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Story ka naam Beraham Ishq heUpdate ~ 12
अशोक की हालत सच में ठीक नहीं थी।
एक्सीडेंट बुरी तरह हुआ था।
शुक्र इस बात का था कि टक्कर विपरीत दिशा से हुई थी और वो दूसरी तरफ ड्राइविंग सीट पर था।
अगर इस तरफ से टक्कर होती तो यकीनन वो ऑन द स्पॉट यमलोक पहुंच गया होता।
हालाकि टक्कर इतनी तेज़ थी कि विपरीत दिशा में होने के बाद भी उसे गहरी चोटें आईं थी।
ये तो उसकी किस्मत थी कि दो लोगों ने फ़ौरन ही उसे हॉस्पिटल ले जाने का प्रबंध कर दिया था वरना ज़्यादा खून बह जाने की वजह से उसका ज़िंदा रहना मुश्किल ही था।
प्रिया और अंकिता जिस वक्त ऑटो से उतर रहीं थी ठीक उसी वक्त एक कार तेज़ी से आ कर ऑटो के पीछे रुकी।
अभी प्रिया ने कार की तरफ देखा ही था कि ऑटो वाले ने उससे किराए के पैसे मांगे।
प्रिया को अब जा कर ध्यान आया कि रोने धोने और मारे हड़बड़ाहट में वो अपना पर्स तो लाना ही भूल गई है।
वो ये सोच कर घबरा उठी कि अब वो ऑटो वाले को पैसे कैसे देगी?
"अरे! प्रिया अच्छा हुआ तू यहीं मिल गई मुझे।" ऑटो के पीछे रुकी कार का दरवाज़ा खोल कर साक्षी उसके पास आते ही बोली──"तेरे फ़ोन करने पर मैं जिस हालत में थी वैसे ही अपने हसबैंड के साथ यहां चली आई। चल जल्दी अंदर।"
"वो...वो साक्षी बात ये है कि इस ऑटो वाले को देने के लिए इस वक्त मेरे पास पैसे ही नहीं हैं।" प्रिया ने झिझकते हुए उससे कहा──"फ़ोन पर जब ऐसी ख़बर सुनी तो किसी बात का होश ही नहीं रह गया था मुझे।"
"ओह! हां समझ सकती हूं।" साक्षी ने फ़ौरन ही अपना पर्स खोला और उसमे से सौ का एक नोट प्रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा──"ये ले, इसे ऑटो वाले को पकड़ा और फ़ौरन अंदर चल।"
कुछ ही देर में तीनों हॉस्पिटल के अंदर पहुंच गए।
अभी वो इधर उधर देख ही रही थी कि साक्षी का पति यानि विशाल अग्निहोत्री भी आ गया।
प्रिया ने एक नज़र उसे देखा।
जबकि साक्षी ने अपने पति से कहा कि वो फ़ौरन पता करे कि प्रिया के हसबैंड को यहां कहां पर भर्ती किया गया है?
विशाल फ़ौरन ही इस काम में लग गया।
जल्दी ही उसने पता लगा लिया और साथ ही डॉक्टर्स से बात भी की।
इस हॉस्पिटल में उसके कुछ जान पहचान वाले डॉक्टर थे इस लिए उसे किसी बात की परेशानी अथवा असुविधा नहीं हुई।
प्रिया और अंकिता बहुत ही ज़्यादा बेचैन और दुखी नज़र आ रहीं थी।
वो एक नज़र अशोक को देख लेना चाहतीं थी।
विशाल ने डॉक्टर से बात की तो डॉक्टर ने बताया कि इस वक्त अशोक से मिलना संभव नहीं है क्योंकि इस वक्त वो आई सी यू में है।
आई सी यू का नाम सुनते ही प्रिया की आंखें एक बार फिर से छलक पड़ीं।
अंकिता भी सिसक उठी।
साक्षी ने दोनों को सम्हाला।
विशाल अपने पहचान के डॉक्टरों से बात चीत करने में लगा हुआ था।
"फ़िक्र मत कर प्रिया।" साक्षी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा──"अशोक जी को कुछ नहीं होगा। ऊपर वाले की दया से वो यहां तक पहुंच गए हैं तो आगे भी सब अच्छा ही होगा।"
"पता नहीं ऊपर वाला क्या चाहता है मुझसे?" प्रिया का मन जाने कहां कहां भटक रहा था──"अब तक तो सब ठीक ही था लेकिन अब जाने कहां से ऐसी मुसीबतें और ऐसे दुख मेरे सामने आ खड़े हुए हैं?"
"धीरज रख प्रिया।" साक्षी ने कहा──"तू बिना मतलब की बातें मत सोच। तुझे भी पता है कि दुनिया में कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ इस तरह के हादसे होते ही रहते हैं। आज तेरे साथ हुआ है तो कल किसी और के साथ होगा। दुनिया में सबके साथ कुछ न कुछ होता ही रहता है। तू बेकार की बातें मत सोच और ऊपर वाले से प्रार्थना कर कि वो अशोक जी को जल्द से जल्द ठीक कर दें।"
प्रिया सचमुच आंखें बंद कर के मन ही मन ऊपर वाले से प्रार्थना करने लगी।
मासूम अंकिता भी उसे देख कर उसी के जैसे आंखें बंद कर के ऊपर वाले से अपने डैड को जल्दी ठीक कर देने की प्रार्थना करने लगी।
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क़रीब दो घंटे बाद आई सी यू का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर सफेद कोट पहने तथा हाथों में ग्लव्स पहने बाहर निकला।
विशाल लपक कर उसके क़रीब पहुंचा।
प्रिया, अंकिता और साक्षी भी तेज़ी से उसकी तरफ लपकीं।
"सब ठीक तो है ना डॉक्टर?" विशाल ने उससे पूछा।
डॉक्टर ने विशाल के साथ साथ बाकी तीनों की तरफ देखा।
उसके यूं देखने से प्रिया और अंकिता की सांसें अटक सी गईं।
"डोंट वरी।" तभी डॉक्टर ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"अब वो ख़तरे से बाहर हैं लेकिन....।"
"ल...लेकिन क्या डॉक्टर साहब?" प्रिया ये पूछने से खुद को रोक न सकी।
उसके मन में एकाएक ही तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।
"हमने तो अपनी तरफ से पूरी ही कोशिश की है।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उस व्यक्ति का भी सबसे ज़्यादा योगदान है जिसने उन्हें समय पर यहां पहुंचाया भी और उन्हें अपना खून भी दिया था।"
"भगवान का लाख लाख शुक्र है।" प्रिया ने मन ही मन उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए कहा──"मेरे डूबते संसार को उस फ़रिश्ते ने अपना खून दे कर बचा लिया। भगवान उसे हमेशा खुश रखे और उसके जीवन में कभी भी ऐसा संकट न आए।"
"वैसे डॉक्टर वो था कौन?" विशाल ने डॉक्टर से पूछा──"हम ऐसे नेक आदमी से मिलना चाहते हैं।"
"वैसे तो वो एक मामूली सा टैक्सी ड्राइवर था।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन इतना बड़ा काम कर के वो महान बन गया। दुर्भाग्य से हमारे हॉस्पिटल में उस ग्रुप का खून बस थोड़ा ही बचा था। जब उस टैक्सी ड्राइवर को पता चला तो उसने बताया कि उसका खून भी उसी ग्रुप का है जिस ग्रुप के खून की पेशेंट को ज़रूरत थी। अब जबकि वो खुद ही अपना खून देने को तैयार था तो हमने भी देरी नहीं की। इसी लिए मैंने कहा कि वो व्यक्ति महान था और पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उसका बहुत बड़ा हाथ है।"
डॉक्टर के मुख से टैक्सी ड्राइवर की बात सुन जाने क्यों प्रिया को अरमान का ख़याल आ गया।
उसकी धड़कनें अनायास ही तेज़ी से धड़कनें लगीं।
अनायास ही उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं वो टैक्सी ड्राइवर अरमान तो नहीं रहा होगा?
नहीं नहीं, इतना बड़ा इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता।
"आपने उस टैक्सी ड्राइवर से उसका नाम पता तो पूछा ही होगा डॉक्टर।" उधर विशाल डॉक्टर से कह रहा था──"हम जानना चाहते हैं उस आदमी के बारे में। इतना बड़ा उपकार करने वाले का हम तहे दिल से धन्यवाद देना चाहते हैं।"
"हमारे पूछने पर उसने सिर्फ इतना ही बताया था कि उसका नाम अरमान है।" डॉक्टर ने कहा──"जी हां यही नाम बताया था उसने──अरमान...जिंदल। उस समय क्योंकि समय कम था इस लिए हमने उसका पता जानने पर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।"
अरमान नाम सुनते ही प्रिया का दिल धक्क से रह गया।
अभी कुछ पल पहले वो यही सोच रही थी कि इतना बड़ा इत्तेफ़ाक उसके साथ नहीं हो सकता लेकिन ऐसा इत्तेफ़ाक हो चुका था।
अरमान नाम का प्राणी अपना खून दे कर उसके पति की जान बचा चुका था।
प्रिया को समझ न आया कि ऊपर वाला ये कैसी अजीब लीला कर रहा है उसके साथ?
वो सोचने पर मजबूर हो गई कि जब उसके पति का एक्सीडेंट हुआ तो अरमान ही क्यों अपनी टैक्सी में उसे ले कर हॉस्पिटल आया था?
कोई दूसरा क्यों नहीं आया?
क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक था या ऊपर वाले की कोई लीला?
आख़िर अरमान उस जगह पर कैसे था?
"क्या अब हम उन्हें देख सकते हैं डॉक्टर?" विशाल की आवाज़ से प्रिया का ध्यान भंग हुआ।
"अभी तो फिलहाल आप लोग बाहर से ही उन्हें देख सकते हैं।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन थोड़े समय बाद जब उन्हें दूसरे वार्ड में सिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप लोग उन्हें क़रीब से देख सकेंगे। अच्छा, अब मैं चलता हूं।"
डॉक्टर इतना कह कर चला गया।
प्रिया और अंकिता फ़ौरन अशोक को देखने के लिए बेचैन हो उठीं।
यही हाल साक्षी और विशाल का भी था।
वो सब फ़ौरन ही आई सी यू की तरफ बढ़े।
आई सी यू के दरवाज़े के ऊपर लगे ग्लास से सबसे पहले प्रिया और अंकिता ने अंदर झांका।
अंदर बेड पर अशोक आंखें बंद किए लेटा हुआ था।
उसके सिर और माथे के साथ साथ दाईं बाजू पर भी पट्टी बंधी हुई थी।
उसकी ये हालत देख प्रिया और अंकिता की आंखें फिर से छलक पड़ीं।
"अरे! अब क्यों ऐसे रो रही हो तुम दोनों?" पीछे से साक्षी ने कहा──"तुम दोनों की दुआ से देखो ये सही सलामत बच गए हैं। बाकी जो थोड़ी बहुत चोटें हैं वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।"
साक्षी की इस बात से प्रिया और अंकिता ने आंसू बहाना बंद किया।
वो दोनों जब ग्लास से हटीं तो विशाल और साक्षी ने भी ग्लास से अंदर झांक कर अशोक को देखा।
उसके बाद विशाल ये कह कर चला गया कि वो डॉक्टर से ये पता कर के आता है कि अशोक जी को यहां कब तक रहना होगा?
विशाल के जाने के बाद साक्षी ने प्रिया और अंकिता को एक तरफ रखे बेंच पर बैठाया।
वो खुद भी उनके साथ बैठ गई।
"आज अगर उन्हें कुछ हो जाता तो हम दोनों मां बेटी का क्या होता साक्षी?" प्रिया दुखी भाव से बोल पड़ी──"पहले ही उनकी मां मुझे करमजली और बांझ कह कर जाने क्या क्या सुनाती रहती थीं और आज अगर कोई अनर्थ हो जाता तो जाने क्या हो जाता। अंकिता को तो वो अपने पास रख लेतीं लेकिन मुझे धक्के मार कर अपने घर से निकाल देतीं।"
"ऐसा मत कहिए आंटी।" अंकिता झट से बोल पड़ी──"मैं कभी आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। आप जहां जाएंगी मैं भी जाऊंगी।"
"मेरी बच्ची।" प्रिया ने भावना में बह कर अंकिता को खुद से छुपका लिया।
इधर अंकिता की बात सुन साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गई कि अगर सच में ऐसा कोई अनर्थ हो जाता तो प्रिया का सच में क्या होता?
अगर उसकी बात सच मान ली जाए तो क्या सचमुच उसकी सास उसे अपने घर से निकाल देती और क्या उसके साथ अंकिता भी रहती?
साक्षी ये भी महसूस कर रही थी कि प्रिया अशोक और अंकिता के प्रति कुछ ज़्यादा ही जज़्बात रखती है।
हालाकि ये स्वाभाविक ही है क्योंकि अशोक तो उसका पति ही है और अंकिता उसकी सौतेली बेटी है।
एक ऐसी बेटी जिसने आज तक उसे मां नहीं कहा बल्कि हमेशा आंटी ही कहा है।
साक्षी को समझ न आया कि ऐसे में प्रिया क्या इतना आसानी से अशोक को तलाक़ देने का सोच सकेगी?
क्या वो इतनी आसानी से अंकिता जैसी अपनी सौतेली बेटी से मुंह मोड़ सकेगी?
साक्षी को महसूस हुआ कि ये इतना आसान नहीं होगा।
मतलब साफ है कि अभी इसके लिए समय लगेगा।
अभी और ज़्यादा मंथन की ज़रूरत है।
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डॉक्टर ने अशोक को घर ले जाने की इजाज़त नहीं दी थी।
बल्कि उसे क़रीब एक हफ़्ता हॉस्पिटल में ही रखने का मशवरा दिया था।
विशाल ने भी प्रिया से यही कहा कि अशोक जी के लिए यही बेहतर होगा।
बाकी वो किसी बात की फ़िक्र न करें।
साक्षी की दोस्त होने के नाते उसका ये दुख और उसकी इस परेशानी को वो अपनी परेशानी जैसा ही समझता है।
प्रिया को इस बात से बहुत राहत मिली थी।
वो साक्षी जैसी दोस्त पर गर्व महसूस करने लगी थी और साथ ही उसका एहसान भी मानने लगी थी।
विशाल ने उसके सामने ही साक्षी से कहा था कि प्रिया को जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो वो फ़ौरन ही उसे पूरी करे।
प्रिया से भी उसने कहा था कि वो किसी बात के लिए संकोच न करें।
सबके जीवन में दुख दर्द और परेशानियां आती हैं लेकिन मुसीबत में साथ देना ही इंसानियत होती है और एक दोस्त का फर्ज़ होता है।
अशोक को दूसरे दिन होश आया था।
अपने क़रीब प्रिया और अंकिता को देखते ही उसकी आंखें भर आईं थी।
यही हाल प्रिया और अंकिता का भी हुआ था।
अंकिता तो अपने डैड से लिपट कर रोने ही लगी थी।
प्रिया ने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला हुआ था।
अंकिता की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो इसके लिए साक्षी ने उसे बड़े अच्छे तरीके से समझा कर स्कूल जाने के लिए मनाया था।
हालाकि प्रिया का भी इसमें उतना ही हाथ था।
अशोक साक्षी से पहली बार मिला था।
जब उसे पता चला कि साक्षी उसकी बीवी की कॉलेज के समय की दोस्त है तो उसे बड़ी हैरानी हुई और साथ ही खुशी भी।
बहरहाल ऐसे ही समय गुज़रता गया और देखते ही देखते एक हफ़्ता गुज़र गया।
इस बीच एक बात ज़रूर अजीब हुई कि अशोक जब से होश में आया था तो विशाल उससे मिलने एक बार भी नहीं आया था।
ज़ाहिर है अगर वो आता तो अशोक उसे पहचान जाता।
वो ये जान जाता कि ये उसकी कंपनी का वही नौजवान अधिकारी है जिसने उसको गहन परेशानी में डाल रखा है।
हालाकि साक्षी के द्वारा जब उसे उसके पति का नाम विशाल पता चला तो एक बार के लिए उसके मन में उसी नौजवान अधिकारी का ख़याल आ गया था।
फिर उसने ये सोच कर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि विशाल नाम के दुनिया में बहुत से लोग हैं।
हालाकि साक्षी से वो अक्सर कहता था कि वो विशाल जी को धन्यवाद देने के इरादे से उनसे मिलना चाहता है।
साक्षी उससे यही कहती कि वो एक ज़रूरी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं।
जैसे ही वो आएंगे तो वो उन्हें उससे मिलने आने का ज़रूर बोलेगी।
आख़िर एक हफ्ते बाद अशोक को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और वो प्रिया तथा साक्षी के साथ अपने फ्लैट पर आ गया।
अंकिता स्कूल गई हुई थी।
उसके एक्सीडेंट की ख़बर उसकी कंपनी में भी पहुंच गई थी।
कंपनी के कुछ लोग एक दो बार उससे मिलने हॉस्पिटल आए थे।
बाकी के कुछ लोग फ़ोन द्वारा उसका हाल चाल पूछ लेते थे।
सही सलामत अपने घर आ कर अशोक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका नया जन्म हुआ है।
उसने अपनी बीवी प्रिया और उसकी दोस्त साक्षी को बार बार धन्यवाद दिया।
उसके इलाज़ का सारा खर्च साक्षी के पति विशाल ने उठाया था।
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"तू साले कब तक उस बुढ़ऊ से छुपता फिरेगा?" टैक्सी की पैसेंजर शीट पर बैठे विशाल से अरमान ने कहा──"किसी दिन बढ़िया सा मुहूर्त निकाल कर उसे अपने दर्शन करा ही दे। उस बुढ़ऊ को भी तो पता चले कि वो तू ही है जिसने कंपनी में उसकी सांसें हलक में अटका रखी हैं और एक्सीडेंट में उसके इलाज़ का खर्चा भी तूने ही उठाया है।"
"वो तो उससे मिलना ही पड़ेगा यार।" विशाल ने कहा──"लेकिन तू क्यों सच सच ये नहीं बता रहा कि उसका एक्सीडेंट स्वाभाविक रूप से हुआ था या उसमें तेरी कोई मेहरबानी थी?"
"तुझे ऐसा क्यों लगता है कि ऐसा मैंने करवाया होगा?" अरमान ने इस बार उसे गुस्से से देखा──"तू अच्छी तरह जानता है कि ऐसा घटिया काम करने का सोच भी नहीं सकता मैं। कितनी बार तुझे ये बात बता चुका हूं फिर भी तुझे मेरी बात पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा?"
"तो तेरे अनुसार उस रात उसने दारू पी रखी थी?" विशाल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा──"और उसके दारू पीने की वजह मैं था? मैं इस लिए क्योंकि मेरी वजह से वो बेहद चिंतित और परेशान था?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"ये तो संयोग था कि उसी समय मैं अपनी टैक्सी से एक सवारी उतार कर उधर से गुज़र रहा था। शोर शराबा और भीड़ भाड़ देख कर मैं भी टैक्सी को एक साइड लगा कर उस तरफ चला गया था। भीड़ को चीर कर जब मैं आगे पहुंचा तो देखा कुछ लोग कार से एक आदमी को निकाल रहे थे। आदमी खून में बुरी तरह नहाए जा रहा था। अचानक मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो मैं ये देख के बुरी तरह चौंक गया कि ये तो प्रिया का हसबैंड है। कुछ पलों के लिए तो यकीन ही नहीं हुआ मुझे कि वो प्रिया का हसबैंड है लेकिन सच तो सच ही था। माना कि उससे प्रिया को हासिल करना मेरी आख़िरी ज़िद थी लेकिन इस तरीके से तो हर्गिज़ नहीं। मैंने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर उन आदमियों की मदद से उसे अपनी टैक्सी में शिफ्ट किया और फिर जितना जल्दी हो सका उसे अपोलो हॉस्पिटल ले गया। शुक्र था कि एक आदमी मेरे साथ था जिसके चलते डॉक्टर ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की और फ़ौरन ही उसे आई सी यू में शिफ्ट कर दिया। इधर उसकी इस हालत के चलते मेरे अंदर भी तूफ़ान चालू था। मुझे उसका मोबाइल उसकी जेब में ही पड़ा मिल गया था इस लिए मैंने डॉक्टर के द्वारा उसकी बीवी यानी प्रिया को फोन करवाया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आया तो उसने कहा कि उसका खून बहुत ज़्यादा बह गया है और उसके ग्रुप का खून हॉस्पिटल में उस वक्त इतना उपलब्ध नहीं है जितने की उसे ज़रूरत है। डॉक्टर के मुख से ही मैंने सुना था कि उसका ब्लड ग्रुप क्या है। अजब संयोग था क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था जो प्रिया के हसबैंड का था। मैंने फ़ौरन ही डॉक्टर को ये बात बताई और उससे कहा कि वो मेरे जिस्म से खून निकाल कर उसको चढ़ाए। बस इतनी सी ही कहानी थी।"
"बड़े आश्चर्य की बात है।" विशाल गहरी सांस लेते हुए बोला──"एक साथ कितने इत्तेफ़ाक हुए। आम तौर पर ऐसा होना इंपॉसिबल है। ख़ैर जो भी हो, अच्छी बात ये है कि तेरी मेहरबानी के चलते प्रिया का हसबैंड बच गया। वैसे हॉस्पिटल में मैंने देखा था कि इस हादसे की वजह से प्रिया बहुत ज़्यादा सदमे में आ गई थी। उस समय उसकी हालत देख कर मैं और साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गए थे कि अगर वो अपने हसबैंड के लिए इतने गहरे जज़्बात रखती है तो फिर कैसे वो उसे तलाक़ देने का सोचेगी और फिर कैसे वो तुझसे शादी करने का सोचेगी?"
"असंभव चीज़ को ही तो संभव बनाना है माई डियर।" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"एंड ट्रस्ट मी, ऐसा चमत्कार ज़रूर होगा।"
"यार मुझे तो ऐसा कहीं से भी नहीं लगता।" विशाल ने कहा──"पता नहीं तुझे इतना यकीन कैसे है?"
"बदले हुए वक्त और हालातों की वजह से इतना यकीन है।" अरमान ने कहा──"तुझे भी पता है कि इंसान जैसे कर्म करता है वैसा ही कर्म फल पाता है। प्रिया ने जो कर्म किया था उसका भुगतान करने के लिए एक न एक दिन इस शहर में लौट कर आना ही उसकी नियति बन चुकी थी। जिस ऐशो आराम की ख़्वाहिश के चलते उसने मुझे ठुकरा कर किसी और से शादी की थी वो ज़्यादा समय तक चलने वाला नहीं था। बड़ी सिंपल सी बात है डियर कि कोई भी इंसान किसी का इस हद तक दिल दुखा कर हमेशा खुश नहीं रह सकता। उसके बुरे कर्म जल्द ही उसकी खुशियों पर ग्रहण लगाते हैं और फिर उसे उस इंसान के सामने ला कर खड़ा कर देते हैं जिसे उसने कभी दुख दिया होता है। प्रिया के साथ कुदरत ने यही तो किया है। साढ़े सात सालों बाद जिस दिन वो मुझे उस फाइव स्टार होटल के बाहर मिली थी उसी दिन मैं समझ गया था कि कुदरत ने उसे इसी लिए मेरे सामने ला कर खड़ा किया है ताकि इस शहर में उसके बुरे कर्म का हिसाब हो सके और उसे ऐसे ऐसे दुख दर्द का एहसास हो सके जिसका उसने कभी तसव्वुर भी न किया हो।"
"यार बड़ी अजीब और ख़तरनाक बातें कर रहा है तू।" विशाल ने हैरानी से अरमान को देखा──"आख़िर क्या चल रहा है तेरे अंदर? प्रिया के प्रति तेरे इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे मुझे।"
"फ़िक्र मत कर।" अरमान ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर उसके धुएं को उगलते हुए कहा──"अपनी ज़िंदगी में सिर्फ उसी को तो टूट टूट कर चाहा है मैंने। ज़ाहिर है उसे ऐसी तकलीफ़ तो नहीं दे सकूंगा जिसके चलते खुद मुझे भी तकलीफ़ हो। मगर हां, इतना तो उसे ज़रूर मिलेगा जितने में उसे ये एहसास हो सके कि किसी के द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने से एक इंसान कैसे घुट घुट के जीता है?"
उसकी बातें सुन कर विशाल के समूचे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
किसी अंजानी आशंका के चलते उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी पैदा हो गई थी।
जाने कैसे कैसे ख़याल उसके मन में उभरते चले गए।
उधर अरमान के चेहरे पर अजीब सी सख़्ती छाई हुई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो अंगुलियों के मध्य फंसी सिगरेट आधे से ज़्यादा सुलग चुकी थी।
To be continued...
Isse jyada na kam ki apeksha hum nahi karenge.
Par ha sanyog bhi yoga yog se he bante he, ab ye yogayog prakritik ho ya sawdhani se bune hue jaal ho ye to koi nahi keh sakta
Arman ne kaha ke Ashok nashe me tha
Kahani ka saar yahi he ke pyaar matt karna aur karna to bhi itna na karna ke pyar ke ilawa tumhare paas kuchh bache na !


