ..." असल में मानसी को आदित्य के गले लगकर खूब रोना था... उससे पूछना था, "तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों एक ही वक्त पर दो लड़कियों की ज़िंदगी के साथ खेल रहे थे?"
उसके सीने में जैसे आग की लपटें उठ रही थीं.. पर अपनी आँखों में आने वाले आंसुओं को उसने बहुत मुश्किल से रोक कर रखा था.. अगर वो इस वक्त टूट जाती, तो आदित्य को खुद से दूर करना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता... और शायद वो कभी आदित्य को खुद से दूर नहीं कर पाती..
"सर, आप एक आदमी हैं... आपको कोई कुछ नहीं कहेगा... पर एक शादीशुदा आदमी के साथ मेरे रिश्ते हैं, ये बात अगर किसी को पता चली तो लोग मेरे चरित्र पर तो उंगलियां उठाएंगे ही, साथ ही मेरे घर वालों के संस्कारों को भी ताने मारेंगे... मेरी वजह से मेरे घर वालों को कोई कुछ कहे, ये मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी... आपकी रखेल बनकर रहने से तो मुझे मर जाना ज़्यादा आसान लगेगा..."
"मानसी... ये क्या कह रही हो तुम? तुम्हें कुछ समझ भी आ रहा है?" आदित्य के दिल को मानसी के ये शब्द तीरों की तरह आर पार चीर रहे थे..
"मैं सच ही कह रही हूँ सर, प्लीज़ मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए... मुझ पर भरोसा रखिए, मैं कोई भी गलत कदम नहीं उठाऊंगी... मेरी किस्मत में जो लिखा है उसे मैंने खुशी खुशी अपना लिया है... आप भी अपनी गृहस्थी में खुश रहिए... अब इसके आगे हम एक दूसरे से ना ही मिलें तो अच्छा है... आपके और मेरे, दोनों के लिए... प्लीज़ सर, अगर आपने कभी भी मुझसे सच में प्यार किया है ना, तो बस मेरी इतनी सी बात मान लीजिए... प्लीज़!"
मानसी आदित्य की तरफ देखकर बोल रही थी... आज भी उसके चेहरे पर वही शांत और सुन्न भाव दिखाई दे रहा था..
'क्या मानसी इतनी आसानी से ये सब सच में अपना सकती है? या फिर वो मुझे और खुद को भी धोखा दे रही है??'
आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि मानसी के मन में आखिर चल क्या रहा है... उसका ये बर्ताव उसे बेमौसम बारिश की तरह लग रहा था... मन में दुख के काले बादल जमा करके रखना... बस भर आना पर बरसना नहीं... और फिर किसी दिन अचानक गड़गड़ाहट के साथ मूसलाधार बरसना... बिना रुके!
मानसी आदित्य की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी बाहर वाले कमरे में बैठे हुए थे.. आदित्य किसी से कुछ भी कहे बिना जल्दबाज़ी में वहां से चला गया.. मानसी अपने मन के उस भयानक तूफान को छुपाने की कितनी भी कोशिश कर रही हो, लेकिन तात्या और दादा उसके स्वभाव को बहुत अच्छी तरह जानते थे... जो हुआ है वो कभी ना कभी तो होना ही था... पर इस सब से मानसी को बाहर कैसे निकालें, ये उन्हें समझ नहीं आ रहा था.. मानसी ऊपर से भले ही सबको अपने खुश होने का दिखावा कर रही थी, लेकिन अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी.. उसने अपने चारों तरफ पाबंदियों का एक जाल सा बुन लिया था.. हमेशा तितली की तरह उड़ने और चहकने वाली मानसी अब बहुत शांत हो गई थी.. उसे गहरे रंगों और फूलों का बहुत शौक था! पर अब उन्हें भी उसने खुद से दूर कर दिया था.. अपनी जवानी के दिनों में ही वो किसी उम्रदराज़ औरत की तरह दिखने लगी थी.. आँखों पर चश्मा... लंबे बालों की चोटी की जगह अब वो बालों का जूड़ा बांधने लगी थी... मोगरा तो जैसे उसकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए दूर हो गया था... आदित्य की याद दिलाने वाली कोई भी चीज़ अब उसे अपने आस पास नहीं चाहिए थी..
...
मानसी अब पूरी तरह से ठीक हो गई थी.. आदित्य मानसी से बात करने की बहुत कोशिश कर रहा था... पर तात्या, दादा और भाभी को भी मानसी की ही बात सही लग रही थी.. अगर आदित्य ने नेहा से शादी कर ली है... और वो उसके बच्चे की माँ बनने वाली है, तो उसे अब नेहा का ही साथ देना चाहिए... उसके साथ ईमानदारी से रहना चाहिए... सिर्फ भावनाओं में बहकर कोई भी सुखी नहीं होने वाला था... ना नेहा, ना आदित्य, और नेहा की खुशियां छीनकर मानसी भी कभी सुखी नहीं रह पाती.. उसकी वजह से कोई दुखी हो, ये उसे बिल्कुल मंज़ूर नहीं था... और नेहा की कोख में पलने वाली वो नन्ही सी जान.. इस सब में उसका भला क्या कसूर था?? ... मानसी आदित्य से बहुत दूर हो गई थी... पर आदित्य के साथ ही उसके मन में मौजूद वो 'प्यार' का अहसास भी जैसे हमेशा के लिए मर गया था.. वो खुद से प्यार करना ही भूल गई थी.. सबके साथ घुल मिलकर, हँसते खेलते रहने वाली मानसी अब बिल्कुल अलग थलग और अकेली रहने लगी थी..
मानसी से कहा गया कि अगर उसकी इच्छा हो तो वो वापस बैंक जॉइन कर सकती है.. तात्या को भी लग रहा था कि अगर मानसी काम में बिज़ी हो जाएगी, तो इन दो सालों में उसकी ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ है, उसे भुलाने में उसे मदद मिलेगी... पर अगर उसी ब्रांच में आदित्य भी होगा तो उसके लिए सब कुछ फिर से बहुत मुश्किल हो जाएगा..
उस दिन पल्लवी भाभी से मिलने गाँव की एक काकी आई हुई थीं.. वो पल्लवी से मानसी के बारे में पूछताछ कर रही थीं और मानसी ने उनकी बातें सुन लीं,
"पल्लवी, देख बेटी, इस तरह टूटी हुई शादी वाली कुंवारी लड़की को घर में बिठाकर रखने से अच्छा है कि कोई ठीक ठाक रिश्ता देखकर इसके हाथ पीले कर दो! मानसी अगर ऐसे ही घर में बैठी रही तो तुम्हारी गृहस्थी कैसे आगे बढ़ेगी? मंदार और उसके तात्या तो बस उसी की फिक्र में लगे रहते हैं, ओवि और तुम्हारी किसी को फिक्र है क्या? देख ले अगर मेरी बात समझ आए तो! मुझे तो डर ही लगता है कि कहीं उस मानसी की तुम्हारे और मंदार के सुख चैन को नज़र ना लग जाए!"
"अरे ये आप क्या कह रही हैं काकी? आप हमारी फिक्र मत कीजिए, मानसी का क्या करना है वो हम खुद देख लेंगे!" पल्लवी ने सचमुच उन काकी को घर से भगा ही दिया.. पर काकी की वो कड़वी बातें मानसी के दिल में इस कदर घर कर गईं कि उसने तय कर लिया कि अब उसे इस घर में नहीं रहना है.. अपनी वजह से वो दादा और भाभी को कोई परेशानी नहीं होने देना चाहती थी..
मानसी ने बैंक में ट्रांसफर के लिए अर्जी दे दी.. बहुत जल्द उसे मुंबई के एक इलाके में ट्रांसफर का ऑर्डर मिल गया.. तात्या, दादा और भाभी को मानसी का घर से दूर रहना बिल्कुल सही नहीं लग रहा था... पर मानसी की ज़िद के आगे किसी की एक ना चली.. आखिर में इस शर्त पर उसे जाने की इजाज़त मिली कि तात्या भी उसके साथ ही रहेंगे.. नया शहर... नए लोग... मानसी ने खुद को काम में इतना ज़्यादा उलझा लिया कि उसे अपना वो दर्दनाक बीता हुआ कल याद करने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी..
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सालों साल बीत गए... पर मानसी अभी भी शादी के नाम से ही कतराती थी.. उम्र के साथ तात्या की बीमारियां और तकलीफें बढ़ती जा रही थीं.. शहर की वो आबोहवा तात्या को रास नहीं आ रही थी.. दादा तात्या को वापस गाँव लेकर आ गए.. मानसी बस तात्या को देखने के लिए घर आती थी, पर दो दिन रहकर वापस अपने काम पर लौट जाती थी.. ओवि अपनी आगे की पढ़ाई के लिए मानसी के पास रहने आ गई.. बचपन से ही ओवि अपनी बुआ पर जान छिड़कती थी! ओवि की वजह से मानसी को जीने का एक नया मकसद मिल गया था.. उसका पूरा दिन बस अपनी बैंक और ओवि की ज़रूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता था! अब तो ओवि भी बड़ी हो गई थी और उसने अपने लिए एक जीवनसाथी चुन लिया था..
ओवि की शादी तय हो गई.. पर मानसी के दिल में जैसे फिर से एक अजीब सा खालीपन आ गया था.. ओवि की ज़िंदगी संवरने वाली है... उसे उसकी पसंद का जीवनसाथी मिल गया है, इस बात की उसे बहुत खुशी थी, पर अब मानसी फिर से बिल्कुल अकेली पड़ने वाली थी..
उसकी लाडली ओवि की शादी थी, फिर भी 'छुट्टी नहीं मिल रही है', ऐसा बहाना करके वो शादी से सिर्फ दो दिन पहले ही घर आई.. घर के सामने वो सजा हुआ मंडप, वो रोशनी देखकर उसका सारा अतीत फिर से उसकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो गया.. फिर भी हमेशा की तरह वो अपनी आँखों का सारा दर्द और सारे भाव सबसे छुपा रही थी..
ओवि की शादी में मानसी का बचपन का दोस्त संकेत भी आया हुआ था.. इतने सालों तक वो विदेश में था.. उसे लगता था कि मानसी आदित्य से शादी करके अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश होगी, पर जब उसने मानसी को देखा, तो उसके चेहरे की वो गहरी उदासी उससे छुप नहीं पाई.. अपनी सगी भतीजी की शादी में भी मानसी एकदम सादे से कपड़ों में थी.. हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, गले में बारीक मोतियों की एक माला... और वैसे ही छोटे से कान के झुमके.. बस इतना सा ही उसका श्रृंगार था... वरना सजने संवरने और गहनों का शौक रखने वाली मानसी बहुत ही फीकी लग रही थी... हालांकि उस सादगी में भी उसकी खूबसूरती कहीं छुप नहीं रही थी... पर उसका चेहरा बहुत ही उदास लग रहा था.. संकेत इतने सालों बाद उससे मिल रहा था.. पर मानसी उससे भी बहुत कट कर और रूखेपन से बात कर रही थी.. संकेत ने उससे बात करने की बहुत कोशिश की... पर मानसी उससे दूर दूर ही रह रही थी..
संकेत और मानसी की... बचपन से ही बहुत गहरी और पक्की दोस्ती थी! मानसी अपनी हर छोटी बड़ी बात उसके साथ शेयर किया करती थी..
संकेत गाँव के अमीर इनामदार काका का छोटा बेटा था! मानसी और संकेत दोनों साथ साथ ही पले बढ़े थे.. दोनों ही पढ़ाई, खेलकूद और मस्ती करने में सबसे आगे थे! स्कूल से लेकर कॉलेज तक दोनों हमेशा एक साथ ही रहे.. मानसी और संकेत एक दूसरे से कभी कोई बात नहीं छुपाते थे और अगर कोई कुछ छुपाने की कोशिश भी करता, तो बिना कहे ही वो एक दूसरे के मन की बात पढ़ लेते थे.. गाँव में तो सबको यही लगता था कि मानसी और संकेत बड़े होकर एक दूसरे से ही शादी करेंगे.. उन दोनों की जोड़ी एकदम लक्ष्मी नारायण की तरह जमेगी... मेड फॉर ईच अदर... संकेत को भी मानसी बहुत पसंद थी.. जब से उसने होश संभाला था, वो मानसी से ही प्यार करता था.. पर मानसी ने अपनी उस दोस्ती से आगे बढ़कर संकेत के बारे में कभी कुछ ऐसा सोचा ही नहीं था! संकेत उसके लिए बस एक बहुत अच्छा दोस्त था..
गाँव के इनामदार होने का मतलब था सबसे रईस परिवार! पर संकेत को अपनी उस रईसी का ज़रा सा भी घमंड नहीं था.. अपने पिता की दौलत पर ऐश करने के बजाय, उसने तय किया था कि वो खुद मेहनत करके, अपनी काबिलियत से अपने पैरों पर खड़ा होगा और उसके बाद ही मानसी से शादी की बात करेगा.. कॉलेज की पढ़ाई पूरी होते ही वो आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला गया.. पढ़ाई पूरी होते ही उसे वहीं एक बहुत अच्छी सैलरी वाली नौकरी भी मिल गई.. अब वो मानसी के साथ अपनी शादी के सपने सजा रहा था.. वो बस इसी बेताबी में था कि कब एक बार भारत जाकर मानसी को अपने दिल की सारी बात बताए.. वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर खास मानसी से ही मिलने भारत, अपने गाँव वापस आया था..
उस दिन शाम को वो अपने सारे दोस्तों के सामने मानसी को प्रपोज़ करने वाला था.. वो इतने दिनों बाद भारत आया था, इसलिए सारे दोस्त उससे मिलने उनकी हमेशा वाली जगह पर जमा हुए थे... मानसी भी वहां थी.. पर इससे पहले कि वो अपने दिल की बात मानसी से कह पाता, मानसी ने खुद ही सबको आदित्य के बारे में बता दिया.. मानसी उस दिन बहुत खुश थी.. आदित्य कैसा दिखता है, उसका स्वभाव कैसा है, वो दोनों कैसे मिले... सब कुछ बहुत उत्साह के साथ बता रही थी..
संकेत अपने दिल में छिपा मानसी के लिए वो प्यार किसी के सामने भी ज़ाहिर नहीं कर पाया.. उसे बस ऐसा लग रहा था कि अचानक उसके हाथों से कुछ बहुत कीमती चीज़ फिसलती जा रही है.. इतने दिनों से उसने जो भी सपने सजाए थे, वो अब कभी पूरे नहीं हो सकते थे.. पर मानसी खुश है... वो आदित्य के साथ बहुत सुखी रहेगी, इसी बात से संकेत को सुकून मिल रहा था.. उसका अपना प्यार भले ही उसे ना मिला हो, पर मानसी ने जिससे प्यार किया, वो आदित्य उसे मिल गया! मानसी की खुशी में ही संकेत अपनी खुशी ढूंढ रहा था.. मानसी को बिना कुछ बताए ही वो हमेशा के लिए विदेश चला गया!
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मानसी के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वो उसे देखने आया था.. पर आदित्य उस वक्त मानसी के साथ ही था... वो उसकी जी जान से देखभाल कर रहा था... मानसी को एक बहुत अच्छा जीवनसाथी मिल गया था... वो हमेशा ऐसे ही खुश रहे... संकेत को लगा कि मानसी की इस हालत में वो उसके लिए अपने मन का प्यार और फिक्र शायद छुपा नहीं पाएगा, इसलिए वो उसे बिना मिले ही वहां से चला गया.. उसके माता पिता भी गाँव की उस इतनी बड़ी हवेली में अकेले ही रहते थे, इसलिए उसका बड़ा भाई, जो नौकरी के सिलसिले में अपने परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता था, वो माता पिता को भी अपने साथ वहीं ले गया.. अब गाँव में संकेत का अपना कोई नहीं रहता था.. इसलिए उसे यही लगता रहा कि इतने सालों में मानसी अपनी गृहस्थी में बहुत सुखी होगी... मानसी की याद उसे कमज़ोर ना कर दे, इसलिए जब भी दोस्तों का फोन आता, तो वो उनसे भी मानसी के बारे में कभी कुछ नहीं पूछता था.. और संकेत उसका इतना करीबी दोस्त होने के बावजूद, मानसी ने भी कभी उससे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की.. और आज जब इतने सालों बाद मानसी उसे मिली, तो इस हालत में!
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ओवि की दो महीने पहले ही शादी हुई थी और वो अपने पति प्रवीण के साथ बैंगलोर चली गई थी.. प्रवीण की नौकरी वहीं पर थी.. ओवि और प्रवीण शादी के बाद पहली बार आठ दस दिनों के लिए गाँव आए हुए थे.. इसके बाद इतनी जल्दी उन्हें आई, तात्या, बुआ और दादा से मिलने का मौका नहीं मिलने वाला था.. मानसी ने भी खास ओवि के लिए ही छुट्टी ली थी और चार दिन घर पर रहने आई थी..
आज रात ओवि से मिलने उसके सारे दोस्त आने वाले थे.. पल्लवी ने खाने पीने का खास इंतज़ाम किया था.. ओवि बहुत खुश थी.. वो अपने सारे दोस्तों से प्रवीण की पहचान करा रही थी.. रात का खाना खत्म होने के बाद सब एक साथ बैठकर बचपन की बातें याद करके हँस खेल रहे थे..
उन सबको देखकर मानसी को भी अपने दोस्तों की याद आ गई... संकेत की भी याद आई..
'कैसा मस्त था हमारा वो ग्रुप... कितनी मस्ती करते थे हम लोग! अब पता नहीं कहाँ होंगे सब! इतने साल हो गए, मैंने खुद को ही अपनी बनाई पाबंदियों की दीवार में कैद कर लिया.. कितने खूबसूरत थे वो दिन! वो रिमझिम करते नटखट पल! अगर आदित्य उस वक्त मेरी ज़िंदगी में आया ही ना होता, तो शायद मेरी पूरी ज़िंदगी ही कुछ और होती! आदित्य, उस रिमझिम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में आया... उसके प्यार की बारिश में मैं पूरी तरह भीग गई... और फिर अचानक उस बेमौसम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा भयानक तूफान देकर चला गया... जो कभी खत्म ही नहीं होने वाला था!'
मानसी ने अपने मन की सारी भावनाओं को अपने अंदर ही कैद करके रखा था.. वो अपनी बदकिस्मती और उदासी को सबसे छुपाने की कोशिश कर रही थी..
घर की छत पर अंताक्षरी का खेल बहुत रंग लाया था.. सब नाचने गाने में मगन थे.. ओवि और प्रवीण भी उसमें पूरी तरह रम गए थे.. मंदार दादा की बारी आई तो उसने पल्लवी को उठाया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर गाना गाने लगा...
"ओ मेरी ज़ोहराज़बीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं, और मैं जवाँ, तुझपे कुर्बान मेरी जान, मेरी जान!"
पल्लवी शर्म से लाल हो गई.. मानसी ने भी पहली बार दादा को इतने रोमांटिक मूड में देखा था.. सब लोग उन दोनों के चारों तरफ गोल घेरा बनाकर, तालियां बजाते हुए नाच रहे थे..
अगले दिन सुबह सब लोग घूमने के लिए खेत पर गए.. खेत में बना वो छोटा सा खपरैल वाला घर... कभी किसी ज़माने में मानसी ने ही वहां फूलों के पौधे लगाए थे... सावन की वो रिमझिम बारिश, चारों तरफ फैली हुई हरियाली... और मन को मोह लेने वाली वो मीठी मीठी खुशबू... पूरा माहौल ही बहुत खुशनुमा लग रहा था..
दादा और भाभी सबको खेत दिखा रहे थे.. मानसी अकेली ही उस खपरैल वाले घर के बाहर लटके हुए झूले के पास एक कुर्सी पर बैठकर किताब पढ़ रही थी.. हवा के हल्के झोंकों से वो झूला धीरे धीरे झूल रहा था.. खपरैल से छनकर आने वाली हल्की धूप... उस झूलते हुए झूले की वजह से कभी मानसी के चेहरे पर आकर चमकती और कभी पल भर में गायब हो जाती... कोई दूर खड़ा होकर मानसी की उस खूबसूरती को निहार रहा था.. तभी अचानक किसी ने उसे आवाज़ दी और उसका ध्यान टूट गया..
"मानसी!"
मानसी ने झट से किताब से नज़रें उठाकर सामने देखा! उसके ठीक सामने संकेत खड़ा था.. बिल्कुल पहले जैसा ही... लंबा... गोरा... जानबूझकर बढ़ाई हुई हल्की हल्की दाढ़ी... बाल बस थोड़े से सफेद हो गए थे... पर वो अभी भी वैसा ही था... जैसा कॉलेज के दिनों में दिखा करता था!
"अरे! संकेत, तुम यहाँ?" मानसी ने हैरानी भरी नज़रों से उसे देखते हुए पूछा.. "हाँ, पर क्यों? मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था क्या?" संकेत बोला.. "अरे, ऐसा नहीं है... मेरा मतलब तुम तो विदेश में रहते हो... फिर अचानक यहाँ कैसे?" मानसी कुर्सी से उठते हुए बोली..
"हाँ वैसे तो विदेश में ही रहता हूँ... पर तीन महीने पहले ही आई बाबा से मिलने दादा के पास आया था... मंदार दादा ने आई तात्या को ओवि की शादी का खास न्योता दिया था... इसी बहाने उन्हें काका, यानी तुम्हारे तात्या से भी मिलने की बहुत इच्छा थी.. दादा को गाँव आने का वक्त नहीं मिल पाया, तो उसने ही मुझसे कहा कि मैं आई बाबा को गाँव लेकर आऊं.. मैं वैसे भी छह महीने के लिए भारत आया हुआ था, तो मैंने सोचा ठीक है मैं ही चला जाता हूँ... इसी बहाने तुमसे भी मुलाकात हो जाएगी.. ओवि की शादी में मैंने तुमसे मिलने की बहुत कोशिश की... पर तुम मेहमानों की भीड़ में बहुत बिज़ी थी... आज मंदार दादा ने ही बताया कि तुम सब खेत पर आने वाले हो... ओवि और प्रवीण से भी शादी में बस जल्दबाज़ी में ही मिल पाया था... इसलिए मैं खुद ही यहाँ आ गया... तुम सबसे मिलने," संकेत ने अपने यहाँ आने की वजह बताई..
संकेत को देखकर मानसी को अपना पूरा बचपन याद आ रहा था... पर अब उससे क्या बात करे, ये उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. "अरे बैठोगे क्या? या फिर वो देखो दादा, ओवि सब उस तरफ घूम रहे हैं, तुम चाहो तो वहां जा सकते हो!" मानसी ने दादा और बाकी लोग जिस तरफ गए थे, उस तरफ हाथ से इशारा करते हुए संकेत से कहा..
"अरे पर, तुम यहाँ अकेले क्या कर रही हो? तुम भी चलो ना साथ में!" संकेत मानसी को अपने साथ चलने के लिए ज़िद कर रहा था.. "नहीं रे, बारिश की वजह से सब जगह बहुत कीचड़ हो गया है... कहीं फिसल कर गिर गई तो! अब और दर्द सहने की हिम्मत नहीं बची है मुझमें," मानसी असल में क्या कहना चाह रही है, ये संकेत को कुछ समझ नहीं आ रहा था!
"अरे गिरोगी कैसे? मैं हूँ ना तुम्हें सहारा देने के लिए.. मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलूँगा, तुम बस साथ चलो! या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?" संकेत अपनी ज़िद छोड़ने को तैयार नहीं था.. मानसी बिना कुछ कहे किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी..
"मानसी, अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो एक बात पूछूं?" संकेत ने फिर पूछा.. "अरे पूछो ना, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? अब मेरी उम्र बची है क्या रूठने और गुस्सा करने की?"
"मानसी, गुस्सा करने, रूठने और प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती, ये सब तो बस अपने आप हो जाता है... हम खुद ही अपने ऊपर पाबंदियां लगा लेते हैं... और खुद के ही बनाए हुए चक्रव्यूह में फंस जाते हैं... पर हमें ही मन से मज़बूत होकर इस चक्रव्यूह को तोड़कर बाहर निकलना होगा! तुम गुस्सा करो, चाहो तो मुझसे लड़ो, पर ऐसे अकेले ही अंदर अंदर घुटती मत रहो... दोस्ती का हक़ होता है ये, दोस्ती में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए, जो मन में आए वो बोलकर दिल हल्का कर लेना चाहिए, सुख और दुख सब बांटना चाहिए!" संकेत मानसी को समझा रहा था..
"अरे पर, मुझे कोई दुख नहीं है, तुम अपनी बताओ, तुम्हारा वहां विदेश में कैसा चल रहा है?" मानसी बात बदलते हुए बोली.. "मानसी प्लीज़, बातों को मत घुमाओ, मुझे सब समझ आ रहा है, कहाँ खो गई मेरी वो बचपन की दोस्त, जो हमेशा चहकती रहती थी, हँसती थी... और पूरे हक़ से मुझ पर गुस्सा करती थी, उसके दिल में क्या है, ये उसे खुद पता चलने से पहले ही वो मुझे बता देती थी...
मानसी, तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ, वो दादा ने मुझे ओवि की शादी के बाद बताया... सच कहूं तो गलती मेरी ही थी, मुझे लगा कि इतने सालों में तुम आदित्य के साथ बहुत सुखी होगी... इसलिए मैंने कभी तुम्हारी कोई खबर भी नहीं ली... पर इतना सब कुछ हो गया और किसी ने मुझे एक बार बताना भी ज़रूरी नहीं समझा, तुमने भी मुझे पराया ही समझा ना!"
"संकेत, अरे ऐसा कुछ भी नहीं है, तुम खुद को क्यों कसूरवार ठहरा रहे हो? जो मेरी किस्मत में लिखा था, वो तो होना ही था... और मुझे ही वो सब किसी को बताकर बार बार अपने ज़ख्मों को नहीं कुरेदना था.. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. भूल चुकी हूँ मैं वो सब कुछ!"
"ठीक हो तुम? ऐसी? अरे ये क्या हालत बना रखी है तुमने अपनी, खुद को देखा है क्या इतने दिनों में कभी आईने में? कहाँ गए तुम्हारे वो पसंदीदा रंग, वो खुशबू, वो फूल और वो बारिश? बारिश में भीगना कितना पसंद था तुम्हें और अब तुम्हें ये सब नहीं चाहिए? तुमने बस अपने शरीर को ज़िंदा रखा है... पर तुम्हारे मन का क्या? तुम्हें क्या लगता है तुम्हें इस हालत में देखकर काका, दादा और भाभी को कैसा लगता होगा? अगर आदित्य ने शादी कर ली तो फिर तुमने क्यों नहीं अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत की? क्यों ऐसी अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी जीती रही? किसके लिए ये सज़ा काट रही हो? तुम्हें पता भी है... तुम्हारी वजह से तुम बाकी सबको भी सज़ा ही दे रही हो... इतने सालों से!"
"संकेत, अरे प्यार किया है मैंने आदित्य से... प्यार क्या होता है, ये उसी ने सिखाया है ना मुझे... उसके सिवा मैंने कभी किसी और के बारे में सोचा ही नहीं! किसी और से शादी करना मेरे लिए सिर्फ एक समझौता होता... आदित्य के लिए मेरे दिल में जो प्यार है, वो मैं कभी किसी और को नहीं दे पाती... अगर मैं किसी और से शादी कर भी लेती तो ना वो सुखी हो पाता और ना ही मैं खुश रह पाती! और ज़िंदगी में क्या शादी ही सब कुछ होती है? मैं इतनी मज़बूत हूँ कि अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जी सकती हूँ! मुझे नहीं चाहिए किसी का सहारा... मैं अकेले ही बहुत खुश रह सकती हूँ!"
"तुम्हें नहीं चाहिए किसी का सहारा, पर अगर कोई तुम्हारे सहारे का इंतज़ार कर रहा हो तो? मैं मानता हूँ कि शादी ही सब कुछ नहीं होती, पर जिसकी याद में तुम अपनी ज़िंदगी इस तरह घुट घुट कर बर्बाद कर रही हो, उसे तुम्हारे इस प्यार का ज़रा सा भी एहसास है क्या?" संकेत मानसी से लड़ रहा था..
"संकेत, प्लीज़, मुझे इस बारे में और कोई बात नहीं करनी है... अभी सब लोग आ जाएंगे... हम इस बारे में बात ना ही करें तो अच्छा है," मानसी के चेहरे पर अभी भी वही सुन्न भाव थे.. संकेत मानसी के इस बर्ताव से बहुत उदास हो गया था.. वो वहां एक पल भी नहीं रुका और सीधा चला गया..
...
दो दिन बाद ओवि पल्लवी को बता रही थी कि आज रात वो और प्रवीण संकेत काका से मिलने जाने वाले हैं... संकेत कल फिर से विदेश वापस जाने वाला था.. मानसी ने ये सुना और ओवि से पूछा, "ओवि, संकेत तो छह महीने के लिए आया था ना, फिर इतनी जल्दी वापस क्यों जा रहा है?"
"उसकी वजह तुम हो बुआ!" ओवि ऐसा क्यों बोल रही है, ये मानसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था! "तुम्हारा और संकेत काका का झगड़ा हुआ है ना?" "अरे पर उसके लिए..." मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो ओवि के सामने क्या कहे..
"बुआ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है या तुम कुछ समझना ही नहीं चाहती हो? संकेत काका सिर्फ तुमसे मिलने के लिए मेरी शादी में आए थे... उन्हें तुमसे कुछ बात करनी थी... पर तुम तो अभी भी अपनी ही उसी दुनिया में खोई हुई हो.. तुमने कभी उनसे पूछा कि इतने सालों में उनकी ज़िंदगी में क्या क्या हुआ? वो अचानक ऐसे विदेश क्यों चले गए? बुआ, इतने सालों तक सिर्फ तुम्हारे लिए उन्होंने शादी तक नहीं की... वो बचपन से तुमसे प्यार करते थे... और आज भी करते हैं! इतने सालों तक तुम सुखी हो, इसी बात को अपनी खुशी मानकर वो जी रहे थे... पर तुमने कभी उनके बारे में कुछ जानने या उन्हें समझने की कोशिश ही नहीं की," ओवि ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..
"अरे, ये कैसे मुमकिन है... उसने कभी मुझसे कुछ कहा क्यों नहीं?" मानसी पूरी तरह से उलझन में पड़ गई.. "उसकी बात सुनने का तुम्हारे पास वक्त था क्या? अब वो वापस जा रहा है, फिर कभी ना लौटने के लिए..."
...
ओवि ने जो कुछ भी बताया, उससे मानसी अंदर तक बेचैन हो गई.. उसकी वजह से संकेत का दिल दुखा था.. उसे संकेत से माफी मांगनी थी.. एक दोस्त होने के नाते उसे मानसी को कुछ भी कहने का पूरा हक़ था.. मानसी को अपनी गलती का एहसास हो गया था..
मानसी इनामदार की हवेली पहुँची.. रिमझिम बारिश हो रही थी.. पत्थर की चारदीवारी से लगकर उगे हुए अरबी के पत्तों पर गिरी बारिश की बूंदें सावन की उस हल्की धूप में हीरों की तरह चमक रही थीं.. वो अंदर दाखिल हुई, तुलसी के चबूतरे पर तुलसी बहुत खिली हुई थी.. आले में एक दीया जल रहा था.. दालान में एक बड़ा सा पालना झूल रहा था.. मानसी को अपने बचपन के दिन याद आ गए.. छुट्टियों के दिनों में वो सारे दोस्त इस हवेली में जमकर उधम मचाया करते थे.. बारिश के मौसम में संकेत की आई के बहुत सारे व्रत और पूजा पाठ हुआ करते थे! वट सावित्री, आषाढ़ी एकादशी, सावन के सोमवार, जन्माष्टमी... और जाने क्या क्या! इन बच्चों की तो बस मौज रहती थी! मस्त बारिश में खूब मस्ती करते और फिर देर हो जाती तो यहीं प्रसाद खाकर रुक जाते! मानसी तो सबकी सबसे लाडली थी! बिना माँ की बच्ची समझकर संकेत की आई मानसी को कुछ ज़्यादा ही प्यार करती थीं... आज कितने सालों बाद मानसी यहाँ आई थी, पर वो सारी यादें अभी भी बिल्कुल ताज़ा थीं..
मानसी घर के अंदर गई! संकेत अपने कमरे में बैग पैक कर रहा था.. मानसी ने उसे आवाज़ दी, 'संकेत...'.. उसने मानसी की आवाज़ पहचान ली थी, पर उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं... कहते हैं ना कि मर्दों को रोना नहीं चाहिए! पर ये उससे कभी हो ही नहीं पाया... वो मानसी की तरह अपने दिल के भावों को कभी छुपा ही नहीं पाता था... आज भी वो मानसी को अपना ये चेहरा नहीं दिखाना चाहता था.. वो उसकी तरफ पीठ किए हुए ही उससे बात कर रहा था...
"आओ, बैठो मानसी, तुम यहाँ कैसे?" "अरे, एक दोस्त रूठ कर जा रहा है ना, बस उसी से मिलने आई हूँ.."
"उस दोस्त को किसी के सहारे या तसल्ली की कोई ज़रूरत नहीं है," संकेत ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..
"पर अगर मुझे उसके सहारे की ज़रूरत हो तो... तब भी वो नहीं रुकेगा?"
"मतलब?"
संकेत ने पूरी हैरानी से पीछे मुड़कर देखा... उसके सामने मोरपंखी रंग की साड़ी पहने हुए... अपने लंबे बालों की चोटी में मोगरे का गजरा लगाए हुए... उसकी वही पुरानी दोस्त मानसी खड़ी थी.. उसे इस रूप में देखकर संकेत के दिल को बहुत गहरा सुकून मिला.. उसने मानसी के पास आकर, उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "मुझे बस अपनी इसी मानसी को देखना था!"
बाहर सावन की बारिश बरस रही थी... और मानसी के मन का वो सावन खुशी के आंसुओं के रूप में उसकी आँखों से छलक रहा था... आसमान में उस हल्की धूप और रिमझिम बारिश के बीच एक सतरंगी इंद्रधनुष अपनी खूबसूरत कमान बनाते हुए ज़मीन को छू रहा था!
मानसी की वो अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी अब हमेशा के लिए पूरी हो चुकी थी...
समाप्त!
गेट से लिपटी हुई सायली की बेल नाज़ुक सफेद फूलों से पूरी तरह लदी हुई थी.. बैंगनी और लाल रंग का कृष्ण कमल बेवजह ही शर्माया हुआ सा लग रहा था.. प्राजक्ता के वो केसरी डंठल वाले सफेद रेशमी फूल मानो उसे देखकर खुशी से मुस्कुरा रहे थे.. बिट्टी तो पीले धमक फूलों का श्रृंगार करके किसी गौरी की तरह सजी हुई थी.. बीच में ही कहीं से उग आया तेरडा जैसे अपनी पिचकारी से लाल और गुलाबी रंग उड़ा रहा था.. घर के खंभे का सहारा लेकर ऊपर तक चढ़ी मोगरे की बेल सफेद चमकते सितारों की तरह टिमटिमा रही थी.. सावन की वो हल्की सी धूप बारिश की बूंदों से फिसलकर इन नाज़ुक फूलों को और भी चमका रही थी.. पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे सारा आसमान एक सुगंधी सांस ले रहा हो..
तभी झूले पर बैठी ओवि दौड़ती हुई उसके पास आई..
"क्या बुआ, कितनी राह देखने लगाई तुमने? कल ही क्यों नहीं आ गई? तुम्हें पता है कल से मैं अकेले कितना बोर हो रही हूँ यहाँ?" ओवि ने मानसी पर प्यार से गुस्सा करते हुए कहा..
"अरे बाप रे, कितने सवाल पूछोगी? और ओवि मैडम शादी हो चुकी है अब तुम्हारी! ये तुम्हारा बचपना और धक्कमधुक्की अभी तक गई नहीं.. और तुम अकेली कहाँ थी? दामाद जी भी तो आए होंगे ना साथ में! और घर में आई तात्या तो हैं ही!" मानसी ने प्यार से ओवि के गाल खींचते हुए कहा..
तभी बारिश की एक तेज़ बौछार आई और दोनों भागकर जल्दी से घर के अंदर घुस गईं..
"ये देखो, आते ही तुम्हारी वजह से मैं भी भीग गई!" मानसी ओवि को लाड से डांटने लगी..
"ये सही है तुम्हारा... मैं शादी के बाद पहली बार अपने मायके आई हूँ, पर यहाँ किसी के पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है... तात्या दामाद जी को पूरा गाँव घुमाने ले गए हैं, वो रात से पहले लौटने वाले नहीं हैं... पक्का अपने सारे दोस्तों से मिलवा कर ही लाएंगे उन्हें.. और आई साहेब ने तो अपने प्यारे दामाद जी के लिए छप्पन भोग की तैयारी कर रखी है.. मुझे लगा था मेरे आने का पता चलते ही तुम दौड़कर मुझसे मिलने आओगी... पर तुम्हारे पास भी मेरे लिए टाइम नहीं है... यहाँ सबको बस अपने दामाद का ही कौतुक करना है!" ओवि झूठा गुस्सा दिखाते हुए बड़बड़ा रही थी..
तभी पल्लवी किचन से बाहर आई, "अरे मानसी! आ गई तुम! और ये क्या? तुम दोनों इतना कैसे भीग गईं? जाओ जल्दी से ऊपर जाकर कपड़े चेंज कर लो, मैं तब तक चाय बनाती हूँ.. मानसी तुम्हारे लिए खाने में क्या बनाऊं?"
"गरमागरम कांदा भजी बना लो... मस्त बारिश हो रही है... है ना बुआ?" ओवि ने अपना फरमान सुना दिया..
"नहीं भाभी, मुझे अभी कुछ नहीं खाना! मेरे लिए बस एक कप चाय बना दो.." मानसी ने कहा..
मानसी और ओवि कपड़े बदलकर आ गईं.. ओवि अपने हाथों से गूंथा हुआ मोगरे का एक ताज़ा गजरा मानसी के लंबे लेकिन अब हल्के सफेद हो चुके बालों में लगाने लगी..
"अरे, ये क्या? मोगरे का गजरा? मेरे बालों में मत लगा इसे, भाभी को दे दे..."
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मोगरे का गजरा मतलब मानसी की जान! लेकिन पिछले कई सालों से उसने कभी भूलकर भी अपने बालों में गजरा नहीं लगाया था.. मोगरा, बारिश और आदित्य... अब वो पुरानी यादें उसे बिल्कुल नहीं चाहिए थीं..
करीब पंद्रह साल पहले घटी वो घटना!
आज भी ऐसा लगता था जैसे सब कुछ अभी हुआ हो.. अगर उस वक्त आदित्य और मानसी की शादी हो गई होती, तो तात्या, मंदार दादा और पल्लवी भाभी ने आदित्य का भी बिल्कुल ऐसे ही लाड प्यार और कौतुक किया होता..
मानसी भी ओवि की तरह ही इस घर की सबसे लाडली बेटी थी! वो जो कहती, वही सबके लिए पत्थर की लकीर होती.. उसकी पढ़ाई पूरी होते ही उसके लिए बहुत अच्छे रिश्ते आने लगे थे.. लेकिन मानसी को पहले खुद के पैरों पर खड़ा होना था..
मानसी पढ़ाई में बहुत होशियार थी, और दिखने में बेहद खूबसूरत! नाज़ुक और छरहरा बदन, गोरा रंग, चंपे की कली जैसी नाक, हिरनी जैसी आँखें और लंबे घने बाल... सच में देखते ही कोई भी प्यार में पड़ जाए ऐसी ही थी वो! उसका स्वभाव भी बहुत मीठा था..
आई के गुज़र जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी.. पल्लवी भाभी ने भी उसकी हर बात मानी.. मानसी उम्र में पल्लवी से काफी छोटी थी, इसलिए वो उसे ननद की तरह नहीं बल्कि अपनी छोटी बहन की तरह ही संभालती थी..
पढ़ाई पूरी होने के बाद भी मानसी बैंक के एग्जाम्स दे रही थी.. वो जी तोड़कर पढ़ाई कर रही थी और उसमें उसे कामयाबी भी मिली.. उसे एक सरकारी बैंक में नौकरी मिल गई और गाँव के पास ही एक शहर में उसकी पोस्टिंग पी.ओ. ऑफिसर के तौर पर हो गई..
उसी ब्रांच में आदित्य का भी ब्रांच मैनेजर के तौर पर नया नया ट्रांसफर हुआ था.. आदित्य उस जगह पर बिल्कुल नया था.. उसका घर मुंबई में था.. इसलिए रोज़ उसे दो घंटे का ट्रेन का सफर करना पड़ता था..
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अक्टूबर महीने का वो पहला हफ्ता... इतने दिनों से बहुत कड़क धूप पड़ रही थी.. लेकिन उस दिन अचानक से बारिश वाला माहौल बन गया.. काले घने बादलों ने आसमान को भर दिया.. बिजली कड़कने लगी और धो धो करके मुसलाधार बारिश शुरू हो गई..
शाम तक बारिश ने इतना ज़ोर पकड़ लिया कि लगने लगा जैसे अब ट्रेन भी बंद हो जाएंगी.. टीवी पर खबरें आने लगीं.. कहीं पानी भर गया है.. कहीं बिजली गिर गई है... एक के बाद एक कई खबरें..
ब्रांच में दूर से आने वाले कर्मचारी अपना काम जल्दी जल्दी निपटा कर ट्रेन बंद होने से पहले ही ब्रांच से निकल गए.. आदित्य भी निकलने ही वाला था कि तभी किसी ने उसे बताया कि ट्रेन बहुत लेट चल रही हैं और कई ट्रेनें कैंसिल भी हो रही हैं..
मानसी का घर वहां से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर था.. उसे लेने के लिए उसका दादा गाड़ी लेकर आने वाला था.. निकलते वक्त मानसी ने यूं ही सहजता से आदित्य से पूछ लिया, "सर, आप नहीं निकलेंगे?"
इसपर आदित्य ने बताया कि ट्रेन के प्रॉब्लम की वजह से शायद उसे आज ब्रांच में ही रुकना पड़ेगा.. मानसी ने उससे कहा कि अगर उसे कोई ऐतराज़ ना हो, तो वो उसके साथ उसके घर चल सकता है.. शुरुआत में आदित्य को थोड़ा अजीब लगा कि वो ऐसे किसी के घर कैसे जा सकता है.. लेकिन उसे उस जगह के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी और अकेले ब्रांच में कैसे रुकता? इसलिए वो मानसी के साथ उसके घर जाने के लिए तैयार हो गया..
मानसी ने घर पर फोन करके बता दिया कि उसके साथ उसके सर भी आ रहे हैं और जब तक ट्रेन चालू नहीं हो जाती, वो उनके पास ही रुकेंगे.. दादा घर से गाड़ी लेकर निकल चुका था.. मानसी ने आदित्य से कहा कि वो रोज़ जहाँ दादा का इंतज़ार करती है, वहां चलकर खड़े होते हैं..
ब्रांच से बाहर निकलते ही बाहर का वो खराब माहौल देखकर आदित्य को थोड़ी टेंशन होने लगी.. ट्रैफिक जाम लगा हुआ था.. बारिश बस धो धो करके बरस रही थी.. सड़कों के गड्ढे कीचड़ से भर गए थे.. उन्हीं गड्ढों से रास्ता निकालते हुए आदित्य और मानसी चल रहे थे.. ऐसा अचानक से इतनी बारिश आएगी ये किसी ने सोचा भी नहीं था.. उन दोनों के पास छाता भी नहीं था..
आदित्य परेशान होकर मानसी से कहने लगा..
"मिस मानसी, जब हम अंदर थे तब तो लग भी नहीं रहा था कि बाहर इतना भयंकर माहौल होगा... ये बारिश है या कोई तूफान?"
लेकिन मानसी तो इस बरसते पानी का पूरा मज़ा ले रही थी.. सड़क पर जमा हुए पानी में बारिश की बूंदों से बन रहे गोल गोल डिज़ाइनों को देखते हुए उसने आदित्य से पूछा, "सर, आपको बारिश पसंद नहीं है क्या?"
"अरे पसंद है, पर वो हल्की रिमझिम वाली... ऐसा भयंकर तूफान मचाने वाली, नुकसान करने वाली बारिश भला किसे पसंद आएगी?" आदित्य बोला..
"अरे बारिश का तो स्वभाव ही ऐसा है! वो आते और जाते वक्त ऐसे ही गड़गड़ाहट करती है... अपने आने और जाने की गवाही देती है वो..." मानसी हँसते हुए बोली..
ठीक सामने फुटपाथ पर एक मौसी मोगरे के गजरे बेच रही थी.. आते जाते लोगों से 'एक गजरा ले लो, सस्ते में दे दूंगी', कहकर मिन्नतें कर रही थी.. वो और उसकी गजरों की टोकरी पूरी तरह भीग चुकी थी.. मानसी उसके पास गई और उसने पूछा, "मौसी, कितने गजरे बचे हैं?"
"बस दस ही बचे हैं बेटा," गजरे वाली मौसी बोली..
"मुझे दे दो सारे," मानसी ने कहा और अपनी पर्स से पैसे निकालकर जल्दी से उस मौसी के हाथ में रख दिए..
तभी दादा वहां गाड़ी लेकर आ गया... गजरे वाली मौसी खुल्ले पैसे वापस देने के लिए मानसी के पीछे भागी...
"बेटा... ये बचे हुए पैसे तो लेती जा..."
"रहने दो मौसी, अगली बार हिसाब कर लेंगे," कहकर मानसी गाड़ी में बैठ गई..
दादा ने आदित्य को आगे का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठने को कहा.. मानसी ने गाड़ी में बैठने के बाद आदित्य सर और दादा की एक दूसरे से पहचान करा दी..
गाड़ी शहर से निकलकर एक छोटे से घाट पर चढ़ने लगी.. शहर के भीड़भाड़ वाले माहौल से बाहर निकलकर उनका सफर एक शांत और खूबसूरत गाँव के रास्ते पर शुरू हो गया.. एक तरफ ऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई... और बीच से गुज़रता वो घुमावदार काला रास्ता... जो बारिश के पानी से पूरी तरह धुलकर साफ हो गया था.. रास्ते के एक तरफ ऊंचे ऊंचे हरे भरे पेड़ बारिश में नहाए हुए खड़े थे.. आगे बढ़ने पर हरे भरे खेत दिखाई दिए, जो हवा और बारिश के खेल में पूरी तरह रम गए थे.. बाहर का वो सुहावना मौसम देखते हुए गाड़ी कब बंगले के गेट के अंदर दाखिल हो गई, ये आदित्य को पता ही नहीं चला..
मानसी गाड़ी से उतरी और सबसे पहले वो बगीचे में जाकर ये देखने लगी कि उसके लगाए हुए सारे पौधे ठीक हैं या नहीं.. इसी धुन में वो ये भी भूल गई कि आदित्य पहली बार उनके घर आया है.. मोगरे के फूलों से लदी वो बेल बारिश से पूरी तरह नीचे झुक गई थी.. मानसी उस बेल को पास के खंभे का सहारा देकर वापस ऊपर संभालने लगी.. डार्क वाइन कलर की जॉर्जेट की साड़ी और उसी रंग का स्लीवलेस ब्लाउज़... मानसी बारिश में भीग रही थी... और आदित्य उसका वो दिलकश रूप बस देखता ही जा रहा था..
दादा ने आदित्य से कहा, "आइए... आइए सर... अंदर आइए... हमारी मानसी को तो आप जानते ही हैं... अरे ये बगीचा तो जैसे उसकी जान है... खुद से ज़्यादा तो इसे इन पौधों की फिक्र रहती है... उनके आगे इसे कुछ याद ही नहीं रहता... सॉरी... पर आप घर में चलिए... वो आ जाएगी अभी..."
तभी आदित्य की याद आते ही मानसी उनके पीछे पीछे घर में दाखिल हुई.. "सॉरी सर, वो ज़रा मोगरे की बेल नीचे झुक गई थी ना... मैं बस उसे ठीक कर रही थी... आप आइए ना... बैठिए," कहते हुए मानसी ने तात्या, ओवि और पल्लवी भाभी से आदित्य की पहचान कराई..
"अरे, आपके बगीचे में तो इतने सारे फूल हैं, फिर अभी रास्ते में आपने उस गजरे वाली मौसी से इतने सारे गजरे क्यों खरीद लिए?" आदित्य ने हैरानी से पूछा.. "अरे आदित्य साहब... हमारी मानसी ऐसी ही है... उसे मोगरा बहुत पसंद है... वैसे तो उसे सारे ही फूल पसंद हैं... लेकिन फिर भी उस गजरे वाली मौसी की थोड़ी मदद हो जाए, इसलिए वो रोज़ उसके बचे हुए सारे गजरे खरीद लेती है... फिर वो गजरे बालों में लगाकर मानसी भी खुश हो जाती है और मंदिर में बैठे उसके सारे भगवान भी खुश हो जाते हैं!" तात्या हँसते हुए आदित्य को मानसी के बारे में बता रहे थे..
मानसी और आदित्य हाथ मुँह धोकर फ्रेश होकर आ गए... दादा ने आदित्य को पहनने के लिए अपना कुर्ता और पजामा दे दिया.. तभी सफेद सलवार कुर्ता पहने, बालों में तौलिया लपेटे, मानसी धूपपात्र में धूप जलाकर पूरे घर में घुमाने लगी.. उसका वो सादा सा पहनावा, वो महकती हुई धूप... और उस धूप के धुएं के सफेद छल्लों के बीच घूमती मानसी का वो मनमोहक रूप देखकर आदित्य एक बार फिर इतना खो गया कि उसे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि पास बैठे दादा और तात्या उसे ही देख रहे हैं..
थोड़ी देर बाद पल्लवी ने डाइनिंग टेबल पर सबके लिए खाना परोसना शुरू किया.. पल्लवी आदित्य को बहुत ज़िद करके सब कुछ परोस रही थी.. आदित्य बार बार 'नहीं नहीं' कह रहा था, पर पल्लवी, "खाकर तो देखिए, ये खीर और भिंडी की सब्ज़ी मानसी ने बनाई है... थोड़ी सी लेकर देखिए, आपको ज़रूर पसंद आएगी..." कहते हुए आदित्य की थाली में परोस रही थी..
ओवि उस वक्त स्कूल मे थी.. आदित्य और ओवि की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी.. आदित्य उससे उसके स्कूल और सहेलियों के बारे में पूछ रहा था.. पर तात्या बातों ही बातों में घुमा फिराकर उससे पूछ रहे थे... "आप रहते कहाँ हैं? घर में कौन कौन है? आपकी शादी हुई है या नहीं?"
दादा ने आदित्य के सोने का इंतज़ाम ऊपर के एक कमरे में कर दिया था.. ओवि और मानसी दोनों अपने कमरे की तरफ जाने लगीं.. ओवि मानसी से पूछ रही थी, "बुआ, ये कौन हैं? तुम्हारे फ्रेंड हैं क्या?" मानसी ने कहा, "अरे नहीं, ये कोई फ्रेंड नहीं हैं, ये मेरे बॉस हैं... ऑफिस में अगर इनकी कोई बात ना सुने तो ये बहुत गुस्सा करते हैं! तू भी सो जा अब जल्दी से, वरना ये तुझे भी डांटेंगे!"
"हह! वो मुझपर बिल्कुल गुस्सा नहीं करेंगे... उन्होंने तो मुझे बहुत प्यार किया... और अगली बार आते वक्त वो मेरे लिए गिफ्ट भी लेकर आने वाले हैं... मुझे तो तुम्हारे ये आदित्य अंकल बहुत अच्छे लगे!" पल्लवी, दादा और तात्या ओवि की ये बातें सुन रहे थे... पल्लवी हँसते हुए बोली, "हाँ भई, हमें भी आदित्य सर बहुत अच्छे लगे!"
"क्या भाभी, मैं आने के बाद से देख रही हूँ, आप सबने मिलकर मेरा जो ये कौतुक समारोह चला रखा है ना... और तात्या, आप तो कुछ भी पूछे जा रहे हैं उनसे? अरे बॉस हैं वो मेरे... कोई मुझे देखने नहीं आए हैं वो... प्लीज़ आप सब उनके साथ ऐसा बर्ताव मत कीजिए... उन्हें कैसा लग रहा होगा?" मानसी सब पर थोड़ा गुस्सा होने लगी..
मानसी को गुस्सा आया मतलब घर में सब चुप... बाहर अभी भी ज़ोर से बिजली कड़क रही थी.. मानसी ओवि से बोली, "चलो ओवि ताई, अब सोने चलो... नहीं तो आसमान वाली बुढ़िया आ जाएगी.." सब हँसते हुए अपने अपने कमरों में सोने चले गए.. आदित्य को तो नींद ही नहीं आ रही थी... बस मानसी का चेहरा ही उसकी आँखों के सामने घूम रहा था..
अगले दिन बारिश थोड़ी कम हो गई थी.. टीवी पर खबरें आ रही थीं कि ट्रेन धीरे धीरे चालू हो रही हैं.. रविवार होने की वजह से आज बैंक की छुट्टी थी.. आदित्य भी तैयार होकर, मानसी और उसके घरवालों ने जो खातिरदारी की थी उसके लिए उनका शुक्रिया अदा करके अपने घर जाने के लिए निकल पड़ा.. ओवि आदित्य से कह रही थी, "अंकल आज भी रुक जाओ ना, हम बहुत मज़े करेंगे.."
मानसी को छोड़कर जाने का आज आदित्य का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था.. वैसे तो मानसी उसे रोज़ ही ब्रांच में मिलती थी.. पर अब उसका ये बिल्कुल अलग रूप देखकर वो उसके प्यार में पड़ने लगा था..
...
आदित्य आजकल चुपचाप चोरी छुपे नज़रों से मानसी को निहारता रहता था.. पर बात करते वक्त वो ब्रांच में बाकियों के साथ जैसा बर्ताव करता था, मानसी के साथ भी वैसा ही बर्ताव करता था... लेकिन मानसी का पूरा ध्यान सिर्फ अपने काम पर ही रहता था.. आदित्य के मन में उसके लिए कुछ चल रहा है, इस बात का मानसी को ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था..
आजकल वो गजरे बेचने वाली मौसी कहीं गायब हो गई थी.. पर मानसी की डेस्क पर उसे रोज़ सुबह आते ही मोगरे का एक ताज़ा और खुशबूदार गजरा रखा हुआ मिलता था.. उसकी डेस्क पर रोज़ ये गजरा कौन रखता होगा? ये सवाल उसे परेशान करने लगा था.. क्योंकि बैंक में सबसे पहले मानसी और प्यून काका ही आते थे.. उसने काका से भी उस गजरे के बारे में पूछताछ की.. पर उन्होंने भी यही कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता.. बिना बात के पूरे ऑफिस में गपशप ना हो, इसलिए उसने किसी को कुछ नहीं बताया.. वो रोज़ चुपचाप उस गजरे को अपने पर्स में रख लेती थी..
ऐसे ही आठ दस दिन बीत गए.. एक दिन उसे उस गजरे के साथ एक चिट्ठी भी मिली...
"मिस मानसी... मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या और कैसे लिखूं? पर आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं... अगर आपके मन में भी मेरे लिए कुछ है, तो आज आप ये गजरा अपने पर्स में ना रखकर, अपने बालों में लगा लीजिएगा! ...........आदित्य!"
मानसी ने वो चिट्ठी पढ़ी और बिना कुछ कहे उस चिट्ठी को फाड़ दिया और गजरे को मसलकर कूड़ेदान में डाल दिया..
आदित्य को लगा था कि मानसी हँसते हुए उसके प्यार को अपना लेगी लेकिन मानसी उसकी चिट्ठी और गजरे को ऐसे कूड़ेदान में फेंक देगी, ये उसने सपने में भी नहीं सोचा था.. मानसी के इस बर्ताव से उसे बहुत बुरा लगा.. वो ज़िंदगी में पहली बार किसी के प्यार में पड़ा था... पर उसके प्यार का ऐसा अंजाम हुआ था.. मानसी के चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नहीं थे, ना खुशी के, ना दुख के और ना ही गुस्से के!
आदित्य को लगा कि मानसी उसके पास आकर पूछेगी कि 'आपने मेरी डेस्क पर ये गजरा और चिट्ठी क्यों रखी?' पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.. मानसी रोज़ की तरह बिल्कुल नॉर्मल बर्ताव कर रही थी.. लेकिन आदित्य अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हो गया था.. मुझमें ऐसी क्या कमी है जो मानसी ने मुझे मना कर दिया? कोई भी लड़की उसके एक इशारे पर उससे शादी करने को तैयार हो जाती... पर मानसी के अलावा आज तक उसके दिल में कोई उतरी ही नहीं थी..
मानसी रोज़ उसके सामने ही घूमती फिरती नज़र आती थी और वो उसे देखकर और भी ज़्यादा बेचैन हो जाता था.. चार पाँच दिन बीत गए, आदित्य ऑफिस नहीं आ रहा था.. पर मानसी ने किसी से भी उसके बारे में कुछ नहीं पूछा..
उस दिन अचानक वो गजरे वाली मौसी सामने आ गई.. वो मानसी को आवाज़ लगाने लगी, "बेटा, आज गजरा नहीं चाहिए क्या?" मानसी ने मौसी को पहचान लिया और पूछा,
"अरे मौसी, इतने दिन से कहाँ गायब थी तुम?"
"गायब कहाँ होऊंगी बेटा? रोज़ सुबह एक साहब आकर मेरे सारे गजरे खरीद कर ले जाता था... सामने वाले उस गणपति के मंदिर में चढ़ाने के लिए.. पर चार दिन हो गए, वो गजरे लेने आया ही नहीं.. दो दिन तो मैं भी उस गणपति के मंदिर के पास जाकर बैठी रही... पर वहां के फूल वाले मुझे उधर बैठने ही नहीं देते... तुझे दूँ क्या एकाध गजरा?" मौसी ने मानसी से पूछा..
"दे दो सारे," कहते हुए मानसी ने मौसी से सारे गजरे खरीद लिए.. आदित्य की याद आते ही उसकी आँखों में पानी भर आया.. आदित्य क्यों नहीं आ रहा? किससे पूछे? उसके दिमाग में कई सारे सवाल घूम रहे थे.. वो पहले गणपति मंदिर गई.. बाप्पा के दर्शन किए.. 'आदित्य सलामत रहे', ये प्रार्थना की और वापस बैंक आ गई..
ब्रांच में सब लोग उसी के बारे में बात कर रहे थे.. 'आदित्य सर को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है.. आने वाले रविवार को हम सब मिलकर उन्हें देखने चलेंगे!'
आदित्य हॉस्पिटल में भर्ती है? क्या हुआ होगा उसे? इन ख्यालों से मानसी भी बेचैन हो गई.. उस दिन उसका काम में बिल्कुल मन नहीं लगा.. वो हाफ डे लेकर घर आ गई.. उसका चेहरा पूरी तरह उतरा हुआ था.. आते ही पल्लवी ने पहचान लिया कि मानसी के साथ ज़रूर कुछ बात है.. वरना वो कभी ऐसे हाफ डे लेकर घर नहीं आती.. पल्लवी ने मानसी से पूछना शुरू किया,
"क्या हुआ है? तुम्हारा चेहरा ऐसे क्यों उतरा हुआ है? तबियत ठीक नहीं है क्या?" एक के बाद एक कई सवाल पूछ डाले..
मानसी ने इतने दिनों से जो कुछ भी हुआ और अब आदित्य के हॉस्पिटल में भर्ती होने की बात, सब कुछ पल्लवी को बता दिया.. पल्लवी ने मानसी से सीधा ही पूछ लिया,
"मानसी, सच सच बताना, प्यार व्यार में तो नहीं पड़ गई ना?"
पल्लवी तो मज़ाक कर रही थी पर मानसी को रोना आ रहा था,
"भाभी, मुझे नहीं पता मुझे क्या हो रहा है, पर मुझे आदित्य सर से मिलना है, उनसे माफी मांगनी है... मेरी वजह से तो उन्हें कुछ नहीं हुआ ना?"
पल्लवी ने मानसी को गले लगा लिया,
"अरे मेरी पगली, तुमने क्या किया है? उन्हें ही प्यार का रोग लग गया है, हो जाएंगे जल्दी ही ठीक, तुम फिक्र मत करो, तुम्हें मिलना है ना उनसे? कल ही छुट्टी लेकर जाओ उनसे मिलने, दिल की बातें ऐसे छुपा कर नहीं रखनी चाहिए, बोलकर मन हल्का कर लेना चाहिए, तुम्हारे दिल में उनके लिए जो कुछ भी है, वो तुम उन्हें बता दो!"
...
अगले दिन सुबह ही मानसी ने ब्रांच में तबियत खराब होने की वजह से ना आने की बात कह दी और आदित्य सर को देखने मुंबई के हॉस्पिटल में पहुँच गई.. मानसी ने कमरे के दरवाज़े से अंदर झाँक कर देखा.. बेड पर आदित्य लेटा हुआ था.. उसके हाथ में सलाइन की सुइयां लगी थीं.. दाढ़ी बढ़ी हुई थी.. नींद में भी वो बहुत थका हुआ लग रहा था.. साथ में कोई नहीं था.. अंदर कैसे जाएं, ये सोच ही रही थी कि आदित्य को दरवाज़े पर किसी के होने का एहसास हुआ.. मानसी को दरवाज़े के पास खड़ा देखकर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. वो बेड पर ही उठकर बैठने की कोशिश करने लगा.. मानसी दौड़कर उसके पास गई और उसे उठने में मदद करने लगी.. उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे सीधा करने लगी.. उसके अचानक हुए इस स्पर्श से आदित्य पूरी तरह घबरा गया.. मानसी भी जैसे कुछ याद आने पर, "सॉरी... सॉरी सर," कहते हुए झट से पीछे हट गई..
"आप यहाँ... अचानक?" आदित्य ने मानसी से पूछा..
सच कहें तो मानसी ने हॉस्पिटल में आकर आदित्य को एक बहुत प्यारा सरप्राइज़ दिया था.. मोरपंखी रंग के सलवार कुर्ते में मानसी और भी खूबसूरत लग रही थी... और उसका वो मोरपंखी स्पर्श! उसके मन में तो था ही कि मानसी उसे मिलने आए... पर वो यूं ही भाव खा रहा था..
"हाँ, मतलब... सर आप अकेले ही हैं? साथ में कोई नहीं है?" मानसी ने अपने यहाँ आने की असली वजह बताने से बचते हुए कहा..
"नहीं, आई है, आज डिस्चार्ज मिलने वाला है... इसलिए डॉक्टर से मिलने गई है, आ ही रही होगी, आप बैठिए," सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए आदित्य ने मानसी से कहा..
तभी आदित्य की आई कमरे में आ गई.. आदित्य ने मानसी की अपनी आई से पहचान कराई..
"ओह... तो तुम हो मिस मानसी... बहुत सुना है आदित्य से तुम्हारे बारे में!" आई ने कहा..
मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे.. वो कुछ बोलने ही वाली थी कि आदित्य ने बात बदलते हुए अपनी आई से पूछा,
"आई, क्या हुआ? मिल गया डिस्चार्ज?"
"अरे हाँ, डॉक्टर कह रहे हैं, बिल्कुल ठीक है तू, आज ही घर ले जाओ बोले, अच्छा मैं ज़रा बिलिंग का क्या करना है, पूछ कर आती हूँ.. मानसी तुम बैठोगी क्या आदित्य के पास थोड़ी देर, मुझे शायद वक्त लगेगा... तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं है ना?" आई ने पूछा..
पहले से ही घबराई हुई मानसी ने सिर हिलाकर हाँ कह दिया.. आई के जाने के बाद आदित्य ने मानसी से फिर पूछा,
"आप अकेले ही अचानक मुझे देखने कैसे आ गईं, मिस मानसी?"
"आपकी तबियत खराब होने का पता चला तो मुझसे रहा नहीं गया इसलिए आ गई... नहीं आना चाहिए था क्या?" मानसी ने आदित्य की तरफ देखते हुए कहा..
उसके चेहरे के भाव पढ़ने और आगे कुछ पूछने ही वाला था कि आई हाथ में प्रसाद और मोगरे का गजरा लेकर आ गई..
"ये क्या? तुम तो हॉस्पिटल का बिल भरने गई थी ना?" आदित्य ने आई से पूछा..
"अरे हाँ, नीचे बिलिंग काउंटर पर बिल भरा और सामने ही बाप्पा का मंदिर था, तो वहां होकर आ गई.. तू जल्दी ठीक हो गया ना, इसलिए उनका शुक्रिया तो अदा करना चाहिए ना? वहां के पंडित जी ने ये प्रसाद और बाप्पा के चरणों का गजरा दिया है," आई ने आदित्य के हाथ में प्रसाद देते हुए कहा..
"आई वो गजरा देना ज़रा," आदित्य ने आई से कहा..
आई ने मानसी को प्रसाद दिया और आदित्य को गजरा देते हुए बोली, "क्यों रे बाबा, तुझे कब से मोगरा पसंद आने लगा?"
"मुझे नहीं, मिस मानसी को पसंद है, लीजिए मिस मानसी, बाप्पा का प्रसाद!" आदित्य ने मानसी के सामने गजरा कर दिया..
मानसी ने एक पल के लिए आदित्य की तरफ देखा और गजरा अपने बालों में लगा लिया..
"बाप्पा की कृपा हो गई समझो," आदित्य ने मानसी की तरफ देखते हुए कहा..
मानसी धीरे से शरमा गई.. वो कुछ नहीं बोली पर बिना कुछ कहे ही आदित्य को उसके दिल की सारी बात समझ आ गई थी.. आदित्य बस मंत्रमुग्ध होकर उसे ही देख रहा था.. एक ही पल में उसकी बीमारी, उसके मन की सारी उदासी दूर हो गई थी..
आई को भी आदित्य और मानसी के मन में क्या चल रहा है, इसका अंदाज़ा लग गया था..
...
आदित्य के ठीक होने के कुछ दिनों बाद आदित्य के आई पापा ने मानसी के घर आकर पूरे रीति-रिवाज़ के साथ उसकी शादी का प्रस्ताव रखा.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी को तो आदित्य दामाद के रूप में पहले से ही पसंद था.. जब शादी तय ही हो गई है तो बिना बात के इंतज़ार क्यों करना, इसलिए दो महीने बाद की ही तारीख पक्की कर दी गई.. दोनों घरों में खुशी का माहौल था.. आदित्य को तो अब बस इसी बात की जल्दी थी कि कब शादी हो और मानसी उसके घर आए.. शादी मानसी के घर पर ही होने वाली थी.. आदित्य इकलौता बेटा और मानसी इस घर की लाडली बेटी होने की वजह से शादी बहुत धूमधाम से होने वाली थी.. मानसी खुद को दुल्हन के रूप में इमेजिन करके बार बार आईने में देखकर शरमा रही थी.. आदित्य भी मानसी के ही सपने देख रहा था..
शादी में बस आठ दिन बचे थे.. ज़ोरों शोरों से तैयारी चल रही थी.. मंडप सज गया था.. रोशनी हो गई थी.. करीबी रिश्तेदार आना शुरू हो गए थे.. शादी की इस भागदौड़ में आठ दिनों से मानसी और आदित्य मिल नहीं पाए थे.. अब शादी में सिर्फ चार दिन बचे थे.. दो दिन बाद मेहंदी, फिर हल्दी और फिर शादी... मानसी और आदित्य ज़िंदगी भर के लिए एक दूसरे के होने वाले थे.. पर आदित्य को मानसी से मिले बिना चैन ही नहीं पड़ रहा था.. घर के बड़ों ने दोनों को समझा कर रखा था,
'अब तुम दोनों शादी के बाद ही मिलना!'
पर आदित्य ने मानसी से कैसे भी करके आज मुझे मिलने आ जाओ, ऐसी ज़िद की.. आखिर में मानसी से भी रहा नहीं गया और थोड़ी शॉपिंग बाकी है, मुंबई जाकर आती हूँ, ऐसा कहकर वो घर से निकल पड़ी.. मानसी ने सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए ज़िंदगी में पहली बार घर पर झूठ बोला था..
आज इतने दिनों बाद मानसी से मिलकर आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे और क्या ना करे.. आज तक उसने मोगरे के गजरे के अलावा उसे कोई दूसरा गिफ्ट नहीं दिया था! दोनों ने मिलकर खूब शॉपिंग की, खूब घूमे, और इस सब में उन्हें वक्त का अंदाज़ा ही नहीं रहा.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे और पहुँचने में अभी दो तीन घंटे और लगेंगे, ये सोचकर मानसी जल्दी जल्दी में निकल पड़ी.. आदित्य ने उसे स्टेशन तक छोड़ा..
"आगे मैं अकेली चली जाऊंगी, तुम जाओ, अब सीधा शादी के दिन ही मिलेंगे," कहते हुए मानसी ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म पर आ गई.. आदित्य को तो अब ये जुदाई बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रही थी, पर उससे विदा लेकर मानसी निकल चुकी थी..
शाम का वक्त था! प्लेटफॉर्म पर खचाखच भीड़ थी! ट्रेन आई! हाथ में पकड़े भारी बैग और अपना दुपट्टा संभालते हुए, मानसी किसी तरह उस भीड़ में ट्रेन के अंदर चढ़ी.. अंदर पैर रखने की भी जगह नहीं थी.. ट्रेन के खंभे को पकड़कर मानसी बस किसी तरह खड़ी थी.. ट्रेन धीरे धीरे झटके खाते हुए आगे बढ़ी, प्लेटफॉर्म से निकलते ही ट्रेन ने अचानक तेज़ रफ्तार पकड़ ली और आगे खड़ी भीड़ का सारा वज़न मानसी पर आने लगा... और इससे पहले कि उसे कुछ समझ आता, मानसी उस तेज़ दौड़ती ट्रेन से बाहर नीचे गिर पड़ी!
...
मानसी को जब होश आया तो वो एक हॉस्पिटल में थी.. उसके पूरे शरीर पर भयानक चोटें आई थीं.. हाथों और पैरों पर प्लास्टर बंधा था.. तात्या, दादा, आदित्य, पल्लवी भाभी... सब उसके पास ही थे.. आज असल में उनकी शादी का दिन था, पर...
...
दो महीने तक मानसी हॉस्पिटल में ही रही.. 'ये सब मेरी वजह से ही हुआ है', ये सोच सोचकर आदित्य अंदर ही अंदर घुट रहा था.. उसने इतने दिनों में एक पल के लिए भी मानसी को अकेला नहीं छोड़ा था.. मानसी की कमर में बहुत गहरी चोट आई थी.. वो अभी भी ठीक से बैठ और चल नहीं पाती थी.. कई छोटे बड़े ऑपरेशन करने पड़े थे.. पर मानसी अंदर से बहुत मज़बूत थी.. वो उठने और चलने की पूरी कोशिश कर रही थी.. तात्या, दादा, पल्लवी, आदित्य... सब बहुत टेंशन में थे.. डॉक्टरों के मुताबिक मानसी को पूरी तरह से ठीक होने में कितना वक्त लगेगा? मानसी पूरी तरह ठीक हो भी पाएगी या नहीं? वो फिर से खुद अपने पैरों पर चल पाएगी या नहीं? या फिर ज़िंदगी भर उसे ऐसे ही रहना पड़ेगा... कोई कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता था.. पर मानसी को पूरा भरोसा था कि वो बहुत जल्द अपने पैरों पर चलेगी.. उसके अपने लोग और आदित्य सब उसके साथ थे... इसलिए उसे किसी बात की कोई फिक्र नहीं थी..
...
मानसी के एक्सीडेंट को एक साल से ज़्यादा का वक्त बीत चुका था.. मानसी अब धीरे धीरे चलने लगी थी.. अपना सारा काम खुद कर सकती थी.. आदित्य रोज़ शाम को मोगरे का गजरा लेकर उससे मिलने आता था.. इतने दिनों में वो पहली बार बैंक के किसी काम से दो दिन के लिए बाहर गया था.. पल्लवी भाभी के किसी करीबी रिश्तेदार के यहाँ कोई कार्यक्रम था.. दादा, भाभी और ओवि वहां जाने वाले थे.. तात्या मानसी के पास रुकने वाले थे, पर मानसी ने ही ज़िद करके उन्हें दादा और भाभी के साथ भेज दिया.. इतने दिनों से मानसी की इस हालत की वजह से उसे छोड़कर कोई भी घर से बाहर नहीं गया था.. पर अब मानसी ठीक हो रही थी.. आखिर में मानसी की ज़िद के आगे हारकर वो लोग गंगू ताई को उसके पास छोड़कर चले गए..
...
मानसी अकेली ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर का नज़ारा देख रही थी.. आसमान में काले बादल घिर रहे थे.. ऐसा लग रहा था कि आज पक्का बारिश होगी.. हवा का एक हल्का सा झोंका मन को सुकून दे रहा था.. और तभी अचानक आसमान में बिजली कड़कने लगी.. पहली बारिश की एक तेज़ बौछार आई और भीगी हुई मिट्टी की वो सोंधी महक मन को खुश कर गई!
गंगू ताई बाहर कुछ काम कर रही थीं.. थोड़ी ही देर में वो मानसी को बताने आईं कि उससे कोई मिलने आया है.. मानसी ने गंगू ताई से कहा कि उन्हें अंदर ले आइए..
मानसी की ही उम्र की एक बेहद खूबसूरत औरत गंगू ताई के साथ कमरे में आई.. उसे देखकर ही लग रहा था कि वो प्रेगनेंट है.. मानसी ने उसे सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा और गंगू ताई को पानी और चाय लाने के लिए भेज दिया.. मानसी ने उससे पूछा,
"माफ कीजिएगा, पर मैंने आपको पहचाना नहीं.."
"हाँ मुझे पता है, आपने मुझे नहीं पहचाना, पर मैं आपको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ! मैं आपके आदित्य सर की पत्नी हूँ, नेहा!"
"क्या? ये कैसे मुमकिन है... आप ये क्या कह रही हैं??" मानसी को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई हो..
'ये औरत आखिर है कौन? अगर आदित्य की सच में शादी हो गई है तो मुझे किसी ने ये बात क्यों नहीं बताई?' मानसी के दिमाग में सवालों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ था..
"मानसी ताई, सच कहूं तो सबको पता है कि मेरी और आदित्य की शादी आठ महीने पहले ही हो चुकी है... आपके घर वालों को भी ये बात पता है... पर अगर आपको ये सब पता चला तो आपको बहुत तकलीफ होगी, इसलिए आदित्य ने मुझे भी कसम दी थी कि मैं आपको कुछ ना बताऊं..
ये बात भी सच है कि आदित्य आपके अलावा किसी और से शादी करने को तैयार ही नहीं थे... पर उनकी आई की वजह से उन्हें मुझसे ज़बरदस्ती शादी करनी पड़ी.. अगर वो मुझसे शादी नहीं करते तो उनकी आई ने खुद को कुछ कर लेने की धमकी दी थी.. मजबूरी में उन्हें अपनी आई की बात माननी पड़ी.. शादी से पहले उन्होंने मुझे आप दोनों के बारे में सब कुछ बता दिया था, उन्होंने तो मुझसे ये भी कहा था कि मैं खुद इस शादी से इंकार कर दूँ.. पर मैं एक अनाथ लड़की हूँ.. आदित्य जैसा पति और इतना अच्छा घर परिवार मिलेगा, ये सोचकर मैंने इस शादी के लिए हाँ कर दी.. उन्होंने सिर्फ अपनी आई की खुशी के लिए मुझसे शादी की है.. वो शरीर से भले ही मेरे पास हों, पर मन से वो हमेशा आपके ही पास रहते हैं.. वो रोज़ आपसे मिलने आते हैं... उन्होंने मुझसे कभी कुछ नहीं छुपाया.. पर अब मैं उनके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ.. अब इस हालत में मुझे और मेरे बच्चे को उनकी बहुत ज़रूरत है.. मैं अपने आने वाले बच्चे के लिए आपसे आपके आदित्य की भीख मांगती हूँ.. क्या आप मेरे बच्चे के लिए प्लीज़ इतना कर देंगी? अगर उन्हें पता चला कि मैंने यहाँ आकर आपको ये सब बता दिया है, तो वो मेरी शक्ल भी नहीं देखेंगे... आप भी तो एक औरत हैं... मेरे दिल का दर्द आप ज़रूर समझेंगी, बस यही सोचकर मैं आपके पास आई हूँ.."
नेहा बुरी तरह रो रही थी और मानसी फटी आँखों से बस उसे ही देखे जा रही थी.. नेहा का एक एक लफ्ज़ मानसी के कानों में खौलते हुए तेल की तरह गिर रहा था.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे पूरा कमरा उसके चारों तरफ गोल गोल घूम रहा हो.. इतने दिनों से उसने जो भी हसीन सपने सजाए थे, वो पल भर में ही टूट कर मिट्टी में मिल गए थे..
"मेरे बच्चे का भविष्य अब सिर्फ आपके ही हाथों में है... अब मैं चलती हूँ... आगे क्या करना है, ये फैसला अब आप ही कीजिएगा..." इतना कहकर नेहा वहां से चली गई..
बाहर बारिश का ज़ोर अब थोड़ा कम हो गया था, पर मानसी की ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा और खौफनाक तूफान आ गया था.. अनगिनत सवालों के काले बादल उसके मन में हाहाकार मचा रहे थे.. नेहा का हर एक लफ्ज़ ज़हर बनकर उसके दिल में उतर रहा था..
'क्या आदित्य ने मुझे धोखा दिया? नहीं! पर वो भी अपनी आई का दिल कैसे तोड़ता... कौन सी माँ अपने सही सलामत बेटे की शादी मुझ जैसी अपाहिज लड़की से खुशी खुशी करवाएगी?? पर फिर इस सब में मेरी क्या गलती है? कितने सारे सपने देखे थे मैंने... अब आदित्य के बिना कैसे जिऊंगी मैं? पर इसमें उस बेचारी नेहा और इस दुनिया में आने वाले उस मासूम बच्चे की क्या गलती है? हे भगवान! ये सब मेरे ही नसीब में क्यों लिखा था? घर के सब लोगों ने मुझसे आदित्य की शादी की बात क्यों छुपा कर रखी?'
मानसी के दिल और दिमाग में एक भयानक जंग छिड़ी हुई थी.. पर अब उसने अपना फैसला कर लिया था.. नेहा उससे मिलने आई थी और उसे आदित्य का सारा सच पता चल गया है, ये बात उसे अपने घरवालों को बिल्कुल नहीं बतानी थी.. इतने दिनों से तात्या, दादा और भाभी के चेहरे पर उसे हमेशा एक अनजाना सा डर दिखाई देता था.. उसे यही लगता था कि उसके एक्सीडेंट की वजह से वो लोग टेंशन में रहते हैं.. शादी से पहले सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए उसे घर पर झूठ बोलना पड़ा था.. आज वो उसी झूठ की इतनी बड़ी सज़ा भुगत रही थी.. आई के जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था.. उसे इस बात का पूरा एहसास था.. अपनी वजह से वो तात्या और दादा को कभी भी दुखी नहीं देख सकती थी.. इस दर्दनाक एक्सीडेंट और इतने सारे ऑपरेशन्स की वजह से होने वाले असहनीय दर्द को भी उसने कभी अपने चेहरे पर नहीं आने दिया था... पर आज नेहा ने आदित्य के बारे में जो सच बताया था, उससे उसके दिल पर जो गहरे ज़ख्म लगे थे, उनके दर्द को अपने चेहरे पर छुपाना अब उसके लिए नामुमकिन सा हो रहा था.. वो अपना दुख तो एक बार के लिए सह भी सकती है, पर उसका परिवार उसे इस तरह टूटते हुए कभी नहीं देख पाएगा..
अगले दो दिनों तक मानसी अपने घरवालों के सामने झूठी खुशी का नकाब पहनकर घूमती रही.. आज फिर से उसे अपनों के साथ ये झूठा नाटक करना पड़ रहा था... सिर्फ आदित्य और उसके परिवार की खुशी के लिए!
दो दिन बाद आदित्य अपना काम खत्म करके शाम को हमेशा की तरह मानसी के लिए मोगरे का गजरा लेकर आया.. मानसी अपने कमरे में ही थी..
आदित्य अंदर आया और मानसी के बिल्कुल करीब जाकर उसके बालों में वो गजरा लगाने लगा.. "रुकिए आदित्य सर, प्लीज़ मुझे हाथ मत लगाइए!" मानसी ने हमेशा की तरह अपने चेहरे के भावों को सख्ती से छुपाते हुए आदित्य से कहा..
मानसी के इस तरह अचानक बदल जाने की वजह आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रही थी.. "मानसी, क्या हुआ? मैं दो दिन तक तुमसे मिलने नहीं आ पाया, इसलिए इतना गुस्सा आ रहा है क्या?" आदित्य ने बड़ी ही मासूमियत का नाटक करते हुए मानसी से पूछा..
"सर, प्लीज़, मुझे आपके बारे में सब कुछ पता चल गया है! आप जाइए यहाँ से! आप मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए, मेरे मुकाबले आपकी पत्नी और आपके आने वाले बच्चे को आपकी कहीं ज़्यादा ज़रूरत है..."
"मानसी..." आदित्य के मन में कई सवाल चल रहे थे.. मानसी को ये सब किसने बताया होगा?
"मेरे लिए आपने आज तक जो कुछ भी किया है, उसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ..." असल में मानसी को आदित्य के गले लगकर खूब रोना था... उससे पूछना था, "तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों एक ही वक्त पर दो लड़कियों की ज़िंदगी के साथ खेल रहे थे?"
उसके सीने में जैसे आग की लपटें उठ रही थीं.. पर अपनी आँखों में आने वाले आंसुओं को उसने बहुत मुश्किल से रोक कर रखा था.. अगर वो इस वक्त टूट जाती, तो आदित्य को खुद से दूर करना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता... और शायद वो कभी आदित्य को खुद से दूर नहीं कर पाती..
"सर, आप एक आदमी हैं... आपको कोई कुछ नहीं कहेगा... पर एक शादीशुदा आदमी के साथ मेरे रिश्ते हैं, ये बात अगर किसी को पता चली तो लोग मेरे चरित्र पर तो उंगलियां उठाएंगे ही, साथ ही मेरे घर वालों के संस्कारों को भी ताने मारेंगे... मेरी वजह से मेरे घर वालों को कोई कुछ कहे, ये मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी... आपकी रखेल बनकर रहने से तो मुझे मर जाना ज़्यादा आसान लगेगा..."
"मानसी... ये क्या कह रही हो तुम? तुम्हें कुछ समझ भी आ रहा है?" आदित्य के दिल को मानसी के ये शब्द तीरों की तरह आर पार चीर रहे थे..
"मैं सच ही कह रही हूँ सर, प्लीज़ मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए... मुझ पर भरोसा रखिए, मैं कोई भी गलत कदम नहीं उठाऊंगी... मेरी किस्मत में जो लिखा है उसे मैंने खुशी खुशी अपना लिया है... आप भी अपनी गृहस्थी में खुश रहिए... अब इसके आगे हम एक दूसरे से ना ही मिलें तो अच्छा है... आपके और मेरे, दोनों के लिए... प्लीज़ सर, अगर आपने कभी भी मुझसे सच में प्यार किया है ना, तो बस मेरी इतनी सी बात मान लीजिए... प्लीज़!"
मानसी आदित्य की तरफ देखकर बोल रही थी... आज भी उसके चेहरे पर वही शांत और सुन्न भाव दिखाई दे रहा था..
'क्या मानसी इतनी आसानी से ये सब सच में अपना सकती है? या फिर वो मुझे और खुद को भी धोखा दे रही है??'
आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि मानसी के मन में आखिर चल क्या रहा है... उसका ये बर्ताव उसे बेमौसम बारिश की तरह लग रहा था... मन में दुख के काले बादल जमा करके रखना... बस भर आना पर बरसना नहीं... और फिर किसी दिन अचानक गड़गड़ाहट के साथ मूसलाधार बरसना... बिना रुके!
मानसी आदित्य की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी बाहर वाले कमरे में बैठे हुए थे.. आदित्य किसी से कुछ भी कहे बिना जल्दबाज़ी में वहां से चला गया.. मानसी अपने मन के उस भयानक तूफान को छुपाने की कितनी भी कोशिश कर रही हो, लेकिन तात्या और दादा उसके स्वभाव को बहुत अच्छी तरह जानते थे... जो हुआ है वो कभी ना कभी तो होना ही था... पर इस सब से मानसी को बाहर कैसे निकालें, ये उन्हें समझ नहीं आ रहा था.. मानसी ऊपर से भले ही सबको अपने खुश होने का दिखावा कर रही थी, लेकिन अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी.. उसने अपने चारों तरफ पाबंदियों का एक जाल सा बुन लिया था.. हमेशा तितली की तरह उड़ने और चहकने वाली मानसी अब बहुत शांत हो गई थी.. उसे गहरे रंगों और फूलों का बहुत शौक था! पर अब उन्हें भी उसने खुद से दूर कर दिया था.. अपनी जवानी के दिनों में ही वो किसी उम्रदराज़ औरत की तरह दिखने लगी थी.. आँखों पर चश्मा... लंबे बालों की चोटी की जगह अब वो बालों का जूड़ा बांधने लगी थी... मोगरा तो जैसे उसकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए दूर हो गया था... आदित्य की याद दिलाने वाली कोई भी चीज़ अब उसे अपने आस पास नहीं चाहिए थी..
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मानसी अब पूरी तरह से ठीक हो गई थी.. आदित्य मानसी से बात करने की बहुत कोशिश कर रहा था... पर तात्या, दादा और भाभी को भी मानसी की ही बात सही लग रही थी.. अगर आदित्य ने नेहा से शादी कर ली है... और वो उसके बच्चे की माँ बनने वाली है, तो उसे अब नेहा का ही साथ देना चाहिए... उसके साथ ईमानदारी से रहना चाहिए... सिर्फ भावनाओं में बहकर कोई भी सुखी नहीं होने वाला था... ना नेहा, ना आदित्य, और नेहा की खुशियां छीनकर मानसी भी कभी सुखी नहीं रह पाती.. उसकी वजह से कोई दुखी हो, ये उसे बिल्कुल मंज़ूर नहीं था... और नेहा की कोख में पलने वाली वो नन्ही सी जान.. इस सब में उसका भला क्या कसूर था?? ... मानसी आदित्य से बहुत दूर हो गई थी... पर आदित्य के साथ ही उसके मन में मौजूद वो 'प्यार' का अहसास भी जैसे हमेशा के लिए मर गया था.. वो खुद से प्यार करना ही भूल गई थी.. सबके साथ घुल मिलकर, हँसते खेलते रहने वाली मानसी अब बिल्कुल अलग थलग और अकेली रहने लगी थी..
मानसी से कहा गया कि अगर उसकी इच्छा हो तो वो वापस बैंक जॉइन कर सकती है.. तात्या को भी लग रहा था कि अगर मानसी काम में बिज़ी हो जाएगी, तो इन दो सालों में उसकी ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ है, उसे भुलाने में उसे मदद मिलेगी... पर अगर उसी ब्रांच में आदित्य भी होगा तो उसके लिए सब कुछ फिर से बहुत मुश्किल हो जाएगा..
उस दिन पल्लवी भाभी से मिलने गाँव की एक काकी आई हुई थीं.. वो पल्लवी से मानसी के बारे में पूछताछ कर रही थीं और मानसी ने उनकी बातें सुन लीं,
"पल्लवी, देख बेटी, इस तरह टूटी हुई शादी वाली कुंवारी लड़की को घर में बिठाकर रखने से अच्छा है कि कोई ठीक ठाक रिश्ता देखकर इसके हाथ पीले कर दो! मानसी अगर ऐसे ही घर में बैठी रही तो तुम्हारी गृहस्थी कैसे आगे बढ़ेगी? मंदार और उसके तात्या तो बस उसी की फिक्र में लगे रहते हैं, ओवि और तुम्हारी किसी को फिक्र है क्या? देख ले अगर मेरी बात समझ आए तो! मुझे तो डर ही लगता है कि कहीं उस मानसी की तुम्हारे और मंदार के सुख चैन को नज़र ना लग जाए!"
"अरे ये आप क्या कह रही हैं काकी? आप हमारी फिक्र मत कीजिए, मानसी का क्या करना है वो हम खुद देख लेंगे!" पल्लवी ने सचमुच उन काकी को घर से भगा ही दिया.. पर काकी की वो कड़वी बातें मानसी के दिल में इस कदर घर कर गईं कि उसने तय कर लिया कि अब उसे इस घर में नहीं रहना है.. अपनी वजह से वो दादा और भाभी को कोई परेशानी नहीं होने देना चाहती थी..
मानसी ने बैंक में ट्रांसफर के लिए अर्जी दे दी.. बहुत जल्द उसे मुंबई के एक इलाके में ट्रांसफर का ऑर्डर मिल गया.. तात्या, दादा और भाभी को मानसी का घर से दूर रहना बिल्कुल सही नहीं लग रहा था... पर मानसी की ज़िद के आगे किसी की एक ना चली.. आखिर में इस शर्त पर उसे जाने की इजाज़त मिली कि तात्या भी उसके साथ ही रहेंगे.. नया शहर... नए लोग... मानसी ने खुद को काम में इतना ज़्यादा उलझा लिया कि उसे अपना वो दर्दनाक बीता हुआ कल याद करने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी..
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सालों साल बीत गए... पर मानसी अभी भी शादी के नाम से ही कतराती थी.. उम्र के साथ तात्या की बीमारियां और तकलीफें बढ़ती जा रही थीं.. शहर की वो आबोहवा तात्या को रास नहीं आ रही थी.. दादा तात्या को वापस गाँव लेकर आ गए.. मानसी बस तात्या को देखने के लिए घर आती थी, पर दो दिन रहकर वापस अपने काम पर लौट जाती थी.. ओवि अपनी आगे की पढ़ाई के लिए मानसी के पास रहने आ गई.. बचपन से ही ओवि अपनी बुआ पर जान छिड़कती थी! ओवि की वजह से मानसी को जीने का एक नया मकसद मिल गया था.. उसका पूरा दिन बस अपनी बैंक और ओवि की ज़रूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता था! अब तो ओवि भी बड़ी हो गई थी और उसने अपने लिए एक जीवनसाथी चुन लिया था..
ओवि की शादी तय हो गई.. पर मानसी के दिल में जैसे फिर से एक अजीब सा खालीपन आ गया था.. ओवि की ज़िंदगी संवरने वाली है... उसे उसकी पसंद का जीवनसाथी मिल गया है, इस बात की उसे बहुत खुशी थी, पर अब मानसी फिर से बिल्कुल अकेली पड़ने वाली थी..
उसकी लाडली ओवि की शादी थी, फिर भी 'छुट्टी नहीं मिल रही है', ऐसा बहाना करके वो शादी से सिर्फ दो दिन पहले ही घर आई.. घर के सामने वो सजा हुआ मंडप, वो रोशनी देखकर उसका सारा अतीत फिर से उसकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो गया.. फिर भी हमेशा की तरह वो अपनी आँखों का सारा दर्द और सारे भाव सबसे छुपा रही थी..
ओवि की शादी में मानसी का बचपन का दोस्त संकेत भी आया हुआ था.. इतने सालों तक वो विदेश में था.. उसे लगता था कि मानसी आदित्य से शादी करके अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश होगी, पर जब उसने मानसी को देखा, तो उसके चेहरे की वो गहरी उदासी उससे छुप नहीं पाई.. अपनी सगी भतीजी की शादी में भी मानसी एकदम सादे से कपड़ों में थी.. हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, गले में बारीक मोतियों की एक माला... और वैसे ही छोटे से कान के झुमके.. बस इतना सा ही उसका श्रृंगार था... वरना सजने संवरने और गहनों का शौक रखने वाली मानसी बहुत ही फीकी लग रही थी... हालांकि उस सादगी में भी उसकी खूबसूरती कहीं छुप नहीं रही थी... पर उसका चेहरा बहुत ही उदास लग रहा था.. संकेत इतने सालों बाद उससे मिल रहा था.. पर मानसी उससे भी बहुत कट कर और रूखेपन से बात कर रही थी.. संकेत ने उससे बात करने की बहुत कोशिश की... पर मानसी उससे दूर दूर ही रह रही थी..
संकेत और मानसी की... बचपन से ही बहुत गहरी और पक्की दोस्ती थी! मानसी अपनी हर छोटी बड़ी बात उसके साथ शेयर किया करती थी..
संकेत गाँव के अमीर इनामदार काका का छोटा बेटा था! मानसी और संकेत दोनों साथ साथ ही पले बढ़े थे.. दोनों ही पढ़ाई, खेलकूद और मस्ती करने में सबसे आगे थे! स्कूल से लेकर कॉलेज तक दोनों हमेशा एक साथ ही रहे.. मानसी और संकेत एक दूसरे से कभी कोई बात नहीं छुपाते थे और अगर कोई कुछ छुपाने की कोशिश भी करता, तो बिना कहे ही वो एक दूसरे के मन की बात पढ़ लेते थे.. गाँव में तो सबको यही लगता था कि मानसी और संकेत बड़े होकर एक दूसरे से ही शादी करेंगे.. उन दोनों की जोड़ी एकदम लक्ष्मी नारायण की तरह जमेगी... मेड फॉर ईच अदर... संकेत को भी मानसी बहुत पसंद थी.. जब से उसने होश संभाला था, वो मानसी से ही प्यार करता था.. पर मानसी ने अपनी उस दोस्ती से आगे बढ़कर संकेत के बारे में कभी कुछ ऐसा सोचा ही नहीं था! संकेत उसके लिए बस एक बहुत अच्छा दोस्त था..
गाँव के इनामदार होने का मतलब था सबसे रईस परिवार! पर संकेत को अपनी उस रईसी का ज़रा सा भी घमंड नहीं था.. अपने पिता की दौलत पर ऐश करने के बजाय, उसने तय किया था कि वो खुद मेहनत करके, अपनी काबिलियत से अपने पैरों पर खड़ा होगा और उसके बाद ही मानसी से शादी की बात करेगा.. कॉलेज की पढ़ाई पूरी होते ही वो आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला गया.. पढ़ाई पूरी होते ही उसे वहीं एक बहुत अच्छी सैलरी वाली नौकरी भी मिल गई.. अब वो मानसी के साथ अपनी शादी के सपने सजा रहा था.. वो बस इसी बेताबी में था कि कब एक बार भारत जाकर मानसी को अपने दिल की सारी बात बताए.. वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर खास मानसी से ही मिलने भारत, अपने गाँव वापस आया था..
उस दिन शाम को वो अपने सारे दोस्तों के सामने मानसी को प्रपोज़ करने वाला था.. वो इतने दिनों बाद भारत आया था, इसलिए सारे दोस्त उससे मिलने उनकी हमेशा वाली जगह पर जमा हुए थे... मानसी भी वहां थी.. पर इससे पहले कि वो अपने दिल की बात मानसी से कह पाता, मानसी ने खुद ही सबको आदित्य के बारे में बता दिया.. मानसी उस दिन बहुत खुश थी.. आदित्य कैसा दिखता है, उसका स्वभाव कैसा है, वो दोनों कैसे मिले... सब कुछ बहुत उत्साह के साथ बता रही थी..
संकेत अपने दिल में छिपा मानसी के लिए वो प्यार किसी के सामने भी ज़ाहिर नहीं कर पाया.. उसे बस ऐसा लग रहा था कि अचानक उसके हाथों से कुछ बहुत कीमती चीज़ फिसलती जा रही है.. इतने दिनों से उसने जो भी सपने सजाए थे, वो अब कभी पूरे नहीं हो सकते थे.. पर मानसी खुश है... वो आदित्य के साथ बहुत सुखी रहेगी, इसी बात से संकेत को सुकून मिल रहा था.. उसका अपना प्यार भले ही उसे ना मिला हो, पर मानसी ने जिससे प्यार किया, वो आदित्य उसे मिल गया! मानसी की खुशी में ही संकेत अपनी खुशी ढूंढ रहा था.. मानसी को बिना कुछ बताए ही वो हमेशा के लिए विदेश चला गया!
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मानसी के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वो उसे देखने आया था.. पर आदित्य उस वक्त मानसी के साथ ही था... वो उसकी जी जान से देखभाल कर रहा था... मानसी को एक बहुत अच्छा जीवनसाथी मिल गया था... वो हमेशा ऐसे ही खुश रहे... संकेत को लगा कि मानसी की इस हालत में वो उसके लिए अपने मन का प्यार और फिक्र शायद छुपा नहीं पाएगा, इसलिए वो उसे बिना मिले ही वहां से चला गया.. उसके माता पिता भी गाँव की उस इतनी बड़ी हवेली में अकेले ही रहते थे, इसलिए उसका बड़ा भाई, जो नौकरी के सिलसिले में अपने परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता था, वो माता पिता को भी अपने साथ वहीं ले गया.. अब गाँव में संकेत का अपना कोई नहीं रहता था.. इसलिए उसे यही लगता रहा कि इतने सालों में मानसी अपनी गृहस्थी में बहुत सुखी होगी... मानसी की याद उसे कमज़ोर ना कर दे, इसलिए जब भी दोस्तों का फोन आता, तो वो उनसे भी मानसी के बारे में कभी कुछ नहीं पूछता था.. और संकेत उसका इतना करीबी दोस्त होने के बावजूद, मानसी ने भी कभी उससे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की.. और आज जब इतने सालों बाद मानसी उसे मिली, तो इस हालत में!
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ओवि की दो महीने पहले ही शादी हुई थी और वो अपने पति प्रवीण के साथ बैंगलोर चली गई थी.. प्रवीण की नौकरी वहीं पर थी.. ओवि और प्रवीण शादी के बाद पहली बार आठ दस दिनों के लिए गाँव आए हुए थे.. इसके बाद इतनी जल्दी उन्हें आई, तात्या, बुआ और दादा से मिलने का मौका नहीं मिलने वाला था.. मानसी ने भी खास ओवि के लिए ही छुट्टी ली थी और चार दिन घर पर रहने आई थी..
आज रात ओवि से मिलने उसके सारे दोस्त आने वाले थे.. पल्लवी ने खाने पीने का खास इंतज़ाम किया था.. ओवि बहुत खुश थी.. वो अपने सारे दोस्तों से प्रवीण की पहचान करा रही थी.. रात का खाना खत्म होने के बाद सब एक साथ बैठकर बचपन की बातें याद करके हँस खेल रहे थे..
उन सबको देखकर मानसी को भी अपने दोस्तों की याद आ गई... संकेत की भी याद आई..
'कैसा मस्त था हमारा वो ग्रुप... कितनी मस्ती करते थे हम लोग! अब पता नहीं कहाँ होंगे सब! इतने साल हो गए, मैंने खुद को ही अपनी बनाई पाबंदियों की दीवार में कैद कर लिया.. कितने खूबसूरत थे वो दिन! वो रिमझिम करते नटखट पल! अगर आदित्य उस वक्त मेरी ज़िंदगी में आया ही ना होता, तो शायद मेरी पूरी ज़िंदगी ही कुछ और होती! आदित्य, उस रिमझिम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में आया... उसके प्यार की बारिश में मैं पूरी तरह भीग गई... और फिर अचानक उस बेमौसम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा भयानक तूफान देकर चला गया... जो कभी खत्म ही नहीं होने वाला था!'
मानसी ने अपने मन की सारी भावनाओं को अपने अंदर ही कैद करके रखा था.. वो अपनी बदकिस्मती और उदासी को सबसे छुपाने की कोशिश कर रही थी..
घर की छत पर अंताक्षरी का खेल बहुत रंग लाया था.. सब नाचने गाने में मगन थे.. ओवि और प्रवीण भी उसमें पूरी तरह रम गए थे.. मंदार दादा की बारी आई तो उसने पल्लवी को उठाया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर गाना गाने लगा...
"ओ मेरी ज़ोहराज़बीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं, और मैं जवाँ, तुझपे कुर्बान मेरी जान, मेरी जान!"
पल्लवी शर्म से लाल हो गई.. मानसी ने भी पहली बार दादा को इतने रोमांटिक मूड में देखा था.. सब लोग उन दोनों के चारों तरफ गोल घेरा बनाकर, तालियां बजाते हुए नाच रहे थे..
अगले दिन सुबह सब लोग घूमने के लिए खेत पर गए.. खेत में बना वो छोटा सा खपरैल वाला घर... कभी किसी ज़माने में मानसी ने ही वहां फूलों के पौधे लगाए थे... सावन की वो रिमझिम बारिश, चारों तरफ फैली हुई हरियाली... और मन को मोह लेने वाली वो मीठी मीठी खुशबू... पूरा माहौल ही बहुत खुशनुमा लग रहा था..
दादा और भाभी सबको खेत दिखा रहे थे.. मानसी अकेली ही उस खपरैल वाले घर के बाहर लटके हुए झूले के पास एक कुर्सी पर बैठकर किताब पढ़ रही थी.. हवा के हल्के झोंकों से वो झूला धीरे धीरे झूल रहा था.. खपरैल से छनकर आने वाली हल्की धूप... उस झूलते हुए झूले की वजह से कभी मानसी के चेहरे पर आकर चमकती और कभी पल भर में गायब हो जाती... कोई दूर खड़ा होकर मानसी की उस खूबसूरती को निहार रहा था.. तभी अचानक किसी ने उसे आवाज़ दी और उसका ध्यान टूट गया..
"मानसी!"
मानसी ने झट से किताब से नज़रें उठाकर सामने देखा! उसके ठीक सामने संकेत खड़ा था.. बिल्कुल पहले जैसा ही... लंबा... गोरा... जानबूझकर बढ़ाई हुई हल्की हल्की दाढ़ी... बाल बस थोड़े से सफेद हो गए थे... पर वो अभी भी वैसा ही था... जैसा कॉलेज के दिनों में दिखा करता था!
"अरे! संकेत, तुम यहाँ?" मानसी ने हैरानी भरी नज़रों से उसे देखते हुए पूछा.. "हाँ, पर क्यों? मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था क्या?" संकेत बोला.. "अरे, ऐसा नहीं है... मेरा मतलब तुम तो विदेश में रहते हो... फिर अचानक यहाँ कैसे?" मानसी कुर्सी से उठते हुए बोली..
"हाँ वैसे तो विदेश में ही रहता हूँ... पर तीन महीने पहले ही आई बाबा से मिलने दादा के पास आया था... मंदार दादा ने आई तात्या को ओवि की शादी का खास न्योता दिया था... इसी बहाने उन्हें काका, यानी तुम्हारे तात्या से भी मिलने की बहुत इच्छा थी.. दादा को गाँव आने का वक्त नहीं मिल पाया, तो उसने ही मुझसे कहा कि मैं आई बाबा को गाँव लेकर आऊं.. मैं वैसे भी छह महीने के लिए भारत आया हुआ था, तो मैंने सोचा ठीक है मैं ही चला जाता हूँ... इसी बहाने तुमसे भी मुलाकात हो जाएगी.. ओवि की शादी में मैंने तुमसे मिलने की बहुत कोशिश की... पर तुम मेहमानों की भीड़ में बहुत बिज़ी थी... आज मंदार दादा ने ही बताया कि तुम सब खेत पर आने वाले हो... ओवि और प्रवीण से भी शादी में बस जल्दबाज़ी में ही मिल पाया था... इसलिए मैं खुद ही यहाँ आ गया... तुम सबसे मिलने," संकेत ने अपने यहाँ आने की वजह बताई..
संकेत को देखकर मानसी को अपना पूरा बचपन याद आ रहा था... पर अब उससे क्या बात करे, ये उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. "अरे बैठोगे क्या? या फिर वो देखो दादा, ओवि सब उस तरफ घूम रहे हैं, तुम चाहो तो वहां जा सकते हो!" मानसी ने दादा और बाकी लोग जिस तरफ गए थे, उस तरफ हाथ से इशारा करते हुए संकेत से कहा..
"अरे पर, तुम यहाँ अकेले क्या कर रही हो? तुम भी चलो ना साथ में!" संकेत मानसी को अपने साथ चलने के लिए ज़िद कर रहा था.. "नहीं रे, बारिश की वजह से सब जगह बहुत कीचड़ हो गया है... कहीं फिसल कर गिर गई तो! अब और दर्द सहने की हिम्मत नहीं बची है मुझमें," मानसी असल में क्या कहना चाह रही है, ये संकेत को कुछ समझ नहीं आ रहा था!
"अरे गिरोगी कैसे? मैं हूँ ना तुम्हें सहारा देने के लिए.. मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलूँगा, तुम बस साथ चलो! या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?" संकेत अपनी ज़िद छोड़ने को तैयार नहीं था.. मानसी बिना कुछ कहे किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी..
"मानसी, अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो एक बात पूछूं?" संकेत ने फिर पूछा.. "अरे पूछो ना, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? अब मेरी उम्र बची है क्या रूठने और गुस्सा करने की?"
"मानसी, गुस्सा करने, रूठने और प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती, ये सब तो बस अपने आप हो जाता है... हम खुद ही अपने ऊपर पाबंदियां लगा लेते हैं... और खुद के ही बनाए हुए चक्रव्यूह में फंस जाते हैं... पर हमें ही मन से मज़बूत होकर इस चक्रव्यूह को तोड़कर बाहर निकलना होगा! तुम गुस्सा करो, चाहो तो मुझसे लड़ो, पर ऐसे अकेले ही अंदर अंदर घुटती मत रहो... दोस्ती का हक़ होता है ये, दोस्ती में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए, जो मन में आए वो बोलकर दिल हल्का कर लेना चाहिए, सुख और दुख सब बांटना चाहिए!" संकेत मानसी को समझा रहा था..
"अरे पर, मुझे कोई दुख नहीं है, तुम अपनी बताओ, तुम्हारा वहां विदेश में कैसा चल रहा है?" मानसी बात बदलते हुए बोली.. "मानसी प्लीज़, बातों को मत घुमाओ, मुझे सब समझ आ रहा है, कहाँ खो गई मेरी वो बचपन की दोस्त, जो हमेशा चहकती रहती थी, हँसती थी... और पूरे हक़ से मुझ पर गुस्सा करती थी, उसके दिल में क्या है, ये उसे खुद पता चलने से पहले ही वो मुझे बता देती थी...
मानसी, तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ, वो दादा ने मुझे ओवि की शादी के बाद बताया... सच कहूं तो गलती मेरी ही थी, मुझे लगा कि इतने सालों में तुम आदित्य के साथ बहुत सुखी होगी... इसलिए मैंने कभी तुम्हारी कोई खबर भी नहीं ली... पर इतना सब कुछ हो गया और किसी ने मुझे एक बार बताना भी ज़रूरी नहीं समझा, तुमने भी मुझे पराया ही समझा ना!"
"संकेत, अरे ऐसा कुछ भी नहीं है, तुम खुद को क्यों कसूरवार ठहरा रहे हो? जो मेरी किस्मत में लिखा था, वो तो होना ही था... और मुझे ही वो सब किसी को बताकर बार बार अपने ज़ख्मों को नहीं कुरेदना था.. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. भूल चुकी हूँ मैं वो सब कुछ!"
"ठीक हो तुम? ऐसी? अरे ये क्या हालत बना रखी है तुमने अपनी, खुद को देखा है क्या इतने दिनों में कभी आईने में? कहाँ गए तुम्हारे वो पसंदीदा रंग, वो खुशबू, वो फूल और वो बारिश? बारिश में भीगना कितना पसंद था तुम्हें और अब तुम्हें ये सब नहीं चाहिए? तुमने बस अपने शरीर को ज़िंदा रखा है... पर तुम्हारे मन का क्या? तुम्हें क्या लगता है तुम्हें इस हालत में देखकर काका, दादा और भाभी को कैसा लगता होगा? अगर आदित्य ने शादी कर ली तो फिर तुमने क्यों नहीं अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत की? क्यों ऐसी अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी जीती रही? किसके लिए ये सज़ा काट रही हो? तुम्हें पता भी है... तुम्हारी वजह से तुम बाकी सबको भी सज़ा ही दे रही हो... इतने सालों से!"
"संकेत, अरे प्यार किया है मैंने आदित्य से... प्यार क्या होता है, ये उसी ने सिखाया है ना मुझे... उसके सिवा मैंने कभी किसी और के बारे में सोचा ही नहीं! किसी और से शादी करना मेरे लिए सिर्फ एक समझौता होता... आदित्य के लिए मेरे दिल में जो प्यार है, वो मैं कभी किसी और को नहीं दे पाती... अगर मैं किसी और से शादी कर भी लेती तो ना वो सुखी हो पाता और ना ही मैं खुश रह पाती! और ज़िंदगी में क्या शादी ही सब कुछ होती है? मैं इतनी मज़बूत हूँ कि अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जी सकती हूँ! मुझे नहीं चाहिए किसी का सहारा... मैं अकेले ही बहुत खुश रह सकती हूँ!"
"तुम्हें नहीं चाहिए किसी का सहारा, पर अगर कोई तुम्हारे सहारे का इंतज़ार कर रहा हो तो? मैं मानता हूँ कि शादी ही सब कुछ नहीं होती, पर जिसकी याद में तुम अपनी ज़िंदगी इस तरह घुट घुट कर बर्बाद कर रही हो, उसे तुम्हारे इस प्यार का ज़रा सा भी एहसास है क्या?" संकेत मानसी से लड़ रहा था..
"संकेत, प्लीज़, मुझे इस बारे में और कोई बात नहीं करनी है... अभी सब लोग आ जाएंगे... हम इस बारे में बात ना ही करें तो अच्छा है," मानसी के चेहरे पर अभी भी वही सुन्न भाव थे.. संकेत मानसी के इस बर्ताव से बहुत उदास हो गया था.. वो वहां एक पल भी नहीं रुका और सीधा चला गया..
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दो दिन बाद ओवि पल्लवी को बता रही थी कि आज रात वो और प्रवीण संकेत काका से मिलने जाने वाले हैं... संकेत कल फिर से विदेश वापस जाने वाला था.. मानसी ने ये सुना और ओवि से पूछा, "ओवि, संकेत तो छह महीने के लिए आया था ना, फिर इतनी जल्दी वापस क्यों जा रहा है?"
"उसकी वजह तुम हो बुआ!" ओवि ऐसा क्यों बोल रही है, ये मानसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था! "तुम्हारा और संकेत काका का झगड़ा हुआ है ना?" "अरे पर उसके लिए..." मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो ओवि के सामने क्या कहे..
"बुआ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है या तुम कुछ समझना ही नहीं चाहती हो? संकेत काका सिर्फ तुमसे मिलने के लिए मेरी शादी में आए थे... उन्हें तुमसे कुछ बात करनी थी... पर तुम तो अभी भी अपनी ही उसी दुनिया में खोई हुई हो.. तुमने कभी उनसे पूछा कि इतने सालों में उनकी ज़िंदगी में क्या क्या हुआ? वो अचानक ऐसे विदेश क्यों चले गए? बुआ, इतने सालों तक सिर्फ तुम्हारे लिए उन्होंने शादी तक नहीं की... वो बचपन से तुमसे प्यार करते थे... और आज भी करते हैं! इतने सालों तक तुम सुखी हो, इसी बात को अपनी खुशी मानकर वो जी रहे थे... पर तुमने कभी उनके बारे में कुछ जानने या उन्हें समझने की कोशिश ही नहीं की," ओवि ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..
"अरे, ये कैसे मुमकिन है... उसने कभी मुझसे कुछ कहा क्यों नहीं?" मानसी पूरी तरह से उलझन में पड़ गई.. "उसकी बात सुनने का तुम्हारे पास वक्त था क्या? अब वो वापस जा रहा है, फिर कभी ना लौटने के लिए..."
...
ओवि ने जो कुछ भी बताया, उससे मानसी अंदर तक बेचैन हो गई.. उसकी वजह से संकेत का दिल दुखा था.. उसे संकेत से माफी मांगनी थी.. एक दोस्त होने के नाते उसे मानसी को कुछ भी कहने का पूरा हक़ था.. मानसी को अपनी गलती का एहसास हो गया था..
मानसी इनामदार की हवेली पहुँची.. रिमझिम बारिश हो रही थी.. पत्थर की चारदीवारी से लगकर उगे हुए अरबी के पत्तों पर गिरी बारिश की बूंदें सावन की उस हल्की धूप में हीरों की तरह चमक रही थीं.. वो अंदर दाखिल हुई, तुलसी के चबूतरे पर तुलसी बहुत खिली हुई थी.. आले में एक दीया जल रहा था.. दालान में एक बड़ा सा पालना झूल रहा था.. मानसी को अपने बचपन के दिन याद आ गए.. छुट्टियों के दिनों में वो सारे दोस्त इस हवेली में जमकर उधम मचाया करते थे.. बारिश के मौसम में संकेत की आई के बहुत सारे व्रत और पूजा पाठ हुआ करते थे! वट सावित्री, आषाढ़ी एकादशी, सावन के सोमवार, जन्माष्टमी... और जाने क्या क्या! इन बच्चों की तो बस मौज रहती थी! मस्त बारिश में खूब मस्ती करते और फिर देर हो जाती तो यहीं प्रसाद खाकर रुक जाते! मानसी तो सबकी सबसे लाडली थी! बिना माँ की बच्ची समझकर संकेत की आई मानसी को कुछ ज़्यादा ही प्यार करती थीं... आज कितने सालों बाद मानसी यहाँ आई थी, पर वो सारी यादें अभी भी बिल्कुल ताज़ा थीं..
मानसी घर के अंदर गई! संकेत अपने कमरे में बैग पैक कर रहा था.. मानसी ने उसे आवाज़ दी, 'संकेत...'.. उसने मानसी की आवाज़ पहचान ली थी, पर उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं... कहते हैं ना कि मर्दों को रोना नहीं चाहिए! पर ये उससे कभी हो ही नहीं पाया... वो मानसी की तरह अपने दिल के भावों को कभी छुपा ही नहीं पाता था... आज भी वो मानसी को अपना ये चेहरा नहीं दिखाना चाहता था.. वो उसकी तरफ पीठ किए हुए ही उससे बात कर रहा था...
"आओ, बैठो मानसी, तुम यहाँ कैसे?" "अरे, एक दोस्त रूठ कर जा रहा है ना, बस उसी से मिलने आई हूँ.."
"उस दोस्त को किसी के सहारे या तसल्ली की कोई ज़रूरत नहीं है," संकेत ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..
"पर अगर मुझे उसके सहारे की ज़रूरत हो तो... तब भी वो नहीं रुकेगा?"
"मतलब?"
संकेत ने पूरी हैरानी से पीछे मुड़कर देखा... उसके सामने मोरपंखी रंग की साड़ी पहने हुए... अपने लंबे बालों की चोटी में मोगरे का गजरा लगाए हुए... उसकी वही पुरानी दोस्त मानसी खड़ी थी.. उसे इस रूप में देखकर संकेत के दिल को बहुत गहरा सुकून मिला.. उसने मानसी के पास आकर, उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "मुझे बस अपनी इसी मानसी को देखना था!"
बाहर सावन की बारिश बरस रही थी... और मानसी के मन का वो सावन खुशी के आंसुओं के रूप में उसकी आँखों से छलक रहा था... आसमान में उस हल्की धूप और रिमझिम बारिश के बीच एक सतरंगी इंद्रधनुष अपनी खूबसूरत कमान बनाते हुए ज़मीन को छू रहा था!
मानसी की वो अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी अब हमेशा के लिए पूरी हो चुकी थी...
समाप्त!
