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Adirshi

Royal कारभार 👑
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अधांतर

मानसी घर के गेट से अंदर दाखिल हुई.. रिमझिम बारिश की बूंदों को अपने ऊपर झेलते हुए, हाथ में अपना बैग संभालते हुए और आँखों का चश्मा ठीक करते हुए वो आस-पास के बगीचे को अपनी आँखों में बसाने लगी थी..

गेट से लिपटी हुई सायली की बेल नाज़ुक सफेद फूलों से पूरी तरह लदी हुई थी.. बैंगनी और लाल रंग का कृष्ण कमल बेवजह ही शर्माया हुआ सा लग रहा था.. प्राजक्ता के वो केसरी डंठल वाले सफेद रेशमी फूल मानो उसे देखकर खुशी से मुस्कुरा रहे थे.. बिट्टी तो पीले धमक फूलों का श्रृंगार करके किसी गौरी की तरह सजी हुई थी.. बीच में ही कहीं से उग आया तेरडा जैसे अपनी पिचकारी से लाल और गुलाबी रंग उड़ा रहा था.. घर के खंभे का सहारा लेकर ऊपर तक चढ़ी मोगरे की बेल सफेद चमकते सितारों की तरह टिमटिमा रही थी.. सावन की वो हल्की सी धूप बारिश की बूंदों से फिसलकर इन नाज़ुक फूलों को और भी चमका रही थी.. पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे सारा आसमान एक सुगंधी सांस ले रहा हो..

तभी झूले पर बैठी ओवि दौड़ती हुई उसके पास आई..

"क्या बुआ, कितनी राह देखने लगाई तुमने? कल ही क्यों नहीं आ गई? तुम्हें पता है कल से मैं अकेले कितना बोर हो रही हूँ यहाँ?" ओवि ने मानसी पर प्यार से गुस्सा करते हुए कहा..

"अरे बाप रे, कितने सवाल पूछोगी? और ओवि मैडम शादी हो चुकी है अब तुम्हारी! ये तुम्हारा बचपना और धक्कमधुक्की अभी तक गई नहीं.. और तुम अकेली कहाँ थी? दामाद जी भी तो आए होंगे ना साथ में! और घर में आई तात्या तो हैं ही!" मानसी ने प्यार से ओवि के गाल खींचते हुए कहा..

तभी बारिश की एक तेज़ बौछार आई और दोनों भागकर जल्दी से घर के अंदर घुस गईं..

"ये देखो, आते ही तुम्हारी वजह से मैं भी भीग गई!" मानसी ओवि को लाड से डांटने लगी..

"ये सही है तुम्हारा... मैं शादी के बाद पहली बार अपने मायके आई हूँ, पर यहाँ किसी के पास मेरे लिए टाइम ही नहीं है... तात्या दामाद जी को पूरा गाँव घुमाने ले गए हैं, वो रात से पहले लौटने वाले नहीं हैं... पक्का अपने सारे दोस्तों से मिलवा कर ही लाएंगे उन्हें.. और आई साहेब ने तो अपने प्यारे दामाद जी के लिए छप्पन भोग की तैयारी कर रखी है.. मुझे लगा था मेरे आने का पता चलते ही तुम दौड़कर मुझसे मिलने आओगी... पर तुम्हारे पास भी मेरे लिए टाइम नहीं है... यहाँ सबको बस अपने दामाद का ही कौतुक करना है!" ओवि झूठा गुस्सा दिखाते हुए बड़बड़ा रही थी..

तभी पल्लवी किचन से बाहर आई, "अरे मानसी! आ गई तुम! और ये क्या? तुम दोनों इतना कैसे भीग गईं? जाओ जल्दी से ऊपर जाकर कपड़े चेंज कर लो, मैं तब तक चाय बनाती हूँ.. मानसी तुम्हारे लिए खाने में क्या बनाऊं?"

"गरमागरम कांदा भजी बना लो... मस्त बारिश हो रही है... है ना बुआ?" ओवि ने अपना फरमान सुना दिया..

"नहीं भाभी, मुझे अभी कुछ नहीं खाना! मेरे लिए बस एक कप चाय बना दो.." मानसी ने कहा..

मानसी और ओवि कपड़े बदलकर आ गईं.. ओवि अपने हाथों से गूंथा हुआ मोगरे का एक ताज़ा गजरा मानसी के लंबे लेकिन अब हल्के सफेद हो चुके बालों में लगाने लगी..

"अरे, ये क्या? मोगरे का गजरा? मेरे बालों में मत लगा इसे, भाभी को दे दे..."

**

मोगरे का गजरा मतलब मानसी की जान! लेकिन पिछले कई सालों से उसने कभी भूलकर भी अपने बालों में गजरा नहीं लगाया था.. मोगरा, बारिश और आदित्य... अब वो पुरानी यादें उसे बिल्कुल नहीं चाहिए थीं..

करीब पंद्रह साल पहले घटी वो घटना!

आज भी ऐसा लगता था जैसे सब कुछ अभी हुआ हो.. अगर उस वक्त आदित्य और मानसी की शादी हो गई होती, तो तात्या, मंदार दादा और पल्लवी भाभी ने आदित्य का भी बिल्कुल ऐसे ही लाड प्यार और कौतुक किया होता..

मानसी भी ओवि की तरह ही इस घर की सबसे लाडली बेटी थी! वो जो कहती, वही सबके लिए पत्थर की लकीर होती.. उसकी पढ़ाई पूरी होते ही उसके लिए बहुत अच्छे रिश्ते आने लगे थे.. लेकिन मानसी को पहले खुद के पैरों पर खड़ा होना था..

मानसी पढ़ाई में बहुत होशियार थी, और दिखने में बेहद खूबसूरत! नाज़ुक और छरहरा बदन, गोरा रंग, चंपे की कली जैसी नाक, हिरनी जैसी आँखें और लंबे घने बाल... सच में देखते ही कोई भी प्यार में पड़ जाए ऐसी ही थी वो! उसका स्वभाव भी बहुत मीठा था..

आई के गुज़र जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी.. पल्लवी भाभी ने भी उसकी हर बात मानी.. मानसी उम्र में पल्लवी से काफी छोटी थी, इसलिए वो उसे ननद की तरह नहीं बल्कि अपनी छोटी बहन की तरह ही संभालती थी..

पढ़ाई पूरी होने के बाद भी मानसी बैंक के एग्जाम्स दे रही थी.. वो जी तोड़कर पढ़ाई कर रही थी और उसमें उसे कामयाबी भी मिली.. उसे एक सरकारी बैंक में नौकरी मिल गई और गाँव के पास ही एक शहर में उसकी पोस्टिंग पी.ओ. ऑफिसर के तौर पर हो गई..

उसी ब्रांच में आदित्य का भी ब्रांच मैनेजर के तौर पर नया नया ट्रांसफर हुआ था.. आदित्य उस जगह पर बिल्कुल नया था.. उसका घर मुंबई में था.. इसलिए रोज़ उसे दो घंटे का ट्रेन का सफर करना पड़ता था..

**

अक्टूबर महीने का वो पहला हफ्ता... इतने दिनों से बहुत कड़क धूप पड़ रही थी.. लेकिन उस दिन अचानक से बारिश वाला माहौल बन गया.. काले घने बादलों ने आसमान को भर दिया.. बिजली कड़कने लगी और धो धो करके मुसलाधार बारिश शुरू हो गई..

शाम तक बारिश ने इतना ज़ोर पकड़ लिया कि लगने लगा जैसे अब ट्रेन भी बंद हो जाएंगी.. टीवी पर खबरें आने लगीं.. कहीं पानी भर गया है.. कहीं बिजली गिर गई है... एक के बाद एक कई खबरें..

ब्रांच में दूर से आने वाले कर्मचारी अपना काम जल्दी जल्दी निपटा कर ट्रेन बंद होने से पहले ही ब्रांच से निकल गए.. आदित्य भी निकलने ही वाला था कि तभी किसी ने उसे बताया कि ट्रेन बहुत लेट चल रही हैं और कई ट्रेनें कैंसिल भी हो रही हैं..

मानसी का घर वहां से सिर्फ आधे घंटे की दूरी पर था.. उसे लेने के लिए उसका दादा गाड़ी लेकर आने वाला था.. निकलते वक्त मानसी ने यूं ही सहजता से आदित्य से पूछ लिया, "सर, आप नहीं निकलेंगे?"

इसपर आदित्य ने बताया कि ट्रेन के प्रॉब्लम की वजह से शायद उसे आज ब्रांच में ही रुकना पड़ेगा.. मानसी ने उससे कहा कि अगर उसे कोई ऐतराज़ ना हो, तो वो उसके साथ उसके घर चल सकता है.. शुरुआत में आदित्य को थोड़ा अजीब लगा कि वो ऐसे किसी के घर कैसे जा सकता है.. लेकिन उसे उस जगह के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी और अकेले ब्रांच में कैसे रुकता? इसलिए वो मानसी के साथ उसके घर जाने के लिए तैयार हो गया..

मानसी ने घर पर फोन करके बता दिया कि उसके साथ उसके सर भी आ रहे हैं और जब तक ट्रेन चालू नहीं हो जाती, वो उनके पास ही रुकेंगे.. दादा घर से गाड़ी लेकर निकल चुका था.. मानसी ने आदित्य से कहा कि वो रोज़ जहाँ दादा का इंतज़ार करती है, वहां चलकर खड़े होते हैं..

ब्रांच से बाहर निकलते ही बाहर का वो खराब माहौल देखकर आदित्य को थोड़ी टेंशन होने लगी.. ट्रैफिक जाम लगा हुआ था.. बारिश बस धो धो करके बरस रही थी.. सड़कों के गड्ढे कीचड़ से भर गए थे.. उन्हीं गड्ढों से रास्ता निकालते हुए आदित्य और मानसी चल रहे थे.. ऐसा अचानक से इतनी बारिश आएगी ये किसी ने सोचा भी नहीं था.. उन दोनों के पास छाता भी नहीं था..

आदित्य परेशान होकर मानसी से कहने लगा..

"मिस मानसी, जब हम अंदर थे तब तो लग भी नहीं रहा था कि बाहर इतना भयंकर माहौल होगा... ये बारिश है या कोई तूफान?"

लेकिन मानसी तो इस बरसते पानी का पूरा मज़ा ले रही थी.. सड़क पर जमा हुए पानी में बारिश की बूंदों से बन रहे गोल गोल डिज़ाइनों को देखते हुए उसने आदित्य से पूछा, "सर, आपको बारिश पसंद नहीं है क्या?"

"अरे पसंद है, पर वो हल्की रिमझिम वाली... ऐसा भयंकर तूफान मचाने वाली, नुकसान करने वाली बारिश भला किसे पसंद आएगी?" आदित्य बोला..

"अरे बारिश का तो स्वभाव ही ऐसा है! वो आते और जाते वक्त ऐसे ही गड़गड़ाहट करती है... अपने आने और जाने की गवाही देती है वो..." मानसी हँसते हुए बोली..

ठीक सामने फुटपाथ पर एक मौसी मोगरे के गजरे बेच रही थी.. आते जाते लोगों से 'एक गजरा ले लो, सस्ते में दे दूंगी', कहकर मिन्नतें कर रही थी.. वो और उसकी गजरों की टोकरी पूरी तरह भीग चुकी थी.. मानसी उसके पास गई और उसने पूछा, "मौसी, कितने गजरे बचे हैं?"

"बस दस ही बचे हैं बेटा," गजरे वाली मौसी बोली..

"मुझे दे दो सारे," मानसी ने कहा और अपनी पर्स से पैसे निकालकर जल्दी से उस मौसी के हाथ में रख दिए..

तभी दादा वहां गाड़ी लेकर आ गया... गजरे वाली मौसी खुल्ले पैसे वापस देने के लिए मानसी के पीछे भागी...

"बेटा... ये बचे हुए पैसे तो लेती जा..."

"रहने दो मौसी, अगली बार हिसाब कर लेंगे," कहकर मानसी गाड़ी में बैठ गई..

दादा ने आदित्य को आगे का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठने को कहा.. मानसी ने गाड़ी में बैठने के बाद आदित्य सर और दादा की एक दूसरे से पहचान करा दी..

गाड़ी शहर से निकलकर एक छोटे से घाट पर चढ़ने लगी.. शहर के भीड़भाड़ वाले माहौल से बाहर निकलकर उनका सफर एक शांत और खूबसूरत गाँव के रास्ते पर शुरू हो गया.. एक तरफ ऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई... और बीच से गुज़रता वो घुमावदार काला रास्ता... जो बारिश के पानी से पूरी तरह धुलकर साफ हो गया था.. रास्ते के एक तरफ ऊंचे ऊंचे हरे भरे पेड़ बारिश में नहाए हुए खड़े थे.. आगे बढ़ने पर हरे भरे खेत दिखाई दिए, जो हवा और बारिश के खेल में पूरी तरह रम गए थे.. बाहर का वो सुहावना मौसम देखते हुए गाड़ी कब बंगले के गेट के अंदर दाखिल हो गई, ये आदित्य को पता ही नहीं चला..

मानसी गाड़ी से उतरी और सबसे पहले वो बगीचे में जाकर ये देखने लगी कि उसके लगाए हुए सारे पौधे ठीक हैं या नहीं.. इसी धुन में वो ये भी भूल गई कि आदित्य पहली बार उनके घर आया है.. मोगरे के फूलों से लदी वो बेल बारिश से पूरी तरह नीचे झुक गई थी.. मानसी उस बेल को पास के खंभे का सहारा देकर वापस ऊपर संभालने लगी.. डार्क वाइन कलर की जॉर्जेट की साड़ी और उसी रंग का स्लीवलेस ब्लाउज़... मानसी बारिश में भीग रही थी... और आदित्य उसका वो दिलकश रूप बस देखता ही जा रहा था..

दादा ने आदित्य से कहा, "आइए... आइए सर... अंदर आइए... हमारी मानसी को तो आप जानते ही हैं... अरे ये बगीचा तो जैसे उसकी जान है... खुद से ज़्यादा तो इसे इन पौधों की फिक्र रहती है... उनके आगे इसे कुछ याद ही नहीं रहता... सॉरी... पर आप घर में चलिए... वो आ जाएगी अभी..."

तभी आदित्य की याद आते ही मानसी उनके पीछे पीछे घर में दाखिल हुई.. "सॉरी सर, वो ज़रा मोगरे की बेल नीचे झुक गई थी ना... मैं बस उसे ठीक कर रही थी... आप आइए ना... बैठिए," कहते हुए मानसी ने तात्या, ओवि और पल्लवी भाभी से आदित्य की पहचान कराई..

"अरे, आपके बगीचे में तो इतने सारे फूल हैं, फिर अभी रास्ते में आपने उस गजरे वाली मौसी से इतने सारे गजरे क्यों खरीद लिए?" आदित्य ने हैरानी से पूछा.. "अरे आदित्य साहब... हमारी मानसी ऐसी ही है... उसे मोगरा बहुत पसंद है... वैसे तो उसे सारे ही फूल पसंद हैं... लेकिन फिर भी उस गजरे वाली मौसी की थोड़ी मदद हो जाए, इसलिए वो रोज़ उसके बचे हुए सारे गजरे खरीद लेती है... फिर वो गजरे बालों में लगाकर मानसी भी खुश हो जाती है और मंदिर में बैठे उसके सारे भगवान भी खुश हो जाते हैं!" तात्या हँसते हुए आदित्य को मानसी के बारे में बता रहे थे..

मानसी और आदित्य हाथ मुँह धोकर फ्रेश होकर आ गए... दादा ने आदित्य को पहनने के लिए अपना कुर्ता और पजामा दे दिया.. तभी सफेद सलवार कुर्ता पहने, बालों में तौलिया लपेटे, मानसी धूपपात्र में धूप जलाकर पूरे घर में घुमाने लगी.. उसका वो सादा सा पहनावा, वो महकती हुई धूप... और उस धूप के धुएं के सफेद छल्लों के बीच घूमती मानसी का वो मनमोहक रूप देखकर आदित्य एक बार फिर इतना खो गया कि उसे इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि पास बैठे दादा और तात्या उसे ही देख रहे हैं..

थोड़ी देर बाद पल्लवी ने डाइनिंग टेबल पर सबके लिए खाना परोसना शुरू किया.. पल्लवी आदित्य को बहुत ज़िद करके सब कुछ परोस रही थी.. आदित्य बार बार 'नहीं नहीं' कह रहा था, पर पल्लवी, "खाकर तो देखिए, ये खीर और भिंडी की सब्ज़ी मानसी ने बनाई है... थोड़ी सी लेकर देखिए, आपको ज़रूर पसंद आएगी..." कहते हुए आदित्य की थाली में परोस रही थी..

ओवि उस वक्त स्कूल मे थी.. आदित्य और ओवि की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी.. आदित्य उससे उसके स्कूल और सहेलियों के बारे में पूछ रहा था.. पर तात्या बातों ही बातों में घुमा फिराकर उससे पूछ रहे थे... "आप रहते कहाँ हैं? घर में कौन कौन है? आपकी शादी हुई है या नहीं?"

दादा ने आदित्य के सोने का इंतज़ाम ऊपर के एक कमरे में कर दिया था.. ओवि और मानसी दोनों अपने कमरे की तरफ जाने लगीं.. ओवि मानसी से पूछ रही थी, "बुआ, ये कौन हैं? तुम्हारे फ्रेंड हैं क्या?" मानसी ने कहा, "अरे नहीं, ये कोई फ्रेंड नहीं हैं, ये मेरे बॉस हैं... ऑफिस में अगर इनकी कोई बात ना सुने तो ये बहुत गुस्सा करते हैं! तू भी सो जा अब जल्दी से, वरना ये तुझे भी डांटेंगे!"

"हह! वो मुझपर बिल्कुल गुस्सा नहीं करेंगे... उन्होंने तो मुझे बहुत प्यार किया... और अगली बार आते वक्त वो मेरे लिए गिफ्ट भी लेकर आने वाले हैं... मुझे तो तुम्हारे ये आदित्य अंकल बहुत अच्छे लगे!" पल्लवी, दादा और तात्या ओवि की ये बातें सुन रहे थे... पल्लवी हँसते हुए बोली, "हाँ भई, हमें भी आदित्य सर बहुत अच्छे लगे!"

"क्या भाभी, मैं आने के बाद से देख रही हूँ, आप सबने मिलकर मेरा जो ये कौतुक समारोह चला रखा है ना... और तात्या, आप तो कुछ भी पूछे जा रहे हैं उनसे? अरे बॉस हैं वो मेरे... कोई मुझे देखने नहीं आए हैं वो... प्लीज़ आप सब उनके साथ ऐसा बर्ताव मत कीजिए... उन्हें कैसा लग रहा होगा?" मानसी सब पर थोड़ा गुस्सा होने लगी..

मानसी को गुस्सा आया मतलब घर में सब चुप... बाहर अभी भी ज़ोर से बिजली कड़क रही थी.. मानसी ओवि से बोली, "चलो ओवि ताई, अब सोने चलो... नहीं तो आसमान वाली बुढ़िया आ जाएगी.." सब हँसते हुए अपने अपने कमरों में सोने चले गए.. आदित्य को तो नींद ही नहीं आ रही थी... बस मानसी का चेहरा ही उसकी आँखों के सामने घूम रहा था..

अगले दिन बारिश थोड़ी कम हो गई थी.. टीवी पर खबरें आ रही थीं कि ट्रेन धीरे धीरे चालू हो रही हैं.. रविवार होने की वजह से आज बैंक की छुट्टी थी.. आदित्य भी तैयार होकर, मानसी और उसके घरवालों ने जो खातिरदारी की थी उसके लिए उनका शुक्रिया अदा करके अपने घर जाने के लिए निकल पड़ा.. ओवि आदित्य से कह रही थी, "अंकल आज भी रुक जाओ ना, हम बहुत मज़े करेंगे.."

मानसी को छोड़कर जाने का आज आदित्य का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था.. वैसे तो मानसी उसे रोज़ ही ब्रांच में मिलती थी.. पर अब उसका ये बिल्कुल अलग रूप देखकर वो उसके प्यार में पड़ने लगा था..

...

आदित्य आजकल चुपचाप चोरी छुपे नज़रों से मानसी को निहारता रहता था.. पर बात करते वक्त वो ब्रांच में बाकियों के साथ जैसा बर्ताव करता था, मानसी के साथ भी वैसा ही बर्ताव करता था... लेकिन मानसी का पूरा ध्यान सिर्फ अपने काम पर ही रहता था.. आदित्य के मन में उसके लिए कुछ चल रहा है, इस बात का मानसी को ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था..

आजकल वो गजरे बेचने वाली मौसी कहीं गायब हो गई थी.. पर मानसी की डेस्क पर उसे रोज़ सुबह आते ही मोगरे का एक ताज़ा और खुशबूदार गजरा रखा हुआ मिलता था.. उसकी डेस्क पर रोज़ ये गजरा कौन रखता होगा? ये सवाल उसे परेशान करने लगा था.. क्योंकि बैंक में सबसे पहले मानसी और प्यून काका ही आते थे.. उसने काका से भी उस गजरे के बारे में पूछताछ की.. पर उन्होंने भी यही कहा कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता.. बिना बात के पूरे ऑफिस में गपशप ना हो, इसलिए उसने किसी को कुछ नहीं बताया.. वो रोज़ चुपचाप उस गजरे को अपने पर्स में रख लेती थी..

ऐसे ही आठ दस दिन बीत गए.. एक दिन उसे उस गजरे के साथ एक चिट्ठी भी मिली...

"मिस मानसी... मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या और कैसे लिखूं? पर आप मुझे बहुत अच्छी लगती हैं... अगर आपके मन में भी मेरे लिए कुछ है, तो आज आप ये गजरा अपने पर्स में ना रखकर, अपने बालों में लगा लीजिएगा! ...........आदित्य!"

मानसी ने वो चिट्ठी पढ़ी और बिना कुछ कहे उस चिट्ठी को फाड़ दिया और गजरे को मसलकर कूड़ेदान में डाल दिया..

आदित्य को लगा था कि मानसी हँसते हुए उसके प्यार को अपना लेगी लेकिन मानसी उसकी चिट्ठी और गजरे को ऐसे कूड़ेदान में फेंक देगी, ये उसने सपने में भी नहीं सोचा था.. मानसी के इस बर्ताव से उसे बहुत बुरा लगा.. वो ज़िंदगी में पहली बार किसी के प्यार में पड़ा था... पर उसके प्यार का ऐसा अंजाम हुआ था.. मानसी के चेहरे पर किसी भी तरह के कोई भाव नहीं थे, ना खुशी के, ना दुख के और ना ही गुस्से के!

आदित्य को लगा कि मानसी उसके पास आकर पूछेगी कि 'आपने मेरी डेस्क पर ये गजरा और चिट्ठी क्यों रखी?' पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.. मानसी रोज़ की तरह बिल्कुल नॉर्मल बर्ताव कर रही थी.. लेकिन आदित्य अंदर ही अंदर बहुत बेचैन हो गया था.. मुझमें ऐसी क्या कमी है जो मानसी ने मुझे मना कर दिया? कोई भी लड़की उसके एक इशारे पर उससे शादी करने को तैयार हो जाती... पर मानसी के अलावा आज तक उसके दिल में कोई उतरी ही नहीं थी..

मानसी रोज़ उसके सामने ही घूमती फिरती नज़र आती थी और वो उसे देखकर और भी ज़्यादा बेचैन हो जाता था.. चार पाँच दिन बीत गए, आदित्य ऑफिस नहीं आ रहा था.. पर मानसी ने किसी से भी उसके बारे में कुछ नहीं पूछा..

उस दिन अचानक वो गजरे वाली मौसी सामने आ गई.. वो मानसी को आवाज़ लगाने लगी, "बेटा, आज गजरा नहीं चाहिए क्या?" मानसी ने मौसी को पहचान लिया और पूछा,

"अरे मौसी, इतने दिन से कहाँ गायब थी तुम?"

"गायब कहाँ होऊंगी बेटा? रोज़ सुबह एक साहब आकर मेरे सारे गजरे खरीद कर ले जाता था... सामने वाले उस गणपति के मंदिर में चढ़ाने के लिए.. पर चार दिन हो गए, वो गजरे लेने आया ही नहीं.. दो दिन तो मैं भी उस गणपति के मंदिर के पास जाकर बैठी रही... पर वहां के फूल वाले मुझे उधर बैठने ही नहीं देते... तुझे दूँ क्या एकाध गजरा?" मौसी ने मानसी से पूछा..

"दे दो सारे," कहते हुए मानसी ने मौसी से सारे गजरे खरीद लिए.. आदित्य की याद आते ही उसकी आँखों में पानी भर आया.. आदित्य क्यों नहीं आ रहा? किससे पूछे? उसके दिमाग में कई सारे सवाल घूम रहे थे.. वो पहले गणपति मंदिर गई.. बाप्पा के दर्शन किए.. 'आदित्य सलामत रहे', ये प्रार्थना की और वापस बैंक आ गई..

ब्रांच में सब लोग उसी के बारे में बात कर रहे थे.. 'आदित्य सर को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है.. आने वाले रविवार को हम सब मिलकर उन्हें देखने चलेंगे!'

आदित्य हॉस्पिटल में भर्ती है? क्या हुआ होगा उसे? इन ख्यालों से मानसी भी बेचैन हो गई.. उस दिन उसका काम में बिल्कुल मन नहीं लगा.. वो हाफ डे लेकर घर आ गई.. उसका चेहरा पूरी तरह उतरा हुआ था.. आते ही पल्लवी ने पहचान लिया कि मानसी के साथ ज़रूर कुछ बात है.. वरना वो कभी ऐसे हाफ डे लेकर घर नहीं आती.. पल्लवी ने मानसी से पूछना शुरू किया,

"क्या हुआ है? तुम्हारा चेहरा ऐसे क्यों उतरा हुआ है? तबियत ठीक नहीं है क्या?" एक के बाद एक कई सवाल पूछ डाले..

मानसी ने इतने दिनों से जो कुछ भी हुआ और अब आदित्य के हॉस्पिटल में भर्ती होने की बात, सब कुछ पल्लवी को बता दिया.. पल्लवी ने मानसी से सीधा ही पूछ लिया,

"मानसी, सच सच बताना, प्यार व्यार में तो नहीं पड़ गई ना?"

पल्लवी तो मज़ाक कर रही थी पर मानसी को रोना आ रहा था,

"भाभी, मुझे नहीं पता मुझे क्या हो रहा है, पर मुझे आदित्य सर से मिलना है, उनसे माफी मांगनी है... मेरी वजह से तो उन्हें कुछ नहीं हुआ ना?"

पल्लवी ने मानसी को गले लगा लिया,

"अरे मेरी पगली, तुमने क्या किया है? उन्हें ही प्यार का रोग लग गया है, हो जाएंगे जल्दी ही ठीक, तुम फिक्र मत करो, तुम्हें मिलना है ना उनसे? कल ही छुट्टी लेकर जाओ उनसे मिलने, दिल की बातें ऐसे छुपा कर नहीं रखनी चाहिए, बोलकर मन हल्का कर लेना चाहिए, तुम्हारे दिल में उनके लिए जो कुछ भी है, वो तुम उन्हें बता दो!"

...

अगले दिन सुबह ही मानसी ने ब्रांच में तबियत खराब होने की वजह से ना आने की बात कह दी और आदित्य सर को देखने मुंबई के हॉस्पिटल में पहुँच गई.. मानसी ने कमरे के दरवाज़े से अंदर झाँक कर देखा.. बेड पर आदित्य लेटा हुआ था.. उसके हाथ में सलाइन की सुइयां लगी थीं.. दाढ़ी बढ़ी हुई थी.. नींद में भी वो बहुत थका हुआ लग रहा था.. साथ में कोई नहीं था.. अंदर कैसे जाएं, ये सोच ही रही थी कि आदित्य को दरवाज़े पर किसी के होने का एहसास हुआ.. मानसी को दरवाज़े के पास खड़ा देखकर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. वो बेड पर ही उठकर बैठने की कोशिश करने लगा.. मानसी दौड़कर उसके पास गई और उसे उठने में मदद करने लगी.. उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे सीधा करने लगी.. उसके अचानक हुए इस स्पर्श से आदित्य पूरी तरह घबरा गया.. मानसी भी जैसे कुछ याद आने पर, "सॉरी... सॉरी सर," कहते हुए झट से पीछे हट गई..

"आप यहाँ... अचानक?" आदित्य ने मानसी से पूछा..

सच कहें तो मानसी ने हॉस्पिटल में आकर आदित्य को एक बहुत प्यारा सरप्राइज़ दिया था.. मोरपंखी रंग के सलवार कुर्ते में मानसी और भी खूबसूरत लग रही थी... और उसका वो मोरपंखी स्पर्श! उसके मन में तो था ही कि मानसी उसे मिलने आए... पर वो यूं ही भाव खा रहा था..

"हाँ, मतलब... सर आप अकेले ही हैं? साथ में कोई नहीं है?" मानसी ने अपने यहाँ आने की असली वजह बताने से बचते हुए कहा..

"नहीं, आई है, आज डिस्चार्ज मिलने वाला है... इसलिए डॉक्टर से मिलने गई है, आ ही रही होगी, आप बैठिए," सामने रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए आदित्य ने मानसी से कहा..

तभी आदित्य की आई कमरे में आ गई.. आदित्य ने मानसी की अपनी आई से पहचान कराई..

"ओह... तो तुम हो मिस मानसी... बहुत सुना है आदित्य से तुम्हारे बारे में!" आई ने कहा..

मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे.. वो कुछ बोलने ही वाली थी कि आदित्य ने बात बदलते हुए अपनी आई से पूछा,

"आई, क्या हुआ? मिल गया डिस्चार्ज?"

"अरे हाँ, डॉक्टर कह रहे हैं, बिल्कुल ठीक है तू, आज ही घर ले जाओ बोले, अच्छा मैं ज़रा बिलिंग का क्या करना है, पूछ कर आती हूँ.. मानसी तुम बैठोगी क्या आदित्य के पास थोड़ी देर, मुझे शायद वक्त लगेगा... तुम्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं है ना?" आई ने पूछा..

पहले से ही घबराई हुई मानसी ने सिर हिलाकर हाँ कह दिया.. आई के जाने के बाद आदित्य ने मानसी से फिर पूछा,

"आप अकेले ही अचानक मुझे देखने कैसे आ गईं, मिस मानसी?"

"आपकी तबियत खराब होने का पता चला तो मुझसे रहा नहीं गया इसलिए आ गई... नहीं आना चाहिए था क्या?" मानसी ने आदित्य की तरफ देखते हुए कहा..

उसके चेहरे के भाव पढ़ने और आगे कुछ पूछने ही वाला था कि आई हाथ में प्रसाद और मोगरे का गजरा लेकर आ गई..

"ये क्या? तुम तो हॉस्पिटल का बिल भरने गई थी ना?" आदित्य ने आई से पूछा..

"अरे हाँ, नीचे बिलिंग काउंटर पर बिल भरा और सामने ही बाप्पा का मंदिर था, तो वहां होकर आ गई.. तू जल्दी ठीक हो गया ना, इसलिए उनका शुक्रिया तो अदा करना चाहिए ना? वहां के पंडित जी ने ये प्रसाद और बाप्पा के चरणों का गजरा दिया है," आई ने आदित्य के हाथ में प्रसाद देते हुए कहा..

"आई वो गजरा देना ज़रा," आदित्य ने आई से कहा..

आई ने मानसी को प्रसाद दिया और आदित्य को गजरा देते हुए बोली, "क्यों रे बाबा, तुझे कब से मोगरा पसंद आने लगा?"

"मुझे नहीं, मिस मानसी को पसंद है, लीजिए मिस मानसी, बाप्पा का प्रसाद!" आदित्य ने मानसी के सामने गजरा कर दिया..

मानसी ने एक पल के लिए आदित्य की तरफ देखा और गजरा अपने बालों में लगा लिया..

"बाप्पा की कृपा हो गई समझो," आदित्य ने मानसी की तरफ देखते हुए कहा..

मानसी धीरे से शरमा गई.. वो कुछ नहीं बोली पर बिना कुछ कहे ही आदित्य को उसके दिल की सारी बात समझ आ गई थी.. आदित्य बस मंत्रमुग्ध होकर उसे ही देख रहा था.. एक ही पल में उसकी बीमारी, उसके मन की सारी उदासी दूर हो गई थी..

आई को भी आदित्य और मानसी के मन में क्या चल रहा है, इसका अंदाज़ा लग गया था..

...

आदित्य के ठीक होने के कुछ दिनों बाद आदित्य के आई पापा ने मानसी के घर आकर पूरे रीति-रिवाज़ के साथ उसकी शादी का प्रस्ताव रखा.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी को तो आदित्य दामाद के रूप में पहले से ही पसंद था.. जब शादी तय ही हो गई है तो बिना बात के इंतज़ार क्यों करना, इसलिए दो महीने बाद की ही तारीख पक्की कर दी गई.. दोनों घरों में खुशी का माहौल था.. आदित्य को तो अब बस इसी बात की जल्दी थी कि कब शादी हो और मानसी उसके घर आए.. शादी मानसी के घर पर ही होने वाली थी.. आदित्य इकलौता बेटा और मानसी इस घर की लाडली बेटी होने की वजह से शादी बहुत धूमधाम से होने वाली थी.. मानसी खुद को दुल्हन के रूप में इमेजिन करके बार बार आईने में देखकर शरमा रही थी.. आदित्य भी मानसी के ही सपने देख रहा था..

शादी में बस आठ दिन बचे थे.. ज़ोरों शोरों से तैयारी चल रही थी.. मंडप सज गया था.. रोशनी हो गई थी.. करीबी रिश्तेदार आना शुरू हो गए थे.. शादी की इस भागदौड़ में आठ दिनों से मानसी और आदित्य मिल नहीं पाए थे.. अब शादी में सिर्फ चार दिन बचे थे.. दो दिन बाद मेहंदी, फिर हल्दी और फिर शादी... मानसी और आदित्य ज़िंदगी भर के लिए एक दूसरे के होने वाले थे.. पर आदित्य को मानसी से मिले बिना चैन ही नहीं पड़ रहा था.. घर के बड़ों ने दोनों को समझा कर रखा था,

'अब तुम दोनों शादी के बाद ही मिलना!'

पर आदित्य ने मानसी से कैसे भी करके आज मुझे मिलने आ जाओ, ऐसी ज़िद की.. आखिर में मानसी से भी रहा नहीं गया और थोड़ी शॉपिंग बाकी है, मुंबई जाकर आती हूँ, ऐसा कहकर वो घर से निकल पड़ी.. मानसी ने सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए ज़िंदगी में पहली बार घर पर झूठ बोला था..

आज इतने दिनों बाद मानसी से मिलकर आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे और क्या ना करे.. आज तक उसने मोगरे के गजरे के अलावा उसे कोई दूसरा गिफ्ट नहीं दिया था! दोनों ने मिलकर खूब शॉपिंग की, खूब घूमे, और इस सब में उन्हें वक्त का अंदाज़ा ही नहीं रहा.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे और पहुँचने में अभी दो तीन घंटे और लगेंगे, ये सोचकर मानसी जल्दी जल्दी में निकल पड़ी.. आदित्य ने उसे स्टेशन तक छोड़ा..

"आगे मैं अकेली चली जाऊंगी, तुम जाओ, अब सीधा शादी के दिन ही मिलेंगे," कहते हुए मानसी ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म पर आ गई.. आदित्य को तो अब ये जुदाई बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हो रही थी, पर उससे विदा लेकर मानसी निकल चुकी थी..

शाम का वक्त था! प्लेटफॉर्म पर खचाखच भीड़ थी! ट्रेन आई! हाथ में पकड़े भारी बैग और अपना दुपट्टा संभालते हुए, मानसी किसी तरह उस भीड़ में ट्रेन के अंदर चढ़ी.. अंदर पैर रखने की भी जगह नहीं थी.. ट्रेन के खंभे को पकड़कर मानसी बस किसी तरह खड़ी थी.. ट्रेन धीरे धीरे झटके खाते हुए आगे बढ़ी, प्लेटफॉर्म से निकलते ही ट्रेन ने अचानक तेज़ रफ्तार पकड़ ली और आगे खड़ी भीड़ का सारा वज़न मानसी पर आने लगा... और इससे पहले कि उसे कुछ समझ आता, मानसी उस तेज़ दौड़ती ट्रेन से बाहर नीचे गिर पड़ी!

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मानसी को जब होश आया तो वो एक हॉस्पिटल में थी.. उसके पूरे शरीर पर भयानक चोटें आई थीं.. हाथों और पैरों पर प्लास्टर बंधा था.. तात्या, दादा, आदित्य, पल्लवी भाभी... सब उसके पास ही थे.. आज असल में उनकी शादी का दिन था, पर...

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दो महीने तक मानसी हॉस्पिटल में ही रही.. 'ये सब मेरी वजह से ही हुआ है', ये सोच सोचकर आदित्य अंदर ही अंदर घुट रहा था.. उसने इतने दिनों में एक पल के लिए भी मानसी को अकेला नहीं छोड़ा था.. मानसी की कमर में बहुत गहरी चोट आई थी.. वो अभी भी ठीक से बैठ और चल नहीं पाती थी.. कई छोटे बड़े ऑपरेशन करने पड़े थे.. पर मानसी अंदर से बहुत मज़बूत थी.. वो उठने और चलने की पूरी कोशिश कर रही थी.. तात्या, दादा, पल्लवी, आदित्य... सब बहुत टेंशन में थे.. डॉक्टरों के मुताबिक मानसी को पूरी तरह से ठीक होने में कितना वक्त लगेगा? मानसी पूरी तरह ठीक हो भी पाएगी या नहीं? वो फिर से खुद अपने पैरों पर चल पाएगी या नहीं? या फिर ज़िंदगी भर उसे ऐसे ही रहना पड़ेगा... कोई कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता था.. पर मानसी को पूरा भरोसा था कि वो बहुत जल्द अपने पैरों पर चलेगी.. उसके अपने लोग और आदित्य सब उसके साथ थे... इसलिए उसे किसी बात की कोई फिक्र नहीं थी..

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मानसी के एक्सीडेंट को एक साल से ज़्यादा का वक्त बीत चुका था.. मानसी अब धीरे धीरे चलने लगी थी.. अपना सारा काम खुद कर सकती थी.. आदित्य रोज़ शाम को मोगरे का गजरा लेकर उससे मिलने आता था.. इतने दिनों में वो पहली बार बैंक के किसी काम से दो दिन के लिए बाहर गया था.. पल्लवी भाभी के किसी करीबी रिश्तेदार के यहाँ कोई कार्यक्रम था.. दादा, भाभी और ओवि वहां जाने वाले थे.. तात्या मानसी के पास रुकने वाले थे, पर मानसी ने ही ज़िद करके उन्हें दादा और भाभी के साथ भेज दिया.. इतने दिनों से मानसी की इस हालत की वजह से उसे छोड़कर कोई भी घर से बाहर नहीं गया था.. पर अब मानसी ठीक हो रही थी.. आखिर में मानसी की ज़िद के आगे हारकर वो लोग गंगू ताई को उसके पास छोड़कर चले गए..

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मानसी अकेली ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर का नज़ारा देख रही थी.. आसमान में काले बादल घिर रहे थे.. ऐसा लग रहा था कि आज पक्का बारिश होगी.. हवा का एक हल्का सा झोंका मन को सुकून दे रहा था.. और तभी अचानक आसमान में बिजली कड़कने लगी.. पहली बारिश की एक तेज़ बौछार आई और भीगी हुई मिट्टी की वो सोंधी महक मन को खुश कर गई!

गंगू ताई बाहर कुछ काम कर रही थीं.. थोड़ी ही देर में वो मानसी को बताने आईं कि उससे कोई मिलने आया है.. मानसी ने गंगू ताई से कहा कि उन्हें अंदर ले आइए..

मानसी की ही उम्र की एक बेहद खूबसूरत औरत गंगू ताई के साथ कमरे में आई.. उसे देखकर ही लग रहा था कि वो प्रेगनेंट है.. मानसी ने उसे सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा और गंगू ताई को पानी और चाय लाने के लिए भेज दिया.. मानसी ने उससे पूछा,

"माफ कीजिएगा, पर मैंने आपको पहचाना नहीं.."

"हाँ मुझे पता है, आपने मुझे नहीं पहचाना, पर मैं आपको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ! मैं आपके आदित्य सर की पत्नी हूँ, नेहा!"

"क्या? ये कैसे मुमकिन है... आप ये क्या कह रही हैं??" मानसी को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई हो..

'ये औरत आखिर है कौन? अगर आदित्य की सच में शादी हो गई है तो मुझे किसी ने ये बात क्यों नहीं बताई?' मानसी के दिमाग में सवालों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ था..

"मानसी ताई, सच कहूं तो सबको पता है कि मेरी और आदित्य की शादी आठ महीने पहले ही हो चुकी है... आपके घर वालों को भी ये बात पता है... पर अगर आपको ये सब पता चला तो आपको बहुत तकलीफ होगी, इसलिए आदित्य ने मुझे भी कसम दी थी कि मैं आपको कुछ ना बताऊं..

ये बात भी सच है कि आदित्य आपके अलावा किसी और से शादी करने को तैयार ही नहीं थे... पर उनकी आई की वजह से उन्हें मुझसे ज़बरदस्ती शादी करनी पड़ी.. अगर वो मुझसे शादी नहीं करते तो उनकी आई ने खुद को कुछ कर लेने की धमकी दी थी.. मजबूरी में उन्हें अपनी आई की बात माननी पड़ी.. शादी से पहले उन्होंने मुझे आप दोनों के बारे में सब कुछ बता दिया था, उन्होंने तो मुझसे ये भी कहा था कि मैं खुद इस शादी से इंकार कर दूँ.. पर मैं एक अनाथ लड़की हूँ.. आदित्य जैसा पति और इतना अच्छा घर परिवार मिलेगा, ये सोचकर मैंने इस शादी के लिए हाँ कर दी.. उन्होंने सिर्फ अपनी आई की खुशी के लिए मुझसे शादी की है.. वो शरीर से भले ही मेरे पास हों, पर मन से वो हमेशा आपके ही पास रहते हैं.. वो रोज़ आपसे मिलने आते हैं... उन्होंने मुझसे कभी कुछ नहीं छुपाया.. पर अब मैं उनके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ.. अब इस हालत में मुझे और मेरे बच्चे को उनकी बहुत ज़रूरत है.. मैं अपने आने वाले बच्चे के लिए आपसे आपके आदित्य की भीख मांगती हूँ.. क्या आप मेरे बच्चे के लिए प्लीज़ इतना कर देंगी? अगर उन्हें पता चला कि मैंने यहाँ आकर आपको ये सब बता दिया है, तो वो मेरी शक्ल भी नहीं देखेंगे... आप भी तो एक औरत हैं... मेरे दिल का दर्द आप ज़रूर समझेंगी, बस यही सोचकर मैं आपके पास आई हूँ.."

नेहा बुरी तरह रो रही थी और मानसी फटी आँखों से बस उसे ही देखे जा रही थी.. नेहा का एक एक लफ्ज़ मानसी के कानों में खौलते हुए तेल की तरह गिर रहा था.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे पूरा कमरा उसके चारों तरफ गोल गोल घूम रहा हो.. इतने दिनों से उसने जो भी हसीन सपने सजाए थे, वो पल भर में ही टूट कर मिट्टी में मिल गए थे..

"मेरे बच्चे का भविष्य अब सिर्फ आपके ही हाथों में है... अब मैं चलती हूँ... आगे क्या करना है, ये फैसला अब आप ही कीजिएगा..." इतना कहकर नेहा वहां से चली गई..

बाहर बारिश का ज़ोर अब थोड़ा कम हो गया था, पर मानसी की ज़िंदगी में एक बहुत बड़ा और खौफनाक तूफान आ गया था.. अनगिनत सवालों के काले बादल उसके मन में हाहाकार मचा रहे थे.. नेहा का हर एक लफ्ज़ ज़हर बनकर उसके दिल में उतर रहा था..

'क्या आदित्य ने मुझे धोखा दिया? नहीं! पर वो भी अपनी आई का दिल कैसे तोड़ता... कौन सी माँ अपने सही सलामत बेटे की शादी मुझ जैसी अपाहिज लड़की से खुशी खुशी करवाएगी?? पर फिर इस सब में मेरी क्या गलती है? कितने सारे सपने देखे थे मैंने... अब आदित्य के बिना कैसे जिऊंगी मैं? पर इसमें उस बेचारी नेहा और इस दुनिया में आने वाले उस मासूम बच्चे की क्या गलती है? हे भगवान! ये सब मेरे ही नसीब में क्यों लिखा था? घर के सब लोगों ने मुझसे आदित्य की शादी की बात क्यों छुपा कर रखी?'

मानसी के दिल और दिमाग में एक भयानक जंग छिड़ी हुई थी.. पर अब उसने अपना फैसला कर लिया था.. नेहा उससे मिलने आई थी और उसे आदित्य का सारा सच पता चल गया है, ये बात उसे अपने घरवालों को बिल्कुल नहीं बतानी थी.. इतने दिनों से तात्या, दादा और भाभी के चेहरे पर उसे हमेशा एक अनजाना सा डर दिखाई देता था.. उसे यही लगता था कि उसके एक्सीडेंट की वजह से वो लोग टेंशन में रहते हैं.. शादी से पहले सिर्फ आदित्य का मन रखने के लिए उसे घर पर झूठ बोलना पड़ा था.. आज वो उसी झूठ की इतनी बड़ी सज़ा भुगत रही थी.. आई के जाने के बाद तात्या और दादा ने उसे हमेशा अपनी पलकों पर बिठा कर रखा था.. उसे इस बात का पूरा एहसास था.. अपनी वजह से वो तात्या और दादा को कभी भी दुखी नहीं देख सकती थी.. इस दर्दनाक एक्सीडेंट और इतने सारे ऑपरेशन्स की वजह से होने वाले असहनीय दर्द को भी उसने कभी अपने चेहरे पर नहीं आने दिया था... पर आज नेहा ने आदित्य के बारे में जो सच बताया था, उससे उसके दिल पर जो गहरे ज़ख्म लगे थे, उनके दर्द को अपने चेहरे पर छुपाना अब उसके लिए नामुमकिन सा हो रहा था.. वो अपना दुख तो एक बार के लिए सह भी सकती है, पर उसका परिवार उसे इस तरह टूटते हुए कभी नहीं देख पाएगा..

अगले दो दिनों तक मानसी अपने घरवालों के सामने झूठी खुशी का नकाब पहनकर घूमती रही.. आज फिर से उसे अपनों के साथ ये झूठा नाटक करना पड़ रहा था... सिर्फ आदित्य और उसके परिवार की खुशी के लिए!

दो दिन बाद आदित्य अपना काम खत्म करके शाम को हमेशा की तरह मानसी के लिए मोगरे का गजरा लेकर आया.. मानसी अपने कमरे में ही थी..

आदित्य अंदर आया और मानसी के बिल्कुल करीब जाकर उसके बालों में वो गजरा लगाने लगा.. "रुकिए आदित्य सर, प्लीज़ मुझे हाथ मत लगाइए!" मानसी ने हमेशा की तरह अपने चेहरे के भावों को सख्ती से छुपाते हुए आदित्य से कहा..

मानसी के इस तरह अचानक बदल जाने की वजह आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रही थी.. "मानसी, क्या हुआ? मैं दो दिन तक तुमसे मिलने नहीं आ पाया, इसलिए इतना गुस्सा आ रहा है क्या?" आदित्य ने बड़ी ही मासूमियत का नाटक करते हुए मानसी से पूछा..

"सर, प्लीज़, मुझे आपके बारे में सब कुछ पता चल गया है! आप जाइए यहाँ से! आप मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए, मेरे मुकाबले आपकी पत्नी और आपके आने वाले बच्चे को आपकी कहीं ज़्यादा ज़रूरत है..."

"मानसी..." आदित्य के मन में कई सवाल चल रहे थे.. मानसी को ये सब किसने बताया होगा?

"मेरे लिए आपने आज तक जो कुछ भी किया है, उसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूँ..." असल में मानसी को आदित्य के गले लगकर खूब रोना था... उससे पूछना था, "तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों एक ही वक्त पर दो लड़कियों की ज़िंदगी के साथ खेल रहे थे?"

उसके सीने में जैसे आग की लपटें उठ रही थीं.. पर अपनी आँखों में आने वाले आंसुओं को उसने बहुत मुश्किल से रोक कर रखा था.. अगर वो इस वक्त टूट जाती, तो आदित्य को खुद से दूर करना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता... और शायद वो कभी आदित्य को खुद से दूर नहीं कर पाती..

"सर, आप एक आदमी हैं... आपको कोई कुछ नहीं कहेगा... पर एक शादीशुदा आदमी के साथ मेरे रिश्ते हैं, ये बात अगर किसी को पता चली तो लोग मेरे चरित्र पर तो उंगलियां उठाएंगे ही, साथ ही मेरे घर वालों के संस्कारों को भी ताने मारेंगे... मेरी वजह से मेरे घर वालों को कोई कुछ कहे, ये मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी... आपकी रखेल बनकर रहने से तो मुझे मर जाना ज़्यादा आसान लगेगा..."

"मानसी... ये क्या कह रही हो तुम? तुम्हें कुछ समझ भी आ रहा है?" आदित्य के दिल को मानसी के ये शब्द तीरों की तरह आर पार चीर रहे थे..

"मैं सच ही कह रही हूँ सर, प्लीज़ मेरी फिक्र करना छोड़ दीजिए... मुझ पर भरोसा रखिए, मैं कोई भी गलत कदम नहीं उठाऊंगी... मेरी किस्मत में जो लिखा है उसे मैंने खुशी खुशी अपना लिया है... आप भी अपनी गृहस्थी में खुश रहिए... अब इसके आगे हम एक दूसरे से ना ही मिलें तो अच्छा है... आपके और मेरे, दोनों के लिए... प्लीज़ सर, अगर आपने कभी भी मुझसे सच में प्यार किया है ना, तो बस मेरी इतनी सी बात मान लीजिए... प्लीज़!"

मानसी आदित्य की तरफ देखकर बोल रही थी... आज भी उसके चेहरे पर वही शांत और सुन्न भाव दिखाई दे रहा था..

'क्या मानसी इतनी आसानी से ये सब सच में अपना सकती है? या फिर वो मुझे और खुद को भी धोखा दे रही है??'

आदित्य को बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि मानसी के मन में आखिर चल क्या रहा है... उसका ये बर्ताव उसे बेमौसम बारिश की तरह लग रहा था... मन में दुख के काले बादल जमा करके रखना... बस भर आना पर बरसना नहीं... और फिर किसी दिन अचानक गड़गड़ाहट के साथ मूसलाधार बरसना... बिना रुके!

मानसी आदित्य की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थी.. तात्या, दादा और पल्लवी भाभी बाहर वाले कमरे में बैठे हुए थे.. आदित्य किसी से कुछ भी कहे बिना जल्दबाज़ी में वहां से चला गया.. मानसी अपने मन के उस भयानक तूफान को छुपाने की कितनी भी कोशिश कर रही हो, लेकिन तात्या और दादा उसके स्वभाव को बहुत अच्छी तरह जानते थे... जो हुआ है वो कभी ना कभी तो होना ही था... पर इस सब से मानसी को बाहर कैसे निकालें, ये उन्हें समझ नहीं आ रहा था.. मानसी ऊपर से भले ही सबको अपने खुश होने का दिखावा कर रही थी, लेकिन अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी.. उसने अपने चारों तरफ पाबंदियों का एक जाल सा बुन लिया था.. हमेशा तितली की तरह उड़ने और चहकने वाली मानसी अब बहुत शांत हो गई थी.. उसे गहरे रंगों और फूलों का बहुत शौक था! पर अब उन्हें भी उसने खुद से दूर कर दिया था.. अपनी जवानी के दिनों में ही वो किसी उम्रदराज़ औरत की तरह दिखने लगी थी.. आँखों पर चश्मा... लंबे बालों की चोटी की जगह अब वो बालों का जूड़ा बांधने लगी थी... मोगरा तो जैसे उसकी ज़िंदगी से हमेशा के लिए दूर हो गया था... आदित्य की याद दिलाने वाली कोई भी चीज़ अब उसे अपने आस पास नहीं चाहिए थी..

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मानसी अब पूरी तरह से ठीक हो गई थी.. आदित्य मानसी से बात करने की बहुत कोशिश कर रहा था... पर तात्या, दादा और भाभी को भी मानसी की ही बात सही लग रही थी.. अगर आदित्य ने नेहा से शादी कर ली है... और वो उसके बच्चे की माँ बनने वाली है, तो उसे अब नेहा का ही साथ देना चाहिए... उसके साथ ईमानदारी से रहना चाहिए... सिर्फ भावनाओं में बहकर कोई भी सुखी नहीं होने वाला था... ना नेहा, ना आदित्य, और नेहा की खुशियां छीनकर मानसी भी कभी सुखी नहीं रह पाती.. उसकी वजह से कोई दुखी हो, ये उसे बिल्कुल मंज़ूर नहीं था... और नेहा की कोख में पलने वाली वो नन्ही सी जान.. इस सब में उसका भला क्या कसूर था?? ... मानसी आदित्य से बहुत दूर हो गई थी... पर आदित्य के साथ ही उसके मन में मौजूद वो 'प्यार' का अहसास भी जैसे हमेशा के लिए मर गया था.. वो खुद से प्यार करना ही भूल गई थी.. सबके साथ घुल मिलकर, हँसते खेलते रहने वाली मानसी अब बिल्कुल अलग थलग और अकेली रहने लगी थी..

मानसी से कहा गया कि अगर उसकी इच्छा हो तो वो वापस बैंक जॉइन कर सकती है.. तात्या को भी लग रहा था कि अगर मानसी काम में बिज़ी हो जाएगी, तो इन दो सालों में उसकी ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ है, उसे भुलाने में उसे मदद मिलेगी... पर अगर उसी ब्रांच में आदित्य भी होगा तो उसके लिए सब कुछ फिर से बहुत मुश्किल हो जाएगा..

उस दिन पल्लवी भाभी से मिलने गाँव की एक काकी आई हुई थीं.. वो पल्लवी से मानसी के बारे में पूछताछ कर रही थीं और मानसी ने उनकी बातें सुन लीं,

"पल्लवी, देख बेटी, इस तरह टूटी हुई शादी वाली कुंवारी लड़की को घर में बिठाकर रखने से अच्छा है कि कोई ठीक ठाक रिश्ता देखकर इसके हाथ पीले कर दो! मानसी अगर ऐसे ही घर में बैठी रही तो तुम्हारी गृहस्थी कैसे आगे बढ़ेगी? मंदार और उसके तात्या तो बस उसी की फिक्र में लगे रहते हैं, ओवि और तुम्हारी किसी को फिक्र है क्या? देख ले अगर मेरी बात समझ आए तो! मुझे तो डर ही लगता है कि कहीं उस मानसी की तुम्हारे और मंदार के सुख चैन को नज़र ना लग जाए!"

"अरे ये आप क्या कह रही हैं काकी? आप हमारी फिक्र मत कीजिए, मानसी का क्या करना है वो हम खुद देख लेंगे!" पल्लवी ने सचमुच उन काकी को घर से भगा ही दिया.. पर काकी की वो कड़वी बातें मानसी के दिल में इस कदर घर कर गईं कि उसने तय कर लिया कि अब उसे इस घर में नहीं रहना है.. अपनी वजह से वो दादा और भाभी को कोई परेशानी नहीं होने देना चाहती थी..

मानसी ने बैंक में ट्रांसफर के लिए अर्जी दे दी.. बहुत जल्द उसे मुंबई के एक इलाके में ट्रांसफर का ऑर्डर मिल गया.. तात्या, दादा और भाभी को मानसी का घर से दूर रहना बिल्कुल सही नहीं लग रहा था... पर मानसी की ज़िद के आगे किसी की एक ना चली.. आखिर में इस शर्त पर उसे जाने की इजाज़त मिली कि तात्या भी उसके साथ ही रहेंगे.. नया शहर... नए लोग... मानसी ने खुद को काम में इतना ज़्यादा उलझा लिया कि उसे अपना वो दर्दनाक बीता हुआ कल याद करने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी..

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सालों साल बीत गए... पर मानसी अभी भी शादी के नाम से ही कतराती थी.. उम्र के साथ तात्या की बीमारियां और तकलीफें बढ़ती जा रही थीं.. शहर की वो आबोहवा तात्या को रास नहीं आ रही थी.. दादा तात्या को वापस गाँव लेकर आ गए.. मानसी बस तात्या को देखने के लिए घर आती थी, पर दो दिन रहकर वापस अपने काम पर लौट जाती थी.. ओवि अपनी आगे की पढ़ाई के लिए मानसी के पास रहने आ गई.. बचपन से ही ओवि अपनी बुआ पर जान छिड़कती थी! ओवि की वजह से मानसी को जीने का एक नया मकसद मिल गया था.. उसका पूरा दिन बस अपनी बैंक और ओवि की ज़रूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता था! अब तो ओवि भी बड़ी हो गई थी और उसने अपने लिए एक जीवनसाथी चुन लिया था..

ओवि की शादी तय हो गई.. पर मानसी के दिल में जैसे फिर से एक अजीब सा खालीपन आ गया था.. ओवि की ज़िंदगी संवरने वाली है... उसे उसकी पसंद का जीवनसाथी मिल गया है, इस बात की उसे बहुत खुशी थी, पर अब मानसी फिर से बिल्कुल अकेली पड़ने वाली थी..

उसकी लाडली ओवि की शादी थी, फिर भी 'छुट्टी नहीं मिल रही है', ऐसा बहाना करके वो शादी से सिर्फ दो दिन पहले ही घर आई.. घर के सामने वो सजा हुआ मंडप, वो रोशनी देखकर उसका सारा अतीत फिर से उसकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो गया.. फिर भी हमेशा की तरह वो अपनी आँखों का सारा दर्द और सारे भाव सबसे छुपा रही थी..

ओवि की शादी में मानसी का बचपन का दोस्त संकेत भी आया हुआ था.. इतने सालों तक वो विदेश में था.. उसे लगता था कि मानसी आदित्य से शादी करके अपनी ज़िंदगी में बहुत खुश होगी, पर जब उसने मानसी को देखा, तो उसके चेहरे की वो गहरी उदासी उससे छुप नहीं पाई.. अपनी सगी भतीजी की शादी में भी मानसी एकदम सादे से कपड़ों में थी.. हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, गले में बारीक मोतियों की एक माला... और वैसे ही छोटे से कान के झुमके.. बस इतना सा ही उसका श्रृंगार था... वरना सजने संवरने और गहनों का शौक रखने वाली मानसी बहुत ही फीकी लग रही थी... हालांकि उस सादगी में भी उसकी खूबसूरती कहीं छुप नहीं रही थी... पर उसका चेहरा बहुत ही उदास लग रहा था.. संकेत इतने सालों बाद उससे मिल रहा था.. पर मानसी उससे भी बहुत कट कर और रूखेपन से बात कर रही थी.. संकेत ने उससे बात करने की बहुत कोशिश की... पर मानसी उससे दूर दूर ही रह रही थी..

संकेत और मानसी की... बचपन से ही बहुत गहरी और पक्की दोस्ती थी! मानसी अपनी हर छोटी बड़ी बात उसके साथ शेयर किया करती थी..

संकेत गाँव के अमीर इनामदार काका का छोटा बेटा था! मानसी और संकेत दोनों साथ साथ ही पले बढ़े थे.. दोनों ही पढ़ाई, खेलकूद और मस्ती करने में सबसे आगे थे! स्कूल से लेकर कॉलेज तक दोनों हमेशा एक साथ ही रहे.. मानसी और संकेत एक दूसरे से कभी कोई बात नहीं छुपाते थे और अगर कोई कुछ छुपाने की कोशिश भी करता, तो बिना कहे ही वो एक दूसरे के मन की बात पढ़ लेते थे.. गाँव में तो सबको यही लगता था कि मानसी और संकेत बड़े होकर एक दूसरे से ही शादी करेंगे.. उन दोनों की जोड़ी एकदम लक्ष्मी नारायण की तरह जमेगी... मेड फॉर ईच अदर... संकेत को भी मानसी बहुत पसंद थी.. जब से उसने होश संभाला था, वो मानसी से ही प्यार करता था.. पर मानसी ने अपनी उस दोस्ती से आगे बढ़कर संकेत के बारे में कभी कुछ ऐसा सोचा ही नहीं था! संकेत उसके लिए बस एक बहुत अच्छा दोस्त था..

गाँव के इनामदार होने का मतलब था सबसे रईस परिवार! पर संकेत को अपनी उस रईसी का ज़रा सा भी घमंड नहीं था.. अपने पिता की दौलत पर ऐश करने के बजाय, उसने तय किया था कि वो खुद मेहनत करके, अपनी काबिलियत से अपने पैरों पर खड़ा होगा और उसके बाद ही मानसी से शादी की बात करेगा.. कॉलेज की पढ़ाई पूरी होते ही वो आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला गया.. पढ़ाई पूरी होते ही उसे वहीं एक बहुत अच्छी सैलरी वाली नौकरी भी मिल गई.. अब वो मानसी के साथ अपनी शादी के सपने सजा रहा था.. वो बस इसी बेताबी में था कि कब एक बार भारत जाकर मानसी को अपने दिल की सारी बात बताए.. वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर खास मानसी से ही मिलने भारत, अपने गाँव वापस आया था..

उस दिन शाम को वो अपने सारे दोस्तों के सामने मानसी को प्रपोज़ करने वाला था.. वो इतने दिनों बाद भारत आया था, इसलिए सारे दोस्त उससे मिलने उनकी हमेशा वाली जगह पर जमा हुए थे... मानसी भी वहां थी.. पर इससे पहले कि वो अपने दिल की बात मानसी से कह पाता, मानसी ने खुद ही सबको आदित्य के बारे में बता दिया.. मानसी उस दिन बहुत खुश थी.. आदित्य कैसा दिखता है, उसका स्वभाव कैसा है, वो दोनों कैसे मिले... सब कुछ बहुत उत्साह के साथ बता रही थी..

संकेत अपने दिल में छिपा मानसी के लिए वो प्यार किसी के सामने भी ज़ाहिर नहीं कर पाया.. उसे बस ऐसा लग रहा था कि अचानक उसके हाथों से कुछ बहुत कीमती चीज़ फिसलती जा रही है.. इतने दिनों से उसने जो भी सपने सजाए थे, वो अब कभी पूरे नहीं हो सकते थे.. पर मानसी खुश है... वो आदित्य के साथ बहुत सुखी रहेगी, इसी बात से संकेत को सुकून मिल रहा था.. उसका अपना प्यार भले ही उसे ना मिला हो, पर मानसी ने जिससे प्यार किया, वो आदित्य उसे मिल गया! मानसी की खुशी में ही संकेत अपनी खुशी ढूंढ रहा था.. मानसी को बिना कुछ बताए ही वो हमेशा के लिए विदेश चला गया!

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मानसी के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वो उसे देखने आया था.. पर आदित्य उस वक्त मानसी के साथ ही था... वो उसकी जी जान से देखभाल कर रहा था... मानसी को एक बहुत अच्छा जीवनसाथी मिल गया था... वो हमेशा ऐसे ही खुश रहे... संकेत को लगा कि मानसी की इस हालत में वो उसके लिए अपने मन का प्यार और फिक्र शायद छुपा नहीं पाएगा, इसलिए वो उसे बिना मिले ही वहां से चला गया.. उसके माता पिता भी गाँव की उस इतनी बड़ी हवेली में अकेले ही रहते थे, इसलिए उसका बड़ा भाई, जो नौकरी के सिलसिले में अपने परिवार के साथ दूसरे शहर में रहता था, वो माता पिता को भी अपने साथ वहीं ले गया.. अब गाँव में संकेत का अपना कोई नहीं रहता था.. इसलिए उसे यही लगता रहा कि इतने सालों में मानसी अपनी गृहस्थी में बहुत सुखी होगी... मानसी की याद उसे कमज़ोर ना कर दे, इसलिए जब भी दोस्तों का फोन आता, तो वो उनसे भी मानसी के बारे में कभी कुछ नहीं पूछता था.. और संकेत उसका इतना करीबी दोस्त होने के बावजूद, मानसी ने भी कभी उससे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की.. और आज जब इतने सालों बाद मानसी उसे मिली, तो इस हालत में!

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ओवि की दो महीने पहले ही शादी हुई थी और वो अपने पति प्रवीण के साथ बैंगलोर चली गई थी.. प्रवीण की नौकरी वहीं पर थी.. ओवि और प्रवीण शादी के बाद पहली बार आठ दस दिनों के लिए गाँव आए हुए थे.. इसके बाद इतनी जल्दी उन्हें आई, तात्या, बुआ और दादा से मिलने का मौका नहीं मिलने वाला था.. मानसी ने भी खास ओवि के लिए ही छुट्टी ली थी और चार दिन घर पर रहने आई थी..

आज रात ओवि से मिलने उसके सारे दोस्त आने वाले थे.. पल्लवी ने खाने पीने का खास इंतज़ाम किया था.. ओवि बहुत खुश थी.. वो अपने सारे दोस्तों से प्रवीण की पहचान करा रही थी.. रात का खाना खत्म होने के बाद सब एक साथ बैठकर बचपन की बातें याद करके हँस खेल रहे थे..

उन सबको देखकर मानसी को भी अपने दोस्तों की याद आ गई... संकेत की भी याद आई..

'कैसा मस्त था हमारा वो ग्रुप... कितनी मस्ती करते थे हम लोग! अब पता नहीं कहाँ होंगे सब! इतने साल हो गए, मैंने खुद को ही अपनी बनाई पाबंदियों की दीवार में कैद कर लिया.. कितने खूबसूरत थे वो दिन! वो रिमझिम करते नटखट पल! अगर आदित्य उस वक्त मेरी ज़िंदगी में आया ही ना होता, तो शायद मेरी पूरी ज़िंदगी ही कुछ और होती! आदित्य, उस रिमझिम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में आया... उसके प्यार की बारिश में मैं पूरी तरह भीग गई... और फिर अचानक उस बेमौसम बारिश की तरह मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा भयानक तूफान देकर चला गया... जो कभी खत्म ही नहीं होने वाला था!'

मानसी ने अपने मन की सारी भावनाओं को अपने अंदर ही कैद करके रखा था.. वो अपनी बदकिस्मती और उदासी को सबसे छुपाने की कोशिश कर रही थी..

घर की छत पर अंताक्षरी का खेल बहुत रंग लाया था.. सब नाचने गाने में मगन थे.. ओवि और प्रवीण भी उसमें पूरी तरह रम गए थे.. मंदार दादा की बारी आई तो उसने पल्लवी को उठाया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर गाना गाने लगा...

"ओ मेरी ज़ोहराज़बीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हसीं, और मैं जवाँ, तुझपे कुर्बान मेरी जान, मेरी जान!"

पल्लवी शर्म से लाल हो गई.. मानसी ने भी पहली बार दादा को इतने रोमांटिक मूड में देखा था.. सब लोग उन दोनों के चारों तरफ गोल घेरा बनाकर, तालियां बजाते हुए नाच रहे थे..

अगले दिन सुबह सब लोग घूमने के लिए खेत पर गए.. खेत में बना वो छोटा सा खपरैल वाला घर... कभी किसी ज़माने में मानसी ने ही वहां फूलों के पौधे लगाए थे... सावन की वो रिमझिम बारिश, चारों तरफ फैली हुई हरियाली... और मन को मोह लेने वाली वो मीठी मीठी खुशबू... पूरा माहौल ही बहुत खुशनुमा लग रहा था..

दादा और भाभी सबको खेत दिखा रहे थे.. मानसी अकेली ही उस खपरैल वाले घर के बाहर लटके हुए झूले के पास एक कुर्सी पर बैठकर किताब पढ़ रही थी.. हवा के हल्के झोंकों से वो झूला धीरे धीरे झूल रहा था.. खपरैल से छनकर आने वाली हल्की धूप... उस झूलते हुए झूले की वजह से कभी मानसी के चेहरे पर आकर चमकती और कभी पल भर में गायब हो जाती... कोई दूर खड़ा होकर मानसी की उस खूबसूरती को निहार रहा था.. तभी अचानक किसी ने उसे आवाज़ दी और उसका ध्यान टूट गया..

"मानसी!"

मानसी ने झट से किताब से नज़रें उठाकर सामने देखा! उसके ठीक सामने संकेत खड़ा था.. बिल्कुल पहले जैसा ही... लंबा... गोरा... जानबूझकर बढ़ाई हुई हल्की हल्की दाढ़ी... बाल बस थोड़े से सफेद हो गए थे... पर वो अभी भी वैसा ही था... जैसा कॉलेज के दिनों में दिखा करता था!

"अरे! संकेत, तुम यहाँ?" मानसी ने हैरानी भरी नज़रों से उसे देखते हुए पूछा.. "हाँ, पर क्यों? मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था क्या?" संकेत बोला.. "अरे, ऐसा नहीं है... मेरा मतलब तुम तो विदेश में रहते हो... फिर अचानक यहाँ कैसे?" मानसी कुर्सी से उठते हुए बोली..

"हाँ वैसे तो विदेश में ही रहता हूँ... पर तीन महीने पहले ही आई बाबा से मिलने दादा के पास आया था... मंदार दादा ने आई तात्या को ओवि की शादी का खास न्योता दिया था... इसी बहाने उन्हें काका, यानी तुम्हारे तात्या से भी मिलने की बहुत इच्छा थी.. दादा को गाँव आने का वक्त नहीं मिल पाया, तो उसने ही मुझसे कहा कि मैं आई बाबा को गाँव लेकर आऊं.. मैं वैसे भी छह महीने के लिए भारत आया हुआ था, तो मैंने सोचा ठीक है मैं ही चला जाता हूँ... इसी बहाने तुमसे भी मुलाकात हो जाएगी.. ओवि की शादी में मैंने तुमसे मिलने की बहुत कोशिश की... पर तुम मेहमानों की भीड़ में बहुत बिज़ी थी... आज मंदार दादा ने ही बताया कि तुम सब खेत पर आने वाले हो... ओवि और प्रवीण से भी शादी में बस जल्दबाज़ी में ही मिल पाया था... इसलिए मैं खुद ही यहाँ आ गया... तुम सबसे मिलने," संकेत ने अपने यहाँ आने की वजह बताई..

संकेत को देखकर मानसी को अपना पूरा बचपन याद आ रहा था... पर अब उससे क्या बात करे, ये उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. "अरे बैठोगे क्या? या फिर वो देखो दादा, ओवि सब उस तरफ घूम रहे हैं, तुम चाहो तो वहां जा सकते हो!" मानसी ने दादा और बाकी लोग जिस तरफ गए थे, उस तरफ हाथ से इशारा करते हुए संकेत से कहा..

"अरे पर, तुम यहाँ अकेले क्या कर रही हो? तुम भी चलो ना साथ में!" संकेत मानसी को अपने साथ चलने के लिए ज़िद कर रहा था.. "नहीं रे, बारिश की वजह से सब जगह बहुत कीचड़ हो गया है... कहीं फिसल कर गिर गई तो! अब और दर्द सहने की हिम्मत नहीं बची है मुझमें," मानसी असल में क्या कहना चाह रही है, ये संकेत को कुछ समझ नहीं आ रहा था!

"अरे गिरोगी कैसे? मैं हूँ ना तुम्हें सहारा देने के लिए.. मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलूँगा, तुम बस साथ चलो! या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?" संकेत अपनी ज़िद छोड़ने को तैयार नहीं था.. मानसी बिना कुछ कहे किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी..

"मानसी, अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो एक बात पूछूं?" संकेत ने फिर पूछा.. "अरे पूछो ना, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? अब मेरी उम्र बची है क्या रूठने और गुस्सा करने की?"

"मानसी, गुस्सा करने, रूठने और प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती, ये सब तो बस अपने आप हो जाता है... हम खुद ही अपने ऊपर पाबंदियां लगा लेते हैं... और खुद के ही बनाए हुए चक्रव्यूह में फंस जाते हैं... पर हमें ही मन से मज़बूत होकर इस चक्रव्यूह को तोड़कर बाहर निकलना होगा! तुम गुस्सा करो, चाहो तो मुझसे लड़ो, पर ऐसे अकेले ही अंदर अंदर घुटती मत रहो... दोस्ती का हक़ होता है ये, दोस्ती में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए, जो मन में आए वो बोलकर दिल हल्का कर लेना चाहिए, सुख और दुख सब बांटना चाहिए!" संकेत मानसी को समझा रहा था..

"अरे पर, मुझे कोई दुख नहीं है, तुम अपनी बताओ, तुम्हारा वहां विदेश में कैसा चल रहा है?" मानसी बात बदलते हुए बोली.. "मानसी प्लीज़, बातों को मत घुमाओ, मुझे सब समझ आ रहा है, कहाँ खो गई मेरी वो बचपन की दोस्त, जो हमेशा चहकती रहती थी, हँसती थी... और पूरे हक़ से मुझ पर गुस्सा करती थी, उसके दिल में क्या है, ये उसे खुद पता चलने से पहले ही वो मुझे बता देती थी...

मानसी, तुम्हारे साथ जो कुछ भी हुआ, वो दादा ने मुझे ओवि की शादी के बाद बताया... सच कहूं तो गलती मेरी ही थी, मुझे लगा कि इतने सालों में तुम आदित्य के साथ बहुत सुखी होगी... इसलिए मैंने कभी तुम्हारी कोई खबर भी नहीं ली... पर इतना सब कुछ हो गया और किसी ने मुझे एक बार बताना भी ज़रूरी नहीं समझा, तुमने भी मुझे पराया ही समझा ना!"

"संकेत, अरे ऐसा कुछ भी नहीं है, तुम खुद को क्यों कसूरवार ठहरा रहे हो? जो मेरी किस्मत में लिखा था, वो तो होना ही था... और मुझे ही वो सब किसी को बताकर बार बार अपने ज़ख्मों को नहीं कुरेदना था.. मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. भूल चुकी हूँ मैं वो सब कुछ!"

"ठीक हो तुम? ऐसी? अरे ये क्या हालत बना रखी है तुमने अपनी, खुद को देखा है क्या इतने दिनों में कभी आईने में? कहाँ गए तुम्हारे वो पसंदीदा रंग, वो खुशबू, वो फूल और वो बारिश? बारिश में भीगना कितना पसंद था तुम्हें और अब तुम्हें ये सब नहीं चाहिए? तुमने बस अपने शरीर को ज़िंदा रखा है... पर तुम्हारे मन का क्या? तुम्हें क्या लगता है तुम्हें इस हालत में देखकर काका, दादा और भाभी को कैसा लगता होगा? अगर आदित्य ने शादी कर ली तो फिर तुमने क्यों नहीं अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत की? क्यों ऐसी अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी जीती रही? किसके लिए ये सज़ा काट रही हो? तुम्हें पता भी है... तुम्हारी वजह से तुम बाकी सबको भी सज़ा ही दे रही हो... इतने सालों से!"

"संकेत, अरे प्यार किया है मैंने आदित्य से... प्यार क्या होता है, ये उसी ने सिखाया है ना मुझे... उसके सिवा मैंने कभी किसी और के बारे में सोचा ही नहीं! किसी और से शादी करना मेरे लिए सिर्फ एक समझौता होता... आदित्य के लिए मेरे दिल में जो प्यार है, वो मैं कभी किसी और को नहीं दे पाती... अगर मैं किसी और से शादी कर भी लेती तो ना वो सुखी हो पाता और ना ही मैं खुश रह पाती! और ज़िंदगी में क्या शादी ही सब कुछ होती है? मैं इतनी मज़बूत हूँ कि अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जी सकती हूँ! मुझे नहीं चाहिए किसी का सहारा... मैं अकेले ही बहुत खुश रह सकती हूँ!"

"तुम्हें नहीं चाहिए किसी का सहारा, पर अगर कोई तुम्हारे सहारे का इंतज़ार कर रहा हो तो? मैं मानता हूँ कि शादी ही सब कुछ नहीं होती, पर जिसकी याद में तुम अपनी ज़िंदगी इस तरह घुट घुट कर बर्बाद कर रही हो, उसे तुम्हारे इस प्यार का ज़रा सा भी एहसास है क्या?" संकेत मानसी से लड़ रहा था..

"संकेत, प्लीज़, मुझे इस बारे में और कोई बात नहीं करनी है... अभी सब लोग आ जाएंगे... हम इस बारे में बात ना ही करें तो अच्छा है," मानसी के चेहरे पर अभी भी वही सुन्न भाव थे.. संकेत मानसी के इस बर्ताव से बहुत उदास हो गया था.. वो वहां एक पल भी नहीं रुका और सीधा चला गया..

...

दो दिन बाद ओवि पल्लवी को बता रही थी कि आज रात वो और प्रवीण संकेत काका से मिलने जाने वाले हैं... संकेत कल फिर से विदेश वापस जाने वाला था.. मानसी ने ये सुना और ओवि से पूछा, "ओवि, संकेत तो छह महीने के लिए आया था ना, फिर इतनी जल्दी वापस क्यों जा रहा है?"

"उसकी वजह तुम हो बुआ!" ओवि ऐसा क्यों बोल रही है, ये मानसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था! "तुम्हारा और संकेत काका का झगड़ा हुआ है ना?" "अरे पर उसके लिए..." मानसी को समझ नहीं आ रहा था कि वो ओवि के सामने क्या कहे..

"बुआ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है या तुम कुछ समझना ही नहीं चाहती हो? संकेत काका सिर्फ तुमसे मिलने के लिए मेरी शादी में आए थे... उन्हें तुमसे कुछ बात करनी थी... पर तुम तो अभी भी अपनी ही उसी दुनिया में खोई हुई हो.. तुमने कभी उनसे पूछा कि इतने सालों में उनकी ज़िंदगी में क्या क्या हुआ? वो अचानक ऐसे विदेश क्यों चले गए? बुआ, इतने सालों तक सिर्फ तुम्हारे लिए उन्होंने शादी तक नहीं की... वो बचपन से तुमसे प्यार करते थे... और आज भी करते हैं! इतने सालों तक तुम सुखी हो, इसी बात को अपनी खुशी मानकर वो जी रहे थे... पर तुमने कभी उनके बारे में कुछ जानने या उन्हें समझने की कोशिश ही नहीं की," ओवि ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..

"अरे, ये कैसे मुमकिन है... उसने कभी मुझसे कुछ कहा क्यों नहीं?" मानसी पूरी तरह से उलझन में पड़ गई.. "उसकी बात सुनने का तुम्हारे पास वक्त था क्या? अब वो वापस जा रहा है, फिर कभी ना लौटने के लिए..."

...

ओवि ने जो कुछ भी बताया, उससे मानसी अंदर तक बेचैन हो गई.. उसकी वजह से संकेत का दिल दुखा था.. उसे संकेत से माफी मांगनी थी.. एक दोस्त होने के नाते उसे मानसी को कुछ भी कहने का पूरा हक़ था.. मानसी को अपनी गलती का एहसास हो गया था..

मानसी इनामदार की हवेली पहुँची.. रिमझिम बारिश हो रही थी.. पत्थर की चारदीवारी से लगकर उगे हुए अरबी के पत्तों पर गिरी बारिश की बूंदें सावन की उस हल्की धूप में हीरों की तरह चमक रही थीं.. वो अंदर दाखिल हुई, तुलसी के चबूतरे पर तुलसी बहुत खिली हुई थी.. आले में एक दीया जल रहा था.. दालान में एक बड़ा सा पालना झूल रहा था.. मानसी को अपने बचपन के दिन याद आ गए.. छुट्टियों के दिनों में वो सारे दोस्त इस हवेली में जमकर उधम मचाया करते थे.. बारिश के मौसम में संकेत की आई के बहुत सारे व्रत और पूजा पाठ हुआ करते थे! वट सावित्री, आषाढ़ी एकादशी, सावन के सोमवार, जन्माष्टमी... और जाने क्या क्या! इन बच्चों की तो बस मौज रहती थी! मस्त बारिश में खूब मस्ती करते और फिर देर हो जाती तो यहीं प्रसाद खाकर रुक जाते! मानसी तो सबकी सबसे लाडली थी! बिना माँ की बच्ची समझकर संकेत की आई मानसी को कुछ ज़्यादा ही प्यार करती थीं... आज कितने सालों बाद मानसी यहाँ आई थी, पर वो सारी यादें अभी भी बिल्कुल ताज़ा थीं..

मानसी घर के अंदर गई! संकेत अपने कमरे में बैग पैक कर रहा था.. मानसी ने उसे आवाज़ दी, 'संकेत...'.. उसने मानसी की आवाज़ पहचान ली थी, पर उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं... कहते हैं ना कि मर्दों को रोना नहीं चाहिए! पर ये उससे कभी हो ही नहीं पाया... वो मानसी की तरह अपने दिल के भावों को कभी छुपा ही नहीं पाता था... आज भी वो मानसी को अपना ये चेहरा नहीं दिखाना चाहता था.. वो उसकी तरफ पीठ किए हुए ही उससे बात कर रहा था...

"आओ, बैठो मानसी, तुम यहाँ कैसे?" "अरे, एक दोस्त रूठ कर जा रहा है ना, बस उसी से मिलने आई हूँ.."

"उस दोस्त को किसी के सहारे या तसल्ली की कोई ज़रूरत नहीं है," संकेत ने बहुत ही नाराज़गी भरे लहज़े में कहा..

"पर अगर मुझे उसके सहारे की ज़रूरत हो तो... तब भी वो नहीं रुकेगा?"

"मतलब?"

संकेत ने पूरी हैरानी से पीछे मुड़कर देखा... उसके सामने मोरपंखी रंग की साड़ी पहने हुए... अपने लंबे बालों की चोटी में मोगरे का गजरा लगाए हुए... उसकी वही पुरानी दोस्त मानसी खड़ी थी.. उसे इस रूप में देखकर संकेत के दिल को बहुत गहरा सुकून मिला.. उसने मानसी के पास आकर, उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "मुझे बस अपनी इसी मानसी को देखना था!"

बाहर सावन की बारिश बरस रही थी... और मानसी के मन का वो सावन खुशी के आंसुओं के रूप में उसकी आँखों से छलक रहा था... आसमान में उस हल्की धूप और रिमझिम बारिश के बीच एक सतरंगी इंद्रधनुष अपनी खूबसूरत कमान बनाते हुए ज़मीन को छू रहा था!

मानसी की वो अधूरी और लटकी हुई ज़िंदगी अब हमेशा के लिए पूरी हो चुकी थी...



समाप्त!
 

Adirshi

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मृत्यूस्पर्श

हाथ में एक लंबी सी लाठी लेकर मैं गांव की उस पगडंडी पर मजे से चला जा रहा था.. चलते हुए लाठी को ज़मीन पर घिसने से जो धूल और आवाज़ उड़ रही थी उससे घास में छिपे छोटे मोटे टिड्डे भी अपनी जान बचाकर मेरे रास्ते से हट रहे थे.. बीच बीच में उसी लाठी से मैं किसी पत्थर को पलट कर भी देख लेता था.. पत्थर पलटते ही कभी उसके नीचे से लाल चींटियों की पूरी फौज निकल आती तो कभी कोई काला बिच्छू अपना डंक उठाए बाहर आ जाता.. फिर मैं उस बिच्छू का डंक कुचलकर उसे अपने हाथ पर खिलाते हुए आगे बढ़ जाता.. घास पर जमी ओस से मेरी नीचे से मोड़ी हुई पैंट गीली हो गई थी और उस पर ढेर सारे कांटे और मिट्टी चिपक गए थे..

चलते चलते आखिर में मैं ठाकुर के आम और रामफल के बागीचे के पास पहुंच गया था और इतनी सुबह वहां कोई रखवाली करने वाला भी नहीं था तो बागीचे में घुसने का यही सबसे सॉलिड मौका था.. दोबारा ऐसा चांस नहीं मिलेगा ये सोचकर मैं चुपके से अंदर घुस गया.. कांटेदार बाड़ फांदते वक्त एक बड़ा सा कांटा चुभ कर सीधे मेरे पैर में घुस गया और कांटा घुसते ही दर्द की एक भयंकर लहर सीधे मेरे दिमाग तक गई.. पर फिर भी मैंने मुंह से सी तक नहीं की और दांतों तले होंठ दबाकर उस दर्द को वहीं पी लिया.. अंदर पहुंचते ही मैंने पीली हो चुकी हर एक कैरी को दबा दबा कर देखना शुरू किया.. लेकिन सिर्फ धूप की गर्मी से पीली पड़ी वो कैरियां मेरे साथ जैसे कोई मज़ाक कर रही थीं.. क्योंकि वो पकी नहीं थीं बस कड़क धूप से पीली हो गई थीं.. आस पास गिरी हुई आम की गुठलियों से मैं अंदाज़ा लगा रहा था कि कौन सा आम पकने लगा है और एक एक करके कैरी तोड़ रहा था.. अब तक मेरी सारी जेबें कैरियों से फुल हो चुकी थीं और जब बहुत सारी कैरियां जमा हो गईं तो मैंने रामफल के पेड़ों की तरफ अपना मोर्चा मोड़ा और अपनी टी शर्ट को पैंट के अंदर खोंसकर उसमें एक एक रामफल डालना शुरू कर दिया.. थोड़ी ही देर में मेरी टी शर्ट भी पूरी तरह भर गई.. अब बस एक ही टास्क बाकी था कि इस पूरी लूट को लेकर सही सलामत बागीचे से बाहर निकला जाए..

तभी एक हट्टा कट्टा और गहरे काले रंग का भैंसा मेरी तरफ आता हुआ दिखा.. उसके माथे पर बना हुआ सफेद चांद का निशान उसके काले रंग पर एकदम उभर कर दिख रहा था.. अपनी सुर्ख लाल आंखों से गुस्सा उगलते हुए और खुरों से मिट्टी खोदकर ज़ोर से डकारता हुआ वो मेरी तरफ बढ़ने लगा.. अचानक आई इस आफत को कैसे हैंडल करूं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. अब वहां से भागने के सिवा कोई दूसरा ऑप्शन भी नहीं था.. पर अब टी शर्ट के अंदर भरे हुए रामफलों की वजह से इस फूले हुए पेट को लेकर दोबारा उस कांटेदार बाड़ से कूदकर भागना भी मुझे मुमकिन नहीं लग रहा था.. मुझे लगा था कि लोग बागीचे की रखवाली के लिए कोई आदमी रखेंगे या ज़्यादा से ज़्यादा कोई पालतू कुत्ता रखेंगे.. पर रखवाली के लिए कोई भैंसा पाल कर रखेगा ऐसा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था..

जब तक मैं ये सब सोचता वो भैंसा मुझ तक पहुंच ही गया.. अब अपनी खैर नहीं इस बात का मुझे पूरा अंदाज़ा हो चुका था.. इतने में ही उसने मुझे एक ज़ोरदार टक्कर मारकर नीचे गिरा दिया.. वो मेरे पेट पर पैर रखकर खड़ा होने ही वाला था कि मैं ज़ोर से चीखकर बोला, "अरे रुक जा! ज़रा सी चोरी की इतनी बड़ी सज़ा? और अब तू मेरा क्या करेगा क्या मुझे जान से मार डालेगा?"

मेरे इस सवाल पर उस भैंसे को भी जैसे ज़बान मिल गई और किसी राक्षस की तरह भयानक हंसी हंसते हुए उसने जवाब दिया, "ये सपना है चूतिये और पूरी तरह से तेरा ही सपना है तो ये तेरी ही मर्ज़ी से चलेगा ना.. अगर तुझे मारना है तो मार देता हूं.."

और बस इतना सुनते ही मेरी आंख खुल गई..

"हे भगवान! मतलब ये एक सपना था बच गया यार मैं उस भैंसे से.." ये खुद से बड़बड़ाते हुए मैं बिस्तर पर उठकर बैठ गया.. मेरी आंखें खुल चुकी थीं और मेरा धड़कता हुआ दिल अब फिर से अपनी जगह पर आ रहा था.. माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए मैंने अपनी रजाई साइड कर दी.. सपने भी अपनी मर्ज़ी के हिसाब से आने को तैयार नहीं हैं इससे ज़्यादा अजीब बात और क्या ही होगी.. ऊपर से मेरे सपने में आने वाले लोग भी अब मुझे जगाने का काम कर रहे थे..

"क्या हुआ नींद में क्या बड़बड़ा रहे थे आप? कोई सपना वपना देख लिया क्या?" श्रुति ने किचन से बाहर झांकते हुए पूछा..

और मेरे उसे पूरा सपना बताते ही वो मुझ पर हंसते हुए बोली, "आप भी ना इतने बड़े डॉक्टर बन गए पर फिर भी दूसरों के बागीचे में घुसकर कैरियां चुराना आपने अभी तक नहीं छोड़ा.."

"क्या करें सरकार अब सपना क्या आना चाहिए ये मेरे हाथ में थोड़े ही है.. पर सुबह सुबह आने वाले इन सपनों का कुछ ना कुछ मतलब तो पक्का होता है.." मैं अपनी आंखें मलते हुए बोला..

"अरे दूसरा क्या मतलब होगा.. बचपन में घुसे होंगे आप किसी के बागीचे में कैरियां और रामफल चुराने इसीलिए तो ऐसे सपने नींद में आपका पीछा करते रहते हैं.." श्रुति रोटियां बेलते बेलते बोली..

"हां आम तो कई बार चुराए हैं हमने बचपन में पर उस भैंसे का क्या? वो कोई सीधा सादा भैंसा नहीं था.. एकदम खतरनाक था और काजल जैसा काला रंग था उसका, सुर्ख लाल आंखें नुकीले सींग, गले में ज़ेवर और पैरों में कड़े.. बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात यमराज की सवारी हो वो.."

"शायद उस भैंसे में आपको आपके पिछले जन्म के दर्शन हो गए होंगे.." श्रुति ने मेरे मज़े लेते हुए कहा..

अब बीवी की तरफ से हुई इस बेइज़्ज़ती का कुछ ना कुछ करारा जवाब देना तो बनता ही था.. वरना ज़िन्दगी भर वो मुझे मेरे पिछले जन्म की याद दिलाती रहती..

"ऐसा कुछ नहीं है सरकार क्योंकि सातों जन्म मुझे यही पति मिले ऐसी मन्नत मांगने वाली भैंस मुझे उस सपने में कहीं नहीं दिखी.." मैंने उसकी तरफ देखकर हंसते हुए जवाब दिया..

"मतलब मम्मा तुम पिछले जन्म में भैंस थी?" पीहू ने बड़े ही भोलेपन से पीछे से आते हुए पूछा..

"मार खानी है क्या तुझे? मां हूं ना मैं तेरी अपनी मां को ऐसे बोलते हैं क्या?" श्रुति उस पर चिल्लाते हुए भड़की..

"अरे छोटी बच्ची है अभी वो उसे इतना थोड़ी समझ आता है.. तू क्यों उस बेचारी पर गुस्सा कर रही है?" मैंने श्रुति को समझाते हुए कहा और पीहू को चुपके से बाहर खेलने के लिए भेज दिया..

सुबह के दस बजने वाले थे.. ओपीडी के बाहर अब तक कई मरीज़ों की लाइन लग चुकी होगी इसलिए मुझे फटाफट तैयार होकर ओपीडी पहुंचना बहुत ज़रूरी था.. मुश्किल से पंद्रह मिनट में ही मैं तैयार होकर घर से निकल गया.. पर रास्ते में भी उस भैंसे का ख्याल मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था.. क्योंकि मुझे आज तक जो भी सपने आए थे वो बिल्कुल वैसे के वैसे ही सच साबित हुए हों ऐसा तो नहीं है पर उन सपनों से जुड़ी कोई ना कोई घटना तो पक्का हुई ही थी.. और ऐसा एक बार नहीं बल्कि कई बार हो चुका था.. भैंसा तो वैसे भी यमराज की सवारी होता है.. मतलब क्या आज कोई पैशन्ट टपकने वाला है क्या? और पैशन्ट ही क्यों शायद मुझे खुद आज यमराज के दर्शन हो सकते हैं.. आखिर मौत का क्या भरोसा.. वो कब किसे अपने जबड़े में जकड़ कर फाड़ खाए इसका कुछ कहा थोड़ी जा सकता है.. मुझे लगा कि मैं उस सपने के बारे में कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूं इसलिए मैंने आखिर में उस बात को वहीं छोड़ने का फैसला किया और पैशन्टस् को केबिन में भेजने के लिए बेल बजा दी..

इतने में ही दरवाज़ा खोलकर एक गंजा और बित्ता भर दाढ़ी बढ़ाया हुआ एक पैशन्ट अंदर आया.. जैसे उसके सिर के बचे खुचे सारे बाल ही नाराज़ होकर उसकी दाढ़ी पर उतर आए हों.. उसकी जीभ और दांत भी पान चबा चबा कर एकदम लाल पड़ चुके थे.. और थूक थूक कर वही लाल रंग ग्रैविटी की वजह से उसकी दाढ़ी पर भी चढ़ गया था.. उसके ठीक पीछे बुर्का पहने हुए उसकी दो बीवियां भी अंदर आ गईं.. उन दोनों औरतों की गोद में एक एक छोटा बच्चा था दूसरा बच्चा उंगली पकड़कर साथ आया था और तीसरा बच्चा पूरे बिंदास तरीके से उनके पेट में पल रहा था.. मतलब मेरी ओपीडी में अब करीब सात आठ लोगों की भीड़ जमा हो गई थी.. जबकि हर बार ओपीडी में एक वक्त पर सिर्फ पैशन्ट और उसके एक रिश्तेदार को ही अंदर भेजा जाता था.. पर इस बार जब एक बीवी को पैशन्ट के साथ अंदर भेजने की बात आई तो दूसरी बीवी भी अंदर आने के लिए झगड़ने लगी.. फिर मजबूरी में रिसेप्शनिस्ट ने दोनों को ही अंदर जाने दिया.. अब जब ये दोनों अंदर गईं तो इनके साथ आए हुए उन छोटे बच्चों ने भी अपना रोना धोना शुरू कर दिया.. कुल मिलाकर हाथी के साथ उसकी पूंछ भी अंदर आ गई थी..

मैंने एसी चालू किया और उस पेशंट को सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहते हुए पूछा, "क्या तकलीफ है रहीम चाचा?" मैंने फाइल पर पैशन्ट का नाम पढ़ते हुए पूछा

"मेरे को कुछ तो भी हो रहा है," वो अपनी छाती दबाते हुए बोला..

"कुछ तो भी मतलब क्या तकलीफ हो रही है चाचा और ये कब से हो रहा है?" मैंने उसकी तरफ देखकर पूछा..

"मेरी छाती भी दुख रही है पेट भी दुख रहा है पीठ भी दुख रही है और कंधे भी दुख रहे हैं," वो अपना सारा दर्द चेहरे पर लाते हुए बोला..

"अच्छा कुछ चोट वगैरह लगी थी क्या या गाड़ी से वगैरह गिरे थे क्या?" मैंने फिर से सवाल किया..

"क्या बताऊं डॉक्टर साब तुमको एक भैंसे ने मारा था मेरको और बहुत भगा भगा के मारा था साले ने," उसने अपने पेट से पठानी सूट का कुर्ता ऊपर उठाते हुए बताया..

"क्या? भैंसे ने? और कब मारा था?" उसने जैसे ही भैंसे का नाम लिया तो मैंने थोड़ा चौंक कर पूछा..

"उसको तो दस बारह महीने हो गए," उसने ऐसा मुंह बनाकर बोला जैसे कोई बहुत बड़ा राज खोल रहा हो..

"अच्छा दस बारह महीने पहले? फिर अब वो भैंसा कैसा है?" मैंने भी मज़े लेते हुए पूछा..

"उसको तो कत्लखाने ही जाना था पर क्या डॉक्टर साब आपको मेरे से ज़्यादा उस भैंसे की पड़ी है," वो थोड़ा चिढ़ते हुए बोला..

"अरे वैसी बात नहीं है चाचा मेरा मतलब था कि दस बारह महीने पहले की बात मत बताओ अभी की बात बोलो.. ये तकलीफ अभी कब से चालू है? कुछ रिपोर्ट वगैरह है क्या तुम्हारे पास? कही दिखाया था पहले?" मैंने उससे पूछा..

"हां है ना कल ही मशीन लगाकर चेक किया था दिल के डॉक्टर ने," ऐसा कहते हुए उसने अपने साथ लाई हुई प्लास्टिक की पन्नी से सोनोग्राफी और एंजियोग्राफी की रिपोर्ट निकालकर मेरे हाथ में थमा दी..

"दारू पीते हो क्या तुम और बीड़ी सिगरेट या तंबाकू वगैरह?" मैंने रिपोर्ट पर एक नज़र मारते हुए पूछा..

"हां मतलब कभी कभी ही लेकिन ज़्यादा नहीं पीता," उसने थोड़ा झिझकते हुए अपनी बीवी की तरफ देखते हुए जवाब दिया..

"काहे को झूठी बातें करते हो तुम.. दारू के बिना तो तुम्हारा दिन भी चालू नहीं होता किधर भी पड़ा रहता है डॉक्टर साब ये आदमी.. काम धंधा भी कुछ नहीं करता घर में एक फूटा बर्तन तक नहीं छोड़ा इस आदमी ने.. मेरा जब इसके साथ निकाह हुआ था तब सब ठीक था लेकिन जब से ये इस दूसरी औरत को घर लेकर आया है तभी से पूरा बिगड़ गया है ये आदमी.. क्या जादू किया है इस चुड़ैल ने इस पर अल्लाह ही जाने," उसकी पहली बीवी ने अपनी सौतन को सुनाते हुए अपने शौहर की पूरी जन्म कुंडली मेरे सामने खोल कर रख दी..

अपने ही पति की ऐसी पोल खोलकर उसकी धज्जियां उड़ाने में इन औरतों को सच में कितना मज़ा आता है ना.. उस वक्त मुझे महाभारत में युधिष्ठिर का पूरी स्त्री जाति को दिया गया वो श्राप याद आ गया कि औरतें अपने पेट में कभी कोई राज छुपाकर नहीं रख पाएंगी.. और ये श्राप सच होते हुए मैं खुद अपनी आंखों के सामने देख रहा था..

मैं रिपोर्ट देखते देखते उससे उसकी बीमारी के बारे में और बातें उगलवा रहा था.. उसके दिल की दो नसें अस्सी परसेंट ब्लॉक थीं और एक नस नब्बे परसेंट ब्लॉक थी.. हार्ट स्पेशलिस्ट ने उसे बाईपास के लिए ही मेरे पास भेजा था.. मैंने सिस्टर को बुलाकर उसे एडमिट कर लेने को कहा.. पर इस पेशंट ने भी भैंसे की याद दिला दी थी जिससे मेरी बेचैनी और ज़्यादा बढ़ गई.. मेरे रात के सपने में भैंसा और इस आदमी की बातों में भी भैंसा इतना बड़ा इत्तेफाक कैसे हो सकता है यार.. मेरे दिमाग में चल रहे भैंसे वाले ख्यालात शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे कि तभी मेरा फोन बज उठा..

"हेलो डॉ. राघव, मैं डॉ. मीरा बोल रही हूं.. आज चार पेशंट्स का बाईपास है, उनके ऑपरेशन की सारी तैयारी करके रखो.."

"मैडम, उन पेशंट्स को कल बाईपास के लिए ले लें तो नहीं चलेगा क्या? आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है," मैंने आज का काम टालने के लिए बहाना मारते हुए कहा.. क्योंकि सुबह वाला वो भैंसा पुराण मैडम को सुनाना मुझे कुछ सही नहीं लग रहा था और आज मैं किसी भी पेशंट को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था..

"नहीं राघव, उनमें एक वीआईपी पेशंट भी है.. अपने विधायक जी का बेटा है वो.. उस पेशंट को तीन तीन ब्लॉकेज हैं, हम कल तक का इंतज़ार नहीं कर सकते और हार्ट सर्जन डॉ. सिद्धार्थ शर्मा सर तो अब तक हमारे यहां आने के लिए निकल भी चुके होंगे.. इसलिए ओटी आज के लिए कन्फर्म है," डॉ. मीरा बोलीं..

"ठीक है मैडम, मैं करता हूं सारी तैयारी," मैंने मजबूरी में फोन रखते हुए कहा..

डॉ. मीरा देसाई मैडम खुद एक कार्डियक एनेस्थेटिस्ट थीं.. सामने वाला पेशंट ऑपरेशन के लिए कितनी भी ना नुकुर कर रहा हो पर उसे मक्खन लगाकर उसकी ना को हां में बदलने का गजब का टैलेंट उनके पास था.. उन्होंने भले ही अपनी उम्र की हाफ सेंचुरी पार कर ली थी पर अपनी उम्र को वो अपने चेहरे के आस पास भी फटकने नहीं देती थीं.. वो कब बूढ़ी होंगी इसका इंतज़ार करने वाले लोग खुद कबके बुढ़ापे की कगार पर पहुंच चुके थे पर डॉ. मीरा अभी भी वैसी की वैसी ही थीं.. ऐसा लगता था जैसे उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र को भी एनेस्थीसिया देकर बेहोश कर दिया हो.. कभी कभी उन्हें देखकर मुझे लगता था कि संतूर साबुन का एड तो असल में डॉ. मीरा को ही करना चाहिए था..

और दूसरी तरफ थे हमारे डॉ. सिद्धार्थ शर्मा सर.. इतना बड़ा हार्ट सर्जन होने के बाद भी इस बंदे में रत्ती भर का भी घमंड नहीं था बॉस.. इनके तो शब्दों में नहीं बल्कि हाथों में जादू था.. मैंने एक बार भी उन्हें कभी किसी पर भड़कते हुए नहीं देखा था.. दिन भर के इतने सारे ऑपरेशन्स की भागदौड़ के बीच भी अपने ड्राइवर ने खाना खाया या नहीं ये पूछते हुए मैंने खुद उन्हें देखा था.. और सच काहू तो ये इंसान मेरा आइडल था.. सिर्फ एक डॉक्टर के तौर पर ही नहीं बल्कि कितना भी बड़ा बन जाए पर पैर हमेशा ज़मीन पर रखकर काम करने वाले इंसान के तौर पर भी.. इतने बड़े और महान लोगों के साथ काम करने का मौका मिलना, इससे बढ़िया बात और क्या ही हो सकती है..

बाईपास सर्जरी के बाद पेशंट करीब सात आठ दिन तक आईसीयू में मेरी निगरानी में रहता था.. उसमें शुरुआत के कुछ घंटे उसे वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ती थी.. दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखने के लिए दो तीन दवाइयां भी लगातार सलाइन के ज़रिए छोड़ी जाती थीं.. ये आईसीयू वाले सात आठ दिन अगर सही सलामत निकल गए तभी ये घोड़ा अपनी आगे की ज़िन्दगी की रेस जीत पाएगा वरना फिर सीधा मौत के गड्ढे में गिरकर अपनी जान से हाथ धो बैठेगा.. इसलिए शुरुआत के कम से कम दो दिन तो मुझे थोड़ा ज़्यादा अलर्ट रहना बहुत ज़रूरी था.. क्योंकि पेशंट के टपकने के चांसेस इन्हीं दो दिनों में सबसे ज़्यादा होते हैं..

मैंने तुरंत तैयारी शुरू कर दी.. हर एक पेशंट के लिए खून की थैलियां मंगवा लीं.. सारे मॉनिटर और वेंटिलेटर सही से काम कर रहे हैं या नहीं ये भी चेक कर लिया.. इमरजेंसी में लगने वाली सारी दवाइयां सिरिंज में भरकर रेडी रख लीं.. स्टाफ और जूनियर डॉक्टर्स को कुछ इंस्ट्रक्शंस देकर उन्हें भी काम पर लगा दिया.. मेरी तरफ से तो सारी तैयारी हो चुकी थी बस अब पेशंट्स के आने का ही इंतज़ार था..

उसके बाद करीब एक डेढ़ घंटे में पहले पेशंट की सर्जरी पूरी हुई और उसे आईसीयू में शिफ्ट किया गया.. उस पेशंट के आते ही सारी नर्सेस और जूनियर डॉक्टर्स उसे मैनेज करने के लिए भागदौड़ करने लगे.. वो पेशंट करीब सत्तर साल का कोई बुज़ुर्ग था.. उसका एनेस्थीसिया अभी तक उतरा नहीं था.. उसकी छाती में दो नलियां डाली हुई थीं.. उनमें से एक नली दिल के आस पास वाली जगह से और दूसरी नली फेफड़ों के आस पास वाली जगह से बाहर आ रही थी.. सांस की नली में भी सांस लेने के लिए एक और ट्यूब डाली गई थी.. मैंने वेंटिलेटर की सारी सेटिंग्स सेट कीं और उसे वेंटिलेटर पर ले लिया.. सांस दिल की धड़कन और बीपी एकदम नॉर्मल है ये पक्का करके मैंने उसकी दवाइयों का ऑर्डर फाइल में लिख दिया.. वैसे तो वो बुज़ुर्ग ठीक ही था बस थोड़ा खून चढ़ाने की ज़रूरत लग रही थी तो मैंने उसका भी ऑर्डर दे दिया.. उसके बाद एक के पीछे एक तीनों पेशंट आईसीयू में आ गए.. उनका भी सारा सेटअप करके मैंने एसी के सामने कुर्सी खिसकाई और उस पर टिक कर बैठ गया.. कोई ज़िम्मेदारी वाला काम पूरा होने के बाद ली गई चैन की सांस भी कितना बड़ा सुकून देती है इस बात का एहसास मुझे तब हुआ..

रात के करीब आठ बजने वाले थे.. सारे जूनियर डॉक्टर्स और सिस्टर्स बस इसी इंतज़ार में थे कि मैं कब यहां से निकलूं.. उनकी हरकतों से मुझे भी ये समझ आ रहा था.. पर बेचारे कुछ बोल भी तो नहीं सकते थे.. मैंने उन्हें बारी बारी से खाना खाने भेज दिया और अपना खाना भी वहीं मंगवा लिया.. इससे सबको ये बात तो क्लियर हो गई थी कि अब मैं इतनी जल्दी आईसीयू से हिलने वाला नहीं हूं.. इसलिए आज पूरी रात बिना सोए उन्हें पेशंट्स पर नज़र रखनी ही पड़ने वाली थी..

अब उन चार पेशंट्स में से तीन पेशंट तो कबके होश में आ चुके थे और उन्हें वेंटिलेटर से भी हटा दिया गया था.. पर ये वीआईपी पेशंट मुझे थोड़ा ज़्यादा ही क्रिटिकल लग रहा था.. उस महान इंसान को सिर्फ तीस साल की उम्र में ही बाईपास की ज़रूरत पड़ जाए इससे बड़ी बदनसीबी और क्या ही होगी.. मैंने उसकी फाइल दोबारा पढ़कर देखी.. वो विधायक जी का बेटा था.. वज़न करीब सौ किलो के आस पास रहा होगा.. उसे सिगरेट पीने की भयंकर लत थी जिसकी वजह से उसके फेफड़ों की ताकत भी कम हो गई थी.. दारू पी पीकर उसके लीवर पर सूजन आ गई थी.. ऐसा कोई नशा नहीं था जो उसने ना किया हो.. इसीलिए उसके खून की जांच बार बार करना बहुत ज़रूरी हो गया था.. आईसीयू के बाहर उसके चेलों और कार्यकर्ताओं ने उससे मिलने के लिए भीड़ जमा कर रखी थी..

"हमारे भाऊ की तबियत कैसी है? अब उन पर थोड़ा ज़्यादा ध्यान रखिएगा डॉक्टर साब.." उसके घरवाले और कार्यकर्ता मेरे सामने गिड़गिड़ा रहे थे..

"तुम घरवालों ने अगर वक्त रहते इस लड़के पर थोड़ा ध्यान दे दिया होता तो आज मुझे इस पर ज़्यादा ध्यान देने के लिए यूं मिन्नतें करने की नौबत ही नहीं आती.." ये बात मैंने अपने मन में ही कही..

"हां बिल्कुल हम अपनी तरफ से सौ परसेंट कोशिश कर रहे हैं पर हमारे इलाज पर पेशंट का शरीर कैसे रियेक्ट करेगा सब कुछ उसी पर टिका है पर अभी के लिए तो हालत सीरियस ही है हम थोड़ा और इंतज़ार करते हैं.." ये सब उसके घरवालों से बोलकर मैं दोबारा अंदर जाने लगा.. पर तभी कब तक न्यूज़ चैनल के पत्रकारों ने मुझे घेर लिया..

"डॉक्टर हम माननीय विधायक जी के बेटे की तबियत के बारे में आपसे बात करना चाहते हैं कैसी है अब उनकी तबियत क्या उन्होंने आज का खाना खाया वो वीआईपी पेशंट हैं इसलिए उनके लिए अलग से कोई खास इंतज़ाम किया गया है क्या?" उनमें से एक पत्रकार ने मेरे मुंह के आगे माइक अड़ाते हुए पूछा..

"मेरे यूनिट के सारे पेशंट मेरे लिए वीआईपी ही हैं और खास ध्यान सिर्फ केस की सीरियसनेस देखकर दिया जाता है ना कि वीआईपी पेशंट देखकर.." बस इतना बोलकर मैं उनकी भीड़ से बचकर आईसीयू में घुस गया.. इन पत्रकारों का तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आता, भाई पेशंट ने क्या खाया क्या नहीं बस यही नहीं बल्कि उसके हगने मूतने की भी ये लोग कब ब्रेकिंग न्यूज़ बना दें कुछ कहा नहीं जा सकता..

अंदर आकर मैंने उस वीआईपी पेशंट पर एक नज़र डाली.. उसका बीपी लगातार गिरता जा रहा था.. ऑपरेशन के बाद खून भी कुछ ज़्यादा ही बह गया लग रहा था.. मैंने उसकी बीपी की दवाइयों का डोज़ थोड़ा बढ़ा दिया और खून रोकने वाली दवाइयां भी दे दीं.. उसे जल्द ही खून चढ़ाने की भी ज़रूरत थी तो मैंने उसका भी ऑर्डर दे दिया.. पर थोड़ी ही देर में अचानक उसके दिल की धड़कनें बेतहाशा बढ़ने लगीं और मॉनिटर के ईसीजी में भी सब ऊपर नीचे दिखने लगा.. अब बीपी इतना ज़्यादा गिर गया था कि दिमाग को खून पहुंचाने वाली नस में भी मुझे कोई हलचल महसूस नहीं हो रही थी.. मैंने तुरंत स्टाफ को शॉक देने की तैयारी करने को कहा और अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर उसकी छाती पर ज़ोर से दबाव देते हुए उसके दिल को दोबारा चालू करने की कोशिश करने लगा.. छाती दबाते हुए उसकी ऊपर वाली पसली के कटक से टूटने का एहसास भी मेरे हाथों को हुआ.. पर ऐसे नाज़ुक वक्त में उस टूटी हुई पसली से कहीं ज़्यादा ज़रूरी उसके दिल का फिर से धड़कना था.. इतनी कोशिश करने के बाद भी उसका दिल साथ देने को तैयार ही नहीं था.. शॉक की मशीन रेडी होते ही मैंने शुरुआत में उसे दो सौ जूल का शॉक दिया.. पर फिर भी जब इतने से कुछ नहीं हुआ तो उसके तुरंत बाद मैंने दोबारा तीन सौ साठ जूल का शॉक दिया और तब जाकर उसका दिल फिर से नॉर्मल धड़कने लगा..

हमने भले ही फिलहाल के लिए उस पेशंट को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया था पर आखिर में किस्मत में क्या लिखा है ये किसे पता होता है.. मैंने उसके घरवालों को अपनी केबिन में बुलाया और पेशंट की सीरियस होती हालत के बारे में उन्हें बताकर मैं जो भी कोशिशें कर रहा था उसकी डिटेल देने लगा.. पर तभी मेरी बात बीच में ही काटते हुए उस पेशंट का विधायक बाप मुझसे बोला..

"हमें सच सच बताइये डॉक्टर साब हमारा लड़का सच में ज़िंदा भी है या नहीं आप ही ने मारा है ना हमारे लड़के को हमारे एक कार्यकर्ता ने खुद आपको उसकी छाती दबा दबा कर मारते हुए देखा है कितने पैसे दिए हैं आपको विरोधी पार्टी के नेताओं ने हमारे लड़के को मारने के लिए अगर इतनी ही पैसों की भूख थी तो हमसे मांग लेते ना आप.."

उनकी ये बातें सुनकर तो मेरे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई.. मतलब अभी थोड़ी देर पहले दिल चालू करने के लिए जब मैं उस पेशंट की छाती दबाकर सीपीआर दे रहा था तो उस बात का इन्होंने ये मतलब निकाला.. कहीं इन्होंने पेशंट पर नज़र रखने के लिए कोई जासूस तो नहीं छोड़ रखा है.. आईसीयू के अंदर की इतनी सीक्रेट बातें इन्हें कैसे पता चलीं इससे ज़्यादा मुझे इस बात का बुरा लग रहा था कि इनका मेरे इलाज पर ज़रा भी भरोसा नहीं था.. अगर इन्हें मुझ पर भरोसा ही नहीं था तो मैं सुबह से इतनी जी तोड़ मेहनत क्यों कर रहा था.. मेरे दिमाग में ख्यालों का एक तूफान सा उठ खड़ा हुआ.. पर फिर भी मैंने एक गहरी सांस ली और अपने मन की बेचैनी को अपने चेहरे पर बिल्कुल नहीं आने दिया और उनसे बोला..

"विधायक जी जब दिल काम करना बंद कर देता है तो उसे फिर से चालू करने के लिए छाती पर दबाव देने का ये एक मेडिकल तरीका होता है और आपका पेशंट अभी ज़िंदा है भला मैं क्यों मारूंगा आपके पेशंट को.." मैंने उन्हें समझाते हुए कहा तो ज़रूर पर केबिन में घुसे हुए उन कार्यकर्ताओं का शोर अब इतना बढ़ गया था कि मेरी बात किसी को सुनाई ही नहीं दी.. इतने में ही कुछ कार्यकर्ता हाथों में हॉकी स्टिक लेकर केबिन में घुस आए और उन्होंने केबिन के कांच फोड़ना शुरू कर दिया.. मैं तुरंत उन्हें रोकने के लिए आगे भागा पर तभी पीछे से एक डंडा सीधे मेरे सिर पर आ लगा और मैं धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा..

डंडे की उस चोट से ऐसा लग रहा था जैसे सिर में कोई ब्लास्ट हो गया हो.. उस भयानक दर्द के आगे सुबह से हुई भागदौड़ की वजह से शरीर में आई थकावट भी अब फीकी लगने लगी थी.. मैंने अपना पूरा ध्यान सिर्फ अपनी सांसों पर लगाना शुरू कर दिया.. मेरा पूरा शरीर धीरे धीरे सुन्न पड़ता जा रहा था और अचानक मुझे एक गहरी शांति का एहसास होने लगा.. मुझे अंदाज़ा होने लगा था कि शायद मेरा इस दुनिया से जाने का बुलावा आ गया है.. मरते वक्त अगर मैं भगवान का नाम लूंगा तो इस जन्म मरण के चक्कर से आज़ाद होकर मैं पक्का उसी परमात्मा में लीन हो जाऊंगा ये सोचकर मैं अपनी हर सांस के साथ भगवान का नाम जपने लगा.. इतने में ही मेरे अंदर छाई उस गहरी शांति को चीरती हुई एक बहुत ही भारी और भयानक आवाज़ मुझे सुनाई दी.. थोड़ी देर के लिए तो मैं उस आवाज़ से एकदम कन्फ्यूज़ ही हो गया.. एक तो मैं भगवान को पुकार रहा हूं और भगवान मुझे इतनी भयानक आवाज़ में जवाब दें ये कैसे हो सकता है भला.. फिर वो भारी आवाज़ जैसे जैसे मेरे करीब आती गई मुझे एहसास होने लगा कि मुझे लेने भगवान नहीं बल्कि अपने भैंसे पर सवार होकर खुद यमराज आ रहे हैं और वो भयानक आवाज़ भी उसी भैंसे की थी.. एकदम भीमकाय और काजल जैसा काला रंग, सुर्ख लाल आंखें नुकीले सींग माथे पर सफेद चांद का निशान गले में ज़ेवर पैरों में कड़े और बालों वाली पूंछ बिल्कुल वैसा ही था वो भैंसा जैसा मैंने उसे सपने में देखा था.. उसके दांत और माथे पर बने चांद के निशान को छोड़ दिया जाए तो सफेद रंग से उसका दूर दूर तक कोई नाता नहीं था..

अच्छा तो मतलब सुबह से चल रहे उस भैंसा पुराण का ऐसा अंत होने वाला था.. कोई बात नहीं पर दुख सिर्फ इस बात का हो रहा था कि मरते वक्त भगवान को इतना याद करने के बाद भी वो मुझे बचाने नहीं आए.. मेरे ही पाप होंगे और क्या अब इस यमराज के साथ यमलोक जाकर वहां मुझे कौन कौन सी सज़ाएं भुगतनी पड़ेंगी ये भी अब भगवान ही जाने.. पर वो भैंसा यमराज को लेकर मेरी तरफ ना आकर आईसीयू के कांच के आर पार सीधा अंदर घुस गया.. यमराज ने अपना यमपाश बाहर निकाला और उस वीआईपी पेशंट पर डालकर उसे लेकर वो मेरे सामने से ही वापस जाने लगे..

"अरे यमराज जी रुकिए मुझे भी अपने साथ ले चलिए वो भगवान भी नहीं आए और आप भी मुझे बिना लिए ही जा रहे हैं मुझे ले जाने के लिए कोई वीआईपी इंतज़ाम करने वाले हैं क्या आप मैं इतना भी वीआईपी नहीं हूं आप मुझे भी अभी अपने साथ ले चलिए," मैंने मिन्नतें करते हुए कहा..

"कुछ ज़्यादा ही जल्दी है तुझे यहां से निकलने की तेरा यहां का बहुत सा काम अभी बाकी है और तेरा बुलावा भी अभी नहीं आया है तुझे अभी नहीं ले जाया जा सकता," यमराज ने अपनी भारी और गूंजती हुई आवाज़ में कहा..

"मेरा बुलावा अभी नहीं आया है तो फिर मेरी ऐसी हालत क्यों हुई और मुझे आपके दर्शन कैसे हो गए फिर मुझे भी ले चलिए अपने साथ मैंने अपना पूरा मन बना लिया है," मैंने बहुत ही गिड़गिड़ाते हुए मिन्नत की..

"तेरी ये हालत करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचा था अगर तू बार बार उस वीआईपी पेशंट को बचाता रहता तो उसकी मौत का वक्त टल जाता इसीलिए उसे उठाने के लिए मुझे पहले तुझे रास्ते से हटाना पड़ा और एक और वजह ये भी है कि मौत के वक्त लोग यमराज से ज़्यादा तुम डॉक्टरों से डरते हैं तुम डॉक्टर लोग तो पेशंट को चैन से मरने भी नहीं देते हो यार पूरी ज़िन्दगी भर जो इंसान कभी ढंग से जी नहीं पाया वो कुछ दिन और जी कर ऐसा कौन सा तीर मार लेगा, कई बार तुम डॉक्टरों को ये पता भी होता है कि अभी अगर तुमने उस पेशंट को बचा भी लिया तो ज़्यादा से ज़्यादा वो दो तीन दिन और जी लेगा पर एक ना एक दिन तो उसे मरना ही है ना फिर इस सच को अपनाने से तुम लोग क्यों डरते हो बिल्कुल खुशी खुशी अपनी ज़िन्दगी जीने की जैसे तुम लोग प्लानिंग करते हो वैसे ही खुशी से मौत को गले लगाना तुम इंसान कब सीखोगे, तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक की सारी तकलीफों का इलाज अगर मौत ही कर रही है तो इससे खूबसूरत बात और कोई हो ही नहीं सकती अगर तुम्हें मरते वक्त डर लग रहा है तो इसका मतलब तुमने ज़िन्दगी से कुछ सीखा ही नहीं है मौत ही ज़िन्दगी का आखिरी सच है इस सच को अगर तुमने मान लिया तो फिर डरने की कोई बात ही नहीं बचती हर बार मौत के वक्त तुम इंसानों की ऐसी रोती बिसूरती शक्लें देख देखकर अब हम भी पक चुके हैं," ऐसा बोलते बोलते ही यमराज वहां से निकलने लगे.. मौत का इतना गहरा ज्ञान देने वाले वो यमराज मुझे कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े होकर गीता का ज्ञान देने वाले साक्षात श्री योगेश्वर जैसे ही लग रहे थे.. उन्हें वापस जाते हुए देखते हुए ही मैंने अपनी आंखें मूंद लीं..

फिर जब मैंने अपनी आंखें खोलीं तो मुझे समझ आया कि मैं अपने ही आईसीयू में एडमिट था.. मेरे सिर पर लगे टांकों की वजह से वहां की स्किन एकदम खिंची खिंची सी लग रही थी.. मुंह में डाली गई सांस की नली की वजह से मैं ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था.. बगल के स्टैंड पर एक सलाइन भी लटकता हुआ दिख रहा था.. उस मॉनिटर की लगातार आ रही बीप बीप की आवाज़ भी अब मुझे चुभ रही थी.. कुछ देर मैं ऐसे ही छत को घूरता रहा..

"हेलो डॉ. राघव कैसा लग रहा है अब.. पिछले पंद्रह दिनों से एडमिट हो तुम यहां चार दिन पहले ही तुम्हारी क्रैनियोटॉमी हुई है थोड़ी ही देर में हम वेंटिलेटर निकाल देंगे फिर तुम अपने घरवालों से मिल सकते हो सब ठीक है फिक्र मत करो," मुझे होश में आया देखकर डॉ. रोहन सर बोले..

मैंने नज़रों से ही उन्हें 'ठीक है' का इशारा किया और थोड़ी ही देर में मेरा वेंटिलेटर निकाल दिया गया.. उसके बाद एक के पीछे एक घरवाले मुझसे मिलने आने लगे.. मुझे होश में देखकर सब बहुत खुश लग रहे थे.. श्रुति ने भी मेरी देखभाल के लिए एक महीने तक अपनी प्रैक्टिस बंद रखी थी.. पीहू भी हर दिन मेरी लिखी कहानियां मुझे ही पढ़कर सुनाने वाली थी..

आज आईसीयू में एडमिट रहने का मेरा आखिरी दिन था.. कल डॉ. रोहन मुझे डिस्चार्ज देने वाले थे.. इसलिए मैं बहुत बेसब्री से घर जाने का इंतज़ार कर रहा था.. क्योंकि पिछले बीस दिनों से मैं यहां पेशंट बनकर अटका पड़ा था.. कितने ही दिनों से नहाने का कोई अता पता नहीं था इसलिए घर जाते ही सबसे पहले ठंडे पानी की बाल्टी मैं अपने ऊपर धड़धड़ उंडेलने वाला था.. कितने दिनों से मैंने उगता हुआ सूरज भी नहीं देखा था.. आईसीयू के अंदर दिन चल रहा है या रात ये भी समझने का कोई तरीका नहीं था.. अब बस कुछ ही घंटों की बात बची थी..

तभी एक नया इमरजेंसी पेशंट आईसीयू में लाया गया.. ड्यूटी वाले सीनियर डॉक्टर्स को आने में अभी वक्त था तो वहां के जूनियर डॉक्टर मेरे पास ही उसकी फाइल लेकर आए.. उम्र करीब अस्सी के आस पास रही होगी.. उसके दिल की ताकत बीस परसेंट से भी कम हो गई थी.. दिल के दोनों तरफ के वाल्व भी खराब हो चुके थे.. दिल की नसों में भी दो ब्लॉकेज थे.. उस पेशंट का शरीर इस हालत में ऑपरेशन झेल पाएगा ऐसा मुझे बिल्कुल नहीं लग रहा था.. मैंने फर्स्ट एड चालू करने को कहा और उस पेशंट के पास गया.. वो पेशंट पसीने से पूरी तरह तरबतर था.. उसकी सांसें भी बहुत तेज़ चल रही थीं और वो एकदम बेचैन हालत में, "डॉक्टर साब मुझे बचा लो मेरी छाती में बहुत दर्द हो रहा है," ऐसी मिन्नतें कर रहा था..

मैंने पास जाकर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और दूसरा हाथ उसके माथे पर रखकर उसे शांत करते हुए बोला..

"बाबा आंखें बंद करके शांति से एक गहरी सांस लो और ली हुई सांस धीरे धीरे बाहर छोड़ो.. एक बार अंदर ली हुई हर सांस हमें बाहर छोड़नी ही पड़ती है ना.. बिल्कुल ऐसा ही इस ज़िन्दगी का भी है.. एक बार तुमने ज़िन्दगी को अपना लिया तो कभी ना कभी तुम्हें इसे छोड़ना ही पड़ेगा.. फिर इस मौत से इतना क्यों डर रहे हो.. हर सांस छोड़ते वक्त राम का नाम लो सब कुछ ठीक हो जाएगा.."

उसके बाद बस कुछ ही सांसों में वो पेशंट एकदम शांत हो गया.. वो शांत हुआ पर हमेशा के लिए.. उसके चेहरे पर कहीं भी मौत का वो खौफ या भैंसे वाला डरावना भाव नहीं दिख रहा था.. वहां थी तो बस एक सुकून भरी मुस्कान.. ईश्वर का नाम लेते हुए उसने जो आखिरी सांस छोड़ी उसका स्पर्श मेरे हाथों को भी महसूस हुआ था.. मेरे लिए वो सिर्फ एक छुअन नहीं थी बल्कि वो एक मृत्युस्पर्श था..

(समाप्त)
 

Mrxr

“𝕾𝖐𝖞— 𝕿𝖍𝖊 𝖍𝖊𝖆𝖗𝖙 𝖔𝖋 𝖊𝖑𝖊𝖒𝖊𝖓𝖙𝖘”
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Payal : Ek Adhura Sach

Subah ka waqt aur halki dhoop... Ye din bhi har roz ki tarah hi normal sa lag raha tha. Par mere liye ye sab ajeeb sa tha.

Main apne classroom ki pichli seat par baitha hua tha. Class mein halka sa shor macha hua tha. Sab aapas mein baatein kar rahe the.

Kabhi-kabhi main sochta hun, zindagi aisi hi honi chahiye, simple aur bina kisi complications ke. Meri zindagi bhi kuch aisi hi hai. College, padhai, mazak masti karne wale kuch dost aur Payal. Jab wo mere samne hoti hai, toh sab kuch accha sa lagta hai. Main baitha yahi sab soch raha tha ki mujhe kisi ne aawaz di.

"Good morning... Kis soch me gum ho?"

Maine sir utha kar dekha. Wo mere samne khadi thi. Chehre par wahi muskurahat, jo mujhe pasand thi.

"Kuch Nahi..."

"Tum kuch jyada hi sochte ho."
usne kaha.

"Aur tum bahut ajeeb baatein karti ho."

Wo Hans padi, aur mere sath baith gayi. Phir kuch der baad wo mujhse boli,

"Abhay..."

"Hmm..."

"Agar kabhi ye sab kuch khatam ho jaye... Toh tum kya karoge?"


Uska ye sawal mujhe kafi ajeeb laga. Main haste hue kaha, "Ye kaisa sawal hai. Aisa sirf filmon me hota hai."

Wo khamosh si mujhe dekhti rahi. Mujhe aisa laga jaise use jawab pahle se hi pata tha. Par pata nahi kyon... Uska wo sawal mere dimaag me hi ghoomta raha. Aur na jane usne kitne hi aur sawal chhod diye mere andar. Us din mujhe pehli baar laga, main jitna sochta hun zindagi utni bhi aasan nahi.

Khair, aise hi waqt beetne lage. Kabhi lagta sab normal hai, par kabhi aisa lagta jaise sab kuch uljha hua sa hai. Mere sath kuch ajeeb si chize hone lagi.

Ek din jab main subah so kar utha, toh diwar par lagi ghadi mein 7:15 ho raha tha. Par jab maine apna phone dekha, toh usme 7:25 ho raha tha. Mine socha shayad kharab ho gayi hogi. Isiliye maine jyada dhyaan nahi diya.

Par Agle din isse bhi jyada kuch ajeeb sa hua. Main canteen se gujar raha tha. Tabhi mujhe aisa laga jaise ye sab mere sath pahle bhi ho chuka hai. Tabhi ek ladke ne joke mara, bilkul usi andaaz mein jaise usne pahle bola tha. Ajeeb baat ye thi, ki mujhe uski agli line yaad thi. Mano kisi ne time ko rewind kar diya ho.

"Tumhe kal bhi yahi joke mara tha." Maine usse kaha.

Ladka halka hansa, "Pagal hai kya."

"Mujhe yaad hai, tumne kal bhi yahi joke mara tha."


Wo halka hansa aur bola, "Bhai, subah-subah pi rakhi hai kya?"

Main aage kuch nahi bola, kyonki mere paas meri baat ka koi proof nahi tha. Isiliye main chup raha. Maine socha ho sakta hai wo sach bol raha ho. Shayad ye mera waham ho.

"Payal theek hi kahti hai, main kuch jyada hi sochta hun."

Main khud se hi bol raha tha. Par mere dimaag me kuch khatak raha tha. Us raat jab main so raha tha, toh mujhe kuch ajeeb sa laga. Jaise main kisi andhere kamre mein leta hua hun, aur charon taraf sannata pasara hua hai. Machines ki beep… beep… ki aawazin mere kaano me sunai de rahi thi. Un machines ki aawazon ke beech ek aawaz aur thi, jo kisi ladki ki thi. Wo mujhe aawaz de rahi thi.

"Please... Wapas aa jao."

Uski aawaz me bechaini saaf mahsus ki maine. Jaise wo mujhe khone se dar rahi ho. Main uth kar use jawab dena chahta tha, par Jaise mere shareer me jaan hi nahi thi.

Agle hi pal alarm clock ki tez aawaz se meri neend khul gayi. Jo na jane kitni der se baj rahi thi. Meri saans tezi se chal rahi thi. Maine chehre par haath fera, toh chehra paseene se bhara hua tha.

"Ye ek Sapna tha?" Main khud se hi bola.

Kuch time baad main college pahuncha. Sab kuch pehle jaisa normal tha. Shor... Students... Classes aur Payal. Par mere andar kuch bhi normal nahi tha.

Payal ne muskurate hue kaha, "Good morning."

Kuch pal main chup sa use dekhta raha. Use dekh kar mujhe ek ajeeb sa sukoon mahsus ho raha tha, par sath me ek anjana dar bhi lag raha tha. Aisa kyon tha, mujhe nahi pata. Koi jawab na milne par wo phir boli.

"Tum theek ho?"

Maine halka sa sir hilaya, "Haan..."

Kuch lamhe, ham dono ke beech khamoshi rahi. Phir maine dheere ke kaha.

"Aaj mujhe ek Ajeeb sa sapna aaya."

"Kaisa sapna?"
Usne pucha.

"Ek andhra kamra... Machines ki beep-beep ki aawazein... Jaise kis hospital ke kamre se aati hain. Aur ek ladki ki aawaz jo mujhe pukar rahi thi."

Usne mujhe gaur se dekha, mujhe uski aankhon me dar dikha... Ya shayad kuch aur tha.

"Sapna hi toh tha... Itna seriously mat lo."

Uski aawaz normal nahi thi. Usne tezi me jawab diya. Aisa aksar log us waqt karte hain, jab wo kuch chupa rahe hote hain. Maine usko gaur se dekhte hue pucha.

"Tumhe kaise pata, main seriously le raha hun?"

Kuch pal toh wo chup rahi, phir muskurate hue boli.

"Tum aisa hi karte ho... Mujhe pata hai."

Mujhe uska jawab thoda ajeeb laga. Us din mera dimaag kahin aur hi tha. Ghar laut-te waqt main apni hi sochon me gum, road cross kar raha tha. Tabhi ek tez horn ki aawaz mujhe sunai di.

Aawaz itni tez thi, jaise wo bilkul mere paas se aayi ho. Maine sir utha kar dekha. Toh Khud ko bich road par paya. Aur ek car tez raftar se meri taraf aa rahi thi. Meri aankhen hairat se badi ho gayi. Mera dil tezi se dhadakne laga. Us waqt mere liye 1 second bhi 1 ghante jaisa lag raha tha. Mujhe aisa laga, jaise wo pal meri jindagi ka aakhri pal ho. Main wahan se hatna chahta tha, par pair wahin jam se gaye the.

Tabhi achanak se sab ruk gaya. Hawa... Log... Gadiyon ka Shor... Aur wo car bhi. Mujhe samajh nahi aaya ye hua kya. Tabhi mujhe phir se wahi aawaz sunai di.

"Beep... Beep... Beep."

Mujhe aisa laga, meri saans jaise thamne lagi thi. Tabhi ek aur aawaz gunji.

"Abhi nahi."

Ye aawaz mere peeche se aayi thi. Maine palat kar dekha, piche payal khadi thi. Par wo kuch alag lag rahi thi. Uska chehre par koi bhav nahi the... Wo Bilkul shaant si khadi hui thi. Uski aankhon mein mujhe sunapan dikha.

"Payal…?"

Uske kadam dheere se meri taraf badhe.

"Abhi waqt nahi aaya... Abhay." Uski aawaz kaanp rahi thi.

"Kaisa waqt?"

Wo kuch bolti usse pahle hi sab normal ho gaya. Waqt wapas se chal pada, hawa phir se bahne lagi. Aur wo car mere bilkul paas aakar ruk gayi. Mere aas paas logon ki bheed jama ho gayi. Agle hi pal mujhe kisi ke chillane ki aawaz sunai di.

"Pagal ho gaya hai kya?"

Mera shareer abhi bhi kaanp raha tha. Maine us taraf dekha... wo aawaz us car wale ki thi. Phir maine payal ki taraf dekha, par wo wahan nahi thi.

Main hairan ho gaya, "Abhi toh yahin thi, achanak kahan gayab ho gayi? Kya wo mera waham thi?"

Aise hi kai sawal mere dimaag me chalne lage. Ab mera shak yakeen mein badalne laga tha. Ye jo kuch bhi ho raha hai, wo normal nahi ho sakta. Kuch toh gadbad hai mere sath.

Agle din main doctor ke paas gaya, aur sari baatein batayi. Usne mujhe kuch medicines di. Par usse bhi kuch faida nahi hua. Aksar mujhe wahi aawazein sunai deti. Is sab se pareshan hokar maine sach ka pata lagane ka faisla kiya.

Sabse pahle maine apne past ke baare me sochna suru kiya. Family... School... Bachpan ke dost... Aur bhi bahut kuch. Par sab kuch dhundhla-dhundhla sa tha. Jaise kisi ne jaan bujh kar meri yaadon ke saath khilwad kiya ho.

Maine apne doston aur apne padosiyon se bhi baatein ki, par un sabke jawab bhi ajeeb the. Kuch bhi gahrai me nahi tha. Mujhe ab aisa lagne laga tha, jaise main kisi aur hi duniya mein hun. Jo bilkul asal duniya jaisi hi hai, par yahan kuch bhi gahrai se nahi hai.

Maine Payal ko notice karna start kiya. Kyonki ek wahi thi, jo mere dil ke sabse karib thi. Jab bhi main usse kuch puchta wo topic badal deti, ya phir mujhe gumrah kar deti. Par mujhe ab sach janna tha.

Ek din maine payal se puch hi liya.

"Tum mujh se kuch chupa rahi ho na?"

Uski aankhon me hairat bhar gayi. Jaise main uska jhuth pakad liya ho. Par agle hi pal wo muskura uthi.

"Abhay... Tum kuch jyada soch rahe ho, aisa kuch nahi hai."

Lekin mujhe aise simple se jawab se kuch hansil nahi hone wala tha. Aaj main uski baaton me nahi fasne wala tha. Mujhe mere sawalon ke jawab chahiye the.

"Bas payal... Mujhe sach janna hai, warna main pagal ho jaunga."

Kuch lamhe ki khamoshi ke baad payal boli.

"Tum sun nahi paoge." Uski aawaz dheemi thi.

"Main sunna chahta hun."

"Sach tod dega tumhe, Abhay. Tumhe taklif hogi."

"Jo bhi ho, payal... Mujhe sach janna hai."


Meri Aawaz me dar aur halka gussa dono tha. Payal ne thehri aankhon se meri taraf dekha. Dekhte hi dekhte uski aankhein nam ho gayi.

"Tum pagal nahi ho, Abhay... Ye sab Jo tum dekh rahe ho, sab kuch khokhla hai. Sach kuch aur hai."

"Kya Matlab?"

"Asli duniya me tumhara accident hua tha, jisme almost tum mar chuke the. Aur is waqt tum coma me ho."


Ek choti si khamoshi ke baad wo fir boli.

"Ye tumhare hi dimaag ki banai hui duniya hai. Aur main... Usi duniya ka ek hissa hun."

Mere pairon tale jamin khisak gayi, mujhe laga main gir jaunga.

"Nahi... Aisa kaise ho sakta hai. Tum jhuth bol rahi hai, ye possible nahi hai."

"Yahi sach hai, Abhay. Ham sach se bhag nahi sakte."

Maine uski taraf dekha. Wo chup chap khadi mujhe hi dekh rahi thi.

"Ab faisla tumhe karna hai."

"Kaisa faisla?"

Usne ek gahri saans bhari aur aage boli.

"Ya toh tum is jhuthi duniya me jeete raho... Ya phir apni asal duniya me laut jao."

Mujhe kuch samajh nahi aa raha tha. Mera dimaag fatne ko ho raha tha. Maine himmat kar ke Payal se pucha.

"Agar main wapas gaya toh?"

Mera sawal sun kar Payal ki aankh se aansu uske gaal par bah gaye.

"Ye duniya mit jayega, aur tum sab kuch bhul jaoge."

Mujhe jis baat ka dar tha, Payal ne wahi kaha.

"Tum bhi?"

Pahle toh usne kuch nahi kaha, phir dheemi aawaz me boli.

"Haan... Main bhi. Log toh honge tumhare paas, par yaadein mit chuki hongi tumhari." Payal ne itna keh kar apni nazrein jhuka li.

Main use kabhi khona nahi chahta tha. Par is jhuthi duniya ka koi matlab bhi nahi banta tha, jahan sab kuch adhura hai. Kuch der toh mera dimaag kuch soch hi nahi paya. Mere dimaag mein hazaron baatein ghum rahi thi.

Maine apni aankhein band kar li. Mujhe ek-ek kar beete lamhe yaad aane lage. Beep-beep ki aawaz... Ladki ka pukarna... Payal... Wo sab kuch jo mere sath hua.

Ab mere paas do raaste the, jinke beech main khada tha. Ya toh main is jhuthi duniya me rahe jaun, jahan payal hai. Par sab adhura hai. Ya fir main asli duniya me wapas chala jaun, jahan se main aaya hun. Par wahan payal nahi hogi.

Main samajh nahi paa raha tha, kaunsa rashta chunu. Mujhe pareshan dekh kar payal ne kaha.

"Kya hua, Abhay?"

"Mujhe kuch samajh nahi aa raha kaunsa rashta sahi hai."


Usne ek fiki muskaan ke sath kaha.

"Wapas laut jao, Abhay... Mujhe azaad kar do is duniya se."

Ye sun kar mera badan sihar gaya.

"Nahi payal... Main tumhe khona nahi chahta."

"Nahi Abhay... Yahi sahi hai hamare liye. Aur wo ladki jo tumhara kab se intezar kar rahi hai, uske khatir wapas laut jao."

Main payal ko kuch der waisa hi khada dekhta raha. Meri himmat nahi ho rahi thi ki main koi faisla lun, par mujhe faisla toh karna hi tha. Kafi der sochne ke baad maine dheere se kaha.

"Theek hai payal... Main apni duniya me wapas jana chahta hun."

"Thank you, Abhay."


Jaise hi usne ye bola, dheere dheere sab kuch badalne laga. Achanak se meri aankhon ke aage andhera chha gaya. Jaise kisi ne mujhe andhere kamre mein band kar diya ho.

Jab meri aankhein khuli toh sab dhundhla sa tha. Safed ceiling... Machines ki beep... Aur thandhi hawa. Dheere dheere sab kuch saaf ho gaya. Maine khud ko hospital ke bed par paya. Maine halka sa sir ghuma kar dekha.

Ek nurse khadi glucose ki bottle me injection se dawa mila rahi thi. Dawa milane ke baad wo meri taraf mudi. Mujhe jaga hua dekh kar wo muskurate hue boli.

"Abhi kaisa feel kar rahe ho."

Mere muh se bilkul dheemi aawaz nikli. Jaise shareer me jaan hi na ho.

"Sir me... dard ho... raha hai."

Wo halka sa meri taraf jhuki aur mere sir par haath fer kar boli, "Dheere-dheere sab theek ho jayega, main hun na tumhare paas."

Main kuch nahi bola, bas uski taraf dekhta raha. Mujhe aisa lag raha tha, main usse pahle se janta hun. Par mujhe kuch bhi yaad nahi uske baare mein, sab dhundhla sa tha. Meri nazar uski dress par lage badge par padi. Jis par uska naam likha tha.

"Payal."

Maine apni dheemi aawaz me usse pucha, "Kya main... Tumhe janta hun?"

Uske chehre ki ronak pal bhar mein gayab ho gayi. Phir Kuch der baad usne jawab diya.

"Jante the."

Maine mahsus kiya yeh bolte hue uski aawaz kaanp gayi. Uski aankhon me aansu bhar gaye. Yeh dekh kar mere dil mein ek anjana sa dard mahsus hua. Aisa kyon tha, mujhe nahi pata. Main chup chap use waise hi dekhta raha. Mujhe uske baare me kuch bhi yaad nahi tha. Par use dekh kar dil me ek khalipan sa lag raha tha.

Wo tez kadmon ke sath kamre se bahar chali gayi. Mujhe ye ajeeb laga. Mere sir mein dard ki wajah se maine apni aankhein band kar li. Aur kuch der baad... Sab shant ho gaya, aur dheere dheere sab dhundhla hone laga.

Par agle hi pal Achanak se meri aankh khuli, aur main uth kar baith gaya. Meri saanson ke sath dil ki dhadkan bhi tezi se chal rahi thi. AC ki thandhi hawa me bhi mera pura shareer paseene se bhiga hua tha. Lights jal rahi thi. Maine khud ko apne kamre me paya.

"Ye... Ye ek Sapna tha?" Maine kaanpti hui aawaz mein dheere se kaha.

Tabhi bathroom ka darwaja khula. Jab maine us taraf dekha toh ek ladki baalon mein towel lapete hue bahar nikl rahi thi.

"Payal?"

Main tezi se uski taraf badha, aur usse lipat gaya. Achanak mere aisa krne se wo kasmasa uthi.

"Kya hua? Chhodo mujhe."

Par main waise hi usse lipta raha. Shayad use meri tez dhadkan mahsoos ho rahi thi. Isiliye, usne dobara kuch nahi kaha. Thodi der ki khamoshi ke baad usne kaha.

"Abhay... Aur kitni der aise hi khada rakhoge mujhe."

Ab tak main kafi had tak shaant ho chuka tha. Maine usko khud se alag kiya. Usne meri aankhon me dekh kar kaha.

"Ab batao hua kya hai?"

"Maine sapna dekha..."

"Sapna?..."


"Main coma mein tha... Aur jab main utha toh main tumhe bhul gaya tha."

Meri aawaz mein dar saf pata chal raha tha. Usne kuch der mujhe gaur se dekha. Fir halki muskan ke sath boli.

"Tum bhi na... Yahin toh hun main... Tumhare samne."

"Haan... Par..."


"Abhay... Tum kuch jyada soch rahe ho."

Main chaunk kar bola, "Aisa hi tumne sapne mein bhi..."

Main itna hi bol paya ki usne mere honthon par apni ungli rakh di.

"Ssshhhh... Chup raho. Sab bhul jao, Bas mujhe yaad rakho."

Itna bol kar usne mere gaal par ek kiss ki aur sheeshe ke samne khadi hokar khud ko sawarne lagi.

Main bolna chahta tha, par chup rahe gaya. Meri nazarein bas use hi dekh rahi thi. Wo mere samne khadi thi. Mere Dil me abhi bhi dar tha, kahin ye bhi koi sapna na ho. Aur jab main uthun, toh phir se main use kho na dun.

"Mujhe nahi pata... Ye kya tha. Ek sapna... Ya kisi adhure pyaar ki bachi hui yaadein... Sach kya hai... Ye faisla main aap par chhodta hun."

(The end)
 

GHANSA23

Every male and female is loyal until they caught
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Raat Ki Apsara
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गाँव की सरहद पर खड़ी वह पुरानी 'शमशान कोठी' बरसों से वीरान थी। गाँव वाले कहते थे कि वहाँ जाना मतलब मौत को दावत देना है। लेकिन शहर की चकाचौंध से ऊबकर अपने पैतृक गाँव लौटे युग के लिए यह सब महज़ अंधविश्वास था। एक शाम, ढलते सूरज की लालिमा के बीच, युग अनजाने में उस कोठी के करीब जा पहुँचा। चारों तरफ ऊँची घास, पुराने बरगद के पेड़ और एक अजीब सी भारी खामोशी थी।
जैसे ही युग ने कोठी के जंग लगे फाटक को छुआ, उसे एक ठंडी सिहरन महसूस हुई। तभी उसे किसी के पायल की छनछन सुनाई दी।
पहली मुलाकात: यामिनी का सम्मोहन
युग ने पीछे मुड़कर देखा, तो उसके होश उड़ गए। सामने एक बेहद खूबसूरत युवती खड़ी थी—यामिनी। सफेद लिबास, खुले काले बाल और आँखों में एक ऐसी चमक जो किसी को भी पत्थर बना दे।
युग: (हैरानी और सम्मोहन में) "अरे! आप यहाँ? इस वीरान जगह पर? मैंने सुना है गाँव वाले यहाँ आने से डरते हैं।"
यामिनी: (एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ) "डर इंसानों के मन में होता है, युग। और वैसे भी, जो खुद अंधेरे का हिस्सा हो, उसे अंधेरे से कैसा डर?"
युग: (हल्का मुस्कुराते हुए) "मेरा नाम जानते हुए भी अनजान बन रही हैं? वैसे, आप यहाँ रहती हैं या बस रास्ता भटक गई हैं? क्योंकि इस 'शमशान कोठी' के बारे में जो किस्से सुने हैं, उन्हें सुनकर तो कोई परी ही यहाँ आ सकती है।"
नोक-झोक और अनजाना आकर्षण
यामिनी धीरे-धीरे चलकर युग के करीब आई। युग को महसूस हुआ कि हवा अचानक बर्फीली हो गई है, लेकिन यामिनी की खूबसूरती ने उसे बाँध लिया था।
यामिनी: "किस्से अक्सर डराने के लिए होते हैं। क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा? इस कोठी की दीवारों ने बहुत कुछ देखा है।"
युग: (छेड़ते हुए) "शहर का लड़का हूँ, भूत-प्रेत पर यकीन नहीं करता। और अगर सामने आप जैसी खूबसूरत लड़की हो, तो भूत भी रास्ता बदल ले। वैसे, आपका नाम क्या है?"
यामिनी: "यामिनी। रात की रानी।"
युग: "नाम तो बड़ा गहरा है। पर यामिनी जी, इस कोठी के अंदर क्या है? लोग कहते हैं यहाँ एक 'डायन' या 'यक्षिणी' कैद थी।"
यामिनी: (उसकी आँखों में सीधे देखते हुए) "कैद तो वह आज भी है। बस उसे रिहा करने वाले का इंतज़ार है। क्या तुम उसे आज़ाद करोगे?"
युग: (हँसते हुए) "अगर वह डायन आप जैसी दिखी, तो मैं उसे उम्र भर के लिए अपने दिल में कैद कर लूँगा।"

युग की इस बेबाकी पर यामिनी खिलखिलाकर हँसी, लेकिन उस हँसी में एक अजीब सी गूँज थी जिसने कोठी के सन्नाटे को चीर दिया। युग को लगा जैसे पेड़ों पर बैठे कौवे अचानक उड़ने लगे हों।
उस दिन के बाद से युग और यामिनी की मुलाकातें बढ़ने लगीं। युग उसे एक साधारण गाँव की लड़की समझकर प्यार कर बैठा था। वह अक्सर उसे अपनी शहरी ज़िंदगी की बातें बताता और यामिनी उसे उस कोठी के डरावने इतिहास की परतों में उलझाती रहती। युग के लिए वह 'इश्क' था, लेकिन यामिनी के लिए वह उसका 'शिकार' बनने की पहली सीढ़ी थी।

शमशान कोठी के पिछले हिस्से में एक पुराना बगीचा था, जहाँ चमेली की खुशबू हवा में घुली हुई थी। चाँदनी रात में कोठी की दीवारें और भी सफेद और डरावनी लग रही थीं, लेकिन युग के लिए वह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं थी, क्योंकि वहाँ यामिनी उसका इंतज़ार कर रही थी।
जैसे ही युग करीब पहुँचा, यामिनी एक पत्थर की बेंच पर बैठी अपनी लंबी जुल्फों को सँवार रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी-जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को करीब आता देख रहा हो।
यामिनी: (धीमी और खनकती आवाज़ में) "बड़ी देर कर दी आपने आने में, युग बाबू। हमें लगा शहर की चमक-धमक याद आ गई और आप इस वीरान कोठी की रौनक को भूल गए।"
युग: (मुस्कुराते हुए उसके पास बैठते हुए) "शहर की चकाचौंध में वो बात कहाँ, जो आपकी इन आँखों के गहरे सन्नाटे में है, यामिनी। और फिर, आपको दिए वादे से मुकर जाऊं, इतना साहस मुझमें नहीं।"
यामिनी: (उसके चेहरे के करीब आते हुए) "साहस? साहस की तो अभी बहुत ज़रूरत पड़ेगी युग बाबू। सुना है गाँव वाले कहते हैं कि इस कोठी की हवाओं में मौत का वास है। क्या आपको हमसे डर नहीं लगता?"
युग: (यामिनी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए) "डर? आपके हाथों की इस ठंडक में जो सुकून है, वो दुनिया की किसी गर्माहट में नहीं। अगर मौत आप जैसी हसीन हो, तो मैं उसे गले लगाने को तैयार हूँ।"

युग के शब्दों में छिपी दीवानगी यामिनी के भीतर सोई हुई उस सदियों पुरानी 'यक्षिणी' को जगा रही थी। उसने युग के कंधे पर अपना सिर रख दिया। हवाएं अचानक तेज़ चलने लगीं और कोठी के पुराने दरवाजे अपने आप चरमराने लगे, जैसे कोई उन्हें अंदर आने का न्योता दे रहा हो।
यामिनी: (फुसफुसाते हुए) "तो क्या आप पूरी तरह मेरे होना चाहते हैं, युग बाबू? क्या आप उस दुनिया में कदम रखेंगे जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं?"
युग: (उसकी आँखों में डूबते हुए) "मैं तो उसी पल आपका हो गया था, जब मैंने आपको पहली बार इस खंडहर के पास देखा था। मुझे बस आप चाहिए, यामिनी... चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो।"
उस रात, शमशान कोठी के उस एकांत कक्ष में, जहाँ कभी सन्नाटा पसरा रहता था, युग और यामिनी का मिलन हुआ। युग को लग रहा था कि वह प्रेम के सागर में डूब रहा है, लेकिन वह इस बात से अनजान था कि यामिनी का हर स्पर्श उसके जीवन की ऊर्जा को सोख रहा था। वह प्यार जिसे वह वरदान समझ रहा था, दरअसल उस यक्षिणी का जाल था, जो उसे हमेशा के लिए अपना बनाने को तैयार थी।
जैसे-जैसे रात गहरी हुई, कोठी की दीवारों से सिसकियों और पायल की आवाज़ें आने लगीं, जो युग की मदहोशी में कहीं खो गई थीं।
कोठी के उस ठंडे कक्ष में, जहाँ युग बाबू अपनी गिरती हुई सेहत और यामिनी के मायाजाल के बीच फंसे थे, अचानक बाहर से ढोल और मंत्रों की आवाज़ें आने लगीं। गाँव के लोग मशालें लेकर कोठी को घेर चुके थे। लेकिन युग बाबू के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी। यामिनी के प्रेम ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था, पर उनकी आत्मा अभी भी यामिनी के सम्मोहन में थी।
यामिनी: (घबराते हुए) "सुन रहे हैं युग बाबू? ये इंसान हमें अलग करने आए हैं। वे उस यक्षिणी को जलाना चाहते हैं जिसे उन्होंने सदियों पहले कैद किया था। क्या आप मुझे फिर से उस अकेलेपन में छोड़ देंगे?"
युग: (हांफते हुए, यामिनी का हाथ थामकर) "नहीं यामिनी... मैंने कहा था न, मैं आपका साथ कभी नहीं छोडूंगा। अगर यह दुनिया हमें साथ नहीं रहने देगी, तो हम इस दुनिया का हिस्सा ही नहीं रहेंगे।"

जैसे ही भीड़ ने कोठी के मुख्य द्वार को तोड़ा, युग बाबू ने अपनी जेब से वह पुरानी माचिस निकाली जो वे अक्सर सिगरेट जलाने के लिए रखते थे। उन्होंने देखा कि कोठी के फर्श पर बरसों पुराना सूखा बारूद और तेल बिखरा पड़ा था, जिसे शायद गाँव वालों ने पहले ही छिड़का था।
युग: (एक दर्दभरी मुस्कान के साथ) "यामिनी, आज तुम्हारा शाप भी खत्म होगा और मेरा इंतज़ार भी। हम एक ऐसी जगह मिलेंगे जहाँ न कोई डायन होगी और न कोई इंसान... बस हम होंगे।"
यामिनी: (चीखते हुए, पहली बार उसकी आँखों में डर की जगह प्रेम दिखा) "युग बाबू, रुकिए! आपकी जान चली जाएगी!"
युग: "जान तो उसी दिन चली गई थी जब तुमसे दिल लगाया था।"
युग ने जलती हुई तीली फर्श पर फेंक दी। पल भर में पूरी शमशान कोठी आग की लपटों में घिर गई। गाँव वाले बाहर खड़े होकर उस खौफनाक मंज़र को देख रहे थे। आग की उन लपटों के बीच, लोगों ने दो परछाइयों को देखा-एक विशालकाय यक्षिणी का साया जो धीरे-धीरे धुएँ में बदल रहा था, और उसके गले लगा हुआ एक इंसान।
कहा जाता है कि उस रात के बाद शमशान कोठी की वह डरावनी आवाज़ें हमेशा के लिए शांत हो गईं। यामिनी का शाप युग के आत्मघाती प्रेम की आग में जलकर राख हो गया।
अगली सुबह जब राख की छानबीन हुई, तो वहाँ कुछ नहीं मिला... सिवाय युग बाबू की उस अंगूठी के, जो अब पूरी तरह काली पड़ चुकी थी। युग और यामिनी का यह अधूरा और खौफनाक प्रेम अध्याय हमेशा के लिए मिट्टी में मिल गया।
 

RagVi Singh

Typing… deleting… sleeping...
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BEGUNAAH (FRAMED)

Delhi ke Rohini Sector 24 ke ek purane se ground par subah ke 4:45 baj rahe the. Andhera abhi poori tarah gaya nahi tha, aur hawa mein woh thandi si khamoshi thi jo sirf subah ke waqt hoti hai. Ground ke ek kone mein ek ladka already warm-up kar raha tha—jaise usse darr ho ki agar woh ek second bhi ruk gaya, toh koi aur usse peeche chhod dega.

Aarav Singh.

Uske shoes ke sole ghis chuke the, left wale mein chhota sa crack bhi tha jisse mitti andar ghus jaati thi. Lekin usne kabhi complain nahi kiya. Uske liye discomfort koi issue nahi tha. Issue sirf ek tha—main best hoon ya nahi?

Woh sprint karta… rukta… phir dobara sprint karta. Har baar thoda tez. Har baar thoda aur push karta. Jaise uske andar koi invisible clock chal rahi ho—aur woh usse beat karna chahta ho.

“Bas kar, aadha ghanta ho gaya,” ek awaaz aayi.

Ground ka watchman, Raghubir, bench pe baitha usse dekh raha tha. Usne Aarav ko bachpan se grow hote dekha tha.

Aarav ne bas haath hila diya, bina rukke. “Last set!”

Raghubir hamesha hasta tha is line pe. Usse pata tha—Aarav ke liye last set ka matlab hota hai aur 5 sets.

Jab finally Aarav rukha, uski saansen itni tez thi ki woh seedha khada bhi nahi reh pa raha tha. Haath ghutnon par, aankhen band… lekin face pe ek chhoti si smile.

“Pagal hai tu,” Raghubir bola.

Aarav hasa, “Thoda.”

“Yeh sab karke kya milega?”

Aarav ne seedha jawab diya, “Sab kuch.”


Ghar wapas aate hi uski maa, Sushma, already uth chuki hoti thi. Chulha jal raha hota, chai ki khushboo poore ghar mein fail rahi hoti.

“Phir se itni subah?” maa ne usse dekhte hi kaha.

“Competition badh raha hai,” Aarav ne paani peete hue bola.

Maa ne uski taraf dekha—uski aankhon ke neeche halka sa darkness, thakan, lekin uske andar ek ajeeb sa junoon.

“Tu bachcha hai abhi,” maa ne softly kaha.

“Time nahi hai bachcha rehne ka,” Aarav ne bina soche bol diya.


School mein Aarav ka naam already chal raha tha. Football team ka star player. Fastest runner. Sharpest instincts. Coach Verma aksar doosre teachers se kehte, “Agar is ladke ko sahi exposure mil gaya na, toh yeh state level nahi… national level khelega.”

Practice sessions intense hote the. Baaki players jab thak jaate, Aarav tab bhi same intensity se khelta rehta.

“Break le le,” teammate Karan bolta.

Aarav sirf ek line bolta, “Match mein break nahi milta.”

Ek din practice match chal raha tha. Opponent team strong thi. Score 1-1 pe atka hua tha. Last 2 minutes bache the.

Ball Aarav ke paas aayi.

Do defenders saamne.

Kisi normal player ke liye yeh risky situation hoti… lekin Aarav ke liye yeh moment tha.

Usne pehle defender ko body feint se cross kiya. Dusre ko nutmeg.

Crowd se halki si “ohhh” ki awaaz aayi.

Goalkeeper aage badha.

Aarav ne shot fake kiya… goalkeeper dive kar gaya… aur Aarav ne calmly ball side se push kar di.

Goal.

Whistle baji.

Match khatam.

Sab uske paas bhaag ke aaye.

“Bhai tu kya cheez hai!” Karan chillaya.

Aarav sirf halka sa hasa. Andar se woh khush tha… lekin uske dimaag mein already next thought aa chuka tha—next match aur better khelna hai.


Kuch hafton baad ek bada announcement hua—Inter-State Selection Trials.

Yeh woh moment tha jiske liye Aarav saalon se mehnat kar raha tha.

Coach Verma ne usse side pe bulaya.

“Yeh tera chance hai. Pressure handle kar payega?”

Aarav ne seedha aankhon mein dekha, “Pressure hi toh chahiye.”

Trial ke din ground pe energy alag thi. Alag alag schools ke best players aaye hue the. Sab apna best dene ke liye ready.

Aarav thoda side pe khada tha, quietly apne shoes tie karte hue.

Uske paas se ek player guzra aur dheere se bola, “Yeh hi hai Aarav?”

Dusra bola, “Haan, suna hai fast hai.”

Aarav ne kuch react nahi kiya. Usne sirf apni aankhen band ki aur ek deep breath li.

Bas game khelna hai.

Match start hua.

Pehle kuch minutes mein hi clear ho gaya—Aarav alag level pe hai.

Uski positioning, uska control, uski speed… sab natural lag raha tha.

Ek moment aaya jab ball midfield mein loose thi. Do players uske liye dive kiye… Aarav pehle pahunch gaya.

Usne bina dekhe ek through pass diya—perfect.

Goal.

Coach Verma sideline pe khade smile kar rahe the.

“Yeh ladka ready hai,” unhone kisi selector se kaha.

Second half mein Aarav aur aggressive ho gaya. Jaise usse feel ho raha ho—yeh moment wapas nahi aayega.

Last few minutes mein usne ek solo run liya. Poora defense cross kiya. Shot maara.

Ball crossbar se takra ke andar gayi.

Crowd explode ho gaya.

Aarav ground pe ghutnon pe gir gaya… thakan se nahi… emotion se.

Yeh sirf goal nahi tha.

Yeh saalon ki mehnat ka jawab tha.


Trial ke baad sab players result board ke paas khade the.

Aarav thoda door khada tha.

Usse darr lag raha tha—pehli baar.

Karan bhaagte hue aaya, “Bhai! Tera naam hai!”

Aarav ne slowly board ki taraf dekha.

“Aarav Singh.”

Usne ungli se apna naam touch kiya… jaise confirm kar raha ho ki yeh sach hai.

Uski aankhon mein halka sa paani aa gaya.


Ghar aake usne maa ko bataya.

Maa chup ho gayi.

Phir achanak usse gale laga liya.

“Tu kar gaya…”

Aarav ne dheere se kaha, “Abhi bas start hai.”


Us raat Aarav so nahi paaya.

Woh chhat pe baitha tha, aasman dekh raha tha.

Hawa halki si chal rahi thi.

Usne khud se kaha, “Main rukunga nahi.”

Usse bilkul idea nahi tha…

ki zindagi usse rukne par majboor karne wali hai.

Aise tareeke se… jiska woh kabhi imagine bhi nahi kar sakta.

Selection ke baad Aarav ki zindagi pehli baar thodi halki lag rahi thi. Jaise saalon se jo pressure uske seene pe tha, woh thoda kam ho gaya ho. Ground ab bhi wahi tha, practice ab bhi utni hi hard thi, lekin andar ek confidence aa gaya tha—main kar sakta hoon.

School mein bhi log usse alag nazar se dekhne lage the. Teachers smile karte, juniors respect se baat karte, aur teammates… woh toh pehle hi usse hero maante the.

Lekin success ke saath ek aur cheez aati hai—log tumhe notice karne lagte hain. Har nazar positive nahi hoti.

Neha.

Woh Aarav ki class mein thi, lekin kabhi zyada interaction nahi hua tha. Na close friend, na stranger. Bas ek attraction.

Lekin pichle kuch hafton mein Aarav ne notice kiya tha ki woh usse thoda zyada dekhne lagi hai. Kabhi corridor mein, kabhi class ke baad… jaise kuch kehna chahti ho, lekin keh nahi pa rahi.

Ek din school ke baad Aarav practice ke liye nikal raha tha jab Neha ne usse roka.

“Aarav… ek minute?”

Aarav ruk gaya. “Haan?”

Neha thodi nervous thi. “Tum… free ho thodi der ke liye?”

Aarav ne watch dekhi. Practice ka time ho raha tha.

“Practice hai… par bol, kya hua?”

Neha ne thoda hesitate kiya, phir bola, “Bas thodi baat karni thi.”

Aarav ne shoulders uthaaye, “Chalo.”

Dono school ke piche wale area mein chale gaye—wahan usually koi nahi hota tha. Ek chhoti si jagah thi, half-constructed wall, thoda isolated.

Aarav thoda awkward feel kar raha tha. Usse yeh sab aadat nahi thi.

“Bolo?” usne seedha poocha.

Neha uski taraf dekh rahi thi… kuch seconds tak bas dekhte hi rahi.

Phir dheere se boli, “Tum alag ho.”

Aarav confuse ho gaya. “Matlab?”

“Sab tumhari baat karte hain… tum itne focused kaise ho?”

Aarav halka sa hasa, “Karna padta hai.”

Silence.

Hawa thodi tez chalne lagi.

Phir achanak Neha thoda paas aayi.

Aarav ne reaction dene se pehle hi… usne Aarav ko kiss kar liya.

Sab kuch ek second ke liye freeze ho gaya.

Aarav bilkul still khada tha. Usne push nahi kiya….

Uska dimaag blank ho gaya.

Neha peeche hati.

Dono ke beech ek awkward, heavy silence aa gaya.

“Sorry…” Neha ne dheere se kaha.

Aarav ne bas sir hila diya. Usse samajh nahi aa raha tha kya bolna chahiye.

“Main… main chalti hoon,” Neha ne jaldi se kaha aur wahan se chali gayi.

Aarav wahi khada reh gaya.

Usne apne face pe haath phira… jaise confirm kar raha ho ki abhi kya hua.

Phir usne sir shake kiya aur seedha ground ki taraf chal diya.

Uske liye woh ek confusing moment tha… lekin bas ek moment.

Usne usse wahi chhod diya.

Usse kya pata tha… ki yeh moment uski poori zindagi ban jayega.


Do din baad.

Subah ka time tha. Aarav ghar pe breakfast kar raha tha.

Maa ne poocha, “Aaj practice kitne baje hai?”

“Shaam ko,” Aarav ne casual tone mein kaha.

Tabhi door pe zor se knock hua.

Ek baar.

Do baar.

Phir aur zor se.

Maa ne darwaza khola.

Bahar police khadi thi.

“Aarav Singh yahan rehta hai?”

Room ki hawa ekdum heavy ho gayi.

“Haan… kya hua?” maa ki awaaz halka sa kaap gayi.

Officer seedha andar aaya. “Aarav Singh?”

Aarav khada ho gaya. “Ji.”

“Tumhe humare saath chalna hoga.”

“Par kyun—?”

“Complaint aayi hai tumhare against.”

Aarav ka dil ek second ke liye ruk gaya.

“Kis cheez ki complaint?” usne dheere se poocha.

Officer ne seedha aankhon mein dekha, “Sexual assault.”

Yeh do words jaise hawa mein latak gaye.

Maa ne turant react kiya, “Kya bakwaas hai yeh?! Mera beta—”

“Madam, please cooperate,” officer ne interrupt kiya.

Aarav bilkul still khada tha.

Usse laga yeh koi mistake hai.

“Sir, aap kisi aur ki baat kar rahe ho… main—”

“Neha naam ki ladki ne complaint file ki hai.”

Aarav ke dimaag mein ek flash hua.

Wahi moment.

Wahi jagah.

Woh kiss.

Uska gala sukh gaya.

“Sir… woh… aisa kuch nahi hua…” usne kehne ki koshish ki.

Lekin uski awaaz weak pad gayi.


Police station ka environment alag hota hai.

Wahan time slow ho jaata hai.

Questions repeat hote rehte hain.

“Tum wahan gaye the?”
“Haan.”
“Tum dono akele the?”
“Haan.”
“Kya hua wahan?”

Aarav har baar same jawab deta, “Kuch nahi… bas baat hui…”

“Phir ladki kyun keh rahi hai ki tumne zabardasti ki?”

Yeh sawaal har baar usse thoda aur tod deta.

“Sir, woh jhooth bol rahi hai…”

Lekin yeh line sunne ke liye koi ready nahi tha.

Shaam tak baat school tak pahunch gayi.

Agli subah, Aarav school gaya… lekin sab kuch badal chuka tha.

Log usse dekh rahe the.

Fuss-fuss kar rahe the.

“Wahi hai…”
“Sach mein?”
“Yaar maine toh socha nahi tha…”

Coach Verma ne usse office mein bulaya.

Unka face serious tha.

“Aarav… jab tak yeh matter clear nahi hota, tum practice attend nahi karoge.”

“Sir, maine kuch nahi kiya—”

“Main samajhta hoon,” coach ne beech mein roka, lekin unki aankhon mein doubt tha, “lekin situation serious hai.”

Yeh pehli baar tha jab Aarav ne feel kiya—log believe nahi kar rahe.

Do din ke andar media tak baat pahunch gayi.

Local news channels pe chhoti si headline aayi.

“Young football talent accused in assault case.”

Naam poora nahi bataya gaya tha… lekin locality mein sabko pata chal gaya.

Gali ke log jo pehle usse “beta” kehte the, ab aankhon se bach ke nikal jaate.

Ek aunty ne seedha maa se poocha, “Sach hai kya?”

Maa ne gusse mein jawab diya, “Mera beta aisa nahi hai!”

Lekin unki awaaz mein woh confidence nahi tha jo pehle hota tha.


Raat ko ghar mein silence tha.

Aarav bed pe baitha tha, aankhen blank.

Maa uske saamne baithi thi.

“Kya hua tha?” unhone dheere se poocha.

Aarav ne poori kahani batayi.

Woh kiss.

Woh awkward moment.

Sab.

Maa chup ho gayi.

“Kuch aur toh nahi hua?” unhone phir poocha.

“NAHI!” Aarav almost chillaya, “Maine kuch nahi kiya!”

Silence.

Heavy silence.

Maa ne usse dekha… phir dheere se sir hila diya.

“Theek hai.”

Lekin us “theek hai” mein doubt tha ya trust… Aarav samajh nahi paaya.


Case officially register ho gaya.

Lawyers involve ho gaye.

Court dates set hone lagi.

Aarav ki zindagi ekdum shift ho gayi—practice se court tak.

Uske haath mein football ki jagah file aa gayi.

Aur sabse buri cheez yeh thi—

Usse samajh nahi aa raha tha ki woh kis cheez ke liye lad raha hai.

Ek aisa crime… jo usne kiya hi nahi.


Ek raat Aarav chhat pe khada tha.

Neeche city ki lights blink kar rahi thi.

Usne apne aap se poocha—

agar sach mere saath hai… toh main itna akela kyun feel kar raha hoon?

Hawa tez chal rahi thi.

Lekin uske andar sab kuch ruk chuka tha.

Usse abhi tak yeh nahi pata tha…

ki yeh bas shuruat hai.

Asli andhera abhi baaki tha.

Lekin court ke bahar khade hote hi usse samajh aa gaya—yahan kuch bhi theek nahi hone wala.

Log the. Bohot saare log. Kuch curious, kuch judgmental, kuch bas tamasha dekhne aaye hue. Aur sabki nazrein us par.

Jaise woh insaan nahi… ek case ho.

“Aarav Singh?” kisi ne dheere se bola.

Phir kisi aur ne, “Wahi ladka hai na news wala?”

Usne aankhen neeche kar li.

Maa uske saath chal rahi thi, lekin unka haath uske haath se thoda door tha. Pehle jaise tight grip nahi thi. Jaise woh bhi confuse ho—pakde ya chhode.

Courtroom ke andar hawa heavy thi. Judge apni kursi par, lawyers apni files ke saath, aur beech mein sach… jo ab kisi ko clearly dikh nahi raha tha.

Neha aayi.

Aarav ne usse dekha… aur pehli baar usse pehchaan nahi paaya.

Woh ladki jo us din awkward si khadi thi, aaj confident thi. Strong thi. Uski aankhon mein darr tha… lekin saath mein yakeen bhi.

Yeh sab Aarav ko tod raha tha.

Yeh itna sure kaise ho sakti hai?

Case start hua.

Neha ne apni statement di.

Har detail ke saath.

Har pause ke saath.

Har aansu ke saath.

Courtroom silent tha.

Aarav sun raha tha… aur har sentence ke saath usse lag raha tha ki uski zindagi uske saamne likhi ja rahi hai—lekin uski marzi ke bina.

“Usne mujhe force kiya…”

Yeh line uske dimaag mein baar baar goonj rahi thi.

Usne apni fists tight kar li.

“Jhooth hai…” usne dheere se bola.

Lekin uski awaaz sirf uske andar hi reh gayi.

Defense lawyer weak tha. Paise kam the. Preparation adhuri thi.

“Proof?” judge ne poocha.

Lawyer ne kuch vague arguments diye.

Lekin yeh case emotions pe chal raha tha… logic pe nahi.

Aarav ko witness stand pe bulaya gaya.

Uske pair heavy ho gaye.

“Tum wahan gaye the?”

“Haan.”

“Tum dono akele the?”

“Haan.”

“Ladki keh rahi hai ki tumne zabardasti ki. Tum kya kehte ho?”

Aarav ne seedha judge ki taraf dekha.

“Main innocent hoon.”

Bas itna hi.

Koi drama nahi.

Koi lambi speech nahi.

Sirf sach.

Lekin kabhi kabhi sach bahut chhota lagta hai… jab saamne kahani badi ho.

Court ke bahar media khadi thi.

“Sir, ek statement?”
“Aap guilty feel karte hain?”
“Kya aapne yeh crime kiya?”

Questions teer ki tarah aa rahe the.

Aarav chup raha.

Maa ne uska haath pakadne ki koshish ki… phir wapas kheench liya.

Din mahino mein badal gaye.

Har hearing ke saath Aarav thoda aur thakne laga.

Uska routine simple ho gaya—court, ghar, silence.

Football? Woh ab sirf yaad thi.

Phir decision ka din aaya.

Courtroom phir se bhara hua tha.

akir me ussne haar maan lee.

lawyer ke according ..... esa krne pr saza kam hosktii hai

and koi option bhi nhi tha

Judge ne file kholi.

Kuch seconds ka silence.

Phir awaaz aayi—

“Based on the evidence presented…”

Aarav ka dil itna zor se dhadak raha tha ki usse baaki words sunai nahi de rahe the.

“...the accused is found guilty.”

Bas.

Sab khatam.

Koi background music nahi.

Koi dramatic pause nahi.

Sirf ek line… aur zindagi toot gayi.


Maa ki cheekh usne clearly suni.

“AARAV!”

Usne peeche mudkar dekha.

Maa ro rahi thi.

Lekin is baar unki aankhon mein sirf dard nahi tha…

tootna tha.

Jaise unka bharosa bhi uske saath hi gir gaya ho.

Police usse le ja rahi thi.

Aarav chal raha tha… lekin usse feel nahi ho raha tha ki woh chal raha hai.

Jaise body alag ho, dimaag alag.


Juvenile detention center ka gate band hua.

Thak.

Woh awaaz seedha uske seene pe lagi.

Andar ek alag duniya thi.

Concrete.

Iron bars.

Ajeeb si smell—pasine, dard aur haar ki.

“New boy,” kisi ne dheere se bola.

Aarav ko ek chhote se room mein le jaya gaya.

Ek patla mattress.

Ek kambal.

Bas.

“Yahi tera hai,” guard ne bola.

Door band.

Lock ki awaaz.

Aur silence.


Pehli raat Aarav ne socha woh ro lega.

Lekin aansu aaye hi nahi.

Woh bas chhat ko dekhte raha.

Har baar jab aankhen band karta… Neha ki awaaz aati.

“Usne mujhe force kiya…”

Woh turant aankhen khol deta.


Agle din se routine start.

Line mein khade ho.

Khana lo.

Chup chaap khao.

Wapas cell.

Log usse dekhte the.

Judge karte the.

“Case kya hai tera?” kisi ne poocha.

Aarav chup raha.

“Hero type lagta hai… crime bhi bada hi kiya hoga,” kisi ne hasa.

Woh react nahi karta.

Usne decide kiya—main invisible ho jaunga.

Lekin jail mein invisible rehna mushkil hota hai.

Ek din ek ladka uske paas aaya.

“Sach bol, kiya tha kya?”

Aarav ne dheere se kaha, “Nahi.”

Woh hasa.

“Sab yahi bolte hain.”

Usne Aarav ko push kiya.

“Hero banega?”

Aarav ne resist nahi kiya.

Usne bas khud ko girne diya.

Kyunki usmein ladne ki energy nahi bachi thi.


Raat ko usne pehli baar khud se poocha—

agar sab keh rahe hain ki main galat hoon… toh kya main hoon?

Yeh sawaal dangerous tha.

Bahut dangerous.

Kyunki jab tum sach jaante ho… lekin duniya tumhe itni baar jhooth bolti hai…

toh ek din tum khud pe shaq karne lagte ho.

Maa milne aayi.

Glass ke uss side.

Aarav is side.

Unhone phone uthaya.

“Aarav…” unki awaaz toot rahi thi.

Aarav chup.

“Sach bata… please…”

Yeh line seedha uske dil mein lagi.

“Maa, main jhooth kyun bolunga?” usne almost plead kiya.

Maa ro padi.

“Main kisse ladun? Sab bol rahe hain…”

Aarav ne phone dheere se rakh diya.

Us din usne feel kiya—

main akela hoon.


Din saal banne lage.

Aarav ka body change ho raha tha.

Strong ho raha tha… lekin andar se hollow.

Woh kabhi kabhi courtyard mein khada ho jaata.

Aankhen band karta.

Imagine karta—ground, ball, crowd.

Phir aankhen kholta.

Concrete.

Silence.


Ek din Fernandes aaya

kaffi time se aarav ko observe kr rhe the

Unhone Aarav ko dekha.

“Tu bhaagta kyun nahi?” unhone poocha.

Aarav ne seedha jawab diya, “Kahan bhaagun?”

Fernandes uske paas baith gaye.

“Tu yahan phasa hai… lekin khatam nahi.”

Aarav hasa… pehli baar.

“Difference kya hai?”

Fernandes ne seedha bola, “Tu decide karega.”

Us raat Aarav ne bahut der tak socha.

Phir dheere se khada hua.

Aur chhoti si jagah mein daudna start kiya.

Slow.

Phir fast.

Phir aur fast.

Koi dekh nahi raha tha.

Koi appreciate nahi kar raha tha.

Phir bhi.

Kyuki shayad…

woh khud ko yaad dilana chahta tha—

main abhi bhi wohi hoon.

Lekin sach yeh tha…

woh toot chuka tha.

Aur usse abhi tak pata bhi nahi tha…

ki usse aur kitna tootna baaki hai.

Jail ke andar waqt seedha nahi chalta. Kabhi lagta hai ruk gaya hai, kabhi lagta hai bhaag raha hai… lekin sach yeh hai ki woh tumhe peeche chhod deta hai.


Aarav ko andar aate hue 5 saal ho chuke the.

Paanch saal.

Itna waqt jismein bahar ek insaan poori zindagi badal leta hai… aur andar ek insaan dheere dheere khud ko bhool jaata hai.

Ab uski aadat ho gayi thi.

Subah uthna. Count. Khana. Thoda training. Silence.

Fernandes ab bhi kabhi kabhi usse dekhte aur sirf ek line bolte, “Rukna mat.”

Aarav rukta nahi tha… lekin usse pata bhi nahi tha ki woh kis taraf ja raha hai.

Football ab bhi uske andar tha, lekin sapna… woh thoda dheere dheere dhundla pad gaya tha.

Kabhi kabhi woh sochta—agar main bahar gaya bhi… toh kya?

Kaun wait kar raha hai?

Kaun believe karega?



Phir ek din…

Routine ke beech ek guard ne uska naam bulaya.

“Aarav Singh, visitor.”

Aarav thoda confused hua. Maa usually fixed dates pe aati thi.

“Kaun hai?” usne poocha.

Guard ne shoulders utha diye, “Pata nahi.”

Meeting room mein woh aake baitha.

Glass ke uss side ek ladki baithi thi.

Aarav ruk gaya.

Neha.

Uska gala sukh gaya.

5 saal baad.

Woh same ladki… lekin bilkul different.

Aankhon ke neeche dark circles. Face pe guilt likha hua.

Aarav ne phone uthaya.

Kuch seconds tak dono chup rahe.

“Hi…” Neha ne dheere se bola.

Aarav ne jawab nahi diya.

Phir Neha ne seedha kaha—

“Mujhe tumse baat karni hai.”

Aarav ke andar kuch hil raha tha. Gussa, confusion, dard… sab ek saath.

“Ab?” usne finally bola, awaaz thandi thi, “5 saal baad?”

Neha ki aankhon mein paani aa gaya.

“Maine galti ki…”

Yeh line Aarav ne expect nahi ki thi.

Uska dimaag ek second ke liye blank ho gaya.

“Kya?” usne dheere se poocha.

Neha ne seedha uski aankhon mein dekha.

“Maine jhooth bola tha.”

Room mein jaise hawa ruk gayi.

Aarav ka haath phone pe tight ho gaya.

Usne kuch nahi bola.

Usse samajhne mein time lag raha tha.

“Tum… kya keh rahi ho?” uski awaaz halki si kaap rahi thi.

"Pata hai ab toh mene bhi maan liya hai"

Neha ro padi.

“Woh jo maine court mein bola… sab jhooth tha…”

Aarav ki saansen tez ho gayi.

Uske dimaag mein woh saare saal flash hone lage—courtroom, jail, maa ka rona…

Sab.

“KYUN?” usne pehli baar zor se bola.

Room ke bahar guard ne dekha… phir ignore kar diya.

Neha ka answer ready nahi tha.

“Main… main darr gayi thi… situation control se bahar chali gayi… phir main wapas nahi aa paayi…”

“Darr?” Aarav almost hasta hua bola, lekin woh hansi toot rahi thi, “Mera kya? Mera kya hua?”

Neha chup.

“5 saal…” Aarav ne dheere se bola, “5 saal main yahan tha… aur tum…?”

Neha sirf ro rahi thi.

“I’m sorry…”

Aarav ne aankhen band kar li.

Yeh word… itna chhota.

Aur damage itna bada.


Us meeting ke baad Aarav poori raat nahi soya.

Uska dimaag ruk nahi raha tha.

Yeh sach hai?
Agar hai… toh main yahan kyun hoon?
Ab kya hoga?


Agle din Neha phir aayi.

Is baar woh thodi composed thi.

“Mujhe sab theek karna hai,” usne kaha.

Aarav ne seedha poocha, “Kaise?”

“Main sach bolungi. Officially.”

Aarav chup raha.

Usne itne saalon mein hope feel karna band kar diya tha.

Ab achanak hope aa rahi thi… lekin usse darr lag raha tha.


Kuch hafton tak dono secretly milte rahe.

Neha apni guilt express karti.

Aarav sunta.

Kabhi react karta, kabhi bilkul silent rehta.

Un meetings mein koi dosti nahi thi… koi connection nahi tha.

Sirf ek cheez thi—sach.

Ek din Aarav ne bola, “Bolne se kuch nahi hoga. Proof chahiye.”

Neha ne uski taraf dekha.

“Main record karungi.”

Plan simple tha… lekin risky.

Neha ne apni confession record karne ka decision liya.

Ek private meeting set hui—jahan Aarav nahi tha, lekin uska lawyer tha.

Neha ne poori kahani boli.

Step by step.

“Main jhooth bol rahi thi…”
“Usne mujhe force nahi kiya…”
“Maine pressure mein aake yeh kiya…”

Sab record ho gaya.

Aarav ne jab woh recording suni… uske haath kaap rahe the.

Yeh woh cheez thi jo usse 5 saal pehle chahiye thi.

Proof.

Sach ka proof.


Case dobara file hua.

Court mein excitement thi.

“New evidence.”

“Case reopen.”

Aarav ke andar ek chhoti si umeed jagi.

Shayad ab sab theek ho jayega.

Courtroom phir se wahi.

Judge same.

System same.

Lekin iss baar Aarav ke paas sach ka audio tha.

Lawyer ne confidently bola, “Your honor, we have new evidence that proves the accused’s innocence.”

Recording play hui.

Room silent.

Neha ki awaaz clear thi.

“Maine jhooth bola tha…”

Aarav ne aankhen band kar li.

Usse laga—yeh moment hai.


Lekin zindagi seedhi nahi hoti.

Judge ne recording suni.

Phir file band ki.

“Is recording ki authenticity verify nahi hai. Aur yeh coercion ka result bhi ho sakta hai.”

Aarav ka dil ek second ke liye ruk gaya.

“Matlab?” usne apne lawyer se dheere se poocha.

Lawyer ne aankhen neeche kar li.

Judge ne continue kiya—

“This court cannot rely solely on this evidence. Previous conviction stands.”

Bas.

Phir se.

Sab gir gaya.

Aarav ko laga jaise kisi ne uske seene pe haath rakh ke zor se daba diya ho.

Saans nahi aa rahi thi.

“Par… yeh sach hai…” usne dheere se bola.

Koi nahi sun raha tha.

Neha shock mein thi.

“Maine khud bola hai!” woh almost chillayi.

Judge ne sternly kaha, “Order in the court.”


Bahar aake Aarav bilkul silent tha.

Neha uske saamne khadi thi.

“I’ll fix this… I promise…”

Aarav ne uski taraf dekha.

Is baar uski aankhon mein gussa tha.

“Tumne already sab kharab kar diya hai.”

Neha chup ho gayi.

Us raat Aarav wapas apne cell mein tha.

Same deewar.

Same silence.

Lekin iss baar ek difference tha—

Ab usse sach pata tha.

Aur phir bhi woh yahan tha.

Yeh feeling sabse zyada dangerous hoti hai.

Jab tum innocent ho… prove kar sakte ho…
phir bhi system tumhe accept nahi karta.


Aarav ne us raat training nahi ki.

Woh bas baitha raha.

Chhat ko dekhte hue.

Aur dheere se bola—

“Shayad… main kabhi bahar nahi jaunga.”

Lekin usse yeh nahi pata tha…

ki sach kabhi kabhi court se nahi…
logon se jeetta hai.

Jab court ne recording reject ki… us din ke baad Aarav ke andar kuch permanently shift ho gaya tha.

Pehle woh lad raha tha—system se, logon se, apni situation se.

Ab woh bas exist kar raha tha.

Subah uthna. Line mein khada hona. Khana. Chup rehna.

Training bhi kam ho gayi thi.

Fernandes ne notice kiya.

“Ruk kyun gaya?” unhone poocha.

Aarav ne seedha jawab diya, “Kya fayda?”

Fernandes kuch seconds usse dekhte rahe.

Phir bole, “Fayda nahi hota… zaroorat hoti hai.”

Aarav ne kuch reply nahi kiya.

Usse lag raha tha—ab kuch change nahi hoga.

Sach saamne hai… phir bhi kuch nahi badla.

Toh ab kya bacha hai?

Bahar duniya apni speed se chal rahi thi.

Neha apni guilt ke saath jee rahi thi.

Woh har din ek hi cheez sochti—main aur kya kar sakti hoon?

Court ne usse reject kar diya tha.

Lawyers bhi keh rahe the—case weak hai.

Lekin ek cheez abhi bhi thi.

Recording.

Sach ka proof.

Jo court ne nahi maana… lekin duniya shayad maane.


Ek raat, Neha apne room mein baithi thi.

Phone haath mein.

Recording screen pe.

Uska dil zor se dhadak raha tha.

Yeh sahi hai?
Yeh aur bigaad toh nahi dega?


Phir usne Aarav ka face imagine kiya.

Woh blank expression.

Neha ne aankhen band ki.

Aur upload kar diya.

Pehle kuch minutes kuch nahi hua.

Phir dheere dheere views aane lage.

Phir shares.

Phir comments.

Phir explosion.

“Girl admits false accusation?”
“This changes everything!”
“Innocent boy jailed for years??”

Social media pe aag lag gayi.

Log recording sun rahe the.

Repeat pe.

Har jagah ek hi baat—

“Yeh ladka toh innocent hai!”

Media ne turant pick up kiya.

News channels pe debate shuru ho gayi.

“System failure?”
“False accusations and justice?”
“Who is responsible?”

Aarav ka naam phir se TV pe tha.

Lekin iss baar tone alag thi.

Sympathy.

Shock.

Gussa.


Jail ke andar Aarav ko initially kuch pata nahi tha.

Ek guard ne usse dekh ke bola, “Tu news mein hai.”

Aarav ne react nahi kiya.

Usse laga—phir se koi negative cheez hogi.

Lekin next day Fernandes jaldi jaldi uske paas aaye.

“Bahaar dekh kya ho raha hai!”

Aarav confused.

“Kya?”

Fernandes ne dheere se bola, “Sach bahar aa gaya hai.”

Kuch din ke andar legal pressure build hone laga.

Public outrage strong tha.

NGOs involve ho gaye.

Lawyers ne case dobara push kiya.

Iss baar sirf ek recording nahi thi…

poori public khadi thi.

Court ne emergency hearing bulayi.

Aarav phir se wahi courtroom mein tha.

Same jagah.

Lekin iss baar environment different tha.

Media bahar thi.

Pressure clearly feel ho raha tha.

Judge serious tha.

“New developments have come to light,” lawyer ne confidently bola.

Is baar sirf recording nahi thi.

Neha court mein khadi thi.

Live.

“Maine jhooth bola tha,” usne clear voice mein repeat kiya.

Koi hesitation nahi.

Koi confusion nahi.

Bas sach.

Courtroom silent.

Judge ne usse cross-question kiya.

“Tum pe koi pressure toh nahi?”

“Nahi.”

“Tum yeh willingly bol rahi ho?”

“Haan.”

Aarav usse dekh raha tha.

Is baar usse Neha pe gussa nahi aa raha tha.

Bas ek ajeeb si feeling thi…

jaise sab kuch finally apni jagah aa raha ho.


Judge ne decision reserve kiya.

Woh kuch minutes…

Aarav ke liye saalon jaise the.

Uska dil itna zor se dhadak raha tha ki usse lag raha tha sab sun rahe honge.

Maa peeche baithi thi.

Unki aankhen bas Aarav pe thi.

Phir judge wapas aaya.

File kholi.

Aur bola—

“In light of new evidence and testimony… this court overturns the previous conviction.”

Aarav ne saans rok li.

“The accused is acquitted of all charges.”


Kuch seconds ke liye usse kuch samajh nahi aaya.

Phir dheere dheere words register hue.

Acquitted.

Free.


Uski aankhon mein paani aa gaya.

Lekin woh roya nahi.

Woh bas khada raha.

Jaise body ko samajhne mein time lag raha ho.

Maa uske paas aayi.

Is baar unhone usse zor se gale laga liya.

Itna tight… jaise woh saalon ka gap ek hug mein bharna chahti ho.

“Aarav…” woh bas uska naam repeat kar rahi thi.

Is baar unki awaaz mein doubt nahi tha.

Sirf bharosa.

Jail ka gate dobara khula.

Wahi awaaz—

Thak.

Lekin iss baar feel alag tha.

Aarav bahar aaya.

Dhoop uske chehre pe lagi.

Usne aankhen thodi si band kar li.

Itni simple cheez…

lekin itni door lag rahi thi.


Media uske saamne thi.

Questions ready.

“Kaise feel kar rahe ho?”
“Kya kehna chahenge?”
“Kya aap system pe trust karte hain?”

Aarav kuch seconds chup raha.

Phir usne sirf itna kaha—

“Sach ko time lagta hai… par aata zaroor hai.”

Lekin kahani yahin khatam nahi hoti.

Freedom mil gayi thi.

Lekin lost time wapas nahi aaya.

Woh 5 saal… jo usne jail mein bitaye…

woh koi return nahi karega.

Log sympathy de rahe the.

Media usse hero bana rahi thi.

Lekin raat ko jab woh akela hota…

toh silence wapas aa jaata.

Ek din woh ground pe gaya.

Wahi mitti.

Wahi smell.

Wahi feeling.

Usne shoes pehne.

Daudna start kiya.

Pehle dheere.

Phir thoda fast.

Phir aur fast.

Saans phool rahi thi.

Body resist kar rahi thi.

Lekin dil…

woh finally zinda feel kar raha tha.


Ball uske paas aayi.

Usne control ki.

Ek touch.

Do touch.

Phir shot.

Ball net mein gayi.

Wahi awaaz.

Thak.

Aarav ruk gaya.

Aankhen band ki.

Aur iss baar…

woh ro diya.


Kyunki yeh sirf ek goal nahi tha.

Yeh proof tha—

ki sab kuch tootne ke baad bhi…

insaan dobara ban sakta hai.

lekin Aarav ne ek cheez samajh li—

Zindagi kabhi fair nahi hoti.

Kabhi tumse sab kuch cheen leti hai…

aur phir ek din bina warning ke wapas de deti hai.

Lekin tab tak…

tum woh insaan nahi rehte jo pehle the.

Aarav ne aasman ki taraf dekha.

Halka sa smile kiya.

Aur dheere se bola—

“Main wapas aa gaya… par alag.”
 

Ag1990

mitra
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मुक्ति

पूजा अपना अतीत पीछे छोड़कर इस शहर में नये सिरे से अपनी जिंदगी प्रारंभ करने आई थी। नौकरी तो मिल गई पर रहने का ठिकाना नहीं मिल पा रहा था।
किसी अन्य से जान पहचान न होने के कारण वह एक होटल के कमरे में रह रही थी। वह उसकी जेब पर भारी पड़ रहा था। जेब को बचाने तथा जिंदगी में स्थिरता लाने के लिये वह स्थाई निवास की खोज में भी लगी हुई थी।

सुबह से शाम तक वह आफिस में काम करती तथा रात में अखबार में निकले विज्ञापन के आधार पर घर ढूँढने निकल पड़ती।

कोई घर इतना मँहगा होता कि उसे लगता कि अगर वह इसे लेगी तो उसकी जेब सदा के लिये छोटी ही रह जायेगी और जो सस्ता होता उसकी लोकेशन उसके मनमुताबिक नहीं होती, जो थोड़ा अच्छा लगता वे एडवांस इतना माँगते कि जब वह अपनी बचत पर निगाह डालती तो कम लगती।

अगर कहीं सब कुछ मनमुताबिक लगता तो अकेली लड़की जानकर गृहस्वामिनी या गृहस्वामी की भेदती निगाहें उसको अपना इरादा बदलने के लिये मजबूर कर डालतीं थीं।

एक दिन सुबह की चाय की चुस्कियों के साथ पेपर मे खाली घरों के विज्ञापनों पर निशान लगा रही थी कि एक विज्ञापन पर निगाह पड़ी... पेइंग गेस्ट के लिये लड़की चाहिए…

विज्ञापन में लिखी बातें उसके अनुकूल थीं। उसे लगा शायद यहाँ बात बन जाए। जगह भी आफिस से ज्यादा दूर नहीं थी अतः आफिस के पश्चात् विज्ञापित पते पर जाकर दरवाजा खटखटाया तो पिछत्तर अस्सी वर्ष की एक वृद्ध महिला ने दरवाजा खोला।

उसका मंतव्य सुनकर, अपना परिचय देते हुए, आत्मीयता से उसे अंदर बुलाते हुये कहा,
' आओ बेटी, आओ...मेरा नाम नीलिमा गुप्ता है। तुम मुझे नीलू दादी कहकर बुला सकती हो...। यहाँ सब मुझे इसी नाम से पुकारते हैं। तुम कहाँ की रहने वाली हो बेटी ? '

' जी गोंडा...। '

' तुम्हारा विवाह हो गया है ?'

' जी नहीं...।' वह न चाहते हुये भी झूठ बोल गई क्योंकि अगर वह सच कहती तो उसे उनके अन्य कई प्रश्नों से गुजरना पड़ता।

' तुम इस शहर में अकेली हो या अन्य कोई अन्य रिश्तेदार भी हैं।'

' जी मैं अकेली ही इस शहर में पैर जमाने की कोशिश कर रही हूँ।'

' घबराना मत, जिसका कोई नहीं होता उसके भगवान होते हैं। बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ।'

' पूछिये...।' पूजा ने सशंकित स्वर में पूछा।

' बेटा नौकरी तुम्हारा शौक है या आवश्यकता। '

' जी आवयकता है...।'

' ओह ! तू बैठ, मैं तेरे लिये कुछ खाने के लिये लेकर आती हूँ...। यह बता कब सामान लेकर यहाँ आ रही है।' उसके संयमित और संतुलित उत्तर से संतुष्ट होने पर उन्होंने उठते हुए कहा।

' आप परेशान न हों। वैसे भी मेरा कुछ भी खाने पीने का मन नहीं है। मुझे कहीं और भी जाना है अगर आप वह कमरा दिखा दें तो...।' उनकी उम्र और लड़खड़ाती चाल को देखकर उसने उन्हें रोकते हुए कहा।

' कमरा भी देख लेना...। मेरे हाथ की बनी कॉफी पीकर तो देख...शिखा कहती थी, दादी आप बहुत अच्छी कॉफी बनाती हैं।'

' शिखा कौन...?' उनकी आत्मीयता देखकर पूजा से रहा नहीं गया और पूछ बैठी।

' मेरी पोती...।'

' अब कहाँ है वह...?'

' वह नहीं रही...।' कहते हुए वह उठ गई तथा छड़ी के सहारे वह किचन की ओर चल दीं।

उनकी आँखों में तिर आई नमी उससे छिप न सकी...। वह उनके पीछे-पीछे जाना चाहती थी पर यह सोचकर नहीं जा पाई कि पता नहीं उन्हें उसका किचन में आना पसंद आये या न आये।

नीलिमा जी के जाने के पश्चात् वह आँखों ही आँखों में ड्राइंग रूम का मुआयना करने लगी...। दीवार पर विभिन्न चित्र लगे हुए थे पर जिन चित्रों ने उसे ज्यादा आकर्षित किया वह एक लड़की के थे। किसी में वह दुल्हन के वेश में थी तो किसी में पारंपरिक भारतीय परिधान में अपनी खूबसूरती की छटा बिखेर रही थी तो किसी में वेस्टर्न आउटफिट में अत्याधुनिक लड़की लग रही थी तो किसी में मॉडेल बनी किसी वस्तु का प्रचार करती नजर आ रही थी।

' यह मेरी पोती शिखा है...।' उसे तस्वीरों से उलझा देखकर, कॉफी उसकी ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा।

' बहुत सुंदर थी...उसके साथ क्या हुआ जो असमय ही...।' अपनी आदत के विपरीत पूजा पूछ बैठी।

' बहुत लंबी कहानी है...फिर कभी बताऊँगी। तू कह रही थी कि तुझे जल्दी है। ले कॉफी पी और बता कैसी है ?' स्वयं को संयमित कर ममत्व भरे स्वर में कहा।

' अच्छी है...बहुत ही अच्छी...।' पूजा ने कॉफी पीकर कहा।

पूजा के कॉफी पीने के पश्चात् नीलिमा जी उसे कमरा दिखाने लगी।

उसे कमरे का निरीक्षण करते देख उन्होंने कहा... ' यह मेरी पोती शिखा का ही कमरा है। मैं इस कमरे को किसी को देना तो नहीं चाहती थी पर अब इस बुढापे में अकेले रहना डराने लगा है अतः मैंने इश्तहार दे दिया...। मैं यह कमरा शिखा जैसी ही किसी लड़की को देना चाहती थी इसलिये विज्ञापन में यही छपवाया। वैसे भी मुझे किरायेदार से ज्यादा अच्छा साथ चाहिए, इसीलिये मैंने तुमसे इतनी पूछताछ की जबकि मैं जानती हूँ तुम्हारी उम्र के बच्चों को ज्यादा पूछताछ पसंद नहीं है। आशा है बुरा नहीं मानोगी...।' कहते हुए वह भावुक हो आई थीं।

' इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? यह सब पूछना आपका हक है आखिर कोई ऐसे ही किसी को अपने घर में नहीं रख लेता है...।' उसने उनके साथ चलते-चलते कहा।

कमरा अच्छा और हवादार लगा...। अटैच बाथरूम था ही, कमरा पूरी तरह फरनिश भी था। पलंग के साथ अलमारी और स्टडी टेबल के अतिरिक्त दीवार से लगा सोफा और छोटी सी सेंट्रल टेबल कमरे की शोभा को दुगणित कर रही थी। इससे भी ज्यादा संतोष उसे रूम से सटा एक छोटा सा किचन देखकर हुआ।

उसमें गैस स्टोव के अलावा माइक्रोवेव भी था। नीलिमा जी के दरवाजे से पर्दा हटाते ही कमरे से सटा एक छोटा बरामदा तथा उगते सूरज की किरण रश्मियों को कमरे में प्रवेश करते देखकर वर्षो पुराना एक स्वप्न आँखों में तिर आया...वह घर के बरामदे में बैठी उगते और डूबते सूरज को देखकर मन की भावनाओं को कागज पर उकेर रही है या बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ते हुए उगते सूरज की रश्मियों में स्वयं को नहलाकर, तरोताजा होकर एक अच्छे दिन का प्रारंभ करने की योजना बना रही है...पर ऐसा कभी नहीं हो पाया।

' यह किचन मैंने अभी यह सोचकर बनवाया है कि जिसको भी दूँगी तो वह अपनी पसंद का अगर कुछ बनाना चाहे तो बना सकेगा। गैस स्टोव और माइक्रोवेव मेरे पास एक्सट्रा था इसलिये यहाँ रखवा दिया।' उसकी निगाह किचन की ओर देखकर उन्होंने कहा।

नीलिमा दादी की बात सुनकर वह अपने विचारों से बाहर आई। कमरा पसंद न आने का कोई कारण नहीं था। किराया भी ज्यादा नहीं था तथा वह एडवांस भी नहीं माँग रही थीं।

सबसे बड़़ी बात यह थी कि उनके ममत्व भरे व्यवहार ने उसका मन मोह लिया था अतः दूसरे दिन सामान शिफ्ट करने की बात कहकर वह चल दी। उसे आफिस भी समय से पहुँचना था।

पूजा ने दूसरे दिन शिफ्ट कर लिया। वह अपना सामान कमरे में लगा ही रही थी कि नीलिमा दादी कॉफी के साथ नाश्ता लेकर आ गई तथा रात के खाने का भी न्यौता दे दिया। वह बड़ी भली लगी...कम से कम अनजान शहर में किसी का कंधा मिलना उसे बहुत ही अच्छा लग रहा था।

दूसरे दिन इतवार था...। वह अपने हफ्ते भर के कपड़े धो रही थी।

आवाज सुनकर उन्होंने दरवाजा खटखटाया, उसके बाहर आने पर कहा...
' बेटी, हाथ से धोने की क्या आवश्यकता है? घर में मशीन है हफ्ते में एक दिन चला लेगी तो कुछ बिगड़ नही जायेगा।'

उनकी बात सुनकर अनायास ही पूजा को वह दिन याद आया, जब घर भर के ढेर सारे कपड़े धोने के पश्चात् एक दिन विकास से उसने वाशिंग मशीन खरीदने की बात कही तो जब तक विकास कुछ कह पाते, उसकी सास ने ताना मारते हुये कहा...
' जरा से कपड़े क्या धो लिये, वाशिंग मशीन की बात करने लगी। अगर इतनी ही नाजुक थी तो दहेज में वाशिंग मशीन क्यों नहीं लेकर आई...?'

पूरे दिन नौकरानी की तरह काम करवाने के बावजूद बात-बात पर ताने देना उनकी आदत बन गई थी। वह माँ को ससुराल में मिल रहे कष्टों को बताकर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी किन्तु रोज-रोज उनकी जली कटी बातें सुनकर उसके सब्र का बांध टूटने लगा था।

रक्षाबंधन पर उसका भाई उसे लेने आया। घर पहुँचकर उसने माँ को सारी बातें बताई तो उन्होंने कहा, ' सब्र कर बेटी, समय के साथ-साथ सब ठीक हो जायेगा। यह बात अवश्य है जितना उन्होंने माँगा था, हम दे नहीं पाये पर चिंता न कर धीरे-धीरे हम उनकी सब माँगों को पूरा कर देंगे।'

सब ठीक कहाँ हो पाया था...! न माँ पिताजी उनकी नित बढ़ती माँगों को पूरा कर पाये और न ही सासू माँ की ज्यादातियाँ कम हुई...। हालात ऐसे बने कि उन्होंने उसके कहीं आने जाने पर भी पाबंदी लगा दी।

दुख तो तब होता जब अपने छोटे मोटे खर्चो के लिये भी उसे उनसे पैसे माँगने पड़ते क्योंकि विकास अपना सारा वेतन अपनी माँ को ही देते थे।

सारा काम करवाने के बावजूद खाना उसे ऐसे पकड़ाया जाता मानो वह इसकी हकदार नहीं है। फल, दूध खाये पीये तो उसे वर्षो बीत गये थे़। जब वह गर्भवती हुई तब उसके प्रति सासू माँ के व्यवहार में अवश्य परिवर्तन आया था...किन्तु इंतिहा तो तब हुई जब उसने बेटी को जन्म दिया।

वह दर्द से तड़फड़ा रही थी, सांत्वना के दो शब्द कहने की बजाय उन्होंने चिल्लाकर कहा, 'ज्यादा मुँह मत फाड़, कोई बेटा नहीं जन्मा है जो कोई तेरे नाज नखरे़ उठाये...।'

चीख मुँह में ही दबकर रह गई तथा आँखों से आँसू निकल पड़े...। विकास भी अपनी माँ की ही तरह थे। माँ के मुँह से निकला वाक्य मानो उनके लिये बह्मवाक्य था। बेटी दूध के लिये रोती रहती और वह उसे काम में उलझाये रखतीं।

कोई औरत इतनी संवेदनहीन भी हो सकती है, वह सोच भी नहीं सकती थी। बहू तो बहू, अपनी पोती से भी उन्हें प्यार नहीं था।

एक बार विकास कहीं टूर पर गये हुए थे, इसी बीच पुत्री आकांक्षा को ज्वर हो गया। वह बुखार से तड़प रही थी और वह घरेलू इलाज करवाती रही। बच्ची को दर्द से तड़पता देखकर करूण स्वर में उसने न जाने कितनी बार उनसे कहा,' माँजी, इसे डाक्टर को दिखा दें।'

वह नहीं मानी...इलाज के अभाव में एक रात वह मासूम चल बसी। उसने तब स्वयं को बेहद असहाय महसूस किया था। उसी सुबह विकास आ गये जब तक वह कुछ कह पाती, सासू माँ ने बेटी की ठीक से देखभाल न करने का आरोप उस पर लगा दिया।

विकास ने बिना उसकी सुने उसे खूब खरी खोटी सुनाई। एक तो बेटी की मृत्यु का दर्द, उस पर ठीक से देखभाल न करने का आरोप, वह सहन नहीं कर पाई। उसदिन वह खूब फूट-फूट कर रोई थी पर उसके आँसुओं की किसी को भी परवाह नहीं थी।

अति तो तब हुई जब दूसरे दिन सासु माँ ने अल्टीमेटम देते हुए कहा अगर इस बार बेटा नहीं जन्मा तो वह अपने बेटे का दूसरा विवाह कर देंगी। उसी रात विकास ने अपनी माँ की आज्ञा के पालन के लिए उसका साथ चाहा किन्तु वह तन-मन से इतनी अस्वस्थ थी कि उसने उसका साथ देने से मना कर दिया।

तब विकास ने उसके साथ जोर जबरदस्ती करनी चाही , उसने अपनी पूरी शक्ति से विरोध करते हुए चिल्लाकर कर कहा,
' तुम्हारी माँ की वजह से मैंने अपनी बेटी को खोया है। उनकी नफरत ने उसे मारा है। तुम्हें अपनी बेटी के असमय मरने का दुख नहीं है पर मुझे है। मुझे कुछ दिन उसके साथ रहने दो। '

' खुद उसका ख्याल नहीं रख पाई और अब माँ पर आरोप लगा रही हो।' अपनी अवमानना तथा माँ के ऊपर लगाए आरोप से तिलमिलाए विकास ने कहा और उसे एक जोरदार थप्पड़ मारकर कमरे से बाहर निकल गया।

बेटी का गम और उसको समझने की कोशिश किये बिना विकास के थप्पड़ ने उसके वजूद को हिलाकर रख दिया था।

दूसरे दिन ही बिना किसी से कुछ कहे उसने घर छोड़ दिया। वैसे भी उस जगह रहने से क्या फायदा जहाँ उसका मानसम्मान न हो, स्त्री को पत्नी नहीं वरन् दासी समझा जाए...और तो और उसे अपनी ही पुत्री का कातिल होने का झूठा आरोप लगाकर बार-बार प्रताड़ित करने के साथ जोर जबरदस्ती करते हुए उससे इंसान होने का हक ही छीन लिया जाए।

उसे पता था कि उसके इस कदम से उसे बदचलन सिद्ध कर दिया जायेगा पर वह क्या करती सहने की भी एक सीमा होती है। जब हद पार हो जाती है तो अच्छा बुरा सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त हो जाती है...। तब विद्रोह का ऐसा ज्वालामुखी फूट पड़ता है जिसमें लगता है या तो स्वयं को जला ले या दूसरों को...।

ऐसा करके वह अपनी जिंदगी तबाह नहीं करना चाहती थी। उसने निश्चय कर लिया था कि वह ऐसे रिश्तों से मुक्ति पाकर स्वयं के लिये एक नया रास्ता तलाश कर जीवन को नई दिशा देते हुये अपने लिये एक छोटा सा आकाश ढूँढने का प्रयत्न करेगी जहाँ उससे या उसकी भावनाओं से खेलने वाला कोई ना हो।

पूजा अपने घर जा नहीं सकती थी क्योंकि उसे पता था कि उसके माता- पिता अपने सम्मान की दुहाई देते हुए उसे परिस्थतियों से समझौता करने के लिये कहेंगे। वहाँ रहकर भी उसे चैन नहीं मिलेगा अतः उसने अपनी मित्र दीपा के घर जाने का निश्चय कर लिया।

दीपा उसकी ऐसी सखी थी जिसकी मित्रता पर उसे नाज था। जो उसके सुख-दुख की न केवल साथी रही थी वरन् उसने ऐसे क्षणों में भी उसका साथ दिया जब वह जिंदगी से हार मानकर बैठी थी। शायद ऐसे ही मित्रों के लिये किसी ने कहा है...इंसान भले ही हजारों मित्र बना ले पर एक ऐसा तो मित्र बनाकर दिखाये जो उसका साथ हजार वर्षो तक निभाये...।

वह दीपा के घर रहकर ही नौकरी की तलाश करने लगी। माता-पिता को जब पता चला तो उन्होंने आकर खूब खरी -खोटी सुनाई पर वह अपने निर्णय पर अडिग रही। उसका दृढ़ निश्चय देखकर वे उसे कभी अपना मुँह न दिखाने का निर्णय सुनाकर चले गये।

दिल तार-तार हो गया था। क्या व्यक्ति की नाक इतनी ऊँची होती है कि मुसीबत के क्षणों में भी वह अपने कोख जाये से संबंध तो तोड़ सकता है पर उसके मनोबल को टूटने से बचाते हुए उसको सहारा नहीं दे सकता ?

उस समय दीपा ने उसके आत्मविश्वास को टूटने से बचाते हुए न केवल उसका मनोबल बढ़ाया वरन् नौकरी दिलवाने में भी भरपूर मदद की। उसने बी.बी.एम. किया था।

एम.बी.ए. में उसका दाखिला भी हो गया था पर उसी समय दादी की बहन अपनी ननद की मित्र के लड़के का रिश्ता लेकर आईं। उसके माँ-पिताजी को यह रिश्ता इतना पसंद आया कि उन्होंने उसके विरोध को दरकिनार कर ,पढ़ाई तो तुम बाद में भी कर सकती हो, का आश्वासन देकर उस पर विवाह के लिए दबाब बनाया। आखिर उसे अपनी सहमति देनी पड़ी थी।

जिंदगी ने जब उसे दोराहे पर खड़ा किया तब उसकी मित्र दीपा के अतिरिक्त उसकी पढ़ाई ही काम आई। कुछ प्रयासों के पश्चात् एक कंपनी में उसे सेल्स मैनेजर की नौकरी मिल गई और उसे गोंडा छोड़कर यहाँ इस अनजान शहर लखनऊ में आना पड़ा।

सच जिंदगी भी न जाने कितने खेल खेलती है। जीवनरूपी शतरंज की बिसात पर आदमी तो सिर्फ एक मोहरा है जिसे समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी चालें चलनी पड़ती हैं...।

' किस सोच में डूब गई बेटी...?'

' थैंक यू दादी...। आज तो धुल ही गये हैं...। अगली बार मशीन में धो लूँगी।' नीलिमा जी का ममत्व भरा स्वर सुनकर मन के बीहड़ जंगल से बाहर निकलते हुये उसने कहा।

' क्या कहा...दादी...? सच तेरे मुँह से दादी शब्द बहुत अच्छा लग रहा है...और रिश्ते तो छूट गये कम से कम इस रिश्ते को फिर से जी लूँ।' कहते हुए उन्होंने आँखें पोंछी तथा फिर कहा,' अच्छा आज तेरी छुट्टी है...मैं सरसों का साग और मक्के की रोटी बना रही हूँ , तू भी आ जाना...मुझे अच्छा लगेगा।'

' कम से कम इस रिश्ते को पुनः जी लूँ।'
दादी के कहे वाक्य ने पूजा के दिल में हलचल मचा दी थी।

इस समय उनसे कुछ और पूछ या कहकर वह उनका दिल नहीं दुखाना चाहती थी। पता नहीं क्यों उस समय वह भी उसे अपनी ही तरह बेचारी और एकाकी लगीं। सच तो यह था कि वह आज से पहले उनके कहने के बावजूद उन्हें दादी नहीं कह पाई थी।

उसे नहीं पता था कि यह छोटा सा शब्द उन्हें इतनी खुशी दे जायेगा। अब उसने निश्चय कर लिया था कि अब से वह उन्हें दादी कहकर ही पुकारेगी। उसका एकाकी मन भी किसी का साथ चाह रहा था अतः दादी के आग्रह को उसने स्वीकार कर लिया।

वह हाथ से रोटी बनाने लगीं। थपथप की आवाज के साथ रोटी को बढ़ते हुए देख सोचने लगी कि अगर इंसान के मन में साहस और विश्वास है तो उम्र उसकी राह में रोड़ा नहीं बनती वरना दादी की उम्र में तो कुछ लोग बिस्तर से उठना ही नहीं चाहते...।

फिर भी उससे रहा नहीं गया तथा उनके पास जाकर कहा …
' अब आप बैठिये दादी, रोटी मैं बना देती हूँ...।'

' तेरे हाथ रोटी की फिर किसी दिन खा लूँगी। आज मेरे हाथ की मक्के की रोटी खाकर देख। बस बन ही गई है। तू खा, मेरा इंतजार मत करना। मक्के की रोटी गर्मागर्म ही अच्छी लगती हैं। मैं स्वयं के लिये बनाकर तेरा साथ देने आ जाऊँगी।' रोटी पर घी लगाकर उन्होंने उसकी प्लेट में रोटी रखते हुए कहा।

उनके हाथ की साग रोटी खाकर अनजाने ही उसे अपनी दादी की याद आ गई थी...। वह भी ऐसे ही सबको अपने सामने बिठाकर गर्मागर्म रोटी खिलाती थीं।

' मेरी पोती शिखा को भी सरसों का साग और मक्के की रोटी बहुत पसंद थीं।' अचानक दादी ने कहा।

' क्या हुआ था उसे...?' शिखा के बारे में जानने की उत्सुकता को पूजा रोक न पाई तथा पूछ बैठी।

' शिखा एक अच्छी नृत्यांगना के साथ अच्छी कलाकार भी थी...। उसने कई स्टेज प्रोग्राम भी दिये थे। उसका सपना फिल्मों में काम करने का था। इस शहर में उसका सपना पूरा होने का नाम नहीं ले रहा था। तभी एक टी.वी. सीरियल में काम करने के लिये एक विज्ञापन निकला। उसके आडीशन के लिये तारीख नियत हुई। उस नियत तिथि पर वह आडीशन के लिये गई। कई राउंड के पश्चात् उसका चयन हो गया तथा उसे सीरियल में काम करने के लिए मुंबई बुलाया गया। उसके साथ ही विराज नाम के लड़के का चयन इसी आडीशन के द्वारा उस टी.वी. सीरियल के लिये हुआ था।
शिखा विराज को मुझसे मिलाने लाई। उससे बात करने पर पता चला कि उसका भी बचपन से सपना फिल्मों में काम करने का रहा है। टी.वी. सीरियल तो उसके लिये मुंबई में पैर जमाने का प्रयास भर है। वह बी.ई. कर रहा था।
सीरियल के लिये बी.ई. की पढ़ाई बीच में ही छोडने का निश्चय कर उसने अपने माता-पिता को नाराज कर दिया था। वह चाहता था कि अपने इस कैरियर को उन बुलंदियों तक ले जाए जिससे उसके माता-पिता की नाराजगी दूर हो जाए। न जाने क्यों उस लड़के की सच्चाई और जिजीविषा मुझे भा गई।

'मैं शिखा को अकेले मुंबई नहीं भेजना चाहती थी। बचपन से उसकी एक-एक इच्छा पूरी करने की कोशिश की थी। पंकज और सीमा, शिखा के माता पिता की प्लेन क्रेश में मृत्यु के पश्चात् वही मेरे जीवन का मकसद बन गई थी। मैं अपने स्वार्थ के लिये उसकी ख्वाहिश को रोंदकर उसके साथ नाइंसाफी नहीं करना चाहती थी। अपनी बात जब विराज के सामने रखी तो उसने सहजता से कहा…'दादी, अगर आप मुझ पर विश्वास कर सकती हैं तो शिखा को मेरे साथ भेज दीजिए। मैं आपसे वायदा करता हूँ कि मैं शिखा को कभी कोई परेशानी नहीं होने दूँगा तथा उसे उसकी मंजिल तक पहुँचाने की हर संभव कोशिश करूँगा। मेरी और शिखा की मंजिल एक ही है, हम अवश्य कामयाब होंगे।'
शिखा को अकेले विराज के साथ भेजना मेरे संस्कारी मन को स्वीकार नहीं हुआ। शिखा की आँखों में मैंने विराज के लिये चाहत देखी थी अतः एक विचार मन में आया। अपना विचार, जब मैंने उनके सामने प्रकट किया तो वे दोनों ही चौंक गये...।

' दादी विवाह, मैंने इस बारे में सोचा भी नहीं...क्या आपने शिखा से पूछा...?'

' पूछा तो नहीं...।' शिखा की ओर देखते हुए मैंने कहा।

' फिर यह कैसे संभव है...?' कहते हुये विराज ने भी शिखा की ओर देखा।

' संभव है...मैं अपनी पोती को अच्छी तरह जानती हूँ। सच तो यह है कि उसकी चाहत को पहचान कर ही मैं यह निर्णय लेने का साहस कर पाई हूँ...।' अंधेरे में तीर चलाते हुए मैंने कहा था।

' विवाह अभी उचित नहीं होगा...पहले हमें अपना मुकाम हासिल कर लेने दीजिए...। ' विराज ने मेरी पेशकश सुनकर कहा।

' दादी, विराज ठीक कह रहे हैं। पहले हम अपना मुकाम तो हासिल कर लें।' शिखा ने विराज का समर्थन करते हुए कहा।

' बेटी,जब तुम दोनों की राहें एक हैं फिर इंकार क्यों...? फिर अब तो तुम दोनों को मुंबई में काम करने का कांट्रैक्ट मिल ही गया है। कम से कम मेरे मन में कोई दुविधा या संशय तो नहीं रहेगा। बेटा, तुम तो मेरे मन की दुविधा समझ सकते हो...कहो तो मैं तुम्हारे माता-पिता से कहकर बात आगे बढ़ाऊँ...।'

आखिर विराज ने उसकी पेशकश मान ली...। विराज के माता-पिता से बात की तो उन्होंने बेरूखी प्रदर्शित करते हुए विराज से किसी प्रकार का संबंध रखने से साफ मना कर दिया।

विराज मायूस हो गया था। वह अपने माता-पिता के आशीर्वाद के बिना विवाह नहीं करना चाहता था। उसे उम्मीद थी कि जब वह सफल होगा तब उसके माता पिता न केवल उसे माफ करेंगे वरन् शिखा को भी अपना लेंगे। स्थिति मनोनुकूल होने के लिये वह समय चाहता था।

उस समय मैं अपने स्वार्थ में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने विराज की भावनाओं की भी परवाह नहीं की तथा विराज को किसी तरह मनाकर धूमधाम से शिखा का विराज से विवाह कर दिया। विराज उसे मुंबई लेकर चला गया। भरे मन से मैंने उन्हें विदा किया तथा मुम्बई पहुँचते ही सूचना देने के लिये कहा। उन्होंने मुंबई पहुँचकर मुझे फोन के द्वारा सकुशल पहुँचने की सूचना दी तथा कहा कि अभी वे एक होटल में रूके हैं। जल्दी ही स्थाई निवास की व्यवस्था कर सूचना देंगे...।

उसके पश्चात कई दिनों तक शिखा और विराज की कोई खबर न आने पर मुझे चिंता होने लगी थी...। उन दिनों मोबाइल का इतना प्रचलन नहीं था कि घंटे-घंटे पर खबर रखी जा सके। बताये होटल के नम्बर पर फोन किया तो पता चला कि वे लोग चार दिन पूर्व ही वहाँ से चले गये थे। कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने टी.वी. सीरियल वालों को फोन किया। उन्होंने बेरूखी से कहा कि मुंबई पहुँच कर उन्होंने हमसे संपर्क तो किया था। हमने उन्हें स्टूडियो में आकर मिलने के लिये कहा पर न तो वे आये न ही उनकी कोई खबर ही आई है। उन्हें काम नहीं करना था तो पहले सूचित कर देते कम से कम हमारा समय तो बरबाद नहीं होता।

कुछ समझ में नहीं आया तब मैं उनका पता लगाने मुंबई गई। क्या इतने बड़े शहर में उन्हें ढूँढ पाना संभव था ? आखिर जब तक पता नहीं चल जाता वहीं रूकने का फैसला किया। पुलिस में भी रिर्पोट लिखवा दी पर फिर भी कुछ पता नहीं लग पा रहा था।

एक दिन अखबार पलट रही थी कि 'गुमशुदा कॉलम ' में एक शव को देखते ही चीख निकल गई... शिखा का शव था...। लिखी खबर से पता चला कि उसे किसी ने मारकर समुद्र के किनारे फेंक दिया था...। साथ ही उस पर बलात्कार के निशान भी पाये गये।

किसी तरह स्वयं को संभालकर पुलिस स्टेशन गई। शव लगभग एक हफ्ते पुराना था। उसका पंचनामा करवाकर अंतिम क्रिया की और खाली हाथ लौट आई...।

शायद तुम समझ सको बेटी कि उस समय मैंने स्वयं को कितना अकेला महसूस किया होगा ! पहले बेटा, बहू और फिर पोती...मेरे दिल पर क्या गुजरी होगी...? पर कहते हैं जब तक सांस है तब तक तो जीना ही पड़ता है...।' कहते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गये थे।

' और वह लड़का विराज...।'

' वह भी नहीं मिला...पता नहीं उसने ही शिखा को मारा या वे दोनों ही किसी साजिश के शिकार हुए...। विराज के माता -पिता से उसके बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा, ' वह तो हमारे लिये उसी समय मर गया था जब उसने हमारी इच्छा के विरूद्ध अपना कैरियर चुना था। जब उसे हमारी परवाह नहीं है तो हम ही उसकी परवाह क्यों करें ? पता नहीं इंसान इतना संवेदनहीन, अमानुष कैसे हो जाता है कि अपनी एक अवज्ञा पर अपने खून से ही नाता तोड़ देता है।' आँसू पोंछते हुए उन्होंने भरी आवाज में उत्तर दिया।

' बेटा, एक बात कहूँ ?'

' जी दादी। '

' बेटा, मेरी शिखा तो साजिश का शिकार होकर अपनी मंजिल नहीं प्राप्त नहीं कर पाई पर तुम अपना हर कदम फूँक-फूँककर उठाना तथा अपने लिए एक छोटा सा आकाश तलाश कर ही रहना। मुझे लगेगा मेरी शिखा मुझे वापस मिल गई।'

उनकी कहानी तो उससे भी दुखद थी पर उनकी जिजीविषा तथा उनकी उसके प्रति सोच उसके लिये प्रेरणा बन गई थी।
वह अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं थी अतः उसने अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने के उद्देश्य से पत्राचार द्वारा एम.बी.ए .करने का निश्चय ही नहीं किया वरन पढ़ाई भी प्रारम्भ कर दी।

इसके साथ ही अब वह रोज आफिस से आने के पश्चात् कुछ समय उनके पास गुजारने लगी थी। यद्यपि धीरे-धीरे एक ही सी बातें सुनकर बोर होने लगी थी फिर भी उनके व्यवहार में न जाने कैसा सम्मोहन था कि जब तक कुछ पल उनके साथ नित्य बिता नहीं लेती थी तब तक उसे चैन ही नहीं मिलता था। वह भी गर्मागर्म नाश्ता बनाये उसका इंतजार करती मिलतीं।

एक दिन पूजा ऑफिस से आई तो देखा बरामदे में एक आदमी उसका इंतजार कर रहा है। उसके आते ही उसने उसे एक कागज पकड़ाया।

वह कागज सामान्य नहीं वरन विकास द्वारा भिजवाए तलाक के पेपर थे। उसने बिना कुछ कहे उन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये। एक हस्ताक्षर से उनके सात जन्मों के बंधनों का अंत हो गया था।

वह स्वयं उस बंधन को तोड़ आई थी किन्तु फिर भी न जाने मन में एक आस थी आज वह आस भी टूट गई थी।

मन बेहद उदास था वह अपने कमरे जाकर लेट गई। उसे अपने पास न आते देखकर दादी ने उसके रूम का दरवाजा खटखटाया।

उसके आते ही उन्होंने कहा,' बेटा, क्या बात है बेटा, क्या तबीयत ठीक नहीं है ? चल आज मैंने तेरा मनपसंद पोहा बनाया है। कुछ खाएगी तो अच्छा लगेगा। '
उस मनःस्थिति में वह दादी के पीछे-पीछे चल दी।

उसे चुपचाप खाते देखकर दादी ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो वह चुप नहीं रह पाई। उसने उन्हें अपनी आपबीती सुनाई तो वह चौंक गई तथा कहा,' तुम तो कह रही थीं कि तुम्हारा विवाह नहीं हुआ है तथा तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं है...।'

' दादी, यह सच है कि आज मैंने आपको अपने जीवन के काले अध्याय से अवगत कराया पर क्या यह सच नहीं है जिनसे मैं सारे रिश्ते नाते तोड़ आई थी, जिनका मेरी जिंदगी में वापस आना असंभव है, उनके बारे में बताकर मैं क्या करती ? अब आप ही बताइये, उस दिन मैंने क्या गलत कहा ? जिस व्यक्ति से संबंध ही न रह गया हो उसके साथ नाम जोड़ना क्या उचित है ? मैं उसकी परवाह क्यों करूँ, क्यों अपना नाम उससे जोड़कर रखूँ जिसको कभी मेरी परवाह ही नहीं रही...? वह रिश्ते ही झूठे थे तभी एक हस्ताक्षर से वह एक झटके में टूट गए। '

' शायद तुम ठीक कहती हो बेटी...।' कहते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गये थे।

' यह क्या, आपकी आँखों में आँसू...?'

' तेरी बात ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया...। तू सच ही कह रही है जिसको हमारी परवाह न हो, उसके साथ अपना नाम कैसे जोड़ें पर सदा ऐसा कहाँ हो पाता है ? मेरा बड़ा बेटा पंकज प्लेन क्रेश मे मारा गया तो दूसरा संजय सात समुंदर पार बैठा है।'

' क्या आपका दूसरा पुत्र भी है ? आपने कभी बताया ही नहीं...।'

' क्या बताती उसके बारे में...? पाँच वर्ष से वह आया ही नहीं है...। वह इतना व्यस्त रहता है कि उसके पास किसी के लिये समय ही नहीं है। वह बार-बार मुझसे कहता है कि माँ अब यहाँ कोई नहीं है, सब कुछ बेचकर मेरे पास आ जाओ...। बेटी मैं जीते जी इस घर को कैसे बेच सकती हूँ ? शिखा के दादाजी ने एक एक पाई जोड़कर इस घर को बनवाया था। इस घर के साथ मेरी न जाने कितनी खट्टी मीठी यादें जुड़ी हैं...अगर मैं यहाँ से गई तो मेरा शरीर जायेगा, मन नहीं।'

' पर दादी...।'

' बेटी मैं जानती हूँ कि तेरे मन में कैसे-कैसे प्रश्न आ जा रहे हैं पर एक इंसान के जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जब वह कोई भी निर्णय लेने से पूर्व कई बार सोचता है...। बार-बार स्वयं से सवाल जबाव करता है। बेटी मेरे मन ने मेरे प्रश्नों का सदा एक ही उत्तर दिया है कि मुझे संजय के पास नहीं जाना चाहिए...। अब तक मैंने एक स्वतंत्र और निर्भीक जीवन जीया है। तन भले ही शिथिल हो गया है पर मेरा मन अब भी इस शरीर को संजीवनी देकर बार-बार यही कहता है, नीलिमा अभी भी तुम थकी नहीं हो। तुझमें अभी भी इतनी ताकत है कि तुम अपना भार स्वयं उठा सकती हो...।
पंकज के पापा हमेशा कहा करते थे...नीलू बच्चों के आगे कभी हाथ नहीं फैलाना। सदा देना ही लेना नहीं...। इसी में तुम्हारी इज्जत है। यह बात अलग है कि आज वह मेरे साथ नहीं हैं पर उनकी यादें तो हैं। उन्होंने मेरे लिये इतना छोड़ा है कि कभी किसी के सामने हाथ पसारने की नौबत न अभी आई है और न ही भविष्य में आयेगी।
मुझे पता है संजय तथा उसकी पत्नी मुझे हाथों हाथ लेंगे पर कब तक...? क्या कुछ दिनों पश्चात् मैं उनके लिये घर में रखी सजीव निरर्थक वस्तु मात्र बनकर नहीं रह जाऊँगी ? जिसके सामने समय पर खाने पीने के लिये सामान तो रख दिया जायेगा पर अपनी- अपनी व्यस्तता के कारण मेरे दिल तक पहुँचने की कोशिश कोई नहीं करेगा !! सच बेटा, उस स्थिति की कल्पना मात्र से मैं सिहर उठती हूँ।
बेटी, यह बात मैं ऐसे ही नहीं, कुछ महीने उनके साथ बिताये अनुभव के आधार पर कह रही हूँ। वह तो अपना कर्तव्य निभा रहे थे पर मेरे लिए वहाँ करने के लिए कुछ नहीं था। बस अब तो उस परमपिता परमेश्वर से इतनी ही प्रार्थना है कि मेरा अंत भी शांति से हो जाए। मुझे इस सारी मोह ममता से मुक्ति मिल जाए।'

पूजा उनकी जिजीविषा को मुक्त कंठ से निहार रही थी कि अचानक उन्होंने कहा, ' पूजा बेटा, तू दूसरा विवाह क्यों नहीं कर लेती ? अकेले जीवन काटना बहुत कठिन होता है बेटी।'

' दूसरा विवाह...?'

' हाँ बेटी...। मैं चाहती हूँ , तू दूसरा विवाह कर ले...। अब वह समय नहीं रहा कि जिस घर में डोली जाये उसी से अर्थी निकले। आज समय बदल रहा है मान्यतायें बदल रही हैं...वैसे भी बिना मकसद जिंदगी जीना बेमानी बन जाता है। कभी-कभी स्वयं के लिये अपनी ही जिंदगी बोझ बनने लगती है।'

' दादी उस कटु अनुभव के बाद मेरा विवाह संबंध में विश्वास ही नहीं रहा है। '

' जीवन जीने के लिये है...। जीवन में सुख-दुख तो आते ही हैं पर वास्तव में मनुष्य वही है जो इन सब को झेलते हुए सदा आगे बढ़ता जाए।'

' ठीक है दादी, कोई मिल गया तो सबसे पहले आपको ही बताऊँगी।'

बात टालने के लिये उसने कह दिया पर यह नहीं कह पाई दादी ,आप भी तो अतीत की यादों में अभी तक उलझी हुई हो वरना आप अपने बेटे की बात मानकर उसके पास नहीं चली जातीं। माना आज के बच्चों के पास अपने बुजुर्गो के लिये समय नहीं है पर सुख-दुख में तो वे साथ देंगे ही। जब आप इस उम्र में अकेली रह सकती हो तो मैं क्यों नहीं ?

न जाने क्यों विवाह जैसी संस्था से उसका मोह टूट गया था। उसे एक बार धोखा मिल चुका था अब दुबारा धोखा नहीं खाना चाहती थी। अब वह अपने पैरों पर खड़ी है। क्या कमी है उसे जो व्यर्थ किसी पचड़े में फँसे ?

जीवन बीत रहा था...उसका एम.बी.ए. पूरा हो गया था। अब वह दूसरा जॉब ढूँढने लगी। उस दिन वह बेहद खुश थी। उसे विप्रो कंपनी में दस लाख के पेकेज पर अगले महीने पूना जॉइन करना था।

सबसे पहले वह अपनी इस खुश खबरी को दादी को सुनना चाहती थी अतः ऑफिस से आते ही उसने उनका दरवाजा खटखटाया...।

कोई आवाज न मिलने पर डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला तो देखा दादी जमीन पर पड़ी तेजी-तेजी सांस ले रही हैं...। वह उन्हें देखकर सकते में आ गई। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे, किसे बुलाये...?

अपनी पढ़ाई या आफिस से आने के बाद दादी के पास तक ही सीमित रहने के कारण उसने कभी यह जानने का प्रयत्न ही नहीं किया कि अगल बगल में कौन रहता है। यद्यपि उसने दादीजी के पास कुछ लोगों को आते जाते देखा था पर उसने न तो उनसे कभी पूछा न ही उन्होंने कभी बताया।
एक बार सोचा कि मदद के लिये किसी पड़ोसी का दरवाजा खटखटाये पर उनकी हालत देखकर उन्हें अकेले छोड़ने का भी मन नहीं कर रहा था।

समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे, उन्हें कहाँ और किस डाक्टर के पास ले जाए ? उसे इस शहर के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था...। उनकी स्थिति बिगड़ती जा रही थी। वह उन्हें कृत्रिम श्वास देकर उनकी उखड़ी सांसों को यह सोचकर नियंत्रित करने का प्रयास करने लगी कि स्थिति कंट्रोल में होने पर वह किसी की मदद माँगने जायेगी तभी मोबाइल बज उठा।

उसकी सहयोगी सुषमा का फोन था। पूजा ने जब उसे वस्तुस्थिति बताई तो उसने कहा,' तुम चिंता न करो, मैं अभी डाक्टर को लेकर आती हूँ।'

' सिर्फ डाक्टर को लाने से कोई फायदा नहीं होगा, जल्दी से जल्दी इन्हें कहीं शिफ्ट करना पड़ेगा, अगर तू किसी को जानती है तो प्लीज जल्दी से डाक्टर के साथ एम्बुलेंस लेकर भी आ...।'

' ठीक है, मैं आती हूँ...।' कहकर उसने फोन रख दिया।
सुषमा उस समय उसे देवदूत सी लगी। वह दादीजी के पास बैठकर उन्हें हिम्मत दिलाने लगी। उस हालात में भी दादीजी उससे कुछ कहने का प्रयास करने लगीं।

' प्लीज दादी, आप ज्यादा बात न करें। आपको कुछ नहीं होगा। मेरी मित्र सुषमा डाक्टर को लेकर बस आती ही होगी...।'
उन्होंने उसकी बात को अनसुना कर अस्फुट स्वर में कुछ कहने का प्रयत्न किया पर कह नहीं पाई तथा बेहोश हो गईं।
उनकी हालत देखकर उसने फिर अपनी मित्र सुषमा को फोन किया तो उसने कहा…' एम्बुलेंस बस पहुँच ही रही होगी...। तू उन्हें लेकर अस्पताल पहुँच, मैं वहीं पहुँच रही हूँ...।'

अस्पताल में दादी की हालत को नाजुक करार दिया...। उनके मोबाइल से संजय का नम्बर ढूँढकर पूजा ने उसे फोन किया। उसने उनका ख्याल रखने की बात कहकर शीघ्र पहुँचने की बात कही।
एम्बुलेंस की आवाज से अड़ोसी पडोसियों को उनके बीमार होने के बारे में पता चल ही गया था। वे अस्पताल में उन्हें देखने और मदद करने की चाहत से आये भी पर आई.सी.यू. में किसी को जाने की इजाजत ही नहीं थी।

संजय के आने से पूर्व ही डॉक्टरों की भरपूर कोशिशों के बावजूद दादी जिंदगी की जंग हर गईं थीं।
उनकी मृत्यु के पश्चात् हर जुबां से उनकी प्रशंसा सुनकर लग रहा था जैसे वह पूरे मोहल्ले की जान थीं। किसी की आँटी तो
शिखा ने अड़ोसी पड़ोसियों के साथ मिलकर उनके अंतिम संस्कार की तैयारी प्रारंभ कर दी।

संजय के आते ही उनकी अंतिम यात्रा प्रारंभ हो गई। अंतिम यात्रा के पश्चात् जब वह घर वापस लौटी तो उसे लग रहा था कि वह एक बार फिर से अकेली, बेघर हो गई है। दुख था तो केवल इतना कि वह दादी के साथ अपनी खुशी शेयर नहीं कर पाई।
दुख तो इस बात का भी था कि संजय की रूचि अपनी माँ की आत्मा की मुक्ति के लिये परंपरागत नियम निभाने की बजाय, उनकी सारी चल और अचल संपत्ति को शीघ्रातिशीघ्र बेचने की थी।

घर का विज्ञापन देते ही नित्य नये-नये लोग घर को देखने के लिये आ रहे थे। मकान इतना अच्छा और मैन्टैंड था कि अच्छी से अच्छी बोलियाँ लग रही थीं आखिर संजय को उसकी मनचाही रकम मिल ही गई।
वैसे रूढ़िवादी तो पूजा कभी नहीं रही थी पर संजय को इस तरह जल्दी-जल्दी सारे कार्य निबटाते देख बार-बार मन में यही आ रहा था...क्या मरने वाले का अपने बच्चों पर इतना भी हक नहीं है कि ज्यादा नहीं तो दस बारह दिन ही उसके बच्चे उसकी याद में सुबह शाम दीप जलायें...? सच नीलिमा दादी की सांसों के टूटते ही उनकी वर्षो से सँजोई धरोहर भी दूसरे की हो गई थी।

' तुम व्यर्थ दुखी हो रही हो, आज के युग में इंसान अपने लिये ही समय नहीं निकाल पाता तो अपने बुजुर्गो के लिये उसके पास समय कहाँ होगा ?' अंतर्मन ने टोका।

' तुम ठीक कह रही हो...। शायद आज की यही सच्चाई है और शायद समय की यही माँग भी है।' प्रतिउत्तर देते हुए उसने मन को स्थिर किया।

यद्यपि दादी के बिना उसका इस घर में रहने का बिलकुल मन नहीं था किन्तु पंद्रह दिन वह कहाँ रहती। समय देखकर संजय से पूना में अपने जॉब के बारे बताते हुए पंद्रह दिन और रहने की इजाजत मांगी। उसने मकान के नए मालिक से बात की, उन्होने उसे रहने की इजाजत दे दी।

पंद्रह दिन पश्चात पूजा जब इस घर को छोड़कर जाने लगी तो अनायास ही उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे...। न जाने क्यों कुछ ही दिनों में उसे दादीजी से इतना मोह हो गया था कि यह घर उसे अपना ही घर लगने लगा था।

सच तो यह है कि इतना दुख तो उसे अपनी माँ का घर छोड़ने पर भी नहीं हुआ था। वह समझ नहीं पा रही थी कि ये कैसे दिल के रिश्ते हैं ? खून के रिश्तों में भले ही थोड़ी सी नासमझी, अहंकार या एक दूसरे से की गई उम्मीदों के पूरा न होने के कारण दरार पड़ जाए पर दिल से बने ये रिश्ते इन सब कारणों से मुक्त होते हुए न केवल जीवन को सुरभित कर जाते हैं वरन् जीवन को परिपूर्ण बनाते हुए एक ऐसे बंधन में बाँध देते हैं जिनसे इंसान चाह कर भी मुक्त नहीं हो पाता है...।

नीलू दादी ही थीं जिन्होने उसे विषम परिस्थितियों से लड़ने के साथ ,सदा जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित किया था। दुखी मन के बावजूद भी उसे खुशी इस बात की थी कि दादी की अंतिम इच्छा पूरी हो गई...।

जिस शांति और सम्मान से उन्होंने जीवन काटा था उसी शांति और सम्मान से वह बिना किसी को तकलीफ दिये इस दुनिया से विदा हो गई, उन्हें मुक्ति मिल गई थी...सच्ची मुक्ति...।

पूजा उनकी यादों को मन ही मन सँजोये एक मुट्ठी आकाश की तलाश में चल दी।

"समाप्त"
 
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tera hero

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माँ का आखिरी वादा

दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में, एक छोटे से फ्लैट में Meera अकेली रहती थी। 52 साल की उम्र में भी उसकी आँखों में वो चमक थी जो माँओं के दिल में हमेशा बची रहती है। उसके पति की मौत को 22 साल हो चुके थे। उसने अकेले ही अपने बेटे Arjun को पाला था। स्कूल की फीस, ट्यूशन, बीमारियाँ, रातों की जागरण – सब कुछ। Arjun जब छोटा था तो रात को डर लगने पर माँ की गोद में सोता था और कहता था, “माँ, तुम कभी मत छोड़ना मुझे।”

Meera मुस्कुराती और उसके सिर पर हाथ फेरती, “कभी नहीं बेटा। माँ का आखिरी वादा है ये।”
समय बीता। Arjun बड़ा हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और Bangalore में एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। शुरुआत में वो हफ्ते में दो-तीन बार फोन करता था। “माँ, आज क्या बनाया? मैं आऊँगा ना जल्दी।” लेकिन जैसे-जैसे सैलरी बढ़ी, प्रोजेक्ट्स बढ़े, दोस्त बढ़े, फोन कम होते गए। अब सिर्फ महीने में एक बार पैसों का ट्रांसफर और एक छोटा सा मैसेज – “Take care माँ। Busy हूँ।”

Meera कभी शिकायत नहीं करती थी। वो जानती थी कि बेटा अपनी जिंदगी बना रहा है। लेकिन अंदर ही अंदर एक खालीपन बढ़ता जा रहा था। उसकी सेहत भी बिगड़ रही थी। पिछले छह महीने से पेट में तेज दर्द, वजन कम होना, थकान। डॉक्टर ने जांच कराई तो खबर आई – Stage 3 Ovarian Cancer. ऑपरेशन और कीमोथेरेपी की जरूरत थी। खर्चा लगभग 8-10 लाख।

Meera ने सोचा, “Arjun को नहीं बताऊँगी। उसकी शादी होनी है, उसका भविष्य है। माँ चली जाएगी तो क्या, लेकिन बेटा आगे बढ़े।” उसने अपने गहने बेचने शुरू कर दिए और कुछ पैसे जमा किए। लेकिन इलाज के लिए काफी नहीं थे।

Arjun की तरफ से जिंदगी तेज रफ्तार से चल रही थी। 28 साल की उम्र में वो Senior Software Engineer बन चुका था। अच्छा फ्लैट, अच्छी गाड़ी, अच्छे दोस्त। लेकिन माँ के फोन आने पर वो अक्सर sigh करता, “फिर emotional blackmail शुरू हो गया।” उसके दोस्त कहते, “Yaar, parents को तो बस पैसे चाहिए होते हैं। तू तो भेजता है ना हर महीने।”

Arjun खुद को convince करता, “मैं तो support कर रहा हूँ ना। दिल्ली आकर क्या करूँ? वही पुराना फ्लैट, वही बातें।”

Arjun का जन्मदिन था। Meera ने सुबह से तैयारी की। आलू पराठे, दही, घर का गुलाब जामुन, और एक छोटा केक। दीवार पर पुरानी फोटो सजाई। शाम 7 बजे से वो दरवाजे की तरफ देखती रही। फोन पर कॉल किया – ringing, फिर voicemail।
“Beta… जन्मदिन मुबारक। माँ ने सब बनाया है। बस एक बार आ जा।”

रात 11 बजे तक Arjun नहीं आया। Meera ने अकेले केक काटा। एक टुकड़ा अपने लिए, एक Arjun के नाम का प्लेट में रखा। फोटो फ्रेम को चूमकर बोली, “बेटा, माँ को माफ कर देना।”

उस रात दर्द इतना बढ़ा कि वो फर्श पर लेट गई। सुबह अस्पताल गई। डॉक्टर ने कहा, “Meera ji, देर हो रही है। जल्दी इलाज शुरू करें।”

Meera ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “डॉक्टर साहब, मेरा बेटा Bangalore में है। वो बहुत busy है। मैं खुद संभाल लूँगी।”

दूसरी तरफ Arjun को प्रमोशन मिला। पार्टी में शराब पीकर वो अपने दोस्त से कह रहा था, “माँ हर बार यही करती है। आ जाओ, आ जाओ। जैसे मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ उनके लिए।”

तीन महीने बाद Meera की हालत और बिगड़ गई। वो अब अकेले अस्पताल नहीं जा पा रही थी। पड़ोस की आंटी उसे ले जाती। कीमोथेरेपी शुरू हुई, लेकिन पैसे खत्म हो रहे थे। Meera ने Arjun को मैसेज किया, “Beta, बस एक बार फोन कर दे। माँ को तेरी आवाज सुननी है।”

Arjun ने देखा और reply किया, “कल बात करेंगे माँ। Meeting है।”

Meera ने फोन रखा और आँखों से आँसू बहने लगे। “तेरा कल कभी नहीं आता बेटा…”

एक दिन Arjun के ऑफिस में उसका बॉस बोला, “Arjun, family emergency के लिए leave ले लो अगर जरूरत हो।” Arjun ने हँसकर कहा, “No sir, sab theek hai।”

लेकिन उसी शाम उसे Delhi से एक अननोन नंबर से कॉल आया। पड़ोस की आंटी थी। “Arjun beta, तुम्हारी माँ बहुत बीमार है। अस्पताल में है। आ जाओ जल्दी।”

Arjun का दिल धड़का। वो रात की फ्लाइट पकड़कर Delhi पहुँचा। अस्पताल पहुँचते ही उसने माँ को देखा – पतली, पीली, बाल झड़ चुके, लेकिन आँखों में वही पुरानी मुस्कान।

“Arjun… आ गया बेटा?” Meera ने कमजोर आवाज में कहा।

Arjun की आँखें भर आईं। वो बेड के पास बैठ गया। “माँ, तुमने बताया क्यों नहीं?”

Meera ने उसके हाथ को थामा। “बताती तो तू अपनी नौकरी छोड़ देता। तेरा भविष्य खराब हो जाता। माँ तो चली जाएगी, लेकिन तू आगे बढ़ना।”

Arjun रो पड़ा। “मैंने सोचा तुम बस पैसे के लिए… मैंने तुम्हें neglect किया माँ। Sorry…”

Meera ने उसके सिर पर हाथ फेरा, ठीक वैसा ही जैसे बचपन में करती थी। “बेटा, माँ कभी गुस्सा नहीं करती। बस एक बात याद रखना – मेरा आखिरी वादा था कि मैं तुझे कभी नहीं छोडूँगी। लेकिन अब लगता है वादा पूरा नहीं हो पाएगा।”

डॉक्टर ने बताया कि स्थिति गंभीर है। ऑपरेशन की आखिरी कोशिश की जा सकती है, लेकिन सफलता की संभावना कम है। Arjun ने तुरंत सारी जिम्मेदारी ली। उसने अपनी कंपनी से remote work की permission ली और Delhi में रहने लगा।
अगले 15 दिन Arjun ने माँ की देखभाल की। अस्पताल से घर, घर से अस्पताल। खाना बनाता, दवाइयाँ देता, रात को जागकर बैठता। पुरानी यादें ताजा हो रही थीं। जब वो छोटा था तो माँ रात को उसके लिए कहानियाँ सुनाती थी। अब वो माँ को कहानियाँ सुनाता था।

एक रात Meera ने कहा, “Arjun, अगर मैं चली गई तो रोना मत। बस मेरी एक तस्वीर अपने पास रखना और हर साल मेरे जन्मदिन पर आलू पराठे बनाना।”
Arjun ने रोते हुए कहा, “माँ, तुम नहीं जा सकती। मैंने तुम्हें इतना अकेला छोड़ दिया। अब मैं यहीं रहूँगा। नौकरी छोड़ दूँगा अगर जरूरत पड़ी।”

Meera हँसी। “पागल है क्या? तूने मेरे लिए इतना किया है। पैसे भेजकर, मेरी जिंदगी आसान बनाकर। बस एक गलती की – मुझे समय नहीं दिया। लेकिन अब दे दिया। माँ खुश है।”

ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने कहा, “हमने पूरी कोशिश की है। अब प्रार्थना करें।”

Arjun अस्पताल के वेटिंग रूम में बैठा रहा। उसने माँ की पुरानी डायरी निकाली जो उसने घर से लाई थी। उसमें लिखा था – “आज Arjun ने पहली बार स्कूल में प्राइज जीता। मेरा बेटा बहुत आगे जाएगा। मैं सिर्फ उसे देखना चाहती हूँ।”

Arjun की आँखें भर आईं। उसने महसूस किया कि माँ ने कभी कुछ माँगा ही नहीं। सिर्फ उसका समय और प्यार।

तीन दिन बाद Meera होश में आई। कमजोर लेकिन मुस्कुराती हुई। “Arjun… माँ जीत गई लगती है।”
Arjun ने उसे गले लगाया। “माँ, मैंने वादा किया है। अब मैं हर हफ्ते आऊँगा। या फिर तुम Bangalore आ जाओ मेरे साथ।”

Meera ने सिर हिलाया। “नहीं बेटा। यह घर मेरी यादों से भरा है। तू अपनी जिंदगी जी। बस फोन पर रोज एक मिनट की बात कर लिया कर। बस इतना काफी है।”

समय बीता। Meera धीरे-धीरे ठीक होती गई। Arjun ने अपनी जिंदगी में balance लाया। वो महीने में दो बार Delhi आता। कभी माँ को Bangalore ले जाता। उसने दोस्तों को कहा, “Family सबसे पहले है। Career बाद में।”
एक साल बाद Meera की हालत स्थिर हो गई। Arjun ने शादी की। उसकी पत्नी ने Meera को माँ कहा और पूरा सम्मान दिया। शादी के दिन Meera ने Arjun से कहा, “बेटा, आज मेरा आखिरी वादा पूरा हो गया। मैंने तुझे कभी नहीं छोड़ा और तू भी मुझे नहीं छोड़ेगा।”

Arjun ने माँ के पैर छुए। “माँ, तुम मेरी ताकत हो। तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं।”

Meera की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरा खुशी से चमक रहा था। “बेटा, जिंदगी में गलतियाँ होती हैं। लेकिन उन्हें सुधारने का मौका मिले तो उसे मत गँवाना। मैंने तुझे पाला, तूने मुझे बचाया। हम दोनों ने एक-दूसरे को पूरा किया।”

आज भी दिल्ली के उस छोटे फ्लैट में Meera रहती है। हर शाम वो खिड़की के पास बैठकर Arjun का इंतजार करती है। कभी-कभी वो नहीं आता तो फोन पर बात करती है। और Arjun अब कभी “busy” नहीं कहता।

क्योंकि उसे पता है – माँ का आखिरी वादा सिर्फ शब्द नहीं था। वो एक रिश्ता था। जो टूटने के कगार पर पहुँच गया था, लेकिन प्यार ने उसे फिर से जोड़ दिया।

समाप्त
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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प्रेम
"अरे यार जल्दी रोक न गाड़ी"
"क्या हुआ अब?"
"अरे क्या हुआ होगा ?, वही इसका फोटोग्राफी का कीड़ा"
"देख तू मेरी फोटोग्राफी के बारे में कुछ मत बोल हाँ, और फिर ज़रा बाहर देख, क्या हसीन नज़ारा है। तुम लोगों को आना है तो आओ वरना मैं चला कुछ अच्छी पिक्चर्स क्लिक करने"
"हां हां ठीक है, लेकिन जल्दी आना। हम यहीं इंतजार करेंगे"
"ओके"
वो गाड़ी से उतरकर अपने कैमरा में उस वादी के नज़ारों को कैद करने में मशगुल हो गया। बहुत ही सुहावना मौसम था उस वक्त मनाली में, हल्की-हल्की बर्फबारी भी शुरू हो चुकी थी। वो अपने काम में इतना खोया हुआ था कि उसे पता ही न चला कि वो कब गाड़ी से दूर निकल आया। तभी तस्वीर लेते हुए अचानक उसे वो दिखाई पड़ी।
वो रोड़ के दूसरी तरफ खड़ी थी, खाई की ओर चेहरा किए। यूँ एक लड़की का इस तरह खड़े होना कोई अनोखी बात नहीं थी, लेकिन फिर भी वो अपना ध्यान उस पर से हटा नहीं पाया।
वो न ही हिल रही थी और ऐसा लग रहा था कि कोई सख्ती से उसे वहां खड़े रहने की सज़ा दे गया हो। वो अपने ख्यालों में इतनी गुम थी कि उसे पता ही न चला कि कब उसकी बगल वाले पेड़ ने उखड़ना शुरू कर दिया और फिर अचानक से किसी ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया। 'धड़ाममम्म' की आवाज़ के साथ वो पेड़ करीब आधी बर्फ को रौंदता हुआ नीचे खाई में जा गिरा। एक पल के लिए जैसे वहां सन्नाटा पसर गया।
उसे एहसास ही नहीं हुआ कि कब उसने उस लड़की का हाथ अपनी ओर खींचा और अब वो उसके सीने से लगी हुई थी।
वो सहम गया था इस डर से कि अगर उसने अपना हाथ न बढ़ाया होता तो वो लड़की इस वक्त खाई में होती।
उस लड़की ने एक पल के लिए खुद को देखा और फिर उसे पर उन आँखों में इस बात का ज़रा भी खौफ़ नहीं था कि अभी कुछ देर पहले उसकी जान भी जा सकती थी। डर की जगह उन आँखों में उसे एक दर्द दिखाई दिया। एक गहरा उदास दर्द।
"आप ठीक तो हैं ?"
"हाँ वो मुझे पता ही नहीं चला कब वो पेड़ मेरी जान बचाने के लिए शुक्रिया" इतना कहकर वो मुड़कर जाने लगी।
उसने उसे रोकना चाहा, शायद पूछना चाहता था कि आखिर कोई अपनी जान के लिए इतना लापरवाह कैसे हो सकता है ? लेकिन कैसे पूछता, वो थी तो उसके लिए एक अजनबी !
तभी उसकी नज़र ज़मीन पर गिरे एक कागज़ पर पड़ी। वो कागज़ शायद उस लड़की के पास से गिरा था वहां। उसने वो कागज़ उठाकर खोला कि तभी
"अरे विशाल ! क्या हुआ था ? तू ठीक तो है न ? हमने वहां से कुछ गिरने का शोर सुना" ये उसके दोस्त अनंत की आवाज़ थी।
"हाँ कुछ नहीं हुआ सब ठीक है"
"लेकिन वो लड़की कौन थी ?" उसके दूसरे दोस्त युवराज़ ने पुछा।
"पता नहीं" उसने बड़ी लापरवाही से बात को टालते हुए कहा।
"चल अभी बहुत ले ली तस्वीरें, मौसम खराब हो रहा है, हमें वापिस होटल चलना चाहिए" ये कहकर उसके दोस्त गाड़ी की तरफ बढने लगे।
उसने एक बार मुड़कर पीछे देखा और फिर उस कागज़ के टुकड़े को और मोड़कर अपनी ज़ेब में रख लिया।
उस शाम मौसम में 'तूफ़ान' की शुरुआत हो चुकी थी।
वो एक 5 स्टार होटल का आलीशान कमरा था।
"हैलो पापा"
"हैलो विशाल बेटा कैसे हो तुम ? कैसी चल रही है तुम्हारी वेकेशन ?" दूसरी तरफ से आवाज़ आई।
"मैं एकदम ठीक हूँ पापा, आप और माँ कैसे हैं ?"
"हम बिलकुल ठीक है, तुम्हारी माँ तुम्हें याद कर रही थी। लेकिन तुम ये बताओ कि तुम लोग वापिस कब आ रहे हो ?"
"क्या पापा अभी यहाँ आये हमें तीन दिन भी नहीं हुए हैं और ये सवाल आप दुसरी बार पूछ रहे हैं" उसने दिखावटी नाराज़गी जताते हुए कहा।
"क्या करूं बेटा कभी तुम्हें खुद से दूर नहीं भेजा न"
"पर पापा अब मैं बड़ा हो चुका हूँ"
"हाँ-हाँ पता है, तभी तो तुम्हें रोका नहीं। तुम्हारा जब तक मन करे घुमो, एन्जॉय करो। आराम से वापिस आना, कोई जल्दी नहीं ओके ?"
"थैंक यू पापा, बाय"
[ये है विशाल अग्निहोत्री, दिल्ली शहर के जाने-माने बिजनेसमैन वरदान अग्निहोत्री का इकलौता बेटा। दिखने में तो ये जनाब किसी हैंडसम हंक से कम नहीं है और फ़िलहाल अपने दो दोस्तों के साथ छुट्टियाँ बिताने मनाली आये हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अपने पिता के बिजनेस से ज्यादा इनकी रूचि म्यूजिक और फोटोग्राफी में है।]
विशाल आया तो यहाँ एक 'मुसाफ़िर' बन कर है लेकिन उसे ये नहीं पता कि किस्मत उसे उसकी जिंदगी की कौन-सी हकीकत से रु-ब-रु करवाने वाली है !
वो एक बड़ा सा अँधेरा कमरा था जिसके बीच में मेज़ पर एक धीमी रोशनी वाला स्टडी लैंप जल रहा था। उस कमरे में ज्यादा कुछ नहीं बस एक बैड, किताबों से भरी अलमारी, दीवारों पर बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स और एक स्टडी टेबल थी जिस पर वो चुपचाप बैठी अपने ख्यालों में गुम थी। काले घने बाल, गहरी भूरी आंखे, एक सुंदर लेकिन उदास और ख़ामोश चेहरा।
"यही दिन था वो वो मनहूस शाम। काश ! कि ये दिन उसकी ज़िंदगी में कभी आया ही न होता। काश ! कि वो उसे कभी खुद से दूर होने ही नहीं देती। काश ! कि वो उसे बचा पाती" ये सोचते-सोचते उसकी आँखों में उदासी की जगह आँसुओं ने ले ली।
"अरे यार विशाल तूने अंकल को बोल दिया न कि अभी हम कुछ दिन और यहां रहने वाले हैं"
"हां मेरी बात हो गयी है उनसे, उन्होंने कहा है कि जब तक हमारा मन करे हम यहां रह सकते हैं"
"बढ़िया तो अब हम लोगों को सोना चाहिए"
"नहीं यार तुम लोग सो जाओ, मैं अभी अपने आज के पिक्चर्स का कलेक्शन चेक करूँगा"
"ठीक है जैसी तेरी मर्ज़ी, चल युवी"
"गुड़ नाइट"
अनंत और युवराज़ के कमरे से जाने के बाद विशाल ने अपना कैमरा उठाया और बैड पर आराम से पसरकर क्लिक की हुई तस्वीरें देखने लगा। तस्वीरों को स्वैप करते हुए उसके सामने उस लड़की की तस्वीर आ पहुंची 'घने काले लम्बे बाल और ब्लैक कलर का ओवरकोट जो उसने ब्लू कलर की जीन के साथ डाला हुआ था' इस से ज्यादा उस तस्वीर में और कुछ नहीं दिखा उस से जुड़ा।
तभी अचानक एक ख्याल उसके दिमाग में कौंधा और उसने फटाफट उठकर अलमारी से अपनी जैकेट निकाली जो सुबह उसने पहनी थी और फिर उसकी ज़ेब में कुछ ढूंढने लगा।
और आख़िर वो मिल गया वो कागज़ का टुकड़ा जो सुबह उस 'ट्रैजिक गर्ल' के पास से गिरा था।
उसने वो कागज़ खोल कर देखा। उस पर एक बहुत ही प्यारी शायरी जैसी कविता लिखी हुई थी।
"जो तेरा साया किसी जिस्म से सहम जाए
तो मुझे याद करना
जो तेरी नींद आधी रात में ही उड़ जाए
तो मुझे याद करना
जो तेरे हालात कभी तेरी समझ मे न आएं
तो मुझे याद करना
जो भीड़ में भी तेरी तन्हाई तुझे सताए
तो मुझे याद करना
जो तेरी रूह का परिंदा आसमां में भी छटपटाए
तो मुझे याद करना
जो तेरी ख्वाहिशों का चिराग़ कभी डगमगाए
तो मुझे याद करना
जो तेरी अपनी परछाई भी तुझे अधूरा छोड़ जाए
तो मुझे याद करना
मैं तो हूं तेरे आस पास, बेशक ये तुझे नज़र न आए
पर फिर भी कभी अगर मेरी कमी तुझे रुलाए
तो बस तू मुझे याद करना
मुझे याद करना ! !"
मायरा

मायरा
उसे अचानक ऐसा लग जैसे किसी ने उसे पुकारा हो। उसने नज़र उठाकर इधर उधर देखा, कमरे में कोई नहीं था।
"क्या ये उसकी आवाज़ थी ? नहीं ये नहीं हो सकता वो तो जा चुका था हमेशा के लिए।
लेकिन ये एहसास ऐसा क्यों लग रहा था कि वो यहीं आस पास है" उसने सोचते हुए खिड़की के पास जाकर देखा। वहाँ बस मीलों दूर तक फैला हुआ अंधेरा था और तेज़ चलती हवा जो कि उस तूफ़ान से कम ही लग रही थी जो उसकी जिंदगी में आया था।
तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"और कितना कोसोगी खुद को ? दो साल हो गए हैं उसे गए हुए और तुम आज भी उस दिन से आगे नहीं बढ़ पाई हो। कब तक तकलीफ़ दोगी खुद को ? भूल जाओ बेटी सब" ये उसकी नानी थी जो उसके दिल और ज़िंदगी के हालात से बखूबी वाक़िफ़ थी।
"नहीं नानी माँ, मैं मर भी जाऊं तो भी खुद को इस इल्ज़ाम से रिहा नहीं कर सकती कि जो कुछ भी हुआ वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरा दोष था। मैं जिम्मेवार हूं उस अनहोनी के लिए जिसने मेरी ज़िन्दगी तबाह कर दी" उसने अपने आंसुओ पर मुश्किल से काबू पाते हुए कहा।
"नहीं मायरा, ऐसा नहीं है जो कुछ भी हुआ वो भगवान की मर्ज़ी थी।"
"कैसी मर्ज़ी नानी माँ ? बचपन में मेरे माँ-पापा मुझसे छीन लिए और जब ज़िंदगी में किसी को अपना माना तो मेरा प्यार भी मुझसे छीन लिया। ये कैसी मर्ज़ी है भगवान की और अगर यही उसकी मर्ज़ी है तो फिर उसने ये रिश्ते मुझे दिए ही क्यों ? क्यों मुझे सपने देखने पर मजबूर किया ? क्यों उसे मेरी ज़िन्दगी में भेजा" और ये कहते-कहते वो फूट-फूटकर रो पड़ी।
"नहीं मेरे बच्चे, भगवान इतना कठोर नहीं है। जरूर उसने तेरी ज़िंदगी के लिए भी कुछ अच्छा सोचा होगा। और तू तो मेरी बहादुर बेटी है, तू ऐसे हार नहीं मान सकती" नानी ने कहा जबकि वो भी जानती थी कि मायरा के घावों पर इस तरह की बातें कोई असर नहीं करने वाली थी।
अगले दिन सुबह विशाल अपने दोस्तों के साथ घूमने निकल गया। सारा दिन पहाड़ों की सैर में वक़्त का कुछ पता ही न चला।
वापिस आते-आते तीनों थक चुके थे। तभी रास्ते में अनंत ने गाड़ी रोकी।
"अरे यार वो देख कैफ़े चल वहां चलके थोड़ी थकान उतारें वैसे भी होटल कुछ दूर ही रह गया है"
"ठीक है लेकिन ज्यादा देर नहीं" विशाल ने बोला।
"हां ठीक है"
तीनों उतरकर कैफ़े "सीज़न" की ओर चल पड़े। ये उसी रास्ते पर था जहां कल विशाल को वो लड़की दिखाई दी थी।
तीनों जाकर एक टेबल पर बैठ गए।
"जी सर कहिए आपको क्या चाहिए ?" पहाड़ी सा दिखने वाला एक वेटर उनके पास आकर बोला।
"तीन कॉफी" युवराज़ ने ऑर्डर दिया।
विशाल इधर उधर नज़रें घूमने लगा। वो लकड़ी से बना एक विंटेज लुक वाला छोटा मगर खूबसूरत सा कैफ़े था जिसके पिछली तरफ़ बड़े आराम से बर्फीले पहाड़ों को देखने का लुत्फ़ लिया जा सकता था। वो ये सब नोटिस कर ही रह था कि तभी उसे पीछे की तरफ लास्ट टेबल पर बैठी हुई वो दिख गई।
उसके दिल में अचानक से एक बिजली कौंधी।
"क्या ये सिर्फ़ एक इतेफाक़ है ? कल ही तो नहीं नहीं, वैसे भी ये एक छोटा शहर है और यहां कैफ़े ही कितने हैं। ये एक इतेफाक़ ही है" उसने मन ही मन सोचा।
"ओए तू किधर गुम हो गया ?" अनंत ने उसके सामने चुटकी बजाई।
"कुछ नहीं मैं अभी आया, बस दो मिनट" कहकर विशाल टेबल से उठ गया।
"ओह हेलो किधर चले" युवराज ने आवाज़ लगाई।
"छोड़ जाने दे उसे, आ जाएगा" अंनत ने उसे रोका।
विशाल सीधे उस कैफ़े के मालिक के पास गया जो एक 70 साल का बुजुर्ग व्यक्ति था।
"नमस्ते काका, कैसे हैं ?" उसने बोला
"नमस्ते बेटा, तुम कौन ?" उस व्यक्ति ने कांपती आवाज़ में पूछा।
"अरे बस इधर घूमने आए थे, अच्छा काका आप उस लड़की को जानते हैं ? वो वो लास्ट टेबल वाली" विशाल ने बिना वक़्त गवाए उस लड़की की तरफ इशारा कर के पूछा।
"वो बिटिया वो तो सालों से यहां रोज़ आती है। कुछ बोलती नहीं बस चुपचाप उस खिड़की के पास बैठ कर कुछ लिखती रहती है। मगर तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो ?"
"कुछ नहीं बस उसकी शक्ल मेरी एक दोस्त से मिलती है न इसलिए पूछा" विशाल ने बहाना बनाते हुए कहा। "अच्छा ठीक है काका थैंक्स" वो वहां से खिसकता हुआ बोला।
"हे, हाय कैसी हो ?" उसने लास्ट वाली टेबल पर जाकर बोला।
वो अभी भी कुछ लिख रही थी। उसने सिर उठाकर देखा।
"पहचाना ? हम कल मिले थे पेड़ मैंने तुम्हारी जान " इस से पहले की वो बात पूरी करता वो बोल पड़ी।
"मैंने कल उसके लिए आपको शुक्रिया बोल दिया था और अगर वो कम था तो अगेन थैंक्स वेरी मच"
उसने बोला।
"अरे नहीं नहीं ! थैंक्स वेंकस की बात नहीं है। मैं तो आपको ये वापिस करने आया था" विशाल ने वो कागज़ का टुकड़ा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा जो उसे कल गिरा हुआ मिला था।
"ये आपको कहाँ से मिला ?" उसने हैरानी से पूछा।
"ये वहीं से जहां आप मिलीं, आई मीन ये कल गिर गया था आपके पास से शायद तो मैंने उठा लिया कि अगर आप दोबारा मिलीं तो वापिस कर सकूं। वैसे आप काफ़ी अच्छा लिखती हैं मायरा जी"
"आपको मेरा नाम " फिर उसे ध्यान आया कि वो अपनी कविता के नीचे अक्सर अपना नाम लिखती है।
"शुक्रिया ये मुझे लौटाने के लिए ये वाकई बहुत ज़रूरी था" मायरा ने उस कागज़ की तऱफ देखते हुए बोला जैसे वो उसकी कोई बहुत बड़ी पूंजी थी।
"अरे शुक्रिया कैसा ? मैंने तो बस किसी की खोई हुई चीज़ उसे वापिस दी है। वैसे मेरा नाम विशाल है" उसने बैठते हुए कहा।
मायरा ने एक ठंडी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा जैसे उसे उसका नाम जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
"तो आप एक राइटर हैं ?" उसने सामने रखी डायरी, पेन और किताबों को देखते हुए पूछा।
"जी हां, बस यूं ही थोड़ा बहुत लिख लेती हूं"
"अच्छा वैसे एक तरीका है, जिससे आप अपना शुक्रिया भी अदा कर सकती हैं और आपके दिल पर कोई बोझ भी नहीं रहेगा कि मैंने आपकी जान बचाई" विशाल ने मुस्कुराते हुए हीरो वाले अंदाज में कहा।
"मैं कुछ समझी नहीं, आप क्या कहना चाहते हैं ?" मायरा ने हैरत भरी नज़रों से उस शख्स से पूछा जो अभी भी उसके लिए एक अजनबी ही था।
"देखिए आप लिखती हैं और जाहिर है कि आपके पास बहुत सी किताबें भी होंगी और मैं ठहरा किताबों का शौकीन। तो अगर आपको कोई एतराज़ न हो तो आप मुझे अपने कॉलेक्शन में से कुछ किताबें दे सकती हैं ? पढ़ने के लिए। मैं पक्का उन्हें लौट दूंगा"
"हां लेकिन " मायरा को समझ नहीं आ रहा था वो क्या बोले।
"अरे इसमें सोचना क्या आप मुझे रोज़ एक किताब दे दिया कीजिए और मैं उसे पढ़ कर अगले ही दिन लौट दूंगा। आप वैसे भी रोज़ यहां आती है ना मेरा मतलब है हम रोज़ यहीं मिल लिया करेंगे" विशाल ने बहुत ही चालाकी से बात बदलते हुए कहा ताकि मायरा को इसकी भनक न लगे कि उसे कैफ़े मालिक ने बताया है कि वो यहां रोज़ आती है।
"ठीक है फिलहाल आप इसे ले जाइए" मायरा ने थोड़ा सोचते एक किताब उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
"ओके, तो ठीक है कल इसी वक्त फिर मिलेंगे यहीं" विशाल ने कहा।
मायरा ने एक फीकी मुस्कान के साथ हां में सिर हिला दिया।
"ओ हीरो कहां गायब हो गया था ?" गाड़ी के पास इंतज़ार करते हुए उसके दोस्तों ने पूछा।
"अरे कुछ नहीं है, तुम लोग ऐसे ही सवाल करते रहते हो"
"देख विशाल तू हमसे कुछ नहीं छिपाता, कल भी तूने ऐसे ही टाल दिया। चल अब बता क्या बात है ?"
अनंत ने गम्भीर लहज़े में पूछा।
"और तू कबसे ये किताबें पढ़ने लग गया ?, हां ?" युवराज़ ने उसके हाथ में किताब देखकर कहा।
"ओ ये ये तो फाइन ! चलो मैं गाड़ी में बताता हूँ सब तुम लोगों को" विशाल ने बोला क्योंकि अब उसे भी लगा था कि छिपाने का कोई फायदा नहीं।
"अच्छा तो ये बात है और तू हमें अब बता रहा है"
"लेकिन यार तू बच के रह, ये पहाड़ी लोगों का न कुछ पता नहीं होता। मैंने तो सुना है ये लोग जादू-टोना भी जानते हैं" युवराज़ ने कहा तो दोनों ज़ोर से हंसने लगे।
"क्या युवी तू भी न"
"नहीं यार वो ऐसी नहीं है, इन्फेक्ट मुझे ये लगा कि उसे लोगों से ज्यादा मिलना या बात करना पसंद नहीं है। मैं गया तो उसे सिर्फ वो कागज़ का टुकड़ा वापिस करने था लेकिन उस से मिल के मुझे ऐसा लगा जैसे न जाने कितने वक्त से मैं उस से बात करना चाहता था" विशाल ने कहा।
"वेल अगर ऐसा है तो कैरी ऑन ब्रो" अनंत ने उसकी तरफ देखकर हंसते हुए कहा।
"क्या हुआ, तुम कुछ परेशान लग रही हो" नानी ने कमरे में आकर मायरा से पूछा।
"कुछ नहीं नानी माँ, बस ऐसे ही"
"अच्छा अब मुझे भी नहीं बताओगी ?"
"ऐसा नहीं है, एक आप ही तो हैं जो मुझे समझती हैं" और मायरा ने उन्हें सब बता दिया जो कुछ उसके साथ इन दो दिनों में हुआ।
"अरे फिर क्या हुआ ? किताबें ही तो मांगी है पढ़ने के लिए, इसमें इतना सोचने वाली कौनसी बात है ?" नानी ने मुस्कुराते हुए कहा।
"पर नानी माँ आप जानती हैं, मुझे किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता और फिर यूँ रोज़-रोज़ मैं तो उसे जानती तक भी नहीं"
"नहीं जानती तो जान जाओगी, हर इन्सान बुरा नहीं होता मायरा। मुझे लगता है तुम्हें बिना जाने उसके बारे में सही या गलत राय नहीं बनानी चाहिए"
"ठीक है, अगर आप कहती हैं तो मान लेती हूँ" मायरा ने बिना किसी भाव के कहा।
अगले दिन विशाल कैफे पहुंचा तो उसने देखा कि मायरा वहीं उसी टेबल पर बैठी अपनी डायरी में लिख रही है। उसे देखते ही उसके चेहरे पर एक मुस्कान फ़ैल गई।
"हाय, मैंने आने में ज्यादा देर तो नहीं की ?"
"नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं है, बैठिए" मायरा ने एक ठंडा सा जवाब दिया।
"सो आज आप कौन-सी किताब लेकर आई हैं मेरे लिए ? और ये रही आपकी कल वाली किताब, मैंने पूरी रात जागकर इसे पढ़ा काफी अच्छी कहानी है"
"जी, लेकिन आपको अगली किताब देने से पहले मेरी एक शर्त है"
"कैसी शर्त ?"
"ये कि जब भी हम मिलेंगे तो आप मुझसे ज्यादा बात करने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही कभी ऐसा कोई सवाल करेंगे जो मेरी निजी जिंदगी से जुड़ा हो, क्योंकि मैं यहाँ सिर्फ अपनी कहानियों को समय देने आती हूँ। बोलिए मंजूर है ?"
"हाँ मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, बस आपसे एक रिक्वेस्ट है"
"कैसी रिक्वेस्ट ?"
"कि आप भले ही मुझसे कोई बात न करें लेकिन अगर किसी किताब या कहानी से जुड़ा कोई भी सवाल होगा तो आप मेरी मदद करेंगी। बोलिए मंजूर है ?" विशाल ने ठीक मायरा के लहज़े में ही कहा।
"ठीक है" मायरा ने हामी भरते हुए बोला।
"तो फिर मेरी किताब ?" विशाल ने हाथ बढ़ाते हुए कहा।
"ये रही"
तो इस तरह शुरू हुआ विशाल और मायरा की मुलाकात का सिलसिला।
हालाँकि मायरा की शर्त के हिसाब से उनके बीच कोई बात नहीं होती थी मगर विशाल हमेशा किताब में से उसके लिए ढूंढ-ढूंढ कर सवाल निकलता या यूँ कह लीजिए कि मायरा से बात करने का ये उसका नया तरीका था जिसे वो मना नहीं कर सकती थी और वो भी उसके सवालों का बिना कुछ कहे जवाब दे देती थी।
कुछ दिन यूँ ही बीत गए और फिर एक दिन विशाल को ऐसे ही बाज़ार में घूमते हुए मायरा दिखाई दी। उसने देखा कि कुछ टूरिस्ट लड़के उसे परेशान कर रहे थे।

"अरे मायरा तुम यहाँ हो, मैं तुम्हें कब से पूरी मार्किट में ढूंढ रहा हूँ, देर हो गई है चलो घर चलते हैं" विशाल ने मायरा का हाथ पकड़ कर चलते हुए कहा। ये देखकर वो सभी साइड हट गए।
बात को समझते हुए मायरा भी चुपचाप उसके साथ चल दी।
"वो " मायरा इस से पहले कुछ बोलती विशाल बोल पड़ा।
"नहीं नहीं, थैंक्स कहने की जरूरत नहीं है, ये तो मेरा फर्ज़ था"
"थैंक्स नहीं पर मैं ये कहना चाहती थी कि आई कुड हैंडल देम"
"हाँ मैं जनता हूँ लेकिन आपको ऐसी सिचुएशन में देखकर मुझसे रहा नहीं गया"
"लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि आप हर जगह कैसे पहुँच जाते हैं ?" मायरा ने थोड़े सख्त लहज़े में कहा।
तभी विशाल ने उसे पकडकर अपनी तरफ़ खींच लिया मायरा एक पल के लिए चौंक गई पर उसे ध्यान आया कि अभी-अभी एक तेज़ गाडी लगभग उसे छू कर निकली है।
"अब ये तो मुझे भी नहीं मालूम कि जब आप मुसीबत में होती हैं तो मै वहां कैसे आ जाता हूँ" विशाल ने अपनें दोनों हाथ उठाते हुए मासूमियत भरे लहज़े में कहा जिसे सुनकर मायरा अचानक से हंस पड़ी।
उसे इस तरह हंसते विशाल ने पहली बार देखा था और मायरा खुद बहुत सालों बाद इस तरह से हंसी थी।
"अब तो वाकई में मैं आपके एहसानों तले दब चुकी हूँ" मायरा ने हंसते हुए कहा।
"लेकिन आप अभी के अभी ये एहसान उतार सकती हैं" विशाल ने कहा।
"अच्छा, वो कैसे ?"
"क्या है कि घर का खाना खाए बहुत दिन हो गए हैं तो अगर आप अपने हाथ का बना कुछ खिला सकें तो"
"अच्छा ठीक है, तो फिर घर चलिए मेरी नानी माँ बहुत ही टेस्टी खाना बनाती हैं" मायरा ने कुछ सोचते हुए मुस्कुराकर कहा।
"तो क्या आज से हम दोस्त बन सकते हैं ?, आइ स्वेअर मैं आपको बिलकुल परेशान नहीं करूंगा"
"मंजूर, पर शायद अभी तक हमारा ठीक से इंट्रोडक्शन भी नहीं हुआ है"
"कोई बात नहीं अभी कर लेते हैं हेलो आई ऍम विशाल, विशाल अग्निहोत्री| तो मिस मायरा "
"मायरा श्रीवास्तव"
"ओह तो मायरा श्रीवास्तव क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगी ?" विशाल ने अपना हाथ आगे बढाते हुए कहा।
"श्योर" मायरा ने भी हाथ मिलाते हुए बोला।
"तो आप क्या करते हैं ? मिस्टर विशाल अग्निहोत्री"
"बेसिकली मैं दिल्ली से हूँ और हाल ही में मैंने अपना फोटोग्राफी का कोर्स पूरा किया है। इसके अलावा मैं म्यूजिक का स्टूडेंट रह चुका हूँ"
"म्यूजिक" ये सुनते ही मायरा के चेहरे पर मुस्कान की जगह उदासी ने ले ली।
"क्यों आपको म्यूजिक पसंद नहीं ?"
"नहीं ऐसा नहीं है और कौन-कौन है आपके घर में ?" मायरा ने बात बदलते हुए कहा।
"पापा और माँ और आपकी फ़ैमिली में ?"
"मैं और मेरी नानी माँ"
"और आपके पेरेंट्स ?"
"मेरे माँ-पापा बचपन में ही गुजर गए थे"
"ओह सॉरी ऍम रियली सॉरी"
"इट्स ओके लीजिए घर आ गया" मायरा ने घर की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"कौन आया है मायरा ?" नानी ने पूछा|
"नानी माँ ये विशाल है, मैंने बताया था न"
"अच्छा-अच्छा वही जिसे किताबें पढने का शौंक है" नानी ने विशाल की तरफ देख कर उसे छेड़ते हुए कहा।
"नमस्ते नानी"
"खुश रहो पर मुझे समझ नहीं आ रहा ये लड़की तुम्हें घर तक कैसे ले आई इसे तो तुमसे बात करना भी पसंद नहीं" नानी ने हंसते हुए कहा।
"ओफ्फो नानी माँ ये सब मैं आपको बाद में बता दूंगी अभी आप खाने के लिए कुछ अच्छा सा बना दीजिए" मायरा ने बात काटते हुए कहा।
"अच्छा ठीक है तुम लोग बैठो मैं आती हूँ"
विशाल के जाने के बाद मायरा अपने कमरे में गई और उसने अपने बैड के निचे से एक बॉक्स बाहर निकाला उस बॉक्स में एक खुबसूरत गिटार था। उसने उस गिटार को निकला और प्यार से सहलाने लगी।
"उसे भी तो म्यूजिक से कितना प्यार था ये गिटार वो उसे उसके जन्मदिन पर गिफ्ट करना चाहती थी, मगर जिंदगी ने तो उसे इतना भी मौका नहीं दिया। उस से पहले ही उसे छीन लिया"
ये सब याद कर उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे।
और उस दिन के बाद से मायरा और विशाल में दोस्ती हो गई। विशाल रोज मिलने पर अब भी उससे पहले की तरह ही सवाल करता लेकिन फ़र्क ये था कि अब उसके सवाल मायरा को परेशान नहीं करते थे। इस तरह विशाल को मनाली में करीब बीस दिन से भी ज्यादा हो गए थे।
एक दिन रोज की तरह ही वो दोनों कैफ़े में आमने-सामने बैठे थे। मायरा अपनी किसी नई कहानी का क्लाइमेक्स लिख रही थी और विशाल चुपचाप किताब पढ़ रहा था या फिर ये कहें कि नजरें बचाकर मायरा को देखने के लिए ये एक बहाना था उसका।
तभी विशाल के मोबाइल पर अनंत का कॉल आया।
"यार विशाल और कितनी देर लगेगी ? हम यहाँ बाहर तेरा वेट कर रहे हैं"
"हाँ ठीक है आता हूँ" कह कर विशाल ने फोन रख दिया।
"मायरा मुझे अब चलना चाहिए बाहर मेरे दोस्त इंतजार कर रहे हैं हम कल मिलते हैं"
"ठीक है"
"बाय" कह कर विशाल चल गया।
उसके जाने के बाद मायरा ने देखा कि वो अपना कैमरा अपनी सीट पर ही भूल गया है। उसने कैमरा उठाया और उसे देने के लिए विशाल के पीछे बाहर निकल गई। पार्किंग एरिया में पहुँच कर उसने देखा कि विशाल अपने दोस्तों से बात कर रहा था।
"अरे यार जब तू उसे इतना पसंद करता है तो किस बात का इंतजार कर रहा है ? अब बोल भी दे उसे कि तुझे उस से प्यार हो गया है आई ऍम 100% श्योर कि वो तुझे मना नहीं करेगी" अनंत ने उसे समझाते हुए कहा।
"नहीं यार मुझे लगता है कि अभी जल्दी होगा बहुत"
"तू बेकार में इतना सोच रहा है अभी नहीं तो कभी नहीं और फिर देख खुद को इतने हेंडसम लड़के को कौन लड़की मना करेगी ?" युवराज़ ने आँख दबाते हुए कहा।
"नहीं युवी वो ऐसी नहीं है और मुझे लगता है कि अभी ये सब बताना सही नहीं है अब तुम लोग बताओ मैं क्या करूं ?" विशाल ने पुछा लेकिन उन दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया।
"तुम लोग कुछ बोल क्यों नहीं रहे और मुझे ऐसे घूर क्यूँ रहे हो" विशाल ने हैरानी से बोला।
युवी ने उसे इशारे से पीछे की और मुड़ने को कहा।
जैसे ही विशाल ने पीछे मुड़कर देखा तो मायरा ठीक उसके पिछे खड़ी थी और उसका चेहरा गुस्से से लाल था। विशाल ये देखकर घबरा गया।
"मायरा मेरी बात सुनो"
"चुप एकदम चुप" मायरा ने गुस्से से कहा।
"तुम मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ?, मैंने तुम्हें अपना दोस्त समझा और तुम मुझसे ये उम्मीद कर रहे हो देखो विशाल मैं एक बात तुम्हें अच्छी तरह से बता देना चाहती हूं कि मेरी ज़िंदगी में प्यार के लिए कोई जगह नहीं है और तुम अपने दिमाग में ये बात अच्छी तरह से बिठा लो। और दूसरी बात कि आज के बाद मैं तुमसे नहीं मिलना चाहती कभी भी और तुम भी ऐसी कोई कोशिश मत करना। इसे हमारी आखिरी मुलाकात समझो"
इतना कह कर मायरा विशाल के हाथ में कैमरा दे कर गुस्से से चली गई।
"मायरा मायरा मेरी बात तो सुनो" विशाल ने उसे आवाज़ लगाई लेकिन उसने नहीं सुना।
तकरीबन दस दिन बीत चुके थे। विशाल और मायरा के बीच बातचीत हुए। हालांकि शुरू में एक-दो दिन विशाल ने उस से बात करने की कोशिश की लेकिन वो कोई जवाब नहीं देती थी। कैफ़े में भी विशाल को देखकर वो वहां से चली जाती थी और फिर उसने वहां आना ही बंद कर दिया लेकिन विशाल वहां हर रोज जाता था मायरा के इंतज़ार में।
और फिर एक दिन रात के नौ बजे उसके मोबाइल पर एक कॉल आया।
"हैलो विशाल बेटा, मैं मायरा की नानी बोल रही हूं"
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई।
"जी नानी, बोलिए इतनी रात को आपने कॉल किया। सब ठीक तो है न ?" विशाल ने थोड़ा घबराहट से पूछा।
"नहीं बेटा, वो मायरा कहीं चली गई है। मेरा मतलब है कि वो सुबह से कहीं गई है और अब तक घर नहीं लौटी" नानी की आवाज़ में चिंता साफ दिख रही थी।
"अभी तक घर नहीं आई ?, कहाँ गयी होगी वो ?, आपने उसे फोन किया ?"
"किया था लेकिन वो अपना फोन घर पर ही छोड़ गई है"
"ऐसे कैसे वो कहीं जा सकती है कुछ हुआ था क्या ? वो किसी बात से परेशान थी ?"
"दरअसल बेटा आज उसका जन्मदिन है और वो कई सालों से अपना जन्मदिन नहीं मानती। हमेशा वो अकेले ही कहीं चली जाती है ताकि कोई उसे जन्मदिन की बधाई न दे लेकिन शाम होते ही लौट आती है। मगर आज वो अब तक नहीं आई तो मुझे लगा कि मुझे तुम्हें बताना चाहिए"
"आपने बहुत अच्छा किया नानी, आप चिंता मत कीजिए मैं मायरा को ढूंढकर लाता हूं। आप बिलकुल भी स्ट्रेस मत लीजिए मैं उसे लेकर सीधे आपके पास ही आऊंगा"
"थैंक्स बेटे"
"ओके नानी अब मैं रखता हूं"
और फिर विशाल बिना अपने दोस्तों को बताए गाड़ी लेकर मायरा को ढूंढने निकल गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इस वक़्त कहां गयी होगी ? उसने उन सभी रास्तों पर देखा जहाँ मिले थे या जहाँ मायरा के होने की संभावना थी। लेकिन कुछ पता नहीं चला। इतने में ही 1 घण्टे से ज्यादा बीत चुका था।
फिर अचानक से उसे याद आया कि इस वक़्त टूरिस्ट्स के ज्यादा आने से कैफ़े करीब 12 बजे तक खुले रहते हैं।
"ओह गॉड मैं ये कैसे भूल गया, सबसे इम्पोर्टेन्ट जगह" उसने फटाफट कैफ़े की तरफ गाड़ी घुमाई।
जब वो कैफ़े के नज़दीक पहुंचा तो बाहर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। उसे कुछ समझ नहीं आया।
उसने वहीं गाड़ी पार्क की और उतर कर तेज़ कदमों से कैफ़े की ओर बढ़ने लगा।
नज़दीक पहुंचने पर उसे एक तेज़ झटका लगा। पूरा कैफ़े आग की लपटों से घिरा हुआ था और लोग चिल्ला रहे थे।
एक पल के लिए विशाल को कुछ समझ में नहीं आया फिर उसने जल्दी से भीड़ में जाकर मायरा को तलाश करना शुरू किया लेकिन उसे वो कहीं नहीं दिखी। अचानक उसने कैफ़े के मालिक को देखा जो सदमे और दुख से रो रहा था। उसने जल्दी से उसके पास जाकर पूछा
"ये सब कैसे हुआ काका ?, ये आग"
"पता नहीं बेटा अचानक से कैसे ये सब " उसने बड़ी मुश्किल से कहा।
"अच्छा काका क्या मायरा यहां आई थी ? वो लड़की जो लास्ट वाली टेबल पर बैठती है। उसे देख आपने ?"
"पता नहीं बेटा हां वो आई तो थी तुम देखो यहीं कहीं होगी वो"
विशाल ने उनसे ज्यादा कुछ पूछना सही नहीं समझा। पर वो मायरा को सब जगह देख चुका था वो भीड़ में कहीं नहीं थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था तभी उसकी नज़र कैफ़े के पिछले भाग में लगे कांच के शीशे पर पड़ी। उसने जल्दी से वहां पहुँचकर अंदर झांका।
उसने देखा कि मायरा वहीं टेबल के पास नीचे बेहोश पड़ी है। उसने जल्दी से चारों तरफ अंदर जाने का रास्ता ढूंढना शुरू किया। पीछे भीड़ में से लोग उसे वापिस आने के लिए बुला रहे थे। लेकिन उसके सिर पर तो जैसे जुनून सवार था।
किसी तरह बहुत कोशिश के बाद वो कैफ़े के दरवाजे से अंदर पहुंचने में कामयाब हो गया। लेकिन अभी भी मायरा उस से दूर थी। उसने एक अधजली चेयर को उठाया और उस से आग से बचते हुए वो किसी तरह उसके पास पहुँचा।
"मायरा उठो" उसने मायरा का चेहरा थपथपाते हुए कहा। लेकिन लगता था वो धुंए से पूरी तरह बेहोश हो चुकी थी।
विशाल ने तुरंत एक टेबल कवर में उसको लपेट और जैसे ही उसे उठाने लगा उसे मायरा की डायरी दिखी जो फर्श पर पड़ी थी। उसने जल्दी से उसे उठाया और मायरा को गोद मे लेकर बाहर आ गया।
"प्लीज़ कोई डॉक्टर को बुलाइए" उसने चिल्लाकर कहा।
वो उसे गाड़ी की तरफ ले गया। तभी फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस भी आ गई। दो लोग डॉक्टर को लेकर जल्दी से मायरा और विशाल के पास आए।
डॉक्टर ने मायरा का चेकअप किया।
"घबराने वाली कोई बात नहीं है बस धुंए से सांस अटक गई थी इस लिए बेहोशी आई है। अच्छा हुआ जो आप इन्हें वक्त रहते निकाल लाए। मैंने इंजेक्शन दे दिया है ये थोड़ी देर में होश में आ जाएंगी। आप इनका ख्याल रखिए"
"जी डॉक्टर, थैक्स" विशाल ने बोला।
उसने मायरा की तरफ़ देखा। आज तो वो बुरी तरह डर गया था कि अगर मायरा को सच में कुछ हो जाता तो इस ख्याल से ही उसकी आँखों में आंसू आ गए।
विशाल उसे लेकर तुरंत घर आ गया। उसे बेहोश देख कर नानी घबरा गई।
"ये सब क्या हुआ है विशाल, मायरा ऐसे बेहोश क्यों है ?"
"मैं सब बताता हूं नानी" विशाल ने मायरा को बैड पर लिटाते हुए कहा।
वो और नानी कमरे से बाहर आ गए और विशाल ने कैफ़े में जो कुछ भी हुआ वो नानी को बता दिया।
"अब बाकी के सवाल आप अपनी मायरा से पूछिएगा"
"मैं किस मुँह से तुम्हारा शुक्रिया करूँ बेटा, तुमने आज मेरे जीने के इकलौते सहारे को बचाया है। मैं हमेशा तुम्हारी एहसानमंद रहूंगी"
"ये तो गलत बात है नानी, वो क्या सिर्फ आपकी ही सबकुछ है, वो मेरी भी दोस्त है। तो अब आप रोना बन्द कीजिए। अब वो बिलकुल ठीक है"
"वो टेबल पर बैठी रोए जा रही थी। आज उसके आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसने खिड़की से बाहर देखकर अपना ध्यान बांटने की कोशिश की और तभी एक आवाज़ सुनाई दी।
'मायरा '
और उसने मुड़कर देखा तो वो उसके सामने खड़ा था। वैसी ही मुस्कान के साथ जैसे वो हर दिन उस से मिलता था। एक पल के लिए उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने उसे छूने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया वो उससे दूर जाने लगा और तभी एकाएक अंधेरा छाने लगा और लोगों में अफरातफरी मच गई और जब उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा आग लगी हुई थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने उठने की कोशिश की लेकिन ऐसे लगा कि कोई उसका दम घोंट रहा है। उसने हाथ बढ़ाकर कर उसे आवाज़ लगानी चाही लेकिन तभी वो गायब हो गया।"
"नहीं " वो एक दम डर से चिल्लाई और जाग गयी।
आवाज़ सुनकर विशाल और नानी दौड़कर उसके कमरे में आए।
"मायरा क्या हुआ मेरी बच्ची ? तुम ठीक हो" कहकर नानी ने उसे गले लगा लिया।
वो कुछ नहीं बोल रही थी बस रोए जा रही थी।
फिर अचानक उसकी नज़र वहां खड़े विशाल पर पड़ी और उसने नानी की तरफ सवालिया नज़र से देखा।
"जब तू इतनी देर तक घर नहीं आई तो मैंने ही इसे फोन किया था और तुझे आग से भी इसी ने बचाया है" नानी ने बताया।
मायरा ने विशाल की तरफ इस नज़र से देखा जैसे ये सब उसका कुसूर था।
"अच्छा अब तुम लोग बात करो मैं कुछ खाने के लिए लाती हूं, मायरा को भूख लगी होगी। है न ?"
मायरा नानी की तरफ देख कर मुस्कुरा दी।
उनके जाने के बाद मायरा ने विशाल की ओर देखा।
"देखो थैंक्स तो तुम बोलना भी मत और इस बार मुझसे कोई हमदर्दी की उम्मीद मत रखना। क्या समझती क्या हो तुम अपने आप को ? कौन सी दुनिया में खोई रहती हो कि अपने ऊपर आने वाली मुसीबत का ध्यान नहीं रहता। तुम्हें पता है नानी कितना घबरा गयीं थी तुम्हें इस हालत में देख कर। और अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मेरा क्या हो " विशाल गुस्से में बोलते-बोलते अचानक से रुक गया।
"मैं जानती हूं तुम मुझसे नाराज़ हो लेकिन जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी। और उस दिन जो कुछ भी मैंने तुम्हें बोला वो गुस्से में बोला था। उसके लिए आई एम रियली सॉरी" मायरा ने बड़ी मासूमियत से कहा।
तभी नानी कमरे में खाना और केक लेकर आई।
"देखो मायरा तुम अपना जन्मदिन नहीं मानती लेकिन फिर भी मैं हमेशा केक बनाती हूँ इस उम्मीद से कि कभी तो तुम इसे काटोगी। लेकिन आज मैं खुद चाहती हूं कि अपने दोस्त के लिए तुम इसे काटो। उसने तुम्हारी जान बचाई है इसके बदले तुम इतना तो कर ही सकती हो" नानी ने मायरा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
"ठीक है नानी मां आप कहती हैं तो मैं जरूर करूंगी ये"
और इस तरह नानी विशाल के बहाने से मायरा का जन्मदिन मनाने में सफल हो गईं। उन्हें खुशी थी कि विशाल के आने से मायरा में कुछ तो बदलाव हुआ था।
"विशाल बेटा आज रात तुम यहीं रुक जाओ, सुबह चले जाना अभी वक़्त ज्यादा हो गया है और मैं जानती हूं कि तुम भी मेरी बात नहीं टालोगे"
"ठीक है नानी"
"चलो मैं तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखाती हूं"
सुबह जब मायरा उठी तो उसे उसके दरवाजे पर एक कागज़ मिला। जिसमें लिखा था कि
"पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ उसे भूल जाओ और जो कुछ भी मैंने कहा उसके लिए मुझे माफ़ कर देना। मैं आज ही दिल्ली वापिस जा रहा हूँ"
ये पढ़कर मायरा के चेहरे पर उदासी छा गई। वो फिर से अकेली हो गई थी।
"विशाल चला गया ? बिना बताए" नानी ने चाय देते हुए पूछा।
"हां, हमेशा के लिए। वो तो यहां घूमने आया था, उसे तो जाना ही था। और अच्छा ही है कि मेरी मनहूस किस्मत से वो दूर चला गया" ये कहकर मायरा उठी और बाहर चली गयी।
विशाल को मनाली से आए हुए छः महीने बीत चुके थे। उसने बहुत कोशिश की मायरा को भुलाने की लेकिन वो उसे अपने दिल से निकाल ही नहीं पा रहा था। इस बीच उसने अपना ध्यान हटाने के लिए अपने पापा का बिजनेस भी जॉइन कर लिया था। मगर फिर भी वो कहीं न कहीं से उसके ख्यालों में आ ही जाती थी।
इधर मायरा ने फिर से अकेलेपन को अपना साथी बना लिया था क्योंकि उसका मानना था कि प्यार की अब उसकी जिंदगी में कोई जगह नहीं है और न ही उसे इसका हक़ है। हालांकि वो भी विशाल की बक-बक को बहुत मिस करती थी।
"विशाल बेटा क्या बात है ? मैं देख रहा हूँ जबसे तुम दिल्ली वापिस आए हो तुम उदास से रहते हो। आखिर बात क्या है ? अगर कोई प्रॉब्लम है तो बताओ मुझे" मि वरदान ने विशाल से पूछा।
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है पापा"
"मैं तुम्हारा बाप हूं, बचपन से जानता हूं तुम्हें। जब तक घर को अपनी बातों से सिर पे न उठा लो तुम्हें चैन नहीं आता। और आजकल तुम किसी से सही से बात भी नहीं कर रहे हो। देखो जो कुछ भी साफ साफ बताओ क्योंकि छिपाने से कोई फायदा नहीं"
ये सुनकर विशाल उनके गले लगकर रोने लगा और उन्हें सारी बात बता दी।
"ओह अब समझ में आया जनाब इश्क़ कर बैठे हैं। अरे लेकिन इसमें दुखी होने वाली कौनसी बात है ? तुम्हे तो खुश होना चाहिए"
"लेकिन पापा वो मुझसे प्यार नहीं करती इनफैक्ट वो तो ये कहती है कि वो अब किसी से प्यार नहीं कर सकती। अब आप ही बताइए मैं ऐसे में कैसे खुश हो सकता हूँ"
"हम्म्म्म बात तो सही है। मगर बेटा उसके ऐसा कहने के पीछे कोई बड़ी वजह भी तो हो सकती है। क्या तुमने कभी उस से पूछा ?"
"नहीं, दरअसल उसने शर्त रखी थी कि मैं उसकी पर्सनल लाइफ से जुड़ा कोई सवाल न करूं"
"तो कोई बात नहीं तुम फिक्र मत करो। तुम एक काम करो वापिस मनाली जाओ और उस से अपने दिल की बात बोल डालो। और अगर वो न करे तो उस से उसकी न कि वजह जानने की कोशिश करो। मुझे लगता है कि इतने सब के बाद वो तुम्हें जरूर बता देगी और फिर क्या पता तुमसे दूर रह कर उसने अपना इरादा बदल लिया हो। तुम एक बार कदम आगे बढ़ा कर तो देखो" पापा ने उसे समझाया।
"थैंक्स डैड, आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं" उसने खुशी से कहा।
अगले ही दिन विशाल मनाली जा पहुंचा। उसने होटल पहुंचकर मायरा को कॉल किया।
"हेलो मायरा" उसने हिचकिचाहट से कहा।
"विशाल ?" इतने दिनों बाद विशाल की आवाज़ सुनकर वो खुश भी थी और हैरान भी।
"वो मायरा मैं कहना चाहता था कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूं बस एक बार तो क्या तुम प्लीज़"
"हां जरूर लेकिन तुम इस वक़्त हो कहाँ"
"मैं यहीं मनाली मैं हूँ"
"मनाली ? तुम यहाँ कब आए ?"
"आज ही और अब मैं बस तुमसे एक बार मिलना चाहता हूं"
"ठीक है बताओ कहां मिलना है ?"
"पुरानी लेक के पास आज शाम को मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा"
"ठीक है"
फोन रखने के बाद विशाल को ऐसा लग जैसे उसके दिल से कोई बोझ उतर गया हो वरना अब तक तो उसे यही डर था कि मायरा उस से मिलना चाहेगी भी या नहीं।
बहुत ही खूबसूरत नजारा था वहां का। सूरज लगभग डूब चुका था और हल्का-हल्का छाया अंधेरा उस शाम को और भी रंगीन बना रहा था।
उसने सब इंतेज़ाम कर लिया था। बस अब देर थी तो उसके आने की। वो इंतज़ार करने लगा।
अचानक उसके पीछे से आवाज़ आई
"विशाल"
विशाल ने पीछे मुड़कर देखा। वो आज हल्के आसमानी चूड़ीदार सूट में बेहद खूबसूरत लग रही थी। हवा में लहराते वही घने काले बाल। विशाल को लगा जैसे वो एक बार फिर यहीं अपना दिल खो बैठेगा।
"कहाँ खो गए ?" मायरा ने उसके चेहरे के सामने हाथ हिलाते हुए कहा।
"कहीं नहीं, बस यूं ही"
"तुम्हें यहां देखकर बहुत अच्छा लग रहा है" मायरा ने उसके गले लगते हुए कहा। वो दोनों इस तरह शायद पहली बार मिल रहे थे।
"उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी कि मैं यहां आऊँगा" विशाल ने बोला।
"पर आ गए न"
"हां किस्मत हमें खींच ही लाती है तुम बैठो न" उसने उसे चेयर ऑफ़र करते हुए कहा।
"थैंक्स, वैसे पूछ सकती हूं कि इतने इतंजाम किस खुशी में ?"
"अरे नहीं अब तुमसे मिलने से बढ़ कर क्या हो सकता है तुम इतनी खास दोस्त हो मेरी"
"हां ये तो है लेकिन तुम उस दिन बिना बताए चले गए, इसके लिए मैं तुमसे नाराज़ हूं"
"हां मैं मानता हूं, मुझे ऐसे नहीं जाना चाहिए था। मुझे माफ़ कर दो"
"तो क्या प्लान है ? आगे का"
"प्लान कुछ नहीं बस तुम्हारे साथ वक़्त बिताना है और तुम्हें कुछ बताना है"
"अच्छा तो जल्दी से बताओ"
"समझ नहीं आ रहा तुमसे कैसे कहूँ ?"
"अरे इतना क्यों सोच रहे हो बोलो भी"
"ओके मायरा मैं जो तुमसे कहने जा रहा हूँ प्लीज़ उसे ध्यान से सुनना और समझने की कोशिश करना मैं मैं तुमसे प्यार करता हूँ बेहद प्यार और इस बात का मुझे तब एहसास हुआ जब मैं तुमसे दूर हुआ। हालांकि मैं शुरू से ही तुम्हें पसन्द करता था, तुम्हारी सादगी, तुम्हारी शायरी, तुम्हारी बातें। उस दिन जब तुमने कहा कि तुम किसी से प्यार नहीं कर सकती तो मैंने फैसला किया कि मैं अब कभी तुम्हें इस बात का एहसास नहीं होने दूंगा और इसीलिए मैं तुम्हें बिना बताए चला गया। लेकिन घर जाकर भी तुम मेरे ज़ेहन से एक पल के लिए दूर नहीं हुई। मैं जहां भी सोचता था सिर्फ़ तुम होती थी। जहां भी देखता था तुम होती थी। मैंने लाख कोशिश की तुम्हें भुलाने की लेकिन मैं नाकाम रहा। और बहुत हिम्मत करने के बाद मैं तुमसे यहां मिलने आ सका हूं। मैं नहीं जानता कि तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो मगर मैं जो भी कह रहा हूँ दिल से कह रहा हूँ और ये सब सच है। अब तुम्हारा जो भी फैसला होगा वो मुझे मंजूर है"
एक पल के लिए दोनों शांत हो गए। फिर मायरा ने खामोशी तोड़ी।
"विशाल मैं तुम्हारे इस एहसास की इज़्ज़त करती हूं क्योंकि मैं अब जानती हूं कि तुम कितने अच्छे इंसान हो। तुमने इतनी बार बिना किसी रिश्ते के मेरी जान बचाई है और तुम जैसा दोस्त किस्मत वालों को मिलता है। मैंने तुम्हारे आगे शर्त रखी थी कि तुम कभी मेरी ज़िंदगी से जुड़ा कोई सवाल नहीं पूछोगे क्योंकि तब मुझे लगा था कि तुम भी और लड़कों की तरह सिर्फ टाइम पास करने आए हो लेकिन अब जब मैं जानती हूं कि तुम एक खूबसूरत दिल रखते हो तो मुझे लगता है कि अब मुझे तुम्हें अपने इंकार की वजह बता देनी चाहिए"
"कैसी वजह ?"
मायरा मुस्कुरा दी।
" विहान विहान था उसका नाम। कॉलेज का सबसे पॉपुलर और हैंडसम दिखने वाला लड़का। वो म्यूजिक का स्टूडेंट था और मैंने लिटरेचर में एडमिशन लिया था। ये बात आज से 5 साल पहले की है जब मैंने दिल्ली के कॉलेज में ग्रैजुएशन के लिए कदम रखा। वो मुझसे एक साल सीनियर था। जितना अच्छा वो दिखने में था उतना ही म्यूजिक में भी। संगीत उसका पैशन था। कॉलेज की तकरीबन सारी लड़कियां उसपर फिदा थीं।
एक दिन किसी ने क्लास में आकर बताया कि सभी स्टूडेंट्स को हॉल में बुलाया गया है एक जरुरी मीटिंग के लिए। मुझे भी कुछ समझ नहीं आया और जब हॉल में पहुंचे तो देखा कि वहां एक लड़का स्टेज पर अपने म्यूजिक बैंड के साथ सबसे वाहवाही बटोर रहा है। हॉल में सब तरफ विहान विहान की आवाज़ें गूंज रही थी। और फिर उसने गाना शुरू किया। हालांकि उसकी आवाज़ बहुत ही सुरीली थी और कोई भी उस पर वाह वाह कर उठता लेकिन मुझे उस भीड़ में खड़े रहने से ज्यादा जरूरी अपना लेक्चर लगा। मैं अकेली ही वहां से निकल आई। और वो मेरी लाइफ का सबसे सही फैसला था" मायरा हंसने लगी।
"फिर ?"
"फिर जब शाम को मैं होस्टल जा रही थी तो रास्ते में एक गाड़ी आकर रुकी और आवाज़ आई
"ओह मैडम, गाना अच्छा नहीं लगा था तो बता देती यूं बीच मे छोड़कर बेज़्ज़ती तो मत करतीं आप"
मैंने जब देखा तो वो और कोई नहीं विहान ही था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया और आगे चल दी। वो गाड़ी से उतरकर पीछे आ गया।
"अरे उस 2000 स्टूडेंट्स की भीड़ में से अकेली आप मेरी परफॉर्मेंस छोड़कर गयीं, अब ये तो बता दीजिए कि क्या कमी थी गाने में ?"
"देखिए मिस्टर"
"विहान सब मुझे विहान के नाम से जानते हैं" उसने मेरी बात काटकर कहा।
"देखिए आप जो भी हैं मुझे न तो आपके गाने में कोई इंटरेस्ट है और न ही आपकी बातों में। अब आप मेरा रास्ता छोड़िए"
"ठीक है छोड़ देते हैं लेकिन एक शर्त है। आपको मुझे बताना पड़ेगा कि आप वहां से क्यों गयी ?"
"अजीब आदमी हैं आप। मैं आपको कह रही हूं कि मुझे आपमें कोई इंटरेस्ट नहीं है और आप है कि वजह पूछ रहे हैं। तो सुनिए मैंने यहां एडमिशन अपनी पढ़ाई के लिए लिया है किसी की परफॉर्मेंस देखने के लिए नहीं"
"अरे आप तो गुस्सा कर गईं। मैंने तो सिर्फ इसलिए पूछा था ताकि मैं अपनी गलती को सुधार सकूँ"
मैंने उसे घूरकर देखा।
"अच्छा ठीक है आप मत सुनिए मेरा गाना। पर इतना तो बता सकती हैं कि आप किस स्ट्रीम की स्टूडेंट हैं ?"
"मुझे आपसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है और बेहतर होगा आप यहां से जाएं" क्योंकि चलते चलते हम काफ़ी दूर निकल आये थे।
"ठीक है अगर आप बात नहीं करना चाहती तो मैं चला जाता हूँ मगर याद रखिएगा एक दिन आप भी मेरा गाना जरूर पसन्द करेंगीं बाय"
उसके जाने के बाद मुझे बहुत गुस्सा आया।
"अगले दिन सुबह जैसे ही मैं कॉलेज में दाखिल हुए तो कुछ सीनियर लड़कों ने मुझपर तरह तरह के कमेंट करने शुरू कर दिए उनमें से कई ने मेरी रैगिंग करने की बात भी की। लेकिन फिर कुछ देर बाद ही वो सभी मेरे पीछे से मुड़कर वापिस चले गए।
जब मैंने सामने देखा तो विहान खड़ा था। मुझे लगा कि शायद ये कोई इतेफाक़ होगा मगर बाद में मुझे पता लगा कि कॉलेज के सभी लड़के विहान से डरते हैं क्योंकि वो कोई भी गलत हरकत बर्दाश्त नहीं करता है। ये सुनने के बाद मेरे दिल में उसके लिए कहीं न कहीं रीस्पेक्ट की जगह बन गयी थी।
अब वो मुझे उतना बुरा नहीं लगता था जितना पहले दिन लगा था। दरअसल वो बुरा था ही नहीं बस मैंने ही समझने में गलती कर दी थी। लेकिन मैं ये नहीं जानती थी कि उसके दिल में भी मेरे लिए एक खास जगह बन चुकी थी। क्योंकि मेरे ख्याल से तो उस के लिए कॉलेज में तमाम खूबसूरत लड़कियां मौजूद थीं।"
"और फ़िर एक दिन मेरे कुछ शरारती दोस्तों को मेरे साथ एक प्रेंक करने की सूझी। हालांकि उन्होंने अपनी पूरी तैयारी की थी लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि ये प्रेंक इतना सीरियस हो जाएगा।
उन्होंने मेरी आँखों पर पट्टी बंधी और बोला कि वो मुझे कुछ दिखाना चाहते हैं। मैंने भी कुछ नहीं कहा। और इस तरह वो मुझे कॉलेज की टैरेस पर ले गए और मुझे दीवार पर खड़ा कर दिया। उन्हें लगा था कि जब मैं ये देखूंगी तो डर जाऊंगी मगर इस से पहले वो लोग कुछ करते मैंने अपने पैर आगे टैरेस से नीचे बढ़ा दिए।"
"व्हाट ? ? ?" विशाल ने चौंकते हुए कहा।
"हां लेकिन मैं नीचे नहीं गिरी। जैसे ही मैंने अपनी आंखों से पट्टी उतारी तो देखा कि विहान ने मुझे गोद में उठा रखा है। जब मुझे सारा मामला समझ आया तो मैं खुद को इस तरह देख कर हड़बड़ाहट में नीचे उतर गई। इतने में मेरे सब दोस्त भी नीचे आ गए। पूरा कॉलेज इक्ट्ठा हो चुका था और उसके बाद विहान ने जो क्लास लगाई उन सबकी वो देखने लायक थी। उसे यूं उन सबको डांटते हुए देख मुझे यूं लगा जैसे कोई मेरा अपना मेरे लिए लड़ रहा हो। बचपन से कोई था ही नहीं जो इस तरह मेरे लिए रिएक्ट करता सिवाय मेरी नानी मां के।
"और आप मैडम" उसने मेरी तरफ देखते हए बोला।
"दूर रहिए ऐसे बेवकूफ़ दोस्तों से" उसने गुस्से में बोल तो मैंने चुपचाप सिर हिला दिया।
उस दिन के बाद वो हमेशा मुझे अपनी नज़र में रखता था। मैं कहीं छोटी सी मुसीबत में भी होती वो वहीं पहुंच जाता था। और इस तरह हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए।
जब से उसे पता चला था कि मुझे लिखने का शौंक है वो अपने लिखे हुए गाने सबसे पहले मुझे दिखाता और कहता कि मैं उन्हें चेक करूँ कि वो सही है या उसमें बदलाव की जरूरत है।
कभी-कभी वो मुझे कॉलेज से होस्टल छोड़ने भी जाता था और अब मुझे भी उसकी ये फिक्र अच्छी लगने लगी थी। सबके लिए हम भले ही दोस्त थे लेकिन हम दोनों ही एक दूसरे से मन ही मन प्यार करने लगे थे।"
उसे मुझे सरप्राइज देना पसन्द था। एक बार मेरे जन्मदिन पर उसने मुझे फुटबॉल ग्राउंड में बुलाया रात को। मुझे कुछ भी नहीं पता था कि उसने मुझे क्यों बुलाया है ? और जैसे ही मैं वहां पहुंची उसने मुझे अपने दोस्तों के साथ वहाँ लाइट्स, केक और म्यूजिक के साथ पहुंचकर चौंका दिया। मैं बहुत खुश थी और तभी उसने एक किताब मेरी और बढ़ाई और ये देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रह कि वो किताब मेरे नाम से पब्लिश हुई थी।
उसने मुझे बताया कि किस तरह उसने मेरी शायरी वाली डायरी चुराकर वो बुक पब्लिश करवाई।
और तब उसने मुझसे वादा लिया कि मैं कभी लिखना नहीं छोडूंगी।"
"और इस तरह डेढ़ साल बीत गया। मैं सेकेंड ईयर में हो चुकी थी और वो फाइनल ईयर में। अब हम ज्यादातर वक़्त एक दूसरे के साथ बिताते थे। मैं नानी से हमेशा विहान की बातें करती थी और उस से नानी के बारे में। नानी और विहान की बात भी अक्सर फोन पर होती थी। अब नानी भी उसे पसंद करने लगीं थीं।
और एक दिन वो मेरी आंखे बन्द कर के हॉल में ले गया। उसने बताया कि आज उसका जन्मदिन है। सभी स्टूडेंट्स उसका बर्थडे सेलिब्रेट करने के लिए वह मौजूद थे। और तभी उसने इन सबके सामने अपने घुटनों पर बैठकर मुझे प्रपोज़ कर दिया।
"मैं अपनी ज़िंदगी का हर साल अब से तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूं, क्या तुम मेरा साथ दोगी मायरा ?"
और चारों तरफ से 'से येस-से येस' की आवाज़ें आने लगीं। मैं हैरान थी ये सब देखकर, मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि ये सब सच है या एक सपना और फिर मैंने हाँ कर दी।
उसने रिंग मेरी उंगली में पहना दी। वो दिन मेरी ज़िन्दगी का सबसे ख़ुशनुमा दिन था।
उसके बाद से जैसे सब बदल गया। मैं कॉलेज में सबके लिए खास बन गई। विहान सब का चहेता था और मैं उसकी पसंद इसलिए अगर किसी कोई भी काम होता तो वो मुझसे सिफारिश के लिए आता।"
ये सोचकर मायरा हंसने लगी। लेकिन फिर एकाएक ख़ामोश हो गई।
"फिर क्या हुआ मायरा ?" विशाल ने उत्सुकता से पूछा।
"और मेरी खुशियों को नज़र लग गई। मेरी एक छोटी सी गलती मेरे लिए ज़िंदगी भर का नासूर बन गयी" और उसकी आँखों मे आंसू साफ झलक रहे थे।
"क्यों ऐसा क्या हुआ था ?"
"उस शाम मेरी दोस्त राधिका ने अपने घर पर एक पार्टी रखी थी और उसने मुझे कहा कि मैं भी आऊं। उसके बहुत ज़ोर देने पर मैं भी चली गयी। पार्टी में उसके और भी बहुत से फ्रेंड्स थे और उनमें से एक था अरनव जो विहान का बहुत अच्छा दोस्त था। वो एक बहुत अच्छा इंसान था और विहान की तरह ही मेरी भी बहुत इज़्ज़त करता था।
उस रात क़रीब पार्टी 1 बजे तक चली और फ़िर हम सब घर के लिए निकले। क्योंकि मैं होस्टलर थी और होस्टल राधिका के घर से काफी दूर था तो अरनव ने मुझे होस्टल तक छोड़ने के लिए पूछा। इतनी रात को अकेले जाने से अच्छा मुझे उसके साथ आना सही लगा और मैंने हां कर दी। उसने रास्ते में मुझे बताया कि वो राधिका से बहुत प्यार करता है लेकिन कभी उसे बोल नहीं पाया और इस मामले में मेरी मदद चाहता है। उसने बताया कि कल सुबह वो उसे प्रपोज़ करने वाला है और कहा कि अगर बात नहीं बनती है तो मैं सिचुएशन को संभाल लूं।
और इन सब में मैं ये भूल गयी कि मेरा फोन पिछली शाम से बैटरी न होने के कारण बन्द पड़ा है और बस यही भूल हो गई थी मुझसे।
हम लोग जैसे ही होस्टल के सामने पहुंचे मैंने देखा कि विहान अपनी गाड़ी के साथ वहां खड़ा था। उसे यूं इतनी रात को देखकर मैं हैरान हो गई।
मैं उतरकर उसके पास गई और पूछा।
"विहान तुम इस वक़्त यहां क्या कर रहे हो ?"
"कहां थी तुम ? और इस वक़्त अरनव के साथ कैसे ?"
"अरे वो मैं राधिका के घर पार्टी में थी और अरनव बस मुझे ड्राप करने आया था"
"क्या हुआ विहान सब ठीक है ?" अरनव ने पूछा तो विहान ने उसे हाथ से जाने का इशारा किया। वो अपनी गाड़ी लेकर चल गया।
"तुम्हारा फोन कहां है ?" उसने फिर से उसी सख़्त लहज़े में मुझसे पूछा।
"फोन तो वो तो बैटरी न होने के कारण ऑफ है, लेकिन बात क्या है विहान। तुम कुछ बताओ तो"
"बात थी लेकिन अब कोई बात नहीं है" उसके चेहरे पे गुस्सा साफ झलक रहा था।
"मतलब ?"
"मतलब ये कि मैं तुम्हें कल शाम से फोन लगा रहा हूँ लेकिन नहीं लग रहा है। जानती हो क्यों ? क्योंकि मैं तुम्हें घर ले जाकर मॉम-डैड से मिलवाना चाहता था। लेकिन तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है। एक बार किसी के फोन से मुझे बता भी सकती थी कि तुम राधिका के घर पर हो। कल शाम से मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ" उसका ये गुस्सा देखकर मैं डर गई।
"आई एम सॉरी मैं भूल गयी थी रियली सॉरी विहान, प्लीज़ तुम ऐसे गुस्सा मत करो"
"ठीक है, मैं गुस्सा नहीं करूंगा लेकिन अब मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है"
"विहान ये तुम क्या कह रहे हो ?" मैं विहान के उस तरह के बर्ताव से हैरान थी क्योंकि शायद ये पहली बार था जब वो ऐसे बात कर रहा था।
उसने गुस्से में मेरी कोई बात नहीं सुनी और वो वहां से चल गया। मुझे अंदर से बहुत बुरा लग रहा था। लेकिन मुझे विश्वास था कि सुबह तक सब ठीक हो जाएगा।
इसकी मैं भी चुपचाप होस्टल चली गई।"
"अगली सुबह जब मैं कॉलेज पहुंची तो मेरी नज़रें विहान को ढूंढ रही थी और तभी एकदम से अरनव मेरे सामने गुलाब लेकर आ गया।
"ये सब क्या है अरनव" मैंने इर्रिटेट होते हुए बोला।
"अरे यार कल यूं ही बेवजह तुम्हारे और विहान के बीच अनबन हो गई। ये उसकी सोलुशन है। तुम जाकर उसे ये गुलाब दे दो और फिर देखो वो कैसे एक सेकेंड में मान जाता है"
"मुझे नहीं लगता"
"अरे ट्रस्ट मी उसका गुस्सा बहुत कम टाइम के लिए होता है और फिर तुम उसे फिल्मी अंदाज़ में ये गुलाब देना" उसने अपने घुटनों पर बैठते हुए प्रपोज़ करने की एक्टिंग करते हुए कहा।
और तभी मैंने देखा कि विहान हमें दूर से खड़ा गुस्से से देख रहा था। मुझे लगा कि बात और न बिगड़ जाए इसलिए मैं उसके पीछे भागी पर इस से पहले मैं उसके पास पहुंचती वो गाड़ी लेकर कॉलेज से बाहर निकल गया। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? फिर मैंने एक कागज पर कविता लिखी और उसके आने का इंतज़ार करने लगी। मुझे यकीन था कि जब मैं उसे ये दूंगी तो इसे पढ़कर वो अपना गुस्सा भूल जाएगा। मगर " कहते कहते मायरा रुक गई।
"मगर क्या ?"
"मैं शाम तक उसका इंतजार करती रही लेकिन वो नहीं आया। उसका इंतजार करते-करते 9 बज गए और गेटकीपर ने मुझसे कहा कि अब मैं जाऊं क्योंकि अब गेट बन्द करने पड़ेगा। मैं वहां से होस्टल आ गई। लेकिन न ही उसका कोई फोन आया न ही कोई मैसेज। और तो और उसका फोन भी बंद था। मैं अंदर ही अंदर घबरा गई थी। इंतज़ार करते करते रात के 2 बज गए। तभी मेरे फोन पर एक अननोन नम्बर से कॉल आया। वो फोन सिटी हॉस्पिटल से था। फोन करने वाले ने बताया कि उन्हें कार एक्सीडेंट में एक आदमी की लाश मिली है। कार का नम्बर सुनकर मेरे होश उड़ गए। वो विहान की ही कार थी"
मुझे लगा कि जैसे मेरी सारी दुनिया एक पल में तबाह हो गई। मुझे मेरे कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने जल्दी से वॉर्डन को सब बताया और हॉस्पिटल के लिए निकल गयी।
मैं जब हॉस्पिटल पहुंची तो वहां विहान के मॉम डैड पोस्टमार्टम रूम के बाहर बैठे थे। उन्हें देख कर मैं बुरी तरह डर गई। जब उसकी मां ने मुझे देखा तो वो गुस्से से पागल हो गईं।
"तुम्हीं हो न वो जिसने मेरे बेटे को मुझसे छीना है क्या चाहती थी तुम क्या लेने आई हो अब यहां मर चुका है वो सुना तुमने मर चुका है वो" उनके ये शब्द सुनकर मैं सुन्न रह गई।"
मायरा की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।
"वो बोलती रहीं उनकी नज़र में मैं उनके बेटे की मौत की जिम्मेवार थी और एक मायने में ये सच ही था।
"तुमने मेरे बेटे को मारा है अब चली जाओ इस से पहले की मैं कुछ कर बैठूं"
"आंटी प्लीज़ मुझे एक बार विहान को देख लेने दीजिए प्लीज़ आण्टी" मैं उनके सामने गिड़गिड़ाते हुए घुटनों पर बैठ गई।
"खबरदार जो अब मेरे बेटे के नज़दीक भी गयी जीते जी उसे छोड़ा नहीं अब मरने के बाद भी तू उसके पास जाए ये मैं नहीं होने दूंगी। तुझे कोई हक नहीं है उसका चेहरा देखने का। और अगर तुझे जरा सा भी उस से प्यार था तो अभी के अभी यहां से चली जा। मुझे तेरी शक्ल भी नहीं देखनी।" और मेरे लाख मिन्नतें करने के बाद भी वो नहीं मानी। मुझे मुझे विहान की लाश तक देखने को नहीं मिली"
ये कहते हुए मायरा फूट-फूट कर रोने लगी।
विशाल ने उठकर उसे गले से लगा लिया। उसकी आंखें भी नम हो चुकीं थीं।
"विहान की मौत के बाद मैं पूरी तरह टूट चुकी थी। मेरे दिल में हमेशा विहान की मौत का बोझ रहता था। मैं ना कॉलेज जाती थी और न किसी से मिलती थी। ज़िंदगी जैसे ख़त्म हो गई थी मेरे लिए। इस हादसे को एक महीना बीत चुका था। तभी मुझे मेरी दोस्त ने बताया कि बाहर विहान के कुछ दोस्त मुझसे मिलने आए हैं।
मैं बड़े बेमन से उनसे मिलने गई। उनमें अरनव भी शामिल था।
"मायरा जो कुछ भी हुआ हम सब जानते हैं कि उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है लेकिन तुम खुद के साथ ऐसा कर के विहान को धोखा दे रही हो। क्या विहान खुद कभी चाहेगा कि तुम अपनी ज़िंदगी ऐसे जिओ ?"
मैंने खामोश चेहरे से उन सबकी ओर देखा।
"मायरा पूरा कॉलेज तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है क्योंकि सब जानते हैं कि अगर तुम आओगी तो कहीं न कहीं उन्हें विहान अपने बीच दोबारा से मिल जाएगा। प्लीज़ मायरा अगर तुम सच में हमे अपना दोस्त मानती हो तो फिर से कॉलेज आना शुरू कर दो"
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था लेकिन उन सबके ज़ोर देने पर मैंने हां कर दी।
और जब मैं कॉलेज गयी तो मैं ये देखकर हैरान थी कि सभी ने मुझे वैसे ही प्यार और इज़्ज़त दी जैसे वो विहान को देते थे। सब मेरा हर वक़्त ख्याल रखते थे। और जब मैंने कॉलेज छोड़ा उस दिन सभी की आंखे नम थी।"
"और उसके बाद मैं वापिस मनाली आ गई और यहीं एक कॉलेज में लिटरेचर पढ़ाना शुरू कर दिया। हालांकि मैंने विहान को किए वायदे को निभाया, कभी लिखना नहीं छोड़ा। वो कागज़ जो तुमने मुझे उस दिन वापिस किया था उसपर वही कविता लिखी थी जो मैं उसे देना चाहती थी लेकिन ज़िंदगी ने मुझे इतना भी मौका नहीं दिया और तब से उसे मैं हमेशा अपने साथ रखती हूं इससे मुझे ऐसा लगता है कि वो हमेशा मेरे साथ है"
कुछ पल के लए वहां एक ख़ामोशी ने जगह ले ली।
"अब मैं क्या कहूँ तुम सच में बहुत मज़बूत हो। इतने वक़्त तक ये बोझ अपने दिल पर लेकर जीती रही और किसी से एक शब्द भी नहीं कहा। मैं सच मे बहुत खुशकिस्मत हूं कि मैंने तुमसे प्यार किया। और मैं तुम्हें आज एक वादा करता हूँ कि चाहे तुम मुझे प्यार करो या न करो, चाहे तुम मुझे मिलो या न मिलो मैं तुम्हें हमेशा यूँ ही प्यार करता रहूंगा"
"वो तो ठीक है लेकिन अब आगे क्या करना है ?" मायरा ने सवाल किया।
"करना क्या है, चूँकि अब मैं तुम्हारी न की वजह जानता हूँ तो कभी भी दोबारा तुमसे इस बारे में कुछ नहीं पूछुंगा और अब जिस काम के लिए आया था वो तो हुआ नहीं तो कल ही वापिस जा रहा हूं। लेकिन जाने से पहले मुझे तुमसे कुछ चाहिए"
"क्या ?"
"एक वादा कि चाहे कुछ भी हो जाये तुम अपने होठों पर यूं ही मुस्कान रखोगी हमेशा। इसे कभी गुम नहीं होने दोगी। बोलो मंजूर ?"
मायरा ने हां में सिर हिला दिया
विशाल मनाली से खाली हाथ ही वापिस आ गया था लेकिन इस बार उसके दिल में एक सुकून था। और अब उसके दिल मे मायरा के लिए प्यार और इज्ज़त दोनों ही और बढ़ गए थे।
घर पहुंचकर उसने सोचा कि पापा से इस बारे में बात करे पर वो काफ़ी बिज़ी थे। फिर एक दिन उन्होंने खुद ही उस से इस बारे में पूछा।
"तो बरखुर्दार बात कहां तक पहुंची ?, मायरा ने हां की या नहीं ?"
"नहीं पापा, उसका जवाब नहीं बदला लेकिन हां अब मैं उसके इनकार की वजह जनता हूं और सच कहिए अब मुझे उसकी न से कोई एतराज नहीं है"
"अच्छा ज़रा मुझे भी बताओगे, उसने ऐसा क्या कहा। हम वादा करते हैं कि ये बात सिर्फ हम दोनों के बीच रहेगी"
और फिर विशाल ने उन्हें सब बता दिया जो कुछ मायरा के साथ हुआ। ये सब सुनकर मिस्टर वरदान किसी सोच में डूब गए।
"क्या हुआ पापा, आप कहां खो गए ?"
"कुछ नहीं बेटा, अच्छा तुम्हारे पास उस लड़के विहान की कोई फोटो है या मायरा ने तुम्हें कभी दिखाई हो"
"हां एक मिनट रुकिए" विशाल ने कुछ सोचकर कहा क्योंकि उस याद आया कि विहान की एक फोटो मायरा की उस डायरी में थी जो उस आग वाले हादसे के दिन उसके साथ ही उसके सामान में आ गई थी। लेकिन मायरा को लगता था कि वो डायरी जल चुकी है।
विशाल ने वो फोटो लाकर अपने पापा को दिखाई।
उसे देखते ही उन्हें एक बड़ा झटका लगा।
"ओह गॉड ये नहीं हो सकता" उनके मुंह से निकला।
"क्यों आप ऐसा क्यों कह रहे हैं क्या नहीं हो सकता ? बोलिए पापा बताइए"
और फिर उन्होंने जो बताया वो विशाल के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। उसकी जिंदगी की इतनी बड़ी हकीकत जिससे वो इतने वक़्त से अनजान था आज उसके सामने खड़ी थी। और वो हकीकत कुछ ऐसी थी।
"आज से 2 साल पहले की बात है बेटा जब डॉक्टरों ने कह दिया था कि तुम अब ऐसे दिल के साथ नहीं जी सकते जिसमें एक छेद है। उन्होंने कहा कि अब कोई रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि कोई तुम्हें अपना दिल ट्रांसप्लांट के लिए दे। मैं और हमारे जानकार डॉक्टर्स ने बहुत कोशिश की लेकिन ऐसा कोई नहीं मिला। और फिर एक दिन तुम्हारी हालात गम्भीर हो गई और हमें तुम्हें हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा"
"हां पापा मुझे अच्छे से याद है लेकिन मेरी सर्जरी का इन सबसे क्या लेना-देना"
"उस रात तुम बेहोश थे और हमें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। डॉक्टर्स जवाब दे चुके थे कि अगर कोई दिल मिला तो ठीक वरना हम तुम्हें खो देंगे। मैं उस वक़्त तुम्हें बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था। और तभी मुझे पता चला कि हॉस्पिटल में एक एक्सीडेंट केस आया है और उस लड़के की हालत बहुत गम्भीर है। मैंने डॉक्टर से उसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक्सीडेंट बहुत बुरा था और उसके बचने के आसार कम हैं। उन्होंने बताया कि अब तक कोई भी उस लड़के के घर से नहीं या है। मैं वहीं इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में ही मालूम हुआ कि वो लड़का मर चुका है। डॉक्टर्स उसे लावारिस लाश समझकर ले जा ही रहे थे कि तभी मैंने उनसे गुजारिश की की वो उसका हार्ट तुम्हें ट्रांसप्लांट कर दें। मेरे ज़ोर देने पर वो लोग मान गए।
और उस लड़के का दिल सर्जरी से तुम्हारे अंदर ट्रांसप्लांट कर दिया गया। लेकिन बाद में मैंने देखा कि उसके मां-बाप भी आ गए थे। हालांकि मैंने और डॉक्टर्स ने उन्हें सब बता दिया था। उसके बाप ने कहा कि अब उनका बेटा तो रहा नहीं कम से कम उसकी वजह से मेरा बेटा तो ज़िंदा है।
और वो लड़का कोई और नहीं विहान ही था"
ये कहकर वो चुप हो गए।
"विहान ! ! !" विशाल इस सच को सुनकर दंग रह गया। जिस लड़के ने उसे दिल देकर उसकी जान बचाई और जिसे मायरा इतना प्यार करती थी वो दोनों एक ही थे उसके सीने में इस वक़्त विहान का दिल धड़क रहा था।
धीरे-धीरे उसके सामने सब आने लगा। कैसे वो तब उस से पहली बार मिला और उसकी जान बचाई। कैसे जब वो उस से बात करने गया तो ऐसा लगा कि जैसे वो उसे बहुत पहले से जनता है। जब भी वो उसे देखता था उसे लगता था कि वो दोनों एक-दूसरे से हमेशा से जुड़े थे। उसे मायरा की वो सब बातें याद आने लगी जो उसने विहान के बारे में कही थी।
वो सोच रहा था कि "अगर मायरा को इस बात का पता चलेगा तो उसे कैसा लगेगा। क्या सोचेगी वो उसके बारे में ?"
इसी कशमकश में तीन दिन बीत गए।
अगली शाम उसके पास नानी का फोन आया।
"हेलो विशाल बेटा कैसे हो तुम ?"
"मैं ठीक हूं नानी, आप कैसी हैं ? और मायरा वो कैसी है ?"
"मैं ठीक हूं लेकिन बेटा तुम मायरा को रोक लो। वो मेरी बात नहीं सुन रही है"
"आप क्या कह रही हैं, साफ-साफ बताओ
"मायरा ने अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी में अप्लाई किया था और वो अप्रूव हो गया है। वो कल ही जा रही है बेटा। उसने मुझे भी आज ही बताया है। बेटा उसे रोकलो। एक तुम ही हो जो फिर से उसे जिंदगी जीना सीख सकते हो। तुम ही उसे इस अंधेरे से बाहर निकल रखते हो मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ उसे रोक लो बेटा"
"नानी आप फ़िक्र मत कीजिए मैं अभी आ रहा हूँ वहां" कह कर विशाल ने फोन रख दिया।
उसने अपने माँ-पापा को सब बताया तो उन्होंने भी उसे जाने की इजाज़त दे दी।
वो उसी वक़्त मनाली के लिए निकल पड़ा। लेकिन दुर्भाग्यवश उस रात मौसम कुछ ज्यादा ही खराब हो गया और रास्ते में भारी बारिश और पहाड़ी रास्ता होने के कारण विशाल की गाड़ी एक पेड़ से जा टकराई। उसे बुरी तरह चोट आई थी। वो तो वहां से गुजर रहे लोगों ने उसे वक्त से हॉस्पिटल पहुंचा दिया।
बहुत तेज़ बारिश हो रही थी आज और फिर अचानक से तड़ाक की आवाज़ के साथ एक के बाद एक दीवार पर लगी दो तस्वीरें नीचे गिर कर चूर हो गईं। कमरे में इतना सारा टूटा कांच देखकर मायरा एकदम डर गई।
"ये सिर्फ तूफान के कारण था या कोई अनहोनी का इशारा ?" उसने बाहर जाकर देखा नानी अपने कमरे में सो रहीं थी।
उसने विशाल को फोन मिलाया लेकिन वो भी बंद था। उसे बेहद घबराहट होने लगी ठीक ऐसे ही जैसे उस दिन विहान के न आने पर हुई थी। वो सुबह होने का इंतजार करने लगी।
सुबह उसके फोन पर रिंग बजी। उसने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज़ आई
"हेलो मायरा बेटा मैं विशाल का डैड बोल रहा हूँ। तुम जल्दी से हॉस्पिटल आ जाओ कल रात विशाल का एक्सीडेंट हो गया है। तुम जल्दी से आ जाओ"
ये सुनकर मायरा बेहोश होते-होते बची। उसने रोते हुए सब नानी को बताया और उन्हें लेकर तुंरत हॉस्पिटल पहुंची। वहां विशाल के मां पापा पहले से ही मौजूद थे।
उसे देखते ही विशाल की माँ ने उसे गले से लगा लिया।
"बेटा हमें माफ कर दो हम भी तुम्हारे गुनाहगार हैं"
"ये आप क्या कह रहीं है आंटी ?, विशाल कैसा है ?" मायरा ने हैरान होते हुए पूछा।
"वो ठीक है बेटा अभी खतरे से बाहर है। लेकिन उस से पहले कि तुम उस से मिलो मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं"
और फिर विशाल के डैड ने मायरा को विशाल और विहान से जुड़ी सारी सच्चाई बता दी जिसे सुनकर मायरा को एक और झटका लगा।
"बेटा हमें माफ करदो"
"माफी किसलिए अंकल जो कुछ भी मेरी और विहान किस्मत में लिखा था वो तो होना ही था। उसमें आप लोगों का क्या कुसूर। आपने तो एक बाप के नाते उस वक़्त जो सही था वही किया"
मायरा ने उन्हें समझाते हुए कहा।
"क्या मैं उस से मिल सकती हूं ?"
"हां बिल्कुल"
और मायरा उस कमरे की तरफ बढ़ने लगी जिसमें विशाल था। उसे एक-एक कर के सब याद आ रहा था कि किस तरह विहान के जैसे ही उसने हर बार उसकी जान बचाई थी। क्यों वो हर वक़्त ये महसूस करती थी कि विहान उसके साथ है जब भी विशाल उसके साथ होता था।
वो धीरे से कमरे में दाखिल हुई। विशाल आंखे बंद किए हुए लेटा था। उसने धीरे से जाकर उसे पुकारा।
"विशाल"
उसने आंखे खोली तो देखा सामने मायरा खड़ी थी। उसके होठों पर एक सुकून वाली मुस्कान थी।
"तुम कब आईं ?"
"शशशशशशश " मायरा ने उसके मुंह पर उंगली रखते हुए कहा।
"तुम्हें क्या लगा था कि तुम मुझे नहीं बताओगे तो मुझे पता नहीं चलेगा"
"क्या"
"यही की ये जो खूबसूरत सा दिल तुम लिए फिरते हो ये किसी और का नहीं बल्कि उसका है जिस से मैं बहुत प्यार करती हूं" कहते हुए उसकी आँखों मे आंसू आ गए।
"लेकिन मायरा मैंने तुम्हारे प्यार का दिल चुराया है सज़ा तो मुझे मिलनी चाहिए थी"
"हां और इसी वजह से तुम यहाँ हॉस्पिटल में आ गए है न ? लेकिन मैं तुम्हें इसके लिए माफ नहीं करूंगी" मायरा ने झुठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।
"ये क्या बात हुई ? नाराज़ तो मुझे तुमसे होना चाहिए। तुम इस दिल और मुझे दोनों को छोडकर जा रही थी। ये कहां का इंसाफ है ?"
"हां मैं जा रही थी लेकिन अब नहीं जा रही हूं क्योंकि मैं एक बार अपना प्यार खो चुकी हूं दोबारा नहीं खोना चाहती" मायरा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
"तो क्या तुम सच में मेरा साथ दोगी ?"
"हां अब मेरी अमानत जो तुम्हारे पास है" कहते हुए मायरा हंस पड़ी।
बाहर खिड़की से देखते हुए नानी खुश थी कि भगवान के खेल ने एक बार फिर से दो 'दिलों के तार' को मिला ही दिया था।

"समाप्त"
 
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Blues Bane

Shastra Uthao Parth
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Nyay Ka Doosra Naam​

Raat ke kareeb gyarah baje the jab Armaan Qureshi ne purani district court ki building ke saamne apni bike roki. Baarish thodi der pehle hi ruki thi, isliye sadak par streetlight ki peeli roshni paani ke patle jamaav mein toot kar padi thi. Court ki building din mein bhi aadhi mari hui lagti thi, raat mein to aur zyada. Seedhiyon ke paas ek chowkidar kursi par jhuk kar so raha tha. Gate ke ek kone par gutkhe ki laal dhaari neeche tak sookh chuki thi. Armaan ne helmet utara, bike ka stand maara aur seedha andar chala gaya jaise us jagah par uska haq ho.

Uska wahan haq waise tha bhi. Official taur par woh wahan kuch nahi tha. Na vakil, na clerk, na police. Par asal mein bahut si files uske haath se guzarti thi, bahut se logon tak paise usi ke zariye pahunchte the, aur bahut se faisle likhe jaane se pehle hi usse pata hote the. Shehar ke aadhe police waale uska naam jaante the aur aadhe neta uska number. Agar kisi ko bail jaldi chahiye, kisi gawah ko gaayab karna ho, kisi complaint ko thoda dheema karna ho, kisi report ki copy ko raste mein rokna ho, Armaan kaam aa sakta tha.

Armaan khud ko bura aadmi nahi maanta tha. Woh aksar kehta tha, duniya do hisson mein banti hai. Ek woh log jo system ko samajhte nahi aur uske neeche pise rehte hain, aur doosre woh log jo system ko samajh kar uska istemal kar lete hain. Uske hisaab se woh bas doosri category mein tha. Chaalak. Practical. Seedha bolun to fayde ka bhooka. Magar har bhook buraai nahi hoti, yeh baat woh khud ko roz samjhata tha.

Us raat woh record room ke peeche wale hisse mein gaya jahan purani file racks ke beech ek chhota sa daftar tha. Wahin Judge S. N. Tandon ka peshkar uska intezar kar raha tha. Mej par ek brown envelope pada tha. Peshkar ne envelope uski taraf sarakaya. "Bas itna hi hai," usne dheere se kaha, "baaki kal order copy nikalte hi mil jayega."

Armaan ne envelope khola nahi. Wazan se hi andaza ho gaya. Kaafi tha. Usne envelope jacket ke andar rakha aur file par nazar dali. Naam likha tha, Nilesh Pawar vs State. Usse yaad aaya. Road rage ka case. Ek aadmi ko gaadi se kuchal diya gaya tha. Driver nasha ki haalat mein tha. Driver ke baap ka naam zyada bhaari tha, marne wale ka ghar zyada kamzor. Kal interim relief mil jayegi, phir baaki sab dheere dheere khisak jayega.

"Family bahut royi thi," peshkar ne aadhi muskaan ke saath kaha.

Armaan ne kandhe uchka diye. "Family roti hi hai."

Seedhiyon se neeche utarte hue usne court ke verandah mein baithi ek aurat ko dekha. Godh mein aadha soya hua bachcha, pairon ke paas thaila, aankhon ke neeche do din ki neend ki kami. Shayad wahi family thi. Aurat usse dekh kar ek pal ko khadi hui. Jaise pehchaan gayi ho. Jaise kuch kehna chahti ho. Armaan ne nazar hata li. Is shehar mein sabse sasta samaan aankhon ka milna tha aur sabse mehnga unmein thoda sa ruk jaana.

Bahar nikal kar usne cigarette sulgaai. Pehla kash hi liya tha ki uske phone par call aayi. Maa ka naam flash hua. Usne do second dekha aur receive kar liya.

"Kab aaoge?" Maa ne poocha.

"Kaam par hoon."

"Rabiya pooch rahi thi."

Armaan ne pal bhar aankhen band ki. Rabiya uski chhoti behen thi. Bachpan se uski aadat thi ke jab bhi Armaan ghar der se aata, woh jag kar baithi rehti. Ab woh badi ho gayi thi, college jaati thi, par aadat nahi gayi thi.

"Bol dena der ho jayegi," Armaan ne kaha.

Maa kuch der chup rahi. Phir boli, "Beta, kal us ladki walon ke ghar jaana hai. Kam se kam kal seedha ghar aa jaana."

Armaan ne halka sa hansa. "Main koi seedha aadmi lagta hoon, Ammi?"

Maa ne jawaab nahi diya. Bas call kaat di.

Armaan ne cigarette aadhi chhod kar neeche phenki aur bike start kar di. Raat aur tez thandi ho gayi thi.

Ghar pahunchte pahunchte aadhi raat ho gayi. Unka makaan purane shehar ke us hissa mein tha jahan galliyan itni tang hoti hain ki do aadmi kandha jod kar niklen to teesre ko deewar se chipakna pade. Upar do kamre, neeche chhota sa aangan. Maa so chuki thi. Rabiya sach mein jag rahi thi. Dining table par books khuli thi, par uski aankhen Armaan par.

"Phir late," usne kaha.

Armaan ne jacket kursi par phenki. "Tum so kyun nahi jaati?"

"Wajah aap ho."

"Drama band karo aur paani do."

Rabiya uth kar rasoi se steel ka glass le aayi. Armaan ne aadha ek saans mein piya. Rabiya usse dekhti rahi. "Aap phir paisa laaye ho?" usne poocha.

Armaan ne uski taraf dekha. Sawal seedha tha, isliye chubha.

"To?"

"To kuch nahi. Bas pooch rahi thi. Har baar jab aap itna chup hote ho na, tab ya to kisi ko dara ke aate ho ya paisa le ke."

Armaan ne glass mej par rakha. "Tumhe bahut samajh aane laga hai."

Rabiya palatne lagi, phir ruki. "Bhai, kabhi kabhi lagta hai aap khud ko bhi justify karte karte thak jaoge."

Armaan ne thoda sa hansa, par us hansne mein thakan thi. "Insaan tabhi thakta hai jab galat ho. Main practical hoon."

Rabiya ne seedha kaha, "Har practical aadmi baad mein bura hi nikla hai."

Woh andar chali gayi. Armaan ka mann hua jawab de, par nahi diya. Usne jacket uthai, envelope nikala, note ginne laga. Saat minute baad jab sab alag alag dheron mein rakhe hue the, usse mehsoos hua ki kamre ki hawa thodi badal gayi hai.

Pehle usne socha bijli chali gayi ya voltage gira hai. Phir usne sar uthaya.

Aangan ke bilkul beech, jahan chhat khuli thi aur baarish ka paani gir kar nali mein chala jaata tha, hawa ka ek gola sa jam gaya tha. Safed nahi, lekin bilkul andhera bhi nahi. Jaise chandi ko kisi ne paani mein ghola ho aur woh thahar gaya ho. Us gole ke andar kuch chal raha tha. Roshni? Dhua? Pata nahi. Armaan khada ho gaya.

"Kya bakwaas hai..." usne dheere se kaha.

Woh cheez dheere dheere uski taraf sarakne lagi. Armaan peeche hata. Kursi takra kar gir gayi. Maa ke kamre ka darwaza andar se hila, par khula nahi. Gola rukka nahi. Agle pal woh seedha Armaan ke seene se takra gaya.

Takrana bhi sahi lafz nahi tha. Jaise koi cheez andar ghus gayi ho. Seedha haddi ke beech.

Armaan ki saans band ho gayi. Ghutne jhuk gaye. Aankhon ke saamne do second ke liye sirf safedi thi. Phir ek awaaz.

Bina muh ke. Bina disha ke.

"Dharak chuna gaya hai."

Usne apne kaan pakde, par awaaz kaan se nahi aayi thi. Awaaz uske andar thi.

"Kaun?" usne ghut kar poocha.

Koi jawab nahi.

Sirf seene ke beech jalti hui ek patli rekha. Jaise kisi ne tapte taar se chinh bana diya ho.

Subah usse halka bukhar tha. Maa ne poocha to usne kaha raat ko baarish mein bheeg gaya tha. Rabiya ne uske seene par patti jaise nishan dekha to poocha, "Yeh kya hai?" Armaan ne jhooth bol diya, "Bike se garam silencer lag gaya." Jhooth uski zabaan par itna aasaan chadhta tha ki use kabhi kabhi hairani hoti thi log sach bolte kaise honge.

Dopehar tak usse lagne laga ki raat wali baat ya to sapna thi ya bukhar ka asar. Phir woh bazaar gaya aur sab kuch badal gaya.

Sabzi mandi mein bheed thi. Paani ke gaddhon ke beech log pair bachate hue chal rahe the. Ek thele waala aadmi kisi aurat se chillaa raha tha ki poore paise do. Armaan ne uski taraf dekha aur jam gaya. Us aadmi ke kandhon par kuch latka hua tha. Bilkul waisa nahi jaisa kisi bhooke insaan ya thake hue mazdoor par hona chahiye. Yeh kuch aur tha. Kaala. Bhaari. Taana bana hua. Jaise kala dhua patli rassein ban kar uske seene aur gardan se bandha ho.

Armaan ne palat kar doosre aadmi ko dekha. Us par patla sa dhabba. Teesri aurat par kuch nahi. Chauthe buzurg par itna bhaari bojh jaise unke andar puri raaton ki cheekh jam gayi ho.

Usne aankhen mali. Phir dekha.

Sab waisa hi tha.

Ghar lautne ke bajaye woh poore shehar mein ghoomta raha. Kotwali ke bahar khade havaldar par mail ki moti parat. Masjid ke bahar jooton ki raksha karne wale buddhe par halka sa dhua. Ek school ki ladki par kuch bhi nahi. Do bhaiyon ke beech jhagde mein bade wale par kaala bojh aur chhote wale par bas dard. Armaan ko dheere dheere andaza hua ki jo woh dekh raha hai, woh logon ke kapde ya sharir par nahi, unke andar ki kisi cheez par latka hua hai.

Raat ko usne ek aur baat samjhi. Yeh bojh hilaya bhi ja sakta tha.

Us raat woh Kothari ke farmhouse par tha. Wahan ek chhota sa jashn tha. Koi deal pass hui thi. Daaru chal rahi thi. Kothari, mota aur hamesha muskurata hua, sab ko kandhe par haath rakh rakh kar baat kar raha tha. Armaan ne pehli baar use us nazar se dekha jo usse ab mil chuki thi. Kothari ke kandhon par andhere ka poora godaam latka tha. Patli rassein, gehri dhadkanein, sookhi hui cheekhon jaisa kuch. Armaan usse dekhte dekhte uske paas gaya. Kothari kisi MLA ke bhanje ko samjha raha tha ki road widening ka tender kaise niklega. Armaan ne haath badhaya. Bas aadat se. Jaise dekh raha ho ki sach hai bhi ya nahi.

Aur andhera hil gaya.

Armaan ek pal ko kaanp gaya. Phir usne dobara haath badhaya. Is baar andhere ka ek tukda Kothari se alag hua aur seedha Armaan ke haath, ya kehna chahiye haath ke andar, aa gaya. Itna bhaari ki uske daant apne aap bhid gaye. Kothari ne achanak gardan seedhi ki aur thoda halka sa hans diya. "Armaan, aaj pata nahi kyun mood bahut achha hai," usne kaha.

Armaan ki nazar lawn ke doosre kone par khade waiter ladke par gayi. Bahut patla. Shayad unnis bees saal ka. Darte hue glass utha raha tha. Armaan ne bas socha, kya hota hai agar...

Andhera us ladke par chala gaya.

Woh turant jhuk gaya. Tray haath se chhoot gayi. Glass toot gaye. Sab log mud kar dekhne लगे. Kothari zor se hansa. "Hatt yaar, haramkhor ko khada bhi nahi hua ja raha," usne kaha.

Waiter ladke ke chehre par aisi thakan aa gayi jaise usne ek pal mein das saal budhapa jee liya ho.

Armaan raat bhar soya nahi. Use dar bhi laga aur nasha bhi. Pehli baar uske paas aisi cheez thi jo paise se badi thi. Faisla. Asar. Ikhtiyar. Agar kisi ka bojh kam kar sakta hai aur kisi par daal sakta hai, to matlab woh us cheez ko chhoo raha hai jise duniya taqdeer, paap, saza, hisaab, sab kuch bolti hai.

Uske baad usne dheere dheere khel shuru kiya.

Pehla shikar ek daroga tha jo bina paise FIR nahi likhta tha. Armaan ne uska andhera ek pocketmaar par daal diya jo waise hi jail ki hawa khata rehta tha. Daroga do din tak ajeeb narmi से baat karta raha. Pocketmaar ne andar jaakar apne hi haath kaat liye.

Phir ek aadmi jo roz biwi ko peetta tha. Uska bojh ek nashedi par. Phir ek builder jo do mazdooron ki maut daba chuka tha. Uska bojh ek chhote gunde par. Armaan ke dimaag mein hisaab saaf tha. Jo waise hi gandagi mein jee rahe hain, un par thoda aur bojh daal dene se duniya ka santulan nahi bigadta. Par jinke upar se bojh hatega, woh better behave karenge. System saaf hoga. Shehar behtar hoga.

Usse lagne laga tha shayad use hi is kaam ke liye chuna gaya hai. Shayad isliye kyunki woh system jaanta tha. Shayad ek seedha aadmi itna practical hisaab nahi laga pata. Shayad nyay karne ke liye thoda ganda hona padta hai.

Isi dauraan uski mulaqat Ira se hui.

Ira Deshmukh ek journalist thi. Local paper mein kaam karti thi, lekin woh un local reporters jaisi nahi thi jo press release ko news bana dete hain. Woh jiddi thi. Kisi case ko pakad leti to uske peeche pad jaati. Pehli baar Armaan ne use district court ke bahar dekha. Do files baahon mein, baal aadhe khule, aankhen seedha dekhne wali. Woh ek hit and run case ke baare mein kisi clerk se ulajh rahi thi. Clerk jhooth bol raha tha. Ira uski baat kaat kar keh rahi thi, "File ya to andar hai ya gayab hai. Teesra option nahi hota."

Armaan use dekhta reh gaya, kyunki uske kandhon par kuch bhi nahi tha.

Bilkul saaf.

Usne pehle socha shayad roshni ka khel hai. Phir do din baad usne use dobara dekha. Phir bhi saaf.

Ira se milna mushkil nahi tha. Woh har doosre din court ke aas paas hi hoti. Armaan ne pehle uski help ki. Ek certified copy jaldi nikalwa di. Phir ek witness ka address. Phir chai. Ira ne shuru mein us par bharosa nahi kiya. "Aap itne help kyun kar rahe hain?" usne poocha.

Armaan ne muskurakar kaha, "Shayad image sudhar raha hoon."

Ira ne hans kar jawab diya, "Jinki image kharab hoti hai na, woh sudharne se pehle do teen aur kaand karte hain."

Armaan ko uske saath baithna achha lagne laga. Woh seedhe sawaal karti thi aur jawaab half cooked pasand nahi karti thi. Kabhi kabhi uski baaton se Armaan ko chid hoti thi, kabhi khud par hansi. Ira sach mein believe karti thi ki kuch cases lad kar jeete ja sakte hain. Ki public pressure ka matlab hota hai. Ki institutions poori tarah mare nahi hote. Armaan use dekh kar sochta, kitni ajeeb baat hai. Is aurat ke kandhon par kuch nahi, aur dimaag mein itna bhaar.

Phir woh din aaya jahan se sab ulat gaya.

Shehar ke bahar ek chhote se gaon mein police firing hui. Official version tha ki log violent ho gaye the. Unofficial version tha ki zameen ke mamle mein Kothari ne police lagwa di thi. Firing mein ek ladka mar gaya. Naam tha Samar Chauhan. Umar bas bees. Photo agle din paper mein chhapi. Ira us case ke peeche pad gayi.

Armaan ko pata tha sach kya hai. Aur yeh bhi pata tha ki Kothari is baar aasani se nahi fasega. Woh har aadmi ko khareed raha tha. Thanedar se le kar tehsildar tak. Witnesses darae ja rahe the. Samar ke pita ne court ke bahar ro kar kaha tha, "Bas itna likh do beta ki mera ladka pathar lekar nahi, kagaz lekar gaya tha." Armaan wahan khada sun raha tha.

Usne Samar ki photo dekhi. Phir uske ghar gaya, bahane se. Aur usne dekha ki Samar ke pita, Narayan Chauhan, ke kandhon par dard tha, par andhera zyada nahi. Asli bojh Kothari par tha. Pura ka pura. Ira us case par din raat kaam kar rahi thi. Ek shaam usne Armaan se kaha, "Mujhe pata hai aap jaante ho. Kya hua tha. Ek baar sach bol do."

Armaan ne poocha, "Aur phir?"

"Phir jo hoga dekha jayega."

"Jo hoga woh aap dekh paogi?" Armaan ne thoda kadwa hoke poocha.

Ira ne uski aankhon mein dekhte hue kaha, "Aap dekh paoge agar nahi bola to?"

Us raat Armaan so nahi paya. Uske andar do hisaab lad rahe the. Ek simple. Kothari ko bachao, sab usual rahega. Paisa, pahunch, suraksha. Doosra anjaana. Sach bolo, sab toot sakta hai. Maa ka ilaaj usi paise se chal raha tha. Rabiya ki fees usi se ja rahi thi. Ghar par jo chhat thik hui thi, usi se. Aur phir uske andar se ek aur awaz aayi, jo uske apne dimaag ki thi, "Tumhare paas power hai. Tum sach बोले bina bhi hisaab theek kar sakte ho."

Agle din witness protection room ke bahar Samar ka chhota bhai, Faiz, baitha tha. Bas aatrah saal ka. Dar se sukha hua. Kothari ko andar le jaaya jaa raha tha. Andhera uske kandhon par kaamp raha tha. Armaan ne us waqt faisla liya.

Usne Kothari se bojh kheench liya.

Aur Faiz par daal diya.

Faiz ka chehra ek pal mein badal gaya. Jaise uske andar se saans kisi ne kheench li ho. Usne apni gardan pakdi. Aankhen seedha Armaan par tik gayin. Us nazar mein koi ilzaam nahi tha. Sirf samajh aa gaya tha. Armaan ne us nazar ko pehli baar mehsoos kiya. Jaise koi aapko dekh kar bol raha ho, main gaya, par tum bache nahi ho.

Do ghante baad Faiz ne statement badal diya. Bola usne sab kuch clearly nahi dekha. Case hil gaya. Samar ke pita toot gaye. Ira ne Armaan ko us din dhoondha. Court ke peeche pakad kar poocha, "Kya kiya aapne?"

Armaan ne jhooth bola, "Kuch nahi."

Ira ne sir hilaaya. "Pata nahi aapne kya kiya. Par aap jahan hote ho na, wahan sach kam ho jaata hai."

Us raat Faiz ne fan se latak kar jaan de di.

Khudkushi ka note chhota tha. Sirf do line. "Mujhse bojh nahi uth raha. Bhai maaf karna."

Armaan ne note ki photo dekhi aur uske pairon ke neeche se zameen nikal gayi. Yeh pehli baar tha jab usne seedha nateeja dekha jo sirf data point ya side effect nahi tha. Ladka mar gaya tha. Aur uski maut mein Armaan ka haath tha. Kanooni taur par nahi. Asli taur par.

Woh seedha ghar gaya. Maa ne khana poocha. Usne mana kar diya. Rabiya ne uska chehra dekha aur darr gayi. "Kya hua?" usne poocha.

Armaan bathroom mein ghus gaya. Darwaza andar se band kiya. Aaine mein khud ko dekha. Apne kandhon par pehli baar usne kuch dekha.

Patli si kaali parat.

Usne turant seene par haath rakha. Jalti rekha tez ho gayi.

"Wapas le lo," usne hawa mein kaha. "Jo kiya hai, wapas le lo."

Andar se wohi awaaz aayi.

"Jo saunp diya gaya, woh lautta nahi."

Armaan ne aaine par mukka maara. Sheesha toot gaya. Haath se khoon gira. Par kuch wapas nahi aaya.

Uske baad usne Kothari ka kaam chhod diya. Seedha chhod diya. Kothari ne pehle hansa, phir dhamkaya, phir usse pitwaane ki koshish ki. Armaan ne jawab nahi diya. Woh alag tarah ke kaam mein lag gaya. Files chhup kar Ira tak pahunchana. Anonymous packets. Audio clips. Payment trail. Kothari ke aadmiyon ki list. Woh system jise woh itne saal samajh kar apna ghar bhar raha tha, ussi system ko andar se kaatne laga.

Saath hi saath usne ek aur kaam shuru kiya. Ab woh doosron ka bojh kam karne ke liye kisi teesre par nahi daalta tha. Khud par leta tha.

Pehli baar jab usne aisa kiya to lagbhag behosh ho gaya. Ek police inspector tha jiske khilaaf custody torture ka case tha. Armaan ne uska andhera kheench kar apne seene mein utaar liya. Poora sharir thand se bhar gaya. Do din bukhar raha. Teesre din inspector jaise thoda halka pad gaya, par uski jagah kisi aur thane mein doosra waisa hi aadmi khada ho gaya. Armaan ne phir bhi nahi roka.

Har baar uska sharir aur jhukne laga. Aankhon ke neeche gaddhe. Haathon mein kamzori. Maa samajh rahi thi woh drugs le raha hai. Rabiya samajh rahi thi kisi ne usse maar peet kar dara diya hai. Ira ko bas itna pata tha ki Armaan se milne par ab uski saanson mein thakan sunai deti hai.

Ek shaam Ira ne seedha poocha, "Aap kar kya rahe ho apne saath?"

Armaan ne bachne ki koshish ki. "Sudhar raha hoon."

Ira ne teekhi awaaz mein kaha, "Insaan sudharte waqt itna nahi toot-ta."

Woh dono purane bridge ke paas chai pi rahe the. Neeche ka nala andhere mein beh raha tha. Door masjid ki azaan aur kisi mandir ki ghanti ek saath aa kar ghoom rahi thi. Armaan ne cup neeche rakha. Bahut der baad bola, "Maan lo kisi ke paas tareeka ho, sach mein cheezein theek karne ka. Par har baar jab woh ek gandi cheez hataaye, kahin aur do aur ug aayein. Phir?"

Ira ne kaha, "Phir bhi jo hata sakte ho, hatao."

Armaan ne halka sa sir hilaaya. "Nahi. Tab samajh aata hai ki gandagi logon mein nahi, dhanche mein hai. Aur dhanche ki koi gardan nahi hoti jise daba do."

Ira ne uske chehre ko dekha. "Aap pehli baar sach bolne ke kareeb lag rahe ho."

Armaan hansna chahta tha, par hansa nahi.

Agle kuch mahine usne lagataar wahi kiya. Jahan kisi bilkul saaf insaan par andhera girne वाला hota, woh beech mein kood kar use apne andar kheench leta. Ek school teacher jise jhoothe harassment case mein phansaya ja raha tha. Ek nurse jise medicine theft mein bali ka bakra banaya ja raha tha. Ek ladka jo thane mein bas isliye band tha kyunki uska baap union leader tha. Armaan kuch zulm rok leta. Kuch ko tal deta. Kuch log bach jaate. Phir doosri jagah koi aur toot jaata.

Usse dheere dheere samajh aaya ki andhera kisi paap ka hisaab bhar kar nahi baithta. Woh raw material hai. Ek se hatao to doosre raste nikal aata hai. Jahan tumne saza rok di, wahan laaparwahi ug gayi. Jahan tumne zulm ka bojh khud le liya, wahan naye zulm paida ho gaye kyunki system ka santulan kisi na kisi ko pees kar hi banta tha.

Aur sabse buri baat yeh thi ki uske andar bhi andhera bharne laga tha. Ab use logon par bojh sirf dikhai nahi deta tha, mehsoos bhi hota tha. Kabhi kabhi market mein chalte hue kisi aadmi par itna kaala bojh dekhta ke mann karta abhi yahin kheench kar uske gale mein lohe ka rod ghusa de. Phir khud ko rokta. Remorse ne use saaf nahi kiya tha. Bas usse apne gande hisson ka hosh de diya tha.

Phir ek din Kothari mar gaya.

Heart attack likha gaya. Par shehar jaanta tha ki uske do purane partners usse kha gaye. Armaan ne khabar suni to uske andar kuch nahi hila. Na sukoon. Na khushi. Na badla. Bas ek khaali pan. Kothari gaya, par uski jagah teen naye chhote Kothari paida ho gaye. Files baant li gayin. Routes baant liye gaye. Police mein nayi setting ho gayi.

Ira ne us raat usse phone kiya. "Tum theek ho?" usne poocha.

Armaan ne bahut dheere se kaha, "Pehle lagta tha bura aadmi hat jayega to thoda sa nyay aa jayega. Ab lagta hai aadmi badalte rehte hain, kaam wahi rehta hai."

"Kya matlab?" Ira ne poocha.

Armaan kuch second chup raha. Phir bola, "Nyay naam ki koi cheez hoti hi nahi hai shayad."

Ira ne turant jawaab nahi diya.

Armaan ne khidki ke bahar andhera dekha. Gali mein ek drunk aadmi ladkhadate hue ja raha tha. Do ghar chhod kar ek aurat bachche ko daant rahi thi. Door se kisi ambulance ki awaaz aa rahi thi. Usne kaha, "Bas kuch waqt ke liye anyay kam ho jaata hai. Hum us khali jagah ko nyay bol dete hain. Par woh khali jagah tikti nahi."

Phone ke doosre side Ira saans leti rahi. Phir usne poocha, "Aur aap? Aap kya bologe khud ko? Gunahgaar? Ya sudhra hua aadmi?"

Armaan ne pehli baar sacchi hansi hansi. Thodi kamzor, thodi be-mazak. "Dono mein se koi nahi. Main bas woh aadmi hoon jise galat cheez de di gayi."

Us raat jab woh ghar aaya to Rabiya baithi thi. Uski shaadi ki baat pakki ho gayi thi. Maa so chuki thi. Rabiya ne uski taraf dekha aur bina kisi role ke seedha poocha, "Aap marne wale ho kya?"

Armaan ne hairan ho kar usse dekha. "Pagal ho?"

Rabiya ne aansu rok kar kaha, "Aap jaise chal rahe ho na, lagta hai andar se koi kha gaya hai."

Armaan uske paas baith gaya. Bahut saalon baad. Usne uske sir par haath rakha. "Ho sakta hai," usne dheere se kaha.

Rabiya ro padi. "Aap achhe aadmi kyun nahi ban gaye bas? Itna mushkil tha?"

Armaan ne jawab dene ki koshish ki, par lafz nahi mile. Kyunki asli jawab yeh tha ki achha aadmi banna mushkil nahi tha, bas usne kabhi chuna hi nahi. Aur jab tak chuna, tab tak kaafi der ho chuki thi.

Aakhri baar Ira usse purani district court ki seedhiyon par mili. Wahi building jahan se sab shuru hua tha. Din ka waqt tha. Shehar ka shor zyada. Ira ke haath mein ek notebook thi. Armaan ke chehre par pichhle kuch mahino ka saara bojh. Woh dono kuch der tak bina bole baithe rahe.

Ira ne poocha, "Agar aapko phir se mauka mile, sab shuru se, to alag karoge?"

Armaan ne seedha jawab diya, "Nahi pata. Shayad pehle din hi mana kar deta. Shayad pehle din hi khud ko jhooth bol deta ki yeh meri zimmedari nahi hai. Shayad main phir bhi wahi karta jo kiya, kyunki main wahi aadmi tha."

Ira ne uski taraf dekha. "Aur ab?"

"Ab main itna jaanta hoon," Armaan ne kaha, "ki saza dene ki taqat aur nyay karne ki taqat alag hoti hai. Mujhe pehli mili thi. Main doosri samajhta raha."

Usi pal uske seene ki rekha jal uthi. Itni tez ki usse saans leni mushkil ho gayi. Woh jhuk gaya. Ira ne uska kandha pakda. Armaan ne pehli baar dekha, uske apne kandhon par ab andhera pahaad ki tarah baitha tha. Na keval doosron se liya hua, balki apna bhi. Apne saare faisle. Saare bahane. Saare jhooth.

Andar se wohi awaaz aayi.

"Dharak ayogya tha."

Is baar Armaan dara nahi. Sirf thak kar muskuraya. "Yeh to mujhe pehle din pata hona chahiye tha," usne bahut dheere se kaha.

Rekha se roshni nikalne lagi. Ira ne kuch nahi dekha, par Armaan ne saaf dekha. Andhere ke dhaage uske seene se uth kar hawa mein chhoot rahe the. Ghul nahi rahe the. Khatam nahi ho rahe the. Bas bikhhar kar shehar ki taraf ja rahe the. Kisi thane, kisi daftar, kisi ghar, kisi aadmi, kisi aurat, kisi bachche ki kismat mein.

Bas jagah badal rahe the.

Armaan ne aankhen band kar liं. Aakhri pal mein usse Samar ka chehra yaad aaya. Faiz ki nazar. Rabiya ki awaaz. Maa ke haath. Ira ki saaf gardan jahan kabhi koi bojh nahi dikha tha. Phir use samajh aaya ki shayad kuch log isliye saaf dikhte hain kyunki duniya ka kaala bojh unke kandhon par tikne se pehle hi koi aur uske liye jhooth bol deta hai, rasta badal deta hai, kisi kamzor ko de deta hai. Saaf log bhi akela nyay nahi la sakte. Gande log bhi akela anyay nahi banate. Sab kuch juda hua hai. Isi mein khauf hai.

Jab Ira ne use sambhala, Armaan ka sharir dheere se seedhiyon par ek taraf jhuk gaya. Saans bahut halki reh gayi thi. Woh uski taraf dekh kar bas itna bol saka, "Ira..."

"Haan," Ira ne jhuk kar kaha.

"Jab kabhi likho na..." usne ruk ruk kar kaha, "yeh mat likhna ki nyay jeet gaya."

Ira ki aankhen bhar aayi. "Kya likhun?"

Armaan ne bahut mushkil se honton ko hilaya. "Likho... kuch der ke liye andhera peeche hata tha."

Uske baad usne kuch nahi kaha.

Shehar uske baad bhi wahi raha. Court mein files chalti rahiं. Police waise hi bani rahi. Kothari ki jagah naye log aa gaye. Rabiya ki shaadi ho gayi. Maa ne uske kapde bahut din tak almirah se nahi hataaye. Ira ne Samar aur Faiz ke case par ek lambi report likhi jo kuch din charcha mein rahi, phir kisi naye scandal ne use dhakel diya. Logon ne Armaan ka naam alag alag tareeqon se yaad kiya. Koi usse fixer bolta raha, koi dalaal, koi bechara, koi aadha hero, koi poora gunahgaar. Shayad sab thoda thoda sahi the.

Par sach inmein se koi nahi tha.

Sach itna sa tha ki ek galat aadmi ko ek aisi taqat mil gayi thi jise woh nyay samajh baitha. Phir jab tak usse samajh aaya ki woh nyay nahi, sirf bojh baantne ka ikhtiyar tha, tab tak bahut kuch toot chuka tha. Usne marammat ki koshish ki. Saza khud par li. Kuch log bachaye. Kuch nahi bacha paaya. Aur aakhir mein bas itna samajh kar gaya ki duniya mein nyay koi pakki cheez nahi hoti. Na woh talwar hai, na kursi, na kanoon ki mohar.

Nyay shayad bas us pal ka naam hai jab anyay thodi der ke liye saans lene ruk jaata hai.

Phir wapas chal padta hai.
 
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Shivakalakar

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Adhure panne(incest)

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Ramesh, ab to bol do, kya humein marte waqt bhi khushi nahi doge?

Wo shaam thi jab aasman mein baadal aise ghire the jaise khuda bhi ro raha ho. Delhi ki un sankari galiyon mein, jahan hawa mein dhool aur udaasi ka mel tha, main khada tha — akela, thaka hua, aur dil mein wo dard jo kabhi kam nahi hota. Mera naam Ramesh tha, lekin us waqt lagta tha jaise naam bhi boj ban gaya ho. 1945 ka saal tha. Duniya yuddh ki aag mein jal rahi thi, aur meri duniya to pehle hi raakh ho chuki thi.

Naam tha uska Kamla. Wo meri chachi ki beti thi, balki uski aankhon mein wo dard tha jo mere jaisa lagta tha. Kamla ki umar koi bees-bais saal ki rahi hogi, lekin chehre par wo udaasi aisi thi jaise umar se bahut aage nikal gayi ho. Pita (chacha) sarkari daftar mein clerk the, maa (chachi) ghar sambhalti thi, aur bhai yuddh mein chala gaya tha — kahin Burma ki taraf, jahan se khabrein aati thi ki Japani gole barsa rahe hain. Kamla roz shaam ko chhat par khadi rehti, aankhen door kshitij ki taraf tikaye, jaise kisi ko intezaar ho jo kabhi lautne wala nahi. Pahle to bahut nautanki baaz thi, bahut natkhat chulbuli si. Ek baar to kumharon ke matke phod aayi thi aur wo orahan lekar ghar aaya tha. Ye mere ghar mein chhup gayi thi. Bahut maari gayi thi. Maine bachaya tha. Aisi thi. Batao jara sa kuchh kah do. Billiyon ki tarah katne ko daudti thi.

Lekin ab main use dekhta to dil mein ek ajeeb si hook uthati. Main khud ek sadharan clerk tha, British sarkar ke adheen, jahan filein uthaana aur chai banana hi mera kaam tha. Lekin dil mein sapne the — bade sapne. Swatantra Bharat ka sapna, jahan koi gulam nahi hoga, jahan pyar bhi aazaad hoga. Lekin 1945 mein sapne bhi bhookhe the. Angrezon ki satta kamzor ho rahi thi, lekin hamari gareebi aur dard nahi. Ghar mein maa bimaar thi, baap ka dehant ho chuka tha, aur behan ki shaadi ka boj mere kandhon par tha. Hamara ghar uske ghar ke bagal mein tha.

Us din jab baarish ne galiyon ko taalab bana diya tha. Main chhata lekar bhaag raha tha daftar se, aur Kamla chhat se neeche utar rahi thi paani mein bheegte hue. Uske haath mein ek purani kitaab thi — Ravindranath ki. Paani mein bheegkar kitaab kharab ho rahi thi, lekin wo hans rahi thi. Hansi aisi ki dil toot gaya. “Bhaiya,” usne kaha, “aap bhi bheeg rahe ho. Aao, chhat par aa jao.”

Main chala gaya. Chhat par wo purani lakdi ki kursi thi, aur hum dono baith gaye. Baarish ki boondein chhat par tapak rahi thi, aur hawa mein mitti ki khushbu. Kamla ne apne saree ke pallu se mera sar ponchh diya aur kaha, “Duniya itni badi kyun hai, bhaiya? Kyun har koi itna dukhi hai?” Maine jawab diya, “Kyunki hum insaan hain, Kamla. Dukh hi to hamari kahani hai.”

Kamla ek baat kahen. Usne kaha, “Ha boliye na. Tum aise chup-chup si na raha karo. Hamein bada dukh hota hai.”

Wo thoda sa muskuraayi aur upar kadakti bijliyon ko dekhne lagi. Bijliyan aisi chamak rahi thi jaise koi purana zamana yaad dila raha ho.

“Kamla, tumko yaad hai ek baar tum school ka gola maar ke ghoom rahi thi. Chachi ne tumko kitna koota tha?

Aankhen chhoti karte hue tunak ke boli, “Aur batane wala kaun tha? 🤨 Arre bhaiya, aap bhi na! Woh toh bas ek chhota sa gola tha, lekin ma ko laga jaise maine unka poora ghar loot liya ho. Laathi uthayi aur peeche-peeche daudti hui aayi – ‘Kamlaaa! Ruk jaa re pagli, aaj bahut marungi ruki!’ Main toh bhagte-bhagte thak gayi, phir bhi unhone do-chaar jad diye. Uss din ke baad toh maine school ka gola kabhi nahi mara. Ab sochti hoon toh hasi aa jaati hai… lekin uss waqt toh ro-ro ke aankhen laal kar di thi!”

Phir wo hans padi, ek purani si hansi, jaise koi radio gaana baja ho –saamne ye kaun aya, dil me hui halchal

“Aur yaad hai na, woh waqt jab tum chhat par patang udane gayi thi aur patang ka manja haath mein aa gaya tha? Haath se khoon nikal raha tha, phir bhi tum chillayi nahi. Bas chupke se chachi ke paas jaake bola – ‘ma, thoda tel de do, haath mein chubhan ho rahi hai.’ Chachi ne dekha toh chillayi – ‘Arre Ram! Yeh ladki toh mar hi jaayegi!’Aur phir maine tumko danta tha tab se patng sirf udate dekhti thi kabhi uadati nahi thi,

Ha bhaiya yaad hain maza aa raha tha na, apko dant ke, fir kabhi bhi hamne aaj tak patng ko hath tak nahi lagay? Woh hawa mein udti patang, aur hum log chhat par nach-te hue… woh din bhi kya din the!”

Hai na bhaiyaa

Us din se hamari baatein shuru hui — thodi mazakiya, thodi gambhir. Roz shaam ko, jab suraj dhalta, hum chhat par milte. Kabhi wo apni kitaabein sunati — Premchand ki kahaniyaan, jahan gareebon ka dard tha. Kabhi main use apne sapnon ke baare mein batata — ki ek din main lekhak banunga, kahaniyaan likhunga jo dilon ko chhuein. Lekin dil mein chhupa hua tha wo sach jo main kisi se nahi kah paata tha. Kamla ke bhai ki maut ki khabar aa chuki thi, lekin wo abhi tak maan nahi rahi thi. Wo kehti, “Wo laut aayega, bhaiya. Dekhna, bas ek khat aur aayega.”

Main jaanta tha ki khat nahi aayega. Lekin chup rehta. Kyunki uski aankhon mein ummeed dekhkar lagta tha jaise meri apni ummeed bhi zinda hai. Hamari dosti dheere-dheere us rishte mein badalne lagi — kuchh aisa jo… jo… chhodo. Pyar? Shayad. Lekin us waqt pyar kahna bhi jurm tha. Samaaj tha, parivaar tha, aur sabse bada — samay tha jo hamare khilaaf tha. Sabse badi baat hamara rishta wo chachi ki beti thi. Agar kisi ko pata padta to humein to maar hi daalte.

Ek shaam thi, jab chaandni raat apni poori chamak se dharti ko naha rahi thi. Hawa mein gulab aur chameli ke phoolon ki madhosh karne wali khushboo thi, jaise koi purani yaadein saans mein ghus rahi hon. Purane bagh ke us kone mein, jahaan purane peepal ka ped apni chhaon failaye khada tha, Kamla ne mera haath apne dono haathon mein thaam liya. Uski ungliyan thandi aur kaanp rahi thi. Uske chehre par chaandni ki roshni pad rahi thi, jo uski bheegi aankhon ko aur bhi chamka rahi thi.

“Bhaiya…” uski awaaz bahut dheemi thi, jaise koi dard chhupa rahi ho. “Agar main kahoon ki main tumse… bahut dinon se…”

Wo ruk gayi. Uski saans tez ho gayi. Maine uske haath ko halke se dabaya aur dheere se bola, “Kaho na, Kamla. Aaj ki raat bahut khamosh hai. Jo dil mein hai, woh bol do. Dar mat.”

Lekin Kamla ne kuch nahi kaha. Bas uski aankhon se aansu behne lage. Ek ek aansu uske gaal par se fisal kar uske haathon par gir raha tha, jahaan mera haath tha. Usne apni nazar jhuka li, jaise sharam aur majboori dono ek saath usko daba rahe hon.

“Meri maa… meri maa keh rahi hain ki ab shaadi kar do, Kamla. Kisi ameer ghar mein… kisi aise ghar mein jahaan paisa ho, izzat ho, sukh ho. Unke hisaab se main unki akhri umeed hoon.

sakenge… lekin main… main nahi chahti, bhaiya.”

Uski awaaz tootne lagi. Usne mera haath aur zor se pakda, jaise main uska sahara hoon.

“Main nahi jaana chahti uss ghar mein jahaan sirf paisa ho, pyar na ho. Jahan main ek bahu ban kar sirf naam ki zindagi jeeyoon. Main toh… main toh aapke paas rehna chahti hoon. Aapke is chhote se ghar mein, aapke saath. Aapki woh chhoti si naukri, woh thodi si khushi… woh bhi mujhe bahut badi lagti hai. Kyunki usme aap ho. Aapki muskurahat, aapki baatein, woh raatein jab aap mujhe purani kahaniyan sunate the… sab kuch.”

Maine uske aansuon ko apni ungli se pochne ki koshish ki, lekin wo aur behne lage.

Kamla ne apni aankhein utha kar meri taraf dekha. Uski aankhon mein ek gehra dard tha, ek majboori jo usko tode ja rahi thi.

“Bhaiya… aap samajhte kyun nahi? Main aapko kitna chahti hoon. Kitne saalon se chhupaye hue rakha hai is dil ko. Har baar jab aap mujhe ‘Kamla’ kehte ho, mera dil dhadakta hai. Har baar jab aap mere liye chhoti chhoti cheezein laate ho – woh sasta sa dupatta, woh mithai ka tukda – main sochti hoon ki yeh hi toh hai asli pyar. Na paisa, na badi badi cheezein… bas aapka saath.”

Lekin uski awaaz mein ab gussa bhi aa gaya tha, majboori ka gussa.

Hamne ma se bataya bhi ki ham kisis se pyaar karte hain

Uski chhoti si nuakri hai.

“Maa kehti hain – ‘Kamla, sapne mat dekho. Zameen par reh. Woh ladka kya dega tujhe? Uski naukri bhi toh chhoti si hai. Tu kya khayegi? Kya pehnegi? Tere bacchon ka kya hoga?’ Aur main chup rehti hoon, bhaiya. Chup rehti hoon kyuki main unko dukh nahi dena chahti. Hamara rista, Lekin andar se main toot rahi hoon. Har raat sochti hoon ki agar main aapke saath bhag jaun toh kya hoga? Maa roye gi, lekin main zinda toh rahungi na? Is majboori ki zindagi se toh maut behtar hai.”

Usne mera haath chhoda nahi, balki aur kheench kar apne seene ke paas le aayi. Uski saans phool rahi thi.

“Boliye na, bhaiya… aise chup kyun hain? Aap bhi toh mujhe dekhte ho na? Aapki aankhon mein bhi woh baat hoti hai jo meri aankhon mein hai. Phir kyun nahi bolte? Kya aap bhi darr rahe hain is samaj se? Is garibi se? Ya phir aapko lagta hai ki main sirf ek chhoti si ladki hoon, jo sirf sapne dekhti hai?”

Maine kuch bolne ki koshish ki, lekin wo ruk nahi rahi thi. Aansu ab uske bolne ke saath saath beh rahe the.

Maine kuch bolne ki koshish ki, lekin wo ruk nahi rahi thi. Aansu ab uske bolne ke saath saath beh rahe the.

Mai rundhi si aavaj me bola kamla hamara rista dekh hame maar dalenge te log mai mar jau to kya tum

Usne apne haath mere muh pe rakh diye

“Aap samajh nahi rahe, bhaiya. Yeh sirf mera dil nahi hai… yeh meri zindagi ka sawal hai. Agar main us ameer ghar mein chali gayi toh har din mar mar kar jeena padega. Har subah uth kar sochungi ki aaj bhi main aapke bina hoon. Aapke bina hansna, aapke bina rona… sab bekaar lagta hai. Meri maa kehti hain ki pyar se pet nahi bharta. Lekin bhaiya, pyar ke bina toh saans bhi nahi li ja rahi hamse. Aap bataiye… kya main galat hoon? Kya main apni maa ko dhokha de rahi hoon? Ya phir khud ko dhokha de rahi hoon?”

Usne apna sir mere kandhe par rakh diya. Uski awaaz ab sirf siskiyon mein badal gayi thi.

“Bhaiya… agar aap keh do ki ‘Kamla, main bhi tumhe chahta hoon’, toh main saari duniya se lad jaungi. Maa se, samaj se, garibi se… sab se. Lekin agar aap bhi chup rahe… toh main toot jaungi. Is chaandni raat mein bhi meri zindagi andheri ho jayegi. Boliye na… kuch toh boliye. Aapke ek shabd se meri majboori khatam ho sakti hai. Ya phir yeh majboori hi meri kismat ban jayegi.”

Hawa mein phoolon ki khushboo ab bhi thi, lekin ab usme ek dard bhari mehak bhi mil gayi thi. Kamla ki saans mere kandhe par gir rahi thi, uske aansu mere kurte ko bheeg rahe the. Raat khamosh thi, lekin uski majboori ki awaaz bahut zor se gooj rahi thi.

“Bhaiya… please… aaj faisla ho jaye. Meri zindagi aapke haathon mein hai. Ya toh aap mujhe apna bana lo… ya phir mujhe uss ameer ghar ki qaid mein bhej do. Lekin yeh beech ka rasta… yeh toh mujhe roz mar raha hai.”

Usne apni aankhein band kar li aur sirf itna hi kaha, awaaz mein gehra tanaav aur roti hui majboori ke saath:

“Bol do, bhaiya… ek baar bol do… ki aap bhi mujhe chahte ho. Warna… main mar jaungi is intezaar mein.”

“Kamla tum shadi kar lo”

Usne muh se ek shabd bhi nahi nikla wo chup si ho gayi

Aur phir sirf uski siskiyan baaki reh gayi, chaandni raat ke sannate mein.

Main bistar par leta hua chhat ko nihar raha tha. Us raat maine sapne dekhe. Saath bhaagne ke, kahin door jaakar, jahan koi pooche nahi. Lekin sapne the wo, haqeeqat nahi. Kai din beet gaye. Main hadtaalon mein jaane laga tha.

Din daftar mein khabar aayi ki Angrez sarkar ne aur sakhti kar di hai. Hadtaalein ho rahi thi, Quit India ki lahar abhi bhi goonj rahi thi. Main bhi shaamil ho gaya ek chhoti si sabha mein. Lekin police ne laathiyaan barsaayi.

Main ghayal hokar, lahu se latpat, ghar laut aaya tha.

Sharir mein dard ki ek aisi lehrein uth rahi thi jaise har saans ek nayi saza ho. Pair ladkhada rahe the, aankhein dhundhli pad rahi thi, lekin phir bhi maine darwaze ki chaukhat pakad kar khud ko sambhala.

Jaise hi main andar ghusa, Kamla ne mujhe dekha.

Uski aankhein faail gayi. Ek pal ke liye uska saara chehra safed pad gaya, jaise usne maut ko saamne khada dekha ho. Phir uske honthon se ek cheekh nikal gayi — dheemi, tooti hui, lekin dil ko cheer dene wali.

“Bhaiya…!”

Wo daud kar mere paas aayi. Uski saans phool rahi thi. Haathon se mujhe sambhalne ki koshish ki, lekin uske haath kaanp rahe the itni ki mujhe thaam bhi nahi pa rahi thi. Usne mujhe dekh kar ro padi — wo bhi aise royi jaise uska dil phat raha ho.

“Aap… aap mar jaoge! Agar aise hi karte rahe… toh ek din sach mein chhod kar chale jaoge mujhe! Dekho na… kitna khoon beh raha hai… kitna!”

Uski awaaz mein dard, gussa, pyaar aur majboori — sab ek saath ubal rahe the. Maine bahut mushkil se muskurane ki koshish ki, lekin muskurahat bhi dard se bikhar gayi.

“Marna toh sabko hai, Kamla… har insaan ko ek din jaana hai. Lekin marte waqt kam se kam yeh toh kah sakoon ki maine kuch kiya tha. Kuch ladaiyan ladi thi… kuch awaaz uthayi thi… kuch logon ke liye kuch kiya tha. Warna zindagi kya thi? Sirf saans lena?”

Kamla ne kuch nahi suna. Usne jhat se apni saree ka pallu pakda aur daanton se usko faad diya. Ek bada sa tukda faad kar usne mere sabse gehre ghaav par patti baandhni shuru kar di. Uski ungliyan mere zakhm par lagte hi kaanp rahi thi. Har baar jab wo patti kashti, uske aansu mere haath par, mere seene par, mere khoon mein mil rahe the.

“Ha… karte raho apni marzi…” uski awaaz ab bilkul toot rahi thi. “Kya hi farak padta hai kisi ko? Main mar jaungi… main toh roz mar rahi hoon aapko aise dekhte hue. Aapko kya farak padta hai? Aap toh bas apne sapnon ke peeche… apne ‘kuch karne’ ke peeche pagal ho gaye ho. Mujhe toh sirf aapki saans chahiye… aapka saath chahiye… aap zinda rehna chahiye!”

Uski naak laal ho gayi thi. Aankhein itni nam thi ki har pal aansu ki nadiyaan beh rahi thi. Wo rote hue hi bol rahi thi, siskiyon ke beech ruk ruk kar.

Usne patti baandhte hue jab mere ghaav ko halka sa chhua, toh main karah utha. Dard ki ek tez lahar sharir mein daud gayi.

“Siiihhh…!”

Kamla turant ruk gayi. Uski aankhein aur bhi badi ho gayi, bhari hui nam aankhon se mujhe dekhte hue wo fauran boli, awaaz mein itna dard tha ki dil phatne laga:

“Dard… ho raha hai na, bhaiya? Bahut dard ho raha hai? Main… main aur kashti hoon kya? Boliye na… bataiye na… main kya karun? Main toh mar rahi hoon aapko dard hota dekhte hue!”

Wo ab khud hi ro rahi thi, haathon se apne aansu pochhti hui, lekin aansu ruk nahi rahe the. Usne phir se patti sambhali aur dheere-dheere, bahut pyar se, jaise koi maa apne bachche ko sambhal rahi ho, bandhne lagi.

“Aapko pata hai… jab aap bahar jaate ho, main yahin baith kar har pal sochti rehti hoon — aaj wapas aayenge ya nahi? Agar aaye toh theek-thaak aayenge ya aise lahu-luhan? Aapke liye main roz dua karti hoon… lekin aap… aap toh meri duaaon ko bhi thukra dete ho. Aapko kya lagta hai? Main sirf ek ladki hoon jo aapke ghaavon par patti baandh deti hai? Main toh aapke har dard ko apne dil mein mehsoos karti hoon. Jab aapko chot lagti hai, mujhe lagti hai… jab aap khoon behate ho, mera dil behata hai.”

Uski awaaz ab gehri ho chuki thi, bhari hui thi. Wo mere chehre ko dekhti hui, aansuon bhari aankhon se boli:

“Main chahti hoon aap zinda raho… mere liye zinda raho. Main jaanti hoon aap bade kaam karna chahte ho… logon ke liye ladna chahte ho. Lekin pehle toh khud ko zinda rakho na, bhaiya. Agar aap nahi rahe… toh main kya karungi? Main kiske liye saans loongi? Kis liye roti-pani khaungi? Aapke bina yeh ghar… yeh duniya… sab sunsaan lagta hai.”

Delhiye apne bola tha shadi ko maan jo to maan gai ab aap aise devdaas bane mat ghumiye aise mundi na hilaiye samjhe…are smjh gaye na

Maine uske haath ko pakadne ki koshish ki. Wo ruk gayi. Usne meri taraf dekha — aankhein nam, naak laal, honth kaanp rahe the.

“Ab jaake dikhaye toh taange na tod dungi…” usne rote hue, siskiyon ke saath kaha, lekin uski awaaz mein itna pyaar tha ki dard bhi meetha lag raha tha. “Sach mein bol rahi hoon… aapko hospital le jaungi, doctor ke paas le jaungi… aur agar aapne phir bhi aisi harkatein ki… toh main… main aapki taange tod dungi taaki aap kahin na ja sako. Mere paas hi raho… bas mere paas.”

Us waqt laga ki yeh dard hi hamari mohabbat hai.

Yeh zakhm, yeh aansu, yeh patti baandhte hue kaanpte haath, yeh siskiyaan… sab kuch hamari mohabbat ka hissa tha. Ek aisi mohabbat jo dard se banti thi, aansuon se geeli hoti thi, aur phir bhi har pal aur gehri hoti ja rahi thi.

Kamla ne patti baandh kar mera sir apne god mein rakh liya. Uski ungliyan mere baal mein phir rahi thi. Wo dheere se ro rahi thi, lekin ab uski awaaz mein ek nayi kasam si thi:

“Sun lo, bhaiya… agar aap phir kabhi aise ghayal hokar aaye… toh main pehle khud mar jaungi. Kyunki main aapke bina jeena nahi seekh paayi… aur shayad kabhi seekh bhi na paaun.”

Bahari raat mein sirf uski siskiyaan aur mere dard bhari saansein goonj rahi thi. Aur uske aansu… jo ab bhi mere haathon par tapak rahe the… jaise woh har aansu ek wada ho — zindagi ka, pyaar ka, aur saath rehne ka….nahi…ye…chhodo na….

Ab kamla bahut kam milti thi bahut sant rahne lagi thi

Din beet te gaye. 1945 ka aakhiri mahina aaya. Japan haar gaya tha, yuddh khatam ho raha tha, lekin hamare gharon mein yuddh abhi bhi chal raha tha. Kamla ki shaadi tay ho gayi. Ladka tha koi sarkari afsar ka beta, ameer, padha-likha, lekin dil ka sookha. Kamla ne mujhe bataya to main chup raha. Kya kehta? “Mat karo”? Lekin kahan le jaata use? Ye rishta, ye samaaj, bimaar maa, aur bhookhe sapne.

Us raat hum chhat par mile. Hawa thandi thi, aur door kahin se radio par khabrein aa rahi thi — swatantrata ki baatein. Kamla ne kaha, “Agar main shaadi kar loon to tum kya karoge?” Maine kaha, “Main mar jaunga, Kamla. Lekin tum khush rehna.” Wo ro padi. “Tum hamesha aise kyun bolte ho? Kyun nahi kehte ki bhaag chalen? Kyun nahi ladte?”

Maine uska chehra apne haathon mein liya. “Kyunki ladna bhi ek tarah ka marna hai, Kamla. Aur main tumhe marte hue nahi dekhna chahta.”

Jaate hue maine usse kaha, “Ja rahi ho! Gale nahi milogi?”

Usne kaha, “Unh hoon… nahi milungi.”

Maine phir kaha, “Mil lo! Dil mein reh jayega ye na milna… uska kehna tha. Kuchh rehna bhi to chahiye dil mein jab koi ja raha ho.”

Uske baalon mein baarish ki khushbu thi, aur dil mein dard ka saagar. “Bhaiyaa,” usne fusfusaya, “agar agle janam mein milein to…”

Lekin agla janam kahan? Is janam mein to bas yehi raat thi.janm sirf ek hi hota hai

Mujhe wo gana yaad ata hai “lag ja gale”

Hamari aankhen mili, aur us pal mein saari duniya gayab ho gayi.

Shaadi ke din ghar mein shor tha. Main bahar khada dekh raha tha. Kamla laal jode mein thi, lekin chehra peela.

“Achha maa-papa, chalti hoon.”

Uski nazar meri taraf aayi, aur aankhon mein wo sawal tha — “Kyun nahi roka tumne mujhe?” Main muskuraaya, lekin andar se toot raha tha. Baraat nikli, aur main peeche-peeche chala. Galiyon mein dhool ud rahi thi, aur mere pair bhari the. Sabse zyada rone wala insaan main tha. Cheekh-cheekh ke roya. Bahut roya tha.

Raat ko jab sab so gaye, main uske ghar ke bahar khada raha. Khidki se uski parchhaai dekhne ki koshish kar raha tha. Maine man mein kaha, “Khush rehna, Kamla.” Lekin dil cheekh raha tha.

Phir aaya wo din jab khabar aayi ki Kamla bimaar hai. Shaadi ke baad uska dil toot gaya tha. Doctor kehte the ki wo khana nahi khati, bas roti rehti hai. Main gaya uske ghar. Uske pati ne mujhe dekha to naak bhoun chadhaayi, lekin main chachi ko saath lekar gaya tha. Kamla bistar par leti thi, aankhen band. Maine uska haath thaama. “Kamla, main hoon. Ramesh.”

Usne aankhen kholi. Kamzor muskaan aayi. “Ramesh… tum aaye. Ab to bol do, kya humein marte waqt bhi khushi nahi doge?”

Sab soch mein the.

Main ro pada. “Kamla, maine tumhe kabhi dukh nahi dena chaaha. Lekin ye duniya… ye samay…” Main chup sa ho gaya.

Main man mein bola — hum dono ne gunaah kiya hai, pyar ka gunaah, ummeed ka gunaah, aur jeene ka gunaah.

Sabhi chale gaye the doctor ko vida karne.

Kamre mein sirf main aur wo thi.

Wo hansii — dheemi, tooti hui. “Ramesh, yaad hai wo baarish wali shaam? Jab humne sapne dekhe the? Wo sapne ab bhi mere paas hain. Lekin tum… tum mujhe chhodkar mat jaana.”

Maine uska sir apni god mein liya. “Nahi jaunga. Aaj nahi, kal nahi. Hamesha tumhare saath.” Lekin hum dono jaante the ki ye jhooth tha. Samay hamara dushman tha.

Us raat Kamla ne mujhe apni diary di. Usmein likha tha — har panne par mera naam. Har panne par dard. “Ramesh, agar main mar gayi to ye diary jalana mat. Ise rakhna. Taaki koi jaan sake ki hum bhi jiye the.”

Maine wada kiya. Lekin dil mein jaanta tha ki main khud jal raha hoon.

Kamla ki halat bigadti gayi. Doctor aaye, dawaiyaan di, lekin dawa kya karti jab dil hi toota ho. Main roz jaata. Chachi ko lekar. Pati ghoorta. Lekin Kamla ki aankhen mujhe bulaati. Hum baatein karte — purani baatein, wo chhat wali shaamein, wo kitaabein, wo hansi jo ab nahi aati thi.

Ek din usne kaha, “Ramesh, mujhe lagta hai ki main mar rahi hoon. Lekin dar nahi lagta. Kyunki tum ho. Bas ek baat kahna — kya tum mujhe kabhi bhuloge?”

Maine kaha, “Bhoolna kya, Kamla? Tum to meri saans ho. Marne ke baad bhi tumhe dhoondunga.”

Wo muskuraayi. “To phir khush rehna. Mere liye.”

Lekin main khush nahi reh saka.

Aakhiri din aaya. 1945 ka December. Bahar thand thi, aur Delhi mein kohra chhaya hua tha. Kamla ki saansein tez ho rahi thi. Main uske paas baitha tha, uska haath apne haath mein. Uske pati bahar the, parivaar ro raha tha. Kamla ne dheemi awaaz mein kaha, “Ramesh… ab to bol do… kya humein marte waqt bhi khushi nahi doge?”

Maine uske mathe par chumban liya. “Khushi dunga, Kamla. Agle janam mein. Is janam mein to bas dard hi hamara saathi raha. Lekin yaad rakhna — hamare pyar ne is duniya ko thoda sa roshan kiya. Bhale hi wo roshni sirf hamare dilon tak rahi.” Tum row mat yaar, mujhe achha nahi lagta… lekin… lekin… Ramesh bahut dard ho raha hai. Main marna nahi chahti… lekin… le..

Uski aankhen band ho gayi. Saans ruk gayi. Kamra sannate mein doob gaya. Main chupchaap baitha raha, uska haath thaame. Aansu bah rahe the, lekin cheekh nahi nikli. Kyunki cheekhne ka haq bhi nahi tha mujhe. Jisne pyar kiya, lekin rakh nahi saka.

Shavyaatra mein main peeche-peeche chala. Log keh rahe the, “Bechari, itni jawani mein…” Prem ka chakkar raha ladki ka. Lekin main jaanta tha ki wo nahi mari thi. Wo to bas chali gayi thi us jagah jahan dard nahi pahunchta.

Uske baad main badal gaya. Daftar chhod diya. Likhne laga. Kahaniyaan — uski kahani, hamari kahani. Lekin har kahani adhoori rehti. Kyunki ant hamesha dukhda hota. 1947 aaya, desh aazaad hua, lekin meri aazaadi kahan thi? Main ghoomta raha un galiyon mein, chhat ko dekhta, aur man mein fusfusata, “Kamla, tum kahan ho?”

Saal beet gaye. Main boodha hota gaya. Maa guzar gayi, behan ki shaadi ho gayi, lekin main akela raha. Kabhi-kabhi raat ko sapne aate — Kamla ki hansi, uski aankhen, wo baarish wali shaam. Main uthkar baith jaata aur rota. “Ramesh,” main khud se kehta, “ab to bol do, kya tumne use kabhi khushi di?”

Nahi di. Kabhi nahi.

Aaj bhi, jab main apni purani diary kholta hoon — uski diary — to panne peele pad chuke hain. Usmein likha hai aakhiri vaakya — “Ramesh, agar tum padh rahe ho to jaan lena ki main tumse bahut pyar karti thi. Aur dukh ye hai ki pyar kabhi kaafi nahi hota.”

Main chhat ke railing mein khada tha.

Main diary band karta hoon aur bahar dekhta hoon. Aasman mein baadal phir ghire hain. Baarish aane wali hai. Aur main fusfusata hoon, “Kamla… main bhi aa raha hoon. Tum chinta na karna.”

Lekin jawab nahi aata. Sirf sannata.

Neech road par log ikattha ho gaye the.

Aur dard. Wo dard jo kabhi khatam nahi hota.

Pyar ke, ummeed ke, aur toote sapnon ke. Aur prem ka ant hamesha dukhda hota… nahi… lekin…
 
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