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Apan story title ko hi justify karega men, title isi liye aisa hai kyoki story ka plot waisa hai...baaki kya yogayog hoga, kya Sanjog hoga...ye sab aage pata chal hi jaayega ju koStory ka naam Beraham Ishq he
Isse jyada na kam ki apeksha hum nahi karenge.
Par ha sanyog bhi yoga yog se he bante he, ab ye yogayog prakritik ho ya sawdhani se bune hue jaal ho ye to koi nahi keh sakta![]()
Wo budhau sach me nashe me thaArman ne kaha ke Ashok nashe me thaAb safai pehle Ashok dega fir uspe Arman ki kahi baat kitni sach he ye batayegi
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Pyar karna parKahani ka saar yahi he ke pyaar matt karna aur karna to bhi itna na karna ke pyar ke ilawa tumhare paas kuchh bache na !
iske liye... 
Duniya me kuch bhi mushkil nahi hai dost, bas zarurat hoti hai samdhaan khojne ki aur situation create karne kiArman ke liye rasta mushkil h
Armaan ke liye raasta mushkil hota jaa raha hai uske apne sathi bhi ab Priya ke liye hamdardi lekar Beth Gaye hai. Arman ko bhi sochna chahiye ki aap aaj se 8 saal pehlay ki baat ko Ghar kar ke beth gaye ho arey woh age hi jam hoti hai insaan ko itna sab cheezo ka pata nahi hota hai.

Kahani itni jaldi thode na khatm ho jayegi bro...Arman se itna jaldi peechha thode na chhoot jayega....कहते है कि कभी कभी एक छोटी सी गलती पूरी मेहनत पे पानी फेर देती है, ये accident ऐसा ही है, अपने पति को इस हालत में देख पक्का प्रिया के मन में अरमान के लिए जो कुछ भावनाएं उठी थीं वो कम हो जाएंगी, अगर प्रिया एक सही लड़की हुई तो
जो ना मिले तो सोना, जो मिल जाए तो मिट्टी।
Arman ka pyar sachcha hi hai...bas thode se jazbaat badal gaye hainदेखते है प्रिया को कब तक ये बात समझ आएगी कि अरमान बस use कर रहा

"फ़िक्र मत कर।" अरमान ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर उसके धुएं को उगलते हुए कहा──"अपनी ज़िंदगी में सिर्फ उसी को तो टूट टूट कर चाहा है मैंने। ज़ाहिर है उसे ऐसी तकलीफ़ तो नहीं दे सकूंगा जिसके चलते खुद मुझे भी तकलीफ़ हो। मगर हां, इतना तो उसे ज़रूर मिलेगा जितने में उसे ये एहसास हो सके कि किसी के द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने से एक इंसान कैसे घुट घुट के जीता है?"
उसकी बातें सुन कर विशाल के समूचे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
किसी अंजानी आशंका के चलते उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी पैदा हो गई थी।
जाने कैसे कैसे ख़याल उसके मन में उभरते चले गए।
उधर अरमान के चेहरे पर अजीब सी सख़्ती छाई हुई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो अंगुलियों के मध्य फंसी सिगरेट आधे से ज़्यादा सुलग चुकी थी।
Shaandar update
Nice update....
Nice update....
Story ka naam Beraham Ishq he
Isse jyada na kam ki apeksha hum nahi karenge.
Par ha sanyog bhi yoga yog se he bante he, ab ye yogayog prakritik ho ya sawdhani se bune hue jaal ho ye to koi nahi keh sakta
Arman ne kaha ke Ashok nashe me thaAb safai pehle Ashok dega fir uspe Arman ki kahi baat kitni sach he ye batayegi
Kahani ka saar yahi he ke pyaar matt karna aur karna to bhi itna na karna ke pyar ke ilawa tumhare paas kuchh bache na !
Arman ke liye rasta mushkil h
Armaan ke liye raasta mushkil hota jaa raha hai uske apne sathi bhi ab Priya ke liye hamdardi lekar Beth Gaye hai. Arman ko bhi sochna chahiye ki aap aaj se 8 saal pehlay ki baat ko Ghar kar ke beth gaye ho arey woh age hi jam hoti hai insaan ko itna sab cheezo ka pata nahi hota hai.
intezaar rahega....
कहते है कि कभी कभी एक छोटी सी गलती पूरी मेहनत पे पानी फेर देती है, ये accident ऐसा ही है, अपने पति को इस हालत में देख पक्का प्रिया के मन में अरमान के लिए जो कुछ भावनाएं उठी थीं वो कम हो जाएंगी, अगर प्रिया एक सही लड़की हुई तो
जो ना मिले तो सोना, जो मिल जाए तो मिट्टी।
देखते है प्रिया को कब तक ये बात समझ आएगी कि अरमान बस use कर रहा
Next update posted guysintezaar rahega....


Bahut hi badhiya update diya hai TheBlackBlood bhai....Update ~ 13
"अ..अरे! सर आप?" साक्षी के साथ आए विशाल को देखते ही अशोक बुरी तरह चौंक पड़ा। बेयकीनी से उसे देखते हुए बोला──"अ..आप यहां कैसे?"
"अब कैसी तबीयत है मिस्टर खत्री?" विशाल ने उसकी हालत का मन ही मन लुत्फ़ उठाते हुए किंतु हल्के से मुस्कुरा कर पूछा।
अशोक जो उसके यहां होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था उसे अपने सामने खड़ा देख चकित सा हो गया था। विशाल के द्वारा तबीयत का पूछने पर ही जैसे उसे होश आया।
"अ...अब पहले से बेहतर हूं स..सर।" अशोक ने हकलाते हुए जवाब दिया।
"क्या आप दोनों एक दूसरे को जानते हैं?" साक्षी ने अंजान बन कर अपने पति विशाल से पूछा।
वहीं दूसरी तरफ प्रिया भी ये सोच कर हैरान हो गई थी कि उसका पति साक्षी के पति विशाल को सर क्यों कह रहा है?
"हां डियर।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ जैसे प्रिया पर बम फोड़ा──"असल में मिस्टर खत्री उसी कंपनी में जी-आई के इंचार्ज हैं जहां पर मैं हूं। पहले मुझे पता नहीं था कि ये असल में तुम्हारी दोस्त प्रिया के हसबैंड हैं।"
"ओह! तभी मैं सोचूं कि तुम अशोक जी को मिस्टर खत्री कह के कैसे पुकार रहे थे?" साक्षी ने पहले की ही भांति अंजान बनते हुए कहा──"ख़ैर ये तो बहुत अच्छी बात है कि अशोक जी उसी कंपनी में काम करते हैं। प्रिया तो मेरी दोस्त है ही किंतु अब तुम्हारा भी अशोक जी से नाता जुड़ गया है।"
"हां सही कहा।" विशाल की मुस्कान गहरी हो गई──"वेल, सॉरी मिस्टर खत्री, ज़रूरी काम से बाहर चला गया था इस लिए इलाज़ के फ़ौरन बाद आपसे मिल नहीं पाया।"
"कोई बात नहीं स..सर।" अशोक को बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकता था, बोला──"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे बीच ऐसे संबंध निकल आएंगे।"
"हां ये तो है।" विशाल ने कहा──"लेकिन अब क्योंकि हमारा आपस में ऐसा संबंध बन गया है तो मैं चाहता हूं कि आप मुझे सर न कहें। वैसे भी उमर में आपसे काफी छोटा हूं तो आप मुझे मेरे नाम से संबोधित कर सकते हैं।"
"ठीक है सर....मेरा मतलब है कि विशाल जी।" अशोक हकला सा गया──"लेकिन कंपनी के अंदर तो आप मेरे सर ही कहलाएंगे।"
"क्या करें मिस्टर खत्री।" विशाल ने कहा──"हर जगह की अपनी एक अलग इंपोर्टेंस है। वहां पर हर इंसान को नियम कानून के तहत ही बिहेव करना मजबूरी होती है।"
"सही कहा आपने।" अशोक ने कहा, फिर सहसा वो हड़बड़ाया──"अरे! आप खड़े क्यों हैं विशाल जी? प्लीज़ बैठिए ना। प्रिया, तुम यूं चुप सी क्यों खड़ी हो? इतने बड़े लोग आए हैं हमारे घर, थोड़ा तो ख़याल करो।"
अशोक की इस बात से प्रिया को जैसे अब होश आया।
वो एकदम से हड़बड़ा गई।
फिर खुद को सम्हाल कर जल्दी ही साक्षी और विशाल को सोफे पर बैठाया।
हालाकि साक्षी और विशाल ने मुस्कुराते हुए उसे परेशान न होने की हिदायत दी।
अशोक मन ही मन ये सोच रहा था कि ये सब क्या चक्कर चल पड़ा है उसके साथ?
उसकी पत्नी की दोस्त का पति एक ऐसा व्यक्ति निकला जो असल में उसका बड़ा अधिकारी है और जिसे वो सर कहता है।
अशोक को इस एहसास ने बड़ा अजीब सा महसूस करवाया।
वो इसी बात से समझ गया कि उसकी पत्नी की दोस्त किसी मामूली खानदान से नहीं है।
इधर प्रिया ने साक्षी और विशाल के मना करने के बावजूद उन्हें चाय नाश्ता करवाया।
ये अलग बात है कि प्रिया इस सबके बीच भी बार बार यही सोच बैठती थी कि ये सब आख़िर हो क्या रह है?
उधर एक अरमान है जो अचानक से ही उसके पति को अपना खून दे कर बचाने आ गया था और दूसरी तरफ साक्षी का पति है जो किसी जादू की तरह उसके पति का अधिकारी बना दिख गया।
आख़िर ऊपर वाले की ये कैसी लीला है?
थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के बाद साक्षी और विशाल दोनों पति पत्नी से इजाज़त ले कर चले गए।
दोनों के जाने के बाद प्रिया कमरे में अपने पति के पास पहुंची।
अशोक को दवा देने का समय हो गया था।
"क्या सोच रहे हैं?" प्रिया ने अशोक को कहीं खोए हुए देखा तो पूछा।
"सोच रहा हूं कि ऊपर वाला भी कैसे कैसे संजोग बना देता है।" अशोक ने गहरी सांस ले कर कहा──"तुम्हें पता है, तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड ही वो व्यक्ति है जिसने मेरे लिए परेशानी खड़ी कर रखी थी।"
"क...क्या??" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" अशोक ने कहा──"लेकिन देखो, ऊपर वाले ने ऐसा सीन क्रिएट किया कि वही व्यक्ति अब शायद मेरे लिए कोई परेशानी नहीं खड़ी करेगा। आख़िर उसे भी तो अब पता चल गया है कि मैं उसकी वाइफ की दोस्त का हसबैंड हूं। आज जिस तरह से वो मुझसे पेश आया था उससे यही लगता है कि अब शायद ही वो मेरे लिए कोई समस्या खड़ी करेगा।"
"भगवान करे ऐसा ही हो।" प्रिया ने कुछ सोचते हुए कहा──"वैसे क्या सच में साक्षी का हसबैंड उसी कंपनी में आपका बड़ा अधिकारी है?"
"हां बेबी।" अशोक ने कहा──"पर मुझे ये नहीं पता था कि वो तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड निकलेगा।"
"मैंने भी कहां सोचा था कि इतना बड़ा व्यक्ति साक्षी का हसबैंड होगा।"
प्रिया सचमुच मन ही मन हैरान थी।
जाने क्यों उसे साक्षी से ईर्ष्या सी हुई।
"चलो जो भी हो।" अशोक ने कहा──"अच्छी बात ये है कि तुम्हारी दोस्त साक्षी की वजह से अब उसका हसबैंड मेरे लिए कोई समस्या नहीं खड़ी करेगा।"
प्रिया ने इस बार कुछ कहा नहीं लेकिन मन ही मन इस सोच में डूब गई थी कि साक्षी तो सचमुच उससे ज़्यादा पैसे वाली निकली। उस दिन जब उसने अपने परिवार के बारे में और आर्थिक स्थिति के बारे में बताया था तो प्रिया को यही लगा था कि वो झूठ मूठ का उसके सामने अपने बड़े और संपन्न होने का बखान कर रही है लेकिन अब जब उसे उसकी असलियत का पता चल गया तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।
बहरहाल, उसने अशोक को दवा दी और घर के बाकी कामों में लग गई।
मीरा पिछले दो दिन से काम पर नहीं आ रही थी क्योंकि उसकी तबीयत ख़राब थी।
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शाम के छह बज रहे थे।
प्रिया किचेन में रात के लिए डिनर बनाने की तैयारी कर रही थी।
अशोक की हालत पहले से बेहतर थी लेकिन डॉक्टर ने उसे अभी कुछ दिन घर में रह कर ही आराम करने को कहा था।
उसकी सौतेली बेटी अंकिता कुछ देर अपने डैड के पास बैठने के बाद अपने कमरे में पढ़ाई करने जा चुकी थी।
प्रिया किचेन में डिनर बनाने के लिए सब्जियां धो रही थी कि तभी उसका मोबाइल फ़ोन बजा।
मोबाइल क्योंकि किचेन में ही एक तरफ रखा हुआ था इस लिए उसने उसे उठाया। मोबाइल स्क्रीन पर साक्षी का नाम फ्लैश होता देख उसके मन में उसके प्रति थोड़ी जलन की भावना उभर आई।
हालाकि साक्षी ने इतनी बड़ी मुसीबत में उसकी बहुत हेल्प की थी जिसके लिए उसे उसका एहसानमंद होना चाहिए था लेकिन जाने क्यों उसके मन में साक्षी के प्रति जलन की भावना घर करने लगी थी।
बहरहाल, उसने कॉल रिसीव की।
"मैंने तुझे डिस्टर्ब तो नहीं किया ना?" उधर से साक्षी की मधुर आवाज़ उसके कान में पड़ी।
"नहीं तो।" प्रत्यक्ष में प्रिया को बोलना पड़ा──"बस डिनर बनाने की तैयारी कर रही हूं। तुझे बताया था न कि मेड की तबीयत ख़राब है इस लिए वो दो दिन से नहीं आ रही। ख़ैर तू बता, क्या कर रही है?"
"मैं भी तेरी तरह डिनर बनाने ही जा रही थी यार।" साक्षी ने उधर से कहा──"अभी थोड़ी देर पहले मेरी ननद स्नेहा वापस घर गई है। विशाल उसे रेलवे स्टेशन छोड़ने गए हैं।"
"बड़ा जल्दी तेरी ननद वापस चली गई।" प्रिया ने आलू छीलते हुए कहा──"लगता है तेरे पास ज़्यादा मन नहीं लग रहा था उसका।"
"नहीं, ऐसी बात नहीं है यार।" साक्षी ने कहा──"मन तो उसका बहुत लग रहा था क्योंकि यहां पर उसे एक तरह से आज़ादी थी। असल में जिससे उसकी शादी होने वाली है उससे फ़ोन पर बात करने का उसे वक्त ही वक्त मिलता था यहां लेकिन मां जी को उसकी ये आज़ादी रास ही नहीं आई। दो दिन से फ़ोन कर के उसे वापस आने को कह रहीं थी तो विशाल ने भी आज समय निकाल कर उसके जाने की व्यवस्था कर दी। पहले उसे शॉपिंग करवाई और फिर फर्स्ट क्लास एसी की टिकट बनवा कर उसे भेजने गए।"
"तो कब है तेरी ननद की शादी?"
"नवंबर में।" उधर से साक्षी ने कहा──"अच्छा एक बात तो बताना भूल ही गई तुझे। आज अरमान मिला था मुझे।"
साक्षी के मुख से अरमान का नाम सुनते ही प्रिया का आलू छीलता हांथ रुक गया।
उसकी धड़कनें थम सी गईं।
दिलो दिमाग़ में अजीब सा एहसास भरता चला गया।
फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला।
"असल में अपनी ननद को छोड़ने मैं फ्लैट से नीचे तक गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"विशाल तो उसे कार में बैठा कर रेलवे स्टेशन की तरफ निकल गए जबकि मैं नीचे ही एक आइसक्रीम वाले के पास रुक कर उससे आइसक्रीम लेने लगी थी। तभी एक टैक्सी मुझसे थोड़ी दूरी पर रुकी तो अनायास ही मेरी नज़र टैक्सी की ड्राइविंग सीट पर बैठे अरमान पर पड़ गई। टैक्सी से सवारी उतारने के बाद वो आगे बढ़ने ही वाला था कि मैंने उसे हाथ हिला कर आवाज़ दी। वो मुझे देख कर पहले तो चौंका फिर टैक्सी को बढ़ा कर मेरे पास आया।"
साक्षी बोले जा रही थी और प्रिया अपनी धड़कनें थामे सुनती जा रही थी।
इतना तो उसे हॉस्पिटल में ही पता चल गया था कि उसी ने अपना खून दे कर उसके पति की जान बचाई थी।
इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी प्रिया ने उसका शुक्रिया अदा करने के बारे में नहीं सोचा था।
हालाकि उसका दिल बार बार उसकी तरफ जाने के लिए उसे ज़ोर देता रहता था लेकिन उसने जैसे खुद को पत्थर का बना लिया था।
कदाचित ये सोच कर कि अगर वो शुक्रिया अदा करने उसके पास गई तो कहीं वो पहले से ज़्यादा कमज़ोर न पड़ जाए।
"तेरे साथ ही उस दिन उससे मिली थी।" उधर से माया बदस्तूर बोले जा रही थी──"तब से ना तो वो कहीं दिखा था और ना ही मैंने उससे मिलने के बारे में सोचा था। ख़ैर आज शाम के वक्त जब वो टैक्सी में बैठा मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि जिस दिन तेरे हसबैंड का एक्सीडेंट हुआ था उस दिन वो वहां कैसे पहुंच गया था और....और फिर उसने एक ऐसे इंसान को अपना खून क्यों दिया जिसे वो जानता तक नहीं था?"
साक्षी की इस बात से प्रिया एकदम से होश में आई और उसके कान खड़े हो गए।
वो भी ये बात जानना चाहती थी।
अब तक वो यही सोच कर हैरान परेशान थी कि उसके पति के एक्सीडेंट वाली शाम अरमान वहां कैसे पहुंचा था अथवा कैसे वहां पर मौजूद था और फिर वो उसके पति को हॉस्पिटल ले गया?
"त...तो फिर क्या बताया उसने?" प्रिया ने धड़कते दिल से पूछा।
"कह रहा था कि वो उस समय वहां पर एक सवारी को छोड़ने गया हुआ था।" उधर से साक्षी ने बताया──"तभी उसने देखा था कि थोड़ी ही दूरी पर लोगों की भीड़ जमा है और लोग आपस में एक्सीडेंट वाली बातें कर रहे थे। उत्सुकतावश वो अपनी टैक्सी से उतर कर ये देखने भीड़ के पास गया था कि आख़िर किसका एक्सीडेंट हुआ है और क्या वो एक्सीडेंट में बचा है या...मर चुका है? जब वो भीड़ को चीर कर अंदर गया तो देखा कुछ लोग एक लहू लुहान आदमी को कार से बाहर निकाल रहे थे। उसके अनुसार आदमी ज़िंदा तो था लेकिन उसकी हालत बद्तर थी। जब उसने देखा कि बाकी के लोग खड़े सिर्फ तमाशा देख रहे हैं तो उसने भी उन लोगों की मदद करने का सोचा जो तेरे लहू लुहान हसबैंड को कार से बाहर निकाल रहे थे। अरमान कह रहा था कि पता नहीं उस वक्त उसके अंदर कैसा जुनून सा सवार हो गया था और उसका दिल कह रहा था कि इस आदमी को कुछ नहीं होना चाहिए। बस, फिर क्या था उसने उन आदमियों की मदद से तेरे हसबैंड को अपनी ही टैक्सी में सुरक्षित बैठाया और उनमें से एक को टैक्सी में तेरे हसबैंड को सम्हालने के उद्देश्य से बैठा कर टैक्सी को सरपट हॉस्पिटल की तरफ दौड़ा दिया था।"
साक्षी इतना कह कर चुप हुई तो प्रिया के कानों में जैसे सन्नाटा छा गया।
ये अलग बात है कि उसकी अपनी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बजती सुनाई दे रहीं थी।
साक्षी की बातें सुन कर उसके दिलो दिमाग़ में ये सोच कर अचानक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ कि अरमान ने अंजाने में उस पर कितना बड़ा उपकार कर दिया है और वो इतनी ख़ुदगर्ज़ तथा पत्थर दिल है कि उसने उसका शुक्रिया अदा करने के लिए उभरने वाले ख़याल को भी अपने ज़हन से मिटा रही थी।
उसे एहसास हुआ कि एक बार फिर वो उसके लिए पत्थर दिल बन गई है।
अगर साक्षी के द्वारा उसे पता चल गया होगा कि जिसे उसने अपना खून दे कर बचाया था वो असल में उसी औरत का पति था जिसे आज भी वो टूट कर प्यार करता है तो कैसा महसूस होगा उसे?
क्या उसे ये सोच कर दुख नहीं होगा कि इतना कुछ करने के बाद भी प्रिया ने उसका एहसान मानने की तो बात दूर बल्कि दूर से ही सही लेकिन एक बार उसको शुक्रिया तक नहीं कहा।
प्रिया के दिलो दिमाग़ में अचानक ही दर्द और पीड़ा की लहरें उठने लगीं।
उसका मन बुरी तरह मचल उठा।
दिल में कहीं मौजूद जज़्बात पलक झपकते ही बाहर निकल कर बुरी तरह मचल उठे।
प्रिया ने खुद को बहुत सम्हाला लेकिन इस पीड़ा की अधिकता ने उसकी आंखों को छलका ही दिया।
"क...क्या तूने उसे बताया कि जिसकी उसने अपना खून दे कर जान बचाई थी वो कोई और नहीं बल्कि मेरा हसबैंड था?" फिर उसने अपने जज़्बातों को बहुत हद तक काबू कर के साक्षी से पूछा।
"यार, सच कहूं तो मैं उसके दिल को दुखाने के ख़याल से ही कांप जाती हूं।" उधर से साक्षी ने कहा──"मुझे एहसास हो गया था कि अगर मैंने उसे ये सच बता दिया तो उसे बड़े ज़ोर का धक्का लगेगा और फिर वो ये सोच कर दुखी भी हो जाएगा कि उसने तेरे लिए इतना बड़ा काम किया और तूने एक बार उसे शुक्रिया भी नहीं कहा। बस यही सब सोच कर मैंने उसे ये सच नहीं बताया।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली।
बंद आंखों के किनारों से आंसू के कतरे निकल कर नीचे फर्श पर फ़ना हो गए।
एक बार फिर से उसके जज़्बात बुरी तरह मचल उठे।
"वैसे एक बात कहूं प्रिया?" उधर से साक्षी ने कहा──"तू न सच में बड़ी पत्थर दिल है। मुझे समझ में नहीं आता कि तू खुद को इतना कठोर कैसे बना लेती है?"
"ऐसा मत कह साक्षी, प्लीज़।" प्रिया का स्वर लड़खड़ा गया। उसकी रुलाई फूट गई। किसी तरह खुद को सम्हालते हुए बोली──"मैं मानती हूं कि एक समय था जब मैंने अपना दिल पत्थर का बना लिया था लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब तो ऐसा लगता है जैसे मेरा दिल ही नहीं बल्कि मेरा समूचा जिस्म ही मोम में तब्दील हो गया है। मैं तुझे शब्दों में बता नहीं सकती कि पिछले कुछ समय से मेरे अंदर कैसे कैसे झंझावात उठते हैं और मुझे तड़पाते हैं। मैं बहुत कुछ करना चाहती हूं लेकिन मजबूर हूं। मैं कुछ भी नहीं कर सकती साक्षी। ईश्वर करे, दुनिया में किसी भी इंसान के जीवन में ऐसा मोड़ ना आए। कोई भी मेरे जितना मजबूर न हो।"
"ऐसा नहीं है प्रिया।" साक्षी ने जैसे समझाते हुए कहा──"दुनिया बहुत बड़ी है। इस दुनिया में खोजने पर तुझे अनगिनत ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें तुझसे भी ज़्यादा दुख होगा और जो तुझसे भी ज़्यादा किसी बात के लिए मजबूर होंगे। बात ये है कि इंसान अपने दुख दर्द को बाकी लोगों के दुख दर्द से बड़ा बना लेता है। वो सोच बैठता है कि उसके जितना दुखी दूसरा कोई है ही नहीं जबकि सच्चाई इससे बहुत अलग होती है। ख़ैर, मैं तुझसे यही कहूंगी कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सकता। दुनिया में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है जो इंसान को हमेशा के लिए एक जगह पर जाम कर के रख दे। इंसान चाहे तो सब कुछ कर सकता है। उसके लिए शर्त यही है कि वो कुछ भी कर गुज़रने के लिए पूरी तरह से दृढ़ रहे।"
प्रिया को समझ न आया कि साक्षी को उसकी इन बातों का क्या जवाब दे?
उसके मन में तो बस उथल पुथल मची हुई थी।
सब्जी काटना कब का भूल गई थी वो।
"अगर अब तू पत्थर दिल नहीं है।" उसे चुप देख उधर से साक्षी ने पुनः कहा──"तो कम से कम इतना तो कर कि जिसने तुझ पर इतना बड़ा उपकार किया है उसे अंधेरे में न रख और उसका एहसान मान कर उसे एक बार शुक्रिया कहने जा। तू भी जानती है कि उसने कभी भी तेरे साथ किसी बात के लिए ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की है और मुझे यकीन है कि ऐसा नेक इंसान आगे भी ऐसा कुछ नहीं करेगा। फिर तुझे उसके पास जा कर उसको शुक्रिया कहने में क्या समस्या है?"
"म...मैं जाऊंगी साक्षी।" प्रिया ने जैसे निश्चय कर लिया──"मैं उस फ़रिश्ते के पास ज़रूर जाऊंगी शुक्रिया कहने। मैंने वर्षों पहले उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था लेकिन अब नहीं करूंगी। जितना मेरे बस में है उतना तो कर ही सकती हूं उसके लिए।"
"ये हुई न बात।" उधर से साक्षी ने जैसे खुश हो कर कहा──"मुझे पता था तू इतनी भी पत्थर दिल नहीं है। ख़ैर तो कब जा रही है तू उसके पास उसे शुक्रिया कहने?"
"आज का दिन तो गुज़र ही गया है।" प्रिया ने अधीरता से कहा──"इस लिए इस वक्त नहीं जा सकती लेकिन कल ज़रूर जाऊंगी। बस एक ही प्रॉब्लम है कि अशोक के यहां रहते बाहर कैसे जा सकूंगी? वो अगर पूछेंगे तो उन्हें क्या जवाब दूंगी?"
"डोंट वरी।" साक्षी की आवाज़ उसके कान में उभरी──"तेरी ये प्रॉब्लम मैं चुटकियों में दूर कर देती हूं।"
"क...कैसे?"
"अरे! कैसे क्या पागल?" उधर से साक्षी ने कहा──"कल मैं तेरे घर आ जाऊंगी और तेरे हसबैंड से खुद कहूंगी कि मैं तुझे अपने साथ एक ज़रूरी काम से ले जा रही हूं। अब ऐसा तो है नहीं कि तेरे हसबैंड मुझे इसके लिए मना कर देंगे। सही कहा ना?"
"हम्म्म, ये तो सही कहा तूने।" प्रिया ने उसकी बात सुन कर मन ही मन ये सोच कर राहत की सांस ली कि चलो साक्षी ने अपनी चतुराई से उसकी सबसे बड़ी समस्या दूर कर दी है।
"चल अब रखती हूं मैं।" साक्षी ने कहा──"कल तैयार रहना। मैं सुबह दस बजे के बाद किसी भी वक्त तेरे पास पहुंच जाऊंगी।"
प्रिया ने ठीक है कहा तो उधर से साक्षी ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
प्रिया काफी देर तक इन्हीं सब बातों के बारे में सोचती रही।
फिर वो पुनः सब्जियां काटने में लग गई।
To be continued...
Ashok ne uski baat sun li hogiUpdate ~ 13
"अ..अरे! सर आप?" साक्षी के साथ आए विशाल को देखते ही अशोक बुरी तरह चौंक पड़ा। बेयकीनी से उसे देखते हुए बोला──"अ..आप यहां कैसे?"
"अब कैसी तबीयत है मिस्टर खत्री?" विशाल ने उसकी हालत का मन ही मन लुत्फ़ उठाते हुए किंतु हल्के से मुस्कुरा कर पूछा।
अशोक जो उसके यहां होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था उसे अपने सामने खड़ा देख चकित सा हो गया था। विशाल के द्वारा तबीयत का पूछने पर ही जैसे उसे होश आया।
"अ...अब पहले से बेहतर हूं स..सर।" अशोक ने हकलाते हुए जवाब दिया।
"क्या आप दोनों एक दूसरे को जानते हैं?" साक्षी ने अंजान बन कर अपने पति विशाल से पूछा।
वहीं दूसरी तरफ प्रिया भी ये सोच कर हैरान हो गई थी कि उसका पति साक्षी के पति विशाल को सर क्यों कह रहा है?
"हां डियर।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ जैसे प्रिया पर बम फोड़ा──"असल में मिस्टर खत्री उसी कंपनी में जी-आई के इंचार्ज हैं जहां पर मैं हूं। पहले मुझे पता नहीं था कि ये असल में तुम्हारी दोस्त प्रिया के हसबैंड हैं।"
"ओह! तभी मैं सोचूं कि तुम अशोक जी को मिस्टर खत्री कह के कैसे पुकार रहे थे?" साक्षी ने पहले की ही भांति अंजान बनते हुए कहा──"ख़ैर ये तो बहुत अच्छी बात है कि अशोक जी उसी कंपनी में काम करते हैं। प्रिया तो मेरी दोस्त है ही किंतु अब तुम्हारा भी अशोक जी से नाता जुड़ गया है।"
"हां सही कहा।" विशाल की मुस्कान गहरी हो गई──"वेल, सॉरी मिस्टर खत्री, ज़रूरी काम से बाहर चला गया था इस लिए इलाज़ के फ़ौरन बाद आपसे मिल नहीं पाया।"
"कोई बात नहीं स..सर।" अशोक को बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकता था, बोला──"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे बीच ऐसे संबंध निकल आएंगे।"
"हां ये तो है।" विशाल ने कहा──"लेकिन अब क्योंकि हमारा आपस में ऐसा संबंध बन गया है तो मैं चाहता हूं कि आप मुझे सर न कहें। वैसे भी उमर में आपसे काफी छोटा हूं तो आप मुझे मेरे नाम से संबोधित कर सकते हैं।"
"ठीक है सर....मेरा मतलब है कि विशाल जी।" अशोक हकला सा गया──"लेकिन कंपनी के अंदर तो आप मेरे सर ही कहलाएंगे।"
"क्या करें मिस्टर खत्री।" विशाल ने कहा──"हर जगह की अपनी एक अलग इंपोर्टेंस है। वहां पर हर इंसान को नियम कानून के तहत ही बिहेव करना मजबूरी होती है।"
"सही कहा आपने।" अशोक ने कहा, फिर सहसा वो हड़बड़ाया──"अरे! आप खड़े क्यों हैं विशाल जी? प्लीज़ बैठिए ना। प्रिया, तुम यूं चुप सी क्यों खड़ी हो? इतने बड़े लोग आए हैं हमारे घर, थोड़ा तो ख़याल करो।"
अशोक की इस बात से प्रिया को जैसे अब होश आया।
वो एकदम से हड़बड़ा गई।
फिर खुद को सम्हाल कर जल्दी ही साक्षी और विशाल को सोफे पर बैठाया।
हालाकि साक्षी और विशाल ने मुस्कुराते हुए उसे परेशान न होने की हिदायत दी।
अशोक मन ही मन ये सोच रहा था कि ये सब क्या चक्कर चल पड़ा है उसके साथ?
उसकी पत्नी की दोस्त का पति एक ऐसा व्यक्ति निकला जो असल में उसका बड़ा अधिकारी है और जिसे वो सर कहता है।
अशोक को इस एहसास ने बड़ा अजीब सा महसूस करवाया।
वो इसी बात से समझ गया कि उसकी पत्नी की दोस्त किसी मामूली खानदान से नहीं है।
इधर प्रिया ने साक्षी और विशाल के मना करने के बावजूद उन्हें चाय नाश्ता करवाया।
ये अलग बात है कि प्रिया इस सबके बीच भी बार बार यही सोच बैठती थी कि ये सब आख़िर हो क्या रह है?
उधर एक अरमान है जो अचानक से ही उसके पति को अपना खून दे कर बचाने आ गया था और दूसरी तरफ साक्षी का पति है जो किसी जादू की तरह उसके पति का अधिकारी बना दिख गया।
आख़िर ऊपर वाले की ये कैसी लीला है?
थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के बाद साक्षी और विशाल दोनों पति पत्नी से इजाज़त ले कर चले गए।
दोनों के जाने के बाद प्रिया कमरे में अपने पति के पास पहुंची।
अशोक को दवा देने का समय हो गया था।
"क्या सोच रहे हैं?" प्रिया ने अशोक को कहीं खोए हुए देखा तो पूछा।
"सोच रहा हूं कि ऊपर वाला भी कैसे कैसे संजोग बना देता है।" अशोक ने गहरी सांस ले कर कहा──"तुम्हें पता है, तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड ही वो व्यक्ति है जिसने मेरे लिए परेशानी खड़ी कर रखी थी।"
"क...क्या??" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" अशोक ने कहा──"लेकिन देखो, ऊपर वाले ने ऐसा सीन क्रिएट किया कि वही व्यक्ति अब शायद मेरे लिए कोई परेशानी नहीं खड़ी करेगा। आख़िर उसे भी तो अब पता चल गया है कि मैं उसकी वाइफ की दोस्त का हसबैंड हूं। आज जिस तरह से वो मुझसे पेश आया था उससे यही लगता है कि अब शायद ही वो मेरे लिए कोई समस्या खड़ी करेगा।"
"भगवान करे ऐसा ही हो।" प्रिया ने कुछ सोचते हुए कहा──"वैसे क्या सच में साक्षी का हसबैंड उसी कंपनी में आपका बड़ा अधिकारी है?"
"हां बेबी।" अशोक ने कहा──"पर मुझे ये नहीं पता था कि वो तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड निकलेगा।"
"मैंने भी कहां सोचा था कि इतना बड़ा व्यक्ति साक्षी का हसबैंड होगा।"
प्रिया सचमुच मन ही मन हैरान थी।
जाने क्यों उसे साक्षी से ईर्ष्या सी हुई।
"चलो जो भी हो।" अशोक ने कहा──"अच्छी बात ये है कि तुम्हारी दोस्त साक्षी की वजह से अब उसका हसबैंड मेरे लिए कोई समस्या नहीं खड़ी करेगा।"
प्रिया ने इस बार कुछ कहा नहीं लेकिन मन ही मन इस सोच में डूब गई थी कि साक्षी तो सचमुच उससे ज़्यादा पैसे वाली निकली। उस दिन जब उसने अपने परिवार के बारे में और आर्थिक स्थिति के बारे में बताया था तो प्रिया को यही लगा था कि वो झूठ मूठ का उसके सामने अपने बड़े और संपन्न होने का बखान कर रही है लेकिन अब जब उसे उसकी असलियत का पता चल गया तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।
बहरहाल, उसने अशोक को दवा दी और घर के बाकी कामों में लग गई।
मीरा पिछले दो दिन से काम पर नहीं आ रही थी क्योंकि उसकी तबीयत ख़राब थी।
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शाम के छह बज रहे थे।
प्रिया किचेन में रात के लिए डिनर बनाने की तैयारी कर रही थी।
अशोक की हालत पहले से बेहतर थी लेकिन डॉक्टर ने उसे अभी कुछ दिन घर में रह कर ही आराम करने को कहा था।
उसकी सौतेली बेटी अंकिता कुछ देर अपने डैड के पास बैठने के बाद अपने कमरे में पढ़ाई करने जा चुकी थी।
प्रिया किचेन में डिनर बनाने के लिए सब्जियां धो रही थी कि तभी उसका मोबाइल फ़ोन बजा।
मोबाइल क्योंकि किचेन में ही एक तरफ रखा हुआ था इस लिए उसने उसे उठाया। मोबाइल स्क्रीन पर साक्षी का नाम फ्लैश होता देख उसके मन में उसके प्रति थोड़ी जलन की भावना उभर आई।
हालाकि साक्षी ने इतनी बड़ी मुसीबत में उसकी बहुत हेल्प की थी जिसके लिए उसे उसका एहसानमंद होना चाहिए था लेकिन जाने क्यों उसके मन में साक्षी के प्रति जलन की भावना घर करने लगी थी।
बहरहाल, उसने कॉल रिसीव की।
"मैंने तुझे डिस्टर्ब तो नहीं किया ना?" उधर से साक्षी की मधुर आवाज़ उसके कान में पड़ी।
"नहीं तो।" प्रत्यक्ष में प्रिया को बोलना पड़ा──"बस डिनर बनाने की तैयारी कर रही हूं। तुझे बताया था न कि मेड की तबीयत ख़राब है इस लिए वो दो दिन से नहीं आ रही। ख़ैर तू बता, क्या कर रही है?"
"मैं भी तेरी तरह डिनर बनाने ही जा रही थी यार।" साक्षी ने उधर से कहा──"अभी थोड़ी देर पहले मेरी ननद स्नेहा वापस घर गई है। विशाल उसे रेलवे स्टेशन छोड़ने गए हैं।"
"बड़ा जल्दी तेरी ननद वापस चली गई।" प्रिया ने आलू छीलते हुए कहा──"लगता है तेरे पास ज़्यादा मन नहीं लग रहा था उसका।"
"नहीं, ऐसी बात नहीं है यार।" साक्षी ने कहा──"मन तो उसका बहुत लग रहा था क्योंकि यहां पर उसे एक तरह से आज़ादी थी। असल में जिससे उसकी शादी होने वाली है उससे फ़ोन पर बात करने का उसे वक्त ही वक्त मिलता था यहां लेकिन मां जी को उसकी ये आज़ादी रास ही नहीं आई। दो दिन से फ़ोन कर के उसे वापस आने को कह रहीं थी तो विशाल ने भी आज समय निकाल कर उसके जाने की व्यवस्था कर दी। पहले उसे शॉपिंग करवाई और फिर फर्स्ट क्लास एसी की टिकट बनवा कर उसे भेजने गए।"
"तो कब है तेरी ननद की शादी?"
"नवंबर में।" उधर से साक्षी ने कहा──"अच्छा एक बात तो बताना भूल ही गई तुझे। आज अरमान मिला था मुझे।"
साक्षी के मुख से अरमान का नाम सुनते ही प्रिया का आलू छीलता हांथ रुक गया।
उसकी धड़कनें थम सी गईं।
दिलो दिमाग़ में अजीब सा एहसास भरता चला गया।
फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला।
"असल में अपनी ननद को छोड़ने मैं फ्लैट से नीचे तक गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"विशाल तो उसे कार में बैठा कर रेलवे स्टेशन की तरफ निकल गए जबकि मैं नीचे ही एक आइसक्रीम वाले के पास रुक कर उससे आइसक्रीम लेने लगी थी। तभी एक टैक्सी मुझसे थोड़ी दूरी पर रुकी तो अनायास ही मेरी नज़र टैक्सी की ड्राइविंग सीट पर बैठे अरमान पर पड़ गई। टैक्सी से सवारी उतारने के बाद वो आगे बढ़ने ही वाला था कि मैंने उसे हाथ हिला कर आवाज़ दी। वो मुझे देख कर पहले तो चौंका फिर टैक्सी को बढ़ा कर मेरे पास आया।"
साक्षी बोले जा रही थी और प्रिया अपनी धड़कनें थामे सुनती जा रही थी।
इतना तो उसे हॉस्पिटल में ही पता चल गया था कि उसी ने अपना खून दे कर उसके पति की जान बचाई थी।
इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी प्रिया ने उसका शुक्रिया अदा करने के बारे में नहीं सोचा था।
हालाकि उसका दिल बार बार उसकी तरफ जाने के लिए उसे ज़ोर देता रहता था लेकिन उसने जैसे खुद को पत्थर का बना लिया था।
कदाचित ये सोच कर कि अगर वो शुक्रिया अदा करने उसके पास गई तो कहीं वो पहले से ज़्यादा कमज़ोर न पड़ जाए।
"तेरे साथ ही उस दिन उससे मिली थी।" उधर से माया बदस्तूर बोले जा रही थी──"तब से ना तो वो कहीं दिखा था और ना ही मैंने उससे मिलने के बारे में सोचा था। ख़ैर आज शाम के वक्त जब वो टैक्सी में बैठा मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि जिस दिन तेरे हसबैंड का एक्सीडेंट हुआ था उस दिन वो वहां कैसे पहुंच गया था और....और फिर उसने एक ऐसे इंसान को अपना खून क्यों दिया जिसे वो जानता तक नहीं था?"
साक्षी की इस बात से प्रिया एकदम से होश में आई और उसके कान खड़े हो गए।
वो भी ये बात जानना चाहती थी।
अब तक वो यही सोच कर हैरान परेशान थी कि उसके पति के एक्सीडेंट वाली शाम अरमान वहां कैसे पहुंचा था अथवा कैसे वहां पर मौजूद था और फिर वो उसके पति को हॉस्पिटल ले गया?
"त...तो फिर क्या बताया उसने?" प्रिया ने धड़कते दिल से पूछा।
"कह रहा था कि वो उस समय वहां पर एक सवारी को छोड़ने गया हुआ था।" उधर से साक्षी ने बताया──"तभी उसने देखा था कि थोड़ी ही दूरी पर लोगों की भीड़ जमा है और लोग आपस में एक्सीडेंट वाली बातें कर रहे थे। उत्सुकतावश वो अपनी टैक्सी से उतर कर ये देखने भीड़ के पास गया था कि आख़िर किसका एक्सीडेंट हुआ है और क्या वो एक्सीडेंट में बचा है या...मर चुका है? जब वो भीड़ को चीर कर अंदर गया तो देखा कुछ लोग एक लहू लुहान आदमी को कार से बाहर निकाल रहे थे। उसके अनुसार आदमी ज़िंदा तो था लेकिन उसकी हालत बद्तर थी। जब उसने देखा कि बाकी के लोग खड़े सिर्फ तमाशा देख रहे हैं तो उसने भी उन लोगों की मदद करने का सोचा जो तेरे लहू लुहान हसबैंड को कार से बाहर निकाल रहे थे। अरमान कह रहा था कि पता नहीं उस वक्त उसके अंदर कैसा जुनून सा सवार हो गया था और उसका दिल कह रहा था कि इस आदमी को कुछ नहीं होना चाहिए। बस, फिर क्या था उसने उन आदमियों की मदद से तेरे हसबैंड को अपनी ही टैक्सी में सुरक्षित बैठाया और उनमें से एक को टैक्सी में तेरे हसबैंड को सम्हालने के उद्देश्य से बैठा कर टैक्सी को सरपट हॉस्पिटल की तरफ दौड़ा दिया था।"
साक्षी इतना कह कर चुप हुई तो प्रिया के कानों में जैसे सन्नाटा छा गया।
ये अलग बात है कि उसकी अपनी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बजती सुनाई दे रहीं थी।
साक्षी की बातें सुन कर उसके दिलो दिमाग़ में ये सोच कर अचानक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ कि अरमान ने अंजाने में उस पर कितना बड़ा उपकार कर दिया है और वो इतनी ख़ुदगर्ज़ तथा पत्थर दिल है कि उसने उसका शुक्रिया अदा करने के लिए उभरने वाले ख़याल को भी अपने ज़हन से मिटा रही थी।
उसे एहसास हुआ कि एक बार फिर वो उसके लिए पत्थर दिल बन गई है।
अगर साक्षी के द्वारा उसे पता चल गया होगा कि जिसे उसने अपना खून दे कर बचाया था वो असल में उसी औरत का पति था जिसे आज भी वो टूट कर प्यार करता है तो कैसा महसूस होगा उसे?
क्या उसे ये सोच कर दुख नहीं होगा कि इतना कुछ करने के बाद भी प्रिया ने उसका एहसान मानने की तो बात दूर बल्कि दूर से ही सही लेकिन एक बार उसको शुक्रिया तक नहीं कहा।
प्रिया के दिलो दिमाग़ में अचानक ही दर्द और पीड़ा की लहरें उठने लगीं।
उसका मन बुरी तरह मचल उठा।
दिल में कहीं मौजूद जज़्बात पलक झपकते ही बाहर निकल कर बुरी तरह मचल उठे।
प्रिया ने खुद को बहुत सम्हाला लेकिन इस पीड़ा की अधिकता ने उसकी आंखों को छलका ही दिया।
"क...क्या तूने उसे बताया कि जिसकी उसने अपना खून दे कर जान बचाई थी वो कोई और नहीं बल्कि मेरा हसबैंड था?" फिर उसने अपने जज़्बातों को बहुत हद तक काबू कर के साक्षी से पूछा।
"यार, सच कहूं तो मैं उसके दिल को दुखाने के ख़याल से ही कांप जाती हूं।" उधर से साक्षी ने कहा──"मुझे एहसास हो गया था कि अगर मैंने उसे ये सच बता दिया तो उसे बड़े ज़ोर का धक्का लगेगा और फिर वो ये सोच कर दुखी भी हो जाएगा कि उसने तेरे लिए इतना बड़ा काम किया और तूने एक बार उसे शुक्रिया भी नहीं कहा। बस यही सब सोच कर मैंने उसे ये सच नहीं बताया।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली।
बंद आंखों के किनारों से आंसू के कतरे निकल कर नीचे फर्श पर फ़ना हो गए।
एक बार फिर से उसके जज़्बात बुरी तरह मचल उठे।
"वैसे एक बात कहूं प्रिया?" उधर से साक्षी ने कहा──"तू न सच में बड़ी पत्थर दिल है। मुझे समझ में नहीं आता कि तू खुद को इतना कठोर कैसे बना लेती है?"
"ऐसा मत कह साक्षी, प्लीज़।" प्रिया का स्वर लड़खड़ा गया। उसकी रुलाई फूट गई। किसी तरह खुद को सम्हालते हुए बोली──"मैं मानती हूं कि एक समय था जब मैंने अपना दिल पत्थर का बना लिया था लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब तो ऐसा लगता है जैसे मेरा दिल ही नहीं बल्कि मेरा समूचा जिस्म ही मोम में तब्दील हो गया है। मैं तुझे शब्दों में बता नहीं सकती कि पिछले कुछ समय से मेरे अंदर कैसे कैसे झंझावात उठते हैं और मुझे तड़पाते हैं। मैं बहुत कुछ करना चाहती हूं लेकिन मजबूर हूं। मैं कुछ भी नहीं कर सकती साक्षी। ईश्वर करे, दुनिया में किसी भी इंसान के जीवन में ऐसा मोड़ ना आए। कोई भी मेरे जितना मजबूर न हो।"
"ऐसा नहीं है प्रिया।" साक्षी ने जैसे समझाते हुए कहा──"दुनिया बहुत बड़ी है। इस दुनिया में खोजने पर तुझे अनगिनत ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें तुझसे भी ज़्यादा दुख होगा और जो तुझसे भी ज़्यादा किसी बात के लिए मजबूर होंगे। बात ये है कि इंसान अपने दुख दर्द को बाकी लोगों के दुख दर्द से बड़ा बना लेता है। वो सोच बैठता है कि उसके जितना दुखी दूसरा कोई है ही नहीं जबकि सच्चाई इससे बहुत अलग होती है। ख़ैर, मैं तुझसे यही कहूंगी कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सकता। दुनिया में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है जो इंसान को हमेशा के लिए एक जगह पर जाम कर के रख दे। इंसान चाहे तो सब कुछ कर सकता है। उसके लिए शर्त यही है कि वो कुछ भी कर गुज़रने के लिए पूरी तरह से दृढ़ रहे।"
प्रिया को समझ न आया कि साक्षी को उसकी इन बातों का क्या जवाब दे?
उसके मन में तो बस उथल पुथल मची हुई थी।
सब्जी काटना कब का भूल गई थी वो।
"अगर अब तू पत्थर दिल नहीं है।" उसे चुप देख उधर से साक्षी ने पुनः कहा──"तो कम से कम इतना तो कर कि जिसने तुझ पर इतना बड़ा उपकार किया है उसे अंधेरे में न रख और उसका एहसान मान कर उसे एक बार शुक्रिया कहने जा। तू भी जानती है कि उसने कभी भी तेरे साथ किसी बात के लिए ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की है और मुझे यकीन है कि ऐसा नेक इंसान आगे भी ऐसा कुछ नहीं करेगा। फिर तुझे उसके पास जा कर उसको शुक्रिया कहने में क्या समस्या है?"
"म...मैं जाऊंगी साक्षी।" प्रिया ने जैसे निश्चय कर लिया──"मैं उस फ़रिश्ते के पास ज़रूर जाऊंगी शुक्रिया कहने। मैंने वर्षों पहले उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था लेकिन अब नहीं करूंगी। जितना मेरे बस में है उतना तो कर ही सकती हूं उसके लिए।"
"ये हुई न बात।" उधर से साक्षी ने जैसे खुश हो कर कहा──"मुझे पता था तू इतनी भी पत्थर दिल नहीं है। ख़ैर तो कब जा रही है तू उसके पास उसे शुक्रिया कहने?"
"आज का दिन तो गुज़र ही गया है।" प्रिया ने अधीरता से कहा──"इस लिए इस वक्त नहीं जा सकती लेकिन कल ज़रूर जाऊंगी। बस एक ही प्रॉब्लम है कि अशोक के यहां रहते बाहर कैसे जा सकूंगी? वो अगर पूछेंगे तो उन्हें क्या जवाब दूंगी?"
"डोंट वरी।" साक्षी की आवाज़ उसके कान में उभरी──"तेरी ये प्रॉब्लम मैं चुटकियों में दूर कर देती हूं।"
"क...कैसे?"
"अरे! कैसे क्या पागल?" उधर से साक्षी ने कहा──"कल मैं तेरे घर आ जाऊंगी और तेरे हसबैंड से खुद कहूंगी कि मैं तुझे अपने साथ एक ज़रूरी काम से ले जा रही हूं। अब ऐसा तो है नहीं कि तेरे हसबैंड मुझे इसके लिए मना कर देंगे। सही कहा ना?"
"हम्म्म, ये तो सही कहा तूने।" प्रिया ने उसकी बात सुन कर मन ही मन ये सोच कर राहत की सांस ली कि चलो साक्षी ने अपनी चतुराई से उसकी सबसे बड़ी समस्या दूर कर दी है।
"चल अब रखती हूं मैं।" साक्षी ने कहा──"कल तैयार रहना। मैं सुबह दस बजे के बाद किसी भी वक्त तेरे पास पहुंच जाऊंगी।"
प्रिया ने ठीक है कहा तो उधर से साक्षी ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
प्रिया काफी देर तक इन्हीं सब बातों के बारे में सोचती रही।
फिर वो पुनः सब्जियां काटने में लग गई।
To be continued...


Nice update....Update ~ 13
"अ..अरे! सर आप?" साक्षी के साथ आए विशाल को देखते ही अशोक बुरी तरह चौंक पड़ा। बेयकीनी से उसे देखते हुए बोला──"अ..आप यहां कैसे?"
"अब कैसी तबीयत है मिस्टर खत्री?" विशाल ने उसकी हालत का मन ही मन लुत्फ़ उठाते हुए किंतु हल्के से मुस्कुरा कर पूछा।
अशोक जो उसके यहां होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था उसे अपने सामने खड़ा देख चकित सा हो गया था। विशाल के द्वारा तबीयत का पूछने पर ही जैसे उसे होश आया।
"अ...अब पहले से बेहतर हूं स..सर।" अशोक ने हकलाते हुए जवाब दिया।
"क्या आप दोनों एक दूसरे को जानते हैं?" साक्षी ने अंजान बन कर अपने पति विशाल से पूछा।
वहीं दूसरी तरफ प्रिया भी ये सोच कर हैरान हो गई थी कि उसका पति साक्षी के पति विशाल को सर क्यों कह रहा है?
"हां डियर।" विशाल ने उसी हल्की मुस्कान के साथ जैसे प्रिया पर बम फोड़ा──"असल में मिस्टर खत्री उसी कंपनी में जी-आई के इंचार्ज हैं जहां पर मैं हूं। पहले मुझे पता नहीं था कि ये असल में तुम्हारी दोस्त प्रिया के हसबैंड हैं।"
"ओह! तभी मैं सोचूं कि तुम अशोक जी को मिस्टर खत्री कह के कैसे पुकार रहे थे?" साक्षी ने पहले की ही भांति अंजान बनते हुए कहा──"ख़ैर ये तो बहुत अच्छी बात है कि अशोक जी उसी कंपनी में काम करते हैं। प्रिया तो मेरी दोस्त है ही किंतु अब तुम्हारा भी अशोक जी से नाता जुड़ गया है।"
"हां सही कहा।" विशाल की मुस्कान गहरी हो गई──"वेल, सॉरी मिस्टर खत्री, ज़रूरी काम से बाहर चला गया था इस लिए इलाज़ के फ़ौरन बाद आपसे मिल नहीं पाया।"
"कोई बात नहीं स..सर।" अशोक को बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था लेकिन कर भी क्या सकता था, बोला──"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे बीच ऐसे संबंध निकल आएंगे।"
"हां ये तो है।" विशाल ने कहा──"लेकिन अब क्योंकि हमारा आपस में ऐसा संबंध बन गया है तो मैं चाहता हूं कि आप मुझे सर न कहें। वैसे भी उमर में आपसे काफी छोटा हूं तो आप मुझे मेरे नाम से संबोधित कर सकते हैं।"
"ठीक है सर....मेरा मतलब है कि विशाल जी।" अशोक हकला सा गया──"लेकिन कंपनी के अंदर तो आप मेरे सर ही कहलाएंगे।"
"क्या करें मिस्टर खत्री।" विशाल ने कहा──"हर जगह की अपनी एक अलग इंपोर्टेंस है। वहां पर हर इंसान को नियम कानून के तहत ही बिहेव करना मजबूरी होती है।"
"सही कहा आपने।" अशोक ने कहा, फिर सहसा वो हड़बड़ाया──"अरे! आप खड़े क्यों हैं विशाल जी? प्लीज़ बैठिए ना। प्रिया, तुम यूं चुप सी क्यों खड़ी हो? इतने बड़े लोग आए हैं हमारे घर, थोड़ा तो ख़याल करो।"
अशोक की इस बात से प्रिया को जैसे अब होश आया।
वो एकदम से हड़बड़ा गई।
फिर खुद को सम्हाल कर जल्दी ही साक्षी और विशाल को सोफे पर बैठाया।
हालाकि साक्षी और विशाल ने मुस्कुराते हुए उसे परेशान न होने की हिदायत दी।
अशोक मन ही मन ये सोच रहा था कि ये सब क्या चक्कर चल पड़ा है उसके साथ?
उसकी पत्नी की दोस्त का पति एक ऐसा व्यक्ति निकला जो असल में उसका बड़ा अधिकारी है और जिसे वो सर कहता है।
अशोक को इस एहसास ने बड़ा अजीब सा महसूस करवाया।
वो इसी बात से समझ गया कि उसकी पत्नी की दोस्त किसी मामूली खानदान से नहीं है।
इधर प्रिया ने साक्षी और विशाल के मना करने के बावजूद उन्हें चाय नाश्ता करवाया।
ये अलग बात है कि प्रिया इस सबके बीच भी बार बार यही सोच बैठती थी कि ये सब आख़िर हो क्या रह है?
उधर एक अरमान है जो अचानक से ही उसके पति को अपना खून दे कर बचाने आ गया था और दूसरी तरफ साक्षी का पति है जो किसी जादू की तरह उसके पति का अधिकारी बना दिख गया।
आख़िर ऊपर वाले की ये कैसी लीला है?
थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के बाद साक्षी और विशाल दोनों पति पत्नी से इजाज़त ले कर चले गए।
दोनों के जाने के बाद प्रिया कमरे में अपने पति के पास पहुंची।
अशोक को दवा देने का समय हो गया था।
"क्या सोच रहे हैं?" प्रिया ने अशोक को कहीं खोए हुए देखा तो पूछा।
"सोच रहा हूं कि ऊपर वाला भी कैसे कैसे संजोग बना देता है।" अशोक ने गहरी सांस ले कर कहा──"तुम्हें पता है, तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड ही वो व्यक्ति है जिसने मेरे लिए परेशानी खड़ी कर रखी थी।"
"क...क्या??" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी।
"हां प्रिया।" अशोक ने कहा──"लेकिन देखो, ऊपर वाले ने ऐसा सीन क्रिएट किया कि वही व्यक्ति अब शायद मेरे लिए कोई परेशानी नहीं खड़ी करेगा। आख़िर उसे भी तो अब पता चल गया है कि मैं उसकी वाइफ की दोस्त का हसबैंड हूं। आज जिस तरह से वो मुझसे पेश आया था उससे यही लगता है कि अब शायद ही वो मेरे लिए कोई समस्या खड़ी करेगा।"
"भगवान करे ऐसा ही हो।" प्रिया ने कुछ सोचते हुए कहा──"वैसे क्या सच में साक्षी का हसबैंड उसी कंपनी में आपका बड़ा अधिकारी है?"
"हां बेबी।" अशोक ने कहा──"पर मुझे ये नहीं पता था कि वो तुम्हारी दोस्त साक्षी का हसबैंड निकलेगा।"
"मैंने भी कहां सोचा था कि इतना बड़ा व्यक्ति साक्षी का हसबैंड होगा।"
प्रिया सचमुच मन ही मन हैरान थी।
जाने क्यों उसे साक्षी से ईर्ष्या सी हुई।
"चलो जो भी हो।" अशोक ने कहा──"अच्छी बात ये है कि तुम्हारी दोस्त साक्षी की वजह से अब उसका हसबैंड मेरे लिए कोई समस्या नहीं खड़ी करेगा।"
प्रिया ने इस बार कुछ कहा नहीं लेकिन मन ही मन इस सोच में डूब गई थी कि साक्षी तो सचमुच उससे ज़्यादा पैसे वाली निकली। उस दिन जब उसने अपने परिवार के बारे में और आर्थिक स्थिति के बारे में बताया था तो प्रिया को यही लगा था कि वो झूठ मूठ का उसके सामने अपने बड़े और संपन्न होने का बखान कर रही है लेकिन अब जब उसे उसकी असलियत का पता चल गया तो उसे बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था।
बहरहाल, उसने अशोक को दवा दी और घर के बाकी कामों में लग गई।
मीरा पिछले दो दिन से काम पर नहीं आ रही थी क्योंकि उसकी तबीयत ख़राब थी।
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शाम के छह बज रहे थे।
प्रिया किचेन में रात के लिए डिनर बनाने की तैयारी कर रही थी।
अशोक की हालत पहले से बेहतर थी लेकिन डॉक्टर ने उसे अभी कुछ दिन घर में रह कर ही आराम करने को कहा था।
उसकी सौतेली बेटी अंकिता कुछ देर अपने डैड के पास बैठने के बाद अपने कमरे में पढ़ाई करने जा चुकी थी।
प्रिया किचेन में डिनर बनाने के लिए सब्जियां धो रही थी कि तभी उसका मोबाइल फ़ोन बजा।
मोबाइल क्योंकि किचेन में ही एक तरफ रखा हुआ था इस लिए उसने उसे उठाया। मोबाइल स्क्रीन पर साक्षी का नाम फ्लैश होता देख उसके मन में उसके प्रति थोड़ी जलन की भावना उभर आई।
हालाकि साक्षी ने इतनी बड़ी मुसीबत में उसकी बहुत हेल्प की थी जिसके लिए उसे उसका एहसानमंद होना चाहिए था लेकिन जाने क्यों उसके मन में साक्षी के प्रति जलन की भावना घर करने लगी थी।
बहरहाल, उसने कॉल रिसीव की।
"मैंने तुझे डिस्टर्ब तो नहीं किया ना?" उधर से साक्षी की मधुर आवाज़ उसके कान में पड़ी।
"नहीं तो।" प्रत्यक्ष में प्रिया को बोलना पड़ा──"बस डिनर बनाने की तैयारी कर रही हूं। तुझे बताया था न कि मेड की तबीयत ख़राब है इस लिए वो दो दिन से नहीं आ रही। ख़ैर तू बता, क्या कर रही है?"
"मैं भी तेरी तरह डिनर बनाने ही जा रही थी यार।" साक्षी ने उधर से कहा──"अभी थोड़ी देर पहले मेरी ननद स्नेहा वापस घर गई है। विशाल उसे रेलवे स्टेशन छोड़ने गए हैं।"
"बड़ा जल्दी तेरी ननद वापस चली गई।" प्रिया ने आलू छीलते हुए कहा──"लगता है तेरे पास ज़्यादा मन नहीं लग रहा था उसका।"
"नहीं, ऐसी बात नहीं है यार।" साक्षी ने कहा──"मन तो उसका बहुत लग रहा था क्योंकि यहां पर उसे एक तरह से आज़ादी थी। असल में जिससे उसकी शादी होने वाली है उससे फ़ोन पर बात करने का उसे वक्त ही वक्त मिलता था यहां लेकिन मां जी को उसकी ये आज़ादी रास ही नहीं आई। दो दिन से फ़ोन कर के उसे वापस आने को कह रहीं थी तो विशाल ने भी आज समय निकाल कर उसके जाने की व्यवस्था कर दी। पहले उसे शॉपिंग करवाई और फिर फर्स्ट क्लास एसी की टिकट बनवा कर उसे भेजने गए।"
"तो कब है तेरी ननद की शादी?"
"नवंबर में।" उधर से साक्षी ने कहा──"अच्छा एक बात तो बताना भूल ही गई तुझे। आज अरमान मिला था मुझे।"
साक्षी के मुख से अरमान का नाम सुनते ही प्रिया का आलू छीलता हांथ रुक गया।
उसकी धड़कनें थम सी गईं।
दिलो दिमाग़ में अजीब सा एहसास भरता चला गया।
फिर जैसे उसने खुद को सम्हाला।
"असल में अपनी ननद को छोड़ने मैं फ्लैट से नीचे तक गई थी।" उधर से साक्षी ने कहा──"विशाल तो उसे कार में बैठा कर रेलवे स्टेशन की तरफ निकल गए जबकि मैं नीचे ही एक आइसक्रीम वाले के पास रुक कर उससे आइसक्रीम लेने लगी थी। तभी एक टैक्सी मुझसे थोड़ी दूरी पर रुकी तो अनायास ही मेरी नज़र टैक्सी की ड्राइविंग सीट पर बैठे अरमान पर पड़ गई। टैक्सी से सवारी उतारने के बाद वो आगे बढ़ने ही वाला था कि मैंने उसे हाथ हिला कर आवाज़ दी। वो मुझे देख कर पहले तो चौंका फिर टैक्सी को बढ़ा कर मेरे पास आया।"
साक्षी बोले जा रही थी और प्रिया अपनी धड़कनें थामे सुनती जा रही थी।
इतना तो उसे हॉस्पिटल में ही पता चल गया था कि उसी ने अपना खून दे कर उसके पति की जान बचाई थी।
इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी प्रिया ने उसका शुक्रिया अदा करने के बारे में नहीं सोचा था।
हालाकि उसका दिल बार बार उसकी तरफ जाने के लिए उसे ज़ोर देता रहता था लेकिन उसने जैसे खुद को पत्थर का बना लिया था।
कदाचित ये सोच कर कि अगर वो शुक्रिया अदा करने उसके पास गई तो कहीं वो पहले से ज़्यादा कमज़ोर न पड़ जाए।
"तेरे साथ ही उस दिन उससे मिली थी।" उधर से माया बदस्तूर बोले जा रही थी──"तब से ना तो वो कहीं दिखा था और ना ही मैंने उससे मिलने के बारे में सोचा था। ख़ैर आज शाम के वक्त जब वो टैक्सी में बैठा मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि जिस दिन तेरे हसबैंड का एक्सीडेंट हुआ था उस दिन वो वहां कैसे पहुंच गया था और....और फिर उसने एक ऐसे इंसान को अपना खून क्यों दिया जिसे वो जानता तक नहीं था?"
साक्षी की इस बात से प्रिया एकदम से होश में आई और उसके कान खड़े हो गए।
वो भी ये बात जानना चाहती थी।
अब तक वो यही सोच कर हैरान परेशान थी कि उसके पति के एक्सीडेंट वाली शाम अरमान वहां कैसे पहुंचा था अथवा कैसे वहां पर मौजूद था और फिर वो उसके पति को हॉस्पिटल ले गया?
"त...तो फिर क्या बताया उसने?" प्रिया ने धड़कते दिल से पूछा।
"कह रहा था कि वो उस समय वहां पर एक सवारी को छोड़ने गया हुआ था।" उधर से साक्षी ने बताया──"तभी उसने देखा था कि थोड़ी ही दूरी पर लोगों की भीड़ जमा है और लोग आपस में एक्सीडेंट वाली बातें कर रहे थे। उत्सुकतावश वो अपनी टैक्सी से उतर कर ये देखने भीड़ के पास गया था कि आख़िर किसका एक्सीडेंट हुआ है और क्या वो एक्सीडेंट में बचा है या...मर चुका है? जब वो भीड़ को चीर कर अंदर गया तो देखा कुछ लोग एक लहू लुहान आदमी को कार से बाहर निकाल रहे थे। उसके अनुसार आदमी ज़िंदा तो था लेकिन उसकी हालत बद्तर थी। जब उसने देखा कि बाकी के लोग खड़े सिर्फ तमाशा देख रहे हैं तो उसने भी उन लोगों की मदद करने का सोचा जो तेरे लहू लुहान हसबैंड को कार से बाहर निकाल रहे थे। अरमान कह रहा था कि पता नहीं उस वक्त उसके अंदर कैसा जुनून सा सवार हो गया था और उसका दिल कह रहा था कि इस आदमी को कुछ नहीं होना चाहिए। बस, फिर क्या था उसने उन आदमियों की मदद से तेरे हसबैंड को अपनी ही टैक्सी में सुरक्षित बैठाया और उनमें से एक को टैक्सी में तेरे हसबैंड को सम्हालने के उद्देश्य से बैठा कर टैक्सी को सरपट हॉस्पिटल की तरफ दौड़ा दिया था।"
साक्षी इतना कह कर चुप हुई तो प्रिया के कानों में जैसे सन्नाटा छा गया।
ये अलग बात है कि उसकी अपनी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बजती सुनाई दे रहीं थी।
साक्षी की बातें सुन कर उसके दिलो दिमाग़ में ये सोच कर अचानक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ कि अरमान ने अंजाने में उस पर कितना बड़ा उपकार कर दिया है और वो इतनी ख़ुदगर्ज़ तथा पत्थर दिल है कि उसने उसका शुक्रिया अदा करने के लिए उभरने वाले ख़याल को भी अपने ज़हन से मिटा रही थी।
उसे एहसास हुआ कि एक बार फिर वो उसके लिए पत्थर दिल बन गई है।
अगर साक्षी के द्वारा उसे पता चल गया होगा कि जिसे उसने अपना खून दे कर बचाया था वो असल में उसी औरत का पति था जिसे आज भी वो टूट कर प्यार करता है तो कैसा महसूस होगा उसे?
क्या उसे ये सोच कर दुख नहीं होगा कि इतना कुछ करने के बाद भी प्रिया ने उसका एहसान मानने की तो बात दूर बल्कि दूर से ही सही लेकिन एक बार उसको शुक्रिया तक नहीं कहा।
प्रिया के दिलो दिमाग़ में अचानक ही दर्द और पीड़ा की लहरें उठने लगीं।
उसका मन बुरी तरह मचल उठा।
दिल में कहीं मौजूद जज़्बात पलक झपकते ही बाहर निकल कर बुरी तरह मचल उठे।
प्रिया ने खुद को बहुत सम्हाला लेकिन इस पीड़ा की अधिकता ने उसकी आंखों को छलका ही दिया।
"क...क्या तूने उसे बताया कि जिसकी उसने अपना खून दे कर जान बचाई थी वो कोई और नहीं बल्कि मेरा हसबैंड था?" फिर उसने अपने जज़्बातों को बहुत हद तक काबू कर के साक्षी से पूछा।
"यार, सच कहूं तो मैं उसके दिल को दुखाने के ख़याल से ही कांप जाती हूं।" उधर से साक्षी ने कहा──"मुझे एहसास हो गया था कि अगर मैंने उसे ये सच बता दिया तो उसे बड़े ज़ोर का धक्का लगेगा और फिर वो ये सोच कर दुखी भी हो जाएगा कि उसने तेरे लिए इतना बड़ा काम किया और तूने एक बार उसे शुक्रिया भी नहीं कहा। बस यही सब सोच कर मैंने उसे ये सच नहीं बताया।"
साक्षी की बात सुन कर प्रिया ने अपनी आंखें बंद कर ली।
बंद आंखों के किनारों से आंसू के कतरे निकल कर नीचे फर्श पर फ़ना हो गए।
एक बार फिर से उसके जज़्बात बुरी तरह मचल उठे।
"वैसे एक बात कहूं प्रिया?" उधर से साक्षी ने कहा──"तू न सच में बड़ी पत्थर दिल है। मुझे समझ में नहीं आता कि तू खुद को इतना कठोर कैसे बना लेती है?"
"ऐसा मत कह साक्षी, प्लीज़।" प्रिया का स्वर लड़खड़ा गया। उसकी रुलाई फूट गई। किसी तरह खुद को सम्हालते हुए बोली──"मैं मानती हूं कि एक समय था जब मैंने अपना दिल पत्थर का बना लिया था लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब तो ऐसा लगता है जैसे मेरा दिल ही नहीं बल्कि मेरा समूचा जिस्म ही मोम में तब्दील हो गया है। मैं तुझे शब्दों में बता नहीं सकती कि पिछले कुछ समय से मेरे अंदर कैसे कैसे झंझावात उठते हैं और मुझे तड़पाते हैं। मैं बहुत कुछ करना चाहती हूं लेकिन मजबूर हूं। मैं कुछ भी नहीं कर सकती साक्षी। ईश्वर करे, दुनिया में किसी भी इंसान के जीवन में ऐसा मोड़ ना आए। कोई भी मेरे जितना मजबूर न हो।"
"ऐसा नहीं है प्रिया।" साक्षी ने जैसे समझाते हुए कहा──"दुनिया बहुत बड़ी है। इस दुनिया में खोजने पर तुझे अनगिनत ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें तुझसे भी ज़्यादा दुख होगा और जो तुझसे भी ज़्यादा किसी बात के लिए मजबूर होंगे। बात ये है कि इंसान अपने दुख दर्द को बाकी लोगों के दुख दर्द से बड़ा बना लेता है। वो सोच बैठता है कि उसके जितना दुखी दूसरा कोई है ही नहीं जबकि सच्चाई इससे बहुत अलग होती है। ख़ैर, मैं तुझसे यही कहूंगी कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सकता। दुनिया में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है जो इंसान को हमेशा के लिए एक जगह पर जाम कर के रख दे। इंसान चाहे तो सब कुछ कर सकता है। उसके लिए शर्त यही है कि वो कुछ भी कर गुज़रने के लिए पूरी तरह से दृढ़ रहे।"
प्रिया को समझ न आया कि साक्षी को उसकी इन बातों का क्या जवाब दे?
उसके मन में तो बस उथल पुथल मची हुई थी।
सब्जी काटना कब का भूल गई थी वो।
"अगर अब तू पत्थर दिल नहीं है।" उसे चुप देख उधर से साक्षी ने पुनः कहा──"तो कम से कम इतना तो कर कि जिसने तुझ पर इतना बड़ा उपकार किया है उसे अंधेरे में न रख और उसका एहसान मान कर उसे एक बार शुक्रिया कहने जा। तू भी जानती है कि उसने कभी भी तेरे साथ किसी बात के लिए ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की है और मुझे यकीन है कि ऐसा नेक इंसान आगे भी ऐसा कुछ नहीं करेगा। फिर तुझे उसके पास जा कर उसको शुक्रिया कहने में क्या समस्या है?"
"म...मैं जाऊंगी साक्षी।" प्रिया ने जैसे निश्चय कर लिया──"मैं उस फ़रिश्ते के पास ज़रूर जाऊंगी शुक्रिया कहने। मैंने वर्षों पहले उसके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था लेकिन अब नहीं करूंगी। जितना मेरे बस में है उतना तो कर ही सकती हूं उसके लिए।"
"ये हुई न बात।" उधर से साक्षी ने जैसे खुश हो कर कहा──"मुझे पता था तू इतनी भी पत्थर दिल नहीं है। ख़ैर तो कब जा रही है तू उसके पास उसे शुक्रिया कहने?"
"आज का दिन तो गुज़र ही गया है।" प्रिया ने अधीरता से कहा──"इस लिए इस वक्त नहीं जा सकती लेकिन कल ज़रूर जाऊंगी। बस एक ही प्रॉब्लम है कि अशोक के यहां रहते बाहर कैसे जा सकूंगी? वो अगर पूछेंगे तो उन्हें क्या जवाब दूंगी?"
"डोंट वरी।" साक्षी की आवाज़ उसके कान में उभरी──"तेरी ये प्रॉब्लम मैं चुटकियों में दूर कर देती हूं।"
"क...कैसे?"
"अरे! कैसे क्या पागल?" उधर से साक्षी ने कहा──"कल मैं तेरे घर आ जाऊंगी और तेरे हसबैंड से खुद कहूंगी कि मैं तुझे अपने साथ एक ज़रूरी काम से ले जा रही हूं। अब ऐसा तो है नहीं कि तेरे हसबैंड मुझे इसके लिए मना कर देंगे। सही कहा ना?"
"हम्म्म, ये तो सही कहा तूने।" प्रिया ने उसकी बात सुन कर मन ही मन ये सोच कर राहत की सांस ली कि चलो साक्षी ने अपनी चतुराई से उसकी सबसे बड़ी समस्या दूर कर दी है।
"चल अब रखती हूं मैं।" साक्षी ने कहा──"कल तैयार रहना। मैं सुबह दस बजे के बाद किसी भी वक्त तेरे पास पहुंच जाऊंगी।"
प्रिया ने ठीक है कहा तो उधर से साक्षी ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
प्रिया काफी देर तक इन्हीं सब बातों के बारे में सोचती रही।
फिर वो पुनः सब्जियां काटने में लग गई।
To be continued...
Apan itni mehnat se likh raha aur ju ko chaar line review dene me taklif ho rahi haiAaj no review just one question
Kitne update baki he![]()
