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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

STORY HINDI MEIN LIKHUN YA HINGLISH (ROMAN FONT KE SATH) JALD SE JALD REPLY KIJIYE


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INDEX
Family Introduction
Update #01Update # 02Update # 03Update #04Update # 05
Update # 06Update # 07Update #08Update # 09Update # 10
 Update # 11 Update # 12 Update # 13 Update # 14 Update # 15
Update # 16Update # 17Update # 18Update # 19Update # 20
Update # 21
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अरे author साहब… अब तो आपने मुझे और पागल कर दिया!!! 😭💦🔥

पहले तो वो “अंक की रानी” वाला hint…
अब समझ आई!!! 😳😳
यार तुमने तो जान-बूझकर वो डाला था ना???
Manik की “अंक की रानी” मतलब Pari!!!
क्योंकि Pari ही तो Maths में हमेशा अंक लाती है, और Manik उसी को पढ़ाता है…
ओ माय गॉड!!! तुमने तो इतना subtle तरीके से बता दिया कि Manik का subconscious पहले से ही Pari को उसी नज़र से देख रहा है!!!
मैं तो चीख पड़ी ये पढ़ के!!! 🤯💘
तुम कितने शैतान हो यार… इतना गहरा hint छुपा दिया और मैं बेवकूफ़ ऊपर-ऊपर ही खुश हो रही थी 😭

“आपके कमेंट ही किसी का लुंड खड़ा कर दें”
अरे भाई!!! ❤️🔥❤️
ये तो मैंने जान-बूझकर लिखा था ना…
ताकि तुम्हें भी वही गर्मी लगे जो मुझे लग रही है 😈
और अब तुम बोल रहे हो कि कहानी पहले से लिखी हुई है…
तो फिर एक काम करो ना…
जो लिखा है उसे रहने दो, बस एक छोटा सा extra scene डाल दो किसी episode में…
जैसे कोई flashback, या कोई सपना, या बिजली चली जाए वाला night scene…
बस 10-15 लाइन का भी चलेगा…
जिसमें Manik और Pari का वो पहला forbidden touch हो जाए…
बस एक बार…
मैं ज़िंदगी भर तुम्हारी गुलाम बन जाऊँगी 😭🙏

प्लीज़ प्लीज़ प्लीज़…
मेरे लिए कर दो ना…
मैं तो अब हर रात बस यही सोचकर सोने वाली हूँ कि कब आएगा वो सीन…
जब भाई की उँगलियाँ गलती से बहन की कमर पर रुक जाएँ…
जब साँसें एक-दूसरे के होंठों पर टकराएँ…
जब “भाईया” बोलते-बोलते आवाज़ काँप जाए…
बस एक बार वो सीन दे दो…
आपकी सबसे गंदी, सबसे बेकरार, सबसे पागल fan🧎‍♀️💦❤️.
और हाँ… “अंक की रानी” वाला hint के लिए थैंक यू…
अब तो मैं पूरी कहानी फिर से पढ़ूँगी और सारे छुपे हुए incest वाले hints ढूंढूँगी 😈
aapne ank ka jo arth samjha wo bhi galat nahi hai use fit kiya ja sakta hai par meri pyari behna hindi mein ank ka arth goad bhi hota hai...ank ki rani arthat goad ki rani....kyun kaisi rahi aasifa ji...waise main open book hun par sometimes I become unpredictable
 
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अरे यार… मैं तो सच में पागल हो गई!!! 😭🔥💦💦💦

manikmittalme07 तुमने तो आज मेरी सारी हदें पार कर दीं!!!
ये पार्ट नहीं… ये तो pure blue film का trailer था जो मेरे दिमाग में full movie बन गया!!! 🤯❤️

पहले तो Neeru Bua का वो deep-neck T-shirt वाला entry…
बाप रे!!! जब तुमने लिखा कि Manik की नज़र Bua की cleavage पर अटक गई और उसका लौड़ा तुरंत खड़ा हो गया…
मैं तो वहीं बैठी-बैठी सिसकारी लेने लगी!!! 😩💦
फिर Bua ने जो बोला – “मैंने सब देखा… तुम Pari को कुछ और ही ताड़ रहे थे”
ओए होए!!! मेरा तो दिल ही निकल गया!!!
Bua ने Manik को completely expose कर दिया… और वो भी इतने गंदे, इतने साफ तरीके से कि मैं चीख पड़ी!!! 😈

और फिर वो Divya वाला bike scene…
Manik बार-बार Divya के boobs को घूर रहा है…
Divya को कुछ पता ही नहीं…
उफ्फ़्फ़्फ़!!! ये tension, ये एकतरफा lust, ये गंदी नज़रें…
ये तो मेरी सबसे फेवरेट चीज़ है!!! 🔥🔥

तुमने तो आज साबित कर दिया कि तुम incest की असली समझ रखते हो…
वो जो धीरे-धीरे poison फैल रहा है Manik के अंदर…
पहले Pari… अब Divya… और Bua तो already game में है…
अब तो बस एक स्पार्क चाहिए… बस एक रात… बस एक गलती…
और पूरा घर आग के गोले में तब्दील हो जाएगा!!! 🫠💥

मेरी rating: 1000/10
ये पार्ट मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़तरनाक, सबसे गंदा, सबसे perfect incest chapter बन गया!!!

अब अगले पार्ट में मुझे चाहिए अगर पॉसिबल हो तो:
1. बाज़ार से लौटते वक्त बारिश हो जाए ☔
2. दोनों भीग जाएँ… Divya का कुर्ता चिपक जाए… nipple साफ दिखने लगें
3. घर आकर कपड़े बदलने का सीन… Divya towel लपेटकर निकले और Manik देख ले
4. या फिर… Bua Manik को “madad” करने के बहाने बुला ले अपने कमरे में… और कुछ “practical lesson” दे!!! 😈

प्लीज़… अब और इंतज़ार नहीं होता…
मैं तो अभी से बैठी हूँ मोबाइल हाथ में लेकर…
हर 2 मिनट में रिफ्रेश कर रही हूँ…
वरना सच में… मैं मर जाऊँगी!!! 😭💦

तुम्हारे नाम की माला जप रही हूँ आज रात…
manikmittalme07… manikmittalme07… manikmittalme07…
जल्दी अपडेट डालो… वरना मैं तुम्हारी नींद ख़राब कर दूँगी अपने मैसेज से!!! 😏❤️

आपकी सबसे गंदी, सबसे भूखी, सबसे बेकरार fan 🧎🏻‍♀️💋💦
hahaha kal raat bhi ek update daal hi deta par kal rishtedariyon mein ghum rahe the main aur wife. to ho nahi paya. jitni badhia smiksha aapne ki hai abhi tak meri kahani ki main daava karta hun ke aaj tak nahi ki gayi. likhne ka bhi maza aa raha hai. kuchh na kuchh to karunga hi aapke liye fikar not...hahaha lol aur aap jab mujhe bhai sahib kehti hona.....hahaha samajh jao bas jyada detail mein nahi bolunga
 
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Part -9

⚠️ जानबूझकर ब्रेक: अनैतिक स्पर्श और मानिक का आनंद

मानिक और दिव्या बाज़ार के लिए निकल चुके थे। बाइक पर, दिव्या पीछे बैठी थी और दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी। मानिक के दिमाग़ में अभी भी नीरू बुआ की बातें, परी की छवि, और उसकी अपनी आँखों का भटकाव चल रहा था। इन सबने मिलकर उसके अंदर एक अनैतिक साहस और जिज्ञासा पैदा कर दी थी।

मानिक को अपनी बाइक चलाने की आदत थी, और वह जानता था कि किस तरह ब्रेक लगाने पर पीछे बैठे व्यक्ति का शरीर आगे की ओर झुकता है। आज, उसके दिमाग़ में एक ख़तरनाक विचार आया—वह जानबूझकर दिव्या के शरीर के स्पर्श का अनुभव करना चाहता था।

🛑 ब्रेक, बार-बार ब्रेक

सड़क पर ट्रैफ़िक सामान्य था, लेकिन मानिक ने अचानक, बिना किसी ज़रूरी वजह के, तेज़ ब्रेक लगाया।

मानिक की पीठ पर तुरंत दिव्या का शरीर ज़ोर से टकराया। दिव्या के हाथों ने अचानक मानिक की कमर को कसकर पकड़ लिया, और इससे पहले कि वह ख़ुद को संभाल पाती, उसके स्तन (Boobs) मानिक की पीठ से टकरा गए।

दिव्या (हड़बड़ी में): "अरे मानिक! क्या कर रहा है? ध्यान से चला!"

मानिक (सामान्य आवाज़ में, नाटक करते हुए): "सॉरी, सॉरी! वो सामने से अचानक एक कुत्ता आ गया था।"

मानिक ने थोड़ा आगे बढ़कर फिर से बिना किसी स्पष्ट कारण के हल्का-सा ब्रेक लगाया। इस बार टकराव उतना ज़ोरदार नहीं था, लेकिन दिव्या का भरा हुआ शरीर, ख़ासकर उसके वक्षस्थल, एक बार फिर मानिक की पीठ को छू गया।

मानिक को तुरंत एक गहरा, अनैतिक आनंद महसूस हुआ। यह स्पर्श वर्जित था, अनैतिक था, और उसे पता था कि वह अपनी बहन के साथ ग़लत कर रहा है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गई थी। नीरू बुआ की बातों और यौन तड़प ने उसे इस स्तर तक धकेल दिया था।

🧠 दिव्या की अनभिज्ञता

दिव्या, जो अपनी पढ़ाई और जल्दी बाज़ार पहुँचने की चिंता में थी, पूरी तरह से अनभिज्ञ थी कि मानिक यह सब जानबूझकर कर रहा है। उसे लगा कि मानिक हमेशा की तरह लापरवाह ढंग से बाइक चला रहा है, या फिर ट्रैफ़िक ज़्यादा है।

दिव्या (थोड़ा झल्लाते हुए): "मानिक, थोड़ा ध्यान दो न! अगर मुझे कुछ हो गया तो? वैसे भी, तुम हमेशा जल्दबाज़ी में रहते हो।"

मानिक (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "हाँ, हाँ, सॉरी दीदी! अब ध्यान रखता हूँ।"

लेकिन उसका 'ध्यान' सड़क पर कम और अगली बार ब्रेक लगाने के मौक़े पर ज़्यादा था।

बाज़ार तक के छोटे से सफ़र में, मानिक ने न जाने कितनी बार अनावश्यक ब्रेक लगाए। कभी किसी रिक्शे के पास आने का बहाना, कभी किसी गड्ढे से बचने का बहाना। हर ब्रेक पर, दिव्या का शरीर, उसके वक्षस्थल के साथ, उसकी पीठ से टकराता रहा।

मानिक को यह स्पर्श एक गुप्त खेल जैसा लग रहा था। यह एक अनैतिक जीत थी, जहाँ वह अपने छोटे भाई होने का फ़ायदा उठा रहा था, और उसकी बड़ी बहन, जो हमेशा उसे नफ़रत करती थी, अनजाने में उसे एक अनैतिक आनंद दे रही थी।

मानिक की पीठ से टकराने वाले हर स्पर्श पर उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उसे यह भी महसूस हो रहा था कि यह कितना भयानक और ग़लत है, लेकिन शरीर की अनियंत्रित इच्छाएँ उसके विवेक पर हावी हो रही थीं।

🛑 बाज़ार में रुकावट

जब वे बाज़ार पहुँचे और मानिक ने बाइक रोकी, तो दिव्या राहत की साँस लेकर उतरी।

दिव्या (गुस्से से): "शुक्र है! तुम तो ऐसे चला रहे थे जैसे आज ही मुझे अस्पताल पहुँचाना है। अगली बार मैं ऑटो ले लूँगी, तुम्हारा यह एहसान नहीं चाहिए।"

मानिक (मासूमियत का नाटक करते हुए): "अरे, दीदी! मैं तो बस तुम्हें सुरक्षित ले आया। ट्रैफ़िक ही ऐसा था।"

उसने अपनी पीठ पर हाथ फेरा, जहाँ अभी भी दिव्या के शरीर का दबाव महसूस हो रहा था। दिव्या को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने भाई की गुप्त अनैतिकता का शिकार हुई है।

मानिक को लगा कि नीरू बुआ के बोल्‍ड विचारों ने उसके अंदर की जो वर्जित इच्छाएँ जगाई थीं, उसने आज अपनी बहन के साथ उस पर एक गंदी मुहर लगा दी थी। मानिक को यह अहसास हो रहा था कि वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल पड़ा है।

🛍️ बाज़ार में निगाहों का पीछा और दिव्या का अनजाना एहसास

बाज़ार पहुँचकर, दिव्या जल्दी से एक बड़ी स्टेशनरी की दुकान में घुस गई, जहाँ उसे मेडिकल की ज़रूरी किताबें और कुछ उपकरण ख़रीदने थे। मानिक बाइक पार्क करके दुकान से थोड़ी दूर, एक चाय वाले की दुकान के पास खड़ा हो गया।

दिव्या, अपने काम में व्यस्त थी। वह किताबें पलट रही थी, सेल्समैन से बात कर रही थी और लिस्ट मिला रही थी।

👁️ मानिक की अनियंत्रित निगाहें

मानिक को अपनी बाइक पर जानबूझकर ब्रेक लगाने से मिला अनैतिक आनंद अभी भी महसूस हो रहा था। अब दूर खड़े होकर, उसकी नज़रें बार-बार दिव्या की ओर जा रही थीं। स्टेशनरी की दुकान में काफ़ी रोशनी थी, और दिव्या जब भी आगे झुककर किताबों के रैक से कुछ देखती, या सेल्समैन को कुछ समझाती, तो उसके कुर्ते की बनावट के कारण, उसके वक्षस्थल की बनावट और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती थी।

मानिक की निगाहें अब पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुकी थीं। नीरू बुआ के बोल्डपन और पिछले कुछ दिनों की वर्जित जिज्ञासा ने उसे एक ऐसे 'ताड़ने' वाले व्यक्ति में बदल दिया था, जो अपने विवेक को पूरी तरह से खो चुका था। मानिक अपने भाई-बहन के रिश्ते को भूलकर, सिर्फ़ एक उत्तेजित युवा के रूप में दिव्या के शरीर को घूर रहा था।

उसे अंदर ही अंदर अपने इस बर्ताव पर घिन आ रही थी। 'यह मेरी बहन है! मुझे क्या हो गया है?' वह ख़ुद से कहता, लेकिन अगले ही पल, उसकी आँखें फिर से दिव्या के शरीर पर चली जाती थीं।

मानिक को यह भी डर था कि कहीं कोई उसे ताड़ते हुए न देख ले, ख़ासकर दिव्या के दोस्तों में से कोई।


शाम के सात बज चुके थे। सूरज डूबने को था। मानिक ने दिव्या को बाइक पर बिठाया और शहर से बाहर की तरफ़ निकल गया। दिव्या को लगा शायद कोई अच्छी जगह ले जा रहा है – नदी किनारा या कोई ढाबा।

लेकिन मानिक का इरादा कुछ और ही था।

वो शहर से 20-25 किलोमीटर दूर एक सुनसान रोड पर पहुँचा, जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। सिर्फ़ बड़े-बड़े पत्थर, जंगल का किनारा और हल्की सी धुंध।

बाइक रोकी। इंजन बंद किया। चारों तरफ़ सन्नाटा।

दिव्या (हँसते हुए, अभी भी मूड अच्छा था):

“अरे वाह… ये तो बिलकुल फिल्मी जगह है। अब बताओ ना, क्या प्लान है?”

मानिक ने कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें लाल थीं। साँसें तेज़। उसने एक झटके में दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा।

दिव्या (हैरान):

“मानिक… क्या कर रहे हो?”

मानिक ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया और उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ज़ोर का, जबरदस्ती का, बिना इजाज़त का चुम्बन।

दिव्या ने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की।

“छोड़ो… मानिक… पागल हो गए हो क्या??”

लेकिन मानिक ने नहीं छोड़ा। उसने दिव्या को पास के बड़े पत्थरों की ओट में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी।

उसने दिव्या को पत्थर से सटा दिया। एक हाथ से उसके दोनों हाथ ऊपर कर पकड़ लिए, दूसरा हाथ सीधा उसके कुर्ते के अंदर।

दिव्या की आँखें फैली हुई थीं। डर। गुस्सा। अविश्वास।

“मानिक… रुक जाओ… ये गलत है… मैं तेरी बहन हूँ…”

मानिक (फुसफुसाते हुए, पागलपन भरी आवाज़ में):

“बस एक बार… बस आज… मैं पागल हो रहा हूँ दी… तेरे बिना मर जाऊँगा…”

उसने दिव्या का कुर्ता ऊपर खींचा। ब्रा को एक झटके में ऊपर किया। दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। मानिक ने उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।

दिव्या रोने लगी।

“नहीं… छोड़ो मुझे… मैं चिल्लाऊँगी…”

लेकिन चारों तरफ़ सन्नाटा। कोई नहीं था।

मानिक ने अपना पैंट खोला। अपना खड़ा हुआ लंड बाहर निकाला। दिव्या की सलवार का नाड़ा खींचा। उसकी पैंटी नीचे की।

दिव्या ने आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारा, लेकिन मानिक का जोश उसकी ताकत से कहीं ज़्यादा था।

उसने दिव्या को पत्थर पर लिटाया। दोनों टाँगें चौड़ी कीं। और बिना कुछ सोचे, बिना कंडोम, बिना सहमति – अंदर घुस गया।

दिव्या की चीख़ जंगल में गूँज गई… लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

पहले कुछ धक्के में दिव्या सिर्फ़़ रोती रही, हाथ-पैर मारती रही।

“नहीं… बाहर निकाल… मानिक प्लीज़…”

लेकिन दस-पंद्रह धक्कों के बाद… कुछ बदला।

दिव्या की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

मानिक ने महसूस किया – दिव्या ने विरोध करना बंद कर दिया। अब उसके कूल्हे अपने आप हिलने लगे।

दिव्या (धीमी, काँपती आवाज़ में):

“कमीने… हरामी… धीरे से…”

मानिक ने और ज़ोर से शुरू किया। दोनों पत्थरों के बीच, चाँदनी में, भाई-बहन का ये पाप पूरा हो रहा था।

दिव्या ने अब पूरी तरह से साथ देना शुरू कर दिया। उसने मानिक का सिर पकड़ा और अपने स्तनों पर दबाया। मानिक ने उन्हें चूसा, काटा।

फिर मानिक ने उसे उठाया। दिव्या ने खुद ही घुटनों पर बैठ गई। मानिक का लंड उसके मुँह में।

दिव्या ने पहले हिचकिचाया… फिर आँखें बंद कीं और चूसने लगी। जैसे सालों से ये करना चाहती हो।

मानिक का शरीर काँप उठा। वो दिव्या के मुँह में ही झड़ गया।

दोनों पत्थर पर लेट गए। साँसें तेज़। पसीना। चुप्पी।

कुछ देर बाद…

दिव्या (रोते हुए, लेकिन अब गुस्सा नहीं था):

“तूने मेरे साथ बलात्कार किया… मैं कभी माफ़ नहीं करूँगी।”

मानिक (सिर झुकाए):

“मैं… मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा दी… लेकिन मैं रोक नहीं पाया।”

दिव्या ने अपना कुर्ता ठीक किया। आँखें पोंछीं। फिर अचानक वो मुस्कुराई – और फिर जोर जोर से हंसने लगी। फिर अचानक उसने उसे पीठ पर धक्का मारा और माणिक डर गया!
 

kas1709

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Part -9

⚠️ जानबूझकर ब्रेक: अनैतिक स्पर्श और मानिक का आनंद

मानिक और दिव्या बाज़ार के लिए निकल चुके थे। बाइक पर, दिव्या पीछे बैठी थी और दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी। मानिक के दिमाग़ में अभी भी नीरू बुआ की बातें, परी की छवि, और उसकी अपनी आँखों का भटकाव चल रहा था। इन सबने मिलकर उसके अंदर एक अनैतिक साहस और जिज्ञासा पैदा कर दी थी।

मानिक को अपनी बाइक चलाने की आदत थी, और वह जानता था कि किस तरह ब्रेक लगाने पर पीछे बैठे व्यक्ति का शरीर आगे की ओर झुकता है। आज, उसके दिमाग़ में एक ख़तरनाक विचार आया—वह जानबूझकर दिव्या के शरीर के स्पर्श का अनुभव करना चाहता था।

🛑 ब्रेक, बार-बार ब्रेक

सड़क पर ट्रैफ़िक सामान्य था, लेकिन मानिक ने अचानक, बिना किसी ज़रूरी वजह के, तेज़ ब्रेक लगाया।

मानिक की पीठ पर तुरंत दिव्या का शरीर ज़ोर से टकराया। दिव्या के हाथों ने अचानक मानिक की कमर को कसकर पकड़ लिया, और इससे पहले कि वह ख़ुद को संभाल पाती, उसके स्तन (Boobs) मानिक की पीठ से टकरा गए।

दिव्या (हड़बड़ी में): "अरे मानिक! क्या कर रहा है? ध्यान से चला!"

मानिक (सामान्य आवाज़ में, नाटक करते हुए): "सॉरी, सॉरी! वो सामने से अचानक एक कुत्ता आ गया था।"

मानिक ने थोड़ा आगे बढ़कर फिर से बिना किसी स्पष्ट कारण के हल्का-सा ब्रेक लगाया। इस बार टकराव उतना ज़ोरदार नहीं था, लेकिन दिव्या का भरा हुआ शरीर, ख़ासकर उसके वक्षस्थल, एक बार फिर मानिक की पीठ को छू गया।

मानिक को तुरंत एक गहरा, अनैतिक आनंद महसूस हुआ। यह स्पर्श वर्जित था, अनैतिक था, और उसे पता था कि वह अपनी बहन के साथ ग़लत कर रहा है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गई थी। नीरू बुआ की बातों और यौन तड़प ने उसे इस स्तर तक धकेल दिया था।

🧠 दिव्या की अनभिज्ञता

दिव्या, जो अपनी पढ़ाई और जल्दी बाज़ार पहुँचने की चिंता में थी, पूरी तरह से अनभिज्ञ थी कि मानिक यह सब जानबूझकर कर रहा है। उसे लगा कि मानिक हमेशा की तरह लापरवाह ढंग से बाइक चला रहा है, या फिर ट्रैफ़िक ज़्यादा है।

दिव्या (थोड़ा झल्लाते हुए): "मानिक, थोड़ा ध्यान दो न! अगर मुझे कुछ हो गया तो? वैसे भी, तुम हमेशा जल्दबाज़ी में रहते हो।"

मानिक (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "हाँ, हाँ, सॉरी दीदी! अब ध्यान रखता हूँ।"

लेकिन उसका 'ध्यान' सड़क पर कम और अगली बार ब्रेक लगाने के मौक़े पर ज़्यादा था।

बाज़ार तक के छोटे से सफ़र में, मानिक ने न जाने कितनी बार अनावश्यक ब्रेक लगाए। कभी किसी रिक्शे के पास आने का बहाना, कभी किसी गड्ढे से बचने का बहाना। हर ब्रेक पर, दिव्या का शरीर, उसके वक्षस्थल के साथ, उसकी पीठ से टकराता रहा।

मानिक को यह स्पर्श एक गुप्त खेल जैसा लग रहा था। यह एक अनैतिक जीत थी, जहाँ वह अपने छोटे भाई होने का फ़ायदा उठा रहा था, और उसकी बड़ी बहन, जो हमेशा उसे नफ़रत करती थी, अनजाने में उसे एक अनैतिक आनंद दे रही थी।

मानिक की पीठ से टकराने वाले हर स्पर्श पर उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उसे यह भी महसूस हो रहा था कि यह कितना भयानक और ग़लत है, लेकिन शरीर की अनियंत्रित इच्छाएँ उसके विवेक पर हावी हो रही थीं।

🛑 बाज़ार में रुकावट

जब वे बाज़ार पहुँचे और मानिक ने बाइक रोकी, तो दिव्या राहत की साँस लेकर उतरी।

दिव्या (गुस्से से): "शुक्र है! तुम तो ऐसे चला रहे थे जैसे आज ही मुझे अस्पताल पहुँचाना है। अगली बार मैं ऑटो ले लूँगी, तुम्हारा यह एहसान नहीं चाहिए।"

मानिक (मासूमियत का नाटक करते हुए): "अरे, दीदी! मैं तो बस तुम्हें सुरक्षित ले आया। ट्रैफ़िक ही ऐसा था।"

उसने अपनी पीठ पर हाथ फेरा, जहाँ अभी भी दिव्या के शरीर का दबाव महसूस हो रहा था। दिव्या को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने भाई की गुप्त अनैतिकता का शिकार हुई है।

मानिक को लगा कि नीरू बुआ के बोल्‍ड विचारों ने उसके अंदर की जो वर्जित इच्छाएँ जगाई थीं, उसने आज अपनी बहन के साथ उस पर एक गंदी मुहर लगा दी थी। मानिक को यह अहसास हो रहा था कि वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल पड़ा है।

🛍️ बाज़ार में निगाहों का पीछा और दिव्या का अनजाना एहसास

बाज़ार पहुँचकर, दिव्या जल्दी से एक बड़ी स्टेशनरी की दुकान में घुस गई, जहाँ उसे मेडिकल की ज़रूरी किताबें और कुछ उपकरण ख़रीदने थे। मानिक बाइक पार्क करके दुकान से थोड़ी दूर, एक चाय वाले की दुकान के पास खड़ा हो गया।

दिव्या, अपने काम में व्यस्त थी। वह किताबें पलट रही थी, सेल्समैन से बात कर रही थी और लिस्ट मिला रही थी।

👁️ मानिक की अनियंत्रित निगाहें

मानिक को अपनी बाइक पर जानबूझकर ब्रेक लगाने से मिला अनैतिक आनंद अभी भी महसूस हो रहा था। अब दूर खड़े होकर, उसकी नज़रें बार-बार दिव्या की ओर जा रही थीं। स्टेशनरी की दुकान में काफ़ी रोशनी थी, और दिव्या जब भी आगे झुककर किताबों के रैक से कुछ देखती, या सेल्समैन को कुछ समझाती, तो उसके कुर्ते की बनावट के कारण, उसके वक्षस्थल की बनावट और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती थी।

मानिक की निगाहें अब पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुकी थीं। नीरू बुआ के बोल्डपन और पिछले कुछ दिनों की वर्जित जिज्ञासा ने उसे एक ऐसे 'ताड़ने' वाले व्यक्ति में बदल दिया था, जो अपने विवेक को पूरी तरह से खो चुका था। मानिक अपने भाई-बहन के रिश्ते को भूलकर, सिर्फ़ एक उत्तेजित युवा के रूप में दिव्या के शरीर को घूर रहा था।

उसे अंदर ही अंदर अपने इस बर्ताव पर घिन आ रही थी। 'यह मेरी बहन है! मुझे क्या हो गया है?' वह ख़ुद से कहता, लेकिन अगले ही पल, उसकी आँखें फिर से दिव्या के शरीर पर चली जाती थीं।

मानिक को यह भी डर था कि कहीं कोई उसे ताड़ते हुए न देख ले, ख़ासकर दिव्या के दोस्तों में से कोई।


शाम के सात बज चुके थे। सूरज डूबने को था। मानिक ने दिव्या को बाइक पर बिठाया और शहर से बाहर की तरफ़ निकल गया। दिव्या को लगा शायद कोई अच्छी जगह ले जा रहा है – नदी किनारा या कोई ढाबा।

लेकिन मानिक का इरादा कुछ और ही था।

वो शहर से 20-25 किलोमीटर दूर एक सुनसान रोड पर पहुँचा, जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। सिर्फ़ बड़े-बड़े पत्थर, जंगल का किनारा और हल्की सी धुंध।

बाइक रोकी। इंजन बंद किया। चारों तरफ़ सन्नाटा।

दिव्या (हँसते हुए, अभी भी मूड अच्छा था):

“अरे वाह… ये तो बिलकुल फिल्मी जगह है। अब बताओ ना, क्या प्लान है?”

मानिक ने कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें लाल थीं। साँसें तेज़। उसने एक झटके में दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा।

दिव्या (हैरान):

“मानिक… क्या कर रहे हो?”

मानिक ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया और उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ज़ोर का, जबरदस्ती का, बिना इजाज़त का चुम्बन।

दिव्या ने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की।

“छोड़ो… मानिक… पागल हो गए हो क्या??”

लेकिन मानिक ने नहीं छोड़ा। उसने दिव्या को पास के बड़े पत्थरों की ओट में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी।

उसने दिव्या को पत्थर से सटा दिया। एक हाथ से उसके दोनों हाथ ऊपर कर पकड़ लिए, दूसरा हाथ सीधा उसके कुर्ते के अंदर।

दिव्या की आँखें फैली हुई थीं। डर। गुस्सा। अविश्वास।

“मानिक… रुक जाओ… ये गलत है… मैं तेरी बहन हूँ…”

मानिक (फुसफुसाते हुए, पागलपन भरी आवाज़ में):

“बस एक बार… बस आज… मैं पागल हो रहा हूँ दी… तेरे बिना मर जाऊँगा…”

उसने दिव्या का कुर्ता ऊपर खींचा। ब्रा को एक झटके में ऊपर किया। दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। मानिक ने उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।

दिव्या रोने लगी।

“नहीं… छोड़ो मुझे… मैं चिल्लाऊँगी…”

लेकिन चारों तरफ़ सन्नाटा। कोई नहीं था।

मानिक ने अपना पैंट खोला। अपना खड़ा हुआ लंड बाहर निकाला। दिव्या की सलवार का नाड़ा खींचा। उसकी पैंटी नीचे की।

दिव्या ने आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारा, लेकिन मानिक का जोश उसकी ताकत से कहीं ज़्यादा था।

उसने दिव्या को पत्थर पर लिटाया। दोनों टाँगें चौड़ी कीं। और बिना कुछ सोचे, बिना कंडोम, बिना सहमति – अंदर घुस गया।

दिव्या की चीख़ जंगल में गूँज गई… लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

पहले कुछ धक्के में दिव्या सिर्फ़़ रोती रही, हाथ-पैर मारती रही।

“नहीं… बाहर निकाल… मानिक प्लीज़…”

लेकिन दस-पंद्रह धक्कों के बाद… कुछ बदला।

दिव्या की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

मानिक ने महसूस किया – दिव्या ने विरोध करना बंद कर दिया। अब उसके कूल्हे अपने आप हिलने लगे।

दिव्या (धीमी, काँपती आवाज़ में):

“कमीने… हरामी… धीरे से…”

मानिक ने और ज़ोर से शुरू किया। दोनों पत्थरों के बीच, चाँदनी में, भाई-बहन का ये पाप पूरा हो रहा था।

दिव्या ने अब पूरी तरह से साथ देना शुरू कर दिया। उसने मानिक का सिर पकड़ा और अपने स्तनों पर दबाया। मानिक ने उन्हें चूसा, काटा।

फिर मानिक ने उसे उठाया। दिव्या ने खुद ही घुटनों पर बैठ गई। मानिक का लंड उसके मुँह में।

दिव्या ने पहले हिचकिचाया… फिर आँखें बंद कीं और चूसने लगी। जैसे सालों से ये करना चाहती हो।

मानिक का शरीर काँप उठा। वो दिव्या के मुँह में ही झड़ गया।

दोनों पत्थर पर लेट गए। साँसें तेज़। पसीना। चुप्पी।

कुछ देर बाद…

दिव्या (रोते हुए, लेकिन अब गुस्सा नहीं था):

“तूने मेरे साथ बलात्कार किया… मैं कभी माफ़ नहीं करूँगी।”

मानिक (सिर झुकाए):

“मैं… मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा दी… लेकिन मैं रोक नहीं पाया।”


दिव्या ने अपना कुर्ता ठीक किया। आँखें पोंछीं। फिर अचानक वो मुस्कुराई – और फिर जोर जोर से हंसने लगी। फिर अचानक उसने उसे पीठ पर धक्का मारा और माणिक डर गया!
Nice update....
 

parkas

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Part -9

⚠️ जानबूझकर ब्रेक: अनैतिक स्पर्श और मानिक का आनंद

मानिक और दिव्या बाज़ार के लिए निकल चुके थे। बाइक पर, दिव्या पीछे बैठी थी और दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी। मानिक के दिमाग़ में अभी भी नीरू बुआ की बातें, परी की छवि, और उसकी अपनी आँखों का भटकाव चल रहा था। इन सबने मिलकर उसके अंदर एक अनैतिक साहस और जिज्ञासा पैदा कर दी थी।

मानिक को अपनी बाइक चलाने की आदत थी, और वह जानता था कि किस तरह ब्रेक लगाने पर पीछे बैठे व्यक्ति का शरीर आगे की ओर झुकता है। आज, उसके दिमाग़ में एक ख़तरनाक विचार आया—वह जानबूझकर दिव्या के शरीर के स्पर्श का अनुभव करना चाहता था।

🛑 ब्रेक, बार-बार ब्रेक

सड़क पर ट्रैफ़िक सामान्य था, लेकिन मानिक ने अचानक, बिना किसी ज़रूरी वजह के, तेज़ ब्रेक लगाया।

मानिक की पीठ पर तुरंत दिव्या का शरीर ज़ोर से टकराया। दिव्या के हाथों ने अचानक मानिक की कमर को कसकर पकड़ लिया, और इससे पहले कि वह ख़ुद को संभाल पाती, उसके स्तन (Boobs) मानिक की पीठ से टकरा गए।

दिव्या (हड़बड़ी में): "अरे मानिक! क्या कर रहा है? ध्यान से चला!"

मानिक (सामान्य आवाज़ में, नाटक करते हुए): "सॉरी, सॉरी! वो सामने से अचानक एक कुत्ता आ गया था।"

मानिक ने थोड़ा आगे बढ़कर फिर से बिना किसी स्पष्ट कारण के हल्का-सा ब्रेक लगाया। इस बार टकराव उतना ज़ोरदार नहीं था, लेकिन दिव्या का भरा हुआ शरीर, ख़ासकर उसके वक्षस्थल, एक बार फिर मानिक की पीठ को छू गया।

मानिक को तुरंत एक गहरा, अनैतिक आनंद महसूस हुआ। यह स्पर्श वर्जित था, अनैतिक था, और उसे पता था कि वह अपनी बहन के साथ ग़लत कर रहा है, लेकिन उसके शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गई थी। नीरू बुआ की बातों और यौन तड़प ने उसे इस स्तर तक धकेल दिया था।

🧠 दिव्या की अनभिज्ञता

दिव्या, जो अपनी पढ़ाई और जल्दी बाज़ार पहुँचने की चिंता में थी, पूरी तरह से अनभिज्ञ थी कि मानिक यह सब जानबूझकर कर रहा है। उसे लगा कि मानिक हमेशा की तरह लापरवाह ढंग से बाइक चला रहा है, या फिर ट्रैफ़िक ज़्यादा है।

दिव्या (थोड़ा झल्लाते हुए): "मानिक, थोड़ा ध्यान दो न! अगर मुझे कुछ हो गया तो? वैसे भी, तुम हमेशा जल्दबाज़ी में रहते हो।"

मानिक (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "हाँ, हाँ, सॉरी दीदी! अब ध्यान रखता हूँ।"

लेकिन उसका 'ध्यान' सड़क पर कम और अगली बार ब्रेक लगाने के मौक़े पर ज़्यादा था।

बाज़ार तक के छोटे से सफ़र में, मानिक ने न जाने कितनी बार अनावश्यक ब्रेक लगाए। कभी किसी रिक्शे के पास आने का बहाना, कभी किसी गड्ढे से बचने का बहाना। हर ब्रेक पर, दिव्या का शरीर, उसके वक्षस्थल के साथ, उसकी पीठ से टकराता रहा।

मानिक को यह स्पर्श एक गुप्त खेल जैसा लग रहा था। यह एक अनैतिक जीत थी, जहाँ वह अपने छोटे भाई होने का फ़ायदा उठा रहा था, और उसकी बड़ी बहन, जो हमेशा उसे नफ़रत करती थी, अनजाने में उसे एक अनैतिक आनंद दे रही थी।

मानिक की पीठ से टकराने वाले हर स्पर्श पर उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उसे यह भी महसूस हो रहा था कि यह कितना भयानक और ग़लत है, लेकिन शरीर की अनियंत्रित इच्छाएँ उसके विवेक पर हावी हो रही थीं।

🛑 बाज़ार में रुकावट

जब वे बाज़ार पहुँचे और मानिक ने बाइक रोकी, तो दिव्या राहत की साँस लेकर उतरी।

दिव्या (गुस्से से): "शुक्र है! तुम तो ऐसे चला रहे थे जैसे आज ही मुझे अस्पताल पहुँचाना है। अगली बार मैं ऑटो ले लूँगी, तुम्हारा यह एहसान नहीं चाहिए।"

मानिक (मासूमियत का नाटक करते हुए): "अरे, दीदी! मैं तो बस तुम्हें सुरक्षित ले आया। ट्रैफ़िक ही ऐसा था।"

उसने अपनी पीठ पर हाथ फेरा, जहाँ अभी भी दिव्या के शरीर का दबाव महसूस हो रहा था। दिव्या को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वह अपने भाई की गुप्त अनैतिकता का शिकार हुई है।

मानिक को लगा कि नीरू बुआ के बोल्‍ड विचारों ने उसके अंदर की जो वर्जित इच्छाएँ जगाई थीं, उसने आज अपनी बहन के साथ उस पर एक गंदी मुहर लगा दी थी। मानिक को यह अहसास हो रहा था कि वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल पड़ा है।

🛍️ बाज़ार में निगाहों का पीछा और दिव्या का अनजाना एहसास

बाज़ार पहुँचकर, दिव्या जल्दी से एक बड़ी स्टेशनरी की दुकान में घुस गई, जहाँ उसे मेडिकल की ज़रूरी किताबें और कुछ उपकरण ख़रीदने थे। मानिक बाइक पार्क करके दुकान से थोड़ी दूर, एक चाय वाले की दुकान के पास खड़ा हो गया।

दिव्या, अपने काम में व्यस्त थी। वह किताबें पलट रही थी, सेल्समैन से बात कर रही थी और लिस्ट मिला रही थी।

👁️ मानिक की अनियंत्रित निगाहें

मानिक को अपनी बाइक पर जानबूझकर ब्रेक लगाने से मिला अनैतिक आनंद अभी भी महसूस हो रहा था। अब दूर खड़े होकर, उसकी नज़रें बार-बार दिव्या की ओर जा रही थीं। स्टेशनरी की दुकान में काफ़ी रोशनी थी, और दिव्या जब भी आगे झुककर किताबों के रैक से कुछ देखती, या सेल्समैन को कुछ समझाती, तो उसके कुर्ते की बनावट के कारण, उसके वक्षस्थल की बनावट और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती थी।

मानिक की निगाहें अब पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुकी थीं। नीरू बुआ के बोल्डपन और पिछले कुछ दिनों की वर्जित जिज्ञासा ने उसे एक ऐसे 'ताड़ने' वाले व्यक्ति में बदल दिया था, जो अपने विवेक को पूरी तरह से खो चुका था। मानिक अपने भाई-बहन के रिश्ते को भूलकर, सिर्फ़ एक उत्तेजित युवा के रूप में दिव्या के शरीर को घूर रहा था।

उसे अंदर ही अंदर अपने इस बर्ताव पर घिन आ रही थी। 'यह मेरी बहन है! मुझे क्या हो गया है?' वह ख़ुद से कहता, लेकिन अगले ही पल, उसकी आँखें फिर से दिव्या के शरीर पर चली जाती थीं।

मानिक को यह भी डर था कि कहीं कोई उसे ताड़ते हुए न देख ले, ख़ासकर दिव्या के दोस्तों में से कोई।


शाम के सात बज चुके थे। सूरज डूबने को था। मानिक ने दिव्या को बाइक पर बिठाया और शहर से बाहर की तरफ़ निकल गया। दिव्या को लगा शायद कोई अच्छी जगह ले जा रहा है – नदी किनारा या कोई ढाबा।

लेकिन मानिक का इरादा कुछ और ही था।

वो शहर से 20-25 किलोमीटर दूर एक सुनसान रोड पर पहुँचा, जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। सिर्फ़ बड़े-बड़े पत्थर, जंगल का किनारा और हल्की सी धुंध।

बाइक रोकी। इंजन बंद किया। चारों तरफ़ सन्नाटा।

दिव्या (हँसते हुए, अभी भी मूड अच्छा था):

“अरे वाह… ये तो बिलकुल फिल्मी जगह है। अब बताओ ना, क्या प्लान है?”

मानिक ने कुछ नहीं बोला। उसकी आँखें लाल थीं। साँसें तेज़। उसने एक झटके में दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपनी ओर खींचा।

दिव्या (हैरान):

“मानिक… क्या कर रहे हो?”

मानिक ने उसका मुँह अपने हाथ से बंद किया और उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। ज़ोर का, जबरदस्ती का, बिना इजाज़त का चुम्बन।

दिव्या ने दोनों हाथों से उसे धक्का देने की कोशिश की।

“छोड़ो… मानिक… पागल हो गए हो क्या??”

लेकिन मानिक ने नहीं छोड़ा। उसने दिव्या को पास के बड़े पत्थरों की ओट में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी।

उसने दिव्या को पत्थर से सटा दिया। एक हाथ से उसके दोनों हाथ ऊपर कर पकड़ लिए, दूसरा हाथ सीधा उसके कुर्ते के अंदर।

दिव्या की आँखें फैली हुई थीं। डर। गुस्सा। अविश्वास।

“मानिक… रुक जाओ… ये गलत है… मैं तेरी बहन हूँ…”

मानिक (फुसफुसाते हुए, पागलपन भरी आवाज़ में):

“बस एक बार… बस आज… मैं पागल हो रहा हूँ दी… तेरे बिना मर जाऊँगा…”

उसने दिव्या का कुर्ता ऊपर खींचा। ब्रा को एक झटके में ऊपर किया। दोनों बड़े-बड़े स्तन बाहर आ गए। मानिक ने उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।

दिव्या रोने लगी।

“नहीं… छोड़ो मुझे… मैं चिल्लाऊँगी…”

लेकिन चारों तरफ़ सन्नाटा। कोई नहीं था।

मानिक ने अपना पैंट खोला। अपना खड़ा हुआ लंड बाहर निकाला। दिव्या की सलवार का नाड़ा खींचा। उसकी पैंटी नीचे की।

दिव्या ने आखिरी बार ज़ोर से धक्का मारा, लेकिन मानिक का जोश उसकी ताकत से कहीं ज़्यादा था।

उसने दिव्या को पत्थर पर लिटाया। दोनों टाँगें चौड़ी कीं। और बिना कुछ सोचे, बिना कंडोम, बिना सहमति – अंदर घुस गया।

दिव्या की चीख़ जंगल में गूँज गई… लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

पहले कुछ धक्के में दिव्या सिर्फ़़ रोती रही, हाथ-पैर मारती रही।

“नहीं… बाहर निकाल… मानिक प्लीज़…”

लेकिन दस-पंद्रह धक्कों के बाद… कुछ बदला।

दिव्या की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

मानिक ने महसूस किया – दिव्या ने विरोध करना बंद कर दिया। अब उसके कूल्हे अपने आप हिलने लगे।

दिव्या (धीमी, काँपती आवाज़ में):

“कमीने… हरामी… धीरे से…”

मानिक ने और ज़ोर से शुरू किया। दोनों पत्थरों के बीच, चाँदनी में, भाई-बहन का ये पाप पूरा हो रहा था।

दिव्या ने अब पूरी तरह से साथ देना शुरू कर दिया। उसने मानिक का सिर पकड़ा और अपने स्तनों पर दबाया। मानिक ने उन्हें चूसा, काटा।

फिर मानिक ने उसे उठाया। दिव्या ने खुद ही घुटनों पर बैठ गई। मानिक का लंड उसके मुँह में।

दिव्या ने पहले हिचकिचाया… फिर आँखें बंद कीं और चूसने लगी। जैसे सालों से ये करना चाहती हो।

मानिक का शरीर काँप उठा। वो दिव्या के मुँह में ही झड़ गया।

दोनों पत्थर पर लेट गए। साँसें तेज़। पसीना। चुप्पी।

कुछ देर बाद…

दिव्या (रोते हुए, लेकिन अब गुस्सा नहीं था):

“तूने मेरे साथ बलात्कार किया… मैं कभी माफ़ नहीं करूँगी।”

मानिक (सिर झुकाए):

“मैं… मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा दी… लेकिन मैं रोक नहीं पाया।”


दिव्या ने अपना कुर्ता ठीक किया। आँखें पोंछीं। फिर अचानक वो मुस्कुराई – और फिर जोर जोर से हंसने लगी। फिर अचानक उसने उसे पीठ पर धक्का मारा और माणिक डर गया!
Bahut hi badhiya update diya hai manikmittalme07 bhai....
Nice and beautiful update....
 
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